भारतकोश
संग्रह पर लौटें

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

चतुर्थ भाग: भस्म व अमृत (कुँवर सिंह, अन्तिम युद्ध व संदेश)

प्रकरण-7 लखनऊ का पतन तात्या टोपे ने कानपुर की ओर जो भयंकर गड़बड़ मचाई थी उसको इस तरह बांध`दने के बाद सर कोलिन ने विद्रोही प्रदेश को फिर से जीत लेने के लिए कमर कसी। दिल्ली जीत लेने के बाद साटन अलीगढ़ तक के निचले प्रदेश में शांति स्थापित करता आया था, इसलिए कानपुर से ऊपर अलीगढ़ तक प्रदेश में शांति स्थापित करने का वालपोल को कालपी के रास्ते भेजा गया। वालपोल कानपुर से ऊपर चढ़ते और सीटन अलीगढ़ से नीचे उतरते हुए मैनपुरी में मिले और ऐसा नक्शा अंग्रेजी सेना के लिए बना कि दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा पूरी तरह पुनर्जित हो और यमुना तीर से इसके सेना जाते-आते दोआब के विद्रोही हटते-हटते फतेहगढ़ के पास इकट्ठा होने लगेंगे, यह स्पष्ट ही था और इस प्रकार अंत में वालपोल, सीटन और कोलिन अपने-अपने अभियान पूरे कर फतेहगढ़ में मिलेंगे, यह सहज ही होने वाला था। सन् 1857 के इस आगामी वर्ष में सामान्य रूप से यह कार्य पूरा करने की अंग्रेजी योजना थी। इस नक्शे के अनुसार वालपोल तोपखाने सहित सर्वांगपूर्ण गोरी सेना लेकर कानपुर से 18 दिसंबर को कालपी के रास्ते ऊपर चला। रास्ते में विद्रोहियों की बिखरी सेना से छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ते विद्रोहियों को आश्रह देनेवाले गांवों पर अंग्रेजी रीति से कहर बरपाते और उस प्रदेश को फिर से पूरी तरह ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 316

वह इटावा शहर तक चलता आया-यहां से भी वैसे आगे बढ़ गया होता; पर इटावा शहर के सारे विद्रोही वहां से चले जाने के बाद भी उसे वहीं पर सेना के साथ ठहरना पड़ा। क्या कारण था? अंग्रेजों कीये बलवान सेना एकदम ठहरकर रह जाए, ऐसा क्यों है? विद्रोहियों के हजारों पैदल तो चलकर नहीं आ गए? या पांडे की सेना के चपल घुड़सवारों की टोलियां अंग्रेजों पर कहीं हमला तो नहीं कर रहीं? या उनकी गड़गड़ाहट करती तोपें कहीं अंग्रेजों पर जलते अंगारों की वर्षा तो नहीं कर रहीं? इटावा के पास ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था। पैदल या हजारों घुड़सवारों की टोलियां या तोपखाने के अंगार-इनमें से कुछ भी इटावा के पास अंग्रेजों को रोके रखने के लिए नहीं था। केवल तीस-चालीस भारतीय दीवारों में गोलीबारी के लिए छेद हैं। इस छोटे से भवन में खड़े लोगों के हाथों में एक-एक मस्केट है और हृदय में एक-एक जलती ज्योति लिये इनतं ीस-चालीस लोगों ने ही इटावा के दरवाजे में इस अंग्रेजी चतुरंग सेना को रोका हुआ है। उन्होंने इस अंग्रेजी तोपखाने के साथ इटावा तक चली आई अंग्रेजी सेना से रणांगण में 'युद्धं देहि' की माँग प्रस्तुत की है। इटावा के दरवाजे में पैर रखनेवाले को 'युद्धं देहि'। अब इस बित्त भर भवन में दृढ़ता से खड़े रहकर अंग्रेजी घुड़सवार, पैदल, तोपखाना युद्ध भी क्या करे! और थोड़ी राह देखें जिससे पागलपन की यह मांग छोड़कर ये सिरफिरे होश में आएं और अभी भी पलायन की खुली राह पकड़ें। परंतु कितनी ही राह देखी, फिर भी उनका पागलपन सही नहीं हो रहा था। ठीक है-करो युद्ध। केवल उन्हें एक बार तोपखाना दिखाना ही काफी है। यही उनसे युद्ध करके उन्हें पराजित करना हो जाएगा। इसलिए अंग्रेजी सेना ने अपना जबड़ा दिखाकर उन सिरफिरों को डराना चाहा। डर, डर किसे? जिसने एक बार दिव्य स्वतंत्रता के लिए स्वतंत्रता-लक्ष्मी के चैतन्य से सम्मोहित होकर मृत्यु से ही प्रेम किया, मृत्यु का भय छोड़ा, मृत्यु के लिए जो उतावला हो गया-उसे इस विश्व में कौन डरा सकता है? जो जय के लिए लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! जो जय के लिए लड़ता है वह डरता है, जो कीर्ति के लिए लड़ता है वह डरता है, पर जो मृत्यु के लिए ही लड़ता है उसे कौन डराएगा? शहीद को कौन रोक सकता है! पृथ्वी के सारे अंगारे और आकाश की सारी बिजलियां एक साथ आकर उसपर गिरें तो भी जो अपनी प्रिय वस्तु प्राप्त करने के लिए अति तीव्र गति से दौड़ रहा है उसका क्या बिगड़ेगा? जिसने केवल 'मृत्यु' की आशा पकड़ी उसे विश्व में निराशा कैसे शेष रहे? प्रिया की ओर प्रियतम जिस तरह दौड़ता जाता है वैसे ही वे मृत्यु के लिए दौड़े जाते हैं-ऐसे इन इटावा के देशवीरों को भय कैसा? और वह दिखाए कौन? और इसलिए उन्होंने पलायन के खुले मार्ग छोड़ दिए। उन्होंने विजय की कल्पना भी नहीं की। अंग्रेजों की चतुरंग सेना को धिक्कारते हुए ये मुट्ठी भर लोग उस भवन से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 317

‘युद्धं देहि’ की गर्जना करने लगे। दिल्ली से जो डरी नहीं, कानपुर के रण से डरकर जो रुकी नहीं-वह अंग्रेजी सेना इस बित्ता भर भवन के पास मानो ठोकर खाकर रुक गई। मैलसन लिखता है-"संख्या से मुट्ठी भर, केवल मस्कट ही पास में, परंतु निराशा के अवसान से अधिक युद्ध का उत्साह उनमें भरा हुआ था। अपने ध्येय के लिए आत्मार्पण करने को वे मृत्यु की लालसा कर रहे थे। वालपोल ने उस स्थान का निरीक्षण किया। कोई सेना वहां रुकी रहे ऐसा उसमें कुछ नहीं था। उसे हमला कर जीतना बहुत आसान था। परंतु उनपर हमला करने का अर्थ कितने ही मनुष्यों की बलि देनी पड़ेगी। इसलिए युक्तियां खोजी जा रही थी। उन सबमें विफलता दिखने पर चारा सुलगाकर उन्हें अंदर ही जला डालने की बात भी सोची गई। परंतु बेकार। उन दीवारों के छेदों में से उन पक्के योद्धाओं ने हमला करनेवालों पर ऐसी निरंतर अचूक मार की कि तीन घंटे देने का निर्णय किया गया। इंजीनियर लोगों ने सुरंग खोदी और उसे बत्ती दे दी। सुरंग से वह पूरा जीवन आकाश में उछला और फिर नीचे गिरा। उसके उछलने और गिरने में उन देशवीरों को वह शहादत का सम्मान मिल गया, जिसकी उन्हें अति उत्कट अभिलाषा थी। वे सारे उसी स्थान पर मर गए। उस दिन से कैसे मरा जाए? इस विषय पर इटावा की यह पवित्र समाधि दिन-रात भयंकर मूक व्याख्यान देती रहती है। इटावा! शूर इटावा!! थर्मापिल के पहाड़ में, इटली के ब्रेशा के किले में, नीदरलैंड के ही रूटर के शरीर में तुझसे अधिक तेजोमय क्या होगा? इटावा! शूर इटावा!! इटावा से वालपोल आ रहा है और सीटन भी अलीगढ़, कासगंज, मैनपुरी आदि स्थानों पर विद्रोहियों की फुटकर सेना को पीटते नीचे उतर रहा था। इन दोनों सेनाओं की भेंट 3 जनवरी, 1857 को मैनपुरी में हुई। पहले के कार्यक्रम के अनुसार दोआब का यमुना तटवर्ती किनारा अंग्रेजी सेना ने दिल्ली, मेरठ से लेकर इलाहाबाद तक वापस जीत लिया। इधर गंगा किनारे से चढ़ते हुए फतेहगढ़ के नवाब को दंडित कर और दोआब के विद्रोहियों का वह अंतिम आश्रय तोड़-फोड़कर दोआब का सारा प्रदेश शत्रु-विहीन करने कानपुर से सर कोलिन भी फतेहगढ़ की ओर बढ़ रहा था। ऐसे दोनों ओर से ऊपर बढ़ रही अंग्रेजी सेना ने अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी आदि स्थानों से सारे-के-सारे विद्रोहियों को भगाकर फतेहगढ़ में बंद कर दिया। फतेहगढ़ में फर्रूखाबाद के नवाब ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था, यह पहले कहा ह गया है। उस नवाब की सेना से अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ की बहुत बार छीना-झपटी हुई। फतेहगढ़ में दिल्ली और कानपुर से पराजित सिपाहियों की संख्या ही अधिक होने से वे लड़ाई शुरू होते ही मृत्यु के डर से भाग जाते। परंतु वह मृत्यु क्या इस अपमान से टलनेवाली थी? सो भी नहीं। वे भागते और अंग्रेज उनका पीछा करते। कभी छह सौ, कभी सात सौ, कभी-कभी हजार तक लोगों को काट डालते। यह इन भगोड़ों का मराना और वह उस इटावा का मरना! जमीन-आसमान का अंतर! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 318

