भारतकोश
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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

आस्तिकता ३५६ परिशिष्ट

च. भद्रासन— भद्रासन इस प्रकार है-गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीविन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत्। पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां दृढं बद्ध्वा सुनिश्चलम्॥ भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् (जा०दर्शनो० ३.७) अर्थात् इस आसन में दोनों पैरों के गुल्फों (टखनों) को वृषण के नीचे सीवन के दोनों पार्श्व भागों में इस प्रकार रखा जाता है कि बायाँ टखना सीवन के वाम पार्श्व में और दायाँ टखना सीवन के दक्षिण पार्श्व भाग में स्थिर हो जाए। इसके बाद सीवन के पार्श्व भागों में स्थित पैरों का हाथों द्वारा दृढ़तापूर्वक पकड़कर स्थिर हुआ जाता है। भद्रासन विष से उत्पन्न रोगों का विनाशक है। छ. मुक्तासन— मुक्तासन की स्थिति इस प्रकार है-निपीड्य सीविनीं सूक्ष्मां दक्षिणेतरगुल्फतः। वामं याम्येन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् (जा०दर्शनो०३.८-९) अर्थात् सीवन को सूक्ष्म रेखा को बायें टखने से दबाकर, बायें टखने को दायें टखने से दबाकर बैठने की स्थिति मुक्तासन कहलाती है। इसकी दूसरी विधि इस प्रकार बतायी गई है-मेढ्रादुपरि निक्षिप्य सव्यं गुल्फं ततोपरि। गुल्फान्तरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं मुने (जा० दर्शनो० ३.९) अर्थात् उपस्थ (लिङ्ग) के ऊपर बायें टखने को स्थिर करके, बायें टखने पर दायें टखने को स्थिर करके बैठने की स्थिति भी मुक्तासन कहलाती है। ज. मयूरासन—मयूरासन की परिभाषा इस प्रकार विवेचित है-कूर्पराग्रं मुनिश्रेष्ठ निक्षिपेत्राभिपाश्वयोः॥ भूम्यां पाणितलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः। समुन्नताशिरः पादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः॥ मयूरासनमेतत्स्या-त्सर्वपापप्रणाशनम् (जा० दर्शनो० ३.१०-१२) अर्थात् दोनों हथेलियों को भूमि पर टिकाकर, कोहनियों के आगे के भाग को नाभि के दोनों पाश्वों में स्पर्श करके स्थिर चित्त होकर सिर और पादों को ऊँचा करके आकाश में दण्डवत् (पृथिवी के समानान्तर) होकर स्थित हो जाये। यह मयूर नामक आसन समस्त पापों का विनाश करने वाला है। झ. सुखासन— सुखासन का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है-येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते॥ तत्सुखासनमित्यु- क्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् (जा० दर्शनो० ३.१२-१३) अर्थात् जिस प्रकार भी बैठने से सुख और धैर्य बना रहे, वही सुखासन कहलाता है। अशक्त साधकों को इसी आसन का आश्रय लेना चाहिए। ञ. सिद्धासन— उपर्युक्त नौ आसनों के अतिरिक्त एक अन्य आसन 'सिद्धासन' भी प्रचलित है। उसकी स्थिति इस प्रकार वर्णित है-बायें पैर की एड़ी को सीवन के मध्य में मजबूती पूर्वक इस प्रकार स्थिर करके कि उसका तलवा दायें पैर की ऊरु (जंघा) को छूता हुआ हो। इसी प्रकार दायें पैर को लिङ्ग की जड़ के ऊपर इस तरह स्थापित करे कि उसका तलवा बायें पैर को जंघा का स्पर्श करे। तदुपरान्त बायें पैर के अँगुठे और तर्जनी को दायें पैर की जंघा और पिण्डली के बीच में ले ले तथा इसी तरह दायें पैर के अँगुठे और तर्जनी को बायें पैर को जंघा और पिण्डली के बीच में ले ले, यह सिद्धासन कहलाता है। कुछ ग्रन्थों में इस स्थिति में ठोड़ी को हृदय के समीप रखकर दृष्टि को भृकुटि के मध्य में स्थिर करने का वर्णन भी मिलता है। यह आसन मोक्ष कपाट का भेदन करने वाला कहा गया है-योनिस्यानकमंघ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्मेढे पादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुस्थिरम्॥ ......सिद्धासनं प्रोच्यते (हठ० प्र० १.३५)। ५२. आस्तिकता - द्र०-ज्ञानखण्ड। ५३. आहवनीय — वैदिक ग्रन्थों में अग्नियों के अनेक प्रकार वर्णित हैं। जैसे-आहवनीय अग्नि, गार्हपत्य अग्नि और दक्षिणाग्नि आदि। अथर्ववेद ९.७.१३ में इन तीनों अग्नियों की संक्षिप्त परिभाषा इस प्रकार दी गई है- योऽतिथीनां स आहवनीयो यो वेश्मनि स गार्हपत्यो यस्मिन् पचन्ति स दक्षिणाग्निः अर्थात् जिस अग्नि से अतिथियों (देवों) का आवाहन किया जाता है, वह आहवनीय, गृहस्थित अग्नि गृहपति तथा अन्नपाचन करने वाली अग्नि को दक्षिणाग्नि कहते हैं। इन्हें श्रौत अग्नियां भी कहते हैं। महाराज मनु ने गार्हपत्य अग्नि को पिता, दक्षिणाग्नि को माता तथा आहवनीयाग्नि को गुरु की संज्ञा प्रदान की है-'पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः। गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी' (मनु० २.२३१)। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श में पारिभाषिक शब्दकोश के अन्तर्गत आहवनीय कुण्ड का भी नाम है। जिसमें आहवनीयाग्नि द्वारा देवों का आवाहन किया जाता है, उसे आहवनीय खर (कुण्ड) कहते हैं, जिसका स्थान यज्ञशाला में पूर्व की ओर होता है- आहूयन्तेऽस्मिन्नाहुतयइत्याहवनीयः। गार्हपत्याग्नि का स्वरूप सात्विक है, यज्ञशाला में गार्हपत्य खर (कुण्ड) का स्थान पश्चिम की ओर होता है। दक्षिणाग्नि का स्वरूप रजोगुणी है, यज्ञशाला में इसका स्थान दक्षिण की ओर होता है। कठरुद्रोपनिषद् में भी आहवनीय, दक्षिणाग्नि और गार्हपत्य अग्नियों का उल्लेख हुआ है- ......गार्हपत्यदक्षिणा- ग्न्याहवनीयेषु अरण्यिदेशाद्भस्ममुष्टिं पिबेदित्येके (कठरुद्रो० ३)। आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और सभ्य-ये श्रौत अग्नियों तथा आवसथ्य अग्नि स्मार्त कही जाती है।

परिशिष्ट ३५७ उपरति ५४. इड़ा — द्र०-ज्ञानखण्ड-सुषुम्ना नाड़ी। ५५. इन्द्रयोनि-वेदयेानि —द्र०-कपालाष्टक। ५६. इन्द्रियाँ — द्र०-ज्ञानखण्ड- अन्तःकरण चतुष्टय। ५७. इष्ट— भारतीय धर्म ग्रन्थों में इष्ट एक बहुप्रचलित शब्द है। जिसका सामान्य अर्थ है-अभिलषित, चाहा हुआ अथवा वाञ्छनीय। वाचस्पत्यम् पृ० १९० में इष्ट की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- इष्ट त्रि० इष कर्मणि क्त। अभिलषिते, प्रिये ........। यज्ञ, संस्कार तथा एरण्ड वृक्ष आदि शब्दों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। अपने पूजित देव के लिए भी इष्ट शब्द प्रयुक्त होता है। जैसे-किसी के इष्ट देव हनुमान् जी हैं, तो किसी के गणपति और किसी के राम और कृष्ण। इच्छा के विषय में भी इस शब्द का प्रयोग कई जगह होता है, जैसे- सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् (गी०-३.१०)। ५८. ईशान—द्र०- त्र्यम्बक। ५९. ईश्वर पूजन—द्र०- नियम। ६०. उञ्छवृत्ति — द्र०- गृहस्थ। ६१. उड़्डियान बन्ध—द्र०- बन्ध। ६२. उत्तरायण — ज्योतिर्विदों ने सम्पूर्ण आकाश मण्डल को दो भागों में विभक्त किया है- १. विषुवत् (मध्य) रेखा का उत्तरीभाग, २. विषुवत् रेखा का दक्षिणी भाग। सूर्य वर्षभर में छः माह उत्तरी भाग और छः माह दक्षिणी भाग में दृश्यमान होता है। जब सूर्य मकर रेखा से उत्तर (कर्क रेखा) की ओर जाता है, तो उसे उत्तरायण कहा जाता है तथा जब सूर्य कर्क रेखा से दक्षिण (मकर रेखा) की ओर जाता है, तो उसे दक्षिणायन कहा जाता है। यह ६-६ मास का समय होता है। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार-भानोर्मकरसंक्रान्तेः षण्मासा उत्तरायणम्। सूर्य मकर संक्रान्ति से छः मास तक उत्तर की ओर रहता है, इस काल को उत्तरायण कहा जाता है। उत्तरायण में शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएँ परिगणित की जाती हैं। “शिशिरश्च वसन्तोऽपि ग्रीष्मः स्यादुत्तरायणे' (हारीत)। ६३. उदुम्बर—द्र०-वानप्रस्थ। ६४. उन्मनी अवस्था—द्र० - अमनस्क स्थिति। ६५. उन्मनी भाव—द्र०- अमनस्क स्थिति। ६६. उपदेष्टा — सामान्यतः उपदेष्टा धर्म का उपदेश करने वाले को कहते हैं, इसीलिए इसके लिए धर्मोपदेशक या उपदेशक शब्द भी प्रयुक्त होता है। वाचस्पत्यम् के अनुसार उपदेष्टा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उपदेष्टृ-पु० उप+दिश-तृच्। १. गुरौ कर्मोपदेशके २. आचार्ये अर्थात् कर्मोपदेशक और गुरु तथा आचार्य के अर्थ में उपदेष्टा शब्द का प्रयोग किया जाता है। आचार्य के अर्थ में ऋत्विजों को भी परिगणित किया गया है; क्योंकि वे यज्ञादि कर्मों में प्रत्यक्ष मार्गदर्शन (उपदेश) देते हैं। शास्त्र मान्यता है कि आचार्यों, ऋत्विजों के रूप में स्वयं भगवान् हरि ही कर्म का उपदेश प्रदान करते हैं- चत्वारो वयमृत्विजः स भगवान् कर्मोपदेष्टा हरिः" वेणी० (वाच०पृ० १२११)। भारतीय संस्कृति में उपदेष्टा की बहुत महत्ता है; क्योंकि वह जो कुछ उपदेश करता है, उसे पहले अपने जीवन में उतारता है, इसलिए वह आचरणीय होता है। इसी कारण उपदेष्टा का दूसरा नाम आचार्य है। वैसे तो गुरु को गोविन्द (ब्रह्म) से भी बड़ा बताया गया है तथा प्रणाम-अभिवादन के क्रम में गोविन्द से पहले गुरु को प्रणाम करने का परामर्श दिया गया है- गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय (कबीर); किन्तु उपदेशक की अर्चना गुरु से भी पूर्व करने का शास्त्रीय विधान मिलता है- तस्योपदेष्टारमपि पूजयेच्च ततो गुरुम् (वाच०पृ० १२११)। ६७. उपनयन—द्र०-अनुपवीत। ६८. उपरति — जीवन के चार लक्ष्यों में मोक्ष प्राप्ति अन्तिम लक्ष्य है। इसकी प्राप्ति के लिए साधक को षट्सम्पत्तियों का आश्रय लेना पड़ता है। ये षट्सम्पत्तियाँ- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान कहलाती हैं। इनमें उपरति का

