योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☀ निर्वाण प्रकरण ☀ ६३७
स्वप्न में स्वप्न की सृष्टि दिखती है, परन्तु वास्तव में हुई नहीं, निद्रादोष से दिखती है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी वास्तव में नहीं हुई, अज्ञान से जीवों को भासित होती है। वास्तव में सब जीव ब्रह्मरूप हैं, पर अपने स्वरूप के प्रमाद से जीवत्वभाव को अङ्गीकार किया है। उस अङ्गीकार और अनात्म देहादिक में आत्मअभिमान से जीव जैसा निश्चय करता है, वैसी ही गति पाता है। देश, काल, क्रिया और द्रव्य का जैसा संकल्प अनुभवसत्ता में दृढ़ होता है, वैसा ही भासता है। उसमें चार अवस्था कल्पित होती हैं और जैसी-जैसी भावना होती है, उसके अनुसार अवस्था का अनुभव होता है। वे चार अवस्था ये हैं—एक घनसुषुप्ति; दूसरी क्षीणसुषुप्ति, तीसरी स्वप्न अवस्था और चौथी जाग्रत। पर्वत और पाषाण घनसुषुप्ति में हैं। जैसे सुषुप्ति अवस्था में कुछ नहीं फुरता, जड़ीभूत हो जाता है, वैसे ही इनको कुछ नहीं फुरता—घन सुषुप्ति में स्थित हैं। वृक्ष क्षीणसुषुप्ति में स्थित हैं। जैसे क्षीणसुषुप्ति में कुछ फुरना फुरता है, वैसे ही वृक्षों में भी फुरना होता है, इससे वे क्षीणसुषुप्ति में हैं। पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि तिर्यक् जीव स्वप्न अवस्था में स्थित हैं। जैसे स्वप्न में पदार्थ दिखता है, परन्तु स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही इनको थोड़ा सूक्ष्म ज्ञान है, इससे ये स्वप्न अवस्था में स्थित हैं। मनुष्य और देवता जाग्रतरूप जगत् का अनुभव करते हैं।
हे राम ! ये चारों अवस्था आत्मा में स्थित हैं। छोटे बड़े सबका अहंप्रत्ययरूप आत्मा है। उसमें जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही वह दिखता है। हे राम ! हमको एक दिन व्यतीत होता है और चींटी को उसी में युग का अनुभव होता है। हमको जो सूक्ष्म अणु होता है, उनको वही पर्वत के समान लगता है। हे राम ! स्वरूप सबका एक आत्मसत्ता ही है, परन्तु भावना में भिन्न-भिन्न भासित होता है। एक कीट है, जो बहुत सूक्ष्म है। जब वह चलता है, तब जानता है कि मेरा गरुड़ का सा वेग है और उसको वही सत् हो रहा है। बाल-खिल्यों का अंगुष्ठप्रमाण शरीर है। उनको वही बड़ा दिखता है और विराट् को वही अपना बड़ा शरीर लगता है। निदान जैसी जिसकी
६३८ ❈ योगवाशिष्ट ❈
भावना होती है, वैसा ही उसको भासित होता है। मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, सबका अपना-अपना भिन्न-भिन्न संकल्प है। जैसा संकल्प किसी को दृढ़ हो रहा है, उसको वैसा ही स्वरूप भासित होता है। जैसे मनुष्य राग, द्वेष, भय, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, क्षुधा, तृषा, हर्ष, शोक आदि विकारों में आसक्त होता है, वैसे ही कीट पतङ्ग, पक्षी आदि को भी होता है, परन्तु भेद इतना ही है कि जैसे हमको यह जगत् स्पष्टरूप दिखता है, वैसे उनको नहीं दिखता। संसारी सब हैं परन्तु वासना के अनुसार न्यून-अधिक भासता है और दुःख का अनुभव स्थावर-जङ्गम को भी होता है।
जब किसी स्थान में अग्नि लगती है और उसमें वृक्ष और पाषाण जलते हैं, तब उनको भी दुःख होता है, परन्तु सूक्ष्म-स्थूल का भेद है। जैसे और जीव के शस्त्रप्रहार करने से शरीर नष्ट होने का दुःख होता है, वैसे ही वृक्षादिक को भी होता है, परन्तु घनसुषुप्ति, क्षीण-सुषुप्ति और स्वप्न जाग्रत् का भेद है। पर्वत पाषाण को सूक्ष्म दुःख होता है, वृक्ष को पाषाण से विशेष दुःख होता है, परन्तु स्पष्ट मान और अपमान का दुःख नहीं होता; स्वप्न की नाईं होता है। मनुष्य और देवताओं को स्पष्ट रागद्वेष जाग्रत् की नाईं होता है; क्योंकि वे जाग्रत् अवस्था में स्थित हैं। और वृक्ष, पाषाण आदि को स्पष्ट दुःख का विकल्प नहीं उठता; क्योंकि वे जड़ स्वभाव में स्थित हैं, पर दुःख तो सबको होता ही है। और आश्चर्य देखो कि कीट महादुःखी रहते हैं। जब वे मृतक होते हैं, तब सुखी होते हैं। अज्ञान से जो इस शरीर में आस्था हुई है, उसको भी मरना बुरा लगता है तो और जीवों को भला कैसे न लगे। हे राम! अपने स्वरूप के प्रमाद से भय, क्रोध, लोभ, मोह, जरा, मृत्यु, क्षुधा, तृषा, राग-द्वेष, हर्ष, शोक, इच्छा आदि विकारों की अग्नि में जीव जलते हैं, आत्मानन्द को नहीं प्राप्त होते और घटीयन्त्र की नाईं वासना के अनुसार भटकते हैं। जब वासना दृढ़ पाप की होती है, तब जीव पाषाण और वृक्षयोनि पाते हैं। जब क्षीण वासना तामसी होती है, तब तिर्यक् पक्षी, सर्प और कीटयोनि पाते
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६३६
है । हे राम ! राजसी वासना से जीव मनुष्य होते हैं । सात्त्विकी वासना से देवता होते हैं । पर जब मनुष्य शरीर रखकर निर्वासनिक होते हैं, तब मुक्ति पाते हैं । जब ज्ञान उत्पन्न होता है, तब जीवों के दुःख नष्ट हो जाते हैं । दुःख के नाश का और कोई उपाय नहीं है । ये जगत् के दुःख तब तक जान पड़ते हैं, जब तक आत्मज्ञान नहीं उपजा । जब आत्मज्ञान उपजता है, तब सब जगद्भ्रम मिट जाता है । मुझसे पूछो तो वास्तव में न कोई देवता है, न मनुष्य है, न पशु है, न पक्षी है, न पाषाण है, न वृक्ष है और न कीट है सब चिदाकाशरूप हैं, दूसरा कुछ नहीं बना, भ्रान्ति से नानास्वरूप भासित होते हैं । सर्वदाकाल सब प्रकार आत्मसत्ता अपने ही में स्थित है ।
