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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

३७८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः धृतिः" इत्यादिस्रवच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेषु¹ विहितः, तद्युक्तैः । वीरैः, अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः । पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वभावमशिवापहम् ॥ (श्लो० ५०) इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्या भेदप्रतीति²साधनस्य इदन्तारिपोरहमि ³सम- राङ्गणे प्रलयप्रतिपादनपरा⁴ वीराः, तैः सह पूजयेत्⁵ । तन्त्राचारपरिभ्रष्टैः प्रपञ्चव्रतशालिभिः । पशुभिः क्षुद्रकर्मस्थैर्न कुर्याद् द्रव्यमेलनम्⁶ ॥ इत्यादिवचनसिद्धैः सह न पूजयेदित्यर्थः ॥१९१॥ ननु कस्मिन्नक्षत्रे कस्मिन् वारे कस्मिन् वा दिने पूजेयं कार्येत्यत आह— ⁷पुष्यभेन तु वारे च सौरे च परमेश्वरि ॥१९१॥ गुरोर्दिने स्वनक्षत्रे चतुर्दश्यष्टमीषु च । में—'गुरुभक्ति, शान्ति, पूजा, श्रद्धा, क्षमा, धृति' इत्यादि का कौलाचार में परिगणन किया गया है। इन आचारों का पालन करने वाले वीर कहलाते हैं। परापञ्चाशिका में वीरों का स्वरूप इस तरह से वर्णित है— इदन्ता रूपी शत्रु का अहन्ता में विलय करने के प्रयास में लगा साधक सभी प्रकार के अमंगल का नाश कर देने वाले स्व-स्वरूप को प्राप्त कर लेता है ॥ इसके अनुसार भेदप्रतीति का जो साधन है, उस इदन्ता रूपी शत्रु का सामना करते हुए जो व्यक्ति उसको अभेद प्रतीति के सहारे अपनी अहन्ता में एकरस कर देता है, वही वस्तुतः वीर है। ऐसे वीरों के साथ भगवती की पूजा करनी चाहिये। कहीं कहा गया है— तन्त्राचार से परिच्युत, प्रपंच भरे व्रतों का पालन करने वाले, क्षुद्र कर्मों के अनुष्ठान में लगे हुए पशुओं के साथ द्रव्यमेलन न करे ॥ इस वचन में जिन अज्ञ जनों का उल्लेख किया गया है, उनके साथ उक्त पूजाविधि का अनुष्ठान नहीं करना चाहिये ॥१९१॥ अब प्रश्न होता है कि किस नक्षत्र, वार और दिन में इस पूजा का अनुष्ठान करना चाहिये, इसका उत्तर देते हैं— हे परमेश्वरि ! पुष्य नक्षत्र से युक्त रविवार के दिन, गुरु के जन्म और मृत्यु के दिन, अपने जन्म नक्षत्र में, चतुर्दशी और अष्टमी के दिन चक्रगत योगि- १. शास्त्रे-ख. ज. झ. उ. । २. सारस्य-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. रणाङ्गणे-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. परैः सह-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. इतः परम्-'न तु कातरैः सह पुत्रदारपरिभ्रष्टैः' इत्यधिकं-उ. । ६. भोजनम्-ख. ने. झ. । ७. नित्यं पुष्यदिने वारे- ख. ने. च. छ. ज. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३७९ चक्रपूजां विशेषेण योगिनीनां समाचरेत् ॥१९२॥ "नित्यं सम्पूजयेद् देवीं सासनां सावृतिं क्रमात्" इति स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेषु १यद्यपि प्रतिदिनं पूजा विहिता, तथापि पुष्यभेन पुष्यनक्षत्रेण सह सौरे वारे, गुरो२रुदयव्याप्त्योर्दिने, स्वनक्षत्रे च, चतुर्दश्यष्टमीषु तिथिषु च, चक्रपूजां चतु- रस्रादिबैन्दवान्तचक्रगतानां देवतानां पूजां विशेषेण समाचरेत्। नित्यपूजा३वन्न भवति, किन्तु नैमित्तिकतया ४अष्टाष्टकादियोगिनीगणप्रीणनपुरःसरं पूजये- दित्यर्थः ॥१९१-१९२॥ ननु५ चक्रेऽष्टाष्टकपूजनं कथं संगच्छत इति शङ्कामपनुदन् विशेषपूजामेव विवृणोति— चतुःषष्टिर्यतः कोट्यो योगिनीनां महौजसाम् । चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिता वीरवन्दिते ॥१९३॥ अष्टाष्टकं तु कर्तव्यं वित्तशाठ्यविवर्जितम् । ७त्रैलोक्यमोहनचक्रनिवासिनीनां ब्राह्म्यादीनामंशभूता अक्षोभ्याद्याश्चतुःषष्टि- नियों (शक्तियों) की पूजा विशेष रूप से करे ॥१९१-१९२॥ स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"आसन और आवरण देवताओं के साथ देवी की नित्य पूजा करे"। इस तरह से यद्यपि प्रतिदिन पूजा का विधान है, तो भी पुष्य नक्षत्र से संयुक्त रविवार के दिन, अपने गुरु के उदय (जन्म) और व्याप्ति (मरण) की तिथि में, अपने जन्म नक्षत्र के दिन और चतुर्दशी तथा अष्टमी तिथियों के आने पर चतु- रस्र से बैन्दव पर्यन्त चक्रों में विराजमान देवताओं की पूजा विशेष रूप से करनी चाहिये । नित्य पूजा की तरह इसका सामान्य अनुष्ठान न कर इन नैमित्तिक अवसरों पर विशेष पूजा का आयोजन करे । इसका अभिप्राय यह है कि अष्टाष्टक विधान द्वारा योगिनियों की पूर्ण तृप्ति के लिये विशेष पूजा का अनुष्ठान करे ॥१९१-१९२॥ श्रीचक्र में अष्टाष्टक पूजा की विधि कैसे संभव हो सकती है ? इस शंका का परि- हार करते हुए विशेष पूजा का विधान बताते हैं— हे वीरवन्दिते ! महाप्रभावशालिनी ६४ करोड़ योगिनियां इस चक्र में निवास करती हैं । अतः धन के लोभ को छोड़कर इस चक्र में अष्टाष्टक पूजा का अनु- ष्ठान करना चाहिये ॥१९३-१९४॥ १. 'यद्यपि' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. गुरुदय—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. तु न—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. 'अष्टाष्टकादियोगिनीनाम्' इत्येव—ख. ने. ज. ड. । ५. 'ननु'''' विवृणोति' नास्ति—ख. ने. ज. । ६. षष्टियुताः—क. ग. ड. । श्लोक एव नि० षो० (४।१७) इत्यत्रापि वर्तते । तत्रापि यत इत्येव पाठः । ७. 'त्रैलोक्यमोहन' नास्ति—ज. झ. ।

