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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

६३ रसकल्याणिनी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| इदमिह मदनेन पूर्वमिष्टं <br> शतधनुषा कृतवीर्यसूनुना च। <br> कृतमथ वरुणेन नन्दिना वा <br> किमु जननाथ ततो यदुद्भवः स्यात्॥ ४९ | जननाथ ! पूर्वकालमें कामदेवने, राजा शतधन्वाने, कार्तवीर्य अर्जुनने, वरुणदेवने तथा नन्दीने भी इस अद्भुत व्रतका अनुष्ठान किया था। इस प्रकार इस व्रतके अनुष्ठानसे जैसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें और अधिक क्या कहा जाय॥ ४३—४९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सौभाग्यशयनव्रतं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सौभाग्यशयनव्रत नामक साठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६०॥


इकसठवाँ अध्याय

अगस्त्य और वसिष्ठकी दिव्य उत्पत्ति, उर्वशी अप्सराका प्राकट्य और अगस्त्यके लिये अर्घ्य-प्रदान करनेकी विधि एवं माहात्म्य

नारद उवाचनारदजीने पूछा—
भूर्लोकोऽथ भुवर्लोकः स्वर्लोकोऽथ महर्जनः। <br> तपः सत्यं च सप्तैते देवलोकाः प्रकीर्तिताः॥ १ <br> पर्यायेण तु सर्वेषामाधिपत्यं कथं भवेत्। <br> इह लोके शुभं रूपमायुः सौभाग्यमेव च। <br> लक्ष्मीश्च विपुला नाथ कथं स्यात् पुरसूदन॥ २त्रिपुरविनाशक महेश्वर ! भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक—ये सात देवलोक बतलाये गये हैं। इन सबपर क्रमशः आधिपत्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है? तथा नाथ ! इस लोकमें सुन्दर रूप, दीर्घायु, सौभाग्य और विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? (कृपया इसे बतलाइये)॥ १-२॥
महेश्वर उवाचभगवान् महेश्वरने कहा—
पुरा हुताशनः सार्धं मारुतेन महीतले। <br> आदिष्टः पुरुहूतेन विनाशाय सुरद्विषाम्॥ ३ <br> निर्दग्धेषु ततस्तेन दानवेषु सहस्रशः। <br> तारकः कमलाक्षश्च कालदंष्ट्रः परावसुः। <br> विरोचनश्च संग्रामादपलायंस्तपोधन॥ ४ <br> अम्भः सामुद्रमाविश्य संनिवेशमकुर्वत। <br> अशक्या इति तेऽप्यग्निमारुताभ्यामुपेक्षिताः॥ ५ <br> ततः प्रभृति ते देवान् मनुष्यान् सभुजङ्गमान्। <br> सम्पीड्य च मुनीन् सर्वान् प्रविशन्ति पुनर्जलम्॥ ६ <br> एवं वर्षसहस्राणि वीराः पञ्च च सप्त च। <br> जलदुर्गबलाद् ब्रह्मन् पीडयन्ति जगत्त्रयम्॥ ७ <br> ततः परमथो वह्निमारुतावमराधिपः। <br> आदिदेश चिरादम्बुनिधिरेष विशोष्यताम्॥ ८तपोधन ! पूर्वकालकी बात है, एक बार इन्द्रने भूतलपर देवद्रोही असुरोंका विनाश करनेके लिये वायुके साथ अग्निको आज्ञा दी। तब अग्निद्वारा हजारों दानवोंको जलाकर भस्म कर दिये जानेपर तारक, कमलाक्ष, कालदंष्ट्र, परावसु और विरोचन आदि प्रधान दानव रणभूमिसे भाग खड़े हुए और समुद्रके जलमें प्रविष्ट होकर (वहाँ छिपकर) निवासस्थान बनाकर रहने लगे। उस समय अग्नि और वायुने भी 'अब ये सर्वथा अशक्त, निर्जीव हो गये हैं'—ऐसा समझकर उनकी उपेक्षा कर दी। तबसे वे दानव जलसे निकलकर देवताओं, नागों (सामान्य) मनुष्यों और समस्त मुनियोंको बुरी तरह पीड़ित कर पुनः जलमें प्रविष्ट हो जाते थे। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वे पाँच-सात ही दानववीर हजारों वर्षोंसे अपने जलदुर्गके बलपर त्रिलोकीको पीड़ा पहुँचा रहे थे। तब यह सब देखकर देवेश्वर इन्द्रने अग्नि और वायुको आज्ञा दी कि 'आपलोग इस समुद्रको सुखा डालें।
* अध्याय ६१ *२४५

| यस्मादस्मद्द्विषामेष शरणं वरुणालयः।<br>तस्माद् भवद्भ्यामद्यैव क्षयमेष प्रणीयताम्॥ ९<br>तावूचतुस्ततः शक्रमुभौ शम्बरसूदनम्।<br>अधर्म एष देवेन्द्र सागरस्य विनाशनम्॥ १०<br>यस्माज्जीवनिकायस्य महतः संक्षयो भवेत्।<br>तस्मान्न पापमद्यावां करवावः पुरंदर॥ ११<br>अस्य योजनमात्रेऽपि जीवकोटिशतानि च।<br>निवसन्ति सुरश्रेष्ठ स कथं नाशमर्हति॥ १२ | 'चूँकि यह वरुणका निवासस्थान समुद्र हमारे शत्रुओंका आश्रयस्थान बना हुआ है, इसलिये आपलोग आज ही इसे नष्ट कर दें।' तब वे दोनों (अग्नि और वायु) शम्बरासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रसे बोले—'देवेन्द्र! समुद्रका विनाश कर देना—यह महान् अधर्म होगा। पुरंदर! ऐसा करनेसे बहुत बड़े जीव-समुदायका विनाश हो जायगा, इसलिये हमलोग आज यह पाप नहीं करना चाहते। सुरश्रेष्ठ! इस समुद्रके एक योजन (चार मील)-के विस्तारमें ही सैकड़ों करोड़ जीव निवास करते हैं, भला, उनका विनाश कैसे किया जा सकता है!'॥३—१२॥ | | एवमुक्तः सुरेन्द्रस्तु कोपात् संरक्तलोचनः।<br>उवाचेदं वचो रोषात्रिर्दहन्निव पावकम्॥ १३<br>न धर्माधर्मसंयोगं प्राप्नुवन्त्यमराः क्वचित्।<br>भवतस्तु विशेषेण माहात्म्यं चाधितिष्ठति॥ १४<br>मदाज्ञालङ्घनं यस्मान्मारुतेन समं त्वया।<br>मुनिव्रतमहिंसादि परिगृह्य त्वया कृतम्।<br>धर्मार्थशास्त्ररहितं शत्रुं प्रति विभावसो॥ १५<br>तस्मादेकेन वपुषा मुनिरूपेण मानुषे।<br>मारुतेन समं लोके तव जन्म भविष्यति॥ १६<br>यदा च मानुषत्वेऽपि त्वयागस्त्येन शोषितः।<br>भविष्यत्युदधिर्वह्ने तदा देवत्वमाप्स्यसि॥ १७<br>इतीन्द्रशापात् पतितौ तत्क्षणात् तौ महीतले।<br>अवाप्तावेकदेहेन कुम्भाज्जन्म तपोधन॥ १८<br>मित्रावरुणयोर्वीर्याद् वसिष्ठस्यानुजोऽभवत्।<br>अगस्त्य इत्युग्रतपाः सम्बभूव पुनर्मुनिः॥ १९ | उनके ऐसा कहनेपर क्रोधके कारण सुरेन्द्रके नेत्र लाल हो गये। तब वे अपनी क्रोधाग्निसे अग्निको जलाते हुएकी तरह यह वचन बोले—'विभावसो! देवताओंपर कहीं भी धर्म और अधर्मका प्रभाव नहीं पड़ता। आपमें तो यह महत्त्व विशेषरूपसे वर्तमान है। चूँकि आपने वायुके साथ मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है और अहिंसा आदि मुनि-व्रत धारण कर धर्म, अर्थ और शास्त्रसे विहीन शत्रुके प्रति उपेक्षा की है, इसलिये मानवलोकमें वायुके साथ आपका एक शरीरसे मुनिरूपमें जन्म होगा। अग्ने! मानव-योनिमें उत्पन्न होनेपर भी जब आपद्वारा अगस्त्यरूपसे समुद्र सोख लिया जायगा, तब पुनः आपको देवत्वकी प्राप्ति होगी।' तपोधन! इस प्रकार इन्द्रके शापसे वे दोनों (अग्नि और वायु) उसी क्षण पृथ्वीतलपर गिर पड़े और एक ही शरीरसे (दोनोंने) घड़ेसे जन्म धारण किया। वे मित्रावरुणके वीर्यसे उत्पन्न होकर वसिष्ठके अनुज हुए। आगे चलकर वे दोनों संयुक्त उग्रतपस्वी अगस्त्य मुनिके नामसे विख्यात हुए॥ १३—१९॥ | | नारद उवाच<br>सम्भूतः स कथं भ्राता वसिष्ठस्याभवन्मुनिः।<br>कथं च मित्रावरुणौ पितरावस्य तौ स्मृतौ।<br>जन्म कुम्भादगस्त्यस्य कथं स्यात् पुरसूदन॥ २० | नारदजीने पूछा—त्रिपुरसूदन! वे मुनि जन्म धारण करनेके पश्चात् वसिष्ठके भ्राता कैसे हो गये? वे दोनों मित्रावरुण इनके पिता कैसे कहलाये? तथा अगस्त्य मुनिका घड़ेसे जन्म कैसे हुआ? (यह सब हम जानना चाहते हैं।)॥२०॥ | | ईश्वर उवाच<br>पुरा पुराणपुरुषः कदाचिद् गन्धमादने।<br>भूत्वा धर्मसुतो विष्णुश्चचार विपुलं तपः॥ २१ | ईश्वरने कहा—नारद! पूर्वकालमें पुराणपुरुष भगवान् विष्णु किसी समय धर्मके पुत्ररूपमें उत्पन्न होकर गन्धमादन पर्वतपर महान् तपस्यामें संलग्न थे। |

