योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५१ ननु कस्य कस्य भूतस्य गुणाः केषु केषु भूतेषु स्थिताः ? विद्यायाः १ कानि कान्यक्षराणि २कस्य कस्य भूतस्य गुणान् लक्षयन्तीत्यत आह— तस्माद्व्योमगुणः शब्दो वाय्वादीन्व्याप्य संस्थितः । व्योमबीजैस्तु विद्यास्थैर्लक्षयेच्छब्दपञ्चकम् ॥३६॥ तस्माद् व्योम्नः ३श्वेतरभूतेभ्यः स्थूलत्वाद् व्यापकत्वम्, तेन व्योमगुणः शब्दो वाय्वादीन् वायुतेजःसलिलपृथिव्यात्मकान् व्याप्य स्थितः । विद्यास्थैर्व्योम- बीजैः पञ्चभिः पञ्चभूतेषु स्थितानां शब्दानां पञ्चकं लक्षयेत्, व्योमवाचकत्वाद् हकारपञ्चकं तद्गुणं शब्दपञ्चकं लक्षयतीत्यर्थः ॥३६॥ ननु विद्यायां षड् हकाराः ४सन्ति, अन्यस्य हकारस्य किं प्रयोजनमित्यत आह— तेषां कारणरूपेण स्थितं ध्वनिमयं परम् । किस किस भूत के गुण किन किन भूतों में रहते हैं और विद्या के कौन कौन से अक्षर किस किस भूत के गुणों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन अब किया जा रहा है— ऊपर बताये व्याप्यव्यापक भाव के कारण आकाश का गुण शब्द वायु प्रभृति में भी रहता है । विद्या स्थित पाँच हकार इन्हीं गुणों के सूचक हैं ॥ ३६ ॥ ऊपर बताई गई पद्धति से आकाश अपने से भिन्न भूतों की अपेक्षा स्थूल है, व्यापक है । इसलिये आकाश का गुण शब्द वायु, तेज, जल और पृथिवी को भी व्याप्त करके स्थित है । विद्या में स्थित पाँच व्योम बीज पाँच भूतों में स्थित पाँच प्रकार के शब्दों को लक्षित करते हैं। इसका भाव यह है कि हकार आकाश का वाचक होता है । विद्या में पाँच हकार वर्ण हैं। पाँच वर्ण आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी में विद्यमान शब्दों की ओर इंगित करते हैं ॥ ३६ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्या में तो छः हकार हैं, इस बचे हुए छठे हकार का क्या प्रयोजन है ? इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं— उन पाँच शब्दों का कारणभूत तत्त्व ध्वनिमय नाद है । यह छठा हकार इसी को लक्षित करता है ॥ १. विद्यायां-ख. ज. झ. उ. । २. 'कस्य कस्य भूतस्य गुणान्'—नास्ति-ख. ज. उ. । ३. श्वेतेरेभ्यः-ख. ने. ज. उ. । ४. निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । माना जाता है, किन्तु यहाँ स्थूल का अर्थ व्यापक तथा सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य करने के कारण व्याप्य (सूक्ष्म) पृथिवी आदि की अपेक्षा से जल आदि तत्त्वों की व्यापकता (स्थूल) के आधार पर स्थूल (व्यापक) तत्त्वों को वरीयता दी गई है ।
१५२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः तेषां शब्दानां कारणरूपेण स्थितः कारणात्मना स्थितो ध्वनिनादः शब्दानां कारणम्। तदुक्तमभियुक्तैः— पिण्डो वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा¹ स्थिति- र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन्। ²घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरम³न्नन्यामणीयस्तनी- माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे⁴ ॥ इति । तन्मयं ⁵तल्लक्षकत्वात्। परं कामराजबीजस्थितककारलकारमध्यगतहकारा- क्षरम्। कोऽर्थः ? कामराजमध्यस्थितः षष्ठो हकार आकाशादिपञ्चभूतगतशब्द- पञ्चककारणनादरूपः कामराजबीजस्य स्थितिरूपतां लक्षयतीत्यर्थः ॥ ऊपर बताये गये पाँच प्रकार के शब्दों को उत्पन्न करने वाला ध्वनिमय नाद ही इन सबका कारण है। जैसा कि किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद कहते हैं। इसका भाव यह है कि नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्य रूप शब्दप्रपंच की संस्कार के रूप में स्थिति रहती है। सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे ! यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघकर उन्मनावस्था में पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद्दशा रूप अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है, इसका उदा- हरण है— घण्टा ध्वनि। जैसे घण्टे को बजाने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में विलीन हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ।। कामराज बीज के ककार और लकार के बीच में विद्यमान छठा हकार इसी नादमय शब्द को लक्षित करता है। इसका अभिप्राय यह है कि कामराज बीज में स्थित छठा हकार आकाश आदि पाँच भूतों में विद्यमान पाँच शब्दों के कारणभूत छठे नादरूप शब्द का बोधक है। इससे कामराज बीज स्थिति का प्रतिनिधि है, इस बात की पुनः¹ पुष्टि हो जाती है। १. दोषा-ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । २. 'घण्टा ॰॰॰मुमे' नास्ति-क. ग. उ. । ३. न्नन्त्यां-ब. । ४. णीं मम-ख. ब. । ५. तल्लक्ष्यत्वात्-ख. ने. ज. झ. । १. कामराज बीज की स्थितिरूपता का प्रतिपादन पहले (२।२२-२३) किया जा चुका है।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५३ ननु हकारादिवर्णा आकाशादिभूतवाचका इत्युक्तम्, कथं शब्दादिपञ्चभूत- गुणानामपि वाचका इत्युच्यन्त इत्यत आह— भवेद् गुणवतां बीजं गुणानामपि वाचकम् ॥३७॥ गुणवताम्, गुणाः शब्दादयः पञ्च, तद्वतामाकाशादीनां पञ्चभूतानां बीजम् । जातावेकवचनम् । अत्र विद्यायां हकारादीनि पञ्चभूताक्षराणि व्यञ्जनानि । अत्रै- वोक्तम्—"हकाराद् व्योम संभूतम्" (२।२९) इत्यादिना १ । अतो बीजान्युच्यन्ते । ककारादिक्षकारान्तानां व्यञ्जनानां बीजत्वमुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— षण्ढवर्जंमहिमद्युतेः २स्वरा बिन्दुसर्गंरहिताश्च ये शुचेः । सर्व एव शशिनः कलाः३ शिवे योनयो विधृतबोजतः स्वराः४ ॥ इति । (श्लो० ४०) फिर प्रश्न उठता है कि पहले यह बताया गया था कि विद्यागत हकार आदि वर्ण आकाश आदि भूतों के वाचक हैं, अब कहा जा रहा है कि ये वर्ण भूतगत शब्द आदि गुणों के भी वाचक हैं । यह कैसे होगा ? इसी का उत्तर देते हैं— गुणवान् आकाश आदि के वाचक बीजभूत हकार आदि अक्षर आकाशादि- गत गुणों के भी वाचक हो जाते हैं ॥३७॥ यहाँ एकवचन में प्रयुक्त बीज शब्द बीज जाति का वाचक है । विद्या में विद्यमान बीजाक्षर शब्द आदि गुणों से युक्त आकाश आदि के तो वाचक हैं ही, वे आकाश आदि में विद्यमान गुणों के भी वाचक हो जाते हैं । यहाँ विद्या में पाँच भूतों के वाचक हकार आदि अक्षर व्यंजन हैं । पहले (२।२९) ही इस विषय का वर्णन किया जा चुका है । हकार आदि से आकाश आदि की इस उत्पत्ति के कारण ही इनको 'बीज' कहा गया है । ककार से क्षकार पर्यन्त व्यंजनों को चिद्गगनचन्द्रिका में 'बीज' नाम दिया गया है । जैसे कि— षण्ढ (ऋ ॠ ऌ ॡ) स्वरों को छोड़कर बाकी बारह स्वर सूर्य की बारह कलाओं के, बिन्दु और विसर्ग को भी छोड़कर बाकी दस स्वर अग्नि की १० कलाओं के और सभी १. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. कला-ख. ने. ज. उ. । ३. कलाश्च ये योनयो-ख. ज. झ. उ. । ४. बीजकास्तदा-ख. ने. ज. उ. ।
