भारतकोश
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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

३. तृतीय खण्ड: ग्रह-पर्वत लक्षण (गुरु, शनि, सूर्य, बुध, शुक्र व मंगल पर्वत)

( १७५ ) ९. यात्रा रेखा पर वर्ग की उपस्थिति इस बात की सूचक होती है कि वह जीवन में कई बार यात्राएं करेगा तथा यात्राओं से विशेष धन लाभ लेगा । १०. चन्द्र रेखा पर वर्ग की उपस्थिति मानव की सभी प्रकार की उन्नति में सहायक होती है । ११. यदि विवाह रेखा पर वर्ग का चिन्ह हो तो उसकी पत्नी पढ़ी-लिखी, सुन्दर, सुशील तथा शिक्षित होती है । तथा उसे ससुराल से विशेष धन लाभ होता है । १२. यदि स्वास्थ्य रेखा पर वर्ग हो तो उसका व्यक्तित्व आकर्षक और जीवन भर स्वास्थ्य अनुकूल बना रहता है । १३. यदि भाग्य रेखा पर वर्ग का चिन्ह हो तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय छोटी अवस्था में ही हो जाता है । १४. सूर्य पर्वत पर अथवा सूर्य रेखा पर वर्ग का चिन्ह हो तो उसके जीवन में यश, मान, पद, प्रतिष्ठा आदि की कोई कमी नहीं रहती । १५. यदि हृदय रेखा पर वर्ग का चिन्ह हो तो उसका गृहस्थ जीवन सुखमय होता है तथा वह हृदय से परोपकारी एवं दयालु होता है । १६. मस्तिष्क रेखा पर वर्ग का चिन्ह इस बात का सूचक है कि ऐसे व्यक्ति का दिमाग सन्तुलित तथा निरन्तर क्रियाशील है । १७. यदि जीवन रेखा पर वर्ग का चिन्ह हो तो वह व्यक्ति दीर्घायु होता है । १८. यदि राहू पर्वत पर वर्ग का चिन्ह हो तो उसका काफी समय साधु के रूप में जंगलों में व्यतीत होता है । वस्तुतः वर्ग का चिन्ह हथेली में कहीं पर भी हो वह पूर्णतः शुभ माना जाता है । ७. जाल : खड़ी रेखाओं पर आड़ी रेखाएं होने से एक प्रकार का जाल-सा बन जाता है। यह व्यक्ति की हथेलियों में सभी स्थानों पर देखने को मिल जाता है। इन स्थानों पर पड़े इन जालों का फलादेश निम्न प्रकार से है : १. यदि गुरु क्षेत्र पर जाल चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति क्रूर, निर्दयी, स्वार्थी, तथा घमण्डी होता है । २. यदि शनि पर्वत पर जाल का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति आलसी होता है तथा समाज में कंजूस होने की वजह से बदनामी सहन करनी पड़ती है । ३. यदि यह रेखा जाल सूर्य पर्वत पर हो तो समाज में बार-बार निन्दा का पात्र बनना पड़ता है । जाल

( १७६ ) ४. यदि बुध पर्वत पर जाल हो तो वह व्यक्ति अपने ही किये गये कार्यों पर पछताता है तथा परेशानियां उठाता है । ५. यदि प्रजापति क्षेत्र पर जाल का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति के हाथ से अवश्य ही हत्या होती है तथा उसे कारावास का दण्ड भोगना होता है । ६. यदि चन्द्र क्षेत्र पर जाल का चिन्ह हो तो वह अस्थिर स्वभाव वाला तथा असन्तुष्ट व्यक्तित्व का स्वामी होता है । ७. यदि केतु पर्वत पर जाल हो तो वह जीवन भर बीमारियों से परेशान रहता है । ८. यदि शुक्र पर्वत पर जाल हो तो वह व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भोगी तथा लम्पट होता है । समाज में उसका किसी प्रकार का कोई स्थान नहीं होता । ६. यदि मंगल क्षेत्र पर जाल हो तो वह जीवन भर मानसिक दृष्टि से अशान्त बना रहता है । १०. यदि राहू पर्वत पर जाल का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति दुर्भाग्य पूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिये बाध्य होता है । ११. यदि मणिबन्ध रेखा पर हो तो उसका जरूरत से ज्यादा पतन होता है । १२. हथेली में कहीं पर भी जाल का चिन्ह अनुकूल फल देने वाला नहीं माना जाता । ८. नक्षत्र या तारा : हथेली में कई स्थानों पर सूक्ष्मतापूर्वक देखने से नक्षत्र या तारे दिखाई देते हैं । अलग-अलग स्थानों में होने से इनके फलादेश में भी अन्तर आ जाता है । १. यदि गुरु पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । समाज में धन, मान, पद, प्रतिष्ठा, आदि की दृष्टि से उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । वह निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर रहता है तथा सम्माननीय पद प्राप्त कर समाज में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । २. यदि शनि पर्वत पर नक्षत्र या तारे का चिन्ह हो तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय शीघ्र ही होता है । वह अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है तथा जीवन में पूर्ण यश तथा सम्मान प्राप्त करने में सफल होता है ।

( १७७ ) ३. यदि सूर्य पर्वत पर नक्षत्र हो तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में पूर्ण धन लाभ होता है। भौतिक दृष्टि से उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । ४. शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ रहता है । ५. यदि बुध पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति एक सफल व्यापारी तथा उच्च कोटि की योजना बनाने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति एक सफल कवि तथा साहित्यकार भी हो सकता है । ६. यदि केतु पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति का बचपन अत्यन्त सुखमय बीतता है तथा जीवन में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । ७. यदि शुक्र पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति भोगी होता है । पत्नी के अलावा अन्य स्त्रियों से भी सम्पर्क रहता है, तथा जीवन में उसकी पत्नी अत्यन्त सुन्दर तथा स्वस्थ रहती है। ८. मंगल पर्वत पर यदि नक्षत्र का चिन्ह हो तो ऐसा व्यक्ति धीरजवान तथा साहसी होता है। युद्ध में अतुलनीय साहस दिखाने से उसे देश व्यापी सम्मान मिलता है । ६. यदि राहू पर्वत पर चिन्ह हो तो हमेशा भाग्य साथ देता है तथा जीवन में पूर्ण यश तथा सम्मान प्राप्त करता है । १०. यात्रा रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह इस बात का सूचक होता है कि उस व्यक्ति की मृत्यु घर से दूर तीर्थ स्थान पर होती है । ११. चन्द्र रेखा पर यदि तारे का चिन्ह हो तो वह पेट संबंधी रोगों से ग्रस्त रहता है तथा थोडे बहुत रूप में वह बराबर बीमार बना रहता है । १२. यदि मंगल रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति की हत्या होती है। १३. यदि विवाह रेखा पर नक्षत्र या तारे का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति के विवाह में कई प्रकार की बाधाएं आती हैं तथा उसका गृहस्थ जीवन सुखमय नहीं कहा जा सकता । १४. यदि स्वास्थ्य रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो व्यक्ति का स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर बना रहता है। तथा उसकी मृत्यु अत्यन्त दुखदायी परिस्थितियों में होती है। १५. यदि सूर्य रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति को व्यापार में विशेष सफलता मिलती है तथा आकस्मिक धन प्राप्त के योग जीवन मे कई बार होते हैं।

