कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ६४७
नवम लम्बक ६४७ आज भैरव देव क्यों विलम्ब कर रहे हैं इस प्रकार माताओं ने नारायणी देवी से पूछा। किन्तु वह हंसती थी कुछ बोलती न थी ॥७८॥ उन माताओं द्वारा अत्यन्त आग्रह के साथ पूछे जाने पर नारायणी ने कहा- 'यद्यपि यह लज्जाजनक बात है फिर भी सहेलियों मैं तुमसे कहती हूँ' ॥७९॥ शूरपुर नगर में शूरसेन नाम का राजा है। सौन्दर्य में प्रसिद्ध उसकी विद्याधरी नाम की कन्या है ॥८०॥ उसे देने की इच्छा करनेवाले राजा शूरसेन ने सुना कि उसके रूप के समान सुन्दर राजा विमल का पुत्र प्रभाकर है ॥८१॥ राजा शूरसेन प्रभाकर को कन्या देना चाहता है यह राजा विमल ने भी सुना। और, उस कन्या को अपने पुत्र के समान ही सुन्दर जानकर राजा विमल ने राजा सेनपुर में दूत भेजकर, उसकी पुत्री विद्याधरी की अपने पुत्र प्रभाकर के लिए माँग की ॥८२-८३॥ शूरसेन ने भी आवश्यक सम्मति के साथ विमल के पुत्र प्रभाकर को विधिवूर्वक अपनी कन्या प्रदान कर दी ॥८४॥ तब बहूरूपा विद्याधरी अपने श्वशुर के नगर विमलपुर में आकर अपने पति प्रभाकर के साथ रात्रि में मिली ॥८५॥ वहाँ उत्कण्ठिता विद्याधरी ने जब पति प्रभाकर को बिना किसी चेष्टा के सोया देखा तब उसने आश्चर्य से उसकी परीक्षा की और उसे नपुंसक पाया ॥८६॥ 'हाय! हाय! मैं मारी गई, मुझे नपुंसक पति मिला' इस प्रकार सोचती हुई राजकुमारी ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की ॥८७॥ प्रातः काल ही उसने पत्र लिखकर अपने पिता के पास भेजा कि तुमने बिना जाँच किये ही मुझे नपुंसक को कैसे दे दिया ॥८८॥ उस पत्र को पढ़कर राजा शूरसेन ने सोचा कि राजा विमल ने मुझे ठग लिया है। इसलिए उसे क्रोध आ गया और उसने विमल के प्रति क्रोध प्रकट करते हुए उसे यह लिखित सन्देश भेजा कि तूने छल से अपने नपुंसक लड़के के लिए जो मेरी पुत्री को बियाह दिया है अब उसका फल भोगो। मैं सेना लेकर आता हूँ और तुझे मार डालता हूँ ॥८९॥ बल के मद से उन्मत्त शूरसेन ने राजा विमल के लिए इस प्रकार सन्देश भेज दिया। राजा विमल भी इस सन्देश को पाकर मन्त्रियों के साथ उसके लेख का तत्त्व विचारने लगा क्योंकि शूरसेन बल में विमल से अधिक होने के कारण उसके लिए अजेय था ॥९१-९२॥
१४८ कथासरित्सागर
१४८ कथासरित्सागर
ततस्तं पिङ्गलदासाख्यो मन्त्री विमलमभ्यधात्। एक एवास्त्युपायोऽत्र तं देव शृणु साम्प्रतम्॥९३॥ अस्ति स्थूलशिरा नाम यक्षस्तस्य च वद्म्यहम्। मन्त्रमाराधनं येन वरमिष्टं ददाति सः॥९४॥ तेनोपास्तेन मन्त्रेण यक्षमाराध्य सम्प्रति। लिङ्गं याचस्व पुत्रार्थं सद्यः शाम्यतु विग्रहः॥९५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा तस्मान्मन्त्रमादाय तं नृपः। सुतार्थं यक्षमाराध्य स तं लिङ्गमयाचत॥९६॥ तेन सम्प्रति दत्तं च लिङ्गं यक्षेण तत्सुतः। पुमांस्प्रभाकरः सोऽभूद्यक्षस्त्वासीन्नपुंसकः॥९७॥ सा तु विद्याधरी दृष्ट्वा पुमांसं तं प्रभाकरम्। तेन परया सहावाप्तरससौख्या व्यचिन्तयत्॥९८॥ भ्रान्ताहं मददोषेण न मे भर्त्ता नपुंसकः। पुमानेवैष सुभगो नात्र कार्यान्यथा मतिः॥९९॥ इत्यालोच्यैनमेवार्थं लिखित्वा लज्जिता पुनः। पित्रे सा प्राहिणोल्लेखं शमं भेजे च तेन सः॥१००॥ एतत् ज्ञात्वा च वृत्तान्तं भैरवेणाथ कुप्यता। मानाम्य स स्थूलशिराः शप्तो देवेन गुह्यकः॥१०१॥ लिङ्गत्यागेन यच्छश्वद्भावितं मत्प्रिया ततः। षण्ढ एव भवाजीवं पुमान् सोऽस्तु प्रभाकरः॥१०२॥ एवं नपुंसकीभूतो गुह्यकः सोऽथ दुःसहाम्। प्रभाकरश्च पुरुषीभूतो भोगसुखाय सः॥१०३॥ तदेतेनाथ कार्येण देवस्यागमने मनाक्। जातो विलम्बः क्षिप्राच्च जानीतायन्तमेव तम्॥१०४॥ इति नारायणी देवी मातृभिरिदमब्रवीत् सा। देवश्चण्डेश्वरस्तावदाययौ सोऽत्र भैरवः॥१०५॥ सम्पूजितश्च सर्वाभिरुपहारैः स मातृभिः। ताण्डवेन क्षणं नृत्यंश्चक्रीडेयोगिनीसखः॥१०६॥ तञ्च सर्वं तरोः पृष्ठाच्चन्द्रस्वामी विलोकयन्। मारायच्या वदर्शाका शासी सापि तमक्षत॥१०७॥
नवम लम्बक ६४९
नवम लम्बक ६४९ जब उसे कोई उपाय नहीं सूझा तब पिंगदत्त नामक मन्त्री ने राजा विमल से कहा- 'स्वामिन् एक ही उपाय कल्याण के लिए है। उसे करो ॥१९३॥ स्थूलशिरा नाम का एक यक्ष है। उसका मन्त्र और आराधना-विधि मैं जानता हूँ जिससे वह अभीष्ट वर देता है ॥१९४॥ उसके मन्त्र को ग्रहण करके उससे पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना करो। इससे विरोध दूर होजायगा' ॥१९५॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे मन्त्र ग्रहण किया और उससे यक्ष की आराधना करके पुत्र के लिए जननेन्द्रिय की याचना की ॥१९६॥ उस यक्ष द्वारा जननेन्द्रिय प्राप्त हो जाने पर वह नपुंसक पुत्र प्रभाकर पूर्ण पुरुष हो गया किन्तु वह यक्ष नपुंसक हो गया ॥१९७॥ अब वह विद्याधरी प्रभाकर को पुरुषत्व से युक्त देखकर और उसके साथ यौन सुख का आनन्द लेकर सोचने लगी- ॥१९८॥ मैं अपने यौवन-मद में भूल कर गई। मेरा पति नपुंसक नहीं है। यह तो पूर्ण पुरुष है। अतः इसके सम्बन्ध में विपरीत मति नहीं करनी चाहिए ॥१९९॥ इस प्रकार विचार कर और इसी बात को पुनः पिता को लिखकर, साथ ही लज्जित होकर भी उसने यह सन्देश भेजा जिससे उसका पिता शान्त हो गया ॥२००॥ यह समाचार सुनकर आज क्रुद्ध हुए भैरव ने स्थूलशिरा यक्ष को बुलाकर शाप दिया-॥२०१॥ कि जननेन्द्रिय का त्याग करने से तूने नपुंसकता धारण की है अतः अब तू आजीवन नपुंसक ही बना रहेगा और वह प्रभाकर सदा के लिए पुरुष हो जायगा ॥२०२॥ इसलिए नपुंसक बना हुआ यह यक्ष आज बहुत दुःखी है और प्रभाकर भार्या-सुख के लिए पुरुष बनकर सुखी है॥२०३॥ इसी काम में आज भैरव का आने में कुछ विलम्ब होगया है। फिर फिर भी उन्हें आया ही समझो ॥२०४॥ कात्यायनी देवी जबतक उन योगिनी महात्मा से कह ही रही थीं कि इतने में ही भयङ्कर भैरवदेव आ ही गये और उन योगिनियों ने नाना प्रकारके उपहारों से उनका पूजन किया। भैरव ने भी कुछ समय तक उन योगिनियों के साथ मोद-प्रमोद किया ॥२०५॥ चन्द्रस्वामी ने वन पर बैठ बैठकर यह सब कुछ दृश्य देखा। वह कात्यायनी की एक दासी को देखा। उसने भी चन्द्रस्वामी को देखा॥२०६॥ ८२
६५० कथारित्सागर
६५० कथारित्सागर अन्योन्यसामिलाषौ च दयावृद्धौ तौ बभूवतुः। सा च नारायणी देवी तथामूतौ विवेद तौ ॥१०८॥ गतेऽथ मातृसहिते भैरवे सा विलम्ब्य तम्। नारायणी पादपस्थं चन्द्रस्वामिनमाह्वयत् ॥१०९॥ मवरुह्यागतं स च स्वदासीं सां च सा ततः। पप्रच्छ कश्चिदन्योन्यमभिलाषोऽस्ति वामिति ॥११०॥ अस्ति देवीति विज्ञप्ता ताभ्यां तथ्यं ततश्च सा। देवी विमुक्तकोपा तं चन्द्रस्वामिनमभ्यधात् ॥१११॥ सत्येनोक्तेन तुष्टाऽहं युवयोर्न शपामि वाम्। ददाम्येतां सु दासीं ते भवतं निर्वृतौ युवाम् ॥११२॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्विप्रो देवि यद्यपि चञ्चलम्। मनो रुणध्मि तदपि स्पृशामि न परस्त्रियम् ॥११३॥ मनसः प्रकृतिश्चैषा रक्ष्यं पापं तु कायिकम्। इत्यूचिवांसं तं धीरं विप्रं देवी जगाद सा ॥११४॥ प्रीतास्मि ते वरश्चायं पुत्रादीञ्शीघ्रमप्स्यसि। इदं चोत्पलम्मम्लानं विपादिघ्नं गृहाण मे ॥११५॥ इत्युक्त्वा नीरजं दत्त्वा चन्द्रस्वामिद्विजस्य सा। नारायणी सदासीका देवी तस्य तिरोदधे ॥११६॥ स च प्राप्तोत्पलो रात्रौ क्षीणायां प्रस्थितस्ततः। तारापुरं तन्नगरं प्राप विप्रः परिभ्रमन् ॥११७॥ यत्रास्य स स्थितः पुत्रो महीपालः सुता च सा। अनन्तस्वामिनस्तस्य गृहे विप्रस्य मन्त्रिणः ॥११८॥ तत्र गत्वा स तस्यैव मन्त्रिणो भोजनेप्सया। द्वारे प्राग्र्यमनं चक्रे भूत्वा तमतिथिं प्रियम् ॥११९॥ स च मन्त्री प्रतीहारैराज्ञेयान्तः प्रवेशितम्। न्यमन्त्रयत दृष्ट्वैव विद्वांसं भोजनाय तम् ॥१२०॥ निमन्त्रितोऽथ स श्रुत्वा तत्र पापहरं सरः। चन्द्रस्वामी ययौ स्नातुमगस्त्यह्रदसंज्ञकम् ॥१२१॥ आगच्छति ततः स्नात्वा यावत्तावत्समन्ततः। हाकष्टशब्दं शुश्राव नगरे तत्र स द्विजः ॥१२२॥
नवम लम्बक ६५१
नवम लम्बक ६५१ दैवयोग से वे दोनों परस्पर अभिलाषा-युक्त हो गये और नारायणी देवी ने दोनों के भाव को ताड़ लिया ॥१८॥ तदनन्तर, माताओं के साथ भैरव के चले जाने पर नारायणी कुछ विलम्ब करके वहीं रुक गई और उसने वृक्ष पर बैठे हुए चन्द्रस्वामी को बुलाया ॥१९॥ नारायणी देवी ने वृक्ष से उतरकर आये हुए चन्द्रस्वामी तथा उस दासी दोनों से पूछा कि क्या तुम दोनों को परस्पर मिलने की अभिलाषा है? ॥११०॥ 'हाँ देवि है। ऐसा उन दोनों ने सत्य-सत्य कह दिया।' तब नारायणी देवी ने क्रोध-रहित होकर चन्द्रस्वामी से कहा—'तुम लोगों ने सत्य कहा इसलिए शाप नहीं देती हूँ वरन् तुझे यह दासी देती हूँ। तुम दोनों सुखी रहो' ॥१११-११२॥ यह सुनकर वह ब्राह्मण बोला— भगवती यद्यपि मैं चंचल मन को रोकता हूँ। किसी परस्त्री का स्पर्श नहीं करता। यद्यपि चंचलता मन की प्रकृति है तथापि शारीरिक पाप से उसकी रक्षा करनी चाहिए। इस प्रकार कहते हुए उस धीर ब्राह्मण से नारायणी देवी ने कहा—'बेटा तुझ पर प्रसन्न हूँ और मेरा तो कहना है कि अपने बच्चों को प्राप्त कर और यह कभी न म्लान होनेवाला कमल तुझे देती हूँ जो विष आदि को दूर करता है। इसे ले' ॥११३-११५॥ इस प्रकार कहकर और चन्द्रस्वामी को कमल देकर वह नारायणी देवी दासी के साथ अन्तर्धान हो गई ॥११६॥ वह चन्द्रस्वामी देवी के दिये हुये कमल को पाकर और रात्रि के व्यतीत होने पर वहाँ से चलकर घूमते-फिरते तारापुर नगर पहुँचा ॥११७॥ वहाँ पर उसका पुत्र महीपाल और कन्या राजा के ब्राह्मण-मन्त्री अनन्तस्वामी के यहाँ ठहरे हुए थे ॥११८॥ इस नगर में जाकर वह चन्द्रस्वामी उसी मन्त्री के घर भोजन प्राप्त करने की इच्छा से गया और उसे अतिथि-प्रिय जानकर उसके द्वार पर बैठकर वेदपाठ करने लगा। द्वारपालों द्वारा सूचना देकर अन्दर ले जाये गये चन्द्रस्वामी को मन्त्री अनन्तस्वामी ने भोजन के लिए आमन्त्रित किया ॥११९-१२०॥ वह निमन्त्रित चन्द्रस्वामी पाप हरण करनेवाले अनन्तह्रद नामक सरोवर में स्नान करने के लिए गया ॥१२१॥ जब वह स्नान करके आया तब इतने में ही उसे 'हाय! हाय! बहुत दुख है' सारे नगर में इस प्रकार का कोलाहल सुनाई पड़ा ॥१२२॥