फतेहगढ़ में नाना का एक सच्चा मददगार नादिर खान था। उसे फांसी पर लटकाने के लिए सबके सामने से ले जाया गया। फांसी पर चढ़ते हुए उसने लोगों को अंतिम उपदेश में कहा, "तुम सभी देशवासियों! अपनी तलवारें म्यान से निकालकर अंग्रेजों की सत्ता को निर्मूल कर देने के लिए आगे बढ़ो।" इस पराभव का परिणाम फर्रूखाबाद के नवाब को जल्दी ही भुगतना पड़ा। उसकी राजधानी, किले, युद्ध सामग्री सब अंग्रेजों के हाथ लगी और बचे-खुचे विद्रोही उसके साथ रुहेलखंड में गंगा पार भगा दिए गए। 4 जनवरी को जब सर कोलिन फतेहगढ़ में विजयी होकर घुसा, उस समय सारा दोआब और बनारस से ऊपर मेरठ तक सारा भूप्रदेश पूरी तरह अंग्रेजी सेना के अधीन हो गया था। तब यह प्रश्न खड़ा हो गया कि दोआब की विजय के बाद अंग्रेजी सेना का कार्यक्रम क्या हो? दोआब के विद्रोह की ज्वालाएं ठंडी हो जाने से अन्य प्रदेशों के विद्रोह अपने आप ही शांत हो जाएंगे, यह अंग्रेज सरकार को कुछ समय पहले तक जो आशा थी वह अब पूर्ण रूप से विफल हो गई थी। दिल्ली गिरते ही आठ निद के अंदर ब्रिदोह राख हो जाएगा-ऐसी भविष्यवाणी बड़े-बड़े राजकरण कुशल लोगों ने की थी। परंतु वास्तव में दिल्ली पतन से विद्रोह राख तो नहीं हुआ, भविष्य कथन ही राख हो गया। क्योंकि दिल्ली में रुका पड़ा सेना समूह उस शहर के गिरते ही किसी उतमत्त मेघ जैसा गरजते हुए चारों ओर फैल गया-बख्तार खान के अधीन रोहिला सेना, वीरसिंह के नेतृत्व में नीमच की सेना और अपने-अपने सूबदारों के नेतृत्व में अन्य हारी हुई सेनाएं अंग्रेजों की शरण जाना छोड़ दिल्ली गिरते ही अपमान में क्रोध में आगबबूला होकर दिल्ली में चूका बदला कहीं दूसरी ओर लेने निकल पड़ीं। 138 विद्रोहियों को अब हारने की चिंता नहीं थी। विजय की आशा का पहला जोश ठंडा पड़ गया था। अब उनके सीने में निश्चय की परिपक्वता आ गई थी। चाहे कुछ भी हो, अंग्रेजों से लड़ते रहने के सिवाए कोई दूसरा विचार उन्होंने अपने पास नहीं आने दिया। या तो फिरंगी मरें या स्वयं मरें। इन दो में से जब तक एक पूरी तरह समाप्त नहीं होता तब तक शस्त्र नीचे नहीं रखने का उनका स्वाभिमानी निश्चय हो गया था । वे आपस में लड़ रहे थे। उनमें से कुछ लोभवश अनियंत्रित व्यवहार कर रहे थे। कोई-कोई मृत्यु के भय से कभी-कभी भाग रहे थे । पर अंग्रेजों से लड़ाई छोड़ने को उनमें से कोई भी तैयार नहीं था। और या तो फिरंगी या वे स्वयं-किसी एक का पूरा नाश होने तक तलवार नहीं रखने का संकल्प हर विद्रोही के भिंचे दांत और तनी हुई। भृकुटी पर लिखा हुआ यदि स्पष्टता से दिखाई देता था तो वह दोआब की पराजय के बाद। इस समय लड़ाई में पकड़कर फांसी चढ़ाते हुए 1857 का स्वातंत्र्य समर - 319 138 एक बार दिल्ली में ऐसी अफवाह फैली कि श्रीमंत नाना साहब स्वयं दिल्ली पर हमला करके बादशाह को मुक्त कर ले जाने वाले हैं। यह समाचार सुनते ही दिल्ली के अंग्रेज अधिकारियों ने बादशाह की कैद के मुख्य अधिकारियों को कड़े आदेश दिए कि-'सचमुच नाना की ऐसी कोई गड़बड़ शुरू हो जाए तो वे बादशाह को गोली मार दें।"-चार्ल्स बाल, खंड 2, पृष्ठ 94

अंग्रेज अधिकारियों द्वारा उन विद्रोही सिपाहियों से इस युद्ध के विषय में किए गए प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने कहा, “फिरंगियों को मारना ही धर्माज्ञा है! और इसका अंत? सारे फिरंगियों का नाश और सारे सिपाहियों का नाश! आगे जो प्रभु की इच्छा।”¹³⁹ दिल्ली हार जाने के विद्रोहियों की स्वतंत्रता की चेतना घटने की जगह अधिकारियों सुलगती गई और दिल्ली का प्रतिशोध लेने वे लखनऊ और बरेली–इन शहरों की ओर लड़ते निकले। क्योंकि दोआब जीतने के बाद रूहेलखंड और अवध, ये दो प्रदेश अभी भी विद्रोहियों के कब्जे में थे और वहां उनके राजसिंहासन क्रियाशील थे। इसलिए अंग्रेजी सेना का मुख्य प्रश्न इन दोनों प्रदेशों को जीतने का था। इस प्रश्न का उत्तर सर कोलिन ने यह दिया कि पहले रूहेलखंड जीता जाए और फिर लखनऊ का समाचार लिया जाए। लॉर्ड केनिंग का आग्रह यह था कि पहले लखनऊ का बड़ा केंद्र ध्वस्त किया जाए। जिससे विद्रोहियों के दूसरे छोटे-छोटे शहर अपने आप शरण में आ जाएंगे। लॉर्ड केनिंग के आदेशों के अनुसार चलना बाध्य होने के कारण कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन ने पहले लखनऊ पतन करने का निश्चय पक्का किया। फतेहगढ़ में सीटन एवं वालपोल और कोलिन की पिछली योजनानुसार इकट्ठी हुई सेना की संख्या कुल दस-ग्यारह हजार तक थी। दोआब में मुख्य स्थानों पर संरक्षण के लिए थोड़ी-थोड़ी अंग्रेजी सेना रखकर और आगरा से आई नई कुमुक के साथ सर कोलिन कानपुर से आई हुई विशाल सेना लेकर लखनऊ की ओर चल पड़ा। इस समय की अंग्रेजी सेना का वर्णन अंग्रेजी ग्रंथकार इस तरह करते हैं-‘उन्नाव और बुन्नी की बीच विशाल रेतीले मैदान में उस समय जो अंग्रेजी सेना उतरी थी वैसी अंग्रेजी सेना हिंदुस्थान के मैदान में पहले कदाचित् ही जमा हुई होगी। इंजीनियर, तोपखाना, घोड़े, पैदल, रसद की गाड़ियां, सेवल लोग—यह अपूर्व अंग्रेजी सेना सर्वांग सज्जित थी। उसमें सत्रह बटालियन पैदल थीं, जिनमें पंद्रह गोरी थीं। अट्ठाईस स्क्वाड्रन घुड़सवारों की थी, जिनमें चार गोरी रेजिमेंट थीं। चौवन हलकी तोपें और अस्सी भरी तोपें थीं। उन्मत्त अवध को पदनत करने के लिए फरवरी की 23 तारीख को कानपुर छोड़कर अपनी इस सबल सेना के साथ सर कोलिन कैंपबेल फिर से एक बार गंगा के पार उतरने लगा। अवध को पदनत करने के लिए, हे गां! यह कितनी आंग्ल सेना तुम्हारे किनारे उतरी है? और हे मानिनी अवग्ध! अब इस सेना से डरकर तू पदनत होने वाली है या नहीं? सर कोलिन रास्ते के हिंदू मंदिरों को बारूद से उड़ाते हुए आगे आ रहा है, इसकी पूरी जानकारी अवध शहर को थी। परंतु अपने को पदनत करने के लिए अंग्रेजी सेना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 320 ¹³⁹ चार्ल्स बाल कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 242 ।

