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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

व्यासजीद्वारा भगवान् गणेशजीकी स्तुति [क्रीडाखण्ड अ० १५०]

क्री०ख०-अ०१२५ ] * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-पाँच * ५७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 व्यासजीद्वारा भगवान् गणेशजीकी स्तुति [क्रीडाखण्ड अ० १५०] सिद्धि-बुद्धिके साथ मयूरेश (गणेशजी)-का विवाह [क्रीडाखण्ड अ० १२५]

५७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सुशोभित उन मयूरेशको आद्य ओंकारके रूपमें देखा ॥ ३२॥ | ही उसका वरण करो। तब सिद्धि-बुद्धिने सभी देवताओंको तदनन्तर ज्ञान प्राप्त हुए उन देवताओंने अपने भ्रम | छोड़कर मयूरेशके गलेमें माला पहना दी और वे दोनों तथा अभिमानका परित्यागकर 'जय' शब्दके द्वारा उन | बड़ी प्रसन्न हो गयीं। यह देखकर सभी देवता खिन्न सर्वान्तर्यामी प्रभुका पूजन किया ॥ ३३ ॥ | मनवाले हो गये और वे दीर्घ श्वास छोड़ने लगे। देवताओंके द्वारा मयूरेशका पूजन कर लेनेके अनन्तर | घुटनोंतक लम्बी उन मालाओंसे मयूरेशकी बड़ी शोभा दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणिने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ | हुई। तदनन्तर ब्रह्माजीने यथोचित विधि-विधानके अनुसार उन गुणेश्वर मयूरेशका पूजन किया। उन्होंने पंचामृत तथा | उन दोनों सिद्धि-बुद्धिका विवाह मयूरेशके साथ कर शुद्धजलसे उन मयूरेशको स्नान कराकर दिव्य वस्त्रों तथा | दिया ॥ ४१-४४ ॥ आभूषणोंसे उन्हें अलंकृत किया। तदनन्तर पुष्प, धूप, | तदुपरान्त उस सभाके मध्यमें स्थित होकर ब्रह्माजी दीप, विविध नैवेद्य निवेदित किये। इसके पश्चात् फल, | बोले- मेरे हृदयमें जो था, उसे मैंने आज प्राप्त कर लिया ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ उन्हें समर्पित कीं | है। ऐसा कहकर यथोचित रीतिसे ब्रह्माजीने उन दोनों और फिर नीराजन करनेके अनन्तर मन्त्रपुष्पांजलि और | कन्याओंको देवेश्वर मयूरेशको सौंप दिया ॥ ४५ ॥ प्रणाम निवेदित करके उनका स्तवन किया। इसी प्रकारसे | ब्रह्माजीने यह भी कहा कि आजतक मैंने इन दोनों राजा चक्रपाणिने बड़ी ही भक्ति-श्रद्धाके साथ सभी | कन्याओंका बड़े ही यत्नपूर्वक पालन-पोषण किया है, देवताओंकी भी पूजा की ॥ ३४-३६ ॥ | इस समय अब मैं इन दोनोंको तुम्हें समर्पित कर रहा हूँ, इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिने उन देवताओंसे | तुम बड़े ही यत्नसे इनकी रक्षा करना ॥ ४६ ॥ कहा- आज मैं आप लोगोंका पूजन करनेसे धन्य हो | इसके पश्चात् इन्द्र आदि देवताओंने मयूरेशसे गया हूँ, क्योंकि इस प्रकारसे सभी देवताओंका एक | निवेदन करते हुए कहा- हे देवेश ! आपकी कृपासे हम स्थानपर उपस्थित होना कहीं भी नहीं देखा गया है। | सभी देवता दैत्य सिन्धुके कारागारसे मुक्त हुए हैं। तदनन्तर वहाँपर विद्यमान अत्यन्त प्रसन्न हुए देवर्षि | आपकी ही कृपासे उस दैत्यराज सिन्धुने मोक्ष भी प्राप्त नारदजीने चतुर्मुख ब्रह्माजीसे कहा- ॥ ३७ १/२ ॥ | किया है, इस समय अब हम गौतम आदि मुनियोंके साथ हे कमलयोनि ब्रह्माजी ! आपकी आज्ञासे सिद्धि | अपने-अपने स्थानको जायँगे। आप हमें जानेकी अनुमति तथा बुद्धिके विवाहके सम्बन्धमें भगवान् शिव तथा | प्रदान करें ॥ ४७-४८ ॥ देवी पार्वतीको सभी बातें बताकर यह मैंने पहले ही | ब्रह्माजी बोले- तब देव मयूरेशने जानेकी इच्छा निश्चय कर लिया था कि सभी प्रकारके शुभ लक्षणोंसे | रखनेवाले उन देवों तथा मुनियोंको प्रसन्नतापूर्वक जानेकी सम्पन्न इन दोनों कन्याओंको आप मयूरेशको ही | आज्ञा प्रदान की। इसके पश्चात् शिवके समीपमें स्थित प्रदान करेंगे ॥ ३८-३९ ॥ | माता पार्वती ने अपनी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दोनों तदनन्तर आसक्तिवश वे सभी देवता देव ब्रह्माजीसे | पुत्रवधुओंको तथा मयूरेशको बड़े ही आदरके साथ आदरपूर्वक यह माँग करने लगे कि 'ये कन्याएँ | अपनी गोदमें बैठाकर बड़े ही हर्षका अनुभव किया। मुझे प्रदान कीजिये।' तब ब्रह्माजीने उन दोनों- | उन्होंने [ब्राह्मणोंको] वस्त्र तथा आभूषण आदि अनेक सिद्धि एवं बुद्धिके हाथोंमें माला देकर इस प्रकार | दानोंको प्रदान किया ॥ ४९-५० ॥ कहा - ॥ ४० १/२ ॥ | जो मनुष्य भगवान् गणेशके द्वारा प्राप्त की गयी ब्रह्माजी बोले- हे देवियो ! यहाँ उपस्थित तैंतीस | सिन्धुदैत्यपर विजय तथा भगवान् गणेशके शुभ-विवाहके करोड़ देवताओंमें से कोई एक, जो तुम्हारे हृदयको भाता | इस आख्यानका श्रवण करता है, वह व्यक्ति अपने सभी हो, उसके गलेमें माला पहनाकर तुम दोनों मेरे समक्ष | अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशके विवाहका वर्णन' नामक एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२५ ॥

एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०१२६ ] * विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान * ५७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान, मयूरेशपुरीका वर्णन, भाद्रपदमासके गणेशव्रतकी विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेशका द्वापरयुगमें सिन्दूरवधके लिये पुनः अवतरित होनेका आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजीका एक सुन्दर प्रासादको निर्मितकर उसमें गजाननप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, मयूरेशचरित्रश्रवणकी महिमा ब्रह्माजी बोले—सिद्धि तथा बुद्धिके साथ विवाह | सुननेमात्रसे तत्काल ही चक्रपाणिकी आँखोंमें आँसू आ गये। सम्पन्न हो जानेके अनन्तर देव मयूरेशने अपने वाहन | सभी नगरनिवासी उन मयूरेशको प्रणाम करके शोकाकुल मोरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपनी नगरीके लिये | होते हुए उच्चस्वरमें यह बात कहने लगे। आप जहाँ जा प्रस्थान किया॥ १॥ | रहे हैं, हम सभीको भी वहीं ले चलें। आपका हम लोगोंको उसी समय सभी देवता भी अपने-अपने वाहनोंपर | इस प्रकार यहाँ छोड़ना ठीक नहीं है ॥ ९-१० ॥ विराजमान होकर उन मयूरेशके आगे-आगे चलने लगे | यदि आप पहले यहाँ न आये होते, तो हम लोगोंको और मुनिगण उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ २॥ | दुःख नहीं होता। ऐसा कहकर उन मयूरेशको प्रणाम चक्रपाणिके साथ नगरके सभी निवासी, स्त्रियाँ | करके और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी चले गये ॥ ११ ॥ तथा बालक बड़े ही आनन्दके साथ सहसा बाहर | राजा चक्रपाणिने भी उन्हें प्रणामकर अपने नगरको निकलकर उनके पीछे चलने लगे। उस समय सभी | प्रस्थान किया। उन मयूरेशके बहुतसे अद्भुत गुणोंका प्रकारके वाद्य बज रहे थे, अप्सराओंके समूह-के-समूह | वर्णन करते हुए वे सभी नगरनिवासी क्षणभरमें ही अपनी नृत्य कर रहे थे। उन सभीसे घिरे हुए मयूरेश जैसे ही | नगरीमें पहुँच गये और चक्रपाणिसे आज्ञा प्राप्तकर युद्धभूमिमें पहुँचे, त्यों-ही स्कन्द आदि वीर उन विभु | अपने-अपने घरोंको चले गये। चक्रपाणि भी अपने घर मयूरेशसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे ॥ ३–४१/२ ॥ | चले गये ॥ १२-१३ ॥ वीर बोले—युद्धभूमिमें जिन सेनानियोंको दैत्योंकी | राजा चक्रपाणिने अपने नगरमें सूर्य, गणेश, विष्णु, सेनाने मार डाला था, वे सभी आपके दृष्टिपातरूप | शिव तथा दुर्गा—इन पंचदेवोंके लिये पाँच मन्दिर अमृतसे सिंचित होकर उठ खड़े हुए हैं। मयूरेशके द्वारा | बनवाये और उनमें एक-एक मूर्तिकी स्थापनापूर्वक उनको जीवित किया गया देखकर सभी देवता तथा | प्रतिष्ठा करवायी ॥ १४ ॥ नगरनिवासीजन अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये और 'साधु- | राजा चक्रपाणि भक्तिभावपूर्वक उन पंचदेवोंकी साधु' इस प्रकारसे कहने लगे ॥ ५–६१/२ ॥ | नित्य पूजा किया करते थे। इधर मयूरेश भी क्षणभरमें योजनमात्र मार्ग तय करनेपर देवेश्वर मयूरेश मार्गमें | अपनी मयूरेशपुरीमें पहुँच गये ॥ १५ ॥ ठहर गये और चक्रपाणिके सिरपर अपना मंगलमय हाथ | उस नगरीको देखकर सभी गण बड़े ही आश्चर्यमें रखकर तथा शत्रुपक्षके वीरोंको भय पहुँचानेवाले अपने | पड़ गये। उस पुरीके स्तम्भ रत्नोंसे बने हुए थे और दसों हाथोंसे राजाका आलिंगनकर उनसे बोले ॥ ७-८॥ | उसकी दीवारें सोनेसे निर्मित थीं ॥ १६ ॥ देव बोले—मेरे कथनानुसार तुम शीघ्र ही सभी | उन रत्नमय तथा स्वर्णिम दीवारोंमें अपना प्रतिबिम्ब नागरिकोंके साथ अपने गण्डकीपुरकी ओर प्रस्थान | अकेला नहीं दिखता था, अपितु असंख्य जनोंसे समन्वित करो ॥ ८१/२ ॥ | दिखता था। उस रमणीय सभामण्डपमें ब्रह्मा आदि ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके इस प्रकारके वचन | देवोंको बैठाकर मयूरेशने सभाके मध्यमें प्रवेश किया