सत्कारणं च पृच्छन्तं तमयमवदज्जनः। इह स्थितो महीपालो नाम ब्राह्मणपुत्रकः ॥१२३॥ अटव्यां सार्थवाहेन प्राप्तः सार्थभरेण सः। तस्मात् सुलक्षणो दृष्ट्वा याचित्वा भगिनीसखः ॥१२४॥ अनन्तस्वामिना यत्नादिहानीतः स मन्त्रिणा। पुत्रीकृतश्चापुत्रेण स तेन प्रियतां गतः ॥१२५॥ तारावर्मनृपस्येह राष्ट्रस्यास्य च सद्गुणः। सोऽद्य कृष्णाहिना दष्टस्तेन हाहारवः पुरे ॥१२६॥ एतच्छ्रुत्वा स एष स्यान्मत्पुत्र इति चिन्तयन्। आययौ त्वरितश्चन्द्रस्वामी मन्त्रिगृहं स तत् ॥१२७॥ तत्र सर्वैर्वतं दृष्ट्वा परिज्ञाय च तं सुतम्। मन्वति स्म स हस्तस्थममृतागदोत्पलम् ॥१२८॥ अढौकयच्च नासायां महीपालस्य तस्य सत्। नीलोत्पलं सद्यैवाभूत्सद्गन्धेन स निर्विषः ॥१२९॥ उत्तस्थौ च महीपालो निद्रायुक्त इवास्त सः। पुरे चात्रोत्सवं चक्रे जनः सर्वः सराजकः ॥१३०॥ चन्द्रस्वामी च स तदा देवांशः कोऽप्यसाविति। अनन्तस्वामिना पौरैः राज्ञा चाप्यतिपूज्यत ॥१३१॥ तस्थौ च तत्रैव सुखं मन्त्रिवेश्मनि सोऽर्चितः। पश्यन्पुत्रं महीपालं सुतां चन्द्रवतीं च ताम् ॥१३२॥ परिज्ञायापि चान्योन्यं तूष्णीं तस्थुस्त्रयोऽपि ते। कुर्वन्त्यकालेऽभिव्यक्तिं न कार्यापेक्षिणो वृथा ॥१३३॥ अथ तस्मै महीपालायान्तः सन्तोषतो गुणैः। राजा बन्धुमतीं नाम तारावर्मा ददौ सुताम् ॥१३४॥ प्रदत्तनिजराज्यार्धं तस्मिन्नेव व्यधात्तथा। सुखी राज्यभरं कृत्स्नं स नृपोऽन्यमपुत्रकः ॥१३५॥ महीपालोऽपि स प्राप्तराज्यः प्रख्याप्य तं निजम्। पितरं स्वानुजां स्थाने वरत्वा तस्थौ यथासुखम् ॥१३६॥ एकदा च पिता चन्द्रस्वामी स्वैरमभाषत। एहि स्वदेशं गच्छावो मातुरानमनाय ते ॥१३७॥
नवम लम्बक ३५३
नवम लम्बक ३५३ इसका कारण पूछने पर लोगों ने उसे बताया कि यहाँ महीपाल नाम का एक ब्राह्मण कुमार रहता है। उसे व्यापारी सार्थवाह ने शून्य जंगल में पाया था। उसके अच्छे लक्षणों को देखकर उसकी बहन के साथ उसे मन्त्री अनन्तस्वामी व्यापारी से माँग लाये थे और पुत्रहीन मन्त्री ने उसे अपना पुत्र बना लिया था। इसलिए वह उसका बहुत प्रिय हो गया था ॥१२४-१२५॥ वह सर्वगुण बालक यहाँ के राजा का बहुत प्रिय था। उसे आज काले साँप ने काट लिया इसलिए आज सारे नगर में हाहाकार मच रहा है ॥१२६॥ यह समाचार सुनकर चन्द्रस्वामी ने सोचा कि यह तो मेरा ही पुत्र है। इस प्रकार सोचता हुआ चन्द्रस्वामी शीघ्र ही मन्त्री के घर पर आया ॥१२७॥ वहाँ सब लोगों से घिरे हुए उसे देखकर और पहचानकर हाथ में देवी के दिये हुए ओषधि-रूप कमल को लिया हुए चन्द्रस्वामी प्रसन्न हुआ ॥१२८॥ उसने उस कमल को महीपाल की नाक में लगा दिया जिससे वह बालक उसी समय विष हीन हो गया ॥१२९॥ और, इस प्रकार उठ बैठा मानों नींद में सो रहा था। तब उस नगर में उसके जीवित होने का उत्सव राजा-सहित सारी प्रजा ने मनाया ॥१३०॥ तदनन्तर, चन्द्रस्वामी भी किसी देवता का अवतार है ऐसा समझा जाकर जनता से और राजा से धन आदि द्वारा सम्मान किया गया ॥१३१॥ वह चन्द्रस्वामी मन्त्री के घर पर अपने पुत्र महीपाल और कन्या चन्द्रवती को देखता हुआ सम्मान के साथ रहने लगा ॥१३२॥ वे तीनों परस्पर एक दूसरे को पहचानते हुए भी मौन रहे। कार्य की अपेक्षा करके बुद्धिमान् व्यक्ति असमय में प्रकट नहीं होते ॥१३३॥ कुछ दिनों के अनन्तर महीपाल के गुणों से मुग्ध राजा तारावर्मा ने उसे तारावती नाम की अपनी कन्या दे दी ॥१३४॥ और साथ ही उस पुत्रहीन राजा ने अपने राज्य का आधा भाग और सारे राज्य का भार भी उसे देकर स्वयं शान्ति प्राप्त की ॥१३५॥ महीपाल भी राज्य प्राप्त करके और चन्द्रस्वामी को अपना वास्तविक पिता घोषित करके तथा अपनी छोटी बहन का योग्य पात्र के साथ विवाह कराके सुखपूर्वक रहने लगा ॥१३६॥ एकबार महीपाल के पिता चन्द्रस्वामी ने उससे कहा-‘चलो अपनी माता को लाने के लिए अपने गाँव को चल ॥१३७॥
