छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| विद्यां यच्च पश्चाच्चिरं वसेत्याज्ञाप्तवान्, तन्निमित्तं ब्राह्मणं क्षमापयति हेतुवचनोक्त्या ।<br><br>तं होवाच राजा सर्वविद्यो ब्राह्मणोऽपि सन्नयथा येन प्रकारेण मा मां हे गौतमावदस्त्वं तामेव विद्यालक्षणां वाचं मे ब्रूहीत्यज्ञानात्तेन त्वं जानीहि । तत्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रकारेणेयं विद्या प्राक् त्वत्तो ब्राह्मणान्न गच्छति न गतवती । न च ब्राह्मणा अनया विद्ययानुशासितवन्तः । तथैतत्प्रसिद्धं लोकेयतस्तस्मादु पुरा पूर्वं सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव क्षत्रजातेरेवानया विद्यया प्रशासनं प्रशास्तृत्वं शिष्याणामभूद्बभूव । क्षत्रियपरम्परयैवेयं विद्यैतावन्तं कालमागता, तथाप्यहमेतां तुभ्यं वक्ष्यामि त्वत्सम्प्रदानादूर्ध्वं ब्राह्मणान्गमिष्यति । अतो मया यदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसीत्युक्त्वा तस्मै होवाच विद्यां राजा ॥७॥ | स्थान किया और फिर उसे 'चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, उसका कारण बतलाते हुए वह ब्राह्मणसे क्षमा कराता है।<br><br>राजाने उससे कहा—'सर्वविद्यासम्पन्न ब्राह्मण होनेपर भी हे गौतम ! तुमने जिस प्रकार मुझसे 'उस विद्यारूप वाणीको ही मेरे प्रति कहो' इस प्रकार अज्ञानपूर्वक कहा है इससे तुम यह जानो। उसमें यह कारण बतलाता है कि जिससे यह विद्या तुमसे पहले ब्राह्मणोंमें नहीं गयी तथा इस विद्याद्वारा ब्राह्मणोंने उपदेश ही नहीं किया; क्योंकि इस प्रकार यह बात इस लोकमें प्रसिद्ध है इसीसे पूर्वकालमें समस्त लोकोंमें क्षत्रियका ही--क्षत्रियजातिका ही इस विद्याके द्वारा शिष्योंका शासन--शिक्षकत्व रहा है। अर्थात् क्षत्रियोंकी परम्परासे ही इतने समयतक यह विद्या आयी है। तथापि मैं तुम्हारे प्रति इसका उपदेश करूँगा। तुम्हें देनेके पश्चात् यह ब्राह्मणोंके पास जायगी। इसलिये मैंने जो कुछ कहा है उसे क्षमा करना। ऐसा कहकर राजाने उसे विद्याका उपदेश किया ॥ ७ ॥ |
--: ० :-- इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥ -—: ० :—-
चतुर्थ खण्ड
पञ्चम प्रश्नका उत्तर
| पञ्चम्यामाहुतावाप इत्ययं प्रश्नः प्राथम्येनापाक्रियते । तदपाकरणमन्वितरेषामपाकरणमनुकूलं भवेदिति । अग्निहोत्राहुत्योः कार्यारम्भो यः स उक्तो वाजसनेयके । तं प्रति प्रश्नाः, उत्क्रान्तिराहुत्योर्गतिः प्रतिष्ठा तृप्तिः पुनरावृत्तिर्लोकं प्रत्युत्थायीति । तेषां चापाकरणमुक्तं तत्रैव—‘ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतस्ते अन्तरिक्षमाविशतस्ते अन्तरिक्षमेवाहवनीयं कुर्वते वायुं | अब 'पाँचवीं आहुतिमें आप (जल) पुरुषसंज्ञक