भारतकोश
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बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

( २६८ ) राज योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहों में से कोई एक ग्रह का पर्वत बलवान पुष्ट तथा लालिमा युक्त हो तथा उससे संबंधित रेखा भी सीधी सरल और स्पष्ट हो तो राज योग होता है। फल : जिसके हाथ में राज योग होता है वह अपने परिश्रम से ऊंचा उठकर अपने जीवन को सुखमय बनाता है। तथा यदि अन्य रेखाएं अच्छी हों तो गजेटेड अधिकारी बनता है ऐसा व्यक्ति परिश्रम पूर्वक धन संचय करता है तथा उसका पूरा आनन्द उठाता है। राज योग राज्य योग : परिभाषा : जिसके हाथ में सूर्य रेखा बलवान हो और गुरु पर्वत श्रेष्ठ हो तो राज्य योग होता है। फल : राज्य योग में जन्म लेने वाले व्यक्ति सभी सुख-सुविधाओं में पूर्ण जीवन व्यतीत करने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु जीवन के अन्तिम समय में और विशेषकर ४२वें साल के बाद से उसका भाग्योदय होता है तथा उसे भूमि, मकान तथा वाहन सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति चतुर, विपत्ति में भी धैर्य रखने वाला तथा योग्य होता है। राज्य योग टिप्पणी : निम्नलिखित योग भी राज्य योग कहलाते हैं । १. हाथ में गुरु पर्वत श्रेष्ठ तथा सभी उंगलिया लम्बी और पतली हों । २. यदि कनिष्ठिका उंगली जरूरत से ज्यादा लम्बी हो । ३. यदि शुक्र पर्वत के नीचे स्वस्तिक का चिह्न हो । ४. यदि गुरु पर्वत बडा हो तथा उस पर से रेखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो । ५. यदि मणिबन्ध से भाग्य रेखा का प्रारंभ हो । ६. यदि गुरु पर्वत हथेली के बाहर न निकला हुआ हो तथा अपने आप में श्रेष्ठ हो ।

( २६६ ) महेन्द्र योग : परिभाषा : यदि दोनों हाथों में भाग्य रेखा तथा सूर्य रेखा का प्रारंभ मणिबन्ध से दिखाई दे तथा चन्द्र पर्वत पूर्णतः विकसित हो तो महेन्द्र योग होता है । फल : जिसके हाथ में महेन्द्र योग होता है वह आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होता है। राजा के समान जीवन व्यतीत करता है । उसके जीवन काल में ही उसकी समस्त इच्छाएं पूरी हो जाती हैं । विद्वानों ने निम्नलिखित योग भी महेन्द्र योग माने हैं । १. यदि चन्द्र पर्वत बलवान हो तथा उस पर स्वस्तिक का चिह्न हो । २. यदि शुक्र पर्वत बलवान हो तथा जीवन रेखा की ओर बढ़ा हुआ हो, साथ ही उस पर स्वास्तिक का चिन्ह बना हो । रुद्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में गुरु मुद्रा तथा शनि मुद्रा हो साथ ही सूर्य से कोई रेखा निकल कर इन दोनों मुद्राओं को स्पर्श करती हो तो रुद्र योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में रुद्र योग होता है वह मस्त तबियत का आदमी होता है। यद्यपि यह जीवन में धन उपार्जित करता है, परन्तु साथ ही यह दोनों हाथों से खर्च करना भी जानता है। शान-शौकत, वैभव प्रदर्शन आदि में इसका विश्वास ज्यादा होता है । मृगेन्द्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, तथा शनि इन सातों ही ग्रहों के पर्वत दबे हुए हों तथा इनसे संबंधित सभी रेखाएं कमजोर हों या उनमें से कई रेखाएं दिखाई ही नहीं देती हों तो मृगेन्द्र योग होता है । फल : मृगेन्द्र योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला तथा आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त उच्च कोटि का होता है। भौतिक दृष्टि से उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती ।