५८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- और सभी ओर दृष्टि दौड़ायी। उन्होंने उस सभाके पूर्वभागमें रतिके साथ कामदेवको तथा मार्जारी नामवाली लोकमें प्रसिद्ध देवीको देखा, जो सुख प्रदान करनेवाली हैं। सभाकी दक्षिण दिशामें उन्होंने भगवान् शिव और पार्वतीको देखा ॥ १७-१९॥ उनके आगे देवी विरजाको देखा, जो भक्तोंकी सकल कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हैं। पश्चिम दिशामें धरणीदेवीसे समन्वित भगवान् वाराहको और सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाली आश्रया नामवाली मंगलकारिणी देवीको देखा ॥ २० १/२ ॥ उत्तर दिशामें श्रीहरिका और प्रसिद्ध मुक्तादेवीका दर्शन किया, वे देवी सब प्रकारकी मुक्तिको प्रदान करनेवाली हैं। तैंतीस करोड़ देवता भी उन मयूरेशका दर्शन करनेकी इच्छासे वहाँ आकर स्थित हो गये ॥ २१-२२ ॥ [इसी प्रसंगमें ब्रह्माजी भाद्रपद चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करते हुए कहते हैं—हे व्यासजी !] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको स्नान करनेके अनन्तर सर्वप्रथम गजाननकी पूजा करे, तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर वहाँ मार्जारी देवीका पूजन करे ॥ २३ ॥ पूजनके अनन्तर ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान प्रदान करे और गजाननका स्मरण तथा ध्यान करके मौन व्रतसे रहे। इस प्रकारसे धीरे-धीरे चले कि चलते समय पैरोंसे होनेवाली आवाज न सुनायी दे ॥ २४ ॥ कृमि, कीट तथा पतंग आदिकी हिंसा न करे, प्रयत्नपूर्वक पवित्रता एवं संयमसे रहे। तदनन्तर पुनः स्नान करके देवाधिदेव गजाननकी (सायंकालीन) पूजा करे। इसी प्रकार दूसरे दिन तथा तीसरे दिन भी पहले दिनकी भाँति क्रमशः पूजन आदि करे, दूसरे दिन दक्षिणद्वारपर देवी विरजाकी पूजा मार्जारीदेवीके समान ही करे ॥ २५-२६ ॥ तीसरे दिन पश्चिमद्वारपर आश्रया नामवाली देवीको नमस्कार करके पूर्ववत् उनका पूजन करे, चतुर्थी तिथिको व्यक्तिको चाहिये कि वह उत्तरद्वारपर पूर्वोक्त विधिके अनुसार देवी मुक्ताका पूजन करे और फिर मयूरेशका पूजन करे। महोत्सव मनाये तथा रात्रिमें जागरण करे ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकारसे जो उपवासपूर्वक चारों द्वारोंमें स्थित देवियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह भगवान् मयूरेशके कृपाप्रसादसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यदि समर्थ हो तो चतुर्थी तिथिको ही चारों द्वारोंपर पूर्वकी भाँति मार्जारी आदि देवियों और मयूरेशका पूजन करे। इन देवियोंके पूजनके आदि और अन्तमें जो स्नान करके देवेश्वर मयूरेशका दर्शन करता है, तो उसका फल देव गजानन प्रसन्न होकर तुरन्त ही प्रदान करते हैं ॥ २९-३० १/२ ॥ अतः भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे प्रारम्भ करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए चतुर्थी तिथिके दिन उषाकालमें स्नान करके तथा विधिपूर्वक सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर विधि-विधानसे मयूरेश्वरका पूजन करे ॥ ३१-३२ ॥ पूजनके अनन्तर इक्कीस बार प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। तदनन्तर शीघ्रतासे पूर्वद्वारमें जाकर मार्जारीको नमस्कार करे। फिर दक्षिणदिशामें विरजा, पश्चिमद्वारमें आश्रया, उत्तरद्वारमें जाकर श्रेष्ठ मुक्तादेवीको प्रणाम करे। इसके पश्चात् किंचित् दिन शेष रहनेपर मयूरेश्वरकी पूजाका आरम्भ करे। पूजक व्यक्ति अत्यन्त ध्यानपूर्वक सोलह उपचारोंद्वारा मयूरेश्वरका पूजन करे और रात्रिमें गीत तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ जागरण करे ॥ ३३-३५ ॥ प्रातःकाल होनेपर निर्मल जलमें स्नान करनेके अनन्तर पुनः देवेश्वर मयूरेशका पूजन करे। तदनन्तर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी व्रतकी पारणा करे ॥ ३६ ॥ उन ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, धान्य तथा गो आदि प्रदान करे। इस प्रकारसे जो व्यक्ति व्रत करता है, वह जो कुछ असाध्य है, उसे भी सिद्ध कर लेता है। वह पुत्र-पौत्रोंकी सम्पदासे सम्पन्न होता है और विविध सुखोंका उपभोग करनेके अनन्तर अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त करता है। वहाँ इन्द्र, यम, कुबेर आदि लोकपाल उस मनुष्यकी पूजा करते हैं ॥ ३७-३८॥ आठों प्रकारकी नायिकाएँ उस व्रती व्यक्तिके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं। अन्धेको दृष्टि प्राप्त हो

क्री०ख०-अ०१२६]
* विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान *
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जाती है, मूक व्यक्ति अवश्य ही वाणी प्राप्त कर लेता है। जो भार्याकी अभिलाषा करता है, वह भार्या प्राप्त कर लेता है और जो विद्यार्थी है, वह उत्तम बुद्धिको प्राप्त कर लेता है। चारों द्वारोंमें उपवास करनेपर भी यही फल कहा गया है॥ ३९-४०१/२॥ [इस प्रकार चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करके ब्रह्माजी पुनः पूर्ववर्ती प्रसंगका वर्णन करते हैं—] तदनन्तर किसी दिनकी बात है, देवेश्वर मयूरेश विष्णु, ब्रह्मा तथा शिव आदि सभी देवताओंसे अत्यन्त स्निग्ध वाणीमें कहने लगे ॥ ४११/२ ॥ मयूरेश बोले— हे देवो ! जिस कार्यको सम्पन्न करनेके लिये मैं अवतरित हुआ था, वह कार्य मैंने पूर्ण कर लिया है। मैंने बहुत-से दैत्योंका वध किया और पृथ्वीके भारको हलका कर दिया। दैत्य सिन्धुके कारागृहसे सभी देवताओंको मुक्त किया है॥ ४२-४३॥ अब स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार आदि अर्थात् देवपूजन, यज्ञ तथा पितृकर्म-श्राद्धादि पहलेकी भाँति होने लगेंगे। हे देवो ! आप सबसे आज्ञा लेकर अब मैं अपने धामको जाना चाहता हूँ॥ ४४॥ मयूरेशके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी देवता शोकमें पड़ गये। आँसू बहाते हुए तथा एक- दूसरेका मुख देखते हुए वे कहने लगे॥ ४५॥ हे मयूरेश ! हम लोगोंको छोड़ करके आप कहाँ जाना चाहते हैं? आप स्नेहका परित्यागकर इस प्रकारसे अत्यन्त निष्ठुर कैसे हो गये हैं? तदनन्तर देवी पार्वती भी यह सब सुनकर एकाएक शोकसे व्याकुल हो उठीं। मूर्च्छित होकर वे भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके बाद चेतना लौटनेपर वे कहने लगीं—॥ ४६-४७॥ हे दीनानाथ ! हे दयासागर ! हे जगन्नाथ ! हे सिन्धुदैत्यका विमर्दन करनेवाले ! मुझ अपनी माताका परित्यागकर तुम कहाँ जाओगे ? हे सुरेश्वर ! आपके चले जानेपर मेरे प्राण भी नहीं रहेंगे ॥ ४८१/२ ॥ देव बोले— हे शुभे ! द्वापरयुग आनेपर मैं पुनः आपकी पुत्रताको प्राप्त होऊँगा। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा। आप कुछ भी चिन्ता न करें। आपके वियोगसे


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मुझे भी अतुलनीय दुःख हो रहा है॥ ४९-५०॥ हे माता ! सुहृज्जनोंका एक स्थानपर रहना सर्वदाके लिये सम्भव नहीं होता है। आगे अत्यन्त भयंकर सिन्दूर नामक एक दैत्य उत्पन्न होगा। वह सभी देवताओंके लिये अवध्य होगा, तब मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न होऊँगा। हे शिवप्रिये ! मैं स्मरणमात्र करनेसे ही आपके समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा॥ ५१-५२॥ तदनन्तर कार्तिकेय बोले—आप जहाँ जा रहे हैं, मुझे भी वहाँ ले चलें। बालक, असहाय तथा दीनकी उपेक्षा करना ठीक नहीं है॥ ५३॥ देव बोले— हे बन्धु ! आप चिन्ता न करें, मैं यहाँ पुनः आऊँगा। मुझ अन्तर्यामीका आपसे कभी भी वियोग नहीं होगा। तदनन्तर मयूरेश्वरने अपने भाई कार्तिकेयको अपना वाहन मयूर प्रदान किया और उसी समय उनका मयूरध्वज यह नाम रखा ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर बन्धु गुणेश्वरकी आज्ञासे कार्तिकेय उस मयूरके ऊपर [जैसे ही] आरूढ़ हुए, उसी क्षण वे देव मयूरेश्वर अन्तर्धान हो गये ॥ ५६ ॥ उन मयूरेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशने सर्वदा ही उन्हें अपने हृदयदेशमें प्रतिष्ठित देखा। तदनन्तर ब्रह्माजीने एक अत्यन्त मनोहर प्रासाद बनवाया और बालुकासे गजाननकी मूर्ति बनाकर उस मन्दिरमें विधिवत् स्थापित की। सभी लोगोंने विविध उपचारोंके द्वारा यथाविधि उन गजाननका पूजन किया। वसिष्ठ आदि मुनिगणोंने ब्रह्मकमण्डलु नामक नदीमें स्नान किया और सन्ध्यावन्दनादि सम्पूर्ण कर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर वे गजाननकी उस अत्यन्त सुन्दर मूर्तिके समीप गये॥ ५७–५९॥ कुछ मुनियोंने व्रत करके गजाननके धामको प्राप्त करनेके लिये मन्दिरके चारों ओर चार द्वार बनाये। कुछ स्नान करनेके अनन्तर उन गजाननको प्रणाम करके दौड़ते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे॥ ६० ॥ उस समय सभी देवता तथा मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर परस्पर कहने लगे कि इस प्रकारका पुण्यक्षेत्र अन्य कहीं देखा नहीं गया है, जहाँ कि साक्षात् देव

५८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गजानन स्थित हों। ये मयूरेश विघ्नोंका निवारण करनेवाले | प्राप्ति होती है और यह आख्यान मनुष्योंके सभी हैं और भक्तोंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। | प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६४-६५ ॥ इस प्रकार कहकर तथा उन गजाननका पूजन करके वे | इस मयूरेश-चरितका श्रवण पुत्र देनेवाला, धन सभी मुनिगण अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले | प्रदान करनेवाला, विद्या प्रदान करनेवाला तथा समस्त गये ॥ ६१-६२ ॥ | दुःखोंका निवारण करनेवाला है। यह शारीरिक तथा तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने-अपने स्थानोंपर | मानसिक सभी बाधाओंको दूर करनेवाला और कुष्ठ चले गये। भगवान् शंकर अपने परिवारके साथ आनन्दित | आदि दुष्ट रोगोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६६ ॥ होते हुए कैलासको चले गये। तब स्वधा, स्वाहा और | यह मयूरेशका आख्यान पढ़ने तथा सुननेवाले वषट्कार होने लगा, जिससे इन्द्र आदि देवता बड़े प्रसन्न | पुरुषोंके लिये अत्यन्त मंगलकारी है और भुक्ति तथा हो गये ॥ ६३ १/२ ॥ | मुक्ति प्रदान करनेवाला है। यह मनुष्योंको विजयश्रीका ब्रह्माजी बोले- हे मुनि व्यासजी! त्रेतायुगमें | अधिष्ठान है। क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों-सभीको लक्ष्मी मयूरेश्वरने जो कुछ भी किया था, वह सम्पूर्ण चरित्र | प्रदान करनेवाला और पुष्टिको बढ़ानेवाला है ॥ ६७ १/२ ॥ आपको बता दिया है। देव मयूरेशके चरितका श्रवण | [ब्रह्माजी बोले-] हे मुनि व्यासजी! जो-जो सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। मयूरेशकी कथाके | आपने पूछा, वह सब मैंने बता दिया। अब आप मेरे सुननेसे कृतार्थता प्राप्त होती है, यश तथा आयुष्यकी | मुखसे पुनः गजाननके चरित्रका श्रवण करेंगे ॥ ६८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वारमहिमाका वर्णन' नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२६ ॥

एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानोंकी परीक्षाके लिये सिन्दूरका ब्रह्माजीको ही लक्ष्य बनाना और ब्रह्माजीका भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना

व्यासजी बोले- हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे देवेश ! | प्राप्त करते हैं। हे मुने! मैं विनायकचरितकी उस कथाको आपने गुणेशके शुभ चरितका विस्तारसे वर्णन किया। फिर | आपसे कहूँगा, जो चरित देव विनायकने द्वापरयुगमें किया भी हे देव ! उसके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हुई है। मनुष्य | था, उसे आप इस समय सुनें ॥ ४-५ १/२ ॥ अमृतके पानसे तो तृप्त हो सकता है, किंतु कथाके श्रवणसे | जिस प्रकारसे वे देव गजानन रक्तवर्णवाले, चार तृप्त नहीं हो सकता। मैंने त्रेतायुगमें हुए गुणेशके अवतारकी | भुजाओंवाले, गजके मुखवाले एवं मूषकके वाहनवाले सम्पूर्ण कथा सुन ली है ॥ १-२ ॥ | हुए, वह सब मैं आपसे कहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥ तदनन्तर द्वापरयुगमें गजानन नामसे उन्होंने कहाँ | किसी समयकी बात है, भगवान् शंकर संयोगवश अवतार लिया और हे महाप्रभु ! मूषक उनका वाहन | ब्रह्मलोकमें पहुँचे। तब उन्होंने शयन कर रहे ब्रह्माजीको किस प्रकार हुआ ? हे कमलासन ब्रह्माजी ! आप मेरे इस | जगाया। उस समय वे क्रुद्ध होकर उठे और उन्होंने दीर्घ संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ३ १/२ ॥ | जँभाई ली ॥ ७-८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे वत्स ! हे मुने ! मेरे मनमें जो | उस जँभाईसे एक महाभयानक पुरुष उत्पन्न हुआ। बात थी, उसे पूछकर आपने बहुत अच्छा किया है, | उत्पन्न होते ही उस पुरुषने सभीको भयभीत कर क्योंकि श्रोता, वक्ता तथा पूछनेवाला - ये तीनों ही सिद्धिको | देनेवाला तीव्र ध्वनियुक्त शब्द किया, उस ध्वनिसे समुद्र,

क्री०ख०-अ०१२७ ] * गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति * ५८३

द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। दिशाओंके रक्षक, सभी दिक्पाल आश्चर्यचकित हो उठे। क्षुब्ध होकर शेषनाग विष उगलने लगे ॥ ९-१० ॥ सभी पर्वत चूर-चूर होकर गिर पड़े और समस्त प्राणी व्याकुल हो उठे। तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंके लिये कल्पान्तमें होनेवाले प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। वह अपने मस्तकसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको विदीर्ण करता हुआ-सा खड़ा हो गया। उसके शरीरसे निकलनेवाली सुन्दर गन्ध तीनों लोकोंमें फैल गयी ॥ ११-१२ ॥ उस पुरुषके जपाकुसुमके समान कान्तियुक्त देहकी प्रभासे सभी दिशाएँ अरुणिम वर्णकी हो उठीं। क्या ब्रह्माजीद्वारा यह कोई दूसरा कामदेव उत्पन्न हो गया है, यह विचारकर कामदेव उस पुरुषके सौन्दर्यको देखकर तत्क्षण ही लज्जित हो उठा। अपने सामने स्थित उस पुरुषको देखकर कमलयोनि ब्रह्मा विस्मित हो गये और उससे बोले—तुम किसके पुत्र हो? कहाँसे उत्पन्न हुए हो? तुम्हारी क्या करनेकी इच्छा है? वह सब मुझे बताओ ॥ १३-१४१/२ ॥ पुरुष बोला—हे सुरेश्वर! आप अनेकों ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाले होनेपर भी तथा सब कुछ जाननेवाले होनेपर भी भ्रममें पड़े हुएकी भाँति मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? आपकी जँभाईसे ही उत्पन्न मुझे आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं? ॥ १५-१६ ॥ आप अपने पुत्र मुझपर कृपा करें और अपनी बुद्धिके अनुसार मेरा नाम रखें। हे नाथ! मुझे रहनेके लिये स्थान प्रदान करें, साथ ही मेरा भोजन क्या होगा तथा मुझे कौन-सा कार्य करना है, यह सब मुझे बतायें। उस पुरुषके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर चतुरानन ब्रह्माजी बोले—चूँकि तुम्हारा शरीर रक्तवर्णका है, इसलिये तुम 'सिन्दूर' नामसे प्रसिद्ध होओगे ॥ १७-१८ ॥ तुम्हारी सामर्थ्य महान् होगी और तुम तीनों लोकोंको वशमें करनेमें सक्षम होओगे। तुम क्रोधके आवेशमें जिसका भी आलिंगन करोगे, वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त हो जायगा ॥ १९ ॥ तुम्हें पाँच भूतों—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे भी कभी कोई भय नहीं होगा। देवता, दानवों, यक्षों तथा मनुष्योंसे तुम्हें भय नहीं होगा। इन्द्र आदि लोकपालों तथा साक्षात् कालसे भी कोई तुम्हें भय नहीं होगा। नागों, राक्षसोंसे भी कोई भय नहीं होगा, तुम्हें न तो दिनमें भय रहेगा और न रात्रिमें कोई भय रहेगा ॥ २०-२१ ॥ हे सिन्दूर ! तुम्हें न तो सजीव प्राणियोंसे भय होगा और न निर्जीव प्राणियोंसे। तीनों लोकोंमें जहाँ भी तुम्हारा रहनेको मन करे, वहाँ रहो ॥ २२ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीके मुखसे उत्पन्न वह सिन्दूर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया। तब वह अपनी आवाजके द्वारा चराचरसहित तीनों लोकोंको कँपाते हुए दहाड़ा ॥ २३ ॥ उस तीव्र ध्वनिसे समुद्र क्षुब्ध हो उठे, सभी लोकपाल भाग उठे। तदनन्तर उस सिन्दूरने पितामह ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा ॥ २४ ॥ सिन्दूर बोला—हे अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी ब्रह्माजी ! आपके वचनरूपी अमृतसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हो गया हूँ। आप ही सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा इस विश्वकी रचना करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें उसका लय भी कर देते हैं ॥ २५ ॥ आपके सो जानेपर यह समस्त संसार भी सो जाता है और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त हो जाता है। हे विभो ! मेरा यह महान् अहोभाग्य है कि बिना तपस्या किये, बिना दानोंको दिये और बिना व्रत, उपवास किये आप मुझपर पुत्रका स्नेह प्रकट करके प्रसन्न हैं, अन्यथा आप प्रसन्न नहीं होते। हे प्रभो ! करोड़ों कल्पोंतक तपस्याके परिणामस्वरूप ही आप प्रसन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर उन्हें प्रणामकर और उनकी प्रदक्षिणा करके वह सिन्दूर अपने मनको अनुकूल लगनेवाले स्थानकी ओर चल पड़ा। मार्गमें वह यह तर्क-वितर्क करने लगा कि न तो मैंने कोई तपस्या की है, न ध्यान किया है, न किसी मन्त्रका जप किया है और न ही शास्त्रोंका स्वाध्याय किया है, तो फिर क्यों उन ब्रह्माजीने मुझे इतने वर प्रदान किये हैं, क्या उनके दिये वरदान सत्य हैं अथवा मिथ्या हैं? वहाँ पिता ब्रह्माके पास जाकर ही इन वरदानोंकी परीक्षा

५८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * : [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करूँगा। ऐसा कहकर वह सिन्दूर पितामह ब्रह्माजीके | जायगी, वे गजानन 'सिन्दूरप्रिय' हो जायँगे और वे देव पास गया। उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर भयंकर | गजानन 'सिन्दूरवधकर्ता' के नामसे प्रसिद्ध हो जायँगे। गर्जना की ॥ २८-३०॥ | ऐसा कहकर भयभीत हो कमलयोनि वे ब्रह्माजी वहाँसे उसने ब्रह्माजीका आलिंगन करना चाहा, तब | शीघ्र ही चल पड़े ॥ ३४-३५ ॥ पितामह ब्रह्माजी उससे बोले, मैंने तुम्हें पुत्रस्नेहके कारण | वे ब्रह्मा मनकी गति तथा वायुके वेगके समान ही वर प्रदान किये हैं, जो अन्यके लिये दुर्लभ हैं; किंतु | वहाँसे पलायित हुए थे, अतः तीव्रतावश श्वास लेने तथा दुर्भावनावश तुम मेरा ही अपकार करनेके लिये यहाँ | छोड़नेके कारण वे हाँफने लगे। शाप सुनकर क्रुद्ध हुआ आये हो, निश्चित ही सर्पको दिया गया दूध विष ही | वह दैत्य सिन्दूर भी उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा ॥ ३६ ॥ हो जाता है। तुम दुष्ट भावनासे ग्रस्त हुए हो, अतः | दौड़नेके कारण पसीनेसे भीगे शरीरवाला वह दुष्ट जाओ, तुम दैत्य हो जाओगे। परमात्मा गजानन शीघ्र ही | दैत्य सिन्दूर जहाँ-जहाँ वे ब्रह्माजी जाते थे, उनको देखते अवतार लेकर तुम्हारा वध कर डालेंगे ॥ ३१-३३॥ | हुए वह उनके पीछे-पीछे जाने लगा। अगला चरण तुम्हारे शरीरमें सुगन्ध है, यह जानकर देव गजानन | रखते ही मैं इन्हें पकड़ लूँगा यह कहते हुए वह दैत्य अपने अंगोंमें उस सुगन्धित सिन्दूरका लेप भी करेंगे। | पीछे दौड़ने लगा। काँपते हुए ब्रह्माजी शीघ्रतासे वैकुण्ठमें इसीसे उन गजाननकी देह भी अरुणम वर्णकी हो | जा पहुँचे ॥ ३७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्दूरकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२७॥ एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना, उसी समय सिन्दूरका वहाँ आना, भगवान् विष्णुके कहनेपर सिन्दूरका भगवान् शिवसे युद्ध करने कैलासपर जाना, शिवको ध्यानस्थ देखकर सिन्दूरका पार्वतीका हरण करना, मयूरेशका द्विजरूपसे उपस्थित होकर सिन्दूरको समझाना, सिन्दूरका वापस लौट जाना, मयूरेशद्वारा माता पार्वतीको अपने गजानन-अवतारका स्मरण दिलाना ब्रह्माजी बोले- ब्रह्माजीने वैकुण्ठलोकमें जाकर | उनकी सेवा-पूजा करके भगवान् विष्णुने उनसे देखा कि भगवान् नारायण निर्विकार भावसे रत्नों तथा | पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य आपके समक्ष आ सुवर्णसे सुशोभित कमलके आसनपर विराजमान हैं ॥ १ ॥ | उपस्थित हुआ है, आपका मुख क्यों मुरझाया हुआ है, भगवान् विष्णुने भी अपने सामने म्लान मुखवाले | आप क्यों लम्बी-लम्बी साँस ले रहे हैं और प्रभाहीन ब्रह्माजी और उनके पीछे आकाशसे स्पर्धा करनेवाले | क्यों दिखायी दे रहे हैं? हे पितामह ! आपकी ऐसी मस्तकसे युक्त महादैत्य सिन्दूरको आता हुआ देखा ॥ २ ॥ | स्थिति देखकर मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ४१/२ ॥ यह देखकर दयालु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु | भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सहसा शीघ्र ही उठ पड़े और उन्होंने ब्रह्माजीका हाथ | कमलयोनि ब्रह्माजी बोले ॥ ५ ॥ पकड़कर एवं उनका आलिंगनकर उन्हें अपने आसनपर | ब्रह्माजी बोले- मैं अपने भवनमें प्रगाढ़ निद्रामें बैठाया ॥ ३ ॥ | सोया हुआ था, उसी समय भगवान् शिवने मुझे जगाया,

क्री०ख०-अ०१२८ ] * ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना * ५८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तब जँभाई लेनेपर मेरे मुखसे एक विशाल पुरुष प्रकट हुआ। उसका मस्तक इतना ऊँचा था कि उस ऊँचे मस्तकके टकरानेसे आकाशसे ग्रह-नक्षत्र नीचे भूमिपर गिरने लगे। उसके शरीरसे निकलनेवाली सुगन्धित वायुसे सभी देवता विस्मित हो उठे ॥ ६-७ ॥ वह इतना सुन्दर था कि उसके लावण्यको देखनेमात्रसे कामदेव लज्जित हो गये। उसके चिल्लानेके शब्दसे तीनों लोक कम्पित हो उठे। हे देव ! वह पुरुष मुझे नमस्कार करके विनीत भावसे मेरे सामने खड़ा हो गया। हे माधव ! तब मैंने उसे अपना पुत्र समझकर पुत्रस्नेहके कारण अनेक वर प्रदान किये ॥ ८-९ ॥ मैंने वर देते हुए उससे कहा कि तुम जिस-जिसका आलिंगन करोगे, वह निश्चित ही मृत्युको प्राप्त हो जायगा, साक्षात् काल भी युद्धमें तुम्हारे सामने खड़ा होनेमें समर्थ नहीं हो सकेगा ॥ १० ॥ हे देव ! तदनन्तर मैंने उसे रहनेके लिये उसकी इच्छाके अनुरूप ही स्थान दिया। तब वह मुझे नमस्कार करके कुछ ही दूर गया था कि कुछ सोच-विचारकर पुनः वापस आया। फिर वह मुझे आलिंगन करनेके लिये मेरे समीप आया। उसके भयसे मैं भाग उठा। मैं अपने हंसपर आरूढ़ हुआ और वेगसे उड़ता हुआ आपके पास आ पहुँचा हूँ ॥ ११-१२ ॥ उसे अपने पीछे-पीछे आता देख-देखकर मेरा शरीर काँपने लगा और मैं हाँफने लगा। हे सर्वसुरेश्वर ! आपके बिना मैं और दूसरे किसकी शरणमें जाऊँ ? तब उन शरणमें आये हुए ब्रह्माजीसे भगवान् महाविष्णु कहने लगे ॥ १३१/२ ॥ श्रीविष्णु बोले— हे देव ! आपने पहले तो जानबूझकर उसे वर प्रदान किये और अब संकट आ गया है तो चिन्ता करनेसे क्या लाभ ! जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— वह तो तीनों लोकोंको पीड़ित करनेके लिये उद्यत हो गया है ॥ १५ ॥ जब इस प्रकारसे ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु चिन्तासे व्याकुल हो रहे थे कि उसी समय उन दोनोंको

