कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर तन्निमे नरसिंहोऽयमजेयोऽप्रतिमस्ती बलैः । द्वन्द्वयुद्धेन च मया साकमय नियुध्यसे ॥१३२॥ भूचर धुधरो भूत्वा न चैन कृतवानहम्। अधर्मयुद्धेन जय को हीच्छेत्क्षत्रियो भवन् ॥१३३॥ तन्मे प्रतिज्ञासाध्य यद्बन्धिभिर्द्वारवर्तिन । आश्वदन् नृपस्यास्य तत्र साहायक कुरु ॥१३४ एतच्छ्रुत्वैव धन्यास्मीत्युक्त्वा राज्ञामूना सह। समन्त्र्य गणिकाथ स्वानाहूयोवाच बन्दिनः ॥१३५॥ नरसिंहो यदा राजा गृहमेष्यति मे तदा। द्वारसन्निहितैर्भाव्य भवद्भिर्दत्तदृष्टिभिः ॥१३६॥ देव भक्तोऽनुरक्तश्च नरसिंहनृपस्त्वयि। इति वाच्य च युष्माभिस्तस्य प्रविशतो मुहुः ॥१३७॥ कः स्थितोऽत्रति यदि च प्रक्ष्यत्युत्प्रेक्ष्य तत्क्षणम्। स्थितोऽत्र विक्रमादित्य इति वक्तव्य एव सः ॥१३८॥ इत्युक्त्वा तान्विसृज्याथ प्रतीहारी जगाद सा। नरसिंहो न राजात्र निवेश्यः प्रविशन्निति ॥१३९॥ एव कृत्वा पुन प्राप्तप्राणनाथा यथासुखम्। तस्थौ मदनमाला सा नि सस्य वदती यस्तु ॥१४०॥ तत श्रुत्वातिदान तत्सौवर्णपुरुषोद्भवम्। नरसिंहनृपो हित्वाप्यागाद्द्रष्टु स तद्गृहम् ॥१४१॥ प्रतीहारानिषिद्धस्य तस्य प्रविशतोऽत्र च। भा बहिर्द्वारसिस्तारमूबू घर्मेऽपि बन्दिनः ॥१४२॥ नरसिंहो नृपो देव प्रणतो भक्तिमागिति। तच्च शृण्वन्स सामर्ष सशङ्कश्चामवन्नृपः ॥१४३॥ पृष्ट्वा च कः स्थितोऽत्रेति श्रुत्वा तत्र स्थित च तम्। राजानं विक्रमादित्य क्षणमेवमचिन्तयत् ॥१४४॥ तदिद प्राक्प्रतिज्ञात द्वारि मन्त्रिनिवेदनम्। निर्मूढममुना राज्ञा प्रसह्यान्त प्रविश्य मे ॥१४५॥ अहो राजायमोजस्वी येनाद्यैवमह जितः। न च बध्यो बलेनाद्यावेशकी मे गृहागतः ॥१४६॥
सप्तम लम्बक ९७
सप्तम लम्बक ९७ यह कहकर अपनी प्रतिज्ञा सुनाकर फिर बोला—'प्रिये ! यह राजा अत्यन्त बलवान् है अत' अजेय है। यह मेरे साथ द्वन्द्व-युद्ध कर सकता था क्योंकि मैं आकाशचारी होकर भूमि चारी को मारना नहीं चाहता था। कौन व्यक्ति क्षत्रिय होकर अधर्म-युद्ध से विजय प्राप्त करना चाहेगा ? ॥१३२—१३३॥ इसलिए, मेरी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए द्वार पर आये हुए नरसिंह के आगमन की सूचना दिलाने में मेरी सहायता करो ॥१३४॥ यह सुनकर वेश्या बोली—'मैं धन्य हूँ'। तदनन्तर राजा से आवश्यक परामर्श करके वेश्या ने अपने बन्दियों को बुलाकर कहा—'राजा नरसिंह जब मेरे घर पर आवेगा तब तुम लोग उसपर दृष्टि रखते हुए द्वार के पास ही रहना और उसके द्वार में प्रवेश करने के समय कहना— 'महाराज ! राजा नरसिंह आप पर भक्ति और अनुराग रखता है। यदि राजा नरसिंह उस समय यह कहे कि यहाँ कौन ठहरा है तो कहना कि यहाँ राजा विक्रमादित्य है। ऐसा कहकर और उन्हें विदाकर मदनमाला ने द्वारपालिका से कहा—'यहाँ अन्दर आते हुए राजा नरसिंह को रोकना नहीं' ॥१३५–१३९॥ ऐसा प्रबन्ध करके प्राणनाथ को पुनः प्राप्त की हुई मदनमाला भिक्षुओं को असंख्य धन देती हुई राजा के साथ सुख से रहने लगी ॥१४० ॥ तदनन्तर, सोने के पुष्पों द्वारा असंख्य दान करती हुई मदनमाला का समाचार सुनकर चकित राजा नरसिंह उस वेश्या के घर का परित्याग कर बने पर भी सोने के पुष्पों को देखने के लिए उसके यहाँ आया ॥१४१॥ द्वारपालों से न रोके हुए राजा नरसिंह के भीतर आते ही मदनमाला के बन्दीजन बाहरी द्वार से ही जोर से चिल्लाकर बोले—'महाराज राजा नरसिंह आपके प्रति भक्ति रखता है। और भक्त है। यह सुनकर राजा नरसिंह क्षण भर के लिए क्रोध और शंका से भर गया ॥१४२–१४३॥ उसने पूछा कि यहाँ कौन ठहरा है ? राजा विक्रमादित्य को यहाँ ठहरा हुआ जानकर राजा नरसिंह ने एक क्षण के लिए सोचा—॥१४४॥ राजा विक्रम ने पहले ही द्वार पर मेरी सूचना दिलाने की प्रतिज्ञा की थी उस प्रतिज्ञा को राजा ने हठात् मेरे घर में घुसकर ही पूरा किया ॥१४५॥ आश्चर्य है कि यह राजा बहुत तेजस्वी है जिसने आज ही मुझे जीत लिया और एकाकी एवं मेरे घर पर आया हुआ यह मेरे लिए मारण योग्य भी नहीं है ॥१४६॥ १३
कथासरित्सागर
८ कथासरित्सागर