उपराम ३५८ परिशिष्ट

बहुत महत्त्व है। प्रख्यात कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् के अनुसार 'उपरति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- उप+रम+क्तिन्। जिसके कई अर्थ होते हैं, जैसे-विरति (विरक्ति), मृत्यु, प्राप्त विषयों के प्रति इन्द्रियों की उदासीनता तथा विहित कर्म विधान का संन्यास की स्थिति में परित्याग (विहित कर्मणाम् विधानतस्त्यागरूपे संन्यासे "पुमर्थः कर्मणा नेति धीर्या सोपरतिर्भवेत्"-वाच०पृ० १२८३); किन्तु विषयों से वैराग्य या उनके प्रति उदासीनता के भावार्थ में ही उपरति का अधिक प्रचलन है। अध्यात्मोपनिषद् मंत्र २८ में उपरति का उल्लेख इस रूप में आया है- वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् । स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् (अध्यात्मो० २८) अर्थात् वैराग्य का प्रतिफल बोध (आत्मज्ञान) है और बोध (ज्ञान) का फल उपरति अर्थात् विषयों से विरक्ति है। (उपरति के फलस्वरूप) आत्मानन्द से जो शान्ति प्राप्त होती है, वह उस उपरति का ही फल है। अतः आसक्ति ही अशान्ति और उपरति ही शान्ति का कारण है। उपरति धारण करने वाले साधक को उपराम कहते हैं। ६९. उपराम - द्र०-उपरति। ७०. उपवीत - द्र०-अनुपवीत । ७१. उपाधि - द्र०-ज्ञानखण्ड । ७२. ऊर्ध्वपुण्ड्र - द्र०-त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड्र। ७३. ऊर्ध्वरेता - ऊर्ध्वरेता शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-ऊर्ध्वमूर्ध्वंगं नाधः पतत् रेतो यस्य अर्थात् जिसका रेतस् (वीर्य) अधोगामी न होकर ऊर्ध्वगामी हो गया हो, उसे ऊर्ध्वरेता कहा जाता है। रेतस्, पौरुष का प्रतीक है। अधिकांश लोगों का रेतस् अधोगामी होता है; किन्तु जिसके वीर्य को गति नीचे को ओर जाने से रुककर ऊर्ध्वगामी हो जाती है, वह ऊर्ध्वरेता कहलाता है-रेतो हि पुंचिह्नेन प्रायः सर्वेषामधो गच्छति यस्तस्य अधोगतिं संरुणद्धि स ऊर्ध्वरेता इत्युच्यते (वाच० पृ० १३९२)। इसलिए अखण्ड ब्रह्मचारी को भी ऊर्ध्वरेता कहा जाता है। जैसे- भीष्म, हनुमान्, सनकादिमुनि, भगवान् महादेव आदि। भीष्म (देवव्रत) ने अपने पिता शान्तनु के अभीष्ट विवाह के लिए स्वयं विवाह नहीं किया। अतः वे आजीवन ब्रह्मचारी रहने के कारण ऊर्ध्वरेता नाम से प्रख्यात हो गये। शंकर का भी एक नाम ऊर्ध्वरेता है- ऊर्ध्वरेता ऊर्ध्वलिङ्ग ऊर्ध्वशायी नभस्थलः (वाच० १३९२)। जाबाल दर्शनोपनिषद् के नवें खण्ड में भी भगवान् शंकर की स्तुति में ऊर्ध्वरेता शब्द आया है-ऊर्ध्वरेतं विश्वरूपं विरूपाक्षं महेश्वरम्। सोऽहमित्यादरेणैव ध्यायेद्योगीश्वरेश्वरम् (जा० दर्शनो० ९.२)। इस प्रकार शास्त्रों में ऊर्ध्वरेता की बहुत महिमा गायी गई है; क्योंकि अधोगामी रेतस् जहाँ कुछ ही सृजनात्मक कार्य कर पाता है, वही ऊर्ध्वगामी रेतस् से चित्त के एकाग्र होने, चिन्तन परिष्कृत होने से लेकर विभिन्न महत्त्वपूर्ण ऋद्धियों-सिद्धियों का स्वामी बना देता है। हनुमान् जैसे भक्त इसी शक्ति के सहारे 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता' बन गये थे। ७४. ऋचा - ऋचा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- ऋच्यते स्तूयतेऽनया (वाच०) अर्थात् जिससे देवों की स्तुति या अर्चना की जाती है, वह ऋचा है। सामान्य रूप से ऋचा का अर्थ स्तुति या पूजा से लिया जाता है। वैदिक मंत्रों के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है; किन्तु विशेष रूप से ऋग्वेद के मंत्रों को ऋचा कहा जाता है। डॉ० राजबली पाण्डेय ने भी हिन्दू धर्मकोश में लिखा है कि प्राचीन वैदिक काल में देवताओं के सम्मानार्थ उनकी जो स्तुति को जाती थी, उन्हें ऋक् या ऋचा कहते थे। ऋग्वेद ऐसी ही ऋचाओं का संग्रह है, इसीलिए उसका नाम ऋग्वेद पड़ा। ७५. ऋत - द्र०-ज्ञानखण्ड-ऋत-सत्य। ७६. ऋत्विक् - द्र०-ज्ञानखण्ड- ऋत्विज्। ७७. ऋषि-द्र०-ज्ञानखण्ड । ७८. एकत्व-द्र०-ज्ञानखण्ड-एकत्व-ऐक्य। ७९. एषणात्रय - द्र०-ज्ञानखण्ड । ८०. ओंकार - द्र०-ज्ञानखण्ड । ८१. कपालाष्टक - प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में योग विषयक विवेचन में कपालाष्टक शब्द का उल्लेख मिलता है। योग के आठ अंग बताये गये हैं। इन्हीं आठ अङ्गों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को

