महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं पिनाकं मे करे स्थितम् ॥ ७ ॥
लोगोंके हितकी कामनासे ही मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके वेषमें रहता हूँ। देवताओंका हित करनेके लिये पिनाक सदा मेरे हाथमें रहता है ॥ ७ ॥
इन्द्रेण च पुरा वज्रं क्षिप्तं श्रीकाङ्क्षिणा मम ।
दग्ध्वा कण्ठं तु तद् यातं तेन श्रीकण्ठता मम ॥ ८ ॥
पूर्वकालमें इन्द्रने मेरी श्री प्राप्त करनेकी इच्छासे मुझपर वज्रका प्रहार किया था। वह वज्र मेरा कण्ठ दग्ध करके चला गया। इससे मेरी श्रीकण्ठ नामसे ख्याति हुई ॥ ८ ॥
(पुरा युगान्तरे यत्नादमृतार्थं सुरासुरैः ।
बलवद्भिर्विमथितश्चिरकालं महोदधिः ॥
प्राचीन कालके दूसरे युगकी बात है, बलवान् देवताओं और असुरोंने मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये महान् प्रयास करते हुए चिरकालतक महासागरका मन्थन किया था ॥
रज्जुना नागराजेन मथ्यमाने महोदधौ ।
विषं तत्र समुद्भूतं सर्वलोकविनाशनम् ॥
नागराज वासुकिकी रस्सीसे बँधी हुई मन्दराचलरूपी मथानीद्वारा जब महासागर मथा जाने लगा, तब उससे सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाला विष प्रकट हुआ ॥
तद् दृष्ट्वा विबुधाः सर्वे तदा विमनसोऽभवन् ।
ग्रस्तं हि तन्मया देवि लोकानां हितकारणात् ॥
उसे देखकर सब देवताओंका मन उदास हो गया। देवि! तब मैंने तीनों लोकोंके हितके लिये उस विषको स्वयं पी लिया ॥
तत्कृता नीलता चासीत् कण्ठे बर्हिनिभा शुभे ।
तदाप्रभृति चैवाहं नीलकण्ठ इति स्मृतः ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
शुभे! उस विषके ही कारण मेरे कण्ठमें मोर-पंखके समान नीले रंगका चिह्न बन गया। तभीसे मैं नीलकण्ठ कहा जाने लगा। ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दी। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
उमोवाच
नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखावह ॥
बहूनामायुधानां त्वं पिनाकं धर्तुमिच्छसि ।
किमर्थं देवदेवेश तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। देवदेवेश्वर! बहुत-से आयुधोंके होते हुए भी आप पिनाकको ही किसलिये धारण करना चाहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
शस्त्रागमं ते वक्ष्यामि शृणु धर्म्यं शुचिस्मिते ।
युगान्तरे महादेवि कण्वो नाम महामुनिः ।।
स हि दिव्यां तपश्चर्यां कर्तुमेवोपचक्रमे ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**पवित्र मुसकानवाली महादेवि! सुनो। मुझे जिस प्रकार धर्मानुकूल शस्त्रोंकी प्राप्ति हुई है, उसे बता रहा हूँ। युगान्तरमें कण्वनामसे प्रसिद्ध एक महामुनि हो गये हैं। उन्होंने दिव्य तपस्या करनी आरम्भ की ।।
तथा तस्य तपो घोरं चरतः कालपर्ययात् ।।
वल्मीकं पुनरुद्भूतं तस्यैव शिरसि प्रिये ।
धरमाणश्च तत् सर्वं तपश्चर्यां तथाकरोत् ।
प्रिये! उसके अनुसार घोर तपस्या करते हुए मुनिके मस्तकपर कालक्रमसे बाँबी जम गयी। वह सब अपने मस्तकपर लिये-दिये वे पूर्ववत् तपश्चर्यामें लगे रहे ।।
तस्मै ब्रह्मा वरं दातुं जगाम तपसार्चितः ।।
दत्त्वा तस्मै वरं देवो वेणुं दृष्ट्वा त्वचिन्तयत् ।
मुनिकी तपस्यासे पूजित हुए ब्रह्माजी उन्हें वर देनेके लिये गये। वर देकर भगवान् ब्रह्माने वहाँ एक बाँस देखा और उसके उपयोगके लिये कुछ विचार किया ।।
लोककार्यं समुद्दिश्य वेणुनानेन भामिनि ।।
चिन्तयित्वा तमादाय कार्मुकार्थे न्ययोजयत् ।
भामिनि! उस बाँसके द्वारा जगत्का उपकार करनेके उद्देश्यसे कुछ सोचकर ब्रह्माजीने उस वेणुको हाथमें ले लिया और उसे धनुषके उपयोगमें लगाया ।।
विष्णोर्मम च सामर्थ्यं ज्ञात्वा लोकपितामहः ।।
धनुषी द्वे तदा प्रादाद् विष्णवे मम चैव तु ।
लोकपितामह ब्रह्माने भगवान् विष्णुकी और मेरी शक्ति जानकर उनके और मेरे लिये तत्काल दो धनुष बनाकर दिये ।।
पिनाकं नाम मे चापं शार्ङ्गं नाम हरेर्धनुः ।।
तृतीयमवशेषेण गाण्डीवमभवद् धनुः ।
मेरे धनुषका नाम पिनाक हुआ और श्रीहरिके धनुषका नाम शार्ङ्ग। उस वेणुके अवशेष भागसे एक तीसरा धनुष बनाया गया, जिसका नाम गाण्डीव हुआ ।।
तच्च सोमाय निर्दिश्य ब्रह्मा लोकं गतः पुनः ।।
एतत् ते सर्वमाख्यातं शस्त्रागममनिन्दिते ।)
गाण्डीव धनुष सोमको देकर ब्रह्माजी फिर अपने लोकको चले गये। अनिन्दिते! शस्त्रोंकी प्राप्तिका यह सारा वृत्तान्त मैंने तुम्हें कह सुनाया ।।
उमोवाच वाहनेष्वत्र सर्वेषु श्रीमत्स्वन्येषु सत्तम । कथं च वृषभो देव वाहनत्वमुपागतः ॥ ९ ॥ उमाने पूछा—सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महादेव! इस जगत्में अन्य सब सुन्दर वाहनोंके होते हुए क्यों वृषभ ही आपका वाहन बना है? ॥ ९ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच सुरभीमसृजद् ब्रह्मा देवधेनुं पयोमुचम् । सा सृष्टा बहुधा जाता क्षरमाणा पयोऽमृतम् ॥ १० ॥ श्रीमहेश्वरने कहा—प्रिये! ब्रह्माजीने देवताओंके लिये दूध देनेवाली सुरभि नामक गायकी सृष्टि की, जो मेघके समान दूधरूपी जलकी वर्षा करनेवाली थी। उत्पन्न हुई सुरभि अमृतमय दूध बहाती हुई अनेक रूपोंमें प्रकट हो गयी ॥ १० ॥ तस्या वत्समु खोत्सृष्टः फेनो मद्गात्रमागतः । ततो दग्धा मया गावो नानावर्णत्वमागताः ॥ ११ ॥ एक दिन उसके बछड़ेके मुखसे निकला हुआ फेन मेरे शरीरपर पड़ गया। इससे मैंने कुपित होकर गौओंको ताप देना आरम्भ किया। मेरे रोषमें दग्ध हुई गौओंके रंग नाना प्रकारके हो गये ॥ ११ ॥ ततोऽहं लोकगुरुणा शमं नीतोऽर्थवेदिना । वृषं चैनं ध्वजार्थं मे ददौ वाहनमेव च ॥ १२ ॥ अब अर्थनीतिके ज्ञाता लोकगुरु ब्रह्माने मुझे शान्त किया तथा ध्वज-चिह्न और वाहनके रूपमें यह वृषभ मुझे प्रदान किया ॥ १२ ॥
