श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ ईशस्येन्द्रियाद्यविषयतां प्रत्य- | अब श्रुति ईश्वरकी इन्द्रियादिकी ग्रूपतां तदैक्यज्ञानान्मोक्षतां | अविषयता, प्रत्यग्रूपता और उसके | साथ आत्माके एकत्वका ज्ञान होनेसे चाह— | मोक्षप्राप्तिका वर्णन करती है— न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥२०॥ इसका स्वरूप नेत्रादिसे ग्रहण करनेयोग्य स्थानमें नहीं है, इसे कोई भी नेत्रद्वारा नहीं देख सकता। जो इस हृदयस्थित परमात्माको शुद्ध बुद्धि यानी मनसे इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥२०॥ न संदृश इति । अस्य प्रकृते- | 'न संदृशे' इत्यादि । इस प्रकृत श्वरस्य रूपं स्वरूपं रूपाादिरहितं | ईश्वरका रूप अर्थात् रूपाादिरहित निर्विशेषं खप्रकाशारखण्डसुखानु- | निर्विशेष स्वप्रकाश अखण्डानन्दा- भवं संदृशे चक्षुरादिग्रहणयोग्य- | नुभवमय स्वरूप संदृश—नेत्रादि प्रदेशे न तिष्ठति तद्विषयो न | इन्द्रियोंसे ग्रहण करनेयोग्य प्रदेशमें भवतीत्येतत् । इन्द्रियागोचरत्वा- | स्थित नहीं है, अर्थात् यह उनका द्वेवैनं प्रकृतं चक्षुरित्युपलक्षणम् । | विषय नहीं होता । इन्द्रियोंका विषय | न होनेसे ही इस प्रकृत परमात्माको सर्वेन्द्रियैरपि कश्चन कोऽपि न | कोई भी नेत्रसे—नेत्र यहाँ समस्त | इन्द्रियोंको उपलक्षित करता है, अतः पश्यति तद्विषयतया ग्रहीतुं न | किसी भी इन्द्रियसे नहीं देख सकता | अर्थात् इसे इन्द्रियोंके विषयरूपसे शक्नुयात् । "यच्चक्षुषा न पश्यति | ग्रहण नहीं कर सकता । "जिसे कोई | नेत्रद्वारा नहीं देख सकता अपि तु
२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ येन चक्षूंषि पश्यति" (के० उ० | जिसकी सत्तासे नेत्र देखता है" १।६) इत्यादिश्रुतेः । हृदा | इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । जो शुद्धबुद्धयैतद्व्याख्यातं मनसेति | साधनचतुष्टयादिसम्पन्न संन्यासी यानी हृदिस्थं हृदाकाशगुहास्थं प्रत्य- | योग्य अधिकारी हृदयस्थित—हृदया- क्तया तत्रावस्थितं ये साधन- | काशरूप गुहामें स्थित अर्थात् वहाँ चतुष्टयादियुक्ताः संन्यासिनो | प्रत्यक्रूपसे विद्यमान इस प्रकृत योग्याधिकारिण एनं प्रकृतं ब्रह्मा- | ब्रह्मरूप आत्माको हृदय—शुद्धबुद्धि- त्मानमेवमित्थं ब्रह्माहमस्मीत्य- | से, इसीकी व्याख्या करके कहते हैं परोक्षेण विदुर्जानान्ति तेऽपरोक्षी- | 'मनसे' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे जानते करणमहिम्नामृता भवन्त्यमरण- | हैं कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वे उस साक्षात्कार- धर्माणो भवन्ति । मरणहेत्वविद्या- | की महिमासे अमृत—अमरणधर्मा देस्तत्त्वज्ञानाग्निना दग्धत्वात्पुन- | हो जाते हैं । तात्पर्य यह है कि र्देहान्तरं न भजन्तीत्यर्थः ॥२०॥ | मरणके हेतुभूत अज्ञानादिका तत्त्व- ज्ञानरूप अग्निसे दाह हो जानेके कारण वे पुनः अन्य देह धारण नहीं करते ॥२०॥ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तत्प्रसादादेवेष्टप्राप्ति- | अब यह मानकर कि उसीकी परिहाराविति मत्वा तमेव परमेश्वरं | कृपासे इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्ति हो सकती हैं दो मन्त्रोंसे उस परमे- प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | श्वरकी ही स्तुति करते हैं— अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते । रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥२१॥ हे रुद्र ! तुम अजन्मा हो, इसलिये कोई [मुझ-जैसा] संसारभयसे कातर पुरुष तुम्हारी शरण लेता है [और कहता है कि] तुम्हारा जो दक्षिण मुख है उससे मेरी सर्वदा रक्षा करो ॥ २१ ॥
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१
अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ अजात इति । इतिशब्दो | 'अजातः' इत्यादि । मूलमें 'इति' हेत्वर्थः । यस्मात्त्वमेवाजातो ज- | शब्द हेतुवाचक है । क्योंकि तुम्हीं न्मजराशनायापिपासाधर्मवर्जितः । | अजात यानी जन्म, जरा, क्षुधा, इतरत्सर्वं विनाशि दुःखान्वितम्, | पिपासादि धर्मोंसे रहित हो, और सब तस्माज्जन्मजरामरणाशनायापिपा- | तो नाशवान् एवं दुःखी हैं, इसलिये जो साशोकमोहान्वितात्संसाराद्भीरु- | जन्म-जरा-मरण, क्षुधा-पिपासा एवं र्भीतः सन्कश्चिदेक एव परतन्त्र- | शोक-मोहादिपूर्ण संसारसे डरा हुआ है स्त्वामेव शरणं प्रपद्ये मादृशो वा | ऐसा कोई एक मैं परतन्त्र जीव कश्चित्प्रपद्यत इति प्रथमपुरुष- | तुम्हारी ही शरण लेता हूँ; अथवा मन्वधीयते । हे रुद्र यत्ते दक्षिणं | कोई मुझ-जैसा शरण लेता है— मुखमुत्साहजननं ध्यातॄणामाह्लाद- | इस आशयसे इस क्रियाका प्रथम करम् । अथवा दक्षिणस्यां दिशि | पुरुषसे सम्बन्ध किया जा सकता भवं दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि | है । अतः हे रुद्र ! तुम्हारा जो नित्यं सर्वदा ॥२१॥ | उत्साहजनक दक्षिण मुख है, | जो ध्यान करनेपर आनन्द पैदा | करनेवाला है अथवा दक्षिण दिशामें | होनेके कारण जो दक्षिण मुख है | उससे तुम नित्य—सर्वदा मेरी रक्षा | करो ॥२१॥ ———•••——— किञ्च— | तथा— मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधी- र्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥२२॥ हे रुद्र ! तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और अश्वोंमें क्षय न करना और हमारे वीर सेवकोंका भी वध न करना । हम हव्य- सामग्रीसे युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते हैं ॥२२॥
२०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
२०२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
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मा न इति । मा रीरिष इति | ‘मा नः’ इत्यादि । ‘मा रीरिषः’ सर्वत्र संबध्यते । मा रीरिषः । | इस क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध रेषणं मरणं विनाशं मा कार्षीः । | है । मा रीरिषः-रेषण—मरण यानी नोऽस्माकं तोके पुत्रे तनये | विनाश न करो । हमारे ‘तोके’—पुत्रमें, पौत्रे न आयुषि मा नो | ‘तनये’—पौत्रमें, आयुमें तथा गौ और गोषु मा नोऽश्वेषु शरीरिषु । | अश्व आदि शरीरधारियोंमें भी क्षय न ये चास्माकं वीरा विक्रामन्तो | करो । हमारे जो वीर—विक्रमशील भृत्यास्तान्हे रुद्र भामितः क्रोधितः | सेवक हैं, हे रुद्र ! तुम क्रोधित होकर सन्मा वधीः । कस्मात् ? यस्मा- | उनका भी वध न करो । क्यों ? द्धविष्मन्तो हविषा युक्ताः सदम् | क्योंकि हम हविष्मान्—हविसे युक्त इत् त्वा हवामहे सदैव रक्षणार्थ- | होकर सदा ही तुम्हारा आवाहन माह्वयाम इत्यर्थः ॥२२॥ | करते हैं अर्थात् तुम्हें रक्षाके लिये | सर्वदा ही पुकारते हैं ॥२२॥
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इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चम अध्याय
पञ्चम अध्याय
—-—:00:00:00:—-- अक्षराश्रित विद्या-अविद्या और उनके शासक परमेश्वरके स्वरूप तथा माहात्म्यका वर्णन चतुर्थाध्यायशेषमपूर्वार्थं प्रति- | चतुर्थ अध्यायमें अवशिष्ट रहे अपूर्व विषयका प्रतिपादन करनेके पादयितुं पञ्चमोऽध्याय आर- | लिये 'द्वे अक्षरे' इत्यादि मन्त्रसे पञ्चम अध्याय आरम्भ किया भ्यते द्वे अक्षरे इत्यादिना-- | जाता है-- द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥ हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट अविनाशी और अनन्त परब्रह्ममें जहाँ विद्या और अविद्या दोनों परिच्छिन्नभावसे स्थित हैं [ उनमें ] क्षर अविद्या है और अमृत विद्या है तथा जो इन विद्या और अविद्या दोनोंका शासन करता है वह इनसे भिन्न है ॥१॥ द्वे विद्याविद्ये यस्मिन्नक्षरे | जिस अविनाशी एवं अनन्त यानी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परे ब्रह्मपरे | देश, काल या वस्तुसे अपरिच्छिन्न ब्रह्म- परस्मिन्वा ब्रह्मण्यनन्ते देशतः | परमें—ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट कालतो वस्तुतो वापपरिच्छिन्ने । | अथवा परब्रह्ममें विद्या और अविद्या यत्र यस्मिन्द्वे विद्याविद्ये निहिते | ये दोनों गूढ यानी अव्यक्तभावसे स्थापिते गूढे अनभिव्यक्ते । | स्थित हैं। उन विद्या और अविद्याको विद्याविद्ये विविच्य दर्शयति— | अलग-अलग करके दिखाते हैं—
