कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक २७९
अष्टम लम्बक २७९ यह सुनकर मय ने विभीषण से कहा—'हम जबरदस्ती वैर नही कर रहे हैं किन्तु इन्द्र के निरर्थक हठ को सहन कैसे करें, तुम ही बताओ ॥१४८॥ देवताओं ने जिन असुरों को मारा है, वे प्रमादी थे। बलि प्रह्लाद आदि सावधान असुर नहीं मारे गये' ॥१४९॥ मय द्वारा इस प्रकार कहा गया विभीषण सबसे मिलकर उसी समय मन्दोदरी को साथ लेकर लंका को लौट गया ॥१५०॥ तदनन्तर, सुनीथ और सूर्यप्रभ को साथ लेकर राजा बलि को देखने के लिए वह दानवराज तीसरे पाताल को गया ॥१५१॥ स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर उस लोक में उन्होंने हार और मुकुट धारण किये हुए तथा दैत्यों और दानवों से घिरे हुए राजा बलि को देखा ॥१५२॥ वे सुनीथ आदि सभी राजा बलि के चरणों पर गिरे और उसने भी उन सब का समुचित स्वागत-सम्मान किया ॥१५३॥ मय दानव द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर प्रसन्न हुए राजा बलि ने शीघ्र ही प्रह्लाद तथा अन्य दूसरे दानवों को बुलवाया ॥१५४॥ सुनीथ आदि ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और वे सभी उन विप्रन्न भोगों को देखकर आनन्द-विभोर हो गये ॥१५५॥ तब बलि ने कहा—'यह हमारा सुनीथ पृथ्वी पर चन्द्रप्रभ के रूप में जन्म लेकर अपने शरीर में आकर पुनर्जीवित होगया ॥१५६॥ सुमुण्डीक का अवतार यह सूर्यप्रभ भी आया है। शिवजी ने इसे विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है ॥१५७॥ उसके यज्ञ के प्रभाव से मेरे बन्धन ढीले हुए हैं। अतः इन दोनों के पुनः प्राप्त होने पर हम लोगों का अभ्युदय ही होनेवाला है' ॥१५८॥ बलि के वचन सुनकर उनका गुरु शुक्र बोला—'धर्म का आचरण करो। सत्य-मार्ग पर रहने से अवनति कदापि नही होती ॥१५९॥ अतः धर्म का व्यवहार करो यह मेरा वचन मानो। यह सुनकर सभी दानवों ने धर्म पे चलने का नियम बना लिया ॥१६०॥ सातों पातालो के राजा वहाँ एकत्र हुए और सुनीथ की पुनःप्राप्ति की प्रसन्नता में बलि ने महान् उत्सव मनाया १६१॥ इसी बीच फिर नारद मुनि वहाँ आ पहुँचे। पूजा सत्कार प्राप्तकर बैठने के बाद उन्होंने दानवों से कहा—॥१६२॥
सम्भूत्वा च मयोत्क्षोभम बलात् कुर्महे वयम्। हठात् कुर्वति शक्रे तु कथं ब्रूहि सहामहे ॥१४८॥ ते चासुरा हता देवैस्ते बभूवुः प्रमादिनः। अप्रमत्तास्तु किं नैव बलिप्रभृतयो हताः ॥१४९॥ इत्याद्युक्तो मयेनाथ मन्दोदर्या सहैव सः। राक्षसेश्वरमामन्त्र्य जगाम वसतिं निजाम् ॥१५०॥ सूर्यप्रभादिभिर्युक्तः सुनीथोऽथ मयेन सः। निन्ये तृतीयं पातालं बलिं राजानमीक्षितुम् ॥१५१॥ स्वर्गादप्यधिके तत्र सर्वे ते ददृशुर्बलिम्। आमुक्ताहारमुकुटं वृतं दितिजदानवैः ॥१५२॥ निपेतुः पादयोस्तस्य सुनीथाद्याः क्रमेण ते। सोऽपि तान् मानयामास सत्कारेण यथोचितम् ॥१५३॥ मयावेदितवृत्तान्तहृष्टः सोऽथ बलिस्ततः। प्रह्लादमानायितवांष्ठीघ्रमन्यांश्च दानवान् ॥१५४॥ तानप्यत्र सुनीथाद्याः पादयोस्ते ववन्दिरे। तेऽप्याप्यभिननन्दुस्तान् प्रह्लादानन्दनिर्भराः ॥१५५॥ तत्राऽथ बलिराह स्म भूत्वा चन्द्रप्रभो भुवि। सुनीथः स्वतनुप्राप्त्या प्रत्युज्जीवित एष यः ॥१५६॥ सुमुण्डीकावतारश्च प्राप्तः सूर्यप्रभोऽप्ययम्। शर्वेण चायमादिष्टो भावी विद्याधरेश्वरः ॥१५७॥ एतच्चप्रभावाच्च जातोऽहं क्षतबन्धनः। तदेताभ्यामवाप्ताभ्यां ध्रुवमभ्युदयोऽस्ति नः ॥१५८॥ एतद्वलिवचः श्रुत्वा शुक्रः प्रोवाच सद्गुरुः। धर्मेण चरतां सत्ये नास्त्यनभ्युदयः क्वचित् ॥१५९॥ तस्माद् धर्मेण वर्तध्वं कुरुताद्यापि मद्वचः। तच्छ्रुत्वा दानवास्तत्र तथेति नियमं व्यधुः ॥१६०॥ सप्त पातालपतयो ये तत्र मिलितास्तथा। बलिद्वात्रोत्सवं चक्रुः सुनीथप्राप्तिहर्षतः ॥१६१॥ अत्रान्तरे च तत्रायात् पुनर्नारदो मुनिः। गृहीतार्योपविष्टश्च दानवांस्तानुवाच सः ॥१६२॥
यह सुनकर मय ने विभीषण से कहा—'हम जबरदस्ती बैर नहीं कर रहे हैं किन्तु इन्द्र के निरर्थक हठ को सहन कैसे करें, तुम ही बताओ ।।१४८।। देवताओं ने जिन असुरों को मारा है वे प्रमादी थे। बलि प्रह्लाद आदि सावधान असुर नहीं मारे गए ।।१४९।। मय द्वारा इस प्रकार कहा गया विभीषण सबसे मिलकर उसी समय मन्दोदरी को साथ लेकर लंका को लौट गया ।।१५०।। तदनन्तर, सुनीथ और सूर्यप्रभ को साथ लेकर राजा बलि को देखने के लिए वह दानवराज तीसरे पाताल को गया ।।१५१।। स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर उस लोक में उन्होंने हार और मुकुट धारण किये हुए तथा दैत्यों और दानवों से घिरे हुए राजा बलि को देखा ।।१५२।। वे सुनीथ आदि सभी राजा बलि के चरणों पर गिरे और उसने भी उन सब का समुचित स्वागत-सम्मान किया ।।१५३।। मय दानव द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर प्रसन्न हुए राजा बलि ने शीघ्र ही प्रह्लाद तथा अन्य दूसरे दानवों को बुलवाया ।।