उमोवाच निवासा बहुरूपास्ते दिवि सर्वगुणान्विताः । तांश्च संत्यज्य भगवन् श्मशाने रमसे कथम् ॥ १३ ॥ उमाने पूछा—भगवन्! स्वर्गलोकमें अनेक प्रकारके सर्वगुणसम्पन्न निवासस्थान हैं, उन सबको छोड़कर आप श्मशान-भूमिमें कैसे रमते हैं? ॥ १३ ॥ केशास्थिकलिला भीमे कपालघटसंकुले । गृध्रगोमायुबहुले चिताग्निशतसंकुले ॥ १४ ॥ अशुचौ मांसकलिले वसाशोणितकर्दमे । विकीर्णान्त्रास्थिनिचये शिवानादविनादिते ॥ १५ ॥ श्मशानभूमि तो केशों और हड्डियोंसे भरी होती है। उस भयानक भूमिमें मनुष्योंकी खोपड़ियाँ और घड़ें पड़े रहते हैं। गीधों और गीदड़ोंकी जमातें जुटी रहती हैं। वहाँ सब ओर चिताएँ जला करती हैं। मांस, वसा और रक्तकी कीच-सी मची रहती है। बिखरी हुई
आँतोंवाली हड्डियोंके ढेर पड़े रहते हैं और सियारिनोंकी हुआँ-हुआँकी ध्वनि वहाँ गूँजती रहती है, ऐसे अपवित्र स्थानमें आप क्यों रहते हैं? ।। १४-१५ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
मेध्यान्वेषी महीं कृत्स्नां विचराम्यनिशं सदा ।
न च मेध्यतरं किंचित् श्मशानादिह लक्ष्यते ।। १६ ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! मैं पवित्र स्थान ढूँढ़नेके लिये सदा सारी पृथ्वीपर दिन-रात विचरता रहता हूँ, परंतु श्मशानसे* बढ़कर दूसरा कोई पवित्रतर स्थान यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रहा है ।। १६ ।।
तेन मे सर्ववासानां श्मशाने रमते मनः ।
न्यग्रोधशाखासंछन्ने निर्भुग्नस्रग्विभूषिते ।। १७ ।।
इसलिये सम्पूर्ण निवासस्थानोंमेंसे श्मशानमें ही मेरा मन अधिक रमता है। वह श्मशानभूमि बरगदकी डालियोंसे आच्छादित और मुर्दोंके शरीरसे टूटकर गिरी हुई पुष्पमालाओंके द्वारा विभूषित होती है ।। १७ ।।
तत्र चैव रमन्तीमे भूतसंघाः शुचिस्मिते ।
न च भूतगणैर्देवि विनाहं वस्तुमुत्सहे ।। १८ ।।
पवित्र मुसकानवाली देवि! ये मेरे भूतगण श्मशानमें ही रमते हैं। इन भूतगणोंके बिना मैं कहीं भी रह नहीं सकता ।। १८ ।।
एष वासो हि मे मेध्यः स्वर्गीयश्च मतः शुभे ।
पुण्यः परमकश्चैव मेध्यकामैरुपास्यते ।। १९ ।।
शुभे! यह श्मशानका निवास ही मैंने अपने लिये पवित्र और स्वर्गीय माना है। यही परम पुण्यस्थली है। पवित्र वस्तुकी कामना रखनेवाले उपासक इसीकी उपासना करते हैं ।। १९ ।।
(अस्माच्छ्मशानमेध्यं तु नास्ति किंचिदनिन्दिते ।
निस्सम्पातान्मनुष्याणां तस्माच्छुचितमं स्मृतम् ।।
अनिन्दिते! इस श्मशानभूमिसे अधिक पवित्र दूसरा कोई स्थान नहीं है, क्योंकि वहाँ मनुष्योंका अधिक आना-जाना नहीं होता। इसीलिये वह स्थान पवित्रतम माना गया है ।।
स्थानं मे तत्र विहितं वीरस्थानमिति प्रिये ।
कपालशतसम्पूर्णमभिरूपं भयानकम् ।।
प्रिये! वह वीरोंका स्थान है, इसलिये मैंने वहाँ अपना निवास बनाया है। वह मृतकोंकी सैकड़ों खोपड़ियोंसे भरा हुआ भयानक स्थान भी मुझे सुन्दर लगता है ।।
मध्याह्ने संध्ययोस्तत्र नक्षत्रे रुद्रदैवते ।
आयुष्कामैरशुद्धैर्वा न गन्तव्यमिति स्थितिः ।।
दोपहरके समय, दोनों संध्याओंके समय तथा आर्द्रा नक्षत्रमें दीर्घायुकी कामना रखनेवाले अथवा अशुद्ध पुरुषोंको वहाँ नहीं जाना चाहिये, ऐसी मर्यादा है ।।
मदन्येन न शक्यं हि निहन्तुं भूतजं भयम् ।
तत्रस्थोऽहं प्रजाः सर्वाः पालयामि दिने दिने ।।
मेरे सिवा दूसरा कोई भूतजनित भयका नाश नहीं कर सकता। इसलिये मैं श्मशानमें रहकर समस्त प्रजाओंका प्रतिदिन पालन करता हूँ ।।
मन्नियोगाद् भूतसंघा न च घ्नन्तीह कंचन ।
तांस्तु लोकहितार्थाय श्मशाने रमयाम्यहम् ।।
एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
मेरी आज्ञा मानकर ही भूतोंके समुदाय अब इस जगत्में किसीकी हत्या नहीं कर सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये मैं उन भूतोंको श्मशानभूमिमें रमाये रखता हूँ। श्मशानभूमिमें रहनेका सारा रहस्य मैंने तुमको बता दिया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश त्रिनेत्र वृषभध्वज ।
पिङ्गलं विकृतं भाति रूपं ते तु भयानकम् ।।
उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिनेत्र! वृषभध्वज! आपका रूप पिंगल, विकृत और भयानक प्रतीत होता है ।।
भस्मदिग्धं विरूपाक्षं तीक्ष्णदंष्ट्रं जटाकुलम् ।
व्याघ्रोदरत्वक्संवीतं कपिलश्मश्रुसंततम् ।।
आपके सारे शरीरमें भभूति पुती हुई है, आपकी आँख विकराल दिखायी देती है, दाढ़ें तीखी हैं और सिरपर जटाओंका भार लदा हुआ है, आप बाघम्बर लपेटे हुए हैं और आपके मुखपर कपिल रंगकी दाढ़ी-मूँछ फैली हुई है ।।
रौद्रं भयानकं घोरं शूलपट्टिशसंयुतम् ।
किमर्थं त्वीदृशं रूपं तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
आपका रूप ऐसा रौद्र, भयानक, घोर तथा शूल और पट्टिश आदिसे युक्त किसलिये है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ।।
श्रीमहेश्वरने कहा— प्रिये! मैं इसका भी यथार्थ कारण बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जगत्के सारे पदार्थ दो भागोंमें विभक्त हैं—शीत और उष्ण (अग्नि और