हे राम ! न कुछ जगत् का होना है, न अनहोना है; न आत्मता शब्द है, न परमात्मता शब्द है, न मौन है, न अमौन है; न शून्य है, न अशून्य है; केवल अचेत चिन्मात्र अपने आपमें स्थित है । उसमें जन्म और जन्मान्तर भ्रम से भासित होते हैं । जैसे स्वप्न से स्वप्नान्तर भ्रम से भासित होता है । और जैसे स्वप्न में एक अपना रूप होता है निद्रादोष से द्वैत भासित होता है, वैसे ही अब भी आत्मा अद्वैत है; पर अविचार से नानात्व प्रतीत होता है । दुःख भी अज्ञान से होता है, विचार करने से दुःख कुछ नहीं । जो मृतक होकर उत्पन्न होता है, तो शान्ति हुई, दुःख कुछ नहीं, और जो मृतक होकर शान्त हो जाता है, उपजता नहीं, तो भी दुःख कोई नहीं, मुक्त हुआ । जो मरता नहीं तो भी ज्यों का त्यों हुआ, दुःख कोई नहीं हुआ । और जो सब चिदाकाश है तो भी दुःख की बात नहीं । हे राम ! अज्ञानी के निश्चय में दुःख है, पर विचार किये से दुःख कुछ नहीं । यह जगत् आत्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित है, परन्तु यह जगतरूपी कैसा प्रतिबिम्ब है, जो अकारणरूप है । इसका कारणरूप बिम्ब कोई नहीं । यह कारण से रहित है । जैसे नदी में जो नीलता का प्रतिबिम्ब पड़ता है, वह अकारणरूप है, वैसे ही यह जगत् अकारणरूप है । अज्ञानी को प्रमाद्दोष से उसमें सत्यता है और ज्ञानी को द्वैत नहीं भासित होता—अज्ञानी को द्वैत
६४०
योगवाशिष्ठ
भासित होता है। हे राम ! हमको तो सदा चिदाकाश प्रतीति होता है—हम जागे हैं, इसमें द्वैत नहीं भासित होता। जैसे सूर्य को अन्धकार नहीं दिखता, वैसे ही हमको द्वैत नहीं दिखता। जो ज्ञानी है, उसको ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं दिखता, उसे सर्वब्रह्म ही दिखता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थरूपवर्णनंनाम द्विशताधिकनवमसर्गः ॥ २०९ ॥
श्रीराम ने पूछा, हे भगवन् ! जो कुछ तुमने कहा सो तो मैंने जाना परन्तु अब प्रश्न यह है कि नास्तिकवादी का कल्याण किस प्रकार होता है, क्योंकि वे कहते हैं कि जब तक जीव है, तब तक सुख भोगे, जब मर जायगा तब भस्मीभूत होगा। न कहीं आना है, न जाना है।
वशिष्ठ बोले, हे राम ! अखण्ड आत्मसत्ता आकाश की नाईं सर्वत्र व्याप्त है। जब तक उसका भान नहीं होता, तब तक मन का ताप नहीं नष्ट होता। जब आत्मसत्ता का भान होता है, तब शान्ति प्राप्त होती है और मनुष्य अपने को अमर जानता है। जिस पुरुष ने अखण्ड निश्चय अङ्गीकार किया है, उसको दुःख नहीं स्पर्श करता। वह ब्रह्मदर्शी होता है। और जिसको ब्रह्मसत्ता का निश्चय नहीं हुआ, उसको मन के ताप नहीं छोड़ते। वह स्वरूप के प्रमाद से अपने को मरता जानता है पर महाप्रलयरूप आत्मा में सब शब्दों का अभाव है। जैसे महाप्रलय में सब शब्दों का अभाव होता है, वैसे ही आत्मा में सब शब्दों का अभाव है। जिसको आत्मा में निश्चय हुआ है, उसको सब शब्दों का अभाव हो जाता है, वह महाज्ञानवान् है। उसको आत्मसत्ता ही दिखती है। जो वास्तव है, उसको हमारे उपदेश की आवश्यकता नहीं—वह ज्ञानी है। हे राम ! आत्मसत्ता में द्वैत जगत् कुछ नहीं बना परमार्थसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। उसमें जो सृष्टि भासती है, वह स्वप्न सदृश अकारण है, इसलिए ज्ञानवान् पुरुष सब शब्द-अर्थों को सत् नहीं जानता ! ऐसे पुरुष को हमारे उपदेश की आवश्यकता नहीं, क्योंकि सब शास्त्रों का सिद्धान्त आत्मपद है, जो उसको जानता है, उसको फिर कुछ कर्तव्य नहीं रहता। जिसको ऐसी दशा नहीं हुई, वही उपदेश
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६४१
का अधिकारी है। यह जगत् आत्मा का किञ्चन है, अज्ञानी को सत्य जान पड़ता है और ज्ञानी के निश्चय में कुछ नहीं है। जैसे किसी ने संकल्प से एक वृक्ष रचा हो तो उसके पत्ते, टास, फूल, फल उसको दिखते हैं, पर और के मन में शून्य होते हैं, वैसे ही अज्ञानी के निश्चय में जगत् होता है, पर ज्ञानी के निश्चय में विलास और आत्मा से भिन्न कुछ नहीं।
हे राम ! आत्मसत्ता सर्वत्र और सर्वव्यापी है। उसमें जैसा निश्चय फुरना होता है वैसा ही अहंप्रत्यय भावना की दृढ़ता से भासित होता है। जिस पदार्थ का निरन्तर दृढ़ अभ्यास होता है, वह अभ्यास, शरीर-त्याग करने पर भी, धारणारूप हो जाता है। पर आत्मसत्ता ज्ञानमात्र है और केवल अद्वैतसंविद् सबका अपना रूप है। जिसको स्वरूप का ज्ञान होता है, वह शास्त्रों के दण्ड से रहित होता है। वेद और शास्त्र जिसको भला, बुरा, सच या झूठ वर्णन करते हैं, उसमें जिस पुरुष को निश्चय होता है, उसको वे वासना के अनुसार फल देते हैं। और जिसके निश्चय में आत्मा से भिन्न सब शब्दों का अभाव होता है, उसको आत्म अनात्म विभाग की कल्पना भी नहीं रहती, चाहे देह रहे अथवा न रहे। हे राम ! जिसकी संविद् जगत् के शब्द-अर्थ में बँधी हुई है, उसको पदार्थों में राग-द्वेष उपजता है। जैसे सुपुप्ति में भी आत्मसत्ता है, पर अभाव की तरह स्थित है, वैसे ही नास्तिकवादी भी अपने जड़स्वरूप को देखते हैं, क्योंकि उनको जड़शून्यता का ही अभ्यास है और उसी में उनकी संविद् दृश्य सुख से बँधी हुई है, इससे उनका जगद्भ्रम नहीं मिटता। उस मलिन वासना से उन्हें संविद् मिली है, इससे उनको जड़ पत्थररूप प्राप्त होते हैं। उस जड़ता को भोगकर वे वासना के अनुसार फिर दुःख भोगेंगे। उस भावना से जगत् नहीं भासता, पर वे कुछ काल पीछे चैतन्य होकर फिर उन्हीं कर्मों को भोगते हैं। जैसे सूर्य के आगे बादल आवे और फिर हट जाय, वैसे ही उनके लिए जगत् होता है। स्फुरणरूपी जो जीव है, उसमें जैसा निश्चय होता है, वैसा ही भासित होता है।