१५४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः परापञ्चशिकायामप्युक्तम्—"द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता" (श्लो० ४०) इति । तानि तद्गुणानां शब्दादीनां वाचकानि लक्षकाणि, हकाराद्य- क्षराण्याकाशार्थेषु संकेतितत्वात्तद्गुणेषु शब्दादिषु लक्षकाण्येव । तदुक्तमभियुक्तैः— “साक्षात् संकेतितं योऽर्थमभिधत्ते स वाचकः” (का० प्र० २।७) इति । कोऽर्थः ? शब्दादिगुणवतामाकाशादिभूतानां यानि बीजानि वाचकानि १हकारादीनि, तानि तद्गुणानां शब्दादीनां लक्षकाणीत्यर्थः२ ॥३७॥ सोलह स्वर चन्द्र की १६ कलाओं के द्योतक हैं । हे देवि ! ये सभी स्वर१ बीजाक्षरों को धारण करने वाले हैं, अतः इनको ‘योनि' कहा जाता है ॥ परापञ्चाशिका में भी बताया गया है— “बीज और योनि के भेद से यह मातृका देवी दो रूपों में स्थित है”। आकाश आदि के अभिव्यंजक ये हकार आदि बीजाक्षर उन आकाश आदि के शब्द आदि गुणों को भी लक्षित करते हैं । हकार आदि अक्षरों का साक्षात् संकेतित (अभिधेय) अर्थ तो आकाश आदि ही हैं, किन्तु लक्षणा वृत्ति के द्वारा ये आकाशादिगत गुणों को भी लक्षित कर देते हैं । इस विषय में अभियुक्तों की उक्ति है—"साक्षात् संकेतित अर्थ को बताने वाला शब्द वाचक होता है”। इससे यह अभि- प्राय निकलता है कि शब्द आदि गुणों से संपन्न आकाश आदि भूतों के वाचक जो हकार आदि बीजाक्षर हैं, वे आकाशादिगत शब्द आदि गुणों का भी लक्षणा वृत्ति के द्वारा बोध कराते हैं ॥३७॥ १. ‘हकारादीनि' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. त्युक्तम्-ख. । १. सूर्य की १२, अग्नि की १० तथा सोम की १६ कलाओं की चर्चा योगिनीहृदय (३।१००-१०१) में हुई है और दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इनके नाम दिये हैं। वहाँ चन्द्र की १६ कलाओं में १६ स्वरों का, वह्नि की १० कलाओं में यादि क्षान्त दस वर्णों का तथा सूर्य की १२ कलाओं में ककार से ठकार पर्यन्त वर्णों का अनुलोम क्रम से तथा भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का प्रतिलोम क्रम से विन्यास प्रदर्शित है। अतः चिद्गगनचन्द्रिका के प्रस्तुत श्लोक में द्वादश और दश स्वर केवल संख्या के सूचक माने जाने चाहिये । यहाँ स्वरों को योनि तथा व्यंजनों को बीज माना गया है । कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री ने भी इसी मत का प्रतिपादन किया है । किन्तु मालिनी- विजय (३।१०-११) में स्वरों को बीज तथा व्यंजनों को योनि बताया गया है। अभिनव- गुप्त (तन्त्रसार,पृ० १५) इसी मत का अनुसरण करते हैं। आगे (३।१५३) दीपिकाकार भी स्वरों को बीज ही मानते हैं। सूर्य, वह्नि और सोम की ३८ कलाओं के समान अघोर आदि पाँच मन्त्रों की भी ३८ कलाएँ हैं। उनके नाम स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९) तथा नेत्रतन्त्र (२२।२६-३४) में देखे जा सकते हैं।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५५ लक्षणायां निमित्तमाह— कार्यकारणभावेन तयोरैक्यं विवक्षया । तयोः गुणगुणिनोः । कार्यकारणभावेन । गुणी कारणम्, गुणः कार्यम् । अतः कार्यकारणभावेनै¹कत्वविवक्षया विवक्षितमेवैकत्वम्, न तु तात्त्विकम् । गुणगुणिनोः कार्यकारणभावादेकत्वमारोप्य तत्संबन्धं निमित्तीकृत्य लक्षण्या गुणिशब्दा गुणेषु योज्यन्त² इत्यर्थः । तदुक्तं ³महास्वच्छन्दसंग्रहे— शब्दः ⁴शान्तत्वघोरत्वविशेषा⁵पन्नरूपकः । शब्दस्तु शब्दतन्मात्रं मृदूष्णकठिनश्चलः ॥ लक्षणा में कोई निमित्त होना चाहिये, उसी को बताते हैं— गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । उनकी एकता की ओर इंगित करना ही मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है ॥ गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । इनमें से गुणी कारण और गुण कार्य है । अतः इस कार्यकारणभाव की एकता को बताना मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है । अर्थात् यहाँ एकता की विवक्षामात्र है, इनमें वास्तविक एकता नहीं है । गुण और गुणी में कार्यकारणभाव संबन्ध के आधार पर इनमें एकता का आरोप कर देते हैं । इस एकता संबन्ध को ही निमित्त बना कर लक्षणा वृत्ति के द्वारा गुणी के वाचक शब्दों का प्रयोग गुणों में भी कर दिया जाता है । इस विषय का विस्तार महास्वच्छन्द- संग्रह में इस तरह से किया गया है— स्थूल रूप में शब्द ¹शान्त, घोर और मूढ नामक विशेष दशा को धारण कर लेता है । सूक्ष्म रूप में विद्यमान यही शब्द शब्दतन्मात्र कहलाता है । ²मृदु, उष्ण, कठिन, १. एकत्वं विवक्षितं न तु—ख. ने. ज. उ. । २. योज्याः—ख. उ. । ३. 'महा' नास्ति—झ. । ४. सा(शा)न्तद्वयोरर्थविशे—ख. ने. ज. उ. । ५. षोऽयं न रूपकः—ख. ज. उ., पः पञ्चरूपकः—ने. । १. सांख्यकारिका (श्लो० ३८) में पाँच तन्मात्राओं को अविशेष तथा उनसे उत्पन्न पाँच महाभूतों को विशेष संज्ञा दी गई है तथा इन विशेषों को शान्त, घोर और मूढ स्वभाव का बताया गया है । वाचस्पति मिश्र सत्त्वगुणमय सुखात्मक प्रकाशात्मक और लघुस्वभाव को शान्त, रजोगुणमय दुःखात्मक अव्यवस्थित स्वभाव को घोर तथा तमोगुणात्मक निराशा से भरे हुए भारी स्वभाव को मूढ बताते हैं । शान्त, घोर और मूढ स्वभाव के भोग्य विषयों का भोक्ता पुरुष भी इन स्वभावों से आक्रान्त हो जाता है । २. इस विषय का विस्तार और संक्षेप मतङ्गपारमेश्वर (वि० १९-२३ पटल), स्वच्छन्दतन्त्र (१२।१५-३०), मृगेन्द्रागम (वि० १२।१९-२९), तत्त्वसंग्रह (श्लो० २-४), भोगकारिका (श्लो० ५-२०), तत्त्वप्रकाश (श्लो० ६१-६३) आदि में देखा जा सकता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