सोम) ।। तयोर्हि ग्रथितं सर्वं सौम्याग्नेयमिदं जगत् । सौम्यत्वं सततं विष्णौ मय्याग्नेयं प्रतिष्ठितम् ।। अनेन वपुषा नित्यं सर्वलोकान् बिभर्म्यहम् । अग्नि-सोम-रूप यह सम्पूर्ण जगत् उन शीत और उष्ण तत्त्वोंमें गुँथा हुआ है। सौम्य गुणकी स्थिति सदा भगवान् विष्णुमें है और मुझमें आग्नेय (तैजस) गुण प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इस विष्णु और शिवरूप शरीरसे मैं सदा समस्त लोकोंकी रक्षा करता हूँ ।। रौद्राकृतिं विरूपाक्षं शूलपट्टिशसंयुक्तम् । आग्नेयमिति मे रूपं देवि लोकहिते रतम् ।। देवि! यह जो विकराल नेत्रोंसे युक्त और शूल-पट्टिशसे सुशोभित भयानक आकृतिवाला मेरा रूप है, यही आग्नेय है। यह सम्पूर्ण जगत्के हितमें तत्पर रहता है ।। यद्यहं विपरीत: स्यामेतत् त्यक्त्वा शुभानने । तदैव सर्वलोकानां विपरीतं प्रवर्त्तते ।। शुभानने! यदि मैं इस रूपको त्यागकर इसके विपरीत हो जाऊँ तो उसी समय सम्पूर्ण लोकोंकी दशा विपरीत हो जायगी ।। तस्मान्मयेदं ध्रियते रूपं लोकहितैषिणा । इति ते कथितं देवि किं भूय: श्रोतुमिच्छसि ।। देवि! इसलिये लोकहितकी इच्छासे ही मैंने यह रूप धारण किया है। अपने रूपका यह सारा रहस्य बता दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
नारद उवाच
एवं ब्रुवति देवेशे विस्मिता परमर्षयः । वाग्भिःसाञ्जलिमालाभिरभितुष्टुवुरीश्वरम् ।। नारदजी कहते हैं—देवेश्वर भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सभी महर्षि बड़े विस्मित हुए और हाथ जोड़कर अपनी वाणीद्वारा उन महादेवजीकी स्तुति करने लगे ।।
ऋषय ऊचुः
नमः शङ्कर सर्वेश नमः सर्वजगद्गुरो । नमो देवादिदेवाय नमः शशिकलाधर ।। ऋषि बोले—सर्वेश्वर शंकर! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्के गुरुदेव! आपको नमस्कार है। देवताओंके भी आदि देवता! आपको नमस्कार है। चन्द्रकलाधारी शिव! आपको नमस्कार है ।। नमो घोरतराद् घोर नमो रुद्राय शङ्कर । नमः शान्ततराच्छान्त नमश्चन्द्रस्य पालक ।।
अत्यन्त घोरसे भी घोर रुद्रदेव! शंकर! आपको बार-बार नमस्कार है। अत्यन्त शान्तसे भी शान्त शिव! आपको नमस्कार है। चन्द्रमाके पालक! आपको नमस्कार है॥ नमः सोमाय देवाय नमस्तुभ्यं चतुर्मुख । नमो भूतपते शम्भो जह्नुकन्याम्बुशेखर ॥ उमासहित महादेवजीको नमस्कार है। चतुर्मुख! आपको नमस्कार है। गंगाजीके जलको सिरपर धारण करनेवाले भूतनाथ शम्भो! आपको नमस्कार है॥ नमस्त्रिशूलहस्ताय पन्नगाभरणाय च । नमोऽस्तु विषमाक्षाय दक्षयज्ञप्रदाहक ॥ हाथोंमें त्रिशूल धारण करनेवाले तथा सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित आप महादेवको नमस्कार है। दक्ष-यज्ञको दग्ध करनेवाले त्रिलोचन! आपको नमस्कार है॥ नमोऽस्तु बहुनेत्राय लोकरक्षणतत्पर । अहो देवस्य माहात्म्यमहो देवस्य वै कृपा ॥ एवं धर्मपरत्वं च देवदेवस्य चार्हति । लोकरक्षामें तत्पर रहनेवाले शंकर! आपके बहुत-से नेत्र हैं, आपको नमस्कार है। अहो! महादेवजीका कैसा माहात्म्य है। अहो! रुद्रदेवकी कैसी कृपा है। ऐसी धर्मपरायणता देवदेव महादेवके ही योग्य है॥
नारद उवाच
एवं ब्रुवत्सु मुनिषु वचो देव्यब्रवीद्धरम् । सम्प्रीत्यर्थं मुनीनां सा क्षणज्ञा परमं हितम् ॥) **नारदजी कहते हैं—**जब मुनि इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी समय अवसरको जाननेवाली देवी पार्वती मुनियोंकी प्रसन्नताके लिये भगवान् शंकरसे परम हितकी बात बोलीं॥
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश सर्वधर्मविदां वर । पिनाकपाणे वरद संशयो मे महानयम् ॥ २० ॥ **उमाने पूछा—**सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ! सर्वभूतेश्वर! भगवन्! वरदायक! पिनाकपाणे! मेरे मनमें यह एक और महान् संशय है॥ २०॥ अयं मुनिगणः सर्वस्तपस्तेप इति प्रभो । तपोवेषकरो लोके भ्रमते विविधाकृतिः ॥ २१ ॥ अस्य चैवर्षिसंघस्य मम च प्रियकाम्यया । एतं ममेह संदेहं वक्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २२ ॥
प्रभो! यह जो मुनियोंका सारा समुदाय यहाँ उपस्थित है, सदा तपस्यामें संलग्न रहा है
और तपस्वीका वेष धारण किये लोकमें भ्रमण कर रहा है; इन सबकी आकृति भिन्न-भिन्न
प्रकारकी है। शत्रुदमन शिव! इस ऋषिसमुदायका तथा मेरा भी प्रिय करनेकी इच्छासे आप
मेरे इस संदेहका समाधान करें ।। २१-२२ ।।
धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वा चरितुं नरैः ।
शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ।। २३ ।।
प्रभो! धर्मज्ञ! धर्मका क्या लक्षण बताया गया है? तथा जो धर्मको नहीं जानते हैं ऐसे
मनुष्य उस धर्मका आचरण कैसे कर सकते हैं? यह मुझे बताइये ।। २३ ।।
नारद उवाच
ततो मुनिगणः सर्वस्तां देवीं प्रत्यपूजयत् ।
वाग्भिर्ऋग्भूषितार्थाभिः स्तवैश्चार्थविशारदैः ।। २४ ।।
नारदजी कहते हैं—तदनन्तर समस्त मुनि-समुदायने देवी पार्वतीकी ऋग्वेदके
मन्त्रार्थोंसे सुशोभित वाणी तथा उत्तम अर्थयुक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति एवं प्रशंसा की ।। २४ ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम् ।
शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ।। २५ ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! किसी भी जीवकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब
प्राणियोंपर दया करना, मन और इन्द्रियोंपर काबू रखना तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान
देना गृहस्थ-आश्रमका उत्तम धर्म है ।। २५ ।।
परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् ।
अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम् ।। २६ ।।
एष पञ्चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः ।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ।। २७ ।।
(उक्त गृहस्थ-धर्मका पालन करना,) परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और
स्त्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिराको त्याग देना
—से धर्मके पाँच भेद हैं, जो सुखकी प्राप्ति करानेवाले हैं। इनमेंसे एक-एक धर्मकी अनेक
शाखाएँ हैं। धर्मको श्रेष्ठ माननेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्मका पालन अवश्य
करें ।।
