कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
षष्ठम लम्बक १४१
षष्ठम लम्बक १४१ मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा कहकर नरवाहनदत्त के लिए फिर यह दूसरी कथा कहने लगा ॥४४॥ बोधिसत्त्व का अंशावतार कोई व्यक्ति किसी वन में पर्णकुटी बनाकर करुणा में सदा एकाग्रचित्त होकर तपस्या करता हुआ रहता था ॥४५॥ वह उस वन में विपद्ग्रस्त प्राणियों और पिपासुओं का उद्धार करता हुआ वन्याश्रय प्राणियों की जल और अन्न से सेवा करता था ॥४६॥ एक बार, दूसरे के उपकार के लिए, जंगलों में घूमते हुए उसने एक भारी कुँआ देखा और उसके भीतर झाँका ॥४७॥ तब उसके भीतर पड़ी हुए एक स्त्री उसे देखकर जोर से बोली—'हे महात्मन्, मैं (स्त्री) सिंह, स्वर्णचूड़ पक्षी और सर्प इस प्रकार हम चार व्यक्ति रात को इस कुएँ में गिर पड़े हैं। अतः कृपाकर हम चारों को निकालो ॥४८-४९॥ यह सुनकर वह महात्मा उस स्त्री से बोला—'तुम तीनों यदि अँधेरे में न दीख पड़ने के कारण गिर पड़े हो तो ठीक है, परन्तु यह पक्षी कैसे गिरा ? ॥५०॥ 'बहेलिये के जाल से बँधा हुआ यह पक्षी भी इसी तरह गिरा'—इस प्रकार उस स्त्री ने उत्तर दिया ॥५१॥ तब उस महात्मा ने अपनी तपस्या के बल से उन्हें ऊपर लाना चाहा, किन्तु वह ऐसा न कर सका। उसकी वह सिद्धि नष्ट हो गई ॥५२॥ 'यह स्त्री पापिनी है, अवश्य ही इससे बात करने से मेरी सिद्धि नष्ट हुई है, अतः दूसरी युक्ति करता हूँ'—यह सोचकर उस महात्मा ने घासों से रस्सी बटकर, उसके द्वारा अपनी दृढमत्ता साबित करते हुए उन सबको कुएँ से बाहर निकाला ॥५३-५४॥ तदनन्तर, आश्चर्य के साथ उसने सिंह, पक्षी और सर्प से पूछा—'तुम्हारी वाणी मनुष्यों के समान क्यों स्पष्ट है और तुम्हारी यह स्थिति क्यों है? बताओ। तब उनमें पहले सिंह बोला—पूर्व जन्म का स्मरण करनेवाले तथा एक-दूसरे के बाधक हम चारों की बात क्रमसे सुनो ॥५५-५६॥ सिंह की आत्म-कथा यह कहकर सिंह ने अपनी कथा शुरू की। हिमालय पर्वत पर वैदूर्यभूम नाम का एक उत्तम नगर है। वहाँ पद्मवेग नाम का विद्याधरों का राजा है। उसको वज्रवेग नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७-५८॥
१४२ कथासरित्सागर
१४२ कथासरित्सागर स वज्रवेगोऽहङ्कारी विरोधं येन केनचित्। साकं शौर्यमदान्चक्रे लोके विद्याधरे वसन् ॥५९॥ निषेधतः पितुस्तस्य यदा नागणयद्वचः। तदा पिता तमशपन्मर्त्यलोके पतति सः॥६०॥ ततो नष्टमदो भ्रष्टविद्यः शापहतो रुदन्। वज्रवेगः स पितरं शापान्तं तमयाचत ॥६१॥ तत स तत्पिता पद्मवेगो ध्यात्वाऽब्रवीत् क्षमात्। भुवि विप्रसुतो भूत्वा कृत्वाप्यत्र भव पुनः॥६२॥ पितुः शापात् ततः सिंहो भूत्वा कूपे पतिष्यसि। महासत्त्वश्च कृपया कश्चित् त्वामुद्धरिष्यति ॥६३॥ तस्य प्रत्युपकारं च विधायापदि मोक्ष्यसे। शापादस्मादिति पिता शापान्तं तस्य स व्यधात् ॥६४॥ अथेह वज्रवेगोऽसौ विप्रस्याजनि माठरे। हरधोपाभिधानस्य देवधोपाभिधः सुतः॥६५॥ स तत्राप्यकरोद्वैरं बहुभिः शौर्यगर्वितः। बहुभिर्मा कृथा वैरमिति तं चावदत् पिता ॥६६॥ अकुर्वाणं वचस्तस्य शप्तवान् स पिता क्रुधा। शौर्याभिमानी दुर्बुद्धे सिंहस्त्वं भव साम्प्रतम् ॥६७॥ एवं तस्य पितुः शापाद्देवधोपः पुनश्च सः। विद्याधरावतारः सन् सिंहो जातोऽत्र कानने ॥६८॥ तमिमं विद्धि मां सिंहं सोऽहं दैवाद् भ्रमन्क्षितौ। कूपेऽद्य पतितोऽमुष्मिन् महासत्त्वोद्धृतस्त्वया ॥६९॥ तद्यामि तावदापन्नं यदा स्यात् क्वापि ते सखा। मां स्मरेरुपकारं ते कृत्वा मोक्ष्ये स्वशापतः ॥७०॥ इत्युदीर्य गते सिंहे बोधिसत्त्वेन तेन सः। पृष्टः सुवर्णचूलोऽथ पक्षी स्वोदन्तमभ्यधात् ॥७१॥ स्वर्णचूडपक्षिण आत्म कथा अस्ति विद्याधराधीशो वज्रदंष्ट्रो हिमाचले। तस्य दम्भाभजायन्त पञ्च कन्या निरन्तराः ॥७२॥
दशम लम्बक १४३