२०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
क्षरं त्वविद्या क्षरणहेतुः संसृति- | उनमें क्षर—क्षरणकी हेतु यानी कारणम् । अमृतं तु विद्या मोक्ष- | संसारकी कारण तो अविद्या है और हेतुः । यस्तु पुनर्विद्याविद्ये ईशते | अमृत यानी मोक्षकी हेतु विद्या नियमयति स ताभ्यामन्यस्त- | है । और जो विद्या और अविद्याका त्साक्षित्वात् ॥ १ ॥ | शासन करता है वह उनका साक्षी | होनेसे उन दोनोंसे भिन्न है ॥१॥ ------------------oo:x:oo------------------ कोऽसावित्याह— | वह कौन है ? सो बतलाते हैं— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ जो अकेला ही प्रत्येक स्थान तथा सम्पूर्ण रूप और समस्त योनियों ( उत्पत्तिस्थानों ) का अधिष्ठान है, तथा जिसने सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्न हुए कपिल ऋषि ( हिरण्यगर्भ ) को ज्ञानसम्पन्न किया था और जन्म लेते हुए भी देखा था [ वही विद्या और अविद्यासे भिन्न उनका शासक है ]॥२॥ यो योनिमिति । यो योनिं | ‘यो योनिम्’ इत्यादि । जो योनिं स्थानं स्थानं “यः | योनि-योनिको—स्थान-स्थानको अर्थात् पृथिव्यां तिष्ठन्” (बृ०उ० ३ । | “जो पृथिवीमें स्थित होकर [पृथिवी- ७।३) इत्यादिनोक्तानि पृथिव्या- | का शासन करता है ]” इत्यादि दीन्यधितिष्ठति नियमयति । | मन्त्रसे कहे हुए पृथिवी आदिको एकोऽद्वितीयः परमात्मा विश्वानि | अधिष्ठित—नियमित करता है तथा रोहितादीनि रूपाणि योनीश्च | जो एक—अद्वितीय परमात्मा प्रभवस्थानान्यधितिष्ठति । ऋषिं | लोहितादि सम्पूर्ण रूपोंको और | योनियों-उत्पत्तिस्थानोंको अधिष्ठित | करता है; [ जिसने ] ऋषि यानी
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५
सर्वज्ञमित्यर्थः । कपिलं कनक- | सर्वज्ञ प्रसूत—अपनेहीसे उत्पन्न किये कपिलवर्णं प्रसूतं स्वेनैवोत्पादितं | हुए कपिल—सुवर्णसदृश कपिलवर्ण हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वमित्य- | हिरण्यगर्भको पहले जन्म दिया था, स्यैव जन्मश्रवणात् । अन्यस्य | क्योंकि आरम्भमें हिरण्यगर्भका ही चाश्रवणात् । उत्तरत्र “यो ब्रह्माणं | जन्म श्रुति प्रतिपादित करती है, विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहि- | अन्य ( महर्षि कपिल ) का जन्म णोति तस्मै” (श्वे० उ० ६।१८) इति | नहीं बतलाती । कारण, आगे यह वक्ष्यमाणत्वात् “कपिलोऽग्रजः” | कहा जायगा कि “जो आरम्भमें इति पुराणवचनात्कपिलो हिरण्य- | ब्रह्माको रचता है और उसके लिये गर्भो वा निर्दिश्यते— | वेदोंको प्रेरित करता है ।” “कपिल | पहले उत्पन्न होनेवाला है” इस | पुराणवचनसे भी कपिल या हिरण्य- | गर्भका ही निर्देश किया गया है । “कपिलर्षिर्भगवतः | “जगत्का मोह नष्ट करनेके सर्वभूतस्य वै किल । | लिये सर्वभूतमय भगवान् विष्णुके विष्णोरंशो जगन्मोह- | ही अंशस्वरूप मुनिवर कपिलने नाशाय समुपागतः ॥” | अवतार लिया है ।” “सर्वभूतात्मा श्रीहरि “कृते युगे परं ज्ञानं | सत्ययुगमें कपिलादिरूप धारण कर कपिलादिखरूपधृत् । | सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर उत्कृष्ट ददाति सर्वभूतात्मा | ज्ञान प्रदान करते हैं ।” “तुम समस्त सर्वस्य जगतो हितम् ॥” | देवताओंमें इन्द्र हो, ब्रह्मवेत्ताओंमें “त्वं शक्रः सर्वदेवानां | ब्रह्मा हो, बलवानोंमें वायुदेवता हो, ब्रह्मा ब्रह्मविदामसि । | योगियोंमें सनत्कुमार हो, ऋषियोंमें वायुर्बलवतां देवो | वसिष्ठ हो, वेदवेत्ताओंमें व्यास हो, योगिनां त्वं कुमारकः॥ | ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं | व्यासो वेदविदामसि । |