१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर राज्यस्य र्खा हि बुद्ध्वा सा रूप सेनास्मि विस्मृता। इति श्रुत्वा शपेज्जातु पुत्रातिचिरकुक्षिता ॥१३८॥ मातापितृभ्यां शप्त सन् जातु सुखमश्नुते। तथा चतां पुरावृत्तां वणिक्पुत्रकथां शृणु ॥१३९॥ चक्रधरगत लोभवत्पुत्रयोः कथा चक्रो नाम वणिक्पुत्रो धवलाख्येऽभवत्पुरे। सोऽनिच्छतोरगात्पित्रो स्वर्णद्वीपं वणिग्गया ॥१४०॥ तत स पञ्चभिर्वर्षैरुपार्जितमहाधनः। आगच्छन्नारुरोहाग्र्यौ वहन रत्नपूरितम् ॥१४१॥ अल्पावशेषे गन्तव्ये वारिधौ तस्य चोन्नदन्। उदतिष्ठन् महावातवर्षवेगाकुलोऽम्बुद ॥१४२॥ पित्राववमन्यैष किमायातः इतीव तम्। क्षोधारप्रवहण तस्य निर्बभञ्जुर्गहोर्मयः ॥१४३॥ तस्या रूडेपि हतास्तोयमकरैः कुत्रपि भक्षिताः। चक्रस्त्वायूर्वलाभीत्वा तीरे क्षिप्तश्च वीचिभिः ॥१४४॥ सत्रस्तो निसह स्वप्न इव रौत्रासिताकृतिम्। पाशहस्त ददर्शैक पुरुष स वणिक्सुत ॥१४५॥ तेनोत्क्षिप्य च नीतोऽभूत्स चक्रः पाशवेष्टितः। दूरं सिंहासनस्थेन पुरुषेणाधिष्ठां सभाम् ॥१४६॥ तस्याज्ञायासनस्थस्य तेनैव स वणिग्युवा। नीत्वा पाशमुता लोहमये गेहे न्यवेश्यत ॥१४७॥ तत्रान्तः पीड्यमानं स चक्रः पुरुषमैक्षत। मूर्ध्नि तप्तेन लोहेन चक्रेण भ्रमतामिधम् ॥१४८॥ कस्स्त्वं केनाधुनेनेव तव जीवस्यहो कथम्। इत्यपृच्छत् स चक्रन्तं सोऽप्येव प्रत्युवाच तम् ॥१४९॥ शृङ्गाख्योऽहं वणिक्पुत्र पित्रोर्यच्च वचो मया। न कृतं तेन सङ्क्रुद्धौ तौ मामशपतां क्रुधा ॥१५०॥ धिट्स्त्वायससन्तप्तचक्रभ्रमी नौ दुनोपि यद्। तदीदृश्येव ते पीडा दुराचार भविष्यति ॥१५१॥ इत्युक्त्वा तौ विरम्पोभौ रुदन्त मामबोधताम्। मा रोदीरेकमेवास्तु मासं पीडा तवेद्दृशी ॥१५२॥
नवम लम्बक १५५
नवम लम्बक १५५ तुमको राजा हुए जानकर, उसने मुझे कैसे भुला दिया यह सोचकर चिरदुःखिता माता क्रोध करके कभी तुम्हें शाप न दे दे ।।१३८।। माता और पिता से शापित व्यक्ति कभी सुख नहीं पाता इस सम्बन्ध में एक पुरानी कहानी कहता हूँ सुनो ।।१३९।। चक्र और खड्ग नामक वैश्यपुत्रों की कथा प्राचीन समय में चक्रपुर में चक्र नाम का एक वैश्य-पुत्र था। वह माता-पिता के द्वारा मना किये जाने पर भी उनकी इच्छा के विरुद्ध व्यापार के लिए सुवर्णद्वीप चला गया ।।१४०।। पाँच वर्षों में वहाँ से पर्याप्त द्रव्य उपार्जित करके लौटते हुए वह रत्नों से भरी नाव पर चढ़ा ।।१४१।। जब स्वदेश का किनारा कुछ ही शेष रह गया तब आकाश में सहसा आँधी-पानी की बौछार के साथ भारी बादल-दल उमड़ पड़ा ।।१४२।। यह माता-पिता की आज्ञा के विरुद्ध व्यापार करने क्यों गया मानों इसी क्रोध से समुद्र की ऊँची-ऊँची तरंगों ने उसकी नाव को तोड़-फोड़ डाला ।।१४३।। नाव में बैठे हुए अनेक व्यक्ति पानी में बह गये कितनों को मगर निगल गये और आयु शेष रहने के कारण लहरों ने चक्र को किनारे पर ला पटका ।।१४४।। किनारे पर बेहोश और असहाय पड़े हुए स्वप्न में जैसे उसने हाथ में फांस लिये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ।।१४५।। वह पुरुष चक्र को पाश से बाँधकर एक सभा में ले गया जहाँ दूर पर एक व्यथित सिंहासन पर बैठा था ।।१४६।। उसी सिंहासन पर बैठे हुए व्यक्ति की आज्ञा से पाशधारी पुरुष ने उसे एक लोहे की कोठरी में पटक दिया ।।१४७।। उस कोठरी के अन्दर चक्र ने सिर पर घूमते हुए लोहे के गरम चक्र से पीड़ित एक दूसरे पुरुष को देखा ।।१४८।। और पूछा—'तू कौन है तथा इस कष्ट से किस प्रकार तू जी रहा है? तब उसने कहा—।।१४९।। "मैं खड्ग नाम का वैश्यपुत्र हूँ। मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी इससे क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे शाप दिया कि तू सिर पर रखे हुए लोहे के चक्र के समान हम लोगों को त्रास देता है, इसलिए हे दुराचारी तुझे भी ऐसी ही अनुपम पीड़ा होगी ।।१५०-१५१।। ऐसा कहकर और रोते हुए मुझे देखकर वे बोले—'रोओ मत ऐसी पीड़ा तुझे केवल एक मास तक ही होगी' ।।१५२।।
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वाहं शुचा भीत्या तद्दिनं शयनाशितः । निशि स्वप्न इवाद्राक्षं भीमं पुरपमागतम् ॥१५३॥ सेनादाय बलेनाहमस्मिंल्लोहमये गृहे । क्षिप्तो यस्तं च मे मूर्ध्नि ज्वलच्चक्रमिदं भ्रमतु ॥१५४॥ इति मे पितृशापोऽयं तेन प्राणा न यान्ति मे । स च मासोऽद्य सम्पूर्णो न च मुच्य सभाप्यहम् ॥१५५॥ इत्युक्तवन्तं तं खड्गं स चक्रः सङ्घपोऽब्रवीत् । पित्रोः प्रवसतामार्थे मयापि न कृतं वचः ॥१५६॥ प्राप्तं नङ्क्ष्यति तं वित्तमिति मां शपत स्म तौ । तन्नाम्न मे धनं नष्टं कृत्स्नं द्वीपान्तरार्जितम् ॥१५७॥ एषव वार्तां श्रायत्र तत्सोऽयं जीवितन मे । दह्यतन्मूर्ध्नि मे चक्रं खड्ग शापोऽपयातु ते ॥१५८॥ इति चक्रे वदत्यय वाणी दिव्यात्र शुश्रुवे । खड्ग मुक्तोऽसि चक्रस्य मूर्द्धयेतन्चक्रमपर्यं ॥१५९॥ सञ्छ्रुत्वा चक्रशिरसि न्यस्तचक्रस्तदव सः । खड्गः केनाप्यवृश्यन निन्ये पितृगृहं ततः ॥१६०॥ तत्रासीत् स पुनः पित्रोरनुलङ्घितशासनः । चक्रस्त्वादाम तन्मूर्ध्नि चक्रं तत्रैवमभ्यधात् ॥१६१॥ पापिमोज्येऽपि मुच्यन्तां पृथ्व्यां तत्पातरपि । व्या पापक्षयमेतन्मे चक्रं भ्राम्यतु मूर्धनि ॥१६२॥ इत्युक्तवन्तं तं चक्रं धीरसत्त्वं नभःस्थिताः । पुष्पवृष्टिमुजो देवाः परितुष्ट्येवमब्रुवन् ॥१६३॥ साधु साधु महासत्त्व क्षान्तं कक्षणयानया । पापं ते व्रज वित्तं च तवाक्षम्यं भविष्यति ॥१६४॥ इत्युक्तवत्सु देवेषु चक्रस्य शिरसः क्षणात् । श्वायसं तस्य सचक्र जगाम क्वाप्यदर्शनम् ॥१६५॥ त्क्षमोपेत्याम्बरावेको विद्याधरकुमारकः । तुष्टेनेन्द्रप्रेषितं दत्त्वा महार्हं रत्नसञ्चयम् ॥१६६॥ मङ्के कृर्व्वथ स चक्रं नगरं धवलाभिधम् । निजं तत्प्रापयामास जगाम च यथागतम् ॥१६७॥