क्यों हो जाते हैं?' इस प्रश्नका सबसे पहले निराकरण किया जाता है, क्योंकि उसका निराकरण होनेपर अन्य प्रश्नोंका निराकरण सुगम हो जायगा । अग्निहोत्रकी [ प्रातःकालिक और सायंकालिक ] दोनों आहुतियोंका जो कार्यारम्भ है वह वाजसनेयोपनिषद्में बतला दिया गया है । वहाँ उस ( कार्यारम्भ ) के विषयमें उन दोनों आहुतियोंकी उत्क्रान्ति, गति, प्रतिष्ठा, तृप्ति, पुनरावृत्ति तथा लोकोंके प्रति उत्थान करना-ये छः प्रश्न हैं । वहीं उनका निराकरण भी इस प्रकार बतलाया गया है—‘‘वे ये आहुतियाँ हवन किये जानेपर [ अपूर्वरूप होकर उत्क्रमण करते हुए यजमानको आवृत कर उसके साथ ] उत्क्रमण करती हुई अन्तरिक्षलोकमें प्रवेश करती हैं; और अन्तरिक्षलोकको ही आहवनीय, वायुको समिध् तथा किरणोंको |
४८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| समिधं मरीचीरेव शुक्लामाहुतिं ते अन्तरिक्षं तर्पयतस्ते तत उत्क्रामतः'' इत्यादि; एवमेव पूर्ववद्दिवं तर्पयतस्ते तत आवर्तेते । इमामाविश्य तर्पयित्वा पुरुषमाविशतः । ततः स्त्रियमाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भवतोति । | शुक्ल आहुति बनाती हैं; इस प्रकार ये अन्तरिक्षलोकको तृप्त करती हैं* फिर वहाँसे [ यजमानके उत्क्रमण करनेपर ] वे उत्क्रमण करती हैं" इत्यादिरूपसे इसी तरह पहलेहीके समान द्युलोकको [ द्युलोकस्थ यजमानको फलप्रदानद्वारा ] तृप्त करती हैं । तत्पश्चात् [ प्रारब्धक्षय होनेपर यजमानके पुनरावर्तन करनेपर ] वे वहाँसे लौट आती हैं, तथा इस लोकमें प्रवेश कर इसे तृप्त करनेके अनन्तर [रेतःसेकमें समर्थ] पुरुषमें प्रवेश करती हैं । फिर स्त्रीमें प्रवेश कर वे परलोकके प्रति [ लौकिक कर्म कराती हुई ] उत्थान करनेवाली होती हैं । † | | तत्राग्निहोत्राहुत्योः कार्यारम्भमात्रमेवंप्रकारं भवतीत्युक्तम् । इह तु तं कार्यारम्भमग्निहोत्रापूर्वपरिणामलक्षणं पञ्चधा प्रविभज्याग्नित्वेनोपासनमुत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विधित्सन्नाह । असौ वाव लोको गौतमाग्निरित्यादि । | वहाँ ( वाजसनेयोपनिषद्में ) तो यह बतलाया गया था कि अग्निहोत्रकी आहुतियोंका केवल कार्यारम्भमात्र इस प्रकार होता है; किंतु यहाँ अग्निहोत्रके अपूर्वके परिणामरूप उस कार्यारम्भको पाँच प्रकारसे विभक्त कर उनमें उत्तरमार्गकी प्राप्तिके साधनभूत अग्निभावसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति 'असौ वाव लोको गौतमाग्निः' इत्यादि कथन करती है । |
* अर्थात् अन्तरिक्षलोकस्थ यजमानको फलोन्मुख करती हैं ।
† अर्थात् गर्भरूपसे उत्पन्न हुए यजमानको कर्मानुष्ठानमें समर्थ देहकी प्राप्ति करा उसके द्वारा पारलौकिक कर्म कराती हुई उसका परलोकके प्रति गमन कराती हैं !
