कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर सापि संमोह्य पितरं प्राग्वद्रूपधिया पतिम्। तमभ्यगात् पतिहितादन्यत् साध्व्यो न जानते ॥१९४॥ ततस्तया समं शृङ्गभुजः पत्न्या स सत्वरम्। आश्चर्यतुरगारूढो वर्धमानपुरं ययौ ॥१९५॥ तत्र बुद्ध्वा तमायान्तं युक्तं शृङ्गभुजं तया। पिता वीरभुजस्तस्य हृष्टोऽग्रे निर्ययौ नृपः ॥१९६॥ स दृष्ट्वा शोभितं बध्वा तं शौरिमिव भामया। प्राप्तां तदा नवां मेने नरेन्द्रो राज्यसम्पदम् ॥१९७॥ अश्वावतीर्णमेनं च पादलग्नं सवल्लभम्। उत्थाप्यालिङ्ग्य तनयं हर्षबाष्पाम्बु बिभ्रता ॥१९८॥ वधूप्रवेशकृतोदार निर्विच्छन्नममङ्गलः¹। प्रावेशयद्राजधानीं स ततो विहितोत्सवः ॥१९९॥ क्व गतोऽभूस्त्वमित्यत्र तेन पृष्टः सुतोऽथ सः। निजमाद्यन्तं शृङ्गभुजो वृत्तान्तमब्रवीत् ॥२००॥ आहूय तत्समक्षं च भ्रातृभ्यस्तत्समर्पयत्। स निर्वासभुजादिभ्यस्तेभ्यो हेममयं शरम् ॥२०१॥ तच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च तेषु वीरभुजो नृपः। व्यरज्यत्सर्व्वेषु सुतेष्वेकं मेने च तं सुतम् ॥२०२॥ अथ स राजा मतिमान् सम्यगेवमचिन्तयत्। ज्ञातं यथैष विद्वेष्यादमूद्भिः प्रवासितः ॥२०३॥ पापैर्निरपराधोऽपि शत्रुभिर्भ्रातृनामभिः। तथैव नूनमेतेषां जननीभिर्मम प्रिया ॥२०४॥ मातास्य सा गुणवरा निर्दोषा दूषिता मृषा। तत्किं चिरेण पश्यामि यावदद्यैव निश्चयम् ॥२०५॥ इत्यालोच्य यथासद्दिनं नीत्वाभ्यगाद्भिशि। जिज्ञासुरयशोलेखां राज्ञीं तां स नृपोजशराम् ॥२०६॥ तदभ्यागमहृष्टा सा मद्यं तेनातिपायिता। रतान्तसुप्ता व्यस्पन्दामि तस्मिन् सजागरे ॥२०७॥ मिथ्या गुणवरायाश्चेत्साऽवदिष्याम दूषणम्। तत्किमेवमुपायास्यदयं राजा मामिह ॥२०८॥ १ निर्विन् निर्द्वन्द्व तस्यान्न राजननेव मङ्गलम्।
सप्तम लम्बक १२७
सप्तम लम्बक १२७ वह रूपशिखा इस प्रकार पिता को ठगकर और पति को लेकर चली गई। पतिव्रता स्त्रियाँ पति के हित को छोड़कर और कुछ नहीं जानतीं ॥१९४॥ तब शृंगभुज भी पत्नी के साथ शीघ्र ही उस आश्चर्यमय घोड़े पर चढ़ा हुआ शीघ्र ही वर्धमानपुर पहुँचा ॥१९५॥ यहाँ रूपशिखा के साथ आते हुए पुत्र शृंगभुज का पता पाकर उसका पिता वीरभुज प्रसन्न होकर उसकी अगवानी करने के लिए नगर से बाहर निकला ॥१९६॥ वहाँ पर सत्यभामा के साथ विष्णु के समान रूपशिखा के साथ शृंगभुज को देखकर राजा ने मानों नई राज्य-सम्पत्ति प्राप्त की ॥१९७॥ घोड़े से उतरकर पत्नी के साथ पैरों पर गिरते हुए पुत्र को उठाकर, आलिंगन करके आनन्द के आँसुओं से भरे नेत्रों से शोक-शमन रूपी मगल करता हुआ राजा हर्ष के साथ राजधानी में प्रविष्ट हुआ ॥१९८ १९९॥ 'तू कहाँ चला गया था ? —राजा से इस प्रकार पूछने पर शृंगभुज ने आरम्भ से सारा वृत्तान्त सुनाया। और अपने भाइयों को बुलाकर निर्भासभुज को वह सोने का बाण लौटा दिया ॥२ २ १॥ यह सब समाचार जानकर और पूछकर राजा वीरभुज अन्य सभी पुत्रों से विरक्त हो गया और केवल शृंगभुज को ही एकमात्र पुत्र मानने लगा ॥२ २॥ उस बुद्धिमान् राजा ने सोचा कि इसे द्वेष के कारण इन भाइयों ने भगा दिया था ॥२ ३॥ इन भाई कहलाने वाले पापी शत्रुओं ने जैसे इस निरपराध के साथ किया वैसे ही इसकी माता के साथ इनकी माताओं ने द्वेष के कारण पाप किया है ॥२ ४॥ इसकी माता गुणवरा निर्दोष है, उसे झूठा कलंकित किया गया है। तो देर क्यों करूँ ? आज ही इसका निश्चय करता हूँ ॥२ ५॥ ऐसा सोचकर सारे दिन पूर्व दिनों के समान कार्य करके राजा पता लगाने के लिए अयशोलेखा नाम की रानी के पास गया ॥२ ६॥ राजा के आकस्मिक आगमन से अति प्रसन्न अयशोलेखा को राजा ने अधिक शराब पिला दी। इस कारण शान्त-काल में सोई हुई वह रानी राजा के जागते रहने पर नशे में प्रलाप करने लगी ॥२ ७॥ यदि मैं गुणवरा को झूठा कलङ्क न लगाती तो क्या आज राजा इस प्रकार स्वयं मेरे पास आता ॥२ ८॥
१२८ कथासरित्सागर