( १७८ ) १६. यदि हृदय रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो वह हृदय से संबंधित रोगों से पीड़ित रहता है । १७. यदि मस्तिष्क रेखा पर नक्षत्र या तारे का चिन्ह हो तो वह जीवन भर स्नायु संबंधी रोगों से ग्रस्त रहता है । १८. यदि आयु रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो उस व्यक्ति की यौवनकाल में ही आकस्मिक मृत्यु हो जाती है । १९. यदि अंगूठे पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो वह व्यक्ति परिश्रमी, सहनशील तथा सफल व्यक्तित्व का धनी होता है । २०. तर्जनी उंगली पर नक्षत्र का चिन्ह सभी प्रकार से शुभ माना गया है । २१. मध्यमा तथा अन्य उंगलियों पर नक्षत्र के चिन्ह से उससे संबंधित ग्रहों को विशेष बल मिलता है । वस्तुतः हाथ में नक्षत्र या तारे के चिन्ह का सावधानी पूर्वक अध्ययन करना चाहिए । ये चिन्ह व्यक्तित्व के निर्माण में तथा भविष्यकथन में बहुत अधिक सहायक होते हैं ।

काल-निर्धारण

पीछे के अध्यायों में मैंने हस्त रेखा से संबंधित तथ्य स्पष्ट किए हैं, साथ ही साथ सहायक रेखाओं तथा हस्त चिन्हों के बारे में भी जानकारी प्रस्तुत की है। परन्तु इसके साथ ही यह प्रश्न भी व्यक्ति के दिमाग में स्वाभाविक रूप से पैदा होता है कि जीवन में अमुक घटनाएं घटित होंगी, यह तो हस्तरेखा ज्ञान से स्पष्ट हो जाता है; परन्तु ये घटनाएं किस अवधि में घटित होंगी इसको समझना और जानना भी बहुत जरूरी है। व्यक्ति के जीवन में ये प्रश्न निरन्तर चक्कर लगाते रहते हैं कि भाग्योदय कब होगा, किस प्रकार के कार्य से भाग्योदय होगा, भाग्योदय इसी देश में होगा या बिदेश में होगा, विदेश यात्रा कब है नौकरी कब मिलेगी, व्यापारमें स्थिरता कब आ सकेगी, व्यापार में कितना लाभ होगा और कब होगा, किस वस्तु या किस कार्य से व्यापार में लाभ सम्भव है, आय वृद्धि कब होगी, नौकरी में प्रमोशन कब होगा, सन्तान सुख कैसा मिलेगा, विवाह कब होगा - आदि ऐसी सैकड़ों बातें हैं जो मानव मस्तिष्क में निरन्तर घुमड़ती रहती हैं इन सभी के लिये यह बहुत जरूरी है कि हम काल निर्धारण प्रक्रिया को समझें और उसके माध्यम से भविष्य कथन को स्पष्ट कर सकें। पीछे के पृष्ठों में मैंने हृदय रेखा, भाग्य रेखा, स्वास्थ्य रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा जीवन रेखा आदि के बारे में जानकारी दी है। इनमें जीवन रेखा का सर्वप्रथम अध्ययन जरूरी है। जैसा कि मैं पीछे बता चुका हूं कि अंगूठे और तर्जनी के बीच में से जीवन रेखा प्रारंभ होकर शुक्र पर्वत को घेरती हुई मणिबन्ध तक पहुंचती है। यह जीवन रेखा कहलाती है। पहले अभ्यास के लिये किसी धागे के माध्यम से जहां से यह जीवन रेखा प्रारंभ होती है वहां से लगाकर जीवन रेखा के अन्तिम स्थल अर्थात् मणिबन्ध की पहली रेखा तक नापिये और इस पूरे धागे को १०० वर्ष का समझकर इसके बराबर १० हिस्से कर लीजिये। इस प्रकार एक हिस्सा १० वर्षों का प्रतिनिधित्व करेगा। इन १० वर्षों में भी जो दूरी है उसको यदि १० भागों में बांटें तो प्रत्येक भाग एक वर्ष का प्रतिनिधित्व करेगा। यद्यपि ये चिन्ह नजदीक हो सकते हैं, परन्तु यह प्रत्येक

( १८० ) चिन्ह एक वर्ष को सूचित करेगा । अभ्यास के बाद चिन्ह लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी और हाथ देखकर ही यह अनुमान हो सकेगा कि यह जीवन रेखा कितने वर्ष का प्रतिनिधित्व करती है। यदि जीवन रेखा बीच में ही समाप्त हो जाती है, तो आयु के उस भाग में जीवन समाप्त समझना चाहिए । इससे यह भली भाँति ज्ञात हो सकेगा कि व्यक्ति की आयु कितने वर्ष की है। इसी प्रकार जीवन रेखा पर जहाँ भी क्रॉस का चिन्ह या जहां भी रेखा कमजोर पड़ी है आयु के उस भाग में बहुत बड़ी बीमारी आयेगी या मरण तुल्य कष्ट भोगना पड़ेगा, ऐसा समझना चाहिए। पूरे हाथ में घटनाओं को सूचित करने वाली जीवन रेखा ही है। अन्य जो भी रेखाएं हैं, उन पर बिन्दु लगा कर उससे एक सीधी रेखा जीवन रेखा की ओर खींचिये, जिस बिन्दु पर खींची हुई रेखा मिलेगी; आयु के उस भाग में ही वह घटना घटित होगी। उदाहरण के लिये भाग्य रेखा के मध्य में कटा हुआ हिस्सा है तो कटे हुए स्थान से यदि हम रेखा खींचें और वह रेखा जीवन रेखा के ४२वें वर्ष के बिन्दु से मिलती हो तो इससे यह सिद्ध हो जाता है कि इस व्यक्ति की ४२वें वर्ष में भाग्य-बाधा आयेगी और भाग्य से संबंधित कोई बहुत बड़ा कष्ट उठाना पड़ेगा। इसी प्रकार आप अन्य रेखाओं पर पाये जाने वाले चिन्हों का फल ज्ञात कर सकते हैं एवं उन घटनाओं को घटित होने का समय भी स्पष्ट कर सकते हैं। धीरे-धीरे इस संबंध में अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के बाद तो मात्र हथेली पर एक झलक पड़ने पर ही संबंधित घटना और उसका समय ज्ञात हो सकता है। वस्तुतः एक सफल भविष्यवक्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ तभी माना जाता है जबकि वह घटनाओं का समय सही-सही रूप में स्पष्ट कर सके और इसके लिये मैंने ऊपर बिन्दु स्पष्ट कर दिये हैं।

