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भारतकोश
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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

१४६ * योगवाशिष्ठ *

आत्मा में स्थित देखोगे । जब सर्वत्र तुमको समबुद्धि होगी, तब स्व- रूप में तुम्हारी दृढ़ स्थिति होगी । हे अर्जुन ! जो सब प्राणियों में स्थित आत्मा को देखता है, एकत्वभाव से मनन करता है और जिसमें आत्मा से भिन्न और भावना नहीं उठती, वह सब कर्म करके भी फिर जन्म-मरण नहीं पाता । हे अर्जुन ! जिसमें सब शब्दों का अर्थ है और जो सब शब्दों से अनर्थरूप है, ऐसी आत्मसत्ता न सत है और न असत । सत-असत से रहित जो सत्ता है, वह आत्मसत्ता है । वह सब लोगों के चित्त में प्रकाशरूप में स्थित है ।

हे भारत ! जैसे दूध में घृत और जल में रस स्थित होता है; वैसे ही मैं सब लोगों के हृदय में तत्त्वरूप में स्थित हूँ । जैसे दूध में घृत स्थित है, वैसे ही सब पदार्थों के भीतर में आत्मा स्थित हूँ । जैसे रत्नों के भीतर- बाहर प्रकाश होता है, वैसे ही मैं सब पदार्थों के भीतर-बाहर स्थित हूँ । जैसे अनेक घटों के भीतर-बाहर एक ही आकाश स्थित है, वैसे ही मैं अनेक देहों के भीतर-बाहर अव्यक्तरूप स्थित हूँ । हे अर्जुन ! ब्रह्मा से लेकर तृण-पर्यन्त सब पदार्थों में मैं समान सत्ता में स्थित नित्य और अजन्मा हूँ, मुझसे जो विश्वारम्भ हुआ है, वह ब्रह्मसत्ता की तक हुआ है और फुरने से जगत् रूप ही भासित होता है, पर आत्मतत्त्व अपने आपमें स्थित है, द्वैत कुछ नहीं है । हे अर्जुन ! आत्मा सबका साक्षीरूप है—उसको जगत् का सुख-दुःख स्पर्श नहीं करता । जैसे दर्पण प्रति- बिम्ब को ग्रहण करता है, परन्तु सबमें संग है और किसी से भिन्न नहीं होता, वैसे ही सब पदार्थों तथा अवस्थाओं का साक्षी आत्मा है; परन्तु किसी को स्पर्श नहीं करता, और शरीर के नाश से उसका नाश नहीं होता । जो ऐसा देखता है, वही यथार्थ देखता है ।

हे अर्जुन ! पृथ्वी में गन्ध, जल में रस, पवन में स्पर्श और स्पन्दन शक्ति में ही हूँ । अग्नि में प्रकाश और आकाश में शब्दशक्ति में ही हूँ । तुमसे क्या कहूँ कि यह में हूँ । सर्वरूप सबका आत्मा में हूँ— मुझसे कुछ भिन्न नहीं । हे पाण्डव ! यह जो सृष्टि प्रवृत्त है, उत्पन्न और प्रलय होती देख पड़ती है । सो मुझमें ऐसे है, जैसे समुद्र में तरङ्ग

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ १४७

उपजते और लीन होते हैं। जैसे पहाड़ पत्थररूप हैं; वृक्ष काष्ठरूप हैं और तरङ्ग जलरूप हैं, वैसे ही सब पदार्थों में मैं आत्मारूप हूँ। जो सब भूतों को आत्मा में देखता है, वह आत्मा को अकर्ता देखता है। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग और सुवर्ण में भूषण दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में नाना आकार भासित होते हैं। हे अर्जुन ! ये नाना प्रकार के पदार्थ ब्रह्मरूप हैं—ब्रह्म से भिन्न नहीं। तब और क्या कहिए; भाव-विकार क्या कहिये और जगत् द्वैत क्या कहिए ? जो सब वही है तो वृथा मोहित क्यों होते हो ? इस प्रकार सुनकर बुद्धिमान् इस लोक में समरस विचरते हैं। हे अर्जुन ! उस पद को तुम क्यों नहीं प्राप्त होते ? जो पुरुष निर्वाण और निर्मोह हुए हैं और जिनकी सब अभिलाषाएँ निवृत्त हुई हैं, वे अक्षयपद को प्राप्त हुए हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे अर्जुनोपदेशो नाम द्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥

श्रीभगवान बोले, हे महाबाहो ! फिर मेरे श्रेष्ठ वचन सुनो; मैं तुम्हारी प्रसन्नता के निमित्त कहता हूँ, क्योंकि तुम्हारा हितकारी हूँ। ये जो शीतोष्ण विषय हैं सो इन्द्रियों से भोग्य हैं और आगमापायी अर्थात् आते हैं और फिर निवृत्त हो जाते हैं, इससे अनित्य हैं, इनको सहो, ये आत्मा को स्पर्श नहीं करते। तुम तो आदि-अन्त-मध्य में पूर्ण, निराकार, अखण्ड और व्यापक एक आत्मा हो। तुमको शीत, उष्ण, सुख, दुःख खण्डित नहीं कर सकते। ये कल्पना से रचे हुए हैं। जैसे सुवर्ण में भूषण का निवास है, वैसे ही आत्मा में इनका निवास असत् है। हे भारत ! जिनको इन्द्रियों के भ्रमरूप भोग और स्पर्श चलायमान नहीं कर सकते और सुख-दुःख सम है, उसी पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे अर्जुन ! आत्मा नित्य, शुद्ध और सर्वरूप है और इन्द्रियों के स्पर्श असतरूप हैं। इसलिए असत् पदार्थ सत् आत्मा को मोहित नहीं कर सकते। ये अल्पमात्र तुच्छ हैं और बोधरूप आत्म-तत्त्व सर्वगत शुद्धरूप है; उसको इनका स्पर्श कैसे हो—सत् को असत् स्पर्श नहीं कर सकता। जैसे रस्सी में सर्प का जो अभास होता है, वह

१४८ * योगवाशिष्ठ *

रस्सी को स्पर्श नहीं कर सकता, जैसे चित्र की अग्नि कागज को जला नहीं सकती और जैसे स्वप्न के सांप जाग्रत् पुरुष को स्पर्श नहीं कर सकते, वैसे ही इन्द्रियाँ और उनके विषय आत्मा को स्पर्श नहीं कर सकते।

