भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

( ३२६ ) ७१. जिस स्त्री का पेट छोटा तथा कोमल त्वचा बाला हो वह श्रेष्ठ होती है । ७२. घड़े के समान पेट वाली स्त्री दरिद्री होती है । ७३. यदि पेट बहुत चौड़ा हो तो वह दुर्भाग्यशाली होती है । ७४. लम्बे पेट वाली स्त्री ससुर या जेठ का नाश करती है । ७५. जिसके पेट पर तीन बल या तीन रेखाएं पड़ती हों वह भाग्यवान होती है । ७६. जिसके रोम सीधे और पतले हों वह सुख उठाने वाली होती है । ७७. जिसकी रोम पंक्ति टेढ़ी-मेढ़ी हो वह विधवा होती है । ७८. जिसका सीना बिना रोम का हो वह अपने पति की प्रिय होती है । ७९. जिसका सीना विस्तृत हो वह निर्दयी होती है । ८०. अठारह अंगुल चौड़ा सीना शुभ माना गया है । अर्थात् स्त्री का सीना छत्तीस अंगुल का होना चाहिए । ८१. यदि स्तन कठोर गोल तथा दृढ़ हों तो वे शुभ हैं । ८२. यदि स्तन मोटे तथा सूखे हुए हों तो वे दुख देने वाले होते हैं । ८३. यदि स्त्री का दाहिना स्तन ऊंचा हो तो सौभाग्यशाली होती है । ८४. जिस स्त्री के दोनों स्तन दबे हुए हों वह कुलटा होती है । ८५. जिस स्त्री के स्तनों के अग्र भाग काले तथा गोल हों वह शुभ माना गया है । ८६. जिस स्त्री की हंसुली मोटी हो वह ऐश्वर्य भोगी होती है । ८७. जिसकी हंसुली ढीली-ढाली हो वे दरिद्री होती है । ८८. यदि स्त्री के कंधे झुके हुए न हों तो शुभ है । ८९. यदि स्त्री के कंधे टेढ़े मोटे और बाल युक्त हों तो वह विधवा होती है । ९०. यदि आगे को कुछ झुके हुए और मजबूत हों तो वह आनन्द करती है । ९१. यदि उसकी भुजाएं कोमल तथा सीधी और रोम रहित हों तो यह शुभ माना गया है । ९२. यदि भुजाएं बालों से भरी हुई हों तो वह विधवा होती है । ९३. जिन स्त्रियों की भुजाएं छोटी हों वे दुख उठाती हैं । ९४. यदि हथेली लाल तथा छिद्र रहित हो तो वह सौभाग्यशालिनी होती है । ९५. यदि हथेली बहुत-सी नसों वाली या बहुत अधिक रेखाओं वाली हों तो दरिद्री होती है । ९६. यदि नख लाल और उभरे हुए हों तो शुभ है । ९७. पीले नख दरिद्रता के सूचक हैं । ९८. नखों पर सफेद बिन्दु कुलटा का संकेत करते हैं । ९९. जिसकी पीठ झुकी हुई हो वह दुख उठाने वाली होती है ।

( ३२७ ) १००. जिस स्त्री की पीठ मे बहुत अधिक बाल हों वह विधवा होती है । १०१. सीधी दृष्टि वाली स्त्री पुण्यवान होती है । १०२. जिस स्त्री की दृष्टि नीचे की ओर झुकी हुई हो वह अपराधिनी होती है । १०३. यदि दोनों आंखें अधिक निकट हों तो वह स्त्री धोखा देने वाली होती है । १०४. जिसकी आंखें बहुत दूर वह मूर्ख होती है । १०५. यदि ललाट में तिल हो तो वह जीवन भर आनन्द उठाती है । १०६. यदि हृदय पर तिल हो तो यह सौभाग्यदायक होता है । १०७. जिस स्त्री के दाहिने स्तन पर तिल हो वह अधिक कन्याएं पैदा करने वाली होती है। १०८. यदि बायें कुच पर लाल तिल हो तो वह विधवा होती है । १०६. जिसकी नाक के अग्र भाग में लाल तिल हो वह पति की प्रिय होती है। ११०. जिसकी नाक के आगे के भाग में काला तिल हो वह दुराचारिणी होती है । १११. जिसकी नाभी के नीचे तिल हो वह शुभ है । ११२. जिसके बायें हाथ में तिल हो वह सौभाग्यशाली होती है । ११३. जिसके गाल होठ, हाथ, कान, या गले पर तिल हो तो वह जीवन भर सुख पाती है। स्त्री की इक्कीस जातियां : स्त्री की २१ जातियां होती हैं जिनका वर्णन संक्षेप में नीचे की पंक्तियों में स्पष्ट किया जाता है। पद्मिनी स्त्री :—ऐसी स्त्री दया और स्नेह रखने वाली, चित्त को मोहित करने वाली, हंस के समान चलने वाली तथा माता-पिता की सेवा करने वाली होती है। इसके शरीर से कमल के समान सुगंध निकलती है। वह सुन्दर, सामने वाले को प्रभावित करने वाली तथा पति सेवा में लीन रहती है। इसके नाक, कान, तथा होठ छोटे होते हैं। शंख के समान गर्दन और कमल के समान चेहरा होता है। ये स्त्री सौभाग्यवती, कम सन्तान उत्पन्न करने वाली और पतिव्रता होती है। २ चित्रिणी:—ऐसी स्त्रियां पतिव्रता और सब पर स्नेह करने वाली होती हैं । श्रृंगार आदि में उनकी रुचि रहती है। ये ज्यादा परिश्रम नहीं करतीं पर बुद्धिमान होती हैं। इनका मस्तिष्क गोल तथा नेत्र चंचल होते हैं। इनकी चाल हाथी के समान स्वर मोर के समान होता है। ऐसी स्त्रियां कोमल अंगों वाली तथा लज्जा रखने वाली होती हैं। ऐसी स्त्रियां नृत्य प्रेम तथा सुन्दरता से पति को प्रसन्न रखने वाली होती हैं।