३५६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः विशिष्टस्पर्शरूपश्च स्पर्शतन्मात्रसंज्ञकः । नीलपीतत्वशुक्लत्वविशिष्टं रूपमेव च ॥ रूपतन्मात्रमित्युक्तं १मधुरत्वादिसंयुतम् । रसतन्मात्रसंज्ञं तु सौरभादिविशेषितः ॥ गन्धः स्याद् गन्धतन्मात्रं तेभ्यो वै भूतपञ्चकम् । आकाशं शब्दतन्मात्रं नित्यं शब्दगुणं महत् ॥ व्यापकं निर्मलं तत्त्वमवकाशप्रदानकम् । स्पर्शतन्मात्रतो वायुश्चलद्रूपोऽनिलोऽभवत् ॥ जगत्प्राणोऽनिलो व्यूहप्रेरणं च लघुर्भवेत् । शब्दस्पर्शगुणः प्रोक्तो गमागमनकर्मकृत् ॥ शब्दस्पर्शरूपगुणं तेजस्तत्त्वं तु भास्वरम् । रूपतन्मात्रकार्यं च पाककर्मकरं शिवे ॥ रसतन्मात्रतो जातं वारितत्त्वं द्रवात्मकम् । शब्दस्पर्शरूपरसगुणं संग्रहकर्मकृत् ॥ चल आदि विशेष स्पर्शवाला तत्त्व स्पर्शतन्मात्र कहलाता है। नील, पीत, शुक्ल आदि विशिष्ट रूपों वाला तत्त्व रूपतन्मात्र कहा गया है। मधुरत्व आदि गुणों से विशिष्ट रसतन्मात्र और सुरभि (सुगन्ध) आदि से विशिष्ट गन्धतन्मात्र कहा गया है। इन्हीं से पांच भूतों की उत्पत्ति होती है। शब्दतन्मात्र से आकाश की अभिव्यक्ति होती है। शब्द गुण वाला यह आकाश नित्य, महान्, व्यापक और निर्मल है। अन्य सभी तत्त्वों को यह अवकाश देने वाला है, अर्थात् अन्य सभी भूत आकाश के द्वारा प्रदत्त अवकाश में ही स्थित हैं। स्पर्शतन्मात्र से वायु की उत्पत्ति होती है। यह वायु चंचल गति वाला है, जगत् का प्राण है, १व्यूहन और प्रेरण इसकी वृत्ति है और यह बहुत हल्का है। शब्द और स्पर्श ये दो गुण इसमें हैं। श्वास-प्रश्वास के रूप में गमन (बाहर जाना) और आगमन (भीतर आना) की क्रिया यही करता है। शब्द, स्पर्श और रूप गुण वाला भास्वर तेजस्तत्त्व रूपतन्मात्र का कार्य है। हे शिवे ! यह तत्त्व पाक क्रिया का निष्पादक है। रसतन्मात्र से द्रवात्मक जल तत्त्व निकलता है। इसमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस १. मधुरत्वोष्णसं-ख. ज. झ. उ. ।
- ऊपर उद्धृत स्थलों का अवलोकन कीजिये । टीकाकारों ने व्यूहन का अर्थ अवयव-घटन, अवयव-विरचन, विविध-वहन अथवा पुंजीकरण किया है। पांच भूतों में वायु पहला तत्त्व है, जो कि जागतिक पदार्थों को योजना बद्ध रूप से जुटाने में लगता है। वायु के इस व्यूहन और प्रेरण व्यापार की ही चर्चा प्रस्तुत उद्धरण में भी हुई है।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५७ शब्दस्पर्शरूपरसगन्धपञ्च ¹गुणान्वितम् । पृथिवीतत्त्वमाख्यातं ²कठिनं सर्वधारणम् ॥ पृथ्व्यादिव्योमतत्त्वान्त³पञ्चकं पूर्वपूर्वकम् । कार्यदृष्ट्या⁴ समावृत्य वर्तते पञ्चकं क्रमात् ॥ इति⁵ ॥ पूर्वं विद्यास्थहकारपञ्चकस्य पञ्चभूतस्थितशब्दपञ्चक⁶लक्षकतामुक्त्वे- दानीं ⁷वाय्वादिभूतचतुष्टयगतं स्पर्शचतुष्टयं वायुवाचकबीजैर्लक्षयति— महामायात्रयेणापि कारणेन च बिन्दुना ॥ ३८ ॥ वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां च चतुष्टयम् । उत्पन्नं भावयेद् देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ ३९ ॥ महामाया ईकारः, तेषां त्रयं बीजत्रयशिखरवर्तिनामीकाराणां बिन्दुद्वयार्ध- मात्रामयानां त्रयम् । कारणेन च बिन्दुना तदक्षर⁸त्रयकारणेनाकारहकारसामरस्य- रूपेण कामाख्येनोर्ध्वबिन्दुना । वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां चतुष्टयमुत्पन्नं ये चार गुण रहते हैं । यह तत्त्व संग्रह क्रिया का निष्पादक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच गुणों से युक्त पृथिवी तत्त्व है । यह कठोर है और सबको धारण करने वाला है । पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त पाँच तत्त्वों में पहला तत्त्व अपने कार्य तत्त्व को अपने में समेटे हुए रहता है ॥ विद्यास्थित पाँच हकार पाँच भूतों में स्थित पाँच शब्दों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन करने के उपरान्त अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वायुवाचक बीजों से वायु प्रभृति चार भूतों के चार प्रकार के स्पर्शों को लक्षित किया जाता है— हे देवि ! तीन महामायाओं और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार स्पर्शों को उत्पति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये, क्योंकि स्थूल और सूक्ष्म भूत के क्रम से स्पर्श गुण की अनुवृत्ति चार भूतों में मानी जाती है ॥३८-३९॥ महामाया शब्द यहाँ ईकार का वाचक है । श्रीविद्या में तीन ईकार हैं । इनकी स्थिति तीनों बीजों के अन्त में है तथा इनका आकार दो बिन्दु और हार्धकला से बना है । इनके अतिरिक्त एक कारण बिन्दु भी है । यह तीनों ईकाराक्षरों का कारण है और इसकी स्थिति अकारहकारसामरस्यमय ऊर्ध्व बिन्दु के रूप में है, जिसको काम बिन्दु १. गुणात्मकम्–ख. ने. ज. उ. । २. कथितं–ख. ज. उ. । ३. तत्त्वान्तं–ज. झ. उ. । ४. कार्यं व्यत्यास–ने. ज. झ. । ५. इतः परं केवलं कपुस्तके विद्यमानः पाठोऽग्रे सूक्ष्माक्षरेषु स्थापितः । ६. पञ्चकं पूर्वं कथयित्वे–क. ग. । ७. वायुवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयतीत्याह–ने. ज. झ. उ. । ८. त्रयं नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. ।
१५८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः लक्ष्यं भावयेत् । स्थूलसूक्ष्मविभेदतः । सूक्ष्माणि पृथिव्यप्तेजांसि, स्थूलो वायुरर्वा- चीनेभ्यः । अत एव एवंविधेन ईकारत्रयेणापि लक्षिता बिन्दवः ¹षट्संख्याकाः । कारणं बिन्दुः समष्टिवृत्तं हि, षड्बिन्दुलाञ्छितवृत्तात्मकत्वाद् वायुमण्डलस्य । तदुक्तमभियुक्तैः—"कण्ठादितालुपर्यन्तं वृत्तं षड्बिन्दुलाञ्छितम् । धूम्रम्" इति । [एवमन्यत्रापि— समष्टिबिन्दुना वायुः स्थूलसूक्ष्मप्रभेदतः ।] तद्वायुमण्डलवाचकेन ईकारत्रयेण समष्टिबिन्दुना च स्थूलसूक्ष्मविभेदतो वाय्वादि²भूतचतुष्टयस्थितं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयेदित्यर्थः ॥ ३८-३९ ॥ वायुवाचकैर्वायुगुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयित्वेदानीं तेजोवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं रूपत्रयं लक्षयति—
कहते हैं । इन तीन ईकारों और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार प्रकार के स्पर्श उत्पन्न हुए हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये । इन चतुर्विध स्पर्शों की उत्पत्ति स्थूल-सूक्ष्म के भेद से होती है । इनमें पृथिवी, जल और तेज सूक्ष्म तथा वायु इनसे स्थूल है । ऊपर बताया गया है कि ईकार का स्वरूप दो बिन्दुओं से बना है । तीन ईकारों में मिलकर छः बिन्दु हुए और कारण बिन्दु समष्टि वृत्त का स्वरूप धारण कर लेता है । इस तरह से छः बिन्दुओं से लांछित वृत्ताकार ¹वायुमण्डल का स्वरूप इससे बन जाता है । किसी अभियुक्त ने वायुमण्डल का स्वरूप बताया है—"कण्ठ से तालु पर्यन्त वृत्ताकार छः बिन्दुओं से लांछित वायुमण्डल होता है । यह धूम्र वर्ण का है" । ²[अन्यत्र भी कहा गया है—"स्थूल और सूक्ष्म के भेद से समष्टि बिन्दु वायुमण्डल का बोध कराता है ।"] इस तरह से वायुमण्डल के वाचक तीन ईकार और समष्टि बिन्दु में स्थूल और सूक्ष्म के भेद से वायु प्रभृति चार भूतों में विद्यमान चार स्पर्शों की भावना करनी चाहिये ।।३८-३९।। विद्यागत वायुवाचक अक्षरों से वायु के गुणभूत चार स्पर्शों को लक्षित करने के बाद अब तेजोवाचक अक्षरों में तेजोगत रूपत्रय की भावना बताते हैं—
