भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

( ४६ ) १. तर्जनी : २. मध्यमा : ३. अनामिका : ४. कनिष्ठिका : इन चारों उंगलियों में से प्रत्येक उंगली तीन-तीन खण्डों में बंटी हुई होती है । नैसर्गिक रूप से देखा जाये तो मध्यमा उंगली सबसे बड़ी; तर्जनी, मध्यमा के आखिरी खण्ड के मध्य तक पहुंचने वाली, अनामिका भी लगभग इतनी ही लम्बी, तथा कनिष्ठिका, अनामिका के आखिरी खण्ड तक पहुंचने वाली होती है, इसमें थोड़ी बहुत लम्बाई कम या ज्यादा हो सकती है । तर्जनी पहली उंगली है, जो कि अंगूठे के पास वाली होती है । इसके मूल में गुरु पर्वत का स्थान है । तर्जनी के पास मध्यमा होती है, जिसके मूल में शनि का पर्वत कहा जाता है । मध्यमा के पास वाली उंगली अनामिका कहलाती है, जिसके मूल में सूर्य पर्वत स्थित है तथा इसके पास की उंगली कनिष्ठिका होती है, जिसके मूल में बुध पर्वत का स्थान है, यह सभी उंगलियों से छोटी होती है । तर्जनी उंगली : इसको अंग्रेजी में 'इण्डैक्स फिंगर' कहत हैं । अधिकतर लोगों के हाथ में यह उंगली अनामिका से छोटी होती है । पर कुछ हाथों में मैंने यह उंगली अनामिका से बड़ी भी देखी है । जिस हाथ में यह उंगली अनामिका से लम्बाई में बड़ी हो वे व्यक्ति अपने गौरव से अभिभूत, घमण्डी तथा उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर कार्य करने वाले होते हैं । धार्मिक कार्यों में इनकी रुचि नहीं होती । ये ऊपर के अधिकारियों की चापलूसी करने में भी विश्वास रखते हैं । अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर कड़ाई से नियन्त्रण करते हैं । तथा शासन करने की भावना इनमें हद से ज्यादा होती है । यद्यपि इस वजह से समाज में इन्हें कई बार निन्दा का पात्र बनना पड़ता है फिर भी अपने धैर्य के बल पर ये आगे की ओर बढ़ते रहते हैं । यदि तर्जनी अनामिका उंगली से छोटी हो तो ऐसा व्यक्ति चालाक होता है ऐसा व्यक्ति किसी भी तरीके से अपना काम निकालने में माहिर होते हैं । ऐसे व्यक्तियों को स्वार्थी, खुदगर्ज और चालाक समझना चाहिए ।

( ४७ ) यदि तर्जनी उंगली असामान्य रूप से छोटी हो तो व्यक्ति अकस्मात निर्णय लेने में होशियार होता है । यदि यह असाधारण रूप से लम्बी हो तो ऐसे व्यक्ति अत्या- चारी, घमण्डी, तथा कामुक होते हैं । यदि तर्जनी उंगली लम्बी हो तथा ऊपर का सिरा नोकीला हो तो ऐसे व्यक्ति अन्ध-विश्वासी और धर्म में जरूरत से ज्यादा आस्था रखने वाले होते हैं। यदि यह उंगली लम्बी हो परन्तु ऊपर का सिरा वर्गाकार हो तो ऐसे व्यक्ति सच्चरित्र तथा उदार प्रवृत्ति के होते हैं । यदि तर्जनी उंगली औसत लम्बाई लिए हुए हो और आगे का भाग चपटा हो तो व्यक्ति डांवाडोल मन- स्थिति का होता है । यदि तर्जनी उंगली का पहला पर्व ही लम्बा हो तो व्यक्ति आत्मविश्वासी कहा जाता है । यदि मात्र दूसरा पर्व लम्बा हो तो उसकी इच्छाएं बहुत अधिक बड़ी-चढ़ी होती हैं । यदि तीसरा पर्व लम्बा हो तो उसमें जरूरत से ज्यादा घमण्ड और अभिमान होता है। यदि मध्यमा और प्रथमा दोनों ही उंगलियां बराबर हों तो ऐसे व्यक्ति पूरे संसार में सम्मानित होते हैं । नैपोलियन बोनापार्ट तथा अब्राह्रीम लिंकन की तर्जनी और मध्यमा दोनों ही उंगलियां बराबर लम्बाई लिये हुई थीं । मध्यमा उंगली : इसे अंग्रेजी में 'फिंगर आफ सेटर्न' कहते हैं। क्योंकि इसके मूल में शनि पर्वत होता है । सामान्यतः यह उंगली तर्जनी और अनामिका से लम्बी होती है, परंतु यह लम्बाई १/४ इंच से बड़ी नहीं होनी चाहिए । यदि यह १/४ इंच से बड़ी हो तो उस व्यक्ति का पूरा जीवन दुख, अभाव और परेशानियों में ही व्यतीत होता है । यदि यह उंगली मात्र १/४ इंच ही बड़ी हो तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान, शुभ कार्यों को करने वाला तथा उन्नति की ओर अग्रसर होने वाला होता है । ऐसा ही व्यक्ति समाज में सम्मान तथा यश प्राप्त करता है । यदि मध्यमा उंगली तर्जनी से आधा इंच या उससे भी ज्यादा बड़ी हो तो व्यक्ति निश्चय ही हत्यारा होगा, ऐसा समझ लेना चाहिए । यदि मध्यमा उंगली लम्बी हो तो व्यक्ति रोगी और कामी होता है । यदि यह उंगली लम्बी होने के साथ-साथ गांठदार एवं फूली हुई हो तो वह व्यक्ति स्वार्थी तथा चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है । यदि यह उंगली लम्बी हो, साथ ही इसका ऊपर का सिरा वर्गाकार हो तो ऐसे व्यक्ति गम्भीर स्वभाव के होते हैं तथा जीवन में उत्तर- दायित्वपूर्ण पदों पर सफलता के साथ कार्य करते हैं । यदि यह उंगली लम्बी हो पर