गंगा पार हो रही है, यह उस मानिनी अवध को विशेष बुरा नहीं लग रहा था। उसे जो दुःख था, जिस दिशा की ओर देखकर वह जार-जार आंसू बहाने लगी थी और पराजय की मृत्यु की छाया उसके अभिमानी चेहरे पर जिधर से पड़ रही थी, वहां से कोई अंग्रेजी सेना नहीं चली आ रही थी। वहां से तो जंगबहादुर की नेपाली सेना आक्रमण करती आ रही थी। अंग्रेजी सेना को अपने पर आक्रमण के लिए आते देख दुःखी हो-अवध ऐसी कायर होती तो उसने रणक्षेत्र में यह भैरव रूप धारण ही न किया होता। अंग्रेजी सत्ता को केश पकड़कर पीटते हुए जिस दिन अवध ने अपने घर से भगाया उसी दिन उसे साफ मालूम था कि उस अंग्रेजी सत्ता के समर्थन में कोई और अंग्रेजी सेना उसपर आक्रमण करेगी। और उस आगामी रण के लिए वह अपनी हजार भुजाओं से सशस्त्र होकर रण में उतरी थी। परंतु अवध को जो अब तक ज्ञात नहीं था कि मेरे शत्रु अंग्रेज मुझपर तलवार चलाएंगे, परंतु उसे यह ज्ञात नहीं था कि उसके मित्र, उसके सहोदर भी उसपद कुल्हाड़ी से वार करेंगे। वह अंग्रेजों से कुश्ती लड़ने को तो तैयार थी, परंतु हिंदुस्थान के एक स्वकीय से भी हिंदुस्थान की स्वतंत्रता के लिए जूझना पड़ेगा, यह उसे ज्ञात नहीं था। इस उदाहरण का आविष्कार करने के लिए जब जंगबहादुर अपनी नेपाली सेना सहित उसपर आ क्रमण करने आया तब ऐन समय पर विश्वास के कारण स्वजन परित्यक्त अवध जंगबहादुर की ओर देख-देखकर जार-जार आसूं बहाने लगी। क्योंकि दोआब की विशाल अंग्रेजी सेना इकट्ठी कर उसके साथ जब सर कोलिन गंगा पार करके लखनऊ की ओर चलने लगा, उसी समय पूर्व दिशा से अपनी नेपाली सेना सहित जंगबहादुर भी अंग्रेजी सेना की सहायता के लिए उधर आ रहा था। अंग्रेज, उसके मित्र और हिंदुस्थानी शत्रु! कारतूसों को गाय की चरबी लगानेवाले उसके मित्र और उस चरबी को मुंह लगाने से मना करनेवाले हिंदुस्थानी उसके शत्रु! ऐसा यह अद्वितीय कुलकलंकी जंगबहादुर हिंदुस्थान में युद्ध प्रारंभ हो गया है, यह सुनते ही अंग्रेजों से मिल गया था। सन् 1857 के थोड़े ही पहले वह विलायत गया था और अंग्रेजी ग्रंथकार कहते हैं कि 'उसने इंग्लैंड का वैभव देखा, इसलिए वह विद्रोह में सम्मिलित होने से डरा।' इंग्लैंड का वैभव क्या वास्तव में इतना भारी था? इंग्लैंड का वैभव जैसे जंगबहादुर ने प्रत्यक्ष देखा था वैसे ही नाना के अजीमुल्ला खान और सतारा के रंगो बापूजी ने भी देखा था। परंतु उस वैभव का उनपर क्या परिणाम हुआ और कैसे वे उस वैभव के हर चिह्न के पीछे क्रांतियुद्ध के लिए नई शपथ लेते गए, यह इतिहास कह ही रहा है। अतः इंग्लैंड के वैभव में कुछ नया कुछ नहीं था। जो विशेष था वह देखनेवाले के दृष्टिकोण में था। वह आंग्ल वैभव देखकर उनका देशभिमान चेत गया और उन्होंने सोचा कि मेरी मातृभूमि भी स्वतंत्रता के तिलक से मंडित हो जाए तो क्या बहार होगी। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 321

देशद्रोही को बेचैनी हुई कि यदि मैं इस वैभव की गुलामी अपनी मां पर लाद दूं तो मुझे दो टुकड़े अधिक मिलेंगे। दो टुकड़े स्वयं को अधिक मिलें, इसलिए अपनी मातृभूमि को गुलाम बनाने को तैयार खड़े जंगबहादुर ने अपनी नेपाली सेना अंग्रेजों को सौंप दी। काठमांडू से तीन हजार गोरखा लोग अवध के पूर्वी भाग-आजमगढ़ और जौनपुर में अगस्त 1857 से आकर रूके हुए थे। उनसे लड़ने को विद्रोहियों का नेता गोरखापुर का मोहम्मद हुसैन तलवार लिये खड़ा था। इस समय दोआब की लड़ाई के कारण अंग्रेजी सेना की बड़ी खींचातानी हो गई थी और इस कारण बेणीमाधव, मोहम्मद हुसैन, रजा इरादत खान आदि योद्धाओं ने बनारस के आसपास का, अवध के पूर्व की ओर का प्रांत पूरी तरह कब्जे में ले लिया था। उस प्रांत में अंग्रेजी सेना के अन्य स्थानों से खाली होने के पहले ही नेपाली सेना ने बड़ी वीरता से विद्रोहियों को अवध की ओर धकेल दिया था। कुछ दिन बाद जंगबहादुर से अंग्रेज सरकार का निश्चित करार हो गया और उस प्रदेश में तीन सेनाएं तैयार की गईं। 23 दिसंबर को स्वयं जंगबहादुर नेपाल से चलकर अंगेजों से आ मिला। कुल मिलाकर नौ हजार गोरखा लोगों की चुनी हुई सेना उसके साथ थी। उस सेना ने अंग्रेजों के फ्रैंक रोक्राफ्ट की सेना के साथ बनारस के उत्तर और अवध के पूर्व का सारा प्रांत जीतने में सफलता प्राप्त की। अंग्रेजों और गोरखों की यह सबल और संगठित सेना लड़ाई के बाद लड़ाई कर उस प्रांत के विद्रोहियों को पीछे-पीछे हटाती हुई फरवरी की 25 फरवरी को अवध में आ घुसी। घाघरा नदी पार कर अंबरपुर में यह अंग्रेजी और नेपाली सेना आ पहुंची। उस रास्ते में एक मजबूत किला ऐसे महत्त्वपूर्ण स्थान पर घड़ी झाड़ियों में खड़ा था कि उसे विद्रोहियों से जीते बिना अंग्रेजी सेना आगे जा ही नहीं सकती थी। इसलिए नेपाली सेना ने उसपर आक्रमण किया। किला लड़ने लगा। उस सर्वांगपूर्ण सेना वे वह किला लड़ने लगा और उस किले को इस तरह लड़ानेवाले क्रांतिवीरों की संख्या कितनी थी। चौंतीस! चौंतीस लोग स्वतंत्रता की स्फूर्ति में मस्त होकर अपने देश के शत्रुओं से वह किला लड़ा रहे थे। नेपाली सेना ने जबरदस्त आक्रमण किया तो उन चौंतीस देशवीरों ने उसका जबरदस्त सामना किया। क्योंकि चौंतीस लोग शत्रु के हजारों सैनिकों से युद्ध करें-ऐसा दिव्य समर इस जड़ पृथ्वी पर किसी भी काल में होना नहीं है। “उन चौंतीसों ने देश की इज्जत और धर्म की रक्षा के लिए वह किला ऐसी वीरता से लड़ाया कि शत्रु के सात योद्धा मारे गए तब भी वह किला लड़ता रहा। और ज बवह चौंतीसवां अपने स्थान से न हटकर धारातीर्थ में गिर गया तब ही वे शत्रु उस किले में जा सके।"140 जैसी दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर – 322


140 मैलसन कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 4 पृष्ठ 227 ।

नहीं लड़ी, जैसा लखनऊ नहीं लड़ा, ऐसा वह अंबरपुर का किला लड़ा। अंबरपुर का किला जीतने के बाद गोरखों और अंग्रेजों की संयुक्त सेना वहां के प्रदेश जीतते हुए आगे बढ़ी। उसी के पीछे-पीछे जनरल फ्रैंक भी सुलतानपुर के नाजिम मेहंदी हुसैन और उनके कमांडर बंदा हुसैन से बदायूं और सुलतानपुर आदि स्थानों पर लड़ाइयां लड़ता ऊपर चढ़ रहा था। अवध के पूर्वी भाग के इस प्रदेश में विद्रोहियों ने आज तक जो शासन संभाला था उसे उपर्युक्त जनरल फ्रैंक द्वारा हथिया लेने पर उसे फिर से प्राप्त करने लखनऊ की पूर्व रियासत के तोपखाने के प्रसिद्ध अधिकारी मिर्जा गफूर बेग को लखनऊ दरबार ने भेजा। उसकी सेना के सुलतानपुर की जंगी लड़ाई में 23 फरवरी को पराजित हो जाने के बाद जनरल फ्रैंक पूरी तरह सफल हो गया। पर सर कोलिन से मिलने के पूर्व देदार के किले पर उसने घेरा डाला। उस किले के वीर लोगों द्वारा तोपें छिन जाने के बाद भी शत्रु से लड़ाई जारी रखने से अंग्रेजी सेना को लेकर फ्रैंक को पीछे हटना पड़ा। वास्तव में देखा जाए तो फ्रैंक ने इतनी लड़ाइयां जीती थी कि एक आकस्मिक और छोटी पराजय से उसकी कुछ भी हानि होनेवाली नहीं थी। फिर भी उस समय अंग्रेजी अनुशासन और जवाबदेही इतनी कड़ी थी कि फ्रैंक की अनेक जीतों के बाद भी उसकी एक हार का समाचार मिलते ही सर कोलिन ने महत्वपूर्ण पदोन्नति के लिए लिखा उसका नाम काट दिया। इस तरह लखनऊ शहर पर आक्रमण करने को बढ़ रही अलग-अलग सेनाएं एक-दूसरे के एकदम पास आने लगीं। कानपुर से निकली सर कोलिन की प्रचंड सेना उधर पश्चित से बढ़ रही थी तो फ्रैंक और जंगबहादुर की सेना पूर्व की ओर से ऊपर चढ़ रही थी। 11 मार्च के पहले ये सारी सेनाएं इकट्ठा हो गई और उस पापी शहर की गरदन काटने के लिए उनकी तलवारें उतावली हो गई थी। पापी! नहीं! नहीं! केवल अभागा लखनऊ-उसके गले पर ये अपनों और परायों की तलवारें सपासप चलने को उतावली हैं तो फिर उसके प्रतिकार के लिए भी कुछ व्यवस्था हो रही है या नहीं? कानपुर की ओर तात्या क्या गड़बड़ कर रहा है, यह देखने सर कोलिन जब पिछले नवंबर में गया था तब से इस मार्च तक इस लखनऊ की सुरक्षा और उसके शत्रु के विनाश के लिए उसके निरंतर प्रयास चल रहे थे। आज तक कितनी ही बार कानपुर में नाना साहब की बार-बार हार और अखंड समर ने उसका अप्रत्यक्ष संरक्षण किया था। अंग्रेजी सेना लखनऊ की ओर बदला लेने के लिए गंगा पार होने लगती कि नाना कानपुर की ओर उसपर दबाव बनाकर उसे फिर दोआब में खींच लेते। ऐसा उत्तम पेंच नाना ने डाला था, फिर भी लखनऊ उसका वैसा लाभ नहीं ले पाया जैसा लेना चाहिए था। लखनऊ में शान से लहराते स्वतंत्रता के झंडे की रक्षा के लिए राजा से रंक तक हर कोई हथेली पर जान लिये लड़ रहा था। उसमें कितने ही जमींदार और राजा भी थे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 323