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३
| इह सायं प्रातरग्निहोत्राहुती हुते पयआदिसाधने श्रद्धापुरःसरे आहवनीयाग्निसमिद्धूमार्चिरङ्गारविस्फुलिङ्गभाविते कर्त्रादिकारकभाविते चान्तरिक्षक्रमेणोत्क्रम्य द्युलोकं प्रविशन्त्यौ सूक्ष्मभूते अप्समवायित्वादप्शब्दवाच्ये श्रद्धाहेतुत्वाच्च श्रद्धाशब्दवाच्ये। तयोरधिकरणोऽग्निः, अन्यच्च तत्संबद्धं समिदादीत्युच्यते। या चासावग्न्यादिभावना हुत्योः साऽपि तथैव निर्दिश्यते। | इस लोकमें जल आदि जिनके साधन हैं, जो श्रद्धापूर्वक निष्पन्न की जाती हैं, जिनमें आहवनीय अग्नि, समिध्, धूम, अर्चि, अङ्गार और विस्फुलिङ्गकी तथा कर्ता आदि कारककी भावना की गयी है, वे अग्निहोत्रकी सायंकालिक एवं प्रातःकालिक दो आहुतियाँ अन्तरिक्षक्रमसे उत्क्रमण कर द्युलोकमें प्रवेश करती हुई सूक्ष्म एवं अप्-समवायिनी (जलमयी) होनेके कारण 'अप्' शब्दकी वाच्य हैं और श्रद्धाजनित होनेके कारण 'श्रद्धा' शब्दकी वाच्य हैं। यहाँ उनके आश्रयभूत अग्नि और उससे सम्बद्ध जो समिध् आदि हैं उनका वर्णन किया जाता है तथा उन आहुतियोंमें जो अग्नि आदिकी भावना है उसका भी उसी प्रकार निर्देश किया जाता है। |
लोकरूपा अग्निविद्या
असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! यह प्रसिद्ध [द्यु-] लोक ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं ॥ १ ॥
छा० उ० १६—
४८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| असौ वाव लोकोऽग्निर्ह गौतम यथाग्निहोत्राधिकरणमाहवनीय इह। तस्याग्नेर्द्युलोकाख्यस्यादित्य एव समित्, तेन हीद्धोऽसौ लोको दीप्यते अतः समिन्धनात्समिदादित्यः। रश्मयो धूमस्तदुत्थानात्, समिधो हि धूम उत्तिष्ठति। अहरर्चिः प्रकाशसामान्यात्, आदित्यकार्यत्वाच्च। चन्द्रमा अङ्गाराः, अहःप्रशमेऽभिव्यक्तेः अर्चिषो हि प्रशमेऽङ्गारा अभिव्यज्यन्ते। नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाश्चन्द्रमसोऽवयवा इव विप्रकीर्णत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! जिस प्रकार इस लोकमें आहवनीयाग्नि अग्निहोत्रका अधिकरण है उसी प्रकार यह प्रसिद्ध लोक ही अग्नि है। उस द्युलोकसंज्ञक अग्निका आदित्य ही समिध् है; उससे सम्यक्प्रकारसे दीप्त हुआ ही यह लोक देदीप्यमान होता है; अतः सम्यक् प्रकारसे इन्धन (दीपन) करनेके कारण आदित्य ही समिध् (इन्धन) है। उससे निकलनेके कारण किरणें धूम हैं, क्योंकि समिध्से ही धूम निकला करता है। प्रकाशमें समानता और आदित्यका कार्य होनेके कारण दिन ज्वाला है। चन्द्रमा अङ्गार है, क्योंकि यह दिनके शान्त होनेपर अभिव्यक्त होता है; लौकिक अङ्गारे भी ज्वालाके शान्त होनेपर ही प्रकट हुआ करते हैं। तथा चन्द्रमाके अवयवोंके समान नक्षत्रगण विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि इधर-उधर छिटके रहनेमें [विस्फुलिङ्गोंके साथ] उनकी समानता है ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५
उस इस [द्युलोकरूप] अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्यथोक्तलक्षणेऽग्नौ देवा यजमानप्राणा अग्न्यादिरूपा अधिदैवतम् । श्रद्धामग्निहोत्राहुतिपरिणामावस्थारूपाः सूक्ष्मा आपः श्रद्धाभाविताः श्रद्धा उच्यन्ते । पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीत्यपां होम्यतया प्रश्ने श्रुतत्वात् । श्रद्धा वा आपः, श्रद्धामेवारभ्य प्रणीय प्रचरन्ति, इति च विज्ञायते । तां श्रद्धामद्रूपां जुह्वति ।