( ४८ ) ऊपर से चपटी हो तो ऐसे व्यक्ति कला के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करते हैं तथा कला के माध्यम से उच्चस्तरीय सम्मान, ख्याति एवं प्रशंसा प्राप्त करते हैं। यदि मध्यमा उंगली का पहला पर्व लम्बा हो तो व्यक्ति आत्महत्या करता है। यदि दूसरा पर्व अपेक्षाकृत लम्बा हो तो ऐसा व्यक्ति व्यापारिक क्षेत्रों में विशेष कर मशी- नेरी सम्बन्धी कार्यों में विशेष लाभ उठाता है। यदि तीसरा पर्व ज्यादा लम्बा हो तो ऐसा व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कंजूस होता है तथा समाज में अपयश का भागी होता है। यदि मध्यमा उंगली का ऊपरी सिरा तर्जनी की ओर झुका हुआ हो तो उसमें जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास होता है और इस आत्मविश्वास के कारण ही वह अपने लक्ष्य तक पहुंचने में सफल हो जाता है। यदि इसका ऊपरी भाग अनामिका की ओर झुका हुआ हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य पर भरोसा करने वाला एवं संगीत, कला आदि में रुचि रखने वाला होता है। अनामिका उंगली : अंग्रेजी में इस उंगली को 'फिंगर आफ अपोलो' भी कहते हैं क्योंकि इसके मूल में सूर्य का स्थान होता है। सामान्यतः यह उंगली मध्यमा से छोटी परन्तु तर्जनी से अपेक्षाकृत लम्बी होती है। परन्तु कुछ हाथों में इसका अपवाद भी देखा गया है। यदि यह उंगली तर्जनी से बड़ी होती है तो ऐसा व्यक्ति उन्नति करता है और उसमें [चित्र: अनामिका / सूर्य की उंगली — चित्र संख्या: ७७] दया, प्रेम, स्नेह आदि मानवोचित गुण जरूरत से ज्यादा होते हैं परन्तु यदि यह उंगली मध्यमा के बराबर पहुंच जाती है तो ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दुष्ट एवं स्वार्थी होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने स्वार्थ के कारण सामने वाले का अधिक से अधिक अहित करने से भी नहीं चूकते। परन्तु ऐसे व्यक्ति भाग्यवादी होते हैं तथा अपने बल का अधिकांश

( ४६ ) चौर्य जुआं, सट्टा आदि गलत कार्यों में लगा देते हैं। ऐसे व्यक्तियों को असभ्य और निर्दयी कहा जाना चाहिए । यदि अनामिका उंगली का झुकाव सबसे छोटी उंगली की ओर हो तो व्यक्ति व्यापार से विशेष लाभ उठाता है और उसका सारा जीवन व्यापारिक कार्यों में ही व्यतीत होता है। परन्तु यदि इस उंगली का झुकाव मध्यमा की तरफ हो तो ऐसा व्यक्ति चिन्तन-प्रधान व आत्म-केन्द्रित होता है तथा जीवन में कुछ ऐसा कार्य करके जाता है, जिससे आगे के जीवन में समाज और देश उसको याद रख सकें । यदि अनामिका छोटी हो तो वह व्यक्ति कलाकृतियों अथवा चित्रों एवं पुरानी वस्तुओं से धन-संचय करता है। यदि इसका अगला सिरा नुकीला हो तो वह एक सफल संगीतज्ञ अथवा चित्रकार होता है। यदि अगला भाग वर्गाकार हो तो कला के माध्यम से धन एवं यश दोनों ही कमाता है। यदि ऊपरी भाग चपटा हो तो इतिहास से संबंध- धित कार्यों में वह विशेष रुचि लेता है तथा उसमें सफलता भी प्राप्त करता है। यदि इस उंगली का पहला पर्व लम्बा हो तो इसमें कलात्मक रुचि विशेष रूप से होती है। यदि दूसरा पर्व लम्बा हो तो अपनी प्रतिभा के बल पर यह व्यक्ति बहुत ऊंचे स्तर तक उठ सकता है। यदि तीसरा पर्व लम्बा तथा चौड़ा हो तो अपने जीवन में यह राष्ट्र-व्यापी सम्मान अर्जित करता है। यदि यह उंगली तर्जनी के बराबर लम्बी हो तो उसे विशेष ख्याति की भूख बनी रहती है। यदि यह उंगली मध्यमा के बराबर लम्बी हो तो इसके जीवन में कई कार्य आकस्मिक रूप से गठित होते हैं और अन्त में यह सफलता प्राप्त करके ही रहता है। कनिष्ठिका उंगली : अंग्रेजी में इस उंगली को 'फिंगर आफ मरकरी' अथवा 'लिटल फिंगर' कहते हैं। इसके मूल में बुध पर्वत का स्थान माना गया है। प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में यह सभी उंगलियों से छोटी होती है। यदि यह उंगली अनामिका के नाखून तक पहुंच जाए तो वह व्यक्ति जीवन में अत्यन्त उच्चस्तरीय सफलता प्राप्त करता है तथा महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन होता है। यह उंगली जितनी ही ज्यादा लम्बी होती है उतनी ही ज्यादा शुभ मानी गई है। ऐसी उंगली रखने वाले व्यक्ति सफल प्रशासक एवं सफल साहित्यकार कहे जाते हैं। यदि यह उंगली अनामिका के ऊपरी पोर के अर्द्ध भाग से भी आगे बढ़ जाती है तो

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ऐसा व्यक्ति सेक्रेटरी अथवा आई० ए० एस० अधिकारी होता है। इन लोगों को आकस्मिक रूप से धन लाभ होता है तथा जीवन का उत्तरार्द्ध अत्यन्त सफलता के साथ व्यतीत होता है। यदि यह उंगली असाधारण रूप से लम्बी दिखाई दे तो ऐसे व्यक्ति बुद्धिजीवी होते हैं तथा उनमें दूसरों को प्रभावित करने की विशेष क्षमता होती है। यदि यह उंगली बहुत अधिक छोटी हो तो वह व्यक्ति बात के मर्म को बहुत जल्दी समझ जाता है और तुरन्त निर्णय लेने में समर्थ रहता है। यदि इसका आगे का सिरा नुकीला हो तो ऐसे व्यक्ति बुद्धिमान, सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न तथा वाकपटु होते हैं। यदि आगे का भाग वर्गाकार हो तो ऐसे व्यक्ति में तर्क करने की विशेष क्षमता होती है तथा ये अपने भाषणों के माध्यम से लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि ऊपरी भाग चपटा हो तो वैज्ञानिक अथवा मशीनरी सम्बन्धी कार्यों में रुचि लेने वाला होता है। यदि उस उंगली का पहला पर्व लम्बा हो तो वह व्यक्ति विज्ञान में सफलता प्राप्त करता है। यदि दूसरा पर्व लम्बा हो तो वह परिश्रम के माध्यम से व्यापार में विशेष सफलता अर्जित करता है। यदि इसका तीसरा पर्व लम्बा हो तो ऐसा व्यक्ति चतुर होता है परन्तु उसमें असत्य बोलने की भावना जरूरत से ज्यादा होती है। यदि यह उंगली अनामिका के बराबर लम्बी हो तो ऐसा व्यक्ति ऊंचे स्तर का दार्शनिक तथा बुद्धिमान होता है। यदि यह उंगली मध्यमा के बराबर लम्बी दिखाई दे तो वह व्यक्ति अपने कार्यों से विश्वविख्यात होता है। वास्तव में अनामिका उंगली जितनी ही ज्यादा लम्बी होती है, उतना ही ज्यादा शुभ कहा जाता है।