लखनऊ के जमींदार केवल अंग्रेजों द्वारा लादी गई लगान पद्धति से असंतुष्ट होकर नहीं उठे थे; वे तो स्वदेश को पापी फिरंगियों के स्पर्श से ही क्रोधित थे। यह केवल मेरा विचार हो ऐसा नहीं है, यह विचार उस समय के गवर्नर जनरल केनिंग का भी था, जो इस उद्धरण से सहज हो जाएगा- “अवध के राजा और जमींदार केवल अपनी नई लगान पद्धति से दुःखी हुए हैं, ऐसा कदाचित् आपको लगेगा। परंतु मेरी दृष्टि से इसमें दूसरी भी एक बात विचार करने के योग्य है। चंदा, वैजा और गोंडा के राजा ने जो कड़वा वैर हमसे पाला है वैसा वैर हमारे किसी भी दूसरे अधीन या मांडलीक ने न पाला होगा। चंदा के राजा का एक भी गांव हमने नहीं लियाः बल्कि हमने उसका लगान भी कम किया था। वैसा के राजा के प्रति भी हमने बहुत उदारता बरती थी। गोंडा के राजा के चार सौ गांवों में से केवल तीन हमने लिये और उसके बदले में दस हजार रूपए लगान कम किया था। “राज्यकर्ताओं में परिवर्तन हो जाने से जितना किसी का न हुआ होगा उतना लाभ नौपारा के युवा राजा का हुआ। अंग्रेजी शासन चालू होते ही हमने उसे एक हजार गांव दिए और सारे उत्तराधिकारियों को दूर कर उसकी मां को हमने उसका अभिभावक नियुक्त किया। परंतु बिलकुल आरंभ से उसकी सेना लखनऊ के कारागार में भेज दिया। “तालुकेदार अशरफ बख्श खान, जिसे पहले के राजा ने बहुत त्रास दिया था उसे हमने उसकी मालगुजारी का पूरा स्वामित्व दे दिया। पर पहले-सा ही वह हमसे गहरा वैर करने लगा। इससे और दूसरे अनेक उदाहरणों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि जो राजा और जमींदार हमारे विरूद्ध हुए हैं वे हमारे शासन के कारण व्यक्तिगत हानि से बिलकुल नहीं है।”¹⁴¹ इसीलिए अंग्रेजी इतिहासकार होम्स ने ईमानदारी से स्वीकार किया है कि“जिन राजाओं और जमींदारों ने इस स्वतंत्रता संग्राम का प्रारंभ कर उसे लड़ा वे लोग व्यक्तिगत स्वार्थ की अपेक्षा उदात्त ध्येय से प्रेरित हो गए थे। ऐसे कितने ही राजा और जागीरदार थे, जिन्हें सचमुख बुरा लगने के लिए कोई विशेष दुःख का कारण नहीं था, पर वे भी हमारी राज्यसत्ता के कानून के विरूद्ध फड़फड़ा रहे थे। हमारी राजपद्धति ही उन्हें इस चुभने वाले सत्य की स्मृति दिलाती रहती थी कि हम हारे हुए राष्ट्र हैं।” पर इन सबमें प्रमुख वह फैजाबाद का देशभक्त, वीर पुरुष अहमद शाह मौलवी कहां है? क्रांतियुद्ध की जलती ज्योति हाथ में लेकर ज बवह सारे हिंदुस्थान में आग 1857 का स्वातंत्र्य समर – 324 141 1. सर जेम्स आउट्रम के पत्र का लॉर्ड केनिंग द्वारा दिया गया उत्तर। 2. होम्स लिखित- 'सेपॉय वार'।

लगाए जा रहा था तब लखनऊ के अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़कर उसे फांसी का दंड दिया था। उस दंड पर कार्यवाही होने के पूर्व उसे फैजाबाद के कारावास में ले जाया गया और इस विदेशी कारावास की कोठरी में से उठाकर उसे सन् 1857 की आंधी ने स्वराज्य सिंहासन की सीढ़ी पर खड़ा कर दिया। वह देशवीर अहमद शाह मौलवी अपने देश की स्वतंत्रता और अपने धर्म की स्थापना के लिए रणक्षेत्र में रंग गया था। जैसा वह समरांगण में शस्त्रयोद्धा था वैसा ही सभारंण के वाक्योद्धा भी था। सभारंण में अपने वाक् शौर्य से वह हजारों देशबंधुओं को मंत्रबद्ध करता और रणांगण में हजारों देशबंधुओं के साथ शस्त्रयुद्ध से शत्रुओं को पाशबद्ध करता और रणांगण में हजारों देशबंधुओं के साथ शस्त्रयुद्ध से शत्रुओं को पाशबद्ध करता था। आलमबाग में चार हजार सेना और तोपों के साथ आउट्रम बैठा था और तात्या टोपे के पेच के कारण सर कोलिन कानपुर में बंधा हुआ था तब लखनऊ इस अवसर पर क्यों न अपने शत्रु को रण से भगा देने के लिए जोर का प्रयास करे, इसलिए मौलवी ने अपने लोगों को उत्तेजित, संगठित और एकीकृत करने के लिए रात-दिन प्रयास किए। अवध की बेगम दरबार में मुख्य राजसत्ताधारी होने से उसके कर्तृत्व से उस लखनऊ शहर में इकट्ठा हजारों भिन्न-भिन्न राजा-महाराजाओ का एकीभवन और संगठित होना जब स्पष्टतया कठिन दिखने लगा, जब अंग्रेजों की मुट्ठी भर सेना को जोरदार हमला कर नष्ट करने के अनंत शुभ प्रसंग लखनऊ की आतंरिक अराजकता और ढील के कारण व्यर्थ गए और जब दिल्ली गिर जाने, कानपुर हारने और फतेहगढ़ हाथ से जाने से उन प्रदेशों के हजारों क्रांतिवीर लखनऊ में आकर अधिक उत्तेजित होने की जगह पहले की अराजकता में अधिक उद्धरता को जोड़ने लगे और अब जबकि विजय से फूले और अगणित सैनिकों से हजार गुना सबल बने अंग्रेजों का अंतिम अनिवार्य हमला निकट आ गया है, हर क्षण ऐसी अति आशंका दिखने लगी, तब इस देशाभिमानी मौलवी ने लखनऊ के दरबार में अपने वाक् तेज से, अपनी बेझिझक करारी टीका से, अपने अप्रतिम कर्तव्य-बल से कितने ही अपनों के हृदय जाग्रत कर दिए। अभी भी एक दिल और अप्रतिहत बल से प्रयास करें तो अंग्रेजों को रणक्षेत्र में पीटना संभव है, यह उसने लखनऊ की राजसभा में आवेश से प्रतिपादित किया; परंतु उसके उस तेज से उत्तेजित न होकर उस राजसभा के कर्तृत्वशून्य और दीपक से डरे लोग और अधिक जलने लगे और कुछ ही दिनों में उस मौलवी को उन्होंने कारागृह में बंद कर दिया। परंतु बेगम से अधिक इस मौलवी का प्रभाव सिपाहियों पर था और उसमें भी दिल्ली की ओर से आई सेना का तो इस मौलवी पर बहुत विश्वास था, इसलिए उसे कारा से तुरंत मुक्त करने के लिए राजदरबार में पूर्ण प्रभाव हुआ और यह आपस के भेदभाव से झगड़ते रहने का अति नाशकारी व्यसन तोड़कर दरवाजे पर थपकी देते बैठे शत्रु का खात्मा करने सब लोग युद्ध के लिए तैयार हो जाएं-यह आवेश उसने फिर से सेना में उत्पन्ना किया। 1857 का स्वातंत्र्य समर — 325