उमोवाच
भगवन् संशयः पृष्टस्तन्मे शंसितुमर्हसि ।
चातुर्वर्ण्यस्य यो धर्मः स्वे स्वे वर्णे गुणावहः ।। २८ ।।
उमाने पूछा— भगवन्! मैं एक और संशय उपस्थित करती हूँ; चारों वर्णोंका जो-जो धर्म अपने-अपने वर्णके लिये विशेष लाभकारी हो, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये॥ २८॥
ब्राह्मणे कीदृशो धर्मः क्षत्रिये कीदृशोऽभवत्।
वैश्ये किंलक्षणो धर्मः शूद्रे किंलक्षणो भवेत् ॥ २९ ॥
ब्राह्मणके लिये धर्मका स्वरूप कैसा है, क्षत्रियके लिये कैसा है, वैश्यके लिये उपयोगी धर्मका क्या लक्षण है तथा शूद्रके धर्मका भी क्या लक्षण है? ॥ २९ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
(एतत्ते कथयिष्यामि यत्ते देवि मनःप्रियम्।
शृणु तत् सर्वमखिलं धर्मं वर्णाश्रमाश्रितम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारे मनको प्रिय लगनेवाला जो यह धर्मका विषय है, उसे बताऊँगा। तुम वर्णों और आश्रमोंपर अवलम्बित समस्त धर्मका पूर्णरूपसे वर्णन सुनो ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति चतुर्विधम्।
ब्रह्मणा विहिताः पूर्वं लोकतन्त्रमभीप्सता ॥
कर्माणि च तदर्हाणि शास्त्रेषु विहितानि वै।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये वर्णोंके चार भेद हैं। लोकतन्त्रकी इच्छा रखनेवाले विधाताने सबसे पहले ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है और शास्त्रोंमें उनके योग्य कर्मोंका विधान किया है॥
यदीदमेकवर्णं स्याज्जगत् सर्वं विनश्यति ॥
सहैव देवि वर्णानि चत्वारि विहितान्यतः।
देवि! यदि यह सारा जगत् एक ही वर्णका होता तो सब साथ ही नष्ट हो जाता। इसलिये विधाताने चार वर्ण बनाये हैं ॥
मुखतो ब्राह्मणाः सृष्टास्तस्मात् ते वाग्विशारदाः ॥
बाहुभ्यां क्षत्रियाः सृष्टास्तस्मात् ते बाहुगर्विताः।
ब्राह्मणोंकी सृष्टि विधाताके मुखसे हुई है, इसीलिये वे वाणीविशारद होते हैं। क्षत्रियोंकी सृष्टि दोनों भुजाओंसे हुई है, इसीलिये उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व होता है ॥
उदरादुद्गता वैश्यास्तस्माद् वार्तोपजीविनः ॥
शूद्राश्च पादतः सृष्टास्तस्मात् ते परिचारकाः ।
तेषां धर्मांश्च कर्माणि शृणु देवि समाहिता ॥
वैश्योंकी उत्पत्ति उदरसे हुई है, इसीलिये वे उदर-पोषणके निमित्त कृषि, वाणिज्यादि वार्तावृत्तिका आश्रय ले जीवन-निर्वाह करते हैं। शूद्रोंकी सृष्टि पैरसे हुई है, इसलिये वे
परिचारक होते हैं। देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर चारों वर्णोंके धर्म और कर्मोंका वर्णन
सुनो ।।
विप्राः कृता भूमिदेवा लोकानां धारणे कृताः ।
ते कैश्चिन्नावमन्तव्या ब्राह्मणा हितमिच्छुभिः ।।
ब्राह्मणको इस भूमिका देवता बनाया गया है। वे सब लोकोंकी रक्षाके लिये उत्पन्न
किये गये हैं। अतः अपने हितकी इच्छा रखनेवाले किसी भी मनुष्यको ब्राह्मणोंका अपमान
नहीं करना चाहिये ।।
यदि ते ब्राह्मणा न स्युर्दानयोगवहाः सदा ।
उभयोर्लोकयोर्देवि स्थितिर्न स्यात् समासतः ।।
देवि! यदि दान और योगका वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न हों तो लोक और परलोक
दोनोंकी स्थिति कदापि नहीं रह सकती ।।
ब्राह्मणान् योऽवमन्येत निन्देच्च क्रोधयेच्च वा ।
प्रहरेत् हरेद् वापि धनं तेषां नराधमः ।।
कारयेद्दीनकर्माणि कामलोभविमोहनात् ।
स च मामवमन्येत मां क्रोधयति निन्दति ।।
मामेव प्रहरेन्मूढो मद्धनस्यापहारकः ।
मामेव प्रेषणं कृत्वा निन्दते मूढचेतनः ।।
जो ब्राह्मणोंका अपमान और निन्दा करता अथवा उन्हें क्रोध दिलाता या उनपर प्रहार
करता अथवा उनका धन हर लेता है या काम, लोभ एवं मोहके वशीभूत होकर उनसे नीच
कर्म कराता है, वह नराधम मेरा ही अपमान या निन्दा करता है। मुझे ही क्रोध दिलाता है,
मुझपर ही प्रहार करता है, वह मूढ़ मेरे ही धनका अपहरण करता है तथा वह मूढ़चित्त
मानव मुझे ही इधर-उधर भेजकर नीच कर्म कराता और निन्दा करता है ।।
स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः ।
कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः ।।
सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।
वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मणका धर्म है, यह शास्त्रका निर्णय है। वेदोंको
पढ़ाना, यजमानका यज्ञ कराना और दान लेना—ये उसकी जीविकाके साधनभूत कर्म हैं।
सत्य, मनोनिग्रह, तप और शौचाचारका पालन—यह उनका सनातन धर्म है ।।
विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः ।।
रस और धान्य (अनाज) का विक्रय करना ब्राह्मणके लिये निन्दित है ।।
तप एव सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः ।
स तु धर्मार्थमुत्पन्नः पूर्वं धात्रा तपोबलात् ।।
सदा तप करना ही ब्राह्मणका धर्म है, इसमें संशय नहीं है। विधाताने पूर्वकालमें धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये ही अपने तपोबलसे ब्राह्मणको उत्पन्न किया था।।
न्यायतस्ते महाभागे सर्वशः समुदीरितः।
भूमिदेवा महाभागाः सदा लोके द्विजातयः ॥ ३० ॥
महाभागे! मैंने तुम्हारे निकट सब प्रकारसे धर्मका निर्णय किया है। महाभाग ब्राह्मण इस लोकमें सदा भूमिदेव माने गये हैं ॥ ३० ॥
उपवासः सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः।
स हि धर्मार्थसम्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३१ ॥
इसमें संशय नहीं कि उपवास (इन्द्रियसंयम) व्रतका आचरण करना ब्राह्मणके लिये सदा धर्म बतलाया गया है। धर्मार्थसम्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३१ ॥
तस्य धर्मक्रिया देवि ब्रह्मचर्या च न्यायतः।