परिशिष्ट ३५९ कला कपालाष्टक भी कहते हैं। कपालाष्टक की व्याख्या करते हुए उपनिषद् व्याख्याकार ब्रह्मयोगी ने लिखा है-'कं परमसुखमसुखकामादिवृत्तिभ्यः पृथक् कृत्य पालयन्तीति कपालानि योगाङ्गानि (परब्रह्मो० २ टीका) अर्थात् 'क' से तात्पर्य परमसुख प्रदाता और कामादिवृत्तियों से उत्पन्न होने वाले असुख (कष्ट) को पृथक् करके पाल अर्थात् साधक का पालन-पोषण करने वाले कृत्य कपाल (योगाङ्ग) कहलाते हैं। इनके अष्टक की ही कपालाष्टक कहते हैं, जो कि योगदर्शन में आसन-प्राणायाम आदि आठ अङ्ग प्रख्यात हैं-तेषामष्टकं यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहा- रधारणाध्यानसमाध्यात्मकं कपालाष्टकमष्टाङ्गयोगमनुसन्धाय यथावदभ्यस्य तद्बलेन चित्तगतमालिन्यं संक्षाल्य निर्विशेषज्ञानमवाप्य कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः (परब्रह्मो० २ टीका) अर्थात् यम नियमादि अष्टाङ्ग योग अथवा कपालाष्टक का यथावत् अभ्यास करने से उत्पन्न ऊर्जा द्वारा चित्तगत मलिनता धुल जाती है, जिससे साधक निर्विशेष ज्ञान को प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाता है। इसी प्रक्रिया (कपालाष्टक-अष्टांगयोग) द्वारा हृदय स्थल में जो स्तन या कदली पुष्पवत् लटका रहता है और योग के समय ऊपर उठता हुआ विकसित होता है। इसी में वह ईश्वर जाग्रत् रहता है। इस प्रकार अपने हृदय कमल में ध्यान करने वाला शुभाशुभ से परे होकर कर्मों से निर्लिप्त हो जाता है-तदैवं कपालाष्टकं संधाय य एव स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः वेदयानिरिति। ......कर्मभिर्न लिप्यते (परब्रह्मो० २)। ८२. कर्मफल - द्र० - ज्ञानखण्ड। ८३. कर्म संन्यासी-द्र- अवधूत । ८४. कर्मेन्द्रियाँ- द्र०- ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण चतुष्टय। ८५. कला - कला एक व्यापक अर्थवाला तथा बहुप्रचलित शब्द है। वाचस्पत्यम् पृष्ठ १७८३ में कला की व्युत्पत्ति इन शब्दों में विवेचित है-कलयति कलते वा कर्त्तरि अच्, कल्यते ज्ञायते कर्मणि अच् वा अर्थात् जो किसी के कर्म अथवा स्थिति को द्योतित करती है,वह कला है। जैसे चन्द्रमा के सोलहवें भाग की उसकी एक कला कहते हैं- चन्द्रमण्डलस्य षोडशे भागे यथा च चन्द्रस्य षोडशभागस्य कला शब्द वाच्यत्वम् (वाच० पृ०१७८३)। यों तो तिथियाँ पन्द्रह होती हैं; किन्तु प्रतिपदा से चतुर्दशी तक १४ तिथियाँ दोनों पक्षों (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) में उभयनिष्ठ हैं। इनमें चन्द्रमा के घटने-बढ़ने की १४ कलाएँ होती हैं। अमावस्या और पूर्णिमा में, एक में चन्द्रमा बिल्कुल नहीं दीखता व दूसरे में पूरा दीखता है, अतः ये भी दो कलाएँ होने से १४+२=१६ कलाएँ कहलाती हैं। चन्द्रमा की सोलह कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-अमृता, मानदा, पूषा, तुष्टि, पुष्टि, रति, धृति, शशिनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्स्ना, श्री, प्रीतिरङ्गा, पूर्णा तथा स्वरजा। इसी प्रकार सूर्य की भी द्वादश कलाएँ वर्णित हैं। इन्हें द्वादशादित्य भी कहते हैं। सूर्य की कलाएँ इस प्रकार हैं-तपिनी, तापिनी, धूम्रा, मरीचि, ज्वालिनी, रुचि, सुषुम्ना, भोगदा, विश्वा, बोधिनी, धारिणी और क्षमा। वैसे कुल चौंसठ कलाएँ बतायी गई हैं; जो पूर्णतया परब्रह्म में मानी जाती हैं। वैदिक मान्यतानुसार परब्रह्म का त्रिपाद ऊर्ध्वलोकों में और एक पाद (चतुर्थांश) भूलोक (विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में) व्याप्त है (त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहा भवत्पुनः - ऋ० १०.९०.४)। इसी कारण भूलोक पर १६ कलाएँ ही विद्यमान हैं और इन्हें 'पूर्ण कला' कहा जाता है। अवतारों के विषय में भी उनकी दस कलाओं, बारह कलाओं, सोलह कलाओं का उल्लेख मिलता है, जो उनकी विशेषताओं, शक्ति व स्थिति का बोध कराती हैं। जैसे राम बारह कला के और कृष्ण सोलह कला के अवतार माने जाते हैं। वस्तुतः जीव मात्र में एक-दो कलाएँ होती हैं और जैसे-जैसे वह अपने को विकसित करता जाता है; वैसे-वैसे उसको कलाएँ भी बढ़ती जाती हैं। जैसे उद्भिज्जों-वृक्ष, लता, गुल्म आदि में एक (अन्नमय) कला होती है अर्थात् ये भोजन ग्रहण करते व विकसित होते हैं; इसी प्रकार स्वेदजों (मक्खी, मच्छर, जूँ, लीख आदि) में दो (अन्नमय व प्राणमय) कलाएँ होती हैं। अण्डजों (कबूतर, चिड़िया, तोता, मयूर आदि) में तीन (अन्नमय, प्राणमय व मनोमय) कलाएँ होती हैं। जरायुजों (घोड़ों, कुत्तों, हाथियों व गाय-भैंस आदि) में चार (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय) कलाएँ होती हैं। मानव श्रेणी उपर्युक्त जीवों के बाद की सृष्टि में गिनी जाती है। मानवों में अन्नमय, प्राणयम, मनोमय, विज्ञानमय के अतिरिक्त आनन्दमय कला भी पायी जाती है। कुछ विशिष्ट मनुष्यों में उपर्युक्त पाँच कलाओं (पंचकोशों) के अतिरिक्त तीन अन्य कलाएँ भी देखी जाती हैं। जो इस प्रकार हैं- १. अतिशायिनी कला २. विपरिणामिनी कला ३. संक्रामिणी कला। प्रथम अतिशायिनी कला के कारण ही आद्यशंकराचार्य ने दस-बारह वर्ष की अवस्था में वह कार्य कर लिया था, जो सामान्य व्यक्ति के लिए कल्पनातीत होते थे। द्वितीय विपरिणामिनी कला के द्वारा साधक अणिमा आदि आठ सिद्धियों के माध्यम से शरीर को हल्का-भारी,

कल्पान्त ३६० परिशिष्ट छोटा-बड़ा करके परकाया प्रवेश भी कर सकते हैं। तृतीय संक्रामिणी कला के द्वारा साधक अपनी शक्ति दूसरों में भी प्रविष्ट कर सकते हैं, जैसे रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानन्द में शक्तिपात किया था और योगेश्वर कृष्ण ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। उपर्युक्त कलाएं मानवों तक सीमित हैं, इसके ऊपर की ९ से १६ तक की कलाएँ देवों व अवतारों में होती हैं। पूर्णकलाएँ १६ मानी गई हैं अर्थात् पूर्ण अवतार षोडश कलायुक्त होता है। देवों-अवतारों की ८ कलाएँ इस प्रकार हैं- १. प्रभ्वी २. कुण्ठिनी ३. विकासिनी ४. मर्यादिनी ५. संहादिनी ६. आह्लादिनी ७. परिपूर्ण ८. स्वरूपावस्थिति। इनमें प्रभ्वी का अर्थ ईश्वर की उस परिभाषा से सम्बन्धित है, जिसमे उन्हें 'कर्तुं अकर्तुं अन्यथाकर्तुं समर्थं प्रभु' कहा गया है अर्थात् असम्भव को भी संभव कर दिखाना-जैसे खम्भे में से नृसिंह अवतार। कुण्ठिनी कला से पंचमहाभूत या विषादि को प्रभावरहित किया जा सकता है, जैसे शिव ने विष प्रभाव कम करके ही हलाहल पान किया था। विकासिनी कला के द्वारा ही भगवान् वामन ने तीन पगों में समूचे ब्रह्माण्ड को नाप लिया था। मर्यादिनी कला के द्वारा श्रीराम सर्वशक्ति सम्पन्न होते हुए भी मर्यादाओं में बँधे रहे व मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। संहादिनी कला से भगवान् कृष्ण ने अनृतु में फूल-फल आदि उत्पन्न करके प्रकृति के नियम में हस्तक्षेप कर दिया था। आह्लादिनी कला से ही राधिका ने नित्य कृष्ण जी के साथ रहकर उनका अनुरञ्जन किया था। स्वरूपावस्थिति कला के द्वारा सम्पूर्ण कलाओं की समेट कर अपने मूलरूप में अवस्थित हुआ जा सकता है, जैसे-द्वापर में श्री कृष्ण जी ने अपनी सभी कलाओं को समेटकर मूल रूप में धारण किया था, जिससे उन्हें पूर्ण अवतार माना जाता है। उपर्युक्त कलाओं के अतिरिक्त अन्य भी लौकिक कलाएँ हैं, जैसे-वास्तुकला, चित्रकला, हस्तकला, काष्ठकला, स्थापत्यकला, वक्तृताकला, संगीतकला, नृत्यकला आदि। ८६. कल्पान्त - भारतीय कालगणना के क्रम में 'कल्प' का उल्लेख किया जाता है। यह एक बहुत लम्बी अवधि होती है। सृष्टि का कालचक्र चार युगों में विभक्त है। सतयुग (कृतयुग), त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। इनमें सतयुग की अवधि १७,२८,००० वर्ष, त्रेतायुग की १२,९६,००० वर्ष, द्वापरयुग की ८,६४,००० वर्ष तथा कलियुग की अवधि ४,३२,००० वर्ष मानी गई है। चारों युगों की सम्मिलित अवधि ४३,२०,००० वर्ष की एक चतुर्युगी कहते हैं। इस प्रकार की एक सहस्र चतुर्युगी का ब्रह्माजी का एक दिन और इतनी ही बड़ी एक रात्रि होती है। एक हजार चतुर्युगी अथवा ब्रह्मा का एक दिन 'कल्प' कहलाता है। तदुपरान्त प्रलय की स्थिति आती है, जिसमें सब कुछ विनष्ट हो जाता है। इस अवधि को कल्पान्त कहते हैं। इस प्रकार कल्प का साधारण अर्थ हुआ सृष्टि रचना से लेकर उसके विनाश तक का समय। विद्वानों का कहना है कि अब तक ब्रह्माजी के ५० वर्ष बीत चुके हैं, ५१ वाँ वर्ष चल रहा है, जिसके तीन युग बीत चुके हैं, चौथा चल रहा है। युगों की काल-गणना के अनुसार एक कल्प की अवधि चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष मानी जाती है। एक अन्य मान्यता के अनुसार कलियुग की आयु १२०० वर्ष, द्वापर २४०० वर्ष, त्रेता की ३६०० वर्ष और सतयुग की आयु ४८०० वर्ष है। इस प्रकार एक चतुर्युगी १२००० वर्षों की हुई तथा ७१ चतुर्युगी का एक मन्वन्तर तथा १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है। अस्तु, १४ मन्वन्तरों के समापन की अवधि कल्पान्त कहलाती है। ८७. कामना - द्र०-ज्ञानखण्ड-षड्रिपु-षड्वर्ग। ८८. कुटीचक - द्र० - अवधूत। ८९. कुण्डलिनी- भारतीय योग शास्त्रों में कुण्डलिनी महाशक्ति का बहुत महत्त्व है। कहते हैं कि यदि किसी साधक की कुण्डलिनी जाग जाये, तो वह सभी ऋद्धियों-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। तांत्रिक मतानुसार इसे परमेश्वर की वह पराशक्ति कहा गया है, जो प्रत्येक जीव के शरीर में प्रसुप्तावस्था में रहती है। यह मनुष्य देह में मेरुदण्ड से नीचे मूलाधार (गुदा और उपस्थ के मध्य स्थित चक्र) में कुण्डली मारकर सर्पिणी की तरह स्थित है, इसीलिए इसका नाम कुण्डलिनी पड़ा है। तन्त्रसार में इसे एक देवी माना गया है, जो षट्चक्रों के अन्तर्गत मूलाधार में सूक्ष्म रूप से निवास करती है। कुण्डलिनी के सन्दर्भ में उल्लेख है कि वह स्वयम्भू लिङ्ग में साढ़े तीन चक्कर लगाये देवी रूप (सर्पिणी रूप) में प्रतिष्ठित है। करोड़ों विद्युतप्रभा के प्रकाश की तरह देदीप्यमान तथा उदीयमान सूर्य की कान्ति वाली उस कुण्डलिनी का ध्यान करते हुए साधक दृढ़ासन पर बैठकर श्वासोच्छ्वास प्रक्रिया (प्राणायाम) द्वारा प्राण मन्त्र (गायत्री मन्त्र) से उसे उठाकर (जाग्रत् करके) मन की एकाग्रता तथा सम्पूर्ण शुभ-शान्ति प्राप्त करते हैं-ध्यायेत् कुण्डलिनीं सूक्ष्मां मूलाधारनि- वासिनीम्। तामिष्टदेवतारूपां सार्द्धत्रिवलयान्विताम् ॥ कोटिसौदामिनीभासां स्वयम्भूल्लिङ्गवेष्टिनीम्। तामुत्थाप्य महादेवीं प्राणमन्त्रेण साधकः ॥ उद्यद्दिनकरद्योतां ..... चिन्तयेत् (श०क० खण्ड २, पृ० १४०) !