६४२ * योगवाशिष्ठ *
जिसको एक आत्मा में निश्चय होता है, वह जन्म-मरण आदि विकारों से रहित होता है, और जिसको नानात्वरूप जगत् में निश्चय होता है वह जन्म-मरण से नहीं छूटता ।
हे राम ! जिसकी बुद्धि में पदार्थों का रङ्ग चढ़ता है, वह रागद्वेष-रूपी नरक से मुक्त नहीं होता, और जिसको एक आत्मा का अभ्यास होता है, उसे अभ्यास के बल से सब जगत् आत्मतत्त्व भासित होता है, और वह राग-द्वेष से मुक्त होता है । जैसे स्वप्न में किसी को अपना जाग्रत्स्वरूप स्मरण आता है तो वह स्वप्न के सब जगत् को अपना देखता है, वैसे ही जिसको आत्मज्ञान होता है, उसको सब जगत् अपना रूप ही दिखता है । सर्वदा आत्मसत्ता अनुभवरूप जाग्रत् ज्योति है । जिसको ऐसी आत्मसत्ता में नास्ति की भावना होती है, वह कि गड्ढे में कीट होता है; पाषाण, वृक्ष, पर्वत आदि स्थावरयोनियों को प्राप्त होता है और उनमें चिरकाल तक रहता है । जबतक उसकी बुद्धि का द्वैत का संयोग होता है, तबतक वह जगद्भ्रम देखता है—और भ्रम नहीं मिटता । पर जब उसकी संवित् की द्वैत का संयोग मिट जाता है, तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है । हे राम ! सम्यक्ज्ञान से जगत् के भ्रम का अभाव हो जायगा । अभाव का निश्चय जगने पर फिर जगत् नहीं भासित होता । जब संसार के पदार्थों में संवित् बिंधी हुई है, तब जैसा निश्चय होगा, वैसा ही प्राप्त होगा और उसी निश्चय के अनुसार गति होगी । राम ने पूछा, हे भगवन् ! नास्तिकवादी का वृत्तान्त तो आपने कहा, सो मैंने जाना, पर जो पुरुष हृदय में जगत् को सत्य जानता है, आत्मबोध के मार्ग में दूर है और शुद्धस्वरूप को नहीं जानता, उसके मोक्ष की क्या युक्ति है और उसकी क्या अवस्था होती है यह मेरे बोध की दृढ़ता के निमित्त कहिए ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसका उत्तर मैंने प्रथम ही तुमसे कहा है पर अब फिर तुमने जो पूछा है इससे फिर कहता हूँ। पहले तो पुरुष का अर्थ सुनो । हे राम ! यह जगत् न नेत्रों में स्थित है, न श्रवण में है और न नासिका आदि इन्द्रियों में है—किन्तु चैतन्य संवित् में स्थित है । चैतन्य
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६४३
संवित् ही पुरुषरूप है। जिसको उसमें निश्चय है, वह ज्ञानवान् है और उसको द्वैतकलना नहीं फुरती। और जो प्रत्यक्ष दृष्टिगत भी होती है तो उसके निश्चय में नहीं होती है। जैसे आकाश में धूल दिखती है, परन्तु उमे स्पर्श नहीं करती, वैमे ही ज्ञानवान् को द्वैत-कलना स्पर्श नहीं करती। जिस चैतन्य संवित् में फुरने का सम्बन्ध है, उसको जगत् का आकार दिखता है, और जिस पुरुष की संवित् में देश, काल, क्रिया और द्रव्य का सम्बन्ध है, वह कलङ्क में दृढ़ हो रहा है। और जो अपने वास्तव अद्वैत स्वरूप के अभ्यास से मार्जन नहीं करता, वह वास्तव चैतन्य आकाशरूप होने पर भी कलङ्क में वासना के अनुसार जगत् उसे अपने से भिन्न लगता है—द्वैतभ्रम नहीं मिटता। हे राम ! जो पुरुष ऐसा है कि देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में सम रहना है, पर उसे आत्मसत्ता ज्यों की त्यों नहीं भामती, तो वह अज्ञानी है। आत्मसत्ता जाने बिना उनका संसार निवृत्त नहीं होता। जब आत्म-सत्ता का साक्षात्कार होगा, तभी सब भ्रम निवृत्त होगा। हे राम ! यह पुरुष न जीव है, न स्फुरण है और न शरीर का नाश होने से इसका नाश होता है। यह केवल चिन्मात्रस्वरूप है, पर वासना से भ्रम को देखता है। शून्यवादी लोग वृक्ष, पर्वत आदि जड़ योनि पाते हैं जो सदा अनुभव स्वरूप है, उसको त्यागकर जो और को इष्ट मानते हैं वे मूर्ख हैं और उनको आत्मसुख नहीं प्राप्त होता। आत्मा के प्रमाद से अहं, त्वं, भीतर, बाहर आदि शब्द भासित होते हैं। जब आत्मज्ञान हुआ, तब सब शब्द आत्मरूप हो जाते हैं। जिन पुरुषों ने आत्म-अनात्म को निर्णय करके नहीं देखा, वे पुरुषों में नीच हैं। जिस पुरुष ने निर्णय करके आत्मा में अहं-प्रतीति की है और अनात्म का त्याग किया है, वह महापुरुष है। उसे मेरा नमस्कार है। जिसने अनात्मा में अहंप्रतीति की है और आत्मा का त्याग किया है, वह बालक है। जैसे आकाश में बादल ही हाथी और घोड़े के आकार में दिखते हैं और समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैमे ही आत्मा में जगत् दिखता है। पर द्वैत कुछ नहीं है। जैसे स्वप्न के नगर अपने-अपने अनुभव में स्थित
६४४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
होते हैं, और बाहर द्वैत की नाईं भासते हैं सो वे आभासमात्र हैं, वैसे ही आत्मा में जो जगत् भासित होता है, वह आभासमात्र है—वास्तव में कुछ नहीं। जिसको आत्मसत्ता का अनुभव हुआ है, उसे जगत् के शब्द अर्थ और रागद्वेष किसी की कल्पना नहीं रहती। उसको पुण्य-पाप का फल स्पर्श नहीं करता।