हस्त-चित्र लेने की रीति

मेरे केन्द्र में हमेशा सैकड़ों पत्र आते हैं और उनका यह आग्रह रहता है कि हस्त-चित्रों के माध्यम से सही भविष्यफल स्पष्ट करके भेजा जाए। इस केन्द्र की सेवाएं देश में तथा विदेशों में सभी लोगों को सुलभ हैं और मेरे लिये यह प्रसन्नता का विषय है कि लोगों ने इस सेवा का भरपूर लाभ उठाया है। यद्यपि हस्तचित्रों की अपेक्षा व्यक्तिगत रूप से हाथ दिखाना और उससे भविष्य-फल ज्ञात करना ज्यादा अनुकूल होता है। क्योंकि इसके माध्यम से पर्वतों का उभार और छोटी से छोटी रेखाओं को भली प्रकार से जाना जा सकता है, परन्तु यह सभी के लिये सुलभ नहीं है। जो दूर हैं, या जो विदेशों में हैं उनके लिये हस्तचित्र ही एक ऐसा माध्यम होता है जिसके द्वारा वे अपना भविष्यफल ज्ञात कर सकते हैं। जहां तक मेरा अनुभव है एक अच्छे कैमरे से ही हाथ का सही-सही फोटो लिया जा सकता है और इसमें भी ग्रहों के पर्वतों का उभार देखा जा सकता है। इसके साथ ही कैमरे की आंख से छोटी से छोटी रेखा भी छिपी नहीं रहती और हथेली में सभी रेखाएं पूर्ण रूप से फोटो में आ जाती हैं जिसके माध्यम से सही-सही भविष्यफल स्पष्ट किया जा सकता है। मेरी राय में जो सही भविष्यफल चाहते हैं, उन्हें अपने दोनों हाथों के फोटो कुशल फोटोग्राफर से खिंचवा कर भेजने चाहिए। जहां फोटो की सुविधा न हो तो वे कागज पर हस्तचित्र उतार करके भी भेज सकते हैं। परन्तु इसके बारे में बहुत अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। जैसे— १. कागज सफेद हो तथा खुरदरा नहीं होना चाहिए। यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए, कि कागज न तो बहुत पतला हो और न चिकना हो। स्याही सोखने वाला कागज भी नहीं लिया जाना चाहिए। २. कागज पर चित्र उतारते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कागज की लम्बाई और चौड़ाई अपने आप में पूरी हो। हथेली का कोई भी हिस्सा या उंगली का कोई भी हिस्सा कागज के बाहर नहीं रहना चाहिए। ३. चित्र लेते समय हाथ साबुन से धुले हुए होने चाहिए तथा उंगली में किसी प्रकार की कोई अंगूठी पहनी हुई नहीं होनी चाहिए।

( १८२ ) विधियां नीचे की पंक्तियों में मैं तीन चार विधियों का परिचय दे रहा हूँ जिनके माध्यम से हाथों का स्पष्ट चित्र ज्ञात किया जा सकता है । १. धुंयें के द्वारा चित्र उतारना :- एक सफेद चिकना और थोड़ा सा कड़ा कागज लें जो कि व्यक्ति की हथेली से बड़ा हो और पूरा हाथ उस कागज पर रखते समय चारों तरफ ३-३ उंगल खाली रह सके । इसके बाद एक कटोरी में शुद्ध कपूर की टिकियाएं रखकर उस में लौ या आग या माचिस लगा देनी चाहिए और कागज को दोनों हाथों से पकड़कर कटोरी के थोड़ा ऊपर रखना चाहिए पर इसमें यह साव- धानी बरतनी बहुत जरूरी है कि कपूर की आग उस कागज को पकड़ न ले या आंच से कागज जल न जाय । हमारा उद्देश्य मात्र इतना ही है कि उससे उत्पन्न धुएं से कागज के नीचे का हिस्सा काला हो जाए । धीरे-धीरे कागज को इधर-उधर घुमाते रहना चाहिए जिससे चारों तरफ से वह काला हो जाय । साथ ही वह कागज सुरक्षित भी रहे । यह भी ध्यान रखें कि बहुत जल्दी उस कागज को अलग न ले-लें बल्कि उस पर धुएं की मोटी परत जमने दें । इसमें सावधानी यह बरतें कि सभी जगह धुएं की परत बराबर जमें जिससे पूरे कागज में एक रूपता आ पायेगी । यदि कटोरी में एक कपूर की टिकिया समाप्त हो जाए तो उसमें दूसरी टिकिया डाल दें । यह कार्य प्रारंभ करने से पूर्व ८-१० टिकियाएं अपने पास निकाल कर रख लेनी चाहिए । जब कागज के नीचे का हिस्सा सभी जगह बराबर काला हो जाए तब उसे पलट कर किसी साफ चिकनी मेज पर रख दें । मेज पर कपड़ा बिछा हुआ नहीं होना चाहिए अर्थात् कागज के नीचे ठोस धरातल और साथ ही साथ चिकना धरातल होना आवश्यक है । कागज पर जो कालिख लगी हुई है वह ऊपर की ओर हो । अब आप अपना हाथ फैला कर उस कागज के ऊपर जमा दें । यह ध्यान रखें कि आपकी सभी उंगलियां तथा मणिबन्ध तक का हिस्सा उस कागज पर पूरी तरह से आ जाए । अब आप अपने हाथ को दबाव दें जिससे आपके हाथ की सभी रेखाएं उस कागज पर आ जाए । अब आप बिना हिलाये अपने हाथ को सीधे ऊपर उठा लें । आप देखेंगे कि आपके हाथ का चित्र और हथेली की प्रत्येक छोटी से छोटी रेखा कागज पर सही रूप में उत्तर आई है । यदि कागज के बीच के हिस्से में नीचे छोटा सा रूमाल रख दिया जाए और रूमाल वाले भाग पर आपकी हथेली का बीच का हिस्सा टिके तो ज्यादा उचित रहेगा और कोई भी स्थान खाली नहीं रहेगा ।