उंगलियों की दूरी : दो उंगलियों का खाली स्थान भी अपनेआप में महत्व रखता है। यदि अंगूठे और तर्जनी के बीच अधिक दूरी हो तो उस व्यक्ति में मानवीय गुण भरपूर होते हैं तथा उनमें प्रेम, दया, क्षमा आदि मानवोचित गुण सहज, स्वाभाविक रूप से प्राप्त होते हैं। यदि तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच खाली जगह दिखाई दे तो वह व्यक्ति अपने विचारों में स्वतन्त्र होता है तथा अपनी बात को किसी के भी सामने कहने में हिचकिचाता नहीं। मध्यमा और अनामिका उंगली के बीच का खाली स्थान व्यक्ति की लापरवाही और असभ्यता प्रदर्शित करता है। इसी प्रकार अनामिका और कनिष्ठिका के बीच खाली स्थान हो तो ऐसा व्यक्ति हत्यारा एवं निर्दयी होता है।

उंगलियों के अग्र भाग : उंगलियों के अग्रभाग भी भविष्य-कथन में बहुत ज्यादा महत्व रखते हैं। हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार ये अग्र भाग चार प्रकार के होते हैं।

( ५१ ) ६५ विभिन्न प्रकार के अग्रभागों वाली उंगलियां

( ५२ ) १. तीखे २. चपटे ३. नोकीले ४. वर्गाकार कई बार यह देखने में आया है कि सभी उंगलियों के अग्र भाग एक समान ही होते हैं और कई बार अलग-अलग उंगलियों के अग्रभाग अलग-अलग प्रकार के होते हैं। अब मैं सामान्य रूप से इनका वर्णन स्पष्ट कर रहा हूँ : १. तीखी उंगलियां :—जिनके हाथों में तीखी उंगलियां होती हैं अथवा जिनके अग्रभाग तीखे होते हैं, वे व्यक्ति अत्यन्त ही श्रेष्ठ तथा समाज में अग्रणी माने जाते हैं। ऐसे व्यक्ति दार्शनिक, कलाकार, संगीतकार, तथा अपनी आत्मा के अनुसार चलने वाले होते हैं । उनके हृदय में घृणा, क्रोध और अविवेक नहीं होता अपितु इनका पूरा हृदय दया, प्रेम, और स्नेह से लबालब भरा होता है । परन्तु अत्यधिक तीखी उंगलियां मस्तिष्क के पागलपन को स्पष्ट करती हैं। ऐसे व्यक्ति केवल कल्पना में ही खोये रहते हैं। इनके जीवन में सफलता कम ही रहती है। तांत्रिक लोगों की उंगलिया सामान्यतः ऐसी ही देखने को मिलती हैं। जहां तक देखा गया है, यह अनुभव में आया है कि मनुष्यों में वे व्यक्ति ज्यादा उन्नत एवं सभ्य ज्ञात हुए हैं, जिनकी उंगलियों के अग्रभाग सामान्य रूप से तीखे होते हैं। २. चपटी उंगलियां :—चपटी उंगलियां कार्यकुशलता तथा फुर्ती की सूचक होती हैं। ऐसे व्यक्ति अपने कार्यों में बराबर लगे रहते हैं तथा किसी भी कार्य को बीच में नहीं छोड़ते । जब तक कोई कार्य भली प्रकार से सम्पन्न नहीं हो जाता तब तक ये विश्राम नहीं लेते । इनमें भरपूर आत्म-विश्वास होता है और अपने आत्म-विश्वास के बल पर ही कार्यों को पूर्णता की ओर पहुंचाते हैं । ऐसे व्यक्ति सफल युद्ध विशारद, संगीतकार, कुशल कारीगर, कुशल खिलाड़ी तथा श्रेष्ठ विद्वान होते हैं । सीखने की इनमें विशेष प्रवृत्ति होती है । इनके जीवन में व्यवस्था और क्रमबद्धता होती है । ऐसे व्यक्ति धर्म के प्रति कट्टर नहीं होते अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उदारता से काम लेते हैं । वस्तुतः ऐसे व्यक्ति ही अपने कार्यों से अपने समाज को कुछ नया योगदान देने में सफल होते हैं। ३. नुकीली उंगलियां :—ये उंगलियां मानव के सुन्दर विचारों तथा सुन्दर कार्यों की ओर इंगित करती हैं । ऐसे व्यक्ति जो भी कार्य करेंगे वह एक तरीके से करेंगे और उनके कार्यों में एक विशेष प्रकार की व्यवस्था होगी परन्तु ऐसा देखा गया है कि