( २७० ) देव योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहों के पर्वतों में से ६ पर्वत दबे हुए या अदृश्य हों तथा इनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या टूटी हुई हों तो उसके हाथ में देव योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सभी सुखों का भोग करता है, उसका जीवन अत्यन्त शान्त एवं सरल होता है तथा अपने विशेष क्षेत्र में वह व्यक्ति प्रसिद्धि प्राप्त करता है । एक प्रकार से इस योग को भी राज योग के समान ही समझना चाहिए । देव योग विक्रम योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहो के पर्वतों में से पांच पर्वत दबे हुए या अदृश्य हों तथा उनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या छिन्न भिन्न हों तो उसके हाथ में विक्रम योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भौतिक दृष्टि से पूर्ण उन्नति करता है तथा उसके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । विक्रम योग सुरपति योग : परिभाषा : यदि हथेली में सात ग्रहो के पर्वतों में से चार पर्वत दबे हुए कमजोर या अदृश्य हों तथा इनसे संबंधित रेखाएं भी अदृश्य या टूटी हुई हों तो सुरपति योग होता है । फल: जिसके हाथ में सुरपति योग होता है वह व्यक्ति अपने परिश्रम में धन एकत्र करता है तथा समाज में सम्मान- नीय जीवन व्यतीत करने में समर्थ होता है । उसके जीवन में भौतिक दृष्टि से कोई न्यूनता नहीं रहती । सुरपति योग

( २७१ ) गजपति योग : परिभाषा : यदि हाथ में सात ग्रहों के पर्वतों में से तीन पर्वत अत्यन्त दबे हुए कमजोर या अदृश्य हों तथा इनसे सम्बन्धित रेखाएं भी अदृश्य या छिन्न-भिन्न हों तो गजपति योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह परिश्रमी और हमेशा उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला व्यक्ति होता है । वह जीवन में कुछ करके दिखाना चाहता है । जीवन के ३२ वें वर्ष से उसका भाग्योदय होता है और उसके बाद से जीवन पर्यन्त वह सभी दृष्टियों से पूर्ण सुख भोग करता है । [चित्र: गजपति योग] मन्महेन्द्र योग : परिभाषा : यदि हथेली में प्रजापति, वरुण, हर्षल, प्लूटो नेपच्यूने तथा पर्वत बलवान हों तथा राहू एवं केतु के पर्वतों का रेखा के द्वारा सम्बन्ध हो तो मन्महेन्द्र योग होता है । फल : मन्महेन्द्र योग मे जन्म लेने वाला व्यक्ति बल- वान, गुणवान तथा पूज्यनीय होता है । किसी एक क्षेत्र में वह अत्यन्त प्रसिद्धि प्राप्त करता है । अथवा उच्च शासकीय पद प्राप्त कर अपने जीवन को आनन्दमय बनाने में समर्थ होता है । [चित्र: मन्महेन्द्र योग] हरिहरब्रह्म योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में बुध, चन्द्र, शुक्र, तथा सूर्य पर्वतों का परस्पर रेखाओं के द्वारा सम्बन्ध होता हो और ये रेखाए आपस मे कहीं पर भी न कटती हों तो हरि- हरब्रह्म योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ मे हरिहरब्रह्म योग होता है वह व्यक्ति शुद्ध सांस्कृतिक जीवन व्यतीत करने वाला एवं सत्य बोलने वाला, वेद तथा संस्कृति को जानने वाला, एवं देवपूजक होता है । ऐसे व्यक्ति का समाज में विशेष सम्मान होता है । [चित्र: हरिहर ब्रह्म योग]

( २७२ ) कुसुम योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य पर्वत अपने स्थान से खिसक कर शनि पर्वत में मिल गया हो तो कुसुम योग होता है। फल : कुसुम योग रखने वाला व्यक्ति विद्वान भाग्य- शाली तथा उच्च पद पर पहुंचने वाला माना गया है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में कई आकस्मिक क्षण आते हैं जबकि वह जल्दी से जल्दी उन्नति करने में समर्थ होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती। [चित्र: कुसुम योग] अग्नि काण्ड योग : परिभाषा : यदि मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो तथा इस पर्वत से एक रेखा निकलकर राहू पर्वत पर जाती हो तो अग्निकाण्ड योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उस व्यक्ति की मृत्यु आग से जलकर होती है। [चित्र: अग्निकाण्ड योग] मत्स्य योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत विकसित हो, अंगूठा पतला, लम्बा और थोड़ा सा पीछे झुका हुआ हो, साथ ही यदि सूर्य रेखा सीढ़ीदार हो तो मत्स्य योग होता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में मत्स्य योग होता है वह सही भविष्यवक्ता, समय का पाबन्द तथा सद्गुणों से युक्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि के द्वारा उन्नति करता है तथा जीवन में क्षमावान, दयावान तथा सद्गुण विवेक- [चित्र: मत्स्य योग] युक्त माना जाता है।