( १८३ ) अब इस कागज के एक कोने पर नाम, पता, जन्म तारीख, तथा हस्तचित्र लेने की तारीख लिख कर उस पर एक सफेद कागज रख दें जिससे कि बीच की रेखाएं मिट न जाएं। अब इस कागज को सावधानी के साथ मोड़कर आप हस्त रेखा विशेषज्ञ के पास भविष्यफल प्राप्त करने के लिये भेज सकते हैं। २. प्रेस की स्याही से चित्र लेना :—प्रेस में जहां पुस्तकों की छपाई होती है वहां एक बड़ा-सा रोलर लगा होता है, जिस पर स्याही लगी होती है। जब पुस्तकों की छपाई पूरी हो जाती है तो स्याही गहरी न होकर थोड़ी सी हल्की पड़ जाती है। हमें इस हल्की स्याही का ही प्रयोग करना चाहिए। सबसे पहले एक मेज पर सफेद कागज बिछा लें जिसके बीच में कागज के नीचे की ओर छोटा सा रूमाल समेट कर रख लें। अब आप अपना दाहिना हाथ रोलर पर लगा लें और देख लें कि आपकी पूरी हथेली में स्याही लगी है अथवा नहीं। जब पूरी हथेली पर स्याही लग जाए तो उस स्याही लगे हाथ को सावधानी के साथ उस कागज पर रखकर दबा लें। इसमें भी यह सावधानी बरतें कि अपनी हथेली का मध्य भाग उस रूमाल पर टिके जिससे कि आपके पूरे हाथ का चित्र स्पष्ट रूप से आ सके। जब हाथ जम जाए तब आप हाथों के जोड़ों पर दूसरे हाथ से थोड़ा-थोड़ा दबाव दे दें जिससे कि कोई भी स्थान खाली न रहे। इसके बाद बिना हाथ को हिलाए ऊपर की ओर उठा लें। इस प्रकार आप देखेंगे कि आपके हाथ की रेखाएं भली प्रकार से कागज पर उतर आई हैं। इसी प्रकार आप बायें हाथ का चित्र भी कागज पर उतार लें और कागज पर उतरी स्याही को हवा में दो मिनट सूखने दें। जब सूख जाय तब उस पर नाम, पता व जन्म की तारीख लिखकर हस्तरेखा विशेषज्ञ के पास भविष्यफल जानने के लिये भेज सकते हैं। मेरी राय में प्रत्येक व्यक्ति को तीन-तीन हस्तरेखा चित्र भेजने चाहिए जिससे कि यदि किसी चित्र में कोई कमी रह गई हो तो दूसरे चित्र को देखकर उसके बारे में जाना जा सके। ३. इंक पैड से हस्तचित्र उतारना :—मुहर लगाने के लिये प्रत्येक घर में इंक पैड आसानी से प्राप्त हो सकते हैं। इक पैड के माध्यम से भी हस्तचित्र भली प्रकार से उतारा जा सकता है। इंक पैड से हस्तचित्र उतारने की विधि भी वही है जो कि ऊपर प्रेस की स्याही से हस्त चित्र उतारने की विधि मे स्पष्ट किया है। ४. फोटो द्वारा चित्र लेना:—यह विधि ज्यादा सही एवं प्रामाणिक मानी जा सकती है। इसके लिये कुशल फोटोग्राफर का चुनाव करना चाहिए और यह ध्यान

( १८४ ) रखना चाहिए कि लाइट व्यवस्था इतनी तेज न हो कि छोटी और हल्की रेखाएं उस चकाचौंध में छिप जायें और न लाइट व्यवस्था इतनी हल्की हो कि सूक्ष्म रेखाएं स्पष्ट ही न हो सके। फोटो खिंचवाने से पहले फोटोग्राफर को यह बात अच्छी तरह से समझा देनी चाहिए। साथ ही पूरी हथेली तथा मणिबन्ध तक का फोटो आना चाहिए और फोटो में हाथों की उंगलियां थोड़ी-सी खुली हुई होनी चाहिए अर्थात् एक दूसरे से चिपकी हुई होना ठीक नहीं। फोटो का कागज उत्तम कोटि का होना चाहिए तथा दोनों ही हाथों का एक चित्र या अलग-अलग लिया जा सकता है। मेरी राय में पोस्टकार्ड साइज से छोटा चित्र उपयुक्त नहीं माना जा सकता। ऊपर लिखी चारों पद्धतियों में से कोई भी पद्धति अपना कर व्यक्ति अपने हाथ की रेखाओं का चित्र भविष्यवक्ता के पास भेज कर अपना भविष्यफल सही-सही रूप में ज्ञात कर सकता है।

प'चांगुली देवी

पीछे के अध्यायों में मैंने हाथ की रेखाओं तथा पर्वतों के बारे में विस्तार से स्पष्ट किया है । परन्तु पंचांगुली देवी के बारे में जानकारी स्पष्ट नहीं कर सका हूं । इस अध्याय में इससे सम्बन्धित संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूं । जिस व्यक्ति को इसके बारे में विस्तार से अध्ययन करना हो उसे मेरी पुस्तक 'हस्तरेखा विज्ञान और पंचांगुली साधना' का अध्ययन करना चाहिए ।


(चित्र शीर्षक: श्री पञ्चाङ्गुली देवी)

पंचांगुली देवी के बारे में अनेक प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है और उसमें यह स्पष्ट किया गया है, कि यदि कोई व्यक्ति नियम पूर्वक पंचांगुली देवी की साधना करे तो शीघ्र ही वह सफल भविष्यवक्ता बन सकता है । किसी भी व्यक्ति का हाथ देखते ही उस व्यक्ति का भूत, वर्तमान और भविष्य उसके सामने साकार हो जाता है । साथ ही वह अनेक सूक्ष्म रहस्यों से भी भली भांति परिचित हो जाता है ।