नवम लम्बक ३५७
नवम लम्बक ३५७ यह सुनकर उस दिन को मैंने बड़े दुःख के साथ बिताया और रात में स्वप्न के समान आये हुए एक भयंकर पुरुष को देखा ॥१५३॥ उस पुरुष ने मुझे बलपूर्वक उठाया और इस लोहे की कोठरी में लाकर पटक दिया और तब मेरे सिर पर इस घूमते हुए गरम चक्र को लगा दिया ॥१५४॥ इस प्रकार, यह मुझे मेरे माता-पिता का शाप है। मेरे प्राण ही नहीं निकल रहे हैं, यद्यपि भयंकर वेदना हो रही है। शाप की अवधि का एक मास आज पूरा होगया फिर भी मैं इस कष्ट से नहीं छूट रहा हूँ" ॥१५५॥ इस प्रकार कहते हुए लब्ध से दयालु चक्र बोला- धन के लिए द्वीपान्तर जाते हुए मैंने माता-पिता की बात नहीं मानी थी तो उन्होंने शाप दिया था कि तेरा कमाया हुआ भी धन नष्ट हो जायगा। इसी कारण द्वीपान्तर से कमाया हुआ मेरा सारा धन समुद्र में डूब गया। ॥१५६-१५७॥ यही वृत्तान्त मेरा है। अब इस जीवन से क्या लाभ है। इस चक्र को मेरे सिर पर रख दो। तुम्हारा शाप नष्ट हो' ॥१५८॥ वह जब इस प्रकार कह ही रहा था कि इतने में उसने आकाशवाणी सुनी कि 'हे लब्ध तू छूट गया। इस चक्र को चक्र के सिर पर रख दे' ॥१५९॥ यह सुनकर अपने सिर से चक्र को चक्र के सिर पर रखकर, लब्ध किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा पिता के घर ले जाया गया ॥१६०॥ अब वह अपने घर में माता-पिता की आज्ञा का पालन करता हुआ रहने लगा। उधर चक्र को सिर पर लेकर चक्र ने यह कहा- पृथ्वी पर और जो भी मेरे समान पापी हों वे पाप से छूट जाँय जबतक पापों का नाश न हो तबतक यह चक्र मेरे सिर पर घूमता रहे ॥१६१-१६२॥ इस प्रकार के धैर्यशाली चक्र पर आकाश से देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की और वे प्रसन्न होकर बोले-॥१६३॥ 'हे महापुरुष ठीक है ठीक है, तेरी इस अपार करुणा से तेरे पाप नष्ट हो गये। अब जाओ तुम्हारे पास अक्षय धन होगा ॥१६४॥ देवताओं के इस प्रकार कहने पर चक्र के सिर से वह लोहे का जलता चक्र अदृश्य हो गया ॥१६५॥ और, आकाश से उतरकर आये हुए एक विद्याधर ने इन्द्र द्वारा भेजे गये अमूल्य रत्नों का ढेर उसे दिया ॥१६६॥ और, चक्र को पोत में उठाकर, उसे उसके धवलपुर में पहुँचाकर वह विद्याधर जैसे आया था वैसे ही चला गया ॥१६७॥ ८१
६५८ कथासरित्सागर
६५८ कथासरित्सागर सोऽथ चक्रोऽन्तिकं पित्रोः प्राप्यानन्दितबान्धवः। तस्थावाख्यातवृत्तान्तस्तत्र धर्मपरिश्च्युतः॥१६८॥ इत्याख्याय महीपालं चन्द्रस्वाम्यवदत् पुनः। ईदृक्पापफलं पुत्र मातापित्रोर्विरोधनम्॥१६९॥ काममेमुस्तु सद्मभितस्तथाप्येषां कथां शृणु। गर्विणो मुनेः पतिव्रताया धर्मव्याधस्य च कथा आसीत्कोऽपि मुनिः पूर्वं वनचारी महातपाः॥१७०॥ तरुच्छायोपविष्टस्य तस्योपरि बलाकया। विष्ठा कदाचिन्मुक्ताभूत्सोऽथ क्रुद्धो ददर्श ताम्॥१७१॥ दृष्टमात्रैव सा तेन बलाका भस्मसादभूत्। तपःप्रभावाहङ्कारं स च भेजे ततो मुनिः॥१७२॥ एकदा नगरे क्वापि स ब्राह्मणगृहं मुनिः। एकं प्रविश्य गृहिणीं तत्र भिक्षामयाचत॥१७३॥ प्रतीक्षस्व मनाग्भर्तुः परिचर्यां समापये। इति तं सा च गृहिणी निजगाद पतिव्रता॥१७४॥ ततस्तं क्रुद्धया दृष्ट्या वीक्षमाणं विहस्य सा। अभाषत मुने नाहं बलाका मुच्यतामिति॥१७५॥ श्रुत्वैतत्स मुनिस्तस्याश्चक्षुर्विस्मार साऽभूत्। एतत्कथमिव ज्ञातमनयेति विचिन्तयन्॥१७६॥ ततः कृत्वानिकायर्द्धिः शुश्रूषां भर्तुरत्र सा। साध्वी भिक्षां समादाय तस्यागादन्तिकं मुनेः॥१७७॥ सोऽथ बद्धाञ्जलिर्भूत्वा मुनिस्तमब्रवत्सतीम्। कथं बलाकावृत्तान्तः परोक्षोऽपि मम त्वया॥१७८॥ ज्ञात इत्यादितो ब्रूहि भिक्षां गृह्णाम्यहं ततः। इत्युक्तवन्तं तमृषिं साबोचत् पतिवेवता॥१७९॥ न भर्तृभक्तेरपरं धर्मं कञ्चन वेद्म्यहम्। तेन मे तत्प्रसादेन विज्ञानबलमीदृशम्॥१८०॥ किं चेह धर्मव्याधस्य मांसविक्रयजीविनः। गत्वा पश्य ततः श्रेयो निरहङ्कारमाप्स्यसि॥१८१॥ एवं सर्वविदा प्रोक्तः स पतिव्रतया मुनिः। गृहीत्वातिथिभागस्तां प्रणम्य निरगात्ततः॥१८२॥
नवम लम्बक ६५१
नवम लम्बक ६५१