हे अर्जुन ! जो सत् है वह असत् नहीं होता और जो असत् है वह सत् नहीं होता। सुख-दुःखादिक असतरूप हैं और परमात्मा सतरूप है। जगत् की सत् वस्तुएँ घटादिक और आकाश की असत् फलादिक त्यागने से जो निष्किञ्चन महासत् पद शेष रहे, उसमें स्थित हो। हे अर्जुन ! ज्ञानवान् पुरुष इष्ट अनिष्ट में चलायमान नहीं होता। वह इष्ट (सुख) में हर्षित और अनिष्ट (दुःख) में शोकातुर नहीं होता। चैतन्य पाषाण सदृश शरीर में स्थित होता है। हे माधो ! यह चित्त भी जड़ है और देह इन्द्रियादिक भी जड़ हैं। आत्मा चेतन है। अपने को इनके साथ मिला हुआ देह क्यों देखना ? चित्त और देह भी आपस में भिन्न-भिन्न हैं। देह के नष्ट होने पर चित्त नहीं नष्ट होता और चित्त के नष्ट होने पर देह नहीं नष्ट होता। इनके नष्ट होने पर जो अपने को नष्ट हुआ मानता है और इनके सुखदुःख में सुखी-दुःखी होता है, वह महामूर्ख है। हे अर्जुन ! स्वरूप के प्रमाद से जो देहादिक में अहंप्रतीति करता है और अपने को भोक्ता मानता है, वह निर्बुद्धि है। जब आत्मा का बोध होता है, तब अपने को अकर्ता, अभोक्ता और अद्वैत देखता है। जैसे रस्सी के अज्ञान में सर्प देख पड़ता है और रस्सी के बोध से सर्प का अभाव होता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान में देह और इन्द्रियों के सुखदुःख प्रतीत होते हैं और आत्मज्ञान से सुख-दुःख का अभाव हो जाता है।

हे अर्जुन ! यह विश्व एक अज ब्रह्मस्वरूप है। न कोई जन्मता है और न मरता है—यह सत् उपदेश है। हे अर्जुन ! ब्रह्मरूपी समुद्र में तुम एक तरङ्ग उठे हो और कुछ काल रहकर फिर ऊर्मि में लीन हो जाओगे—इसमें तुम्हारा स्वरूप निरामय ब्रह्म है। सब जगत् ब्रह्म का स्पन्दन है और समय पाकर देख पड़ता है। इसमें मान, मद, शोक और सुख, दुःख सब असतरूप है। तुम शान्ति होकर रहो। हे अर्जुन ! प्रथम तो तुम

☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ १४६

ब्रह्ममय युद्ध करो और जो कुछ अक्षौहिणी सेना है, उसका अनुभव में नाश करो । यह द्वैत कुछ नहीं । सर्वदा एक ही परब्रह्म स्थित है। ब्रह्ममय युद्ध करो और सुख, दुःख, हानि, लाभ और जय, पराजय को उस युद्ध में समान मानो । ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त जो कुछ जगत् दीखता है, सो सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं, ऐसा जानकर लाभ-हानि में सम होकर स्थित हो और कुछ चिन्ता न करो । हे अर्जुन ! जड़-शरीर में कर्म स्वाभाविक होते हैं । जैसे वायु का स्फुरण स्वाभाविक होता है, वैसे ही शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं ।

हे अर्जुन ! भोजन, यजन, दान इत्यादिक जो कुछ कार्य करो, सब आत्मा ही को अर्पण करो । सदा आत्मसत्ता में स्थित रहो और सबको आत्मरूप देखो । हे अर्जुन ! जो किसी के हृदय में दृढ़ निश्चय होता है, वही रूप उसको भासित होता है । जब तुम इस प्रकार अभ्यास करोगे, तब ब्रह्मारूप हो जाओगे—इसमें संशय नहीं । हे अर्जुन ! जो आत्मा को कर्मों का अकर्ता देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है और सम्पूर्ण कर्मों के करते भी कुछ नहीं करता । हे अर्जुन ! कर्मों के फल की इच्छा भी न हो और कर्मों से विरमता भी न हो-योग में स्थित होकर कर्म को करो ! हे धनंजय ! कर्तृत्व के अभिमान और फल की वाञ्छा को त्यागकर कर्म करो । जो कर्मों के फल और संग को त्यागकर नित्य तृप्त हुआ है, वह करता हुआ भी कुछ नहीं करता । हे अर्जुन ! जिसने सब आरम्भों में कामना और संकल्प का त्याग किया है और ज्ञान-अग्नि में कर्म जलाये हैं, उसी को बुद्धिमान् लोग पण्डित कहते हैं । जो आत्मा में समवस्थित है और सब अर्थों में निस्पृह और निर्द्वन्द्वसत्ता में स्थित है, यथा प्राप्त में वरतता है, वह पृथ्वी का भूषण है । वह समुद्र की तरह अचल और अपने में तृप्त है । जैसे समुद्र में अनिच्छित जल प्रवेश करता है, वैसे ही ज्ञानवान् में सुख प्रवेश करते हैं । वह शान्तरूप सब कामनाओं से रहित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे अर्जुनोपदेशे सर्वब्रह्मप्रति- पादनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥

१५० * योगवाशिष्ठ *

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! तुम देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित, अविनाशी और अजर आत्मा हो। परिणाम या विकार से रहित को अजर कहते हैं। हे अर्जुन ! तुम शोक मत करो। यह जगत तुमको अज्ञान से भासित होता है। अज्ञान अपने प्रमाद को कहते हैं और प्रमाद अनात्मा में आत्माभिमान करने का नाम है। हे अर्जुन ! यह जो संसाररूपी तुम्हारी देह है, इसमें अभिमान मत करो—यह मिथ्या है—इसमें दुःख होता है। तुम असंग और अविनाशी हो; तुम्हारा नाश कदापि नहीं होता। हे अर्जुन ! जो विनाशरूप है, उसका अस्तित्व कभी न होगा और जो सत्य है उसका अभाव न होगा। तत्त्ववेत्ताओं ने इन दोनों का निर्णय किया है। हे अर्जुन ! जिससे यह सब प्रकाशित होता है, उसको तुम अविनाशी जानो। उसका कोई विनाश नहीं कर सकता। हे अर्जुन ! तुम ऐसे हो और यह आत्मा सबका अपना है, तब उसका विनाश कैसे हो ? अज्ञानी मनुष्य उसका विनाश होता मानते हैं।

अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि आत्मा अविनाशी है और सबका अपना है तो इन प्राणियों का नाश क्यों होता है ? श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! तुम सत्य कहते हो। किसी का नाश नहीं होता, परन्तु अज्ञान से लोग अपना नाश होता मानते हैं। हे अर्जुन ! तुम आत्मवेत्ता बनो। वह आत्मा एक अद्वैत है, जिसको एक भी नहीं कह सकते। तब द्वैत कहाँ से हो ? अर्जुन बोले, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि आत्मा एक है, तो मृत्यु भी उससे भिन्न दूसरा न हुआ और यह भी सत्य है कि लोग मर कर नरक या स्वर्ग भोगते हैं। यदि मृत्यु नहीं तो लोग मरते क्यों हैं और पाप-पुण्य का फल कैसे भोगते हैं ? श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! न कोई मरता है और न जन्मता है—यह स्वप्न की तरह मिथ्या कल्पना है। जैसे स्वप्न में निद्रादोष से जन्मना और मरना जान पड़ता है, वैसे ही संसार में यह जन्म-मरण अज्ञान से दीखता है। अज्ञान स्फुरण का नाम है, उसी में नरक और स्वर्ग कल्पित हुआ है।