१. षट् सन्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भूत' नास्ति—ख. ने. ज झ. उ. । १. वायुमण्डल का यह स्वरूप मूल ग्रन्थ (१।४२) में भी बताया गया है । २. कोष्ठक में संस्कृत के जिस अंश की व्याख्या की गई है, वह केवल एक मातृका में उपलब्ध है और पूर्व श्लोक की व्याख्या में महास्वच्छन्दसंग्रह के उद्धरण के बाद रखा गया है । वहाँ उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है, अतः हमने प्रसंग के अनुसार इसको यहाँ रखकर उसका भाषानुवाद किया है ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५९ रूपाणां त्रितयं तद्वत् त्रिभी रेफैर्विभावितम् । रूपाणां त्रितयं वह्निवारिभूमिष्ठानां रूपाणां त्रितयं त्रिभो रेफैर्विभावितं लक्षितम् ॥ ननु रूपं पृथिव्यप्तेजसां साधारणम्, कथं तेजोबीजेन रेफेण लक्षितमित्यत आह— प्रधानं तेजसो रूपं तद्बीजेन हि जन्यते ॥४०॥ १सत्यं त्रिष्वपि भूतेषु विद्यते रूपम्, तथापि वाय्वाकाशयोरभावात् प्रथमं तेजस एव२ रूपं प्रधानम् । पश्चादितरयोर्भूतयोस्तद्बीजेन रेफेण जन्यते ३प्रका- श्यते । जननं प्रादुर्भावः ॥४०॥ पूर्वं तेजोवाचकैरक्षरैस्तेजोगुणं रूपत्रयं लक्षयित्वेदानीमब्वाचकैरक्षरैस्तद्गुणं रसद्वयं लक्षयति— विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैस्तु स्थूलः सूक्ष्मो रसः स्मृतः । इसी तरह से विद्यागत तीन रेफों में तीन रूपों की भावना करे ॥ तेज, जल और पृथिवीगत रूप ही रूपत्रय के नाम से वर्णित है । विद्यागत तीन रेफों से इनकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥ रूप गुण पृथिवी, जल और तेज तीनों में रहता है, तब इसकी उत्पत्ति अग्निबीज रेफ से कैसे मानी जाती है ? इसका समाधान करते हैं— रूप गुण प्रधानतः तेजस्तत्त्व में ही रहता है, अतः उसकी उत्पत्ति अग्निबीज से ही मानी जाती है ॥४०॥ आपका यह कहना ठीक है कि तीनों भूतों में रूप रहता है, तो भी वायु और आकाश में तो यह है नहीं । उसके बाद प्रधानतः इसकी स्थिति सर्वप्रथम अग्नि में ही मानी जाती है । जल और पृथिवी में रूप की उत्पत्ति इसके बाद ही होती है और वह भी अग्निबीज रेफ के द्वारा ही लक्षित होती है । इस तरह अग्निबीज रेफ ही तीनों तत्त्वों में रूप को प्रकाशित करता है । इस पूरे प्रकरण में उत्पत्ति का अर्थ प्रादुर्भाव करना चाहिये ॥४०॥ इस तरह से अग्नितत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रूपों की उत्पत्ति बताने के बाद अब जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से दो प्रकार के रसों की उत्पत्ति बताते हैं— विद्यागत चन्द्रबीजों से स्थूल और सूक्ष्म रस की निष्पत्ति होती है ॥ १ 'सत्यं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'एव' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'प्रकाश्यते' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।
१६० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः १विद्याबीजस्थैश्चन्द्रबीजैः सकारैः। अभिधानमात्रमेतत्। तदुक्तमभि- युक्तैः— व्योमेन्दुवह्न्यधरबिन्दुभिरेकमन्य२द्रक्ताच्छकेन्द्रशिखिभिः सरमार्थचन्द्रैः। अन्यद् द्युशीतकरपावकमन्वमन्तैर्बीजैरमोभिरुदिता त्रिपुरेति विद्या॥ इति। (प्र० सा० ९।३) स्थूलः सूक्ष्मः। स्थूलो रसोऽप्तत्त्वगतः, व्यापकत्वात्। सूक्ष्मो रसो भूतत्त्वगतः, व्याप्यत्वात्। स्मृतः भावितः। स्मृतिर्हि भावना॥ ननु विद्यायां३ सकारत्रयमस्ति, अप्पृथिव्योस्तु रसद्वयमेव, इतरेण सकारेण किमुच्यत इत्यत आह— श्रीविद्या के बीजों में चन्द्रबीज (सकार) भी है। चन्द्रबीज सकार का १अभिधान है, इसमें प्रपंचसार का यह वचन प्रमाण है— व्योम हकार, इन्दु सकार, वह्नि रेफ, अधर ऐकार, बिन्दु अनुस्वार—इन सबके मिलने पर त्रिपुरा विद्या का प्रथम बीज; रक्त हकार, अच्छ सकार, ककार, इन्द्र लकार, शिखी रेफ, रमा ईकार, अर्धचन्द्र बिन्दु—इन सबके मिलने पर द्वितीय बीज तथा द्यु हकार, शीतकर सकार, पावक रेफ, मनु औकार, अमन्त विसर्ग—इन सबके मिलने पर तृतीय बीज बनता है। इन तीन बीजों वाली विद्या ही २त्रिपुरा विद्या कही जाती है। जलतत्त्वगत रस स्थूल (व्यापक) और पृथिवी तत्त्वगत सूक्ष्म (व्याप्य) है, क्योंकि पृथिवी की अपेक्षा जलतत्त्व अधिक व्यापक (बड़ा) है। अतः जलगत रस की स्थूल (व्यापक) रूप में और पृथिवीगत रस की सूक्ष्म (व्याप्य) रूप में भावना की जाती है॥ प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन सकार हैं, जल और पृथ्वी में रस दो ही प्रकार का है, तब तीसरे सकार का क्या प्रयोजन है— १. 'विद्याबीजस्थैः' नास्ति—ख. ने. ज. ब. उ.। २. 'रक्ताच्छ....विद्या' नास्ति— ख. ग. ने. ज. ब.। ३. विद्यायामस्यां—ख. ने. ज. झ. उ.।
- इसका अभिप्राय यह है कि चन्द्र शब्द से सकार का बोध होता है। प्रपंचसार के जिस वचन को यहाँ प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया है, उसमें चन्द्र शब्द से विद्यागत सकार का उद्धार बताया गया है।
- नि० षो० की व्याख्या ऋजुविमर्शिनी (पृ० १०६) में इस श्लोक को आवाहनी विद्या के प्रसंग में उद्धृत किया गया है। इस विद्या का विनियोग त्रिपुरा के आवाहन के लिये किया जाता है, अतः प्रपंचसार में यह त्रिपुरा के नाम से ही संबोधित कर दी गई है।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६१ संबन्धो विदितो लोके रसस्याप्यमृतस्य च ॥४१॥ अमृतस्य सुधाया रसस्यापि संबन्धो लोके विदितः सुरासुरैरपांनिधौ मध्य- माने तत्सारभूतममृतं समुदितमिति पुराणप्रसिद्ध्या¹ लोके विदितः² परिज्ञातः³ । अत्राप्तत्त्वसारभूतत्वात् तद्गुणो रसस्तृतीयसकारेण लक्ष्यते । कोऽर्थः ? अप्त्तत्त्वं स्थूलम्, अमृतं तत्सारभूतं सूक्ष्मम्, तद्व्याप्या पृथिवी च सूक्ष्मा । तेन सलिलामृत- पृथिव्यन्तरे⁴ त्रिधा स्थितो रसो विद्यास्थैस्त्रिभिः सकारैर्लक्ष्यत इत्यर्थः ॥४१॥ पूर्वमब्वाचकैरक्षरैरबगुणं रसत्रयं लक्षयित्वेदानीं पृथिवीवाचकैर्वर्णैः पृथिवीगुणं गन्धं लक्षयति— ⁵वसुन्धरागुणो गन्धस्तल्लिपिर्गन्धवाचिका । वसुन्धरायाः पृथिव्याः, गुणो गन्धः । तल्लिपिः पृथिवीवाचकवर्णो लकारः । गन्धवाचिका गन्धस्य⁶ परिभाषणकरी । लोक में अमृत रस का भी संबन्ध विदित है । इस अमृत का ही तृतीय सकार से बोध होता है ॥४१॥ अमृत (सुधा) के रस का भी संबन्ध लोक में विदित है कि देव और दानवों ने मिलकर क्षीरसमुद्र का जब मन्थन किया था, तो समुद्र के जल से उसके सार के रूप में अमृत निकला था । पुराणवर्णित यह कथा लोक में प्रसिद्ध है । यह अमृत जलतत्त्व का सार है । अतः जल का यह अमृतमय रस विद्यागत तृतीय सकार से लक्षित होता है । इनमें जलतत्त्व स्थूल (व्यापक) है । जलतत्त्व का सारभूत अमृत सूक्ष्म (व्याप्य) है और जलतत्त्व की व्याप्य पृथिवी का रस भी सूक्ष्म (व्याप्य) है । इस तरह जल, अमृत और पृथिवी में विद्यमान त्रिविध रस विद्यागत तीन सकारों से लक्षित होता है ॥४१॥ इस तरह जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रस को लक्षित करने के बाद अब पृथिवीवाचक वर्णों से पृथिवीगत गन्ध गुण की वासना बताते हैं— गन्ध पृथिवी का गुण है । पृथिवी का वाचक वर्ण इस गन्ध को लक्षित करता है ॥ वसुन्धरा (पृथिवी) का गुण गन्ध है । उसकी लिपि, अर्थात् पृथिवी तत्त्व का वाचक वर्ण लकार, गन्ध की वाचिका है, पृथिवीवाचक वर्ण तद्गत गन्ध को भी लक्षित करता है ॥ १. प्रसिद्धं-ख. ने. ज. उ. । २. 'विदितः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. ज्ञातम् । अतोऽमृतसार-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. न्तरस्थितो-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. वसु- नामाऽपि गन्ध-क. । ६. गन्धस्य प्रकाशिका-ने. ज. झ. उ. ११
१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ननु विद्यायां लकारत्रयमस्ति, तत्रैकेन लकारेण पृथिवी १संस्थितो गुणो गन्धो लक्षितः, शिष्टाभ्यां २लकाराभ्यां किं क्रियत इत्यत आह— भुवनत्रयसंबन्धात् त्रिधात्वं तु महेश्वरि ॥४२॥ भुवनत्रयं लोकत्रयम्, तत्संबन्धात् लोकत्रयाधारत्वात्, आधाराधेयभावः३ संबन्धः, तस्मात् संबन्धाद्धेतोः पृथिव्या ४स्त्रिधात्वम्। तेन पृथिवी ५भागत्रयगत- गन्धत्रयलक्षकं लकारत्रयमित्यर्थः ॥४२॥ “हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः” (२।२९) ६इत्यत्र वायुवाचक- तयोक्तस्य७ ककारस्य प्रमातृवाचकत्वेनापि वक्तुं शक्यत्वादन्यैरक्षरैः स्पर्शचतुष्टयं लक्षयित्वेदानीं ककारत्रयेण प्रमातृत्रयं लक्षयति— अशुद्धशुद्धमिश्राणां प्रमातॄणां परं वपुः। क्रोधीशत्रितयेनाथ विद्यास्थेन प्रकाश्यते ॥४३॥ यहाँ पुनः प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन लकार हैं, इनमें से एक से पृथिवीगत गुण गन्ध लक्षित हो जायगा, बाकी दो लकारों का क्या प्रयोजन है ? अब इसी का उत्तर देते हैं— हे महेश्वरि ! भुवन (लोक) तीन होते हैं। इन तीनों भुवनों को लक्षित करने के अभिप्राय से विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥ पृथिवी तीनों भुवनों (लोकों) से संबद्ध है। तीनों लोक इसी पर ठहरे हुए हैं, अतः इनमें परस्पर आधाराधेयभाव संबन्ध है। इस संबन्ध के कारण पृथिवी तीन लोकों के रूप में विभक्त मान ली जाती है। पृथिवी के इन तीन भागों में विद्यमान तीन गन्धों को लक्षित करने के लिये ही विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥ पहले (२।२९) बताया गया है कि हकार से आकाश और ककार से वायुतत्त्व की अभिव्यक्ति हुई। वायुतत्त्व के वाचक विद्यागत ककार तीन प्रमाताओं के भी वाचक हो सकते हैं, अतः महामाया प्रभृति वर्णों से स्पर्शचतुष्टय की वासना (२।३८) बता कर अब यहाँ विद्यागत तीन ककार वर्णों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करते हैं— अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र स्वभाव वाले त्रिविध प्रमाताओं का वासनात्मक स्वरूप विद्यागत तीन क्रोधीश ( ककार ) वर्णों से लक्षित होता है ॥ ४३ ॥ १. 'संस्थितो' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. 'लकाराभ्यां' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. 'भावः' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. स्त्रित्वम्—ख. ने. ज. झ. ड. । ५. भागत्रयाल्लोकत्रय—क. ग. । ६. इत्येवं—ख. ने. ज. झ. ड. । ७. क्तस्यापि— झ. ड. । ८. णां प्र—ख. ने. ज. झ. ड. । ९. न्थितो—ख. ज. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६३ अशुद्धाः प्रमातारो भेद¹धीमात्रसाराः शिवाहमभावभावनाविहीनाः सकलाः पशवः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— पशवस्त्रिप्रकाराः स्युस्तेष्वेके सकला मताः । प्रलयाकलनामानस्तेषां केचिन्महेश्वरि ॥ विज्ञानकेवलास्त्वन्ये तेषां रूपं क्रमाच्छृणु । अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः ॥ शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो² भेदैकरसिको लघुः । सर्वदा कर्मकर्ता³ च स्वकर्मफलभोजकः ॥ नित्यं विषयसंसक्तो⁴ बोध्यः शोध्यः पुमानयम् । इति । शुद्धाः प्रमातारः पक्वमलविज्ञानाः शिवतावन्मात्रसारा ⁵विज्ञानकेवलाः पशवः । तदुक्तं ⁶स्वच्छन्दसंग्रहे— मात्र भेदबुद्धि की ही जिनमें प्रधानता रहती है, ऐसे प्रमाता अशुद्ध वर्ग के अन्त- र्गत आते हैं । मैं शिव ही हूँ, इस तरह की भावना वे नहीं कर पाते । इनको सकल पशु कहा जाता है । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं— पशु तीन प्रकार के होते हैं । कुछ सकल पशु होते हैं । हे महेश्वरि ! इनमें से कुछ प्रलयाकल नाम वाले और दूसरे ¹विज्ञानकेवल नाम वाले बन जाते हैं । तुम इन तीनों पशुओं के स्वरूप को क्रमशः सुनो । अनादि आणव मल से घिरा हुआ, मायीय और कार्म मल से भी आवृत पशु अपने विभु (व्यापक) स्वरूप को खो बैठता है । वह अपने शरीर तक ही सीमित हो जाता है । शिवतत्त्व को वह नहीं जान पाता । उसमें भेदबुद्धि (द्वैत दृष्टि) की ही प्रधानता रहती है । वह बहुत लघु हो जाता है, अपने चंचल (हलके) स्वभाव के कारण अपनी गंभीरता को खो बैठता है । वह सदा अच्छे-बुरे कर्म करता रहता है और फिर अपने किये इन कर्मों का फल भी भोगता रहता है । विषयों में सदा आसक्त रहने वाले इस सकल नाम के पशुप्रमाता का बोधन और शोधन आवश्यक है, मन्त्रोपदेश और दीक्षा द्वारा गुरु को इनका बोधन और शोधन करना चाहिये ॥ मायीय और कार्म मल जिनके परिपक्व हो गये हैं, द्वैत दृष्टि के हट जाने से जो अपने को शिवममय ही समझते हैं, ऐसे शुद्ध प्रमाता विज्ञानकेवल नामक पशु कहलाते हैं । स्वच्छन्दसंग्रह में ये इस तरह से वर्णित हैं— १. 'धी' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. तत्त्वज्ञो—ख. ग. झ. उ. । ३. कान्तारे— ज. । ४. संरक्तो भाव्यः साध्यः—ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. ज्ञान—ख. ने. ज. झ. । ६. महास्व—ख. ग. झ. उ. । १. सिद्धान्त शैव ग्रन्थों में वर्णित विज्ञानाकल को ही यहाँ विज्ञानकेवल नाम से दिया गया है । अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र प्रमाताओं के क्रम के आधार पर यहाँ सकल, विज्ञान-