२०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌಌ सांख्यानां कपिलो देवो ज्ञानयोगियोंमें कपिलदेव हो और रुद्रोंमें रुद्राणामसि शङ्करः॥” महादेव हो” इत्यादि पुराणवचनोंमें इति परमर्षिः प्रसिद्धः । कपिल नामसे महर्षि कपिल ही “ततस्तदानीं तु भुवनमस्मि- प्रसिद्ध हैं। न्प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स अथवा “ततस्तदानीं तु भुवनम- षोडशास्रो पुरुषश्च विष्णोर्विराज- स्मिन् प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स मानं तमसः परस्तात्” इति श्रूयते षोडशास्रः पुरुषश्च विष्णोर्विराजमानं मुण्डकोपनिषदि । स एव वा तमसः परस्तात् ।” इस मुण्डको- कपिलः प्रसिद्धोऽग्रे सृष्टिकाले । पनिषद्की श्रुतिके अनुसार वह यो ज्ञानैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यैर्बिभर्ति हिरण्यगर्भ ही पूर्वकालमें सृष्टिके बभार जायमानं च पश्येदपश्य- समय ‘कपिल’ नामसे प्रसिद्ध हुआ दित्यर्थः ॥ २ ॥ जिसे परमात्माने अपने ज्ञानोंसे-- धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्योंसे युक्त किया और उत्पन्न होते देखा ॥२॥ ───००:०:००─── किञ्च— तथा— एकैकं जालं बहुधा विकुर्व- न्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥ इस संसारक्षेत्रमें यह देव [ सृष्टिके समय ] एक-एक जालको* अनेक प्रकारसे विकृत कर [ अन्तमें ] संहार करता है; तथा यह महात्मा १. यह श्रुति मुण्डकोपनिषद्में नहीं मिलती, अन्यत्र भी उसका पता नहीं चलता । श्रुतिका पाठ भी शुद्ध नहीं जान पड़ता । परम्परासे जैसा पाठ मिला वैसा ही रहने दिया है और अर्थसंगति न लगनेके कारण उसका अनुवाद नहीं किया गया है ।
- 'जाल' शब्दके अर्थ टीकाकारोंने भिन्न-भिन्न प्रकारसे किये हैं । भगवान्
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ ईश्वर ही [ कल्पान्तरके आरम्भमें ] प्रजापतियोंको पुनः उत्पन्न कर सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ एकैकमिति । सुरनरतिर्यगा- | 'एकैकम्' इत्यादि । यह देव दीनां सृजति जालमेकैकं प्रत्येकं | इस मायामय क्षेत्रमें सृष्टिके समय बहुधा नानाप्रकारं विकुर्वन्सृष्टि- | देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादिके एक- कालेऽस्मिन्मायात्मके क्षेत्रे संहर- | एक जालको नाना प्रकारसे विकृत त्येष देवः । भूयः पुनर्य लोकानां | करके रचता है और फिर संहार | कर देता है। फिर यह ईश्वर महात्मा, पतयो मरीच्यादयस्तान्सृष्ट्वा तथा | जिस प्रकार इसने पूर्वकल्पमें मरीचि यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सृष्टवानीशः | आदि जो लोकाध्यक्ष हैं उन्हें रचा सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ | था उसी प्रकार पुनः रचकर उन | सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ किञ्च— | तथा— सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्य- क्प्रकाशयन्भ्राजते यद्दनड्वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४॥ भाष्यकारने इसका कोई अर्थ नहीं किया । श्रीशङ्करानन्दजी लिखते हैं—'जालं महेन्द्रजालं संसाररूपं प्रतिप्राणिव्यवस्थितमित्यर्थः' अर्थात् 'जाल शब्दका तात्पर्य है प्रत्येक प्राणीसे सम्बन्ध रखनेवाला संसाररूप महान् इन्द्रजाल ।' श्रीनारायणतीर्थ कहते हैं—'जालं कर्मफललक्षणं बन्धम्' अर्थात् 'कर्मफलरूप बन्धन ही जाल है ।' तथा विज्ञानभगवान्का कथन है—'जालं समष्टिरूप कार्यकारणलक्षणानि जालानि पुरुष- मत्स्यानां बन्धनत्वाज्जालवज्जालम्' अर्थात् 'समष्टिरूप भूत और इन्द्रियवर्गरूप जाल ही पुरुषरूप मत्स्योंको बाँधनेवाले होनेसे जालके समान जाल हैं ।'
२०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ जिस प्रकार सूर्य प्रकाशित होता है वैसे ही यह ऊपर, नीचे तथा इधर-उधर समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है । इस प्रकार वह द्योतनस्वभाव सम्भजनीय भगवान् अकेला ही कारणभूत पृथिवी आदिका* नियमन करता है ॥४॥
[संस्कृत-भाष्यम्] सर्वा दिश इति । सर्वा दिशः प्राच्याद्या ऊर्ध्वमुपरिष्टादधश्चा- धस्तात्तिर्यक्पार्श्वदिशश्च प्रकाशयन् स्वात्मचैतन्यज्योतिषा प्रकाशते भ्राजते दीप्यते ज्योतिषा यदु अनड्वान्यद्वदादित्यर्थः । यथानड्- वानादित्यो जगच्चक्रावभासने युक्त एवं स देवो द्योतनस्वभावो भगवानैश्वर्यादिसमन्वितो वरेण्यो वरणीयः संभजनीयो योनिः कारणं कृत्स्नस्य जगतः स्वभावान् स्वात्मभूतान्पृथ्व्यादीन्भावानथ वा कारणस्वभावान्कारणभूतान्पृ- थिव्यादीनधितिष्ठति नियमयति । एकोऽद्वितीयः परमात्मा ॥४॥
[हिन्दी-अनुवाद] ‘सर्वा दिशः’ इत्यादि। यह पूर्वादि समस्त दिशाओंको अर्थात् ऊपर- नीचे और इधर-उधरकी दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ अपने स्वरूप- भूत चित्प्रकाशसे भ्राजित् यानी दीप्त होता है जैसे कि अनड्वान् । और जिस प्रकार कि अनड्वान् यानी सूर्य जगच्चक्रको प्रकाशित करनेमें लगा हुआ है उसी प्रकार वह देव— द्योतनस्वभाव, भगवान्--ऐश्वर्यादि- सम्पन्न और वरेण्य—वरणीय— सम्भजनीय योनि यानी कारण एक अद्वितीय परमात्मा सम्पूर्ण जगत्के स्वभाव यानी स्वात्मभूत पृथिवी आदि भावोंको [ अधिष्ठित करता है ] । अथवा [ ‘योनिखभावान्’ ऐसा समस्त पद माना जाय तो ] कारण- स्वभाव यानी कारणभूत पृथिवी आदिको अधिष्ठित–नियमित करता है ॥४॥
[पाद-टिप्पणी]
- यह अर्थ मूलपाठ ‘योनिखभावान्’ मानकर किया गया है, जहाँ मूलमें ‘योनिः स्वभावान्’ ऐसा पाठ है वहाँ ‘योनिः’ शब्द भगवान्का विशेषण होगा और ‘स्वभावान्’ का अर्थ ‘स्वात्मभूतान् पृथिव्यादीन् भावान्’ ( अपने स्वरूपभूत पृथिवी आदि भावोंको ) होगा ।
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०९ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ जगत्का कारणभूत जो परमात्मा [ प्रत्येक वस्तुके ] स्वभावको निष्पन्न करता है, जो पाच्यों ( परिणामयोग्य पदार्थों ) को परिणत करता है, जो अकेला ही इस सम्पूर्ण विश्वका नियमन करता है, और जो [सत्त्वादि] समस्त गुणोंको उनके कार्योंमें नियुक्त करता है [ वह परब्रह्म है ] ॥५॥
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| यच्च स्वभावमिति । यच्च | 'यच्च स्वभावम्' इत्यादि । [ यहाँ |
| यश्चेति लिङ्गव्यत्ययः । स्वभावं | वैदिक-प्रक्रियानुसार ] 'यश्च' इस |
| यदग्नेरौष्ण्यं पचति निष्पादयति | पुँल्लिङ्गके स्थानमें 'यच्च' इस प्रकार |
| विश्वस्य जगतो योनिः । पाच्यांश्च | लिङ्गव्यत्यय हुआ है। जो स्वभावको |
| पाकयोग्यान्पृथिव्यादीन्परिणाम- | यानी अग्निके उष्णत्वको पचाता-निष्पन्न |
| येद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठति | करता है, विश्व-जगत्का कारण है |
| नियमयत्येकः । गुणांश्च सत्त्वरज- | और पाच्य यानी पाक (परिणाम) योग्य |
| स्तमोरूपान्विनियोजयेद्यः । एवं- | पृथिवी आदिका परिणाम करता है, |
| लक्षणः ॥५॥ | जो अकेला इस सम्पूर्ण विश्वको |
| अधिष्ठित—नियमित करता है तथा | |
| जो सत्त्व, रज एवं तमोरूप गुणोंको | |
| नियुक्त करता है—ऐसे लक्षणोंवाला | |
| परमात्मा है ॥५॥ |
किञ्च— | तथा— तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् ।
२१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदु- स्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥ वह वेदोंके गुह्यभाग उपनिषदोंमें निहित है, उस वेदवेद्य परमात्माको ब्रह्मा जानता है। जो पुरातन देव और ऋषिगण उसे जानते थे वे तद्रूप होकर अमर ही हो गये थे ॥ ६ ॥ तदिति। तत्प्रकृतमात्मस्वरूपं | 'तद्वेद' इत्यादि । उस प्रकृत वेदानां गुह्योपनिषदो वेदगुह्योप- | आत्माका स्वरूप वेदोंके गुह्यभाग जो निषदस्तासु वेदगुह्योपनिषत्सु | उपनिषद् हैं उन वेदगुह्योपनिषदोंमें गूढं संवृतम्। ब्रह्मा हिरण्यगर्भो | गूढ—छिपा हुआ है। उस ब्रह्मयोनि वेदते जानाति ब्रह्मयोनिं वेद- | यानी वेदप्रमाणक् आत्माको ब्रह्मा प्रमाणकमित्यर्थः। अथवा ब्रह्मणो | जानता है, अथवा ब्रह्म यानी हिरण्य- हिरण्यगर्भस्य योनिं वेदस्य वा | गर्भके कारण अथवा वेदके कारणभूत ये पूर्वदेवा रुद्रादय ऋषयश्च | उस आत्माको जो रुद्रादि पूर्वदेव वामदेवादयस्तद्विदुस्ते तन्मया- | और वामदेवादि ऋषिगण जानते थे स्तदात्मभूताः सन्तोऽमृता अम- | वे तन्मय—तत्स्वरूप होकर अमृत— रणधर्माणो बभूवुः। तथेदानी- | अमरणधर्मा हो गये । इसी प्रकार न्तनोऽपि तमेव विदित्वामृतो | आधुनिक पुरुष भी उसे जानकर भवतीति वाक्यशेषः ॥ ६ ॥ | अमर हो जाता है—यह वाक्य- | शेष है ॥६॥ ───○○:०:○○─── कर्तृत्वादि धर्मोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपका वर्णन एतावता तत्पदार्थ उपवर्णितः। | इतने ग्रन्थसे तत्पदार्थका वर्णन अथेदानीं त्वंपदार्थमुपवर्णयितु- | किया गया। अब यहाँसे त्वंपदार्थ- | का निरूपण करनेके लिये आगेके मुत्तरे मन्त्राः प्रस्तूयन्ते— | मन्त्र प्रस्तुत किये जाते हैं—
