कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
१३४ कथासरित्सागर
१३४ कथासरित्सागर मरुभूतिः स तु मनाक्पीतासवमदालसः। बद्धपुष्पोज्झितस्रज विलम्बित उपाययौ ॥२॥ प्रस्खलत्पद्यया गत्या हासयंस्त गिरा तदा। तत्प्रीतिरञ्चितमुखो नर्मणोवाच गोमुखः ॥३॥ यौगन्धरायणसुतो भूत्वा नीतिं न वेत्सि किम्। प्रात पिबसि मद्य यन्मत्त प्रभुपैषि ध ॥४॥ तच्छ्रुत्वा तं रुषा क्षीबो मरुभूतिर्जगाद सः। एतन्मे प्रभुणा वाच्यममुना गुरुणापि वा ॥५॥ त्वं तु क शिक्षयसि मामित्याकार्मज रे वद। इत्युक्तवन्तं तं भूयो हसन्नाह स्म गोमुखः ॥६॥ भर्त्सयन्त्यविनीत किं स्वभावा प्रभविष्णवः। अवश्य तस्य वक्तव्य यत्पादस्पर्शयोचितम् ॥७॥ सत्यं चटकपुत्रोऽहं त्वं मन्त्रिवृषम पुनः। भक्ति ते जाल्ममेवैतद्द्रिवाण स्त परं न ते ॥८॥ इत्युक्तो गोमुखेनाथ मरुभूतिरभाषत। तवेव शृण्मत्वं हि गोमुखस्योपपद्यते ॥९॥ तथापि यदचान्तोऽसि सोऽयं ते जातिसङ्करः। एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषु हसत्सूवाच गोमुखः ॥१ ॥ मरुभूतिरयं रत्न जातु यत्नशतैरपि। अवश्यं वयमेतस्मिन्गूण को हि प्रचक्षतेत् ॥११॥ सिकतासेतुवृत्तान्तः मन्यत्युक्षरत्नं तद्यदयरत्नन वध्यत। सिकतासेतुवृत्तान्तं शृणु चात्र निदर्शनम् ॥१२॥ आसीत्कोऽपि प्रतिष्ठाने तपोदत्त इति द्विजः। स पित्रा क्लिश्यमानोऽपि विद्यां नाभ्यस्त शैशवे ॥१३॥ अनन्तरं गृहंमाज सर्वैरनुशयान्वितः। स विद्यासिद्धय यप्तुं तपो गङ्गातटं ययौ ॥१४॥ तत्राश्रितोग्रतपसस्तस्य तं वीक्ष्य विस्मितः। बारयिष्यन्दिजश्छद्मा शत्रे निकटमाययौ ॥१५॥ आगत्य च स गङ्गायास्तटाद्भिरोप भारिणि। उद्यतोदस्य सिकता पद्यतन्तम्स्य भोर्भिणि ॥१६॥
सप्तम लम्बक १३५
सप्तम लम्बक १३५ किन्तु, मरुभूति मन्त्री मद्यके-मद में कुछ अलसाता हुआ फूलों का गजरा डाले और इत्र आदि लगाये हुए लड़खड़ाती हुई गति और जबान से अन्य मित्रों को हँसाता हुआ कुछ देर से आया उसकी इस दशा से मुस्कराते हुए गोमुख ने मजाक करते हुए कहा- ॥१३॥ 'तुम यौगन्धरायण के पुत्र होकर भी नीति नही जानते। प्रातःकाल शराब पीते हो और नशे की बेहोशी में राजा के पास आते हो ? ॥१४॥ यह सुनकर क्रोध से बेहोश मरुभूति गोमुख से बोला- यह बात तो या मेरे स्वामी (राजा) या मेरे पिता कह सकते हैं ॥१५॥ अरे द्वारपक (द्वारपाल) के बच्चे ! बोलते तो सही। तुम मुझे शिक्षा देते हो? ऐसा कहते हुए मरुभूति से गोमुखने फिर कहा- क्या प्रभुजन अविनीत (उद्दण्ड) को अपनी बातों से फटकारते हैं। ऐसी बातें तो राजा के पार्श्ववर्ती व्यक्ति ही कह रहे हैं। यह सच है कि मैं द्वारपक (द्वारपाल) का पुत्र हूँ और तुम मन्त्रिवृषभ (बैल और श्रेष्ठ) हो। तुम्हारी यह स्थिति ही तुम्हारी मूर्खता (बैलपन) बता रही है। केवल दो सींग ही तो नहीं हैं। ॥१६-८॥ गोमुख से ऐसा कहा गया मरुभूति बोला--'बैलपन तो तुम्हें ही अधिक सजता है तुम्हारा नाम ही गौ-मुख है। फिर भी जो तुम्हारी उद्दण्डता है, उसका कारण तुम्हारी वर्णसंकरता ही है' यह सुनकर सब लोगों के हँस देने पर गोमुख फिर बोला-॥१९-१॥ यह मरुभूति वह रत्न है जिसमें सैकड़ों यत्न करने पर भी इस अभेद्य रत्न में बाण (गुण) का प्रवेश कौन करा सकता है॥ ११॥ दूसरा कोई पुरुष रत्न हो तो उसका बेधन बिना प्रयत्न के ही हो जाता है। इस प्रसंग में चिरन्ता-शत्रु का उदाहरण सुनाता हूँ।-॥१२॥ चिरन्ता-शत्रु की कथा प्रतिष्ठान नामक नगर में तारादत्त नाम का कोई ब्राह्मण था वह पिता के अनेक कष्ट देने पर भी बाल्यावस्था में अध्ययन नहीं कर सका ॥१३॥ पिता के मरने पर सभी लोगों से तिरस्कृत किया जाता हुआ वह अत्यन्त विरक्त होकर विद्या की सिद्धि के लिए श्मशान पर जप करने गया ॥१४॥ वहाँ पर अत्यन्त उग्र तपस्या में लगे हुए उस देखकर आश्चर्य चकित दूसरे ब्राह्मण ने वट- बेल से वहाँ गया ॥१५॥ वहाँ पर बैठकर दूर संन्यासीने गंगा के जल से बाल गुण लगाकर पैंजन लगा और वह ब्राह्मण उसे देखता रहा ॥१६॥
१६६ कथासरित्सागर