१६४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः मलमात्रेण संच्छन्नः¹ पशुर्विज्ञानकेवलः । सुपक्वमलविज्ञानकेवलः स स्वयं प्रिये ॥ ²सुतीव्रशक्तिपातेन कुरुते ³तान् स केवलान् । इति । मिश्राः प्रमातारः पुर्यष्टकसूक्ष्मशरीरमात्रसंबद्धाः प्रारब्धकर्मानुभवार्थमनेक- योनिषु संभूय तत्तत्कर्म⁴फलानुभवेन कर्मद्वयसाम्ये सति सुपक्कमलकर्माणो गुरुं विनाऽपि⁵ शिवानुग्रहशालिनः क्रियाज्ञानसाधारणाः प्रलयाकलाः पशवः । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— मिश्राः प्रमातृरूपाः स्युः प्रलयाकलसंज्ञकाः । पुर्यष्टकशरीराश्च स्वस्वकर्मवशात् प्रिये ॥ जो केवल आणव मल से घिरा हुआ है, ऐसे पशु को विज्ञानकेवल कहते हैं। मायीय और कार्म मल के परिपक्व हो जाने से यह विज्ञानकेवल अपने को शिव से अभिन्न मानने लगता है। हे प्रिये ! भगवान् शिव स्वयं ही ऐसे व्यक्तियों को ¹तीव्र- तम शक्तिपात के द्वारा इस तरह की केवलता प्रदान करते हैं ॥ मिश्र प्रमाता वे हैं, जो कि ²पुर्यष्टक के नाम से प्रसिद्ध सूक्ष्मशरीर से संबद्ध हैं। अपने प्रारब्ध कर्मों के फलों का उपभोग करने के लिये अनेक योनियों में जन्म लेकर इन्होंने अन्ततः अपने अनुभव के आधार पर शुभ और अशुभ कर्मों में समता दृष्टि प्राप्त कर ली है और इस तरह से इनका कार्म मल पूर्ण परिपक्व हो गया है। बिना गुरु के भी इनके ऊपर शिव का अनुग्रह हो जाता है और ऐसे व्यक्ति कर्म और ज्ञान में कोई भेद नहीं देखते । इनको प्रलयाकल पशु कहा जाता है। इनका स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह का वर्णन है— मिश्र स्वरूप वाले प्रमाता प्रलयाकल कहलाते हैं। पुर्यष्टक नाम से वर्णित सूक्ष्मशरीर मात्र से ये संबद्ध रहते हैं। हे प्रिये ! अपने-अपने कर्मों के कारण ये अनेक योनियों में जन्म १. संबद्धः-क. ख. । २. स्वतीव्र-ख. ने. झ. उ. । ३. ज्ञांश्च-उ. । ४. 'फल' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'अपि' नास्ति-ख. ज. झ. । केवल और प्रलयाकल यह क्रम दिया गया है। वस्तुतः सकल, प्रलयाकल, विज्ञानकेवल यही क्रम शास्त्रसंमत है। १. तन्त्रसार (पृ० ११९-१२०), तन्त्रालोक (१३।२११-२५४) आदि में प्रथमतः मृदु, मध्य और तीव्र के भेद से तीन प्रकार का तथा इनमें से प्रत्येक के तीन भेद कर नौ प्रकार का शक्तिपात वर्णित है। तीव्रतीव्र शक्तिपात को ही यहाँ तीव्रतम शक्तिपात कहा गया है। २. पुर्यष्टक शब्द की संक्षिप्त और विस्तृत व्याख्या के लिये क्रमशः विज्ञानभैरव (पृ० ५३-५४) की तथा लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग के उपोद्घात (पृ० १३२-१३३) की टिप्पणियाँ देखिये।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६५ सर्वयोनिषु संभूये भोगार्थं स्वस्वकर्मणाम्। भुक्त्वा भोगानि तेषां तु कर्मसाम्ये शिवः स्वयम् ॥ सुपक्वमलकर्माणस्तान् किञ्चिदनुगृह्य च। जलतत्त्वादितत्त्वानां मध्ये लोकेश्वरास्त्रिधा ॥ इति। ²तेषां त्रिविधानां प्रमातृणाम्। वपुः स्वरूपम्। परमन्यत्। क्रोधीशत्रितयेन श्रीकण्ठन्यासपरिपाट्या क्रोधीशः ककारः, तेषां त्रितयेन। विद्यास्थेन बीजत्रित- यस्थेन। प्रकाश्यते व्यज्यते। कोऽर्थः ? बीजत्रयगतककारत्रयेण सकल-विज्ञान- लेते हैं और अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। भोगों का उपभोग पूरा हो जाने पर इनके शुभ और ¹अशुभ कर्म एकसे हो जाते हैं। उस समय भगवान् शिव स्वयं ही इनके ऊपर अनुग्रह करते हैं, क्योंकि इनका कार्म मल पूर्ण परिपक्व हो जाता है। ये तीनों प्रमाता ²जल, तेज और वायु नामक तीन तत्त्वों के अधिपति बन जाते हैं॥ इन त्रिविध प्रमाताओं का उत्कृष्ट स्वरूप, दीक्षा के बाद उत्पन्न हुआ वागीश्वरी देह, विद्यागत तीन ककार वर्णों से लक्षित होता है। ³श्रीकण्ठ न्यास की पद्धति से क्रोधीश ककार का सूचक है। विद्या में तीन क्रोधीश (ककार) हैं। विद्यास्थित इन तीन बीजों से १. संप्राप्य भोगाद्यं-ख. ने. ज. उ. । २. एषां-ख. ने. उ., एवंविधानां-ज. । १. शुभ और अशुभ कर्मों की समान स्थिति को शैव शास्त्रों में कर्मसाम्य नाम दिया गया है। इसके लिये लुप्ता. द्वि. के उपोद्घात (पृ० १५६-१५७) की टिप्पणी देखिये। २. अभी पृ० १३८-१३९ की टिप्पणी में जल से प्रकृति पर्यन्त तत्त्वों में जलतत्त्व की, पुरुष से मायान्त तत्त्वों में तेजस्तत्त्व की तथा ऊपर के तीन तत्त्वों में वायु तत्त्व की स्थिति बताई गई है। तदनुसार दीक्षाप्राप्त सकल जीव प्रकृत्यण्ड का और प्रलयाकल मायाण्ड का अधिपति बन जाता है। विज्ञानकेवल महामाया के साम्राज्य में पहुँच जाता है। सकल प्रमाता तीनों मलों से घिरा हुआ है। प्रलयाकल का कार्म मल परिपक्व हो जाता है और विज्ञानकेवल के मायीय और कार्म दोनों मल। इसका आणव मल बना रहता है। मलों की इस स्थिति के आधार पर भी सकल, प्रलयाकल और विज्ञानकेवल यही क्रम सिद्ध होता है। ३. प्रपंचसार (३।३९-४४) में श्रीकण्ठ से संवर्त पर्यन्त पचास नाम दिये गये हैं। ये अकार से क्षकार पर्यन्त पचास वर्णों के सूचक है। मन्त्रोद्धार के प्रसंग में अकार आदि वर्णों का प्रयोग न कर श्रीकण्ठ आदि पदों का ही प्रायः शास्त्रों में उल्लेख रहता है। इस तरह से अकार से क्षकार पर्यन्त मातृका (वर्णमाला) के न्यास को ही यहाँ दीपिका- कार ने श्रीकण्ठ न्यास के नाम से स्मरण किया है। तदनुसार क्रोधीश पद ककार का सूचक है।