१५४।। सुनीथ आदि ने उनके चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और वे सभी उन विनम्र लोगों को देखकर आनन्द-विभोर हो गये ।।१५५।। तब बलि ने कहा—'यह हमारा सजीव पृथ्वी पर चन्द्रप्रभ के रूप में जन्म लेकर अपने शरीर में आकर पुनर्जीवित होगया ।।१५६।। सुपुण्डीक का अवतार यह सूर्यप्रभ भी आया है। शिवजी ने इसे विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है ।।१५७।। उसके यज्ञ के प्रभाव से मेरे बन्धन ढीले हुए हैं। अतः इन दोनों के पुनः प्राप्त होने पर हम लोगों का अभ्युदय ही होनेवाला है' ।।१५८।। बलि के वचन सुनकर उनका गुरु शुक्र बोला—'धर्म का आचरण करो। सद्-मार्ग पर जाने से अवनति कदापि नहीं होती ।।१५९।। अतः धर्म का व्यवहार करो यह मेरा वचन मानो। यह सुनकर सभी दानवों ने धर्म के चलने का नियम बना लिया ।।१६०।। सातो पातालों के राजा वहाँ एकत्र हुए और सुनीथ की पुन्र्जाति की प्रसन्नता में तीन व महान् उत्सव मनाया १६१।। इसी बीच फिर नारद मुनि वहाँ आ पहुँचे। पूजा सत्कार पाकर बैठने के बाद उन्होंने दानवों से कहा—।।१६२।।
२८० कथासरित्सागर
२८० कथासरित्सागर
प्रेषितोऽस्मीहेन्द्रेण स चैव वक्ति यः किल। सुनीथजीवितप्राप्त्या सन्तोषः परमो मम ॥१६३॥ तदिदानीं न कार्यं नः पुनर्बैरमकारणम्। विरोधश्च न चैवास्मत्पक्षेण श्रुतशर्मणा ॥१६४॥ एवमुक्तेन्द्रवाक्यं तं प्रह्लादो मुनिमब्रवीत्। 'सुनीथजीवितात्तुष्टिरिन्द्रस्येति किमन्यथा ॥१६५॥ अकारणविरोधं च वयं तावन्न कुर्महे। अद्यैव नियमोऽस्माभिः कृतः सर्वेर्गुरोः पुरः ॥१६६॥ श्रुतशर्मा सपत्नत्वमाश्रित्य स बलाद्यदि। अस्मद्विरुद्धं कुरुते कस्माकं तत्र वाच्यता ॥१६७॥ सूर्यप्रभस्य पक्षेण देवदेवेन शम्भुना। प्रागेव ह्ययमादिष्टः स पूर्वाराधितोऽस्य यत् ॥१६८॥ तदस्मिन्नीश्वरादिष्टे कार्ये किं कुर्महे वयम्। तन्निष्कारणमेवेन्द्रश्चक्रे वाक्यसमञ्जसम्' ॥१६९॥ इत्युक्तो दानवेन्द्रेण प्रह्लादेन स नारदः। तथेति वासवं निन्यमदर्शनमगात् मुनिः ॥१७०॥ तस्मिन् गते दानवेन्द्रामूघनास्तानभाषत। 'वैरानुबन्धः कार्येऽस्मिंस्तावदिन्द्रस्य दृश्यते ॥१७१॥ किं त्वस्मासु प्रसाद्येकबद्धकक्ष्ये महेश्वरे। का तस्य धक्तिः किं कुर्यादास्या वा तस्य वैष्णवी' ॥१७२॥ इति मुक्तवचः श्रुत्वा दानवास्तेऽजुमम्य च। सह प्रह्लादमामन्त्र्य बलिं जग्मुर्निजाल्वमान् ॥१७३॥ ततश्चतुर्थं पातालं प्रह्लादे स्वालयं गते। उत्थाय सवसो राजा विषेशाम्यन्तरं बलिः ॥१७४॥ मयः सुभीषद्वान्ये च सर्वे सूर्यप्रभादयः। प्रणम्य बलिमाजम्मुस्तदेव स्वं निकेतनम् ॥१७५॥ यत्रोचितकृताहारपानेष्वेपु समेत्य सा। हीरावती सुनीथं च जगाद जननी निजा ॥१७६॥ पुत्र जानासि यन्मिां मार्यायै महतां सुता। तेजस्विनी धनेदास्य तुम्बुरोरङ्गलावती ॥१७७॥
अष्टम लम्बक २४१
अष्टम लम्बक २४१ 'मुझे इन्द्र ने भेजा है। उसने आप लोगों से कहा है कि सुनीथ की पुनःप्राप्ति से मुझे परम सन्तोष हुआ ॥१६४॥ इसलिए अब फिर बिना कारण बैर न करो और मेरे पक्ष के श्रुतशर्मा से भी विरोध न करो' ॥१६५॥ इस प्रकार, इन्द्र का सन्देश सुनाते हुए नारद मुनि से प्रह्लाद ने कहा—'सुनीथ के पुनर्जीवन से इन्द्र को सन्तोष हुआ यह अनुचित नहीं है। किन्तु, हम अकारण विरोध नहीं कर रहे हैं। आज ही हमने अपने गुरु के सामने प्रतिज्ञा की है ॥१६५, १६६॥ श्रुतशर्मा, यदि इन्द्र के पक्ष का आधार लेकर हमारे विरुद्ध चलता है, तो इसमें हमारा क्या दोष ? सूर्यप्रभ के पक्षपाती देवताओं के देव महादेव ने उससे विद्याधर चक्रवर्ती होने का आदेश दिया है; क्योंकि इसने बहुत पहले उनकी आराधना की थी ॥१६७-१६८॥ इस प्रकार ईश्वर के आदेश से प्राप्त इस कार्य में हम क्या करें। इसलिए, इन्द्र का ऐसा कहना अकारण और असंगत है' ॥१६९॥ दानवेन्द्र प्रह्लाद से इस प्रकार कहे गये नारद मुनि इन्द्र को कोसते हुए अन्तर्हित हो गये ॥१७०॥ उसके बाद पर शुक्राचार्य ने दानवेन्द्र प्रह्लाद से कहा—'इस काम में इन्द्र की शत्रुता स्थिर मालूम होती है किन्तु महादेव के हमारे पक्ष में दृढ़तापूर्वक स्थिर रहने पर वह क्या करेगा ? विष्णु पर उसकी आशा व्यर्थ है उससे क्या होना है ? ॥१७१, १७२॥ शुक्राचार्य की इन बातों का दानवों ने अनुमोदन किया और बलि तथा प्रह्लाद से आज्ञा लेकर वे सब अपने-अपने घर गये ॥१७३॥ इसके बाद प्रह्लाद के चौथे पाताल में अपने घर जाने पर राजा बलि भी सभा-भवन से उठकर अपने भवन को चले गये ॥१७४॥ उनके जाने पर सुनीथ सूर्यप्रभ आदि सभी राजा बलि को प्रणाम करके उसी समय अपने घर आ गये ॥१७५॥ वहाँ आकर व भोजन-पान आदि के समय उनके साथ सम्मिलित होकर उनकी माता कीर्तिमती ने उनसे कहा —॥१७६॥ 'बेटा तुम यह तो जानते ही हो कि तुम्हारी ये पत्नियाँ बड़ों की बेटियाँ हैं जिनमें तेजस्विनी पताकिन कुबेर की मन्नावती गंधर्वराज तुम्बुरु की कन्या है ॥१७७॥ ११