१२८ कथासरित्सागर इति तस्या वचः श्रुत्वा सुप्ताया दुष्टचेतसः। उत्पन्ननिश्चयो राजा क्रोधादुत्थाय निर्ययौ ॥२०९॥ गत्वा स्वावासमानाय्य स जगाद महत्तरान्। उद्बुध्य तां गुणवरां स्नातामानयत द्रुतम् ॥२१ ॥ अयं क्षणो ह्यद्यतनो ज्ञानिनानिष्टशान्तये। तस्या मृग्गूढवासस्य कथितोऽभूत् किलावधिः ॥२११॥ तच्छ्रुत्वा तैस्तथेत्युक्त्वा गत्वा स्नाता विभूषिता। राज्ञी गुणवरा क्षिप्रमानिन्ये सा तदन्तिकम् ॥२१२॥ सतस्तौ दम्पती दीर्घविरहार्णवनिर्वृतौ। अन्योन्यालिङ्गनामृतौ निन्यतुस्तो विभावरीम् ॥२१३॥ अवर्णयत् स राजात्र देव्यै तस्यै मुदा तदा। तं शृङ्गभुजवृत्तान्तं तदेवं निजसूनवे ॥२१४॥ साच प्रबुद्धा राजानं गतं बुद्ध्वा सवाश्छलम्। सम्भाव्येवायशोभीता विषादमगमत्परम् ॥२१५॥ प्रातश्च स नृपो वीरभुजो गुणवरान्तिकम्। वानामयच्छृङ्गभुजं सुतं रूपशिखायुतम् ॥२१६॥ सोऽभ्येत्य मातरं दृष्ट्वा हृष्टो मृद्गृहनिर्गताम्। तयोर्ववन्दे चरणौ पित्रोर्नववधूततः ॥२१७॥ अभ्योत्तीर्णं समाश्लिष्य पुत्रं गुणवरापि सा। तां च स्नुषां तथा प्राप्तामुत्सवादुत्सवं ययौ ॥२१८॥ तत पितुर्निवेशात् स तस्यै शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। विस्तरेण स्ववृत्तान्तं यच्च रूपशिखाकृतम् ॥२१९॥ ततो गुणवरा राज्ञी सा प्रहृष्टा जगाद तम्। किं किं न रूपशिखया कृतं पुत्र त्वदानया ॥२२ ॥ हित्वा स्वजीवितं बन्धून् देशं बहु यदेतया। भीष्योतानि प्रवृत्तानि तुभ्यं चित्रचरित्रया ॥२२१॥ त्वदर्थमवतीर्णैषा कापि देवी विधेर्वशात्। पतिव्रतानां सर्वासाम् यया मूर्ध्नि पदं कृतम् ॥२२२॥ एवमुक्ते तया राज्ञ्या सद्वाक्यमभिनन्दति। राज्ञि रूपशिखायां च विनयानतमूर्धनि ॥२२३॥
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१५ कथासरित्सागर
१५ कथासरित्सागर आययौ स तयैव प्रागयशोलिखया नृपा । दूषितोऽन्तःपुराध्यक्षो भ्रान्ततोयं सुरक्षितः ॥२२४॥ क्षत्रा निवेदितः स च प्रहृष्टः घरणानतम् । ज्ञातार्थोऽपूजयद्राजा भृशं धीरभुजोऽप्य सः ॥२२५॥ तेनैवानाय्य चान्यास्ता राज्ञीरेव दुर्जनीः । तमवोवाच गच्छैता भूगृहे निशिराः क्षिप ॥२२६॥ तच्छ्रुत्वा तासु भीतासु क्षिप्तासु कृपया नृपम् । तं सा गुणवरा देवी पादलग्ना व्यजिज्ञपत् ॥२२७॥ देव मामेव भूयोऽपि चिरं स्थापय भूगृहे । प्रसीद नैवमेता हि भीताः शक्नोमि वीक्षितुम् ॥२२८॥ इति प्रार्थ्य नृपं तासां वधनं सा न्यवारयत् । महतामनुकम्पा हि विरुद्धेषु प्रतिक्रिया ॥२२९॥ ततस्ताः प्रेषिताः राज्ञा लज्जिताः स्वगृहान् ययुः । अनिष्टमपि वाञ्छन्त्यो दीयमानं मुजान्तरम् ॥२३०॥ तां च राजा गुणवरां बहु मेने महाशयाम् । आत्मानं च तया पत्न्या कृतपुण्यममन्यत ॥२३१॥ अथानाय्य सुतानन्यान् स निर्वासिभुजादिकान् । निर्वासयिष्यन् युक्त्या तान् राजा कृतकमभ्यधात् ॥२३२॥ श्रुतं मया वणिक पापैर्भवद्भिः पथिको हतः । तद्वभास्तु सर्वतीर्थानि यात मा स्मेह तिष्ठत ॥२३३॥ तच्छ्रुत्वा त च शेकुस्ते नृपं बोधयितुं नृपाः । प्रभौ दृढप्रभूते हि कस्य प्रत्ययना भवेत् ॥२३४॥ ततस्तान् गच्छतो दृष्ट्वा भ्रातृन् शृङ्गभुजोऽप्य सः । कृपोद्भूताश्रुपूर्णाक्षः पितरं तं व्यजिज्ञपत् ॥२३५॥ तातापराधमेकं त्वं क्षमस्वैषां कृपां कुरु । इत्युक्त्वा पादयोस्तस्य निपपात स भूपतेः ॥२३६॥ सोऽपि मत्वा मरेन्द्रस्तं भूभृद्भारसहं सुतम् । यनोदयाधित बाष्पऽप्यवतारे हरेरिव ॥२३७॥ गुडांगया गैररथी वचस्तस्य तथाकरोत् । तेऽपि तं भ्रातरः सर्वे प्राणान् ममिरे निजम् ॥२३८॥
सप्तम लम्बक १९१
सप्तम लम्बक १९१ इतने में ही अशोकलत्ता रानी के द्वारा झूठा कलंकित किया गया रनिवास का अध्यक्ष सुरक्षित तीर्थयात्रा करके आ पहुँचा ॥२२४॥ प्रतिहार से सूचित और पैरों पर गिरे हुए उस प्रशंसित सुरक्षित को सच्ची बात जानते हुए राजा वीरभुज ने बहुत सम्मानित किया ॥२२५॥ सारी दुष्ट रानियों को बुलाकर वहीं पर राजा ने उस सुरक्षित से कहा—'जाओ इन सब को भू-गृह में डाल दो। यह सुनकर उन सब को ले जाकर भू-गृह (तहखान) में डाल देने पर दया- वती रानी गुणवरा राजा के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगी—'हे आर्यपुत्र ! तुम फिर मुझे ही भू-गृह में डाल दो प्रसन्न हो जाओ ! मैं इन डरी हुई सौतों को नहीं देख सकती' ॥२२६-२२८॥ इस प्रकार, प्रार्थना करके महारानी ने उन्हें बन्धन से छुड़ा लिया। उच्च कोटि के व्यक्तियों की विरोधियों पर कृपा ही बदला लेने के रूप में होती है ॥२२९॥ रानी गुणवरा का अनिष्ट चाहती हुई भी उसके द्वारा बचाई गई सभी रानियां लज्जित होकर अपने-अपने भवन को लौट गईं ॥२३०॥ राजा उदारहृदय उस गुणवरा रानी को भी बहुत मानने लगा और उस पत्नी के कारण अपने-आपको पुण्यवान समझने लगा ॥२३१॥ तब युक्तिपूर्वक निर्वासित करने के निमित्त निर्वासभुज आदि दूसरे पुत्रों को बुलाकर उस राजा ने यह बनावटी बात कही—॥२३२॥ 'मैंने सुना है कि आप अधम बनिकों ने एक पथिक को मार डाला है। इसलिए, आप सभी तीर्थ में घूमने के लिए चले जायें यहाँ न रहें' ॥२३३॥ यह सुनकर वे राजकुमार राजा को (निर्दोष होने का) विश्वास नहीं दिला पाये। क्योंकि प्रभु के हठ पकड़ लेने पर किसको विश्वास दिखाया जा सकता है ? २३४॥ तत्पश्चात् शृंगभुज ने भाइयों को जाते हुए देखा और उसकी आँखें दया से भर आईं। तब उसने अपने पिता से प्रार्थना की—॥२३५॥ 'पिता जी मेरे एक अपराध को आप क्षमा कर दें। इनपर कृपा करें'। यह कहकर वह उस राजा के चरणों पर गिर पड़ा ॥२३६॥ वह राजा भी उस पुत्र को राज्य-भार के उठाने में समर्थ और बचपन में भी यश और दया का आश्रय जानकर समझने लगा कि यह बचपन में गोवर्धन पर्वत के भार को उठानेवाले यशोदा माता से आश्रित भगवान् कृष्ण का अवतार है ॥२३७॥ गंभीर-हृदयवाले उस राजा ने बेटे को बचाने के लिए उसकी प्रार्थना मान ली। उन सभी भाइयों ने भी उस भाई को अपना प्राणदाता मान लिया ॥२३८॥
१३२ कथासरित्सागर
१३२ कथासरित्सागर सर्वाः प्रकृतयोऽप्यत्र तस्य शृङ्गभुजस्य तम्। गुणातिशयमालोक्य दधुस्तद्बहुरागिताम् ॥२३९॥ ततोऽन्यदुर्गुणज्येष्ठ तज्ज्येष्ठेष्वपि सत्सु सः। पिता वीरभुजो राजा यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥२४०॥ स च प्राप्ताभिषेकः सन् दिग्विजयाय ययौ ततः। विज्ञाप्य पितरं सर्वबलैः शृङ्गभुजः सह ॥२४१॥ बाहुवीर्यजिताशेषवसुधाधिपमण्डलम् । आदाय जायतौ दिक्षु प्रविकीर्य यशःश्रियम् ॥२४२॥ ततो वहन् राज्यभारं प्रणतैर्भ्रातृभिः सह। निश्चिन्तभोगसुखितौ रञ्जयन् पितरौ कृती ॥२४३॥ दानं ददद् ब्राह्मणेभ्यस्तस्थौ शृङ्गभुजः सुखी। रूपवत्यार्थसिद्धयेश स रूपशिखया सह ॥२४४॥ इत्यनया पतिं साध्व्यः सर्वकारमुपासते। एते गुणवरारूपशिखे श्वश्रूसूनू यथा ॥२४५॥ इति नरवाहनदत्तो हरिशिखमुखात् कथामिमां श्रुत्वा। रत्नप्रभासमेतः साध्विति जल्पंस्तुतोष परम् ॥२४६॥ उत्थाय चाह्निकमथाशु विधाय गत्वा वत्सेश्वरस्य निकटं स पितुः सभायाम्। भुक्त्वापराह्णमतिवाह्य च गीतवाद्यैः स्वान्तःपुरे सदयितो रजनीं निनाय ॥२४७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके पञ्चमस्तरङ्गः।
षष्ठस्तरङ्गः मघवद्गवियोगदुःखयोः परस्परं वाग्विलासः ततः प्रातः पुनर् रत्नप्रभासद्मनि तं स्थितम्। नरवाहनदत्तं ते गोमुखाद्या उपागमन् ॥१॥
सप्तम लम्बक ११५
सप्तम लम्बक ११५ इस स्थिति में सभी प्रजाओं ने भी उस शृंगभुज के ऐसे विशिष्ट गुण को देखा और उसके प्रति उनका अनुराग दृढ़मूल हो गया ।।२४१।। तब दूसरे दिन उस पिता राजा वीरभुज ने उसके दूसरे जेठे भाइयों के रहने पर भी गुणों से ज्येष्ठ उस शृंगभुज को ही युवराज-पद पर अभिषिक्त किया ।।२४२ ।। और तब वह शृंगराज युवराज-पद पर अभिषिक्त होकर पिता की आज्ञा लेकर घनी प्रकार की सेना के साथ दिग्विजय के लिए चला गया ।।२४३।। वह अपने बाहु-बल से समग्र पृथ्वी के राजमण्डल को जीत कर वापस चला आया साथ ही अपनी कीर्त्तिश्री को भी दिग्दिगन्त में बिखेर आया ।।२४४।। तत्पश्चात् कृतकृत्य वह शृंगभुज अपने विप्रज्ञ भाइयों के साथ राज्य-भार को सँभालता हुआ निश्चिन्त होकर भोग-सुख में लगे हुए माता-पिता को अनुरञ्जित करता रहा ब्राह्मणों को दान देता रहा और अर्थसिद्धि के समान रूपवती रूपशिखा के साथ दिन बिताने लगा ।।२४५-२४६।। इस प्रकार पतिव्रता स्त्रियाँ सभी अवस्थाओं में अपने पतियों की अनन्य भक्ति से उपासना करती हैं, जैसे ये दोनों सास-पतोहू गुणवरा और रूपशिखा करती थीं ।।२४७।। इस प्रकार, नरवाहनदत्त हरिमुख के मुख से इस कथा को सुनकर रत्नप्रभा के साथ मिलकर 'साधु-साधु' कहता हुआ अत्यन्त संतुष्ट हुआ ।।२४८।। तब वह उठकर और शीघ्र दैनिक कृत्य करके अपनी पत्नी के साथ पिता वत्सराज के पास गया। तानन्तर अपराह्न में संगीत से दिन बिताकर उसने प्रियतमा के साथ अपने अन्त पुर में रात बिताई ।।२४९।। महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का पंचम तरंग समाप्त षष्ठ तरंग भवभूति और गोमुख का पारस्परिक वाक्कलह तदनन्तर प्रातः काल रत्नप्रभा के महल में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास गोमुख आदि मन्त्री पुनः आये ॥१॥
१३४ कथासरित्सागर