३८० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः योगिन्यः, तासां प्रत्येकमंशभूतानां कोटि१संख्याकानाम्, महौजसां महाप्रभाव- शालिनीनाम्, योगिनीनामुक्त(१।२, २।१७, २।७९) लक्षणानां मिलित्वा२ चतुः- षष्टिकोटयो यतश्चक्रमेतत् समाश्रित्य संस्थिताः । ३मध्यमभूगृहान्तश्चतुःषष्टि- कोटियोगिनीसमष्टिभूतानामक्षोभ्यादीनाम्, अष्टाष्टकम् अष्टकानामष्टकम्, वित्त- शाठ्यविवर्जितं स्वस्व४विभववञ्चनाहीनं यथा भवति तथा कर्तव्यम् । ५अत्र कृतिर्नाम ६पूजनक्रियायोगोऽभिप्रेतः ॥१९३-१९४॥ ननु तासां पूजने किमायातं ममेत्यत आह— त्वमेव तासां रूपेण क्रीडसे विश्वमोहिनि ॥१९४॥ त्रैलोक्यमोहन चक्र में निवास करने वाली ब्राह्मी आदि आठ योगिनियों की अंशभूत १अक्षोभ्या आदि चौसठ योगिनियाँ हैं । इनमें से भी प्रत्येक योगिनी के अंश से एक एक करोड़ योगिनियाँ निकलती हैं और इनकी संख्या ६४ करोड़ हो जाती है । ये योगिनियाँ महाप्रभावशालिनी हैं । योगिनियों का स्वरूप पहले (१।२, २।१७, २।७९) बताया जा चुका है । ये सब चौसठ करोड़ योगिनियाँ इसी श्रीचक्र में निवास करती हैं । यहाँ मध्य भूगृह में ६४ करोड़ योगिनियों का प्रतिनिधित्व करने वाली अक्षोभ्या प्रभृति ६४ योगिनियों की २अष्टाष्टक (आठ अष्टक) क्रम से पूजा करनी चाहिये । ऐसा करते समय अपने वैभव के अनुसार दिल खोल कर धन खर्च करना चाहिये, इसमें कंजूसी नहीं दिखानी चाहिये । यहाँ कृति (कर्तव्य) पद का संबन्ध पूजन क्रिया से जोड़ना अभिप्रेत है, अर्थात् अष्टाष्टक पूजा करते समय धन का संकोच नहीं करना चाहिये ॥१९३-१९४॥ प्रश्न उठता है कि ऐसा करने से मुझे क्या मिलेगा ? इसी का उत्तर देते हैं— सारे विश्व को मोहित करने वाली तुम ही इन योगिनियों के रूप में क्रीडा करती हो ॥१९४॥ १. कोटिकोटि—ख. ने. झ. । २. इत्युक्तत्वात्—ख. ने. ज. झ. ड. । ३. मध्यभू- गृहोदित—क. ग. उ. । ४. वित्त—क. ग. उ. । ५. 'अत्र कृतिर्नाम' नास्ति—ख. ज. । ६. यागपूजित—ख. ज. झ. । १. अक्षोभ्या आदि चौसठ योगिनियों के नाम प्रतिष्ठा लक्षणसारसमुच्चय (६।३२७- ३३५) में ब्रह्मयामल के प्रमाण से दिये गये हैं । २. अष्टाष्टक शब्द का अर्थ पृ०२११ की दूसरी टिप्पणी में दिया जा चुका है । ब्राह्मी आदि आठ योगिनियों तथा स्वच्छन्द आदि आठ भैरवों में से प्रत्येक के आठ आठ स्वरूप मिलकर इस अष्टाष्टक पद को सार्थक करते हैं । इन चौसठ युगल स्वरूपों की अर्चाविधि ही अष्टाष्टक पूजा कहलाती है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८१ प्रकाशात्मनो विश्वबोधकस्य ममांशभूता विमर्शरूपिणी त्वमेव बैन्दवचक्रगता, विश्वमोहिनी संसारित्वोपपादनकारिणी, तासां ब्राह्माद्यादीनामक्षोभ्यादीनां च रूपेण क्रीडसे, एका सती भगवतो परमार्थतोऽपि संदृश्यसे बहुविधा ननु नर्तकीव । (अ० स्त० १८) इत्यभियुक्तोक्तरीत्या तत्तद्रूपेण परिणमसे । अतस्त्वदंशभूतयोगिनीयजनेन त्वमेव प्रीणासीत्यर्थः ॥१९४॥ ननु व्युत्पत्तिबलादेवागमार्थमवगम्य तत्तत्तन्त्रोदितपूजादिषु प्रवृत्तिः स्यात् किं गुरूपदेशेनेत्याशङ्क्याह— अज्ञात्वा तु कुलाचारमयष्ट्वा गुरुपादुकाम् । योऽस्मिन् शास्त्रे प्रवर्तेत तं त्वं पीडयसि ध्रुवम् ॥१९५॥ स्वप्रकाशशिवमूर्तिरेकिका तद्विमर्शत नुरेकिका तयोः । सामरस्यवपुरिष्यते परा पादुका परशिवात्मनो गुरोः ॥ (चि०१) अपनी प्रकाशात्मकता के कारण सारे विश्व का बोध कराने वाले मुझ शिव की अंशभूत तुम विमर्शरूपिणी शक्ति हो । तुम ही बैन्दव चक्र में निवास करने वाली और सारे विश्व को मोह में डालकर इस संसार-चक्र को चलाने वाली हो । तुम ही ब्राह्मी प्रभृति और अक्षोभ्या प्रभृति योगिनियों के आठ और चौसठ स्वरूपों को धारण कर इस विश्व में क्रीडा करती हो । अम्बास्तवकार ने ठीक ही कहा है— भगवती परमार्थतः (वास्तव में) एक ही है । ऐसा होने पर भी नर्तकी (नटी) जैसे अभिनय करते समय अनेक रूप धारण करती है, उसी तरह से यह देवी भी हमारे सामने अनेक रूपों में प्रकट होती है ॥ इस प्रकार बैन्दव चक्रनिवासिनी भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही इन योगिनियों के रूप में परिणत होती है । अतः तुम्हारी अंशभूत इन योगिनियों की पूजा करने पर यह तुम्हारी ही पूजा होती है, तुम ही इस पूजा से प्रसन्न होकर अपने भक्तों पर अनुग्रह करती हो, उनकी मनोकामना पूरी करती हो ॥१९४॥ यहाँ शंका उठती है कि शास्त्रीय व्युत्पत्ति के आधार पर आगमशास्त्र के अर्थ को जानकर उन उन तन्त्रों में बताई गई पूजाविधि का ज्ञान हो जायगा । ऐसी स्थिति में गुरु की क्या आवश्यकता है ? इसका समाधान करते हैं— कुलाचार को बिना जाने, गुरुपादुका की बिना पूजा किये, जो व्यक्ति इस शास्त्र में प्रवृत्त होता है, उसको तुम निश्चय ही पीडा पहुँचाती हो ॥१९५॥ १. श्यते—ख. ने. ज. झ. उ. । २. यसे—क. ज. ड. ।