२४६* मत्स्यपुराण *

| तपसा तस्य भीतेन विघ्नार्थं प्रेषितावुभौ।<br>शक्रेण माधवानङ्गावप्सरोगणसंयुतौ ॥ २२<br>तदा तद्गीतवाद्येन नाङ्गरागादिना हरिः।<br>न काममाधवाभ्यां च विषयान् प्रति चुक्षुभे ॥ २३<br>तदा काममधुस्त्रीणां विषादमगमद् गणः।<br>संक्षोभाय ततस्तेषां स्वोरुदेशान्नराग्रजः।<br>नारीमुत्पादयामास त्रैलोक्यजनमोहिनीम् ॥ २४<br>संक्षुब्धास्तु तया देवास्तौ तु देववरावुभौ।<br>अप्सरोभिः समक्षं हि देवानामकब्रवीद्धरिः॥ २५<br>अप्सरा इति सामान्या देवानामकब्रवीद्धरिः।<br>उर्वशीति च नाम्नेयं लोके ख्यातिं गमिष्यति ॥ २६<br>ततः कामयमानेन मित्रेणाहूय सोर्वशी।<br>उक्ता मां रमयस्वेति बाढमित्यब्रवीत् तु सा ॥ २७<br>गच्छन्ती चाम्बरं तद्वत् स्तोकमिन्दीवरेक्षणा।<br>वरुणेन धृता पश्चाद् वरुणं नाभ्यनन्दत ॥ २८<br>मित्रेणाहं वृता पूर्वमद्य भार्या न ते विभो।<br>उवाच वरुणश्चित्तं मयि संन्यस्य गम्यताम् ॥ २९ | उनकी तपस्यासे भयभीत हुए इन्द्रने उसमें विघ्न डालनेके लिये अप्सराओंके साथ वसन्त-ऋतु और कामदेव—दोनोंको भेजा। उस समय श्रीहरि न तो उनके गाने, बजाने अथवा अङ्गराग आदिसे ही प्रभावित हुए, न वसन्त और कामदेवद्वारा उपस्थित किये गये विषय-भोगोंके प्रति ही उनका मन क्षुब्ध हुआ। यह देखकर कामदेव, वसन्त और अप्सराओंका समूह विषादमें डूब गया। तत्पश्चात् नरके अग्रज नारायणने उन्हें विशेषरूपसे क्षुब्ध करनेके हेतु अपने ऊरुप्रदेशसे एक ऐसी नारीको उत्पन्न किया, जो त्रिलोकीके मनुष्योंको मोहित करनेवाली थी। उस स्त्रीने समस्त देवताओं तथा उन दोनों देवश्रेष्ठोंको भलीभाँति क्षुब्ध कर दिया। उस समय श्रीहरिने अप्सराओंके सामने ही देवताओंसे कहा—'देवगण! यह एक अप्सरा है। यह लोकमें उर्वशी-नामसे प्रसिद्ध होगी'॥ २१—२९॥ | | गतायां बाढमित्युक्त्वा मित्रः शापमदात्तदा।<br>तस्यै मानुषलोके त्वं गच्छ सोमसुतात्मजम् ॥ ३०<br>भजस्वेति यतो वेश्याधर्म एष त्वया कृतः।<br>जलकुम्भे ततो वीर्यं मित्रेण वरुणेन च।<br>प्रक्षिप्तमथ संजातौ द्वावेव मुनिसत्तमौ ॥ ३१<br>निमिर्नाम सह स्त्रीभिः पुरा द्यूतमदीव्यत।<br>तत्रान्तरेऽभ्याजगाम वसिष्ठो ब्रह्मसम्भवः॥ ३२<br>तस्य पूजामकुर्वन्तं शशाप स मुनिर्नृपम्।<br>विदेहस्त्वं भवस्वेति ततस्तेनाप्यसौ मुनिः॥ ३३<br>अन्योन्यशापाच्च तयोर्विगते इव चेतसी।<br>जग्मतुः शापनाशाय ब्रह्माणं जगतः पतिम् ॥ ३४<br>अथ ब्रह्मण आदेशालोचनेष्ववसन्निभिः।<br>निमेषाः स्युश्च लोकानां तद्विश्रामाय नारद ॥ ३५<br>वसिष्ठोऽप्यभवत् तस्मिन् जलकुम्भे च पूर्ववत्।<br>ततः श्वेतश्चतुर्बाहुः साक्षसूत्रकमण्डलुः।<br>अगस्त्य इति शान्तात्मा बभूव ऋषिसत्तमः ॥ ३६ | तदनन्तर एक घड़ेसे मित्र और वरुणके अंशसे दो मुनिश्रेष्ठ उत्पन्न हुए। प्राचीनकालकी बात है, एक बार जब महाराज निमि स्त्रियोंके साथ जुआ खेल रहे थे, उसी समय ब्रह्मपुत्र महर्षि वसिष्ठ उनके पास आये, किंतु राजाने उनका स्वागत-सत्कार नहीं किया। तब वसिष्ठ मुनिने राजाको शाप दे दिया—'तुम विदेह—देहरहित हो जाओ।' तब राजाने भी मुनिको वही शाप दे दिया। इस प्रकार एक-दूसरेके शापवश दोनोंकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। तब वे दोनों शापसे छुटकारा पानेके लिये जगत्पति ब्रह्माके पास गये। वहाँ ब्रह्माके आदेशसे राजा निमिका प्राणियोंके नेत्रोंमें निवास हुआ। नारद! उन्हींको विश्राम देनेके लिये लोगोंके निमेष (पलकोंका गिरना और खुलना) होते रहते हैं। वसिष्ठ भी पहलेकी तरह उसी जलकुम्भसे प्रकट हुए। तदुपरान्त उसी जलकुम्भसे ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य उत्पन्न हुए, जो अत्यन्त शान्त स्वभाववाले थे। उनका गौर वर्ण था, उनके चार भुजाएँ थीं तथा वे अक्षसूत्र (यज्ञोपवीत) और कमण्डलु धारण किये हुए थे। विप्रोंसे घिरे हुए अगस्त्यने अपनी पत्नीके साथ |

— उसका माहात्म्य

* अध्याय ६१ *२४७
मलयस्यैकदेशे तु वैखानसविधानतः।<br>सभार्यः संवृतो विप्रैस्तपश्चक्रे सुदुश्चरम्॥ ३७<br><br>ततः कालेन महता तारकादतिपीडितम्।<br>जगद् वीक्ष्य स कोपेन पीतवान् वरुणालयम्॥ ३८<br><br>ततोऽस्य वरदाः सर्वे बभूवुः शङ्करादयः।<br>ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् वरदानाय जग्मतुः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं च वै मुने॥ ३९रहकर मलयपर्वतके एक प्रदेशमें वैखानस-विधिके अनुसार अत्यन्त कठोर तप किया था। चिरकालके पश्चात् तारकासुरद्वारा जगत्‌को अत्यन्त पीड़ित देखकर वे कुपित हो गये और समुद्रको पी गये। यह देखकर शङ्कर आदि सभी देवता उन्हें वर देनेके लिये उत्सुक हो उठे। उसी समय ब्रह्मा और भगवान् विष्णु वर प्रदान करनेके निमित्त उनके निकट गये और बोले—'मुने! आपका कल्याण हो! आपको जो अभीष्ट हो, वह वर माँग लीजिये'॥ ३०—३९॥
अगस्त्य उवाच<br>यावद् ब्रह्मसहस्राणां पञ्चविंशतिकोटयः।<br>वैमानिको भविष्यामि दक्षिणाचलवर्त्मनि॥ ४०<br>मद्विमानोदये कुर्याद् यः कश्चित् पूजनं मम।<br>स समलोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति॥ ४१अगस्त्य बोले— देव! मैं एक सहस्र ब्रह्माओंके पचीस करोड़ वर्षोंतक दक्षिणाचलके मार्गमें विमानपर स्थित होकर निवास करूँ। उस समय मेरे विमानके उदय होनेपर जो कोई मनुष्य मेरा पूजन करे, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति हो जाय॥ ४०-४१॥
ईश्वर उवाच<br>एवमस्त्विति तेऽप्युक्त्वा जग्मुर्देवा यथागतम्।<br>तस्मादर्घः प्रदातव्यो ह्यगस्त्यस्य सदा बुधैः॥ ४२ईश्वरने कहा— नारद! तब वे देवगण भी 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' यों कहकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। इसलिये विद्वानोंको अगस्त्यके लिये सदा अर्घ्य प्रदान करते रहना चाहिये॥ ४२॥
नारद उवाच<br>कथमर्घप्रदानं तु कर्तव्यं तस्य वै विभो।<br>विधानं यदगस्त्यस्य पूजने तद् वदस्व मे॥ ४३नारदजीने पूछा— विभो! अगस्त्यके लिये किस विधिसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये? तथा उनके पूजनका क्या विधान है? यह मुझे बतलाइये?॥ ४३॥
ईश्वर उवाच<br>प्रत्यूषसमये विद्वान् कुर्यादस्योदये निशि।<br>स्नानं शुक्लतिलैस्तद्वच्छुक्लमाल्याम्बरो गृही॥ ४४<br>स्थापयेदव्रणं कुम्भं माल्यवस्त्रविभूषितम्।<br>पञ्चरत्नसमायुक्तं घृतपात्रसमन्वितम्॥ ४५<br>अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव<br>सौवर्णमेवायतबाहुदण्डम् ।<br>चतुर्मुखं कुम्भमुखे निधाय<br>धान्यानि सप्ताम्बरसंयुतानि॥ ४६<br>सकांस्यपात्राक्षतशुक्तियुक्तं<br>मन्त्रेण दद्याद् द्विजपुङ्गवाय।<br>उत्क्षिप्य लम्बोदरदीर्घबाहु-<br>मनन्यचेता यमदिङ्मुखः सन्॥ ४७ईश्वरने कहा— नारद! विद्वान् गृहस्थको चाहिये कि वह अगस्त्यके उदयसे संयुक्त रात्रिमें प्रातःकाल श्वेत तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उसी प्रकार श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे। तत्पश्चात् एक छिद्ररहित कलश स्थापित करे और उसे पुष्पमाला तथा वस्त्रसे विभूषित कर दे। उसके भीतर पञ्चरत्न डाल दे और पार्श्वभागमें घीसे भरा हुआ एक पात्र रख दे। साथ ही काँसेका पात्र चावल भरकर उसके ऊपर सीप अथवा शङ्ख रखकर प्रस्तुत करे। फिर अँगूठेके बराबर लम्बी सोनेकी एक ऐसी पुरुषाकार प्रतिमा बनवाये, जिसमें चार मुख दीख पड़ते हों और जिसकी भुजाएँ लम्बी हों, उसे कलशके मुखमें स्थापित कर दे। उसके निकट पृथक्-पृथक् सात वस्त्रोंमें बँधी हुई धान्य-राशि भी रखे। तदनन्तर अनन्य चित्तसे दक्षिणाभिमुख हो लम्बे उदर और लम्बी भुजाओंवाली अगस्त्यमुनिकी उस प्रतिमाको (घड़ेसे) निकालकर हाथमें लेकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी सामग्रियोंसहित सुपात्र ब्राह्मणको दान कर दे।

२४८ * मत्स्यपुराण *

श्लोकअर्थ
श्वेतां च दद्याद् यदि शक्तिरस्ति<br>रौप्यैः खुरैर्हेममुखीं सवत्साम्।<br>धेनुं नरः क्षीरवतीं प्रणम्य<br>स्रग्वस्त्रघण्टाभरणां द्विजाय॥ ४८<br><br>आसप्तरात्रोदयमेतदस्य<br>दातव्यमेतत् सकलं नरेण।<br>यावत्सप्ताः सप्त दशाथ वा स्यु-<br>रथोध्वंमप्यत्र वदन्ति केचित्॥ ४९साथ ही यदि धनसम्पत्तिरूपी शक्ति हो तो गृहस्थ पुरुष एक श्वेत वर्णकी बछड़ेवाली दुधारू गौको सोनेके मुख और चाँदीके खुरोंसे संयुक्त करे तथा उसे माला, वस्त्र और घंटीसे विभूषित करके नमस्कारपूर्वक ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार गृहस्थ पुरुषको अगस्त्योदयसे सात रात्रियोंतक इन सभी वस्तुओंका दान करना चाहिये। इस विधानको सात अथवा दस वर्षोंतक करना चाहिये। कुछ लोग इससे आगे भी इसकी अवधि बतलाते हैं॥ ४८—४९॥
काशपुष्पप्रतीकाश अग्निमारुतसम्भव।<br>मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते।<br>प्रत्यब्दं तु फलत्यागमेवं कुर्वन्न सीदति<sup></sup>॥ ५०तदनन्तर यों प्रार्थना करते हुए अर्घ्य प्रदान करे—'कुम्भसे उत्पन्न होनेवाले अगस्त्यजी! आपके शरीरका रंग कासके पुष्पके सदृश उज्ज्वल है, आपकी उत्पत्ति अग्नि और वायुसे हुई है और आप मित्रावरुणके पुत्र हैं, आपको नमस्कार है।' इस प्रकार फलत्यागपूर्वक प्रतिवर्ष अर्घ्य प्रदान करनेवाला पुरुष कष्टभागी नहीं होता।
होमं कृत्वा ततः पश्चाद् वर्जयेन्मानवः फलम्।<br>अनेन विधिना यस्तु पुमानर्घ्यं निवेदयेत्॥ ५१तत्पश्चात् हवन करके कार्य समाप्त करे। उस समय मनुष्यको फलकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। जो पुरुष इस विधिके अनुसार अगस्त्यको अर्घ्य निवेदित करता है, वह सुन्दर रूप और नीरोगतासे युक्त होकर इस मृत्युलोकमें पुनः जन्म धारण करता है।
इमं लोकं स चाप्नोति रूपारोग्यसमन्वितः।<br>द्वितीयेन भुवर्लोकं स्वर्लोकं च ततः परम्॥ ५२इसी प्रकार वह दूसरे अर्घ्यसे भुवर्लोकको और तीसरेसे उससे भी श्रेष्ठ स्वर्लोकको जाता है।
सप्तैव लोकानाप्नोति सप्तार्घ्यान् यः प्रयच्छति।<br>यावदायुश्च यः कुर्यात् परं ब्रह्माधिगच्छति॥ ५३इसी तरह जो मनुष्य उन (सात) दिनोंमें अर्घ्य देता है, वह क्रमशः सातों लोकोंको प्राप्त होता है तथा जो आयुपर्यन्त इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ ५०—५३॥
इह पठति शृणोति वा य<br>एतद् युगलमुनिप्रभवार्घ्यसम्प्रदानम्।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि<br>विष्णोर्भवनगतः परिपूज्यतेऽमरौघैः॥ ५४जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें इन दोनों (वसिष्ठ और अगस्त्य) मुनियोंकी उत्पत्ति और अगस्त्य मुनिके अर्घ्यप्रदान<sup></sup> के वृत्तान्तको पढ़ता अथवा सुनता है या ऐसा करनेकी सलाह देता है, वह विष्णुलोकमें जाकर देवगणोंद्वारा पूजित होता है॥ ५४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽगस्त्योत्पत्तिपूजाविधानं नामैकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगस्त्योत्पत्तिपूजा-विधान नामक इकसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६१॥