दशम लम्बक १४३ वह वज्रवेग उस विद्याधरनगर में रहता हुआ अपने बल के घमंड से जिस किसी के साथ वैर-विरोध कर लेता था ॥५९॥ पिता के बार-बार मना करने पर भी जब उसने उसकी बात नहीं मानी तब उसके पिता ने उसे शाप दिया कि 'तू मर्त्यलोक में जाकर गिर' ॥६०॥ तब वह मदहीन और विद्या रहित होकर रोता हुआ वज्रवेग अपने पिता से शाप का अन्त करने के लिए प्रार्थना करने लगा ॥६१॥ तब उसके पिता ने क्षणभर सोचकर कहा—'पृथ्वी पर, ब्राह्मण का पुत्र बनकर और वहाँ भी इसी प्रकार मद करने के कारण पुनः पिता के शाप से सिंह बनकर कुएँ में गिरेगा। तब आकर जो महात्मा तुझे निकालेगा उसका प्रत्युपकार करके तू शापमुक्त हो जायगा ऐसा कह कर पिता ने उसके शाप का अन्त बतलाया ॥६२-६४॥ तदनन्तर, वह वज्रवेग मालव देश में हरघोष नामक ब्राह्मण के घर में देवघोष इस नाम से उत्पन्न हुआ। वहाँ भी उसने अपने बल के घमंड से बहुतों के साथ विरोध किया। उसके पिता ने रोका कि 'बहुतों के साथ विरोध न करो' ॥६५-६६॥ किन्तु, उसकी बात न माननेवाले पुत्र को पिता ने शाप दिया कि 'हे बल के घमंडी दुष्टबुद्धि जा अब तू सिंह बन जा' ॥६७॥ तब पिता के शाप से वह देवघोष जो विद्याधर का अवतार था इस वन में सिंह बन गया ॥६८॥ मुझे वही सिंह समझो। दैवयोग से वन में घूमता हुआ मैं रात को इस कूप में गिरा और आज तुझ महात्मा से उबारा गया ॥६९॥ इसलिए, अब मैं जाता हूँ। तुम्हें कहीं पर भी कोई विपत्ति आवे तो मुझे स्मरण कर लेना। उस समय तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शापमुक्त हो जाऊँगा ॥७०॥ ऐसा कहकर सिंह के चले जाने पर उस बोधिसत्त्व से पूछा गया सुवर्णचूड पक्षी अपना वृत्तान्त कहने लगा ॥७१॥ सुवर्णचूड पक्षी की आत्म कथा हिमालय पर वज्रदंष्ट्र नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी से यथावार पाँच कन्याएं उत्पन्न हुईं ॥७२॥
९४४ कथासरित्सागर
९४४ कथासरित्सागर
ततः स हरमाराध्य तपसा प्राप्तवान् सुतम्। राजा रजतदंष्ट्राख्यं जीवितादधिकप्रियम् ॥७३॥ स तेन पित्रा बालोऽपि विद्याः स्नेहेन लम्भितः। वृद्धिं रजतदंष्ट्रोऽथ बन्धुनेत्रोत्सवो ययौ ॥७४॥ एकदा भगिनीं ज्येष्ठां नाम्ना सोमप्रभां च सः। गौर्या पुरः पिञ्जरकं वादयन्तीमवेक्षत ॥७५॥ देहि पिञ्जरकं मह्यं वादयाम्यहमप्यथ। इत्ययाचत तां सोऽथ बालत्वादन्वबध्नत ॥७६॥ सा तन्नादात्तदा तस्मै तया धापल्लत' स्वयं। तस्यास्तत् सोऽपहृत्यैव पक्षीवोदपतन्नभः ॥७७॥ साथ स्वसा तमशपत्तन्मे पिञ्जरक हठात्। धृत्वोड्डीनोऽसि तत्पक्षी स्वर्णचूलो भविष्यसि ॥७८॥ तच्छ्रुत्वा पादपतितेनेय सा तेन याचिता। स्वसा रजतदंष्ट्रण तस्य शापान्तमब्रवीत् ॥७९॥ पक्षी भूत्वान्धकूपे त्व यदा मूढ पतिष्यसि। उद्धरिष्यति कश्चिन्च तदा त्वां करुणापरः ॥८० ॥ तस्य कृत्वोपकारार्थं शापमन्त तरिष्यसि। इत्युक्तः स तया भ्राता स्वर्णचूलः खगोऽजनि ॥८१॥ स एव स्वर्णचूलोऽह पक्षी भ्रष्टोऽभ्रटे निधि। इहोद्धृतोऽस्मि भवता तदिदानीं व्रजाम्यहम् ॥८२॥ आपदि त्वं स्मरमां च तव कृत्वा ह्युपक्रियाम्। शापान् मोक्ष्यद्युमिस्युक्त्वा सोऽपि पक्षी ययौ तत' ॥८३॥ तत स दाधिखस्तेन तन पृष्टा भुजङ्गम। स्वोदन्त कथयामास तस्मायत्र महारमने ॥८४॥
सर्पस्यात्मकथा
पुरा मुनिकुमाराऽहमभूय कश्यपाथमे। अभवतय चैको मे वयस्यो मुनिपुत्रकः ॥८५॥ एकदा पावतीजेंऽस्मिन् सट स्नातुं वयस्यके। तटस्थिताञ्जुमद्राक्ष त्रिकण मपमागतम् ॥८६॥
द्वादश लम्बक १४५
द्वादश लम्बक १४५ तब उसने शिवजी की तपस्या करके एक बालक प्राप्त किया। राजा ने जीवन से भी अधिक प्यारे उस बालक का नाम रजतदंष्ट्र रख दिया ॥७३॥ पिता ने बाल्यरूप में ही स्नेह के कारण उसे सभी विद्याएँ सिखा दीं और बन्धुओं की आँखों का तारा वह रजतदंष्ट्र क्रमशः बड़ा हुआ ॥७४॥ एक बार, उसने अपनी बड़ी बहन सोमप्रभा को गौरी के सामने पिञ्जरक नाम का बाजा बजाते हुए देखा ॥७५॥ 'बहन यह पिञ्जरक मुझे दो मैं भी बजाऊँ—इस प्रकार बाल-हठ के कारण बाजा माँगते हुए उसे जब बहन ने बाजा नहीं दिया तब वह चंचलता के कारण उसकी बीन छीनकर पक्षी के समान आकाश में उड़ गया ॥७६-७७॥ तब उसकी बहन ने उसे शाप दिया कि 'तू मेरे पिञ्जरक को हठपूर्वक लेकर पक्षी के समान उड़ा इसलिए तू स्वर्णचूड़ पक्षी बनेगा' ॥७८॥ यह सुनकर उसके चरणों पर गिरे हुए भाई रजतदंष्ट्र द्वारा प्रार्थना की गई सोमप्रभा ने उसके शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥७९॥ 'मूर्ख तू पक्षी बनकर जब अँधेरे कुएँ में गिरेगा तब तुझे जो भी दयालु उससे बाहर निकालेगा उसका उपकार करने पर तेरे शाप का अन्त होगा बहन से इस प्रकार कहा गया वह भाई रजतदंष्ट्र स्वर्णचूड़ पक्षी के रूप में उत्पन्न हुआ ॥८०-८१॥ यह वही मैं स्वर्णचूड़ पक्षी रात को इस कूप में गिरा हुआ आज तुझ महात्मा द्वारा निकाला गया हूँ सो अब मैं जाता हूँ ॥८२॥ 'संकट के समय तुम मुझे स्मरण करना। तब तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शाप से मुक्त हो जाऊँगा' ऐसा कहकर वह पक्षी चला गया ॥८३॥ तदनन्तर बोधिसत्त्व से पूछे गये सर्प ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार सुनाया ॥८४॥ सर्प की आत्मकथा मैं पूर्वजन्म में कश्यप ऋषि के आश्रम में मुनिकुमार था। वहाँ एक मुनिकुमार मेरा मित्र था ॥८५॥ एक बार स्नान के लिए सरोवर में उतरने पर मैंने तीर पर आये हुए तीन फना वाले एक सर्प को देखा ॥८६॥ १९०