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११ गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥ जो गुणोंसे सम्बद्ध, फलप्रद कर्मका कर्ता और उस किये हुए कर्मका उपभोग करनेवाला है, वह विभिन्न रूपोंवाला, त्रिगुणमय, तीन मार्गोंसे गमन करनेवाला प्राणोंका अधिष्ठाता अपने कर्मोंके अनुसार गमन करता है ॥ ७ ॥ गुणान्वय इति । गुणैः कर्म- | ‘गुणान्वयः’ इत्यादि । जिसका ज्ञानकृतवासनामयैरन्वयो यस्य | कर्म एवं ज्ञानजनित वासनामय सोऽयं गुणान्वयः । फलार्थस्य | गुणोंके साथ सम्बन्ध है वह यह कर्मणः कर्ता कृतस्य कर्मफलस्य | जीव गुणान्वय है । वह फलके लिये स एवोपभोक्ता । स विश्वरूपो | कर्म करनेवाला है और वही किये नानारूपः कार्यकारणोपचितत्वात् | हुए कर्मका फल भोगनेवाला भी है । त्रयः सत्त्वादयो गुणा अस्येति | कार्यकारणभावसे [ नाना देह धारण त्रिगुणः । त्रयो देवयानादयो | करके]वृद्धिको प्राप्त होनेसे वह विश्वरूप मार्गभेदा अस्येति त्रिवर्त्मा धर्मा- | —नाना रूप है । सत्त्वादि तीनों गुण धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति वा । | इसीके हैं इसलिये यह त्रिगुण है। इसके प्राणस्य पञ्चवृत्तेरधिपः संचरति । | देवयानादि तीन मार्गभेद हैं अथवा कैः ? स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥ | धर्म, अधर्म और ज्ञानरूप इसके | तीन मार्ग हैं इसलिये यह त्रिवर्त्मा | है । यह पाँच वृत्तियोंवाले प्राणका | अधिपति सञ्चार करता है। किनके | द्वारा ?—अपने कर्मोंके द्वारा ॥ ७ ॥
२१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥ ८ ॥ जो अँगूठेके बराबर परिमाणवाला, सूर्यके समान ज्योतिःस्वरूप, संकल्प और अहंकारसे युक्त तथा बुद्धि और शरीरके गुणोंसे भी युक्त है वह अन्य (जीव) भी आरकी नोंकके बराबर आकारवाला देखा गया है॥८॥ अङ्गुष्ठमात्र इति। अङ्गुष्ठ- | ‘अङ्गुष्ठमात्रः’ इत्यादि। अङ्गुष्ठ- मात्रोऽङ्गुष्ठपरिमितहृदयसुषिरापे- | मात्र अर्थात् हृदयगुहाकी अपेक्षासे क्षया। रवितुल्यरूपो ज्योतिःस्वरूप | अँगूठेके बराबर परिमाणवाला, रवि- इत्यर्थः। सङ्कल्पाहङ्कारादिना | तुल्यरूप अर्थात् ज्योतिःस्वरूप, समन्वितो बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन च | बुद्धिके गुण सङ्कल्प और अहंकारादि- जरादिना। उक्तं च “जरामृत्यू | से युक्त तथा शरीरके गुण जरादिसे शरीरस्य” इति। आराग्रमात्रः | भी सम्पन्न; “जरा और मृत्यु शरीरके प्रतोदाग्रप्रोतलोहकण्टकाग्रमात्रो- | धर्म हैं” ऐसा कहा भी है। आराग्र- ऽपरोऽपि ज्ञानात्मनात्मा दृष्टो- | मात्र—कोड़ेके अग्रभागमें लगा हुआ ऽवगतः। अपिशब्दः सम्भावना- | जो लोहेका काँटा होता है उसकी याम्। अपरोऽप्यौपाधिको जलसूर्य | नोंकके बराबर अन्य भी यानी आत्मा इव जीवात्मा संभावित इत्यर्थः॥८॥ | भी ज्ञानस्वरूपसे देखा—जाना गया | है। यहाँ ‘अपि’ शब्द सम्भावनामें | है; तात्पर्य यह है कि जलमें प्रति- | बिम्बित सूर्यके समान उपाधिसे अन्य | जीवात्मा भी होना सम्भव है॥८॥ पुनरपि दृष्टान्तान्तरेण दर्श- | एक दूसरे दृष्टान्तसे श्रुति फिर यति— | भी दिखाती है—
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३ वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९ ॥ सौ भागोंमें विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है उस जीवको उसके बराबर जानना चाहिये; किन्तु वही अनन्तरूप हो जाता है ॥ ९ ॥ वालाग्रेति । वालाग्रस्य शत- ‘वालाग्र०’ इत्यादि । सौ भागोंमें विभक्त किये केशके अग्रभागका जो कृत्वो भेदमापादितस्य यो भाग- एक भाग है उसके भी सौ भाग स्तस्यापि शतधा कल्पितस्य किये जानेपर जो भाग होता है उसके समान जीवको समझना भागो जीवः स विज्ञेयः । लिङ्ग- चाहिये । लिङ्गदेह अत्यन्त सूक्ष्म है, इसलिये उसके परिमाणके स्यातिसूक्ष्मत्वात् तत्परिमाणे- अनुसार ही इसका परिमाण बतलाया नायं व्यपदिश्यते । स च जीव- जाता है । जीवस्वरूपसे वह ऐसा है, किन्तु स्वतः (अपने परमार्थरूपसे) स्वरूपेण, आनन्त्याय कल्पते स्वतः ९ वही अनन्त हो जाता है ॥९॥ किञ्च-- । तथा- नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स रक्ष्यते ॥१०॥ यह [ विज्ञानात्मा ] न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसीसे सुरक्षित रहता है ॥१०॥ नैव स्त्रीति । स्वतोऽद्वितीया- ‘नैव स्त्री’ इत्यादि । स्वयं साक्षात् अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण परोक्षब्रह्मात्मस्वभावत्वान्नैव स्त्री यह न स्त्री है, न पुरुष है और न न पुमानेष नैव चायं नपुंसकः । नपुंसक ही है । यह जिस-