[दायाँ स्तम्भ] अपने सामने वह महादैत्य खड़ा दिखायी दिया ॥ १६ ॥ वह अत्यन्त जोरसे गरजा और अपनी तीव्र गर्जनासे उसने तीनों लोकोंको निनादित कर डाला। उस दुष्ट दैत्यने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्माको भी कम्पित कर डाला। तब ब्रह्माजी तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले भगवान् विष्णुसे 'रक्षा करो', 'रक्षा करो' इस प्रकारसे कहने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने अत्यन्त मधुर वाणीमें उससे कहा ॥ १७-१८ ॥ श्रीहरि बोले— ब्रह्माजीके द्वारा वर प्राप्तकर उन्मत्त हुए तुम्हारे साथ मैं युद्ध करनेका साहस नहीं करता। मैं तो सत्त्वगुणका आश्रय लेकर जीवोंके पालनमें ही सदा लगा रहता हूँ। ये ब्रह्माजी ब्राह्मण हैं, अतः इनके साथ भी तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें भगवान् शिव ही समर्थ हैं, उन्होंने कामदेवको भी भस्म कर डाला है। तुम उन्हीं शिवके साथ युद्ध करो, इससे तुम्हारी महान् कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी ॥ १९-२० ॥ ब्रह्माजी बोले— भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्य सिन्दूर प्रसन्न हो उठा। तदनन्तर वह सहसा तीनों लोकोंको कँपाता हुआ, पर्वतोंको गिराता हुआ और वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तत्क्षण ही उड़कर चल पड़ा ॥ २१-२२१/२ ॥ उसके भयसे दिशाओंके सभी हाथी इधर-उधर दिशाओं-विदिशाओंमें चले गये। इस प्रकारसे जाता हुआ वह दैत्य सिन्दूर महान् पर्वत कैलासकी तलहटीमें जा पहुँचा। उस दुष्टने वहाँ पर्वतकी चोटीपर ध्यानमें निमग्न भगवान् शिवको देखा। नन्दी तथा भृंगी आदि गण उनके चारों ओर स्थित थे और माता पार्वती उन प्रभुकी सेवा कर रही थीं ॥ २३-२४ ॥ भगवान् शिवने व्याघ्रचर्म धारण किया हुआ था, उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र विभूषणके रूपमें शोभित था। उन्होंने भस्मका अंगराग लगाया था, जिससे उनकी शोभा और भी अधिक हो रही थी, उन्होंने गजचर्मको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण किया था ॥ २५ ॥ भगवान् शंकरको देखकर वह दैत्य सहसा उनकी

५८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

निन्दा करने लगा। उसने कहा—इस तपस्वीके साथ मैं क्या युद्ध करूँ। मैं इसकी सुन्दर भार्याको लेकर यथारुचि यथास्थानको चला जाता हूँ। ऐसा मनमें निश्चयकर वह गौरी पार्वतीके समीपमें आया ॥ २६-२७॥ उस समय गिरिजा उसी प्रकार कम्पित हो उठीं, जैसे कल्पान्त प्रलयमें संसार काँप उठता है। उन्होंने अपने नेत्रोंको बन्द कर लिया। भयसे विह्वल होकर वे क्षणभरमें ही मूर्च्छित हो गयीं ॥ २८ ॥ कुत्सित विचारवाले दैत्य सिन्दूरने पार्वतीके केशपाशको पकड़ा और वह उड़कर वेगसे चल पड़ा। तब पार्वती अत्यन्त शोक करने लगीं। वह दैत्य उन्हें उसी प्रकार ले जा रहा था, जैसे कि दशानन रावणके द्वारा जगज्जननी सीताका हरण हुआ था ॥ २९१/२॥ गिरिजा बोलीं—हे देव! आप तो सम्पूर्ण अर्थोंके ज्ञाता हैं, फिर मेरे प्रति आप क्यों ऐसी उदासीनता दिखा रहे हैं? आपके अंकमें बैठी आपकी अर्धांगिनीका हरण हो चुका है, फिर भी आप ध्यानमें कैसे मग्न हैं? मैंने आपकी अल्प भी सेवा नहीं की है, इसी कारण आप ऐसी निष्ठुरता दिखा रहे हैं ॥ ३०-३१॥ इस समय कौन ऐसा मित्र है, जो मुझे इस दैत्यके चंगुलसे छुड़ायेगा, कौन मेरा प्राणरक्षक होगा और कौन ऐसा बलशाली होगा, जो पुनः मुझे शंकरका दर्शन करायेगा ? ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन देवी पार्वतीको शोकसे व्यथित देखकर गण उनसे कहने लगे। इस समय तीनों लोकोंका विनाश करनेवाले इस सिन्दूरके साथ युद्ध करनेकी हमारी शक्ति नहीं है ॥ ३३ ॥ भगवान् शिव ध्यानमें निमग्न हैं, दैववश इस दैत्यको अनुकूल अवसर प्राप्त हो गया है। फलतः यह दैत्य सृष्टि, स्थिति तथा अन्त करनेवाली हमारी माता पार्वतीको हर ले गया है। ये देवी सभी देवताओंको मोहित करनेवाली हैं, सभीके सब प्रकारके दुःखोंका हरण करनेवाली हैं, सौन्दर्यकी लहरी हैं और सब प्रकारसे शुभ करनेवाली तथा सभी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ हैं, इन्हें यह दैत्य हर ले गया है ॥ ३४-३५॥

श्रेष्ठ रत्नरूपा उन देवी पार्वतीको वह दैत्य कैसे ले गया और कैसे वे पुनः वापस आयेंगी? इस समय जबकि अपने नेत्रकी अग्निसे सभीका विनाश करनेवाले भगवान् शंकर ध्यानमें स्थित हैं ॥ ३६ ॥ गणोंके द्वारा इस प्रकारसे शोक करनेपर, हाहाकार करके रोनेपर भगवान् महेश्वर क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने शीघ्र ध्यान भंग किया ॥ ३७ ॥ वे अपनी क्रोधाग्निसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा दसों दिशाओंको जलाने लगे। तब उन्होंने उन गणोंसे पूछा कि कौन-सा संकट आ उपस्थित हुआ है? ॥ ३८ ॥ जिसने तुम्हें कष्ट पहुँचाया है, उसे मैं भस्म कर डालूँगा। भगवान् शंकरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उस समय वे गण बोले— ॥ ३९॥ हे देव! आप जब ध्यानमें स्थित थे, उसी समय एक महान् दैत्य यहाँ आ उपस्थित हुआ, वह मन्दराचल- पर्वतके समान आकृतिवाला था और साक्षात् कालके समान ही उसका स्वरूप था ॥ ४० ॥ उसकी श्वासरूपी वायुके प्रवाहसे अचल होनेपर भी पर्वत चलित हो गये। हे शंकर! उसको देखनेमात्रसे ही देवता सम्मोहित हो गये। तब उस महाबलीने गिरिजा पार्वतीके बाल पकड़कर उन्हें उठा लिया और वह शीघ्र ही आकाशमार्गसे हमारी माताको हर ले गया ॥ ४१-४२॥ उसके द्वारा ले जायी जाती हुई माता पार्वती 'दौड़ो-जल्दी दौड़ो' इस प्रकारसे कह रही थीं, फिर वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं और हम सभी भी मूर्च्छित हो गये ॥ ४३ ॥ वैसी स्थितिवाली शिवाको वह दुष्ट मनोवृत्तिवाला दैत्य लेकर चला गया। उन गणोंके वचनोंको सुनकर भगवान् शिव अत्यन्त क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४४ ॥ वे लोकोंको भस्म करते हुए-से अपने वाहन वृषपर आरूढ़ हो गये और उन्होंने अपनी दसों भुजाओंमें त्रिशूल आदि आयुधोंको धारण कर लिया ॥ ४५ ॥ वे दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए आकाशमार्गसे होते हुए तत्क्षण ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ वह सिन्दूर नामक दैत्य स्थित था ॥ ४६ ॥

क्री०ख०-अ०१२८ ] * ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना * ५८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

भगवान् शिवने उसकी पीठपर प्रहार किया, तब वह दैत्य उनके सामने खड़ा हो गया। भगवान् शिवने उससे कहा—अरे महादुष्ट ! तुम मेरी भार्याको छोड़ दो। प्रसन्न होकर तुम कहाँ जा रहे हो ? ॥ ४७ ॥ शिवद्वारा इस प्रकारसे कहा गया वह दैत्य क्रोधके वशीभूत हो गया और तीनों लोकोंको जलाता हुआ-सा और बाहुओंसे प्रहार करता हुआ-सा वह शिवके समीप आ पहुँचा ॥ ४८ ॥ अभिमानके मदसे मोहित वह महादैत्य बोला— समस्त लोकोंका स्वामी मैं तुम-जैसे मच्छरके वाक्योंसे भयभीत होनेवाला नहीं हूँ। जिसकी श्वासवायुके निकलनेसे सुमेरुपर्वत भी तत्क्षण काँप उठता है, इस प्रकारकी शक्ति-सामर्थ्यवाले मेरे सामने तुम्हारी क्या गणना ! तुम मुझे अपना मुख मत दिखलाओ ॥ ४९-५० ॥ यदि तुममें मेरे साथ युद्ध करनेकी सामर्थ्य है, तभी युद्ध करो, यदि ऐसा नहीं तो तुम किसी दूसरी स्त्रीके साथ विवाह कर लो, ऐसा करनेसे तुम सुख प्राप्त करोगे ॥ ५१ ॥ अरे तुच्छ ! मच्छरके समान तुम मेरे साथ क्या युद्ध करोगे ? ऐसा कहकर वह दैत्य सिन्दूर बाहुयुद्ध करनेके लिये भगवान् शंकरके समीप आया ॥ ५२ ॥ उस समय देवी पार्वतीने अपने मनमें मयूरेशका स्मरण किया। तब उन दोनों भगवान् शंकर तथा दैत्य सिन्दूरके मध्य तत्क्षण ही देवेश्वर मयूरेश प्रकट हो गये। वे ब्राह्मणका रूप बनाये हुए थे, उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान थी, उनके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे और वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत थे ॥ ५३-५४ ॥ उन मयूरेशने अपना अस्त्र परशु उन दोनोंके बीचमें करके दैत्यराज सिन्दूरको रोका और फिर वे द्विजश्रेष्ठ अत्यन्त मधुरवाणीमें उस सिन्दूरसे कहने लगे ॥ ५५ ॥ तुम तीनों लोकोंकी माता इन पार्वतीको शीघ्र ही मेरे समीपमें रख दो और फिर शंकरके साथ तबतक युद्ध करो, जबतक कि किसी एककी जय-पराजय नहीं हो जाती, इस युद्धमें जो जीतेगा, वही इन पार्वतीको प्राप्त करेगा। मेरा वचन झूठा नहीं होगा ॥ ५६१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले—द्विजरूपधारी मयूरेशकी बात सुनकर सिन्दूर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गया और युद्धकी विशेष लालसा रखनेवाले उस दैत्य सिन्दूरने पार्वतीको उनके पास रख दिया। उन द्विजरूपधारी मयूरेश तथा पार्वतीके देखते-देखते वे दोनों—शिव और सिन्दूर युद्ध करने लगे ॥ ५७-५८ ॥ सिन्दूर और शिव—दोनों ही युद्धकी विविध कलाओंमें पारंगत थे, उस समय क्रोधसे उन दोनोंके नेत्र रक्तवर्णके हो गये थे। उन दोनोंका तेज और पराक्रम बराबरका था। उस दैत्य सिन्दूरने ज्योंही अपने बाहुपाशमें शंकरको आबद्ध करना चाहा, उसी समय मयूरेशके परशु नामक अस्त्रने अदृश्य होकर उस दैत्यकी छातीमें बलपूर्वक प्रहार किया ॥ ५९-६० ॥ उस प्रहारसे दैत्य सिन्दूरकी शक्ति जाती रही, तदुपरान्त भगवान् शिवने त्रिशूलसे उसपर आघात किया। तब शक्तिहीन हुए उस सिन्दूरसे द्विजश्रेष्ठ मयूरेशने उसके लिये हितकर बात करते हुए कहा— ॥ ६१ ॥ तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवके साथ तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, अतः पार्वतीकी प्राप्तिकी आशा छोड़कर तुम शीघ्र ही अपने घरको चले जाओ। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो ये शिव तुम्हें इस समय भस्म कर डालेंगे। द्विज मयूरेशके द्वारा इस प्रकार कहा गया वह दैत्य सिन्दूर पार्वतीकी अभिलाषा छोड़कर पृथ्वीलोकको चल पड़ा ॥ ६२-६३ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवको विजयकी प्राप्ति होनेपर वे पार्वती उन द्विजरूपधारी मयूरेशसे बोलीं—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप कौन हैं, जिनके द्वारा मैं उस दुष्टसे मुक्त करायी गयी हूँ ? आप मुझे अपना यथार्थ स्वरूप दिखायें, यह मुनिका वेश आपका स्वाभाविक वेश नहीं है। आप मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, आपने मुझे जीवन प्रदान किया है, अतः आप मेरे सखारूप हैं। हे द्विजश्रेष्ठ ! प्राणोंका दान करनेपर भी आपके उपकारको चुकाया नहीं जा सकता ॥ ६४-६५१/२ ॥ पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मुनीश्वर मयूरेश उनसे बोले—हे माता ! मैंने यहाँ कुछ भी नहीं