१६६ कथासरित्सागर तद्दृष्ट्वा मुक्तमौनस्तं तपोदत्तः स पृष्टवान्। अथान्तः किमिदं ब्रह्मन्करोषीति सकौतुकम् ॥१७॥ निर्बन्धपृष्टः स च तं शक्रोऽब्रवीद् द्विजाकृतिः। सेतुं बध्नामि गङ्गायां ताराय प्राणिनामिति ॥१८॥ ततोऽब्रवीत्तपोदत्तः सेतुः किं मूर्ख बध्यते। गङ्गायामोघहार्याभिः सिकताभिः कदाचन ॥१९॥ तच्छ्रुत्वा समुवाचैनं शक्रोऽथ द्विजरूपधृक्। यद्येवं वेत्सि तद्विद्यां विना पाठं विना श्रुतम् ॥२०॥ कस्माद्व्रततपःसाध्यैस्त्वं साधयितुमुद्यतः। इयं शशविषाणेच्छा व्योम्नि वा चित्रकल्पना ॥२१॥ अनक्षरो लिपिन्यासो यदिच्छाध्ययनं विना। एवं यदि भवेदेतन्नाधयीत कश्चन ॥२२॥ इत्युक्तः स तपोदत्तः शकेण द्विजरूपिणा। विचार्य तत्तथा मत्वा तपस्त्यक्त्वा गृहं ययौ ॥२३॥ एवं सुधीः सुखं बोध्यो मरुभूतिस्तु दुर्मतिः। न शक्यते बोधयितुं बोध्यमानश्च कुप्यति ॥२४॥ इत्युक्ते गोमुखेनाऽत्र मध्ये हरिशिखोऽभ्यधात्। भवन्ति सुखसम्बोध्याः सत्यं देव सुमेधसः ॥२५॥ विरूपशर्मणो ब्राह्मणस्य कथा तथा च पूर्वमभवद् वाराणस्यां द्विजोत्तमः। कश्चिद् विरूपशर्माख्यो विरूपो निर्धनस्तथा ॥२६॥ स च वैरूप्यदौर्गत्यनिर्विण्णस्तत्तपोवनम्। गत्वा तीव्रं तपश्चक्रे रूपद्रविणकाङ्क्षया ॥२७॥ अथ सुरपतिः कृत्वा विकटव्याधिताकृतेः। जम्बुकस्याधमं रूपमस्याग्रे तस्य तन्मियान् ॥२८॥ तं विलोक्य परीताङ्गमक्षिकाभिरसृक्स्रवम्। विरूपशर्मा धनकर्मणसा विममर्श सः ॥२९॥ ईदृशा अपि जायन्ते संसारे पूर्वकर्मभिः। तन्ममाल्पमिदं धात्रा कृतं यन्मद्वपुः कृत ॥३०॥ को दैवविलिखितं भोगं रुद्धयेदित्यवेक्ष्य सः। विरूपशर्मा धतकैस्तपःस्थानाद्ययौ गृहम् ॥३१॥
सप्तम लम्बक [१३७]
सप्तम लम्बक [१३७]
उसके इस खेल को देखकर वह ब्राह्मण तपस्या मौन भंग करके बोला—'हे ब्राह्मण ! बिना रुकावट के यह तुम क्या कर रहे हो ? ॥१७॥ आग्रहपूर्वक पूछने पर ब्राह्मण बना हुआ इन्द्र बोला—'जीवों को गंगा पार जाने के लिए पुल बाँध रहा हूँ'। ॥१८॥ यह सुनकर तपोदत्त बोला—'हे मूर्ख ! लहरों से इधर-उधर बिखरनेवाली बालू से भला कहीं पुल बँधता है ? ॥१९॥ यह सुनकर ब्राह्मण-रूपी इन्द्र बोला—'यदि तुम यह समझते हो तो तुम बिना पढ़े-सुने विद्या कैसे प्राप्त करोगे ? ॥२० ॥ व्रत और उपवास आदि से तुम विद्या प्राप्त करने के लिए क्यों उत्सुक हो रहे हो। यह तो खरगोश के सींग के समान या आकाश में चित्र रचना के समान व्यर्थ बात है॥२१॥ बिना अक्षर जाने लिखना और बिना अध्ययन के विद्या प्राप्ति हो जाय तो कोई भी कभी अध्ययन न करे'॥२२॥ ब्राह्मण-रूपी इन्द्र से इस प्रकार कहा गया तपोदत्त ब्राह्मण उसकी बात पर विचार कर और उसे ठीक मानकर तप करना छोड़कर घर चला गया ॥२३॥ इस प्रकार, बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ज्ञान कराया जा सकता है, किन्तु मरुभूति तो दुष्टबुद्धि है। इसे जताया नहीं जा सकता। कुछ बताने या ज्ञान देने पर क्रुद्ध हो जाता है॥२४॥ गोमुख के ऐसा कहने पर हरिशिख ने बीच में ही कहा—'राजन् ! यह सच है बुद्धिमान् व्यक्ति को सरलता से ही समझाया जा सकता है' ॥२५॥ इस प्रसंग में कथा सुनें—
विरूपशर्मा ब्राह्मण की कथा पूर्वकाल में वाराणसी नगरी में विरूपशर्मा नाम का एक दरिद्र ब्राह्मण था॥२६॥ वह अपनी कुरूपता और दरिद्रता से अत्यन्त विरक्त होकर जंगल में जाकर रूप और धन की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने लगा ॥२७॥ तब देवराज इन्द्र बिगड़े और बीमार सियार का रूप धारण करके उसके आश्रम में आकर उसके समीप पड़े हुए। सड़े-गले और मक्खियों से भरे शरीरवाले उस सियार को देखकर विरूपशर्मा अपने मन में सोचने लगा ॥२८-२९॥ संसार में अपने पूर्व कर्मों के कारण ऐसे प्राणी भी होते हैं। इस दृष्टि से दैव ने मुझे बहुत अल्प मात्रा में कुरूप और कुत्सित बनाया है। दैव के लिखे हुए भागों का कौन उल्लंघन कर सकता है ? ऐसा समझकर विरूपशर्मा तपस्या के स्थान से अपने घर वापस आ गया ॥३०-३१॥
१५८ कथासरित्सागर
१५८ कथासरित्सागर इत्थं सुबुद्धिरल्पेन दैव यत्नेन बोध्यते। न कृच्छ्रेणापि महता निर्विचारमतिः पुनः ॥३२॥ एवं हरिशिखनोक्ते श्रद्दधाने च गोमुखे। मरुभूतिरनात्मज्ञः क्षीबोऽतिकुपिरतोऽब्रवीत् ॥३३॥ वरं गोमुख वाच्यं न तु बाह्योर्भवादृशाम्। वाचालैः कुरुह क्लीबैनेत्रपाङ्गबाहुशालिनाम् ॥३४॥ इति ब्रुवाणं युध्यन्तुं मरुभूतिं स्मिताननः। नरवाहनदत्तोऽथ प्रभुः स्वयमसान्त्वयत् ॥३५॥ विसृज्य तं च स्वगृहं तं बालसखिवत्सलः। कुर्वन् दिवसकार्याणि निनाय सदहः सुखम् ॥३६॥ प्रातश्च सर्वेष्वायातेष्वथ मन्त्रिषु च प्रिया। रत्नप्रभा जगादैवं मरुभूतौ त्रपानते ॥३७॥ त्वमार्यपुत्र सुकृती यस्य च सचिवा इमे। आबाल्यस्नेहनिगडबिडाः शुद्धचेतसः ॥३८॥ एते च धन्या येषां त्वमीदृक स्नेहपरः प्रभुः। प्राक्कर्मोपार्जिता यूयमन्योन्यस्य न संशयः ॥३९॥ एवमुक्ते तया राज्ञ्या वसन्तकसुतोऽब्रवीत्। नरवाहनदत्तस्य नर्ममित्रं तपन्तकः ॥४०॥ सत्यं पूर्वाजितोऽयं नः स्वामी सच हि तिष्ठति। पूर्वकर्मवशादेव तथा च श्रूयतां कथा ॥४१॥ तरणचन्द्रवैद्यस्य राज्ञः अजस्य च कथा अभूच्छ्रीकण्ठनिलये विलासपुरनामनि। पुरे विनयशीलाख्या मान्धाज्यर्धेन भूपतिः ॥४२॥ तस्य प्राणसमा देवी बभूव कमलप्रभा। तया साकं च भोगैकसक्तस्तस्थौ चिराय सः ॥४३॥ अथ कालेन भूपस्य जरा सौन्दर्यहारिणी। तस्याविरासीत् तां दृष्ट्वा स चासीद्विदुःखितः ॥४४॥ हिमाहतमिवाम्भोजं पलितं म्लानमाननम्। दर्शयामि कथं वध्वे हा धिङ्मे मरणं वरम् ॥४५॥ इत्यादि चिन्तयन्सोऽथ सदस्याहूय भूपतिः। वैद्यं तरणचन्द्राख्यं विजगाद कृतादरः ॥४६॥