१. यहाँ पूनावाली प्रतिमें तीन श्लोक अधिक हैं।
२. अगस्त्यार्घ्यपर ऋग्वेद १। १७९। ६ से लेकर अग्नि, गरुड, वृहद्धर्म आदि पुराणोंतकमें अपार सामग्री भरी पड़ी है। हेमाद्रि, गोपाल तथा रत्नाकर आदिने भी इन्हें अपने व्रत-निबन्धोंमें कई पृष्ठोंमें संगृहीत किया है। ऋक् प्रथम मण्डलमें दीर्घतमा १६४ सू० के बाद १९१ सूक्तोंतकके ये ही द्रष्टा हैं।

६५ अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

  • अध्याय ६२ * | २४९ ---|---

बासठवाँ अध्याय

अनन्ततृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| मनुरुवाच<br>सौभाग्यारोग्यफलदं विपक्षक्षयकारकम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं देव तन्मे ब्रूहि जनार्दन॥ १ | मनुने पूछा— जनार्दनदेव ! जो इस लोकमें सौभाग्य और नीरोगतारूप फल देनेवाला तथा भोग और मोक्षका प्रदाता एवं शत्रुनाशक हो, वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १॥ | | मत्स्य उवाच<br>यदुमायाः पुरा देव उवाच पुरसूदनः।<br>कैलासशिखरासीनो देव्या पृष्टस्तदा किल॥ २<br>कथासु सम्प्रवृत्तासु धर्म्यासु ललितासु च।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ३ | मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन् ! पूर्वकालमें कैलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए त्रिपुरविनाशक महादेवजीने सुन्दर धार्मिक कथाओंके प्रसङ्गमें उमादेवीद्वारा पूछे जानेपर उनसे जिस व्रतका वर्णन किया था, वही इस समय मैं बतला रहा हूँ, यह भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है॥ २-३॥ | | ईश्वर उवाच<br>शृणुष्वावहिता देवि तथैवानन्तपुण्यकृत्।<br>नराणामथ नारीणामाराधनमनुत्तमम्॥ ४<br>नभस्ये वाथ वैशाखे पौषे मार्गशिरेऽथवा।<br>शुक्लपक्षे तृतीयायां सुस्नातो गौरसर्षपैः॥ ५<br>गोरोचनं सगोमूत्रं मुस्तां गोशकृतं तथा।<br>दधिचन्दनसम्मिश्रं ललाटे तिलकं न्यसेत्।<br>सौभाग्यारोग्यदं यत् स्यात् सदा च ललिताप्रियम्॥ ६<br>प्रतिपक्षं तृतीयासु पुमानापीतवाससी।<br>धारयेदथ रक्तानि नारी चेदथ संयता॥ ७<br>विधवा धातुरक्तानि कुमारी शुक्लवाससी।<br>देवीं तु पञ्चगव्येन ततः क्षीरेण केवलम्।<br>स्त्रापयेन्मधुना तद्वत् पुष्पगन्धोदकेन च॥ ८<br>पूजयेच्छुक्लपुष्पैश्च फलैर्नानाविधैरपि।<br>धान्यलाजाजिलवणैर्गुडक्षीरघृतान्वितैः ॥ ९<br>शुक्लाक्षततिलैर्र्च्चां ललितां यः सदार्चयेत्।<br>आपादाद्यर्चनं कुर्याद् गौर्याः सम्यक् समासतः॥ १० | ईश्वरने कहा— देवि! मैं पुरुषों तथा स्त्रियोंके लिये एक सर्वश्रेष्ठ व्रत बतला रहा हूँ, जो अनन्त पुण्यदायक है। तुम सावधानीपूर्वक उसे सुनो। इस व्रतका व्रती भाद्रपद, वैशाख, पौष अथवा मार्गशीर्ष मासके शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको पीली सरसोंसे युक्त जलसे भलीभाँति स्नान करे। फिर गोरोचन, गोमूत्र, मुस्ता, गोबर, दही और चन्दनको मिलाकर ललाटमें तिलक लगावे; क्योंकि यह तिलक सौभाग्य और आरोग्यका प्रदायक तथा ललितादेवीको परम प्रिय* है। प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको पुरुषको पीला वस्त्र, यदि सधवा स्त्री व्रतनिष्ठ होती है तो उसे लाल वस्त्र, विधवाको गेरू आदि धातुओंसे रँगा हुआ वस्त्र और कुमारी कन्याको श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिये। उस समय देवीकी मूर्तिको पञ्चगव्यसे स्नान करानेके पश्चात् केवल दूधसे नहलाना चाहिये। उसी प्रकार मधु और पुष्प-चन्दनमिश्रित जलसे भी स्नान करावे। फिर श्वेत पुष्प, अनेक प्रकारके फल, धनिया, श्वेत जीरा, नमक, गुड़, दूध और घृतसे देवीकी पूजा करे। श्वेत अक्षत और तिलसे तो ललितादेवीकी सदा पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक शुक्लपक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी मूर्तिके चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्त संक्षेपसे पूजनका विधान है। |


* सौर, पाद्म सृष्टि, भविष्योत्तरपुराण अ० २६ में यह व्रत सविस्तर निरूपित है। सौभाग्य एवं ललितादेवीके विषयमें ६० वें अध्यायकी टिप्पणी द्रष्टव्य है।