* निर्वाण प्रकरण *

१५१

हे अर्जुन ! जैसे यह जीव भोगता है, सो तुम सुनो । इस जीव ने अपने स्वरूप के प्रमाद से संकल्पमय शरीर रचे हैं । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में मन, बुद्धि और अहंकार में जीव प्रकट होता है । उस अंतःकरण में मिलकर जैसी वासना करता है, वैसा ही आगे भोगता है । वह वासना तीन प्रकार की है—एक सात्त्विकी, दूसरी राजसी और तीसरी तामसी । जैसी वासना होती है, वैसा ही स्वर्ग और नरक बन जाता है । सात्त्विकी वासना से स्वर्ग बन जाता है और राजसी-तामसी से नरकादिक बन जाते हैं । स्वर्ग-नरक केवल वासनामात्र हैं; वास्तव में न कोई स्वर्ग है, न नरक है; न कोई मरता है, न जन्मता है । केवल एक आत्मा ही ज्यों का त्यों स्थित है, परन्तु यह जगत् आभास भ्रम से होता है । इस जीव ने अज्ञान में चिरकाल तक वासना का अभ्यास किया है, उसी में भ्रम देखता है । अर्जुन बोले, हे जगत्पते ! यह जीव जो नरक, स्वर्गादिक योनि जगत् में देखता है, उसका कारण क्या है ? श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! अज्ञान में जो अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है, उससे जगत् को सत् जानकर जीव वासना करने लगा है और जैसे-जैसे जगत् को सत् जानकर वासना करता है, वैसे ही वैसे जगत्-भ्रम देखता है । जब आत्मविचार उपजता है, तब जगत् को स्वप्न की तरह देखता है और वासना का भी क्षय हो जाता है । जब वासना का क्षय होता है, तब कल्याण होता है ।

फिर अर्जुन ने पूछा, हे भगवन् ! चिर अभ्यास में जो संसारभ्रम दृढ़ हो रहा है, वह किस प्रकार उपजता है और किस प्रकार लीन होगा ? श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मूर्खता और अज्ञान में जो अनात्म देहादिक में आत्मभावना होती है, उससे जगत् को सत् जानकर जीव वासना करता है और उस वासना के अनुसार जगत्-भ्रम देखता है । पर जब स्वरूप का अभ्यास करता है, तब वासना नष्ट हो जाती है । इससे हे अर्जुन ! तुम स्वरूप का अभ्यास करो । अहं, मम आदिक वासना को त्यागकर केवल आत्मा की भावना करो । यह

१५२ ✵ योगवाशिष्ट ✵

देह वासनारूप है । जब वासना निवृत्त होगी, तब देह भी लीन हो जायगी और जब देह लीन हुई तब देश, काल, क्रिया, जन्म, मरण भी न रहेंगे । ये जीव के अपने ही संकल्प से उठे हैं और भ्रमरूप हैं । उनकी वासना मे घिरा हुआ जीव भटकता है । जब आत्मबोध होता है, तब जीव वासना मे मुक्त होता है और निरालम्ब असंकल्प अविनाशी आत्मतत्त्व पाता है । उर्मी को मोक्ष कहते हैं ।

हे अर्जुन ! जब जीव को तत्त्वबोध होता है तब वासनारूपी जाल मे वह मुक्त हो जाता है और जो वासना मे मुक्त हुआ सो मुक्त हुआ । कोई पुरुष सर्वधर्म-परायण सर्वज्ञ और शास्त्रों का ज्ञाता भी हो, पर यदि वासना मे मुक्त नहीं हुआ, तो वह सब ओर से बँधा हुआ है । जैसे दृष्टि के दोष से निर्मल आकाश में मोर की पूँछ की तरह तारे भासित होते हैं, वैसे ही मूर्ख को शुद्ध आत्मा में वासनारूपी मल यह जगत् भासित होता है । जैसे पिंजड़े में पक्षी बन्द होता है, वैसे ही वह बन्धन में पड़ता है । जिसके हृदय में वासना है, वह बंधन में है और जिसके हृदय में वासना नहीं है, उसको मुक्त जानो । हे अर्जुन ! जिसके हृदय में जगत् की वासना है, वह यदि बड़ी प्रभुता में संयुक्त देख पड़े तो भी दरिद्र और दुःख का भागी है । जिसकी वासना नष्ट हुई है, वह यदि प्रभुता में रहित देख पड़े तो भी बड़ा प्रभुतासम्पन्न ऐश्वर्यशाली है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जीवनिर्णयो नाम चतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५४ ॥

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! इस प्रकार तुम निर्वासनिक जीवन्मुक्त होकर विचरो, तब तुम्हारा अन्तःकरण शीतल हो जायगा । तुम जगमरण से मुक्त और निःसंग आकाश समान होगे और इष्ट-अनिष्ट को त्याग वीतराग होकर स्थित होगे । हे अर्जुन ! प्रवाह में जो कार्य आकर प्राप्त हो, उसको करो । युद्ध में कायरपन न करो । आत्मा अविनाशी और देह नाशवान् है । देह का नाश होने से आत्मा का नाश नहीं होता । हे अर्जुन ! जो जीवन्मुक्त पुरुष हैं, वे रागद्वेष से रहित होकर

निर्वाण प्रकरण १५३

प्रवाह से प्राप्त कार्य को करते हैं। तुम भी जीवन्मुक्त स्वभाव होकर विचरो और 'यह मैं करूँ', 'यह न करूँ', इस ग्रहण-त्याग की दुविधा को त्यागो। इसी से ज्ञानवान् बन्धन को नहीं प्राप्त होते। जो मूर्ख हैं, वे इस बन्धन में बँधते हैं और जीवन्मुक्त पुरुष सुप्तवत् स्थित होकर प्रवाह प्राप्त और प्रबुद्ध की तरह वासना से रहित होकर कार्य करते हैं। जैसे कच्छप अपने अङ्ग समेट लेता है, वैसे ही ज्ञानवान् वासना को समेट लेता है और अपने को चिन्मात्ररूप जानता है। मुझमें जगत् माला के दानों की तरह पिरोया हुआ है और सब जगत् मेरा अङ्ग है। जैसे अपने हाथ पसारे और समेटे और जैसे समुद्र में तरङ्ग उठते और लीन होते हैं, वैसे ही विश्व आत्मा में उपजते और लीन होते हैं-उससे भिन्न कुछ नहीं।