सप्तम लम्बक १६१
सप्तम लम्बक १६१ 'हे राजन्! इस प्रकार अच्छी बुद्धिवाले व्यक्ति साधारण प्रयत्न से ही समझाये जा सकते हैं। अविवेकी और दुर्बुद्धि व्यक्ति अत्यन्त कठिनाई से भी नहीं समझाये जा सकते ॥३२॥ हरिशिख के ऐसा कहने पर और गोमुख के समर्थन करने पर अनार्यमना मरुभूति अत्यन्त क्रोध करके बोला— हे गोमुख ! तुम्हारे ऐसे व्यक्तियों की वाणी में ही बल होता है भुजाओं में नहीं। इसलिए बकवादी नपुंसकों के साथ झगड़ा करना भुजबलग्रामी वीरों के लिए उचित नहीं है' ऐसा कहते हुए और युद्ध के लिए उद्यत मरुभूति को मुसकराते हुए स्वामी नरवाहनदत्त ने स्वयं शान्त किया ॥३३-३५॥ और, बालमित्रों पर प्रेम करनेवाले राजा नरवाहनदत्त ने उसे अपने घर वापस भेजकर दैनिक कार्यों में अपना दिन मजे में व्यतीत किया ॥३६॥ दूसरे दिन प्रातःकाल पुनः मित्रों के आने पर और मरुभूति के सिर नीचा किये रहने पर रत्नप्रभा युवराज से बोली— हे आर्यपुत्र ! तुम धन्य हो तुम्हारे ये सभी मन्त्री बाल्यकाल से स्नेह-सूत्र में बँधे और सुशिक्षित हैं ॥३७-३८॥ और ये भी धन्य हैं जिनके तुम सम स्नेहमय स्वामी हो। तुम लोग पूर्वजन्म के संस्कारों से परस्पर मिले हो इसमें सन्देह नहीं ॥३९॥ उस रानी रत्नप्रभा के ऐसा कहने पर कमलगर्भ का पुत्र एवं नरवाहनदत्त का नर्म-सचिव तान्डक बोला— यह सत्य है कि हमारे स्वामी पूर्वजन्म के अर्जित हैं। यह सब कुछ पूर्वजन्म के संस्कार-वश ही हुआ है। इस प्रसंग में एक कथा सुनें—॥४०-४१॥
तरङ्गदत्त वणिक और राजा अजर की कथा
पूर्वकाल में हिमालय में विद्याधरपुर नामक नगर में यथार्थ नामवाला विनयशील नामक राजा था ॥४२॥ उसकी प्राणों के समान प्यारी कमलप्रभा नाम की रानी थी। राजा उसके साथ सांसारिक सुखों के भोग में चिरकाल तक रहा ॥४३॥ कुछ समय के अनन्तर राजा अपने शरीर में सौन्दर्य का नाश करनेवाली वृद्धावस्था को आई देख अत्यन्त दुःखी हुआ ॥४४॥ सिर (केस) में सफेदी रूप चन्दन के समान सफेदी से मण्डित अपने मुख को देखकर— 'हाय! धिक्कार है! मैं अपना मुँह अपनी रानी को कैसे दिखाऊँ?' हृदय में ऐसा सोच कर लज्जा से अन्तः शान्त हुआ राजा ने तरङ्गदत्त नामक वैद्य को दरबार में बुलाकर आदर के साथ कहा ॥४५-४६॥
१४० कथासरित्सागर
१४० कथासरित्सागर भद्र भवत्स्वमस्मासु कुशलश्छेति पृच्छ्यसे। अप्यस्ति काचिद्युक्तिः सा ययेयं वार्यते जरा ॥४७॥ तच्छ्रुत्वैव कलामात्रसारो वाञ्छन् स पूर्णताम्। वक्रस्तरुणचन्द्रोऽत सत्यनामा व्यचिन्तयत् ॥४८॥ मूर्खोऽयं नृपतिर्मोघ्यो मया वेत्स्यामि च क्रमात्। इति सञ्चिन्त्य स भिषक् तमेवमवदन्नृपम् ॥४९॥ एकस्त्वं गूढे मासानष्टौ यदिदमोषधम्। उपयुङ्क्षे ततो दव जरामपनयामि ते ॥५०॥ एतच्छ्रुत्वैव स नृपस्तद्भूगृहमकारयत्। क्षमन्ते न विचारं हि मूर्खा विषयलोलुपाः ॥५१॥ राजन् सत्त्वेन पूर्वेषां तपसा च दमेन च। रसायनानि सिद्धानि प्रभावेण युगस्य च ॥५२॥ अद्यत्वे च श्रुतान्येव रसान्येतानि भूपते। सामर्थ्याभावात् कुर्वन्ति यत्प्रत्युत विपर्ययम् ॥५३॥ तन्न युक्तमिदं धूर्ताः क्रीडन्त्येव हि बालिशैः। किं श्व समतिक्रान्तमागच्छति पुनर्वयः ॥५४॥ इत्यादि मन्त्रिणां वाक्यं न लेभे तस्य चान्तरम्। आवृते हृदये राज्ञो गाढया मोगतृष्णया ॥५५॥ विवेश च गिरा तस्य भिषजस्तत् स भूगृहम्। एकाकी वारिताशेषराजोचितपरिच्छदः ॥५६॥ एको वैद्यः स्वभृत्येन सहैकेनव तस्य सः। तत्रौषधादिचर्यायां बभूव परिचारकः ॥५७॥ तस्थौ च तत्र स नृपो भूमिगर्भे तमामय। अज्ञान इव भूयस्त्वात् प्रसूते ह्वययाद्वहिः ॥५८॥ गतेषु चात्र मासेषु षण्मापध्वस्य भूपतेः। विलोक्याभ्यधिकीभूतां तां जरां स शठो भिषक् ॥५९॥ आजहार वमप्येवं पुत्रं तावदृशाकृतिम्। राजानं त्वां करोमीति युवानं कृतमंविदम् ॥६०॥ तत गुरुद्धा भूगृहे दूरात्स्थाप्य तं नृपम्। गुप्तं कृत्वा तया नीत्या गोत्रपन्नृपेतिक्षिपत्प्रिति ॥६१॥
सप्तम लम्बक १४१