हे राम! ज्ञानसंवित् का नाश कभी नहीं होता। इससे विश्व भी अनुभवरूप है। इस जगत् का निमित्तकारण और समवायिकारण कोई नहीं; क्योंकि वह अद्वैत है। और जो तुम कहो कि प्रत्यक्ष घटादिक समवाय और निमित्तकारण उपजते दीखते हैं, तो जैसे स्वप्न में कारण-कार्य अनहोते भी दिखते हैं, वैसे ही यह भी जानो। प्रथम तो स्वप्न में ये बने हुए दीखते हैं और पीछे कारण से होते दीखते हैं, वैसे ही यह भी जानो—केवल भ्रममात्र है। जैसे स्वप्नदृष्टि का जागने पर अभाव होता है, वैसे ही ज्ञान से इसका भी अभाव हो जाता है। यह दीर्घकाल का स्वप्न है, इससे जाग्रत् कहाता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने आप होती है और निद्रादोष से भिन्न दीखती है, वैसे ही यह जगत् अपना ही रूप है, परन्तु अज्ञान से भिन्न दीखता है। जाग्रत् में ज्ञान से सब अपना रूप भासित होता है, इससे राग-द्वेष का अभाव हो जाता है। जैसे चन्द्रमा और चन्द्रमा की चाँदनी में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं—आत्मा ही जगत्रूप होकर भासित होता है। हे राम! तुम अपने अनुभव में स्थित होकर देखो कि सब ब्रह्मरूप है, जगत् कुछ नहीं। वह सर्वात्मकरूप और साध्य है। जैसे शरत्काल का आकाश शुद्ध निर्मल होता है, वैसे ही आत्मसत्ता स्फुरणरूप। बादल से परमशुद्ध और शान्तरूप है और उसमें स्थित होने से मान और मोह का अभाव हो जाता है, किसी पदार्थ की तृष्णा नहीं रहती। जीव प्रारब्धगति से जो कुछ आकार प्राप्त होता है, उसको भोगता है। वह आत्मदृष्टि द्वारा दुःख से रहित होकर प्रत्यक्ष आचार करता है। उसको शास्त्र का दण्ड नहीं रहता। वह परम शान्तरूप विराजता है।
इति० नि० नास्तिकवादीनिराकरणंनामद्विशताधिकदशमस्सर्गः ॥२१०॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ <span style="float:right;">६४५</span>
वशिष्ठजी बोले, हे राम! मैं चिदाकाशरूप हूँ और द्रष्टा दर्शन दृश्य त्रिपुटी जो भासती है, वह भी चिदाकाशरूप है। आत्मसत्ता ही त्रिपुटीरूप होकर भासती है—दूसरी वस्तु कुछ नहीं। नास्तिकवादी जो यह कहते हैं कि परलोक कोई नहीं, अर्थात् जो कहते हैं कि आत्मसत्ता कोई नहीं, वे मूर्ख हैं। हे राम! जो अनुभव आत्मसत्ता न हो तो नास्तिक किसमे सिद्ध हो? जिसमे नास्तिकवाद भी सिद्ध होता है वही आत्मसत्ता है। जो इष्ट-अनिष्ट पदार्थ में राग-द्वेष करते हैं और आत्मा का नाश कहते हैं, वे महामूर्ख हैं। जैसे जाग्रत् के प्रमाद से स्वप्न में इष्ट-अनिष्ट में राग-द्वेष होता है, जीव इष्ट को ग्रहण करता और अनिष्ट को त्यागता है, जागने पर सब अपना ही स्वरूप दिखता है और ग्रहण-त्याग तथा रागद्वेष किसी पदार्थ में नहीं रहता, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से किसी पदार्थ में राग होता है और किसी में द्वेष होता है। जब आत्मज्ञान होता है, तब सब अपना ही स्वरूप दिखता है और किसी में राग-द्वेष नहीं रहता। चित्त के फुरने से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के शान्त होने पर लय हो जाता है, इससे जगत् मन में स्थित है; और वह मन आत्मा के अज्ञान से हुआ है। जब आत्मज्ञान होता है, तब मनुष्य, देवता, हाथी, नाग आदि सब स्थावर-जङ्गम जगत् आत्मरूप दिखता है और किसी में राग-द्वेष नहीं रहता। नास्तिकवादी जो नास्ति कहते हैं, वही अस्ति का साक्षी सिद्ध होता है। जिससे नास्ति भी सिद्ध होता है, वह अस्ति आत्मपद है। उस अस्ति अनुभव के इतने नाम शास्त्रकार कहते हैं—सत्, आत्मा, विष्णु, शिव, चिदाकाश, ब्रह्म, अहंब्रह्म और अस्ति। एक कहते हैं कि शून्य ही रहता है और एक कहते हैं कि अस्ति पद रहता है।
हे राम! ये सब संज्ञा आत्मसत्ता ही की हैं। वह आत्मसत्ता अपना ही आप स्वरूप है। वही आत्मा मैं हूँ। ये अङ्ग जो मेरे साथ दिखते हैं, इनको इष्ट पदार्थों से लेपन कीजिये अथवा चूर्ण करिये तो मुझे हर्ष या शोक कुछ नहीं होगा। इनके बढ़ने से मैं बढ़ता नहीं और इनके नष्ट होने से मैं नष्ट नहीं होता। हे राम! तीन शब्द होते हैं—'मैं जन्मा हूँ',
६४६ * योगवाशिष्ठ *
'मैं जीता हूँ' और 'मैं मरूँगा'। जो प्रथम न हो और उपजे उसको जन्म कहते हैं, मध्य में जीना कहते हैं और फिर नाश हो उसको मृतक कहते हैं। पर आत्मा में तीनों विकार नहीं हैं। आत्मा उपजा भी नहीं, क्योंकि आदि ही सिद्ध है। वह मृतक भी नहीं होता, क्योंकि अवि-नाशी है। चैतन्य आकाश सबका और काल का भी अधिष्ठान है, फिर उसका कैसे नाश हो? वह तो उदय-अस्त से रहित है। जिसमें देश, काल, वस्तु और जगत् का किञ्चन होता है, उसमें आत्मा का नाश कैसे हो? इससे आत्मा अविनाशी है। हे राम! जिस वस्तु को देश और काल का परिच्छेद होता है, उसका नाश भी होता है। ये देश, काल और वस्तु, तीनों आत्मा में कल्पित हैं। जैसे सूर्य की किरणों में जल कल्पित होता है, वैसे ही आत्मा में ये तीनों कल्पित हैं। कल्पित वस्तुओं से सत्य का नाश कैसे हो? इससे आत्मा अविनाशी और अद्वैत है, उसमें दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे शून्य स्थान में बैताल कल्पित होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् कल्पित है। उस अभावरूप जगत् में जीव प्रमाद से एक का अभाव और दूसरे का सद्भाव जानता है। जब इस निश्चय को त्यागकर मोक्ष हो, तब शान्ति प्राप्त होगी। विचार करके देखिये तो इस संसार में दुःख कहीं नहीं। जो मरकर फिर जन्म लेता है, तो भी दुःख न होना चाहिए; क्योंकि शरीर जब वृद्ध होकर शीर्ण हुआ, तब उसको त्यागकर नव तनु को ग्रहण किया तो उत्साह हुआ होना चाहिए। जो मृतक होकर फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द होना चाहिए, क्योंकि जब तक जीता था, तब तक ताप था। एक का भाव जानता था, एक को ग्रहण करता था और एक को त्याग करता था। इससे सन्तप्त होता था। उनसे यदि छूटा तो बड़े आनन्द की बात है। और जो सब चिदाकाशरूप है तो भी अपना रूप आनन्दरूप है; दुःख कुछ न हुआ।