वह चक्र भी माता-पिता को सब वृत्तान्त सुनाकर और बन्धु-बान्धवों को आनन्दित करके अपने धर्म पर दृढ होकर रहने लगा ॥१६८॥ महीपाल को यह कथा सुनाकर कनकस्वामी ने फिर कहा-'माता-पिता के विरोध करने का तो इतना दुष्परिणाम होता है और इनकी भक्ति भी इसी प्रकार कामधेनु है। इस सम्बन्ध में भी कथा सुनो- ॥१६९-१७०॥ अहंकारी मुनि, पतिव्रता स्त्री और धर्मव्याध की कथा प्राचीन काल में वन में रहनेवाला एक महातपस्वी मुनि था। एकबार वह वृक्ष की छाया में बैठा था कि उसके सिर पर एक बगुली ने बीट कर दी तो मुनि ने क्रुद्ध होकर उसे देखा ॥१७०-१७१॥ मुनि के इस प्रकार देखते ही वह बगुली जलकर भस्म हो गई। तब मुनि को अपने तप पर अहंकार उत्पन्न होगया ॥१७२॥ एक बार वह मुनि भिक्षा के लिए नगर में एक ब्राह्मण के घर गया। वहाँ जाकर उसने गृहिणी से भिक्षा माँगी ॥१७३॥ पतिव्रता गृहिणी ने कहा-'जरा ठहरो मैं पति की सेवा समाप्त कर लूँ, तो भिक्षा दूँ ॥१७४॥ तब क्रोध-भरी दृष्टि से देखते हुए उस मुनि को देखकर वह पतिव्रता हँसकर बोली- 'मुनि मैं बगुली नहीं हूँ। प्रतीक्षा करो' ॥१७५॥ यह सुनकर वह मुनि आश्चर्य के साथ वहाँ बैठकर सोचने लगा कि इस स्त्री ने यह कैसे जान लिया ? ॥१७६॥ तब वह पतिव्रता स्त्री पति की अग्निहोत्र-सम्बन्धी सेवा समाप्त करके और भिक्षा लेकर मुनि के समीप आई ॥१७७॥ तब वह मुनि हाथ जोड़कर उस सती स्त्री से बोला-'माता तुमने अपने परोक्ष के इस बगुली के वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥१७८॥ यह प्रारम्भ से कहो तो मैं भिक्षा ग्रहण करूँगा ? इस प्रकार कहते हुए मुनि से वह पतिव्रता कहने लगी ॥१७९॥ मैं पति-भक्ति के सिवा और दूसरा धर्म नहीं जानती। अत उसी की कृपा से मुझे यह विज्ञान-बल मिला है॥१८०॥ और यहाँ मांस बेचकर जीवन-निर्वाह करनेवाला एक धर्मव्याध है उससे जाकर मिलो। इससे तुम्हें अहंकार-रहित कल्याण मिलेगा' ॥१८१॥ इस प्रकार उस सर्वज्ञ पतिव्रता से कहा गया वह मुनि भिक्षा लेकर और प्रणाम करके वहाँ से निकला ॥१८२॥
१६० कथासरित्सागर
१६० कथासरित्सागर
अन्यद्युः स मुनिर्धर्मव्याधमन्विष्य तत्र तम्। विपणिस्थमुपागच्छत् कुर्वाणं मांसविक्रयम् ॥१८३॥ धर्मव्याधश्च दृष्ट्वैव स तं मुनिमभाषत। किं पतिव्रतया ब्रह्मन्निह त्वं प्रेषितस्तया ॥१८४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितोऽवादीद्धर्मव्याधमपि स तम्। ईदृशं ते कथं ज्ञानं मांसविक्रयिणः सतः ॥१८५॥ इत्युक्तवन्तं तमृषिं धर्मव्याधो जगाद सः। मातापित्रोरहं भक्तस्तौ ममकं परायणम् ॥१८६॥ तयोः स्नापितयोः स्नामि भुञ्जे भोजिंतयोस्तयोः। शये शयितयोस्तेन ज्ञानमीदृग्विधं मम ॥१८७॥ मांसं चान्याहृतस्माहं मृगाद्वृत्तये परम्। स्वधर्मनिरतो भूत्वा विक्रीणे भार्ययार्हतः¹ ॥१८८॥ ज्ञानविघ्नममहङ्कारमहं सा च पतिव्रता। नैव कुर्वो मुने तेन निर्बाधज्ञानमावयोः ॥१८९॥ तस्मात्त्वमप्यहङ्कारं मुक्त्वा शुद्ध्य मुनिव्रतः ॥ स्वधर्मं चर येनाशु परं ज्योतिरवाप्स्यसि ॥१९०॥ इति तेनानुशिष्टश्च धर्मव्याधेन तद्गृहान्। गत्वा दृष्ट्वा च तच्चर्यां मुनिस्तुष्टो वनं ययौ ॥१९१॥ सिद्धस्तदुपदेशाच्च सोऽभूत्तावपि जग्मतुः। सिद्धिं पतिव्रताधर्मव्याधौ तद्धर्मचर्यया ॥१९२॥ एष प्रभावो भक्तानां पत्यौ पितरि मातरि। तदेहि सम्भावय तां मातरं दर्शनोत्सुकाम् ॥१९३॥ एवं पित्रा महीपाल स चन्द्रस्वामिमोदितः। प्रतिपेदे स्वदेशाय गन्तुं मात्रनुरोधतः ॥१९४॥ अनन्तस्वामिने सर्वं धर्मपित्रे निवेद्य तत्। तेनात्तमाट स ततः प्रायात्पितृसखो निशि ॥१९५॥ क्रमात् प्राप्य स्वदेशं च जननीं दर्शनेन ताम्। आनन्दयदहेवातिं मधु पिकवधूमिव ॥१९६॥
१ भार्ययालोभनेत्यर्थः। गृहो–कोशः।
नवम लम्बक १६१
नवम लम्बक १६१ दूसरे दिन वह मुनि उस नगर में धर्मव्याध को ढूँढ़कर, दूकान पर बैठे हुए और मांस बेचते हुए उससे मिला ॥१८४॥ धर्मव्याध मुनि को देखते ही बोला- क्या तुम्हें उस पतिव्रता ने भेजा है? ॥१८५॥ यह सुनकर आश्चर्य से भरा हुआ ऋषि उस धर्मव्याध से कहने लगा- मांस बेचनेवाला होकर भी तुझे इतना ज्ञान कैसे हुआ ? ॥१८६॥ इस प्रकार, पूछते हुए ऋषि से उस धर्मव्याध ने कहा- मैं एकमात्र माता-पिता का भक्त हूँ। वे ही मेरे देवता हैं॥१८६॥ उन्हें स्नान कराकर स्नान करता हूँ उनके भोजन कर लेने पर भोजन करता हूँ और उनके सो जाने पर सोता हूँ इसलिए मुझे ऐसा ज्ञान है॥१८७॥ दूसरों के द्वारा मारे गये पशुओं का मांस अपनी आजीविका के लिए बेचता हूँ। यह कार्य भी अपना धर्म (कर्त्तव्य) समझकर करता हूँ धन कमाने के लिए नहीं। मैं और वह पतिव्रता स्त्री दोनों ज्ञान के विघ्न अहंकार को पास नहीं फटकने देते। इसलिए, हम लोगों को आसानी से यह ज्ञान होजाता है॥॥१८८-१८९॥ इसलिए, तुम भी मुनियों का व्रत धारण करके अपनी शुद्धि के लिए अहंकार का परित्याग कर अपने धर्म का पालन करो। इससे तुम्हें वह परम प्रकाश प्राप्त हो जायगा ॥१९०॥ इस प्रकार उस धर्मव्याध से आविष्ट मुनि उसके साथ उसके घर गया और उसकी दिनचर्या से प्रसन्न होकर (तप के लिए) वन को गया ॥१९१॥ उनके उपदेश से मुनि ने सिद्धि प्राप्त की और मुनि की धर्मचर्या से वह पतिव्रता और व्याध भी सिद्धि को प्राप्त हुए ॥१९२॥ माता और पिता में भक्ति रखनेवालों का ऐसा चमत्कारी प्रभाव होता है, इसलिए चलो और तुम्हें देखने के लिए कालापित अपनी माता को धीरज बँधाओ' ॥१९३॥ पिता चन्द्रस्वामी से इस प्रकार कहा गया महीपाल पिता के अनुरोध से अपने देश जाने को तैयार हुआ ॥१९४॥ महीपाल ने अपने धर्मपिता से सब बातें करके और राज्य का सारा प्रबन्ध उसे सौंपकर रात्रि के समय पिता के साथ अपने देश को प्रस्थान किया ॥१९५॥ क्रमश अपने गाँव में पहुँचकर उस महीपाल ने अपनी माता को उसी प्रकार प्रसन्न किया जैसे वसन्त कोकिल को प्रसन्न करता है॥१९६॥