१४६ कथासरित्सागर
१४६ कथासरित्सागर तेन भीषयितुं तं च वयस्यं नर्मणा मया। उत्ससर्जूरगस्तटान्ते स वंशो मन्त्रबलाद्बहिः॥८७॥ क्षणात् स्नात्वा तटं प्राप्तो मध्यस्थो विलोक्य सः। अशङ्कितं महाहिं च त्रस्तो मोहमुपागमत्॥८८॥ चिरादाश्वसितः सोऽथ मया ध्यानावधृत्य तत्। मत्कृतं त्रासनं कोपाच्छपति स्म सखापि माम्॥८९॥ गच्छेदृगेव त्रिफणः सर्पो भव महानिति। अनुनीतोऽथ शापान्तमृषिपुत्रः स मेऽब्रवीत्॥९०॥ सर्पीभूतश्च्युतं कूपे योऽसौ त्वामुद्धरिष्यति। तस्योपकृत्यावसरे शापमुक्तो भविष्यसि॥९१॥ इत्युक्तेनैव गते तस्मिन्नपोऽहं सर्पतां गतः। उद्धृतोऽस्मि त्वया चाद्य कूपात्तद्यामि सम्प्रति॥९२॥ स्मृतश्चैषोपकारं ते कृत्वा मोक्ष्य स्वशापतः। इत्युक्त्वा भुजगे याते स्त्री स्ववृत्तमवर्णयत्॥९३॥ दुष्टस्त्रिय आत्मकथा अह क्षत्रियपुत्रस्य भार्या राजोपसेविनः। शूरस्य रूपिणो मूनरुचारुरूपस्य मानिनः॥९४॥ कृतोऽन्यपुरुषासङ्गो मया तदपि पापया। तद्विज्ञाय स भर्त्ता मे निग्रहायाकरोन्मतिम्॥९५॥ सखीमुखाच्च तद्बुद्ध्वा तदवाहं पलायिता। रात्रौ वनं प्रविष्टैव कूपभ्रष्टोद्धृता त्वया॥९६॥ स्वत्प्रसादादिदानीं च गत्वा जीवामि कुत्रचित्। भूयात्तन्मे दिनं यत्र कुर्यां ते प्रत्युपक्रियाम्॥९७॥ इत्युक्त्वा बोधिसत्त्वं तं कुलटा निकटासतं। गोत्रवर्धनसञ्ज्ञस्य राज्ञः सा नगरं ययौ॥९८॥ तस्य सङ्गतिमुत्पाद्य परिवारजनैः सह। तस्यौ राजमहादेव्या दासीभावाश्रयेण सा॥९९॥ तस्यापि बोधिसत्त्वस्य तस्याः सम्भाषणात् स्त्रियाः। नाचिरासीद्वने नष्टसिद्धमूलफलादिकम्॥१००॥
दशम लम्बक १४७
दशम लम्बक १४७ तब मैंने स्नान करनेवाले अपने मित्र को हास्य-विनोद से डराने के लिए उस सर्प को मन्त्र के बल से किनारे पर बाँध दिया ॥८७॥ स्नान करके तुरन्त किनारे पर आया हुआ मित्र निश्चल बैठे हुए उस सर्प को सहसा देखकर मूर्च्छित हो गया ॥८८॥ मैंने ध्यान से यह जानकर चिरकाल के पश्चात् मित्र को चेतन किया। तब मेरे द्वारा डराये गये उसन मित्र ज्ञान पर भी क्रोध से मुझे शाप दिया ॥८९॥ 'जा तू भी ऐसा ही तीन फणोवाला साँप हो जा। मेर अनुनय-विनय पर उस मित्र ने मेरे शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥९०॥ साप बनकर कूँएँ में गिरे हुए तुझे जो उबारेगा समय पर उसी का उपकार करके तू शाप मुक्त होगा' ॥९१॥ इस प्रकार सर्प बने और कुएँ में गिरे हुए मुझे तुमने निकाला है। अब मैं जाता हूँ। तुम्हारे स्मरण करने पर प्रत्युपकार करके मैं शाप से छूट जाऊँगा' ऐसा कहकर सर्प के चले जाने पर उस स्त्री ने अपना वृत्तान्त सुनाया ॥९२-९३॥ दुष्टा स्त्री की आत्मकथा मैं राजा के सेवक एक क्षत्रिय-पुत्र की भार्या हूँ। मेरा पति शूरवीर और त्यागी है। युवा है, सुन्दर और आत्ममानी है ॥९४॥ तो भी पापिनी मैं ने दूसरे पुरुष का प्रणय कर लिया। यह जानकर मेरे पति ने मुझे मारने का विचार किया ॥९५॥ अपनी एक सहेली से यह जानकर उसी समय मैं घर से भागी और रात को इस बन में प्रवेश करके इस कुएँ में गिरी और तुमसे उबारी गई ॥९६॥ अब तुम्हारी ही कृपा से कहीं जाकर जीवन बिताती हूँ और वह दिन भी आय कि मैं आपका प्रत्युपकार कर सकूँ। —बोधिसत्त्व से ऐसा कहकर वह दुष्टा वहाँ से घोषकर्दम नामक राजा के नगर को गई और उसके परिवारवालों से मित्रता करके राजा की महारानी के पास सेविका बनकर रहने लगी ॥९७-९९॥ उस स्त्री के साथ भाषण करने से उस बोधिसत्त्व की सिद्धि नष्ट हो जाने के कारण उस बन में फल-मूलों की भी उत्पत्ति नष्ट हो गई ॥१००॥