( ३२८ ) ३. हस्तिनी : ये पुरुष के मनोऽनुकूल होती हैं। तथा इनमें भोग की इच्छा विशेष होती है। इनका शरीर मोटा और थोड़ा बहुत आलस से भरा हुआ होता है । इनमें लज्जा धर्म आदि कम होता है। इनकी कपोल नासिका कान और गर्दन मोटी होती है। आंखें छोटी और पीली होती हैं। होठ मोटे और लम्बे होते हैं तथा चाल हाथी के समान होती है। इन्हें क्रोध अधिक आता है और लड़ाकूवृत्ति की होती हैं। ये अपने पति से सन्तुष्ट नहीं होती तथा पति के अलावा अन्य पुरुषों से सम्बन्ध बनाने को लालायित रहती हैं। ४. शंखिनी : ये लम्बी होती हैं तथा चलते समय पृथ्वी पर आवाज होती है। ये अपने कूल्हे हिला-हिला कर चलती हैं। इनकी आंखें टेढ़ी और शरीर बेडौल होता है। इनमें क्रोध की भावना अधिक होती है। तथा प्रत्येक क्षण भोग की इच्छा बनी रहती है। इनका मन दुष्ट होता है तथा मादक द्रव्यों का सेवन इन्हें रुचिकर लगता है। ये दुराचारिणी तथा पर पुरुष में रतु रहती हैं। ५. सषिनी : ये सरल स्वभाव वाली तथा डरपोक होती हैं। ऐसी स्त्रियां हंसमुख और लज्जायुक्त होती हैं। उनकी बोली कोमल होती है तथा प्रत्येक दृष्टि से पति को प्रसन्न करने की कला इन्हें आती है। ६. नेत्रावणि : ये सुन्दर रूपवती, गौर-वर्ण, अभिनय के साथ काम करने वाली और भव्या होती है। पर उन्हें पति दुष्ट या कमजोर मिलते हैं। इस वजह से इनका गृहस्थ जीवन ज्यादा सुखमय नहीं होता। इनके रूप को देखकर प्रत्येक पुरुष मोहित हो जाता है। ये पर पुरुष से दूर रहती हैं। ७. कलहकारिणी : ऐसी स्त्री की भौंहें हमेशा चढ़ी हुई रहती हैं। इसके दांत ऊंचे-नीचे तथा भैंस के समान शरीर होता है। रास्ते में चलते समय इसके पैरों से धूल उड़ती रहती है। यह द्वेष रखने वाली तथा धोखे से पति को मारने वाली होती है। यह किसी भी प्रकार का पर पुरुष से सम्बन्ध जोड़ने में ही अपनी चतुराई समझती है। ८. गृहस्थिनी : ऐसी स्त्री आदर्श रूप से घर को चलाने वाली तथा पति में ही अनुरक्त रहती है। न तो यह अधिक बोलती है न किसी को धोखा देती है। न यह पर पुरुषों को चाहती है और न अधिक बनी ठनी रहती है। कुकर्मों से दूर रहने वाली यह स्त्री अपने दोनो पक्षों का नाम ऊंचा उठाती है। ६. आतुरा : ऐसी स्त्री प्रत्येक कार्य को तुरंत-फुर्त करने में विश्वास रखती है। यह साधारण रूप रंग वाली स्त्री पति से प्रेम करने वाली होती है तो कभी पति से भयंकर लड़ाई भी कर लेती है। इस स्त्री को समझना अत्यन्त कठिन होता है।

( ३२६ ) १०. भयोतुरा : यह गौर वर्ण-नाजुक-लज्जा से सिकुड़ सिमट कर बात करने वाली तथा थोड़ी-थोड़ी बातों से डरने वाली होती है। यह कभी अकेली नहीं रहती । यह सबसे प्रेम करने वाली, मधुर भाषण करने वाली तथा अपने धर्म को निभाने वाली होती है। ११. डाकिनी : यह हंसकर बातें करने वाली तथा धोखा देने में चतुर होती है। इसके नेत्र लाल होते हैं। ऊपर से यह बहुत प्यार दिखाती है पर निकट से यह लालची तथा धोखा देने वाली होती है। इससे प्रेम करना और सांप से प्रेम करना बराबर होता है। इसका पति इसकी बदनामी से हर समय दुखी रहता है। १२. हंसिनी : यह सुखी तथा समझदार होती है। इसकी चाल हंस के समान मनमोहक होती है। यह सत्य बोलने वाली तथा रति के समान सुन्दर होती है। यह मधुर प्रीति करने वाली होती है। ऐसी स्त्रियां सौभाग्यशाली पुरुषों को ही मिलती हैं। १३. बहुवंशिनी : ऐसी स्त्री गेहूंएं रंग वाली तथा पूरी तरह से गृहस्थ धर्म को निभाने वाली होती है। यह असत्य नहीं बोलती तथा पति सेवा में ही प्रसन्न रहती है। समाज में इसका सम्मान होता है। १४. कृपणी : ऐसी स्त्री निर्लज्ज, कमजोर शरीर वाली तथा कंजूस होती है। यह थोड़े बहुत रूप में बदनाम होती है तथा किसी से भी किसी भी प्रकार की बात करने में इसको शर्म नहीं आती। यह धन के लिये किसी भी पुरुष के साथ सोने को तैयार हो जाती है। १५. घातिनी : यह स्त्री चालाक, तथा दूसरों को धोखा देने में होशियार होती है। प्रकट मे यह प्रेम जताती है परन्तु इसके हृदय में जहर भरा हुआ रहता हैं। यह कुशल धोखा देने वाली होती है तथा बात-बात पर असत्य भाषण करती है। १६. प्रेमिणी : यह सुन्दर प्रेम को निभाने वाली तथा पतिप्रिय होती है। यह हमेशा मन्द-मन्द मुस्कराती रहती है तथा जो भी इसकी भलाई करता है उस पर यह सब कुछ न्योछावर करने के लिये तैयार रहती है। इसके केस लम्बे सुन्दर तथा चेहरा आकर्षक होता है । १७. कृशतन्वी : यह स्त्री दुबली पतली तथा क्रोध करने वाली होती है यह अपने आपको बहुत अधिक चतुर समझती है तथा जब बोलती है तो इसका शरीर थरथराता रहता है । १८. मध्यमस्तिनी : यह घमंड में चूर तथा कामपिपासू होती है । काम कला में हमेशा पुरुष ही पराजित होता है। यह कभी भी हार नहीं मानती । यह अत्यधिक कामी होती है तथा अन्त में यह वैश्या के समान हो जाती है। एक स्थान पर टिक कर बैठना इसको अच्छा नहीं लगता ।

( ३३० ) १९. कुलच्छेदिनी : यह स्त्री जिस घर में भी जाती है उसको दरिद्र बना देती है। यह पाप कर्म से प्रेम करती है। पति को बात-बात पर धोखा देती है। माता, पिता, पति, भाई, ससुर, आदि की किसी की इज्जत की यह परवाह नहीं करती और लगभग दुराचारिणी होती है। २०. नारकी : ऐसी स्त्री छोटी आंखों वाली तथा पाप कार्यों में रत रहने वाली होती है। यह आपस में एक दूसरे की लड़ाई कराने में प्रसन्न होती है। ऐसी स्त्री दगाबाज तथा असत्यभाषिणी होती है। २१. स्वर्गिणी : ऐसी स्त्री उत्तम विचार रखने वाली, धर्म को मानने वाली, तथा सभी के साथ मधुर व्यवहार करने वाली होती है। ईश्वर में इसका चित्त बहुत अधिक रहता है। यह छोटे बड़े का सम्मान करना जानती है। इसकी वाणी मीठी होती है। समाज में इसका सम्मान होता है। पति को ईश्वर से भी ज्यादा सम्मान देती है। ऊपर मैंने स्त्रियों के कुछ भेद स्पष्ट किये हैं। इसके अलावा माननी, घारकी, दुष्टा, पातकी आदि भी स्त्रियों के भेद होते हैं। कुल भेद ६४ माने गये हैं जिनमें ऊपर लिखे हुए इक्कीस भेद मुख्य होते हैं।

हस्त रेखा व्यावहारिक ज्ञान

( ३३२ ) हस्त रेखा ग्रन्थों में हस्तरेखा से संबंधित तथ्य होते हैं। परन्तु किसी में भी व्यावाहारिक ज्ञान का उल्लेख नहीं मिलता । जिसकी वजह से हस्त रेखा के विद्यार्थी इससे संबंधित थ्योरी तो सीख जाते हैं। परन्तु उन्हें प्रेक्टिकल ज्ञान नहीं होता । इस पुस्तक में पहली बार प्रेक्टिकल ज्ञान देने का प्रयास किया जा रहा है । इसके लिए एक अनजान महिला का हाथ डा० श्रीमाली के समाने रख दिया गया और उस महिला के हाथ को देखकर उन्होंने जो विश्लेषण किया वह नीचे की पंक्तियों में स्पष्ट है । डा० श्रीमाली को जिस महिला का हाथ दिया गया था वह इसी पृष्ठ पर प्रकाशित है । उनके पास जो हाथ का चित्र भेज गया था उस पर न तो महिला का नाम लिखा गया था और न इससे संबंधित कुछ भी तथ्य स्पष्ट किया गया था ।