हे अर्जुन ! जैसे चँदवे के ऊपर नाना प्रकार के चित्र लिखे होते हैं, परन्तु वे रङ्ग और वस्त्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही आत्मा में मनरूपी चितेरे ने जगत् रचा है और अनउपजा होकर भी उपजा-सा लगता है। जैसे खंभ में चितेरा कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, तब आकाशरूपी पुतलियाँ उसके मन में उदय होती हैं, वैसे ही ये तीनों जगत् कालसंयुक्त चित्त में प्रकट होते हैं। चितेरा भी मूर्तियाँ तब लिखता है, जब उसके चित्त के भीतर कल्पना होती है, पर यह आश्चर्य है कि मन आकाश में चित्र बनाता है। हे अर्जुन ! यह चित्र स्पष्ट दिखता है, तो भी आकाशरूप है। जैसे स्वप्नसृष्टि आकाशरूप होती है, वैसे ही यह भी है। आकाश और भीत में भेद नहीं, परन्तु आश्चर्य है कि भेद भासित होता है। जैसे मनोरथ स्वप्नपुर में मन के स्फुरण में जगत् भासित होता है और मन के सुप्त होने से लय हो जाता है सो वह मनोमात्र है, वैसे ही यह मनोमात्र है और आकाश में भी अधिक शून्य है। जैसे स्वप्नपुर और मनोरथ में एक क्षण में बड़े काल का अनुभव होता है और पूर्वरूप के विस्मरण से वह सत्-सा जान पड़ता है, वैसे ही यह जगत् सत् प्रतीत होता है, जब तक प्रमाद होता है, तब तक प्रतीत होता है, पर जब इस क्रम से जीव आत्मरूप को देखता

१५४ 卐 योगवाशिष्ठ 卐

है, तब जगतभ्रम निवृत्त हो जाता है। यद्यपि प्रकट देख पड़ता है परन्तु लीन हो जाता है और शरत्काल के आकाश की तरह आत्मा निर्मल भासित होता है। जैसे चितेरे के मन में जो चित्र जगते हैं वे आकाश-रूप हैं, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है।

हे अर्जुन! भाव-अभाववृत्ति को त्यागकर स्वरूप में स्थित होओ, तब आकाशसदृश निर्मल हो जाओगे। जैसे मेघ की प्रवृत्ति और निवृत्ति में आकाश निर्मल ही रहता है, वैसे ही तुम भी पदार्थ के भाव-अभाव में निर्मल हो। जो कुछ पदार्थ दीखते हैं, वे सब आकाश-रूप हैं। जैसे चितेरे के मन में पुतलियाँ भासित होती हैं, वैसे ही यह जगत् आकाशरूप है। जैसे एक क्षण में मन के स्फुरण से नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं और गुप्त होने से लीन हो जाते हैं, वैसे ही प्रमाद से यह जगत् भासित होता है और आत्मा के जानने से लीन हो जाता है। आत्मा में जगत् निर्वाणरूप है, पर आत्मा में एक निमेष के स्फुरण द्वारा प्रमाद से वज्रसार की तरह दृढ़ स्पष्ट भासित होता है और चित्त के चेतने से सत् जान पड़ता है। यह सब जगत् आकाशरूप है—द्वैत कुछ हुआ ही नहीं, पर बड़ा आश्चर्य है कि आकाश पर लिखे हुए चित्र नानारूप रमणीय होकर भासित होते और मन को मोहते हैं। हे अर्जुन! यही आश्चर्य है कि कुछ नहीं है, पर नाना प्रकार के रङ्ग भासित होते हैं। आकाशरूपी नील सरोवर में चन्द्रमा और तारे आदि फूल खिले हैं और उनमें मेघरूपी पत्ते लगे हैं। हे अर्जुन! और आश्चर्य देखो कि चित्र भी तब होता है, जब उसका आधार भीत अथवा वस्त्र होता है। पर यहाँ चित्र प्रथम उत्पन्न होते हैं, आधार अर्थात् दीवार पीछे बनती है। प्रथम ये मूर्तियाँ और चित्र बने हैं और पीछे भीत हुई है। यही आश्चर्य है। हे अर्जुन! यह माया की प्रधानता है कि वास्तव आकाशरूप चितेरे ने आकाश में आकाशरूप पुतलियाँ रची हैं। आकाश में आकाशरूप पुतलियाँ उपजती हैं और आकाश में लीन होती हैं; आकाश ही को भोजन करती हैं। आकाश ही को आकाश देखता है, आकाश ही यह सृष्टि है और

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २५५

आकाश का ही रूप आकाशरूप आत्मा में आकाशरूप में स्थित है।

हे अर्जुन ! वास्तव में आत्मा ऐसा है। ऐसे अद्वैतरूप आत्मा में जो उत्थान हुआ है, उस उत्थान से उसको स्वरूप का प्रमाद हुआ है, जिससे दृश्य भ्रम देख पड़ता है और अनेक वासनाएँ उत्पन्न होती हैं। वासणारूपी रस्सी से बँधा हुआ जीव भटकता है और वासना में घिरा हुआ अहं-त्व आदिक शब्दों को जानने लगता है और नाना प्रकार के भ्रम देखता है। तो भी उसका स्वरूप ज्यों का त्यों है। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब पड़ता है और दर्पण ज्यों का त्यों रहता है; वैसे ही आत्मा में जगत् प्रतिबिम्बित होता है और आत्मा भेद-भेद से रहित है। ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है। जब सब वही है, तब भेद-भेद किसका हो ? जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले जलरूप हैं, वैसे ही यह सब ब्रह्म ही से पूर्ण है। उसमें द्वैत कुछ नहीं। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में आत्मा स्थित है। उसमें वास्य-वासक कल्पना कोई नहीं, परन्तु स्वरूप के प्रमाद से वास्य-वासक भेद होता है। जब स्वरूप का ज्ञान होता है, तब वासना नष्ट हो जाती है।

हे अर्जुन ! जो वासना से मुक्त है, वही मुक्त है और वासना से बँधा हुआ बन्धन में पड़ा है। यदि सब शास्त्रों का वेत्ता भी हो और सर्वधर्मों से पूर्ण हो तो भी यदि वासना से मुक्त नहीं हुआ तो बन्धन में बँधा ही है। जैसे पिंजड़े में पक्षी बंद होता है, वैसे ही वह वासना से बँधा हुआ है। हे अर्जुन ! जिसके हृदय में वासना का बीज है, वह बीज यद्यपि बाह्य नजर नहीं आता तो भी बहुत फैल जायगा। जैसे वट का बीज फैल जाता है, वैसे ही वह वासना फैल जायगी। जिस पुरुष ने आत्मचिन्तन का अभ्यास किया है और उसमे ज्ञानरूपी अग्नि उपजाकर वासना के बीज को जलाया है, उसको फिर संसार-भ्रम नहीं होता। वह न वस्तु बुद्धि से पदार्थों को ग्रहण करता है, न सुख-दुःख आदिक में डूबता है—सदा निर्लेप रहता है। जैसे तोंबी जल के ऊपर ही रहती है, वैसे ही वह सुख-दुःख के ऊपर रहता है। हे अर्जुन ! तुम शान्त आत्मा हो। तुम्हारा भ्रम अब दूर हुआ और तुम आत्मपद