केवल आवेश उत्पन्न कर ही यह योद्धा खाली बैठा नहीं रहा, उसने समय-समय पर सिपाहियों को रणक्षेत्र में जाने को प्रवृत्त किया और जब-जब आलमबाग के अंग्रेजों पर हिंदुस्तानियों ने आक्रमण कि तब-तब सबसे आगे मौलवी की दिव्य मूर्ति झलकती थी। 22 दिसंबर को उसने आलमबाग के अंग्रेजों को धोखे में रख उनकी सेना को पूरी तरह बांधने की एक उत्कृष्ट व्यूह-रचना की थी। स्वयं अपनी सेना के साथ अंग्रेजों को भुलावा देकर कानपुर के रास्ते पर बढ़ लिया और उसने दूसरे सैनिकों से कहा कि हमारे अंग्रेजों की पिछाड़ी पहुंचते ही वे सामने से मार लगाएं। यह बेजोड़ चाल थी। पर 'दूसरे'! यही तो सबकुछ बाधक है। उस एक आत्मा के तेज को प्रत्युत्साह देना तो दूर-कम-से-कम उसका आवश्यक अनुगमन करने का अनुशासन भी दूसरों में नहीं दिखा। हर कोई अपने को सयाना समझता! और रणक्षेत्र में पहली गोली चलते ही सब सामना करना छोड़कर उस ओर पीठ फेरनेवाले। अन्यों के ऐसे भय और अव्यवस्था के कारण मौलवी के स्वयं का काम उत्तम रीति से करने पर भी उस दिन विद्रोही रणांगण में पराजित हुए। फिर भी उनके हतोत्साह को उत्साह का तेज देने के लिए मौलवी और उसके जैसे ही अन्य तेजस्वी नेता अतिशय प्रयास करते रहे। 15 जनवरी को विद्रोहियों को समाचार मिला कि आलमबाग की अंग्रेजी सेना को मदद और रसद पहुंचाने के लिए कानपुर से कुछ अंग्रेज लोग आ रहे हैं। यह वार्त्ता समझते ही वह रसद छीनने के लिए विद्रोहियों में बातचीत चली। पर कोई रास्ता न निकले और न कोई योजना बने। अंत में उन विद्रोहियों के अनिश्चय से चिढ़कर उस अभिजात मौलवी ने सबके सामने शपथ ली कि 'मैं स्वयं यह रसद छीनकर अंग्रेजी शिविर से लखनऊ में प्रवेश करूंगा। ऐसी घोर प्रतिज्ञा कर यह साहसी अपने लोगों के साथ कानपुर के रास्ते पर लुके-छिपे बढ़ गया। परंतु इस हमले का समाचार आउटरम को पहले ही नेटिव दूत से मिल जाने पर उसने मौलवी की सेना पर उलटा हमला करने को अंग्रेजी सेना भेज दी। इस परस्पर हमले का जल्दी ही सामना हुआ। मौलवी ने उस दिन अपने अनुयायियों को वीरश्री चढ़ाने के लिए स्वयं भयंकर युद्ध किया। वह जैसे राजनीति में चमकता था वैसे ही रणनीति में भी चमकने लगा। बेसुध लड़ते-लड़ते इस वीरपुरूष को एक गोली हाथ में लगी और वह नीचे गिरा। इस मौलवी को पकड़ने के लिए अंग्रेजों में स्पर्धा लगी थी, फिर भी विद्रोही उसे डोली में डालकर बड़ी चतुराई से लखनऊ ले आए। मौलवी के घायल हो जाने का सामचार सुनते ही एक विद्रोही-हनुमान नामक शूर ब्राह्मण नेता-ने एक दिन का भी विश्राम न लेकर 17 जनवरी को अंग्रेजों पर हमला किया। प्रातः दस बजे से संध्या तक यह शूर पुरूष रणांगण में लड़ता रहा। पर अंत में उसके अत्यंत घायल होकर गिरते ही विद्रोही रण छोड़कर भागने लगे। इधर दरबार में 1857 का स्वातंत्र्य समर – 326

इस हार के कारण आपसी शत्रुता बढ़ गई। कुकर्मी सिपाहियों ने लड़ने के पहले ही पैसा मांगा, अग्रिम वेतन मिलने पर भी फिर से वेतन लिये बिना वे लड़ना नहीं चाहते थे। पर ऐसे अंधेर में उस तेजस्वी और कर्तृत्ववान् बेगम ने राज्यव्यवस्था का अनुशासन उत्तम बनाए रखा था और यही उसके असामान्य मनोधैर्य का प्रमाण था। $^{142}$ पराजय की एक के बाद एक कड़ी जुड़ती जा रही थी, तभी बेगम का अर्थमंत्री राजा बालकृष्ण सिंह मर गया। परंतु ऐसी असंख्य आपत्तियों से वह परास्त नहीं हुई। क्योंकि जिसे अंग्रेज का दरवाजे पर खड़े रहना भी मृत्यु से अधिक लज्जाजनक लगता था वह फिर रणक्षेत्र में कूद पड़ता और इस कूदने में उसकी कूद भी सबके आगे रहती-ऐसा वीरपुत्र और कोई न होकर मौलवी अहमद शाह ही था। रणांगण में हुआ असह्य घाव अच्छा होते-न-होते उसने 5 फरवरी को फिर सारी सेना लेकर रण की ओर दौड़ लगाई। मौलवी का सारा श्रम व्यर्थ होकर उस दिन भी विद्रोहियों का फिर से पराभव हो गया। फिर भी मौलवी ने लड़ाई जारी रखी। इस वीर की शूरता से चकित होकर इतिहासकार होम्स अपनी पुस्तक में लिखता है-“यद्यपि बहुसंख्या में विद्रोही डरपोक और हिम्मत हारनेवाले थे, फिर भी उनका नेता अपनी निष्ठा से और कर्तृत्व से उदात्त ध्येय का पीछा करनेवाला और सेना का नेतृत्व स्वीकारने योग्य था। यह नेता अर्थात् अहमदउल्ला-फैजाबाद का मौलवी।” $^{143}$ 60वीं रेजिमेंट के एक सूबेदार ने आठ दिन में अंग्रेजों को भगा देने की प्रतिज्ञा की और उसने भी फिर से हमले किए। एक दिन स्वयं बेगम साहिबा भी सेना के साथ बाहर निकली। परंतु उस अभागे लखनऊ को विजय नहीं मिली। विजय मिले तो कैसे? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 327 $^{142}$ 1. सर डब्ल्यू रसेल ने इस बेगम के संबंध में कहा-“सिपाही सेना का प्रचंड भाग लखनऊ में ही है, ऐसा समझा जाता है; किंतु वे उस वीरता सहित नहीं लड़ेंगे जिस वीरता सहित अवध के रक्षक संग्राम करेंगे, जिन्होंने अपने युवा सम्राट् बिर्जिस कादिर के हितों को अक्षुण्ण रखने के लिए अपने प्रमुखों का अनुगमन किया है। और इनके संबंध में निश्चित रूप से ही यह कहा जा सकता है किवे देशभक्ति के युद्ध में लिप्त हैं, जिसे वे अपने देश और सम्राट् के लिए लड़ रहे हैं। रेजीडेंसी के घेरे में भी सिपाहियों ने खुलकर रणभूमि में ऐसा युद्ध कभी नहीं किया जैसी निर्भीकता सहित जमींदारों और उनके प्रजाजनों ने किया। बेगम ने तो अपनी महान् शक्ति और योग्यता का जो परिचय दिया है, उसने संपूर्ण अवध को ही अपने पुत्र के पक्ष में उठाकर खड़ा कर दिया और सरदार तथा सामंत भी उसके प्रति पूर्णतः निष्ठावान् थे। हम तो उनके पुत्र के वैध अधिकारी हाने में अविश्वास व्यक्त कर सकते हैं; किंतु जमींदार, जो वास्तव में इस प्रश्न पर सही निर्णायक कहे जा सकते है, निस्संकोच ही बिर्जिस कादिर को उत्तराधिकारी स्वीकार करते थे। सरकार इन लोगों से विद्रोहियों जैसा व्यवहार करेगी अथवा संभावित शत्रुओं के समान। बेगम ने हमारे विरूद्ध अखंड युद्ध की घोषणा की है। इन रानियों और बेगमों के शक्तिपूरक चरित्र से ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें अपने रनिवासों और हरमों में प्रचुर मानसिक शक्ति प्राप्त होती थी और वे किसी भी स्थिति में योग्य पग उठाने में समर्थ थीं।” -'रसेल की डायरी', पृष्ठ 275 $^{143}$ 2. होम्स कृत-'सेपॉस वार'।

विजय पुरुषार्थी की दास है। वह पुरुषार्थ विद्रोहियों ने लखनऊ के युद्ध में दिखाया होता तो विजय दूर नहीं थी। पहले लिखे अनुसार अंत में सर कोलिन आलमबाग की अंग्रेजी सेना से आकर मिला। लखनऊ शहर को परास्त करने को आज एक वर्ष से अंग्रेजी सत्ता प्रयासरत थी। तथापि उसके अनेक आक्रमणों की परवाह न कर यह शहर आज तक स्वराज्य के झंडे तले दृढ़ता से खड़ा था। परंतु अब उसे परास्त किए बिना अंग्रेजी सेना वापस नहीं लौटेगी। इस समरांगण में अब या तो अंग्रेजी सत्ता परास्त होगी या भारतीय सत्ता, ऐसी अंतिम वेला आ गई है। अंग्रेजी सत्ता ने जैसे अपनी सारी शक्ति इस समय एकत्रित की थी वैसे ही विद्रोहियों की भी सारी शक्ति एकत्रित हुई थी। जगह-जगह से स्वतंत्रता भक्त लखनऊ के ध्वज की ओर आ रहे थे। चार्ल्स बाल ने 'इंडियन म्युटिनी-, खंड 2 के पृष्ठ 241 पर लिखा है- "मधुमक्खियों के समान प्रदेश भर से हजारों आवारा लोगों और स्वयंसेवकों के झुंड-के-झुंड सशस्त्र होकर फिरंगियों से होनेवाले अंतिम संघर्ष में भाग लेने तथा मरने के लिए अपने सेनापति के पास एकत्र हो रहे थे।" उन्होंने लखनऊ शहर के घर-घर में गोलीबारी करने को छेद बनाकर रखे थे। गोमती की बड़ी-बड़ी नहरें खोदकर शहर के पूर्वी भाग में मजबूती लाई, दिलखुश बाग से केसर बाग के राजमहल तक संरक्षण के लिए बड़ी-बड़ी दीवारें बांधी! उस शहर में अवध और अन्य प्रदेशों के विद्रोही मिलकर लगभग अस्सी हजार योद्धा सशस्त्र तैयार थे। सारांश यह कि उस शहर के उत्तर में छोड़कर सब दिशाओं से जंगी लश्करी तैयारी की हुई थी। इसीलिए सर कोलिन ने इस उत्तर दिशा की ओर से ही विद्रोहियों पर पहले-पहल हमला किया। पहले हैवलॉक, आउट्रम और स्वयं कोलिन कोई भी इस दिशा से न आया, इस कारण और उसी दिशा में गोमती नदी बहने से विद्रोहियों की ऐसी कल्पना थी कि शहर की उत्तर दिशा में कोई विशेष प्रबंध आवश्यक नहीं है। परंतु सर कोलिन न आउट्रम को उसी दिशा में भेजकर जब विद्रोहियों के मर्म स्थान पर एकाएक हमला किया तब उनकी पहले की सारी योजना ढहने लगी। सर कोलिन के अधीन अब कुल तीस हजार तैयार सेना थी। 144 अतः उसने दिलखुश बाग में अपना डेरा लगा विद्रोहियों से शहर का पूर्वी भाग जीत लिया। 6 मार्च को अंग्रेजी सेना ने लखनऊ पर उत्तर और पूर्व की ओर से घेरा कसना शुरू किया। सर कोलिन की व्यूह-रचना ऐसी थी कि विद्रोहियों के चारों ओर से पूरी नाकेबंदी करते हुए उन्हें लखनऊ से भागना असंभव कर दे। 6 से 15 मार्च तक तो लखनऊ अपने शत्रु से दिन-रात जूझता रहा। अंग्रेजी सेना दिलखुश बाग से कदम रसूल, शाहनजीफ, बेगम कोठी आदि स्थान पर कब्जा करते आगे बढ़ती रही। 10 मार्च को अंग्रेजी योद्धा हडसन को विद्रोहियों ने मार गिराया। इस हडसन ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 328 144 नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी', पृष्ठ 405 ।

ही दिल्ली के आत्मसमर्पित शहजादों की गोली मारकर हत्या की थी। लखनऊ ने उस पापी अधम को मारकर दिल्ली का बदला लिया। तारीख 14 तारीख को लखनऊ के राजमहल में अंग्रेजी सेना घुसी। इस संपूर्ण सफलता का वर्णन करते मैलसन लिखता है-‘’इस यश की उपलब्धि का मुख्य कारण सिख सैनिक तथा 10वीं पलटन ही थी।‘’145 पर सर कोलिन के मन पर केसर बाग की इस सफलता का आनंद उछल रहा था, तभी आउट्रम की ओर से प्राप्त समाचार से निराशा हुई। क्योंकि लखनऊ शहर की यद्यपि हार हुई, फिर भी हजारों विद्रोही अपने युवा राजपुत्रों और उस अकुंठित बेगम के साथ अंग्रेजों के प्रतिशोध को विफल करते हुए लड़ते-लड़ते बाहर निकल गए। लखनऊ शहर में रक्त की मूसलाधार बरसात में और राजमहल सहित सभी स्थानों पर विजयी मुट्ठी भर अनुयायियों के साथ फिर से शहर में प्रवेश कर रहा है, क्योंकि फिरंगी लखनऊ को परास्त करें-यह बात उस शूर के हृदय में कालकूट विष जैसा घाव करने लगा। प्राणों की चिंता छोड़, अपमान के क्रोधित, देशभक्ति से दीवाना वह मौलवी शहर के मध्य में घुसकर शत्रु की सेना द्वारा उसे पदाक्रांत करने के बाद भी जैसे मैजिनी उस शहर से अकेला ही चिपका रहा वैसे ही यह मौलवी लखनऊ लौटा। शहादतगंज के एक बंद भवन में केवल दो तोपें लेकर वह अंग्रेजों का भारी प्रतिकार करता हुआ वहीं जमा रहा। उसे यहां से भगाने के लिए जिसने 21 मार्च को पहले ही दिन बेगम कोठी जीत ली थी उस न्यू गार्ड को कुछ सेना के साथ साथ गया। न्यू गार्ड के साथ 93वीं हायलैंडर पलटन और चौथी पंजाब राइफल के सैनिक थे। परंतु विद्रोहियों ने आज अपूर्व शौर्य प्रदर्शित किया। उन्होंने धीरज से अपना संरक्षण किया और हमारी ओर से अनेक सैनिकों को मारकर और अनेक को घायल करके ही वे बाहर आए।‘’146 लखनऊ शहर का यह अंतिम युद्ध था। थोड़ी देर में युद्ध की वीरता का नशा उतरते ही उसकी दृष्टि में आया कि जिस झंडे के लिए मैं यह युद्ध कर रहा हूं वह 1857 का स्वातंत्र्य समर - 329 145 1. के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्युटिनी’, खंड 4, पृष्ठ 270 । 146 2. के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्युटिनी’, खंड 4 , पृष्ठ 286 ।

राजध्वज अब लखनऊ पर है ही नहीं और वह मेरी तलवार की प्रतीक्षा करता उधर वनवास में खड़ा है। विद्रोहियों ने अंग्रेज कैदियों के जो हाल किए, उसके नमूने के लिए दो-चार चित्र यहां दिए जा रहे हैं। लखनऊ की कारा में कुछ अंग्रेज स्त्रियां और अंग्रेज अधिकारी थे। लखनऊ ने उनके प्राण न लेकर छह माह से कैद में रखा था। परंतु जब अंग्रेजी सेना सर कोलिन के पहले आक्रमण के समय राह चलते नागरिकों को काटने घुसी तब उससे संतप्त हुए सिपाही`सर बाग के राजमहल में जाकर जोरों से मांग करने लगे कि अंग्रेज कैदी अभी-के-अभी हमें सौंपे जाएं। कोई उपाय न रहने से के. आर. सर माउंट स्टुअर्ट आदि पांच-छह गोरे नेताओं को सिपाहियों को सौंपते ही उन्होंने गोली मारकर उन्हें मार डाला। परंतु तुरंत सिपाही गोरी महिलाओं को भी मार डालने की जिद करने लगे। तब “बेगम ने नारी जाति के नाम पर ऐसा करने से स्पष्टतः मना कर दिया। उन्होंने सभी अंग्रेज महिलाओं को अपने जनानखाने में लाकर उनकी प्राण-रक्षा भी की।|’’147 बेगम ने गोरी महिलाओं को उन्हें सौंपने से साफ मना किया और उनका स्वयं राजस्त्रियों के निवास में पोषण किया। अब अंग्रेज लखनऊ शहर के नागरिकों पर कैसे जुल्म ढा रहे थे, यह भी उनके प्रसिद्ध लेखकों से उगलवा लें। विद्रोही और अवध के सभी लोग विद्रोही थे-पांच वर्ष से अस्सी वर्ष तक के सभी सशस्त्र लोगों को मार डाला गया-हाथ में आए ब्रिद्रोहियों में से सैकड़ों घायल लोगों को धड़ाधड़ गोली मारकर मार डालना, गांवों को आग लगाकर भस्म करना आदि बातें तो नित्य चल रही थीं। परंतु इससे भी अधिक दानवी प्रक्रिया के उदाहरण-लेखक डॉ. रसेल की दृष्टि में पड़ी। उनमें से एक का वह वर्णन करता है-“परंतु उनमें से एक को घर के बाहर जीवित तप्त बालू पर खींचकर लाया गया। वहां उसे अंग्रेजी सिपाहियों ने संगीनों से छेदकर दबाकर रखा था। शेष सोल्जर उसे जलाने के लिए लकड़ी बीनने चले गए थे और जब सारी तैयारी हो गई तब उस सिपाही को सुलगी चिता पर जीवित ही भूना गया। यह कृत्य करनेवाले सारे अंग्रेज लोग ही थे और उनके अनेक अधिकारी यह सब देखते वहीं खड़े हुए थे। फिर भी फड़फड़ाता बाहर आया तब यह आसुरी कर्म परमोच्च बिंदु पर पहुंचा। विलक्षण रूप से छटपटाते हुए ज बवह चिता से बाहर कूदा तब जलते मांस के लोथड़े उसकी खुली हड्डियों से लटक रहे थे और वह पकड़े जाने के पहले ऐसी अवस्था में भी कुछ दूर दौड़ गया। परंतु उसे फिर पकड़ा गया और संगीनों से कोंचकर फिर चिता पर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 330 147 1. चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2, पृष्ठ 94।

ढकेला गया और उसके अधजले अवशेष पूरे जलाए गए।‘ शहर में ऐसा कत्लेआम चल रहा था तब एक कश्मीरी लड़का एक अंधे बूढ़े को साथ लेकर वहां के एक अंग्रेज अधिकारी के पास आया और उसे भूमि पर लेटकर नमस्कार करते हुए जीवनदान की भीख मांगने लगा। उस अधिकारी ने पिस्तौल निकाली और उस अभागे शरणगत के सिर पर गोली चला दी। उसने फिर घोड़ा दबाया-फिर पिस्तौल चलाई-फिर गोली चूक गई। पुनः घोड़ा दबाया-उस गोली ने उस लड़के मारने से फिर एक बार नकार दिया-“चौथी बार यह वीर यशस्वी हुआ और उसके पैरों के पास भू-लुंठित होता हुआ वह बालक दम तोड़ गया।“148 दिल्ली गिरी, लखनऊ भी गिरा, पर क्रांतियुद्ध का जोर कम नहीं हुआ। यह अनपेक्षित स्थिति देखते हुए भी यह क्रांति सिपाहियों ने ही की थी और उसके पीछे असंतोष के एक-दो कारण ही थे, यह मानकर हम बड़ी चूक कर रहे हैं-अंग्रेजों को यह विश्वास हो गया। यह कोई बंड (विद्रोह) नहीं था, यह तो स्वतंत्रता के लिए ठना एक युद्ध था। यह एक-दो असंतोषों से उपजा विद्रोह नहीं था। इसकी तली में अनंत दुःखों को जन्म देनेवाली राजनीतिक परतंत्रता ही थी। इस क्रांति के मूल में क्षुद्र व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। स्वतंत्रता की पवित्र ज्योति, स्वधर्म और स्वराज्य की उदात्त ध्येय-भावना ही यहां सुलग रही थी। केवल सिपाही अपना निजी स्वार्थ साधने के लिए स्वतंत्रता के पवित्र ध्येय से समरस थे, ऐसा नहीं! वरन् सभी सफेदपोश जनता, शहर की तरह ही गांव की जनता, भी इस क्रांति में प्रमुखता से सहभागी हो गई थी। यदि ऐसा न होता तो यह शक्ति, यह कृतनिश्चय, यह साहस और निस्वार्थ भाव भूल से भी दिखाई नहीं देता; क्योंकि इसी समय लॉर्ड केनिंग ने 'जो कोई विद्रोह से शामिल होगा उसकी सारी संपत्ति और उत्पादन जब्त किए जाएंगे और जो शरण आएंगे उन्हें क्षमा किया जाएगा। ऐसा घोषणापत्र जारी किया था। फिर भी क्रांतिकारियों ने शस्त्र नीचे नहीं रखे। लखनऊ हार गया, पर अवध ने युद्ध जारी ही रखा। डॉ. डफ इस प्रचंड क्रांति के संबंध में लिखता है-“यदि यह केवल सिपाहियों का विद्रोह होता और बहुसंख्य जतना की सहानुभूति और सहायता उन्हें न होती तो उनपर हमें जो पहले दो-चार प्रचंड विजयें प्राप्त हुई उसी में हम उनका कचूमर निकाल दिए होते; परंतु कचूमर निकालना तो दूर रहा, उलटे वे अधिक ही चैतन्य दिखाई देने लगे और विद्रोह का फैलाव पहले से अधिक हो गया। और वह अधिक उग्र स्वरूप भी धारण कर रहा है। यह सीधी-साधा सिपाहियों का विद्रोह न होकर एक क्रांतिकारी विद्रोह ही था-यह दिखाई देता है और इसीलिए उसे पूरी तरह शांत करने में हमें सफलता कम ही मिली और आगे भी वह शीघ्र शांत होगा, ऐसा नहीं लगता। इस तरह यह विद्रोह दीर्घकालिक और उद्देश्यपूर्ण क्रांति था, जिसमें हिंदू-मुललमान नामक विसंगत 1857 का स्वातंत्र्य समर – 331 148 1. रसेल की डायरी, पृष्ठ 385।

जोड़ी कंधे से कंधा लगाए मित्र बनकर लड़ने खड़ी हो गई थी; जिसको बढ़ाने और फैलाने में अवध की पूरी जतना लगी हुई थी और जिसे प्रत्यक्ष रीति से पड़ोस के सभी प्रदेशों की सक्रिय सहानुभूति मिली हुई थी। वह विद्रोह विद्रोही सिपाहियों पर प्राप्त दो-चार शुद्ध एवं अभूतपूर्व जीतों से दबा देना संभव नहीं था। “एकदम प्रारंभ से इस ‘विद्रोह’ को सेना के बाहर फैली विस्तृत जनशक्ति ने अंग्रेजों के प्रभुत्व के विरुद्ध एवं उनकी राज्यसत्ता के विरुद्ध क्रांतिकारी विद्रोह का स्वरूप ही प्राप्त हो गया था। हमारी वास्तविक लड़ाई पूरी तरह विद्रोही सिपाहियों के साथ ही थी, यह पूरी तरह झूठ है। हमारे शत्रु केवल सिपाही होते तो देश में शांति स्थापित करने में चुटकी बजाने से अधिक का समय नहीं लगता। “शत्रु को पूरी तरह तितर-बितर कर उनकी तोपें अपने कब्जे में लिये बिना हमने शत्रु को एक भी लड़ाई में नहीं छोड़ा; पर बार-बार लगातार और कई बार पिटने के बाद भी ये लोग फिर ताजा होकर नई लड़ाई के लिए तैयार दिखाई देते थे। एक प्रांत पर कब्जा कर अंग्रेजी सेना वहां शांति व्यवस्था बनाती तो दूसरे प्रदेश में तभी विद्रोह की आंधी चलती। महत्त्व के स्थानों को जोड़नेवाला कोई राजमार्ग खोला जाता तो तुरंत उसकी नाकेबंदी कर वहां का यातायात तोड़ दिया जाता। एक विभाग से विद्रोहियों को जैसे ही भगाया जाता वैसे ही दुगुनी-तिगुनी संख्या में वे दूसरे किसी विभाग में खड़े दिखाते देते। हमारी सेना उनकी सेना पर झपटकर आक्रमण करती हुई आगे बढ़ती जाती तो विद्रोहियों की टुकड़ियां पिछला सारा प्रदेश अपने कब्जे में ले लेतीं।‘‘149 डॉ डफ द्वारा लिखे गए वास्तविक सत्य की पहचान अंग्रेजों को बहुत अंत में हुई। परंतु पांडे लोगों में से हर एक को बिलकुल प्रारंभ से इसकी पूरी अनुभूति थी। अपने राजा और अपने देश के लिए उन्होंने समरांगण में प्राण दिए। वे ये बातें स्पष्ट बोलते थे, पर उनकी स्त्रियों ने भी वास्तव में उतना ही कठोर निश्चय प्रकट किया था। जब शूरवीर अंग्रेजों ने लखनऊ के जनानखाने पर हमला किया तब उन्हें अंतःपुर में कुछ स्त्रियां मिलीं। दरवाजा तोड़कर अंदर घुसने पर अंग्रेज सोल्जरों ने यहां भी गोलियां दागीं जिससे कुछ स्त्रियां मर गईं। जो बचीं उन्हें कैद में रखा गया। लखनऊ को जला डाला गया। वह सब देखकर अब विद्रोही तुरंत शरण में आ जाएंगे, इस कल्पना से अंग्रेज खुश हुए। अपने देशबंधुओं के इस आनन्दोन्माद में सहभागी अंग्रेज जेलर उन रानियों को खिझाने के लिए पूछता,‘‘विद्रोह पूरी तरह विफल हो गया है, ऐसा तुम्हें नहीं लगता?‘‘ उस समय उन कृतनिश्चयी बेगमों ने स्पष्ट कहा, ‘‘इसे कुचलना तो बहुत दूर की बात है, अंततोगत्वा पराजय तुम्हारी ही होगी।‘‘150 1857 का स्वातंत्र्य समर – 332 149 1. डॉ डफ कृत-‘इंडियन रिबेलियन’, पृष्ठ 241-43 । 150 2. ‘नैरेटिव ऑफ दि इंडियन म्यूटिनी’, पृष्ठ 300; रसेल की डायरी, पृष्ठ 400।

प्रकरण-8 कुँवर सिंह और अमर सिंह जगदीशपुर की घाटी से होअर की शिकारी टोली द्वारा भगाए जाने के बाद राजमहल का सिंह वृद्ध युवा कुंवर सिंह अब अपनी स्वतंत्रता पर घात करनेवाले के कंठ पर कब प्रबल हमला कर सके, इस अवसर की ताक में पश्चिम बिहार के वनों में छिपते-छिपाते चक्कर काट रहा था। उसकी अयाल गुस्से से खड़ी थी, उसके पंजे बदला लेने के लिए फैले हुए और उसके नेत्र शत्रु की गरदरन पर झपट पड़ने के यौगय अवसर की ताक में थे। जैसे अपनी कोठरी में घूमता सिंह हो वैसे ही वह सिंह उन झाड़ियों में इस सिरे से उस सिरे तक चक्कर काट रहा था। उस सिंह के साथ उसके अन्य शावक भी थे। उसके भाई अमर सिंह, निस्स्वार सिंह व जवान सिंह। ये लोग भी अपने-अपने अनुयायियों के साथ वहां आए थे। और तो और, उसकी प्रिया सिंहनी भी युद्धवेश में उस राज्य में अपने वनराज के साथ रिपुरक्त-पान करने को सज्जत थी। शाहाबाद जिले में उसकी वंश परंपरागत भूमि विदेशियों के कब्जे में थी, उसकी सेना थोड़ी सी थी-एक हजार दो सौ सिपाही और अधिकारी और कोई चार सौ अशिक्षित नौकर उसके पास थे। उसके जगदीशपुर के राजमहल में विदेशी शत्रु का अमंगल डेरा पड़ा हुआ था। उसके देवालयों और देवमूर्तियों का उन्मुक्त म्लेच्छों ने चकनाचूर कर दिया था। इस सब अपमान से वह चिढ़ गया था, फिर भी कुंवर सिंह गुस्से के अधीन नहीं हुआ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 333