व्रतोपनयनं चैव द्विजो येनोपपद्यते ॥ ३२ ॥
देवि! उसे धर्मका अनुष्ठान और न्यायतः ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये। व्रतके पालनपूर्वक उपनयन-संस्कारका होना उसके लिये परम आवश्यक है, क्योंकि उसीसे वह द्विज होता है ॥ ३२ ॥
गुरुदैवतपूजार्थं स्वाध्यायाभ्यासनात्मकः।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ॥ ३३ ॥
गुरु और देवताओंकी पूजा तथा स्वाध्याय और अभ्यासरूप धर्मका पालन ब्राह्मणको अवश्य करना चाहिये। धर्मपरायण देहधारियोंको उचित है कि वे पुण्यप्रद धर्मका आचरण अवश्य करें ॥ ३३ ॥
उमोवाच
भगवन् संशयो मेऽस्ति तन्मे व्याख्यातुमर्हसि।
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मं वै नैपुण्येन प्रकीर्तय ॥ ३४ ॥
उमाने कहा— भगवन्! मेरे मनमें अभी संशय रह गया है। अतः उसकी व्याख्या करके मुझे समझाइये। चारों वर्णोंका जो धर्म है, उसका पूर्णरूपसे प्रतिपादन कीजिये ॥ ३४ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
रहस्यश्रवणं धर्मो वेदव्रतनिषेवणम्।
अग्निकार्यं तथा धर्मो गुरुकार्यप्रसाधनम् ॥ ३५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— धर्मका रहस्य सुनना, वेदोक्त व्रतका पालन करना, होम और गुरुसेवा करना—यह ब्रह्मचर्य-आश्रमका धर्म है ॥ ३५ ॥
भैक्षचर्या परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता।
नित्यं स्वाध्यायिता धर्मो ब्रह्मचर्याश्रमस्तथा ॥ ३६ ॥
ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या (गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना) परम धर्म है। नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है ॥ ३६ ॥ गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः । विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ॥ ३७ ॥ ब्रह्मचर्यकी अवधि समाप्त होनेपर द्विज अपने गुरुकी आज्ञा लेकर समावर्तन करे और घर आकर अनुरूप स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे ॥ ३७ ॥ शूद्रान्नवर्जनं धर्मस्तथा सत्पथसेवनम् । धर्मो नित्योपवासित्वं ब्रह्मचर्यं तथैव च ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये, यह उसका धर्म है। सन्मार्गका सेवन, नित्य उपवास-व्रत और ब्रह्मचर्यका पालन भी धर्म है ॥ ३८ ॥ आहिताग्निरधीयानो जुह्वानः संयतेन्द्रियः । विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक् शुचिः ॥ ३९ ॥ गृहस्थको अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला, स्वाध्यायशील, होमपरायण, जितेन्द्रिय, विघसाशी, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये ॥ ३९ ॥ अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् । इष्टींश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ॥ ४० ॥ अतिथि-सत्कार करना और गार्हपत्य आदि त्रिविध अग्नियोंकी रक्षा करना उसके लिये धर्म है। वह नाना प्रकारकी इष्टियों और पशुरक्षाकर्मका भी विधिपूर्वक आचरण करे ॥ ४० ॥ यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु । अपूर्वभोजनं धर्मो विघसाशित्वमेव च ॥ ४१ ॥ यज्ञ करना तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करना उसके लिये परम धर्म है। घरमें पहले भोजन न करना तथा विघसाशी होना—कुटुम्बके लोगोंके भोजन करानेके बाद ही अवशिष्ट अन्नका भोजन करना—यह भी उसका धर्म है ॥ ४१ ॥ भुक्ते परिजने पश्चाद् भोजनं धर्म उच्यते । ब्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः ॥ ४२ ॥ जब कुटुम्बीजन भोजन कर लें उसके पश्चात् स्वयं भोजन करना—यह गृहस्थ ब्राह्मणका विशेषतः श्रोत्रियका मुख्य धर्म बताया गया है ॥ ४२ ॥ दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मः स्याद् गृहमेधिनः । गृह्याणां चैव देवानां नित्यपुष्पबलिक्रिया ॥ ४३ ॥ नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता ।
पति और पत्नीका स्वभाव एक-सा होना चाहिये। यह गृहस्थका धर्म है। घरके देवताओंकी प्रतिदिन पुष्पोंद्वारा पूजा करना, उन्हें अन्नकी बलि समर्पित करना, रोज-रोज घर लीपना और प्रतिदिन व्रत रखना भी गृहस्थका धर्म है ।। ४३ १/२ ।।
सुसम्मृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमो भवेद् गृहे ॥ ४४ ॥
एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारणः ।
द्विजानां च सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ॥ ४५ ॥
झाड़-बुहार, लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए घरमें घृतयुक्त आहुति करके उसका धुआँ फैलाना चाहिये। यह ब्राह्मणोंका गार्हस्थ्य धर्म बतलाया, जो संसारकी रक्षा करनेवाला है। अच्छे ब्राह्मणोंके यहाँ सदा ही इस धर्मका पालन किया जाता है ।। ४४-४५ ।।
यस्तु क्षत्रगतो देवि मया धर्म उदीरितः ।
तमहं ते प्रवक्ष्यामि तन्मे शृणु समाहिता ॥ ४६ ॥
देवि! मेरे द्वारा जो क्षत्रिय-धर्म बताया गया है, उसीका अब तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ, तुम मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। ४६ ।।
क्षत्रियस्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः ।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ ४७ ॥
क्षत्रियका सबसे पहला धर्म है प्रजाका पालन करना। प्रजाकी आयके छठे भागका उपभोग करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है ।। ४७ ।।
(क्षत्रियास्तु ततो देवि द्विजानां पालने स्मृताः ।
यदि न क्षत्रियो लोके जगत् स्यादधरोत्तरम् ॥
रक्षणात् क्षत्रियैरेव जगद् भवति शाश्वतम् ।