१५६ ॐ योगवासिष्ठ ॐ

को प्राप्त हुए हो। तुम्हारे मन और मोह का निर्वाण हो गया है और तुम सम्यक्ज्ञानी हुए हो। व्यवहार करना और चुप रहना दोनों तुमको तुल्य है; क्योंकि तुम शान्तरूप और निःशब्द को प्राप्त हुए हो। यह मैं जानता हूँ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे श्रीकृष्णसंवादे अर्जुनविश्रान्तिवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५५ ॥

अर्जुन बोले, हे अच्युत ! मेरा मोह अब नष्ट हुआ और मुझे आत्म-स्मृति प्राप्त हुई। आपके प्रसाद से मैं अब निर्मदेत हो गया हूँ; अब जो कुछ आप कहिये, वह मैं करूँ। श्रीभगवान् बोले, हे अर्जुन ! मन की पाँच वृत्तियाँ हैं—प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, अभाव और स्मृति। जब ये पाँचों हृदय से निवृत्त हों, तब चित्त शान्त हो। उसके पीछे चेत से रहित चैतन्य जो शेष रहता है, उसको प्रत्यक् चैतन्य कहते हैं। वह वस्तुरूप, सब उपाधियों से रहित पूर्ण और सर्वरूप है। जो उस पद को प्राप्त हुआ है, उसको आधि-व्याधि आदिक दुःख नहीं हो सकते। जैसे जाल से निकलकर पक्षी आकाश को उड़ता है, वैसे ही वह देहाभिमान से मुक्त होकर आत्मपद को प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! प्रत्यक् चैतन्य सत्ता परम प्रकाशरूप, शुद्ध और संकल्प-विकल्प से रहित है और इन्द्रियों के विषय में नहीं आती, इन्द्रियों से परे है। जो पुरुष सबसे अतीत पद को प्राप्त हुआ है, उसको वासना नहीं स्पर्श कर सकती। उसके प्राप्त होने पर ये घट-पट आदिक पदार्थ सब शून्य हो जाते हैं और वहाँ तुच्छ वासना का कुछ बल नहीं चलता। जैसे अग्नि-समूह के निकट बरफ गल जाती है और उसकी शीतलता नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध पद का साक्षात्कार होने पर चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है और वासना का भी अभाव हो जाता है।

हे अर्जुन ! वासना तब तक फुरती है, जब तक मनुष्य संसार को सत्य जानता है। जब आत्मपद की प्राप्ति होती है, तब संसार और वासना का अभाव हो जाता है। इस कारण विरक्त पुरुष की सत्य जान लेने पर कुछ भी वासना नहीं रहती। नाना प्रकार के आकार और

  • निर्वाण प्रकरण * | १५७

विकार से संयुक्त अविद्या तब तक फुरती है, जब तक शुद्ध आत्मा का अपने आप से ज्ञान नहीं होता। शुद्ध आत्मा को प्राप्त होने पर जगत-भ्रम नष्ट हो जाता है; मनुष्य स्वच्छपद आत्मतत्त्व में स्थित होता है, आकाश की तरह निर्मलभाव को प्राप्त होता है और अपने आपको सबमें पूर्ण देखता है। वह आत्मसत्ता सब आकाररूप है और सब आकार-रूपों से रहित भी है। हे अर्जुन ! जो शब्द से अतीत परमवस्तु है, उसकी किससे उपमा दी जाय ? जो वासनारूपी विषूचिका को त्याग-कर अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुआ पृथ्वी में विचरता है, वह त्रिलोकी का नाथ है।

इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार त्रिलोकी के नाथ कहेंगे, तब अर्जुन एक क्षण मौन हो जावेंगे और उसके उपरान्त कहेंगे कि हे भगवन् ! मेरे शोक नष्ट हो गये। जैसे सूर्य उदय होने पर कमल खिल जाते हैं, वैसे ही आपके वचनों से मेरा बोध खिल गया है—अब जो कुछ आपकी आज्ञा हो, वह मैं करूँ। इस प्रकार कहकर अर्जुन गाण्डीव धनुष ग्रहण करेंगे और भगवान् को सारथी करके निःसन्देह और निशङ्क होकर युद्ध करेंगे, जिसमें हाथी, घोड़े, मनुष्य मारकर लोहू के प्रवाह बहावेंगे तो भी आत्मतत्त्व में स्थित रहेंगे और स्वरूप से चलायमान न होंगे। जैसे पवन मेघ का अभाव कर देता है, वैसे ही योद्धाओं का नाश करेंगे।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे श्रीकृष्ण अर्जुनसंवादे भविष्यद् गीतानामोपाख्यानममासिनामषट्पञ्चाशत्सर्गः ॥ ५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसी दृष्टि का आश्रय करो, जो दुःख का नाश करती है। निःसंग संन्यासी होकर अपने सब कर्म और चेष्टाओं को ब्रह्म-अर्पण करो। जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है, ऐसी सत्ता को तुम परमात्मा जानो ! अनुभवरूप आत्मा है। उसकी भावना से मनुष्य उसी को प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं। जो सत्तासंवेदन से रहित चैतन्य है, उसी को तुम परमपद जानो। वह सबका परम द्रष्टारूप और सबका प्रकाशक है, महा उत्तम परमगुरु

१५८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

का गुरु है । जिसको शून्यवादी शून्य, विज्ञानवादी विज्ञान और ब्रह्म-वादी ब्रह्म कहते हैं, वह परमसार शान्तरूप शिव अपने आपमें स्थित है । वही आत्मा इस जगतरूपी मन्दिर को प्रकाश करनेवाला दीपक, जगतरूपी वृक्ष का रस, जगतरूपी पशु का पालनेवाला गोपाल और जीवरूपी मोतियों को एकत्र करनेवाला तागा है । हृदय और भूतरूपी मिचों में तीक्ष्णता है । निदान सब पदार्थों में पदार्थरूप सत्ता वही है । सत्य में सत्यता और असत्य में असत्यता वही है । जगतरूपी गृह में सब पदार्थों को प्रकट करनेवाला दीपक वही है और उसी से सब सिद्ध होते हैं । चन्द्रमा, सूर्य, तारे आदि जो प्रकाशरूप दीखते हैं, उनका भी वह प्रकाशक है । यह जड़ प्रकाश है और वह चैतन्य प्रकाश है, उसमें ये सिद्ध होते हैं और उसी से सब प्रकाश प्रकट हुए हैं । वह आत्मसंवित् अपने ही विचार से पाया जाता है ।

हे राम ! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ देख पड़ते हैं, वे असत हैं । वास्तव में कुछ हुए नहीं, प्रमाददोष से भासित होते हैं और जब ज्ञान-विवेक उपजता है, तब नष्ट हो जाते हैं । हे राम ! जिसके हृदय में अहंभाव है, उसे यह जो जगत-जाल मिथ्याभ्रम से भासित होता है, उसको उपजा क्या कहिये और किसकी आस्था कीजिये । यह जगत कुछ वस्तु नहीं । आदि, अन्त, मध्य की कल्पना से रहित जो देव है वह ब्रह्मसत्ता समान अपने आपमें स्थित है । और द्वैत कुछ नहीं बना । जब यह तुमको दृढ़ निश्चय होगा तो तुम व्यवहार करते भी हृदय से निःसंग और शान्तरूप होगे । हे राम ! जिस पुरुष की उस समान-सत्ता में स्थिति हुई है, वह इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में रागद्वेष से रहित हृदय से सदा शान्तरूप रहता है । वह न उदय होता है, न अस्त होता है; सदा समभाव में स्थित रहता है । वह स्वस्वरूप अद्वैत-तत्त्व में स्थित होता है और जगत को अंग से सुषुप्त सा हो जाता है, व्यवहार भी करता है, परन्तु दर्पण के सदृश उसे क्षोभ नहीं होता । जैसे मणि सब प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, परन्तु उसका संग नहीं करती, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष कर्मों कलना कलंक को नहीं प्राप्त होता;

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १५६

उसका चित्त व्यवहार में सदा निर्मल रहता है। ज्ञानवान् को जगत् आत्मा का चमत्कार भासित होता है। वह न एक है, न अनेक। आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है। चित्त में जो यह चेतनभाव भासित होता है, उस चित्त के चेतने का नाम संसार है और फुरने से रहित शान्तचित्त का नाम परमपद है।

हे राम ! महा चैतन्य में जो निज का अभाव है कि मैं आत्मा को नहीं जानता, इसी का नाम चित्तस्पन्दन है और यही संसार का कारण है। जब इस भावना का क्षय हो, तब चित्त शान्त हो। हे राम ! जहाँ निजभाव होता है, वहाँ पदार्थों का अभाव होता है। वह निज सत्ता सब ठौर अपने अर्थ को सिद्ध करती है, परन्तु आत्मा में नहीं प्रवृत्त हो सकती। जब जीव कहता है कि मैं आत्मा को नहीं जानता, तब भी आत्मा का अभाव नहीं होता; क्योंकि अभाव को जाननेवाला भी आत्मा ही है। जो आत्मतत्त्व न हो तो अभाव कौन कहे। वह आत्मा परमशून्य है, परन्तु अजड़रूप परम चैतन्य है। हे राम ! तुम निज का अर्थ आत्मा में करो और आत्मा का अभाव न मानो। अनात्म में जो निज का भावत्व है, उसका अभाव करो अर्थात् अनात्म को अभावरूप मानो। जब इस प्रकार दृढ़भावना करोगे, तब संसार का भ्रम निवृत्त हो जायगा और केवल आत्मभाव शेष रहेगा।

हे राम ! चित्त के फुरने का नाम संसार है। चित्त के फुरने से ही संसारचक्र चलता है। जैसे सुवर्ण से भूषण प्रकट होते हैं, वैसे ही चित्त से त्रिपुटी होती। पर चित्तस्पन्दन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं, आत्मा का आभासरूप है। अज्ञान से चित्त स्पन्दन होता है और ज्ञान से लीन हो जाता है। जैसे सुवर्ण के भूषण को लगाने से भूषण-बुद्धि नहीं रहती, वैसे ही चित्त अचल होने पर चित्तसंज्ञा जाती रहती है। और जैसे भूषण के अभाव पर सुवर्ण ही रहता है वैसे ही बोध में चित्त के लीन होने पर शुद्ध चैतन्यसत्ता शेष रहती है। फिर भोगों की तृष्णा लीन हो जाती है और जब भोगभावना निवृत्त होती है, तब ज्ञान का परम लक्षण सिद्ध होता है। हे राम ! जो ज्ञानवान् पुरुष है और जिसने

१६० * योगवाशिष्ठ *

सत्त्वरूप को जाना है, उसको भोग की इच्छा नहीं रहती ! जैसे जो पुरुष अमृतपान से अघा जाता है, उसको भाजी आदि तुच्छ भोजन की इच्छा नहीं रहती, वैसे ही आत्मज्ञान से जो संतुष्ट हुआ है, उसको विषय की तृष्णा नहीं रहती । यह निश्चय करके जानो कि जब चित्त फुरता है, तब जगत्भ्रम भासित होता है और सत्य जानकर भोग की इच्छा होती है; पर जब बोध होता है, तब जगत्भ्रम लीन हो जाता है । तब फिर तृष्णा किसकी करे । यदि इन्द्रियों के विषय प्राप्त हों और हठकर उनको न भोगे, वह मूर्ख है । वह मानों अस्त्र से आकाश को छेदता है !

हे राम ! गुरु और शास्त्रों की युक्ति से मन वश होता है; युक्ति बिना उनकी शुद्धि नहीं होती ! यदि कोई अपने अङ्गों को काटे और उससे चित्त को स्थिर किया चाहे तो भी चित्त स्थिर नहीं होता और न संसारभ्रम ही मिटता है जब तक चित्त में स्थिति है तबतक जगत्भ्रम दीखता है और जब गुरु और शास्त्रों की युक्ति ग्रहण करके चित्त का अभाव होता है, तब चित्त नष्ट और अचल हो जाता है । जैसे बालक को अन्धकार में पिशाच देख पड़ता है और दीपक जलाकर देखने से अन्धकार निवृत्त होकर पिशाचभ्रम नष्ट हो जाता है, तब बालक निर्भय होता है, वैसे ही आत्म-ज्ञानरूप युक्ति से अज्ञान निवृत्त होता है । असम्यक्बुद्धि से जगत्भ्रम हुआ है और सम्यक्बोध से निवृत्त हो जाता है; फिर जाना नहीं जाता कि अज्ञान का जगत्भ्रम कहाँ गया ? जैसे दीपक का निर्वाण होने पर नहीं जाना जाता कि प्रकाश कहाँ गया, वैसे ही अज्ञान नष्ट होने पर नहीं जाना जाता कि जगत् कहाँ गया । चित्त के फुरने से बन्धन होता है और न फुरने से मोक्ष होता है परन्तु आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । उसमें न बन्धन है; न मोक्ष है ।