था। उसने जनहानि न होने दी और जिस दिन जगदीशपुर छोड़ा उसी दिन केवल मनोविकारों का दास न होकर और आवेश में विजय अवसर न चूकते हुए एक नई पद्धति का युद्ध लड़ने की योजना बनाई थी। वह जगदीशपुर पर यकायक हमला करने नहीं गया था और शहाबाद प्रदेश में भी उस दृष्टि से नहीं रुका रहा। उस प्रदेश पर और राजधानी पर अंग्रेजों का मजबूत बंदोबस्त था, यह उसे ज्ञात था। इसलिए उसने राजधानी हारने की बिलकुल चिंता नहीं की। उसे जो चिंता थी वह यह कि राजधानी हारे या जीते, मेरे स्वातंत्र्य युद्ध का जरतारी ध्वज अटल लहराता रहना चाहिए। उसकी नई पद्धति स्वतंत्रता संग्राम की अनन्य संजीवनी है। उस युद्ध पद्धति का नाम ‘छापामार युद्ध’ है। इसलिए अपने अपमान के क्षोभ से अंग्रेजों की सबल सेना पर दीप-पतंग-त्वरा से न झपटते हुए कुंवर सिंह उस पश्चिम बिहार के वन में शोण नदी के किनारे-किनारे अंग्रेजों के दुर्बल स्थान टटोलता छिपा हुआ था। लखनऊ के निःपात के लिए आजमगढ़ की ओर से अधिकतर नेपाली और अंग्रेजी सेना अवध की ओर चल पड़ी है, यह सूचना उसे मिली। उसकी तीव्र नाक को इस शिकर की गंध आते ही जगदीशपुर का सिंह हमला करने उस वन से बाहर निकला। क्रोध और मनोविकार के क्षणिक समाधान के अधीन होनेवाले दुर्बल लोगों की तरह विजय की संभावना कम होते हुए भी एक राजधानी के चारों ओर ही घूमते रहनेवाला वह आदमी नहीं था, वह तो सिद्धांत की अंतिम विजय जिधर दिखे उधर ही समर करनेवाला छापामार वीर था। लखनऊ की ओर सारी अंग्रेजी सेना जा रही थी, पर अंग्रेजों की आंखें जगदीशपुर की ओर होने से कुंवर सिंह ने अभी उस ओर जाने की योजना नहीं बनाई। पूर्व अवध में जहां अंग्रेजी मजबूती बिलकुल ढीली पड़ी थी उसने उधर झपट्टा मारने की योजना बनाई। अवध में घुसते ही वहां के अनेक विद्रोहियों को इकट्ठा कर आजमगढ़ पर हल्ला करें और वहां विजय मिलते ही श्री काशी क्षेत्र पर या इलाहाबाद पर भी हमला करें और इस तरह जैसे को तैसा बनकर जगदीशपुर का बदला लिया जाए-ऐसा दांव सोचकर कुंवर सिंह पूर्व अवध की ओर निकला । सन् 1857 की 18 मार्च को बेतवा के विद्रोही उससे आकर मिले और उस संयुक्त सेना ने अतरोलिया के किले के पास अपना शिविर लगाया। आजमगढ़ अतरोलिया से पच्चीस मील दूर था। कुंवर सिंह की सेना इतनी पास आ गई है, यह समझते ही, कोई तीन सौ पैदल और घुड़सवार, दो तोपें-इतनी अंग्रेजी सेना लेकर मिलमन अतरोलिया की ओर बढ़ा। 22 मार्च का बेतवा के विद्रोही उससे आकर मिले और उस संयुक्त सेना ने अतरोलिया के किले के पास अपना शिविर लगाया। आजमगढ़ अतरोलिया से पच्चीस मील दूर था। कुंवर सिंह की सेना इतनी पास आ गई है, यह समझते ही, कोई तीन सौ पैदल और घुड़सवार, दो तोपें-इतनी अंग्रेजी सेना लेकर मिलमन अतरोलिया की ओर बढ़ा। 22 मार्च को प्रातःकाल की सूर्य किरण रण-मैदान को स्पर्श भी न कर पाई थी कि मिलमन और क्रांतिकारी सेना की आंखें मिलीं। एकाएक बढ़ आई अंग्रेजी सेना को देखकर झिझके विद्रोहियों को क्षण भर का भी अवसर न देकर मिलमन ने लड़ाई प्रारंभ कर दी। विद्रोही लड़ने लगे, पर वे विद्रोही अंग्रेजों से कितने लड़ पाते? उनकी तुरंत पराजय हुई। कुंवर सिंह ने इतने तामझाम से हमला किया था, उसकी इस अंग्रेजी सेना ने कैसी फजीहत की। सारी रात चलकर आए होते हुए भी विद्रोहियों से इतने जोर से लड़नेवाली अंग्रेज सेना और उसके सेनानी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 334

सचमुच शाबासी पाने योग्य हैं। तुम अपना सुबह का कलेवा गाढ़े पसीने की कमाई से नहीं, गाढ़े रक्त की कमाई से कर रहे हो, इसलिए सारे अंग्रेज सैनिकों, अपने सेनानी के साथ उस अमराई में शांति से बैठकर उस बाल सूर्य की किरणों और विजय के आनंद में अपना कलेवा ग्रहण करो। शस्त्र एक तरफ रखे गए, कलेवा तैयार हुआ, भूख के समय कौर मुंह तक गया-प्यास मिटाने गिलास होंठो तक गया। उतने में- हा! हा! यह क्या? होंठों से लगता गिलास छूट गया, मुंह का कौर मुंह में रहा। कलेवा के पात्र तड़ातड़ टूटे। शस्त्र सपासप बाहर आए अरे, कुंवर सिंह तो नहीं आया? हां, हा, मदमस्त आंग्ल गज के गंडस्थल पर हमला करके कोसिला से ब्रिटिश सेना को जो पीछे हटाना आरंभ किया तो सीधे आजमगढ़ तक कुंवर सिंह ने उस अभागे मिलमन को दौड़ाया। आजमगढ़ में पहुंचने के बाद मिलमन की जान में जान आई। उसके आवश्यक संदेश के कारण कोई तीन सौ पच्चीस लोगों की नई कुमुक बनारस और गाजीपुर से भेजी गई और इस सारी सेना के सेनापति पद पर कर्नल डेम्स की नियुक्ति हुई। अब आजमगढ़ जैसी मजबूत जगह, दोगुनी बढ़ी हुई अंग्रेजी सेना और कर्नल डेम्स जैसा ताजा दम सेनापति, तब पिछली मामूली पराजय का प्रतिशोध लेने की बात क्यों न सोची जाए? इसलिए कर्नल डेम्स 27 मार्च को आजमगढ़ छोड़कर कुंवर सिंह को मजा चखाने निकला। बाहर निकलते ही वह जीत भी गया और कुंवर सिंह पर ऐसी जीत पाते ही उस भयानक नाटक का ही एक भयानक प्रयोग शुरू हो गया। कुंवर सिंह ने इस नए सौल्जरों और नए सेनापति को ऐसा थप्पड़ लगाया कि कर्नल डेम्स मैदान छोड़ सीधे आजमगढ़ की ओर भाग और शहर की दीवारों के पीछे जाकर छिप गया। उसकी सेना में से कोई कुंवर सिंह पर आक्रमण के लिए बाहर मुंह निकालने को भी तैयार नहीं था। अंग्रेजों की यह पराजय सुनकर इलाहाबाद में बैठे अंग्रेज गवर्नर का चेहरा चिंता से काला हो गया। "इस चढ़ाई के समय गवर्नर जनरल केनिंग इलाहाबाद में ही था। केनिंग कुंवर सिंह की युद्ध-क्षमता, धैर्य, बहादुरी आदि सभी गुणों से परिचित था। अतः आनेवाले संवाद का रूप उसके सामने स्पष्ट था।151 हर नए दिन उसके पास नई सेना इकट्ठी होती जा रही थी। लखनऊ में हारकर भागे हुए सिपाही भी अब उसके झंडे की ओर दौड़ते चले आ रहे थे और जिसमें इस हारी एवं असंगठित सेना को भी सफलता दिलानेवाले छापामार कुशलता वास कर रही थी, वह जगदीशपुर का राणा शीघ्र ही आजमगढ़ को ताला लगाकर बीच के इक्यासी मील की यात्रा कर और बनारस शहर पर अचानक हमला करके इलाहाबाद में गवर्नर जनरल और लखनऊ में कमांडर-इन-चीफ दोनों की ही कलकत्ता से जुड़ी डोर काटने से चूकेगा नहीं, यह तुरंत लॉर्ड केनिंग की समझ में आ गया। विद्रोह के प्रारंभ में सिख लोगों की राजनिष्ठा के कारण बनारस और इलाहाबाद शहर अंग्रेजों के हाथ में आ जाने से वे स्वतंत्रता का मुंह बांधकर हिंदुस्थान का गला दबा सके थे; अंग्रेजों के हाथ आया 1857 का स्वातंत्र्य समर - 335 151 1. मैलसन कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 4, पृष्ठ 321 ।