१६६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः केवल-प्रलयाकलाख्यत्रिविधपशुरूपाऽशुद्ध-शुद्ध-मिश्रप्रमातृत्रयस्वरूपं व्यञ्जयत इत्यर्थः ॥४३॥ पूर्वं विद्यास्थक्रोधीशत्रितयेन प्रमातृत्रयं लक्षयित्वेदानीं विद्यास्थश्रीकण्ठद्वादश- मध्ये आद्यदशकेनाव्यक्तम्, अनन्तरेण प्राणम्, चरमेणेशं च लक्षयति— श्रीकण्ठदशकं तद्वदव्यक्तस्य हि वाचकम् । प्राणरूपेः स्थितो देवि तद्वदेकादशः परः² ॥४४॥ श्रीकण्ठदशकं हृल्लेखात्रयवर्जितहकारादिद्वादशाक्षरोपरिगतानामकाराणां मध्ये श्रीकण्ठदशकम्, श्रीकण्ठा अकाराः, तेषां दशकम् । अव्यक्तो ³जीवोऽनादि- मलसंच्छन्नतया स्वशिवत्वापरिज्ञानकारणेन्द्रियादिजडवर्गान्तःपातितया विन्यस्तः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अनादिमलसंच्छन्नो मायाकर्मवृतोऽविभुः । शरीरी शिवतत्त्वाज्ञो⁴ भेदैकरसिको लघुः ।। इति । त्रिविध प्रमाताओं का दीक्षा परिशुद्ध स्वरूप लक्षित होता है। इसका भाव यह है कि विद्या के तीन बीजों में विद्यमान तीन ककारों से सकल, विज्ञानकेवल और प्रलयाकल नामक अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र नामक तीन प्रमाताओं का स्वरूप व्यक्त होता है ॥४३॥ विद्यास्थित तीन ककारों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करने के बाद अब विद्यास्थित बारह श्रीकण्ठ (अकार) अक्षरों में से प्रथम दस में अव्यक्त की, ग्यारहवें में प्राण और बारहवें श्रीकण्ठ में ईश की भावना बताते हैं— विद्यागत दस श्रीकण्ठ (अकार) वर्ण परशिव के समान अव्यक्त जीव के भी वाचक हैं। हे देवि ! ग्यारहवाँ श्रीकण्ठ प्राणरूप है और बारहवाँ परपुरुष स्वरूप है ॥४४॥ तीन हृल्लेखाओं को छोड़कर हकार आदि बारह अक्षरों के आगे बारह अकार विद्या में विद्यमान हैं। इनमें से दस श्रीकण्ठ (अकार) अव्यक्त जीव के वाचक हैं। अनादि मल से घिरा हुआ जीव अपने शिवत्व को पहचान न पाने के कारण यहाँ अव्यक्त के नाम से कहा गया है, क्योंकि वह इन्द्रिय आदि जड़ पदार्थों के अधीन होकर स्वयं भी जड़सदृश हो गया है। स्वच्छन्दसंग्रह के एक श्लोक में इसका स्वरूप बताया गया है। इसका अर्थ १. भूतः-ख. ग. ने. च. छ. ज. झ. । २. इतः परम्—'परो द्वादशकस्तद्वत् पुरुषस्य च वाचकः' इति श्लोकार्धं उमातृकायां दृश्यते । ३. जीवः करणेन्द्रियसंच्छन्नतया स्वशिवत्वं जडवर्गान्तःपातितया च केवलचिन्मात्रतया न मन्यते, अनादिमलसंच्छन्नतया स्वशिवत्वा- परिज्ञानात्—मातृका। ४. —ज्ञोऽपि—मातृका।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६७ तस्य वाचकम् । "अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः" इति संकेतपद्ध- त्युक्तरीत्याऽकारवाच्यः परमशिवः, परमशिवांशत्वात् । तद्वत् परशिववत् । यथा परमशिवोऽकारवाच्यः, तथा तदंशभूतो जीवोऽप्यकोरदशकेनोच्यत इत्यर्थः । तद्वद् जीववत् । यथा शिवांशो जीवः परमशिववाचकश्रीकण्ठेन लक्ष्यते, तद्वद् जीववत् एकादशश्च श्रोकण्ठो जीवाधारभूतप्राणरूपः स्थितः । प्राणो हि जीवस्याधारः, प्राणेन विना जीवस्यानवस्थानात् । परः परो द्वादशः श्रीकण्ठः पुरुषस्य वाचकः, विश्वस्य पूरणात् परमशिवः पुरुषः । तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— विश्वसद्मनि ^२चिदात्मनीश्वरे पूरणात् पुरुषतामुपेयुषि । ये मनः प्रणिदधुर्महर्षयस्तान् पतञ्जलिमुखानुपामहे ॥९॥ इति । श्रुतिरपि—"पुरुष एवेदं सर्वम्" (ऋ०१०।९०।२) इति ॥ ४४ ॥ ननु श्रीकण्ठद्वादशकं विद्यायां विद्यते, एकेन शिवः कथ्यते, एकेन जीवः, एकेन प्राण इति त्रिभिरेवालम्, किमन्यैरित्यत आह— एकः सन्नेव पुरुषो बहुधा जायते हि सः । हम अभी अशुद्ध (सकल) प्रमाता के प्रसंग में कर चुके हैं। संकेतपद्धति के प्रमाण से सभी वर्णों का आदिभूत अकार प्रकाशात्मक परमशिव का वाचक है। जैसे यह प्रकाशात्मक परमशिव का वाचक है, उसी तरह से उसके अंशभूत जीव को भी यह बोधित करता है और जैसे शिवांश जीव परमशिव के वाचक श्रीकण्ठ से लक्षित होता है, उसी तरह से ग्यारहवें श्रीकण्ठ से जीवन का आधारभूत प्राण भी लक्षित होता है। इस जीवात्मा का आधार प्राण ही है। प्राण के बिना जीव जीवित नहीं रह सकता। इसके आगे का बारहवाँ श्रीकण्ठ पुरुष का वाचक है। यह पुरुष विश्व का पूरण करने वाला परमशिव है। चिद्गगनचन्द्रिका में यह वर्णित है— चिदात्मा परमेश्वर जब इस विश्वरूपी घर में अपने को पूरित कर देता है, तो वह (विराट्) पुरुष का स्वरूप धारण कर लेता है। ऐसे पुरुष में जिन्होंने अपने चित्त को समाहित कर दिया है, उन ^१पतंजलि प्रभृति को हम प्रणाम करते हैं ॥ ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में भी कहा गया है—"यह पुरुष ही सब कुछ है" ॥४४॥ यहाँ शंका उठती है कि विद्या में १२ श्रीकण्ठ हैं। इनमें से एक से शिव, दूसरे से जीव और तीसरे से प्राण का बोध हो जायेगा, ऐसी स्थिति में बाकी के श्रीकण्ठों का क्या प्रयोजन है ? इसी का समाधान करते हैं— पुरुष तो एक ही है, किन्तु वह अनेक रूपों में उत्पन्न होता रहता है, अनेक स्वरूप धारण करता रहता है ॥ १. कारेणोच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. शिवात्म-ख. ने. ज. झ. उ., सदात्म-मु. ।
- पातंजल योगसूत्र के "ईश्वरप्रणिधानाद्वा" और "क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः" (१।२३-२४) इन दो सूत्रों की ओर यहाँ इंगित किया गया है।
१६८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः सत्यमेकेन शिव¹ उच्यते, द्वाभ्यां जीवप्राणौ, तथापि स एकः सन्नेव "एक- मेवाद्वितीयं ब्रह्म" (त्रि० म० ना० ३।३), "सच्च त्यच्चाभवत्" (तै० उ० २।६) इत्युपनिषदुक्तरीत्या सद्रूप ²एको हि पुरुषो बहुधा जायते । हिशब्दः प्रसिद्धौ । ³अपि चास्मिन्नर्थे प्रमाणम्—"इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते" (ऋ० ४।७।३३) इति । एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ (ब्र० वि० उ० ११) इति रीत्या⁴ सत्यमेक एव⁵ शिवो भवति, ⁶तथापि जीवप्राणात्मना ⁷बहुधा भिन्न इतीममर्थं द्योतयितुं विद्यायां बहवः श्रीकण्ठाः स्थिता इत्यर्थः ॥ अक्षराणां वासनामुक्त्वा बिन्दूनां नादादीनां च वासनामाह— रुद्रेश्वरसदेशाख्या देवता मितविग्रहाः ॥४५॥ बिन्दुत्रयेण कथिता अमितामितविग्रहाः । शान्तिः शक्तिश्च शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः ॥४६॥ यह शंका ठीक ही है कि एक से पुरुष और बाकी दो अकारों से जीव और प्राण का बोध हो सकता है, किन्तु एक ही सद्रूप पुरुष अनेक रूपों में प्रकट होता रहता है, यह बात अनेक श्रुतियों में वर्णित है और लोक में भी प्रसिद्ध है । महानारायणोपनिषद् कहती है कि "ब्रह्म एक ही है, दूसरा कोई नहीं है" । तैत्तिरीयोपनिषद् का कहना है—"वह ब्रह्म मूर्त और अमूर्त स्वरूप में अभिव्यक्त होता है"। ऋग्वेद का कहना है— "परमैश्वर्य संपन्न ईश्वर अपनी माया शक्ति के सहारे अनेक रूप धारण कर लेता है"। ब्रह्मबिन्दूपनिषद् का कहना है—"एक अकेला ही भूतात्मा प्रत्येक प्राणी में विराजमान है । जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रबिम्ब के समान यह एक और अनेक रूपों में भासित होता रहता है"। इन प्रमाणों के आधार पर जैसे यह सही है कि शिव एक ही है, उसी तरह से यह भी ठीक ही है कि वह जीव, प्राण आदि के रूप में बहुधा भिन्न भी दिखाई पड़ता है । इसी अर्थ को बताने के लिये विद्या में अनेक श्रीकण्ठ (अकार) वर्णों की स्थिति है ॥ अक्षरों की वासना को बताने के बाद अब बिन्दु और नाद की भावना का प्रकार बताते हैं— परिच्छिन्न स्वरूप वाले रुद्र, ईश्वर और सदाशिव की वासना विद्यागत तीन बिन्दुओं में की जाती है और अनन्त अपरिच्छिन्न स्वरूप वाले शान्ति, शक्ति और शिव की वासना तीन नादों में की जाती है ॥४५-४६॥ १. पुरुषः कथ्यते-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. एकोऽपि-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'अपि च' नास्ति-क. ज. झ. उ. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'एव' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ६. 'तथापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'बहुधा' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।