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परिशिष्ट ३६१ कैवल्य विवेक मार्तण्ड में कुण्डलिनी शक्ति का स्वरूप इस प्रकार विवेचित है कि वह कुण्डलिनी देदीप्यमान सर्पाकार कमल नाल के समान शुभ प्रतिफल प्रदान करने वाली है, जो योगविद्या के जानकारों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली तथा इस विद्या से अनभिज्ञ व्यक्तियों के लिए बन्धन का कारण है। मानवी काया में कन्दस्थल (उपस्थ के ऊपर और नाभि से नीचे स्थित नाड़ियों का गुच्छक) के ऊपर अष्टप्रकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति वलयाकार में ब्रह्मरंध्र के द्वार को अपने मुख से आच्छादित किए (रोके) हुए प्रसुप्तावस्था में है। साधक हठयोग, प्राण साधना द्वारा उस कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत् करके मानो मोक्ष प्राप्ति के द्वार ब्रह्मरंध्र में लगे ताले को ताली (चाभी) द्वारा खोलता है-प्रस्फुरद् भुजगाकारा पद्मतन्तुनिभा शुभा। मूढानां बन्धिनी सास्ति योगिनां मोक्षदायिनी ॥ कन्दोर्ध्वं कुण्डली शक्तिरष्टधा कुटिलाकृतिः । ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति ॥ येन मार्गेण .......................मोक्षद्वारं प्रभेदयेत् (वि०मार्त० ५२-५६)। जाबाल दर्शनोपनिषद् में कुण्डलिनी का स्वरूप इस प्रकार प्रतिपादित है- नाभिकन्दादधः स्थानं कुण्डल्या द्वयङ्गुलं मुने । अष्टप्रकृतिरूपा सा कुण्डली मुनिसत्तम (जा०दर्शनो० ४.११) अर्थात् नाभि स्थल से दो अंगुल नीचे अष्ट प्रकृति (पृथिवी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) से युक्त वह कुण्डलिनी शक्ति निवास करती है। कुण्डलिनी शक्ति के सन्दर्भ में महायोग विज्ञान में उल्लेख है कि जिसकी मूलाधार शक्ति प्रसुप्त है, उसका सारा संसार प्रसुप्त है; जिसकी कुण्डलिनी जगी, समझना चाहिए कि उसका भाग्योदय हो गया है। योगिनी तंत्र के अनुसार कुण्डलिनी के जागते ही अन्तराल में छिपा वैभव अनायास ही दृष्टिगोचर होने लगता है। कुण्डलिनी जाग्रत् कर लेने वाले साधक के लिए जगत् में कुछ भी असंभव नहीं। ९०. कूटस्थ — द्र०-ज्ञानखण्ड। ९१. कृच्छ्र चान्द्रायण — कृच्छ्र शब्द का सामान्य अर्थ कष्टसाध्य या कठिनाई से प्राप्त होने वाला है। शारीरिक तप या प्रायश्चित्त के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। चन्द्रमा की कलाओं के साथ जो कष्टसाध्य प्रायश्चित्त तप किया जाता है, उसे कृच्छ्र चान्द्रायण कहते हैं। प्रायश्चित्त के अतिरिक्त यह व्रत धर्म संचय के लिए भी किया जाता है। चान्द्रायण व्रत में चन्द्र कलाओं के बढ़ने एवं घटने के अनुरूप भोजन ग्रहण किया जाता है। प्राचीन काल से ही चान्द्रायण व्रत दो प्रकार से किए जाते हैं, यवमध्य (जौ के समान बीच में मोटा एवं दोनों छोरों में पतला) एवं पिपीलिका मध्य (चींटी के समान बीच में पतला एवं दोनों छोरों में मोटा) मनु० (११.२७), याज्ञ० स्मृ० (३.३२३), वसिष्ठ स्मृ० (२७.२१), बौधा० ध०सू०(४.५.१८) आदि में चान्द्रायण व्रत (यवमध्यप्रकार) की परिभाषा इस प्रकार दी है- मास के शुक्ल पक्ष से प्रथम दिन एक ग्रास (कौर) भोजन किया जाता है, दूसरी तिथि को दो ग्रास, तीसरी तिथि को तीन ग्रास और इसी प्रकार बढ़ते-बढ़ते पूर्णिमा के दिन १५ ग्रास भोजन ग्रहण किया जाता है। तत्पश्चात् कृष्ण पक्ष के प्रथम दिन १४ ग्रास, दूसरे दिन १३ ग्रास, इस प्रकार एक-एक ग्रास कम करते-करते कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को एक ग्रास खाया जाता है और अमावस्या के दिन निराहार रहकर पूर्ण उपवास किया जाता है। दूसरी विधि (पिपीलिका मध्य) में यदि कोई कृष्ण पक्ष की प्रथम तिथि को व्रत आरम्भ करता है, तो वह एक- एक ग्रास कम करते हुए प्रथम दिन में केवल १४ ग्रास, फिर १३ ग्रास, फिर बारह ग्रास खाता है, इसी प्रकार ग्रासों में कमी करते हुए कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को केवल एक ग्रास खाता है तथा अमावस्या को एक ग्रास भी नहीं लेता। इसके उपरान्त शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन एक ग्रास लेता है और इस प्रकार बढ़ाता-बढ़ाता पूर्णमासी के दिन १५ ग्रास खाता है। इस प्रकार ये दो प्रकार के कृच्छ्र चान्द्रायण व्रत होते हैं। कृच्छ्र चान्द्रायण के सन्दर्भ में आश्रमोपनिषद् में संन्यासियों की आचार संहिता के क्रम में हंस (संन्यासियों का एक प्रकार) के विषय में उल्लेख है कि वह एक दण्ड धारण करने वाले, शिखा विहीन, यज्ञोपवीतधारी, हाथ में शिक्य (छींका) और कमण्डलु धारण करने वाले, ग्राम व शहर में निर्धारित रात्रियों तक ही विश्राम करने वाले होते हैं। वे कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत सम्पन्न करके आत्मा की प्रार्थना अर्थात् आत्म दर्शन का प्रयास करते हैं- हंसा एक दण्डधराः शिखा वर्जिता ... कृच्छ्र चान्द्रायणादि चरन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० ४)। ९२. कैवल्य — हिन्दी विश्वकोश में कैवल्य शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार विवेचित है- केवलस्य औपाधिक सुखदुःखादि रहितस्य चित्स्वरूपस्य भावः अर्थात् उपाधि रूप सुख-दुःख रहित चैतन्य स्वरूप स्थिति कैवल्य है। जब व्यक्ति को विवेक का साक्षात्कार हो जाता है, तो अहंकार स्वतः ही मिट जाता है। फिर ऐसा नहीं लगता कि मैं कर्त्ता, सुखी व दुःखी हूँ। अहंकार विनष्ट हो जाने पर उसके कार्यरूप राग-द्वेष, धर्म और अधर्म आदि भी उत्पन्न नहीं हो सकते। प्रारब्ध कर्म धीरे-धीरे मिट जाते हैं और अविद्या न रहने से फिर नया संस्कार नहीं बनता तथा संस्कार के अभाव में पुनर्जन्म नहीं