देवि! क्षत्रिय ब्राह्मणोंके पालनमें तत्पर रहते हैं। यदि संसारमें क्षत्रिय न होता तो इस जगत्में भारी उलट-फेर या विप्लव मच जाता। क्षत्रियोंद्वारा रक्षा होनेसे ही यह जगत् सदा टिका रहता है ।।
सम्यग्गुणहितो धर्मो धर्मः पौरहितक्रिया ।
व्यवहारस्थितिर्नित्यं गुणयुक्तो महीपतिः ॥)
उत्तम गुणोंका सम्पादन और पुरवासियोंका हितसाधन उसके लिये धर्म है। गुणवान् राजा सदा न्याययुक्त व्यवहारमें स्थित रहे ।।
प्रजाः पालयते यो हि धर्मेण मनुजाधिपः ।
तस्य धर्मार्जिता लोकाः प्रजापालनसंचिताः ॥ ४८ ॥
जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसे उसके प्रजापालनरूपी धर्मके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ।। ४८ ।।
तस्य राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय एव च ।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ४९ ॥
यज्ञोपवीतधरणं यज्ञो धर्मक्रियास्तथा । भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ॥ ५० ॥ सम्यग्दण्डे स्थितिर्धर्मो धर्मो वेदक्रतुक्रियाः । व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ॥ ५१ ॥ राजाका परम धर्म है—इन्द्रियसंयम, स्वाध्याय, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, यज्ञोपवीत-धारण, यज्ञानुष्ठान, धार्मिक कार्यका सम्पादन, पोष्यवर्गका भरण-पोषण, आरम्भ किये हुए कर्मको सफल बनाना, अपराधके अनुसार उचित दण्ड देना, वैदिक यज्ञादि कर्मोंका अनुष्ठान करना, व्यवहारमें न्यायकी रक्षा करना और सत्यभाषणमें अनुरक्त होना। ये सभी कर्म राजाके लिये धर्म ही हैं ॥ आर्तहस्तप्रदो राजा प्रेत्य चेह महीयते । गोब्राह्मणार्थे विक्रान्तः संग्रामे निधनं गतः ॥ ५२ ॥ अश्वमेधजिताँल्लोकानाप्नोति त्रिदिवालये ॥ ५३ ॥ जो राजा दुखी मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, वह इस लोक और परलोकमें भी सम्मानित होता है। गौओं और ब्राह्मणोंको संकटसे बचानेके लिये जो पराक्रम दिखाकर संग्राममें मृत्युको प्राप्त होता है, वह स्वर्गमें अश्वमेध यज्ञोंद्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार जमा लेता है ॥ ५२-५३ ॥ (तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः । अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्षफलदा हि ते ॥ यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवेयुस्तथा परे ।) देवि! इसी प्रकार वैश्य भी लोगोंकी जीवन-यात्राके निर्वाहमें सहायक माने गये हैं। दूसरे वर्णोंके लोग उन्हींके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं। यदि वैश्य न हों तो दूसरे वर्णके लोग भी न रहें ॥ वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ५४ ॥ वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः । विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः ॥ ५५ ॥ पशुओंका पालन, खेती, व्यापार, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, सन्मार्गका आश्रय लेकर सदाचारका पालन, अतिथि-सत्कार, शम, दम, ब्राह्मणोंका स्वागत और त्याग—ये सब वैश्योंके सनातन धर्म हैं ॥ ५४-५५ ॥ तिलान् गन्धान् रसांश्चैव विक्रीणीयान्न चैव हि । वणिक्पथमुपासीनो वैश्यः सत्पथमाश्रितः ॥ ५६ ॥ सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यथार्हतः ।
व्यापार करनेवाले सदाचारी वैश्यको तिल, चन्दन और रसकी बिक्री नहीं करनी चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इस त्रिवर्गका सब प्रकारसे यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ॥
शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु ॥ ५७ ॥
स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
शुश्रूषुरतिथिं प्राप्तं तपः संचिनुते महत् ॥ ५८ ॥
शूद्रका परम धर्म है तीनों वर्णोंकी सेवा। जो शूद्र सत्यवादी, जितेन्द्रिय और घरपर आये हुए अतिथिकी सेवा करनेवाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है। उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है ॥ ५७-५८ ॥
नित्यं स हि शुभाचारो देवताद्विजपूजकः ।
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रयुज्येत बुद्धिमान् ॥ ५९ ॥
नित्य सदाचारका पालन और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले बुद्धिमान् शूद्रको धर्मका मनोवांछित फल प्राप्त होता है ॥ ५९ ॥
(तथैव शूद्रा विहिताः सर्वधर्मप्रसाधकाः ।
शूद्राश्च यदि ते न स्युः कर्मकर्ता न विद्यते ॥
इसी प्रकार शूद्र भी सम्पूर्ण धर्मोंके साधक बताये गये हैं। यदि शूद्र न हों तो सेवाका कार्य करनेवाला कोई नहीं है ॥
त्रयः पूर्वे शूद्रमूलाः सर्वे कर्मकराः स्मृताः ।
ब्राह्मणादिषु शुश्रूषा दासधर्म इति स्मृतः ॥
पहलेके जो तीन वर्ण हैं, वे सब शूद्रमूलक ही हैं, क्योंकि शूद्र ही सेवाका कर्म करनेवाले माने गये हैं। ब्राह्मण आदिकी सेवा ही दास या शूद्रका धर्म माना गया है ॥
वार्ता च कारुकर्माणि शिल्पं नाट्यं तथैव च ।
अहिंसकः शुभाचारो दैवतद्विजवन्दकः ॥
वाणिज्य, कारीगरके कार्य, शिल्प तथा नाट्य भी शूद्रका धर्म है। उसे अहिंसक, सदाचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ॥
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः स्वधर्मेणोपयुज्यते ।
एवमादि तथान्यच्च शूद्रधर्म इति स्मृतः ॥)
ऐसा शूद्र अपने धर्मसे सम्पन्न और उसके अभीष्ट फलोंका भागी होता है। यह तथा और भी शूद्र-धर्म कहा गया है ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं चातुर्वर्ण्यस्य शोभने ।
एकैकस्येह सुभगे किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ६० ॥