( २७३ ) अग्रजघातक योग : परिभाषा : यदि हथेली मे राहू तथा हर्षल पर्वत पर त्रिकोण का चिह्न हो तो उसके जीवन में अग्रजघातक योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने बड़े भाई से वैमनस्य रखता है अथवा उसकी हत्या कर देता है । अग्रजघातक कूर्म योग : परिभाषा : यदि हथेली में सूर्य रेखा स्पष्ट चन्द्र पर्वत से होती हुई जीवन रेखा के मध्य मिलती हो तथा भाग्य रेखा बलवान हो तो कूर्मयोग होता है । फल : कूर्म योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने कार्यों से विख्यात तथा कीर्तिवान होता है । साथ ही ऐसा व्यक्ति विपत्ति मे धैर्य धारण करने वाला, भाषण देने में होशियार, दूसरों को प्रभावित करने वाला तथा राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है । कूर्म योग आत्मघात योग : परिभाषा : यदि मध्यमा उंगली के सबसे निचले पौर पर तारक चिन्ह हो तो आत्मघात योग होता है । फल : जिसके हाथ में आत्मघात योग होता है उसकी मृत्यु स्वयं के प्रयत्नों से होती है और वह आत्महत्या करके मरता है । आत्मघात योग

( २७४ ) देवेन्द्र योग : परिभाषा : जिसके हाथ में कमल का चिह्न हो और विशेषकर ऐसा चिह्न जीवन रेखा के पास में चन्द्र पर्वत से कुछ हटकर हो परन्तु जिससे कोई प्रसिद्ध रेखा कटती न हो तो देवेन्द्र योग होता है । फल : जिसके हाथ में देवेन्द्र योग होता है वह ध्यमित सूझ-बूझ वाला तथा चतुराई से काम करने वाला होता है । वह आकर्षक व्यक्तित्व रखता है तथा सामने वाले व्यक्तियों को पूरी तरह से प्रभावित करने की क्षमता रखता है । ऐसा व्यक्ति दीर्घायु, शासन प्रिय, सुन्दर, कुशल, तथा दक्ष होता है । (चित्र: देवेन्द्र योग) खंग योग : परिभाषा : यदि हथेली मे बुध पर्वत अपने स्थान से खिसक कर सूर्य पर्वत मे मिल गया हो और सूर्य पर्वत अपने आप मे दृढ़ एवं श्रेष्ठ हो तो खंग योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह साधारण स्थिति में भी जन्म लेकर अत्यन्त ऊंचे स्तर तक पहुंचता है । ये जो भी बातें कहते हैं उसे अन्त समय तक निभाने का प्रयत्न करते है । ऐसे व्यक्ति भविष्य कथन करने मे भी श्रेष्ठ एव सफल होते हैं । आर्थिक दृष्टि मे इनके जीवन मे किसी प्रकार (चित्र: खंग योग) की कोई न्यूनता नहीं रहती । नवलक्ष्मी योग : परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा, सूर्य रेखा तथा, बुध रेखा तीनों ही मणिबन्ध मे निकलती हों तथा सीधी, सरल और स्पष्ट हों तो नवलक्ष्मी योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है वह अटूट सम्पत्ति का स्वामी, सम्पन्न, ऐश्वर्य युक्त तथा प्रसिद्धि प्राप्त होता है । (चित्र: नव लक्ष्मी योग)