३८२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १इत्यस्मदुक्तरीत्या २त्रिधामगुरोः । “अविदित्वा कुलाचारं कुलं कौलिक- दर्शनम्” । तत्राचारः स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रे विहितः, तं गुरुमुखाद्विज्ञाय योऽ- स्मिन् शास्त्रे प्रवर्तेत ३योऽस्मिन् ४साधने प्रवर्तेत, तदुक्तार्थचरणपरो भवेत्, तं चुम्बकं५ साधकाधमम्, त्वं६ डाकिनीक्रूरयोगिनीरूपेण साधकमांसमज्जादिशोष- णादिरूपेण पीडयसि गृह्णासि, ध्रुवं नात्र शङ्का। अतो गुरुमुखादेवा७खिलागमा- र्थानवगम्यास्मिन् शास्त्रे प्रवर्तितव्यम्, अन्यथा निष्फलं स्यादित्यर्थः ॥१९५॥ एवं ज्ञात्वा वरारोहे कौलाचारपरः सदा । आवयोः शबलाकारं ८मद्यं मांसं निवेद्य च ॥१९६॥ त्वत्प्रथाप्रसराकारैस्त्वामेव ९परिभावयेत् । स्वयं प्रकाशस्वरूप शिव की एक मूर्ति है और उसका विमर्शशक्तिमय दूसरा शरीर है। इन दोनों के सामरस्यमय शरीर से परा पादुका बनती है, जो कि परमशिव स्वरूप गुरु का देह है ॥ इस तरह से स्वयं व्याख्याकार ने अपने १चिद्विलास स्तव में गुरु के प्रकाश, विमर्श और सामरस्यमय तीन तेजस्वी स्वरूपों का वर्णन किया है। इस गुरु से कुलाचार, कुल और कौलिक दर्शन को बिना जानकारी प्राप्त किये किया गया सारा अनुष्ठान निष्फल हो जाता है। स्वच्छन्दसंग्रह प्रभृति शास्त्रों में कुलाचार का उपदेश किया गया है, किन्तु उसको गुरुमुख से जानकर ही इस शास्त्र में प्रवृत्त होना चाहिये। जो गुरुमुख से बिना जाने इस शास्त्र में विहित अनुष्ठान में प्रवृत्त होता है, वह चुम्बक है, अधम साधक है। ऐसे साधक को तुम डाकिनी, क्रूर योगिनी का स्वरूप धारण कर, उस साधक के मांस, मज्जा आदि धातुओं का शोषण कर, पीड़ा पहुँचाती हो, इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिये। इसलिये गुरुमुख से ही समस्त आगमशास्त्र का अर्थ जानकर इस शास्त्र में प्रवृत्त होना चाहिये, अन्यथा सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है ॥१९५॥ हे वरारोहे ! ऐसा जान कर कौलाचार का पालन करते हुए साधक को चाहिए कि वह शिव और शक्ति के शबलित आकार वाले मद्य और मांस को समर्पित कर विमर्श शक्ति के स्पन्दन से निकले सभी आकार एकमात्र तुम्हारे ही स्वरूप हैं, ऐसी भावना करे ॥१९६-१९७॥ १. इत्यभियुक्तोक्त-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । २. 'त्रिधाम' नास्ति-क. । ३. 'यः' नास्ति-क. ग. उ. । ४. शास्त्रे पूर्वोक्तपरमहितपरदेवतायजनपरमार्थसाधक- स्तुदु-क. ग. । ५. कसाधकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ६. 'त्वं डाकिनीक्रूरयोगिनीरूपेण' नास्ति-ख. ग. ने. ज. झ. । ७. खिलमप्यव-क. ग. । ८. मद्यं तत्र-क. ख. ग., देवि तच्च-च. छ. ज. झ., मद्यं तव-उ. । मद्यं मांसमिति दीपिकाव्याख्यातः पाठः । ९. स्त्वय्येव-ख. ने. छ. ज. झ. उ. । यह श्लोक पहले ही दो बार (पृ० ३४०, ३३६) उद्धृत हो चुका है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८३ वरारोहे "वरारोहा मत्तकाशिन्युत्तमा वरवर्णिनी" (अ० को० २।६।४) इति निघण्टुः । एवम् उक्तप्रकारेण, ज्ञात्वा गुरुमुखादेव। कौलाचारपरः, कौलिकाः पूर्वोक्त(३।१४४,१९१)लक्षणाः, तेषां विहिताः स्वच्छन्दसंग्रहादिशास्त्रेष्वाचाराः, सदा तदनुष्ठानपरः । आवयोः प्रकाशविमर्शात्मनोः, शबलाकारम् “सुरा शक्तिः शिवो मांसमानन्दो मोक्ष उच्यते” इत्यभियुक्त^१वचनोक्तरीत्या सामरस्या- पादनरूपं तत्पूर्वोक्त(३।९८-१०३)रीत्या शोधितममृतीकृतं ^२मद्यं मांसं निवेद्य । आवयो^३रित्थेव योज्यम् । त्वत्प्रथाप्रसराकाराः । तव विमर्शशक्तेः, प्रथा स्पन्दः, तत्प्रसराः तदुद्भूताः, आकारा यासामावरणदेवतानाम्, तास्तथाविधाः, ^४त्वामेव त्वदन्यतो न ^५प्रथायाताः परिभावयेत्, वरारोहा, मत्तकाशिनी, उत्तमा और वरवर्णिनी—इन चार शब्दों का प्रयोग अमर- कोश में उत्कृष्ट गुणों वाली स्त्री के लिये किया गया है। भगवान् शिव यहाँ देवी को 'वरारोहे' कहकर संबोधित कर रहे हैं। कौलिक पद की व्याख्या पहले (३।१४४,१९१) की जा चुकी है। इनके आचारों का वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह^१ आदि शास्त्रों में किया गया है। ऊपर बताई गई विधि को गुरुमुख से जानकर कौलाचारपरायण साधक को चाहिये कि इन आचारों का सदा पालन करते हुये प्रकाश और विमर्श स्वरूप शिव और शक्ति के शबल आकार को, शिव और शक्ति के सामरस्यमय स्वरूप को, अभिव्यक्त करने वाले मद्य और मांस को पूर्व प्रदर्शित (३।९८-१०३) अर्घ्यशोधन विधि से पवित्र, अमृतस्वरूप बना कर हम दोनों को समर्पित करे। किसी प्रामाणिक व्यक्ति के वचन के अनुसार—“सुरा शक्ति का, शिव मांस का और आनन्द मोक्ष का वाचक है”। तद नुसार 'आवयोः' पद की आवृत्ति कर पहले इसका संबन्ध मद्य और मांस से तथा बाद में शिव और शक्ति से जोड़ा जाता है, अर्थात् शिवशक्तिमय इन द्रव्यों को शिवशक्ति को ही समर्पित कर देना चाहिये। 'तत्प्रथाप्रसराकाराः' इस समस्त पद का अर्थ है—तुम्हारे, विमर्श शक्ति के स्पन्दन से जिन आकारों, आवरण देवताओं की उत्पत्ति हुई है, वे सब आकार। ये सब आकार तुम ही हो, तुमसे ये आकार अलग नहीं हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये। सुभागोदयकार शिवानन्द मुनि ने कहा है— १. क्तोक्त- ज. उ. । २. 'मद्यं मांसं' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. योनियो- क. ग. । ४. त्वमेव-ज. ने. झ. उ. । ५. पृथग्भूताः-क. ग., पृथग्याताः-ख. ने. उ. । १. पहले (३।१९१) उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में संक्षेप में इन आचारों का उल्लेख हो चुका है।