५८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- किया है, भगवान् महेश्वरने ही दैत्यपर विजय प्राप्त की है और आपको दैत्यके बन्धनसे भी भगवान् शिवने ही छुड़ाया है। ऐसा कह करके वे विनायक द्विजस्वरूपको छोड़कर अपने पूर्वरूपमें हो गये ॥ ६६-६७१/२॥ उनका शरीर दस भुजाओंसे सुशोभित होकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उनके कान कुण्डलोंसे मण्डित थे। उनके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक लगा हुआ था। वे रत्नों तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे। नाना प्रकारके अलंकारोंसे वे मनोहर लग रहे थे। उन्होंने कण्ठमें शेषनागको धारण कर रखा था, जिसकी मणिकी प्रभासे वे सुशोभित हो रहे थे ॥ ६८-६९ ॥ तब इस प्रकारके स्वरूपवाले परमात्माको देखकर पार्वतीजी अत्यन्त प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया तो उन मयूरेशने उन्हें उठाकर उनसे कहा- ॥ ७० ॥ विनायक बोले- त्रेतायुगमें मैंने आपसे कहा था कि मैं आपको पुनः दर्शन दूँगा और द्वापरयुगमें आपके घरमें गजानन नामसे अवतार धारण करूँगा तथा अपने ओजसे दैत्य सिन्दूरका वध करूँगा ॥ ७११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-मुनिका रूप धारण किये हुए वे देव मयूरेश इस प्रकार देवी पार्वतीसे कहकर अन्तर्धान हो गये। तब वे देवी पार्वती सोचमें पड़ गयीं और अंत्यन्त मूर्च्छित हो गयीं। तब भगवान् विश्वनाथ उनसे बोले- हे प्रिये ! अपने मनको स्वस्थ करो ॥ ७२-७३ ॥ तुम अपने हृदयमें उन अविकारी विनायकका दर्शन करो, उनका कहा हुआ मिथ्या नहीं होता है, उन्होंने जैसा कहा है, वे वैसा ही करेंगे ॥ ७४ ॥ इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव देवी पार्वतीके साथ वृषपर आरूढ़ हुए और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ पर्वतराज कैलासपर चले आये ॥ ७५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'पार्वतीकी बन्धनसे मुक्तिका वर्णन' नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२८ ॥ एक सौ उनतीसवाँ अध्याय सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा विनायककी स्तुति, दुःखप्रशमनस्तोत्र और उसका माहात्म्य, विनायकद्वारा सिन्दूरके वधका आश्वासन दिया जाना, माता पार्वतीके गर्भमें तेजःपुंजका प्रकट होना, उस तेजसे सन्तप्त पार्वतीका भगवान् शिव तथा गणोंके साथ पर्यली नामक वनमें जाना और वहाँ सखियोंके साथ निवास करना ब्रह्माजी बोले- सिन्दूर नामक वह दैत्य कैलाससे मृत्युलोकमें आया और बड़े ही गर्वसे उसने गर्जना की। उस भीषण ध्वनिसे सभी पर्वत कम्पित हो उठे और वृक्ष भूमिपर गिर पड़े ॥ १ ॥ पक्षी, सिंह और अन्य हिंसक जीव-जन्तु वनमें भ्रमण करने लगे। तदनन्तर उस महादैत्य सिन्दूरने सभी राजाओं और सभी वीरोंको जीत लिया ॥ २ ॥ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसके द्वारा जीत लिये गये थे, भला उसके साथ सामान्य राजागण कैसे युद्ध करते ! कुछ राजाओंको काटकर उसने दो टुकड़ोंमें विभक्त कर दिया और कुछ आकाशमें चक्कर काटने लगे ॥ ३ ॥ कुछ राजा जो उसके सामने युद्ध कर रहे थे, वे वीरगति प्राप्तकर स्वर्ग चले गये। कुछ राजा उसकी शरणमें आ गये और उन्होंने उसकी सेवा करना स्वीकार कर लिया ॥ ४ ॥ कुछ राजा अपने अधिकारसे वंचित हो गये तो उन्होंने उसका सेवक होना स्वीकार नहीं किया और वे अभिमानपूर्वक वन चले गये। इस प्रकार सभी राजाओंको जीत लेनेके पश्चात् उस दैत्य सिन्दूरने मुनियोंपर आक्रमण करनेका विचार किया। उस दुष्ट बुद्धिवाले दैत्य सिन्दूरने एकाएक मुनियोंको बन्धनमें डाल दिया। उस समय कुछ मुनिजन अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये ॥ ५-६ ॥ कुछ मुनिगण मेरुकी कन्दरामें चिन्तारहित होकर रहने लगे। कुछ मुनियोंको उसने मार डाला और Kalyana Visheshank 2021_Section_20_1_Back

प्रतिमाओंको खण्डित कर दिया। इस प्रकार प्रलयके

क्री०ख०-अ०१२९ ] * सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओंद्वारा विनायककी स्तुति * ५८९ किन्हीं-किन्हींको अत्यन्त प्रताड़ित किया ॥ ७ ॥ उसने सभी मन्दिरोंको ध्वस्त कर डाला और देव- प्रतिमाओंको खण्डित कर दिया। इस प्रकार प्रलयके समान स्थिति हो जानेपर सभी यज्ञ-यागादि वैदिक क्रियाएँ लुप्त हो गयीं ॥ ८ ॥ स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार अर्थात् देवपूजन, हवन, यज्ञयागादि, श्राद्ध-तर्पण आदिके लुप्त हो जानेसे सर्वत्र हाहाकार मच गया। तदनन्तर पर्वतोंकी गुफाओंमें जो देवता छिपे हुए थे; उन्होंने, मुनियोंने, यक्षोंने तथा किन्नरोंने इस संकटसे उबरनेके लिये देवगुरु बृहस्पतिका आमन्त्रण किया। देवगुरु बृहस्पतिने वहाँ उपस्थित सभी देवताओंसे कहा कि इस समय जो-जो भी देवता हैं, उन सभीसे उस दैत्यको किंचित् भी भय नहीं है, अतः आप लोग देव विनायककी प्रार्थना करें। हे विप्रो! जब वे विनायक भगवान् शिवके घरमें 'गजानन' इस नामसे अवतार लेंगे, तो वे निश्चित ही बलपूर्वक उस सिन्दूरका वध कर डालेंगे—इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ९–१२ ॥ हे देवो! तब सम्पूर्ण जगत् सभी प्रकारकी बाधाओंसे रहित हो जायगा। आचार्य बृहस्पतिद्वारा इस प्रकारसे कहे गये वे देवता, मुनिगण आदि सभी परम श्रद्धा- भक्तिपूर्वक उन विनायककी स्तुति करने लगे ॥ १३ १/२ ॥ देव बोले—जो इस जगत्के कारण हैं, सूर्य तथा नक्षत्रोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, जिनसे सिद्ध, साध्यगण, समुद्र, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मनुष्य, नाग तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण चराचर जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है और जिनसे मनुगण, लोकपाल, सरिताएँ, वृक्षराशि, इक्कीस प्रकारके स्वर्ग (आदि दिव्य) लोक, पंचमहाभूत तथा सात पाताल उत्पन्न हुए हैं, हम उन्हें प्रणाम करते हैं। जिनसे ब्रह्मा आदि देवता, मुनिगण तथा महर्षिजन उत्पन्न हुए हैं, उन देव विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४–१७१/२ ॥ जिनसे सत्त्व, रज तथा तम—इन तीन गुणोंकी उत्पत्ति हुई है, उन भगवान् विनायकको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनसे नाना प्रकारके अवतार हुए हैं और जो सभी प्राणियोंके हृदयदेशमें विराजमान हैं, जिनकी स्तुति करनेमें सहस्र मुखोंवाले शेषनाग भी समर्थ नहीं हो पाते, उन गणाधिप विनायकका भजन करना चाहिये* ॥ १८-१९ ॥ विश्वका संहार करनेवाले महादैत्य सिन्दूरको ब्रह्माजीने उत्पन्न किया है। आप-जैसे स्वामीके विद्यमान होनेपर भी उस महादैत्यने जगत्को अत्यन्त प्रताड़ित कर रखा है, अब हम अन्य किस देवकी शरणमें जायँ, हम सभीकी रक्षा करनेवाला दूसरा और कौन है? [हे देव!] आप भगवान् शिवके यहाँ अवतीर्ण होकर इस दुष्टबुद्धि सिन्दूरका वध करनेकी कृपा करें ॥ २०–२११/२ ॥ इस प्रकारसे देव विनायककी स्तुति करनेके पश्चात् वे (देवता आदि) विविध अनुष्ठानोंमें तत्पर होकर तपस्या करने लगे। कुछ निराहार रहकर, कुछ नियत आहार लेकर प्राणायाममें संलग्न हो गये। कुछ एक पाँवमें खड़े होकर तथा कुछ जलमें स्थित होकर तपस्या करने लगे। कुछ लोग धुआँ पीकर तो कुछ लोग बिना पलक झपकाये ही तपोनिरत थे ॥ २२-२३ ॥ कुछ अपने हाथोंको ऊपर करके साधना करने लगे। कुछ योगपरायण हो गये। कुछने अपने शरीरके अंगोंको काट दिया, तो कुछ अपने मस्तकोंको ही काट दे रहे थे। इस प्रकारसे उन सबकी अत्यन्त कठोर तपस्या और साधना देखकर गणराज विनायक प्रकट हो गये। उनकी आभा करोड़ों सूर्योंके समान दीप्तिसम्पन्न और प्रलयाग्निके समान थी ॥ २४-२५ ॥ विनायकके उस तेजोमय स्वरूपका दर्शनकर वे सभी *देवा ऊचुः जगतः कारणं योऽसौ रविनक्षत्रसम्भवः ॥ सिद्धसाध्यगणाः सर्वे यत एव च सिन्धवः । गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मनुष्योरगराक्षसाः ॥ यतश्चराचरं विश्वं तं नमामि विनायकम् । मनवो लोकपालाश्च सरितो वृक्षसञ्चयाः ॥ एकविंशतिस्वर्गाश्च पञ्चभूतानि यानि च । पातालािन च सप्तैव तं नमाम यतोऽभवत् ॥ यतो ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च महर्षयः । यतो गुणास्त्रयो जातास्तं नमामि विनायकम् ॥ यतो नानावताराश्च यश्च सर्वहृदि स्थितः । यं स्तोतुं नैव शक्नोति शेषस्तं गणपं भजेत् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२९ । १४-१९)