( ३३३ ) डा० श्रीमाली ने उस हाथ को देखकर ज्यों का त्यों उसके बारे में पूर्ण विवरण स्पष्ट कर दिया । दूसरी बार उनके द्वारा पूर्ण सही भविष्यकथन को देखकर मैं अपनी एक परिचित महिला को लेकर उनके निवास स्थान पर पहुंचा और उनसे निवेदन किया कि मैं प्रकाशक महोदय की तरफ से आ रहा हूं और आप द्वारा प्रकाशित पुस्तक के अन्तिम पृष्ठों में व्यावहारिक हस्तरेखा ज्ञान से संबंधित एक परिशिष्ट देने का विचार है। कृपया आप इस महिला का हाथ देखें और इस से संबंधित जानकारी देने का कष्ट करें । डा० श्रीमाली ने उस महिला के हाथ को देखकर जो भविष्यफल स्पष्ट किया उसका विवरण निम्न प्रकार से है। पाठक भी इस जानकारी को हस्त रेखा के माध्यम से समझें। इसके लिए उस महिला का हाथ का चित्र यहां पर दिया जा रहा है। इससे पहले यह ध्यान रहे कि जब मैं और संबंधित महिला डा० श्रीमाली से मिले तब न तो उस महिला के नाम व अन्य बातों के बारे में जानकारी दी और न उन्होंने इस संबंध में कुछ भी पूछा । हाथ को स्पर्श करते ही डा० श्रीमाली ने बताया कि हाथ में गुरु, शनि, सूर्य तथा बुध पर्वत पूर्णतः विकसित हैं और यह कोमल, मुलायम तथा आदर्श श्रेणी का हाथ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि महिला सुसंस्कृत घराने की है और इसके पिता के घर में और पति के घर में अनुकूल तथा सभ्यतापूर्ण वातावरण रहता है। साथ ही इस महिला के संस्कार अपने आप में सांस्कृतिक धार्मिक तथा अनुकूल रहे हैं। वस्तुतः यह एक सुन्दर और भाग्यशाली हाथ दिखाई देता है। परन्तु सूर्य रेखा सीधी होते हुए भी बीच मे से कट गई है; अतः शिक्षा सामान्य रही होगी । यद्यपि बचपन में शिक्षा के लिए प्रयत्न किया होगा परन्तु इस महिला की मामूली शिक्षा ही दिखाई देती है। ज्यादा से ज्यादा यह महिला आठवीं कक्षा से अधिक नहीं पढ़ी होगी। यद्यपि चेहरे से यह महिला पूर्ण शिक्षित तथा विदुषी दिखाई देती है और ऐसा प्रतीत होता है कि महिला कम से कम ग्रेजुएट होनी चाहिए । परन्तु हाथ की रेखाएं असत्य नहीं बोलतीं और ये रेखाएं इस बात की साक्षी हैं कि शिक्षा में निरन्तर व्यवधान आता रहा और इसी कारण यह महिला बहुत ही कम शिक्षा ले पाई होगी । जीवन रेखा को देखने पर आश्चर्यजनक तथ्य ज्ञात हो रहे हैं। जीवन रेखा का प्रारंभ ही कई रेखाओं से मिलकर हुआ है अतः बचपन के प्रारंभिक वर्ष रोग-ग्रस्त रहे होंगे और संक्षेप और सूक्ष्मता से देखने पर यह भली-भांति स्पष्ट हो जाता है ! कि जीवन के ५वें वर्ष में ही कोई बहुत बड़ी बीमारी आई होगी; क्यों कि यहां पर जीवन रेखा कटी हुई है और उसका संबंध मस्तिष्क रेखा से बन गया है। अतः यह

( ३३४ )

बात तो स्पष्ट है कि इस समय कोई बहुत बड़ी बीमारी आई होगी और लगभग मरते मरते ही बची होगी । क्यों यह बात ठीक है ? महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिलाते हुए बताया कि मैं पाँचवें वर्ष में बहुत अधिक बीमार हो गई थी घर वालों ने ऐसा समझ लिया था कि अब यह बालिक शायद ही बचे पर म लगभग महीने भर बीमार रहकर पुनः स्वस्थ हो गई । पंडितजी ने जीवन रेखा का अध्ययन करते हुए आगे बताया कि यह जीवन रेखा आगे भी दो तीन स्थानों पर कटी है । अतः यह बात भी सही है कि दसवें वर्ष में भी कोई विशेष घटना घटित होनी चाहिए और इस बार यह घटना जलघात जैसी दिखाई देती है । महिला ने उत्तर दिया—वस्तुतः दसवें वर्ष ही मैं अपनी मां के साथ तालाब पर गई थी और वहां पर फिसल जाने के कारण मैं बहुत गहरे पानी में चली गई थी । यदि उस समय किनारे पर खड़े कुछ लोगों ने मुझे नहीं बचा लिया होता तो अब तक मैं समाप्त हो गई होती । 'बहुत खूब'—पंडितजी उत्तर दिया परन्तु अब आपको आगे के जीवन में किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं है । आगे जीवन रेखा पूर्णतः सीधी स्पष्ट और साफ है और वह मणिबन्ध तक पहुंच गई है। अतः अब आगे घात या दुर्घटना जैसी कोई बात नहीं है । और पूरी आयु लगभग ६५ और ६६ वर्ष के बीच में है । एक सेकण्ड ठहरिये, सूक्ष्मता से देखने पर ज्ञात होता है कि आपकी पूर्ण आयु ६५ साल ४ महीने २१ दिन स्पष्ट होती है । महिला ने मुस्कराकर पंडित जी की ओर कृतज्ञता से देखा । परन्तु इस जीवन रेखा पर शुक्र पर्वत से बहुत अधिक रेखाएं आ रही हैं और उनमें से लगभग दो रेखाओं ने तो जीवन रेखा को ही काट दिया है । इसके साथ ही छोटी-छोटी कई रेखाएं निकल कर आई हैं और ये सभी बाधक रेखाएं इस तथ्य की परिचायक हैं कि आपके जीवन में जरूरत से ज्यादा बाधाएं, परेशानियां और सम- स्याएं रही हैं । एक प्रकार से देखा जाय तो आपका बचपन अभावों में संघर्षों में तथा कठिनाइयों में ही बीता होगा । यद्यपि आपकी मातृ रेखा और पितृ रेखा पूर्ण है इससे वे दीर्घायु होने चाहिए परन्तु इसः कोई दो राय नहीं कि इन माता पिता से आगे के जीवन में कोई विशेष सुख या सहयोग नहीं मिला होगा । यद्यपि मैं यह कहता हूं कि आपके लालन-पालन में माता पिता ने पूरा सह- योग दिया परन्तु विवाह के बाद माता पिता की तरफ से किसी प्रकार का कोई विशेष सहयोग मिला हो ऐसा प्रतीत नहीं होता । क्यों यह सच है न ? महिला ने स्वीकृति में सिर हिलाया और मुंह से कुछ भी नहीं कहा ।