द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६९ रुद्रस्तेजस्तत्त्वाधिपतिः। तेजस्तत्त्वान्तर्भूतं पुरुषरागविद्यानियतिकालकला- मायान्तम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"पुरुषादिकमायान्तं तेजस्तत्त्वं महेश्वरि" इति। १शुद्धविद्येश्वरसदाशिवा वायुतत्त्वात्मकाः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"विद्या चेश्वरसादाख्यौ वायुतत्त्वं समीरिनम्" इति। अतो रुद्रेश्वरसदेशाख्या देवता मितविग्रहाः परिच्छिन्नरूपाः। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"यत् सदाशिवपर्यन्तं विनाशोत्पत्तिसंयुक्तम्" इति। बिन्दुत्रयेण कथिताः। बिन्दुत्रयं त्रिबोजशिखरवर्ति- कामकलोर्ध्वगतानां बिन्दूनां त्रितयम्। अमितामितविग्रहाः शान्तिः शक्तिश्च शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः। शान्तिरव्यक्तध्वनिलक्षणो नादोऽखिलं जगदधरीकृत्य यत्र लयमेति सा ब्रह्मरन्ध्रावसानभूमिः, ऊर्ध्वशक्तीनां प्रशान्तिस्थानहेतुत्वात्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— नाड्याधारस्तु २नादो वै भित्त्वा सर्वमिदं जगत्। अधःशक्त्या ३विनिर्गत्य ऊर्ध्वशक्त्यवसानकः॥ यहाँ रुद्र तेजस्तत्त्व का अधिपति है। इस तत्त्व में पुरुष, राग, विद्या, नियति, काल, कला और माया ये सात तत्त्व अन्तर्भूत हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— "हे महेश्वरि ! पुरुष से माया पर्यन्त तत्त्व तेजस्तत्त्व का विस्तार है"। शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव वायुतत्त्वात्मक हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में इसका भी प्रतिपादन है— "विद्या, ईश्वर और सादाख्य तत्त्व वायुतत्त्वात्मक हैं"। तेजस्तत्त्व और वायुतत्त्व के अन्तर्गत होने से रुद्र, ईश्वर और सदाशिव नामक देवता परिच्छिन्न स्वरूप वाले हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"सदाशिव पर्यन्त सभी तत्त्व उत्पत्तिविनाशशील हैं"। इनका बोध विद्यागत तीन बिन्दुओं से कराया गया है। ये तीन बिन्दु तीनों बीजों के शिखर पर विराजमान कामकला के ऊपर स्थित है। अनन्त अपरिच्छिन्न स्वरूप वाले शान्ति, शक्ति और शम्भु का बोध तीन नादों से होता है। अव्यक्त ध्वनिरूप नाद समस्त जगत् को लांघ कर जहाँ लीन होता है, वह ब्रह्मरन्ध्र की अवसानभूमि यहाँ १शान्ति के नाम से कही गई है, क्योंकि ऊपर की सभी शक्तियाँ यहाँ पूर्ण शान्ति (विश्राम) का अनुभव करती हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में यह इस तरह से वर्णित है— नाड़ियों के सहारे उठने वाला नाद इस सारे जगत् को भेद कर आधार शक्ति से निकल कर ऊपर सहस्रदल कमल में स्थित शक्ति में लीन हो जाता है। अव्यक्त ध्वनि १. ईश्वरसदाशिवौ वायुतत्त्वात्मकौ-ख. ने. ज. झ. उ.। २. नादान्तो-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. विनिर्भिद्य-ख. ने. ज. झ. उ.। १. ब्रह्मरन्ध्र की अवसान भूमि में स्थित शान्ति नामक नाड़ी की चर्चा अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। इस प्रसंग में भास्करराय की शान्ति पद की ब्रह्मपरक व्याख्या सम्प्रदाय सम्मत नहीं जान पड़ती।
१७० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ] 'नाड्यां ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिलक्षणः । इति । शक्तिरूर्ध्वशक्तिः, उपरिगतं शक्तितत्त्वम् । तदुक्तमत्रैव— ब्रह्माणी त्वपरा शक्तिर्ब्रह्मणोत्सङ्गगामिनो । द्वारं सा मोक्षमार्गस्य रोधयित्वा व्यवस्थिता ॥ तां भित्त्वा तु वरारोहे ऊर्ध्वशक्तिं परां शिवाम् । शक्तितत्त्वात्मिकां देवीं प्रसुप्तभुजगाकृतिम् ॥ शक्तितत्त्वं समाख्यातं भुवनैरावृतं महत् । इति । शम्भुः२ शिवतत्त्वं शक्तितत्त्वोपरि स्थितम् । तदुक्तमत्रैव—"शिवतत्त्वं समा- ख्यातं तदूर्ध्वं शक्तितत्त्वतः" इति । अमितामितविग्रहाः । एतेऽनन्ता अपरिच्छिन्न- रूपाः, व्योमतत्त्वान्तर्गतत्वात् । तदुक्तमत्रैव—"३शक्तितत्त्वं शिवो व्योम" इति । नादत्रितयबोधनाः । वाग्भवकामराजशक्तिबीजोपरिगतबिन्दुत्रयोपरिगतरोधिनो- त्रितयोर्ध्वं४गतानां नादानां त्रयमेषां क्रमेण बोधकं लक्षकम्, तेन नादत्रितय- बोधनाः । वाग्भवबीजोपरिगतबिन्दू परिवर्तिना नादेन शान्तिः, कामराजबीज- वाला यह नाद ब्रह्मबिल (ब्रह्मरन्ध्र) में स्थित नाडी (शान्ति) में लीन हो जाता है ॥ शक्ति का अर्थ है ऊर्ध्वशक्ति, ऊपर स्थित सहस्रदल कमल में विद्यमान शक्ति । इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में मिलता है— ब्रह्मा की गोद में बैठी ब्रह्माणी अपरा शक्ति मानी जाती है। यह मोक्ष के मार्ग के द्वार को रोक कर बैठी रहती है। हे वरारोहे ! इस शक्ति को भेद कर ऊर्ध्वशक्ति के पास पहुँचना चाहिये । यह परा शक्ति सोये हुए सर्प की सी आकृति वाली है। इसी को शक्तितत्त्व भी कहते हैं। यह शक्तितत्त्व अनेकों भुवनों से आवृत है। यह महान् विस्तार वाला है ॥ शम्भु का अर्थ है शिवतत्त्व । यह शक्तितत्त्व के ऊपर स्थित है। इसका भी वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में है—"इसको शिवतत्त्व कहते हैं। यह शक्तितत्त्व से ऊपर है"। शान्ति, शक्ति और शम्भु ये तीनों अपरिमित अनन्त स्वरूपों वाले हैं, क्योंकि इनका अन्तर्भाव व्योमतत्त्व में बताया गया है। जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में कहा गया है—"शक्तितत्त्व और शिवतत्त्व व्योममय (आकाशमय) हैं"। इन तीनों का स्वरूप तीन नादों से बोधित होता है। वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज के ऊपर तीन बिन्दु हैं। इन तीनों के ऊपर, तीनों रोधिनी कलाओं के ऊपर, तीन नाद स्थित हैं। ये तीन नाद ही इनके बोधक हैं। इनमें १. नाड्या-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. शम्भुः शिवः-ख. ज. झ. उ. । ३. शिव-ख. ने. । ४. भागगतानां-ख. ने. ज. झ. उ. ।