३८४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः मूलोद्भवं शक्तिचक्रं यतस्तन्मयतां गतम् । तस्मिन्नेवाव्यये धाम्नि विलीनं परिभावयेत् ॥(सु० ६७) इत्यभियुक्तोक्तवचनोक्तरीत्या विमर्शशक्तिविलासभूताद्याकारायास्ता आवरण- देवतास्तत्रैव विलीना विभावयेदित्यर्थः ॥१९६-१९७॥ त्वामिच्छाविग्रहां देवीं गुरुरूपां विभावयेत् ॥१९७॥ ²त्वन्मयस्य गुरोः शेषं निवेद्यात्मनि योजयेत् । देवीं ³विश्वरूपिणीं विश्वानुजिघृक्षया गृहीतलीलाविग्रहाम्, ⁴इच्छाविग्रहा- मित्यर्थः। त्वामेव गुरुरूपां विभावयेत् । त्वन्मयस्य त्वद्रूपस्य, गुरोस्तद्धेतुं निवेद्य, शेषं देवतागुरुनिवेदितशेषम्, आत्मनि योजयेत् । यावत् साधकस्ताभ्यां समरसी- भवति, तावच्छेषं स्वयमुपयुञ्जीतेत्यर्थः ॥१९७-१९८॥ बलिनिवेदनमाह— प्रकाश-विमर्श-सामरस्यात्मक मूल-स्वरूप (त्रिपुरा) से उत्पन्न हुआ यह आवरण देवताओं का शक्तिचक्र अब पुनः तन्मय हो गया है, उसी अव्यय तत्त्व में लीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये ।। इस तरह से विमर्श शक्ति के विलासभूत आद्या भगवती त्रिपुरसुन्दरी के स्वरूप से निकला यह सारा आवरण देवताओं का समूह पुनः उसी मूलस्वरूप से विलीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥१९६-१९७॥ इच्छानुसार स्वरूप धारण करने वाली तुम देवी को ही अपना गुरु माने और तुमको ही नैवेद्य चढ़ाकर देवता और गुरु की पूजा के बाद बचे नैवेद्य को स्वयं ग्रहण करे ॥१९७-१९८॥ भगवती त्रिपुरसुन्दरी देवी ही विश्व का स्वरूप धारण करती है, विश्व पर अनुग्रह करने की इच्छा से वह लीलामय स्वरूपों को धारण करती रहती है। अतः साधक को चाहिये कि वह गुरु के रूप में तुम्हारा ही ध्यान करे । गुरु भगवतीमय है, ऐसी भावना करके वह गुरु को हेतु द्रव्य समर्पित करे और इसके बाद, देवता और गुरु को समर्पित करने के बाद, बचे हुए द्रव्य को स्वयं ग्रहण करे । जितने द्रव्य के ग्रहण से साधक देवता और गुरु के साथ सामरस्यमय स्थिति का अनुभव करता है, उतने ही द्रव्य को वह ग्रहण करे ॥१९७-१९८॥ इसके बाद बलि का निवेदन करे— १. युक्तोक्त्या—ख. ने. झ. उ. । २. शेषं गुरोर्निवेद्याऽपि पश्चादात्मनि-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. विमर्श—ख. ने. ज. झ. । ४. 'इच्छाविग्रहाम्' नास्ति-क. ज. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८५ योगिनीनां महादेवि बटुकायात्मरूपिणे ॥१९८॥ क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना । योगिनीनां पूर्वोक्त(२।३९)रीत्या मातृमानमेयमरोचीनाम्। आत्मरूपिणे परमानन्दस्पन्दरूपिणे बटुकाय। क्षेत्राणां पतये, क्षेत्राणि शरीराणि, तेषां पति- र्जीवात्मा, तस्मै। मह्यं मदहन्ताविष्टाय। हेतुना मद्येन सद्वितीयेन। बलिं कुर्वीत। श्वासद्वयनिरोधेन कुण्डलोत्रयमेलनात्। यज्जीवशिवयोरैक्यं तेनासावान्तरो बलिः॥ हे महादेवि ! योगिनियों के प्राणस्वरूप बटुकभैरव को और मुझ क्षेत्रपाल को इसके बाद हेतु द्रव्य से बलि देनी चाहिये ॥१९८-१९९॥ संवित्स्वरूपिणी भगवती की माता, मान और मेयमय किरणें ही पहले (२।७९) बताई गई पद्धति से योगिनियाँ¹ कहलाती हैं। इन योगिनियों के लिये परम आनन्द को स्पन्दित करते हैं भगवान् स्वात्मस्वरूप बटुकभैरव। क्षेत्र शरीर को कहते हैं। इनका पति है जीवात्मा। यह जीवात्मा मुझ शिव के साथ अहन्ता स्थापित किये हुए है, शिवाहन्ता से ओतप्रोत है। इस तरह से इन गुणों से अलंकृत बटुक और क्षेत्रपाल को द्वितीय द्रव्य १. मातृस्वरूपिणे-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. अमृतानन्द ने यहाँ (पृ० ६-७, ११९, २११) योगिनी शब्द की चार तरह की व्याख्या की है। योगिनीहृदय शब्द की व्याख्या के प्रसंग (पृ० ६-७) में वे कहते हैं कि इस ग्रन्थ में योगिनी (स्वसंवित्स्वरूपिणी भगवती त्रिपुरा) का हृदय (स्वरूप) उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे सामान्य जन के हृदय में अपना ज्ञान उन्मिषित होता है। यहाँ योग का अर्थ है जगत् की सारी वस्तुओं के साथ अपनी संवित् (ज्ञान) का समवाय (अविनाभाव) संबन्ध। इससे भासित होने वाली है योगिनी। दूसरी जगह (पृ० ११९) योगिनी और वीरशब्द की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि जिनका शिव के साथ योग, नित्य संपर्क बना रहता है, वे योगिनियाँ कहलाती हैं। ये हैं विमर्श शक्ति की अंशभूत इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों से अभिव्यक्त हुई भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक शक्तियाँ। वीर पद का अर्थ पहले (१।६५) बता दिया गया है। प्रकाश की अंशभूत वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों से अभिव्यक्त सृष्टि-स्थिति-संहार कारक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक वीरों का उक्त भारती, पृथ्वी और रुद्राणी नामक योगिनियों से सदा संपर्क बना रहता है। तीसरी और चौथी व्याख्या वे इस तरह से करते हैं—माता, मान और मेय रूप संवित्तियाँ ही योगिनियाँ कहलाती हैं। उनके मेलन का अर्थ है उनको अन्तर्मुख बना कर परप्रमाता स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देना। अथवा ब्राह्मी प्रभृति के अष्टाष्टक स्वरूपों की उपासना के लिये सामयिक शक्तिचक्र को भी योगिनी नाम दिया जाता है। प्रस्तुत स्थल में योगिनी शब्द का तृतीय अर्थ गृहीत है।

३८६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यस्मदुक्तरीत्या सद्वितीयमद्य¹स्वीकारेणोल्लसिते मनसि, ²स्वतः प्राणा- पानयोः संचारे शान्ते, निरस्ते ³त्रित्वलक्षणे भेदे, शिवोऽहमस्मीति स्वान्तरो बलि- रित्यर्थः ॥ ॥१९८-१९९॥ ततः स्वैराचारपरो भूयादित्याह— ⁴नित्यं पिबन् वमन् खादन् स्वेच्छाचारपरः स्वयम् ॥१९९॥ अहन्तेदन्तयोरैक्यं भावयन् विहरेत् सुखम् । नित्यं प्रत्यहम्, पिबन् देवतागुरुनिवेदितशेषं हेतुम्, खादन् तच्छेषं खाद्यम्, वमन् द्वयमपीति सामर्थ्याल्लब्धम् । स्वेच्छाचारपरः यत्र यत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् । तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं सम्प्रकाशते ॥ (श्लो० ७३) के साथ हेतु द्रव्य को बलि समर्पित करे । व्याख्याकार ने स्वयं अपने किसी ¹अन्य ग्रन्थ में कहा है— प्राण और अपान रूपी दोनों श्वासों का निरोध कर और ²तीनों कुण्डलिनियों का मेलन कर जो जीव और शिव में ऐक्यभाव स्थापित किया जाता है, इसी को आन्तर बलि कहा जाता है ॥ ऐसा करने से द्वितीय द्रव्य के साथ मद्य का प्रसाद ग्रहण करने के उपरान्त जब मन उल्लसित होता है, तो उस समय प्राण और अपान वायु का संचार स्वतः शान्त हो जाता है तथा माता, मान और मेय रूप त्रिपुटी का सारा प्रपंच भी समाप्त हो जाता है । उस समय मात्र 'मैं शिव हूँ' यह अनुभूति बची रहती है । इस अद्वयप्रतिष्ठात्मक अनुभूति का ही यहाँ आन्तर बलि के नाम से विवरण दिया गया है ॥१९८-१९९॥ इसके बाद साधक यथेच्छ आचरण कर सकता है— प्रतिदिन पीता हुआ, वमन करता हुआ, खाता हुआ साधक स्वयं स्वैराचारी हो जाय, अहन्ता और इदन्ता में एकता की भावना करता हुआ सुखपूर्वक विचरण करे ॥१९९-२००॥ प्रतिदिन देवता और गुरु को समर्पित हेतु द्रव्य के बचे भाग को पीता हुआ, बचे हुए खाद्य पदार्थ को खाता हुआ और दोनों को यथेच्छ वमन करता हुआ साधक स्वैरा- चार परायण हो जाय । विज्ञानभैरव भट्टारक ने बताया है— १. स्वीकारणोल्लासिते—ख. ने. झ. । २. अत एव—क. ग. ज. । ३. त्रितत्त्वल- ख. ने. । ४. पिवन्नित्यं—ने. च. छ. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक भी व्याख्याकार के तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ का हो सकता है । २. तीनों कुण्डलिनी हैं—अधः कुण्डलिनी, मध्य कुण्डलिनी (श्लो० १३) और ऊर्ध्व कुण्डलिनी (श्लो० २७) ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८७ इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या स्वस्य यत्र यत्रेच्छा जायते तत् तदेव शास्त्र- विहितम्, यत्र यत्रेच्छा न जायते तत्तदेव शास्त्रनिषिद्धम्¹। अतः स्वेच्छानुकूल- पदार्थाननु²भवेत्, तत्प्रतिकूलपदार्थान् परित्यजेदित्यर्थः । अहन्तेदन्तयोरैक्यं भावयन् । अहन्ता ज्ञातृधर्मः, इदन्ता ज्ञेयधर्मः, तयोरैक्यम् "यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते" इत्यादिपूर्वं(२।७९, ३।१४१)प्रतिपादितरीत्या ज्ञातृज्ञेयचैतन्ययोः समरसीकरणलक्षणं ³ज्ञानम्, तदेवाहमिति भावयन् सुखं विह- रेत् । परिपूर्णज्ञानानन्दो भवेदित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥ (श्लो० ७१) इति ।।१९९-२००।। जहाँ जहाँ मन की तुष्टि हो, मन को संतोष हो, उसको वहीं स्थिर कर दे। ऐसा करने से साधक के हृदय में उसी स्थिति में परमानन्दमय स्वात्मस्वरूप प्रकाशित हो उठता है ।। इस तरह से साधक योगी को जिस विषय को प्राप्त करने की इच्छा हो, उसी को शास्त्रविहित माने; जहाँ जहाँ इच्छा न हो, उसी को शास्त्रनिषिद्ध समझे । इस प्रकार अपनी इच्छा के अनुकूल स्वरूप वाले पदार्थों का उपभोग करे और इसके प्रतिकूल पदार्थों का परित्याग कर दे । ऐसा करते समय अहन्ता और इदन्ता में एकता की भावना अवश्य करता रहे । अहन्ता ज्ञाता का धर्म है और इदन्ता ज्ञेय का । इन दोनों में एकता की भावना पहले (पृ० २११, ३३३) उद्धृत स्तोत्रावली के वचन में प्रतिपादित इस पद्धति से की जाती है—"जहाँ जहाँ संवित् की किरणें मिलती हैं, इन्द्रियों का विषयों के साथ संपर्क होता है, वहीं वहीं भगवान् शिव का व्यापक स्वरूप आलोकित हो उठता है"। इस तरह से ज्ञाता और ज्ञेय के रूप में स्फुरित हो रहे चैतन्य को समरस करने वाला ज्ञान ही 'मैं वही हूँ' इस प्रत्यभिज्ञा ज्ञान के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसी की भावना करता हुआ योगी सुखपूर्वक विचरण करे, अर्थात् परिपूर्ण ज्ञान और आनन्द से सराबोर हो जाय । विज्ञानभैरव भट्टारक ने इस स्थिति का वर्णन इस तरह से किया है— ¹जग्धि और पान के कारण अभिव्यक्त उल्लास, रस और आनन्द की दशाओं का विस्तार होने पर साधक योगी अपनी भरितावस्था की, अपने परिपूर्ण भैरव स्वरूप की भावना करे । ऐसा करने से वह साधक महानन्द से परिपूर्ण हो उठता है ।।१९९-२००।। १. मपि वर्तते-क. ग. । २. भावयेत्-ख. ने. ज. उ. । ३. जानन्-क. ।