६६ सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२५० * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अर्थ
वरदायै नमः पादौ तथा गुल्फौ श्रियै नमः।<br>अशोकायै नमो जङ्घे पार्वत्यै जानुनी तथा॥ ११<br>ऊरू मङ्गलकारिण्यै वामदेव्यै तथा कटिम्।<br>पद्मोदरायै जठरमुरः कामश्रियै नमः॥ १२<br>करौ सौभाग्यदायिन्यै बाहूदरमुखं श्रियै।<br>दन्तान् दर्पणवासिन्यै स्मरदायै स्मितं नमः॥ १३<br>गौर्यै नमस्तथा नासामुत्पलायै च लोचने।<br>तुष्ट्यै ललाटमलकान् कात्यायन्यै शिरस्तथा॥ १४<br>नमो गौर्यै नमो धिष्ण्यै नमः कान्त्यै नमः श्रियै।<br>रम्भायै ललितायै च वासुदेव्यै नमो नमः॥ १५'वरदायै नमः' से दोनों चरणोंका, 'श्रियै नमः' से दोनों गुल्फोंका, 'अशोकायै नमः' से दोनों जाँघोंका, 'पार्वत्यै नमः' से दोनों जानुओंका, 'मङ्गलकारिण्यै नमः' से दोनों ऊरुओंका, 'वामदेव्यै नमः' से कटिप्रदेशका, 'पद्मोदरायै नमः' से उदरका तथा 'कामश्रियै नमः' से वक्षःस्थलका अर्चन करे; फिर 'सौभाग्यदायिन्यै नमः' से दोनों हाथोंका, 'श्रियै नमः' से बाहु, उदर और मुखका, 'दर्पणवासिन्यै नमः' से दाँतोंका, 'स्मरदायै नमः' से मुसकानका, 'गौर्यै नमः' से नासिकाका, 'उत्पलायै नमः' से नेत्रोंका, 'तुष्ट्यै नमः' से ललाटका, 'कात्यायन्यै नमः' से सिर और बालोंका पूजन करना चाहिये। तदुपरान्त 'गौर्यै नमः', 'धिष्ण्यै नमः', 'कान्त्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'रम्भायै नमः', 'ललितायै नमः' और 'वासुदेव्यै नमः' कहकर देवीके चरणोंमें प्रणिपात करना चाहिये॥ ४—१५॥
एवं सम्पूज्य विधिवदग्रतः पद्ममालिखेत्।<br>पत्रैर्द्वादशभिर्युक्तं कुङ्कुमेन सकर्णिकम्॥ १६<br>पूर्वेण विन्यसेद् गौरीमपर्णां च ततः परम्।<br>भवानीं दक्षिणे तद्वद् रुद्राणीं च ततः परम्॥ १७<br>विन्यसेत् पश्चिमे सौम्यां सदा मदनवासिनीम्।<br>वायव्ये पाटलावासामुत्तरेण ततोऽप्युमाम्॥ १८<br>लक्ष्मीं स्वाहां स्वधां तुष्टिं मङ्गलां कुमुदां सतीम्।<br>रुद्रं च मध्ये संस्थाप्य ललितां कर्णिकोपरि।<br>कुसुमैरक्षतैर्वारिभिर्नमस्कारेण विन्यसेत्॥ १९<br>गीतमङ्गलनिर्घोषान् कारयित्वा सुवासिनीः।<br>पूजयेद् रक्तवासोभी रक्तमाल्यानुलेपनैः।<br>सिन्दूरं गन्धचूर्णं च तासां शिरसि पातयेत्॥ २०<br>सिन्दूरकुङ्कुमस्नानमिष्टं सत्याः सदा यतः।<br>तथोपदेष्टारमपि पूजयेद् यत्नतो गुरुम्।<br>न पूज्यते गुरुर्यत्र सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ २१<br>नभस्ये पूजयेद् गौरीमुत्पलैरसितैः सदा।<br>बन्धुजीवैराश्वयुजे कार्तिके शतपत्रकैः॥ २२इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके मूर्तिके आगे कुङ्कुमसे बारह पत्तोंसे युक्त कर्णिकासहित कमल बनाये। उसके पूर्वभागमें गौरी, उसके बाद अपर्णा, दक्षिणभागमें भवानी और नैर्ऋत्य कोणमें रुद्राणीको स्थापित करे। पुनः पश्चिममें सदा सौम्य स्वभावसे रहनेवाली मदनवासिनी, वायव्यकोणमें पाटला और उत्तरमें पुष्पमें निवास करनेवाली उमाकी स्थापना करे। मध्यभागमें लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, मङ्गला, कुमुदा और सतीको स्थित करे। कमलके मध्यमें रुद्रकी स्थापना करके कर्णिकाके ऊपर ललितादेवीको स्थित करे। तत्पश्चात् गीत और माङ्गलिक बाजाका आयोजन कराकर पुष्प, श्वेत अक्षत और जलसे देवीकी अर्चना करके उन्हें नमस्कार करे। फिर लाल वस्त्र, लाल पुष्पोंकी माला और लाल अङ्गरागसे सुहागिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा उनके सिर (माँग)-में सिन्दूर और कुङ्कुम लगावे; क्योंकि सिन्दूर और कुङ्कुम सती देवीको सदा अभीष्ट हैं। तदनन्तर उपदेश करनेवाले गुरु अर्थात् आचार्यकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये; क्योंकि जहाँ आचार्यकी पूजा नहीं होती, वहाँ सारी क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। गौरीदेवीकी पूजा सदा भाद्रपदमासमें नीले कमलसे, आश्विनमें बन्धुजीव (गुलदपहरिया)-के फूलोंसे, कार्तिकमें शतपत्रक (कमल)-के पुष्पोंसे,
* अध्याय ६२ *२५१
जातीपुष्पैर्मार्गशीर्षे पौषे पीतैः कुरण्टकैः।<br>कुन्दकुङ्कुमपुष्पैस्तु देवीं माघे तु पूजयेत्।<br>सिन्धुवारेण जात्या वा फाल्गुनेऽप्यर्चयेदुमाम्॥ २३<br>चैत्रे तु मल्लिकाशोकैर्वैशाखे गन्धपाटलैः।<br>ज्येष्ठे कमलमन्दारैराषाढे चम्पकाम्बुजैः।<br>कदम्बैरथ मालत्या श्रावणे पूजयेदुमाम्॥ २४<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम्।<br>बिल्वपत्रार्कपुष्पं च गवां शृङ्गोदकं तथा॥ २५<br>पञ्चगव्यं च बिल्वं च प्राशयेत् क्रमशस्तदा।<br>एतद् भाद्रपदाद्यं तु प्राशनं समुदाहृतम्॥ २६मार्गशीर्षमें जाती (मालती)-के पुष्पोंसे, पौषमें पीले कुरण्टक (कटसरैया)-के पुष्पोंसे, माघमें कुन्द और कुङ्कुमके पुष्पोंसे करनी चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुनमें सिन्दुवार अथवा मालतीके पुष्पोंसे उमाकी अर्चना करे। चैत्रमें मल्लिका और अशोकके पुष्पोंसे, वैशाखमें गन्धपाटलके फूलोंसे, ज्येष्ठमें कमल और मन्दारके कुसुमोंसे, आषाढ़में चम्पा एवं कमल-पुष्पोंसे और श्रावणमें कदम्ब तथा मालतीके फूलोंसे पार्वतीकी पूजा करनी चाहिये। इसी तरह भाद्रपदसे आरम्भ कर आश्विन आदि बारह महीनोंमें क्रमशः गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, बिल्व-पत्र, मदारका पुष्प, गोशृङ्गोदक, पञ्चगव्य और बेलका नैवेद्य अर्पण करनेका विधान है। क्रमशः भाद्रपदसे लेकर श्रावणतक प्रत्येक मासके लिये ये नैवेद्य बतलाये गये हैं॥ १६—२६॥
प्रतिपक्षं च मिथुनं तृतीयायां वरानने।<br>ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव शिवं गौरीं प्रकल्प्य च॥ २७<br>भोजयित्वार्चयेद् भक्त्या वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पुंसः पीताम्बरे दद्यात् स्त्रियै कौसुम्भवाससी॥ २८<br>निष्पावाजाजिलवणमिक्षुदण्डगुडान्वितम् ।<br>स्त्रियै दद्यात् फलं पुंसे सुवर्णोत्पलसंयुतम्॥ २९<br>यथा न देवि देवेशस्त्वत्वां परित्यज्य गच्छति।<br>तथा मां सम्परित्यज्य पतिर्नान्यत्र गच्छतु॥ ३०<br>कुमुदा विमलानन्ता भवानी च सुधा शिवा।<br>ललिता कमला गौरी सती रम्भाथ पार्वती॥ ३१<br>नभस्यादिषु मासेषु प्रीयतामित्युदीरयेत्।<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्॥ ३२<br>मिथुनानि चतुर्विंशद् दश द्वौ च समर्चयेत्।<br>अष्टौ षड् वाप्यथ पुनश्चानुमासं समर्चयेत्॥ ३३<br>पूर्वं दत्त्वा तु गुरवे शेषानप्यर्चयेद् बुधः।<br>उक्तानन्ततृतीयेषा सदानन्तफलप्रदा॥ ३४वरानने! प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको एक ब्राह्मण-दम्पतिको उनमें शिव-पार्वतीकी कल्पना कर भोजन कराकर उनकी वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दनसे भक्तिपूर्वक अर्चना करे तथा पुरुषको दो पीताम्बर और स्त्रीको दो पीली साड़ियाँ प्रदान करे। फिर ब्राह्मणी-स्त्रीको निष्पाव (बड़ी मटर या सेम), जीरा, नमक, ईंख, गुड़, फल और फूल आदि सौभाग्यष्टक देकर और पुरुषको सुवर्णनिर्मित कमल देकर यों प्रार्थना करे—'देवि! जिस प्रकार देवाधिदेव भगवान् महादेव आपको छोड़कर नहीं जाते, उसी प्रकार मेरे भी पतिदेव मुझे छोड़कर अन्यत्र न जायें।' पुनः कुमुदा, विमला, अनन्ता, भवानी, सुधा, शिवा, ललिता, कमला, गौरी, सती, रम्भा और पार्वतीदेवीके इन नामोंका उच्चारण करके प्रार्थना करे कि आप क्रमशः भाद्रपद आदि मासोंमें प्रसन्न हों। व्रतकी समाप्तिमें सुवर्ण-निर्मित कमलसहित शय्या दान करे और चौबीस अथवा बारह द्विज-दम्पतियोंकी पूजा करे। पुनः प्रतिमास आठ या छः दम्पतियोंका पूजन करते रहनेका विधान है। विद्वान् व्रती सर्वप्रथम गुरुको दान देकर तत्पश्चात् दूसरे ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। देवि! इस प्रकार मैंने इस अनन्त-तृतीयाका वर्णन कर दिया, जो सदा अनन्त फलकी प्रदायिका है॥२७—३४॥
सर्वपापहरां देवि सौभाग्यारोग्यवर्धिनीम्।<br><br>न चैनां वित्तशाठ्येन कदाचिदपि लङ्घयेत्।<br><br>नरो वा यदि वा नारी वित्तशाठ्यात् पतत्यधः॥ ३५देवि! यह अनन्ततृतीया समस्त पापोंकी विनाशिका तथा सौभाग्य और नीरोगताकी वृद्धि करनेवाली है, इसका कृपणता-वश कभी भी उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये; क्योंकि चाहे पुरुष हो या स्त्री—कोई भी कृपणताके वशीभूत होकर यदि इसका उल्लङ्घन करता है तो उसका अधःपतन हो जाता है।

६७ सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य

२५२ * मत्स्यपुराण *

गर्भिणी सूतिका नक्तं कुमारी वाथ रोगिणी।<br>यद्यशुद्धा तदान्येन कारयेत् प्रयता स्वयम्॥ ३६<br><br>इमामनन्तफलदां यस्तृतीयां समाचरेत्।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं शिवलोके महीयते॥ ३७<br><br>वित्तहीनोऽपि कुरुते वर्षत्रयमुपोषणैः।<br>पुष्पमन्त्रविधानेन सोऽपि तत्फलमाप्नुयात्॥ ३८<br><br>नारी वा कुरुते या तु कुमारी विधवाथवा।<br>सापि तत्फलमाप्नोति गौर्यनुग्रहलालिता॥ ३९<br><br>इति पठति शृणोति वा<br>य इत्थं गिरितनयाव्रतमिन्द्रलोकसंस्थः।<br>मतिमपि च ददाति सोऽपि देवै-<br>रमरवधूजनकिन्नरैश्च पूज्यः॥ ४०गर्भिणी एवं सूतिका (सौरीमें पड़ी हुई) स्त्री नक्तव्रत (रातमें भोजन) करे। कुमारी और रोगिणी अथवा अशुद्ध स्त्री स्वयं नियमपूर्वक रहकर दूसरेके द्वारा व्रतका अनुष्ठान कराये। जो मानव अनन्त फल प्रदान करनेवाली इस तृतीयाके व्रतका अनुष्ठान करता है, वह सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षोंतक उपवास करके पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी उस फलकी प्राप्ति होती है। सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा—जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे लालित होकर उस फलको प्राप्त कर लेती है। इस प्रकार जो मनुष्य गिरीश-नन्दिनी पार्वतीके इस व्रतको पढ़ता अथवा सुनता है, वह इन्द्रलोकमें वास करता है तथा जो इसका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी देवताओं, देवाङ्गनाओं और किन्नरोंद्वारा पूजनीय हो जाता है॥ ३५–४०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽनन्ततृतीयाव्रतं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनन्ततृतीया-व्रत नामक बासठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६२॥


तिरसठवाँ अध्याय

रसकल्याणिनी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच<br><br>अथान्यामपि वक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्।<br>रसकल्याणिनीमेनां पुराकल्पविदो विदुः॥ १<br><br>माघमासे तु सम्प्राप्ते तृतीयां शुक्लपक्षतः।<br>प्रातर्गव्येन पयसा तिलैः स्नानं समाचरेत्॥ २<br><br>स्नापयेन्मधुना देवीं तथैवेक्षुरसेन च।<br>दक्षिणाङ्गानि सम्पूज्य ततो वामानि पूजयेत्॥ ३<br><br>गन्धोदकेन च पुनः पूजनं कुङ्कुमेन वै।<br>ललितायै नमो देव्याः पादौ गुल्फौ ततोऽर्चयेत्।<br>जङ्घां जानुं तथा शान्त्यै तथैवोरुं श्रियै नमः॥ ४ईश्वरने कहा—नारद! अब मैं एक अन्य तृतीयाका भी वर्णन कर रहा हूँ जो पापोंका विनाश करनेवाली है, तथा जिसे पुराकल्पके ज्ञातालोग 'रस-कल्याणिनी' के नामसे जानते हैं। माघका महीना आनेपर शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको प्रातःकाल व्रतीको गो-दुग्ध और तिलमिश्रित जलसे स्नान करना चाहिये। (इस प्रकार स्वयं शुद्ध होकर) फिर देवीकी मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान करावे। तत्पश्चात् सुगन्धित जलसे शुद्ध स्नान कराकर कुङ्कुमका अनुलेप करे। पूजनमें दक्षिणाङ्गकी पूजा कर लेनेके पश्चात् वामाङ्गकी पूजा करनेका विधान है। 'ललितायै नमः' से देवीके दोनों चरणों तथा दोनों गुल्फोंकी अर्चना करे। 'शान्त्यै नमः' से जंघाओं और जानुओंका, 'श्रियै नमः' से ऊरुओंका,
* अध्याय ६३ *२५३

| मदालसायै तु कटिममलायै तथोदरम्।<br>स्तनौ मदनवासिन्यै कुमुदायै च कन्थराम्॥ ५<br><br>भुजं भुजाग्रं माधव्यै कमलायै मुखस्मिते।<br>भ्रूललाटे च रुद्राण्यै शंकरायै तथालकान्॥ ६<br><br>मुकुटं विश्ववासिन्यै शिरः कान्त्यै तथार्चयेत्।<br>मदनायै ललाटं तु मोहनायै पुनर्भुवौ॥ ७<br><br>नेत्रे चन्द्रार्धधारिण्यै तुष्ट्यै च वदनं पुनः।<br>उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठममृतायै नमः स्तनौ॥ ८<br><br>रम्भायै वामकुक्षिं च विशोकायै नमः कटिम्।<br>हृदयं मन्मथाधिष्ठ्यै पाटलायै तथोदरम्॥ ९<br><br>कटिं सुरतवासिन्यै तथोरुं चम्पकप्रिये।<br>जानुजङ्घे नमो गौर्यै गायत्र्यै घुटिके नमः॥ १०<br><br>धराधरायै पादौ तु विश्वकायै नमः शिरः।<br>नमो भवान्यै कामिन्यै कामदेव्यै जगत्प्रिये॥ ११ | 'मदालसायै नमः' से कटिभागका, 'अमलायै नमः' से उदरका, 'मदनवासिन्यै नमः' से दोनों स्तनोंका, 'कुमुदायै नमः' से कंधोंका, 'माधव्यै नमः' से भुजाओं और भुजाओंके अग्रभागका, 'कमलायै नमः' से मुख और मुसकानका, 'रुद्राण्यै नमः' से भौंहों और ललाटका, 'शङ्करायै नमः' से बालोंका, 'विश्ववासिन्यै नमः' से मुकुटका और 'कान्त्यै नमः' से सिरका पूजन करे। पुनः (पूजनका अन्य क्रम बतलाते हैं—) 'मदनायै नमः' से ललाटकी, 'मोहनायै नमः' से दोनों भौंहोंकी, 'चन्द्रार्धधारिण्यै नमः' से दोनों नेत्रोंकी, 'तुष्ट्यै नमः' से मुखकी, 'उत्कण्ठिन्यै नमः' से कण्ठकी, 'अमृतायै नमः' से दोनों स्तनोंकी, 'रम्भायै नमः' से बायीं कुक्षिकी, 'विशोकायै नमः' से कटिभागकी, 'मन्मथाधिष्ठ्यै नमः' से हृदयकी, 'पाटलायै नमः' से उदरकी, 'सुरतवासिन्यै नमः' से कटिप्रदेशकी, 'चम्पकप्रियायै नमः' से ऊरुओंकी, 'गौर्यै नमः' से जंघाओं और जानुओंकी, 'गायत्र्यै नमः' से घुटनोंकी, 'धराधरायै नमः' से दोनों चरणोंकी और 'विश्वकायै नमः' से सिरकी पूजा करके 'भवान्यै नमः', 'कामिन्यै नमः', 'कामदेव्यै नमः', 'जगत्प्रियायै नमः' कहकर चरणोंमें प्रणिपात (प्रणाम) करना चाहिये ॥ १-११॥ | | एवं सम्पूज्य विधिवद् द्विजदाम्पत्यमर्चयेत्।<br>भोजयित्वाऽन्नपानेन मधुरेण विमत्सरः॥ १२<br><br>जलपूरितं तथा कुम्भं शुक्लाम्बरयुगद्वयम्।<br>दत्त्वा सुवर्णकमलं गन्धमाल्यैः समर्चयेत्॥ १३<br><br>प्रीयतामत्र कुमुदा गृह्णीयाल्लवणव्रतम्।<br>अनेन विधिना देवीं मासि मासि सदार्चयेत्॥ १४ | इस प्रकार विधि-विधानके साथ देवीकी पूजा करके एक द्विज-दम्पतिका भी पूजन करना चाहिये। उस समय व्रती अहंकाररहित हो अर्थात् विनम्रतापूर्वक उन्हें मधुर अन्न और जलका भोजन कराकर दो श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित एवं स्वर्णनिर्मित कमलसहित जलसे भरा हुआ घड़ा प्रदान करे फिर चन्दन और पुष्पमाला आदिसे उनकी अर्चना करे, तथा इस प्रकार कहे—'इस व्रतसे कुमुदा देवी प्रसन्न हों।' ऐसा कहकर उस दिन लवण-व्रत ग्रहण करे अर्थात् नमक खाना छोड़ दे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सदा देवीकी अर्चना करनी चाहिये। | | लवणं वर्जयेन्माघे फाल्गुने च गुडं पुनः।<br>तैलं राजिं तथा चैत्रे वर्ज्यं च मधु माधवे॥ १५<br><br>पानकं ज्येष्ठमासे तु आषाढे चाथ जीरकम्।<br>श्रावणे वर्जयेत् क्षीरं दधि भाद्रपदे तथा॥ १६<br><br>घृतमाश्वयुजे तद्वदूर्जे वर्ज्यं च माक्षिकम्।<br>धान्यकं मार्गशीर्षे तु पौषे वर्ज्या च शर्करा॥ १७ | व्रतीको माघमें नमक और फाल्गुनमें गुड़ नहीं खाना चाहिये। चैत्रमें तेल और पीली सरसों (या राई) तथा वैशाखमें मधु वर्जित है। ज्येष्ठमासमें पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), आषाढ़में जीरा, श्रावणमें दूध और भाद्रपदमें दही निषिद्ध है। इसी प्रकार आश्विनमें घी और कार्तिकमें मधुका निषेध किया गया है। मार्गशीर्षमें धनिया और पौषमें शक्कर वर्जित है। |

६८ सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

२५४ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्रतान्ते करकं पूर्णमेतेषां मासि मासि च।<br>दद्याद् द्विकालवेलायां पूर्णपात्रेण संयुतम्॥ १८<br>लड्डुकाञ्छ्वेतवर्णांश्च संयावमथ पूरिकाः।<br>घारिकानप्यपूंपांश्च पिष्टापूंपांश्च मण्डकान्॥ १९<br>क्षीरं शाकं च दध्यन्नमिण्डर्योऽशोकवर्तिकाः।<br>माघादिक्रमशो दद्यादेतानि करकोपरि॥ २०<br>कुमुदा माधवी गौरी रम्भा भद्रा जया शिवा।<br>उमा रतिः सती तद्वन्मङ्गला रतिलालसा॥ २१<br>क्रमान्माघादि सर्वत्र प्रीयतामिति कीर्तयेत्।इस प्रकार इन महीनोंके क्रमसे प्रत्येक मासमें व्रतकी समाप्ति के समय सायंकालकी वेलामें उपर्युक्त पदार्थोंसे भरा हुआ एक करवा पूर्णपात्रसहित ब्राह्मणको दान करे। इसी तरह श्वेत रंगके लड्डू, गोझिया, पूरी, घेवर, पूआ, आटेका बना हुआ पूआ, मण्डक (एक प्रकारका पिष्टक), दूध, शाक, दही-मिश्रित अन्न, इण्डरी (एक प्रकारकी रोटी) और अशोकवर्तिका (सेंवई)—इन पदार्थोंको माघ आदि मासक्रमसे करवाके ऊपर रखकर दान करनेका विधान है। फिर कुमुदा, माधवी, गौरी, रम्भा, भद्रा, जया, शिवा, उमा, रति, सती, मङ्गला, रतिलालसा प्रसन्न हों—ऐसा कहकर माघ आदि सभी मासोंमें क्रमशः कीर्तन करना चाहिये॥ १२—२१ १/२॥
सर्वत्र पञ्चगव्येन प्राशनं समुदाहृतम्।<br>उपवासी भवेन्नित्यमशक्ते नक्तमिष्यते॥ २२सभी मासोंके व्रतमें पञ्चगव्यका प्राशन (भक्षण) बतलाया गया है। इन सभी व्रतोंमें उपवास करनेका विधान है। यदि उपवास करनेमें असमर्थ हो तो रात्रिमें एक बार तारिकाओंके निकल आनेपर भोजन किया जा सकता है।
पुनर्माघे तु सम्प्राप्ते शर्करां करकोपरि।<br>कृत्वा तु काञ्चनीं गौरीं पञ्चरत्नसमन्विताम्॥ २३<br>हैमीमङ्गुष्ठमात्रां च साक्षसूत्रकमण्डलुम्।<br>चतुर्भुजामिन्दुयुतां सितनेत्रपटावृताम्॥ २४वर्षान्तमें पुनः माघमास आनेपर गौरीकी एक सोनेकी मूर्ति बनवाये जो अँगूठेके बराबर लम्बी हो। वह चार भुजाओं और ललाटमें चन्द्रमासे युक्त हो। उसे पञ्चरत्नोंसे विभूषित और दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर दे।
तद्वद् गोमिथुनं शुक्लं सुवर्णास्यं सिताम्बरम्।<br>सवस्त्रभाजनं दद्याद् भवानी प्रीयतामिति॥ २५फिर करवामें शक्कर भरकर उसीके ऊपर उस मूर्तिको स्थापित करके रुद्राक्षकी माला और कमण्डलुसहित ब्राह्मणको दान कर दे। उसी प्रकार गौके जोड़ेको, जिनका रंग श्वेत और मुख सुवर्णसे मढ़ा हुआ हो, जो श्वेत वस्त्रसे आच्छादित हों, अन्य वस्त्र और पात्रके सहित दान करके 'भवानी प्रसन्न हों' यों कहकर प्रार्थना करनी चाहिये।
अनेन विधिना यस्तु रसकल्याणिनीव्रतम्।<br>कुर्यात् स सर्वपापेभ्यस्तत्क्षणादेव मुच्यते॥ २६<br>नवार्बुदसहस्रं तु न दुःखी जायते नरः।जो मनुष्य इस विधिके अनुसार रसकल्याणिनीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह उसी क्षण समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और नौ अरब एक हजार वर्षोंतक कष्टमें नहीं पड़ता।
सुवर्णकमलं गौरि मासि मासि ददन्नरः।<br>अग्निष्टोमसहस्रस्य यत्फलं तदवाप्नुयात्॥ २७गौरि! इसी प्रकार जो मनुष्य प्रत्येक मासमें स्वर्णनिर्मित कमलका दान करता है वह हजारों अग्निष्टोम-यज्ञोंका जो फल होता है, उसे प्राप्त कर लेता है।
नारी वा कुरुते या तु कुमारी वा वरानने।<br>विधवा या तथा नारी सापि तत्फलमाप्नुयात्।<br>सौभाग्यारोग्यसम्पन्ना गौरीलोके महीयते॥ २८वरानने! सधवा स्त्री, कुमारी अथवा विधवा स्त्री—कोई भी यदि इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी उस फलको प्राप्त करती है, साथ ही सौभाग्य और आरोग्यसे सम्पन्न होकर गौरी-लोकमें पूजित होती है।
* अध्याय ६४ *२५५

| इति पठति शृणोति श्रावयेद् यः प्रसङ्गात् <br> कलिकलुषविमुक्तः पार्वतीलोकमेति। <br><br> मतिमपि च नराणां यो ददाति प्रियार्थं <br> विबुधपतिविमाने नायकः स्यादमोघः॥ २९॥ | इस प्रकार जो मनुष्य प्रसङ्गवश इस व्रतको पढ़ता, सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, वह कलियुगके पापोंसे मुक्त होकर पार्वती-लोकमें जाता है तथा जो मनुष्योंकी हित-कामनासे इस व्रतका अनुष्ठान करनेके लिये सम्मति देता है, वह इन्द्रके विमानमें स्थित होकर अक्षयकालतक नायक—नेताका पद प्राप्त करता है॥ २२—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे रसकल्याणिनीव्रतं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रस-कल्याणिनी-व्रत नामक तिरसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६३॥