ततः क्षुत्तृष्णया क्लान्तः प्राक्तं सिंहं समस्मरत्। स्मृतागतः स चैतस्य व्यधाद्वृत्तिं मृगामिषैः ॥१०१॥ कञ्चित्कालं स तन्मांसैः प्रकृतिस्थं विधाय तम्। केसरी सोऽब्रवीत् क्षीणः सशापो मे व्रजाम्यहम् ॥१०२॥ इत्युक्त्वा सिंहतां मुक्त्वा भूत्वा विद्याधरश्च सः। जगाम तदनुज्ञातस्तमामन्त्र्य निजं पदम् ॥१०३॥ ततः स बोधिसत्त्वांशो वृत्तिम्लानः पुनः खगम्। सस्मार स्वर्णचूडं तमुपागात् सोऽपि तत्स्मृतः ॥१०४॥ आवेदितार्तिस्तेनाऽसौ गत्वानीय खगः क्षणात्। रत्नाभरणसम्पूर्णां ददौ तस्मै करण्डिकाम् ॥१०५॥ उवाच चैतेनार्थेन वृत्तिः स्याच्छाश्वती तव। मम जातश्च शापान्तः स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥१०६॥ इत्युक्त्वा सोऽपि भूत्वैव विद्याधरकुमारकः। स्वलोकं नभसा गत्वा प्राप राज्यं निजात् पितुः ॥१०७॥ सोऽपि रत्नानि विक्रेतुं बोधिसत्त्वः परिभ्रमन्। तत्प्राप नगरं यत्र सा स्त्री कूपोद्धृता स्थिता ॥१०८॥ तत्रैकस्याश्च वृद्धाया ब्राह्मण्या विजने गृहे। निधाय तान्याभरणान्यापणं यावदेति सः ॥१०९॥ तावद्ददर्श तामेव वने कूपात् समुद्धृताम्। स्त्रियं सम्मुखमायान्तीं सापि स्त्री पश्यति स्म तम् ॥११०॥ सम्भाषणे श्रुतान्योन्यमथ सा स्त्री कथाक्रमात्। स्वं राजमहिषीपार्श्वस्थितमस्मै न्यवेदयत् ॥१११॥ सोऽपि पृष्टस्ववृत्तान्तस्तया सत्यं शशंस ताम्। रत्नाभरणसम्प्राप्तिं स्वर्णचूडखगाद्बहु ॥११२॥ नीत्वा चाभरणं तस्मै वृद्धावदमन्यदर्शयत्। सापि गत्वा शठा राज्ञ्यै स्वस्वामिन्यै शशंस तत् ॥११३॥ तस्याश्च राज्ञ्या गृहान्तः स्वर्णचूलेन पक्षिणा। नीतं छलेन पश्यन्त्या एवाभरणभाण्डकम् ॥११४॥ तच्च सा स्वपुरप्राप्तं राज्ञी तस्या मुखात् स्त्रियाः। श्रुत्वा विदिततच्छाया राजानं तं न्यजिज्ञपत् ॥११५॥
षष्ठम लम्बक १४९
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तब (फल मूल आदि के अभाव में) भूख से मूच्छित बोधिसत्त्व ने सबसे पहले सिंह का स्मरण किया। स्मरण करते ही आये हुए सिंह ने मृगों का मांस लाकर बोधिसत्त्व का जीवन- निर्वाह किया ॥१११॥ कुछ समय तक मांस खिलाकर उस महात्मा को स्वस्थ बनाकर सिंह ने कहा—'अब मेरा शाप नष्ट हो गया मैं जाता हूँ' ॥११२॥ ऐसा कहकर वह सिंह शरीर का त्यागकर विद्याधर हो गया और महात्मा से आज्ञा लेकर उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को गया ॥११३॥ उसके चले जाने पर भोजन के अभाव से म्लान उस बोधिसत्त्व ने स्वर्णचूड़ का स्मरण किया और स्मरण करते ही वह उसके पास उपस्थित हो गया ॥११४॥ महात्मा द्वारा उसे अपनी पीड़ा बताने पर, उस पक्षी ने तुरन्त जाकर रत्नों से जड़े आभूषणों से भरी एक पिटारी लाकर उसे दी ॥११५॥ और बोला—'इतने धन से सदा के लिए तुम्हारा जीवन-निर्वाह चलेगा। अब मेरे शाप का अन्त हो गया तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ॥११६॥ ऐसा कहकर और विद्याधरकुमार बनकर वह अपने लोक को चला गया और जाने पर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया ॥११७॥ वह बोधिसत्त्व भी उन रत्नों को बेचने के लिए घूमता हुआ उसी नगर में जा पहुँचा जहाँ वह कुएँ से निकाली हुई स्त्री रानी की दासी के रूप में काम कर रही थी ॥११८॥ उस नगर में जाकर बोधिसत्त्व ने एकान्त में एक वृद्धा के घर में रत्न आभूषणों को रख दिया और उनमें से कुछ लेकर वह बाजार में बेचने के लिए गया ॥११९॥ उसने बाजार में जाते हुए सामने से आती हुई उस स्त्री को देखा जिसे उसने कूप से निकाला था। परस्पर बात होने पर उस स्त्री ने अपने को महारानी की दासी बतलाया ॥१२०-१२१॥ उसके द्वारा अपना हाल-समाचार पूछने पर उस सरल महात्मा ने स्वर्णचूड़ पक्षी से रत्नों से मण्डित आभूषणों का प्राप्त होना बताया और उस वृद्धा के घर में ले जाकर आभूषण भी दिखा दिये उस दुष्टा ने जाकर अपनी स्वामिनी से सब कह दिया। सुवर्णचूड़ पक्षी ने उस रानी के घर के भीतर से उसके हँसते-खेलते गहनों की पेटी छत से उठा ली थी। उस पिटारी को फिर उस स्त्री के द्वारा अपने नगर में आई हुई जानकर रानी ने राजा से कह दिया ॥१२२-१२५॥
१५ कथासरित्सागर
१५ कथासरित्सागर राजापि बोधिसत्त्वं स दर्शितं कुस्त्रिया तया। आनाययत् साभरणं भृत्यैर्बद्ध्वा गुहातस्तत् ॥११६॥ परिपृच्छ्य च वृत्तान्तं सत्यं मत्वापि तद्वचः। स्थापयामास बद्धं तं गृहीत्वाभरणान्यपि ॥११७॥ स बन्धस्थोऽत्र सस्मार बोधिसत्त्वो भुजङ्गमम्। ऋषिपुत्रावतारं समुपतस्थे च सोऽपि तम् ॥११८॥ दृष्ट्वा च तं स पृष्टाथ सर्पं साधुमभाषत। गत्वाऽङ्गे वेष्टयाम्येतमामूर्धान्तं महीपतिम् ॥११९॥ न च मुञ्चाम्यमुं यावदागत्योक्तोऽस्मि न त्वया। मोक्ष्याम्यहं नृपं सर्पादिति त्वं च वदेरिह ॥१२०॥ त्वय्यागते त्वद्वचसा मोक्ष्याम्यहमतो नृपम्। संमुक्तश्चैष राजा ते स्वराज्यर्धं प्रदास्यति ॥१२१॥ इत्युक्त्वा तं स गत्वैव परिवेष्टितवानहिः। राजानमास्त चैतस्य मूर्ध्नि कृत्वा फणत्रयम् ॥१२२॥ हा हा दष्टोऽहिना राजेत्याक्रन्दति जनश्च सः। बोधिसत्त्वोऽब्रवीद्रक्षाम्यहं नृपमहरिति ॥१२३॥ श्रुतवद्भिश्च तद्राज्ञे विज्ञप्तं सोऽनुजीविभिः। आनाय्य बोधिसत्त्वं तं सर्पाक्रान्तोऽब्रवीन्नृपः ॥१२४॥ यदि मां मोचयस्यस्मात् सर्पात् तस्मै वदाम्यहम्। राज्यार्धमन्तरस्थाश्च तत्रत मन्त्रिणोऽत्र मे ॥१२५॥ तं दृष्ट्वा बाढमित्युक्ते मन्त्रिभिः स जगाद तम्। भुजङ्ग याहिमत्स्यागा मुञ्च राजानमाद्यिति ॥१२६॥ ततस्तेनाहिना मुक्तो राज्यार्धं नृपतिर्ददौ। स तस्मै बोधिसत्त्वाय सोऽपि स्वस्थोऽभवत् क्षणात् ॥१२७॥ संपदश्च क्षणेनाप मन् भूत्वा मुनिकुमारकः। सन्मन्त्र्याख्यातवृत्तान्तो जगाम निजमाश्रमम् ॥१२८॥ एवं निश्चितमभ्येति शुभमेव शुभात्मनाम्। एष पाशिक्रमो नाम वक्तव्यो महतामपि ॥१२९॥ अविज्ञाताशयं चैव स्त्रीणां शृण्वन्ति नाशताम्। प्राप्तान्तान्तर्गताञ्छीघ्रं किं नामाभवदुच्यते ॥१३०॥
दशम लम्बक १५१
दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिनन्दन के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा-'मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९॥ जबतक तुम आकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२०॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये ॥१२२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा- मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा-॥१२४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा लो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं ॥१२५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा-'राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तियों को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२९॥ अविश्वास की खान स्त्रियों के हृदय में प्राण देने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१३०॥
९५ कथासरित्सागर
९५ कथासरित्सागर
राजापि बोधिसत्त्वं तं दर्शितं कुस्त्रिया तया । आनावयत् साभरणं भृत्यैर्बन्धेवा गृहातस्त ॥११६॥ परिपृच्छंश्च च वृत्तान्तं सत्यं मत्वापि तद्वचः । स्थापयामास बद्धं तं गृहीत्वाभरणान्यपि ॥११७॥ स बन्धस्थोऽथ सस्मार बोधिसत्त्वो भुजङ्गमम् । ऋषिपुत्रावतारं तमृपतस्थे च सोऽपि तम् ॥११८॥ दृष्ट्वा च तं स पृष्टार्थः सर्पः साधुमभाषत । गत्वाऽहं वेष्टयाम्येतमामूर्धान्तं महीपतिम् ॥११९॥ न च मुञ्चाम्यमुं यावदागत्योक्तोऽस्मि न त्वया । मोक्ष्याम्यहं नृपं सर्पादिति स्वं च वदेरिह ॥१२०॥ त्वय्यागते त्वद्वचसा मोक्ष्याम्यहमतो नृपम् । मन्मुक्तश्चथ राजा ते स्वराज्यर्धं प्रदास्यति ॥१२१॥ इत्युक्त्वा तं स गत्वैव परिवेष्टितवानहिः । राजानमास्त चैतस्य मूर्ध्नि कृत्वा फणत्रयम् ॥१२२॥ हा हा दष्टोऽहिना राजेत्याक्रन्दति जनेऽथ सः । बोधिसत्त्वोऽब्रवीद्रक्षाम्यहं नृपमहैरिति ॥१२३॥ श्रुतवद्भिश्च तद्वाक्यं विज्ञप्तः सोऽनुजीविभिः । आनाय्य बोधिसत्त्वं तं सर्पाक्रान्तोऽब्रवीन्नृपः ॥१२४॥ यदि मां मोषयस्यस्मात् सर्पात् तत्ते ददाम्यहम् । राज्यार्धमन्तरस्थाश्च धवैते मन्त्रिणोऽत्र मे ॥१२५॥ तच्छ्रुत्वा बाढमित्युक्ते मन्त्रिभिः स जगाद तम् । भुजङ्ग बोधिसत्त्वांशो मुञ्च राजानमाश्र्विति ॥१२६॥ ततस्तेनाहिना मुक्तो राज्यार्धं नृपतिर्ददौ । स तस्मै बोधिसत्त्वाय सोऽपि स्वस्थोऽभवत् क्षणात् ॥१२७॥ सर्पेश्च क्षीणशापः सन् भूत्वा मुनिकुमारकः । सदस्याख्यातवृत्तान्तो जगाम निजमाश्रमम् ॥१२८॥ एष निश्चितमन्वेति शुभमेव शुभार्समम् । एव नातिक्रमो नाम क्लेशाय महतामपि ॥१२९॥ अविश्वासास्पदं चैव स्त्रीणां स्पृशति नाश्चर्यम् । प्राणदानोपकारोऽपि किं चासामन्यदुच्यते ॥१३०॥
दशम लम्बक १५१
दशम लम्बक १५१ राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११९६॥ उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये और उसे कारागार में डाल दिया ॥११९७॥ कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिकुमार के अवतार उस सर्प का स्मरण किया। स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११९८॥ उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा- मैं जाता हूँ और पैर से सिर तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९९॥ जबतक तुम जाकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२००॥ तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२०१॥ ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन फैला दिये॥१२०२॥ तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि- सत्त्व ने कहा—मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२०३॥ उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—॥१२०४॥ 'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा ले तो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और तेरी इस बात के साक्षी हैं' ॥१२०५॥ यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा— राजा को शीघ्र छोड़ दो' ॥१२०६॥ तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२०७॥ सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने आश्रम को चला गया ॥१२०८॥ इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार वाले महान् व्यक्तित्व को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२०९॥ अविश्वास की पात्र स्त्रियों के हृदय में ज्ञान होने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१२१०॥
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर इत्याख्याय कथां वत्सराजपुत्रं स गोमुखः। उवाच कथयाम्येतां पुनर्मूग्धकथां शृणु॥१३१॥ बभूव श्रमणः कश्चिद्वहारे क्वापि मूढधीः। स रथ्यायां भ्रमन् जातु शुना जानुन्यदश्यत॥१३२॥ श्वदष्टः स विहारं स्वमुपागत्य व्यचिन्तयत्। किं वृत्तं जानुनि तवेत्येकैकः प्रक्ष्यतीह माम्॥१३३॥ प्रत्याययिष्याम्येष च कियतोऽहं कियच्चिरम्। तदुपायं करोम्यत्र सर्वान् बोधयितुं सकृत्॥१३४॥ इत्यालोच्य समारुह्य स विहारोपरि द्रुतम्। गृहीत्वा ग्रन्थिमुसलं मूढो भिक्षुरवादयत्॥१३५॥ अकारणमकाले किं ग्रन्थिं वादयसीति तम्। श्रुत्वाश्चर्येण मिलिताः पप्रच्छुरथ भिक्षवः॥१३६॥ शुना मे भक्षितं जानु तदेकैकस्य पृच्छतः। ब्रूवेऽहं कियवित्येव यूयं सङ्कट्टिता मया॥१३७॥ तद्बुध्यध्वं समं सर्वे जानु मे पश्यतेति सः। भिक्षून् प्रत्यब्रवीदेतान् स्वदष्टं जानु दर्शयन्॥१३८॥ ततः पार्श्वोपपीडं ते समग्रा भिक्षवोऽहसन्। कियन्मात्रे कृतोऽनेन संरम्भोऽयं कियानिति॥१३९॥ डक्कमूर्खकथा आख्यातः श्रमणो मूर्खष्टक्कमूर्खो निशम्यताम्। कदर्थः कोऽप्यभूत् क्वापि मूर्खष्टक्को महाधनः॥१४०॥ सभार्यः स सदा भुङ्क्ते सक्तूत्सवणवर्जितान्। अन्यस्यान्नस्य बुबुधे नैव स्वादं स जातुचित्॥१४१॥ एकदा प्रेरितो धात्रा स भार्यामब्रवीन्निजाम्। क्षीरिणीं प्रति जाता मे श्रद्धा तामद्य मे पच॥१४२॥ तथेति तस्य सा भार्या पपाच क्षीरिणीं तदा। तस्या भाम्यन्तरे गुप्तं स टक्कः स्वयमन्वित्॥१४३॥ दृष्ट्वा प्राघुणिकः कश्चिदत्र मे मा स्म भूदिति। तावत्तस्य सुहृद्धूर्तष्टक्कस्तत्रक आययौ॥१४४॥ १ टक्को बाह्लीकदेशोद्भवः पुंस्त्वं।
द्वादश लम्बक १५३
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गोमुख ने वत्सराज को इस प्रकार कथा सुनाकर कहा—'अब फिर और कुछ मूर्खों की कथाएँ सुनो ।।१३१।। कहीं पर किसी बौद्धमठ (विहार) में एक मूर्ख भिक्षु रहता था। गलियों में भिक्षार्थ घूमते हुए किसी समय एक कुत्ते ने घुटने में काट लिया था ।।१३२।। कुत्ते का काटा हुआ वह मूर्ख अपने मठ में आकर सोचने लगा कि मेरे घुटने में पट्टी बँधी देखकर प्रत्येक भिक्षु मुझसे पूछेगा कि 'तेरे घुटने में क्या हो गया ? ।।१३३।। इस प्रकार मैं कितनों को कितने समय तक बताता रहूँगा । इसलिए, सब को एक बार ही अपना हाल बताने का उपाय करता हूँ ।।१३४।। ऐसा सोचकर और मठ की छत पर चढ़कर घड़ियाल बजाने का मूसल लेकर उसने उसे बजा दिया। बिना कारण असमय में यह घड़ियाल क्यों बजाता है, यह सुनकर सभी भिक्षु आश्चर्य के साथ वहाँ एकत्र हो गये और उससे घंटा बजाने का कारण पूछने लगे ।।१३५-१३६।। 'मेरे घुटने में कुत्ते ने काट लिया है' इस बात को एक-एक करके मैं कबतक और कितनों को बताता रहूँगा । यही एक बार बताने के लिए मैंने आपलोगों को यहाँ एकत्र किया है' ।।१३७।। 'इस बात को आप सब लोग जान लें और मेरे घुटने को देख लें भिक्षुओं' का ऐसा कहकर उसने अपना घुटना सबको दिखा दिया । तब वे सब भिक्षु पेट पकड़कर हँसने लगे कि इतनी-सी बात के लिए इसने कितना प्रपंच रचा ।।१३८-१३९।।
मूर्ख टक्क की कथा मूर्ख श्रमण की कथा सुनी अब एक मूर्ख टक्क की कथा सुनो। किसी स्थान पर एक अत्यन्त कंजूस टक्क रहता था जो बहुत धनी था ।।१४० ।। वह अपनी पत्नी के साथ सदा बिना नमक का सत्तू खाता था उसने सत्तू के सिवाय दूसरे अन्न का कभी स्वाद भी नहीं जाना ।।१४१।। एक बार ईश्वर की प्रेरणा से उसने अपनी पत्नी से कहा— 'आज मेरा मन खीर खाने को है । इसलिए आज तुम खीर पकाओ' ।।१४२।। 'ठीक है' कहकर उसकी पत्नी खीर पकाने लगी और वह मूर्ख घर के भीतर खाट पर जाकर पड़ गया कि मुझे बाहर बैठा देखकर कोई मेहमान न आ जाय । इतने में ही उसका एक मित्र धूर्त टक्क आ गया ।।१४३॥-१४४।।