  1. जग्धि, पान आदि पदों का अभिप्राय विज्ञानभैरव के भाषानुवाद में देखना चाहिये।

३८८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः परमप्रकृतमुपसंहरति— एतत् ते कथितं दिव्यं¹ संकेतत्रयमुत्तमम् ॥२००॥ स्पष्टम्² ॥२००॥ सर्वज्ञानोत्तमत्वादत्यन्तगोपनीयमित्याह— गोपनीयं प्रयत्नेन स्वगुह्यमिव सुव्रते । यथा स्वगुह्यं योनिं परपुरुषेभ्यो गोपायसि प्रयत्नेन, तथैतदपि³ संकेतत्रय- मनर्हेभ्यो गोपनीयमित्यर्थः ॥२०१॥ ननु ⁴केऽनर्हा येभ्यो गोपनीयमित्यत आह— चुम्बके ज्ञानलुब्धे च⁵ न प्रकाश्यं त्वयानघे ॥२०१॥ भक्तिहीनो⁶ऽनेकत्रासक्तस्तत्तत्तन्त्रान्तरेषु विद्यामात्रपाठी⁷ चुम्बकः। ज्ञान- लुब्धः विद्यासाधारणत्वात् काव्यनाटकादिविद्यावदत्रापि ज्ञानं सम्पाद्यमिति मन्वानः। अब परम प्रकृत ( प्रारम्भ में निर्दिष्ट ) विषय का उपसंहार करते हैं— इस तरह से इन तीन दिव्य और उत्तम संकेतों का मैंने तुम्हें उपदेश किया है ॥२००॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥२००॥ अब यह कहते हैं कि सभी ज्ञानों में उत्तम होने से इसको अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये— हे सुव्रते ! अपने गुह्य के समान इस ज्ञान को भी प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये जैसे तुम अपनी योनि को दूसरे पुरुषों से प्रयत्नपूर्वक छिपा कर रखती हो, उसी तरह से चक्रसंकेत, मन्त्रसंकेत और पूजासंकेत नामक इन तीन संकेतों को भी अयोग्य व्यक्तियों से छिपाकर रखना चाहिये ॥२०१॥ प्रश्न होता है कि वे अयोग्य कौन हैं ? जिनसे कि इन संकेतों में उपदिष्ट ज्ञान को छिपा कर रखना चाहिये ? उत्तर है— हे अनघे ! चुम्बक और ज्ञान के लोभी व्यक्ति को तुम्हें इनका प्रकाशन नहीं करना चाहिये ॥२०१॥ भक्तिभाव से रहित, अनेक गुरुओं के पास दौड़ लगाने वाला, सभी तन्त्रों में कुछ न कुछ दखल रखने की आदत वाला व्यक्ति चुम्बक कहलाता है। काव्य, नाटक आदि १. सर्वं-क. ग., देवि-उ. । २. स्पष्टमेतत्-ज. । ३. तथैदमपि-ख. ने. । ४. के के- उ. । ५. वा-ख. ने. छ. झ. । ६. नोऽन्यत्रासक्तः-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. तन्त्रवरेषु- ख. ने., तन्त्रेषु-क. ग., पाठान्तरम्-ख. ज., पाठकृत्-ने. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३८९ तयोर्द्वयोरपीदं रहस्यं त्वया न प्रकटीकरणीयमित्यर्थः ॥२०१॥ विध्यति¹क्रमणादन्यायो न करणीय इत्यत आह— अन्यायेन न दातव्यं नास्तिकानां महेश्वरि । विध्यतिक्रम एवान्यायः । नास्ति परलोक इति ये ²मन्यन्ते ³चुम्बका बौद्धा- दयः, ते नास्तिकाः । नन्वत्र को विधिरित्यत आह— एवं त्वयाऽहमाज्ञप्तो मदिच्छारूपया प्रभो ॥२०२॥ प्रभो ! जगत्प्रवृत्ति⁴नियमप्रभावशालिनि ! अत एव—"शक्त्या ⁵विना शिवे सूक्ष्मे⁶ नाम धाम न विद्यते" (४।७) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या त्वया विनाऽहं किमपि कर्तुं ⁷न शक्तः, वक्तुं न समर्थः । तन्मदिच्छारूपया ममाऽखिलेश्वरस्याऽ- खिलागमशास्त्रवक्तुरिच्छारूपया ⁸विवक्षारूपयाऽनाश्रितकलया । आज्ञप्तः प्रेरितः । ज्ञानमेवमुक्तलक्षणं प्रोक्तवानस्मि । ⁹ततस्त्वदाज्ञैव विधिरित्यर्थः ॥२०२॥ की तरह तन्त्रशास्त्र को भी सामान्य विद्या मानकर इसका ज्ञान अर्जित करने वाला व्यक्ति ज्ञानलुब्ध कहलाता है। इन दोनों तरह के व्यक्तियों के सामने तुमको इस शास्त्र के रहस्य नहीं प्रकट करने चाहिये ॥२०१॥ अब शिव यह कहते हैं कि इस विधि का अतिक्रमण कर अन्याय न करे— हे महेश्वरि ! नास्तिकों को इस रहस्य ज्ञान का उपदेश कर अन्याय नहीं करना चाहिये ॥ विधि का अतिक्रमण ही यहाँ अन्याय कहलाता है। परलोक नहीं है, ऐसा मानने वाले चुम्बक बौद्ध आदि को नास्तिक कहा जाता है ॥ प्रश्न उठता है कि ऐसा हम क्यों करें ? इसका उत्तर है— हे स्वामिनि ! मेरी इच्छा शक्ति के रूप में प्रकट होकर तुमने ही मुझे ऐसा करने की आज्ञा दी है ॥२०२॥ 'प्रभो' यह संबोधन देवी के प्रति है, क्योंकि वह इस जगत् की सृष्टि और संहार को करने में समर्थ है। इसलिये चतुःशती शास्त्र (४।७) में बताया गया है—"शक्ति के बिना सूक्ष्म निराकार शिव में नाम और धाम (स्थान) की भी कल्पना नहीं की जा सकती।" इस तरह से तुम्हारे बिना मैं कुछ भी करने और कहने में असमर्थ हूँ। इसक। १. क्रमादन्यायेन न—क. ग. । २. मन्वते—ख. ज. झ. उ. । ३. 'चुम्बका' नास्ति— ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्रवृत्तिनिवृत्ति—ख. ने. उ. । ५. हीने—क. ग. । ६. शून्ये— क. ग. । ७. 'न शक्तः' नास्ति—ख. ने. झ. उ. । ८. 'विवक्षारूपया' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ९. 'ततः ····रित्यर्थः' नास्ति—ख. ने. ज. उ., अतो भवदाज्ञैव—झ. ।