चौंसठवाँ अध्याय

आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

| ईश्वर उवाच <br><br> तथैवान्यां प्रवक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम्। <br> नाम्ना च लोके विख्यातामार्द्रानन्दकरीमिमाम्॥ १ <br><br> यदा शुक्लतृतीयायामाषाढर्क्षं भवेत् क्वचित्। <br> ब्रह्मर्क्षं या मृगक्षं वा हस्तो मूलमथापि वा। <br> दर्भगन्धोदकैः स्नानं तदा सम्यक् समाचरेत्॥ २ <br><br> शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः। <br> भवानीमर्चयेद् भक्त्या शुक्लपुष्पैः सुगन्धिभिः। <br> महादेवेन सहितामुपविष्टां महासने॥ ३ <br><br> वासुदेव्यै नमः पादौ शङ्कराय नमो हरम्। <br> जङ्घे शोकविनाशिन्यै आनन्दाय नमः प्रभो॥ ४ <br><br> रम्भायै पूजयेदूरू शिवाय च पिनाकिनः। <br> अदित्यै च कटिं देव्याः शूलिनः शूलपाणये॥ ५ <br><br> माधव्यै च तथा नाभिमथ शम्भोर्भवाय च। <br> स्तनावानन्दकारिण्यै शङ्करस्येन्दुधारिणे॥ ६ <br><br> उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठं नीलकण्ठाय वै हरम्। <br> करावुत्पलधारिण्यै रुद्राय च जगत्पतेः। <br> बाहू च परिरम्भिण्यै त्रिशूलाय हरस्य च॥ ७ <br><br> देव्या मुखं विलासिन्यै वृषेशाय पुनर्विभोः। <br> स्मितं सस्मेरलीलायै विश्ववक्त्राय वै विभोः॥ ८ | ईश्वरने कहा—नारद! उसी प्रकार अब मैं एक-दूसरी पापनाशिनी तृतीयाका वर्णन कर रहा हूँ जो लोकमें आर्द्रानन्दकरी नामसे विख्यात है। इसकी विधि यह है—जब कभी शुक्लपक्षकी तृतीयाको पूर्वाषाढ़ अथवा उत्तराषाढ़, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त अथवा मूल नक्षत्र पड़े तो उस समय कुश और चन्दनमिश्रित जलसे भलीभाँति स्नान करना चाहिये। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेप कर ले। तत्पश्चात् महादेवसहित दिव्य आसनपर विराजमान भवानीकी (स्वर्णमयी मूर्तिकी) श्वेत पुष्पों और सुगन्धित पदार्थोंद्वारा भक्तिपूर्वक अर्चना करे। (पूजनकी विधि इस प्रकार है—) ‘वासुदेव्यै नमः, शङ्कराय नमः’ से गौरी-शंकरके दोनों चरणोंका, ‘शोकविनाशिन्यै नमः, आनन्दाय नमः’ से दोनों जंघाओंका, ‘रम्भायै नमः’, ‘शिवाय नमः’ से दोनों ऊरुओंका, ‘अदित्यै नमः, शूलपाणये नमः’ से कटिप्रदेशका, ‘माधव्यै नमः, भवाय नमः’ से नाभिका, ‘आनन्दकारिण्यै नमः, इन्दुधारिणे नमः’ से दोनों स्तनोंका, ‘उत्कण्ठिन्यै नमः, नीलकण्ठाय नमः’ से कण्ठका, ‘उत्पलधारिण्यै नमः, रुद्राय नमः’ से दोनों हाथोंका, ‘परिरम्भिण्यै नमः, त्रिशूलाय नमः’ से दोनों भुजाओंका, ‘विलासिन्यै नमः, वृषेशाय नमः’ से मुखका, ‘सस्मेरलीलायै नमः, विश्ववक्त्राय नमः’ से मुसकानका, |

२५६ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नेत्रे मदनवासिन्यै विश्वधाम्ने त्रिशूलिनः।<br>भ्रुवौ नृत्यप्रियायै तु ताण्डवेशाय शूलिनः॥ ९<br>देव्या ललाटमिन्द्राण्यै हव्यवाहाय वै विभोः।<br>स्वाहायै मुकुटं देव्या विभोर्गङ्गाधराय वै॥ १०<br>विश्वकायौ विश्वमुखौ विश्वपादकरौ शिवौ।<br>प्रसन्नवदनौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ ११'मदनवासिन्यै नमः, विश्वधाम्ने नमः' से दोनों नेत्रोंका, 'नृत्यप्रियायै नमः, ताण्डवेशाय नमः' से दोनों भौंहोंका, 'इन्द्राण्यै नमः, हव्यवाहाय नमः' से ललाटका तथा 'स्वाहायै नमः, गङ्गाधराय नमः' से मुकुटका पूजन करे। तत्पश्चात् विश्व जिनका शरीर है, जो विश्वके मुख, पाद और हस्तस्वरूप तथा मङ्गलकारक हैं, जिनके मुखपर प्रसन्नता झलकती रहती है, उन पार्वती और परमेश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ। (ऐसा कहकर उनके चरणोंमें लुढ़क पड़े।)॥ ९—११॥
एवं सम्पूज्य विधिवदग्रतः शिवयोः नमः।<br>पद्मोत्पलानि रजसा नानावर्णेन कारयेत्॥ १२<br>शङ्खचक्रे सकटके स्वस्तिकाङ्कुशचामरान्।<br>यावन्तः पांसवस्तत्र रजसः पतिता भुवि।<br>तावद् वर्षसहस्त्राणि शिवलोके महीयते॥ १३<br>चत्वारि घृतपात्राणि सहिरण्यानि शक्तितः।<br>दत्त्वा द्विजाय करकमुदकान्नसमन्वितम्।<br>प्रतिपक्षं चतुर्मासं यावदेतन्निवेदयेत्॥ १४<br>ततस्तु चतुरो मासान् पूर्ववत् करकोपरि।<br>चत्वारि सक्तुपात्राणि तिलपात्राण्यतः परम्॥ १५<br>गन्धोदकं पुष्पवारि चन्दनं कुङ्कुमोदकम्।<br>अपक्वं दधि दुग्धं च गोशृङ्गोदकमेव च॥ १६<br>पिष्टोदकं तथा वारि कुष्ठचूर्णान्वितं पुनः।<br>उशीरसलिलं तद्वद् यवचूर्णोदकं पुनः॥ १७<br>तिलोदकं च सम्प्राश्य स्वपेन्मार्गशिरादिषु।<br>मासेषु पक्षद्वितयं प्राशनं समुदाहृतम्॥ १८<br>सर्वत्र शुक्लपुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।<br>दानकाले च सर्वत्र मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ १९<br>गौरी मे प्रीयतां नित्यमघनाशाय मङ्गला।<br>सौभाग्यायास्तु ललिता भवानी सर्वसिद्धये॥ २०<br>संवत्सरान्ते लवणं गुडकुम्भं च सर्जिकाम्।<br>चन्दनं नेत्रपट्टं च सहिरण्याम्बुजेन तु॥ २१<br>उमामहेश्वरं हैमं तद्दिक्षुफलैर्युतम्।<br>सतूलावरणां शय्यां सविश्रामां निवेदयेत्।<br>सपत्नीकाय विप्राय गौरी मे प्रीयतामिति॥ २२इस प्रकार विधिके अनुसार पूजन कर पुनः शिव-पार्वतीकी मूर्तिके अग्रभागमें विभिन्न प्रकारके रङ्गोंवाले रजसे कमलका आकार बनवाये। साथ ही कटकसहित शङ्ख, चक्र, स्वस्तिक, अङ्कुश और चँवरको भी चित्रित करे। ऐसा करते समय वहाँ भूतलपर जितने रजःकण गिरते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक व्रती शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित घीसे भरे हुए चार पात्र और अन्न एवं जलसे युक्त करवा ब्राह्मणको दान करे। ऐसा चार मासतक प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीयाको करना चाहिये। इसके बाद चार मासतक पहलेकी तरह करवापर सत्तूसे पूर्ण चार पात्र रखकर तथा उसके बाद चार मासतक करवापर तिलपूर्ण चार पात्र रखकर दान करे। व्रतीको मार्गशीर्ष आदि मासोंमें क्रमशः गन्धोदक (सुगन्धमिश्रित जल), पुष्पवारि (फूलयुक्त जल), चन्दनमिश्रित जल, कुङ्कुमयुक जल, बिना पका हुआ दही, दूध, गोशृङ्गोदक (गौके सींगसे स्पर्श कराया हुआ जल), पिष्टोदक (पीठीयुक्त जल), कुष्ठ (गन्धक)-के चूर्णसे युक्त जल, उशीर (खस)-मिश्रित जल, यवके चूर्णसे युक्त जल तथा तिलमिश्रित जलका भक्षण करके रात्रिमें शयन करना चाहिये। यह प्राशन (भक्षण) प्रत्येक मासमें दोनों पक्षोंमें करनेका विधान है। सभी महीनोंके पूजनमें श्वेत पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं। सभी मासोंमें दानके समय इस प्रकारका मन्त्र उच्चारण करना चाहिये—'गौरी नित्य मुझपर प्रसन्न रहें, मङ्गला मेरे पापोंका विनाश करें, ललिता मुझे सौभाग्य प्रदान करें और भवानी मेरे लिये सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्रदात्री हों।' इस प्रकार वर्षके अन्तमें स्वर्णनिर्मित कमलसहित नमक, गुड़से भरा हुआ घट, सज्जी, चन्दन, आँखोंको ढँकनेके लिये वस्त्र, गत्रा और नाना प्रकारके फलोंके साथ स्वर्णनिर्मित उमा और महेश्वरकी मूर्ति सपत्नीक ब्राह्मणको दान कर दे। उस समय रूईसे भरा हुआ गद्दा, चादर और तकियासे युक्त सुन्दर शय्या भी दान करनेका विधान है। (दान करनेके पश्चात् उनसे यों प्रार्थना करे—) 'गौरीदेवी मुझपर प्रसन्न हों'॥ १२—२२॥

* अध्याय ६५ * २५७

| आर्द्रानन्दकरी नाम्ना तृतीयाैषा सनातनी।<br>यामुपोष्य नरो याति शाम्भोर्यत् परमं पदम्॥ २३<br>इह लोके सदानन्दमाप्नोति धनसम्पदः।<br>आयुरारोग्यसम्पत्त्या न कश्चिच्छोकमाप्नुयात्॥ २४<br>नारी वा कुरुते या तु कुमारी विधवा च या।<br>सापि तत्फलमाप्नोति देव्यनुग्रहलालिता॥ २५<br>प्रतिपक्षमृपोष्यैवं मन्त्रार्चनविधानवित्।<br>रुद्राणीलोकमभ्येति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ २६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>शक्रलोके स गन्धर्वैः पूज्यतेऽपि युगत्रयम्॥ २७<br>आनन्ददां सकलदुःखहरां तृतीयां<br>या स्त्री करोत्यविधवा विधवाथवापि।<br>सा स्वे गृहे सुखशतान्यनुभूय भूयो<br>गौरीपदं सदयिता दयिता प्रयाति॥ २८ | यह आर्द्रानन्दकरी नामकी सनातनी तृतीया है, जिसका व्रतोपवास करके मनुष्य उस स्थानको प्राप्त होता है जो शिवजीका परमपद कहलाता है। वह इस लोकमें धन-सम्पत्ति, दीर्घायु और नीरोगतारूप सम्पत्तिसे युक्त होकर सुखका उपभोग करता है। उसे कोई शोक नहीं प्राप्त होता। यदि सधवा नारी, कुमारी अथवा विधवा इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी देवीकी कृपासे लालित होकर उसी फलको प्राप्त होती है। इसी प्रकार मन्त्र और अर्चा-विधिका ज्ञाता मनुष्य प्रत्येक पक्षमें इस व्रतका अनुष्ठान कर रुद्राणीके उस लोकमें जाता है जहाँसे पुनरागमन नहीं होता। जो मानव नित्य इस व्रतको सुनता अथवा सुनाता है वह तीन युगोंतक इन्द्रलोकमें गन्धर्वोंद्वारा पूजित होता है। जो स्त्री, चाहे वह सधवा हो अथवा विधवा, इस सम्पूर्ण दुःखोंको हरण करनेवाली एवं आनन्ददायिनी तृतीयाका अनुष्ठान करती है वह नारी पतिसहित अपने घरमें सैकड़ों प्रकारके सुखोंका अनुभव करके पुनः गौरी-लोकमें चली जाती है॥ २३—२८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आर्द्रानन्दकरीतृतीयाव्रतं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः॥ ६४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आर्द्रानन्दकरी तृतीया-व्रत नामक चौंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६४॥


पैंसठवाँ अध्याय

अक्षयतृतीया-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाचभगवान् शंकरने कहा—
अथान्यमपि वक्ष्यामि तृतीयां सर्वकामदाम्।<br>यस्यां दत्तं हुतं जप्तं सर्वं भवति चाक्षयम्॥ १<br>वैशाखशुक्लपक्षे तु तृतीया यैरुपोषिता।<br>अक्षयं फलमाप्नोति सर्वस्य सुकृतस्य च॥ २<br>सा तथा कृत्तिकोपेता विशेषेण सुपूजिता।<br>तत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वमक्षयमुच्यते॥ ३<br>अक्षया संततिस्तस्य तस्यां सुकृतमक्षयम्।<br>अक्षतैः पूज्यते विष्णुस्तेन साक्षया स्मृता।<br>अक्षतैस्तु नराः स्नाता विष्णोर्दत्त्वा तथाक्षताम्॥ ४नारद! अब मैं सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली एक अन्य तृतीयाका वर्णन कर रहा हूँ, जिसमें दान देना, हवन करना और जप करना सभी अक्षय हो जाता है। जो लोग वैशाखमासके शुक्लपक्षकी तृतीयाके दिन व्रतोपवास करते हैं, वे अपने समस्त सत्कर्मोंका अक्षय फल प्राप्त करते हैं। वह तृतीया यदि कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त हो तो विशेषरूपसे पूज्य मानी गयी है। उस दिन दिया गया दान, किया हुआ हवन और जप सभी अक्षय बतलाये गये हैं। इस व्रतका अनुष्ठान करनेवालेकी संतान अक्षय हो जाती है और उस दिनका किया हुआ पुण्य अक्षय हो जाता है। इस दिन अक्षतके द्वारा भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है, इसीलिये इसे अक्षय-तृतीया