२८२ कथासरित्सागर
२८२ कथासरित्सागर
चन्द्रप्रभशरीरेण परिणीता च या त्वया। प्रभासस्य बतोरेतां वत्सि कीर्त्तिमतीं सुताम् ॥१७८॥ श्विस्रस्तवतया द्रष्टव्या समबुद्ध्या सुत त्वया। त्युक्त्वा मुख्यमार्यास्तास्तिस्रोऽस्मै सा समर्पयत् ॥१७९॥ ततस्तस्मिन् दिने रात्रौ सुनीथो ज्येष्ठया तया। तेजस्वत्या समं शय्यावासवेश्म विवेश सः ॥१८०॥ तत्रोपभुङ्क्त स्म तया सुचिरोत्सुकया सह। रतक्रीडासुखं तत्तत्प्राग्भुक्तमपि नूतनम् ॥१८१॥ सूर्यप्रभस्तु सचिवैः सह वासगृहेऽपरे। निशि तस्यामपत्नीको न्यषीदच्छयनीयके ॥१८२॥ निस्नेहेन किमेतेन स्वप्रियास्यशता बहिः। इतीव निद्रा स्त्रीमित्यस्यैकस्याप्यस्य नाययौ ॥१८३॥ प्रहस्तस्य च सेष्येव कार्यचिन्तैकसङ्गिनः। अन्ये तु परितः सूर्यप्रभं निद्रां ययुः सुखम् ॥१८४॥
कलहंस्या कथा
तावत् सूर्यप्रभं सोऽत्र प्रहस्तश्च सखीयुताम्। प्रविशन्तीं ददृशतुर्वरकन्यामनुत्तमाम् ॥१८५॥ मा भूत्सुरारङ्गना स्वर्गे विम्बोयोऽस्याः पुरो मम। इत्युत्पाद्यापि विधिना पाताले स्थापितामिव ॥१८६॥ सूर्यप्रभश्च केयं स्यादिति यावद्विमर्शति। तावत् सा तत्सखीनेयं सुप्तानेकैकमैक्षत ॥१८७॥ अथैकमतिथिंक्लान्तां हित्वा सलक्षणान्वितम्। दृष्ट्वा सूर्यप्रभं सा तमुपागान्मध्यशायिनम् ॥१८८॥ उवाच च सखीं सोऽस्य सखि तत् स्पृश पादयोः। एतां तोयसुशीताभ्यां कराभ्यां प्रतिबोधय ॥१८९॥ तच्छ्रुत्वा तत्सखी सा वैतथा चक्रे स चेक्षणे। सूर्यप्रभो व्याजसुप्तं विहाय प्रोदघाटयत् ॥१९०॥ वीक्ष्य चोवाच कन्ये ते के युवां किमिहागमः। भवत्योरिति तच्छ्रुत्वा तत्सखी तमभाषत ॥१९१॥ श्रृणु देवास्ति पाताले द्वितीयेऽधिपतिर्जयी। अमीरु इति दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतो बली ॥१९२॥
अष्टम लम्बक २८१
अष्टम लम्बक २८१ और चन्द्रप्रभ के जन्म में प्रभास नामक वसु की कन्या का तुमने परिणय किया है, जिसका नाम वसुमती है ।।१७८।। बेटा इन तीनों को तुम्हें समान दृष्टि से देखना चाहिए। ऐसा कहकर उसने उसकी तीनों प्रधान पत्नियों को उसे सौंप दिया ।।१७९।। तब उस दिन सुनीथ ने बड़ी पत्नी तेजस्वती के साथ रात्रि को अपने शयन-भवन में प्रवेश किया।।१८ ०॥ वहाँ पर सुनीथ को उसका सम्भोग-सुख पहले से अनुभूत होने पर भी सर्वथा नवीन प्रतीत हुआ ।।१८१।। पत्नी-रहित सूर्यप्रभ अपने मित्र मन्त्रियों के साथ दूसरे कमरे में पलंग पर अकेला ही सो गया ।।१८२।। 'जो अपनी प्राणप्यारी पत्नियों को बाहर छोड़कर अकेला ही सो रहा है, ऐसे स्नेहहीन के पास जाकर क्या लाभ'? ऐसा सोचकर ही मानों नींद सूर्यप्रभ के समीप नहीं आई ।।१८३।। राज्य-कार्य की चिन्ता में मग्न प्रहस्त के समीप भी नींद मानो इसी ईर्ष्या के कारण ही नहीं आई। और, सभी सूर्यप्रभ के चारों ओर सुख से सो रहे थे ।।१८४।। कलावती की कथा तबतक सूर्यप्रभ और प्रहस्त ने एक सहेली के साथ कमरे में प्रवेश करती हुई अनुपम सुन्दरी कन्या को देखा ।।१८५।। उसके सौन्दर्य के सामने मेरी सूर्यप्रभा-सृष्टि मलिन न होजाय इसलिए मानों ब्रह्मा ने उस कन्या को बनाकर पाताल में छिपा रखा था ।।१८६।। जब सूर्यप्रभ यह सोच ही रहा था कि यह कौन होगी तबतक उस कन्या ने भवन के भीतर सोए हुए उसके मित्रों को एक-एक करके देखना प्रारम्भ किया ।।१८७।। उन सब में चक्रवर्ती के लक्षण न देखकर और उन सबके बीच में सोए हुए सूर्यप्रभ में उन लक्षणों को पाकर अपनी सहेली से वह कन्या बोली—'सखि यह यह है, यत्न से ठंडे हाथों से इसके पैरों को छुओ और इसे जगाओ' ।।१८८-१८९।। यह सुनकर सहेली ने उसी प्रकार उसे जगाया और जान-बूझकर सोए हुए सूर्यप्रभ ने भी धीरे-धीरे आँखें खोलीं ।।१९ ०।। और, उन दोनों कन्याओं को देखकर कहा—'तुम दोनों कौन हो यहाँ क्योंकर आई हो। यह सुनकर उसकी सखी ने कहा—'महाराज सुनिए। दूसरे पाताल में विजयी राजा अनील है। जो हिरण्याक्ष का पुत्र है और बहुत बलवान् है ।।१९१-१९२।।
१८४ कथासरित्सागर
१८४ कथासरित्सागर कलावतीति तस्यैषा प्राणभ्योऽप्यधिका सुता। स इतोऽद्य वरो पार्श्वदागत्यैतत् पिताऽब्रवीत् ॥११३॥ दिष्ट्याद्य जीवितं प्राप्तं सुनीथः पुनरीक्षितः। सुमुण्डीकावतारश्च दृष्टः सूर्यप्रभो युवा ॥११४॥ सृष्टः खेचरसञ्चक्रवर्ती भावी हरेण यः। तद्विहानन्दसम्मानं सुनीथस्य करोम्यहम् ॥११५॥ श्रुतां सूर्यप्रभायैतां प्रयच्छामि कलावतीम्। सुनीथस्यकगोत्रत्वादार्तं ज्ञेया न युज्यते ॥११६॥ सूर्यप्रभश्च पुत्रोऽस्य राजन्मनि मासुरे। [L11: तत्सुतस्य च सम्मानः कृतस्तस्य कृतो भवेत् ॥११७॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा त्वद्गुणाकृष्टमानसा। मत्सखीमिहायाता त्वद्दर्शनकुतूहलात् ॥११८॥ एव तयोक्ते तत्सख्या निद्राति स्म मृषा सः। तदभिप्रायतात्पर्यं ज्ञातुं सूर्यप्रभस्तदा ॥