३९० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः १अतस्तदतिक्रमे महदनिष्टं स्यादित्याह— २अन्यायेन तु यो दद्यात् स परेतो भविष्यति । अतस्त्वदाज्ञाविधिमुल्लङ्घ्य चुम्बकादिभ्यो य एतज्ज्ञानं दद्यात् स परेतो भविष्यति ॥ एतत्परिज्ञानफलमाह— संकेतं यो३ विजानाति योगिनीनां भवेत् प्रियः ॥२०३॥ एतत् संकेतत्रयम् । गुरुमुखादेव यो४ विजानाति, स योगिनीनाम्, योगः परम- शिवसमवायः, तद्गत्यः परमचिन्मरीचिभूताः शक्तयस्तासाम्, प्रियः परमशिव , तस्यानन्त५शक्तिमत्त्वात् । तदुक्तं तन्त्रान्तरे—' शक्तयोऽस्य जगत्सर्वं शक्तिमांस्तु

भाव यह है कि यद्यपि मैं इस सारे जगत् का स्वामी हूँ और समस्त शास्त्रों का उपदेश भी मैं ही करता हूँ, तो भी मुझ शिव की इच्छाशक्तिरूपिणी विवक्षा रूप अनाश्रित कला से अनुमति प्राप्त करके ही मैंने इस ज्ञान का उपदेश किया है । इस तरह से तुम्हारी आज्ञा ही यहाँ १विधिवाक्य है । इस लिये उस विधिवाक्य को न मानने पर बहुत अनिष्ट हो सकता है, यही बात अब कही जा रही है— जो व्यक्ति अन्यायपूर्वक इस ज्ञान का उपदेश करेगा, उसकी मृत्यु हो जायगी ॥ इसलिये तुम्हारी आज्ञा का, आदेशात्मक विधिवाक्य का उल्लंघन कर चुम्बक प्रभृति को जो व्यक्ति इस ज्ञान का उपदेश करेगा, वह अवश्य ही मर जायेगा ॥ अब इस ज्ञान को जानने का फल बताते हैं— जो व्यक्ति संकेतों को जानता है, वह योगिनियों का प्रिय बन जाता है ॥२०३॥ यहाँ उपदिष्ट तीनों संकेतों को जो व्यक्ति गुरुमुख से जान लेता है, वह साधक योगिनियों का प्रिय बन जाता है । परमशिव के साथ समवाय, अर्थात् अविनाभाव संबन्ध को योग कहते हैं । शिव के साथ नित्य समवाय संबन्ध से रहने वाली परम चितिशक्ति

१. 'अत····दित्याह' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. अज्ञानेन—क. ग., नास्त्येषा पङ्क्तिः—ख. च. छ. । ३. योऽभि—ख. ने. च. छ. ज. झ. । ४. योऽभि—ख. ज. झ. उ । ५. शक्तिमत्वात्—ख. ने. ज. झ. उ. । १. वैदिक वाङ्मय और मीमांसाशास्त्र में विधि और निषेध वाक्यों को प्रवृत्ति और निवृत्ति का कारण माना गया है । लिङ् लकार और तव्य आदि प्रत्ययों से विधिवाक्य का बोध होता है । प्रस्तुत स्थल में विधि शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में हुआ है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९१ महेश्वरः" इति । ¹परमशिव एव भवेदित्यर्थः ॥२०३॥ ²ननु परमशिवतादात्म्ये³ कः पुरुषार्थ इत्यत आह— सर्वेप्सितफलावाप्तिः सर्वकामफलाश्रयः । यतः सर्वेषां जनानां ⁴काम्यानां काम्यमानानां फलानामाश्रयः परमशिवः, अतः ⁵सर्वेप्सितफलावाप्तिः सर्वेषां यानीप्सितानि स्पृहणीयानि फलानि, तेषां प्राप्तिः परमशिव⁶तादात्म्यपरिज्ञानाद् भवति । स एव परमपुरुषार्थ इत्यर्थः ॥ की किरणात्मक शक्तियाँ योगिनियाँ हैं। इन योगिनियों का प्रिय बन जाता है, साक्षात् शिव हो जाता है, क्योंकि वह परमशिव अनन्त शक्तियों से संपन्न है। जैसा कि ¹तन्त्रा- न्तर में बताया गया है—"यह सारा जगत् इसकी शक्तियाँ हैं, शक्तिमान् अकेला शिव है"। इस तरह से इन तीनों संकेतों को गुरुमुख से जान लेने वाला साधक साक्षात् परमशिव हो जाता है ॥२०३॥ प्रश्न उठता है कि परमशिव बन जाने से साधक को क्या मिलेगा ? इसका उत्तर देते हैं— परमशिव सभी कामनाओं के फल को देने वाला है, अतः ऐसे साधक की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ चूँकि सभी मनुष्यों की कामनाओं का, अभिलषित फलों का आश्रय परमशिव है, वही मनुष्यों की सारी कामनाओं को पूरा करने वाला है, अतः सभी मनुष्यों के इच्छित फल की प्राप्ति परमशिव के साथ अपने तादात्म्य को समझ लेने से हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि परमशिव के साथ तादात्म्य बोध ही सब से बड़ा पुरुषार्थ है। इसके प्राप्त हो जाने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ अपने आप पूरी हो जाती हैं। १. 'परम''''दित्यर्थः' नास्ति-ख. ज. झ. ड. । २. 'ननु''''आह' नास्ति-ख. ज. ड. । ३. त्म्यवपुषा पुरुषार्थः किमित्यत-क. ग. । ४. 'काम्यानां' नास्ति-क. ड. । ५. 'सर्वेप्सितफलावाप्तिः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. ड. । ६. 'तादात्म्य' नास्ति-क.।

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी आदि ग्रन्थों में सर्वमङ्गला शास्त्र के नाम से यह वचन उद्धृत है और स्पन्दप्रदीपिकाकार ने इसको रहस्यशास्त्र का वचन माना जाता है। देखिये— लुप्तागमसंग्रह, प्रथम भाग, पृ० ११६ तथा पृ० १४६-१४७ । रहस्यशास्त्र तन्त्रशास्त्र की ही विशेष शाखा का नाम है। यह किसी ग्रन्थ विशेष का नाम नहीं है । परमार्थसार- विवृति (पृ० १०), स्पन्दकारिका रामकण्ठविवृति (पृ० ९) तथा नेत्रतन्त्रोद्योत (२१।३१) में भी सर्वमङ्गला अथवा पारमेश्वर वचन के रूप में इसको स्मरण किया गया है।

३९२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः ननु स कुत्र दृश्यते ? इत्यत आह— यतोऽपि दृश्यते देवि ! यतोऽपि¹ यत्र क्वापि बहिरन्तर्वा मनः प्रसरति, तत्र तदनुभवरूपेण स एव दृश्यते, तस्य सर्वगतत्वात् । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— यत्र यत्र मनो याति बाह्ये ²वाऽभ्यन्तरे प्रिये । तत्र तत्र शिवावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति ॥ (श्लो० ११३) इति, ³तत्र तत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः ॥ (श्लो० ११४) इति च । ननु किं⁴ सर्वेषामपि तथा दृश्यते ? इत्यत आह— ⁵कथं विद्वान्न चिन्तयेत् ॥२०४॥ सत्यं दृश्यते, तथापि न पश्यन्ति, “न मां पश्यति कश्चन” इत्युपनिषदुक्त- रीत्या, पुनः प्रश्न होता है कि वह हमें कहाँ दिखाई पड़ता है ? शिव इसका उत्तर देते हैं— हे देवि ! उसका दर्शन तो जहाँ कहीं भी हो सकता है ॥ जहाँ कहीं भी बाहर या भीतर मन का प्रसार होता है, वहाँ उस अनुभव के रूप में वह परमशिव ही दिखाई पड़ता है, क्योंकि वह सर्वगत है, सर्वत्र विद्यमान है । विज्ञान- भैरव भट्टारक ने कहा है— हे प्रिये ! बाहर या भीतर जहाँ कहीं भी मन जाता है, सर्वत्र अपनी व्यापकता के कारण शिवरूपता विद्यमान है । वह मन इस तरह से उस शिवस्वरूप को छोड़कर और कहाँ जायगा ? जहां जहां मन जायगा, वहाँ वहाँ इन्द्रियों के माध्यम से स्वात्मचैतन्य की ही अभि- व्यक्ति होगी ॥ प्रश्न उठता है कि क्या सभी को इसकी प्रतीति हो सकती है ? इसका उत्तर देते हैं— इसके लिए विद्वान् प्रयत्न क्यों न करे ॥२०४॥ इसकी प्रतीति तो सबको होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं है, किन्तु साधारण मनुष्य ऐसा कर नहीं पाता । उपनिषद् में बताया गया है—"मुझे कोई भी नहीं देख पाता" । तन्त्रान्तर में बताया गया है— १. 'अपि' नास्ति—ख. ने. झ. उ. । २. चाम्यन्तरेऽपि च—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. यत्र यत्राक्ष—मु. । ४. कथं तथा—क. ग. झ. । ५. कथञ्चिन्न विचिन्तयेत्— ख. ने. झ. उ. ।