तत्तावत् प्रविशामीति नरसिंहो विचिन्त्य सः। विवेशाभ्यन्तरं राजा बन्दिवृन्दनिवेदितः॥१४७॥ प्रविष्टं तं च दृष्ट्वैव सस्मितं सस्मिताननः। उत्थाय विक्रमादित्यः कण्ठे जग्राह भूपतिम्॥१४८॥ अथोपविष्टौ तौ द्वावप्यन्योन्यकुशलं नृपौ। तस्यां मदनमालायां पार्श्वस्थायामपृच्छताम्॥१४९॥ कथाक्रमाच्च पप्रच्छ विक्रमादित्यमत्र सः। नरसिंहः कुतोऽनेमे सुवर्णपुरुषा इति॥१५०॥ ततोऽथ विक्रमादित्यो निहतश्रमणाधमम्। साधिताकाशगमनं विस्रस्वरवरेण च॥१५१॥ सम्प्राप्ताक्षयसौवर्णमहापुरुषपञ्चकम्। कृत्स्नं कथितवानस्मै स्ववृत्तान्तं समद्भूतम्॥१५२॥ नरसिंहोऽथ मत्वा तं महाशक्तिं नमेश्वरम्। अपापबुद्धिं धृतवान् मित्रत्वाय नृपो नृपम्॥१५३॥ प्रतिपन्नसुहृत्त्वं च कृताचारविधिं तथा। राजधानीं निजां नीत्वा स्वोपचारैरुपञ्चरत्॥१५४॥ सम्मान्य प्रहितस्तेन राज्ञा च स नृपः पुनः। गृहं मदनमालाया विक्रमादित्य आययौ॥१५५॥ अथ स निजौजःप्रतिभासम्पादितदुस्तरप्रतिज्ञार्थः। गन्तुं चकार चेतो निजनगरे विक्रमादित्यः॥१५६॥ तेन समं सा जिगमिषुरसहा विरहस्य मदनमालापि। त्यक्ष्यन्ती तं वेशं शृङ्गारसवाकृतं वसतिं स्वाम्॥१५७॥ ततस्तया साकमनन्यचित्तया तदीयहस्त्यश्वबलात्यनुद्रुतः। स विक्रमादित्यनरेन्द्रचन्द्रमा निजं पुरं पाटलिपुत्रकं ययौ॥१५८॥ तत्र तेन सह बद्धसौहृदस्तस्थिवान् स नरसिंहभूपुतः। मन्वितो मदनमालया तया प्रेममुक्तनिजवेशया सुखम्॥१५९॥ इति देव भवत्युदारसत्त्वे दृढरक्तश्च विलासिनीजनोऽपि। अवरोधसमो महीपतीनां किमुतान्यः कुलजः पुरन्धि्रलोकः॥१६०॥ इत्थं निशम्य मरुभूतिमुखादुदारामेतां कथां स नरवाहनदत्तभूपः। विद्याधरोत्तमहृद्यप्रमदां च तस्यै रत्नप्रभां नववधूम्यैधित प्रमोदम्॥१६१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।
सप्तम लम्बक ९९
सप्तम लम्बक ९९ 'अच्छा जो हो मैं अन्दर जाता हूँ। देखा जायगा'। इस प्रकार सोचता और बन्दियों ने सूचित किया जाता हुआ राजा अन्दर गया ॥१४७॥ उसके अन्दर आते ही मुस्कराते हुए राजा विक्रमादित्य ने उठकर उसे गले से लगा लिया ॥१४८॥ तदनन्तर मदनमाला के समीप ही बैठे हुए दोनों ने आपस में कुशल-मंगल पूछा ॥१४९॥ वार्तालाप के सिलसिले में राजा नरसिंह ने विक्रमादित्य से पूछा कि 'ये सोने के मनुष्य कैसे आये ? ॥१५०॥ तब उसी प्रसंग में राजा विक्रम ने प्रचंडबुद्धि भिक्षु का मारना धनपति कुबेर से आकाश- गति और आश्चर्यसुवर्ण के पाँच महापुरुषों की प्राप्ति की वह आश्चर्यभरी समस्त कथा कह सुनाई ॥१५१ १५२॥ विक्रम का वृत्तान्त सुनकर उसे आकाशचारी एवं महाशक्तिशाली जानकर नरसिंह ने मित्रता के लिए प्रस्ताव किया और मित्रता प्राप्त की ॥१५३॥ इस प्रकार, मित्रता प्राप्त करने पर राजा नरसिंह ने विक्रम को अपनी राजसभा में ले जाकर राजोचित स्वागत-सत्कार से सम्मानित किया और उसके द्वारा सम्मानित राजा विक्रम फिर से मदनमाला के घर पर आ गया ॥१५४ १५५॥ इस प्रकार, अपने बल और प्रतिभा प्रकर्ष से अपनी असाधारण प्रतिज्ञा को पूरी करके राजा विक्रमादित्य ने अपने नगर पाटलिपुत्र में जाने का विचार किया ॥१५६॥ राजा के वियोग को सहन न करती हुई मदनमाला भी अपने देश का त्याग कर और अपनी सम्पत्ति ब्राह्मणों को दान करके राजा के साथ पाटलिपुत्र जाने को उद्यत हुई ॥१५७॥ तब राजाओं में चन्द्रमा के समान वह राजा विक्रमादित्य अनन्य चित्तवाली प्राणप्रिया मदनमाला को उसके हाथी घोड़े और मंत्रियों के साथ अपने पाटलिपुत्र नगर में ले आया ॥१५८॥ राजा नरसिंह के दृढ़ स्नेहयुक्त सौहार्द से सन्तुष्ट राजा विक्रम प्रेम के कारण स्वदेश को छोड़कर आई हुई मदनमाला के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१५९॥ हे महाराज (नरवाहनदत्त) इस प्रकार वेश्याएँ भी उदारचरित और वैसी ही सदाचारिणी होती हैं—जैसी महानिशिखा। अन्य कुलीन स्त्रियों की तो बात ही क्या ॥१६०॥ इसप्रकार मरुभूति के मुख से उदार कथा को सुनकर राजा नरवाहनदत्त की उनकी उत्तम विद्याधर-कुल के अनुरूप तत्त्वभू रत्नप्रभा ने अत्यधिक आनन्द प्राप्त किया ॥१६१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का चौथा तरंग समाप्त
१ कथासरित्सागर
१ कथासरित्सागर पञ्चमस्तरङ्गः राजपुत्रशृङ्गभुजस्य रूपशिखायाश्च कथा एवं कथितवत्यत्र मरुभूतौ चमूपतिः । नरवाहनदत्तस्य पुरो हरिशिखोऽब्रवीत् ॥१॥ सत्यमेव न सुस्त्रीणां भर्तुरन्यत्परायणम् । तथा च श्रूयतामेषाप्यत्र चित्रतरा कथा ॥२॥ वर्धमानपुरं नाम यदस्ति नगरं भुवि । तत्र वीरभुजाख्योऽभूद्राजा धर्मभृतां वरः ॥३॥ अन्तःपुरशते तस्य विद्यमानेऽप्यभूत्प्रभोः । एका गुणवरा नाम राज्ञी प्राणाधिकप्रिया ॥४॥ पत्नीशतस्य मध्य च न तावद् दैवयोगतः । एकस्यामपि कस्याञ्चित्सुतस्तस्योदपद्यत ॥५॥ तेन वैद्यं स पप्रच्छ श्रुतवर्धनसञ्ज्ञकम् । कश्चिदस्त्यौषधं तादृग्येन स्यात्पुत्रसम्भवः ॥६॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्वैद्यो देवेनैतत्प्रसाध्यमहम् । वन्यच्छागस्य किन्तु देवेनानाय्यतां गलः ॥७॥ इत्याकर्ण्य भिषग्वाक्यं प्रतीहारं स भूपतिः । आदिश्यानाययामास तस्य च्छागवरं वनात् ॥८॥ तं छागं राजसूनुघ्नं समर्प्य स भिषक्ततः । तन्मांसे साधयामास राज्ञ्यर्थे रसमोत्तमम् ॥९॥ आदिश्यैकत्र राज्ञीनां प्रेष्य देवमर्चितुम् । गते राज्ञि मिलन्ति स्म देव्य एकत्र यत्र ताः ॥१०॥ एका तु मिलिता नासीद्राज्ञो गुणवरात्र सा । राज्ञो देवार्चनरतस्य तत्कालं निकटे स्थिता ॥११॥ मिलिताभ्यश्च ताभ्यस्तत्पानार्थं चूर्णमिश्रितम् । अविभज्यैव रसकं निधाय स ददौ भिषक् ॥१२॥ कृताप्लवार्चनः सोऽथ राजागत्य प्रियायुतः । वीथ्याद्येवोपयुक्तं तद्दृष्ट्वा वैद्यं समभ्यधात् ॥१३॥ अहो न पायितं किञ्चित्त्वया गुणवराकृते । यत्प्रधानोऽयमारम्भस्तन्मेव तव विस्मृतम् ॥१४॥