( ५३ ) तीखी अंगुलियां नोकीया अंगुलियां वर्गाकार अंगुलियां चपटी अंगुलियां

( ५४ ) इनके जीवन में उतार-चढ़ाव बराबर बना रहता है । कभी ये प्रसन्नता की चरम सीमा पर होते हैं तो कभी इनके जीवन में जरूरत से ज्यादा निराशा छा जाती है । इनका वैवाहिक-जीवन अधिकतर असफल ही रहता है । उंगलियों के अग्र भाग बहुत अधिक तीखे होना अनुकूल नहीं कहा जाता । ऐसे व्यक्तियों में आत्म-विश्वास कम होगा । ये अपनी भावनाओं के अनुसार ही चलते हैं । ऐसे व्यक्ति आलसी, कामुक और अक्षम कहे जाते हैं । ऐसे व्यक्ति अपने पेट में रहस्य नहीं रख सकते । ४. वर्गाकार उंगलियां :—जिन व्यक्तियों के हाथों में वर्गाकार उंगलियां होती हैं, वे व्यक्ति जीवन में दूरदर्शी तथा नियमितता के साथ कार्य करने वाले होते हैं । अधिकतर ऐसे व्यक्ति व्यापारी वर्ग में आते हैं जो प्रत्येक कार्य की योजना बहुत अधिक सोच-विचार कर करते हैं । ऐसे व्यक्ति फूंक-फूंक कर कदम रखने वाले होते हैं तथा इनके कार्यों में एक नियमतता होती है । ये स्वयं भी पूरा परिश्रम करते हैं और दूसरों से भी काम लेने की युक्ति इनको आती है । स्वच्छता, समय की पाबन्दी, अपने वचनों की रक्षा, आत्म विश्वास आदि गुण इनमें विशेष रूप से पाये जाते हैं । ऐसे व्यक्ति अच्छे गणितज्ञ, इतिहासज्ञ, तथा कवि होते हैं । ऐसे ही व्यक्ति जीवन में विशेष सफलता प्राप्त कर सकते हैं । उंगली दर्शन : यदि उंगलियां भीतर की ओर झुकी हुई हों तो व्यक्ति दुनियादारी में बहुत अधिक चतुर होते हैं तथा ऐसे व्यक्ति प्रत्येक कार्य की देखभाल कर सकते हैं । यदि उंगलियों का झुकाव बाहर की ओर हो तो ऐसे व्यक्तियों का हृदय उदार होता है । अपने विचारों के वे धनी होते हैं तथा जीवन में यदि किसी को आश्वासन देते हैं तो अपने कथन को अन्तिम क्षण तक निभाने की कोशिश करते हैं । यदि उंगलियां जरूरत से ज्यादा बाहर झुकी हुई हों तो व्यक्ति लापरवाह होता है । यदि उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी एवं बेडौल हों तो व्यक्ति अपराधी वर्ग के होते हैं तथा अपराध पूर्ण कार्यों में ही उनकी रुचि रहती है । जिनकी उंगलियां मोटी और फूली हुई होती हैं, वे निर्धनता की सूचक होती हैं । ऐसे व्यक्ति जितना ही उपार्जित करते हैं, उससे ज्यादा खर्च कर डालते हैं । यदि उंगलियां चपटी हों तो व्यक्ति सेवाकार्य में सफल होते हैं । जीवन में ऊंचे स्तर पर तथा अधिकारी पद पर पहुंचकर प्रशंसा अर्जित करते हैं ।

( ५५ ) जिसकी उंगलियां एक सीध में होती हैं, वह व्यक्ति भाग्यशाली होता है तथा समाज में उसको विशेष सम्मान मिलता है। ६७ यदि सभी उंगलियां गठीली एवं उबड़-खाबड़ हों तो व्यक्ति विचारशील एवं अध्ययन प्रिय होता है। यदि उंगलियों में गांठें बहुत ज्यादा विकसित हों तो ऐसा व्यक्ति प्रतिभावान तथा चिन्तक होता है। उसके प्रत्येक कार्य में एक विशेष सुघड़ता और व्यवस्था होती है। यदि ये गांठें अत्यधिक उभरी हुई होती हैं तो ऐसे व्यक्ति जीवन में निराशा- वादी होते हैं तथा अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यदि ये गांठें चिकनी होती हैं तो व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भावुक देखे गये हैं। यदि गांठें रहित उंगलियां हों तो व्यक्ति दार्शनिक होता है।

( ५६ ) उंगलियों पर निशान : उंगलियों पर पाये जाने वाले निशान भी हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिये बहुत अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। अपराध शास्त्र में इन चिन्हों का बहुत अधिक महत्व माना गया है। इन चिन्हों के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र उसका मनोविज्ञान आदि को अच्छी तरह से जान सकते हैं। इन चिन्हों के माध्यम से ही हम उसके व्यक्तित्व को भली प्रकार से समझ सकते हैं। ये चिह्न निम्न प्रकार से हैं : १. शंकु :—उंगलियों के ऊपरी भाग अर्थात पोरुओं पर यदि शंकु का चिन्ह दिखाई दे तो ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से अत्यन्त समर्थ एवं श्रेष्ठ होता है। ऐसे व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी उन्नति करते रहते हैं तथा परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करते हैं साथ ही परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढाल लेने की क्षमता रखते हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में अपने प्रयत्नों से सफल हो जाते हैं परन्तु वृद्धा- वस्था में ये व्यक्ति हृदय रोगों के भी शिकार पाये जाते हैं। २. तम्बू :—किसी-किसी व्यक्ति की उंगलियों के पोरुओं पर तम्बू वत चिह्न देखने को मिलते हैं। ऐसे व्यक्ति अधिकतर सहृदय एवं कलाकार होते हैं और अपनी कला के माध्यम से बहुत ऊंचे उठते हैं। परन्तु यह बात भी सही है कि ऐसे व्यक्ति भावुक होते हैं और इन लोगों का अनुचित लाभ उठाया जाता है। मानसिक दृष्टि से ऐसे व्यक्ति असंतुलित होते हैं तथा इनका गृहस्थ जीवन लगभग दुखमय-सा ही रहता है। ३. चक्र :—उंगलियों पर चक्र के निशान पाये जाना शुभ माना गया है। ऐसे व्यक्ति अपने विचारों में स्वतंत्र होते हैं तथा इनके प्रत्येक कार्य में मौलिकता दिखाई देती है। विवेक के बल पर ये समाज में सम्माननीय स्थान भी प्राप्त करते हैं तथा ये रूढ़ि, अज्ञान और पोंगा पन्थी से दूर रहते हैं। ४. मेहराब :—जिन के पोरुओं पर मेहराब के चिह्न पाये जाते हैं, वे व्यक्ति अधिकतर आलसी, शक्की तथा सन्देहशील प्रकृति के होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का न तो अपने आप पर भरोसा होता है और न ये किसी दूसरों पर भरोसा करते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने चारों ओर भ्रम का वातावरण बनाये रखते हैं। रहस्यमय कार्यों तथा गुप्तचर से सम्बन्धित कार्यों में ये विशेष सफलता प्राप्त कर सकते हैं। ५. त्रिभुज :—त्रिभुज का चिह्न व्यक्ति को रहस्यमय बनाता है। ऐसे व्यक्ति योगाभ्यास के द्वारा अपने शरीर को सुगठित बनाने में समर्थ होते हैं। साथ ही साथ ऐसे व्यक्ति एकान्त प्रेमी तथा रूढ़िवादी भी देखे गए हैं। इनके मन में जो बात घर कर जाती है उसे ये सहज में ही नहीं छोड़ते।