हे राम! एक प्रमाद से ही दुःख होता है, और किसी प्रकार दुःख नहीं होता। यह सब जगत् आत्मरूप है, और जब आत्मरूप है तो दुःख कैसे हो? जो तुम कहो कि मैं अपने कर्मों से डरता हूँ, जो पर-
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ ६४७
लोक में मेरे लिए भय का कारण होंगे तो ऐसे जानो कि बुरे कर्म का दुःख-कष्ट यहाँ भी होना है और परलोक में भी होगा—इससे बुरे कर्म मत करो। मैं तुमसे ऐसा उपाय कहता हूँ, जिससे तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जायँगे। वह उपाय यह है कि तुम जानो 'मैं नहीं'; अथवा ऐसे जानो कि 'सब मैं ही हूँ'। सब वासनाएँ त्यागकर अपने को अविनाशी जानो और आत्मसत्ता में स्थित होओ। यह सब जगत् भी तुम्हारा ही रूप है। जब ऐसे आत्मा को जानोगे, तब शरीर के त्याग से भी कोई दुःख न रहेगा और शरीर के होते भी दुःख न होगा। यदि पूर्व शरीर को त्यागकर नया जन्म लिया तो भी आनन्द हुआ, परम शान्ति हुई। और जो चिदाकाशरूप है तो भी परम आनन्द हुआ। हे राम! सब प्रकार आनन्द है। केवल भ्रान्ति से दुःख होता है। जब स्वरूप का साक्षात्कार होगा, तब सब जगत् ब्रह्मानन्दस्वरूप प्रतीत होगा। हे राम! जिसको आत्मसत्ता का प्रकाश प्राप्त है, वह पुरुष सदा आनन्द में मग्न रहता है। वह प्राकृत आचार भी करता है, परन्तु इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में स्वरूप से चलायमान कभी नहीं होता। जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में चलायमान नहीं होता और परम गम्भीर रहता है। अतएव जो कुछ आत्मा से भिन्न उत्थान होता है, उसको त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित हो जाओ, क्योंकि चिन्मात्रसत्ता शरत्काल के आकाश सदृश निर्मल है। जब ऐसे स्वच्छ केवल और चिन्मात्र का अनुभव होगा, तब जगत् द्वैतरूप न भासेगा और व्यवहार में भी द्वैत न फुरेगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमउपदेशवर्णनं नाम द्विशताधिकैकादशस्सर्गः ॥ २११ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! जिन पुरुषों को आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार हुआ है, वे कैसे हो जाते हैं और उनका कैसा आचार होता है, यह मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे उनकी चेष्टा और जैसा उनका निश्चय होता है, सो सुनो। उनका सबके साथ मित्रभाव होता है, बल्कि पाषाण से भी मित्रता होती है। बन्धुओं को
६४८ = * योगवाशिष्ठ *
वे ऐसे जानते हैं, जैसे वन के वृक्ष और पत्ते होते हैं, और स्त्री-पुत्रादि के साथ वे वन के मृग के पुत्र से होते हैं। जैसे जंगली मृगों का मन्न में स्नेह नहीं होता, वैसे ही वे पुत्रादिक में भी स्नेह नहीं करते। जैसे माता का पुत्र पर दया और ममता होती है, वैसे ही वे सब पर दया करते हैं, और निश्चय में उदासीन रहते हैं। जैसे आकाश किसी से स्पर्श नहीं करता, वैसे ही वे किसी में लिप्त नहीं होते। आपदा उनको परमसुख होती है। जितने जगत में रस हैं, वे उनको विरस हो जाते हैं। वे न किसी में राग करते हैं और न किसी में द्वेष। वे तृष्णा करते भी दिखते हैं, परन्तु हृदय में जड़ और पत्थर की नाईं होते हैं। व्यवहार करते भी हैं, परन्तु निश्चय में परमशून्य और मौन होते हैं; अर्थात् सदा समाधि में स्थित रहते हैं। वे सब कर्म करते दिखते हैं, सो इस प्रकार करते हैं कि सब उनकी स्तुति करते हैं। वे यत्न से रहित सब कर्मों का आरम्भ करते हैं, परन्तु निश्चय में सदा अपने को अकर्ता मानते हैं। जो कुछ उन्हें प्रारब्ध गति से प्राप्त होता है, उसे भोगते हैं और देश काल-कर्म, सबको अङ्गीकार करते हैं। जो परलोकादि अनिष्ट आगत प्राप्त होते हैं उनका त्याग भी करते हैं, परन्तु निश्चय में सदा अकर्ता ज्यों के त्यों रहते हैं। वे सुख-दुःख की प्राप्ति में समबुद्धि रहते हैं। प्राकृत आचार यथाशास्त्र करते हैं, परन्तु स्वरूप से कभी विचलित नहीं होते। जैसे फूल की चोट से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता, वैसे ही दुख सुख की प्राप्ति में नहीं डिगते। वे सदा स्वभाव में स्थित रहते हैं और सुख-दुःख को भोगते भी दिखते हैं, पर उनके निश्चय में कुछ नहीं होता।
जैसे स्फटिकमणि के सम्मुख कोई रङ्ग रखिये तो उसमें झलकता है परन्तु उसका रूप कुछ और नहीं हो जाता, वह ज्यों का त्यों ही रहती है, वैसे ही सुख-दुःख के भोग ज्ञानवान् में भी दिखते हैं, परन्तु वे स्वरूप से कभी चलायमान नहीं होते। चेष्टा वे अज्ञानी की नाईं करते हैं, परन्तु निश्चय से परमसमाधिस्थ हैं। जैसे अज्ञानी को भविष्यत् का राग-द्वेष या सुख-दुःख कुछ नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी को वर्तमान का राग-द्वेष
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६४६