सप्तम लम्बक ११
सप्तम लम्बक ११ पञ्चम तरंग राजपुत्र शृंगभुज और रूपशिखा की कथा इस प्रकार, मरुभूति के कथा सुनाने पर सभापति हरिशिखर ने नरवाहनदत्त के सम्मुख कहा—॥१॥ 'यह सत्य है, कुलीन स्त्री के लिए पति ही एकमात्र गति है। इस प्रसंग में एक आश्चर्यमयी कथा सुनो—॥२॥ इस भूतल पर वर्धमान नामक जो नगर है, उसमें वीरभुज नाम का राजा था। उसकी रानियों में गुणवरा नाम की महाराज्ञी उसे प्राणों से भी अधिक प्यारी थी॥३-४॥ उस राजा की एक सौ रानियों में एक को भी पुत्र (सन्तान) नहीं था॥५॥ इस कारण राजाने श्रुतवर्धन नामक वैद्य को बुलाकर पूछा कि क्या ऐसी कोई औषधि है कि जिससे पुत्र की उत्पत्ति हो सके॥६॥ यह सुनकर वैद्य ने कहा—'महाराज! मैं इस कार्य को सिद्ध करता हूँ किन्तु यदि आप मेरे लिए एक जंगली बकरा मँगा दें ॥७॥ वैद्य की बात सुनकर राजा ने द्वारपाल को आज्ञा देकर जंगली बकरा मँगा दिया॥८॥ उस बकरे का राजा के रसोईदारों द्वारा वैद्य ने रानियों के लिए स्वादिष्ट रस (शोरबा) बनवाया॥९॥ राजा सब रानियों को एक स्थान पर आने की आज्ञा देकर स्वयं भगवान् की पूजा करने चला गया और सभी रानियाँ एक स्थान पर एकत्र हो गईं॥१०॥ इनमें केवल एक महाराज्ञी गुणवरा अनुपस्थित रही, क्योंकि वह उस समय राजा के साथ देव-पूजन में संलग्न थी॥११॥ सब रानियों के एकत्र होने पर वैद्य ने उनके पीने के लिए चूल्हे से निकाला हुआ सम्पूर्ण भाग उन उन में बाँट दिया॥१२॥ तुरन्त ही राजा पूजन करके रानी गुणवरा के साथ वहाँ आया और सभी मांस-रस को समाप्त देखकर वैद्य से बोला—'बहुत बुरा हुआ कि तुमने गुणवरा के लिए कुछ भी रस बचाकर नहीं रखा। जिसके लिए यह सब कुछ किया गया, उसे ही तुम भूल गये? —॥१३-१४॥
१०२ कथासरित्सागर
१०२ कथासरित्सागर इत्युक्त्या स विशस्य तं वैद्यं सूदान्नृपोऽब्रवीत्। किं तस्य शृङ्गालस्यास्ति मांसशेषोऽत्र कश्चन ॥१५॥ शृङ्गे परे स्त इत्युक्ते सूदैर्वेद्योऽथ सोऽब्रवीत्। साधु तद्घृतं हि स्यात्प्रसूतौ शृङ्गगर्भजम् ॥१६॥ इत्युक्त्वा कारयित्वैव तत्ततः शृङ्गमांसतः। तस्यै गुणवरायै स चूर्णमिश्रं भिषग्ददौ ॥१७॥ ततस्तस्याश्च नवतिर्देभ्यो राज्ञो नवाधिका। आसन्गर्भाः काले च सर्वाः सुषुविरे सुतान् ॥१८॥ अर्वागुपात्तगर्भा च सा सर्वोत्तमलक्षणम्। प्रासूत स्म महादेवी पश्चाद् गुणवरा सुतम् ॥१९॥ शृङ्गमांसरसोत्पन्नं नाम्ना शृङ्गभुजं च तम्। पिता वीरभुजश्चक्रे राजा कृतमहोत्सवः ॥२०॥ वर्धमानः सहान्यैस्तैर्भ्रातृभिर्वयसा परम्। कनिष्ठः सोऽभवत्तेषां गुणैर्ज्येष्ठतमस्त्वभूत् ॥२१॥ क्रमात्स राजपुत्रश्च रूपे कामसमो बभौ। धनुर्वेदेऽर्जुनसमो भीमसेनसमो बले ॥२२॥ तच्च सपुत्रां सुतरां दृष्ट्वा वीरभुजस्य ताम्। प्रियां गुणवरां राज्ञो देव्योऽन्या मत्सरं ययुः ॥२३॥ अथ तास्वयशोलेखा नाम राज्ञी दुराशया। सम्मन्त्र्य ताभिरन्याभिः सह कृत्वा च संविदम् ॥२४॥ समस्ताभिः सपत्नीभिस्तं राजानं गृहागतम्। मुषाधृतमुखग्लानिं पृच्छन्तं कृच्छ्रतोऽब्रवीत् ॥२५॥ आर्यपुत्र कथं नाम सहसे गृहदूषणम्। परस्य रक्षिताद्य न रक्षस्यात्मनः कथम् ॥२६॥ यः सुरक्षितनाभायमन्तःपुरपतिर्युवा। तत्सक्ता हि त्वदीयेषा राज्ञी गुणवरा किल ॥२७॥ तदन्यस्य न कामोऽस्ति सौविदल्ल१निरीक्षिते। अन्तःपुरेऽत्र पुंसो यद्दत्तासौ तेन सङ्गता ॥२८॥ १ सौविदल्लः कञ्चुकी। तल्लक्षणं यथा — अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः। सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते॥
ऐसा सुनकर वैद्य को लज्जित और स्तब्ध देखकर राजा ने पाचक से कहा—'क्या उस बकरे का कुछ भी मांस शेष है' ? ॥१५॥ 'हाँ देव! दो सींग बचे हैं' पाचक के ऐसा कहने पर वैद्य बोला—'ठीक है, सींगों के अन्दर का मांस तो बहुत उत्तम होगा उसे पकाओ। ऐसा कहकर और सींगों के मांस से रस बनवाकर वैद्य ने चूर्ण मिलाकर रानी गुणवरा को दिया ॥१६—१७॥ उस ओषधि के सेवन से राजा की निन्यानब्बे रानियां एक साथ ही गर्भवती हुईं और साथ ही उन्होंने पुत्रों का प्रसव किया ॥१८॥ सबसे अन्त में रस-पान करने के कारण रानी गुणवरा ने सम्पूर्ण शुभलक्षणों से युक्त पुत्र को सबसे पीछे प्रसव किया ॥१९॥ यह बालक शृंग के मग मांसरस में उत्पन्न हुआ था इसलिए राजा ने इसका नाम शृंगभुज रख दिया ॥२०॥ क्रमशः भाइयों के साथ बड़ा होता हुआ शृंगभुज रूप से अवस्था में छोटा होने पर भी गुणों में उनसे बहुत बड़ा मालूम होता था ॥२१॥ क्रमशः वह राजकुमार शृंगभुज रूप में कामदेव के समान धनुर्वेद में अर्जुन के समान और बल में भीमसेन के समान हुआ ॥२२॥ इस प्रकार, गुणवाले पुत्र के साथ उसकी माता गुणवरा को सन्तुष्ट देखकर राजा वीरभुज की अन्य रानियाँ उससे डाह करने लगीं ॥२३॥ इनमें सबसे दुष्ट रानी अयशोलेखा ने इस स्थिति को देखकर सभी रानियों से मिलकर एक सम्मति की और राजा के घर आने पर बुरे ही मुँह को मलिन बना लिया और राजा के पूछने पर बड़ी ही कठिनाई से बोली—'आर्यपुत्र ! तुम घर के भीतर का कलंक कैसे सहन करते हो ? दूसरों की बुराई की रक्षा करते हो और उस (बुराई) से अपनी रक्षा क्यों नहीं करते हो ? ॥२४—२६॥ यह जो गुहा इस नाम का रतिपाल का प्रधान नौकर है उससे तुम्हारी रानी गुणवरा आसक्त है ॥२७॥ नपुंसिका द्वारा गुहोक्त रतिपाल के अन्तःपुरस्थी इन्दिरा के साथ स्त्री की सम्भावना रही है इसलिए यह रानी उसी गुहा से संभोग करती है ॥२८॥
१४ कथासरित्सागर
१४ कथासरित्सागर सर्वत्रान्तःपुरे चैतत्प्रसिद्धमिह गीयते। इत्युक्तः स तया राजा दध्यौ च विममर्श च ॥२९॥ गत्वा चैकैकशो राज्ञीरन्याः पप्रच्छ ताः क्रमात्। ताश्च तस्मै तथैवोचुः सर्वा रक्षितकथवा ॥३०॥ ततः स मतिमान् राजा जितक्रोधो व्यचिन्तयत्। तयो सम्भाष्यते नैतत्प्रवादश्चायमीदृशः ॥३१॥ तदा निश्चित्य कार्यो मे प्रतिमेषो न कस्यचित्। युक्त्या तु परिहार्यौ तौ सम्प्रत्यस्तमवेक्षितुम् ॥३२॥ इति निश्चित्य सोऽन्येद्युरास्थानेऽन्तःपुराधिपम्। सुरक्षितं तमाहूय कृतकोपं समभ्यधात् ॥३३॥ ब्रह्महत्या त्वया पाप कृतेत्यवगतं मया। तत्त्वामकृतसत्तीर्थयात्रं न द्रष्टुमुत्सहे ॥३४॥ तच्छ्रुत्वा च समुद्भ्रान्तः ब्रह्महत्या कुतो मया। कृता देवेति जल्पन्तं स राजा पुनरब्रवीत् ॥३५॥ मा स्म धाष्ट्र्यं कृथा गच्छ काश्मीराञ्त्यापनाशनान्। यत्र तद्विजयक्षेत्रं नन्दिक्षेत्रं च पावनम् ॥३६॥ वाराहं यत्र च क्षेत्रं ये पूताश्चक्रपाणिना। धत्ते नाम वितस्तेति वहन्ती यत्र जाह्नवी ॥३७॥ यत्र तन्मण्डपक्षेत्रं यत्र चोत्तरमानसम्। तत्तीर्थयात्रापूतो मां पुनर्द्रक्ष्यसि नान्यथा ॥३८॥ एवमुक्त्वा तमवशं विससर्ज सुरक्षितम्। स युक्त्या तीर्थयात्रायां दूरं वीरभुजो नृपः ॥३९॥ छतो गुणवरावेश्म पूर्वं तस्या जगाम सः। सस्नेहश्च सकोपश्च सविमर्शश्च भूपतिः ॥४०॥ तत्र सा खिन्नमनसं तं दृष्ट्वापृच्छदादृता। आर्यपुत्र किमद्यैवमकस्माद् दुर्मनायसे ॥४१॥ तच्छ्रुत्वा स महीभृत्तामेवं कृतकमभ्यधात्। अद्याग्य महाभागी देवी मां कोऽप्यभाषत ॥४२॥ राजन् गुणवरा देवी मासं कञ्चन भूगृहे। स्थापनीया त्वया भाव्यं स्वयं च ब्रह्मचारिणा ॥४३॥
सप्तम लम्बक १५
सप्तम लम्बक १५ यह बात सारे अन्तःपुर में प्रसिद्ध हो गई है, यह सुनकर राजा चिन्तित हुआ और विचार करने लगा ॥२९॥ उसके बाद एक-एक रानी के पास गया और क्रमशः उन सब से पूछा। उन सभी रानियों ने कपट करके एक ही बात कही जो पहले से निश्चित कर चुकी थीं ॥३० ॥ तब उस बुद्धिमान् और सहिष्णु राजा ने सोचा— उन राजा के सम्बन्ध में ऐसी बात की सम्भावना तो नहीं है, किन्तु प्रवाद ऐसा हो गया है। इसलिए बिना पूर्ण निश्चय के मुझे यह रहस्य नहीं खोलना चाहिए। इस समय अन्तिम स्थिति देखने के लिए दाना को रोकना चाहिए ॥३१-३२॥ ऐसा निश्चय करके दूसरे दिन राजा ने रनिवास के अध्यक्ष मुरक्षित को दरबार में बुलाकर कोप प्रदर्शित करते हुए कहा—॥३३॥ 'रे पापी ! मैंने पता लगाया है कि तूने ब्रह्महत्या की है। इसलिए तीर्थयात्रा किये बिना तुझे मैं देखना नहीं चाहता' ॥३४॥ यह सुनकर घबराय हुए 'महाराज ! मैंने ब्रह्महत्या नहीं की' —ऐसा कहते हुए मुरक्षित से राजा ने फिर कहा—॥३५॥ 'पूछता न करो। पाप का नाश करनेवाले कश्मीर देश को जाओ। वहाँ विजय- क्षेत्र और पवित्र नन्दिक्षेत्र है ॥३६॥ और वहाँ वराह-क्षेत्र है। उन क्षेत्रों को भगवान् विष्णु ने पवित्र किया है। जिस देश में बहती हुई जाह्नवी (गंगा) वितस्ता नाम-धारक बनती है, जहाँ उत्तर-मानस नामक पवित्र स्थल है। इन तीर्थों की यात्रा करके पवित्र होकर मेरे पास आना—एम नहीं' ॥३७-३८॥ ऐसा कहकर उस बेचारे मुरक्षित को राजा वीरभुज ने तीर्थयात्रा के बहाने युक्तिपूर्वक दूर भेज दिया ॥३९ ॥ सब स्नेह, क्रोध और चिन्ता में पड़ा राजा गुणवरा रानी के समीप गया। वहाँ उसे विमनिमन देखकर व्याकुल रानी ने पूछा कि 'हे नरपुङ्गव ! आज सहसा आप मुख दुःखी क्यों हो?' ॥४०-४१॥ यह सुनकर राजा वीरभुज रानी से बनावटी बात बोला— 'हे महारानी ! किसी महाज्ञानी विद्वान् (ज्योतिषी) ने आकर मुझे कहा—॥४२॥ राजन् ! शनीश्वरादि ग्रह तुम पर क्रुद्ध हैं, निष्प्रजा (सन्तानहीन) दशा हो और अब इस प्रकारी दशा॥४३॥