( ५७ ) ६. तारा :—जिन व्यक्तियों की उंगलियों पर तारा या क्रॉस का चिह्न दिखाई दे तो वह व्यक्ति प्रबल भाग्यवादी एवं भाग्यशाली होगा, ऐसा समझ लेना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को जीवन में कई बार अप्रत्याशित रूप से धन-लाभ होता है। आर्थिक दृष्टि से ये व्यक्ति जीवन में सुखी रहते हैं। ७. कंदुक :—यदि उंगलियों के पोरुओं पर गोल निशान या कंदुक चिह्न दिखाई दे तो वे व्यक्ति आदर्श प्रेमी और आदर्श मित्र कहे जाते हैं। एक तरफ जहां इनकी रुचि भोग की तरफ होती है वहीं दूसरी ओर वैराग्य की तरफ भी इनका झुकाव होता है। मानसिक दृष्टि से ये अस्थिर होते हैं तथा किसी भी कार्य को पूर्णता के साथ सम्पन्न करना इनके स्वभाव में नहीं होता। ८. जाल :—जाल युक्त उंगलियां इस बात की सूचक होती हैं कि व्यक्ति के जीवन में जरूरत से ज्यादा बाधाएं एवं परेशानियां आयेंगी। यद्यपि इनकी जीवन शक्ति दृढ़ होती है तथा अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर ये संकटों से भी सही सलामत निकल आते हैं परन्तु फिर भी इनके जीवन में आराम तथा सुख कम ही रहता है। अधिकतर अपराधवृत्ति के लोगों तथा डाकुओं की उंगलियों पर ऐसे चिह्न आसानी से देखे जा सकते हैं। ६. चतुर्भुज :—यदि उंगली के पोरुए पर वर्ग या चतुर्भुज का चिह्न दिखाई दे तो यह समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति अपने जीवन में परिश्रमी रहा है और अपने परिश्रम तथा उद्यम के बल पर लक्ष्मी को अपने वश में रखने की सामर्थ्य रखता है। ऐसा व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सम्पन्न तथा सुखी रहता है। यदि किसी की उंगलियों पर एक से अधिक चिह्न दिखाई दें तो उस व्यक्ति में उनसे सम्बन्धित फलादेशों का मिश्रण समझना चाहिए। अंगूठा अंगूठे से भी व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है। इसके बारे में भी मैं संक्षेप में यहां प्रकाश डाल रहा हूं : १. लम्बा अंगूठा :—ऐसे व्यक्ति स्वेच्छाचारी, आत्मनिर्भर तथा दूसरों पर अपना अधिकार रखने वाले होते हैं। इनके जीवन में भावना की बजाय बुद्धि ज्यादा होती है और एक प्रकार से इन्हें बुद्धिजीवी ही कहा जाता है। गणित इंजीनियरिंग आदि कार्यों में इनकी विशेष रुचि रहती है। २. छोटा अंगूठा :—ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि से कम काम लेता है अपितु दूसरों से प्रभावित होकर कार्य करता है। इनके जीवन में बुद्धि की अपेक्षा भावना का बाहुल्य रहता है। काव्य, चित्रकला, संगीत आदि में ये विशेष रुचि लेते हैं।

( ५८ ) [चित्र: अंगूठे के मुख्य तीन भाग — ऊर्ध्व भाग, मध्य भाग, अधोभाग — चित्र संख्या ४२] अंगूठे के मुख्य तीन भाग ३. कड़ा अंगूठा :-ऐसे व्यक्ति हठी और सतर्क होते हैं। कोई भी बात अपने पेट में पचा लेने की विशेष क्षमता रखते हैं। इनके जीवन में भावुकता का अभाव होता है तथा बुद्धि के बल पर ही ये विशेष रूप से संचालित रहते हैं। ४. लचीला अंगूठा :- जिस व्यक्ति के हाथ में ऐसा अंगूठा होता है, वह व्यक्ति धन-संग्रह करने में विशेष रुचि रखता है तथा परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढाल लेने की क्षमता रखता है। ५. पहला पर्व : - यदि अंगूठे का पहला पर्व बहुत अधिक लम्बा हो तो वह व्यक्ति निरंकुश होता है जबकि यह पर्व छोटा होने पर उसमें कार्य करने की इच्छा कम होती है। ऐसे व्यक्ति दुर्बल इच्छा-शक्ति वाले देखे गये हैं। यदि अंगूठे का अग्रभाग वर्गाकार हो तो व्यक्ति न्याय-कायों में चतुर होता है तथा अपनी न्याय- शीलता के कारण समाज में आदरणीय स्थान प्राप्त करता है । यदि अंगूठे का अग्र- भाग चौड़ा होता है तो व्यक्ति जरूरत से ज्यादा हठी होता है और हठ के कारण ही जीवन में कई बार नुकसान उठा लेता है। यदि अंगूठे का पहला पर्व असाधारण रूप

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से लम्बा होता है तो ऐसा व्यक्ति हत्यारा, डाकू या समाज-विरोधी कार्यों में संलग्न रहता है । ६. दूसरा पर्व :-यदि यह पर्व लम्बा होता है तो ऐसा व्यक्ति चतुर, साव- धान तथा समाज के कार्यों में आगे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाला होता है । अपने कार्यों से यह समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करता है। यदि यह पर्व छोटा हो तो व्यक्ति बिना सोचे-समझे काम कर लेता है और उसमें असफल होने पर बराबर पछताता रहता है । जोखिमपूर्ण कार्यों में यह व्यक्ति बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है । यदि यह पर्व महा हो तो उसमें तर्क-शक्ति का अभाव होता है । यदि यह पर्व पिचका हुआ दिखाई दे तो व्यक्ति का मस्तिष्क अत्यन्त तीव्र एवं संवेदनशील होता है। वस्तुतः हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अंगूठा और उंगलियों का अध्ययन अपने- आप में बहुत अधिक महत्त्व रखता है ।