सप्तम लम्बक १४१ 'हे भले आदमी ! तू हमारा हितैषी है और कुशल वैद्य है इसलिए पूछता हूँ कि क्या कोई ऐसी युक्ति भी है कि बुढ़ापे को रोका जा सके' ॥४७॥ यह सुनकर केवल कलावाजी जाननेवाला एवं यथार्थ नामवाला वह कुटिल तरुणचन्द्र सोचने लगा ॥४८॥ 'यह राजा मूर्ख है और मेरा भोज्य भी। धीरे-धीरे समझूँगा' ऐसा सोचकर राजा से बोला—॥४९॥ 'महाराज ! यदि तुम भूमि के नीचे (तहखाने) में आठ महीनों तक रहकर मेरी औषधि खाओ तो मैं तुम्हारा बुढ़ापा दूर कर दूँ' ॥५०॥ ऐसा सुनते ही राजा ने तुरन्त भू-गृह [तहखाना] बनवाया। विषय-लम्पट मूर्ख विचार करने की शक्ति नहीं रखते ॥५१॥ हे राजन् ! पूर्वजों के तप दम और युग के प्रभाव से बड़े-बड़े रसायन सिद्ध हो चुके हैं। किन्तु, आजकल समय के प्रभाव से उनका नाम ही रह गया है। बल्कि ये विपरीत फल देते हैं॥५२-५३॥ अतः यह उचित नहीं है। धूर्त वैद्य मूर्खों के साथ ठगी करते हैं। महाराज ! क्या गई अवस्था फिर लौटकर आती है? ॥५४॥ इस प्रकार मन्त्रियों की बातें राजा के हृदय में पैठ न सकीं, क्योंकि राजा का हृदय भोग की प्रबल तृष्णा से भरा हुआ था ॥५५॥ अतः वह राजा वैद्य के वचन पर विश्वास करके और राजसी ठाट-बाट छोड़ भू-गृह में अकेला घुसा ॥५६॥ अपने एक भृत्य के साथ वैद्य उस राजा की औषधि आदि से परिचर्या करने लगा। राजा उस अन्धकारमय भू-गृह में इस प्रकार रहने लगा मानों उसका अत्यन्त बढ़ा हुआ अज्ञान हृदय से बाहर निकल पड़ा हो ॥५७-५८॥ इस प्रकार, छह महीने बीतने पर और राजा की वृद्धावस्था को वही देखकर वह दुष्ट वैद्य राजा से मिलती-जुलती आकृतिवाले एक पुरुष को लाया और उस युवा से बोला कि 'मैं तुम्हें राजा बनाता हूँ। उससे इस प्रकार सम्मति करके उसने दूर से ही भूगृह तक एक लम्बी सुरंग बनवाई और उसके द्वारा भू-गृह में जाकर राजा को मार डाला और रात को अंधेरे कुएँ में उसकी काया फेंक दी ॥५९—६१॥
१४२ कथासरित्सागर
१४२ कथासरित्सागर तयैव पुरुषं तं च तरुणं तत्र भूगृहे। प्रवेश्य स्थापयामास सुरङ्गां पिदधे च ताम् ॥६२॥ सम्प्राप्य मूढबुद्धीनामवकाशं निरर्गलम्। उच्छृङ्खलमतिः कुर्यात् प्राकृतः किं न साहसम् ॥६३॥ ततः स सर्वाः प्रकृतीर्वैद्योऽन्येद्युरभाषत। अजरोऽयं कृतस्तावत् पक्वनिर्मासिमया नृपः ॥६४॥ मासद्वयेन चैतस्य रूपमन्यद् भविष्यति। तद् दूरात् किञ्चिदात्मानमस्मै दर्शयताधुना ॥६५॥ इत्युक्त्वा भूगृहद्वारि सर्वानानीय दर्शयन्। तस्मै न्यवेदयद् भूपे स तेषां नामकर्मणी ॥६६॥ इत्यन्तःपुरपर्यन्तं मासद्वितयमन्वहम्। भूगृहेऽथो मधूक्त्या युवानं पुष्य स तम् ॥६७॥ प्राप्ते च समये तं स भोगपुष्टं धरागुहात्। उज्जहाराजरः सोऽयं जातो राजेत्युदाहरन् ॥६८॥ ततश्चौषधिसंसिद्धः सैष राजेति तत्र सः। पर्यष्वज्यत हृष्टाभिः पुमान् प्रकृतिभिर्युवा ॥६९॥ अथ स्नातस्तथा लब्धराज्यो राजोचिताः क्रियाः। चकार स सहामात्यैः सोत्सवास्तरुणं पुमान् ॥७०॥ ततःप्रभृति तस्मै च कुर्वन् राज्यं सुखेन सः। नामाजर इति प्राप्य क्रीडन्नन्तःपुरे सह ॥७१॥ सर्वे चैतमसम्भाव्यवेषवृत्ताविशङ्किनः। रसायनपरावृत्तरूपं स्वं मेनिरे प्रभुम् ॥७२॥ प्रीत्यानुरञ्जयन् प्रकृतीर्देवीं च कमलप्रभाम्। सोऽय स्वमित्रैरजरो राजामुञ्चत सह श्रियम् ॥७३॥ मित्रं भेषजचन्द्राख्यं तथान्यं पद्मदर्शनम्। उभे भारसमै चक्रे हस्त्यश्वग्रामपूरितै ॥७४॥ वैद्यं तरुणचन्द्रं तु प्रक्रियाधममानयत्। न तु तस्मिन् विदधद्वासं सत्यधर्मच्युतात्मनि ॥७५॥ एकदा च स वैद्यस्तं स्वैरं राजानमब्रवीत्। किं मामगणयित्वैव स्वात्मन्येव विचेष्टसे ॥७६॥
सप्तम लम्बक १४५
सप्तम लम्बक १४५ और, उसी सुरंग के रास्ते उस युवा पुरुष को भू-गृह में लेजाकर रख दिया और सुरंग को बन्द कर दिया ।।६२।। बेरोक-टोक मौका पाकर दुष्ट बुद्धिवाले नीच पुरुष मूर्ख व्यक्तियों पर कौन-सा साहसिक कुकर्म नहीं कर डालते ? ।।६३।। ऐसा प्रबन्ध करके दूसरे दिन प्रातःकाल वैद्य ने सभी राज-कर्मचारियों से कहा कि मैंने राजा का बुढ़ापा छह् महीनों में दूर कर दिया । अब वह जवान हो गया है। शेष दो महीनों में उसका दूसरा ही रूप हो जायगा। इसलिए, आप लोग दूर से ही अब उसे अपने को दिखाओ ।।६४-६५।। ऐसा कहकर वह एक-एक राज-कर्मचारी को भू-गृह के दरवाजे पर ले जाकर उनका नाम और पद बतलाकर दिखाने लगा ।।६६।। इस प्रकार, दो महीनों तक उसने रानियों तक को ले जाकर उस युवा पुरुष का परिचय कराया ।।६७।। आठ मास पूरे होनेपर खा-पीकर मुटाये हुए उस पुरुष को भू-गृह से निकालकर उसने घोषणा कर दी कि यह वही राजा ओषधि के प्रभाव से युवा और बुढ़ापे से रहित हो गया है इस घोषणा से प्रसन्न प्रजाओं ने भी उस युवा को ही राजा मान लिया। तदनन्तर उस युवा पुरुष को स्नान कराके मन्त्रियों ने साथ उसका राज्याभिषेक उत्सव किया ।।६८-७० ।। तब से वह युवा राजा अजर इस नाम से विख्यात होकर रानियों के साथ क्रीड़ा करता और राज्य का भोग करता हुआ सुख से रहने लगा ।।७१।। राजभवन के सभी व्यक्ति इस असम्भव काम करने वाले वैद्य की विद्या के चमत्कार पर विश्वास करके उसे ही पुराना राजा मानकर और अपना स्वामी समझकर उसकी सेवा करने लगे ।।