<br><br>तस्या आहुतेः सोमो राजापां श्रद्धाशब्दवाच्यानां द्युलोकाग्नौ हुतानां परिणामः सोमो राजा संभवति । यथर्ग्वेदादिपुष्परसा ऋगादिमधुकराेपनीतास्त आदित्ये यशआदिकार्यं रोहितादि- | उस इस उपर्युक्त लक्षणवाले अग्निमें देवगण—[अध्यात्मदृष्टिसे] यजमानके प्राण तथा अधिदैवत-रूपसे अग्नि आदि देवगण श्रद्धाका [ हवन करते हैं ] । अग्निहोत्रकी आहुतियोंकी परिणामावस्थारूप सूक्ष्म जल श्रद्धारूपसे भावित होनेके कारण श्रद्धा कहा जाता है। [ यहाँ 'श्रद्धा' शब्दसे जलका उल्लेख इसलिये किया गया है ] क्योंकि 'पाँचवीं' आहुति देनेपर जल 'पुरुष' शब्दवाची हो जाता है' इस प्रश्नमें जल होम्यद्रव्यरूपसे सुना गया था । इसके सिवा यह प्रसिद्ध भी है कि 'श्रद्धा ही जल है तथा श्रद्धासे आरम्भ करके ही लोग सामग्री जुटाकर कर्म करते हैं' । उस जलरूपा श्रद्धाका वे हवन करते हैं ।<br><br>उस आहुतिसे राजा सोम होता है अर्थात् 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जल-का द्युलोकरूप अग्निमें हवन किये जानेपर उसका परिणामरूप दीप्ति-मान् चन्द्रमा होता है । जिस प्रकार ( अ० ३ खं० १ में ) यह कहा गया है कि 'ऋग्वेदादि पुष्पके रस ऋगादि मधुकरोंद्वारा ले जाये जानेपर आदित्यमें जिस प्रकार रोहितादिरूप |
४८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| रूपलक्षणमारभन्त इत्युक्तं तथेमा अग्निहोत्राहुतिसमवायिन्यः सूक्ष्माः श्रद्धाशब्दवाच्या आपो द्युलोकमनुप्रविश्य चान्द्रं कार्यमारभन्ते फलरूपमग्निहोत्राहुत्योः। <br><br> यजमानाश्च तत्कर्त्तार आहुतिमया आहुतिभावनाभाविता आहुतिरूपेण कर्मणाकृष्टाः श्रद्धाप्समवायिनो द्युलोकमनुप्रविश्य सोमभूता भवन्ति । तदर्थं हि तैरग्निहोत्रं हुतम् । अत्र त्वाहुतिपरिणाम एव पञ्चाग्निसंबन्धक्रमेण प्राधान्येन विवक्षित उपासनार्थं न यजमानानां गतिः । तां त्वविदुषां धूमादिक्रमेणोत्तरत्र वक्ष्यति विदुषां चोत्तरां विद्याकृताम् ॥ २ ॥ | यज्ञ आदि कार्य आरम्भ करते हैं, उसी प्रकार अग्निहोत्रकी आहुतियोंसे सम्बद्ध ये 'श्रद्धा' शब्दवाच्य सूक्ष्म जल द्युलोकमें प्रवेश कर अग्निहोत्रकी आहुतियोंका फलरूप चन्द्रमासम्बन्धी कार्य आरम्भ करते हैं । <br><br> तथा उस हवनके करनेवाले यजमान आहुतिमय—आहुतिकी भावनासे भावित आहुतिरूप कर्मसे आकर्षित हो श्रद्धारूप जलसे पूर्ण हो द्युलोकमें प्रवेश कर चन्द्रमारूप हो जाते हैं, क्योंकि उसीके लिये उन्होंने अग्निहोत्र किया था; किंतु यहाँ तो उपासनाके लिये प्रधानतया पाँच अग्नियोंके सम्बन्धसे आहुतियोंका परिणाम ही बतलाना अभीष्ट है, यजमानोंकी गति नहीं; उसका तो श्रुति आगे चलकर धूमादिक्रमसे अविद्वानोंकी गतिका तथा विद्यासे प्राप्त होनेवाली विद्वानोंकी उत्तरमार्गीय गतिका वर्णन करेगी ॥२॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
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पञ्चम खण्ड
पर्जन्यरूप अग्निविद्या
| द्वितीयहोमपर्यायार्थमाह— | अब श्रुति द्वितीय होमके पर्यायार्थका वर्णन करती है— |
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पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
| पर्जन्यो वाव पर्जन्य एव गौतमाग्निः पर्जन्यो नाम वृष्ट्युपकरणाभिमानी देवताविशेषः। तस्य वायुरेव समित्। वायुना हि पर्जन्योऽग्निः समिध्यते, पुरोवातादिप्राबल्ये वृष्टिदर्शना। अभ्रं धूमो धूमकार्यत्वाद् धूमवच्च लक्ष्यमाणत्वात्। विद्युदर्चिः, प्रकाशसामान्यात्। अशनिरङ्गाराः, काठिन्याद्विद्युत्सम्बन्धाद्वा। ह्रादनयो | हे गौतम ! 'पर्जन्यो वाव'-पर्जन्य ही अग्नि है—वृष्टिके जो साधन हैं उनके अभिमानी देवताविशेषका नाम 'पर्जन्य' है। उसका वायु ही समिध् है, क्योंकि पर्जन्यरूप अग्नि वायुसे ही प्रदीप्त होता है, जैसा कि पूर्वीय वायु आदिकी प्रबलता होनेपर वृष्टि होती देखी जानेसे सिद्ध होता है। धूमका कार्य होने तथा धूमवत् देखा जानेके कारण बादल धूम है। प्रकाशमें समानता होनेके कारण विद्युत् (बिजली) ज्वाला है। कठिनताके कारण अथवा विद्युत्से सम्बन्ध रखनेके कारण वज्र अङ्गार है। ह्रादनय विस्फुलिङ्ग |