पर्वत

हथेली का अध्ययन करते समय उस पर पाये जाने वाले पर्वतों का विशेष महत्त्व है। क्योंकि पर्वतों के माध्यम से ही विभिन्न रेखाएं बनती हैं और उनका विकास हो पाता है। पर्वतों का नामकरण ग्रहों के नामकरण से हुआ है और जिस ग्रह में जो गुण विशेष रूप से होते हैं, वे ही गुण उन पर्वतों के उभार से ज्ञात किये जा सकते हैं। उदाहरणार्थ सूर्य सम्मान, प्रसिद्धि, यश आदि का कारक ग्रह है। अतः यदि हथेली में सूर्य पर्वत विकसित है तो निश्चय ही उस व्यक्ति को विशेष सम्मान तथा आदर मिलेगा, परन्तु यदि हथेली में सूर्य पर्वत का विकास नहीं हुआ है तो वह व्यक्ति भले ही कितने ही ऊंचे स्तर पर पहुंच जाय, उसको वांछनीय सम्मान अथवा ख्याति नहीं मिल पाती।


[चित्र विवरण: हथेली पर पर्वतों के स्थान]

  • शनि
  • सूर्य
  • बुध
  • गुरु
  • ऊर्ध्व मंगल
  • मंगल का क्षेत्र
  • निम्न मंगल
  • शुक्र
  • चन्द्र

हथेली पर पर्वतों के स्थान


अनुभव में यह भी आया है, कि यदि जन्म-कुण्डली में कोई ग्रह विशेष बलवान है, तो वह ग्रह हथेली में भी बलवान दिखाई देता है अर्थात् उसका पर्वत विकसित

( ६१ ) स्पष्ट एवं सुघड़ होता है। एक प्रकार से देखा जाय तो हथेली के पर्वतों में और जन्म कुण्डली के ग्रहों में किसी प्रकार का कोई विशेष अन्तर नहीं होता, इसीलिए कहा जाता है कि हथेली की रेखाओं और पर्वतों का अध्ययन करने से व्यक्ति की जन्म-कुण्डली बनायी जा सकती है। पर्वतों के तीन भेद हैं : १. सामान्य पर्वत २. विकसित पर्वत ३. अविकसित पर्वत यदि हथेली में पर्वत काफी ऊंचे उठे हुए मांसल, स्वस्थ और लालिमा लिये हुए होते हैं तो वे विकसित कहलाते हैं। इसके विपरीत अविकसित पर्वत सामान्यतः दिखाई ही नहीं देते। सामान्य पर्वत वे कहलाते हैं, जो न अविकसित की श्रेणी में आते हैं और न जिन्हें पूर्णतः विकसित माना जा सकता है। ग्रह, उनके अंग्रेजी नाम तथा संबंधित प्रभावों का परिचय निम्न प्रकार से है :: १. बृहस्पति पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'जुपिटर' कहते हैं। यह सौम्य ग्रह कहलाता है तथा यह पर्वत राज्य सेवा, इच्छाओं के प्रदर्शन आदि से संबंधित होता है। २. शनि पर्वत :—अंग्रेजी में इसे 'सेटर्न' कहते हैं तथा यह मननशीलता ,एकान्त- प्रियता, रोग, चिन्ता, मशीनरी व व्यापार आदि से संबंधित है। ३. सूर्य पर्वत :—इसको अंग्रेजी भाषा में 'सन' कहते हैं। इसके माध्यम से राज्य, मानसिक उन्नति, प्रसिद्धि, सम्मान, यश तथा विविध कला-कौशल का अध्ययन किया जाता है। ४. बुध पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'मरकरी' कहते हैं। वैज्ञानिक उन्नति, व्यापार, गणित संबंधी कार्य आदि तथ्यों का अध्ययन इसी ग्रह के माध्यम से किया जाता है। ५. हर्षल पर्वत :—यह नाम अंग्रेजी का है, हिन्दी में इसे 'प्रजापति' कहते हैं। इसका संबंध शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं से होता है। ६. नेपच्युन पर्वत :—हिन्दी में इसे वरुण ग्रह तथा अंग्रेजी में 'नेपच्युन' कहते हैं। व्यक्ति की विद्वता, उसका व्यक्तित्व, दूसरों पर उसका प्रभाव तथा उसका पुरुषार्थ आदि इसी पर्वत के माध्यम से जाना जाता है। ७. चन्द्र पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'मून' कहते हैं तथा हथेली में इस पर्वत के माध्यम से कल्पना, विशालता, सहृदयता, मानसिक उत्थान तथा समुद्र पारीय यात्राओं का अध्ययन किया जाता है।

( ६२ ) ८. शुक्र पर्वत :—अंग्रेजी में यह ग्रह 'वीनस' कहलाता है। सुन्दरता, प्रेम, शान-शौकत, तथा ऐश्वर्य-भोग आदि का संबंध इसी ग्रह से है। ९. मंगल पर्वत :—यह अंग्रेजी में 'मार्स' के नाम से पुकारा जाता है। युद्ध जीवट, शक्ति, परिश्रम, पुरुषोचित्त गुण आदि का अध्ययन इस ग्रह के माध्यम से किया जाता है। १०. राहू पर्वत :—इसको अंग्रेजी में 'ड्रैगन्स हेड' के नाम से पुकारते हैं। आकस्मिक धन-प्राप्ति, लॉटरी, हार्ट एटेक या अचानक घटित होने वाली घटनाओं का संबंध इसी ग्रह से है। ११. केतु पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'ड्रैगन्स टेल' कहते हैं। हाथ पर इस ग्रह से धन, भौतिक उन्नति एवं बैंक बैलेन्स आदि का अध्ययन किया जाता है। १२. प्लूटो पर्वत :—इसे अंग्रेजी में 'प्लूटो' तथा हिन्दी में इन्द्र के नाम से पुकारते हैं। मानसिक चिन्ता तथा अध्यात्मिक उन्नति के बारे में इसी ग्रह से जान सकते हैं। ग्रहों का क्षेत्र : हस्तरेखा विज्ञान में हथेली में समस्त ग्रहों के स्थान निर्धारित हैं और सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर इनको पहचाना जा सकता है। १. बृहस्पति :— हथेली में इसका स्थान तर्जनी उंगली के मूल में तथा मंगल पर्वत से ऊपर होता है। यह स्वभाव से अधिकार, नेतृत्व, संचालन तथा लेखन का देवता विशेष रूप से माना गया है। गुरु का पर्वत इन तथ्यों को भली प्रकार से स्पष्ट करता है। जिन हथेलियों में गुरु का पर्वत सबसे अधिक उभरा हुआ और स्पष्ट होता है उनमें देव-तुल्य सभी गुण पाये जाते हैं। ऐसा व्यक्ति जहां स्वयं की उन्नति करता है, वहां दूसरों की भी उन्नति देने में सहायक रहता है। ऐसे व्यक्ति अपने स्वाभिमान की रक्षा विशेष रूप से करते हैं। ये विद्वान न्याय करने वाले, अपने वचनों का निर्वाह करने वाले, परोपकारी, तथा समाज में माननीय होते हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी ये सहसा विचलित नहीं होते अपितु देश के जो भी उच्च न्यायाधीश या उच्च पदा- धिकारी व्यक्ति हैं उनमें निश्चय ही गुरु पर्वत विकसित अवस्था में होना चाहिए। ऐसे लोगों में यह विशेष क्षमता होती है कि वे जनता को अपने विचारों के अनुकूल बना लेते हैं। इनमें धार्मिक भावनाएं जरूरत से ज्यादा होती हैं। यदि गुरु पर्वत अल्पविकसित या अविकसित होता है तो उन व्यक्तियों में उपर्युक्त गुणों की न्यूनता समझनी चाहिए। शारीरिक दृष्टि से ये व्यक्ति साधारण डील-डौल के स्वस्थ तथा हंस-मुख होते हैं। वाचन तथा भाषण-कला में ये व्यक्ति पटु

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होते हैं तथा हृदय से ऐसे व्यक्ति दयालु और परोपकारी कहे जाते हैं। आर्थिक पक्ष की अपेक्षा सम्मान तथा यश-प्राप्ति की ओर इनका झुकाव कुछ ज्यादा ही होता है। अधिकार, स्वतंत्रता और नेतृत्व के इनमें विशेष गुण पाये जाते हैं। विपरीत योनि के प्रति इनके मन में कोमल भावनाएं होती हैं, सुन्दर तथा सभ्य स्त्रियों से इनका मधुर सम्बन्ध रहता है। यदि स्त्रियों के हाथों में यह पर्वत विक- सित अवस्था में होता है तो उनमें समर्पण की भावना विशेष रूप से पाई जाती है। यदि गुरु पर्वत का झुकाव शनि की ओर हो तो ऐसा व्यक्ति चिन्तनशील तथा अपने ही कार्यों में लगा रहने वाला होता है परन्तु जीवन में पूर्ण सफलता न मिल पाने के कारण धीरे-धीरे उनमें निराशा की भावना आने लग जाती है। स्वभाव से ये व्यक्ति गम्भीर तथा अड़ियल प्रकृति के होते हैं। यदि गुरु पर्वत नीचे की तरफ खिसका हुआ हो तो व्यक्ति को जीवन में कई बार बदनामी का सामना करना पड़ता है परन्तु साहि- त्यिक क्षेत्र में ऐसे व्यक्ति पूर्ण सफल होते देखे गये हैं। यदि गुरु पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो तो ऐसा व्यक्ति स्वार्थी, घमंडी तथा स्वेच्छाचारी होता है। जिनके हाथों में गुरु पर्वत का अभाव होता है, उनके जीवन में आत्म-सम्मान की कमी रहती है। माता-पिता का सुख उन्हें बहुत कम मिल पाता है तथा वह निम्न विचारों से सम्पन्न हल्के स्तर के मित्रों से सम्बन्धित रहते हैं। यदि इस पर्वत का उभार सामान्यतः ठीक हो तो व्यक्ति में आगे बढ़ने की भावना होती है परन्तु इनका विवाह शीघ्र हो जाता है और इनका गृहस्थ-जीवन सामा- न्यतः सुखमय रहता है। यदि उंगलियां नुकीली हों तथा गुरु पर्वत विकसित हो तो वह व्यक्ति अंध- विश्वासी होता है। इसी प्रकार वर्गाकार उंगलियों के साथ विकसित गुरु पर्वत हो तो वह एक प्रकार से जीवन में निरंकुश एवं अत्याचारी बन जाता है। यदि उंगलियां बहुत लम्बी हों और इस पर्वत का विकास ठीक प्रकार से हुआ हो तो वह व्यक्ति अपव्ययी तथा भोगी होता है। यदि गुरु तथा शनि पर्वत बराबर उभरे हुए हों तथा लगभग एक-दूसरे में मिल गये हों तो वह व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली होता है तथा जीवन में विशेष सफलता प्राप्त करता है। वस्तुतः गुरु पर्वत जीवन में अत्यधिक सहायक तथा उन्नति की ओर अग्रसर करने वाला पर्वत कहा जाता है। २. शनि : इसका आधार मध्यमा उंगली के मूल में होता है। हथेली पर इस पर्वत का विकास असाधारण प्रवृत्तियों का सूचक कहा जाता है। यदि हाथ में इस पर्वत का अभाव हो तो व्यक्ति जीवन में विशेष सफलता या सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता।

( ६४ ) मध्यमा उंगली को 'भाग्य की देवी' कहा जाता है, क्योंकि भाग्य रेखा या 'फैट लाइन' की समाप्ति इसी उंगली के मूल में होती है। यदि शनि ग्रह पूर्णविकसित होता है तो व्यक्ति प्रबल भाग्यवान होता है तथा जीवन में अपने प्रयत्नों से बहुत अधिक ऊंचा उठता है। विकसित पर्वत होने पर ऐसा व्यक्ति एकान्त-प्रिय तथा निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने वाला होता है। वह अपने कार्यों में अथवा लक्ष्य में इतना अधिक डूब जाता है कि वह घर-गृहस्थी की चिंता ही नहीं करता। स्वभाव से ऐसे व्यक्ति चिड़चिड़े तथा सन्देहशील प्रवृत्ति के होते हैं। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों ये व्यक्ति भी रहस्यवादी बन जाते हैं। शनि पर्वत प्रधान व्यक्ति, जादूगर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार अथवा रसायनशास्त्री होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण मितव्ययी होते हैं तथा अचल सम्पत्ति में ज्यादा विश्वास रखते हैं। संगीत, नृत्य आदि कार्यों में इनका रुझान कम रहता है। सन्देहशीलता इनके जीवन में बचपन से ही होती है और अपनी पत्नी तथा पुत्रों पर भी सन्देह की दृष्टि रखने से नहीं चूकते । यदि यह पर्वत अत्यधिक विकसित होता है तो व्यक्ति अपने जीवन में आत्म- हत्या कर लेता है। डाकू, ठग, लुटेरे आदि व्यक्तियों के हाथों में यह पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित होता है। ऐसे व्यक्तियों का पर्वत साधारणतः पीलापन लिये हुए होता है। इनकी हथेलियां तथा चमड़ी पीली होती हैं तथा इनके स्वभाव में चिड़चिड़ा- पन स्पष्टतः झलकता है। यदि शनि का पर्वत गुरु पर्वत की ओर झुका हुआ हो तो यह शुभ संकेत कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति समाज में आदरणीय स्थान प्राप्त करते हैं तथा समाज में श्रेष्ठ रूप में देखे जाते हैं। परन्तु यदि शनि पर्वत का झुकाव सूर्य की ओर हो तो ऐसे व्यक्ति आलसी, निर्धन तथा भाग्य के भरोसे जीवित रहने वाले होते हैं। इनमें जरूरत से ज्यादा निराशा होती है तथा वे प्रत्येक कार्य का अन्धकार पक्ष ही देखते हैं। परिवार वालों से उनको विशेष लाभ नहीं मिल पाता, व्यापार में ये हानि उठाते हैं। यदि शनि पर्वत पर जरूरत से ज्यादा रेखाएं हों तो व्यक्ति कायर तथा अत्य- धिक भोगी होता है। यदि शनि पर्वत तथा बुध पर्वत दोनों ही विकसित हों तो वह व्यक्ति एक सफल वैद्य अथवा व्यापारी बनता है और उसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता । यदि हथेली में शनि पर्वत का अभाव होता है तो उस व्यक्ति का जीवन महत्त्व हीन-सा होता है। यदि यह पर्वत सामान्य रूप से उभरा हुआ हो तो वह व्यक्ति जरू- रत से ज्यादा भाग्य पर विश्वास करने वाला तथा अपने कार्यों में असफलता प्राप्त करने वाला होता है। ऐसे व्यक्तियों के जीवन में मित्रों की संख्या बहुत कम होती है। स्वभाव से ये हठी तथा अधार्मिक होते हैं।

( ६५ ) यदि मध्यमा उंगली का सिरा नुकीला हो तथा शनि पर्वत विकसित हो तो व्यक्ति कल्पना-प्रिय होता है, परन्तु यदि उंगली का सिरा वर्गाकार हो तो वह व्यक्ति कृषि अथवा रसायन के क्षेत्र में विशेष उन्नति करता है । ३. सूर्य :-- अनामिका उंगली के मूल में तथा हृदय-रेखा के ऊपर का जो भाग होता है वह सूर्य पर्वत कहलाता है । ऐसा पर्वत व्यक्ति की सफलता का सूचक होता है। यदि हाथ में सूर्य पर्वत का अभाव हो तो व्यक्ति अत्यन्त साधारण जीवन व्यतीत करता है । इसलिये जिसके हाथ में सूर्य पर्वत नहीं होता वह एक प्रकार से गुमनाम जिन्दगी ही व्यतीत करता है । इस पर्वत का विकास मानव के लिए अत्यन्त आवश्यक है और इस पर्वत के विकास से मानव प्रतिभावान् और यशस्वी बनता है । यदि यह पर्वत पूर्ण उन्नत, विकसित तथा गुलाबीपन लिये हुए होता है तो वह व्यक्ति अपने जीवन में अत्यन्त ऊंचे पद पर पहुंचता है । ऐसा व्यक्ति स्वभाव से हंस-मुख तथा मित्रों में घुल-मिल कर काम करने वाला होता है। इनकी बातें और इनके कार्य समाचार बन जाते हैं तथा जनसाधारण में ये व्यक्ति अत्यन्त लोकप्रिय होते हैं। ऐसे व्यक्ति सफल कलाकार, श्रेष्ठ संगीतज्ञ, तथा यशस्वी चित्रकार होते हैं। इन लोगों में प्रतिभा जन्मजात होती है। एक दूसरे के व्यवहार में ये व्यक्ति ईमानदारी बरतते हैं तथा वैभवपूर्ण जीवन बिताने के ये इच्छुक होते हैं। सही रूप में देखा जाय तो ये व्यक्ति व्यापार में विशेष लाभ उठाते हैं तथा इनके जीवन में आय के स्रोत एक से अधिक होते हैं । ये पूर्ण रूप से भौतिक होते हैं तथा सामने वाले व्यक्ति के मन की थाह तक पहुंचने में अत्यन्त सक्षम होते हैं । अनपढ़ तथा सामान्य घराने के व्यक्ति की हथेली में भी यदि सूर्य पर्वत विकसित हो तो वह व्यक्ति श्रेष्ठ धनी और सम्पन्न होता है । आकस्मिक धन-प्राप्ति इनके जीवन में कई बार होती है तथा इनका रहन-सहन अत्यंत राजसी तथा वैभवपूर्ण होता है । हृदय से ये व्यक्ति साफ होते हैं तथा अपनी गलती को स्वीकार करने में भी हिचकिचाते नहीं । सुलझे हुए मस्तिष्क के धनी ये अपना विरोध सहन नहीं कर पाते तथा खरी-खरी बात सामने वाले के मुंह पर कह देने में विश्वास रखते हैं। ऐसे व्यक्ति ही जीवन में महत्त्वपूर्ण पदों पर पहुंच सकते हैं तथा कुछ नया कार्य करके दिखा सकते हैं । यदि हथेली में सूर्य पर्वत नहीं होता तो ऐसा व्यक्ति मन्द-बुद्धि तथा मूर्ख होता है । यदि यह पर्वत कम विकसित होता है तो उस व्यक्ति में सौंदर्य के प्रति रुचि तो होती है परन्तु वे उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पाते । अत्यन्त श्रेष्ठ तथा सुवि- कसित सूर्य पर्वत आत्म-विश्वास, सज्जनता, दया, उदारता, तथा धन-वैभव, का सूचक