६९ भीमद्वादशी-व्रतका विधान

२५८ * मत्स्यपुराण *


विप्रेषु दत्त्वा तानेव तथा सक्तून् सुसंस्कृतान्।<br>यथान्नभुङ् महाभाग फलमक्षय्यमश्नुते ॥ ५<br><br>एकामप्युक्तवत् कृत्वा तृतीयां विधिवन्नरः।<br>एतासामपि सर्वासां तृतीयानां फलं भवेत् ॥ ६<br><br>तृतीयायां समभ्यर्च्य सोपवासो जनार्दनम्।<br>राजसूयफलं प्राप्य गतिमग्र्यां च विन्दति ॥ ७कहते हैं।* मनुष्यको चाहिये कि इस दिन स्वयं अक्षतयुक्त जलसे स्नान करके भगवान् विष्णुकी मूर्तिपर अक्षत चढ़ावे और अक्षतके साथ ही शुद्ध सत्तू ब्राह्मणोंको दान दे; तत्पश्चात् स्वयं भी उसी अन्नका भोजन करे। महाभाग! ऐसा करनेसे वह अक्षय फलका भागी हो जाता है। उपर्युक्त विधिके अनुसार एक भी तृतीयाका व्रत करनेवाला मनुष्य इन सभी तृतीया-व्रतोंके फलको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस तृतीया तिथिको उपवास करके भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति पूजा करता है, वह राजसूय-यज्ञका फल पाकर अन्तमें श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है॥ १—७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽक्षयतृतीयाव्रतं नाम पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अक्षयतृतीया-व्रत नामक पैंसठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६५॥


छाछठवाँ अध्याय

सारस्वत-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

मनुरुवाच<br>मधुरा भारती केन व्रतेन मधुसूदन।<br>तथैव जनसौभाग्यं मतिं विद्यासु कौशलम् ॥ १<br>अभेदश्चापि दम्पत्योस्तथा बन्धुजनेन च।<br>आयुश्च विपुलं पुंसां तन्मे कथय माधव ॥ २मनुने पूछा—मधुसूदन! किस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्योंको मधुर वाणी, जनतामें उत्कृष्ट सौभाग्य, उत्तम बुद्धि, विद्याओंमें निपुणता, पति-पत्नीमें अभेद, बन्धुजनोंके साथ प्रेम और दीर्घायुकी प्राप्ति हो सकती है? माधव! वह व्रत मुझे बतलाइये॥ १-२॥
मत्स्य उवाच<br>सम्यक् पृष्टं त्वया राजञ्छृणु सारस्वतं व्रतम्।<br>यस्य संकीर्तनादेव तुष्यतीह सरस्वती ॥ ३<br>यो मद्भक्तः पुमान् कुर्यादेतद् व्रतमनुत्तमम्।<br>तद्वासरादौ सम्पूज्य विप्रान्नेतान् समाचरेत् ॥ ४<br>अथवाऽऽदित्यवारेण ग्रहताराबलेन च।<br>पायसं भोजयेद् विप्रान् कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ ५<br>शुक्लवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरण्यानि शक्तितः।<br>गायत्रीं पूजयेद् भक्त्या शुक्लमाल्यानुलेपनैः ॥ ६मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! तुमने तो बड़ा उत्तम प्रश्न किया है। अच्छा सुनो! अब मैं उस सारस्वत-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जिसकी चर्चामात्र करनेसे इस लोकमें सरस्वतीदेवी प्रसन्न हो जाती हैं। जो पुरुष मेरा भक्त हो, उसे पञ्चमीके दिन इस श्रेष्ठ व्रतका अनुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिये। आरम्भ-कालमें ब्राह्मणोंके पूजनका विधान है। अथवा रविवारको जब ग्रह और तारा आदि अनुकूल हों, ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर उन ब्राह्मणोंको खीरका भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसहित श्वेत वस्त्र दान करे। फिर श्वेत पुष्पमाला और चन्दन आदि उपकरणोंद्वारा भक्तिपूर्वक

* ध्यान रहे, सामान्यतया अक्षतके द्वारा विष्णुका पूजन निषिद्ध है—'नाक्षतैरर्चयेद् विष्णुम्' (पद्म० ६। ९६। २०)। पर केवल इस दिन अक्षतसे उनकी पूजाका विधान है। अन्यत्र अक्षतके स्थानपर सफेद तिलका विधान है। इस व्रतकी विस्तृत विधि भविष्यपुराण एवं 'व्रत-कल्पद्रुम' में है। इसी तिथिको सत्ययुगका प्रारम्भ तथा परशुरामजीका जन्म भी हुआ था।

* अध्याय ६६ * । २५९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यथा न देवि भगवान् ब्रह्मलोके पितामहः।<br>त्वां परित्यज्य संतिष्ठेत् तथा भव वरप्रदा॥ ७<br>वेदाः शास्त्राणि सर्वाणि गीतनृत्यादिकं च यत्।<br>न विहीनं त्वया देवि तथा मे सन्तु सिद्धयः॥ ८<br>लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिर्गौरी तुष्टिः प्रभा मतिः।<br>एताभिः पाहि अष्टाभिस्तनुभिर्मां सरस्वति॥ ९<br>एवं सम्पूज्य गायत्रीं वीणाक्षमालधारिणीम्।<br>शुक्लपुष्पाक्षतैर्भक्त्या सकमण्डलुपुस्तकाम्।<br>मौनव्रतेन भुञ्जीत सायं प्रातस्तु धर्मवित्॥ १०<br>पञ्चम्यां प्रतिपक्षं च पूजयेद् ब्रह्मवासिनीम्।<br>तथैव तण्डुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम्।<br>क्षीरं दद्याद्धिरण्यं च गायत्री प्रीयतामिति॥ ११<br>संध्यायां च तथा मौनमेतत् कुर्वन् समाचरेत्।<br>नान्तरा भोजनं कुर्याद् यावन्मासास्त्रयोदश॥ १२<br>समाप्ते तु व्रते कुर्याद् भोजनं शुक्लतण्डुलैः।<br>पूर्वं सवस्त्रयुग्मं च दद्याद् विप्राय भोजनम्॥ १३<br>देव्या वितानं घण्टां च सितनेत्रे पयस्विनीम्।<br>चन्दनं वस्त्रयुग्मं च दद्याच्च शिखरं पुनः॥ १४<br>तथोपदेष्टारमपि भक्त्या सम्पूजयेद् गुरुम्।<br>वित्तशाठ्येन रहितो वस्त्रमाल्यानुलेपनैः॥ १५गायत्रीदेवीकी पूजा करके यों प्रार्थना करे—'देवि! जैसे ब्रह्मलोकमें भगवान् पितामह आपको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं रुकते, उसी प्रकारका वर मुझे भी प्रदान करें। देवि! जैसे वेद, सम्पूर्ण शास्त्र तथा गीत-नृत्य आदि जितनी कलाएँ हैं, वे सभी आपके बिना नहीं रह सकतीं, उसी प्रकारकी सिद्धियाँ मुझे भी प्राप्त हों। सरस्वति! आप अपनी लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा और मति—इन आठ मूर्तियोंद्वारा मेरी रक्षा करें।' इस प्रकार धर्मज्ञ पुरुष वीणा, रुद्राक्ष-माला, कमण्डलु और पुस्तक धारण करनेवाली गायत्रीकी श्वेत पुष्प, अक्षत आदिसे भक्तिपूर्वक पूजा कर प्रातः एवं सायंकाल मौन धारण करके भोजन करे तथा प्रत्येक पक्षकी पञ्चमी तिथिको ब्रह्मवासिनी (वेद-विद्याकी अधिष्ठात्री)-का पूजन कर घृतपूर्ण पात्रसहित एक सेर चावल, दूध और सुवर्णका दान करे और कहे—'गायत्रीदेवी मुझपर प्रसन्न हों।' यह कर्म सायंकालमें मौन धारण करके करना चाहिये। तेरह महीनेतक प्रातः और सायंकालके बीच भोजन न करनेका विधान है। व्रत समाप्त हो जानेपर पहले ब्राह्मणको दो वस्त्रोंसहित भोजन-पदार्थका दान करके तत्पश्चात् स्वयं श्वेत चावलोंका भोजन करे। पुनः देवीके निमित्त वितान (चाँदोवा या चाँदनी), घण्टा, दो श्वेत (चाँदीके बने हुए) नेत्र, दुधारू गौ, चन्दन, दो वस्त्र और सिरका कोई आभूषण दान करना चाहिये। तदनन्तर उपदेश करनेवाले अर्थात् कर्म करानेवाले गुरुका भी कृपणतारहित होकर वस्त्र, पुष्पमाला, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करे॥ ३—१५॥
अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् सारस्वतं व्रतम्।<br>विद्यावानर्थसंयुक्तो रक्तकण्ठश्च जायते॥ १६<br>सरस्वत्याः प्रसादेन ब्रह्मलोके महीयते।<br>नारी वा कुरुते या तु सापि तत्फलगामिनी।<br>ब्रह्मलोके वसेद् राजन् यावत् कल्पायुतत्रयम्॥ १७<br>सारस्वतं व्रतं यस्तु शृणुयादपि यः पठेत्।<br>विद्याधरपुरे सोऽपि वसेत् कल्पायुतत्रयम्॥ १८जो मनुष्य इस (उपर्युक्त) विधिके अनुसार सारस्वतव्रतका अनुष्ठान करता है, वह विद्या-सम्पन्न, धनवान् और मधुरभाषी हो जाता है; साथ ही सरस्वतीकी कृपासे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा राजन्! यदि कोई स्त्री इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी उस फलको प्राप्त करती है और तीस कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें निवास करती है। जो मनुष्य इस सारस्वत-व्रतका पाठ अथवा श्रवण करता है वह भी विद्याधर-लोकमें तीस कल्पोंतक निवास करता है॥ १६-१८॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सारस्वतव्रतं नाम षट्षष्ठितमोऽध्यायः॥ ६६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सारस्वत-व्रत नामक छाछठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६६॥