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४८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ५
| ४८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| विस्फुलिङ्गाः, ह्रादनयो गर्जित- | है; मेघोंकी गर्जनाके शब्दोंको |
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| शब्दा मेघानां विप्रकीर्णत्वसा- | 'ह्रादनि' कहते हैं; विप्रकीर्णत्व (इधर-उधर फैले रहने) में समानता |
| मान्यात् ॥ १ ॥ | होनेके कारण वे विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्ष सम्भवति ॥ २ ॥
उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते हैं; उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पूर्ववत्सोमं राजानं जुह्वति। तस्या आहुतेर्वर्षं संभवति । श्रद्धाख्या आपः सोमाकारपरिणता द्वितीये पर्याये पर्जन्याग्निं प्राप्य वृष्टि-त्वेन परिणमन्ते ॥ २ ॥ | उस इस अग्निमें देवगण पूर्ववत् राजा सोमका हवन करते हैं । उस आहुतिसे वर्षा होती है । श्रद्धासंज्ञक आप् इस द्वितीय पर्यायमें सोमके आकारमें परिणत हो पर्जन्याग्निको प्राप्त होकर वृष्टिरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
पृथिवीरूपा अग्निविद्या
पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| पृथिवी वाव गौतमाग्निरित्यादि पूर्ववत् । तस्याः पृथिव्याख्यस्याग्नेः संवत्सर एव समित्; संवत्सरेण हि कालेन समिद्धा पृथिवी व्रीह्यादिनिष्पत्तये भवति । आकाशो धूमः, पृथिव्या इवोत्थित आकाशो दृश्यते; यथाग्नेर्धूमः । रात्रिरर्चिः, पृथिव्या ह्यप्रकाशात्मिकाया अनुरूपा रात्रिः; तमोरूपत्वात्, अग्नेरिवानुरूपमर्चिः। | 'हे गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । उस पृथिवीसंज्ञक अग्निका संवत्सर ही समिध् है, क्योंकि संवत्सररूप कालसे समिद्ध होकर अर्थात् पुष्टि लाभ करके ही पृथिवी धान्यादिकी निष्पत्तिमें समर्थ होती है । आकाश धूम है, क्योंकि आकाश पृथिवीसे उठा हुआ-सा दिखायी देता है, जिस प्रकार कि अग्निसे धुआँ उठता दिखायी देता है । रात्रि ज्वाला है; अप्रकाशात्मिका पृथिवीके अनुरूप ही रात्रि ज्वाला है, क्योंकि वह तमोरूपा है; अतः [ पृथिवीरूप ] अग्निके समान यह उसके अनुरूप ज्वाला है । |
४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| दिशोऽङ्गाराः, उपशान्तत्वसामान्यात् । अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः, क्षुद्रत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | उपशान्तिमें समानता होनेके कारण दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा क्षुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अवान्तर-दिशाएँ (कोण) विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नँसंभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नित्यादि समानम् । तस्या आहुतेरन्नं व्रीहियवादि संभवति ॥ २ ॥ | ‘तस्मिन्नेतस्मिन्’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। उस आहुतिसे व्रीहियवादिरूप अन्न होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