( ३३५ ) ठहरिये, अब मैं यह बता दूं कि आप माता-पिता के अभिभावकत्व में कब तक रहीं, अर्थात् आपका विवाह कब हो गया ? पंडितजी ने गणना करते हुए बताया कि आपका विवाह १४ वर्ष की छोटी- आयु में ही हो जाना चाहिए और गहराई से देखने पर यह ज्ञात होता है कि आपकी विवाह रेखा सीधी है अतः जीवन का कम हिस्सा ही आपने अपने पिता के घर में व्यतीत किया होगा । अतः ज्यों ही आपके १४ वर्ष पूरे हुए होंगे कि आपका विवाह हो गया होगा । ज्यादा से ज्यादा १४ वर्ष तथा एक या दो महीने बीते होंगे कि आप का विवाह हो गया होगा । मुझे आश्चर्य होता है कि आपका विवाह इतनी छोटी उम्र में ही कैसे हो गया ? क्या आपके समाज में छोटी उम्र में ही विवाह हो जाते हैं । महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई और बताया कि वास्तव में मेरा विवाह १४ वर्ष और एक महीने के बाद ही हो गया था । पंडितजी ने रेखाओं का अध्ययन जारी रखते हुए बताया कि आपका पति प्रारम्भ में अत्यन्त सामान्य श्रेणी का होना चाहिए अर्थात् आपको जो ससुराल मिला होगा वह आपके पीहर के स्तर के अनुरूप ही होगा । आर्थिक दृष्टि से भी और सामाजिक दृष्टि से भी और एक प्रकार से देखा जाय तो जिस समय आपकी शादी हुई उस समय आपके पति की सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यन्त नगण्य होनी चाहिए । आपके हाथ में शुक्र वलय भी दिखाई दे रहा है । यद्यपि यह वलय पूरा तो नहीं बना है परन्तु यह वलय इस बात की साक्षी तो दे ही रहा है कि आपके जीवन में ससुराल में आने के बाद से बराबर परेशानियां, मानसिक कठिनाइयां तथा चिंताएं रहीं होंगी । शारीरिक रूप से आप इतनी परेशान भले ही न रही हों, परन्तु मानसिक दृष्टि से तो आप जरूरत से ज्यादा चिन्ताओं तथा परेशानियों में रही होंगी और एक क्षण के लिए भी आपको आराम नहीं रहा होगा । महिला ने स्वीकृति में सिर हिलाया और पूछा—यह स्थिति कब तक है ? श्रीमाली जी हंसे, और बोले कब तक है ? का कोई तात्पर्य नहीं क्योंकि यह स्थिति भी और अब तक आपकी आयु लगभग ४२ को पार कर रही है अतः ज्यादा से ज्यादा इस प्रकार की मानसिक परेशानियां विवाह के १५ वर्षों तक रही होंगी । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि १४वें वर्ष से ३१ वें वर्ष की आयु तक आपका जीवन जरूरत से ज्यादा मानसिक संघर्षों में व्यतीत हुआ होगा । एक क्षण के लिए भी आप को अपने जीवन में आराम नहीं मिला होगा और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस अवधि में आपको पति की तरफ से भी किसी प्रकार का कोई सहयोग मिला हो ऐसा दिखाई नहीं देता ।

( ३३६ ) परन्तु ३२ वें वर्ष से आपकी यह स्थिति सुधरनी चाहिए। इस समय तक पति समाज में अपना स्थान बना चुके होंगे और वे इस योग्य हो गये होंगे कि आपको मानसिक शांति दे सकें, आपको आराम दे सकें, आपको स्नेह और सहयोग दे सकें । मस्तिष्क रेखा नीचे की तरफ झुकी हुई है और बीच में आकर बिल्कुल कट गई है । इसके साथ ही मुझे एक बिन्दु भी दृष्टिगोचर हो रहा है । यह बिन्दु उसी स्थान पर है जहां पर यह मानसिक रेखा कटी है। यह समय आपके जीवन का लग- भग ३८ वां वर्ष आता है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जीवन के ३८ वे वर्ष में एक बार फिर आपको बहुत अधिक मानसिक सदमा पहुंचा होगा । एक प्रकार से देखा जाय तो आपके चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा छा गया होगा और आप मानसिक रूप से बिल्कुल टूट गई होंगी । ऐसा ज्ञात होता है कि जीवन के ३२वें साल से लगाकर ३८वे साल तक आपका जीवन मानसिक दृष्टि से सामान्यतः अनुकूल रहा होगा परन्तु यह घटना आपके पूरे जीवन को झकझोर गई होगी । जहां पर यह रेखा कटी है वहीं पर सूर्य रेखा से एक सहायक रेखा निकल कर मिली है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह मानसिक झंझावात पुत्र की तरफ से रहा होगा और इसमें कोई दो राय नहीं कि इस उम्र में आकर आपको अपने सबसे बड़े पुत्र का वियोग सहना पड़ा होगा और यह घटना इस प्रकार से घटित हुई होगी कि आपका पूरा जीवन अस्त-व्यस्त सा हो गया होगा। निश्चय ही यह घटना आपके सबसे बड़े पुत्र की मृत्यु का संकेत करती है । सामने बैठी युवती की आंखें डबडबा आईं, उसने अपना हाथ खींच लिया । दो क्षण तक वह मौन रही और उसने पुनः अपना हाथ सामने फैला दिया । पंडित जो ने हाथ की रेखाओं का अध्ययन चालू रखते हुए कहा - अब आगे के जीवन में ऐसी कोई दुर्घटना आपके जीवन में नहीं है जिससे मानसिक दृष्टि स आप परेशान हों। यद्यपि यह बात सही है कि आपका चन्द्र पर्वत अपने आप मे कमजोर और दबा हुआ है जिसकी वजह से निरन्तर मानसिक परेशानिया रहती है और आपके जीवन में कोई न कोई ऐसी घटना बराबर घटित होती रहती है जिसमे आपका मानसिक द्वन्द्व बना रहे । मेरी राय में आपके लिए यह ज्यादा अनुकूल एवं उचित रहेगा कि आप चांदी की अंगूठी में मोती धारण करें और आगे के जीवन में बराबर पहने रहें । यह मोती आपकी मानसिक समस्याओं तथा परेशानियों को कम करने में बहुत अधिक सहायक रहेगा । महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई और पूछा कि किस प्रकार का मोती पहनना मेरे लिए ज्यादा उचित रहेगा । पंडित जी ने उत्तर दिया- आपको श्रेष्ठ स्तर का बसरे की खाड़ी का मोती पुष्य नक्षत्र में धारण करना चाहिए । यह मोती चांदी की अंगूठी में हो और यदि आप दाहिने हाथ की कनिष्ठिका उंगली में पहनें तो ज्यादा उचित एवं अनुकूल रहेगा।