नहीं होता । उनकी स्वाभाविक चेष्टा ऐसी होती है—वह सबसे मित्र-भाव रखता है । न उससे कोई खिन्न होता है और न वह किसी से खिन्न होता है । जब उसे सुख प्राप्त होता है, तब वह रागवान् दिखता है और दुःख की प्राप्ति में द्वेषी दिखता है; परन्तु निश्चय से उसको हर्ष-शोक कुछ नहीं । जैसे नट स्वाँग लाता है और जैसा स्वाँग होता है, वैसी ही चेष्टा करता है—राजा का स्वाँग हो अथवा दरिद्री का, परन्तु निश्चय उसे अपने स्वरूप में ही होता है, वैसे ही ज्ञानवान् में सुख-दुःख दिखते हैं, परन्तु निश्चय उसका आत्मस्वरूप में ही होता है । वह पुत्र, धन, बान्धव आदि को बुलबुले की नाईं जानता है । जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं और फिर लीन भी हो जाते हैं, परन्तु जल को कुछ राग द्वेष नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष कुछ नहीं होता । वह सब पर दया रखता है और पतित-प्रवाह में जो सुख-दुःख आकर प्राप्त होता है, उसको भोगता है । जैसे वायु दुर्गन्ध-सुगन्ध को साथ ले जाती है, परन्तु उसको उससे रागद्वेष कुछ नहीं होता, वैसे ही ज्ञानवान् को रागद्वेष नहीं होता । वह बाहर अज्ञानी की नाईं व्यवहार करता है, परन्तु निश्चय में जगत् को भ्रान्तिमात्र जानता अथवा 'सबब्रह्म' जानता है । वह सदा स्वभाव में स्थित रहता है और अनिच्छित प्रारब्ध को भोगता है, परन्तु जाग्रत् में सुषुप्ति की नाईं स्थित रहता है, भूत और भविष्य की चिन्ता नहीं करता और वर्तमान में विचरता है—वह हृदय से शीतल रहता है और बाहर इष्ट-अनिष्ट दिखते हैं । पर हृदय से वह अद्वैतरूप है । ज्ञानवान् कर्म करता है परन्तु कर्म में अकर्म को जानता है और जीना ही मृतक की नाईं है । हे राम ! जैसे मृतक होता और उसको फिर जगत् की कलना नहीं फुरती, वैसे ही जिसको आत्मपद में अहंप्रत्यय हुआ है, उसको द्वैत नहीं भासता । प्रत्यक्ष व्यवहार उसमें दिखता भी है, परन्तु निश्चय में अर्थ शान्त हो गया है ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! ये ज्ञानी के जो लक्षण आपने कहे सो उनको वही जानें और कोई नहीं जानता; क्योंकि बाहर की चेष्टा तो
६५० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
अज्ञानी के तुल्य ही है, पर हृदय मे वे शान्तरूप हैं। ब्रह्मचर्य से भी हृदय में धैर्य होता है और तपस्या से भी राग-द्वेष कुछ नहीं फुरता एक मिथ्या तपस्वी है, जो वैसे ही बन बैठते हैं। उनका निश्चय सत्य है अथवा असत्य, वे असल हैं या नकली, यह कैसे जानिये ? वशिष्ठ बोले, हे राम ! यह निश्चय सत्य हो अथवा असत्य, ये लक्षण सन्त के ही हैं। आत्मा के साक्षात्कार का निश्चय मनुष्य अपने आपसे जानता है और किसी से नहीं जाना जाता, इस कारण उसका लक्षण ज्ञानी ही जानता है और कोई नहीं जानता। जैसे सर्प के खोज को सर्प ही जानता है और कोई नहीं जानता, वैसे ही ज्ञानी का लक्षण स्वसंवेद्य है। हे राम ! ये जो गुण कहे हैं, सो ज्ञानवान् में स्वाभाविक ही रहते हैं, दूसरे को यत्नसाध्य हैं। ज्ञानवान् को सब जगत् भ्रान्तिमात्र है अथवा अनुभवदृष्टि से अपना रूप ही दिखता है, इसी कारण ज्ञानी परमशान्त है और उसके निश्चय में राग-द्वेष नहीं फुरता। वह अपने निश्चय को बाहर नहीं प्रकट करता, पर जो अधिकारी है, वह उसको जानता है। जो अनधिकारी अज्ञानी है, वह उसको नहीं जान सकता। जैसे वन में चन्दन की बड़ी सुगन्ध होती है, परन्तु दूर से नहीं जान पड़ती, वैसे ही अज्ञानी उसके निश्चय से दूर है, इस कारण वह नहीं जान सकता। चर्मदृष्टि से उसको देखे तो नहीं देख सकता और वह अधिकारी बिना जनाता भी नहीं। जैसे अमूल्य चिन्तामणि नीच को दीजिये तो भी वह उसके माहात्म्य को नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है, वैसे ही आत्मरूपी चिन्तामणि है, अनधिकारी अज्ञानी उसका माहात्म्य नहीं जानता, इससे उसका निरादर करता है—इसी कारण ज्ञानवान् उसे प्रकट नहीं करते।
हे राम ! यह जो प्रकट है कि हमको अर्थ की प्राप्ति होगी, हमारा मान होगा, हमारे चेले बनेंगे और हमारी पूजा होगी, उसे ज्ञानवान् गन्धर्वनगर और इन्द्रजाल की नाईं जानते हैं। फिर वे किसकी चाह करें ? इस कारण वे अनधिकारी को अपना इष्ट नहीं प्रकट करते, और जो कोई उनके निकट बैठता है तो भी अपने निश्चयरूपी अङ्ग को वे
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६५१
सकुचा लेते हैं। जैसे कछुआ अपने अङ्गों को समेट लेता है, वैसे ही वे अपने निश्चयरूपी अङ्ग को समेट लेते हैं, पर जिसको अधिकारी देखते हैं, उसके आगे प्रकट करते हैं। हे राम! पात्र में रक्खा पदार्थ शोभा पाता है, अपात्र में रक्खा अशोभन हो जाता है। जैसे गौ को घास देने से वह दूध हो जाती है और सर्प को दूध देने से वह विष हो जाता है, वैसे ही अधिकारी को दिया उपदेश शुभ होता है और अनधिकारी को अनिष्ट हो जाता है। हे राम! अणिमा आदि जो सिद्धियाँ हैं, वे जप, द्रव्य, काल अथवा देश से सबको प्राप्त होती हैं—अभ्यास के बल से अज्ञानी को भी प्राप्त होती हैं—और ज्ञानी को तो होती ही हैं, परन्तु ये ज्ञान का फल नहीं, जप आदिक का फल हैं। जिसकी सिद्धि के लिए जो पुरुष दृढ़ होकर लगता है, वही सिद्ध होता है। जो इन सिद्धियों का दृढ़ अभ्यास करता है तो उनसे आकाश-मार्ग में उड़ने और आने-जाने लगता है। पर ये पदार्थ तबतक अच्छे लगते हैं, जब तक आत्ममार्ग नहीं सूझता।
हे राम! परम सिद्धता इनसे नहीं प्राप्त होती। परमसिद्धि आत्मपद है। जिसको आत्मपद की प्राप्ति हुई है, वह इन सिद्धियों की अभिलाष नहीं करता। ऐसा पदार्थ पृथ्वी में कोई नहीं और न आकाश में देवताओं के स्थानों में ही है, जिसमें ज्ञानी का चित्त मोहित हो। ज्ञानवान् को सब पदार्थ मृगतृष्णा के जल से लगते हैं। मेरा सिद्धान्त तो यही है कि सदा विषयों से उपरत रहना और आत्मा को परम इष्ट जानना ही ज्ञान है। ज्ञानी को जो प्रारब्ध से प्राप्त हो, उसको वह करता है, परन्तु करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ प्रत्यवाय भी नहीं होता। न किसी अर्थ का वह आश्रय करता है, न उसके निमित्त किसी भूत का आश्रय करता है, और सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित होता है। ऐसे निश्चय को पाकर उसे आश्चर्य होता है। वह कहता है कि बड़ा आश्चर्य है, जो सदा अपना स्वरूप है उसको भूल कर मैं इतने काल तक भरमता रहा? पर अब मुझको शान्ति प्राप्त हुई है। जगत् को देखकर वह हँसता है, क्योंकि यह जगत् आभासरूप
६५२ योगवाशिष्ठ
है और अपनी ही संवित् में स्थित है । जैसे आरसी में प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही अपनी संवित् में जगत् स्थित है । उसको जो द्वैत जानता है और राग-द्वेष में जलता है, ऐसे अज्ञानी को देखकर ज्ञानी हँसता है और व्यवहार करता भी हँसता है । जैसे किमी ने स्वप्न में हाथ सुवर्ण दिया और फिर ले लिया और इसने उसको स्वप्न जाना तो रोदन करता है, परन्तु हँसता है और कहता है कि यह मेरा ही स्वरूप है । वैसे ही ज्ञानी व्यवहार करता भी अपने निश्चय में हँसता है । जैसे किमी ग्राम में अग्नि लगे और एक पुरुष उस गाँव से निकलकर पर्वत पर जा बैठे, तब वह जलतों को देखकर हँसता है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष भी संसाररूपी जलते नगर से निकलकर आत्मरूपी पर्वत पर जा बैठता है और अज्ञानियों को जलता देखकर हँसता है, अर्थात् आप अशोक होकर उनको सशोक देखता है ।
हे राम ! जब ज्ञानवान् बोधदृष्टि से देखता है, तब अद्वैतसत्ता दिखती है, और जब अन्तवाहक में स्थित होकर देखता है, तब जैसे पदार्थ होते हैं, वैसा ही उनको देखता है और अपने को सदा शान्तरूप देखता है । मतलब यह कि जो आत्मतत्त्व परमानन्दस्वरूप है, उसमें भिन्न जितने पदार्थ हैं वे सब दोषरूप हैं और सिद्धि आदि जितनी क्रिया हैं, वे संसार का कारण हैं । जैसे समुद्र में कई तरङ्ग बड़े और कई छोटे
✻ निर्वाण प्रकरण ✻
६५३
और परमदया की खान होता है। जैसे मेघ समुद्र से जल लेकर वर्षा करते हैं, सो उस जल का स्थान समुद्र ही होता है, तैसे ही जितने लोग दयालु दिखते हैं, वे ज्ञान के प्रसाद से ही दया करते हैं। दया का स्थान ज्ञानवान् ही है। ज्ञानवान् सबका हृदय है। जो कुछ प्रवाहपतित कार्य आकर प्राप्त होता है, उसे वह करता है, और जो शरीर को दुःख आकर प्राप्त होता है, उसे ऐसे देखता है, जैसे अन्य के शरीर को हो रहा हो। अपने में वह सुख-दुःख, दोनों का अभाव देखता है।
जिनको यह अभ्यास नहीं हुआ, वे शरीर के राग-द्वेष से संतप्त होते हैं। ज्ञानी को शान्ति युक्त देखकर औरों को भी प्रसन्नता हो आती है। जैसे पुण्य करके जो स्वर्ग को गया है, उसे वहाँ इष्ट पदार्थ दिखते हैं, कल्पवृक्ष की सुन्दर मञ्जरियाँ और सुन्दर अप्सरा आदि दिखती हैं, जिन पदार्थों को देखकर प्रसन्नता उपजती है, वैसे ही ज्ञानवान् की संगति जो पुरुष करता है, उसे प्रसन्नता प्राप्त होती है, जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा शीतल करता है, वैसे ही ज्ञानवान् की संगति शीतलता उपजाती है। ज्ञानवान् आत्मपद को पाकर आनन्दित होता है और वह आनन्द कभी दूर नहीं होता, क्योंकि उसको उस आनन्द के आगे अष्टसिद्धियाँ तृण समान लगती हैं। हे राम! ऐसे पुरुषों को आचार और जिन स्थानों में वे रहते हैं, वह भी सुनो। कई तो एकान्त में जा बैठते हैं, कई शुभ स्थानों में रहते हैं, कई गृहस्थी ही में रहते हैं, कई अवधूत होकर सबको दुर्वचन कहते हैं, कई तपस्या करते हैं, कई परम ध्यान लगाकर बैठते हैं, कई नंगे फिरते हैं, कई बैठे राज्य करते हैं, कई पण्डित होकर उपदेश करते हैं, कई परम मौन धारे हैं, कई पहाड़ की कन्दराओं में जा बैठते हैं, कई ब्राह्मण हैं, कई संन्यासी हैं, कई अज्ञानी की नाईं विचरते हैं, कई नीच पामर होते हैं, कई आकाश में उड़ते हैं और नाना प्रकार की क्रिया करते दिखते हैं, परन्तु सदा अपने स्वरूप में स्थित हैं।
हे राम! देह और इन्द्रियाँ पुरुष नहीं और अन्तःकरण चतुष्टय भी
६५४ ✵ योगवाशिष्ठ ✵
पुरुष नहीं, पुरुष केवल चिदाकाशरूप है। वह न कुछ करता है और न किसी से उसका नाश होता है। जैसे नट स्वाँग भरता और मचेष्टा करता है, परन्तु नटभाव में अपने को असंग देखता है, वैसे ही ज्ञानवान् व्यवहार भी करते हैं, परन्तु अपने को अकर्ता और असंग देखते हैं। वे ऐसा निश्चय रखते हैं कि हम अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य, सर्वगत, स्थिर, अचल और सनातन हैं। हे राम! इस प्रकार जिसको आत्मा में अहं प्रतीति हुई है, उसका नाश कैसे हो और वह बन्धन में कैसे पड़े? वह पुरुष चाहे जैसे आरम्भ करे और चाहे जैसे स्थान में रहे, उसको बन्धन नहीं होता। चाहे वह पाताल में चला जाय, आकाश में उड़ता फिरे अथवा देशान्तर में घूमता फिरे उसको न कुछ अधिक है और न कुछ न्यून है। पहाड़ में चूर्ण हो जाय तो भी वह चूर्ण नहीं होता। यह तो चैतन्य पुरुष है। शरीर का नाश होने से उसका नाश कैसे हो? ऐसे अपने स्वरूप में वह सदा स्थित है और आकाश सदृश परम निर्मल, अजर, अमर और शिवपद है। इससे हे राम! ऐसे जानकर तुम भी अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे द्विशताधिक द्वादशसर्गः ॥२१२॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक भावमात्र, दूसरा भाममात्र और तीसरा भामितमात्र है। भावमात्र केवल चैतन्यमात्र को कहते हैं। उसमें जो चेत्योन्मुखता अहंकार का उत्थान हुआ, उसका नाम भाम है, और उसमें जो जगत् हुआ, उसका नाम भामित है। भामित कल्पित का नाम है। कल्पित के नाश से अधिष्ठान का नाश नहीं होता। जो अधिष्ठान कुछ और भाव हो तो उसका नाश भी हो। वह तो और कुछ बना नहीं। उसके फुरने से तीन संज्ञा हुई हैं; अतएव फुरना भी उर्मी का किञ्चन है। आत्मा फुरने या न फुरने में ज्यों का त्यों है। जैसे स्पन्दन और निस्पन्द वायु एक ही है, वैसे ही बोध और अबोध में आत्मा एक ही है। बोध, अबोध, फुरना न फुरना एक रूप है। हे राम! उस आत्मा का किसमें और कैसे नाश हो? चैतन्य भी मरता हो तो इसका किञ्चन जगत् कैसे रहे? किञ्चन आभास को कहते हैं, वह
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६५५
आभास अधिष्ठान के बिना नहीं होता, इससे आत्मा का नाश नहीं होता। और तुम जो चैतन्य को भी मरता मानो कि मरकर फिर नहीं उपजता तो भी आनन्द की बात है। मेरा भी यही उपदेश है कि चेतनता मिटे। जब चेतनता उपजती है, तब जगत् भासित होता है। उसके मिटने पर आत्मा ही शेष रहेगा। ब्रह्म चैतन्य का तो नाश नहीं होता। जो तुम कहो कि वह चैतन्य नष्ट हो जाता है—यह और चैतन्य है, जिससे जगत् होता है, तो हे राम! अनुभव तो एक ही है, उसका नाश कैसे मानिये? जैसे बरफ शीतल है, चाहे किसी ठौर पान कीजिये वह सबको शीतल ही है, और अग्नि उष्ण ही है, चाहे जिस जगह से स्पर्श कीजिये, उष्ण ही अनुभव होता है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। वह एक अखण्डरूप है, जहाँ कोई पदार्थ दिखता है, उसी चेतनता में प्रकाशित होता है। वह चैतन्यसत्ता स्वच्छ, निर्मल और अद्वैत तथा सदा अपने आप में स्थित है; उसका नाश कैसे हो?
जो तुम शरीर के नाश से आत्मा का नाश होता मानो तो ठीक नहीं, क्योंकि शरीर यहाँ अखण्ड पड़ा है और वह परलोक में चेष्टा करता है। और पिशाच आदि का शरीर भी नहीं देख पड़ता। जो शरीर के बिना उसका अभाव होता हो तो उनका भी अभाव हो जाता। इससे शरीर का अभाव होने पर आत्मा का अभाव नहीं होता, क्योंकि शरीर के निर्जीव होने पर शरीर से कुछ चेष्टा नहीं होती, क्योंकि जीवकला में पुर्यष्टका नहीं है। शरीर तो अखण्ड पड़ा है, उसमें कुछ नहीं होता और जीव परलोक में सुख-दुःख भोगता है, तो शरीर का नाश होने पर उसका नाश नहीं हुआ। जो तुम कहो कि सब स्वभाव उसमें रहता है तो सर्वदा उसको क्यों नहीं देखते? उसी समय अपने को क्यों मृतक देखते हैं और बन्ध बान्धव भाई, सब उसी समय क्यों मृतक जानते हैं। जो तुम कहो कि जीवित धर्म से वेष्टित है, इसी से सब अवस्था का अनुभव नहीं करता, मृत्यु समय जब जीवत्व नष्ट हो जाता है तब मृतक होता है। तो जो ऐसा हो तो परलोक का अनुभव न
६५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
करे । पर ऐसा तो नहीं है, क्योंकि जब शरीरपात होता है, तब स- अवस्था को भी जानता है और परलोक में जो शब्द होता है, उम अनुभव करता है, अपने कर्म के अनुसार सुख दुःख भोगता है और देश स्थान को प्राप्त होता है । यह बात शास्त्र में भी सिद्ध है और अ- भव से भी प्रसिद्ध है कि मृतक को किमी ने नहीं जाना और अभ को किमी ने नहीं जाना । और जिसने जाना, वह आत्मा एक अक्षर है—इससे हे राम ! शरीर के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध है और जैसा निश्चय उसमें होता है, वैसा ही होकर भासित होता है और जैसा मिलता है, वैसा ही प्रकाशता है । ऐसा जो सत्य आत्मा है, वह किमी में नहीं बँधता जैसे रस्सी में सर्प का आकार भासित होता है, पर वह रस्सी सर्प तो नहीं हो जाती; जो कल्पित सर्प का अभाव हो जाता है, तब रस्सी ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मसत्ता आकार होकर भासित होती है, परन्तु आकार तो नहीं होती, जब आकार का अभाव हो जाता है, तब आत्मसत्ता ज्यों की त्यों रहती है, इसी कारण उसे बन्धन नहीं होता । ऐसी आत्म- सत्ता में जो विकार दिखते हैं, वे भ्रममात्र हैं और भ्रान्ति से ही लोग दुःख पाते हैं ।
हे राम ! यह जगत् आभासमात्र है, और उस आभासमात्र में जो राग-द्वेष आदि फुरते हैं, उनकी निवृत्ति का उपाय मैं तुमसे कहता हूँ, जो कुछ उपदेश मैंने किया है, उसके विचारने से भ्रान्ति निवृत्त हो जायगी और आत्मपद की प्राप्ति होगी । अभ्यास के बिना जीव जो आत्मपद की प्राप्ति चाहे तो कभी न होगी । जब बारम्बार अभ्यास करेगा, तब द्वैतभ्रम मिट जायगा और आत्मपद प्राप्त होगा । जिसका कोई नित्य अभ्यास करता है और यत्न भी करता है, वह प्राप्त होता है । वह कौन पदार्थ है, जो अभ्यास से प्राप्त न हो ? जो थककर फिरे नहीं और दृढ अभ्यास करे तो प्राप्त होता ही है । राज्य की लक्ष्मी तब प्राप्त होती है, जब रण में दृढ होकर युद्ध करते हैं और जय होती है । यदि केवल मुख से कहे कि मेरी जय हो तो नहीं होती । वैसे ही