१६२ कथासरित्सागर
१६२ कथासरित्सागर कञ्चित्काल महीपालस्तस्थौ बान्धवसत्कृतः । तत्र मातृयुतं पित्रा वृत्तान्ताख्यायिना सह ॥१९७॥ यावत्तारापुरे तत्र तद्भार्या तु नृपात्मजा। निशाक्षये बन्धुमती श्रान्त सुप्ता व्यबुध्यत ॥१९८॥ बुद्ध्वा च स पतिं क्वापि गत विरहविह्वला। न लेभे सा रतिं क्वापि प्रासादोपवनादिषु ॥१९९॥ द्विगुणीकृतहारेण बाष्पेण रुदती परम्। आसीत् प्रलापैकभयी वाञ्छन्ती मृत्युमा सुखम् ॥२००॥ यामि कार्येण केनापि शीघ्रमेष्यामि चेति मे। स्वैरमुक्त्वैव स गतस्तन्मा पुत्रि शुचः कृथाः ॥२०१॥ इत्याश्वासविधिर्भूरिरनन्तस्वामिना ततः। मन्त्रिणाश्वासिताप्येत्य कृच्छ्रात्सा धृतिमादधे ॥२०२॥ तत प्रवृत्तिज्ञानार्थं भर्तुर्देशान्तरागतानू। पूजयन्ती सर्वदासीद्दाने सा द्विजपुङ्गवान् ॥२०३॥ तेन सङ्क्रमदत्ताख्य दीन वामागतं द्विजम्। भर्तुः पप्रच्छ सा वार्त्तामुक्त्वाभिज्ञाननामनी ॥२०४॥ ततस्तां स द्विजोऽवादीद्दृष्टो नैवविधो मया। कश्चित्तथापि देव्यत्र कार्या नैवाधृतिस्त्वया ॥२०५॥ चिरादवाप्यतेऽभीष्टसंयोगः शुभकर्मभिः। सदा च यन्मया दृष्टमाश्चर्यं वच्मि तच्छृणु ॥२०६॥ तीर्थपर्यटनह प्राप हिमाद्रौ मानस सरः। तत्रादर्शमिवापश्यमन्तर्मणिमयं गृहम् ॥२०७॥ ततोऽकस्माच्च निर्गत्य खड्गपाणिः पुमान् गुहात्। अध्यारोहत्सरस्तीरे दिव्यनारीगजान्वितः ॥२०८॥ तत्रोद्याने सह स्त्रीभि सोऽक्रीडत् पानलीलया। दूरात् सकौतुकश्चाह पश्यन्नासमलक्षितः ॥२०९॥ तावत्कुतोऽपि तत्रागात् सुभगः पुरुषोऽपरः। मिलिताय च सतस्मै यथादृष्टं मयोदितम् ॥२१०॥ दर्शितश्च स सस्त्रीक पुमान् दूरात्कुतूहलात्। तद्दृष्ट्वैव स्ववृत्तान्तमेवमाख्यातवान् मम ॥२११॥
नवम लम्बक
नवम लम्बक १६५
वह महीपाल बन्धु-बान्धवों से सत्कृत होकर समस्त वृत्तान्त सुनानेवाले पिता के साथ माता के पास कुछ दिनों तक रहा ॥१९७॥
उधर तारापुर में प्रातःकाल शयनागार में सोई हुई महीपाल की पत्नी बन्धुमती उठी ॥१९८॥
और यह जानकर कि 'उसका पति कहीं चला गया है' विरह से व्याकुल होकर महल में उद्यान में कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सकी ॥१९९॥
आंसू की धार से हार को दुहरा भारवाला बना करके दिनरात रोती हुई और उसी के नाम पर प्रलाप करती हुई वह मृत्यु में ही सुख मांगने लगी ॥२००॥
"मैं किसी कार्य से जा रहा हूँ शीघ्र ही आऊँगा' ऐसा मुझे गुप्त रूप से कहकर वह महीपाल गया है, इसलिए बेटी सोच मत करो" ॥२०१॥
इस प्रकार धीरज देनेवाले मन्त्री अनन्तस्वामी की बातों से किसी प्रकार समझाने-बुझाने पर वह धैर्य रख सकी ॥२०२॥
तब भी पति का समाचार जानने के लिए दूसरे देशों से आनेवाले ब्राह्मणों को वह सदा सत्कार आदि से सन्तुष्ट करती थी ॥२०३॥
एक बार दान लेने के लिए आये हुए संगमदत्त नामक निर्धन ब्राह्मण से उसने चिह्न और नाम बताकर पति का समाचार पूछा ॥२०४॥
तब वह ब्राह्मण उससे बोला कि मैंने ऐसा व्यक्ति कहीं देखा तो नहीं है, तो भी महारानी तुम्हें अधीर न होना चाहिए ॥२०५॥
प्रिय का समागम शुभ कार्यों के कारण विलम्ब से ही होता है। इस सम्बन्ध में मैंने जो आश्चर्य देखा है वह तुम्हें कहता हूँ सुनो ॥२०६॥
एक बार तीर्थ-यात्रा करता हुआ मैं हिमालय पर स्थित मानस-सरोवर में पहुँचा। वहाँ पर मैंने मानो काँच से बने हुए मणि से रचित एक भवन को देखा ॥२०७॥
और देखा कि उस भवन से अकस्मात् ही निकलकर तलवार हाथ में लिये हुए एक पुरुष दिव्य नारियों से युक्त होकर मानस-सर के तट पर गया और मद्यपान आदि करके उन स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करने लगा। मैं भी बड़े ही कौतुक से छिपकर उसे देख रहा था। इतने में ही वहीं कहीं से दूसरा सुन्दर पुरुष आ निकला। उसके मिलने पर मैंने जो कुछ देखा सो सब उसे सुनाया ॥२०८-२१०॥
और, उन स्त्रियों-सहित पुरुष को भी उसे दिखाया। वह देखकर उस पुरुष ने अपना वृत्तान्त मुझे इस प्रकार सुनाया—॥२११॥
३६४ कथासरित्सागर