७२।। वह युवक भी अपने प्रेम से प्रजा और राज-कर्मचारियों को तथा महाराणी कनकप्रभा को प्रसन्न करके राजोचित व्यवहार करता हुआ मन्त्रियों के साथ प्रसन्नता से राज-कार्य करने लगा ।।७३।। और अपने अनन्य एवं प्राचीन मित्र मेघचन्द्र और पद्मदशन को हाथी घोड़े एवं ग्राम आदि प्रदान कर उनके साथ विशेष प्रीति रखने लगा ।।७४।। किन्तु तरुणचन्द्र वैद्य को केवल व्यावहारिक दृष्टि से मानता था। किन्तु, सत्यधर्म से घिरी हुई आत्मावाला उस पर विश्वास नहीं करता था ।।७५।। एकबार उस वैद्य तरुणचन्द्र ने एकान्त में राजासे कहा कि तू मुझे कुछ न समझकर स्वतन्त्र रूप से काम क्यों करता है ? ।।७६।।
१४४ कथासरित्सागर
१४४ कथासरित्सागर तद्विस्मृतं यदा राजा भवानिह मया कृतः। तच्छ्रुत्वा स राजा समजरो वैद्यमभ्यधात् ॥७७॥ अहो मूर्खोऽसि कः कस्य कर्ता दातापि वा पुमान्। प्राक्तनं कर्म हि सर्वं करोति च ददाति च ॥७८॥ अतस्त्वं मा कृथा दर्पं तपःसिद्धमिदं हि मे। एतच्च दर्शयिष्यामि प्रत्यक्षमचिरेण ते ॥७९॥ इत्युक्तस्तेन स ग्रस्त इव वैद्यो व्यचिन्तयत्। अहो किमप्यधृष्टोऽयं धीरो ज्ञानीव भाषते ॥८०॥ यद्वहस्त्यान्तरङ्गत्वं स्वामिसंबन्धनं परम्। तदपि क्षमते नास्मिन्ननुवर्त्यस्तथैव मे ॥८१॥ पश्यामि तावत् किमय साक्षान्म दर्शयिष्यति। इत्यालोच्य तथैत्येव भिषक् तूष्णीं बभूव सः ॥८२॥ अन्येद्युश्चामरो राजा परिभ्रान्तुं स निर्ययौ। क्रीडस्तरुणचन्द्राख्यं सेव्यमानः सुहृत्सखः ॥८३॥ भ्राम्यन् प्राप्तो नदीतीरं यस्या मध्ये ददर्श सः। प्रवाहे वहदायातं सौवर्णं पद्मपञ्चकम् ॥८४॥ वानाययच्च भृत्यैस्तद् गृहीत्वा प्रविलोक्य च। वैद्यं तरुणचन्द्रं स जगाद निकटस्थितम् ॥८५॥ नदीतीरेण गच्छ त्वमुपरिष्टादितोऽमुना। उत्पत्तिस्थानमेतेषां पङ्कजानां गवेषय ॥८६॥ तच्च दृष्ट्वा त्वमागच्छ सुमहत्कौतुकं हि मे। अद्भुतेष्वेपु पद्मेशु त्वं च दक्षः सुहृन्मम ॥८७॥ इत्युक्त्वा प्रहितस्तेन राज्ञा स विवशो भिषक्। यथादिष्टेन मार्गेण तथेति प्रययौ सतः ॥८८॥ राजाप्यासीत् स्वपुरं स च गच्छन् भिषक क्रमात्। प्रापदायतनं शैवं नद्यास्तस्यास्तटस्थितम् ॥८९॥ तदग्रे तत्सरित्तीर्थे सट वनमहातरुम्। अपश्यत्स्यन्दमानं च तस्मिन् नरवरद्वपुम् ॥९०॥ तत्र श्रान्तः कृतस्नानो देवमभ्यर्च्य तत्र सः। यावत्तिष्ठति मधोऽत्र तावदागत्य पृच्छताम् ॥९१॥
सप्तम लम्बक १४५
सप्तम लम्बक १४५ क्या तुम यह भूल गये कि उस समय मैंने ही तुझे राजा बनाया था। यह सुनकर वह राजा वज्र उस वैद्य से बोला ॥७७॥ अरे ! तू बड़ा ही मूर्ख है। कौन किसका बनाता या बिगाड़ता है ? पूर्वजन्म के कर्म ही देते और बनाते हैं। इसलिए तू घमण्ड न कर । यह राज्य तो मेरे तप से प्राप्त हुआ है। यह मैं शीघ्र ही तुझे प्रत्यक्ष दिखलाऊँगा' ॥७८-७९॥ राजा से इस प्रकार फटकारा गया वैद्य तरणचन्द्र सोचने लगा कि यह मेरे साथ डिठाई नहीं कर रहा है और वीरता के साथ ज्ञानी के समान बातें कर रहा है ॥८० ॥ रहस्य की बातों में अन्तरंग बनना और वह भी इसमें सम्भव नहीं है तो भी मुझे इसके पीछे-पीछे ही चलना चाहिए। यह भी देखता हूँ कि यह मुझे प्रत्यक्ष क्या दिखलायेगा ? यह सोचकर वैद्य उसकी बात मानकर चुप हो गया ॥८१-८२॥ किसी दूसरे दिन राजा वज्र, टहलने के लिए तरणचन्द्र आदि मित्रों के साथ बाहर निकला ॥८३॥ टहलते-टहलते वह नदी के किनारे पहुँचा और उसने नदी के बीच धारा में बहते हुए सोने के पाँच कमल देखे ॥८४॥ राजा ने नौकरों से उन कमलों को मँगवाकर हाथ में रखकर और देखकर पास में खड़े तरणचन्द्र वैद्य से कहा — तुम अभी नदी के किनारे-किनारे ऊपर की ओर जाओ और इन सोने के कमलों का उत्पत्ति-स्थान खोजो ॥८५-८६॥ उसे देखकर तुम मेरे पास आओ मुझे उन सोने के कमलों के लिए बहुत उत्सुकता हो रही है। और तुम मेरे चतुर मित्र हो ॥८७॥ ऐसा कहकर राजा से भेजा गया वह विप्र वैद्य की आज्ञा तथा कहकर राजा के बताये मार्ग से चला गया और राजा अपने महल में लौट आया। कमलों को खोजता हुआ वह वैद्य नदी के तट पर स्थित एक शिव-मन्दिर में पहुँचा ॥८८-८९॥ वैद्य ने नदी के उद्गम-स्थान पर सरोवर के किनारे एक पत्र-बहुल वट को देखा और उसने उस पर लटकते हुए नरकंकाल को भी देखा ॥ ९० ॥ वैद्य उस नरकंकाल को प्रणाम करके देवता का पूजन करके जैसे ही जल से ... ९
१४८ | कथासरित्सागर
१४८ | कथासरित्सागर