हे राम ! जब मोक्ष की इच्छा होती है, तब भी उसकी पूर्णता का क्षय होता है और निःसंवेदन होने पर कल्याण होता है । जो अना-भान अजड़रूप परमपद है, वह चैतन्योन्मुखत्व से रहित है । हे राम ! बन्धन, मोक्ष आदिक भी कल्पना से होते हैं । जब कल्पना से रहित बोध होता है, तब बन्धन मोक्ष दोनों नहीं रहते । जब तक विचार

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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से नहीं देखा, तब तक बन्धन और मोक्ष भासित होता है। विचार करने में दोनों का अभाव हो जाता है। जब 'अहं', 'इदं' आदिक भावना का अभाव हुआ, तब किसको कौन बन्धन कहे और किसको कौन मोक्ष कहे। सब कल्पना चित्त के फुरने से होती है। जब चित्त का फुरना नष्ट होता है, तब सब कल्पना का अभाव हो जाता है। तभी पुरुष शान्ति पाता है, अन्यथा नहीं। इससे चित्त को आत्मपद में लीन करो। जिसके आश्रय से यह जगत् उपजता और लीन होता है, उर्मी अनुपमरूप प्रत्यक् आत्मप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा में स्थित होओ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रत्यगात्मबोधवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! परमतत्त्व परमात्मपद हमको सदा प्रत्यक्ष है, और वस्तुरूप वही है, उससे कुछ भिन्न नहीं। यह प्रत्यक् आत्मा सब सत्ता का दर्पण है; सब सत्ता उर्मी में प्रकट होती है। जैसे बीज में वृक्ष की सत्ता प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा में जगत् सत्ता प्रकट होती है। हे राम! मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार जडात्मक हैं। परमपद इनसे रहित है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक सब उर्मी में स्थित हैं। जैसे चक्रवर्ती राजा निर्धन से ऊँचा है, वैसे ही उस सत्ता को पाकर जीव सब लोगों से ऊँचा हो जाता है। उस आत्मा को पाकर फिर मृत्यु को नहीं प्राप्त होता। न कभी शोकवान होता है, न क्षीण। एक क्षणमात्र भी जो अप्रमादी होकर आत्मा को ज्यों का त्यों जानता है, वह संसार-कल्पना को त्यागकर मुक्त होता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का अभाव होने पर जो सत्ता सामान्य शेष रहती है, उसका भान कैसे होता है?

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो सब देहों में स्थित होकर भोजन और जल-पान करता और देखना, सुनना, बोलना इत्यादि कर्म करना देख पड़ता है, वह आदि-अन्त से रहित, संवित् सत्ता, सर्वगत अपने आप में स्थित है। सब विश्वरूप वही है। आकाश में आकाश, शब्द में शब्द, स्पर्श में स्पर्श, नासिका में गन्ध, शून्य में शून्य, नेत्रों में रूप, पृथ्वी

१६२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

में पृथ्वी, जल में जल, तेज में तेज, वृक्षों में रस, मन में मन, बुद्धि में बुद्धि, अहंकार में अहंकार, अग्नि में अग्नि, उष्णता में उष्णता, घट में घट, पट में पट, वट में वट, स्थावर में स्थावर, जङ्गम में जङ्गम, चेतन में चेतन, जड़ में जड़, काल में काल, नाश में नाश, बालक में बालक, यौवन में युवा, वृद्धता में वृद्ध और मृत्यु में मृत्युरूप होकर वही परमेश्वर स्थित है ।

हे राम ! इस प्रकार सब पदार्थों में वह अभिन्नरूप स्थित है । नानात्व- दृष्टि भी आती है, परन्तु नाना नहीं है और भ्रम से भासित होती है । जैसे परछाहीं में भ्रम से बेताल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मा में नानात्व भासित होता है । सबमें, सब ठौर, सब प्रकार, सब आत्मा ही स्थित है । ऐसा जो आत्मदेव सनातन है, उसमें स्थित हो । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा, तब दिन अस्त होने से सब सभासद् परस्पर नमस्कार करके स्नान को गये और सूर्य के निकलते ही फिर अपने-अपने आसन पर आ बैठे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विभूतियोगोपदेशो नामाष्ट- पञ्चाशत्तमःसर्गः ॥ ५८ ॥

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे हमारे स्वप्न में पुर, नगर और मण्डल होते हैं, वैसे ही ब्रह्मादिक ने इस देह को ग्रहण किया है । उनको असत् प्रतीति है, तब हमको दृढ़ प्रतीति कैसे उपजी है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम ब्रह्मा को सर्ग अमन मा भासित होता है, वास्तव नहीं । सर्वगत चैतन्य संवित् संसार के दर्शन में जब सम्यक् दर्शन का अभाव हुआ और स्वप्नरूप में आपमे अहंप्रतीति उपजी, तब वह दृढ़ होकर देखने लगा । जैसे अपने स्वप्न में जगन दृढ़ भासता है और मनुष्य उसे स्वप्न नहीं जानता, वैसे ही ब्रह्मा का जगत् भी सत्य भासित होता है, स्वप्न नहीं जान पड़ता है । जो स्वप्न पुरुष में उपजा है, सो स्वप्नरूप है । हे राम ! ऐसा जो सर्ग है, वह जीव जीव प्रति उदय हुआ है । जैसे समुद्र में तरंग निकलते हैं, वैसे ही चैतन्यतत्त्व का आभास जगत् दिखता है । जैसे स्वप्नपुर में असत् पदार्थ होते हैं, वैसे

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १६३

ही ये पदार्थ भी अवास्तव हैं और मन के संकल्प से भ्रममात्र ही स्पष्ट भासित होते हैं। हे राम! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो इस जगत में सिद्ध नहीं होता, और का और नहीं भासित होता और मर्यादा नहीं त्यागता; क्योंकि सब पदार्थ मन के संकल्प से उपजे हैं।