राज्यभ्रंशोऽन्यथा ते स्यान्मृत्युस्तस्माच्च निन्दितम्। इत्युक्त्वा स गतो ज्ञानी विषादोऽभूत्ततो मम॥४४॥ एवं तनोदिते राज्ञा राज्ञी गुणवरा तु सा। भयानुरगविभ्रान्ता सा जगाद पतिव्रता॥४५॥ साहाय्यिपुत्र नार्थेन किं मां क्षिपसि भूगृहे। धन्या ह्यस्मि यदि प्राणैरपि स्यान्मे हितं तव॥४६॥ मम वा मृत्युरस्त्वत्र तव माऽभूदनिर्वृतिः। इहामुत्र च नारीणां परमा हि गतिः पतिः॥४७॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा साधु सोऽचिन्तयत्प्रभुः। शङ्के न पापमेतस्यां न च तस्मिन्सुरक्षिते॥४८॥ स ह्यम्लानमुखच्छायो निराशङ्को मयेक्षितः। कष्टं तथापि जिज्ञासे प्रवान्तस्यास्य निश्चयम्॥४९॥ इत्यालोच्य स तां राजा राज्ञीमाह स्म दुःखितः। संविहेव वरं देवि भूगृहं क्रियतामिति॥५०॥ तथेति च तया प्रोक्तस्तत्रैवान्तःपुरे सुगम्। विधाय भूगृहं राजा देवीं तां न्यदधेष्व सः॥५१॥ पुत्रं शृङ्गभुजं तस्या विषण्णं पृष्टकारणम्। आश्वासयस्तद्वोक्त्वा राज्ञी सो स यदुक्तवान्॥५२॥ सापि राज्ञो हितमिति स्वर्गं मेने धरागृहम्। स्वसुखं नास्ति साध्वीनां तासां भर्तृसुखं सुखम्॥५३॥ एवं कृतेऽयशोमुक्ता तस्य राज्यपराङ्मुखा। निर्वासिभुजनामानं स्वैरं स्वसुतमभ्यधात्॥५४॥ राज्ञास्मद्विधुरा तावत्खाते गुणवरापिता। एतत्पुत्रद्वयं देशाच्चलितो गच्छेत् सुखं भवेत्॥५५॥ तत्स शृङ्गभुजो देशाभिर्वास्थेताधिश्राधया। तौ पुत्र चिन्तयेयुंवित् स्वमन्यैर्भ्रातृभिः सह॥५६॥ इति मात्रोदितं सोऽन्यान् भ्रातॄनुक्त्वा समत्सरः। आस्ते स्म निर्वासभुजस्तत्रोपायं विचिन्तयन्॥५७॥ एकदा ते महास्त्राणि प्रयुञ्जाना नृपात्मजाः। प्रासादाग्रे महाकायं सर्वेऽपि ददृशुर्बकम्॥५८॥
सप्तम लम्बक १०७
सप्तम लम्बक १०७ यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जायगा और रानी की मृत्यु हो जायगी। ऐसा कहकर वह प्राणी चला गया। इसीसे मुझे खेद हो गया है"॥४४॥ राजा के इस प्रकार कहने पर पतिव्रता रानी गुणवरा प्रेम और भय से व्याकुल होकर बोली—॥४५॥ 'महाराज ! यदि ऐसा है तो आप मुझे आज ही भू-गृह में क्यों नही बन्द कर देते। मैं धन्य हूँगी यदि मेरे प्राणों से भी तुम्हें सुख प्राप्त हो सके ॥४६॥ भले ही मेरी मृत्यु हो जाय किन्तु आपको दुःख प्राप्त न हो, क्योंकि स्त्रियों को इस लोक और परलोक में पति ही परम गति है ॥४७॥ उसके इस प्रकार के वचन सुनकर आँसू बहाता हुआ राजा सोचने लगा कि इस रानी में या उस मुनिपुत्र में मुझे पाप की शंका नहीं है ॥४८॥ उस मुनिसुत को मैंने शंका-रहित और प्रसन्नमुख देखा। दुःख है। तो भी इस निन्दा के सम्बन्ध में निश्चय करता हूँ॥४९॥ ऐसा सोचकर अत्यन्त दुःखी राजा ने रानी से कहा—'तब मैं यहीं रनिवास में भू-गृह बनवाता हूँ। रानी की स्वीकृति मिलने पर राजा ने वहीं एक सुगम (आने-जाने में सरल) भू-गृह बनवाया और रानी को उसमें रख दिया ॥५०-५१॥ दुःखी और कारण पूछते हुए पुत्र शुभभुज को रानी ने राजा से कही गई बात कहकर धीरज बँधाया ॥५२॥ रानी गुणवरा ने राजा का हित समझकर उस भू-गृह को स्वर्ग समान समझा क्योंकि पतिव्रता स्त्रियों को अपना सुख सुख नहीं है पति का सुख ही उनका सुख है ॥५३॥ यह सब होने पर दूसरी रानी अयशस्कान्ता ने अपने निर्दोषभुज नामक पुत्र को एकान्त में कहा—'राजा ने तुम्हारी सौत गुणवरा को तो गड्ढे में डाल दिया। अब इसका लड़का भी निष्कण्टक कर कहीं चला जाय तो बहुत आनन्द हो, हम राज्य देखें ! तुम अपने भाइयों से मिलकर उसी युक्ति सोचो ॥५४-५६॥ माता से इस प्रकार कहा गया निर्दोषभुज ईर्ष्यापूर्वक अपने भाइयों के साथ उपाय सोचने लगा ॥५७॥ इधर वे सभी राजकुमार अपने अन्य राज्य की प्राप्ति के लिए राजभवन में संलग्न व नैराश्य समझ हुए और गुप्त न कहा पर वे ... के लिए यत्न करने को तैयार ... ॥