१३४ कथासरित्सागर मरुभूतिः स तु मनाक्पीतासवमदालसः। बद्धपुष्पोज्झितस्रज विलम्बित उपाययौ ॥२॥ प्रस्खलत्पद्यया गत्या हासयंस्त गिरा तदा। तत्प्रीतिरञ्चितमुखो नर्मणोवाच गोमुखः ॥३॥ यौगन्धरायणसुतो भूत्वा नीतिं न वेत्सि किम्। प्रात पिबसि मद्य यन्मत्त प्रभुपैषि ध ॥४॥ तच्छ्रुत्वा तं रुषा क्षीबो मरुभूतिर्जगाद सः। एतन्मे प्रभुणा वाच्यममुना गुरुणापि वा ॥५॥ त्वं तु क शिक्षयसि मामित्याकार्मज रे वद। इत्युक्तवन्तं तं भूयो हसन्नाह स्म गोमुखः ॥६॥ भर्त्सयन्त्यविनीत किं स्वभावा प्रभविष्णवः। अवश्य तस्य वक्तव्य यत्पादस्पर्शयोचितम् ॥७॥ सत्यं चटकपुत्रोऽहं त्वं मन्त्रिवृषम पुनः। भक्ति ते जाल्ममेवैतद्द्रिवाण स्त परं न ते ॥८॥ इत्युक्तो गोमुखेनाथ मरुभूतिरभाषत। तवेव शृण्मत्वं हि गोमुखस्योपपद्यते ॥९॥ तथापि यदचान्तोऽसि सोऽयं ते जातिसङ्करः। एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषु हसत्सूवाच गोमुखः ॥१ ॥ मरुभूतिरयं रत्न जातु यत्नशतैरपि। अवश्यं वयमेतस्मिन्गूण को हि प्रचक्षतेत् ॥११॥ सिकतासेतुवृत्तान्तः मन्यत्युक्षरत्नं तद्यदयरत्नन वध्यत। सिकतासेतुवृत्तान्तं शृणु चात्र निदर्शनम् ॥१२॥ आसीत्कोऽपि प्रतिष्ठाने तपोदत्त इति द्विजः। स पित्रा क्लिश्यमानोऽपि विद्यां नाभ्यस्त शैशवे ॥१३॥ अनन्तरं गृहंमाज सर्वैरनुशयान्वितः। स विद्यासिद्धय यप्तुं तपो गङ्गातटं ययौ ॥१४॥ तत्राश्रितोग्रतपसस्तस्य तं वीक्ष्य विस्मितः। बारयिष्यन्दिजश्छद्मा शत्रे निकटमाययौ ॥१५॥ आगत्य च स गङ्गायास्तटाद्भिरोप भारिणि। उद्यतोदस्य सिकता पद्यतन्तम्स्य भोर्भिणि ॥१६॥
सप्तम लम्बक १३५
सप्तम लम्बक १३५ किन्तु, मरुभूति मन्त्री मद्यके-मद में कुछ अलसाता हुआ फूलों का गजरा डाले और इत्र आदि लगाये हुए लड़खड़ाती हुई गति और जबान से अन्य मित्रों को हँसाता हुआ कुछ देर से आया उसकी इस दशा से मुस्कराते हुए गोमुख ने मजाक करते हुए कहा- ॥१३॥ 'तुम यौगन्धरायण के पुत्र होकर भी नीति नही जानते। प्रातःकाल शराब पीते हो और नशे की बेहोशी में राजा के पास आते हो ? ॥१४॥ यह सुनकर क्रोध से बेहोश मरुभूति गोमुख से बोला- यह बात तो या मेरे स्वामी (राजा) या मेरे पिता कह सकते हैं ॥१५॥ अरे द्वारपक (द्वारपाल) के बच्चे ! बोलते तो सही। तुम मुझे शिक्षा देते हो? ऐसा कहते हुए मरुभूति से गोमुखने फिर कहा- क्या प्रभुजन अविनीत (उद्दण्ड) को अपनी बातों से फटकारते हैं। ऐसी बातें तो राजा के पार्श्ववर्ती व्यक्ति ही कह रहे हैं। यह सच है कि मैं द्वारपक (द्वारपाल) का पुत्र हूँ और तुम मन्त्रिवृषभ (बैल और श्रेष्ठ) हो। तुम्हारी यह स्थिति ही तुम्हारी मूर्खता (बैलपन) बता रही है। केवल दो सींग ही तो नहीं हैं। ॥१६-८॥ गोमुख से ऐसा कहा गया मरुभूति बोला--'बैलपन तो तुम्हें ही अधिक सजता है तुम्हारा नाम ही गौ-मुख है। फिर भी जो तुम्हारी उद्दण्डता है, उसका कारण तुम्हारी वर्णसंकरता ही है' यह सुनकर सब लोगों के हँस देने पर गोमुख फिर बोला-॥१९-१॥ यह मरुभूति वह रत्न है जिसमें सैकड़ों यत्न करने पर भी इस अभेद्य रत्न में बाण (गुण) का प्रवेश कौन करा सकता है॥ ११॥ दूसरा कोई पुरुष रत्न हो तो उसका बेधन बिना प्रयत्न के ही हो जाता है। इस प्रसंग में चिरन्ता-शत्रु का उदाहरण सुनाता हूँ।-॥१२॥ चिरन्ता-शत्रु की कथा प्रतिष्ठान नामक नगर में तारादत्त नाम का कोई ब्राह्मण था वह पिता के अनेक कष्ट देने पर भी बाल्यावस्था में अध्ययन नहीं कर सका ॥१३॥ पिता के मरने पर सभी लोगों से तिरस्कृत किया जाता हुआ वह अत्यन्त विरक्त होकर विद्या की सिद्धि के लिए श्मशान पर जप करने गया ॥१४॥ वहाँ पर अत्यन्त उग्र तपस्या में लगे हुए उस देखकर आश्चर्य चकित दूसरे ब्राह्मण ने वट- बेल से वहाँ गया ॥१५॥ वहाँ पर बैठकर दूर संन्यासीने गंगा के जल से बाल गुण लगाकर पैंजन लगा और वह ब्राह्मण उसे देखता रहा ॥१६॥
१६६ कथासरित्सागर
१६६ कथासरित्सागर तद्दृष्ट्वा मुक्तमौनस्तं तपोदत्तः स पृष्टवान्। अथान्तः किमिदं ब्रह्मन्करोषीति सकौतुकम् ॥१७॥ निर्बन्धपृष्टः स च तं शक्रोऽब्रवीद् द्विजाकृतिः। सेतुं बध्नामि गङ्गायां ताराय प्राणिनामिति ॥१८॥ ततोऽब्रवीत्तपोदत्तः सेतुः किं मूर्ख बध्यते। गङ्गायामोघहार्याभिः सिकताभिः कदाचन ॥१९॥ तच्छ्रुत्वा समुवाचैनं शक्रोऽथ द्विजरूपधृक्। यद्येवं वेत्सि तद्विद्यां विना पाठं विना श्रुतम् ॥२०॥ कस्माद्व्रततपःसाध्यैस्त्वं साधयितुमुद्यतः। इयं शशविषाणेच्छा व्योम्नि वा चित्रकल्पना ॥२१॥ अनक्षरो लिपिन्यासो यदिच्छाध्ययनं विना। एवं यदि भवेदेतन्नाधयीत कश्चन ॥२२॥ इत्युक्तः स तपोदत्तः शकेण द्विजरूपिणा। विचार्य तत्तथा मत्वा तपस्त्यक्त्वा गृहं ययौ ॥२३॥ एवं सुधीः सुखं बोध्यो मरुभूतिस्तु दुर्मतिः। न शक्यते बोधयितुं बोध्यमानश्च कुप्यति ॥२४॥ इत्युक्ते गोमुखेनाऽत्र मध्ये हरिशिखोऽभ्यधात्। भवन्ति सुखसम्बोध्याः सत्यं देव सुमेधसः ॥२५॥ विरूपशर्मणो ब्राह्मणस्य कथा तथा च पूर्वमभवद् वाराणस्यां द्विजोत्तमः। कश्चिद् विरूपशर्माख्यो विरूपो निर्धनस्तथा ॥२६॥ स च वैरूप्यदौर्गत्यनिर्विण्णस्तत्तपोवनम्। गत्वा तीव्रं तपश्चक्रे रूपद्रविणकाङ्क्षया ॥२७॥ अथ सुरपतिः कृत्वा विकटव्याधिताकृतेः। जम्बुकस्याधमं रूपमस्याग्रे तस्य तन्मियान् ॥२८॥ तं विलोक्य परीताङ्गमक्षिकाभिरसृक्स्रवम्। विरूपशर्मा धनकर्मणसा विममर्श सः ॥२९॥ ईदृशा अपि जायन्ते संसारे पूर्वकर्मभिः। तन्ममाल्पमिदं धात्रा कृतं यन्मद्वपुः कृत ॥३०॥ को दैवविलिखितं भोगं रुद्धयेदित्यवेक्ष्य सः। विरूपशर्मा धतकैस्तपःस्थानाद्ययौ गृहम् ॥३१॥