२१४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ यद्यत्स्त्रीशरीरं पुरुषशरीरं नपुंसक- | जिस स्त्रीशरीर, पुरुषशरीर अथवा शरीरं वादत्ते तेन तेन स च | नपुंसकशरीरको धारण करता है उसी-उसीसे यह विज्ञानात्मा रक्षित- विज्ञानात्मा रक्ष्यते संरक्ष्यते | सुरक्षित रहता है, अर्थात् उसी-उसी तत्तद्धर्मानात्मन्यध्यस्याभिमन्यते | शरीरके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर ऐसा मानने लगता है कि 'मैं स्थूलोऽहं कृशोऽहं पुमानहं स्त्र्यहं | स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं नपुंसकोऽहमिति ॥१०॥ | स्त्री हूँ, मैं नपुंसक हूँ' इत्यादि ॥१०॥ जीवको कर्मोंके अनुसार विविध देहकी प्राप्तिका निर्देश केन तर्ह्यसौ शरीराण्यादत्ते ? | तो फिर यह किस कारणसे शरीर धारण करता है ? सो बतलाते हैं— इत्याह— सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहै- र्ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म । कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसंप्रपद्यते ॥११॥ जिस प्रकार अन्न और जलके सेवनसे शरीरकी वृद्धि होती है वैसे ही संकल्प, स्पर्श, दर्शन और मोहसे [ कर्म होते हैं। फिर ] यह देही क्रमशः [ विभिन्न ] योनियोंमें जाकर उन कर्मोंके अनुसार रूप धारण करता है ॥११॥ सङ्कल्पनेति । प्रथमं सङ्कल्प- | 'सङ्कल्पन०' इत्यादि । पहले नम् । ततः स्पर्शनं त्वगिन्द्रिय- | संकल्प होता है, फिर स्पर्श यानी त्वगिन्द्रियका व्यापार होता है,
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५ व्यापारः । ततो दृष्टिविधानम् । | तत्पश्चात् दृष्टि जाती है, उससे ततो मोहः । तैः सङ्कल्पनस्पर्शन- | पीछे मोह होता है । उन संकल्प, दृष्टिमोहैः शुभाशुभानि कर्माणि | स्पर्श, दर्शन और मोहसे शुभाशुभ निष्पद्यन्ते । ततः कर्मानुगानि | कर्म सम्पन्न होते हैं । फिर कर्मानुगत कर्मानुसारिणी स्त्रीपुंनपुंसकलक्ष- | यानी कर्मोंके अनुसार अनुक्रमसे— णान्यनुक्रमेण परिपाकापेक्षया | कर्मविपाककी अपेक्षासे यह देही— देही मर्त्यः स्थानेषु देवतिर्यङ्क- | जीव स्त्री, पुरुष एवं नपुंसकादि नुष्यादिष्वभिसंप्रपद्यते । तत्र | रूपोंको देवता, तिर्यक् एवं मनुष्यादि दृष्टान्तमाह—ग्रासाम्बुनोरन्नपान- | स्थानों ( योनियों ) में प्राप्त करता योरनियतयोर्वृष्टिरासेचनं निदान- | है । उसमें दृष्टान्त देते हैं—जिस मात्मनः शरीरस्य वृद्धिजायते | प्रकार ग्रास और अम्बु यानी अनियत यथा तद्वदित्यर्थः ॥११॥ | अन्न और जलकी वृष्टि—उनका सम्यक् | सेचन आत्माका निदान है अर्थात् | उससे शरीरकी वृद्धि होती है उसी | प्रकार [जीवको कर्मोंके द्वारा तदनुकूल | शरीरोंकी प्राप्ति होती है ]—ऐसा | इसका अभिप्राय है ॥११॥ स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥ जीव अपने गुणों ( पाप-पुण्यों ) के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म बहुतसे देह धारण करता है । फिर उन ( शरीरों ) के कर्मफल और मानसिक संस्कारोंके द्वारा उनके संयोग ( देहान्तरप्राप्ति ) का दूसरा हेतु भी देखा गया है ॥ १२ ॥
२१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ [मूल संस्कृत व्याख्या] स्थूलानीति। तानि च स्थू- लान्यश्मादीनि सूक्ष्माणि तैजस- धातुप्रभृतीनि बहूनि देवादि- शरीराणि देही विज्ञानात्मा स्व- गुणैर्विहितप्रतिषिद्धविषयानुभव- संस्कारैर्भोत्यावृणोति । ततस्त- त्क्रियागुणैरात्मगुणैश्च स देह्य- परोऽपि देहान्तरसंयुक्तो भवती- त्यर्थः ॥१२॥