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर विकृतं पक्षिणं तं च पश्यतस्तान् सविस्मयान्। ज्ञानी क्षपणकः कोऽपि पथा तत्रागतोऽब्रवीत्॥५९॥ राजपुत्रा बको नायं रूपमानेन राक्षसः। भ्रमत्यग्निशिखाख्योऽयं नगराणि विनाशयन्॥६०॥ सद्विध्येतैन काण्डेन यावद् गच्छतितो द्रुतः। एतत् क्षपणकाच्छ्रुत्वा भवतिस्म नवाधिकाः॥६१॥ काण्डानि चिक्षिपुर्ज्येष्ठा नकोऽप्याहतवान् बकम्। ततो नग्नक्षपणकः पुनस्तानब्रवीच्च सः॥६२॥ अयं कनीयान् युष्माकं भ्राता शृङ्गभुजो बकम्। शक्नोति हन्तुमतस्तद्गृह्णात्वेष क्षमं धनुः॥६३॥ तच्छ्रुत्वैव स्मरन् मातुस्तल्लब्धावसरं वचः। स निर्वासभुजो बालस्तत्क्षणं समचिन्तयत्॥६४॥ सोऽप्य शृङ्गभुजस्यास्य स्यादुपायः प्रवासन। तदर्पयामस्तातस्य सम्बन्धस्मै धनुःशरम्॥६५॥ सौवर्णं तच्छरं हृत्वा विद्धो यास्यति चेद् बकः। पश्चादेषोऽपि गन्तास्य मार्गैरुत्स्वस्मासु स शरम्॥६६॥ मवा च लप्स्यते नैतं घ्निन्वन् रक्षो बकः तदा। स्थास्यतीहस्ततो भ्राम्यँल्लप्स्यतीह शरं विना॥६७॥ इत्यालोच्य ददौ तस्मै पापः शृङ्गभुजाय सः। बकघाताय सशरं पितृसम्बन्धि कार्मुकम्॥६८॥ स गृहीत्वा तदाकृष्य तेन स्वर्णशरेण सम्। रत्नपुङ्खेन विव्याध बकं शृङ्गभुजो बली॥६९॥ स विद्धमात्रस्तं कायलग्नमादाय सायकम्। बकः सद्यदसृग्धारं पलाय्यैव ततो ययौ॥७०॥ ततः शृङ्गभुजं वीरं स निर्वासिभुजः शठः। तत्सङ्गात्प्रेरितास्ते च भ्रातरोऽन्ये समब्रुवन्॥७१॥ देहि हेममयं तं नस्तातसम्बन्धिनं शरम्। अन्यथाद्य शरीराणि त्यक्ष्यामः पुरतस्तव॥७२॥ तातस्तेन विना ह्यस्मानितो निर्वासयिष्यति। न च कर्तुं ग्रहीतुं वा शक्यं तत्प्रतिरूपकम्॥७३॥
सप्तम लम्बक १९
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सप्तम लम्बक १९ उस विकृत पक्षी को देखकर आश्चर्य करते हुए राजकुमारों को देखकर उस मार्ग से जाते हुए किसी ज्ञानी भिक्षु ने कहा—'हे राजकुमारो ! यह बगुला नहीं है। बगुले के रूप में नगरों का नाश करता हुआ यह अग्निमुख नामका राक्षस है ॥५९०॥ अतः इसे बाण से बींध दो जिससे कि यह यहाँ से भाग जाय। इसपर से ऐसा सुनकर उन निशान्तके राजकुमारों ने उसपर अपने-अपने तीर चलाये फिर भी बगुला नहीं मरा। तब वह दिगम्बर (नंगा) साधु बोला—'तुम लोगों का छोटा भाई शृङ्गभुज बगुले को मार सकता है इसलिए यह एक अच्छा धनुष ले ॥५९१-९२॥ उसी समय वह क्रूर (जालिम) निर्भासभुज माँ की बातों को यादकर और उस अवसर का उपयुक्त समझकर सोचने लगा—॥५९४॥ कि यह अवसर है शृङ्गभुज को यहाँ से निकालने का। अतः इसे पिता का धनुष-बाण देते हैं ॥५९५॥ उसके सुलक्ष्य बाण से बींधा हुआ बगुला यदि उड़ जायगा तो यह भी उस बाण को लाने के लिए पीछे-पीछे भागेगा ॥५९६॥ और जब इस राक्षस बगुले को खोजते-खोजते नहीं प्राप्त कर सकेगा तो लज्जा और दण्डाच्छन्न यहाँ न आकर इधर उधर घूमता रहेगा ॥५९७॥ ऐसा सोचकर उस पापी निर्भासभुज ने बगुले को मारने के लिए शृङ्गभुज को पिता के धनुष-बाण लाकर दे दिये ॥५९८॥ उसे लेकर बलवान् शृङ्गभुज ने रत्नाक्त पंखवाले उस सुवर्णजड़ बाण से बगुले को बींध दिया ॥५९९॥ बाण से बिंधा हुआ बगुला शरीर में चुभे हुए बाण को लिये और रक्त की धार बहाता हुआ वहाँ से उड़कर भागा ॥६००॥ तब वह दुष्ट निर्भासभुज और अन्य प्रदीप राजकुमार उस वीर शृङ्गभुज से बोले—॥६०१॥ 'हमारे उस किसीके भी न छूटने योग्य बाण को लाओ नहीं तो हम सब लोग सामने ही शरीर का हनन कर देंगे ॥६०२॥ क्योंकि उसके बिना पिता हम सबको देश से निर्वासित कर देंगे। उसी बाण के जैसा दूसरा नया बाण नहीं बनाया जा सकता ॥६०३॥
११० | कथासरित्सागर
[Header] ११० | कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वैव स जिह्रांस्तान् वीर शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। धीरा भवत मा भूद्वो भयं कार्पण्यमुज्झत ॥७४॥ आनेष्यामि शरं गत्वा हत्वा तं राक्षसाधमम्। इत्युक्त्वा सशरं चापं निजं शृङ्गभुजोऽग्रहीत् ॥७५॥ ययौ च तां समुद्दिश्य दिशं यां स बको गतः। पतितां रक्तसृग्धारां भूमावनुसरञ्जवात् ॥७६॥ दृष्टेषु तेषु चान्येषु मातृपार्श्वं गतेष्वथ। गच्छन् स क्रमशः प्राप दूरां शृङ्गभुजोऽटवीम् ॥७७॥ तस्यां ददर्श चिन्वानां वनस्यान्तर्महत्पुरम्। भोगायोपनतं काले फलं पुण्यतरोरिव ॥७८॥ तत्रोद्यानतरोर्मूले स विश्रान्त क्षणादिव। आश्चर्यरूपामार्यान्तीमत्र कन्यामवेक्षत ॥७९॥ विरहे जीवितहरां सङ्गमे प्राणदायिनीम्। विचित्रां निर्मितां धात्रा विषामृतमयीमिव ॥८०॥ शनैरुपागतां तां च चक्षुषा प्रेमवर्षिणा। पश्यन्तीं तद्गतमना स पप्रच्छ नृपात्मजः ॥८१॥ किं नामधेयं कस्येदं पुरं हरिणलोचने। त्वं च का किं तवेहागमनं कथ्यतामिति ॥८२॥ ततः साचीकृतमुखी न्यस्तदृष्टिर्महीतले। सा च जगाद मुदती मधुरस्निग्धया गिरा ॥८३॥ इदं धूमपुरं नाम सर्वसम्पद्गृहं पुरम्। अस्मिन् वसत्यग्निदिशो नाम राक्षसपुङ्गवः ॥८४॥ तस्य रूपशिखां नाम सबुधी विद्धि मां सुताम्। इहागतामसामान्यात्त्वद्रूपाद्धृतमानसाम् ॥८५॥ त्वं ब्रूहि मेऽधुना कोऽसि किमिहाभ्यागतोऽसि च। एवमुक्ते तया तस्मै सर्वं शृङ्गभुजः क्षणम् ॥८६॥ सोऽसौ यन्नामधेयश्च यस्य पुत्रो महीपतेः। यथा शरनिमित्तेन तद्धूमपुरमागतः ॥८७॥ ततो विदितवृत्तान्ता सा तं रूपशिखाभ्यधात्। न त्वया सुदृगन्योऽस्ति त्रैलोक्येऽपि धनुर्धरः ॥८८॥
सप्तम लम्बर १११ यह सुनकर वीर शृंगभुज उन कपटियों से बोला—'धीरज रखो। घबराओ मत। डरो मत। मैं उस नीच राक्षस को मारकर उस बाण को लाऊँगा। ऐसा कहकर शृंगभुज अपने धनुष-बाण लेकर ज़मीन पर गिरती हुई रक्त-धारा का अनुकरण करता हुआ चला ॥७४-७६॥ इस प्रकार प्रसन्न होकर अन्य राजपुत्रों के अपनी माताओं के समीप चले जाने पर वह शृंगभुज जिस दिशा को बगुला भागा था उस दिशा की ओर बगुले के पीछे-पीछे जंगल में चला गया ॥७७॥ उसने उस घोर जंगल में बगुले को खोजते हुए उसके भीतर एक महान् नगर को ऐसे देखा जैसे मानों पुण्य-रूपी वृक्ष का भोग के लिए आया हुआ फल हो ॥७८॥ उस नगर के उद्यान में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उसने आश्चर्यमय रूपवाली आती हुई कन्या को देखा ॥७९॥ विरह में प्राण हरण करनेवाली और संगम म अमृतमयी वह कन्या विधाता ने विचित्र रूप से विष और अमृत के सम्मिश्रण से बनाई थी ॥८०॥ धीरे-धीरे समीप आई हुई और अमृत बरसानेवाली आँखों से देखती हुई उससे राजकुमार ने पूछा ॥८१॥ 'हे मृगनयनी ! इस नगर का क्या नाम है ? यह नगर किसका है और तू कौन है ? और यहाँ कैसे आई है। यह सब कहो ॥८२॥ तब मुख को कुछ टेढ़ी की हुई भूमि पर आँखें गड़ाई हुई वह सुन्दर दाँतोंवाली कन्या मीठी और स्नेह-भरी भाषा में बोली—॥८३॥ यह धूमपुर नामक नगर है। यह समस्त सम्पत्तियों का घर है। इस नगर में राक्षसों में श्रेष्ठ अग्निदिश नामक राक्षस रहता है ॥८४॥ मैं उसी के नाम के अनुसार रूपवाली रूपशिखा नाम की कन्या हूँ। तुम्हारे असाधारण रूप से आकृष्ट होकर यहाँ आई हूँ ॥८५॥ अब तुम बताओ कि तुम कौन हो ? और यहाँ कैसे आये हो ? उसके ऐसा कहने पर शृंगभुज ने अपना अपने पिता का और बगुले पर बाण चलाने आदि का सारा वृत्तान्त कह सुनाया और बताया कि वह पिता का सुनहरा बाण लाने के लिए धूमपुर आया है ॥८६-८७॥ तब उसके विचार को जानकर रूपशिखा उससे बोली कि तुम्हारे समान धनुर्धारी तीनों लोक में नहीं है ॥८८॥
११२ कथासरित्सागर
११२ कथासरित्सागर येन तातोऽप्यसौ विद्धो बकरूपो महेषुणा। स च हेममयो बाण स्वीकृतः क्रीडया मया॥८९॥ क्षतस्तु निर्व्रणः सद्यो महादंष्ट्रेण मन्त्रिणा। विशल्यकरणीमुख्यमहौषधिविदा कृतः॥९०॥ तथापि तातं सम्बोध्य नयाम्यभ्यन्तरं द्रुतम्। त्वामार्यपुत्र न्यस्तो हि त्वय्यात्मायं मयाधुना॥९१॥ इत्युक्त्वा समवस्थाप्य तत्र शृङ्गभुजं क्षणम्। ययौ रूपशिखा पार्श्वं पितुरग्निशिखस्य सा॥९२॥ तात शृङ्गभुजो नाम राजसूनुरिहागतः। कोऽप्यनन्यसमो रूपकुलशीलबयोगुणैः॥९३॥ जाने कोऽप्यवतीर्णोऽत्र देवांशो न स मानुषः। स चेद्भर्त्ता न मे स्यात् तत्यजेयं जीवितं ध्रुवम्॥९४॥ इत्युक्तः स तया तत्र पिता सां राक्षसोऽब्रवीत्। मानुषाः पुत्रि भक्ष्या मस्तथापि यदि ते ग्रहः॥९५॥ तदस्तु राजपुत्रं तमिहैवानाय्य दर्शय। तच्छ्रुत्वा सा ययौ रूपशिखा शृङ्गभुजान्तिकम्॥९६॥ तत्सर्वं यथावृत्तं सञ्च तं निनायान्तिकं पितुः। सोऽपि तं नम्रमादृत्य तत्पिताग्निशिखोऽब्रवीत्॥९७॥ ददामि राजपुत्रैतां तुभ्यं रूपशिखामहम्। यदि मद्वचनं किञ्चिन्नातिक्रामसि जातुचित्॥९८॥ इत्युक्तवन्तं तं सोऽपि प्रह्वः शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। बाढमुल्लङ्घयिष्यामि नैवाज्ञावचनं तव॥९९॥ इति शृङ्गभुजोक्त्यास्तुष्टः सोऽग्निशिखोऽभ्यधात्। उत्तिष्ठ तर्हि स्नात्वा त्वमागच्छ स्नानवेश्मनः॥१००॥ तमेवमुक्त्वावादीत्सा सुतां रूपशिखां च सः। त्वं गच्छ सर्वा भगिनीरादायागच्छ सत्वरम्॥१०१॥ एवमग्निशिखेनोक्तौ तेन निर्जग्मतुस्ततः। तयैव साकमुत्तस्थौ शृङ्गभुजो रूपशिखा च सा॥१०२॥ ततश्च सा सुधीः शृङ्गभुजं रूपशिखाभ्यधात्। आर्यपुत्र कुमारीणां स्वसॄणामस्ति मे शतम्॥१०३॥
सप्तम लम्बक ११३
सप्तम लम्बक ११३ क्योंकि तुमने बगुला बने मेरे पिता को भीषण बाण से बींध दिया। उस सोने के बाण को मैंने देखने के लिए पिता से ले लिया है ॥८९॥ मेरे पिता को उसके मन्त्री महादंष्ट्र ने विशल्यकरणी आदि ओषधियों से तुरन्त अच्छा कर दिया है ॥९०॥ तो मैं पिता को सूचित करके तुम्हें शीघ्र अन्दर लिवा ले जाती हूँ। हे आर्यपुत्र ! मैंने अपने को तुम्हें दे डाला है ॥९१॥ ऐसा कहकर और शृंगभुज को बैठाकर वह रूपशिखा पिता अग्निशिख के पास गई ॥९२॥ 'हे पिता ! शृंगभुज नाम का एक राजकुमार यहाँ आया है। वह रूप, शील (चरित्र) अवस्था और गुणों से असाधारण व्यक्ति है। मालूम होता है कि वह कोई पृथ्वी पर अवतीर्ण देवता का अंश है, मानव नहीं है। यदि वह मेरा पति न होगा तो मैं निश्चय ही प्राण त्याग कर दूँगी' ॥९३-९४॥ रूपशिखा से इस प्रकार कहे गये उसके पिता ने कहा—'बेटी ! मनुष्य तो हमारे भक्ष्य हैं। तो भी यदि तुम्हारा आग्रह है, तो वही ठीक है। तुम उस राजकुमार को यहीं लाकर दिखाओ। ऐसा सुनकर रूपशिखा शृंगभुज के समीप गई और जो कुछ किया था, उसे कहकर पिता के समीप ले गई। अग्निशिख ने भी उसे विजयी देखकर सत्कार किया और बोला—॥९५-९७॥ 'हे राजकुमार ! मैं तुम्हें इस रूपशिखा को देता हूँ, यदि तुम कभी मेरी बात को इधर-उधर न करोगे' ॥९८॥ ऐसा कहते हुए अग्निशिख से विजयी शृंगभुज बोला—'ठीक है, तुम्हारी आज्ञा के वचनों का उल्लङ्घन कभी न करूँगा' ॥९९॥ शृंगभुज से इस प्रकार कहा गया प्रसन्न अग्निशिख बोला—'अब उठो और स्नानगृह से स्नान करके आओ' ॥१००॥ उसे ऐसा कहकर रूपशिखा से बोला—'तू भी जा और सब बहनों को लेकर शीघ्र जा' इस प्रकार अग्निशिख से कहे गये शृंगभुज और रूपशिखा—दोनों 'जो आज्ञा' कहकर बाहर निकले ॥१०१-१०२॥ बाहर आकर रूपशिखा ने शृंगभुज से कहा—'आर्यपुत्र ! मेरी एक सौ कुँवारी बहनें हैं। ॥१०३॥ १५
सर्वा वयं सदृश्यश्च तुल्याभरणवाससः। सर्वासां सन्ति कण्ठेषु तुल्या हारलताश्च नः॥१०४॥ तत्तातो मेलयित्वास्मांस्त्वां विमोहयितुं प्रिय। आसां मध्यादभीष्टां त्वं वृणीष्वेति वदिष्यति॥१०५॥ जानाम्येतमहं तस्य व्याजाभिप्रायमीदृशम्। सर्वा सङ्कटयत्यस्मान्किमर्थमयमन्यथा ॥१०६॥ तवा मूर्ध्नि करिष्ये च कण्ठाद्धारलतामहम्। तदभिज्ञानलक्ष्म्या यां वनमालां मयि क्षिपे ॥१०७॥ भीतप्रायश्च तातोऽस्य बुद्धिर्नास्य विवेकिनी। तथा मय्यपि मार्गोऽस्य जातिसिद्धः क्व गच्छति॥१०८॥ तदस्य वञ्चनार्थं ते यद्यत्किञ्चिद्वदिष्यति। अङ्गीकृत्य त्वया तत्तद्वाच्यं मे वेद्म्यहं परम्॥१०९॥ इत्युक्त्वा भगिनीनां सा पार्श्वं रूपशिखा ययौ। तथेत्युक्त्वा च गतवांस्नातुं शृङ्गभुजोऽपि सः॥११०॥ अथागात्स्वसृभिः साकं पार्श्वं रूपशिखा पितुः। सोऽपि शृङ्गभुजश्चैतैः स्नापितोऽत्रागमत्पुनः॥१११॥ आसां मध्यान्निजेष्टायै प्रयच्छैतामिति ब्रुवन्। वनमालां ददौ शृङ्गमूनायाग्निशिखोऽथ सः॥११२॥ सोऽप्यादायैव तां रूपशिखायाः क्षिप्तवान्गले। प्राङ्मूर्धन्यस्तसङ्केतहारभ्रष्टेनुं पारमञ्ज ॥११३॥ ततः सोऽग्निशिखो रूपशिखां शृङ्गभुजान्विताम्। निजगाद विभास्ते यां प्रातस्ताहमङ्गलम्॥११४॥ इत्युक्त्वा तौ च ताश्चान्या विससर्ज सुता गृहम्। क्षणाच्च तं शृङ्गभुजं समाहूयैवमब्रवीत्॥११५॥ गच्छैवं दान्तयुगलं समादाय पुरावहिः। राधिस्यं भुवि तन्नाद्य तिलसारीशतं वप॥११६॥ तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गत्वा शृङ्गभुजोऽब्रवीत्। खिन्नो रूपशिखायास्तत्साप्येवं निजगाद तम्॥११७॥ आर्यपुत्र न कार्यस्ते विषादोऽत्र मनागपि। गच्छ त्वं साधयाम्येतदहं क्षिप्रं स्वमायया॥११८॥
सप्तम लम्बक ११५
सप्तम लम्बक ११५ हम सब एक समान रूप और वेश भूषावाली हैं। हम सब के गले में एक समान हार पड़े हुए हैं॥१०४॥ इसलिए, मेरा पिता तुमको ठगने के लिए सभी लड़कियों को एकत्र करके ऐसा कहेगा कि इनमें से तुम जिसे चाहते हो उसे वर लो ॥१०५॥ मैं उसके इस कपट-व्यवहार को जानती हूँ। नहीं तो यह हम सब को एकत्र क्यों कर रहा है ॥१०६॥ वरमाला के वरण के समय मैं अपने कण्ठहार को सिरपर रख लूँगी। तब तुम मुझे पहचान कर मेरे गले में वरमाला डाल देना ॥१०७॥ मेरा पिता मूर्ख है उसकी बुद्धि विवेकशालिनी नहीं है। इसीलिए, मुझ पुत्री के साथ भी ऐसा व्यवहार करता है। जातिगत स्वभाव कहाँ जायगा ॥१०८॥ अतः तुम्हें ठगने के लिए यह जो-जो भी कहेगा उसे स्वीकार कर तुम मुझसे कहना— [L13: आगे जो कर्त्तव्य है मैं करूँगी' ॥१०९॥ ऐसा कहकर रूपसिखा अपनी बहनों के पास गई। 'ऐसा ही करूँगा'—यह कहकर श्रृंगभुज नहाने चला गया ॥११०॥ तदनन्तर रूपसिखा अपनी बहनों के साथ पिता के पास आई। उधर सेविकाओं द्वारा स्नान कराया गया श्रृंगभुज भी आ गया ॥१११॥ तब अग्निधिश ने 'इन कन्याओं में जिसे तुम चाहते हो उसे यह माला दे दो' ऐसा कहकर श्रृंगभुज को एक वरमाला दी ॥११२॥ उस राजकुमार ने भी माला को लेकर, पहले ही सिर पर हार की लड़ियों को रखी हुई रूपसिखा के गले में डाल दिया ॥११३॥ तब अग्निधिश श्रृंगभुज और रूपसिखा से बोला—'कल प्रातःकाल तुम दोनों का विवाह सम्पन्न कर दूँगा' ॥११४॥ ऐसा कहकर उन दोनों को तथा अन्य कन्याओं को उसने अपने-अपने घर जाने की आज्ञा दी और पल-भर में ही श्रृंगभुज को बुलाकर यों बोला—॥११५॥ जाओ इन दो बैलों की गाड़ी सजाकर नगर के बाहर डर के रूप में रंगे हुए तिलों की एक सौ गाड़ी को रोल में बो आओ—॥११६॥ यह सुनकर और 'ठीक है ऐसा कहकर घबड़ाया हुआ श्रृंगभुज रूपसिखा के पास आकर सब वृत्तान्त बोला। तब वह भी उससे बोली ॥११७॥ 'आर्यपुत्र ! तुम इस सम्बन्ध में जरा भी खेद न करो। तुम खेत की ओर जाओ। मैं अपनी माया से सब सिद्ध कर देती हूँ' ॥११८॥