क्षेत्रपाल ३६२ परिशिष्ट होता। वर्तमान शरीर का अवसान होने पर आत्मा चित् स्वरूप में अवस्थित हो जाती है। इसी अवस्था को कैवल्य कहते हैं। पातञ्जल योग सूत्र के अनुसार पुरुषार्थ से शून्य हुए गुण, जब अपने कारण में विलीन हो जाते हैं, तब उस स्थिति को कैवल्य कहते हैं अथवा चिति-शक्ति का अपने वास्तविक स्वरूप (चैतन्य स्वरूप) में प्रतिष्ठित हो जाना ही कैवल्य है। व्यक्ति त्रिगुणातीत हो जाता है, उसकी यही स्थिति कैवल्य है- पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तेरिति (पातं० यो० सू० ४/३४)। सांख्य दर्शन के अनुसार दुःख की ऐकान्तिक और आत्यन्तिक निवृत्ति ही कैवल्य है- आत्यन्तिको दुःख त्रयाभावः कैवल्यम्। हिन्दी विश्वकोश में वर्णित जैन मान्यता के अनुसार कैवल्य अवस्था मुक्ति से पूर्व होती है। ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय-ये चार कर्म विनष्ट हो जाने पर आत्मा का 'केवल' (विशुद्ध) ज्ञान प्राप्त होता है, तब समस्त पदार्थों के सभी पर्यायों को यह जीव जान जाता है (तत्त्वार्थ सूत्र टीका)। अध्यात्मोपनिषद् (१६) में कैवल्यावस्था इन शब्दों में निरूपित है- जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहोऽपि स केवलः। समाधिनिष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ अर्थात् जो जीवित स्थिति में ही कैवल्य-स्थिति (ब्रह्मनिष्ठा) प्राप्त कर चुका हो, वह विदेह (देहरहित) हो जाने पर ब्रह्मरूप हो जायेगा। इसलिए हे पापरहित ! समाधिनिष्ठ होकर निर्विकल्प बनो। इस प्रकार जीवित रहते हुए समस्त संकल्प-विकल्पों एवं गुणों से रहित होकर केवल ब्रह्म में ही समाहित हो जाना (ब्रह्मनिष्ठ हो जाना) कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेना है। ९३. क्षेत्रपाल— तैंतीस कोटि देवों में क्षेत्रपाल देवता को भी परिगणित किया जाता है। सामान्यतः क्षेत्रपाल से तात्पर्य क्षेत्ररक्षक अथवा खेत का रखवाला होता है- क्षेत्रं पालयति रक्षति (हि०वि०को० खंड ५ पृ० ६२५)। प्रयोग सार में क्षेत्रपाल के ४९ भेद वर्णित हैं। जैसे-अजर, आपकुन्त, इन्द्रस्तुति, ईड़ाचार, उक्त, उन्माद और ऋषिसूदन आदि। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार-'क्षेत्रपाल शिव के अनुचर हैं।' कार्तवीर्य को भी क्षेत्रपाल कहते हैं (मत्स्य पु० ४३.२७, वा०पु० ९४.२४)। शास्त्रों में यज्ञादि देव कार्यों में भी यज्ञ की रक्षार्थ क्षेत्रपालों को आबाहित करने का विधान है-क्षेत्रपालाग्नमस्यामि सर्वारिष्टनिवारकान्। अस्य यागस्य सिद्धयर्थं पूजयाराधितान् मया (कर्म०भा०)। क्षेत्रपाल के तीन नेत्रों का उल्लेख मिलता है। इनका वर्ण नीलगिरि की तरह है। उनके मस्तक पर शुभ्र चन्द्र और सिर पर जटायें हैं। इनके चार हाथ हैं, जिनमें गदा, कपाल, रक्तवर्ण की पुष्पमाला और गन्धवस्त्र हैं। उनके कानों में सर्पकुण्डल हैं। क्षेत्रपाल की अर्चना से कान्ति, मेधा, बल, आरोग्य, तेज, पुष्टि, यश और सम्पत्ति आदि की वृद्धि होती है। समस्त प्रमुख पुण्य क्षेत्रों में एक-एक क्षेत्रपाल होते हैं, उनकी विधिवत् पूजा सम्पन्न होती है। कुमायूँ क्षेत्र में क्षेत्रपाल को कहीं भूमिया और कहीं स्वयम्भू कहते हैं। ९४. खेचरी मुद्रा— द्र०-मुद्रा। ९५. गायत्र— द्र०- ब्रह्मचारी। ९६. गार्हपत्य— द्र०- आहवनीय। ९७. गुरु— द्र०- ज्ञानखण्ड- गुरु-शिष्य। ९८. गुरुकुल— द्र०- ज्ञानखण्ड-गुरु-शिष्य। ९९. गृहस्थ— आश्रम धर्म के अनुसार चार आश्रमों में ब्रह्मचर्य के बाद दूसरा आश्रम गृहस्थ कहलाता है। लक्ष्य की दृष्टि से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से इस आश्रम में अर्थ और काम (कामनाओं) की प्राप्ति (पूर्ति) की जाती है। इसे भी २५ वर्ष का माना गया है। इसमें व्यक्ति घर में रहकर पत्नी समेत अपने कुटुम्ब का पालन-पोषण करता है। गरुड़ पुराण के अनुसार परिवार का नियमपूर्वक पालन-पोषण करता हुआ गृहस्थ साधक स्वाध्याय द्वारा ऋषि ऋण, यज्ञादि द्वारा देव ऋण और सन्तानोत्पादन (अथवा आश्रितों के परिपालन) द्वारा पितृऋण से मुक्त होता है। गृहस्थों के चार भेद हैं- वार्ताकवृत्ति, शालीनवृत्ति, यायावर और घोर संन्यासिरु। आश्रमोपनिषद् में इसका उल्लेख इन शब्दों में उपलब्ध है- गृहस्था अपि चतुर्विधा भवन्ति वार्त्ताकवृत्तयः शालीनवृत्तयो यायावरा घोर- संन्यासिकाश्चेति। वार्त्ताकवृत्ति गृहस्थ वे कहलाते हैं, जो कृषि एवं पशुपालन आदि आनन्दित व्यापार करते हुए सौ वर्ष तक यज्ञादि (जीवन यज्ञ) करते हुए आत्म उपासना (जीवन देवता की साधना-आराधना) करते हैं-तत्र वार्त्ताकवृत्तयः

परिशिष्ट ३६३ चातुर्मास्य ......आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० २)। शालीनवृत्तिगृहस्थ उन्हें कहा जाता है, जो स्वयं तो यज्ञादि कृत्य सम्पन्न करते हैं; पर दूसरों की वह क्रिया सम्पन्न नहीं कराते। स्वयं तो अध्ययन करते हैं, पर कराते नहीं; इसी प्रकार स्वयं दान देते हैं, पर दूसरों से दान-दक्षिणा ग्रहण नहीं करते। इस प्रकार सौ वर्ष यज्ञादि सम्पन्न करते हुए आत्म साधना करते हैं। यायावर गृहस्थ वे हैं, जो स्वयं तो यज्ञादि करते ही हैं, दूसरों की भी कराते हैं; स्वयं भी अध्ययन करते हैं व दूसरों को भी तथा स्वयं (श्रेष्ठ कार्यों के निमित्त) दानादि ग्रहण करते हैं और लोकोपयोगी कार्यों के लिए दूसरों को भी दान देते हुए सौ वर्ष तक यज्ञीय जीवन जीकर आत्म प्रार्थना (आत्मा की साधना) करते हैं-यायावरा यजन्तो याजयन्तोऽधीयाना नाध्यापयन्तो ददतो न प्रतिगृह्णन्तः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो०२)। घोर संन्यासिक गृहस्थ उन्हें कहा जाता है, जो पवित्र जल द्वारा दैनिक कृत्य सम्पन्न करते हुए, उञ्छवृत्ति (खेतों में अवशिष्ट अनाज द्वारा आजीविका चलाना) अपनाकर अकिञ्चनवत् अपना निर्वाह करते हुए, सौ वर्ष तक यज्ञीय जीवन जीते हुए आत्म साधना करते हैं- घोरसंन्यासिका उद्धृतपरिपूताभिरद्भिः कार्यं कुर्वन्तः प्रतिदिवसमाहतोञ्छ- वृत्तिमुपयुञ्जानाः शतसंवत्सराभिः क्रियाभिर्यजन्त आत्मानं प्रार्थयन्ते (आश्रमो० २)। इस प्रकार स्थिति भेद से गृहस्थों के ये चार प्रकार होते हैं। १००. घोर संन्यासिक — द्र०- गृहस्थ। १०१. चतुर्दश भुवन— सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन माने गये हैं, जिन्हें चतुर्दश भुवन भी कहा गया है। संस्कृत हिन्दी कोश पृ० ७४५ में इसकी पुष्टि इन शब्दों में की गई है- इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते (भर्तृ०३.२३)। चतुर्दश भुवन से तात्पर्य चौदह लोकों से है। चौदह लोकों में से सात लोक ऊपर हैं एवं सात लोक नीचे हैं। ऊपर के लोकों की ऊर्ध्व लोक अथवा स्वर्गलोक कहते हैं। नीचे के लोकों की अधोलोक अथवा पाताल लोक कहते हैं। हि०वि० कोश में सात स्वर्ग अथवा ऊर्ध्वलोक इस प्रकार हैं- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्। अधोलोक अर्थात् पाताल लोक इस प्रकार हैं- अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। भारतीय संस्कृति कोश के अनुसार अतल लोक वह है, जिसकी मिट्टी कृष्णवर्णा हैं तथा जहाँ मय दानव का पुत्र अपनी माया की सृष्टि रचते हुए निवास कर रहा है। वितल लोक में शंकर और पार्वती का निवास बताया गया है। सुतल लोक में राजा बलि रहते हैं, यहाँ की मिट्टी रक्तवर्णा है। तलातल लोक में दानवराज मय का निवास है, यहाँ की मिट्टी पीतवर्णा है। महातल लोक में काद्रवेय सर्पों का निवास स्थल है, जहाँ की मिट्टी मीठी बतायी जाती है। रसातल लोक में ऐसे दैत्य-दानव आदि निवास करते हैं, जो देवराज इन्द्र से भयभीत रहते हैं। यहाँ की मिट्टी पथरीली है। पाताल लोक वासुकि सहित विशालकाय सर्पों का निवास स्थल है, जहाँ की भूमि स्वर्णमयी है। इस प्रकार नीचे के ये सात लोक हैं। उपनिषदों में इहलोक और परलोक दो ही लोक माने गये हैं, जबकि वेदादि में पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये तीन लोक वर्णित हैं। १०२. चरु — 'चरु' शब्द वैदिक काल से ही प्रचलित है। प्राचीन काल में यज्ञीय पदार्थों (हविष्यान्न) की निर्मित करने के पात्र विशेष के रूप में सम्भवतः कड़ाही के रूप में इसका प्रयोग किया जाता था। ऋग्वेद और अथर्ववेद में चरु का कई बार उल्लेख हुआ है। यथा-स नो वृषन्नमुं चरुं सत्रादावन्नपा वृधि। अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः (ऋ० १.७.६)। इस प्रकार अथर्ववेद में भी चरु का वर्णन इन शब्दों में संप्राप्य है- उत्क्रामातः परि चेदतमस्तस्ताञ्च्छरोरधि नाकं तृतीयम् (अथर्व० ९.५.६)। पात्र विशेष के रूप में 'चरु' शब्द का इतना प्रयोग हुआ कि बाद में उसमें पकाये जाने वाले हविष्यान्न को ही 'चरु' कहने लगे और हविष्यान्न के अर्थ में ही चरु शब्द रूढ़ हो गया। इसीलिए हिन्दी विश्वकोश में इस शब्द की व्युत्पत्ति में लिखा है-चर्यते भक्ष्यतेऽग्न्यादिभिः । यद्वा चरति होमादिकम् अर्थात् हव्यान्न अथवा होम के लिए पाक किया जाने वाला अन्न। चरु (विशिष्ट प्रकार का हविष्यान्न), जिसमें तण्डुल (चावल) की प्रमुखता रहती है, के निर्माण की विधि बहुत लम्बी हैं. जिसका सम्पूर्ण उल्लेख स्थानाभाव के कारण यहाँ सम्भव नहीं हैं। इसे कात्यायन श्रौत सूत्र ४.१.६.७ में देखा जा सकता है। 'श्रौत पदार्थ निर्वचनम्' नामक ग्रन्थ में भी चरु का उल्लेख पक्व तण्डुल के रूप में मिलता है- ते च परिपक्कास्तण्डुलाः चरुपदवाच्याः (श्रौ०प०नि० पृ० १९)। उपनिषद् ग्रन्थों में भी चरु का वर्णन आया है। कठरुद्रोपनिषद् के संन्यास प्रकरण में चरु का उल्लेख द्रष्टव्य है- द्वादशरात्रस्यान्तेऽग्नये वैश्वानराय प्रजापतये च प्राजापत्यं चरुं, वैष्णवं त्रिकपालं अग्निम् (कठरुद्रो० ३)। १०३. चातुर्मास्य — द्र०-ज्ञानखण्ड -चातुर्मास्य-आग्रयण।

चान्द्रायण व्रत ३६४ परिशिष्ट १०४. चान्द्रायण व्रत- द्र०- कृच्छ्र चान्द्रायण। १०५. चित्त शुद्धि- द्र०-ज्ञानखण्ड -चित्त। १०६. चिदात्मा- द्र०-चिद्घन। १०७. चिदानन्द- द्र०-चिद्घन। १०८. चिद्घन-परमात्मा को सत्, चित् और आनन्दस्वरूप कहते हैं। तीन तत्त्वों सत् (सत्य), चित् (चैतन्यता) और आनन्द (परम सुख-आन्तरिक सुख) की सघनता के कारण ही उसे सद्घन, चिद्घन और आनन्दघन कहते हैं। इसीलिए उपर्युक्त गुणों से युक्त ईश्वर को समस्तपद के रूप में सच्चिदानन्दघन कहते हैं। अध्यात्मोपनिषद में इसी तथ्य का उल्लेख इन शब्दों में है-परिपूर्णमनाद्यन्तमप्रमेय........... विक्रियम्। सद्घनं चिद्घनं नित्यमानन्दघनमव्ययम् (अध्यात्मो० ६१) अर्थात् उस परब्रह्म को परिपूर्ण, आदि और अन्त से रहित, परिमाप रहित, विकार शून्य, सन्मय (सद्घन,) चिन्मय (चिद्घन), नित्य आनन्दमय (नित्य और आनन्दघन) तथा अविनाशी कहा गया है। कई अन्य विशेषताओं के कारण उस परमात्मा के और भी कई नाम हैं। जैसे- चैतन्य स्वरूप होने के कारण उसे चिदात्मा कहते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है- चित् चैतन्यमात्मा स्वरूपमस्य (हि०वि०को०ख०६, पृ० ३९१) अर्थात् चैतन्य स्वरूप परब्रह्म ही चिदात्मा है। चैतन्य रूप होने से ही उसे चैतन्य व चिद्रूप भी कहते हैं। चैतन्य और आनन्द स्वरूप होने से उसे ही चिदानन्द कहते हैं। चित् शब्द में मयट् प्रत्यय लगने से उस परमेश्वर को चिन्मय अर्थात् ज्ञानमय कहते हैं। निर्दोष, माया से रहित और विकाररहित होने के कारण उस ब्रह्म को ही निरञ्जन तथा निर्विकार कहते हैं- निरञ्जनो निर्विकारः ............नास्ति (आत्मो० १-घ)। कलाओं से रहित अथवा कलातीत होने के कारण उस ईश्वर को ही निष्कल कहते हैं- तेनेदं निष्कलं ......पञ्चभिः (ब्रह्मविद्यो० १७)। श्रेष्ठ (परम) पुरुष होने के कारण उस ब्रह्म को ही परम अथवा पुरुषोत्तम भी कहते हैं। ज्योतिस्वरूप होने के कारण उसे ही परम-ज्योति कहते हैं। प्राचीनतम होने के कारण उस ईश्वर को ही पुराण पुरुष तथा सम्पूर्ण सृष्टि का मूल तत्त्व होने से उसे ही परम तत्त्व कहते हैं। इसी तरह सबसे परे अथवा परे से भी परे होने के कारण उस परब्रह्म का एक नाम 'परात्पर' भी है। परमात्मा के उपर्युक्त गुणों का निरन्तर चिन्तन करते रहकर सतत आनन्दित रहने वाले परमात्म भाव में स्थित रहते हैं। इस प्रकार उस एक ही परब्रह्म के ये अनेक नाम हैं। १०९. चिन्मय- द्र०-चिद्घन। ११०. चैतन्य- द्र०-चिद्घन। १११. जगत्- द्र०-ज्ञानखण्ड। ११२. जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति- द्र०-ज्ञानखण्ड। ११३. जालन्धर बन्ध- द्र०-बन्ध। ११४. जितेन्द्रिय - धर्म पथगामी मुमुक्षु के लिए जितेन्द्रिय होना आवश्यक है। जितेन्द्रिय का सामान्य अर्थ है-इन्द्रियों को जीत लेने वाला अथवा इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने वाला। प्रख्यात संस्कृत कोश ग्रन्थ वाचस्पत्यम् में जितेन्द्रिय इन शब्दों में परिभाषित है-जितानि वशीकृतानीन्द्रियाणि येन अर्थात् जिसके द्वारा समस्त इन्द्रियाँ वश में कर ली गई या जीत ली गई हैं, वह जितेन्द्रिय है। महाराज मनु ने इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-श्रुत्वा स्पृष्ट्वाथ दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः। न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः (वाच०पृ० ३१२०)। इसका अभिप्राय है, किसी भी प्रकार का विषय सुनकर, कुछ भी स्पर्श करके, कुछ भी देखकर, कुछ भी भक्षण करके तथा कुछ भी सूंघ कर जो व्यक्ति न तो हर्षित होता है और न ही ग्लानि अनुभव करता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिए। महर्षि पतञ्जलि के योग दर्शन में इस विषय में उल्लेख है कि आत्म शुद्धि हो जाने पर सत्त्वगुण प्रकट होता है, तब रजोगुण और तमोगुण नहीं आ सकते। कारण-कार्य न्याय से चित्त शुद्धि हो जाने पर रज और तम सत्त्वगुण से प्रभावित हो जाते हैं, जिससे वे चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने रूप कार्य को नहीं कर पाते; वरन् सत्त्वगुण को सहायता करके हर विषय में अनासक्ति पैदा कर देते हैं, जिससे न किसी से राग होता है, न द्वेष या क्षोभ। निश्चित विषय (ईश्वर) में चित्त अनुरक्त होने के कारण अन्य विषयों (श्रोत्रादि इन्द्रियों के विषयों) में मन नहीं रमता, जिससे इन्द्रियाँ पराजित हो जाती हैं। इस जितेन्द्रिय स्थिति के प्राप्त हो जाने पर आत्म दर्शन और मोक्ष का पथ प्रशस्त होता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् (३.३८) में भी उपर्युक्त मनु कथित

परिशिष्ट ३६५ तुर्यावस्था श्लोक की तरह ही कुछ पाठ भेद से जितेन्द्रिय की परिभाषा उल्लिखित है- श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च भुक्त्वा च ... जितेन्द्रियः। ११५. ज्ञान-वैराग्य-संन्यासी- द्र०-अवधूत। ११६. ज्ञान-संन्यासी-द्र०-अवधूत। ११७. ज्ञानाग्नि - ज्ञान और अग्नि दो शब्दों का समस्त पद ज्ञानाग्नि है, जिसका सामान्य अर्थ है-ज्ञान की अग्नि अथवा ज्ञानरूपी अग्नि। जिस प्रकार अग्नि का कार्य जलाकर भस्म कर देना है, उसी प्रकार ज्ञानाग्नि अज्ञान जनित विकारों को जलाकर भस्म कर देती है। श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेख है कि जिसके सभी कार्य कामना और संकल्प से रहित हो जाते हैं, उसके सभी कर्म (प्रारब्ध कर्म) ज्ञानाग्नि से दग्ध हो जाते हैं। ऐसे उस पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं- यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः (गी० ४.१९)। वेदान्त दर्शन में जीवन्मुक्त की स्थिति के सन्दर्भ में विवेचन है कि ज्ञानरूप ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर अज्ञान और अज्ञान द्वारा संचित कर्म-संशय, विपर्यय आदि बाधित हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति समस्त बन्धनों से रहित होकर जीवन्मुक्त हो जाता है-अथ जीवन्मुक्तलक्षणमुच्यते। जीवन्मुक्तो नाम स्वरूपाखण्ड ब्रह्मज्ञा- नेन.......साक्षात्कृतेऽज्ञानतत्कार्य सञ्चित कर्मसंशयविपर्ययादीनामपि बाधितत्वादखिल बन्धरहितो ब्रह्मनिष्ठः (वे०सा० खं०-३४)। मुण्डक उपनिषद में भी ब्रह्मज्ञानरूप ज्ञानाग्नि द्वारा कर्मों के विनष्ट होने तथा हृदयग्रन्थि के खुल जाने से समस्त संशयों के विनष्ट होने का वर्णन है-भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्व संशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे (मुण्डको० २.२.८)। ब्रह्मविद्योपनिषद में ज्ञानाग्नि को ध्रुवाग्नि भी कहा गया है; क्योंकि ध्रुव (स्थिर) ज्ञानरूपी अग्नि का प्राकट्य हो जाने के बाद अज्ञान जनित समस्त विकार विनष्ट हो जाते हैं। स्व अज्ञान एवं उसके कार्यरूप प्रपञ्च के रूई के समान पर्वत (अम्बर) को जला देने में ज्ञानाग्नि ही सक्षम है, इसलिए इसे ध्रुवाग्नि कहा गया है-स्वाज्ञान तत्कार्य स्वातिरिक्त प्रपञ्चतुलाचलभस्मीकरणपटुत्वात् ध्रुवाग्निः ...............प्रचक्षते (ब्रह्मविद्यो० १ ब्रह्म० भा०)। ११८. ज्ञानेन्द्रियाँ - द्र०-ज्ञानखण्ड-अन्तःकरण-चतुष्टय। ११९. तत्त्वमसि - द्र०-ज्ञानखण्ड - महावाक्य । १२०. तप- द्र०-ज्ञानखण्ड -नियम। १२१. तारक ब्रह्म-तारक मन्त्र - उपनिषदों में तारक ब्रह्म और तारक मंत्र की महत्ता प्रतिपादित को गई है। अथर्वशिखोपनिषद् में तारक को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है- .........सर्वेभ्यो दुःखभयेभ्यः संतारयतीति तारणात्तारः (अथर्वशिख० २.१) अर्थात् जो समस्त दुःखों और भयों से मुक्त कर दे, वही तारक है। इसी प्रकार अथर्वशिर उपनिषद् में तारक का अर्थ किया गया है कि जिसके (जिस तारक मंत्र के) उच्चारण करने से ही गर्भ, जन्म, जरा-मरण एवं संसार के महाभयों से मुक्ति मिल जाती है, वह तारक ब्रह्म या तारक मंत्र है- अथ कस्मादुच्यते तारं यस्मादुच्चार्यमाण एव गर्भजन्मजरामरणसंसारमहाभयात् संतारयति तस्मादुच्यते तारम् (अथर्वशिर० ४९)। अद्वयतारकोपनिषद् में तो तारक का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसमें भी तारक ब्रह्म का स्वरूप इसी प्रकार विवेचित है-गर्भजन्मजरा- मरणसंसारमहद्भयात् संतारयति तस्मात्तारकमिति (अद्वयता० ३)। उपनिषद्कार ने तारक योग का स्वरूप इस प्रकार बताया है कि नेत्र बन्द अथवा अर्धोन्मीलित रखकर भ्रूमध्य के ऊपरी स्थान में अन्तर्दृष्टि से इस प्रकार का भाव करे कि मैं चैतन्य स्वरूप हूँ। इस प्रकार का ध्यान करते रहकर सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेने वाला तद्रूप (तारक रूप) हो जाता है-योगी स्वान्तः .........ब्रह्माहमस्मीत्यालोकयन् तद्रूपः तारकरूपो भवति (अद्वयता० २ ब्रह्म० भा०)। तारक ब्रह्म को प्रत्यगात्मा माना गया है- ......संसारतारकत्वात् तारकं प्रत्यगात्मेत्यर्थः (अद्वयता० ३ ब्रह्म० भा०) हिन्दी विश्वकोश में षडक्षर मंत्र को तारक मंत्र बताया गया है, जिसमें श्रीराम को इसका अधिष्ठाता माना गया है, यह षडक्षर मंत्र 'ॐ रामाय नमः' है। उपनिषदों (रामोत्तरतापनीयोपनिषद् २.३, अथर्वशिर० ४४ आदि) में 'ॐ कार' को भी तारक ब्रह्म-तारक मन्त्र कहा गया है। १२२. तुरीयातीत - द्र०-ज्ञानखण्ड - अवधूत । १२३. तुरीयावस्था - द्र०-ज्ञानखण्ड-तुरीय-तुरीयातीत । १२४. तुर्यावस्था - द्र०-ज्ञानखण्ड -तुरीय-तुरीयातीत ।

तैजस ३६६ परिशिष्ट १२५. तैजस - द्र०-ज्ञानखण्ड । १२६. त्रय शरीर - द्र०-ज्ञानखण्ड। १२७. त्रिगुणातीत-निर्गुण - द्र०-ज्ञानखण्ड-निर्गुण-सगुण। १२८. त्रिदण्ड-त्रिपुण्ड् - संन्यासाश्रम में अनेक प्रकार के संन्यासी होते हैं। उनकी कई शाखाएँ हैं, जिनके अनुसार उनके चिह्न भी पृथक्-पृथक् होते हैं। जैसे कुछ संन्यासी एक दण्ड और कुछ त्रिदण्ड धारण करते हैं। इसी प्रकार कुछ त्रिपुण्ड्र, कुछ ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैं। प्रख्यात संस्कृत शब्दकोश 'शब्द कल्पद्रुम' में त्रिदण्ड के सम्बन्ध में उल्लेख है- 'त्रिदण्डं चतुरङ्गुलगोबालवेष्टनादन्योन्यसम्बन्धं अस्त्यस्येति' (श०क०खं० २ पृ० ६५६) अर्थात् त्रिदण्ड यतियों का वह चिह्न है, जिसमें चार-चार अङ्गुल के तीन दण्ड एक दूसरे में बँधे रहते हैं। यह तो त्रिदण्ड का स्थूल स्वरूप हुआ। इसके धारण करने के मूल में भाव यह है कि त्रिदण्डधारी-त्रिदण्डी यतियों के कायदण्ड, मनोदण्ड और वाग्दण्ड बुद्धि में स्थापित रहते हैं अर्थात् ये (त्रिदण्डी) ज्ञानशक्ति से मन, वचन और कर्म को नियन्त्रित रखते हैं- वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च। यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते (श०क० खं०२, पृ० ६५६)। हिन्दूधर्म कोश के अनुसार त्रिदण्डी संन्यासी श्री वैष्णव संन्यासी कहे जाते हैं, जो शैव दशनामी संन्यासियों से भिन्न हैं। इनमें केवल ब्राह्मण वर्णोत्पन्न ही ग्रहण किए जाते हैं, वे ही त्रिदण्ड धारण कर सकते हैं। नारद परिव्राजकोपनिषद् में उपनिषद्कार ने यतिचर्या का विवेचन करते हुए लिखा है कि यति को सतत सर्वभूतहितरत रहते हुए शान्त, त्रिदण्डी तथा कमण्डलुधारी होकर आत्मा में रमण करते हुए परिव्रज्या करनी चाहिए और एकाकी ही विचरण करना चाहिए, उसे मात्र भिक्षा के लिए ही ग्राम में प्रवेश करना चाहिए, अन्य कार्यों के लिए नहीं- सर्वभूतहितः शान्तस्त्रिदण्डी सकमण्डलुः। एकारामः परिव्रज्य भिक्षार्थं ग्राममाविशेत् (ना०परि०३.५५)। काया, मन और वाणी को नियन्त्रित रखने वाले त्रिदण्डी को महायति की संज्ञा देते हुए उपनिषद् भाष्यकार ब्रह्मयोगी ने श्रुति का एक श्लोक उद्धृत किया है-वाग्दण्डः कायदण्डश्च मनोदण्डश्च ते त्रयः। यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डी महायतिः (ना०परि० ३.५४.६२ ब्रह्म० भा०)। शैव सम्प्रदाय का धार्मिक चिह्न त्रिपुण्ड्र है, जो भृकुटी (भौंहों) के ऊपर मस्तक के एक सिरे से दूसरे तक भस्म की तीन आड़ी रेखाओं के द्वारा अंकित किया जाता है। हिन्दी विश्वकोश में त्रिपुण्ड्र शब्द का स्वरूप इस प्रकार वर्णित है- त्रयाणां पुण्ड्राणां इक्षुवदाकाराणां समाहारः अर्थात् ईख के आकार की तीन रेखाओं का समुच्चय त्रिपुण्ड्र है। इसे ललाट के अतिरिक्त वक्षस्थल, भुजाओं एवं अन्य अंगों पर भी अंकित किया जाता है। नारद परिव्राजकोपनिषद् में बहूदक संन्यासी के लक्षण के सन्दर्भ में त्रिपुण्ड्र का उल्लेख किया गया है-बहूदकः शिखादि कन्थाधरस्त्रिपुण्ड्रधारी .......कबलाशी (ना०परि० ५.१३)। रामानन्दी वैष्णव सम्प्रदाय के सन्तों के ऊर्ध्व पुण्ड्र (मस्तक पर ऊपर की ओर खड़ी रेखा) धारण करने का विधान भी कुछ ग्रन्थों में मिलता है। कुटीचक के लक्षण में भी श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र और त्रिदण्ड धारण करने का उल्लेख है-एकत्रान्नादनं परः श्वेतोर्ध्वपुण्ड्रधारी त्रिदण्डः (ना०परि०५.१२)। १२९. त्रिपाद् ब्रह्म- ब्रह्म की अनेक संज्ञाओं में एक संज्ञा त्रिपाद् ब्रह्म भी है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में सभी जगह त्रिपाद् ब्रह्म का उल्लेख मिलता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है-"त्रयः पादा अस्य संख्या सुपूर्व्वस्य।" जिसके पैरों (पादों या चरणों) की संख्या तीन हो, वह अर्थात् विष्णु भगवान्। पुराणों में उल्लेख है कि एक बार भगवान् विष्णु ने वामन रूप धारण करके राजा बलि से तीन पग भूमि की याचना की, बलि ने वह देना स्वीकार कर लिया, तब वामन ने अपना मूल स्वरूप (विराट् स्वरूप) दिखाया। बलि को ऐसा अनुभव हुआ कि पृथिवी उनके (विराट् भगवान् के) पादद्वय, अन्तरिक्ष मस्तक, सूर्य और चन्द्र दोनों नेत्र हैं आदि। इसे देखकर वे सम्मोहित हो गये। उस समय भगवान् के एक पाद से बलि की समस्त भूमि (पृथिवी), शरीर से आकाश, भुजाओं से समस्त दिशाएँ छा गईं। उनके दूसरे पाद में स्वर्ग के सभी लोक आ गये, परन्तु तीसरा पाद रखने की जगह शेष न बचने पर उनने उसे स्वर्ग लोक से लेकर मर्त्यलोक, जनः लोक, तपः लोक और सत्यलोक में विस्तारित किया। श्रीमद्भागवत में यह प्रकरण इस प्रकार विवेचित है- "क्षितिं पदैकेन बलेर्विचक्रमे, नभः शरीरेण दिशश्च बाहुभिः। पदं द्वितीयं क्रमतस्त्रिविष्टपं, न वै तृतीयाय तदीयमण्वपि । उरुक्रमस्याङ्घ्रिरुपर्युपर्यथो, महर्जनाभ्यां तपसः परं गतः" (भा० ८.२०.३३-३४)। वेद के मत में संसाररहित ब्रह्मस्वरूप पुरुष ही त्रिपाद् ब्रह्म है। उस ब्रह्मरूप पुरुष (त्रिपाद् ब्रह्म) के सन्दर्भ में ऋग्वेद के पुरुषसूक्त के ऋषि नारायण द्वारा दृष्ट एक ऋचा में तीन पादों का वर्णन इस प्रकार है-त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि (ऋ० १०.९०.४) अर्थात् ऊपर (दिव्यलोक में)