५९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे। वे कहने लगे—प्रभुके | कारण समस्त दिशाओं तथा विदिशाओंको द्योतित कर स्वरूपका जैसा हमने ध्यान किया था, वे ही अखिल | रही थीं। उनके जाते समय सभी प्रकारके वाद्य बज रहे विश्वके स्वामी ये [उसी रूपमें] हमारे सामने प्रकट हो | थे। भगवान् शिव पार्वतीके साथ विविध गणोंसे समन्वित गये हैं, ये हमारे दुःखको अवश्य ही दूर करेंगे, इसमें कोई | होकर भूलोकको गये और उन्होंने बहुत-से वनोंमें भ्रमण विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २६१/२ ॥ | किया। इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने पर्यली तदनन्तर चिन्तामें पड़े हुए उन देवोंसे भगवान् विनायक | नामक एक विशाल वन देखा ॥ ३६-३७॥ बोले—हे देवो ! आप लोग बिलकुल भी चिन्ता न करें, मैं | पार्वतीके मनको सुन्दर लगनेवाले उस पर्यली नामक उस दैत्य सिन्दूरको मार डालूँगा। आपने जो मेरी स्तुति की | वनमें उन्होंने विश्राम किया। वह वन विविध प्रकारके है, वह स्तुति दुःखका शमन करनेके कारण दुःखप्रशमन- | पुष्पोंसे समन्वित तथा नाना प्रकारके फलोंसे युक्त वृक्षों- स्तोत्रके नामसे प्रसिद्ध हो जायगी ॥ २७-२८ ॥ | वाला था। वह वन अनेक सरोवरों तथा वापियोंसे युक्त इस स्तोत्रके पाठ करनेसे मेरे अनुग्रहके कारण आप | था। वहाँ वृक्षोंकी घनी छाया व्याप्त थी। वह वन अत्यन्त लोगोंका कष्ट दूर हो जायगा। जो एक समय अथवा | रमणीय था। वहाँपर उष्णता (सूर्यकी प्रतप्त किरणों) - का प्रातः-सायं—दो समय अथवा प्रातः-मध्याह्न एवं सन्ध्या— | प्रवेश नहीं हो पाता था। वह वन कैलासशिखरके समान तीनों कालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे कभी भी तीनों | शीतलता प्रदान करनेवाला था ॥ ३८-३९ ॥ प्रकारका अर्थात् आधिदैविक, आध्यात्मिक और | वह पर्यली नामक वन नन्दनवन तथा चैत्ररथ वनसे आधिभौतिक—दुःख अणुमात्र भी नहीं होगा ॥ २९१/२ ॥ | भी अधिक शोभासे सम्पन्न था। उस वनको देखकर हे देवो ! अब मैं भगवान् शिवके घरमें अवतार लेकर | गिरिजा कहने लगीं— हे शिव ! मुझे मेरी इच्छाके गजानन नामसे प्रसिद्ध होऊँगा, और सभी प्रकारके अर्थोंकी | अनुकूल वन प्राप्त हो गया है। हे विभो! हम यहाँपर सिद्धि देनेवाला बनूँगा। मैं सिन्दूर आदि बड़े-बड़े दैत्योंका | चिरकालतक क्रीड़ा करेंगे। गणोंका भी उस समय उस वध करूँगा और विविध प्रकारकी लीलाओंको दिखाते | वनसे प्रेम हो गया था ॥ ४०-४१ ॥ हुए माता पार्वतीकी सेवा करूँगा ॥ ३०-३११/२ ॥ | तदनन्तर गणोंने देवी पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये ब्रह्माजी बोले—देवताओंसे इस प्रकार कहकर | वहाँ एक मण्डपका निर्माण कर दिया। वह मण्डप देव विनायक अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कुछ काल | विविध वेदियों तथा गृहोंसे युक्त था और गृहस्थ- व्यतीत होनेके अनन्तर भगवान् शिवके अनुग्रहसे हिमवान्की | सम्बन्धी विविध सामग्रियोंसे सम्पन्न था ॥ ४२ ॥ पुत्री देवी पार्वतीने गर्भ धारण किया। वह गर्भ दिन- | भगवान् शिवने देवी पार्वतीसे कहा कि तुम गणोंके प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा | साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें जो-जो भी अभीष्ट होगा, कला-प्रतिकला बढ़ता रहता है ॥ ३२-३३ ॥ | ये वे सभी वस्तुएँ मेरे अनुग्रहसे तुम्हें प्रदान करेंगे ॥ ४३ ॥ तदनन्तर उस गर्भके तेजसे सन्तप्त हुई पार्वतीको | तब भगवान् शिव वहाँसे शीघ्र ही चल पड़े और गर्भकालीन इच्छा जाग्रत् हुई। तब वे भगवान् शंकरसे | हिमालयपर आकर ध्यानमें निमग्न हो गये। वे पार्वती बोलीं- हे शंकर ! मैं अपने गर्भके तेजसे अत्यन्त सन्तप्त | अपनी सखियोंके साथ उस पर्यली नामक वनमें यथेच्छ हो गयी हूँ, अतः जहाँ पर्याप्त ठण्डक हो, ऐसे स्थानपर | विहार करने लगीं। उन पार्वतीको चारों ओरसे घेरकर मुझे ले चलिये। तदनन्तर भगवान् शंकर वृषपर आरूढ़ | करोड़ों गण उनकी रक्षा किया करते थे। वे सभी गण हुए और उन्हें भी वृषभकी पीठपर बैठाया ॥ ३४-३५ ॥ | माता पार्वतीकी आज्ञाके अधीन थे और कन्द-मूल तथा देवी पार्वती महान् तेजके पुंजसे समन्वित होनेके | फलका भक्षण करनेवाले थे ॥ ४४-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौरीके दोहदका वर्णन' नामक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२९ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_20_2_Back

एक सौ तीसवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०१३० ] * पार्वतीजीके गर्भसे गजाननका आविर्भाव * ५९१

एक सौ तीसवाँ अध्याय पार्वतीजीके गर्भसे गजाननका आविर्भाव तथा उनके विलक्षण स्वरूपको देखकर विस्मित पार्वतीको शिवजीके द्वारा प्रबोधित किया जाना

ब्रह्माजी बोले—तदुपरान्त नौवाँ मास पूर्ण होते ही पार्वतीजीने एक बालकका प्रसव किया। उस शिशुके सुन्दर नेत्र कमलकी शोभाको जीतनेवाले थे और उसका मुख चन्द्रमाके सदृश आह्लादक था॥ १ ॥ [जन्मके समय ही उस बालकने] मुकुट तथा केयूर धारण कर रखा था, उसकी देहकान्ति करोड़ों सूर्योंके सदृश थी, प्रवाल (मूँगा या किसलय)-के सदृश [अरुण] शोभामय उसके अधर थे। बालकके चार भुजाएँ शोभित थीं, जिनमें उसने परशु, कमल, माला और मोदक धारण कर रखा था। वह [कण्ठमें] मोतियोंका हार और [हाथोंमें] सुन्दर कंकण धारण करके शोभा पा रहा था। उसके कमलकी-सी कान्तिवाले चरणतल ध्वज, अंकुश, कमल आदि चिह्नोंसे युक्त थे। उस सुन्दर शिशुके सुन्दर गुल्फ-युगल (दोनों टखने) किंकिणीजालसे सुशोभित थे। वह अत्यन्त सौन्दर्यसम्पन्न था। बालकका चन्द्रमासे युक्त ललाट कोटि-कोटि चन्द्रमण्डलोंकी-सी शोभावाला और अग्निके सदृश तेजोदीप्त था। शिशुके ऐसे [विस्मयावह] स्वरूपको देखकर [सहसा] पार्वतीजी काँपने लगीं [किन्तु अगले ही क्षण अपने पुत्रके रूपमें देवाधिदेव विनायकको आया देख] आनन्दमग्न हो गयीं ॥ २-५॥ [वात्सल्य और विस्मय—दोनों ही भावोंसे समन्वित पार्वतीजी कहने लगीं—अरे!] नेत्रोंको ढँक लेनेवाला यह कैसा महातेज उदित हुआ है? हे देव! [मुझपर] कृपा करो और बताओ कि तुम कौन हो? [हे प्रभो! मैं चाहती हूँ कि तुम शिशुरूप होकर मेरे] चित्तको आनन्दित करो। ऐसा कहकर पूर्वकालके वचनोंका स्मरण करती हुई पार्वतीजीने उनको प्रणाम किया। तब वे तेजोमूर्ति गणपति कहने लगे कि हे मातः! उद्विग्न मत होइये। मैं अनेकानेक ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाला गुणेश हूँ। मेरे असंख्य अवतार हुए हैं, जिन्हें देवगण भी नहीं जानते ॥ ६-८॥ हे शिवको आनन्दित करनेवाली! मैं ही [ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक] तीन रूपोंको धारणकर इस विश्वप्रपंचका सृजन, पालन तथा संहार करता हूँ॥ ९॥ मैंने ही पूर्वकालमें त्रेतायुगमें तुम्हारे भवनमें लीलावश अवतीर्ण होकर सिन्धु नामक असुरका संहार और नानाविध चरित्र किये थे। उस समय मेरा नाम मयूरेश था, वर्ण श्वेत था और मैंने छः भुजाएँ धारण की हुई थीं। उसी कालमें मैंने तुम्हें वचन दिया था कि द्वापरयुगमें मैं पुनः तुम्हारी सन्तान बनकर सेवा करूँगा। हे पवित्र मुसकानवाली देवि! उस समस्त वृत्तान्तका स्मरण करो कि [कैसे उस समय] ब्राह्मणके रूपमें आकर मैंने सिन्दूरासुरसे तुमको छुड़ाया था ॥ १०–१२ ॥ हे पार्वती! तब भी मैंने यह बात कही थी कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा। वह जो मेरा वचन था, उसे मैंने सत्य कर दिया है। हे मातः! मैं अब महाबली सिन्दूरासुरका संहार करके भूमिभारका हरण करूँगा तथा आपकी सेवा करूँगा। [और इसके बाद]-भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला मैं 'गजानन' इस नामसे विख्यात होऊँगा ॥ १३-१४१/२॥ ब्रह्माजी बोले-[गजाननकी] इन बातोंको सुनकर देवी गौरीको समस्त प्राचीन वृत्तान्तका स्मरण हो आया और वे उन देवेश, विश्वेश, विघ्नविनाशक भगवान् गजाननकी स्तुति करने लगीं ॥ १५१/२॥ गौरीजीने कहा—जो चिदानन्दघन, निर्विकल्प ब्रह्मस्वरूप हैं, जो निराकार होनेपर भी गुणोंके भेदसे [ब्रह्मादिरूपोंमें] साकार हो जाते हैं। जो अणुसे भी अणुतर अर्थात् अतिसूक्ष्म तथा स्थूलसे भी अधिक स्थूल एवं व्यापक हैं, उन भक्तवत्सलको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ जो अव्यक्त होकर भी [स्वेच्छावश] रजोगुण, तमोगुण तथा सत्त्वगुणका आश्रय लेकर