( २७५ ) ज्योतिर्विद योग : [चित्र: ज्योतिर्विद योग] परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों तथा यह पर्वत अपने आप में पुष्ट हो तो ज्योतिर्विद योग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति सफल भविष्य वक्ता होता है । भूमि योग : परिभाषा : यदि मंगल तथा शुक्र पर्वत के बीच पर- स्पर रेखा संबन्ध हो तथा शुक्र पर्वत पर भाग्य रेखा की कोई सहायक रेखा आकर मिलती हो तो भूमि योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह भूमि सम्बन्धी कार्यों से विशेष लाभ उठाता है तथा अपने आप में भूमिपति होता है । [चित्र: भूमि योग] पुत्रतः धनाप्ति योग : [चित्र: पुत्रतः धनाप्ति योग] परिभाषा : यदि गुरु पर्वत से कोई पतली रेखा शुक्र पर्वत तक जाती हो तथा तर्जनी और मध्यमा के बीच तिल चिह्न हो तो यह योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है उसे जीवन भर पुत्र से धन प्राप्ति होती रहती है तथा सन्तान सुख मिलता है ।

( २७६ ) कोटीश योग : परिभाषा : यदि हाथ में शनि वलय हो और वलय रेखा से छोटी-छोटी रेखाएं ऊपर की ओर उठ रही हों, साथ ही भाग्य रेखा मणिबन्ध से निकल कर शनि बिन्दु तक जाती हो तो कोटीश योग होता है । फल : जिसके हाथ में कोटीश योग होता है वह व्यक्ति जीवन में निश्चय ही करोड़पति होता है । कोटीश योग अरिष्ट योग : परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर तारे का चिह्न हो तथा मध्यमा के सबसे ऊपरी पौर पर सफेद बिन्दु हो तो अरिष्ट योग होता है । फल : जिसके हाथ में अरिष्ट योग होता है वह जीवन में कई बार जादू, टोना, मन्त्र तंत्र, भूत प्रेत आदि से पीड़ित रहता है । अरिष्ट कलह योग : परिभाषा : यदि हथेली में चन्द्र पर्वत पर आड़ी तिरछी रेखाओं से जाल बना हो तो कलह योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में कलह योग होता है वह जीवन भर प्रत्येक से कलह करता रहता है तथा हर एक से उसका मानसिक असंतुलन बना रहता है । कलह

( २७७ ) उन्माद योग : परिभाषा : यदि चन्द्र, राहू, पर्वत का परस्पर रेखा सम्बन्ध हो या सूर्य और राहू पर्वतों का परस्पर सम्बन्ध हो तो उन्माद योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में उन्माद योग होता है वह विक्षिप्त स्वभाव का तथा उन्मादी प्रकृति का होता है । उन्माद योग विष योग : परिभाषा : यदि हाथ में बुध रेखा के नीचे कई काले बिन्दु हों तो विष योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है उसे धोखे से या विश्वासघात से जहर दिया जाता है जिससे उसकी मृत्यु होती है । विष योग श्वान योग परिभाषा : यदि शनि पर्वत पर काला धब्बा या काले बिन्दु हों तो श्वान योग होता है । फल : जिसके हाथ में श्वान योग होता है वह पागल कुत्ते के काटने से पीड़ित होता है या पागल हो जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है । श्वान योग

( २७८ ) बृहद् बीज योग : परिभाषा : यदि राहू पर्वत पर काले धब्बे या काले बिन्दु हों तो बृहद् बीज योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में यह योग होता है उसके अण्डकोष बढ़े हुए होते हैं तथा जीवन भर इस रोग से ग्रसित रहता है । बृहद् बीज विमल योग : परिभाषा : यदि दो मणिबन्धों के बीच में सफेद बिन्दु हो तो विमल योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अत्यन्त सर्व गुण सम्पन्न समस्त प्रकार के ऐश्वर्य भोग भोगने वाला, दयालु, परोपकारी तथा सुखी होता है । विमल सरल योग : परिभाषा : यदि सभी नाखूनों पर छोटे अर्द्धचन्द्र हों तो सरल योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ मे सरल योग होता है वह व्यक्ति दीर्घायु, शिक्षित, बात के मर्म को समझने वाला तथा निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला व्यक्ति होता है । सरल