११९॥ साथ कन्या विनिद्रस्य प्रहस्तस्यान्तिकं शनैः। गत्वा सखीमुखेनोक्त्वा सर्वमस्मै व्यसर्पयत् ॥१२०॥ प्रहस्तश्चाप्युपागत्य देव जागर्षि किं न वा। इति सूर्यप्रभं स्माह स चोन्मिष्य तमभ्यधात् ॥१२१॥ सखे जागर्मि निद्रा हि ममाद्यैकाकिनः कुतः। विशेषं तु वदाम्येष शृणु गोप्यं हि किं त्वयि ॥१२०२॥ अधुनैव प्रविष्टेह मया दृष्टा सखीयुता। कन्यकैका समा यस्यास्त्रैलोक्येऽपि न दृश्यते ॥१२३॥ क्षणेन च गता क्वापि हृत्वैव मम मानसम्। तद्गवेषय सद्यस्तामिहैव क्वचन स्थिताम् ॥१२४॥ इति सूर्यप्रभेणोक्तः प्रहस्तोऽथ बहिर्गतः। दृष्ट्वाच तां समं सख्या स्थितां कन्यामभाषत ॥१२५॥ 'मया त्वदुपरोधेन स्वस्वाम्येष विबोधितः। तत्त्वं मदुपरोधेन पुनर्देह्यस्य दर्शनम्' ॥१२६॥ पश्यास्य रूपं भूयोऽपि कृतार्थकरणं दृशोः। तव पश्यतु चैषोऽपि दृष्टिमात्रवशीकृतः ॥१२७॥
अष्टम लम्बकः २८५
अष्टम लम्बकः २८५ यह उसी राजा अभीक की प्राणों से भी प्यारी कन्या कलावती है। वह राजा अभीक उस दिन ऋषि के पास जाकर जब लौटा तब उसने कहा कि 'अहोभाग्य है हमारा जिसे आज पुनर्जीवित मुनीथ को पुनः देखा और सुमुण्डीक के अवतार सूर्यप्रभ को भी देखा॥१९३-१९४॥ इस युवक मुमुण्डीक सूर्यप्रभ को शिवजी ने विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती बनाया है। इसलिए, यहाँ आये हुए सुमुण्डीक का सानन्द-पूर्ण सम्मान करता हूँ अपनी कन्या कलावती को सूर्यप्रभ के लिए देता हूँ। मुनीथ का और हमारा गोत्र एक है, अतः उसे देना उचित नहीं है। सूर्यप्रभ उसका पुत्र है, किन्तु राजा के जन्म में असुर के जन्म में नहीं। अतः, मुनीथ के पुत्र का सम्मान उसी का सम्मान है' ॥१९५-१९७॥ पिता के ये वचन सुनकर तुम्हारे रूप से आकृष्ट होकर तुम्हें देखने के कौतूहल से यह मेरी सखी यहाँ आई है ॥१९८॥ सहेली के इस प्रकार कहने पर उसके कथन का रहस्य जानने के लिए सूर्यप्रभ कृत्रिम नींद में सो गया ॥१९९॥ तदनन्तर वह कन्या जागते हुए प्रहस्त के समीप धीरे से गई और सहेली द्वारा सारा वृत्तान्त उसे कहलाकर बाहर चली गई ॥२००॥ प्रहस्त भी अपनी शय्या से उठकर सूर्यप्रभ के पास गया और बोला—'राजन् जागते हो या नहीं'। सूर्यप्रभ ने भी अधखुली आँखों से कहा—॥२०१॥ 'मित्र जागता हूँ। मुझ अभागे को आज नींद कहाँ ?—एक विशेष बात तुमसे कहना हूँ तुमसे छिपाकर ही क्या करना है॥२०२॥ अभी-अभी एक सहेली के साथ आई हुई एक कन्या को मैंने देखा जिसके समान सुन्दरी कन्या तीनों लोकों में नहीं है॥२०३॥ वह मेरे मन को चुराकर क्षण भर में ही अदृश्य हो गई। तू उसे अभी जाकर ढूँढ़। यही कहीं होगी' ॥२०४॥ सूर्यप्रभ द्वारा इस प्रकार कहा गया प्रहस्त बाहर निकला और सहेली के साथ खड़ी उस कन्या को देखकर इस प्रकार कहने लगा—'मैंने तुम्हारे अनुरोध से अपने स्वामी को जगा दिया है अब तुम मेरे अनुरोध से उसे फिर दर्शन दो ॥२०५-२०६॥ आँखों को मदन करनेवाले उनके सुन्दर रूप को देख लो। दर्शन से ही शान्त किया हुआ यह भी दुःसह रोग से ॥२०७॥
प्रबुद्धेन ह्यनेनाहमुक्तः कृत्वा भवत्कथाम्।
प्रबुद्धेन ह्यनेनाहमुक्तः कृत्वा भवत्कथाम्। कुतोऽपि दर्शयानीय हा मे प्राणिति नान्यथा॥२०८॥ सतोऽहं त्वामुपायातस्तदेषाऽलोक्य स्वयम्। इति प्रहस्तेनोक्ता सा कन्यामुलभया ह्रिया॥२०९॥ प्रसङ्ग नाशकद् गन्तुं विमृशन्ती यदा तदा। हस्त गृहीत्वा नीताभूत् तेन सूर्यप्रभान्तिकम्॥२१०॥ सूर्यप्रभश्च तां दृष्ट्वा पार्श्वयातां कलावतीम्। उवाच 'चण्डि युक्तं ते किमेतद्यदिहाद्य मे॥२११॥ त्वया सुप्तस्य चौर्येण प्रविश्य हृदयं हृतम्। तदिहाभिगृहीता त्वं चौरि न त्यक्ष्यसे मया'॥२१२॥ एतच्छ्रुत्वा विहस्या सा तत्सखी व्याजहार तम्। पूर्वं ज्ञातश्च पित्रेव चौर्य्यं निग्रहाय ते॥२१३॥ निश्चितोऽर्पयितुं यस्मात् तस्मात् कस्ते निषेधकः। अस्यास्त्वौर्ध्वस्थितं कामं निग्रहं करोषि किम्'॥२१४॥ तच्छ्रुत्वाऽऽलिङ्गितुं सूर्यप्रभे वाञ्छति सत्रपा। मा मार्य्यपुत्र कन्यास्मीत्यवोचत् सा कलावती॥२१५॥ ततः प्रहस्तोऽब्रवीत् तां मा विकल्पोऽस्तु देवि ते। गान्धर्वो ह्येष सर्वेषां विवाहानामिहोत्तमः॥२१६॥ इत्युक्त्वैवं समं सर्वैः प्रहस्ते निर्गते बहिः। सूर्यप्रभस्तदैवैतां भार्यां चक्रे कलावतीम्॥२१७॥ तया सह च पातालकन्यया मर्त्यदुर्लभम्। भेजे सुरतसम्भोगमचिन्त्यनरसङ्गमम्॥२१८॥ राज्यन्ते च कलावत्यां गतायां वसतिं निजाम्। सूर्यप्रभः सुमीथस्य ययौ पार्श्व मयस्य च॥२१९॥ तं मिलित्वाथ सर्वेऽपि प्रह्लादस्यान्तिकं ययुः। स तान्याथाईं सम्मान्य सभास्थो मयमब्रवीत्॥२२०॥ सुनीथस्योत्सवेऽमुष्मिन् प्रियं कर्त्तव्यमेव नः। तदद्य यावत् सर्वेऽपि वयमेकत्र भुञ्ज्महे॥२२१॥ एवं कुर्मोऽत्र को दोष इत्युक्ते च मयेन सः। दूतानिमंत्रणामास प्रह्लादोऽत्रासुराधिपान्॥२२२॥
अष्टम लम्बक २८७