२६०* मत्स्यपुराण *

सड़सठवाँ अध्याय

सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>चन्द्रादित्योपरागे तु यत् स्नानमभिधीयते।<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि द्रव्यमन्त्रविधानवित्॥ १**मनुने पूछा—**द्रव्य और मन्त्रोंकी विधियोंके ज्ञाता (पूर्ण वेदविद्) भगवन्! सूर्य एवं चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर स्नानकी जैसी विधि बतलायी गयी है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>यस्य राशिं समासाद्य भवेद् ग्रहणसम्प्लवः।<br>तस्य स्नानं प्रवक्ष्यामि मन्त्रौषधविधानतः॥ २<br>चन्द्रोपरागं सम्प्राप्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>सम्पूज्य चतुरो विप्रान् शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ ३<br>पूर्वमेवोपरागस्य समासाद्यौषधादिकम्।<br>स्थापयेच्चतुरः कुम्भानव्रणान् सागरानिति॥ ४मत्स्यभगवान्‌ने कहा—(राजन्!) जिस पुरुषकी राशिपर ग्रहणका प्लावन (लगना) होता है, उसके लिये मन्त्र और औषधके विधानपूर्वक स्नान बतला रहा हूँ। ऐसे मनुष्यको चाहिये कि चन्द्र-ग्रहणके अवसरपर चार ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर श्वेत पुष्प और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। ग्रहणके पूर्व ही औषध आदिको एकत्र कर ले। फिर छिद्ररहित चार कलशोंकी, उनमें समुद्रकी भावना करके स्थापना करे। फिर उनमें
गजाश्वरथ्यावल्मीकसंगमाद्दहदगोकुलात् ।<br>राजद्वारप्रदेशाच्च मृदानीय चाक्षिपेत्॥ ५सप्तमृत्तिका—हाथीसार, घुड़शाल, वल्मीक (बल्मोट-दियाँड़), नदीके संगम, सरोवर, गोशाला और राजद्वारसे मिट्टी लाकर डाल दे।
पञ्चगव्यं च कुम्भेषु शुद्धमुक्ताफलानि च।<br>रोचनां पद्मशङ्खौ च पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ ६<br>स्फटिकं चन्दनं श्वेतं तीर्थवारि ससर्षपम्।<br>राजदन्तं सकुमुदं तथैवोशीरगुग्गुलम्।<br>एतत् सर्वं विनिक्षिप्य कुम्भेष्वावाहयेत् सुरान्॥ ७तत्पश्चात् उन कलशोंमें पञ्चगव्य, शुद्ध मुक्ताफल, गोरोचन, कमल, शङ्ख, पञ्चरत्न, स्फटिक, श्वेत चन्दन, तीर्थ-जल, सरसों, राजदन्त (एक ओषधिविशेष), कुमुद (कोइयाँ), खस, गुग्गुल—यह सब डालकर उन कलशोंपर देवताओंका आवाहन करे। (आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—)
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ ८‘यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदियाँ, नद और जलप्रद तीर्थ यहाँ पधारें।’
योऽसौ वज्रधरो देव आदित्यानां प्रभुर्मतः।<br>सहस्रनयनश्चेन्द्रो ग्रहपीडां व्यपोहतु॥ ९(इसके बाद प्रार्थना करे—) ‘जो देवताओंके स्वामी माने गये हैं तथा जिनके एक हजार नेत्र हैं, वे वज्रधारी इन्द्रदेव मेरी ग्रहणजन्य पीडाको दूर करें।
मुखं यः सर्वदेवानां सप्तार्चिरमितद्युतिः।<br>चन्द्रोपरागसम्भूतामग्निः पीडां व्यपोहतु॥ १०जो समस्त देवताओंके मुखस्वरूप, सात ज्वालाओंसे युक्त और अतुल कान्तिवाले हैं, वे अग्निदेव चन्द्र-ग्रहणसे उत्पन्न हुई मेरी पीडाका विनाश करें।
यः कर्मसाक्षी भूतानां धर्मो महिषवाहनः।<br>यमश्चन्द्रोपरागोत्थां मम पीडां व्यपोहतु॥ ११जो समस्त प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं तथा महिष जिनका वाहन है, वे धर्मस्वरूप यम चन्द्र-ग्रहणसे उद्भूत हुई मेरी पीडाको मिटायें।
२६२* मत्स्यपुराण *
परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>सूर्यग्रहे सूर्यनाम सदा मन्त्रेषु कीर्तयेत्॥ २३<br>अधिकाः पद्मरागाः स्युः कपिलां च सुशोभनाम्।<br>प्रयच्छेच्च निशाम्पत्ये चन्द्रसूर्योपरागयोः॥ २४<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रलोके महीयते॥ २५पुनरागमनरहित परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सूर्य-ग्रहणमें मन्त्रोंमें सदा सूर्यका नाम उच्चारण करना चाहिये। इसके अतिरिक्त चन्द्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण—दोनों अवसरोंपर सूर्यके निमित्त पद्मराग मणि और निशापति चन्द्रमाके निमित्त एक सुन्दर कपिला गौका दान करनेका विधान है। जो मनुष्य इस (ग्रहणस्नानकी विधि)-को नित्य सुनता अथवा दूसरेको श्रवण कराता है वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ २२—२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे चन्द्रादित्योपरागस्नानविधिर्नाम सप्तषष्टितमोऽध्यायः॥ ६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें चन्द्रादित्योपरागस्नान-विधि नामक सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ६७॥


अड़सठवाँ अध्याय

सप्तमीस्नपन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

<center>नारद उवाच</center><br>किमुद्वेगाद्भुते कृत्यमलक्ष्मीः केन हन्यते।<br>मृतवत्साभिषेकादिकार्येषु च किमिष्यते॥ १**नारदजीने पूछा—**प्रभो! किसी आकस्मिक एवं वेगशाली कष्टके प्राप्त होनेपर उसकी निवृत्तिके लिये तथा अद्भुत शान्तिके* लिये कौन-सा व्रत करना चाहिये? किस व्रतके अनुष्ठानसे दरिद्रताका विनाश किया जा सकता है तथा जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हैं, उस मृतवत्सा स्त्रीके स्नान आदि कार्योंमें उसकी शान्तिके लिये किस व्रतका विधान है?॥ १॥
<center>श्रीभगवानुवाच</center><br>पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिंस्तपोधन।<br>रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्टवधेन च॥ २<br><br>तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम्।<br>सप्तमीस्नपनं नाम जनपीडाविनाशनम्॥ ३<br><br>बालानां मरणं यत्र क्षीरपाणां प्रदृश्यते।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च यौवने चापि वर्तताम्॥ ४<br><br>शान्तये तत्र वक्ष्यामि मृतवत्साभिषेचनम्।<br>एतदेवाद्वभुतोद्वेगचित्तभ्रमविनाशनम् ॥ ५**श्रीभगवान्‌ने कहा—**तपोधन! पूर्वजन्ममें किये हुए पाप इस जन्ममें रोग, दुर्गति तथा इष्टजनोंकी मृत्युके रूपमें फलित होते हैं। उनके विनाशके लिये मैं सदा कल्याणकारी सप्तमीस्नपन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, यह लोगोंकी पीडाका विनाश करनेवाला है। जहाँ दुधमुँहे शिशुओं, वृद्धों, आतुरों और नवयुवकोंकी आकस्मिक मृत्यु देखी जाती है वहाँ उसकी शान्तिके लिये मैं इस 'मृतवत्साभिषेक' को बतला रहा हूँ। यही समस्त अद्भुत नामक उत्पातों, उद्वेगों और चित्तभ्रमका भी विनाशक है॥ २—५॥

* सामवेदीय 'अद्भुतब्राह्मण' (ताण्डव २६) तथा अथर्वपरिशिष्ट ७२ में अद्भुत शान्तिका विस्तारसे उल्लेख है।

* अध्याय ६८ * २६३


| भविष्यति च वाराहो यत्र कल्पस्तपोधन।<br>वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तमः ॥ ६<br>भविष्यति च तत्रैव पञ्चविंशतिमं यदा।<br>कृतं नाम युगं तत्र हैहयान्वयवर्धनः।<br>भविता नृपतिर्वीरः कृतवीर्यः प्रतापवान् ॥ ७<br>स सप्तद्वीपमखिलं पालयिष्यति भूत लम्।<br>यावद्वर्षसहस्राणि सप्तसप्तति नारद ॥ ८<br>जातमात्रं च तस्यापि यावत् पुत्रशतं तथा।<br>च्यवनस्य तु शापेन विनाशमुपयास्यति ॥ ९<br>सहस्रबाहुश्च यदा भविता तस्य वै सुतः।<br>कुरङ्गनयनः श्रीमान् सम्भूतो नृपलक्षणैः ॥ १०<br>कृतवीर्यस्तदाऽऽराध्य सहस्रांशुं दिवाकरम्।<br>उपवासैर्व्रतैर्दिव्यैर्वेदसूक्तैश्च नारद।<br>पुत्रस्य जीवनायालभेतत् स्नानमवाप्स्यति ॥ ११<br>कृतवीर्येण वै पृष्ट इदं वक्ष्यति भास्करः।<br>अशेषदुष्टशमनं सदा कल्मषनाशनम् ॥ १२ | तपोधन! जब वाराह-कल्प आयेगा, उसमें भी जब श्रेष्ठ वैवस्वत मनुका कार्यकाल होगा, उसमें जब पचीसवाँ कृतयुग आयेगा तब कृतवीर्य नामका एक प्रतापी एवं शूरवीर नरेश उत्पन्न होगा जो हैहयवंशकी वृद्धि करनेवाला होगा। नारद! वह सतहत्तर हजार वर्षोंतक सातों द्वीपोंकी समस्त पृथ्वीका पालन करेगा। उसके सौ पुत्र होंगे, परंतु महर्षि च्यवनके शापसे वे सभी जन्मते ही नष्ट हो जायँगे। नारद! जब उसके सहस्र भुजाधारी, मृग-नेत्र-सरीखे नेत्रोंवाला, शोभाशाली एवं सम्पूर्ण राज-लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र उत्पन्न होगा तब राजा कृतवीर्य अपने उस पुत्रके दीर्घ जीवनकी प्राप्तिके निमित्त उपवास, व्रत तथा दिव्य वेद-सूक्तोंद्वारा सहस्रकिरणधारी सूर्यकी आराधना करके इस विशेष स्नान (स्नपनव्रत)-को प्राप्त करेगा। उस समय कृतवीर्यद्वारा पूछे जानेपर भगवान् सूर्य अखिल दोषोंके शामक एवं पापनाशक इस व्रतको बतलायेंगे ॥ ६–१२ ॥ |

सूर्य उवाच

| अलं क्लेशेन महता पुत्रस्तव नराधिप।<br>भविष्यति चिरंजीवी किंतु कल्मषनाशनम् ॥ १३<br>सप्तमीस्नपनं वक्ष्ये सर्वलोकहिताय वै।<br>जातस्य मृतवत्सायाः सप्तमे मासि नारद।<br>अथवा शुक्लसप्तम्यामेतत् सर्वं प्रशस्यते ॥ १४<br>ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>बालस्य जन्मनक्षत्रं वर्जयेत् तां तिथिं बुधः।<br>तद्वद् वृद्धातुराणां च कृत्यं स्यादितरेषु च ॥ १५<br>गोमयेनानुलिप्तायां भूमावेकाग्निवत् तदा।<br>तण्डुलै रक्तशालीयैश्चरुं गोक्षीरसंयुतम्।<br>निर्वपेत् सूर्यरुद्राभ्यां तन्मन्त्राभ्यां विधानतः ॥ १६<br>कीर्तयेत् सूर्यदैवत्यं समाचिं च घृताहुतीः।<br>जुहुयाद् रुद्रसूक्तेन तद्वद् रुद्राय नारद ॥ १७ | **भगवान् सूर्य कहेंगे—**नरेश्वर! अब तुम अधिक कष्ट मत सहन करो, तुम्हारा पुत्र चिरंजीवी होगा, किंतु सम्पूर्ण लोकोंके हितके हेतु मैं जिस पापनाशक सप्तमीस्नपन-व्रतका वर्णन करूँगा, उसका अनुष्ठान तुम्हें भी करना चाहिये। नारद! मृतवत्सा स्त्रीके नवजात शिशुके लिये सातवें महीनेमें अथवा शुक्लपक्षकी किसी भी सप्तमी तिथिको यह सारा कार्य प्रशस्त माना गया है। यदि उस तिथिको बालकका जन्म-नक्षत्र पड़ता हो तो बुद्धिमान् कर्ताको उस तिथिका त्याग कर देना चाहिये। उसी प्रकार वृद्ध, रोगी अथवा अन्य लोगोंके लिये भी किये जानेवाले कार्यमें इसका विचार करना आवश्यक है। व्रतारम्भमें व्रती ग्रहबल एवं ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर एकाग्निक उपासककी भाँति गो-दुग्धके साथ लाल अगहनीके चावलोंसे हव्यान पकाये, फिर सूर्य और रुद्रको पृथक्-पृथक् उनके मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक वह हव्यान प्रदान करे। उस समय सूर्यसूक्तकी सात ऋचाओंका पाठ करे और अग्निमें घीकी सात आहुतियोंसे हवन करे। नारद! रुद्रके लिये भी उसी प्रकार |