( ३३७. ) पंडित जी ने बिना सिर उठाए ही आगे कहा, मुझे ऐसा दिखाई दे रहा है आपकी स्वास्थ्य रेखा प्रारम्भ में जंजीरवार हो गई है और आगे इस रेखा से छोटी- छोटी रेखाएं निकलती रही हैं परन्तु ये रेखाएं हथेली में नीचे की ओर बढ़ी हैं जो कि शुभ नहीं कही जा सकतीं। ये रेखाएं इस तथ्य की परिचायक हैं कि आपका स्वास्थ्य भी सामान्यतः कमजोर रहा होगा और निरन्तर कोई न कोई छोटी-मोटी बीमारी आपको बनी ही रही होगी। हकीकत में देखा जाय तो जीवन में बीसवें वर्ष से इकतालीसवें वर्ष तक आपका स्वास्थ्य बराबर कमजोर रहा होगा और घर में हर समय डाक्टर का आना जाना बना रहा होगा। क्योंकि इस स्वास्थ्य रेखा में जो नीचे की तरफ रेखाएं गई हैं उसमें अन्तिम रेखा ४१ वर्ष को ही स्पष्ट करती है। अतः तब तक आपका स्वास्थ्य कमजोर रहा होगा। इन रेखाओं का सम्बन्ध चन्द्र पर्वत तथा शुक्र पर्वत से रहा है। चन्द्र पर्वत से सम्बन्ध होने के कारण ऐसा ज्ञात होता है कि आपकी परेशानियां पेट से संबंधित रही होंगी। इसमें दुर्बलता एनीमिया गैस्टिक ट्रबल, अपच, आदि रोग सम्भव हैं तथा शुक्र पर्वत से जो सम्बन्ध बना है उससे ऐसा ज्ञात होता है कि इसके साथ ही साथ प्रदर लुकोरिया तथा स्त्रियों से सम्बंधित बीमारी भी थोड़े बहुत रूप में आपके जीवन में बराबर बनी रही होगी। क्यों यह बात सही है न ? महिला ने सिर झुकाते ही स्वीकृति में अपनी पलकें नीचे गिराईं। परन्तु अब आगे के जीवन में आपके स्वास्थ्य से सम्बन्धित कोई विशेष परे- शानी नहीं है। यद्यपि पेट से सम्बन्धित थोड़ी बहुत कठिनाइयां रह सकती हैं परन्तु वह परेशानी भी मोती पहनने से कुछ अनुकूल हो जायगी। आगे के समय में स्वास्थ्य की दृष्टि से आपके जीवन में अनुकूलता ही दिखाई देती है। यद्यपि जीवन के ५८वें वर्ष में फिर एक शाखा नीचे की ओर झुक रही है और उस शाखा ने मस्तिष्क रेखा से सम्बन्ध भी बनाया है, अतः उस अवधि में आप फिर बीमार पड़ेंगी और लगभग ३ या ४ महीने तक इस सम्बन्ध में कष्ट उठाना पड़ेगा। इसके अलावा आपके आगे के पूरे जीवन में किसी प्रकार की स्वास्थ्य से सम्बन्धित कोई बाधा या परेशानी नहीं है। आपकी प्रणय रेखा को भी साथ ही साथ अध्ययन कर लें। जैसा कि मैंने अभी आपको बताया कि आपके जीवन में लगभग ३१वें वर्ष में ही पति की तरफ से अनु- कूलता प्राप्त हुई होगी और यह बात भी सही है कि इस समय में आकर ही सामा- जिक दृष्टि से तथा आर्थिक दृष्टि से आपके पति की उन्नति हुई होगी। इसके बाद अर्थात् ३२वें वर्ष से आज तक आप आर्थिक तथा पति सुख की दृष्टि से पूर्ण अनुकूल स्थिति में ही रही हैं। और जब हम इस रेखा को आगे के जीवन में देखते हैं तो यह ज्ञात होता है कि आगे के समय में आपके पति आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से बरा-

( ३३८ )

पर उन्नति करते रहेंगे तथा आपको ज्यादा से ज्यादा पति-सुख मिलता रहेगा । आपके जीवन में इस दृष्टि से किसी प्रकार की कोई चिन्ता नहीं है । और यदि मैं सही शब्दों में कहूँ तो आगे के जीवन में यह रेखा जितनी स्पष्ट सरल और निर्दोष है उतनी अन्य कोई रेखा नहीं । अतः इसमें कोई दो राय नहीं कि आगे के पूरे जीवन में आपको पति की तरफ से पूर्ण सुख सम्मान और श्रेष्ठता मिलेगी । इस दृष्टि से आप एक सौभाग्यशाली महिला कही जा सकती हैं । अब मैं इसके साथ ही साथ सन्तान रेखा पर भी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दूं । आपके हाथ में सही रूप में छः रेखाएं दिखाई दे रही हैं । इसमें चार रेखाएं मोटी हैं तथा दो रेखाएं पतली हैं । इससे यह भली भांति स्पष्ट हो जाता है कि आपके छः सन्तान होंगी, जिनमें चार पुत्र होंगे तथा दो पुत्रियां होंगी । परन्तु आप स्वयं देख सकती हैं कि आपकी प्रथम सन्तान रेखा बीच में से टूटी हुई है । अतः आपको अपनी प्रथम सन्तान का सुख प्राप्त नहीं होगा । और जैसा कि मैंने अभी कुछ समय पहले ही आपको स्पष्ट किया है कि आपकी प्रथम सन्तान का दुख आपको जीवन के ३८वें वर्ष में झेलना पड़ा होगा, और यह तथ्य इसी सन्तान से स्पष्ट होता है । इसके बाद गणना करने के बाद यह ज्ञात होता है कि आपके आगे के जीवन में ३ पुत्र तथा २ पुत्रियों का सुख बराबर मिलता रहेगा । परन्तु इसके साथ ही साथ मैं यह बता दूं कि सांसारिक दृष्टि से आपकी सन्तान से आपके सुख में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं है । परन्तु यदि आप यह विचार रखें कि ये पूर्णतः आपकी आज्ञा में रहेंगे या पूर्णतः आज्ञाकारी होंगे तो यह भ्रम आपको अपने दिमाग से निकाल देना चाहिए । हां यह बात सही है कि आपका स्वभाव जरूरत से ज्यादा सहनशीलता का है और इसी वजह से इन सबसे निभ जायगी । यद्यपि कई बार इनसे मतभेद रहेंगे और इसकी वजह से भी आपको मान- सिक परेशानियां रहेंगी । आपके जीवन के ४४वें वर्ष में एक पुत्र तथा एक पुत्री का विवाह होगा । इसके बाद ४८वें वर्ष में एक और पुत्र के विवाह का योग है । इसके बाद ५४वें वर्ष में एक पुत्री का विवाह और ५७वें वर्ष में पुत्र का विवाह आपके हाथों से होगा । इसमें से भी दूसरे तथा तीसरे नम्बर के पुत्र से विशेष सुख मिलेगा । और इसी प्रकार सबसे छोटी पुत्री से आप मानसिक दृष्टि से ज्यादा सन्तुष्ट रह सकेंगी । यों आपके आगे के जीवन में सन्तान सुख है । सन्तान योग्य होगी और अपने कार्यों से वे अपने क्षेत्र में अनुकूलता भी प्राप्त करेंगी । अतः इस दृष्टि से आपके जीवन में किसी प्रकार की कोई न्यूनता नहीं है । गणना करने पर यह भी ज्ञात होता है कि ४७वें वर्ष के प्रारम्भ में आपको पौत्र-सुख तथा दोहित्र सुख मिलेगा । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आप ४७वें वर्ष

( ३३६ )