अष्टम लम्बक २८७ सोकर उठ हुए उसने मुझे तुम्हारी बात सुनाई तो उसने कहा कि उसे कहीं से भी लाकर दिखाओ नहीं तो जीवित न रहूँगा ॥२८०॥ इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ। तुम आओ और स्वयं उसे देखो'—प्रहस्त से इस प्रकार कही गई वह कन्या लज्जावश पुनः शयन-गृह में न जा सकी और इधर-उधर करते हुए उसे प्रहस्त हाथ से पकड़कर सूर्यप्रभ के समीप ले गया ॥२८९-२९०॥ सूर्यप्रभ ने भी पास में आई हुई उसे देखकर कहा—अरी कठोर हृदयवाली क्या तुम्हें यह उचित है, जो आज तुमने किया है॥२९१॥ तुमने सोए हुए मेरे हृदय को चुरा लिया है। इसलिए तुम्हें पकड़कर मँगाया है। अरी चोरिन ! अब तुम्हें न छोड़ूँगा' ॥२९२॥ यह सुनकर उसकी चतुर सहेली बोली—'इस बात को पहले ही समझकर इसके पिता ने इस चोर का तुम्हारे लिए उत्सर्ग करने का निश्चय कर लिया है, इसलिए इसे दंड देने के लिए आपको कौन रोक सकता है ? इसे अब चोरी के अनुसार दंड क्यों नहीं देते? ॥२९३-२९४॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने जैसे ही आलिंगन करना चाहा वैसे ही लजाकर वह कलावती बोली—'आर्यपुत्र ऐसा न करो मैं अभी कन्या हूँ' ॥२९५॥ तब प्रहस्त ने कहा—'हे देवि किसी प्रकार की शंका न करो। सभी प्रकार के विवाहों में गान्धर्व विवाह उत्तम है' ॥२९६॥ प्रहस्त के ऐसा कहने पर और उनके साथ सभी के बाहर निकल जाने पर सूर्यप्रभ ने उसी समय कलावती का गान्धर्व विधि से पत्नी बना लिया ॥२९७॥ और उस पाताल-कन्या के साथ मनुष्यों के लिए दुर्लभ एवं अकथनीय आनन्द का भोग करने लगा ॥२९८॥ रात्रि व्यतीत होने पर और कलावती के अपने घर चल जाने पर सूर्यप्रभ सुनीथ और मय के पास गया ॥२९९॥ वे सब मिलकर फिर प्रह्लाद के समीप गये। सभा में बैठे हुए प्रह्लाद ने सबका समुचित सम्मान करके मय से कहा—'सुनीथ की चक्र-प्राप्ति की प्रसन्नता में हमलोगों को उत्सव मनाना चाहिए इसलिए मेरा विचार है कि हमलोग सब एक साथ भोजन करें ॥३००-३०१॥ 'ऐसा ही करें इसमें हानि क्या है ?' मय ने उत्तर में कहा। तब प्रह्लाद ने दूतों को निदेश कर सभी पातालों में दैत्यों और दानवों को निमन्त्रण प्रेषित करवा दिया ॥३०२॥
२४८ कथासरित्सागर
२४८ कथासरित्सागर आयुयुश्चात्र सर्वेभ्यः पातालेभ्यः क्रमेण ते। पूर्वमागाद् बली राजा महासत्त्वैर्महासुरैः ॥२२३॥ अनन्तरमभीरुश्च दुरारोहश्च वीर्यवान्। सुमायस्तन्तुकच्छश्च विकटाक्षः प्रकम्पनः ॥२२४॥ धूमकेतुर्महामायो ये चान्येऽप्यसुरेश्वराः। एकैको निजसामन्तसहस्रगणयो वृतः ॥२२५॥ अपूर्यत सभा तैश्च विहिताऽन्योन्यवन्दनैः। यथाक्रमोपविष्टांश्च प्रह्लादस्त्वानमानयत् ॥२२६॥ प्राप्ते चाहारकाले ते सर्वे सह मयादिभिः। गङ्गास्नाता समाजग्मुर्भोजनाय महासभाम् ॥२२७॥ शतयोजनविस्तीर्णां सुवर्णमणिकुट्टिमाम्। रत्नस्तम्भचितां न्यस्तविचित्रमणिभाजनाम् ॥२२८॥ तत्र प्रह्लादसहिताः ससुनीथमयाश्च ते। सूर्यप्रभेण सचिवैर्युक्तेन च सहासुराः ॥२२९॥ तत्तन्नानाविधं भक्ष्यभोज्यलेह्यादि षड्रसम्। दिव्यमन्नं बुभुजिरे पपुः पानमथोत्तमम् ॥२३०॥ भुक्तपीताश्च गत्वान्यत् सर्वे रत्नमयं सदः। दैत्यदानवकन्यानां ददृशुर्नृत्तमुत्तमम् ॥२३१॥ महल्लिकायाः प्रेम तत्रसङ्गे ददर्शान प्रनृत्तां पितुराज्ञया। प्रह्लादस्य सुतां सूर्यप्रभो नाम्ना महल्लिकाम् ॥२३२॥ द्योतयन्तीं दिशः कान्त्या वर्षन्तीममृतं दृशोः। कौतुकादिव पातालमागतां मूर्तिमन्दभीम् ॥२३३॥ रुञ्झाटदिसमोपेतां चारुनूपुरपादिकाम्। स्मेरसृष्टिं विधात्रेव सृष्टां नृत्तमयीमिव ॥२३४॥ नेत्रोरारौर्वदनेनैः शिञ्जारैर्विभ्रतीं स्तनौ। उरोमण्डलिनीं नृत्तं सृजतीमिव नूतनम् ॥२३५॥ दृष्ट्वैव च तदा चण्डी तस्य सूर्यप्रभस्य सा। अपि स्वीकृतमन्याभिर्जहार हृदयं हठात् ॥२३६॥ ततः साभ्यसुरन्द्राणां मध्ये दृष्ट्वाऽर्हदत्त एतम्। हरदग्धे स्मरे सृष्टं धात्राऽपरमिव स्मरम् ॥२३७॥
अष्टम लम्बक १८९
अष्टम लम्बक १८९ तदनन्तर क्रमशः सभी पाताल के दैत्यों और दानवों के सरदार यहाँ आने लगे। सबसे पहले राजा बलि अगणित असुरों के साथ आया उसके बाद जम्भीक नामक दैत्यराज तथा महा बलवान् दुरारोह नामक दैत्यराज आये। सुमाय तप्तकच्छ विकटाक्ष प्रकम्पन धूमकेतु और महामाय नामक दैत्यराज भी सहस्रों अनुयायियों के साथ वहाँ आये। सारा सभा-भवन परस्पर नमस्कार करते हुए उनसे भर गया और अपने-अपने पद के क्रमानुसार बैठे हुए उनका प्रह्लाद ने स्वागत किया ॥२२३-२२६॥ भोजन का समय आने पर वे सब मय आदि के साथ गंगा-स्नान करके भोजन के लिए विशाल भवन में एकत्र हुए ॥२२७॥ यह भोजन-भवन चार सौ कोस तक फैला हुआ था इसकी भूमि सोने और रत्नों से जड़ी हुई थी। इसमें रत्नों के खंभे लगे हुए थे और अनेक रंगों के मणियों के भोजन-पात्र सजे हुए थे ॥२२८॥ वहाँ पर मय सुनीथ और सचिवों के साथ सूर्यप्रभ आदि सहित समस्त असुरों ने नाना प्रकार के भक्ष्य भोज्य लेह्य आदि षड्रस पदार्थों का भोजन किया और अन्त में विविध पेय पदार्थों का पान किया ॥२२९-२३०॥ भोजन-पान के पश्चात् वे सब रत्नों से जगमगाते हुए सभा-मंडप में बैठे और दैत्यों एवं दानवों की कन्याओं का नाच देखने लगे ॥२३१॥ महस्तिका का प्रेम इसी नाच के प्रसंग में प्रह्लाद की आज्ञा से नाचती हुई उसकी कन्या महस्तिका को सूर्यप्रभ ने देखा ॥२३२॥ वह महस्तिका अपनी अद्भुत कान्ति से चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी और आँखों के लिए अमृत की वर्षा कर रही थी। ऐसा लगता था मानों चन्द्रमा की मूर्ति पाताल देखने के कौतुक से यहाँ उतर आई हो ॥२३३॥ वह मस्तक पर सुन्दर तिलक लगाए हुए थी पैरों में सुन्दर नूपुर, पायजेब आदि पहने हुए थी। उसका मुख मुस्कराता हुआ था मानों ब्रह्मा ने उसे नृत्यमयी ही बनाया था ॥२३४॥ घुँघराले बालों शुभ्र दाँतों और वक्षःस्थल को घेरे हुए स्तन-मंडलों से वह मानों नवीन नृत्य की सृष्टि कर रही थी ॥२३५॥ उस सुन्दरी ने देखते ही अन्य स्त्रियों से हरण किये हुए सूर्यप्रभ के मन का हठात् हरण कर लिया ॥२३६॥ उस महस्तिका ने असुरेन्द्रों के मध्य बैठे हुए सूर्यप्रभ को इस प्रकार देखा मानों शिव के द्वारा कामदेव के भस्म किये जाने पर विधाता ने दूसरे कामदेव की रचना की हो ॥२३७॥ १७
१९० कथासरित्सागर
१९० कथासरित्सागर दृष्ट्वैव तद्गतमनास्तथाभूदचलप्रभा । आङ्गिकोऽभिनयोऽप्यस्या दृष्ट्वैवाविनयरथा ॥२३८॥ समाप्याथ तयोर्भावं तं द्वयोरप्यसक्यन् । प्रेक्षणं चोपसंजह्रुः श्रान्ता राजसुतेति ते ॥२३९॥ सठं सूर्यप्रभं तिर्यक् पश्यन्ती सा महल्लिका । पित्रा विसृष्टा वन्दित्वा दानवेन्द्रानगाद्गृहम् ॥२४०॥ दानवेन्द्राश्च ते सर्वे यथास्वमगमन् गृहान् । सूर्यप्रभोऽपि स्वावासमाजगाम दिनक्षये ॥२४१॥ प्रदोषे च कलावत्या पुनरागतया सह । सुष्वापाम्यन्तरे गुप्तं बहिः सुप्ताखिलानुगः ॥२४२॥ ताव महल्लिका सार्धं वत्सन्दर्शनसोत्सुका । तत्राययौ सविस्रम्भमवयस्याद्वयसङ्गता ॥२४३॥ अन्तत्प्रवेष्टुमिच्छन्तीं प्रज्ञाढ्याख्यो ददर्श ताम् । सूर्यप्रभस्य सचिवो निद्रया तत्क्षणोज्झितः ॥२४४॥ देवि तिष्ठ क्षण यावत् प्रविश्याभ्यन्तरादहम् । निर्गच्छामीति स च तां परिज्ञायोत्थितोऽभ्यधात् ॥२४५॥ रुद्धाः स्म किं बहिः कस्मादद्य चेति सशङ्कया । तया पृष्टः स मूढोऽपि प्रज्ञाढ्यो निजगाद ताम् ॥२४६॥ स्वैरं सुप्तस्य सहसैकान्तिकं किं प्रविश्यते । सुप्तश्चास्मतप्रभुरसावेको व्रतबशादिति ॥२४७॥ तत्तस्तथा विधत्स्व त्वमित्युक्तः सविलक्षया । प्रह्लादवैद्यसुतया प्रज्ञाढ्योऽन्तर्विवेश सः ॥२४८॥ सुप्तां कलावतीं दृष्ट्वा तस्मै सूर्यप्रभाय सः । प्रबोध्य स्वैरमाचख्यावागतां तां महल्लिकाम् ॥२४९॥ सूर्यप्रभश्च श्रुत्वा तच्छय्योत्थाय निर्गतः । दृष्ट्वा महल्लिकामात्मवृत्तीयामप्यभाषत ॥२५०॥ प्रीता कृतार्थता तामद्ययमभ्यागतो जनः । नीयतां स्थानमप्येतदासनं परिगृह्यताम् ॥२५१॥ तत्तस्तरोपविशदाथ सहास्याभ्यां महल्लिका । सूर्यप्रभोऽप्युपाविशत्स प्रज्ञाढ्ययुतस्ततः ॥२५२॥
उसे देखते ही महल्लिका का मन ऐसा विचलित हुआ कि मानों उसके इस अभिनय को देखकर क्रोध से आंगिक अभिनय भ्रष्ट-सा हो गया ॥२३८॥ सभा में बैठे हुए सभी सदस्यों ने उन दोनों को समझ लिया और 'राजकुमारी थक गई है' ऐसा कहकर उस दृश्य को स्थगित कर दिया ॥२३९॥ वह महल्लिका भी सूर्यप्रभ को तिरछी दृष्टि से देखती हुई पिता से जाने की आज्ञा पाकर, सभी सदस्यों को प्रणाम करके घर चली गई ॥२४ ॥ सभी दानवराज भी नृत्य के उपरान्त अपने-अपने घरों को चले गये। सायंकाल होने पर सूर्यप्रभ भी अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥२४१॥ रात होने पर पुनः शयन-गृह में आई हुई कलावती के साथ वह सो गया और उसके साथी मन्त्री भवन के बाहर अन्यत्र सो गये ॥२४२॥ इसी बीच सूर्यप्रभ से मिलने की लालसा से महल्लिका भी घबराती हुई दो सखियों को साथ लेकर वहाँ आई ॥२४३॥ कमरे के अन्दर जाती हुई उसे देखकर अकस्मात् जाग पड़े सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रज्ञाढ्य ने उसे देखा ॥२४४॥ और उसे पहचानकर कहा-'रुको रुको। मैं अन्दर जाकर और लौटकर आता हूँ' ॥२४५॥ 'हम क्यों रोका गया और आप सब लोग बाहर क्यों हैं'—महल्लिका के इस प्रकार प्रश्न करने पर प्रज्ञाढ्य ने कहा—'क्या स्वतन्त्रता से सोए हुए किसी व्यक्ति के पास एकाएक चला जाना उचित है ? हमारे स्वामी किसी व्रत (नियम) के कारण अकेले सो रहे हैं ॥२४६-२४७॥ 'अच्छा भीतर जाओ'—लज्जिता महल्लिका के इस प्रकार कहने पर प्रज्ञाढ्य अन्दर गया ॥२४८॥ वहाँ कलावती को सोती देखकर उसने सूर्यप्रभ को जगाकर अपनी इच्छा से आई हुई महल्लिका का समाचार दिया ॥२४९॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ धीरे से उठकर बाहर निकल आया और दो सखियों के साथ आई हुई महल्लिका से बोला—॥२५ ॥ 'आपने इस अभ्यागत अतिथि को अपने शुभागमन से कृतार्थ किया अब आप इस स्थान को भी कृतार्थ करें, यह आसन स्वीकार कीजिए' ॥२५१॥ यह सुनकर महल्लिका दोनों सखियों के साथ बैठ गई। सूर्यप्रभ भी प्रज्ञाढ्य के साथ सामने बैठ गया ॥२५२॥