तृतीयः ] | दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३९३ प्रत्यक्षगोचरं देवं लोकं १चाब्धिप्रमाथिनम् । दृष्ट्वा २श्रुतिशिरः सान्द्रमनुक्रोशति दुःखितः ॥ इति तन्त्रान्तरोक्तरीत्या दृश्यमानमप्युपदेशहीना न पश्यन्ति । "निष्कलत्वं शिवे बुद्ध्वा" (२।५०) इति निष्कलपरशिवतादात्म्यापरोक्षानुभवशाली गुरुकटाक्ष- वोक्षणात् त्रुटित३समस्त४पाशजालः परिस्फुरत्परमशिवाहन्ताविज्ञान इदं ५कथं न चिन्तयेत्, सर्वत्र समभावं कथं न पश्येदित्यर्थः ॥२०४॥ शिवेनाम्ब६ ! रहस्यत्वादविस्पष्टतयोदितम् । त्वद्रूपं नाथवचनाद् विवृतं ७नो क्षमस्व तत् ॥ इति श्रीमत्परमयोगीन्द्रपुण्यानन्दशिष्यामृतानन्दयोगिप्रवरविरचितायां योगिनीहृदयदीपिकायां पूजासंकेतस्तृतीयः ॥ ॥ समाप्तश्चायं ग्रन्थः ॥ भगवान् तो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते हैं, किन्तु अज्ञ जन उनको देख नहीं पाते । मनुष्य समुद्र को मथ डालता है, समस्त वेदान्तशास्त्र को पढ़ डालता है, तब भी उसके स्वरूप को जान नहीं पाता और लाचार होकर दुःखसागर में पड़ा विलाप करता रहता है१ ॥ इस तरह से परम तत्त्व का स्वरूप सबके सामने है, किन्तु जिनको गुरु का उपदेश नहीं प्राप्त हुआ है, उनको यह दिखाई नहीं पड़ता । शिव में, गुरु में और अपने में भी निष्कल शिवरूपता के दर्शन की चर्चा पहले (२।५०) आ चुकी है । तदनुसार निष्कल परमशिव के साथ तादात्म्य की प्रत्यक्ष अनुभूति जिसको होने लगी है, गुरु की कृपादृष्टि के पड़ने से जिसके सारे पाशजाल छिन्न-भिन्न हो गये हैं और जिसकी 'परमशिव मैं ही हूं' ऐसी प्रत्यभिज्ञा जाग उठी है, वह साधक अपने स्वरूप के साक्षात्कार के लिये प्रयत्न क्यों न करे, अर्थात् सर्वत्र समभाव का दर्शन क्यों न करे ? इसका अभिप्राय यह है कि ऐसे साधक में अवश्य ही समतादृष्टि जाग उठेगी ॥२०४॥ १. चाधि-क. ग., चाति-ख. ने. ज. । २. स्मृति-क. ग. उ. । ३. 'समस्त' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. माया-ने. ज. झ., प्रभा-उ. । ५. कथञ्चिन्न विचि- न्तयेत्-ख. ने. ज. उ. । ६. नातिर-ख. ने. ज. उ. । ७. मोक्षमच्युतम्-ख. ने. ज. उ. । १. भट्ट गंगाधर के स्तोत्र तथा क्षेमेन्द्र के गीतानिष्यन्द के नाम से इस तरह के श्लोक उद्धृत मिलते हैं । इन ग्रन्थों की उपलब्धि के अभाव में यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये श्लोक वहीं के हैं।

३९४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः

ओ मा ! शिव ने रहस्य से परिपूर्ण तुम्हारे स्वरूप का उपदेश यहाँ रहस्यमयी अस्पष्ट भाषा में ही किया था। अपने गुरु की आज्ञा मिलने पर मैंने यहाँ उसकी स्पष्ट व्याख्या कर दी है, इसके लिये मुझे आप क्षमा करें ।।

इस तरह से श्रीमत्परमयोगीन्द्र पुण्यानन्द के शिष्य अमृता- नन्द योगिप्रवर विरचित योगिनीहृदयदीपिका का यह तीसरा पूजासंकेत प्रकरण पूरा हुआ ॥ ३ ॥

॥ यह ग्रन्थ भी यहाँ समाप्त होता है ॥

परापञ्चाशिका आद्यनाथविरचिता [ ^१सर्वसंविन्नदीभेदभिन्नविश्रान्तिभूमये । नमः प्रमातृवपुषे शिवचैतन्यसिन्धवे ॥ ] अकृत्रिमाहमा^२मर्शप्रकाशैकघनः शिवः । शक्त्या विमर्शवपुषा स्वात्मनोऽनन्यरूपया ॥१॥ शिवादिक्षितिपर्यन्तं विश्वं वपुरुदञ्चयन् । पञ्चकृत्यमहानाट्यरसिकः क्रीडति प्रभुः ॥२॥ न^३ पार्थग्या(र्थक्या)हमवार्ताऽपि विश्वशक्तिशरीरयोः । न^४ विश्वविश्ववपुषोर्भिन्नता कापि तात्त्विकी ॥३॥ भेदे^५ सत्तास्फुरत्ताभ्यां भिन्नं किं नु^६ जगद् भवेत् । ^७सत्तास्फुरत्तासम्बन्धात् सत्ताभानं तु^८ तन्न^९ चेत् ॥४॥ असतः किं सतस्ताभ्यां सम्बन्धः सोऽयमिष्यते । स्वरूपलाभसुलभः सम्बन्धो नह्यवस्तुनः ॥५॥ ^१०न लब्धरूपसम्बन्धस्ताभ्यां ^११किञ्चिदपेक्षते^१२ । अपेक्षायामवस्थानं न स्यादेतस्य किञ्चन ॥६॥ स्वभावतः स्फुरत्ता च सत्ता च न विनाशिनी^१३ । विनाशानभ्युपगमे^१४ जडताऽपि^१५ निवर्तते ॥७॥ ततो गत्यन्तराभावाच्चिदेव परिशिष्यते । ^१६ततश्चिदेक्यं प्रकृतं ^१७जगतो न निवर्तते ॥८॥ प्रकाशा^१८दन्यताभासः स्वात^१९न्त्र्योल्लासकेवलः । परिच्छिनत्ति^२० कः शक्तिं शम्भोर्विश्वातिशायिनः ॥९॥ १. यो. हृ. दी. (३।४१) परापञ्चाशिकावचनत्वेनोद्धृतः श्लोकोऽयं कस्यामपि मातृ- कायां न दृश्यते । २. मर्षः-म. । ३. पृथगर्थमर्थवत्ता विश्वविश्वश-मु. ल., नास्ति पङ्क्तिः-स. अक. । ४. नाविश्व-स. अक. । ५. भेद-स. अक. घ. । ६. किन्तु-मु. । ७. नास्ति पङ्क्तिः-अघ. । ८. च-मु. अग. घ. । ९. तन्न-मु. । १०. नालब्धरूपः-स. अक., रूपसंबन्धे-मु. ल. । ११. कच्चि-अघ. । १२. क्ष्यते-मु. ल. । १३. शिवम्-स. अक. ख. ग., शिनः-म. । १४. मात्-स. अक. घ. । १५. न-स., च-अघ., विनि-अक. । १६. सत:-मु., सत: शिवै-स., अतः शिवै-अक. । १७. जडतो न-स. म. अख. ग. घ., कदाचिन्म-मु. । १८. शोऽनन्यतो भावः-मु., शादन्यदाभासः-अक. । १९. न्त्र्यादस्ति-स. अक. । २० न्नात्मिका शक्तिः-मु., न्नकलां-अख. ग. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३९६ परापञ्चाशिका १स्वप्रकाशात्मकं २सर्वं ३तमःकेवलतां गतम्। यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन्४ प्रकाशान्नाति५रिच्यते ॥१०॥ विमर्शसरणी६ प्राप्तमित्येषा तात्त्विकी ७गतिः। अवधा८नैकतानानां मतिरेवात्र साक्षिणी ॥११॥ किं ९प्रमाणैर्वराकैस्तैश्चिदनुप्राणितात्मभिः। नहि वैकर्तनं ज्योतिर्दीपालोकमपेक्षते ॥१२॥ १० शक्तिपातपवित्रे११ऽस्मिन् धीतत्त्वे१२ च परीक्ष्यताम्। आदर्शो१३ विमलाभोगे१४ ननु१५ सर्वं प्रकाशते ॥१३॥ इत्थं चिदात्मकं १६सर्वं षट्त्रिंशद्१७भेदमुद्रितम्। आदौ १८शुद्धात्मकं १९तत्त्वं पञ्चधा २०तमसः परम् ॥१४॥ शिवः शक्तिश्च सादाख्यमीशो विद्येति भिद्यते२१। २२अक्षादिशान्तवर्णात्मा निर२३णायि शिवेन तु२४ ॥१५॥ कलाविद्ये२५ रागकालौ२६ नियतिर्बन्ध उच्यते। मायापूर्वो२७ वकारादि२८यकारान्ता२९क्षरात्मकः ॥१६॥ पुमान् शक्तिर्मनो बुद्धिरहङ्क३०तृन्मादिपञ्चकम्। श्रोत्रादिपञ्चकं ३१नादि ३२णादि वागादिपञ्चकम् ॥१७॥ तन्मात्रपञ्चकं ३३ञादि ३४ङादि व्योमादिपञ्चकम्। सिसृक्षोः प्रथम३५स्पन्दः शिवतत्त्वं ३६प्रभोः स्मृतम् ॥१८॥

१. यत्-मु. अख. ग. घ. म.। २. विश्वं-अघ.। ३. तत्त्वं-अख. ग. घ. म.। ४. देतत्-मु., न्नौतत्-अख. ग. घ. म., ञ्चैतत्-ल.। ५. दति-मु. म.। ६. सरणि- स. अक. ख. ग.। ७. मति.-मु. अघ.। ८. भासैक-मु., स्थानैक-स. अक.। ९. वराकः प्रमाणेस्तै-अख. ग. म.। १०. नास्ति पङ्क्तिः-स. अक.। ११. त्रेषु-अख. ग. म, त्रायां धिया तत्त्वं परीक्षते-अघ.। १२. तत्त्वं सम्प-अख. ग. म.। १३. आदर्श-मु. अघ.। १४. लादर्श-स. अक.। १५. न तु-मु. ल. अक.। १६. विश्वं-स. अक. घ.। १७. स्तत्त्वमु-स. अक., तत्त्वभेदितम्-अख. ग. म., द्भेदतत्तवतः-मु.। १८. चिदा- अख. ग. म.। १९. चक्रं-अख. ग. म.। २०. तु ततः-अख. ग. म.। २१. कथ्यते- स. अक.। २२. हला-स. अक., शक्त्या-अख. ग. घ. म.। २३. मायि-मु. अघ.। २४. तत्-स. अक. ख. ग. म.। २५. विद्या-मु. अख. ग. म.। २६. कालाः-ल. म., काल-मु.। २७. पूर्णो-ल। २८. अका-मु.। २९. त्मकः पुमान्-स. अक., क्षरात्मिका शक्तिः-अख. ग. म.। ३०. कारादि-मु. अख. ग.। ३१. तादि-मु.। ३२. टादि-मु.। ३३. चादि-मु.। ३४. कादि-मु.। ३५. प्रथमः-स.। ३६. विभोः-मु. अघ.। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

आद्यनाथविरचिता ३९७ इच्छैवाऽस्य¹ परिम्लाना शक्तितत्त्वमिति² स्मृतम् । स्वेच्छया ³रचितं विश्वमाच्छाद्याऽहन्तया स्थितम् ॥१९॥ तदेव तत्त्वं सादाख्यं ⁴सर्वानुग्रहो⁵न्मुखम् । तदेवेश्वरतत्त्वं स्यात् पश्यद् विश्वमिद⁶न्तया ॥२०॥ ⁷अहन्तेदन्तयोरैक्यमति⁸र्विद्या निगद्यते । स्वाङ्गकल्पेषु⁹ भावेषु मायातत्त्वं विभेदधीः ॥२१॥ मायागृहीतसंकोचः¹⁰ शिवः पुंस्तत्त्वमुच्यते । अयमेव हि संसारी ¹¹जीवो ¹²भोक्तेति ¹³गद्यते ॥२२॥ ज्ञत्व-¹⁴कर्तृत्व-पूर्णत्व-नित्यत्वाद्याश्च शक्तयः । तत्संकोचात् संकुचिताः¹⁵ कलाद्या¹⁶तमतया मताः¹⁷ ॥२३॥ मायात्मनः¹⁸ कला¹⁹नाम किञ्चित्कर्तृत्व²⁰कारणम् । विद्या किञ्चिज्ज्ञताहेतू रागोऽभिष्वङ्गकारणम् ॥२४॥ कालः परिच्छेदे²¹करो नियतिश्शेदमेव मे²² । कर्तव्यं ²³ नान्यदित्येषा²⁴ व्यवस्था ²⁵यन्त्रणाकृतिः ॥२५॥ प्रकृतिर्गुणसाम्यं स्यादहङ्कारादिजन्मभूः । अहं ममेद²⁶मित्येतद्बुद्धिहेतु²⁷रहङ्कृतिः ॥२६॥ बुद्धिरध्यवसायस्य कारणं निश्चयात्मनः²⁸ । संकल्पस्य विकल्पस्य ²९बीजं मन ³⁰उदीर्यते ॥२७॥ वचनादेश्च³¹ शब्दादेर्वागादिश्रवणादि³²कम् । कारणं श्रवणादीनां ग्राह्यं तन्मात्रपञ्चकम् ॥२८॥ १. इच्छैव सा-मु., इच्छा चास्य-अघ. । २. मुदञ्चयन्-मु., मुदङ्कुरा-स. अक. ख. ग. म., तत्त्वं चिदङ्कुरम्-अघ. । ३. सूचितं-मु. अघ. म., यास्य चितं-अख. ग. । ४. विश्वा-अक., सर्वान्निग्र-म. । ५. णोद्यतम्-मु. । ६. महन्तया-अख. ग. घ. म. । ७. इदन्ताहन्तयोः-मु. स. अक. । ८. मिति-मु., मतिर्विद्येति ग-अक. । ९. रूपेषु -स. अक. ख. ग. म., भूतेषु-अघ. । १०. संकल्पः-ल. । ११. भव्यो-स. अक । १२. भोक्तैव-मु. म., भोक्तेव-ल. अग. स. । १३. दृश्यते-मु. अग. । १४. पूर्णत्व- कर्तृत्व-स. अक. । १५. चितः-मु. अघ. । १६. द्याश्च-अख. ग. घ., ला स्वात्म-म.। १७. मतः-मु., स्थितः-अघ. । १८. त्मकं-मु., त्मना-अघ. । १९. ज्ञेया-अख. ग. म. । २०. लक्षणा-अघ. । २१. च्छित्ति-स., च्छिन्नकलो-अख. ग., च्छिन्न-म. । २२. हि-स. अक. । २३. व्या-अघ. । २४. दित्यङ्ग-स. । २५. मन्त्र-अक. । २६. ममैतदि-स. अक. । २७. रेखा ह्यह-स. अक. । २८. त्मिका-स. अक. । २९. स्थानं-अक. । ३०. इती-स. अक., उदीरितं-अख. ग. म. । ३१. द्यैश्च-स. अक. । ३२. त्मकम्-स. अक. ।