तदेतद्दर्शितं तुभ्यं युक्त्या प्रत्यक्षतो मया। भवत्क्षिप्तोऽस्मि संसक्तात् साभिज्ञानं च वर्णितम् ॥१०७॥ तस्मात्तुभ्यं मया राज्यमदायीति मम त्वया। अहङ्कारो न कर्त्तव्यः स्थाप्यं चेतो न कुत्सितम् ॥१०८॥ विना हि प्राक्तनं कर्म न दाता कोऽपि कस्यचित् । आगर्भाज्जन्मसुख्याति पूर्वकर्मतरोः फलम् ॥१०९॥ इत्युक्तः स भिषक तेन राज्ञा दृष्ट्वा तथैव तत् । ससन्तोषः पुनर्नैव तत्सेवासुस्थितोऽप्यगात् ॥११०॥ सोऽपि राजाऽथ नातिस्मरस्तं भिषजं ततः । सम्मान्यार्थप्रदानेन यथोचितमुदारधीः ॥१११॥ अन्तःपुरैः सुहृद्भिश्च साकं नयजितां महीम्। भुञ्जानः सुकृतप्राप्तां सुखमास्तामकण्टकाम् ॥११२॥ एवं भवति लोकेऽस्मिन् द्वैधं सर्वस्य सर्वदा। प्राक्कर्मोपार्जितं जन्तोः सर्वमेव शुभाशुभम् ॥११३॥ तस्मात्त्वमपि न स्वामी मय्येवामान्तराजितः। संसृज्यत्वेवमस्माकं प्रसन्नोऽस्यन्यथा कथम् ॥११४॥ इत्यपूर्वरमणीयविचित्रां कान्तया सह हसन्कथञ्चित्। संनिशम्य स कथामुपतिष्ठत् स्नातुमत्र नरवाहनदत्तः ॥११५॥ कृतस्नानो गत्वा निकटमथ वत्सेशनृपतेः पितुर्मुञ्चन् मातुर्मुहुरमृतवर्षं नयनयोः । कृताहारस्ताभ्यां सह सममितो मन्त्रिसहितः सुखैरापानाद्यैर्दिनमगमयेत्तां च रजनीम् ॥११६॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके षष्ठस्तरङ्गः ।
सप्तमस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता)
ततश्च रत्नप्रभया समं सद्भावबन्द्धनि । स्थितोऽन्येषु कथां कुर्वन्तास्ताः स सचिवैः सह ॥१॥ नरवाहनदत्तोऽथ मन्दिरप्राङ्गणे बहिः । अपश्यत्तुङ्गमभ्रंलेहं शुकायातत्विपञ्जरम् ॥२॥
यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये मर्कटकांस के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी नहीं करना चाहिए ॥१७-१८॥ पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१ ९॥ उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तपनचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की सेवा में तत्पर होगया ॥११ ॥ उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन मान आदि देकर अनुगृहीत किया ॥१११॥ और, स्वयं मित्रों एव रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य करने लगा ॥११२॥ इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा 'स्वामी ! इसी प्रकार इस लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपन-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है। मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥ इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥ स्नान करके पिता और माता की आँखों मे अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरितसागर के रत्नप्रभालम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मणिवेश्म मे विविध बातें करते हुए नरवाहन- दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१ २॥
१४६ कथासरित्सागर
१४६ कथासरित्सागर मघामिवृष्टात्तस्माच्च वटशाखावलम्बिनः। मानुपास्थिकरङ्काद्ये न्यपतस्तोयबिन्दवः ॥९२॥ नद्यास्तीर्थजले तस्यास्त्वभ्यस्तानि ददर्श सः। जायमानानि पद्मानि सौवर्णानि क्षणाद् भिषक ॥९३॥ अहो किमिदमाश्चर्यं क पृच्छाम्यजन वन। यदि वा वद कः सर्ग बह्वाश्चर्यमय विधेः ॥९४॥ दृष्टस्तावन्मया सोऽथ कनकाम्भोरुहाकरः। तदेतत् प्रक्षिपाम्यत्र तीर्थे नरकलेवरम् ॥९५॥ धर्मोऽस्तु यत्पुष्ठे व जायन्तामम्बुजानि वा। इत्यालोच्य स वृक्षाग्रात् ततं कङ्कालमक्षिपत् ॥९६॥ नीत्वा च तद्दिनं तत्र सिद्धकार्योऽपरेऽहनि। प्रत्यावत्तिष्ट स ततो भिषग्देशं निजं प्रति ॥९७॥ दिनै कतिपयै प्राप तद्विलासपुरं च सः। तस्याज्रस्य निकटं राज्ञोऽम्बुकुशभूसुरः ॥९८॥ द्वाःस्थेनावेदितो यावत्प्रविश्य धरणीनतः। स पृष्टकुशलो राज्ञा वृत्तान्तं वक्ति स भिषक ॥९९॥ तावत्स विजनं कृत्वा राजा तं स्वयमभ्यधात्। दृष्टं हुमाम्बुजोत्पत्तिस्थानं तद्वभवता सखे ॥१००॥ तत्क्षेत्रमुत्तमं चैव तत्र दृष्टस्त्वया च सः। करङ्को वटवृक्षे तां प्राक्तनीं विद्धि मे तनुम् ॥१०१॥ तदूर्ध्वपादेन मया लम्बमानेन कुर्वता। तपस्तत्र पुरा त्यक्तमुपशोध्य कलेवरम् ॥१०२॥ तपसस्तस्य माहात्म्यात्करङ्कात् प्रच्युतैस्ततः। मघाम्बुभिस्ते जायन्ते पद्मास्तत्र हिरण्मयाः ॥१०३॥ स करङ्कश्च यत्क्षिप्तस्तीर्थे तत्र मम त्वया। युक्तं तद्विहितं त्वं हि मित्रं मे पूर्वजन्मनि ॥१०४॥ एष भेषजचन्द्रश्च तथाऽसौ पद्मदर्शनः। एतावपि च तज्जन्मसङ्गतौ सुहृदौ मम ॥१०५॥ यत्तस्य तपसो मित्र प्राक्तनस्य प्रभावतः। जातिस्मरत्वं ज्ञानं च राज्यं चोपगतं मम ॥१०६॥
सप्तम लम्बक २४७
सप्तम लम्बक २४७ बादल के बरसने के कारण उस वटवृक्ष के लटकते हुए नर-कंकाल पर से जो बूँदें गिरीं उनको उसने नदी के सरोवर में आकर सोने के कमल रूप में परिवर्तित होते देखा ॥९२-९३॥ वैद्य सोचने लगा—'ओह ! यह क्या आश्चर्य है ! इस निर्जन वन में किससे पूछूँ ? विधाता की आश्चर्य भरी सृष्टि का रहस्य कौन जानता है? ॥९४॥ मैंने सोने के कमलों का यह उत्पत्ति-स्थान तो देख लिया अब इस नर-कंकाल को काटकर इस तीर्थ-जल में फेंक देता हूँ। या तो मुझे इसकी सद्गति करने का पुण्य मिलेगा अथवा धर्म होगा'। ऐसा सोचकर उसने उसके बन्धन काटकर उसी सरोवर में फेंक दिया ॥९५ ९६॥ इस प्रकार, उस दिन को वहीं व्यतीत कर कार्य सिद्ध करके वह वैद्य दूसरे दिन अपने घर की ओर लौटा। और, कुछ ही दिनों में विलासपुर में उस राजा अमर के समीप आया। उस समय वह मार्ग की धूल से भरा हुआ था ॥९७-९८॥ द्वारपाल से सूचित किये गये राजा के चरणों पर गिरे हुए राजा से कुशल पूछे जाने पर वैद्य ने सारा समाचार जैसा-का-तैसा उसे सुना दिया ॥९९॥ तब राजा ने वहाँ से अन्य लोगों को हटाकर एकान्त में स्वयं कहा-'मित्र ! तुमने सोने के कमलों का वह उत्पत्ति-स्थान देखा ? ॥१००॥ वह अत्यन्त उत्तम क्षेत्र है। वहाँ पर बड़ के पेड़ में लटकता हुआ जो नरकंकाल तुमने देखा वह मेरा पूर्व शरीर था। वहाँ पर पैर ऊपर करके लटकते हुए मैंने तपस्या से शरीर को सुखाकर प्राण-त्याग किया था ॥१०१ १०२॥ उसी तप के माहात्म्य से मेरे मृत कंकाल से टपकती हुई वर्षा के जल की बूँदें सोने का कमल बन जाती थीं। तुमने जो उस मेरे कंकाल को उस तीर्थ में फेंक दिया यह बहुत उचित किया क्योंकि तुम मेरे पूर्वजन्म के मित्र हो। यह मलयचन्द्र और पद्मदत्तन भी उसी जन्म के मेरे मित्र हैं। इसलिए, हे मित्र ! उसी पूर्व जन्म के तप प्रभाव से मैं अतिशय ज्ञानी और राजा हुआ ॥१०३ १०४॥
१४८ कथासरित्सागर
१४८ कथासरित्सागर तदेतद्दर्शितं तुभ्यं युक्त्या प्रत्यक्षतो मया । भवत्क्षिप्तोऽस्यसद्भाव साभिज्ञानं च वर्णितम् ॥१०७॥ तस्मात्तुभ्यं मया राज्यमदामीति मम त्वया । अहङ्कारो न कर्त्तव्यः स्थाप्यं चेतो न दुःस्थितम् ॥१०८॥ विना हि प्राक्तनं कर्म न दाता कोऽपि कस्यचित् । आगर्भान्जन्त्वुरश्नाति पूर्वकर्मतरो फलम् ॥१०९॥ इत्युक्तः स भिषक् तेन राज्ञा दृष्ट्वा तथैव तत् । असन्तोषं पुनर्नैव तत्सेवामुत्स्रितोऽभ्यगात् ॥११०॥ सोऽपि राजाजरो जातिस्मरस्तं भिषजं ततः । सम्मान्यार्थप्रदानेन यथोचितमुदारधीः ॥१११॥ अन्तःपुरे सुहृद्भिेश्च साकं नयजितां महीम् । भुञ्जानः सुकृतप्राप्तां सुखमास्तापकण्टकाम् ॥११२॥ एवं भवति लोकेऽस्मिन् दैव सर्वस्वं सर्वदा । प्राक्कर्मोपार्जितं जन्तोः सर्वमेव शुभाशुभम् ॥११३॥ तस्मात्त्वमपि न स्वामी मन्ये जन्मान्तराजितः । सत्त्वं येष्वेवमस्माकं प्रसन्नाऽस्त्यन्यथा कथम् ॥११४॥ इत्यपूर्व्वरमणीयविचित्रां कान्तया सह तपन्तकवक्त्रात् । संनिशम्य स कथामुदतिष्ठत् स्नातुमत्र नरवाहनदत्तः ॥११५॥ कृतस्नानो गत्वा निकटमथ वत्सेशन्नृपतेः पितुर्मुञ्चन् मातुर्मुहुरमृतवर्षं नयनयोः । कृताहारस्ताभ्यां सह सदमितो मन्त्रिसहितः सुखैरापागाद्यैर्दिनमगमयेतां च रजनीम् ॥११६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके षष्ठस्तरङ्गः ।
सप्तमस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः स रत्नप्रभया समं तद्वासवेश्मनि । स्थितोऽन्येद्युः कथाः कुर्व्वंस्तास्ताः स सचिवैः सह ॥१॥ नरवाहनदत्तोऽथ मन्दिरप्राङ्गणे बहिः । अकस्मात्पुष्टयस्यैष शुश्रावाश्चन्वितध्वनिम् ॥२॥
सप्तम लम्बक १४९
सप्तम लम्बक १४९ यह सब मैंने युक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष दिखा दिया। और तुम्हारे द्वारा फेंके गये नरकंकाल के बारे में भी अभिज्ञान के साथ वर्णन कर दिया। इसलिए, यह राज्य मैंने तुम्हें दिया था वही अब तुमने मुझे दिया। अतः तुम्हें अहंकार न करना चाहिए और मन को भी दुःखी नहीं करना चाहिए ॥१०७-१०८॥ पूर्वजन्म के कर्मों के सिवा कोई किसी को कुछ देनेवाला नहीं है। प्रत्येक प्राणी गर्भ में प्रवेश के समय से पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करता है ॥१०९॥ उस राजासे इस प्रकार कहा गया वैद्य तरुणचन्द्र असन्तोष छोड़कर आनन्द से राजा की सेवा में तत्पर होगया ॥११०॥ उस जातिस्मर राजा अजर ने भी उस वैद्य को समुचित धन-मान आदि देकर अनुगृहीत किया ॥१११॥ और, स्वयं मित्रा एवं रानियों के साथ पृथ्वी का भोग करता हुआ निष्कण्टक राज्य करने लगा ॥११२॥ इतनी कथा सुनकर तपन्तक ने युवराज नरवाहनदत्त से कहा-'स्वामी ! इसी प्रकार इस लोक में सभी प्राणियों का शुभ और अशुभ फल अपने-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार होता है। मैं समझता हूँ कि आप हमारे पूर्वजन्म के स्वामी हैं। नहीं तो अन्य बहुतेरों के होते हुए भी आप हम पर इतने प्रसन्न कैसे होते ? ॥११३-११४॥ इस प्रकार, अपूर्व रोचक एवं विचित्र कथा को अपनी नवीन पत्नी रत्नप्रभा के साथ तपन्तक के मुँह से सुनकर, नरवाहनदत्त स्नान करने के लिए चला गया ॥११५॥ स्नान करके पिता और माता की आँखों में अमृत की वर्षा करते हुए नरवाहनदत्त ने पत्नी और मित्रों के साथ मद्यपान आदि में वह दिन और रात व्यतीत की ॥११६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त सप्तम तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत) तदनन्तर, किसी एक दिन रत्नप्रभा के साथ मन्त्रियों में विविध बातें करते हुए नरवाहन दत्त ने बाहर भवन के चौक में अकस्मात किसी पुरुष का रोना-चिल्लाना सुना ॥१-२॥
किमेवमिति कस्मिंश्चित्पृच्छत्यागत्य चेटिका। अब्रुवन् कञ्चुकी क्रन्दत्येष धर्मगिरि प्रभो॥३॥ इहागत्य हि मूर्खेण मित्रेण कथितोऽधुना। तीर्थयात्रागतोऽमुष्य भ्राता देशान्तरे मृतः ॥४॥ तेन राजकुलस्थोऽस्मीत्यस्मरञ्छोकमोहितः । साक्रन्दं सन्नगृह नीत सम्प्रत्यथ बहिर्जनैः ॥५॥ तच्छ्रुत्वा युवराजेऽस्मिञ्जातवेपु सानुकम्पया। राज्ञी रत्नप्रभा तत्र विषण्णेव जगाद सा॥६॥ प्रियबन्धुवियोगोत्थमहो दुःखं दुरुत्सहम्। कष्टं किं न कृतो धात्रा जनोऽयमजरामरः ॥७॥ इति राज्ञीवचः श्रुत्वा मरुभूतिरुवाच ताम्। मर्त्येष्वेतत्कुतो देवि तथाहीमां कथां शृणु ॥८॥
नागार्जुनकथा
चिरायुर्नाम्नि नगरे चिरायुर्नाम भूपतिः। पूर्वे चिरपुरेवासीन्निकेतनं सर्वसम्पदाम् ॥९॥ तस्य नागार्जुनो नाम बोधिसत्त्वांशसम्भवः। वयारुर्वानशीलपश्च मन्त्री विज्ञानवानभूत् ॥१०॥ यः सर्वौषधियुक्तिज्ञश्चक्रे सिद्धरसायनः। आत्मानं तं च राजानं विजरं चिरजीवितम् ॥११॥ कदाचिन्मन्त्रिणस्तस्य बालः पञ्चत्वमाययौ। नागार्जुनस्य पुत्रेषु सर्वेषु दयितः सुतः ॥१२॥ स तेन दृष्टसन्तापो मर्त्यानां मृत्युशान्तये। अमृतं सन्दधे द्रव्यैस्तपोदानप्रभावतः ॥१३॥ द्रोपौषधस्य त्वेकस्य कालयोगं स मन्वते। यावत्प्रतीक्षते तावदिन्द्रेण तदबुध्यत ॥१४॥ इन्द्रः समामन्त्र्य सुरैरश्विनावैवमादिशत्। गत्वा नागार्जुनं ब्रूतमिदं मद्वचनाद् भुवि ॥१५॥ कोऽयं कर्तुमिहारब्धो मन्त्रिणाप्यनमस्त्वया। किं स्वं प्रजापतिं जेतुमुद्यतो बत साम्प्रतम् ॥१६॥
सप्तम लम्बक १५१
सप्तम लम्बक १५१ 'यह क्या है ?—इस प्रकार आकर खिड़की से सेविकाओं से पूछने पर वे बोलीं— 'महाराज ! यह धर्मगिरि नामक कंचुकी चिल्ला रहा है। उसे किसी मूर्ख मित्र ने यहाँ आकर कह दिया कि तुम्हारा भाई तीर्थयात्रा के लिए गया था। वह किसी देश में मर गया ॥३-४॥ यह सुनते ही 'मैं राजभवन में हूँ'—इस बात का ध्यान न रखकर शोक से विह्वल वह चिल्लाने लगा। अब उसे कुछ लोग उसके घर पर ले गये ॥५॥ यह सुनकर युवराज उसके दुःख से दुःखी हुए और रानी रत्नप्रभा भी खिन्न-सी होकर बोली—'प्रिय भाई के मरने का दुःख सचमुच असह्य होता है। सच है विधाता ने उस व्यक्ति को अजर और अमर क्यों नहीं बना दिया? ॥६-७॥ रानी के इस प्रकार वचन सुनकर मरुभूति बोला—'महारानी ! मनुष्यों में अजर और अमर होना कैसे सम्भव है। इस प्रसङ्ग में यह कथा सुनो—॥८॥ नागार्जुन की कथा चिरायु नाम के नगर में चिरायु नाम का राजा था। वह चिरायु समस्त सम्पत्तियों का घर था ॥९॥ उस राजा का मन्त्री नागार्जुन बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न परम दयालु दानी और विज्ञानवेत्ता था ॥१०॥ अनेक ओषधियों की शक्तियों को जाननेवाला रसायनों के निर्माण में सिद्धहस्त उस मन्त्री ने अपने विज्ञान-बल से अपने को तथा राजा को वृद्धावस्था-रहित और चिरजीवी बना दिया था ॥११॥ किसी समय मन्त्री नागार्जुन के पुत्रों में सबसे प्यारा पुत्र बालवय होकर मर गया ॥१२॥ नागार्जुन को उसका ऐसा सन्ताप हुआ कि उसने मनुष्य की मृत्यु को सदा के लिए समाप्त करने के लिए (उन्हें अमर बनाने के लिए) अपने तप और ज्ञान के प्रभाव से अमृतमय ओषधियों से अमृत बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया ॥१३॥ अन्य सभी ओषधियों का उसने संग्रह कर लिया। केवल एक ओषधि मिलाना बाकी बच रहा था। नागार्जुन जब उस ओषधि की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि तबतक इन्द्र को इस बात का पता लग गया ॥१४॥ इन्द्र ने देवताओं से सम्मति करके देव-वैद्य अश्विनीकुमार को इस प्रकार आदेश दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर मेरी ओर से नागार्जुन से कहो—॥१५॥ कि 'तुमने मन्त्री होकर भी यह कौन-सी अनीति आरम्भी है कि अब तुम प्रजापति (ब्रह्मा) को भी जीतना चाहते हो ? ॥१६॥