शोभने! इस प्रकार मैंने तुम्हें एक-एक करके चारों वर्णोंका सारा धर्म बतलाया। सुभगे! अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ६० ॥
उमोवाच
(भगवन् देवदेवेश नमस्ते वृषभध्वज ।
श्रोतुमिच्छाम्यहं देव धर्ममाश्रमिणां विभो ॥
उमा बोलीं— भगवन्! देवदेवेश्वर! वृषभध्वज! देव! आपको नमस्कार है। प्रभो! अब मैं आश्रमियोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तथाश्रमगतं धर्मं शृणु देवि समाहिता ।
आश्रमाणां तु यो धर्मः क्रियते ब्रह्मवादिभिः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! एकाग्रचित्त होकर आश्रमधर्मका वर्णन सुनो। ब्रह्मवादी मुनियोंने आश्रमोंका जो धर्म निश्चित किया है, वही यहाँ बताया जा रहा है ॥
गृहस्थः प्रवरस्तेषां गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रितः ।
पञ्चयज्ञक्रिया शौचं दारतुष्टिरतन्द्रिता ॥
ऋतुकालाभिगमनं दानयज्ञतपांसि च ।
अविप्रवासस्तस्येष्टः स्वाध्यायश्चाग्निपूर्वकम् ॥
आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह गार्हस्थ्य धर्मपर प्रतिष्ठित है। पंच महायज्ञोंका अनुष्ठान, बाहर-भीतरकी पवित्रता, अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहना, आलस्यको त्याग देना, ऋतुकालमें ही पत्नीके साथ समागम करना, दान, यज्ञ और तपस्यामें लगे रहना, परदेश न जाना और अग्निहोत्रपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना—ये गृहस्थके अभीष्ट धर्म हैं ॥
तथैव वानप्रस्थस्य धर्माः प्रोक्ताः सनातनाः ।
गृहवासं समुत्सृज्य निश्चित्यैकमनाः शुभैः ॥
वन्यैरेव सदाहारैर्वर्तयेदिति च स्थितिः ।
इसी प्रकार वानप्रस्थ आश्रमके सनातन धर्म बताये गये हैं। वानप्रस्थ आश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छावाला पुरुष एकचित्त होकर निश्चय करनेके पश्चात् घरका रहना छोड़कर वनमें चला जाय और वनमें प्राप्त होनेवाले उत्तम आहारोंसे ही जीवन-निर्वाह करे। यही उसके लिये शास्त्रविहित मर्यादा है ॥
भूमिशय्या जटाश्मश्रुचर्मवल्कलधारणम् ॥
देवतातिथिसत्कारो महाकृच्छ्राभिपूजनम् ।
अग्निहोत्रं त्रिषवणं तस्य नित्यं विधीयते ॥
ब्रह्मचर्यं क्षमा शौचं तस्य धर्मः सनातनः ।
एवं स विगते प्राणे देवलोके महीयते ॥
पृथ्वीपर सोना, जटा और दाढ़ी-मूँछ रखना, मृगचर्म और वल्कल वस्त्र धारण करना, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करना, महान् कष्ट सहकर भी देवताओंकी पूजा आदिका निर्वाह करना—यह वानप्रस्थ-का नियम है। उसके लिये प्रतिदिन अग्निहोत्र और त्रिकाल-स्नानका विधान है। ब्रह्मचर्य, क्षमा और शौच आदि उसका सनातन धर्म है। ऐसा करनेवाला वानप्रस्थ प्राणत्यागके पश्चात् देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥
यतिधर्मास्तथा देवि गृहांस्त्यक्त्वा यतस्ततः।
आकिञ्चन्यमनारम्भः सर्वतः शौचमार्जवम्॥
सर्वत्र भैक्षचर्या च सर्वत्रैव विवासनम्।
सदा ध्यानपरत्वं च दोषशुद्धिः क्षमा दया॥
तत्त्वानुगतबुद्धित्वं तस्य धर्मविधिर्भवेत्।
देवि! यतिधर्म इस प्रकार है। संन्यासी घर छोड़कर इधर-उधर विचरता रहे। वह अपने पास किसी वस्तुका संग्रह न करे। कर्मोंके आरम्भ या आयोजनसे दूर रहे। सब ओरसे पवित्रता और सरलताको वह अपने भीतर स्थान दे। सर्वत्र भिक्षासे जीविका चलावे। सभी स्थानोंसे वह विलग रहे। सदा ध्यानमें तत्पर रहना, दोषोंसे शुद्ध होना, सबपर क्षमा और दयाका भाव रखना तथा बुद्धिको तत्त्वके चिन्तनमें लगाये रखना—ये सब संन्यासीके लिये धर्मकार्य हैं॥
बुभुक्षितं पिपासार्तमतिथिं श्रान्तमागतम्।
अर्चयन्ति वरारोहे तेषामपि फलं महत्॥
वरारोहे! जो भूख-प्याससे पीड़ित और थके-मांदे आये हुए अतिथिकी सेवा-पूजा करते हैं, उन्हें भी महान् फलकी प्राप्ति होती है॥
पात्रमित्येव दातव्यं सर्वस्मै धर्मकाङ्क्षिभिः।
आगमिष्यति यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति॥
धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि अपने घरपर आये हुए सभी अतिथियोंको दानका उत्तम पात्र समझकर दान दें। उन्हें यह विश्वास रखना चाहिये कि आज जो पात्र आयेगा, वह हमारा उद्धार कर देगा।
काले सम्प्राप्तमतिथिं भोक्तुकाममुपस्थितम्।
यस्तं सम्भावयेत् तत्र व्यासोऽयं समुपस्थितः॥
समयपर भोजनकी इच्छासे आये अथवा उपस्थित हुए अतिथिका जो समादर करता है, वहाँ ये साक्षात् भगवान् व्यास उपस्थित होते हैं॥
तस्य पूजां यथाशक्त्या सौम्यचित्तः प्रयोजयेत्।
चित्तमूलो भवेद् धर्मो धर्ममूलं भवेद् यशः॥
अतः कोमलचित्त होकर उस अतिथिकी यथा-शक्ति पूजा करनी चाहिये; क्योंकि धर्मका मूल है चित्तका विशुद्ध भाव और यशका मूल है धर्म॥
तस्मात् सौम्येन चित्तेन दातव्यं देवि सर्वथा ।
सौम्यचित्तस्तु यो दद्यात् तद्धि दानमनुत्तमम् ॥
अतः देवि! सर्वथा सौम्यचित्तसे दान देना चाहिये; क्योंकि जो सौम्यचित्त होकर दान देता है, उसका वह दान सर्वोत्तम होता है ॥
यथाम्बुबिन्दुभिः सूक्ष्मैः पतद्भिर्मेदिनीतले ।
केदारश्च तटाकानि सरांसि सरितस्तथा ॥
तोयपूर्णानि दृश्यन्ते अप्रतर्क्यानि शोभने ।
अल्पमल्पमपि ह्येकं दीयमानं विवर्धते ॥
शोभने! जैसे भूतलपर वर्षाके समय गिरती हुई जलकी छोटी-छोटी बूँदोंसे ही खेतोंकी क्यारियाँ, तालाब, सरोवर और सरिताएँ अतर्क्य भावसे जलपूर्ण दिखायी देती हैं, उसी प्रकार एक-एक करके थोड़ा-थोड़ा दिया हुआ दान भी बढ़ जाता है ॥
पीडयापि च भृत्यानां दानमेव विशिष्यते ।
पुत्रदारधनं धान्यं न मृतमनुगच्छति ॥
भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंको थोड़ा-सा कष्ट देकर भी यदि दान किया जा सके तो दान ही श्रेष्ठ माना गया है। स्त्री-पुत्र, धन और धान्य—ये वस्तुएँ मरे हुए पुरुषोंके साथ नहीं जाती हैं ॥