सप्तम लम्बक [१३७]
सप्तम लम्बक [१३७]
उसके इस खेल को देखकर वह ब्राह्मण तपस्या मौन भंग करके बोला—'हे ब्राह्मण ! बिना रुकावट के यह तुम क्या कर रहे हो ? ॥१७॥ आग्रहपूर्वक पूछने पर ब्राह्मण बना हुआ इन्द्र बोला—'जीवों को गंगा पार जाने के लिए पुल बाँध रहा हूँ'। ॥१८॥ यह सुनकर तपोदत्त बोला—'हे मूर्ख ! लहरों से इधर-उधर बिखरनेवाली बालू से भला कहीं पुल बँधता है ? ॥१९॥ यह सुनकर ब्राह्मण-रूपी इन्द्र बोला—'यदि तुम यह समझते हो तो तुम बिना पढ़े-सुने विद्या कैसे प्राप्त करोगे ? ॥२० ॥ व्रत और उपवास आदि से तुम विद्या प्राप्त करने के लिए क्यों उत्सुक हो रहे हो। यह तो खरगोश के सींग के समान या आकाश में चित्र रचना के समान व्यर्थ बात है॥२१॥ बिना अक्षर जाने लिखना और बिना अध्ययन के विद्या प्राप्ति हो जाय तो कोई भी कभी अध्ययन न करे'॥२२॥ ब्राह्मण-रूपी इन्द्र से इस प्रकार कहा गया तपोदत्त ब्राह्मण उसकी बात पर विचार कर और उसे ठीक मानकर तप करना छोड़कर घर चला गया ॥२३॥ इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ज्ञान कराया जा सकता है, किन्तु मरुभूति तो दुष्टबुद्धि है। इसे जताया नहीं जा सकता। कुछ बताने या ज्ञान देने पर क्रुद्ध हो जाता है॥२४॥ गोमुख के ऐसा कहने पर हरिशिख ने बीच में ही कहा—'राजन् ! यह सच है बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ही समझाया जा सकता है' ॥२५॥ इस प्रसंग में कथा सुनें—
विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा पूर्वकाल में वाराणसी नगरी में विरूपशर्मा नाम का एक दरिद्र ब्राह्मण था॥२६॥ वह अपनी कुरूपता और दरिद्रता से अत्यन्त विरक्त होकर जंगल में जाकर रूप और धन की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगा ॥२७॥ तब देवराज इन्द्र बिगड़े और बीमार सियार का रूप धारण करके उसके आश्रम में आकर उसके समीप पड़े हुए। सड़े-गले और मक्खियों से भरे शरीरवाले उस सियार को देखकर विरूपशर्मा अपने मन में सोचने लगा ॥२८-२९॥ संसार में अपने पूर्व कर्मों के कारण ऐसे प्राणी भी होते हैं। इस दृष्टि से दैव ने मुझे बहुत अल्प मात्रा में कुरूप और कुत्सित बनाया है। दैव के लिखे हुए भागों का कौन उल्लंघन कर सकता है ? ऐसा समझकर विरूपशर्मा तपस्या के स्थान से अपने घर वापस आ गया ॥३०-३१॥
१५८ कथासरित्सागर
१५८ कथासरित्सागर इत्थं सुबुद्धिरल्पेन दैव यत्नेन बोध्यते। न कृच्छ्रेणापि महता निर्विचारमतिः पुनः ॥३२॥ एवं हरिशिखनोक्ते श्रद्दधाने च गोमुखे। मरुभूतिरनात्मज्ञः क्षीबोऽतिकुपिरतोऽब्रवीत् ॥३३॥ वरं गोमुख वाच्यं न तु बाह्योर्भवादृशाम्। वाचालैः कुरुह क्लीबैनेत्रपाङ्गबाहुशालिनाम् ॥३४॥ इति ब्रुवाणं युध्यन्तुं मरुभूतिं स्मिताननः। नरवाहनदत्तोऽथ प्रभुः स्वयमसान्त्वयत् ॥३५॥ विसृज्य तं च स्वगृहं तं बालसखिवत्सलः। कुर्वन् दिवसकार्याणि निनाय सदहः सुखम् ॥३६॥ प्रातश्च सर्वेष्वायातेष्वथ मन्त्रिषु च प्रिया। रत्नप्रभा जगादैवं मरुभूतौ त्रपानते ॥३७॥ त्वमार्यपुत्र सुकृती यस्य च सचिवा इमे। आबाल्यस्नेहनिगडबिडाः शुद्धचेतसः ॥३८॥ एते च धन्या येषां त्वमीदृक स्नेहपरः प्रभुः। प्राक्कर्मोपार्जिता यूयमन्योन्यस्य न संशयः ॥३९॥ एवमुक्ते तया राज्ञ्या वसन्तकसुतोऽब्रवीत्। नरवाहनदत्तस्य नर्ममित्रं तपन्तकः ॥४०॥ सत्यं पूर्वाजितोऽयं नः स्वामी सच हि तिष्ठति। पूर्वकर्मवशादेव तथा च श्रूयतां कथा ॥४१॥ तरणचन्द्रवैद्यस्य राज्ञः अजस्य च कथा अभूच्छ्रीकण्ठनिलये विलासपुरनामनि। पुरे विनयशीलाख्या मान्धाज्यर्धेन भूपतिः ॥४२॥ तस्य प्राणसमा देवी बभूव कमलप्रभा। तया साकं च भोगैकसक्तस्तस्थौ चिराय सः ॥४३॥ अथ कालेन भूपस्य जरा सौन्दर्यहारिणी। तस्याविरासीत् तां दृष्ट्वा स चासीद्विदुःखितः ॥४४॥ हिमाहतमिवाम्भोजं पलितं म्लानमाननम्। दर्शयामि कथं वध्वे हा धिङ्मे मरणं वरम् ॥४५॥ इत्यादि चिन्तयन्सोऽथ सदस्याहूय भूपतिः। वैद्यं तरणचन्द्राख्यं विजगाद कृतादरः ॥४६॥
सप्तम लम्बक १६१
सप्तम लम्बक १६१ 'हे राजन्! इस प्रकार अच्छी बुद्धिवाले व्यक्ति साधारण प्रयत्न से ही समझाये जा सकते हैं। अविवेकी और दुर्बुद्धि व्यक्ति अत्यन्त कठिनाई से भी नहीं समझाये जा सकते ॥३२॥ हरिशिख के ऐसा कहने पर और गोमुख के समर्थन करने पर अनार्यमना मरुभूति अत्यन्त क्रोध करके बोला— हे गोमुख ! तुम्हारे ऐसे व्यक्तियों की वाणी में ही बल होता है भुजाओं में नहीं। इसलिए बकवादी नपुंसकों के साथ झगड़ा करना भुजबलग्रामी वीरों के लिए उचित नहीं है' ऐसा कहते हुए और युद्ध के लिए उद्यत मरुभूति को मुसकराते हुए स्वामी नरवाहनदत्त ने स्वयं शान्त किया ॥३३-३५॥ और, बालमित्रों पर प्रेम करनेवाले राजा नरवाहनदत्त ने उसे अपने घर वापस भेजकर दैनिक कार्यों में अपना दिन मजे में व्यतीत किया ॥३६॥ दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः मित्रों के आने पर और मरुभूति के सिर नीचा किये रहने पर रत्नप्रभा युवराज से बोली— हे आर्यपुत्र ! तुम धन्य हो तुम्हारे ये सभी मन्त्री बाल्यकाल से स्नेह-सूत्र में बँधे और सुशिक्षित हैं ॥३७-३८॥ और ये भी धन्य हैं जिनके तुम सम स्नेहमय स्वामी हो। तुम लोग पूर्वजन्म के संस्कारों से परस्पर मिले हो इसमें सन्देह नहीं ॥३९॥ उस रानी रत्नप्रभा के ऐसा कहने पर कमलगर्भ का पुत्र एवं नरवाहनदत्त का नर्म-सचिव तान्डक बोला— यह सत्य है कि हमारे स्वामी पूर्वजन्म के अर्जित हैं। यह सब कुछ पूर्वजन्म के संस्कार-वश ही हुआ है। इस प्रसंग में एक कथा सुनें—॥४०-४१॥
तरङ्गदत्त वणिक और राजा अजर की कथा
पूर्वकाल में हिमालय में विद्याधरपुर नामक नगर में यथार्थ नामवाला विनयशील नामक राजा था ॥४२॥ उसकी प्राणों के समान प्यारी कमलप्रभा नाम की रानी थी। राजा उसके साथ सांसारिक सुखों के भोग में चिरकाल तक रहा ॥४३॥ कुछ समय के अनन्तर राजा अपने शरीर में सौन्दर्य का नाश करनेवाली वृद्धावस्था को आई देख अत्यन्त दुःखी हुआ ॥४४॥ सिर (केस) में सफेदी रूप चन्दन के समान सफेदी से मण्डित अपने मुख को देखकर— 'हाय! धिक्कार है! मैं अपना मुँह अपनी रानी को कैसे दिखाऊँ?' हृदय में ऐसा सोच कर लज्जा से अन्तः शान्त हुआ राजा ने तरङ्गदत्त नामक वैद्य को दरबार में बुलाकर आदर के साथ कहा ॥४५-४६॥
१४० कथासरित्सागर
१४० कथासरित्सागर भद्र भवत्स्वमस्मासु कुशलश्छेति पृच्छ्यसे। अप्यस्ति काचिद्युक्तिः सा ययेयं वार्यते जरा ॥४७॥ तच्छ्रुत्वैव कलामात्रसारो वाञ्छन् स पूर्णताम्। वक्रस्तरुणचन्द्रोऽत सत्यनामा व्यचिन्तयत् ॥४८॥ मूर्खोऽयं नृपतिर्मोघ्यो मया वेत्स्यामि च क्रमात्। इति सञ्चिन्त्य स भिषक् तमेवमवदन्नृपम् ॥४९॥ एकस्त्वं गूढे मासानष्टौ यदिदमोषधम्। उपयुङ्क्षे ततो दव जरामपनयामि ते ॥५०॥ एतच्छ्रुत्वैव स नृपस्तद्भूगृहमकारयत्। क्षमन्ते न विचारं हि मूर्खा विषयलोलुपाः ॥५१॥ राजन् सत्त्वेन पूर्वेषां तपसा च दमेन च। रसायनानि सिद्धानि प्रभावेण युगस्य च ॥५२॥ अद्यत्वे च श्रुतान्येव रसान्येतानि भूपते। सामर्थ्याभावात् कुर्वन्ति यत्प्रत्युत विपर्ययम् ॥५३॥ तन्न युक्तमिदं धूर्ताः क्रीडन्त्येव हि बालिशैः। किं श्व समतिक्रान्तमागच्छति पुनर्वयः ॥५४॥ इत्यादि मन्त्रिणां वाक्यं न लेभे तस्य चान्तरम्। आवृते हृदये राज्ञो गाढया मोगतृष्णया ॥५५॥ विवेश च गिरा तस्य भिषजस्तत् स भूगृहम्। एकाकी वारिताशेषराजोचितपरिच्छदः ॥५६॥ एको वैद्यः स्वभृत्येन सहैकेनव तस्य सः। तत्रौषधादिचर्यायां बभूव परिचारकः ॥५७॥ तस्थौ च तत्र स नृपो भूमिगर्भे तमामय। अज्ञान इव भूयस्त्वात् प्रसूते ह्वययाद्वहिः ॥५८॥ गतेषु चात्र मासेषु षण्मापध्वस्य भूपतेः। विलोक्याभ्यधिकीभूतां तां जरां स शठो भिषक् ॥५९॥ आजहार वमप्येवं पुत्रं तावदृशाकृतिम्। राजानं त्वां करोमीति युवानं कृतमंविदम् ॥६०॥ तत गुरुद्धा भूगृहे दूरात्स्थाप्य तं नृपम्। गुप्तं कृत्वा तया नीत्या गोत्रपन्नृपेतिक्षिपत्प्रिति ॥६१॥
सप्तम लम्बक १४१
सप्तम लम्बक १४१ 'हे भले आदमी ! तू हमारा हितैषी है और कुशल वैद्य है इसलिए पूछता हूँ कि क्या कोई ऐसी युक्ति भी है कि बुढ़ापे को रोका जा सके' ॥४७॥ यह सुनकर केवल कलावाजी जाननेवाला एवं यथार्थ नामवाला वह कुटिल तरुणचन्द्र सोचने लगा ॥४८॥ 'यह राजा मूर्ख है और मेरा भोज्य भी। धीरे-धीरे समझूँगा' ऐसा सोचकर राजा से बोला—॥४९॥ 'महाराज ! यदि तुम भूमि के नीचे (तहखाने) में आठ महीनों तक रहकर मेरी औषधि खाओ तो मैं तुम्हारा बुढ़ापा दूर कर दूँ' ॥५०॥ ऐसा सुनते ही राजा ने तुरन्त भू-गृह [तहखाना] बनवाया। विषय-लम्पट मूर्ख विचार करने की शक्ति नहीं रखते ॥५१॥ हे राजन् ! पूर्वजों के तप दम और युग के प्रभाव से बड़े-बड़े रसायन सिद्ध हो चुके हैं। किन्तु, आजकल समय के प्रभाव से उनका नाम ही रह गया है। बल्कि ये विपरीत फल देते हैं॥५२-५३॥ अतः यह उचित नहीं है। धूर्त वैद्य मूर्खों के साथ ठगी करते हैं। महाराज ! क्या गई अवस्था फिर लौटकर आती है? ॥५४॥ इस प्रकार मन्त्रियों की बातें राजा के हृदय में पैठ न सकीं, क्योंकि राजा का हृदय भोग की प्रबल तृष्णा से भरा हुआ था ॥५५॥ अतः वह राजा वैद्य के वचन पर विश्वास करके और राजसी ठाट-बाट छोड़ भू-गृह में अकेला घुसा ॥५६॥ अपने एक भृत्य के साथ वैद्य उस राजा की औषधि आदि से परिचर्या करने लगा। राजा उस अन्धकारमय भू-गृह में इस प्रकार रहने लगा मानों उसका अत्यन्त बढ़ा हुआ अज्ञान हृदय से बाहर निकल पड़ा हो ॥५७-५८॥ इस प्रकार, छह महीने बीतने पर और राजा की वृद्धावस्था को वही देखकर वह दुष्ट वैद्य राजा से मिलती-जुलती आकृतिवाले एक पुरुष को लाया और उस युवा से बोला कि 'मैं तुम्हें राजा बनाता हूँ। उससे इस प्रकार सम्मति करके उसने दूर से ही भूगृह तक एक लम्बी सुरंग बनवाई और उसके द्वारा भू-गृह में जाकर राजा को मार डाला और रात को अंधेरे कुएँ में उसकी काया फेंक दी ॥५९—६१॥
१४२ कथासरित्सागर
१४२ कथासरित्सागर तयैव पुरुषं तं च तरुणं तत्र भूगृहे। प्रवेश्य स्थापयामास सुरङ्गां पिदधे च ताम् ॥६२॥ सम्प्राप्य मूढबुद्धीनामवकाशं निरर्गलम्। उच्छृङ्खलमतिः कुर्यात् प्राकृतः किं न साहसम् ॥६३॥ ततः स सर्वाः प्रकृतीर्वैद्योऽन्येद्युरभाषत। अजरोऽयं कृतस्तावत् पक्वनिर्मासिमया नृपः ॥६४॥ मासद्वयेन चैतस्य रूपमन्यद् भविष्यति। तद् दूरात् किञ्चिदात्मानमस्मै दर्शयताधुना ॥६५॥ इत्युक्त्वा भूगृहद्वारि सर्वानानीय दर्शयन्। तस्मै न्यवेदयद् भूपे स तेषां नामकर्मणी ॥६६॥ इत्यन्तःपुरपर्यन्तं मासद्वितयमन्वहम्। भूगृहेऽथो मधूक्त्या युवानं पुष्य स तम् ॥६७॥ प्राप्ते च समये तं स भोगपुष्टं धरागुहात्। उज्जहाराजरः सोऽयं जातो राजेत्युदाहरन् ॥६८॥ ततश्चौषधिसंसिद्धः सैष राजेति तत्र सः। पर्यष्वज्यत हृष्टाभिः पुमान् प्रकृतिभिर्युवा ॥६९॥ अथ स्नातस्तथा लब्धराज्यो राजोचिताः क्रियाः। चकार स सहामात्यैः सोत्सवास्तरुणं पुमान् ॥७०॥ ततःप्रभृति तस्मै च कुर्वन् राज्यं सुखेन सः। नामाजर इति प्राप्य क्रीडन्नन्तःपुरे सह ॥७१॥ सर्वे चैतमसम्भाव्यवेषवृत्ताविशङ्किनः। रसायनपरावृत्तरूपं स्वं मेनिरे प्रभुम् ॥७२॥ प्रीत्यानुरञ्जयन् प्रकृतीर्देवीं च कमलप्रभाम्। सोऽय स्वमित्रैरजरो राजामुञ्चत सह श्रियम् ॥७३॥ मित्रं भेषजचन्द्राख्यं तथान्यं पद्मदर्शनम्। उभे भारसमै चक्रे हस्त्यश्वग्रामपूरितै ॥७४॥ वैद्यं तरुणचन्द्रं तु प्रक्रियाधममानयत्। न तु तस्मिन् विदधद्वासं सत्यधर्मच्युतात्मनि ॥७५॥ एकदा च स वैद्यस्तं स्वैरं राजानमब्रवीत्। किं मामगणयित्वैव स्वात्मन्येव विचेष्टसे ॥७६॥
सप्तम लम्बक १४५
सप्तम लम्बक १४५ और, उसी सुरंग के रास्ते उस युवा पुरुष को भू-गृह में लेजाकर रख दिया और सुरंग को बन्द कर दिया ।।६२।। बेरोक-टोक मौका पाकर दुष्ट बुद्धिवाले नीच पुरुष मूर्ख व्यक्तियों पर कौन-सा साहसिक कुकर्म नहीं कर डालते ? ।।६३।। ऐसा प्रबन्ध करके दूसरे दिन प्रातःकाल वैद्य ने सभी राज-कर्मचारियों से कहा कि मैंने राजा का बुढ़ापा छह् महीनों में दूर कर दिया । अब वह जवान हो गया है। शेष दो महीनों में उसका दूसरा ही रूप हो जायगा। इसलिए, आप लोग दूर से ही अब उसे अपने को दिखाओ ।।६४-६५।। ऐसा कहकर वह एक-एक राज-कर्मचारी को भू-गृह के दरवाजे पर ले जाकर उनका नाम और पद बतलाकर दिखाने लगा ।।६६।। इस प्रकार, दो महीनों तक उसने रानियों तक को ले जाकर उस युवा पुरुष का परिचय कराया ।।६७।। आठ मास पूरे होनेपर खा-पीकर मुटाये हुए उस पुरुष को भू-गृह से निकालकर उसने घोषणा कर दी कि यह वही राजा ओषधि के प्रभाव से युवा और बुढ़ापे से रहित हो गया है इस घोषणा से प्रसन्न प्रजाओं ने भी उस युवा को ही राजा मान लिया। तदनन्तर उस युवा पुरुष को स्नान कराके मन्त्रियों ने साथ उसका राज्याभिषेक उत्सव किया ।।६८-७० ।। तब से वह युवा राजा अजर इस नाम से विख्यात होकर रानियों के साथ क्रीड़ा करता और राज्य का भोग करता हुआ सुख से रहने लगा ।।७१।। राजभवन के सभी व्यक्ति इस असम्भव काम करने वाले वैद्य की विद्या के चमत्कार पर विश्वास करके उसे ही पुराना राजा मानकर और अपना स्वामी समझकर उसकी सेवा करने लगे ।।७२।। वह युवक भी अपने प्रेम से प्रजा और राज-कर्मचारियों को तथा महाराणी कनकप्रभा को प्रसन्न करके राजोचित व्यवहार करता हुआ मन्त्रियों के साथ प्रसन्नता से राज-कार्य करने लगा ।।७३।। और अपने अनन्य एवं प्राचीन मित्र मेघचन्द्र और पद्मदशन को हाथी घोड़े एवं ग्राम आदि प्रदान कर उनके साथ विशेष प्रीति रखने लगा ।।७४।। किन्तु तरुणचन्द्र वैद्य को केवल व्यावहारिक दृष्टि से मानता था। किन्तु, सत्यधर्म से घिरी हुई आत्मावाला उस पर विश्वास नहीं करता था ।।७५।। एकबार उस वैद्य तरुणचन्द्र ने एकान्त में राजासे कहा कि तू मुझे कुछ न समझकर स्वतन्त्र रूप से काम क्यों करता है ? ।।७६।।
१४४ कथासरित्सागर
१४४ कथासरित्सागर तद्विस्मृतं यदा राजा भवानिह मया कृतः। तच्छ्रुत्वा स राजा समजरो वैद्यमभ्यधात् ॥७७॥ अहो मूर्खोऽसि कः कस्य कर्ता दातापि वा पुमान्। प्राक्तनं कर्म हि सर्वं करोति च ददाति च ॥७८॥ अतस्त्वं मा कृथा दर्पं तपःसिद्धमिदं हि मे। एतच्च दर्शयिष्यामि प्रत्यक्षमचिरेण ते ॥७९॥ इत्युक्तस्तेन स ग्रस्त इव वैद्यो व्यचिन्तयत्। अहो किमप्यधृष्टोऽयं धीरो ज्ञानीव भाषते ॥८०॥ यद्वहस्त्यान्तरङ्गत्वं स्वामिसंबन्धनं परम्। तदपि क्षमते नास्मिन्ननुवर्त्यस्तथैव मे ॥८१॥ पश्यामि तावत् किमय साक्षान्म दर्शयिष्यति। इत्यालोच्य तथैत्येव भिषक् तूष्णीं बभूव सः ॥८२॥ अन्येद्युश्चामरो राजा परिभ्रान्तुं स निर्ययौ। क्रीडस्तरुणचन्द्राख्यं सेव्यमानः सुहृत्सखः ॥८३॥ भ्राम्यन् प्राप्तो नदीतीरं यस्या मध्ये ददर्श सः। प्रवाहे वहदायातं सौवर्णं पद्मपञ्चकम् ॥८४॥ वानाययच्च भृत्यैस्तद् गृहीत्वा प्रविलोक्य च। वैद्यं तरुणचन्द्रं स जगाद निकटस्थितम् ॥८५॥ नदीतीरेण गच्छ त्वमुपरिष्टादितोऽमुना। उत्पत्तिस्थानमेतेषां पङ्कजानां गवेषय ॥८६॥ तच्च दृष्ट्वा त्वमागच्छ सुमहत्कौतुकं हि मे। अद्भुतेष्वेपु पद्मेशु त्वं च दक्षः सुहृन्मम ॥८७॥ इत्युक्त्वा प्रहितस्तेन राज्ञा स विवशो भिषक्। यथादिष्टेन मार्गेण तथेति प्रययौ सतः ॥८८॥ राजाप्यासीत् स्वपुरं स च गच्छन् भिषक क्रमात्। प्रापदायतनं शैवं नद्यास्तस्यास्तटस्थितम् ॥८९॥ तदग्रे तत्सरित्तीर्थे सट वनमहातरुम्। अपश्यत्स्यन्दमानं च तस्मिन् नरवरद्वपुम् ॥९०॥ तत्र श्रान्तः कृतस्नानो देवमभ्यर्च्य तत्र सः। यावत्तिष्ठति मधोऽत्र तावदागत्य पृच्छताम् ॥९१॥
सप्तम लम्बक १४५
सप्तम लम्बक १४५ क्या तुम यह भूल गये कि उस समय मैंने ही तुझे राजा बनाया था। यह सुनकर वह राजा वज्र उस वैद्य से बोला ॥७७॥ अरे ! तू बड़ा ही मूर्ख है। कौन किसका बनाता या बिगाड़ता है ? पूर्वजन्म के कर्म ही देते और बनाते हैं। इसलिए तू घमण्ड न कर । यह राज्य तो मेरे तप से प्राप्त हुआ है। यह मैं शीघ्र ही तुझे प्रत्यक्ष दिखलाऊँगा' ॥७८-७९॥ राजा से इस प्रकार फटकारा गया वैद्य तरणचन्द्र सोचने लगा कि यह मेरे साथ डिठाई नहीं कर रहा है और वीरता के साथ ज्ञानी के समान बातें कर रहा है ॥८० ॥ रहस्य की बातों में अन्तरंग बनना और वह भी इसमें सम्भव नहीं है तो भी मुझे इसके पीछे-पीछे ही चलना चाहिए। यह भी देखता हूँ कि यह मुझे प्रत्यक्ष क्या दिखलायेगा ? यह सोचकर वैद्य उसकी बात मानकर चुप हो गया ॥८१-८२॥ किसी दूसरे दिन राजा वज्र, टहलने के लिए तरणचन्द्र आदि मित्रों के साथ बाहर निकला ॥८३॥ टहलते-टहलते वह नदी के किनारे पहुँचा और उसने नदी के बीच धारा में बहते हुए सोने के पाँच कमल देखे ॥८४॥ राजा ने नौकरों से उन कमलों को मँगवाकर हाथ में रखकर और देखकर पास में खड़े तरणचन्द्र वैद्य से कहा — तुम अभी नदी के किनारे-किनारे ऊपर की ओर जाओ और इन सोने के कमलों का उत्पत्ति-स्थान खोजो ॥८५-८६॥ उसे देखकर तुम मेरे पास आओ मुझे उन सोने के कमलों के लिए बहुत उत्सुकता हो रही है। और तुम मेरे चतुर मित्र हो ॥८७॥ ऐसा कहकर राजा से भेजा गया वह विप्र वैद्य की आज्ञा तथा कहकर राजा के बताये मार्ग से चला गया और राजा अपने महल में लौट आया। कमलों को खोजता हुआ वह वैद्य नदी के तट पर स्थित एक शिव-मन्दिर में पहुँचा ॥८८-८९॥ वैद्य ने नदी के उद्गम-स्थान पर सरोवर के किनारे एक पत्र-बहुल वट को देखा और उसने उस पर लटकते हुए नरकंकाल को भी देखा ॥ ९० ॥ वैद्य उस नरकंकाल को प्रणाम करके देवता का पूजन करके जैसे ही जल से ... ९