में दादी व नानी एक साथ एक ही वर्ष में बन सकेंगी। युवती का चेहरा दो क्षण के लिये प्रसन्नता से खिल उठा और फिर दूसरे ही क्षण लज्जा के मारे आंखें नीचे उतर गई । आपके हाथ में गुरु पर्वत अपने आप में श्रेष्ठ है, यद्यपि गुरु पर्वत का झुकाव शनि की ओर झुक रहा है परन्तु फिर भी गुरु पर्वत अपने आप में निर्दोष और स्पष्ट है। इससे ऐसा ज्ञात होता है कि आप अपने जीवन में सच्चरित्र और धार्मिक महिला रही हैं। भौतिक तथ्यों की अपेक्षा धार्मिक तथ्यों की ओर आपका झुकाव ज्यादा रहता है। आपके मन में यह इच्छा भी बराबर बनी रहती है कि आप अपने जीवन में ज्यादा से ज्यादा धार्मिक कार्य करें। गौ, ब्राह्मण तथा साधु सन्तों की सेवा करें तथा जीवन में तीर्थ यात्राएं करें। पर ऐसा योग आपके जीवन में ३६वें वर्ष के बाद से ही संभव है। और यह बात भी सही है कि आपके आगे के जीवन में बराबर धार्मिक भावना आपके मन में बनी रहेगी। यथा संभव आपके हाथों से दान तथा सत्कार्य भी होंगे। तीर्थ यात्राएं भी जीवन के ३६वें वर्ष के बाद से बराबर हैं और आगे के जीवन में बनी रहेंगी। इस दृष्टि से आपके जीवन में कोई कमी नहीं। यद्यपि शनि की ओर झुकाव होने के कारण इस क्षेत्र में ही बीच बीच में सांसारिक बाधाएं आती हैं। परन्तु फिर भी थोड़े बहुत रूप में ये कार्य आपके जीवन में बराबर बने रहेंगे। शनि पर्वत अपने स्थान पर सुदृढ़ है और मध्यमा उंगली भी पूरी लम्बाई लिये हुए है। अतः आप सौभाग्यशाली महिला होनी चाहिए। जब तक आप अपने पिता के घर में रहीं तब तक आपके पिता की बराबर उन्नति होती रही। और जब से आपने पति के घर में कदम रखा उसी दिन से निश्चय ही आपके पति की भी निरन्तर उन्नति बनी रही होगी। मुझे यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि आगे के जीवन में यदि आपके पति आर्थिक सामाजिक अथवा अन्य क्षेत्रों में उन्नति करेंगे या श्रेष्ठता प्राप्त करेंगे तो उसके पीछे निश्चय ही आपके इस शनि पर्वत का सहयोग होगा। अतः जब तक पति आपसे सम्पर्क बनाये रहेंगे या परस्पर मधुर व्यवहार बना रहेगा तब तक उनकी उन्नति बराबर होती रहेगी। साथ ही आपको भी इस माध्यम से सम्मान प्राप्त होता रहेगा। आपके हाथ में सूर्य पर्वत भी बलवान है, परन्तु एक तो उसका झुकाव शनि पर्वत की ओर हो गया है दूसरे सूर्य रेखा कई रेखा से मिलकर बनी है। यद्यपि ये सहायक रेखाएं तो सूर्य रेखा को बल ही देती हैं परन्तु कुछ रेखाएं इस सूर्य रेखा को काटती भी हैं। इससे यह भली-भांति स्पष्ट होता है कि आप अपने जीवन में चाहे कितना ही कार्य करें परन्तु यश कम ही मिलेगा। मैं सही शब्दों में कहूं तो न तो आपको अपने पिता के घर में ही यश मिला होगा और न आपको अपने ससुराल में

( ३४० )

ही किसी प्रकार का यश मिला होगा । यद्यपि यह बात सही है कि आप अपने जीवन में बराबर ससुराल पक्ष से सम्बन्धित लोगों की सेवा करेंगी, समय-समय पर उनको सहायता भी देंगी, उनके साथ अनुकूल एवं मधुर व्यवहार रखेंगी । परन्तु समय पड़ने पर न तो उनकी ओर से आपको कोई सहयोग मिलेगा और न उनकी तरफ से यश ही मिलेगा। यद्यपि आपके हाथ के देखने से ऐसा ज्ञात होता है कि आपको विवाह के बाद ससुर का सुख तो मात्र १४ वर्ष तक ही मिला होगा परन्तु सासू दीर्घायु होगी । परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि सास और ससुर की तरफ से आपको बाधाएं परे- शानियां, अड़चनें तथा कठिनाइयां व मानसिक यंत्रणाएं मिली होंगी । आपने जितना ही ज्यादा उनको सुख और सहयोग देने का प्रयत्न किया होगा, उतना ही ज्यादा उनकी तरफ से कष्ट और मानसिक परेशानियां मिली होंगी । यही तथ्य आपके जीवन में देवर, ननद सास, भाई, माता और पिता के साथ भी लागू होता है । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि आप यथा संभव इन सबकी सहायता करेंगी, परन्तु इनकी तरफ से आपको न तो किसी प्रकार का कोई यश और सम्मान मिला है और न आगे के जीवन मे मिलने की उम्मीद ही है । इतना होने पर भी आप उनकी बराबर मदद करती रहेंगी और जीवन के अन्तिम क्षण तक आप उन्हें सुख और सहयोग देती रहेंगी । आपने अपने हाथ में एक बात नोट की होगी कि आपके हाथ में गुरु पर्वत से एक रेखा आकर सूर्य रेखा से मिलती है । अतः आपको जो भी सम्मान और सहयोग मिलेगा, वह आपके पति की तरफ से मिलेगा । जीवन भर आपको पति का स्नेह और सहयोग मिलता रहेगा, और इसी तथ्य की वजह से आपकी मानसिक परेशानियां कुछ कम रहेंगी । जहां तक बुध पर्वत का प्रश्न है वह सामान्यतः ठीक है । परन्तु एक तो वह हथेली के बाहर की ओर कुछ बढ़ गया है; दूसरे बुध रेखा कनिष्ठिका उंगली की तरफ ऊपर बढ़ गई है । इसमे यह स्पष्ट है कि आप सूक्ष्मदर्शी तथा समझदार महिला होंगी । यह बात भी सही है कि आप अनजान से अनजान आदमी या महिला को देखते ही मन में समझ जाती हैं कि यह प्राणी किस प्रकार के चरित्र का है, किस स्तर का है तथा आगे चलकर यह प्राणी लाभदायक रहेगा या धोखा देगा ? ये सारी बातें आपके दिमाग में एक ही क्षण में स्पष्ट हो जाती हैं और आपने यह अनुभव किया होगा कि आने वाले समय में आप उसके बारे में जो अनुमान लगाती हैं वह बिल्कुल सत्य सिद्ध होता होगा । इसके साथ ही साथ यह बुध पर्वत इस बात को भी सूचित करता है कि प्रभु की तरफ से आपमें यह विशेष गुण प्राप्त होगा कि कई बार आप आने वाली घट- नाओं को पहले से ही जान जाती हैं और उसके साथ ही साथ आपने यह भी अनु-

( ३४१ ) भव किया होगा कि वे घटनाएं आगे चलकर बिल्कुल सही उतरी हैं । यह आपके सरल और निश्छल हृदय का परिचायक है । साथ ही साथ यह तथ्य इस बात का भी सूचक, है कि आप पर प्रभु की विशेष कृपा है । आपके इस बुध पर्वत पर चन्द्र से एक रेखा आकर मिलती है। अतः आपके जीवन में विदेश यात्रा योग भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है । यद्यपि भाग्य रेखा का सम्बन्ध भी यहीं स्पष्ट होता है अतः आपके जीवन के ४१वें वर्ष में, ४३वें वर्ष में तथा ४६वें वर्ष में विदेश यात्रा योग स्पष्ट है । इन विदेश यात्राओं में अन्तिम दो यात्राएं अत्यधिक महत्वपूर्ण एवं अनुकूल रहेंगी । इनमें से अधिकतर विदेश यात्राएं पति के साथ होंगी परन्तु ऐसा भी ज्ञात हो रहा है कि जीवन के ५६वें वर्ष में पुत्र के साथ भी विदेश यात्रा योग दिखाई दे रहा है । इन विदेश यात्राओं से आप अधिकतर यूरोप तथा अमेरिका का हिस्सा देख सकेंगी। यद्यपि ये सभी यात्राएं एक महीने से चार महीने की अवधि तक की होंगी । परन्तु ये विदेश यात्राएं एक तरफ जहां आपके अनुभव को बढ़ाने में सहायक होंगी वहीं दूसरी तरफ ये यात्राएं आपके स्वास्थ्य की दृष्टि से भी तथा मानसिक परेशानियों को भी कम करने के लिये अनुकूल रहेंगी । इसके अलावा आपके जीवन में लगभग पूरे भारत की यात्रा तथा कई बार तीर्थ यात्रा का योग है । आपके हाथ में चन्द्र पर्वत कुछ दबा हुआ है तथा हथेली में अन्दर की ओर खिसका हुआ है । अतः इस पर्वत से आपको मानसिक परेशानियां तथा कठिनाइयां रहेंगी । जैसा कि मैं पीछे स्पष्ट कर चुका हूं कि इस चन्द्र पर्वत की वजह से गैस्टिक ट्रबल, अपच, अजीर्ण आदि की शिकायत थोड़े बहुत रूप में बनी रहेगी । और आपके जीवन में जो मानसिक परेशानियां बराबर बनी रही हैं उनका मूल कारण भी यह चन्द्र पर्वत ही है । इसके लिये मैं उपाय पीछे स्पष्ट कर चुका हूं । हाथ में राहू पर्वत दबा हुआ है जो कि अपने आप में अनुकूल ही है । इससे आपके मन में न तो कभी अधार्मिक और अनैतिक भावना आई है और न आगे के जीवन में ऐसा संभव ही है । एक दृष्टि से इस पर्वत का दबा हुआ रहना आपकी धार्मिक भावनाओं को ऊंचा उठाने में सहायक रहा है । मणिबन्ध आपके अनुकूल है । पहला मणिबन्ध अंजीरवत् है जो कि शुभ परि- णामों को देने वाला है साथ ही आपके हाथ के तीन मणिबन्ध आपको दीर्घायु बनाने में भी सहायक हैं । जहां तक शुक्र पर्वत का प्रश्न है वह अनुकूल है। और जीवन रेखा ने धनुष- वत् अपने आपको बनाकर शुक्र पर्वत का विस्तार ही किया है। इस पर जो बाधक

( १४२ ) रेखाएं हैं वे आपके जीवन में बाधाओं की सूचक हैं और जिसके बारे में मैं कुछ समय पहले स्पष्ट कर चुका हूँ। यद्यपि शुक्र पर्वत हथेली की ओर बढ़ा हुआ भी है और इससे यह स्पष्ट होता है कि आपके जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक साधनाओं का परस्पर समन्वय रहा है। एक प्रकार से देखा जाय तो आपके जीवन में भोगमयी वृत्तियों पर धार्मिक वृत्तियों का प्रभाव विशेष रूप से रहा है और यह आपके जीवन में अनुकूल ही रहा है। अंगूठा पूर्ण लम्बा तथा पीछे की ओर खींचा हुआ है इससे आपकी दृढ़ मनो- वृत्ति स्पष्ट होती है। यह अंगूठा इस बात का भी परिचायक है कि आप अपने जीवन में अपने विचारों पर दृढ़ रहती हैं। एक बार आप जो निश्चय कर लेती हैं उसे पूरा करके ही छोड़ती हैं। चाहे उसके लिये कितनी ही परेशानियां उठानी पड़ें। अंगूठे का पहला पोर कुछ लम्बाई लिए हुए है और अपने आप में सुदृढ़ है। यह सुदृढ़ता आपमें तर्क शक्ति की भावना का विकास करने में सहायक है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि आप कोई भी कार्य आंख मूंद कर नहीं कर लेतीं। अपितु आप उस कार्य में या तो संशोधन करती हैं अथवा उस कार्य में कुछ नवीनता देने का प्रयत्न करती हैं। इस अंगूठे के पर्व को देखने से यह भी ज्ञात होता है कि दूसरों की आलोचना आपको थोड़े बहुत रूप में प्रिय है। यदि आपके अलावा किसी अन्य ने कार्य किया होगा तो आप उस कार्य में या तो त्रुटि निकालने का प्रयत्न करेंगी अथवा यह सुझाव देने से बिल्कुल नहीं हिचकेंगी कि यदि यह कार्य इस प्रकार से न होकर इस तरीके से होता तो ज्यादा उपयुक्त एवं अनुकूल होता। अंगूठे के जड़ में जहां शुक्र पर्वत का विकास प्रारंभ हुआ है वह उभरा हुआ है। और यह उभरा हुआ विकास आपको भौतिकता की ओर भी प्रवृत्त करता है। आपकी यह भावनाएं बराबर मन में बनी रही हैं कि आप शान-शौकत से रहें, तरीके से रहें, प्रदर्शन प्रियता का थोड़ा बहुत मोह आपके मन में बराबर बना रहा है। शुक्र पर्वत पर एक आड़ी रेखा इन बाधा रेखाओं को काटती हुए मंगल पर्वत तक गई है। और जहां से यह रेखा प्रारम्भ हुई है उससे यदि आयु रेखा का मिलान करें तो ज्ञात होता है कि वह अवस्था आपके जीवन की ४३वें वर्ष में आती है। मंगल भूमि का स्वामी है तथा शुक्र भौतिक सुख का अधिकारी है। अतः ऐसा ज्ञात होता है कि जीवन के ४३वें वर्ष की समाप्ति तथा ४४वें वर्ष के प्रारंभ तक आपको अपना स्वयं का मकान सुख प्राप्त होगा। यह अलग बात है, कि आप स्वयं किसी प्रकार की नौकरी नहीं करती होंगी या आपके स्वयं के कोई आय के स्रोत नहीं होंगें परन्तु आपके पति के द्वारा उपार्जित धन से उनके सहयोग से यह मकान योग का समय सिद्ध होता है। मंगल रेखा के पास ही एक छोटा-सा चतुर्भुज जीवन के ३७वें वर्ष में बना

( ३४३ ) है । अतः उस अवधि में भी मकान बनाने का योग बना होगा या जमीन खरीदने का योग बना होगा । परन्तु ऐसा ज्ञात होता है कि इस आयु में मकान तो नहीं बना होगा परन्तु जमीन आपने अवश्य खरीदी होगी । मेरी राय में यह जमीन भी आपने ही खरीदी होगी या आपके नाम से खरीदी गई होगी । आपके हाथ में मंगल रेखा बलवान है और वह जीवन रेखा के समानान्तर चल रही है । मंगल पर्वत विकसित होने के कारण आपमें क्रोध की भावना भी कुछ विशेष होनी चाहिए । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपमें अपने व्यक्तित्व के प्रति जागरूकता जरूरत से ज्यादा है । और जबकि आपके आत्म विश्वास को या आपके अहं को चोट लगती है तो आप तिलमिला जाती हैं । उस समय आप सामने वाले का कच्चा चिट्ठा खोलने लग जाती हैं और यह आपकी प्रवृत्ति होनी चाहिए कि जैसे भी हो अपना पक्ष मजबूत और दृढ़ होना चाहिए और इस पक्ष को पुष्ट करने के लिए आप उन सभी तरीकों का तथा सभी तकों का प्रयोग करती हैं जो आपके अनुकूल हो सकते हैं । इसके साथ ही जैसा कि मैंने अभी बताया कि मंगल रेखा धीरे- धीरे जीवन रेखा के समानान्तर चल रही है जो कि आपमें आत्म विश्वास की भावना पैदा करती है । आपमे जरूरत से ज्यादा आत्म विश्वास होना चाहिए । किसी भी प्रकार की बाधा आने पर आप हताश या निराश नहीं होतीं अपितु अपने परिचितों को भी मुसीबत में या दुख के दिनों में धैर्य बंधाती हैं और उस परेशानियों के समुद्र को पार कराने में सहायक होती हैं । यह आपका एक उज्जवल पक्ष है । मंगल पर्वत से ही एक रेखा शनि पर्वत की ओर गई है और ऐसा ज्ञात होता है कि भले ही वह भाग्य रेखा से पूर्णतः मिल नहीं पाई है, परन्तु फिर भी उस तरफ वह बहुत अधिक बढ़ी है । इससे यह ज्ञात होता है, कि आपके जीवन में जमीन संबंधी कार्यों से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है और न भविष्य में जमीन स बन्धी कार्यों से लाभ ही है । मेरी सलाह यह है कि आप अपने नाम से यथासंभव भूमि संबंधी कार्य न करें तो ज्यादा उचित एवं अनुकूल रहेगा । हाथ में सभी गौण रेखाएं सामान्यतः अनुकूल ही हैं । हथेली में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा को मिलाकर एक बड़े त्रिभुज का आकार बनता है । और इस त्रिभुज को आकार देने में चन्द्र रेखा का भी सहयोग रहता है । यह त्रिभुज अपने आप में अनुकूल हैं । इस त्रिभुज से यह भली-भांति ज्ञात हो जाता है कि आपके जीवन का उत्तरार्द्ध ज्यादा अनुकूल एवं सुखमय कहा जा सकता है । मोटे रूप में यदि आपके पूर्ण आयु ६८ वर्ष मानते हैं तो जीवन के ३४ वें वर्ष के बाद से अनुकूलता प्रारंभ हुई होगी और आगे की अवधि में यह अनुकूलता या सुख आपके जीवन में बरा- बर बना रहेगा । मेरी राय में आपको अपने जीवन की अनुकूलता के लिए विष्णु या