५९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- रूपोंमें] प्रकट होते हैं। जो मायाके अधिपतियोंकी भी [गणपतिदेव] हैं, इनके चारों युगोंमें पृथक्-पृथक् चार मायाके नियामक हैं, समस्त मायाओंको जाननेवाले एवं स्वरूप हैं। सत्ययुगमें इनकी दश भुजाएँ थीं और ये प्रभावसम्पन्न हैं। जो चारों वेदोंसे अज्ञेय हैं तथा जिन्हें 'विनायक' इस नामसे प्रसिद्ध हुए। त्रेतायुगमें इनका वर्ण मन भी समझ नहीं सकता, ऐसे आप नित्य, सर्वाधार, शुक्ल था, भुजाएँ छः थीं और मयूरराट् अर्थात् मयूरेश परात्पर सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है ॥ १८-१९ ॥ नाम हुआ ॥ २८-२९ ॥ हे विभो ! यह मेरा परम सौभाग्य है कि वे [साक्षात् हे प्रिये ! जिन्होंने अपने (हमारे) भवनमें परब्रह्मस्वरूप] आप मेरे पुत्र बनकर अवतीर्ण हुए हैं। हे [पूर्वकालमें] अवतीर्ण होकर सिन्धु दैत्यका संहार विभो ! मैं तो आपके [आगमनकी] प्रतीक्षा ही कर रही करके [विश्वका] रक्षणकार्य सम्पन्न किया था, वे ही थी। आपने आकर प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अब कभी [गणपतिदेव] आज पुनः अरुण वर्ण तथा चार भुजाओंसे आपसे मेरा वियोग न हो सके, वैसा [अनुग्रह] कीजिये। शोभित होकर हम लोगोंके भवनमें अवतीर्ण हुए हैं और जब पार्वतीजी ऐसा कह ही रही थीं, तभी गणपतिदेवने [कालान्तरमें] मूषकारूढ़ होकर सिन्दूर दैत्यका वध दूसरा रूप धारण कर लिया ॥ २०-२१ ॥ करेंगे तथा पृथ्वीके भारका हरण करेंगे ॥ ३०-३१ ॥ उस समय शुण्डादण्डसे युक्त अर्थात् हाथीके इस समय ये देवेश 'गजानन' इस नामसे त्रैलोक्यमें सदृश आकृतिवाले, चतुर्भुज, चन्द्रमासे युक्त शिरोदेशवाले, विख्यात होंगे। हे देवि ! ये ही कलियुगमें सुन्दर नेत्रों तथा नाना भूषणोंसे विभूषित, चिन्तामणि नामक दिव्य मणिसे चार भुजाओंसे समन्वित हो 'धूम्रकेतु' इस सुन्दर नामसे शोभायमान हृदयवाले, दिव्याम्बरविभूषित, दिव्य गन्धसे भूतलपर प्रसिद्ध होंगे। भगवान् शंकरके वचनोंको सुनकर अनुलिप्त देहवाले वे सिद्धि तथा बुद्धिके सहित प्रकट वे बालरूप गणपति स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥ ३२-३३ ॥ होकर भोले-भाले बालककी भाँति रुदन करने लगे। बालरूप गणपति बोले- हे शिव ! आपने मेरे जब तन्वंगी पार्वतीजीने उनके इस रूपको देखा तो वे स्वरूपको भलीभाँति जाना है, आप यथार्थ ही कह अत्यन्त शोकाकुल हो गयीं। [वे विलाप करने लगीं रहे हैं। मैं आपकी सेवा करनेके लिये और देवताओं कि] किसने मेरी निधि अर्थात् सर्वस्वरूप पुत्रका हरण तथा सभी राजाओंको मारनेवाले सिन्दूरासुरका वध कर लिया है। सूँडसे युक्त बालक तो तीनों लोकोंमें करनेके लिये आपके घरमें अवतीर्ण हुआ हूँ। हे कहीं भी नहीं देखा गया है। जब ब्रह्मा आदि [देवगण] शंकर! ब्राह्मणोंको उत्पीड़ित करनेवाले त्रिलोकविजयी तथा [दूसरे भी] लोग इस प्रकारके शिशुको देखेंगे तो उस असुरका संहार करके मैं विश्वको आह्लादित उपहास करेंगे ॥ २२-२४१/२ ॥ करूँगा ॥ ३४-३५१/२ ॥ ऐसे भाँति-भाँतिके शोकपूर्ण विलापको सुनकर भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला मैं [सिन्दूरासुरके भगवान् शंकर अपने गणोंके साथ भवनमें आ पहुँचे और कारण अवरुद्ध हुए] वैदिक यज्ञ-यागादि सत्कर्मोंका उस शिशुको गोदमें लेकर पार्वतीसे कहने लगे- हे प्रिये ! [पुनः] प्रवर्तन करूँगा और वरेण्य [नामक राजा]-को मेरी बात सुनो। शुण्डादण्डसे विभूषित [यह बालक] [मनोवांछित] वर तथा आत्मविज्ञान भी प्रदान करूँगा। आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित साक्षात् गणपतिदेव ही वह वरेण्य मेरा भक्त है और [सर्वदा] मेरा ही ध्यान हैं, जिनके स्वरूपका निरूपण करनेमें चारों वेद, शास्त्र करता रहता है। वह देवता, ब्राह्मण, अतिथि आदिका तथा विशिष्ट मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं। हे प्रिये ! पूजन करनेवाला, पंच महायज्ञोंके अनुष्ठानमें निरत, नानाविध कृत्योंवाले विश्वप्रपंचमें इन्होंने ही देवताओंको सत्यभाषी, पवित्र, सदाचारी तथा पुराणोंके श्रवणमें नियुक्त किया है ॥ २५-२७ ॥ तन्मय रहता है ॥ ३६-३८ ॥ ये सबके अन्तर्यामी, अनेकानेक ब्रह्माण्डोंके आविष्कर्ता उसकी भार्याका नाम पुष्पिका है, जो धर्मपरायण,

क्री०ख०-अ०१३१ ] * शंकरजीकी आज्ञासे नन्दीका शिशुको वरेण्यपत्नीके पास ले जाना * ५९३ पतिव्रता, पतिके वचनोंका अनुसरण करनेवाली और प्राणोंके समान पतिसे प्रीति रखनेवाली है॥ ३९॥ उन दोनोंने बारह वर्षोंतक दारुण तपस्या की थी, तब मैंने उनको वरदान दिया था कि अवश्य ही मैं तुम्हारे पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा ॥ ४० ॥ उस पुष्पिकाने आज ही प्रसव किया है और उसके शिशुका राक्षस (राक्षसी)-ने अपहरण कर लिया है। [अब वह पुत्रवियोगके कारण] प्राण त्याग देगी, इसलिये मुझको वहाँ ले चलो। भगवान् शिवने जब बालगणपतिकी ऐसी बात सुनी तो हर्षित हो उठे और उन्होंने भक्तिभावसे नानाविध वाङ्मयपुष्पों अर्थात् स्तोत्रोंके द्वारा उन बालगणेशका पूजन किया ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'गजाननके आविर्भावका वर्णन' नामक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३० ॥ एक सौ इकतीसवाँ अध्याय भगवान् शंकरकी आज्ञासे नन्दीका शिशु गजाननको वरेण्यपत्नीके पास ले जाना ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त भगवान् शिव विचार करने लगे कि इस बालकको किस प्रकार वहाँ ले जाया जाय ? उन (-के मनोभाव) - को जानकर नन्दीने शिवजीसे कहा- हे स्वामी ! आपके अनुग्रहसे मैं समुद्रोंको अवश्य ही सुखा सकता हूँ तथा पर्वतोंको भी चूर्ण कर सकता हूँ। इसलिये आपके मनमें जो कर्तव्य विद्यमान है, उसको सम्पन्न करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- नन्दीके कथनसे सन्तुष्ट हुए भगवान् शंकर उनसे कहने लगे। शिवजी बोले- हे नन्दिकेश्वर ! मेरे मनोभावको प्रकाशित करते हुए तुमने उत्तमोत्तम बात कही है। सैकड़ों बार मैंने तुम्हारे सामर्थ्यका परिचय पाया है। अब इस समय जो कर्तव्य उपस्थित हुआ है, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम उसको पूर्ण करो ॥ ३-४ ॥ महानगरी माहिष्मतीमें वरेण्य नामसे विख्यात महाबली नरेश हैं, जो विविध धर्मों (जातिधर्म-कुलधर्मादि) -के अनुष्ठानमें निरत रहते हैं। उनकी महाभागा धर्मपत्नीका नाम पुष्पिका है। उसने अभी-अभी प्रसव किया और [प्रसवश्रमके कारण] वह सोयी हुई है। [रानीको सोयी जानकर] किसी राक्षसीने उसके पाससे शिशुका अपहरण कर लिया है, इसलिये जबतक कि वह कल्याणी सोयी है, उसी बीचमें इस बालकको तुम रानीके समीप शीघ्र ही पहुँचा दो ॥ ५-७॥ ब्रह्माजी बोले- भगवान् शंकरके द्वारा दी गयी इस आज्ञाको सुनकर नन्दीने तत्काल पार्वतीपुत्रको उठाया और त्वरापूर्वक आकाशमार्गसे जाकर उस बालकको शीघ्र ही रानीके समीप पहुँचा दिया। रानी सो रही थी, इसलिये इस घटनाको वह जान न सकी। तदुपरान्त वे नन्दिकेश तत्काल ही [आकाशमें] उड़े और महेश्वरके समीप जा पहुँचे तथा मार्गमें जो कुछ उन्होंने किया था, वह सब वृत्तान्त बताने लगे ॥ ८-९ १/२ ॥ [ नन्दिकेश्वर बोले- ] हे देव ! हे विभो ! [ जब मैं जा रहा था कि] सहसा आकाशमें भयंकर रूपवाली एक राक्षसी मुझे रोककर खड़ी हो गयी। वह बालकके मांसका भक्षण कर रही थी। तब मैंने आपके अनुग्रहसे उस राक्षसीको अपनी पूँछमें लपेट लिया और [चारों ओर] उसे घुमाकर एक विशाल पर्वतशिखरपर फेंक दिया। हे प्रभो ! आपके नामका उच्चारण करके [जब मैंने उसे क्रोधपूर्वक फेंका तो] उसके सैकड़ों खण्ड हो गये ॥ १०-१२ ॥ इसके पश्चात् मैंने दुरात्मा गन्धर्वोका विशाल समूह देखा, तो सोचने लगा कि किस प्रकार इनसे युद्ध किया जाय और शिशु (गौरीपुत्र)-को बचाया जाय। हे शंकर ! तब इस प्रकार चिन्ताकुल होकर मैंने मन-ही-मन आपका स्मरण किया। तदुपरान्त अपनी पूँछ, सींग, क्रोधपूरित निःश्वास, लातोंके प्रहार और हुंकारोंसे उन सभी

भूमिपर गिर पड़े और उनके सैकड़ों खण्ड हो गये।

५९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अतिबलिष्ठ गन्धर्वोंको मैंने भगा दिया॥ १३-१४ १/२ ॥ उस समय उनमेंसे कुछ तो मर गये, कुछ भाग गये और कुछ सिर फूट जाने तथा पैर टूट जानेके कारण भूमिपर गिर पड़े और उनके सैकड़ों खण्ड हो गये। तत्पश्चात् [मेरे ऊपर आकाशसे] पुष्पोंकी वर्षा हुई। हे देव ! इसके बाद आपके द्वारा आदिष्ट कर्तव्यको पूर्ण करके मैं [यहाँ] चला आया॥ १५-१६॥ हे देव! आपकी इच्छाके विषयको अर्थात् आप जिसे चाहते हैं, उसे समस्त त्रिलोकीमें ऐसा कौन है, जो मार सके। इसलिये आपके नामका ही आश्रय लेकर बालकके साथ होनेपर भी मैंने विजय प्राप्त की॥ १७॥ तब हर्षसे भरे भगवान् शंकरने नन्दिकेश्वरका आलिंगन किया और प्रसन्न मनसे कहने लगे- नन्दिकेश्वर ! मैंने तुम्हारा दृढ़ पौरुष जान लिया है। इस त्रैलोक्यमें तुम्हारी बराबरी करनेवाला कोई भी नहीं है ॥ १८ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- इसके उपरान्त (शिवजीसे मिल लेनेके पश्चात्) वे नन्दी विश्वनाथ शिवजीको प्रणाम करके पार्वतीजीके समीप गये और हाथ जोड़कर उन्हें प्रणामकर मधुर वाणीमें कहने लगे- हे मातः ! शिवजीकी आज्ञासे मैं बालकको माहिष्मतीपुरी ले गया और वरेण्यपत्नी पुष्पिकाके समीपमें रख आया हूँ; क्योंकि उस (बालरूप गणेश) -ने उस पुष्पिकाको पूर्वमें वर प्रदान किया था कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा और ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादन करूँगा॥ १९-२१ १/२ ॥ तब उन नन्दीश्वरके वचनोंको सुनकर सब कुछ जाननेवाली पार्वतीदेवी प्रसन्न हो गयीं। वे शिशु (-रूप गणपति)-के अन्तहीन पराक्रमको जानती थीं, [अतः गणपतिदेवके प्रति] परम भक्तिभावसे युक्त हो पार्वतीजी नन्दीश्वरसे कहने लगीं- 'हे पुत्र! मैं तुम्हारे पुरुषार्थको जानती हूँ॥ २२-२३॥ तुमने भयंकर घोष करनेवाली अत्यन्त भीषण राक्षसीका संहार किया है, दुरात्मा गन्धर्वोंको नष्ट किया तथा शिशुकी रक्षा की। [इसके अतिरिक्त] बिना उस प्रसूताको ज्ञात हुए, उसके बालकको वहाँ पहुँचा भी दिया है-ये सब महान् कृत्य थे, जो तुमने सम्पन्न किये हैं।' इस प्रकारसे [प्रीतिपूर्वक] नन्दीश्वरसे कहकर पार्वतीजीने उनको विदा किया और विश्राम करने लगीं ॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'गन्धर्वपराजयवर्णन' नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३१ ॥ एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदामें फेंकना, गजाननके रक्तसे रंजित शिलाओंकी 'नार्मद गणेश' संज्ञा, उमामहेश्वरका कैलास-गमन ब्रह्माजी बोले- एक बारकी बात है, दैत्यराज सिन्दूर सभामें बैठा और अपने उन्मद अहंकारमें भरकर कहने लगा कि मेरा पराक्रम तो व्यर्थ ही है; क्योंकि जब इन्द्रादि देवगण तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र भी मुझसे युद्ध करनेमें अक्षम हैं, तब पृथ्वीपर रहनेवाले राजाओंकी तो बात ही क्या है!॥ १-२॥ जिस प्रकार पतिके बिना कुलवती महिलाका यौवन व्यर्थ होता है, वैसे ही योद्धाओंके अभावमें आज मेरा पराक्रम व्यर्थ हो गया है। तब (उसके ऐसा कहते ही) आश्चर्यमयी आकाशवाणी उसे सुनायी पड़ी ॥ ३ १/२ ॥ आकाशवाणी बोली-अरे मूढ ! किसलिये तू चपलता दिखा रहा है, तुझसे लड़नेवाला तो जन्म ले चुका है। पार्वतीके उदरसे समुद्भूत वह गर्भ (शिशु) इस समय वरेण्यके भवनमें स्थित है और अनन्त लीलाएँ करनेवाला वह शिशु वहाँपर शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ रहा है॥ ४-५॥ ब्रह्माजी बोले- एकाएक इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर सिन्दूर मूर्च्छित हो गया और [चेतना प्राप्त करके] वह शोकसे व्याकुल हो उठा और सोचने लगा कि यह क्या है तथा किसने कहा है ? ॥ ६ ॥