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१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर
क्व च भर्त्तेति पप्रच्छ स च तां तस्य गेहिनीम्। साप्यदत्तोत्तरा तस्य प्राविशद्भर्तुरन्तिकम् ॥१४५॥ आख्यातमित्रागमना सोऽपि भार्यां जगाद ताम्। उपविश्येह रुदती पादावाशय तिष्ठ मे ॥१४६॥ भर्त्ता मे मृत इत्येव वदस्व सुहृदं मम। ततो गतेऽस्मिन्प्रावाभ्यां भोक्तव्या क्षीरिणी सुखम् ॥१४७॥ इत्युक्ता तेन यावत्सा प्रवृत्ता रवितुं तदा। तावत् प्रविश्य सोऽपृच्छत्किमेतदिति तां सुहृत् ॥१४८॥ भर्त्ता मृतो मे पश्येति तयोक्तः स व्यचिन्तयत्। क्व पचन्ती मया दृष्टा सुखिता क्षीरिणीमियम् ॥१४९॥ क्वाधुनेष विपन्नोऽप्रमत्तवन्मर्त्ता विना रुजम् नूनं मां प्राघुणं दृष्ट्वा कृतमाभ्यामिदं मृषा ॥१५०॥ तन्मया नैव गन्तव्यमित्यासोऽप्युपविश्य सः। धूर्त्तो हा मित्र हा मित्रेत्याक्रन्दस्तत्र तस्थिवान् ॥१५१॥ श्रुताक्रन्दा प्रविश्याथ बान्धवा मृतवत्स्थितम्। श्मशानं भीतटक्कं च नेतुमासन् समुद्यताः ॥१५२॥ उत्तिष्ठ बान्धवैर्यावन्नीत्वा न दह्यसे। इत्युपादवदत् कर्णमूले भार्या तदा च तम् ॥१५३॥ मव शठोऽस्य टक्को मे क्षीरिणीं भोक्तुमिच्छति ॥ मोत्तिष्ठामि तवेवस्मिन्गतेऽहृ मृतो यदि ॥१५४॥ प्राणेभ्योऽप्यन्नमुष्टिर्हि मादृशानां गरीयसी। इति प्रत्यब्रवीद् भार्यामुपांश्वेव स तां जडः ॥१५५॥ ततस्तेन कुमित्रेण नीत्वा तैः स्वजनैश्च सः। दह्यमानोऽपि निश्चेष्टो ददौ नामेरणाद्रवम् ॥१५६॥ एव स मूढो विजहौ प्राणान् क्षीरिणीं पुनः। रुषाजितं च बुभुज तस्यान्यैहंस्या धनम् ॥१५७॥
मार्जारमूर्खस्य कथा
धृत कदर्ये श्रूयन्ताममी मार्जारभौतकाः। उज्जयिन्यामुपाध्यायो मुग्धः कोऽप्यभवन् मठे ॥१५८॥ सत्र निद्रा न तस्याभून्मूपकोपत्रवाग्निधि। तत्खिन्नस्तच्च सुहृदे स कस्मैचिद्वयवर्ययत् ॥१५९॥
दशम लम्बक १५५
दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ? ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए, मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए,—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख टक्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई बन्धु तुझे श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त टक्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोभों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राण से अधिक है। उस मूढ ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह मरते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुंह से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरा न भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कञ्जूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक मूर्ख अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९॥
१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर क्व ते भर्तेति पप्रच्छ स च तां तस्य गेहिनीम्। साप्यदत्तोत्तरा तस्य प्राविशद्भर्तुरन्तिकम् ॥१४५॥ आख्यातमित्रागमना सोऽपि भार्या जगाद ताम्। उपविश्येह रुदती पादावादाय तिष्ठ मे ॥१४६॥ भर्त्ता म मृत इत्येव वदेरेष सुहृद् मम। शठो गतेऽस्मिन्नावाभ्यां भोक्तव्या क्षीरिणी सुखम् ॥१४७॥ इत्युक्ता तन यावत्सा प्रवृत्ता रोदितुं तथा। तावत् प्रविश्य सोऽपृच्छत्किमवेविति तां सुहृत् ॥१४८॥ भर्त्ता मृतो म पश्येति तयोक्तः स व्यचिन्तयत्। क्व पचन्ती मया दृष्टा सुसिता क्षीरिणीमियम् ॥१४९॥ क्वाधुनैव विपन्नोऽयमवङ्भर्त्ता बिना रुजम् नूनं मां प्राघुणं दृष्ट्वा कृतमाभ्यामिदं मृषा ॥१५०॥ तन्मया नैव गन्तव्यमित्यालोच्योपविश्य सः। धूर्त्तो हा मित्र हा मित्रेत्याक्रन्दस्तत्र तस्थिवान् ॥१५१॥ [L16: श्रुताक्रन्दाः प्रविश्यात्र बान्धवा मृतवत्स्थितम्। श्मशानं भोटटक्कं स नेतुमासन् समुद्यताः ॥१५२॥ उत्तिष्ठ बान्धवैर्यावदेतैर्नीत्वा न बध्यसे। इत्युपांश्ववदत् कर्णमूले भार्या तदा च तम् ॥१५३॥ मैवं शठोऽस्य टक्को मे क्षीरिणीं भोक्तुमिच्छसि ॥ नोत्तिष्ठामि तदेतस्मिन्नगतेऽङ्ग मृतो यदि ॥१५४॥ प्राणेभ्योऽप्यन्नमुष्टिर्हि मादृशानां गरीयसी। इति प्रत्यब्रवीद् भार्यामुपांश्व स तां जडः ॥१५५॥ ततस्तेन कुमित्रेण नीत्वा तं स्वजनश्च सः। दह्यमानोऽपि निर्दग्धो ददौ नामरणाद्वचः ॥१५६॥ एवं स मूढो विजहौ प्राणान्न क्षीरिणीं पुनः। कलहार्जितं च बुभुजे तस्यान्यहँस्तया पुनम् ॥१५७॥