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पुरुषरूपा अग्निविद्या
पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गारे और श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
| पुरुषो वाव गौतमाग्निः। । तस्य वागेव समित्, वाचा हि मुखेन समिध्यते पुरुषो न मूकः। प्राणो धूमः, धूम इव मुखान्निर्गमनात्। जिह्वार्चिर्लोहितत्वात्। चक्षुरङ्गाराः, भास आश्रयत्वात्। श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विप्रकीर्णत्वसाम्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, क्योंकि वाणीरूप मुखके द्वारा ही पुरुष सुशोभित होता है, मूक पुरुष शोभित नहीं होता। प्राण धूम है, क्योंकि वह धूमके समान मुखसे निकलता है; लाल होनेके कारण जिह्वा ज्वाला है; प्रकाशका आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गारे हैं तथा विप्रकीर्णत्वमें समानता होनेसे श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥
४९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| समानमन्यत् । अन्नं जुह्वति <br><br> व्रीह्यादिसंस्कृतम् । तस्या <br><br> आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥ | शेष अर्थ पूर्ववत् है। देवगण इसमें व्रीहि आदिसे सम्यक् प्रकारसे तैयार किये हुए अन्नका हवन करते हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ २ ॥ |
<div align="center">इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
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स्त्रीरूपा अग्निविद्या
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समि- द्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अङ्गारे हैं और उससे जो सुख होता है वह विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| योषा वाव गौतमाग्निः । तस्या उपस्थ एव समित्, तेन हि सा पुत्राद्युत्पादनाय समिध्यते । यदुपमन्त्रयते स धूमः, स्त्रीसंभवादुपमन्त्रणस्य । योनिरर्चिर्लोहितत्वात् । यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अग्निसंबन्धात् । अभिनन्दाः सुखलवा विस्फुलिङ्गाः क्षुद्रत्वात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, क्योंकि उससे वह पुत्रादि उत्पन्न करनेके लिये समिद्ध होती है। पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, क्योंकि उपमन्त्रणकी प्रवृत्ति स्त्रीसे ही होती है। लोहितवर्ण होनेके कारण योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अग्निके सम्बन्धके कारण अङ्गारे हैं और अभिनन्द—सुखके कणमात्र क्षुद्र होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
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४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं, उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति, तस्या आहुतेर्गर्भः संभवतीति; एवं श्रद्धासोमवर्षान्नरेतोहवनपर्यायक्रमेणाप एव गर्भीभूतास्ताः। तत्रापामाहुतिसमवायित्वात्प्राधान्यविवक्षाः आपः पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवचसो भवन्तीति। न त्वाप एव केवलाः सोमादिकार्यमारभन्ते, न चापोऽत्रिवृत्कृताः सन्तीति। त्रिवृत्कृतत्वेऽपि विशेषसंज्ञालाभो दृष्टः पृथिवीयमिमा आपोऽयमग्निरित्यन्यतमबाहुल्यनिमित्तः। | उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है—इस प्रकार श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न और रेतःरूप आहुतियोंके हवनके पर्यायक्रमसे वह जल ही गर्भरूपमें परिणत