( ३४४ ) श्री कृष्ण की आराधना थोड़े बहुत रूप में रखनी चाहिए । इसके अलावा श्री राम, लक्ष्मी तथा अन्य देवी देवताओं की पूजा भी आपके जीवन को अनुकूल बनाने में सहा- यक हो सकती है । महिला ने अपना सिर ऊंचा उठाया और कहा पंडितजी अब तक आपने जो भी तथ्य स्पष्ट किये हैं वे अपने आप में पूर्णतः सत्य हैं पर कुछ प्रश्न मैं इसके अतिरिक्त भी जानना चाहती हूँ । पंडितजी ने कहा—आप बिना संकोच के पूछिए, मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है । युवती मुस्कराई और कहा, आप हाथ के माध्यम से जन्म का महीना तथा जन्म समय संशोधन कर लेते हैं । मैं इस मामले में अभी तक सन्देह में हूं । मेरी मां ने जो समय मुझे बताया है वह भी उन्हें पूरी तरह से याद नहीं है । कभी वह कुछ और समय बताती हैं कभी कुछ अन्य समय को ही बता देती हैं । इस प्रकार एक समय और दूसरे समय में लगभग दो से तीन घण्टों का अन्तर है । पंडितजी ने कहा जन्म समय को संशोधन करना कोई बहुत अधिक कठिन कार्य नहीं है । आप एक मिनट रुकिये मैं अभी आपकी इस समस्या का भी समाधान कर देता हूं । पंडितजी ने आतशी शीशे का सहारा लेते हुए हाथ की रेखाओ का अध्ययन करने के बाद बोले आपका जन्म अप्रैल महीने में होना चाहिए क्योंकि आपकी मध्यमा उंगली के दूसरे पौर पर केवल एक ही रेखा पूरी है । इसके अलावा बाकी जितनी भी रेखाएं हैं वे सभी टूटी हुई तथा अस्पष्ट हैं । यदि हम तारीख का अध्ययन करें तो रेखाओं की गणना से ज्ञात होता है कि आपका जन्म ८ अप्रैल को ही होना चाहिए । दो क्षण रुककर पंडित जी ने कहा निश्चय ही आपका जन्म ८ अप्रैल १६३३ है । जहां तक हाथ की रेखाओं के अध्ययन का प्रश्न है आपकी जन्म तारीख में पूर्णतः सत्यता है । आपको अपनी तारीख तो याद है न ? हां पंडितजी मेरी जन्म तारीख आपने हाथ के माध्यम से पूर्णतः सत्य बताई है वास्तव में मेरी जन्म तारीख ८ अप्रैल १६३३ ही है । पंडितजी ने हाथ पर उसी प्रकार से दृष्टि जमाते हुए आगे उत्तर दिया कि जहां तक आपके अंगूठे के सबसे ऊपरी पौर का प्रश्न है उससे ऐसा ज्ञात होता है कि आपकी लग्न कर्क होना चाहिए और यह कर्क लग्न ही लगभग दो अंश से कुछ ही ज्यादा होना चाहिए । इस हिसाब से आपका जन्म समय शाम के ८ बजकर ३१ मिनट २४ सेकेण्ड के आसपास ही होना चाहिए और इस समय की गणना करने पर कर्क लग्न दो अंश से ही स्पष्ट होता है ।

( ३४५ ) आपकी बात लगभग सही दिखाई देती है। क्योंकि मेरी मां ने मेरा जन्म लगभग शाम को ७ से १० के बीच बताया है। मेरे पंडित जी ने जो मेरी जन्म कुण्डली बनाई थी उसमें कर्क लग्न है। परन्तु कर्क लग्न लगभग ८ अंशों में उन्होंने स्पष्ट किया है। परन्तु ऐसा ज्ञात होता है कि उनको पूर्णतः जन्म समय का ध्यान नहीं रहा होगा। आपने जो पिछली घटनाएं स्पष्ट की हैं वे पूर्णतः सत्य हैं और उसके आधार पर मेरी राय में आपने जो समय बताया है वही सत्य है और प्रामाणिक होना चाहिए। पंडितजी ने धीरे से उत्तर दिया यह पूर्णतः प्रामाणिक ही समझिये । मैंने जो जन्म समय आपको बताया है वही सत्य है। क्योंकि इसी समय को आधार बनाकर यदि जन्म कुण्डली के ग्रहों का निर्धारण किया जाय तो आपके हाथ की रेखाओं तथा जन्म कुण्डली का पूर्णतः सामंजस्य हो जाता है। और इस प्रकार आपके हाथ की रेखाओं से जो घटनाएं स्पष्ट होती हैं वे ही घटनाएं जन्म कुण्डली से स्पष्ट हो जाती हैं। कुछ क्षण रुककर पंडित जी ने बताया कि मैं १ सेकेण्ड में आपके जन्म- कालीन ग्रहों को भी स्पष्ट कर देता हूं। आपकी जन्म कुण्डली में कर्क लग्न होना चाहिए तथा सिंह राशि में सिंह गुरु, चन्द्र, मंगल तथा केतु चार ग्रहों का संगम होना चाहिए। इसी प्रकार मकर में शनि कुम्भ में राहु तथा मीन राशि में सूर्य बुध और शुक्र तीन ग्रह एक साथ बैठे हुए होना चाहिए। हकीकत में देखा जाय तो आप की जन्म कुण्डली यही बनती है। महिला ने अपने बैग में पड़ी हुई जन्म कुण्डली निकाली और मिलान करने पर देखा गया कि वास्तव में जन्म कुण्डली में ग्रहों की स्थिति लगभग वही थी जो पंडित जी ने बताई थी । पंडितजी ने हाथ की रेखाओं का अध्ययन समापन करते हुए कुछ तथ्य और बताये जो कि इस प्रकार से थे— १. आपके हाथ में आकस्मिक धन रेखा का योग नहीं है। न तो अभी तक आपको आकस्मिक धन प्राप्त हुआ है और न आगे के जीवन में ऐसा कोई योग ही है। २. वाहन सुख जीवन के २४ वर्ष के प्रारम्भ में होगा। यह कार योग होगा और आगे के जीवन में यह वाहन सुख बराबर बना रहेगा। ३. आर्थिक दृष्टि से आपके आगे के जीवन में किसी प्रकार की कोई बाधा या परेशानी नहीं है। ४. आपके हाथ में कनिष्ठिका अनामिका तथा मध्यमा पर शंख है और तर्जनी पर पर्वत चिह्न है। अतः आपके जीवन का उत्तरार्द्ध निश्चय ही ज्यादा अनुकूल एवं सुखमय है।