मार्जारमूषकस्य कथा श्रुतं रूपं शृण्वताममी मार्जारभीतकाः। उज्जयिन्यामुपाध्यायो मुग्धः कोऽप्यभवन् मठे ॥१५८॥ तत्र निद्रा न तस्याभून्मूषकोपद्रवान्निशि। तस्मिंस्तस्य सुहृदे स कस्मैचिदवर्णयत् ॥१५९॥
दशम लम्बक १५५
दशम लम्बक १५५ उसने उसकी स्त्री से पूछा कि तुम्हारा पति कहाँ है। वह भी उसे उत्तर न देकर पति के पास चली गई ॥१४५॥ पति को मित्र के आने की सूचना देती हुई स्त्री से उसने कहा—'मेरे पास पैरों को पकड़ कर रोती हुई बैठी रहो' और मेरे मित्र से कहना कि मेरा पति मर गया है। उसके चले जाने पर हम दोनों सुख से खीर खायेंगे' ॥१४६-१४७॥ पति की यह आज्ञा पाकर वह बैठकर रोने लगी। तब उस मित्र मेहमान ने स्त्री से पूछा कि 'यह क्या हुआ ?' ॥१४८॥ 'देखो मेरा पति मर गया' उसने इस प्रकार कहा। उसके ऐसा कहने पर उस धूर्त मित्र ने सोचा—'कहाँ तो मैंने इसे आनन्द से खीर पकाती हुई देखा था और कहाँ अभी-अभी इसका पति बिना किसी रोग के मर गया। अवश्य ही इन दोनों ने मुझे देखकर यह ढोंग रचा है ॥१४९-१५०॥ इसलिए मुझे अब यहाँ से न जाना चाहिए—ऐसा सोचकर वह भी वहीं जमकर बैठ गया। और 'हाय मित्र हाय मित्र'—इस प्रकार रोने-चिल्लाने लगा ॥१५१॥ उसका चिल्लाना सुनकर उसके पड़ोस के सभी बन्धु और मित्र वहाँ आ गये और उसे मरा हुआ देखकर उस मूर्ख ठस्क को श्मशान ले जाने की तैयारी करने लगे ॥१५२॥ तब उसकी स्त्री ने एकान्त में उसके कान में कहा—'उठो। नहीं तो ये सारे भाई- बन्धु तुम्हें श्मशान में ले जाकर फूंक डालेंगे' ॥१५३॥ उसने कहा—'ऐसा न होगा। यह धूर्त ठस्क मेरी खीर खाना चाहता है। अतः, मैं जब मर गया हूँ तब इसके यहाँ से गये बिना न उठूँगा ॥१५४॥ मेरे जैसे लोगों के लिए एक मुट्ठी अन्न भी प्राणों से अधिक है। उस मूर्ख ने एकान्त में ही इस प्रकार अपनी पत्नी से कहा ॥१५५॥ तब उस दुष्ट मित्र ने बन्धु बान्धवों के साथ उसे ले जाकर चिता में फूंक दिया किन्तु वह जलते समय भी तनिक भी हिला-डुला नहीं और न मुख से ही कुछ बोला ॥१५६॥ इस प्रकार उस मूर्ख ने खीर के पीछे अपने प्राण दे दिये और इतने कष्टों से कमाया हुआ उसका धन दूसरों ने भोगा ॥१५७॥ मार्जार-मूर्ख की कथा कंजूस की कथा सुनी अब मार्जार-मूर्ख की कथा सुनो—'उज्जयिनी के किसी मठ में एक वृद्ध अध्यापक रहता था ॥१५८॥ चूहों के उपद्रव के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी इस कारण दुःखी होकर उसने अपने किसी मित्र से अपना यह कष्ट सुनाया ॥१५९ ॥
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर मार्जारं स्थापयानीय सोऽत्र खादति मूषकान्। इति सोऽपि सुहृद्विप्रस्तमुपाध्यायमब्रवीत् ॥१६०॥ मार्जारः कीदृशः क्वास्ते न स दृष्टचरो मया। इत्युक्तवत्युपाध्याये तं सुहृत्सोऽब्रवीत् पुनः ॥१६१॥ काचरं लोचने तस्य वर्णः कपिशधूसरः। पृष्ठे च लोमशं चर्म रथ्यास्वटति यह सः ॥१६२॥ तदेभिस्त्वमभिज्ञानैरन्विष्यानानयाशु तम्। मित्र मार्जारमित्युक्त्वा तत्सुहृत्स ययौ गृहम् ॥१६३॥ ततः शिष्यानुपाध्यायः स जगाद जडो निजान्। अभिज्ञानानि युष्माभिः श्रुतान्येव स्थितेरिह ॥१६४॥ तदन्विष्यत मार्जारं रथ्यासु तमिह क्वचित्। तथेति ते गताः शिष्यास्तत्र भ्रमुरितस्ततः ॥१६५॥ तथापि न तु तैर्दृष्टो मार्जारः स कदाचन। अथैकं ते वटुं रथ्यामुखाविक्षन्त निर्गतम् ॥१६६॥ काचरं नेत्रयुगलं वर्णं धूसरपिङ्गलम्। पृष्ठोपरि दधानं च लोमशं हरिणाजिनम् ॥१६७॥ दृष्ट्वा तं सैष मार्जारः प्राप्तोऽस्माभिर्यथाश्रुतः। इत्यवष्टभ्य तं निन्युस्पाध्यायान्तिकं च ते ॥१६८॥ उपाध्यायोऽपि मित्रोक्तैर्युक्तं मार्जारलक्षणैः। दृष्ट्वा तं स्थापयामास रात्रौ तत्र मठान्तरे ॥१६९॥ मार्जारो नूनमस्तीति मेने सोऽपि वटुर्जडः। मार्जाराख्यां कृतां शृण्वन्नात्मनस्तैर्मुखिभिः ॥१७०॥ स च भीतो वटुः शिष्यस्तस्य विप्रस्य येन तत्। उपाध्यायस्य तस्योक्तं मख्या मार्जारलक्षणम् ॥१७१॥ प्रातः सोऽत्रागतो विप्रो वटुमन्तर्विलोक्य तम्। इह कनायमानीत इति मौठानवाच तान् ॥१७२॥ धृतोपलक्षणस्त्वत्तो मार्जारोऽस्माभिरप्य सः। आनीत इत्युपाध्यायो भीतः शिष्याश्च तेऽवदन् ॥१७३॥