[हिन्दी अनुवाद] 'स्थूलानि' इत्यादि। देही— विज्ञानात्मा अपने गुण यानी विहित और प्रतिषिद्ध विषयोंके अनुभवसे प्राप्त हुए संस्कारोंके द्वारा बहुत-से यानी पाषाणादि स्थूल और तैजस धातु आदि सूक्ष्म देवादि-शरीर धारण करता है। फिर वह देही उन-उन शरीरोंके कर्मफल और मानसिक संस्कारोंके द्वारा अन्य रूप हो जाता है अर्थात् देहान्तरसे युक्त हो जाता है ॥१२॥
परमात्मतत्त्वके जाननेसे जीवकी मुक्तिका कथन
[मूल संस्कृत व्याख्या] स एवमविद्याकामकर्मफल- रागादिगुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव सान्द्रजलनिमग्नो निश्चयेन देहा- हंभावमापन्नः प्रेततिर्यङ्मनुष्यादि- योनिष्व्वाजीवं जीवभावमापन्नः कथ- ञ्चित्पुण्यवशादीश्वरार्थकर्मानुष्ठा- नेनापगतरागादिमलोऽनित्यत्वादि- दर्शनेनोत्पन्नेहामुत्रार्थफलभोगवि- रागः शमदमादिसाधनसंपन्नस्त- मात्मानं ज्ञात्वा मुच्यत इत्याह—
[हिन्दी अनुवाद] अब श्रुति यह बतलाती है कि इस प्रकार गम्भीर जलमें डूबे हुए तूँबेके समान अविद्या, काम, कर्मफल और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण अपने निश्चयसे देहात्मभावसे ही युक्त हुआ जीव प्रेत, तिर्यक् एवं मनुष्यादि योनियोंमें जीवनपर्यन्त जीवभावमें ही स्थित हुआ किसी प्रकार पुण्यवश ईश्वरार्थ कर्म करनेसे रागादिमलसे शुद्ध हो जानेपर जब अनित्यत्वादि दोष-दृष्टि करनेसे ऐहिक और आमुष्मिक फल- भोगसे विरक्त और शमदमादि साधनसम्पन्न होता है तब उस आत्माको जानकर वह मुक्त हो जाता है—
अध्याय ५ शाङ्करभाष्यार्थ २१७
अध्याय ५ शाङ्करभाष्यार्थ २१७
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ इस गहन संसारके भीतर उस अनादि, अनन्त, विश्वके रचयिता, अनेकरूप, विश्वको एकमात्र व्याप्त करनेवाले देवको जानकर जीव समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ अनाद्यनन्तमिति । अनाद्य- | 'अनाद्यनन्तम्' इत्यादि । कलिलके नन्तमाद्यन्तरहितं कलिलस्य मध्ये | मध्यमें यानी अत्यन्त गम्भीर संसारके गहनगभीरसंसारस्य मध्ये विश्वस्य | मध्यमें अनाद्यनन्त—आदि-अन्तसे स्रष्टारमुत्पादयितारमनेकरूपं वि- | रहित, विश्वकी सृष्टि-उत्पत्ति करने- श्वस्यैकं परिवेष्टितारं स्वात्मना | वाले, अनेकरूप, विश्वके एकमात्र सं व्याप्यावस्थितं ज्ञात्वा देवं | परिवेष्टा अर्थात् अपने स्वरूपसे ज्योतीरूपं परमात्मानं मुच्यते | विश्वको व्याप्त करके स्थित हुए, सर्वपाशैर्विद्याकामकर्मभिः॥१३॥ | देव—ज्योतिःस्वरूप परमात्माको जानकर जीव समस्त पाशोंसे यानी अविद्या, काम एवं कर्मादिसे मुक्त हो जाता है ॥१३॥ —————o000o————— केन पुनरसौ गृह्यते ? इत्याह— | किन्तु यह किसके द्वारा ग्रहण किया जाता है, सो बतलाते हैं— भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥ भावग्राह्य, अशरीरसंज्ञक, सृष्टि और प्रलय करनेवाले, शिवस्वरूप, एवं कलाओंकी रचना करनेवाले इस देवको जो जान लेते हैं वे शरीर ( देहबन्धन ) को त्याग देते हैं ॥ १४ ॥
२१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ————————————
भावग्राह्यमिति । भावेन वि- | ‘भावग्राह्यम्’ इत्यादि । भाव— शुद्धान्तःकरणेन गृह्यत इति | विशुद्ध अन्तःकरणसे ग्रहण किया जाता है इसलिये जो भावग्राह्य है, भावग्राह्यम् । अनीडाख्यं नीडं | अनीडाख्य—नीड शरीरको कहते शरीरमशरीराख्यम् । भावाभाव- | हैं अतः अशरीर नामवाले, भाव और अभाव (सृष्टि और प्रलय) करने- करं शिवं शुद्धमविद्यातत्कार्य- | वाले, शिव—शुद्ध अर्थात् अविद्या विनिर्मुक्तमित्यर्थः। कलानां षोड- | और उसके कार्यसे रहित, कला सर्गकर—“उसने प्राणकी रचना शानां प्राणादिनामान्तानाम् “स | की” इत्यादि वाक्यसे अथर्वण (प्रश्न) प्राणमसृजत” (प्र० उ० ६।४) | श्रुतिमें कही हुई प्राणसे लेकर इत्यादिनाथर्वणोक्तानां सर्गकरं | नामपर्यन्त सोलह कलाओंके रचयिता उस देवको जो ‘यह मैं हूँ’ इस देवं ये विदुरहमस्मीति ते जहुः | प्रकार जानते हैं वे तनु—शरीरको परित्यजेयुस्तनुं शरीरम् ॥१४॥ | त्याग देते हैं* ॥१४॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
- अर्थात् फिर उनका शरीरान्तरसे सम्बन्ध नहीं होता, वे मुक्त हो जाते हैं।