श्रेयो दानं च भोगश्च धनं प्राप्य यशस्विनि ।
दानेन हि महाभागा भवन्ति मनुजाधिपाः ॥
नास्ति भूमौ दानसमं नास्ति दानसमो निधिः ।
नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ॥
यशस्विनि! धन पाकर उसका दान और भोग करना भी श्रेष्ठ है; परंतु दान करनेसे मनुष्य महान् सौभाग्यशाली नरेश होते हैं। इस पृथ्वीपर दानके समान कोई दूसरी वस्तु नहीं है। दानके समान कोई निधि नहीं है। सत्यसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्यसे बढ़कर कोई पातक नही है ॥
आश्रमे यस्तु तप्येत तपो मूलफलाशनः ।
आदित्याभिमुखो भूत्वा जटावल्कलसंवृतः ॥
मण्डूकशायी हेमन्ते ग्रीष्मे पञ्चतपा भवेत् ।
सम्यक् तपश्चरन्तीह श्रद्दधाना वनाश्रमे ॥
गृहाश्रमस्य ते देवि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
जो वानप्रस्थ आश्रममें फल-मूल खाकर जटा बढ़ाये, वल्कल पहने, सूर्यकी ओर मुँह करके तपस्या करता है, हेमन्त-ऋतुमें मेढककी भाँति जलमें सोता है और ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निका ताप सहन करता है। इस प्रकार जो लोग वानप्रस्थ आश्रममें रहकर श्रद्धापूर्वक
उत्तम तप करते हैं, वे भी गृहस्थाश्रमके पालनसे होनेवाले धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते॥
उमोवाच
गृहाश्रमस्य या चर्या व्रतानि नियमाश्च ये ।।
यथा च देवताः पूज्याः सततं गृहमेधिना ।
यद् यच्च परिहर्तव्यं गृहिणा तिथिपर्वसु ।।
तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यमानं त्वया विभो ।
उमाने कहा— प्रभो! गृहस्थाश्रमका जो आचार है, जो व्रत और नियम हैं, गृहस्थको सदा जिस प्रकारसे देवताओंकी पूजा करनी चाहिये तथा तिथि और पर्वोंके दिन उसे जिस-जिस वस्तुका त्याग करना चाहिये, वह सब मैं आपके मुखसे सुनना चाहती हूँ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
गृहाश्रमस्य यन्मूलं फलं धर्मोऽयमुत्तमः ।।
पादैश्चतुर्भिः सततं धर्मो यत्र प्रतिष्ठितः ।
सारभूतं वरारोहे दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ।।
तदहं ते प्रवक्ष्यामि श्रूयतां धर्मचारिणि ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! गृहस्थ-आश्रमका जो मूल और फल है, यह उत्तम धर्म जहाँ अपने चारों चरणोंसे सदा विराजमान रहता है, वरारोहे! जैसे दहीसे घी निकाला जाता है, उसी प्रकार जो सब धर्मोंका सारभूत है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। धर्मचारिणि! सुनो॥
शुश्रूषन्ते ये पितरं मातरं च गृहाश्रमे ।।
भर्तारं चैव या नारी अग्निहोत्रं च ये द्विजाः ।
तेषु तेषु च प्रीणन्ति देवा इन्द्रपुरोगमाः ।।
पितरः पितृलोकस्थाः स्वधर्मेण स रज्यते ।
जो लोग गृहस्थ-आश्रममें रहकर माता-पिताकी सेवा करते हैं, जो नारी पतिकी सेवा करती है तथा जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र कर्म करते हैं, उन सबपर इन्द्र आदि देवता, पितृलोकनिवासी पितर प्रसन्न होते हैं एवं वह पुरुष अपने धर्मसे आनन्दित होता है॥
उमोवाच
मातापितृवियुक्तानां का चर्या गृहमेधिनाम् ।।
विधवानां च नारीणां भवानेतद् ब्रवीतु मे ।
उमाने पूछा— जिन गृहस्थोंके माता-पिता न हों, उनकी अथवा विधवा स्त्रियोंकी जीवनचर्या क्या होनी चाहिये? यह मुझे बताइये॥
श्रीमहेश्वर उवाच
देवतातिथिशुश्रूषा गुरुवृद्धाभिवादनम् ।। अहिंसा सर्वभूतानामलोभः सत्यसंधता । ब्रह्मचर्यं शरण्यत्वं शौचं पूर्वाभिभाषणम् ।। कृतज्ञत्वमपैशुन्यं सततं धर्मशीलता । दिने द्विरभिषेकं च पितृदैवतपूजनम् ।। गवाह्निकप्रदानं च संविभागोऽतिथिष्वपि । दीपं प्रतिश्रयं चैव दद्यात् पाद्यासनं तथा ।। पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा द्वादशेऽप्यष्टमेऽपि वा । चतुर्दशे पञ्चदशे ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।। श्मश्रुकर्म शिरोऽभ्यङ्गमञ्जनं दन्तधावनम् । नैतेष्वहस्सु कुर्वीत तेषु लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवता और अतिथियोंकी सेवा, गुरुजनों तथा वृद्ध पुरुषोंका अभिवादन, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, लोभको त्याग देना, सत्यप्रतिज्ञ होना, ब्रह्मचर्य, शरणागतवत्सलता, शौचाचार, पहले बातचीत करना, उपकारीके प्रति कृतज्ञ होना, किसीकी चुगली न खाना, सदा धर्मशील रहना, दिनमें दो बार स्नान करना, देवता और पितरोंका पूजन करना, गौओंको प्रतिदिन अन्नका ग्रास और घास देना, अतिथियोंको विभागपूर्वक भोजन देना, दीप, ठहरनेके लिये स्थान तथा पाद्य और आसन देना, पंचमी, षष्ठी, द्वादशी, अष्टमी, चतुर्दशी एवं पूर्णिमाको सदा ब्रह्मचर्यका पालन करना, इन तिथियोंपर मूँछ मुड़ाने, सिरमें तेल लगाने, आँखमें अंजन करने तथा दाँतुन करने एवं दाँत धोने आदिका कार्य न करे। जो इन विधि-निषेधोंका पालन करते हैं, उनके यहाँ लक्ष्मी प्रतिष्ठित होती हैं ।। व्रतोपवासनियमस्तपो दानं च शक्तितः । भरणं भृत्यवर्गस्य दीनानामनुकम्पनम् ।। परदारनिवृत्तिश्च स्वदारेषु रतिः सदाः । व्रत और उपवासका नियम पालना, तपस्या करना, यथाशक्ति दान देना, पोष्यवर्गका पोषण करना, दीनोंपर कृपा रखना, परायी स्त्रीसे दूर रहना तथा सदा ही अपनी स्त्रीसे प्रेम रखना गृहस्थका धर्म है ।। शरीरमेकं दम्पत्योर्विधात्रा पूर्वनिर्मितम् ।। तस्मात् स्वदारनिरतो ब्रह्मचारी विधीयते । विधाताने पूर्वकालमें पति-पत्नीका एक ही शरीर बनाया था; अतः अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहनेवाला पुरुष ब्रह्मचारी माना जाता है ।। शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च ।। आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ।