विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
३३२ विनय-पत्रिका मानुष जन्म महा अति दुर्लभ, तुम समझो अभिमानी। लोभ नदीकी लहर बहुतु है, बूड़ोगे बिनु पानी ॥ जोगी जैहैं जंगम जैहैं औ जैहैं बड़ ज्ञानी। कहै कबीर एक सन्त न जैहैं जाको चित ठहरानी ॥ [ १९९ ] काहे को फिरत मूढ़ मन धायो । तजि हरि-चरन-सरोज सुधारस, रविकर-जल लय लायो ॥१॥ त्रिजग देव नर असुर अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो । गृह, बनिता, सुत, बंधु भये बहु, मातु पिता जिन्ह जायो ॥२॥ जाते निरय-निकाय निरंतर, सोइ इन्ह तोहि सिखायो । तुव हित होइ, कटै भव-बंधन, सो मग तोहि न बतायो ॥३॥ अजहुँ बिषय कहँ जतन करत, जद्यपि बहु विधि डहँकायो । पावक-काम भोग-घृत तें सठ, कैसे परत बुझायो ॥४॥ बिषय हीन दुख, मिले बिपति अति सुख सपनेहुँ नहिं पायो । उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यों धन दुखप्रद श्रुति गायो ॥५॥ छिन-छिन छीन होत जीवन, दुर्लभ तनु वृथा गँवायो । तुलसिदास हरि भजहि आस तजि, काल-उरग जग खायो ॥६॥ शब्दार्थ—त्रिजग = तिर्यक् (पशुपक्षी) । निरय = नरक । निकाय = समूह । डहँकायो = ठगा गया । प्रेत-पावक = प्रेतकी आग । भावार्थ—रे मूढ़ मन ! तू किसलिए दौड़ता फिर रहा है ? भगवच्चरणा- रविन्दके सुधारसको छोड़कर तूने मृगतृष्णाके जलमें लगन लगा रखी है ॥१॥ पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, राक्षस एवं संसारमें और जितनी योनियाँ हैं, सबमें तू घूम आया । बहुतसे घर, स्त्री, पुत्र, भाई तथा तुझे उत्पन्न करनेवाले माता- पिता हुए ॥२॥ किन्तु इन सबने तुझे वही सिखाया जिससे तेरे लिए नरक-समूह निरन्तर बना रहे (तुझे नरकोंमें ही रहना पड़े); ऐसा मार्ग इन सबने तुझे नहीं बताया जिससे तेरा हित हो, और संसार-बन्धन कट जाय ॥३॥ यद्यपि तू अनेक तरहसे ठगा गया, फिर भी तू अभीतक विषयोंके ही लिए यत्न कर रहा
है। किन्तु रे दुष्ट ! कामरूपी अग्निमें भोगरूपी घी डालते रहनेसे वह कैसे बुझेगी ? ॥४॥ विषयोंके साधनसे रहित होनेमें भी दुःख हुआ और विषयोंके मिल जानेपर तेरी भारी विपत्ति हुई; तुझे तो स्वप्नमें भी सुख नहीं मिला। इसलिए वेदोंने विषयरूपी धनको दोनों ही प्रकारसे भूतके लुककी तरह दुःखप्रद कहा है; (तात्पर्य यह कि विषयी पुरुषोंको न तो विषयकी प्राप्तिमें ही सुख मिलता है और न अप्राप्तिमें ही) ॥५॥ क्षण-प्रति-क्षण तेरा जीवन क्षीण होता जा रहा है, तूने इस दुर्लभ शरीरको व्यर्थ ही खो दिया। ऐ तुलसीदास ! तू सब आशाओं- को छोड़कर हरिभजन कर। देख, कालरूपी सर्प संसारको खाये जा रहा है ॥६॥ [ २०० ] ताँवे सो पीठि मनहुँ तन पायो । नीच, मीच जानत न सीस पर, ईस निपट बिसरायो ॥१॥ अवनि-रवनि, धन-धाम, सुहृद-सुत, को न इन्हहिं अपनायो ? काके भये, गये सँग काके, सब सनेह छल-छायों ॥२॥ जिन्ह भूपनि जग-जीति, बाँधि जम, अपनी बाँह वसायो । तेऊ काल कलेऊ कीन्हें, तू गिनती कव आयो ॥३॥ देखु विचारि, सार का साँचो, कहा निगम निजु गायो । भजहि न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि, जेहि महेस मन लायो ॥४॥ शब्दार्थ—निपट = बिलकुल । रवनि = रमणी । छायो = भरा हुआ है। निजु = यथार्थतः । भावार्थ—मानो तूने ताँबेसे मढ़ा हुआ शरीर पाया है। (अर्थात् तूने इस नश्वर शरीरको अजर-अमर समझ लिया है) । रे नीच ! तू नहीं जानता कि मौत तेरे सिरपर (खड़ी) है, फिर भी तूने परमात्माको बिलकुल ही भुला दिया है ॥१॥ पृथिवी, स्त्री, धन, मकान, सुहृद् और पुत्र इन सबको किसने नहीं अपनाया ? (अर्थात् सबने अपनाया)। किन्तु ये किसके हुए ? किसके साथ गये ? यह सब स्नेह छलसे भरा हुआ है ॥२॥ जिन राजाओंने संसारको जीतकर अपनी भुजाओंके बलसे यमराजको बाँधकर अधीन कर लिया था, उन्हें भी जब प्रबल काल कलेवा कर गया, तो तू किस गिनतीमें है ॥३॥ विचार कर देख, सच्चा तथ्य
३३४ विनय-पत्रिका क्या है, वेदोंने यथार्थतः क्या कहा है। हे तुलसी ! अब भी तू सोच-समझकर उसे नहीं भज रहा है, जिसमें भगवान् शंकरजीने अपना मन लगा रखा है ॥४॥ विशेष १—‘अवनि······अपनायो’—किन्तु इनके अपनानेसे क्या हुआ ? देखिये इसपर गुसाईंजी क्या कहते हैं— झूमत द्वार अनेक मतङ्ग जँजीर जरे मद अम्बु चुचाते। तीख तुरङ्ग मनोगति चञ्चल पौनके गौनहु ते बढ़ि जाते ॥ भीतर चन्द्रमुखी अवलोकति बाहर भूप खड़े न समाते। ऐसे भये तौ कहा तुलसी जो पै जानकीनाथके रङ्ग न राते ॥ [ २०१ ] लाभ कहा मानुष-तनु पाये। काय-बचन-मन सपनेहुँ कवहूँक घटत न काज पराये ॥१॥ जो सुख सुरपुर-नरक, गेह-बन आवत बिनहिं बुलाये। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन, समुझत नहिं समुझाये ॥२॥ पर-दारा, पर-द्रोह, मोह वस किये मूढ़ मन भाये। गरभबास दुखरासि जातना तीव्र बिपति बिसराये ॥३॥ भय-निद्रा, मैथुन-अहार, सबके समान जग जाये। सुर-दुर्लभ तनु धरि न भजे हरि मद अभिमान गँवाये ॥४॥ गई न निज-पर-बुद्धि, सुद्ध ह्वै रहे न राम-लय लाये। तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनिके पछिताये ॥५॥ शब्दार्थ—मैथुन = स्त्रीप्रसंग। जाये = जन्म लिया है। लय = प्रीति, ध्यान। भावार्थ—मनुष्य-शरीर पानेसे क्या लाभ हुआ, यदि वह शरीर, वचन और मनसे स्वप्नमें भी कभी दूसरोंके काम नहीं आया ॥१॥ जो सुख स्वर्ग, नरक, घर और वनमें बिना बुलाये ही आ जाता है, उस सुखके लिए रे मन ! तू बहुत-से यत्न करता है और समझानेपर भी नहीं समझता ॥२॥ हे मूढ़ ! तूने मोहवश होकर दूसरेकी स्त्रीके लिए और दूसरोंसे वैर करनेके लिए मनमाने काम
विनय-पत्रिका ३३५ किये। तूने गर्भवासके महान् दुःख, तीव्र यातना और विपत्तिको भुला दिया; तभी तो ऐसा कर रहा है ! यदि उस कष्टकी तुझे जरा भी सुध होती तो क्या तू फिर वही यंत्रणा भोगनेका काम करता ? (कभी नहीं) ॥३॥ यों तो संसारमें जिसने जन्म लिया है, सबमें भय, निद्रा, मैथुन, आहार आदि एक-से हैं; किन्तु तूने देवताओंके लिए दुर्लभ मानव-शरीर धारण करनेपर भी ईश्वर-भजन नहीं किया, मद और अभिमानमें चूर होकर उसे खो दिया (ऐसी दशामें तुझमें और संसारके इतर-प्राणियोंमें अन्तर ही क्या रहा ?) ॥४॥ यदि अपने-परायेकी बुद्धि न गयी, और शुद्ध भावसे रामजीमें प्रीति न की, तो तुलसीदास कहते हैं कि यह अवसर बीत जानेपर फिर पछतानेसे क्या (लाभ) होगा ? ॥५॥ विशेष १—'भय निद्रा ॰॰॰॰जाये'—इस विषयमें लिखा है- 'आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥ —महाभारत, शान्तिपर्व अर्थात् आहार, निद्रा, भय और मैथुन, मनुष्यों और पशुओंके लिए समान ही स्वाभाविक है। उनमें भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन्हें मर्यादित करनेका) । इस धर्मसे हीन मनुष्य पशुके समान ही है। [ २०२ ] काजु कहा नरतनु धरि साध्यो । पर-उपकार सार स्रुति को जो, सो धोखेहु न विचार्यो ॥१॥ द्वैत मूल, भय-सूल, सोक-फल, भवतरु टरैं न टाऱ्यो । राम भजन-तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निबाऱ्यो ॥२॥ संसय-सिंधु नाम-बोहित भजि निज आतमा न ताऱ्यो । जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हाऱ्यो ॥३॥ देखि आनकी सहज सम्पदा द्वेष-अनल मन-जाऱ्यो । सम, दम, दया दीन-पालन, सीतल हिय हरि न सँभाऱ्यो ॥४॥
३३६ विनय-पत्रिका प्रभु गुरु पिता सखा रघुपति तैं मन क्रम बचन बिसारयो । तुलसिदास यहि आस, सरन राखिहि जेहि गीध उबारयो ॥५॥ शब्दार्थ- कुठार = कुल्हाड़ी । आनकी = दूसरेकी । अनल = आग । भावार्थ-मनुष्य-शरीर धारण करके तूने कौन-सा काम पूरा किया ? जो परोपकार वेदोंका सार या निचोड़ है, उसपर तूने भूलकर भी विचार नहीं किया (करना तो दूर रहा) ॥१॥ यह संसार वृक्षके समान है; द्वैतभाव (अर्थात् देहको आत्मा मानना) इस संसार-वृक्षकी जड़ है, भय ही चुभनेवाले काँटे हैं और शोक ही फल हैं। यह वृक्ष हटानेसे नहीं हट सकता । यह तो केवल राम-भजनरूपी तेजधारकी कुल्हाड़ी लेकर काटनेसे कटता है, सो तूने उसे नहीं काटा ॥२॥ संशय-समुद्रसे पार होनेके लिए नामरूपी नौकाका सेवन कर । तूने अपनी आत्माका उद्धार नहीं किया । तू अनेक जन्मतक विवेकहीन होकर नाना योनियोंमें घूमनेपर भी न थका ॥३॥ दूसरोंकी सहज सम्पत्ति देखकर तू अपने मनको द्वेषकी आगमें जलाता रहा; किन्तु शम, दम, दया और गरीबोंका पालन करते हुए शीतल हृदयसे परमात्माकी सेवा नहीं की ॥४॥ तूने मन, कर्म और वचनसे अपने प्रभु, गुरु, पिता और सखा श्री रघुनाथजीको भुला दिया । किन्तु तुलसीदासको यही इतनी आशा है कि जिसने गीधको उबारा है, वह मुझे भी अपनी शरणमें रख लेंगे ॥५॥ विशेष १--'पर-उपकार सार श्रुतिको'--आचार्योंने परोपकारके समान दूसरा धर्म और दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेके समान दूसरा एक भी पाप नहीं माना है । कहा भी है-- अष्टादश पुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ भर्तृहरिने भी कहा है-- 'स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः । अर्थात् परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है । २--'गीध'--११५ वें पदके विशेषमें देखिये ।
विनय-पत्रिका ३३७ [२०३] श्री हरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान। जेहि सेवत पाइय हरि सुख-निधान भगवान ॥१॥ परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम-मिलत अति दूरि। जद्यपि निकट हृदय निज रहें सकल भरिपूरि ॥२॥ दुइज द्वैत-मति छाँड़ि चरहि महि-मण्डल धीर। विगत मोह-माया-मद हृदय बसत रघुबीर ॥३॥ तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुन्द। गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानन्द ॥४॥ चौथि चारि परिहरहु बुद्धि-मन-चित अहंकार। विमल बिचार परम पद निज सुख सहज उदार ॥५॥ पाँचइ पाँच परस, रस, सब्द, गन्ध अरु रूप। इन्ह कर कहा न कीजिये, बहुरि परब भव-कूप ॥६॥ छठ षटबरग करिय जय जनक-सुता-पति लागि। रघुपति-कृपा-वारि बिनु नहिं बुताइ-लोभागि ॥७॥ सातैं सप्तधातु-निरमित तनु करिय विचार। तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार ॥८॥ आठइँ आठ प्रकृति-पर निरविकार श्रीराम। केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम ॥९॥ नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह। ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारुन दुख लीन्ह ॥१०॥ दसइँ दसहु कर संजम जो न करिय जिय जानि। साधन वृथा होइ सब मिलहिं न सारँगपानि ॥११॥ एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ। सोइ व्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ ॥१२॥ द्वादसि दान देहु अस, अभय होइ त्रैलोक। परहित-निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक ॥१३॥ २२
३३८ विनय-पत्रिका तेरसि तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवन्त । मन-क्रम-बचन अगोचर, व्यापक, व्याप्य, अनन्त ॥१४॥ चौदसि चौदह भुवन अचर - चर - रूप गोपाल । भेद गये बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल ॥१५॥ पूनो प्रेम - भगति - रस हरि - रस जानहिं दास । सम, सीतल, गत-मान, ग्यानरत, बिषय - उदास ॥१६॥ त्रिविध सूल होलिय जरै, खेलिय अब फागु । जो जिय चहसि परम सुख, तौ यहि मारग लागु ॥१७॥ श्रुति-पुरान - बुध - सम्मत चाँचरि चरित मुरारि । करि बिचार भव तरिय, परिय न कबहुँ जमधारि ॥१८॥ संसय-समन, दमन दुख, सुखनिधान हरि एक । साधु कृपा बिनु मिलहिं न, करिय उपाय अनेक ॥१९॥ भवँसागर कहँ नाव सुद्ध संतनके चरन । तुलसिदास प्रयास बिनु मिलहिं राम दुखहरन ॥२०॥ शब्दार्थ—चरहि = विचरण कर । त्रिगुन = सत्व, रज, तम । श्रीरमन = लक्ष्मीकान्त । मुकुन्द = विष्णु । षटबरग = शरीरके भीतर स्थित परलोक विरोधी शत्रुओंका समूह काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि । लीन्ह = ले लिया, खरीद लिया । सारँगपानि = हाथमें धनुष धारण करनेवाले रामचन्द्र । गोपाल = श्रीकृष्ण । अति = जड़से । गत-मान = अहंकार- रहित । उदास = उदासीन । चाँचरि = होलीके गीत । भावार्थ—हे मन ! तू अभिमानको छोड़कर श्रीहरिरूप गुरुके उन चरण- कमलोंका भजन कर, जिनकी सेवा करनेसे आनन्दके भण्डार भगवान् हरि मिलते हैं ॥१॥ फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाकी तरह सबसे पहले प्रेमके बिना रामजीका मिलना बहुत दूर है (अर्थात् जैसे पहली तिथि प्रतिपदा है, उसी तरह भगवत्प्राप्तिके लिए पहली वस्तु प्रेम है) यद्यपि रामजी अपने हृदयमें निवास करते हैं तथापि प्रेमके बिना उनका मिलना कठिन है ॥२॥ दूजके समान दूसरा साधन यह है कि द्वैत-बुद्धि छोड़कर धीर भावसे भू-मण्डलपर विचरण कर ; मोह, माया और मदसे रहित हृदयमें ही श्रीरघुनाथजी निवास करते हैं (इसलिए तू इन विकारोंको छोड़ दे) ॥३॥ तीजके समान तीसरा साधन यह है कि सत्व-
विनय-पत्रिका ३३९ रज-तम इन तीन गुणोंसे परे परमपुरुष लक्ष्मीकान्त मुकुन्द भगवान्का परमानन्द (स्वरूपानन्द) गुण-स्वभावका त्याग किये बिना दुर्लभ है । ब्रह्म साक्षात्कार करनेके लिए गुणोंका त्याग करना आवश्यक है ॥४॥ चौथके समान चौथा उपाय है मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारका त्याग करना (अर्थात्, तादात्म्य भाव त्याग कर अन्तःकरणका द्रष्टा बन जाना चाहिये) । इनका त्याग करनेके बाद विमल विचार उत्पन्न होकर आत्मानन्दरूप परम पदको प्राप्त होना सहज हो जाता है ॥५॥ पंचमीकी तरह पाँचवाँ उपाय यह है कि पंच ज्ञानेन्द्रियोंके जो पाँच विषय हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं, उनका कहना न मान, नहीं तो संसाररूपी कुएँमें गिर जायगा ॥६॥ छठकी तरह छठा उपाय यह है कि जानकी-वल्लभ श्रीरामजीकी प्राप्तिके लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरपर विजयलाभ करना चाहिये । लोभरूपी आग ईश्वरीय कृपारूपी जलके बिना नहीं बुझती (अर्थात् लोभ बड़ा ही प्रबल है, अतः मन, वचन, कर्मसे ऐसा काम करना चाहिए जिसमें इसपर जय प्राप्त हो सके और तुझपर भगवान् की कृपा हो) ॥७॥ सप्तमीके समान सातवाँ यत्न यह है कि सात धातुओं (त्वचा- रक्त, मांस, हड्डी, मज्जा, मेद, शुक्र) से बने हुए शरीरका विचार करना चाहिये । अर्थात् यह समझना चाहिये कि यह शरीर नाशवान् है, इसे काम-क्रोधादिके वशमें नहीं होने देना चाहिये । इस शरीरका एक ही फल है; वह यह कि परोप- कार करो ॥८॥ अष्टमीके समान आठवाँ साधन यह है कि षट्-विकार-रहित श्रीरामजी अष्ट प्रकृतिसे परे हैं, अतः यह जानना चाहिये कि जबतक हृदयमें अनेक तरहकी कामनाएँ बस रही हैं, तबतक वह प्रभु किस तरह मिल सकते हैं ? तात्पर्य यह है कि इच्छाओंका त्याग करना चाहिये ॥९॥ नौमीके समान नवाँ साधन यह है कि नौ दरवाजेकी इस पुरी (शरीर)में बसकर जिसने अपना भला न किया, वह आदमी अनेक योनियोंमें भटकता फिरता है। उसे समझ लेना चाहिये कि मैंने दारुण दुःख खरीद लिया ॥१०॥ दशमीके समान दसवाँ उपाय यह है कि दसों इन्द्रियों (पञ्च ज्ञानेन्द्रिय और पञ्च कर्मेन्द्रिय) का संयम करना चाहिये । जो न कर सके, उसे अपने हृदयमें समझ लेना चाहिये कि सब साधन व्यर्थ हुए और सारंग-पाणि भगवान् रामचन्द्रजी न मिलेंगे ॥११॥ एकादशीके समान ग्यारहवाँ साधन यह है कि मनको वशमें करके केवल उस एक निःसंग,
७. प्रेम-प्रार्थना एवं राम-नाम महिमा
३४० विनय-पत्रिका शुद्ध-बुद्ध आनन्दघन परमात्माकी ही सेवा करनी चाहिये। जो आदमी ऐसा करता है, वही इस एकादशीके व्रतका फल पाता है, और उसका आवागमन (जन्म-मरण) से छुटकारा हो जाता है॥१२॥ द्वादशीके समान बारहवाँ साधन यह है कि ऐसा दान दो कि जिससे तीनों लोकोंमें कोई भय न रह जाय। परोपकार- में रत रहना ही (एकादशी व्रतके बाद द्वादशीका) वह पारण है जिससे फिर कभी शोक नहीं व्यापता ॥१३॥ तेरसके समान तेरहवाँ यत्न यह है कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओंको त्यागकर भगवान्का भजन करना चाहिये। क्योंकि वह मन, कर्म और वाणीसे परे हैं—इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं— सबमें व्याप्त हैं और स्वयं ही व्याप्य हैं (अर्थात् व्याप्य और व्यापक दोनों वही हैं) तथा अनन्त हैं ॥१४॥ चतुर्दशीके समान चौदहों भुवनोंमें चर और अचर- रूप भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं; किन्तु भेदभाव (मेरा-तेरा) दूर हुए बिना रघुनाथ- जी संसारके गहन जालको नहीं काटते। तात्पर्य यह है कि 'मेरा-तेरा' भाव दूर करो, तंव ईश्वर-कृपा होगी ॥१५॥ पूर्णिमाके समान पन्द्रहवाँ साधन यह है कि सिद्धा प्रेमा भक्तिका रस है (इस रसका आविर्भाव तब होता है, जब ऊपर कहे हुए सब साधन सम्पन्न हो जाते हैं)। इस भगवद्दर्शनरूपी रसको केवल ईश्वरके वे अनन्य भक्त जानते हैं, जो समदर्शी, शीतल (शान्त), अहंकार-रहित, ज्ञान-रत तथा सब विषयोंसे उदासीन हैं ॥१६॥ (गुसाईंजीने मनुष्योंके कल्याणके लिए पहले प्रेम, साधन और भक्तिका उल्लेख किया है और अन्तमें अनेक साधनोंके द्वारा उसे सिद्धाभक्तितक पहुँचा दिया है। फागुनकी पूर्णिमा और चैत्रकी प्रतिपदाके सन्धिकालमें होलिकादहन होता है; अतः वहाँ सांसारिक भाव- के नाश और परमात्माके दर्शनकी उत्सुकताके बीचका समय ही सन्धिकाल है। उसी सन्धिकालमें पूर्णिमाके समान सिद्धाभक्तिकी) होलीमें दैहिक, दैविक और भौतिक—इन तीन प्रकारके दुःखोंको जलाकर अच्छी तरह फाग खेलना चाहिये (आनन्द मनाना चाहिये)। यदि तू अपने हृदयमें परमानन्द चाहता है, तो इस मार्गपर चल (ऊपर कहे हुए पन्द्रह साधनोंको क्रम-क्रमसे साध) ॥१७॥ वेदों, पुराणों और पण्डितोंसे सम्मत परमात्माके चरित ही होलीके गीत हैं। इसपर विचार करके संसारसे तर जाना चाहिये और फिर कभी यमदूतोंके फेरमें नहीं पड़ना चाहिये ॥१८॥ संशयोंका नाश करनेवाले,
विनय-पत्रिका ३४१ दुःखोंको दूर करनेवाले और आनन्द-निधान केवल भगवान् ही हैं। किन्तु वह (रामजी) साधुओंकी कृपा हुए बिना नहीं मिल सकते—चाहे कितने ही उपाय क्यों न करो ॥१९॥ संसार-सागरसे पार होनेके लिए सन्तोंका पवित्र चरण ही नाव है। तुलसीदास कहते हैं कि (सन्तोंके चरणरूपी नावके सहारे अर्थात् सन्तोंकी चरण-सेवा करके) दुःखोंको हरनेवाले श्रीराम बिना परिश्रम ही मिल जाते हैं ॥२०॥ विशेष १—गुसाईंजीने इस पदमें बड़ा ही उपदेशप्रद रूपक बाँधा है। इसमें उन्होंने सिद्धाभक्ति प्राप्त होनेतककी अवधिको ही एक पक्ष माना है। पक्षमें पन्द्रह तिथियाँ होती हैं, अतः यहाँ भी क्रमशः पन्द्रह साधनोंका उल्लेख है। 'त्रिविध सूल'की होली भी खूब जलायी गयी है। चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ हैं। एक-एक तिथिमें एक-एक कलाकी वृद्धि होती है। ठीक इसी तरह काम- शास्त्रमें सोलह कलाओंके नाम इस प्रकार दिये गये हैं— ‘पूषा यशा सुमनसा रतिः प्राप्तिस्तथा धृतिः। ऋद्धिः सौम्या मरीचिञ्च तथा चैवांशुमालिनी ॥ अंगिरा शशिनी चेति छाया सम्पूर्णमंडला । तुष्टिश्चैवामृता चेति कलाः सोमश्च षोडश ॥’ भक्तवर वैजनाथजीने जीवकी भी षोडश कलाओंका उल्लेख किया है— ‘निराशा, सद्वासना, कीर्ति, जिज्ञासा, करुणा, मुदिता, स्थिरता, सुसङ्ग, उदासीनता, श्रद्धा, लज्जा, साधुता, तृप्ति, क्षमा, विवेक, विद्या।' २—‘द्वैत-मति'—जीव और ईश्वरको भिन्न समझनेवाली बुद्धि । ३—'मुकुन्द'—का अर्थ है 'मुक्तिदाता' अर्थात् विष्णु । ब्रह्मवैवर्तके श्रीकृष्णजन्म खण्डके ११० वें अध्यायमें इस शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखी है :— 'मुकुमन्ययमान्तंच निर्वाणमोक्षवाचकम् । तद्ददाति च यो देवो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥ मुकुं भक्तिरसप्रेम वचनं वेद सम्मतम् । यस्तद्ददाति विप्रेभ्यो मुकुन्दस्तेन कीर्त्तितः ॥'
३४२ विनय-पत्रिका ४—'षट् बरग'—परलोक-विरोधी भीतर स्थित शत्रुओंको कहते हैं । इन्हें अरिवर्ग भी कहते हैं। इनके नाम ये हैं—१ काम (प्राप्त वस्तुके भोगकी इच्छा), २ क्रोध (द्वेष), ३ लोभ (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिकी इच्छा), ४ मोह (आत्मा अनात्मा अथवा शुभ-अशुभ कार्यका अविवेक), ५ मद (गर्व, अहङ्कार), ६ मत्सर (दूसरेकी वृद्धि देखकर जलना ।) ५—'सप्त धातु'—यह शरीर सात धातुओंसे बना हुआ है:—त्वचा (चमड़ा), रक्त, मांस, मेद (चर्बी), मज्जा (अस्थिगत चिकना पदार्थ), अस्थि (हड्डी) और रेत (शुक्र या वीर्य) । ६—'आठ प्रकृति'—१ पृथिवी, २ जल, ३ अग्नि, ४ वायु, ५ आकाश, ६ मन (यहाँ मन शब्दसे समष्टि मन रूप अहङ्कार है), ७ बुद्धि (यहाँ समष्टि बुद्धि रूप महत्तत्त्वका ग्रहण है) और ८ अहङ्कार (यहाँ महत्तत्त्वसे पूर्व शुद्ध अहङ्कारके कारण अज्ञानरूप मूल प्रकृतिसे अभिप्राय है) । ७—'निरबिकार'—पीछे छ विकारोंका उल्लेख किया जा चुका है । ८—'नवद्वारपुर'—यह शरीर नौ द्वारका पुर है । वे नौ द्वार ये हैं--दो आँखें, दो कान, दो नासिका, मुँह, मूत्रेन्द्रिय और गुदा । इसी प्रकार पुरी भी आठ मानी गयी है—१ ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक (श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण), २ कर्मेन्द्रिय-पञ्चक (वाक् , पाणि, पाद, उपस्थ और गुद), ३ अन्तः- करणचतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), ४ प्राणादि-पञ्चक (प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान), ५ भूत-पञ्चक (पृथिवी, अप, तेज, वायु और आकाश), ६ काम, ७ त्रिविध कर्म और ८ वासना । ९—'चौदह भुवन'—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ये सात लोक ऊपरके हैं और अतल, वितल; सुतल, तलातल, रसातल, महातल और पाताल ये सात नीचेके हैं। १०—'भेद'—अर्थात् भेद-बुद्धि। वेदान्तशास्त्रने पाँच भेद माना है— १ जीव ईश्वरका भेद, २ जीवोंका परस्पर भेद, ३ जीव-जड़का भेद, ४ जड़- ईश्वरका भेद, ५ जड़-जड़का भेद। आत्मा इन पाँचों भेदोंसे रहित है। अथवा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे आत्मा रहित है। अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं, जैसे
विनय-पत्रिका ३४३ ब्राह्मणका अन्य ब्राह्मणसे । अन्य जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, जैसे ब्राह्मणका शूद्रसे—उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं। अपने अवयवों-(अंगों) से जो सम्बन्ध है, जैसे (हाथ, पैर, मस्तक आदिका सम्बन्ध) उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं । गुसाईंजीने इन्हीं भेदोंको त्यागनेके लिए कहा है । राग कान्हरा २०४ ] जो मन लागै रामचरन अस । देह-गेह-सुत-वित-कलत्र महँ मगन होत बिनु जतन किये जस ॥१॥ द्वन्द्व-रहित, गतमान, ग्यानरत, बिषय-विरत खटाइ नाना कस । सुख-निधान सुजान कोसलपति है प्रसन्न, कहु क्यों न होहिं बस ॥२॥ सर्व-भूत-हित, निर्व्यलीक चित, भगति-प्रेम दृढ़ नेम एक-रस । तुलसिदास यह होइ तबहिं जब द्रवैं ईस, जेहि हतो सीसदस ॥३॥ शब्दार्थ—वित = धन । कलत्र = स्त्री । कस = धातु (काँसा, पीतल, ताँबा आदि), कसौटी । निर्व्यलीक = निर्मल, निर्विकार । भावार्थ—यदि यह मन रामजीके चरणोंमें इस भाँति लग जाय, जैसे वह शरीर, घर, पुत्र, धन, स्त्रीमें बिना किसी प्रकारका यत्न किये ही मग्न हो जाता है ॥१॥ तो वह अनेक कसोंसे खटाकर या अनेक प्रकारके यत्नोंते निर्मल होकर, या (देहादिकी ओरसे) मुड़कर, द्वन्द्व (शीत-उष्ण, सुख-दुःखादि) रहित, मान- रहित, ज्ञानरत, विषयोंसे विरत (निवृत्त) हो जाय । ऐसी दशामें भला कहो तो सही कि आनन्द-घन, ज्ञाननिधान कोशलनाथ रामजी प्रसन्न होकर क्यों नहीं वशमें हो जायँगे ? ॥२॥ सब प्राणियोंकी भलाईका भाव, निर्विकार चित्त, भक्ति- प्रेम, दृढ़ नेम और एक-रस, यह सब तभी होता है, जब रावण-हन्ता भगवान् रामजी कृपा करते हैं ॥३॥ विशेष १—'ग्यानरत'—ज्ञान क्या है, इसपर और अधिक न लिखकर गीताका एक श्लोक लिख देना अधिक उत्तम होगा । भगवान्ने अर्जुनसे कहा है:—
३४४ विनय-पत्रिका सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धिसात्त्विकम् ॥ गीता० अ० १८, श्लोक २० अर्थात् 'जिस ज्ञानसे यह मालूम होता है कि विभक्त अर्थात् भिन्न-भिन्न सब प्राणियोंमें एक ही अविभक्त और अव्यय भाव अथवा तत्त्व है, उसे सात्त्विक ज्ञान जानो ।'—आगेके २०५ वें पदमें गोस्वामीजीने भी यही बात कही है। २—'द्वन्द्व-रहित......एकरस'—गोस्वामीजीने इस पदकी दूसरी पंक्तिमें जो देहादि पाँच वस्तुएँ गिनायी हैं, उनकी संगति उन्होंने तीसरी पंक्तिमें द्वन्द्व- रहित आदि पाँच वस्तुओंसे मिलायी है। उसी क्रमसे पाँचवीं पंक्तिमें भी सर्व- भूतहित आदि कहे गये हैं। अर्थात् द्वन्द्व-रहित होते ही सर्वभूत हितता आ जाती है, गतमान होते ही चित्त निर्विकार हो जाता है, ज्ञान-रत (यहाँ साधारण ज्ञानसे आशय है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान तो भक्तिकी चरमावस्था है और यों तो 'ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा' होते ही भक्ति-प्रेमका उद्रेक दिखाई पड़ता है, विषयविरत होते ही दृढ़ नेम हो जाता है और नाना कसोंमें खटाते ही एकरसता प्राप्त हो जाती है। ३—'खटाइ नाना कस'—इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है:— (१) मन इस प्रकार विषयोंसे अलग हो जाता है, जैसे वह कस (काँसा-ताँबा-पीतल आदि) के पात्रोंमें रखी हुई खटाईसे हट जाता है। (२) अनेक प्रकारसे कसनेपर खरा उतरे। (३) अनेकों परीक्षाओंमें पूर्ण उतरे। [२०५] जौ मन भज्यो चहै हरि-सुरतरु । तौ तजि बिषय-बिकार, सार भजु, अजहूँ जो मैं कहौं सोइ करु ॥१॥ सम, संतोष, बिचार बिमल अति, सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरु । काम-क्रोध अरु लोभ मोह-मद, राग-द्वेष निसेष करि परिहरु ॥२॥
विनय-पत्रिका ३४५ स्रवन कथा, मुख नाम, हृदय हरि, सिर प्रनाम, सेवा कर अनुसरु । नयननि निरखि कृपा-समुद्र हरि अग-जग-रूप भूप सीतावरु ॥३॥ इहै भगति, बैराग्य, ज्ञान यह, हरि-तोषन यह सुख व्रत आचरु । तुलसिदास सिव-मत मारग यहि चलत सदा सपनेहुँ नाहिंन डरु॥४॥ शब्दार्थ—निसेष = निःशेष, तनिक भी शेष न रहे । अनुसरु = अनुसरण करु । अग = गमनरहित, जड़ । तोषन = प्रसन्न करनेवाला । आचरु = आचरण कर । भावार्थ—रे मन ! जो तू हरिरूपी कल्पवृक्षको भजना चाहता है, तो अभी विषयोंके विकारको छोड़कर साररूप श्रीरामजीको भज और जो मैं कहता हूँ , वही कर ॥१॥ समता, सन्तोष, अत्यन्त निर्मल विचार और सत्संग, इन चारों- को दृढ़ताके साथ धारण कर; काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं राग-द्वेषको बिलकुल ही छोड़ दे ॥२॥ कानोंसे भगवत्कथा सुन, मुखसे रामका नाम ले, हृदयमें भगवान् (के स्वरूप) का ध्यान कर, मस्तकसे उन्हें प्रणाम कर तथा हाथोंसे सेवाका अनुसरण कर । नेत्रोंसे जड़-चैतन्यमय जानकीवल्लभ भगवान् रामचन्द्रको देख ॥३॥ यही भक्ति है, यही वैराग्य है, यही ज्ञान है और यही परमात्माको प्रसन्न करनेवाला शुभ व्रत है । इसीका तू आचरण कर । तुलसीदास कहते हैं कि भगवान् शिवजीका मत है कि इस मार्गपर चलनेसे स्वप्नमें भी डर नहीं रहता ॥४॥ विशेष १—‘नयननि···सीताबरु’—यहाँ गुसाईंजीने नेत्रोंसे भगवान्को देखनेके लिए कहकर परमात्माका रूप भी स्पष्ट रीतिसे बता दिया है कि ‘अग-जग- रूप भूप सीताबरु’। खूब ! २—‘ज्ञान यह’—गुसाईंजी ऊपर बहुत-सी बातें बतलाते हुए कहते हैं कि ‘अग-जग-रूप भूप सीताबरु’ यह समझना ही ज्ञान है । २०४ थे पदकी टीकामें गीताके जिस श्लोकका अवतरण दिया गया है, उससे यहाँ सादृश्य हो जाता है । [२०६] नाहिन और कोउ सरन लायक, दूजो श्रीरघुपति-सम बिपति-निवारन ।
३४६ विनय-पत्रिका काको सहज सुभाउ सेवक बस, काहि प्रनत पर प्रीति अकारन ॥१॥ जन-गुन अलप गनत सुमेरु करि, अवगुन कोटि बिलोकि बिसारन । परम कृपालु, भगत-चिन्तामनि, बिरद पुनीत, पतितजन-तारन ॥२॥ सुमिरत सुलभ, दास-दुख सुनि हरि, चलत तुरत, पटपीत सँभार न । साखि पुरान-निगम-आगम सब, जानत द्रुपद-सुता अरु बारन ॥३॥ जाको जस गावत कबि-कोबिद, जिन्ह के लोभ-मोह, मद-मार न । तुलसिदास तजि आस सकल भजु, कोसलपति मुनिबधू-उधारन ॥४॥ शब्दार्थ—प्रनत = भक्त । बारन = हाथी । कोविद = विद्वान् । मुनिबधू = अहल्या । भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके समान विपत्तियोंको दूर करनेवाला दूसरा और कोई नहीं है जो शरण लेने योग्य हो (अर्थात् जिसकी शरण ली जाय)। ऐसा सहज स्वभाव किसका है जो अपने सेवकोंके वशमें रहता हो, और भक्तोंपर बिना किसी कारणके किसका प्रेम है ? ॥१॥ वह (रामजी) भक्तोंके थोड़ेसे गुणको सुमेरुगिरिके समान मानते हैं और करोड़ों दोषोंको देखकर भी (उन दोषोंको) भुला देते हैं। वह परम कृपालु हैं, भक्तोंके लिए चिन्तामणि हैं, पवित्र यशवाले हैं तथा पतितजनोंको तारनेवाले हैं ॥२॥ भगवान् स्मरण करनेमें सुलभ हैं, और भक्तोंके दुःख सुनकर तुरन्त चल पड़ते हैं—अपने पीताम्बरतकको नहीं सँभालते। इसके लिए पुराण, वेद और सब शास्त्र साक्षी हैं; यह बात द्रौपदी और गजेन्द्र- को मालूम है ॥३॥ जिनका यश ऐसे कवि और विद्वान् गाते हैं, जो लोभ, मोह, मद और कामसे रहित हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! सब आशाओंको छोड़कर मुनि-वधू (अहल्या) का उद्धार करनेवाले कोशलेन्द्र भगवान् रामचन्द्रको भज ॥४॥
विनय-पत्रिका ३४७ विशेष १—'पटपीत सँभार न'—इसपर महात्मा सूरदासजीने भी बड़ी ही सुन्दर और मधुर रचना की है। आपने उस समयका वर्णन किया है, जब भीष्मपितामहने यह प्रतिज्ञा की थी कि 'आजु रन हरिसों अस्त्र गहैहौं', और भक्तकी प्रतिज्ञाकी लाज रखनेके लिए भगवान् पीताम्बरको सँभाले बिना ही अर्जुनके रथसे कूदकर दौड़े थे :— 'वह पटपीत की फहरानि । रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै कच-रज की लपटानि ॥ कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरत वह बानि । मानहु सिंह सैल ते निकस्यो महामत्त गज जानि ॥ जिन गुपाल मेरो पन राख्यो मेटि वेद की कानि । सोई सूर सहाय हमारो निकट भयो है आनि ॥' २—'द्रुपद-सुता'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये। द्रौपदी क्यों नहीं जानेंगी ! नन्दलालको कोई अपने घरसे वस्त्र निकालकर देना तो था नहीं ! कविने कहा भी है :— कबै आप गए थे बिसाहन बजार बीच, कबै बोलि जुलहा बुनाए दरपट से । नन्दजीकी कामरी न काहू बसुदेवजीकी, तीन हाथ पटुका लपेटे रहे कटि से ॥ 'मोहन' भनत यामैं, रावरी बड़ाई कहा, राखि लीन्हीं आनि-बानि ऐसे नटखट से । गोपिनके लीन्हे तब चीर चोरि चोरि अब, जोरि जोरि दैन लागे द्रौपदी के पट से ॥ —मोहन ३—'बारन'—गजेन्द्र; ८३ वें पदके विशेषमें देखिये। ४—'मुनिबधू'—४३ वें पदके विशेषमें देखिये।
३४८ विनय-पत्रिका [ २०७ ] भजिबे लायक, सुखदायक रघुनायक सरिस सरनप्रद दूजो नाहिन। आनंदभवन, दुखदवन, सोकसमन रमारमन गुन गनत सिराहिं न ॥१॥ आरत, अधम, कुजाति, कुटिल, खल, पतित, सभीत, कहूँ जे समाहिं न। सुमिरत नाम बिबसहूँ बारक पावत सो पद, जहाँ सुर जाहिं न ॥२॥ जाके पद कमल लुब्ध मुनि-मधुकर, बिरत जे परम सुगतिहु लुभाहिं न। तुलसिदास सठ तेहि न भजसि कस, कारुनीक जो अनाथहिं दाहिन ॥३॥ शब्दार्थ—समाहिं = समाना, अँटना, आश्रय पाना। मधुकर = भ्रमर। दाहिन = दाहिने, अनुकूल। भावार्थ—श्रीरामजीके समान भजन करने योग्य, सुखदायी और शरण देनेवाला दूसरा कोई नहीं है। आनन्द-स्वरूप, दुःखोंके नाशक, शोकको दूर करनेवाले लक्ष्मीकान्तके गुण गिननेसे समाप्त नहीं हो सकते ॥१॥ जो दुखिया, अधम, कुजाति, कुटिल, दुष्ट, पतित और भयभीत कहीं भी आश्रय नहीं पाते, वे यदि विवश होकर भी एक बार भगवान्के नामका स्मरण करते हैं, तो वह पद पा जाते हैं जहाँ देवता भी नहीं जा सकते ॥२॥ जिनके चरणकमलोंमें वे विरक्त मुनि-रूपी भ्रमर लुब्ध रहते हैं जो मोक्षपर भी लुब्ध नहीं होते, तुलसीदास कहते हैं कि रे शठ ! भला तू अनाथोंके अनुकूल रहनेवाले, परम कारुणिक ऐसे प्रभुका भजन क्यों नहीं करता ? विशेष १—'बिबस हूँ'—यहाँपर यह शब्द बड़ा ही सार्थक प्रयुक्त हुआ है। इस शब्दका यह आशय है कि श्रद्धाभक्तिपूर्वक सुखमय समयमें नामका स्मरण
विनय-पत्रिका ३४९ करना तो दूर रहा, दुःखमें भी, यदि रामनामका स्मरण किया जाता है तो भगवान् उसे तार देते हैं, यह नहीं सोचते कि हर तरहसे हारकर इसने स्मरण किया है, इसलिए इसकी ओर ध्यान नहीं देना चाहिये । राग कल्याण [२०८] नाथ सों कौन बिनती कहि सुनावौं । त्रिविध¹ विधि अमित अवलोकि अघ आपने, सरन सनमुख होत सकुचि सिर नावौं ॥१॥ विरचि हरिभगतिको बेष बर टाटिका, कपट-दल हरित पल्लवनि छावौं । नाम-लगि लाइ लासा ललित-वचन कहि, व्याध ज्यों विषय-विहँगनि वझावौं ॥२॥ कुटिल सतकोटि मेरे रोम पर वारियहि, साधु गनतीमें पहलेहि गनावौं । परम बर्बर खर्व गर्ब-पर्वत चढ़्यो, अज्ञ सर्वग्य, जन-मनि जनावौं ॥३॥ साँच किधौं झूठ मोको कहत कोड- कोउ राम ! रावरो, हौं तुम्हरो कहावौं । बिरदकी लाज करि दास तुलसिहिं देव ! लेहु अपनाइ अब देहु जनि बावौं ॥४॥ शब्दार्थ—विरचि = रचकर, बनाकर । टाटिका = टट्टी । पल्लवनि = पत्तों । लासा = गोंद । बर्बर = नीच । खर्व = क्षुद्र । जन-मनि = भक्तशिरोमणि । भावार्थ—हे नाथ ! आपको मैं किस तरह अपनी विनती कह सुनाऊँ ! अपने तीनों तरहके (कायिक, वाचिक और मानसिक) अगणित पापोंको देखकर आपके सम्मुख शरणमें होते ही लज्जावश सिर झुका लेता हूँ ॥१॥ ईश्वर-भक्तिके १. पाठान्तर—'विविध' ।
३५० विनय-पत्रिका वेशकी सुन्दर टट्टी बनाकर उसे कपट-समूहरूपी हरे पल्लवोंसे छाता हूँ। फिर (राम) नामकी लग्गी लगाकर ललित वचनोंका लासा लगाता हूँ और बहेलियोंकी तरह विषयरूपी पक्षियोंको फँसाता हूँ ॥२॥ मेरे एक-एक रोमपर सौ करोड़ कुटिल वारे (निछावर किये) जा सकते हैं, फिर भी मैं अपनेको प्रथम श्रेणीके सन्तोंमें गिनाता हूँ। मैं परम नीच एवं क्षुद्र हूँ, तथा अभिमानके पहाड़पर चढ़ा हुआ हूँ (अर्थात् बहुत बड़ा अभिमानी हूँ)। मूर्ख होनेपर भी अपनेको सर्वज्ञ और भक्त-मणि सूचित करता हूँ ॥३॥ हे रामजी ! नहीं कह सकता कि सच है या झूठ, पर कोई-कोई मुझे आपहीका (दास) कहते हैं और मैं भी अपनेको आप- हीका कहलवाता हूँ। अतः हे देव ! अब आप अपने बानेकी लाज करके इस सेवक तुलसीको अपना लीजिये; बाँव (तरह) न दीजिये ॥४॥ विशेष १—'निरचि······बिहँगनि बझावौं'—बहेलिया पक्षियोंको फँसानेके लिए बाँसकी टट्टी बनाकर हरे पत्तोंसे छाता है; यहाँ हरिभक्तिका वेष, यानी तिलक- मुद्रा आदि ही टट्टी है और कपट अर्थात् ऊपर तो वैराग्यके चिह्न और अन्त- करणमें विषय-कामना, यही हरे पत्ते हैं। यहाँ संसारको सुनानेके लिए राम- नामका जप ही लग्गी है और ललित वचन ही लासा है। [२०९] नाहिनै नाथ ! अवलंब मोहिं आन की ! करम-मन-वचन पन सत्य करुनानिधे, एक गति राम ! भवदीय पदत्रान की ॥१॥ कोह-मद-मोह-ममतायतन जानि मन, बात नहिं जात कहि ग्यान-बिग्यान की । काम-संकलप उर निरखि बहु बासनहिं, आस नहिं एक हू आँख निरबान की ॥२॥ बेद-बोधित करम धरम बिनु अगम अति, जदपि जिय लालसा अमरपुर जान की।
विनय-पत्रिका : ३५१ सिद्ध-सुर-मनुज-दनुजादि सेवत कठिन, द्रवहिं हठजोग दिये भोग बलि प्रान की ॥३॥ भगति दुर्लभ परम, संभु-सुक-मुनि-मधुप, प्यास पदकंज-मकरंद-मधुपान की। पतित-पावन सुनत नाम बिस्राम-कृत, भ्रमित पुनि समुझि चित ग्रंथि अभिमान की ॥४॥ नरक-अधिकार मम घोर संसार-तम- कूपकहिं, भूप ! मोहिं सक्ति आपान की। दास तुलसी सोउ त्रास नहिं गनत मन, सुमिरि गुह गीध गज ग्याति हनुमान की ॥५॥ शब्दार्थ—भवदीय = आपके। पदत्रान = जूता। आँक = अंश। कूपकहिं = कुएँमें। आपानकी = आपकी। ग्याति = (ज्ञाति) जाति। भावार्थ—हे नाथ ! मुझे दूसरेका अवलम्ब नहीं है। हे करुणानिधे ! मन, वचन और कर्मसे मेरी यह सत्य प्रतिज्ञा है कि मुझे केवल आपकी पनहीका सहारा है ॥१॥ मैं जानता हूँ कि मेरा मन क्रोध, मद, मोह और ममताका घर है; इसीसे मैं ज्ञान-विज्ञानकी बातें नहीं कह सकता। हृदयमें अनेक तरहकी कामनाओंके संकल्पों और वासनाओंको देखकर किसी भी अंशमें मुझे मोक्षकी आशा नहीं है (क्योंकि वासनाओंके आत्यन्तिक लयका नाम ही मोक्ष है, किन्तु वासनाएँ बनी हुई हैं, इसलिए मुक्ति नहीं हो सकती) ॥२॥ यद्यपि वेदोक्त कर्म- धर्मके बिना (स्वर्ग-प्राप्ति) अत्यन्त कठिन है, फिर भी मेरे हृदयमें स्वर्गमें जानेकी लालसा है। इसके सिवा सिद्ध, देवता, मनुष्य एवं राक्षसोंकी सेवा करना बहुत कठिन है। क्योंकि ये लोग हठयोग करने और प्राणोंकी बलि देकर भोग चढ़ाने- से पिघलते हैं (किन्तु यह मेरा किया नहीं हो सकता) ॥३॥ रही भक्ति, सो वह बहुत ही दुर्लभ वस्तु है; क्योंकि आपके चरणारविन्दके मधुर परागको पान करनेके लिए शिव, शुकदेव तथा (अन्यान्य बड़े-बड़े) मुनिरूपी भौंरे प्यासे रहते हैं (ऐसी दशामें मेरे जैसे अकिंचनको वह कैसे मिल सकता है ?)। मैंने सुना है कि आपका नाम पतितोंको पवित्र करनेवाला तथा शान्ति देनेवाला है; फिर भी