क्री०ख०-अ० १३२ ] * सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदामें फेंकना * ५९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]

यदि [ऐसी बात कहनेवाला] आँखोंके सामने आ जाय तो मैं उसे पूरा-का-पूरा चबा डालूँ। मैं तो स्वयं ही सबका काल हूँ, पश्चिम दिशामें हुए सूर्योदयके समान मेरी कैसे मृत्यु हो सकती है? ॥ ७॥ ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशा- विदिशाओंको [अपनी गर्जनासे] ध्वनित करता हुआ सहसा उड़ने लगा और भगवान् शंकरके निवासस्थान कैलासपर्वतकी ओर चल पड़ा ॥ ८ ॥ उस समय वह अपने शरीर (के उड़नेसे उत्पन्न हुई)-वायुसे पर्वतोंको चूर्ण करता और वृक्षोंको उखाड़ता हुआ जा रहा था। उसके कारण [भूतलके आधार देवता] कूर्म तथा शेषनाग चलायमान हो गये और पृथिवी काँपने लगी। [कैलास पहुँचकर जब] उसने वहाँ शिवको नहीं देखा तो पुन: पृथ्वीलोकमें आ गया और शिवको खोजता हुआ वेगपूर्वक समस्त भूतलपर भटकने लगा। क्रोधमें भरा हुआ [वह भटकते-भटकते] 'पर्यली' नामक विशाल जंगलमें आ पहुँचा और तब वहाँ उसने दूरसे ही पार्वतीजीके साथ स्थित भगवान् शंकरको देखा ॥ ९-११॥ उसने वहाँ आवासमण्डप, सरोवर, उनमें खिले कमल और शिवगणोंको देखा। इसके बाद वह सहसा पार्वतीजीके लिये बनाये गये सूतिकागृहकी ओर चल पड़ा। जब वहाँ उसने बालकको नहीं देखा तो जलती हुई अग्निके समान कुपित हो उठा। इसके बाद वह सोचने लगा कि आकाशवाणी असत्य नहीं हो सकती। [आकाशवाणीने कहा है कि] इसका पुत्र मुझे मारेगा, किंतु हो सकता है कि अभी वह उत्पन्न ही न हुआ हो। अतः इस समय मैं इसी (पार्वती)-को मार डालता हूँ, जिससे [शत्रुका] मूल ही नष्ट हो जायगा ॥ १२-१४॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारका मनमें सोच-विचार करके उसने [पार्वतीको] मारनेके लिये शस्त्र उठाया और जबतक कि वह उमाकी हत्या कर पाता, तबतक उस दुष्टको अपने समक्ष एक शिशु दिखायी पड़ा ॥ १५ ॥ चार भुजाओंसे युक्त वह मनोहर शिशु मुकुट तथा बाजूबन्दसे विभूषित था। उस बालकने परशु, कमल

[दायाँ स्तम्भ]

तथा मालाको धारण कर रखा था। उसके कटिदेशमें शेषनाग [लिपटे थे] और कण्ठमें हार तथा चरणोंमें नूपुर [शोभायमान] थे। यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर और पार्वतीजीको सोयी हुई जानकर वह तत्काल ही पार्वतीके वधसे विरत हो गया ॥ १६-१७॥ उसने बालकको हाथमें उठा लिया और उसे महासागरमें फेंकनेकी कामना करने लगा। इस प्रकारका निश्चित संकल्प करके वह आगे चल पड़ा। तभी वह बालक अपने आपको बढ़ाने लगा और मानो दूसरे हिमालयकी भाँति [भारवाला] हो गया। तब क्षणभरमें ही उसके अतिशय भारसे व्याकुल सिन्दूर काँप उठा ॥ १८-१९॥ उसकी साँसें बढ़ने लगीं तथा वह अपनी शक्तिसे [तनिक भी] आगे चल पानेमें सक्षम नहीं रहा, तब व्याकुल होकर दैत्यने उस बालकको छोड़ दिया ॥ २० ॥ जब तीव्र रव करता हुआ वह बालक भूतलपर गिरा तो पर्वत हिलने लगे और उस घोषके कारण पृथिवी काँप उठी। नाना प्रकारसे चीत्कार करते हुए पक्षीगण आकाशमें घूमने लगे, सातों महासागर क्षुब्ध हो गये तथा ब्रह्माण्ड भी मानो विदीर्ण-सा होने लगा ॥ २१-२२॥ वह बालक मुनिजनोंके समीप, नर्मदाके जलमें जा गिरा, तब वहाँ एक श्रेष्ठ तीर्थ प्रकट हुआ, जिसे गणेशकुण्ड कहा जाता है ॥ २३ ॥ इस तीर्थका स्मरण करते ही जीवनभरमें किया गया पाप क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है तथा इसका दर्शन करनेसे दस जन्मोंका और स्नान करनेसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट होता है। अनुष्ठानपरायण होकर अर्थात् क्षेत्रसंन्यास लेकर इस तीर्थका जो लोग सेवन करते हैं, यह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है॥ २४ १/२॥ [उस तीर्थमें गिरे हुए] बालक गणपतिके देहसे जो रुधिर निकला, उसके कारण वहाँकी शिलाएँ रक्तवर्ण हो गयीं और वे ही पापनाशक शिलाएँ 'नार्मद गणेश' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे शिलाएँ दर्शन-पूजन आदिके द्वारा आराधित होनेपर भक्तोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करती हैं। इन नार्मद गणपतिशिलाओंकी समग्र महिमाका वर्णन हो पाना सम्भव नहीं है ॥ २५-२६ १/२ ॥

५९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तब अर्थात् उन गौरीनन्दनको फेंक देनेके पश्चात् | करेगा। इस प्रकारसे कहनेके उपरान्त वह भयानक पुरुष वह दैत्य हर्षित हो उठा कि मेरा शत्रु तो विनष्ट हो गया | अन्तर्धान हो गया ॥ ३१-३३ ॥ है। तभी उस कुण्डसे विशाल और भयानक एक पुरुष | तब अत्यन्त क्रोधके कारण उस दैत्यने सेवकोंसे प्रकट हुआ, जो अपनी जटाओंसे आच्छादित होनेके | कहा कि [अरे!] उसे पकड़ लो, पकड़ लो, जिसने ऐसे कारण ऐसा जान पड़ता था कि मानो लताओंसे आवृत | कठोर वाक्य कहे हैं ॥ ३४ ॥ कोई वटवृक्ष हो ॥ २७-२८ ॥ | [इसके उपरान्त] जब वह दैत्य उस पुरुषको कहीं दाढ़ोंके कारण उसका मुख अत्यन्त भयानक प्रतीत | भी न देख सका तो अपने स्थानपर लौट आया और मनमें हो रहा था और नागिनके जैसी उसकी जिह्वा थी। उसके | सोचने लगा कि जब उसे देखूँगा, तब जीत लूँगा। उस हाथ-पैर बड़े ही लम्बे थे तथा [वेगपूर्वक] श्वास | (बालक)-का यह जो इतना चरित्र था, उसे पार्वतीजी लेनेके कारण उस पुरुषके नेत्र चलायमान थे ॥ २९ ॥ | जान नहीं सकीं; क्योंकि उसकी मोहकारिणी मायाके वैसे आकार-प्रकारवाले पुरुषको देखकर क्रोधसे | कारण वे अत्यधिक मोहित हो चुकी थीं ॥ ३५-३६ ॥ विह्वल नेत्रोंवाला वह सिन्दूर दैत्य कहने लगा कि यह | तदुपरान्त पार्वतीजीने भगवान् शिवसे विनयपूर्वक मेरी किस गिनतीमें है ! ॥ ३० ॥ | कहा कि हे जगदीश्वर ! इस स्थानपर दैत्यकृत उपद्रव आरम्भ क्रोधपूर्वक ऐसा कहकर हाथमें खड्ग ले वह दैत्य | हो गये हैं, अतएव अब मैं कैलास जाना चाहती हूँ, यदि उस पुरुषको मारने चला और जबतक वह खड्ग-प्रहार | आपकी इच्छा हो तो मुझे वहीं ले चलिये ॥ ३७१/२ ॥ करता, तबतक वह पुरुष [वहाँसे अदृश्य होकर] | उनकी ऐसी बात सुनकर शंकरजीको भी प्रसन्नता आकाशमें दीख पड़ा तथा उस दैत्यसे बोला कि अरे | हुई और वे नन्दीपर तत्काल आरूढ़ होकर, सात करोड़ दैत्य ! तूने तो मुझे व्यर्थ ही भूतळपर फेंका है। रे मूढ़ ! | गणोंसे घिरे हुए, उसी क्षण पार्वतीसहित कैलास जा तुझे मारनेवाला तो कहीं और ही वृद्धिको प्राप्त कर रहा | पहुँचे। अपने भवनमें प्रविष्ट होकर पार्वतीजीको [उस है। सत्पुरुषोंकी रक्षामें तत्पर वह अवश्य ही तेरा वध | समय] अति प्रसन्नता हुई ॥ ३८-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'कैलासाभिगमनका वर्णन' नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३२ ॥ एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका भयभीत होकर वनमें परित्याग और पाराशरमुनिके द्वारा शिशु गजाननका पालन व्यासजी बोले- हे विधे! राजा वरेण्यके भवनमें | रानी पुष्पिकाने पुत्रको देखा। वह अलंकारोंसे समन्वित, [उनकी भार्या] पुष्पिकाके समीप [नन्दीके द्वारा] | चार भुजाओंसे युक्त तथा हाथीके जैसे मुखवाला था। पहुँचाये गये उन बालरूप गणपतिने कौन-सी लीला की, | उसका वर्ण अरुण था। कस्तूरी-तिलक और मोतियोंकी इसे मुझको सविस्तार बतलाइये ॥ १ ॥ | मालाओंसे वह शोभायमान था। उसने उत्तम अंगराग ब्रह्माजी बोले- हे वत्स! तुमने उचित प्रश्न | और पीताम्बर धारण किया था। नानाविध आभूषणोंसे किया है, जो हृदयको आनन्दित करनेवाला है। मैं वह | युक्त वह बालक तेजोमय शरीरवाला था ॥ ३-४१/२ ॥ समस्त पापनाशक वृत्तान्त विहित रीतिसे तुम्हें | वह पुष्पिका उस समय वैसे रूपवाले बालकको बतलाऊँगा ॥ २ ॥ | देखकर विस्मित तथा दुखी हो गयी और उसे भय लगने उस रात्रिके अर्थात् प्रसवकी रात्रि बीतनेके उपरान्त | लगा। तब शोकाकुल वह रानी हाथोंसे वक्षःस्थलपर