होता है। उनमें आहुतियोंसे सम्बद्ध होनेके कारण श्रुतिको जलकी ही प्रधानता बतलानी अभीष्ट है, इसीसे उसने कहा है कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है। केवल जल ही सोमादि कार्य आरम्भ कर देते हों—यह बात नहीं है, और न जल अत्रिवृत्कृत (पृथिवी, जल और तेज इन तीनोंके सम्मिश्रणसे रहित) हों—ऐसी ही बात है। त्रिवृत्कृत होनेपर भी एक-एक भूतकी बहुलताके कारण उनमेंसे प्रत्येकको 'यह पृथिवी है, यह जल है, यह अग्नि है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम प्राप्त होता देखा जाता है। अतः जलकी |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९५
| तस्मात्समुदितान्येव भूतान्यब्वाहुल्यात्कर्मसमवायीनि सोमादिकार्यारम्भकाण्याप इत्युच्यन्ते । दृश्यते च द्रवबाहुल्यं सोमवृष्ट्यन्नरेतोदेहेषु । बहुद्रवं च शरीरं यद्यपि पार्थिवम् । तत्र पञ्चम्यामाहुतौ हुतायां रेतोरूपा आपो गर्भीभूताः ॥ २ ॥ | बहुलता होनेके कारण कर्ममें सम्मिलित हुए सभी भूत सोमादिकार्य आरम्भ करनेवाले 'जल' कहे जाते हैं । इसके सिवा सोम, वृष्टि, अन्न, वीर्य और देहमें द्रवत्वकी बहुलता भी देखी ही जाती है । शरीर यद्यपि पार्थिव होता है, तो भी उसमें द्रवकी अधिकता होती है । उनमें पाँचवीं आहुतिके हुत होनेपर वीर्यरूप जल गर्भमें परिणत हो जाता है [अर्थात् 'पुरुष' शब्दवाची हो जाता है ] ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
—: ० :—
पञ्चम आहुतिमें पुरुषत्वको प्राप्त हुए जलकी गति
इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भव-
न्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासा-
न्नन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥ १ ॥
इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' शब्दवाची हो जाते हैं। वह जरायुसे आवृत हुआ गर्भ दस या नौ महीने अथवा जवतक [पूर्णाङ्ग नहीं होता तबतक माताकी कुक्षिके] भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है ॥ १ ॥
| इति त्वेवं तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति व्याख्यात एकः प्रश्नः यत्तु द्युलोकादिमां प्रत्यावृत्तयोराहुत्योः पृथिवीं पुरुषं स्त्रियं क्रमेणाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भवतीति वाजसनेयक उक्तं तत्प्रासङ्गिकमिहोच्यते । इह च प्रथमे प्रश्ने उक्तम् 'वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ?' तस्य चायमुपक्रमः । | इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है—इस एक प्रश्नकी व्याख्या हुई। तथा वाजसनेय-श्रुतिमें जो द्युलोकसे पृथिवीकी ओर आयी हुई दो आहुतियोंके विषयमें यह कहा गया है कि वे क्रमशः पृथिवी, पुरुष और स्त्रीमें प्रवेश कर परलोकके प्रति उत्थान करनेवाली होती है, उसका भी प्रसङ्गवश यहाँ वर्णन कर दिया जाता है। यहाँ जो पहले प्रश्नमें कहा गया है कि 'क्या तुम जानते हो कि यह प्रजा [मरनेके अनन्तर] यहाँसे कहाँ जाती है?' उसका यह उपक्रम है। |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| स गर्भोऽपां पञ्चमः परिणामविशेष आहुतिकर्मसमवायिनीनां श्रद्धाशब्दवाच्यानामुल्बावृत उल्वेन जरायुणावृतो वेष्टितो दश वा नव वा मासानन्तर्मातुः कुक्षौ शयित्वा यावद्वा यावता कालेन न्यूनेनातिरिक्तेन वाथानन्तरं जायते। | आहुतिकर्मसे सम्बद्ध 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जलका पञ्चम परिणाम-विशेष वह गर्भ उल्बावृत—उल्ब अर्थात् जरायुसंज्ञक गर्भवेष्टन चर्मसे आवृत-वेष्टित हुआ दश या नौ मासतक अथवा जितने भी न्यून या अधिक समयमें पूर्णान्न हो, माताकी कुक्षिमें शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है। |