( १८६ ) यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य हस्तरेखा विशेषज्ञ कीरो या चीरियो भी पंचांगुली देवी की साधना करते थे। कीरो भारत में लगभग ३ वर्ष तक रहा था और उसने यहां के एक योगी से पंचांगुली साधना का अध्ययन किया था और इसी साधना की वजह से वह विश्वविख्यात हो सका था। मेरा स्वयं का यह अनुभव है कि इसकी साधना से व्यक्ति को हस्तरेखाओं का पूर्ण और सहज ज्ञान हो जाता है। पंचांगुली साधना में शुभ मुहूर्त का होना आवश्यक है। मास : यह साधना किसी भी महीने से प्रारंभ की जा सकती है। पर बैसाख, कार्तिक, आश्विन तथा माघ मास विशेष शुभ माने गये हैं। तिथि : यह साधना शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, अथवा पूर्णमासी से प्रारम्भ की जा सकती है। वार : रवि, बुध, गुरु, तथा शुक्रवार इस कार्य को प्रारम्भ करने के लिये श्रेष्ठ माने गये हैं। नक्षत्र : कृतिका, रोहिणी, पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, अनुराधा, तथा श्रवण नक्षत्र विशेष अनुकूल माने जाते हैं। लग्न : स्थिर लग्न, वृष, सिंह वृश्चिक, कुंभ। स्थान : तीर्थभूमि, गंगा यमुना संगम, नदी का तट, पर्वत गुफाएं तथा स्कंध देव मन्दिर इसके लिये शुभ हैं। पर यदि ये स्थान सुलभ न हों तो घर के एकान्त कमरे का उपयोग किया जा सकता है। पंचांगुली यंत्र : किसी भी तंत्र साधना में आवश्यकता पड़ने पर यंत्र का उपयोग करना आवश्यक होता है। पंचांगुली साधना सिद्ध करने के लिये प्राण प्रतिष्ठा युक्त तंत्र सिद्ध पंचांगुली यंत्र तथा पंचांगुली देवी का चित्र बहुत अधिक आवश्यक है। केन्द्र से सम्पर्क स्थापित करने पर इस प्रकार का यंत्र अथवा चित्र भेजने की व्यवस्था की जा सकती है ।

( १८७ ) पद्मावती यन्त्र पूजन सामग्री : कुंकुम, नारियल जटा वाले दीपक अबीर चावल दही गुलाल बादाम शक्कर मोड़ी अखरोट पान सुपारियां काजू भोज-पत्र केशर किसमिस पीपल के पत्ते बताशा मिश्री कच्चा दूध दुग्ध प्रसाद अगरबत्ती घृत कपूर लोंग पुष्प इलायची काली मिर्च पुष्पमाला यज्ञोपवीत शहद गंगा जल फल इत्र कुएं का शुद्ध जल इस साधना में कुछ बातें अत्यन्त आवश्यक हैं जो कि निम्नलिखित हैं : १. स्त्री संसर्ग तथा स्त्री चर्चा साधना काल में त्याज्य है । २. क्षौरकर्म न करें । ३. संध्या गायत्री स्मरण निश्चित हो ।

( १८८ ) ४. नग्नावस्था में, बिना स्नान के, अपवित्र हाथ से, सिर पर कपड़ा रख कर भी जप करना निषिद्ध है। ५. जप के समय माला पूरी हुए बिना बातचीत नहीं करनी चाहिए। ६. छींक अस्पृश्य, उपान वायु होने पर हाथ धोवें तथा कानों के जल स्पर्श करें। ७. आलस्य, जमहाई, छींक, नींद, थकना, डरना, अपवित्र वस्त्र, बातचीत क्रोध आदि जपकाल में वर्जित है। ८. पहले दिन जितना जप किया जाय रोज उतना ही जप करें। इसे घटाना बढ़ाना उचित नहीं। ६. जपकाल में शौच जाने पर पुनः स्नान कर जप में बैठें। जपकाल में नियम : जपकाल में निम्न नियमों का भी पालन किया जाना चाहिए :— १. भूमि शयन २. ब्रह्मचर्य ३. नित्य स्नान ४. मौन ५. नित्य दान ६. गुरु सेवा ७. पापकर्म परित्याग ८. नित्य पूजा ६. देवतार्चन १०. इष्टदेव व गुरु में श्रद्धा ११. जप निष्ठा एवं १२. पवित्रता अब मैं आगे के पृष्ठों में पंचांगुली मंत्र तथा काल ज्ञान मंत्र के साथ-साथ संकल्प भी स्पष्ट कर रहा हूं। सबसे पहले साधक को संकल्प करना चाहिए। उसके बाद पांच बार काल ज्ञान मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और उसके बाद पंचांगुली यंत्र के सामने पंचांगुली का ध्यान करके एक सौ आठ बार पंचांगुली मंत्र का जप करना चाहिए, सबके अन्त में पंचांगुली ध्यान समाप्ति करनी चाहिए। इस प्रकार ६० साठ दिन तक करने से निश्चय ही पंचांगुरी साधना मंत्र सिद्ध होता है। या केवल एक लाख काल ज्ञान मंत्र जपने से भी भूत, भविष्य, सिद्धि हो जाती है।

( १८१ ) पाठकों की सुविधा के लिये मैं पहले संकल्प फिर पंचांगुली ध्यान मंत्र तथा अन्त में काल ज्ञान मंत्र स्पष्ट कर रहा हूं। संकल्प : ओ३म् अस्य श्री कस्यचित् सच्चिदानंद रूपस्य ब्रह्मणो निर्वाच्य मायाशक्ति विजृंभिता विद्या योगात् कालकर्म स्व-भावाविर्भूत महत्सत्वो विताहं कारोद्भूत वियदादि पंच महाभूतेन्द्रिय देवता निर्मिते अंडकटाहगे चतुर्दश लोकात्मके लीलया तन्मध्यवर्तिनी भगवतः श्री नारायणस्य नाभि कमलोद्भूत सकल लोक पितामहस्य ब्रह्मणः सृष्टिं कुर्वतस्तदुद्धरणाय प्रजापति प्रार्थितस्य श्री सित वाराह बतारेण ध्रिय माणायां यस्यां धरित्र्याम भुवर्लोक संहितायां सप्तद्वीप मंडितायां क्षीरोदार्णब्व द्विगुगतीय वलयिकृत लक्षयोजन विस्तीर्ण जम्बूद्वीपे स्वर्गस्थिता अमराणा-सा शितब- तारे गंगादि सरिद्भिः प्रावितेः निखिल जन मुनिकृत निर्वसतिके नैमिषारण्ये कन्या कुमारिके क्षेत्रे पुष्कराण्ये श्री मन्मार्तण्डस्य कृपापात्र कालत्रित यज्ञ गर्गवाराह गणितायां संख्याया श्री ब्रह्मणो द्वितीय परार्द्धे श्री श्वेत वाराह नाम्नि प्रथम कल्पे, द्वितीये यामे तृतीये मुहूर्त, चतुर्थ युगे, स्वायंभुवः स्वारोचितः उत्तमः तामसः रैवतः चाक्षुषेति षण्मनुना मतिक्रमोष्यात् क्रम्यमाणे संप्रति वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति में वर्षं त्रिनवे त्रिग्नेयाते कलियुगे कलि प्रथम चरणे श्री मल्लवणाख्ये उत्तरे तीरे गंगा यमुनयो पश्चिमे तटे शालीवाहन बौद्धावतारे विक्रम भूपकृतः संवत्सरे संवत ..... नाम संवत्सरे (एको न अशात्युत्तर द्वि सहस्र मे) वर्षं रविनारायण (उत्तरायने)...ऋतौ महामांगल्यप्रद मासोत्तमे मासे शुभ मासे .मासे...पक्षे आद्य तिथौ......वाराधिपति श्रीमद् ... वासरे यथा नक्षत्र योगकारण लग्न एवं ग्रह विशेषण विशिष्टायां अमूक गशिस्थिते सूर्य अमुक राशिस्थिते चन्द्रे अमुक राशिस्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथा-यथा राशिस्थिते सप्तसु एवं ग्रह गुण विशेषण विशिष्टायां शुभपुण्यस्थितौ .... गोत्रस्य श्री ( यजमान का नाम ) यजमानस्य शरीरे आयु आरोग्य ऐश्वर्यवां- छित फल प्राप्तये भार्यादि सर्व सम्पत्ये चिंतिताथंस्य आदि व्याधि जरा मृत्यु भय शोक निवृत्तये परमेश्वर्य संपत्त्ये निष्पत्ये अमुक कर्मेण पंचांगुलीदेवी पूजन कर्मणी सांगता सिद्धयर्थं ममः समस्त कुटुम्बस्य सपरिवारस्य सर्वविघ्नोपशांतये भूत भविष्यत् वर्तमान त्रिविधोत्पात् शांतये भूरिभाग्याप्तये पुनः कृतस्य करिष्यमाणः कर्मणः साम्य षृप्त महाफल वाप्तये नित्य नूतन आत्मनः क्षीरोदिपट फुलादिवास सुरभि चन्दनः कर्पूरः कस्तूरी केत्याद्य नेक शरीर भूषण समृद्धयर्थं सुवर्णं रौप्य निखिल धातु प्रबाल मौक्तिक माणिक्येन्द्र नीलवञ्च वैदूर्यादि नाना रत्न बहुल प्राप्तये यवः व्रीही गोधुम तिल माष मुद्रमाद्य नेक धान्यानां संतताभि वृद्धये अश्वशाला गजशाला गौशाला सर्व चतुष्पदशाला प्रपायादिक्षाला देवपूजास्थान, ब्राह्मण संतर्पणादि सर्वस्थानानाम् सर्व विघ्नन्तेपशांतये ममः इह जन्मनि पंचांगुली प्रीति द्वारा सर्वापन्निवृत्ति पूर्वकः अल्पायु निवृत्ति

( १६० ) पूर्वंक जन्म लग्नात् वर्ष लग्नात् गोचारत् चतुरष्ट अष्ट द्वादश स्थान स्थित सूर्यादि क्रूर ग्रह तज्जनितारिष्ट निवृत्ति पूर्वकं दशा अन्तर्दशा उपदशा जनितारिष्ट ज्वर दाह पीड़ा नेत्रकर्णादियो पीड़ा निवृत्ति पूर्वकं अल्पायु निवृत्ति पूर्वकश्चाधि दैविक भौतिक आध्यात्मिक जनितः क्लेशः कायिक वाचिक मानसिक त्रिविधागोध निवृत्ति पूर्वकं शरीरारोग्यार्था धर्मार्थ काम मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिध्यर्थं राजद्वारतः व्यापारतश्च लाभार्थं काम मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ सिध्यर्थं रजद्वारतः व्यापारतश्च लाभार्थं विजयर्थं जयार्थं क्षेमार्थं गतवस्तु प्राप्त्यर्थं स्थिर लक्ष्मो सचिताथें पुत्र पौत्रा अविच्छिन्न धन समृद्धयर्थं बेदशास्त्रोक्त फला वाप्तये कीर्तिलाभ शत्रु पराजय सद्विष्ट सिद्धयर्थं श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं सद्विष्ट सिद्धयर्थं यथा संपादित सामग्रयां कलश स्थापन पंचांगुली पूजन महं करिष्ये । तदंगतवेन निर्विघ्नतां परि समाप्त्यर्थं गणपति पंचौकार वास्तु दिव्यादि चतुः षष्टी योगिनी अजरादि पंचानत् क्षेत्रपाल सप्त चिरंजीव सप्तवसोर्द्धारा सप्तऋषि गंगादि षोड्श मातृका वरुण कलश सूर्यादि नवग्रह तदंगभूत अधिदेवता प्रत्यधि देवता स्थापन पूजनांतर मित्ती पंचांगुली आवाहनं कलशस्थापनं तस्योपरि पंचांगुली यहं पूजनं तदंगत्वैनादौ गणपति पूजनं महं करिष्ये । पंचांगुली ध्यान : पंचांगुली महादेवी श्री सीमन्धर शासने । अधिष्ठात्री करस्यासो शक्तिः श्री त्रिदशेशितुः । पचांगुली मंत्र : ओ३म् नमो पंचागुली पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी लोहमय दंडमषिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रु मध्ये दीवानमध्ये भूतमध्ये पिशाचमध्ये झोंटंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषेणीमध्ये शाकनीमध्ये गुणीमध्ये गारुडी मध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ उपरे बुरो जो कोई करावे जड़े जड़ाये तत चिन्ते चिन्ताबे तस माथे श्री माता श्री पंचांगुली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े ओ३म ठं ठं ठं स्वाहा । कालज्ञान मंत्र : ओ३म् नमो भगवते ब्रह्मानन्द पदः गोलोकादि असंख्यो ब्रह्माण्ड भुवन नाथाय शशांक शंख गोक्षीर कर्पूर धवल गात्राय नीलांभोधि जलद पटलाधि-व्यक्तस्वरूपाय व्याधिकर्म निर्मूलोच्छेदन कराय, जाति जरायुमरण विनाशाय, संसारकान्तारोन्मूल- नाय, अचिन्त्य बल पराक्रमाय, मतिप्रतिमाह चक्राय त्रैलोक्याधीश्वराय, शब्द के

( १६१ )

त्रैलोक्याधिपतिर्बल भुवन कारकाय सर्वसत्व हिताय, निज भक्ताय अभीष्ट फल प्रदाय, भवत्याधीनाय सुरासुरेन्द्रादि मुकुटकोटि धृष्टपाद पीठाय अनन्त युग नाथाय, देवाधि- देवाय, धर्मचक्राधीश्वराय, सर्व विद्या परमेश्वराय, कुविद्याविघ्न प्रदाय, तत्पादपंकजा श्रयानि भवनी देवी सासन देवते त्रिभुवन संक्षोमनी, त्रैलोक्य शिवापहारकरिणीं श्री अद्भुत भ्रातवेदा श्री महालक्ष्मी देवी (अमुकस्य) स्थावर जंगम कृत्रिम विषमूल संहारिणी सर्वाभिचार कर्मापहारिणीं परविद्योच्छेदनी परमंत्र प्रनाशिनीं भ्रष्टमहानाम कुलीञ्चाटनीं कालदष्ट्रं मृत कोत्यापिनीं (अमुकस्य) सर्वरोग प्रमोचनीं, ब्रह्मा विष्णु रुद्रेन्द्र चन्द्रादित्यादिग्रह नक्षत्रोत्पात मरण भय पीड़ा मर्द्दिन त्रैलोक्य विश्वलोक वशंकरि, भुविलोक हितकं महाभैरवि शस्त्रोपचारिणीं रौद्र, रौद्ररूप धारी प्रसिद्ध सिद्ध विद्याधर यक्ष राक्षस गरुड़ गन्धर्व किन्नर किं पुरुषो दैत्योरेन्द्र पूजिते ज्वालापात कराल दिगंतराले महावृषभ वाहिनीं, खेटक कृपाण त्रिशूल शक्ति चक्रपाश शरासन शिव विराजमान षोडशाद्व मुजे एहि एहि लं ज्वाला मालिनीं ह्रीं ह्रीं ब्रूं ह्ली हीं हूं हौं ह्रः देवान् आकर्षय आकर्षय नाग ग्रहान् आकर्षय आकर्षय यक्ष ग्रहान् आकर्षय आकर्षयः गंधर्व ग्रहान् आकर्षय आकर्षय ब्रह्मग्रहान् आकर्षय आकर्षय राक्षस ग्रहान् आकर्षय आकर्षय भूत ग्रहान आकर्षय आकर्षय दिव्यतर ग्रहान् आकर्षय आकर्षय चतुराणि जैंन्य मार्ग ग्रहान् आकर्षय आकर्षय चतुर्विशति जिन ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व जटिल ग्रहान् आकर्षय आकर्षय अखिल मुंडित ग्रहान् आकर्षय जंगम ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व दुर्गशादि विद्याग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व नग निग्रह वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व जलाशय वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्वस्थल वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्वतिस्थि ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व श्मशान वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व पवनी वासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व धर्म शापादि गौ शाप ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व गिरिगुहा दुर्गवासी ग्रहान् आकर्षय आकर्षय श्रापित् ग्रहान् आकर्षय आकर्षय सर्व दुष्ट ग्रहान् आकर्षय आकर्षय वक्र पिंड ग्रहान् आकर्षय आकर्षय कट कट कंपय कंपय शीर्षं चालय शीर्षं चालय गात्रं चालय गात्रं चालय बाहुं बाहुं चालय पादं चालय कर पल्लवान चालय बाहुं चालय पादं चालय पादं चालय कर पल्लवान चालय कर पल्लवान चालय सर्वांगचालय सर्वांगचालय लोलय धुन धुन कंपय कंपय शीघ्रं भव तारय तारय प्रहि प्रहि ग्राह ग्राह भक्षय अक्षय आवेशेय प्रावेशेय ज्वलू ज्वालामालिनीं ह्रां वक्रीं ब्लू द्रां द्रां ज्वल ज्वल र र र र र र र प्रज्वल प्रज्वल धग धग धूमाक्ष करणीं ज्वल विशेषय विशेषय देवग्रहान् दह दह नाग ग्रहान् दह दह यक्ष ग्रहान् दह दह गंधर्व ग्रहान् दह दह ब्रह्म ग्रहान् दह दह राक्षस ग्रहान् दह दह भूत प्रहान् दह दह दिव्यन्तर ग्रहान् दह दह चतुराशि जैंन्य मार्ग ग्रहान् दह दह चतुर्विश जिन ग्रहान् दह दह सर्व जटिल ग्रहान् दह दह अखिल मुंडित ग्रहान् दह दह जंगम ग्रहान् वह दह सर्व दुर्गशादि विद्या ग्रहान् वह दह सर्व नवनिग्रह बासी

( १६२ ) ग्रहान् दह दह सर्वस्थलवासी ग्रहान् दह दह सर्वान्तरिक्ष वासी ग्रहान् दह दह श्मशान वासी ग्रहान् दह दह सर्व गिरिगुहा दुर्गवासी ग्रहान् दह दह श्रापित ग्रहान् दह दह सर्वनाथ पंथि ग्रहान् दह दह सर्वभूवासी प्रेत ग्रहान् दह दह (अमुक गृहे) असद्गति ग्रहान् दह दह वक्रपिण्ड ग्रहान् दह दह सर्वदुष्ट ग्रहान् दह दह शतकोटि योजने दोष- दायी ग्रहान् दह दह सहस्र कोटि योजनान् दोषदायि ग्रहान् दह दह शतकोटि दोष कोष दह दह सहस्रकोटि दोष दह दह आसमुद्रात् पृथ्वी मध्ये देवभूत पिशाचादि (अमु- कस्यो) परिकृत दोषान् तस्य दोषान् दह दह शत्रुकृतभिचार दोषान् दह दह घे घे स्फोटय स्फोटय मारय मारय धगि थगि धागत मुखे ज्वालामालिनी हां हीं हूं हैं हौं हः सर्व ग्रहाणां हृदये दह दह पच पच छिदि छिदि भिदिभिदि दह दह हा हा स्फुट स्फुट घे घे । क्ष्म्लुं क्षां क्षीं क्षुं क्षैं क्षौं क्षः स्तंभयः स्तंभपः । म्भ्लुं म्भ्रां म्भ्रीं म्भ्रू ं म्भ्रैं म्भ्रौं म्भ्रं अः बाडय बाडय । म्स्नूं म्श्रां म्श्रीं म्श्रू ं म्श्रैं म्श्रौं म्नः नेत्रं स्फोटय स्फोटय दर्शय दर्शय । य्म्लूं यां यीं यू यें यौं यः प्रेषय प्रेषय । ष्म्लुं ध्रा धी धू ं ध्रैं ध्रौं ध्रः जठेर भेदय । ग्लुं ग्रां ग्रीं गुं ग्रैं ग्रो ग्रः मुखं बंधयः बंधयः । र्लू ं खां खीं खू ं खैं , खौं खः ग्रीवां मंजय मंजयः । छप्लुं छां छीं छू ं छैं छौं छः मंत्रान् भेदय भेदयः । ढ्प्लुं ढां ढीं ढू ं द्रौं ढू ः महाविद्युत्पाषापाणा स्त्रैहन स्त्रैहन । म्प्रु द्रा व्रीं द्रं भ्रैं द्रौं द्रः समुद्रे भंजय मंजय । द्म्रूं द्रां द्री द्रू द्रौ द्रः सर्व डाकिनी सुन्दरी मर्दय मर्दय सर्व योगिनीं स्वञ्जय स्वञ्जय । सर्व शत्रु ग्रासय ग्रासय ख ख ख ख ख ख ख खादय खादय सर्व दैत्यान् विध्वंसय विध्वंसय सर्व मृत्युं नाशय नाशय सर्वोपद्रवान् स्तंभय स्तंभय जः जः जः जः जः जः जः ज्वरान् दह दह पच पच घुमु घुमु घुरु घुरु घुरु घुरु खरु खरु खंग रावण सुविघायां घातय प्रखिन्न रुजान् दोषोदयान् कृत कार्याणामिचारोत्थान (अमुकस्य) देहे स्थितान् अधुना रुज कारकान् चन्द्रहास शस्त्रेण छेदय छेदय भेदय भेदय उरु उरु छरु छरु स्फुट स्फुट घे श्रां क्रौं क्षीं क्षं क्षैं क्षौं क्षः ज्वाला मालिनीं (अमुकस्य) सौख्यं कुरु कुरु निरूजं कुरु कुरु अभिलाषित कामना देहि देहि ज्वाला मालिनीं विज्ञापयते स्वाहा ।

हस्त-परिचय संसार में जितने भी पुरुष हैं उनके हाथों में कुछ न कुछ विशेषता पाई जाती है । परन्तु अनुभव में ऐसा आया है कि एक विशेष वर्ग के व्यक्तियों के हाथों में एक रूपता या समानता पाई जाती है । नीचे की पंक्तियों में मैं समाज के विभिन्न वर्गों से सम्बन्धित हाथ की विशेषताओं का संक्षिप्त परिचय स्पष्ट कर रहा हूं । १. व्यवसायी : जो व्यक्ति व्यापार या व्यवसाय करता है उसके हाथ का अंगूठा सीधा तथा पीछे की तरफ किंचित् झुका हुआ होता है इसके साथ ही हथेली में उसकी मस्तिष्क रेखा सीधी और स्पष्ट होती है एवं बुध पर्वत सामान्यतः उभरा हुआ होता है । यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि एक सफल व्यवसायी के बुध पर्वत पर किसी प्रकार का कोई जाल नहीं होता । बुध की उंगली अर्थात् कनिष्ठिका कुछ लम्बाई लिये हुए होती है । बुध पर्वत की ओर यदि मस्तिष्क रेखा की कोई शाखा आ रही हो तो यह तुरन्त समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति अपने क्षेत्र में पूर्ण सफल सम्पन्न व्यक्ति है । इसके साथ ही जिसके हाथ की उंगलियां हथेली की अपेक्षा लम्बाई लिये हुए हों तो उसके जीवन में व्यवसाय की दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । [चित्र: व्यवसायी] २. लखपती : जिसके हाथ में सूर्य रेखा अपने आप में प्रबल हो, साथ ही जिसका शुक्र पर्वत विकसित हो और उस पर किसी प्रकार का कोई जाल या टूटी हुई रेखा न हो तो समझ लेना चाहिए कि यह व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अनुकूल है परन्तु जब भाग्य रेखा सीधी स्पष्ट और लालिमा लिये हुऐ हो तथा उसकी कोई एक शाखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो तथा मस्तिष्क रेखा पूर्णतः विकसित हो तो निश्चय ही वह व्यक्ति लखपति होता है तथा आर्थिक दृष्टि से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त कर पूर्ण सुख उपभोग करता है । [चित्र: लखपति]

( १६४ ) ३. एकाउन्टेन्ट : एकाउन्टेन्ट या मुनीम के हाथ में यह विशेषता होती है कि उसका बुध पर्वत अपने आप में विकसित तथा ऊंचा उठा हुआ होता है । साथ ही उसका सूर्य पर्वत भी उभरा हुआ होता है एवं उस पर सूर्य रेखा पूरी तरह से देखी जा सकती है । साथ ही साथ भाग्य रेखा का भी अध्ययन किया जाना चाहिए । यदि भाग्य रेखा बिना कहीं से कटे मध्यमा के मूल में स्थित शनि पर्वत पर सफलता के साथ जा रही हो तो ऐसा व्यक्ति एक सफल एकाउन्टेन्ट होता है । यदि ऊपर लिखे तथ्य हों और मध्यमा उंगली एवं कनिष्ठिका उंगली सामान्यतः कुछ लम्बाई लिये हुए हो साथ ही अंगूठे मजबूत हों तो वह व्यक्ति बैंक में महत्वपूर्ण पद पर [Image Caption: एकाउन्टेन्ट] होता है । ऐसा व्यक्ति इनकमटैक्स अधिकारी भी हो सकता है । यदि इन लक्षणों के अलावा चन्द्र रेखा पूर्णतः विकसित हो तथा भाग्य रेखा भी सहायक हो तो वह व्यक्ति चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट होता है । ४. न्यायाधीश : जिस व्यक्ति के हाथ में तर्जनी उंगली अनामिका से कुछ लम्बाई लिये हुए हो तथा कनिष्ठिका उंगली अनामिका के तीसरे पोर से ऊपर उठी हुई हो, साथ ही साथ सभी उंगलियां सुन्दर हों, गुरु पर्वत पूर्णतः विकसित हो तथा उस पर क्रॉस का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति विख्यात् वकील होता है । ऊपर लिखे गुण होने के साथ-साथ यदि व्यक्ति की हथेली में भाग्य रेखा निर्दोष पतली तथा स्पष्ट हो, साथ सूर्य पूर्ण प्रभाव युक्त हो और अंगूठा लम्बा तथा पीछे की तरफ झुका हुआ हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही सफल न्यायाधीश होगा । ऊपर लिखे गुण होने के साथ-साथ यदि भाग्य रेखा [Image Caption: न्यायाधीश] से कोई शाखा गुरु पर्वत पर पहुंचती हो तो वह व्यक्ति निश्चय ही मुख्य न्यायाधीश होता है ।