३६४ कथासरित्सागर पुरे त्रिभुवनाख्येऽहं राजा त्रिभुवनाभिधः। तत्र मे सुचिरं सेवामेकः पाशुपतो व्यधात् ॥२१२॥ । ॥२१३॥ स पृष्टः कारणं स्वैरं बिलखङ्गप्रसाधने। सहायं प्रार्थयत मां प्रतिपन्नं मया च तत् ॥२१४॥ ततो मया सहारण्यं गत्वा होमादिना निधि। प्रकटीकृत्य विवरं स मां पाशुपतोऽभ्यधात् ॥२१५॥ वीर प्रविश पूर्वं त्वं खड्गं प्राप्य च मामपि। प्रवेशयेस्त्वं निर्गत्य समयं चात्र मे कुरु ॥२१६॥ इत्युक्तस्तेन तस्याहं कृत्वा समयमाशु तत्। प्रविश्य विवरं प्रापमेकं रत्नमयं गृहम् ॥२१७॥ ततो निर्गत्य मां चैका प्रधानासुरकन्यका। अन्तः प्रावेशयत्प्रेम्णा प्रादात्खड्गं च सात्र म् ॥२१८॥ सर्वसिद्धिप्रदमिमं खड्गं खगतिदायिनम्। रक्षेत्युक्तवत्याहं तया तत्रावस सह ॥२१९॥ स्मृत्वाथ खड्गहस्तोऽहं निर्गत्य विवरेण तम्। प्रावेशयं पाशुपतं तस्मिन्नसुरमन्दिरे ॥२२०॥ सप्ताहमभव्या साकं तया सपरिवारया। सोऽपि द्वितीयया साकमासीदसुरकन्यया ॥२२१॥ एकदा पानमत्तस्य स मे पाशुपतःक्रमात्। हृत्वा पार्श्वस्थितं खड्गमकरोन्निजहस्तगम् ॥२२२॥ तस्मिन् हस्तस्थिते लब्धमहासिद्धिः स पाण्डितः। मामादायैव निष्कास्य विवरात् प्राक्षिपद्बहिः ॥२२३॥ ततो द्वावशवर्षाणि मया बिलमुखेषु सः। गवेषितः कदाचित् निर्गतं प्राप्नुयामिति ॥२२४॥ सोऽयमद्येह मे दृष्टिपथे निपतितः शठः। मदीययैतया साकं श्रीलक्षसुरकन्यया ॥२२५॥ इति यावत्त्रिभुवन स राजा वेत्रि ब्रक्ति माम्। तावत्पानमदाभिद्रामगात्पाशुपतोऽत्र सः ॥२२६॥
नवम लम्बक ६६५
नवम लम्बक ६६५ त्रिभुवनपुर नामक नगर में मैं त्रिभुवन नाम का राजा था। वहीं पर एक पाशुपत (शैव) ने बहुत दिनों तक मेरी सेवा की ॥२१२॥ २१३वां श्लोक त्रुटित है ॥२१३॥ एकबार मैंने एकान्त में उसकी सेवा का कारण पूछा तो उसने गुफा-स्थित खड्ग (तलवार) की सिद्धि के लिए मेरी सहायता माँगी और मैंने उसे स्वीकार भी किया ॥२१४॥ तब उसने मेरे साथ जंगल में जाकर रात्रि में हवन आदि करके एक गुफा प्रकट की और मुझसे कहा—॥२१५॥ 'हे वीर, पहले इस गुफा में प्रवेश करो। प्रवेश करने पर तुम्हें एक खड्ग मिलेगा। तब तुम बाहर निकलकर मुझे भी अन्दर ले जाना। मेरे साथ प्रतिज्ञा करो ॥२१६॥ उसके इस प्रकार कहने पर मैं प्रतिज्ञा करके उसके साथ उस बिल में घुसा और वहाँ जाकर मैंने रत्नों से बना एक भवन देखा ॥२१७॥ तब उस भवन से निकलकर एक असुर-कन्या मुझे प्रेम से अन्दर ले गई और वहाँ पर उसने मुझे एक खड्ग प्रदान किया ॥२१८॥ और कहा यह खड्ग सब सिद्धियों को देनेवाला तथा आकाश में गति प्रदान करनेवाला है। भली भाँति इसकी रक्षा करना। ऐसा कहती हुई उसके साथ मैं वहीं रहा ॥२१९॥ तदनन्तर, पाशुपत के साथ की गई प्रतिज्ञा स्मरण करके खड्ग हाथ में लिये हुए मैं उस बिल से बाहर निकला और मैं अपने साथ उस पाशुपत को भी उस असुर-मन्दिर में ले गया ॥२२०॥ उस मन्दिर में पहली असुर-कन्या के साथ मैं और दूसरी असुर-कन्या के साथ वह पाशुपत रहने लगा ॥२२१॥ एक बार मद्यपान से मत्त पाशुपत ने मेरी बगल में रखे हुए खड्ग को अपने हाथ में कर लिया। उस खड्ग के हाथ आते ही उस पाशुपत को महान् सिद्धि प्राप्त हुई और उसने मुझे हाथ से पकड़कर उस बिल से बाहर फेंक दिया ॥२२२-२२३॥ तब मैं बारह वर्षों तक बिल के बाहर उसकी प्रतीक्षा करता हुआ बैठा रहा कि कभी वह बाहर निकले और मैं उसे पकडूँ ॥२२४॥ सो वह दुष्ट आज मेरी ही असुर-कन्या के साथ क्रीड़ा करता हुआ दीख पड़ा है ॥२२५॥ हे देवि राजा त्रिभुवन जब मेरे साथ वार्तालाप कर ही रहा था कि इतने में ही मद्य के नशे में विह्वल पाशुपत पुरुष सो गया ॥२२६॥ ८४
२६ कथासरित्सागर
२६ कथासरित्सागर सुप्तस्य तस्य गत्वथ पार्श्वान्खड्गं तमग्रहीत्। स राजा तेन भूयश्च प्रभावं दिव्यमाप्तवान्॥२२७॥ ततः पाशुपतं पादप्रहारेण प्रबोध्य तम्। निरभर्त्सयदवापच्च स वीरो नावधीत्सुतम्॥२२८॥ प्राविशच्चासुरं पुरं सपरिच्छदया तया। प्राप्तया स स्वया सार्धं सिद्धयवासुरकन्यया॥२२९॥ स च पाशुपतः सिद्धेर्भ्रष्टः कष्टमगात् परम्। कृतघ्नाश्चिरसिद्धार्था अपि भ्रश्यन्ति हि ध्रुवम्॥२३०॥ एवत्साक्षाद्विलोक्यैवाहमिह प्राप्तः परिभ्रमन्। तद्देवि प्रियसंगमस्तव भावी चिरादपि॥२३१॥ यथा त्रिभुवनस्याभूच्छुभङ्कन्नहि सीदति। इति तस्माद्द्विजाच्छ्रुत्वा सोप धन्धुमती ययौ॥२३२॥ चकार च कृतार्थं तं विप्रं दत्त्वा धनं बहु। अन्यद्युश्च द्विजोऽपूर्वस्तमागाद्दूरदेशजः॥२३३॥ तं च बन्धुमती सोत्का प्रोक्ताभिज्ञाननामका। भर्तुर्वार्त्तामपृच्छत्सा सोऽथ तां ब्राह्मणोऽभ्यधात्॥२३४॥ न स देवि मया दृष्टस्त्वद्भर्त्ता क्वापि किं त्वहम्। अन्वर्थं सुमनोनामा तवाद्य गृहमागतः॥२३५॥ तदाशु सौभगस्य ते भावीत्याख्याति मे मनः। भवत्येव च संयोगश्चिरविश्लेषिणामपि॥२३६॥ तथा च कथयाम्येतामत्र देवि कथां शृणु। नलदमयन्तीकथा निषधाधिपती राजा नलो नामाभवत्पुरा॥२३७॥ यस्य रूपेण विजितः कामो मन्येऽब्रमागतः। कोपितत्रिपुरारातिनेत्राग्नावजुहोत्तनुम् ॥२३८॥ तेनाभार्य्येण सदृशी भार्याद्यापि विचिन्वता। दमयन्तीति भीमस्य विदर्भाधिपतेः सुता॥२३९॥ १ अत्रोल्लिखिता नलकथा महाभारतविधेनितकथातो किञ्चिदिव भिन्ना विलोक्यते।