| उल्बावृत इत्यादि वैराग्यहेतोरिदमुच्यते। कष्टं हि मातुः कुक्षौ मूत्रपुरीषवातपित्तश्लेष्मादिपूर्णे तदनुलिप्तस्य गर्भस्योल्वाशुचिपटावृतस्य लोहितरेतोऽशुचिबीजस्य मातुरशितपीतरसानुप्रवेशेन विवर्धमानस्य निरुद्धशक्तिबलवीर्यतेजः प्रज्ञाचेष्टस्य शयनम्। ततो योनिद्वारेण पीड्यमानस्य कष्टतरा निःसृतिर्जन्मेति वैराग्यं ग्राहयति। मुहूर्तमप्यसह्यं दश वा नव वा | उल्बावृत इत्यादि यह सब कथन वैराग्यके लिये है। उल्बरूप अपवित्र वस्त्रसे लिपटे हुए, रज और वीर्यरूप अपवित्र बीजवाले, माताके खाये-पीये पदार्थोंके रसके प्रवेशसे बढ़नेवाले तथा जिसके शक्ति, बल, वीर्य, तेज, बुद्धि और चेष्टा—ये सब निरुद्ध (अविकसित) रहते हैं उस गर्भका माताकी मल-मूत्र-वात-पित्त एवं कफादिसे भरी हुई कुक्षिमें शयन करना कष्टमय ही है। उससे भी अधिक कष्टप्रद योनिद्वारसे पीडित हुए गर्भका बाहर निकलनारूप जन्म है; इस प्रकार श्रुति वैराग्यका ग्रहण कराती है। इसके सिवा जो एक मुहूर्त्तके लिये भी असह्य है उस मातृकुक्षिमें दश या नौ मासके |
४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| मासानतिदीर्घकालमन्तः शयि- | दीर्घकालपर्यन्त शयन करनेके अनन्तर [ जन्म लेना भी वैराग्यका ही हेतु है ] ॥ १ ॥ | | त्वेति च ॥ १ ॥ | |
— : ० : —
स जातो यावदायूषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥ २॥
इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपर्यन्त जीवित रहता है। फिर मरनेपर कर्मवश परलोकको प्रस्थित हुए उस जीवको अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और जिससे उत्पन्न हुआ था ॥२॥
| स एवं जातो यावदायूषं पुनः | इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह जबतक आयु होती है घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवागमनके लिये | | पुनर्घटीयन्त्रवद्गमनागमनाय कर्म | | | कुर्वन्कुलालचक्रवद्वा तिर्यग्भ्रम- | अथवा कुलालचक्रके समान चारों ओर चक्कर काटनेके लिये कर्म करता हुआ कर्मद्वारा जितनी आयु | | णाय यावत्कर्मणोपात्तमायुस्ताव- | प्राप्त की होती है उतना जीवित रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण | | ज्जीवति । तमेनं क्षीणायुषं प्रेतं | हो गयी है ऐसे इस प्रेत—मृत एवं | | मृतं दिष्टं कर्मणा निर्दिष्टं पर- | दिष्ट—कर्मद्वारा परलोकके प्रति नियुक्त किये हुए इस जीवको—क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो | | लोकं प्रति यदि चेज्जीवन्वौदिके | कर्म अथवा ज्ञानका अधिकारी होता अतः उस मरे हुए प्राणीको यहाँसे—इस ग्रामसे ऋत्विक् अथवा | | कर्मणि ज्ञाने वाधिकृतस्तमेनं | | | मृतमितोऽस्माद्ग्रामादग्नयेऽग्न्य- | | | र्थमृत्विजो हरन्ति पुत्रा वान्त्य- | |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
| कर्मणे । यत एवेत आगतोऽग्नेः सकाशाच्छ्रद्धाद्याहुतिक्रमेण, यतश्च पञ्चम्योऽग्निभ्यः संभूत उत्पन्नो भवति, तस्मा एवाग्नये हरन्ति स्वामेव योनिमग्निमापादयन्तीत्यर्थः ॥ २ ॥ | पुत्रगण अन्त्येष्टि कर्मके लिये अग्निके प्रति ले जाते हैं, जिस अग्निसे कि श्रद्धा आदि आहुतियोंके क्रमसे वह यहाँ आया था तथा जिन पाँच अग्नियोंसे वह उत्पन्न होता है, उस अग्निके प्रति ही वे इसे ले जाते हैं। तात्पर्य यह है कि उसे अपनी योनिभूत अग्निको ही प्राप्त करा देते हैं ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