२१२ कथासरित्सागर
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[Main Text] उपविश्य स चोवाच, 'तन्वि यद्यपि मे कृता। त्वयावज्ञा सदस्यथा प्रेक्ष्यान्ते वर्धमानया ॥२५३॥ तथापि तावल्लोलाक्षि दृष्टमात्रेण मे त्वया। सौन्दर्येणेव नूनेन लोचने सफलीकृते ॥२५४॥ इति सूर्यप्रभेणोक्ता सा प्रह्लादसुताऽब्रवीत्। 'नार्यपुत्रापराधोऽस्तो मम सोऽत्रापराध्यति ॥२५५॥ यनाहं संसदि कृता भग्नाभिनमसञ्चिता'। एतच्छ्रुत्वा जितोऽस्मीति' हृष्टम् सूर्यप्रभोऽब्रवीत् ॥२५६॥ जग्राह च करेणास्याः करं राजसुतोऽथ सः। बलात्कारग्रहाद् भीतमिव सस्वेदवेपथुम् ॥२५७॥ मुञ्चार्यपुत्र कत्याह पितृवश्येति भाविनम्। ततो सुरेन्द्रतनयो प्रज्ञाड्यस्तामुवाच सः ॥२५८॥ कन्यानां किं न गान्धर्वो विवाहो देवि विद्यते। न च प्रदास्यत्यन्यस्मै पिता त्वां रूक्षिताशयः ॥२५९॥ एतस्य चात्र सम्मानं निश्चितं स करिष्यति। तदलं साध्वसेनेन्दुमुखा मा भूत् समागमः ॥२६०॥ एवं महल्लिकां यावत् प्रज्ञाढ्यस्तां ब्रवीति सः। तावत्सभाम्यन्तर तत्र प्रबुद्धामूत् कलावती ॥२६१॥ अपश्यन्ती च तं सूर्यप्रभं सा शयनीयके। प्रतीक्ष्य किञ्चिदुद्विग्नशङ्किता निरगाद् बहिः ॥२६२॥ दृष्ट्वा महल्लिकोपेतं तं चात्र निजवल्लभम्। सरोषा च सलज्जा च सभया च बभूव सा ॥२६३॥ महल्लिकाऽपि दृष्ट्वैव तामासीद् भीतसज्जिता। सूर्यप्रभश्च निस्पन्दस्तस्थावाक्षिप्तितो यथा ॥२६४॥ दृष्ट्वा वाथ पलायञ्चे जिह्रेमीर्ष्यामि वा यदि। इति सपादमेवागात् कलावत्यपि सा ततः ॥२६५॥ कुशलं शशि शुभं त्वमागतैर्बमितो निशि। एवं महल्लिकां सां च साभ्यसूयमुवाच सा ॥२६६॥ हता महल्लिकायाचमर्थतद्गृहमेव तु। त्वमग्यास्ताङ्गूढात् प्राप्ता प्रापुणिकाय मे ॥२६७॥
अष्टम लम्बक २५३
अष्टम लम्बक २५३
बैठकर उसने कहा—'हे सुन्दरी तुमने सभा में अन्तिम समय सभासदों को सम्मान-सहित देखती हुई यद्यपि मेरा अपमान किया है, तथापि पंचमलयने तुम्हारे सौन्दर्य के समान ही तुम्हारे नृत्य से मेरी आँखें सफल हो गई हैं॥२५३-२५४॥
सूर्यप्रभ द्वारा इस प्रकार कही गई वह प्रह्लाद की कन्या बोली—'इसमें मेरा अपराध नहीं है, इसमें तो उसी का अपराध है, जिसने मेरे अभिनय को विकृत करके मुझे लज्जित किया है। यह सुनकर सूर्यप्रभ ने हर्ष से कहा—मेरी विजय हुई ॥२५५-२५६॥
और उसका हाथ अपने हाथ से पकड़ लिया जो मानों बलात्कार के भय से पसीने- पसीने होकर काँप रहा था ॥२५७॥
'आर्यपुत्र छोड़ो अभी मैं कुमारी हूँ और पिता के वश में हूँ। ऐसा कहती हुई राजपुत्री को प्रज्ञाढ्य ने कहा—'देवि क्या कन्याओं का गान्धर्व विवाह नहीं होता ? पिता तुम्हारे हार्दिक भाव को जानकर अब दूसरे को प्रदान नहीं करेंगे ॥२५८-२५९॥
वे इस सूर्यप्रभ का सम्मान अवश्य करेंगे। इसलिए घबराओ नहीं तुम्हारा विभ्रम व्यर्थ न हो ॥२६०॥
उधर बाहर जब प्रज्ञाढ्य इस प्रकार महस्तित्त्वा से कह रहा था इसी बीच अन्दर सोई हुई कलावती जाग उठी। उसने शय्या पर सूर्यप्रभ को न देखकर कुछ समय प्रतीक्षा की और फिर घबराकर वह बाहर निकल आई ॥२६१-२६२॥
बाहर आकर अपने पति को महस्तित्त्वा के साथ देखकर उसे कुछ क्रोध कुछ लज्जा और कुछ भय हो आया ॥२६३॥
महस्तित्त्वा भी उसे देखकर कुछ डरी तथा कुछ लज्जित हुई और सूर्यप्रभ तो चित्र में लिखा- सा निश्चल हो गया ॥२६४॥
'मुझे सबने देख लिया है, अब मैं यहाँ से भागूँ तो कैसे ? कैसे लज्जा करूँ और कैसे ईर्ष्या प्रकट करूँ—ऐसा सोचकर कलावती महस्तित्त्वा के पास ही जा बैठी ॥२६५॥
और उससे बोली—सखि कुशल तो है ? तुम इस रात में इस प्रकार यहाँ कैसे आई हो ? तब महस्तित्त्वा ईर्ष्या के साथ उससे बोली—'यह लोक तो मेरा है और मेरा घर भी यहीं है। तू दूसरे पाताल-गृह से यहाँ आई है। इसलिए तू मेरी अतिथि है' ॥२६६-२६७॥
९९४ कथासरित्सागर
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तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैतां कलावत्येवमब्रवीत्। सत्यं वृथैत एवेह यस्य सर्वस्य कस्यचित् ॥२६८॥ करोषीहागतस्यैव प्राघुणातिथ्यसत्क्रियाम्। एवमुक्ते कलावत्या सा जगाद महल्लिका ॥२६९॥ यदि प्रीत्या मयोक्ता त्वं तत्किं सद्वेषनिष्ठुरम्। एवं वदसि निर्लज्जे किमहं सदृशी तव ॥२७०॥ किमहं बान्धवादत्ता दूरावेत्य परस्थले। परस्य शयने सुप्ता रहस्येकाकिनी निशि ॥२७१॥ अहं पितुः प्राघुणिकं स्वस्थाने द्रष्टुमागता। आतिथ्येनाधुनेवैषा सखीद्वितयसङ्गता ॥२७२॥ यदास्माभिःप्रसक्त्यावाबसौ मन्त्री प्रविष्टवान्। तदैवैतन्मया ज्ञातं त्वया व्यक्तीकृतं स्वतः ॥२७३॥ एव महल्लिकोक्ता सा कलावत्यगमत्ततः। तिर्यक्कोपकषायेण पश्यन्ती चक्षुषा प्रियम् ॥२७४॥ ततो महल्लिका साऽपि बहुवल्लभ याम्यहम्। सम्प्रतीति रुषा सूर्यप्रभमुक्त्वा ततो ययौ ॥२७५॥ सूर्यप्रभश्च विमना मुक्तं यदभवत्तयोः। कान्ताभ्यां हि समं तस्य तदासक्तं मनो गतम् ॥२७६॥ अथ ज्ञातुं कलावत्याः कलहान्तरचेष्टितम्। प्राहिणोद्द्रुतमुत्थाय प्रभासं स स्वमन्त्रिणम् ॥२७७॥ महल्लिकायास्तच्चञ्च प्रहस्तं स विसृष्टवान्। स्वयं च तद्व्यपेक्षः सन्नासीत् प्रज्ञाढ्यसंयुतः ॥२७८॥ अथान्विष्य कलावत्याश्चेष्टितं स समाययौ। प्रभासो निकटं तस्य पृष्टश्चैवमुवाच तम् ॥२७९॥ इतो द्वितीयं पातालमवति तद्गतवानहम्। वासवेश्म कलावत्याः स्वविद्याच्छादितात्मकः ॥२८०॥ बह्रिस्तत्र द्वयोश्चेट्योरालापश्च श्रुतो मया। एकाब्रवीत् सखि किमसोद्विग्नास्ते कलावती ॥२८१॥ ततो द्वितीयाप्यवदत् सखि गुह्यत्र कारणम्। सुमुण्डीकावतारो हि चतुर्थेऽन्य रसातले ॥२८२॥
अष्टम लम्बक २९५
अष्टम लम्बक २९५ यह सुनकर कलावती हँसकर बोली— यह तो सत्य ही दीख रहा है कि तू यहाँ आये हुए सबका या किसी विशेष अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करती है' ॥२६८॥ कलावती द्वारा इस प्रकार कही गई महल्लिका बोली—'यदि मैंने प्रेम से तुम्हें कुछ कह दिया तो तुम द्वेष से कठोर बातें क्यों कर रही हो ? हे निर्लज्जे क्या मैं तेरी तरह निर्लज्ज हूँ? ॥२६९-२७० ॥ कि माता-पिता द्वारा बिना दिये हुए ही दूर से दूसरे के घर में आकर रात के समय एकान्त में दूसरे की शय्या पर अकेली सोई हूँ ? ॥२७१॥ मैं तो अपने पिता के अतिथि से अपनी दो सखियों के साथ आतिथ्य-सत्कार के रूप में मिलने आई हूँ। जब हम लोगों को रोककर यह मन्त्री अन्दर गया तभी मैंने जान लिया था फिर तुमने उसे स्वयं ही स्पष्ट कर दिया ॥२७२-२७३॥ महल्लिका द्वारा इस प्रकार फटकारी गई कलावती तिरछी और क्रोध से रक्त दृष्टि से सूर्यप्रभ को देखती हुई वहाँ से चली गई ॥२७४॥ तब महल्लिका ने सूर्यप्रभ से कहा—'हे बहुला के प्यारे, अब मैं भी जाती हूँ' और इस प्रकार कहकर वह चली गई ॥२७५॥ उस समय मन से हीन सूर्यप्रभ भी खिन्न हो गया यह उचित ही था; क्योंकि दोनों प्रेयसियों पर आसक्त उसका मन भी उन्हीं के साथ चला गया था ॥२७६॥ इसके पश्चात् कलावती के कलह करके चले जाने पर उसकी चेष्टा जानने के लिए सूर्यप्रभ ने शीघ्र ही उठकर प्रभास नामक अपने मन्त्री को भेजा ॥२७७॥ उधर महल्लिका का समाचार जानने के लिए प्रहस्त मन्त्री को भेजा और स्वयं प्रज्ञाढ्य के साथ उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा ॥२७८॥ तदनन्तर, कलावती का समाचार लेकर प्रभास उसके पास आया और पूछने पर बोला— 'मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर कलावती के वासस्थान—दूसरे पाताल—में उसके घर पर गया ॥२७९-२८० ॥ वहाँ मैंने बाहर बैठी हुई दो देवियों की बातचीत सुनी। उनमें एक कहने लगी—'अरी आज कलावती घबराई हुई-सी क्यों है? तब दूसरी ने कहा—'सखि इसका कारण सुनो। सुपुण्डरीक का अवतार आज चौथे पाताल में हैं ॥२८१-२८२॥
२१६ कथासरित्सागर
२१६ कथासरित्सागर
स्थितः सूर्यप्रभो नाम रूपेण जितमन्मथः । तस्मै गत्वा स्वयं गुप्तमात्मा दत्तः किलैतया ॥२८३॥ गतायामथ चेट्यां तत्सकाशं निशागमे । प्रह्लाददुहिताऽयागात् स्वयं तत्र महल्लिका ॥२८४॥ तया सहेर्ष्याकलहं कृत्वा सत्यारम्भात्तनो । उद्यतैषा सुखावत्या स्वस्रा दृष्ट्वैव रक्षिता ॥२८५॥ ततश्चान्तः प्रविश्यैव निपत्य शयनीयके । स्थिता तया सह स्वस्रा पृष्टवृत्तान्तविग्नया ॥२८६॥ एवं चेट्योः कथां श्रुत्वा प्रविश्यात्र तथैव तौ । कलावतीसुखावत्यौ दृष्टे सुप्त्याकृती मया ॥२८७॥ इति प्रभासो यावत्तं वक्ति सूर्यप्रभं रहः । तावत्प्रहस्तोऽप्यागात् पृष्टः सोऽप्यब्रवीदिदम् ॥२८८॥ इतो महल्लिकावासगृहं यावदहं गतः । तावत्तत्र प्रविष्टा सा सखीभ्यां सह दुर्मनाः ॥२८९॥ अहं तत्रैव चादृश्यो विद्यायुक्तो प्रविष्टवान् । दृष्टा मयात्र तस्याश्च सख्यो द्वादश तत्समाः ॥२९०॥ ताश्च सञ्चलपर्यङ्कनिषण्णां परिवृत्य ताम् । महल्लिकामुपाविशन्नेका चोवाच तां ततः ॥२९१॥ सखि कस्मादकस्मात्त्वमुद्विग्नेवाद्य दृश्यसे । विवाहे प्रस्तुतेऽप्येषा बत का ते विषादिता ॥२९२॥ तच्छ्रुत्वा सविमर्शा सा तां प्रह्लादसुताब्रवीत् । को मे विवाहो दत्तास्मि कस्मै केनोदितं तव ॥२९३॥ एवं तयोक्ते सर्वास्ता जगदुर्मिथ्यैतत् त्वम् । प्रातर्विवाहो दत्तासि सखि सूर्यप्रभाय च ॥२९४॥ स्वजनन्यै च देव्यैतदद्योक्तं स्वदसन्निधौ । अस्माभियोजयन्त्या ते कौतुकप्रतिबन्धनि ॥२९५॥ तद्धन्यासि च यस्यास्त भावी सूर्यप्रभः पतिः । यद्रूपसम्पदो निन्द्राति निधिं नष्टाङ्गनाजनः ॥२९६॥ अस्मारं तु विगाताश्चे श्चन्तनी यं वयं परम् । तस्मिन् हि भर्त्तरि प्राप्ते त्वमस्मान् विस्मरिष्यसि ॥२९७॥