( २७६ ) हर्ष योग : परिभाषा : यदि हथेली के मध्य में चन्द्र पर्वत और ऊर्ध्व रेखा के बीच में तिल का चिह्न हो तो हर्ष योग होता है । फल : हर्ष योग वाला व्यक्ति भाग्यवान गुणी, चतुर, दृढ़, तथा प्रसिद्ध होता है । प्रवृज्या योग : परिभाषा : यदि आयु रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो प्रवृज्या योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में प्रवृज्या योग होता है वह किसी साधु से दीक्षा ले लेता है और गृहस्थ छोड़कर सन्यासी बन जाता है । टिप्पणी : विद्वानो ने निम्नलिखित योग भी प्रवृज्या योग से संबंधित माने हैं : १. यदि सूर्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो । २. यदि पूरा हाथ लचकदार हो । सभी उंगलियां लम्बी और सुन्दर हों तथा भाग्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो । ३. यदि बुध पर्वत के नीचे त्रिकोण या जाल हो । ४. यदि संतान रेखाओं एवं प्रणय रेखाओं पर जाल का चिह्न हो । शुक्र योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत बलवान पुष्ट, उठा हुआ तथा सुन्दर हो एवं उस पर बाधक रेखाओं का जाल न हो तो शुक्र योग होता है । फल : शुक्र याग वाला व्यक्ति धनवान, विद्वान विख्यात तथा कीर्तिवान होता है । ऐसा व्यक्ति दीर्घायु तथा सुखी परिवार से युक्त होता है ।

( २८० ) दुर्योग : परिभाषा : यदि स्वास्थ्य रेखा पर त्रिकोण का चिह्न हो तो दुर्योग होता है । फल : जिस जातक की हथेली में दुर्योग होता है वह व्यक्ति कमजोर शरीर वाला अपने स्वास्थ्य के प्रति लापर- वाह दरिद्री जीवन व्यतीत करने वाला, स्वार्थी तथा अपने जन्म स्थान से दूर रहने वाला होता है । दुर्योग गोल योग : परिभाषा : यदि शुक्र पर्वत हथेली के बाहर की ओर निकला हुआ सा हो तो गोल योग होता है । फल : ऐसा व्यक्ति परिश्रमी, भाग्यहीन, तथा बराबर धन की चिन्ता करने वाला तथा तुच्छ बुद्धि का होता है । गोल योग युग योग : परिभाषा : यदि स्वास्थ्य रेखा हथेली के पार जाती हो तथा जीवन रेखा से उसका सम्बन्ध बना हो तो युग योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति चंचल स्वभाव वाला पाखण्डी एवं व्यभिचारी होता है । ऐसे व्यक्ति को समाज में किसी प्रकार का कोई सम्मान नहीं मिलता । युग योग

( २८१ ) शूल योग : परिभाषा : यदि मंगल रेखा चन्द्र पर्वत से होकर सूर्य पर्वत तक जाती हो तो शूल योग होता है । फल : जिसके हाथ में शूल योग होता है वह व्यक्ति क्रोधी, क्रोध के आवेश में बना बनाया काम बिगाड़ने वाला, लड़ाकू स्वभाव वाला, दरिद्री तथा घमण्डी होता है । [चित्र: शूल योग] केदार योग : परिभाषा : यदि सूर्य रेखा शनि पर्वत की ओर झुकी हुई तथा स्वास्थ्य रेखा से संबन्ध स्थापित करती है तो हाथ में केदार योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति आलसी, बन्धु-बान्धवों की सहायता करने वाला, कामी और कृषि कार्य मे निपुण होता है । टिप्पणी : इस योग में व्यक्ति में अच्छे और बुरे गुणों का मिश्रण होता है । [चित्र: केदार योग] पाश योग : परिभाषा : यदि गुरु पर्वत पर तिल का चिह्न हो तो पास योग होता है । फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह व्यक्ति मित्रों में लोकप्रिय, नौकरी द्वारा सुख भोगने वाला, तथा धन- वान होता है । [चित्र: पाश]

( २८२ ) दामिनी योग : परिभाषा : यदि मध्यमा और अनामिका उंगली के बीच तिल का चिह्न हो दामिनी योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति उच्च चरित्रवान, दूसरों का सहायक तथा बुद्धिमान व्यक्ति होता था । दामिनी मुकुट योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में मंगल पर्वत विकसित हो तथा वहां से एक रेखा सूर्य पर्वत की ओर जाती हो और उस पर स्वस्तिक का चिह्न हो तो मुकुट योग होता है । फल : जिसके हाथ में मुकुट योग होता है वह व्यक्ति अपने जीवन में श्रेष्ठ खिलाड़ी होता है । जीवन में खिलाड़ी के रूप में ही उसे मान्यता मिलती है तथा वह समाज में प्रसिद्ध होता है । ऐसे व्यक्ति में वैर की भावना अत्यन्त प्रबल होती है । ऐसा जातक शिकारी और अपने लक्ष्य को सही रूप में पहिचानने वाला होता है । मुकुट ऋण योग : परिभाषा : यदि हथेली में शनि रेखा के दाहिनी ओर काले रंग का तिल हो तो ऋण योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह थोड़े बहुत रूप में जीवन भर ऋणी बना रहता है तथा उसके जीवन में आय की अपेक्षा व्यय हमेशा बढ़ा-चढ़ा रहता है । ऋण योग

( २८३ ) कारक योग : परिभाषा : यदि गुरु रेखा के वाम भाग में लाल या काला तिल हो तो उसके हाथ में कारक योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह जातक अपने जीवन को सुख पूर्वक व्यतीत करता है । ऐसा जातक अपने व्यापार में उच्च स्तर प्राप्त करने में सफल रहता है । आर्थिक दृष्टि से तथा भौतिक दृष्टि से इसके जीवन में किसी प्रकार की कोई बाधा या परेशानी नहीं होती । कारक योग

वल्लकी योग : परिभाषा : यदि दाहिने हाथ में मंगल रेखा के नीचे या उसके दाहिनी ओर लाल तिल का चिन्ह हो तो वल्लकी योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह शात, गम्भीर, जीवन में कई मित्रों का सहयोग प्राप्त करने वाला, प्रसन्नचित एवं अपने हुनर में ख्याति प्राप्त व्यक्ति होता है । वल्लकी योग

शारदा योग : परिभाषा : यदि बुध पर्वत के नीचे या उसके बाईं ओर काला तिल हो तो शारदा योग होता है । फल : जिसके हाथ में शारदा योग होता है वह व्यक्ति स्त्री, पुरुष, बन्धु आदि से सम्पन्न उन्नतिशील होता है । देवताओ का यह आदर करता है तथा विद्वान चतुर, एवं धार्मिक पुरुष होता है । शारदा

( २८४ ) समुद्र योग : परिभाषा : यदि सूर्य रेखा के नीचे या उसके दाहिनी ओर काले तिल का चिह्न हो तो समुद्र योग होता है । फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति विख्यात्, धार्मिक कार्य में आगे रहने वाला, राजा के समान सुख भोगने वाला तथा चिन्ता मुक्त होता है । अर्द्ध चन्द्र योग : परिभाषा : यदि चन्द्र रेखा के नीचे या दाहिनी ओर काले तिल का या लाल तिल का चिह्न हो तो अर्द्धचन्द्र योग होता है । फल : जिसके हाथ मे यह योग होता है वह व्यक्ति जीवन भर प्रसन्नचित् रहने वाला, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न, सहृदय, सुन्दर आकर्षक व्यक्तित्व वाला तथा निरंतर उन्नति करने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं रहती । छत्र योग : परिभाषा : यदि शुक्र रेखा के पास में या उसके नीचे लाल तिल अथवा काले तिल का चिह्न हो तो छत्र योग होता है। फल : यदि हाथ में छत्र योग हो तो ऐसा व्यक्ति साहसी, रसिक पूर्ण, गृहस्थ सुख को भोगने वाला तथा आनन्द पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाला होता है ।

( २८५ ) कूट योग : परिभाषा : यदि हाथ के मध्य में दो से अधिक तिल हो और मुट्ठी बन्द करने पर उसमें आते हैं तो कूट योग होता है । फल : जिसके हाथ में कूट योग होता है वे व्यक्ति अत्यन्त साहसी पराक्रमी तथा निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर होने वाले होते हैं । विपरीत परिस्थितियों को देखकर व्यक्ति घब- राते नहीं, अपितु उनसे संघर्ष कर उन विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने की क्षमता रखते हैं । [चित्र: कूट]

इषु योग : परिभाषा : यदि अंगूठे के ऊपरी पौर पर काले तिल का चिह्न हो तो इषु योग होता है । फल : इस योग मे जन्म लेने वाला व्यक्ति राजपत्रित अधिकारी होता है । ऐसे व्यक्ति सामान्यतः जेल अधिकारी या पुलिस सुपरिटेंडेंट होते हैं । अपने जीवन में ये व्यक्ति अपने उद्देश्यों में पूर्णतः सफलता प्राप्त करते हैं । [चित्र: इषु योग]

दिग्बल योग : परिभाषा : यदि शनि पर्वत को छोड़कर अन्य तीन पर्वत अर्थात् सूर्य, बुध, और गृह पर्वत पर या इनसे संबंधित रेखाओं के नीचे काले या लाल तिल का चिन्ह हो तो दिग्बल योग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में दिग्बल योग होता है वह व्यक्ति अपने जीवन में अत्ययन्त ऊंचे स्तर पर पहुंचता है तथा अपने कार्यों से समाज में सम्मानित होता है । [चित्र: दिग्बल योग]

( २८६ ) नीच भंग राज योग : परिभाषा : यदि हाथ में शुक्र वलय हो और उस पर क्रॉस का चिह्न हो तो नीच भंग राज योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अपने प्रयत्नों से उन्नति करता है तथा आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में सुख प्राप्त करता है। टिप्पणी : विद्वानों ने इसके अलावा निम्नलिखित योग भी नीच भंग राजयोग से संबंधित बताए हैं । १. यदि हाथ के मध्य में स्वस्तिक का चिह्न हो। २. यदि मध्यमा उंगली के तीनों ही पर्वतों पर काले नीचभंग राज योग तिल का चिह्न हो। ३. यदि गुरु वलय हो तथा गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिह्न भी हो। ४. यदि बुध वलय हो पर चन्द्रमा से कोई रेखा निकल कर बुध पर्वत तक पहुंची हो। ५. यदि हाथ के सभी पर्वत सामान्यतः उन्नत तथा श्रेष्ठ हों। ६ यदि भाग्य रेखा सीढ़ीदार हो। ७. यदि जीवन रेखा पूर्ण हो तथा उस पर किसी प्रकार की बाधक रेखाएं न हों। ८. यदि शुक्र पर्वत उभरा हुआ हो और उस पर बाधक रेखाएं न हों। ६. यदि चार मणिवन्ध हों तथा पहला मणिबन्ध जंजीरदार हो। चण्डिका योग : परिभाषा : यदि हथेली चौड़ाई की अपेक्षा कुछ अधिक लम्बाई लिये हुए हो, हाथ की उंगलियां बिना गांठ की हों तथा हाथ में जीवन रेखा के प्रारम्भ से एक रेखा निकल कर सूर्य पर्वत अथवा बुध पर्वत तक जाती हो तो चण्डिका योग होता है। फल : जिस व्यक्ति के हाथ में चण्डिका योग होता है वह व्यक्ति चरित्रवान, धनपति, दूसरों की भलाई करने वाला, निरन्तर उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला तथा मन्त्री के चण्डिका योग समान जीवन व्यतीत करने वाला होता है।

( २८७ ) नाभस योग : परिभाषा : यदि किसी भी उंगली के नीचे और पर्वत के ऊपर छोटा स्वस्तिक का चिह्न हो तो नाभस योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति अत्यन्त श्रेष्ठ पूज्यनीय, ऐश्वर्यवान, परोपकारी तथा पूर्ण भौतिक सुख भोगने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करते हैं। (चित्र: नाभस योग) जय योग : परिभाषा : जिसके हाथ में मगल पर्वत पर दो या दो से अधिक तिल के चिह्न हो तो जय योग होता है। फल : जिसके हाथ में यह योग होता है वह व्यक्ति प्रबल, भाग्यशाली, अपने हर कार्य में पूर्ण विजय प्राप्त करने वाला, शत्रुओ का तीव्रता से नाश करने वाला, क्षमता रखने वाला, गुणवान, धैर्ययुक्त एवं दीर्घायु होता है। (चित्र: जय योग) विद्युत योग : परिभाषा : मणिबन्ध के ऊपर तिल का चिन्ह हो तो विद्युत योग होता है। फल : ऐसा योग रखने वाला व्यक्ति राजा के समान जीवन व्यतीत करने वाला, धनवान तथा पूर्ण सुख को भोगने वाला होता है। (चित्र: विद्युत योग)