तुम देखो कि जल में अग्नि स्थित है—जैसे समुद्र में बड़वाग्नि है, सो विपर्यय है। इसी कारण कहता हूँ कि सब मनोमात्र है। और देखो, आकाश में नगर बसते हैं, विमान प्रत्यक्ष चलते हैं और चिन्तामणि आदि से कमल उपजते हैं—जैसे हिमालय पर्वत में बर्फ और सब ऋतु के फूल एक ही समय उपजते हैं; जैसे संकल्प के कल्पित वृक्ष से पत्थर निकल आते हैं; शिला में जल निकलता है; चन्द्रकान्तमणि में अमृत द्रवित होता है और निमेष में घट पट और पट घट हो जाते हैं। निदान स्वरूप के विस्मरण में जीव सत् को असत् देखता है; जैसे स्वप्न में अपना मरना देखता है; जल ऊपर को चलना देखता है; मेघ होकर स्वर्ग में गंगा बहती देखता है और पत्थर उड़ते देखता है; जैसे पंखों-वाले पहाड़ उड़ते हैं और चिन्तामणि शिलारूप में सब पदार्थ उपजते हैं। इत्यादि बातें भ्रम से नानात्व विपर्ययरूप ही दिखती हैं। इनमें तुम देखो कि सब मनोमात्र हैं, और से और हो जाते हैं। हे राम! यह इन्द्रजाल, गन्धर्व-नगर और शाम्बरी माया के सदृश है। असत् ही भ्रम से सतरूप में भासित होता है। ऐसा पदार्थ कोई नहीं है, जो सत नहीं और असत भी नहीं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जाग्रत्स्वप्न विचारोनामै-कोनषष्टितमसर्गः ॥ ५६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार मिथ्या है। जो पुरुष इसको सत्य जानता है, वह महामूर्ख है और भ्रम में भ्रम देखकर महामोह को प्राप्त होता है। जैसे कोई मृग गढ़े में गिर पड़ता है तो दुःखी होता है और फिर उससे भी बड़े गढ़े में गिरता है तो अति दुःख पाता है; वैसे ही जो मूर्ख पुरुष है, वह आत्मा के अज्ञान से संसाररूपी गढ़े में गिरता है और उसमें अनेक भ्रम देखता है; एक स्वप्न के बाद दूसरा स्वप्न

१८४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

दखता है। इस विषय का एक इतिहास कहता हूँ, उसमें मन लगाकर सुनो। एक मननशील संन्यासी योग के आठवें अङ्ग 'समाधि' में स्थित था। उसका हृदय समाधि करते-करते शुद्ध हो गया था। वह समाधि में दिन बिताता और जब समाधि खुलती तो फिर आसन लगाकर समाधि में लग जाता था। इसी प्रकार जब बहुत काल बीता तो एक समय समाधि खुलने पर वह एक चिन्तन करने लगा कि जैसे साधारण पुरुष विचरते और चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं भी कुछ चेष्टा रचूँ। ऐसा विचार कर उसने मन के संकल्प से विश्व की कल्पना की और उसमें आप भी एक बना। उसका नाम धीवर हुआ। निदान वह मद्यपान करता और ब्राह्मणों की सेवा भी करता। चेष्टा करते-करते वह सो गया। स्वप्न में उसको ब्राह्मण के शरीर का भान हुआ तो वह उस ब्राह्मण शरीर में वेद का अध्ययन और पाठ करने लगा। ऐसी चेष्टा में जब उसे चिरकाल बीता तो फिर स्वप्न हुआ। उसमें उसने अपने को बड़ी सेना से युक्त राजा देखा और उस सेना के साथ वह राजा होकर विचरने लगा।

कुछ काल जब इसी प्रकार व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उस स्वप्न में उसने अपने को चक्रवर्ती राजा देखा। वह चक्रवर्ती होकर सारी पृथ्वी पर आज्ञा चलाने लगा। जब कुछ काल बीता तो फिर अपने को देवाङ्गना के रूप में देखा। वह देवता के साथ बाग में विचरने लगी और जैसे बेल वृक्ष के साथ शोभा पाती है, वैसे ही वह देवता के साथ शोभा पाने लगी। इसी प्रकार जब कुछ काल देवता के साथ बीता तो फिर स्वप्न हुआ और उसमें उसने अपने को हरिणी देखा और वन में चरने लगा। कुछ काल ऐसे भी व्यतीत हुआ तो फिर स्वप्न हुआ और उसने अपने को देवताओं के बाग की बेल देखा। जब ऐसे कुछ समय बीता तो फिर स्वप्न में अपने को भँवरी देखा और सुगन्ध को ग्रहण करने लगा। उसके अनन्तर फिर उसने स्वप्न में देखा कि मैं कमलिनी हूँ। वहाँ एक दिन हाथी आकर बेल को खा गया। जैसे कोई मूर्ख बालक भली वस्तु को भी तोड़ डालता है, वैसे ही वह

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १६५

मूर्ख हाथी बेल तोड़कर खा गया । उसके उपरान्त उस बेल ने हाथी का शरीर पाकर बड़ा दुःख पाया और गड्ढे में गिरा । थोड़े समय के उपरान्त हाथी को स्वप्न हुआ और वह भँवरी होकर कमलों में विचरने लगा । जब कुछ काल बीता तो फिर वह बेल हुआ और उस बेल के निकट एक हाथी आया और उस हाथी के पाँवों में वह बेल चूर्ण हो गई । तब उस बेल को एक हंस ने खाया । तब वह बेल हंस होकर बड़े मानसरोवर में विचरने लगी । फिर उस हंस के मन में आया कि मैं ब्रह्मा का हंस होऊँ । तब वह अपने संकल्प से ब्रह्मा का हंस बन गया जैसे जल का तरङ्ग बन जावै । तब ब्रह्मा के उपदेश से हंस को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ ।

हे राम ! अज्ञान से ऐसे भ्रम में पड़कर फिर ज्ञान से वह भ्रम शान्त हुआ । फिर विदेह और मुक्त वह होगा । वह हंस सुमेरुपर्वत में उड़ा जाता था । तब उसके मन में आया कि मैं रुद्र होऊँ । इसलिए मन संकल्प से रुद्र हो गया । जैसे शुद्ध दर्पण में शीघ्र ही प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण के संकल्प से तुरन्त वह रुद्र हो गया । जिसको अनुत्तर ज्ञान हो, उसको रुद्र कहते हैं और अनुत्तर ज्ञान वह है जिसके पाने से और कुछ पाने को नहीं रह जाता । ध्यान से अपने को देख उस रुद्र के मन में विचार हुआ कि बड़ा आश्चर्य है कि मैं अज्ञान से इतने बड़े भ्रम को प्राप्त हुआ था । बड़ी आश्चर्यमयी माया है । मैं तो एक ओर पड़ा हूँ और यह विश्व मेरा स्वरूप है । पूर्व कल्पित जो मेरे शरीर हैं, उनको अब जाकर जगाऊँ । तब रुद्र उठ खड़ा हुआ और अपने स्थान को चला । प्रथम संन्यासी के शरीर को आकर देखा और चित्तशक्ति से उसे जगाया तो संन्यासी के शरीर में ज्ञान हुआ कि सबमें मैं ही स्थित हूँ । परन्तु संन्यासी ने जाना कि मुझको रुद्र ने जगाया है और इतने शरीर मेरे और भी हैं । फिर वहाँ से वह रुद्र और संन्यासी दोनों चले और झींवर के स्थान में आये तो देखा कि झींवर शव की नाईं पड़ा है; मदिरा के बर्तन पड़े हैं, चेतना भी वहीं भ्रमती है और नाना प्रकार के स्थान देखती है-जैसे भग्ने के छिद्र में चींटी