परिशिष्ट ३६७ दर्शयज्ञ

जिसके तीन चरण हैं, उस विराट् पुरुष के एक भाग से यह जगत् पुनः प्रकट हुआ। इसके पश्चात् उसने (विराट् पुरुष ने) अन्नभोजी (प्राणियों) तथा अन्न न खाने वाले (वनस्पति आदि) की संव्यास किया। परब्रह्मोपनिषद् में भी जीव के, हृदयाकाश में 'रमा' आदि तीनों नाड़ियों के आश्रय से जाग्रत् आदि तीन अवस्थाओं तथा बन्ध-मोक्ष आदि की अवस्था में विचरण करने एवं उस जीव का त्रिपाद् ब्रह्म ही शेष रहने का उल्लेख किया गया है—सर्वत्र हिरण्मये परे .........तस्य त्रिपादं ब्रह्म एषात्रेय्य ततोऽनु तिष्ठति (परब्रह्मो०२)। १३०. त्रिपुटी— त्रिपुटी शब्द का उल्लेख प्रायः सभी कोशग्रन्थों में मिलता है। प्रख्यात कोशग्रन्थ हिन्दी विश्वकोश में त्रिपुटी इस प्रकार व्याख्यायित है— त्रीणि पुटानि सन्त्यस्याः अर्थात् जिसमें तीन पुट हों वह त्रिपुटी कहलाती है। त्रिवृता, निसोध, सूक्ष्मैला (छोटी इलायची) आदि के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता है। दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों पुटों का समाहार त्रिपुटी कहलाता है— .........त्रयाणां ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपाणां पुटानामाकाराणां समाहारः। .......भूतोत्पत्तेः पुरा भूमा त्रिपुटीद्वैतवर्जनात्। ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपा त्रिपुटी प्रलये हि नो (श०क० खं०२, पृ०६५९)। बृहत् हिन्दी कोश के अनुसार ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय के अतिरिक्त ध्याता, ध्यान, ध्येय और द्रष्टा, दृश्य तथा दर्शन का समाहार भी त्रिपुटी कहलाता है। मंडलब्राह्मण उपनिषद् में भी त्रिपुटी का उल्लेख हुआ है— एवं त्रिपुट्यां निरस्तायां निस्तरङ्ग समुद्रवन्निवातस्थित दीपवदचल संपूर्णभावाभावविहीन कैवल्य ज्योतिर्भवति (मं० ब्रा०उ० २.३.१) अर्थात् कैवल्यावस्था प्राप्त साधक की जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूप त्रिपुटी निरस्त हो जाती है, तब लहररहित सागर और वायुरहित स्थल में रखे दीप के समान वह स्थिर हो जाता है तथा सम्पूर्ण भाव और अभावों से रहित होकर केवल ज्योति रूप अवशिष्ट रहता है। १३१. त्रिष्टुप्—द्र०-अनुष्टुप् । १३२. त्रैधातवी इष्टि—द्र०-आग्नेयी इष्टि। १३३. त्र्यम्बक— त्र्यम्बक देव का उल्लेख वैदिक काल से ही मिलता है। कोशग्रन्थों के अनुसार त्र्यम्बक शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—त्रीणि अम्बकानि, नयनान्यस्य, त्रयाणां लोकानां अम्बकः पितेति वा (वाच०पृ० ३३९६) अर्थात् तीन नेत्रों वाले भगवान् शिव या तीनों लोकों के पिता भगवान् रुद्र ही त्र्यम्बक हैं। त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में महेश या महादेव को रुद्र भी कहा जाता है; क्योंकि वे सृष्टि के संहारक हैं। रुद्र शब्द की व्युत्पत्ति से उनका रुद्र नाम और भी सार्थक हो जाता है—रुद्रो रौतीति सतो, रोरूयमाणो द्रवतीति वा। रोदयतेर्वा (नि० १.१.५) अर्थात् वे (संहार करके) रुलाते हैं अथवा जीवों को कठोर दण्ड प्रदान करके रोने की विवश करते हैं, इसलिए ही वे रुद्र कहलाते हैं। रुद्रों की संख्या ग्यारह मानी गई है। एकादश रुद्रों में से एक का नाम त्र्यम्बक है। यजुर्वेद ३.६० में त्र्यम्बक देव की स्तुति इस प्रकार की गई है— त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। शिवजी को महेश या महेश्वर भी कहते हैं। महेश्वर का अर्थ है, महान् ईश्वर। हिन्दी विश्वकोश खं० १७ पृ०२९१ में इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है—महांश्चासावीश्वरश्च कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं वा समर्थः यद्वा महत्या महामायया ईश्वरः शिव, महादेव । ब्रह्मवै० पु० २.५.६.६७ में उल्लेख है- विश्वस्थानाञ्च सर्वेषां महतामीश्वरः स्वयम्। महेश्वरञ्च तेनेमं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ इसी प्रकार उपनिषद् में भी रुद्र को ही परब्रह्म, ईशान, महादेव और महेश्वर उपन्यस्त किया गया है—तत् परंब्रह्मेति स एकः स एको रुद्रः स ईशानः स भगवान् स महेश्वरः स महादेवः (अथर्वशिर०३)। ज्ञानाकांक्षी भक्तों की ज्ञान प्रदान करने, समस्त भावों का परित्याग कर आत्मज्ञान और योगैश्वर्य से अपनी महिमा में ही स्थित रहने के कारण इन्हें महेश्वर कहा गया है—...............योगैश्वर्येण महति महीयते तस्मादुच्यते भगवान्महेश्वरः (अथर्वशिर०-४)। नोट— त्र्यम्बक के स्थान पर पाठ भेद से कुछ ग्रन्थों में त्रयम्बक अथवा त्रियम्बक शब्द भी मिलता है। १३४. दक्षिणाग्नि—द्र०-आहवनीय। १३५. दक्षिणायन—द्र०- उत्तरायण। १३६. दर्शयज्ञ— आर्ष ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख है, जैसे राजसूय, वाजपेय, अश्वमेध यज्ञ आदि। दर्श और पौर्णमास यागों (यज्ञो) का नामकरण इनके समय की स्थिति के अनुसार किया गया है। वाचस्पत्यम् में दर्श को इस प्रकार परिभाषित किया गया है—दृश्येते शास्त्रदृष्ट्या सूर्य्यचन्द्रौ एकत्र स्थितौ यत्र। .......सूर्य्येन्दु सङ्गमकाले अमावास्या तिथौ 'एकत्रस्थौ चन्द्रसूर्य्यौ दर्शनात् दर्श उच्यते (वाच०पृ० ३४७३) अर्थात् जिस तिथि को चन्द्र और सूर्यदेव एक ही

दहर पुण्डरीक ३६८ परिशिष्ट स्थान पर एकत्र हुए दृष्टिगोचर होते हैं, उस तिथि को अमावस्या कहते हैं। चन्द्रमा और सूर्य के एक स्थान पर दृश्यमान होने के कारण इस अमावस्या तिथि को ही दर्श कहते हैं एवं इस तिथि में सम्पन्न होने वाले यज्ञ को दर्शयज्ञ कहते हैं। इसी प्रकार जिस दिन चन्द्र पूर्ण कलायुक्त दिखाई देता है, उसे पूर्णिमा तिथि कहते हैं- पूर्ण: कलाभिः पूर्णोमाश्चन्द्रमा यत्र। पूर्णिमायाम् (वाच० पृ० ४४०२)। पूर्णिमा को सम्पन्न किये जाने वाले यज्ञ को पूर्णमास या पौर्णमास यज्ञ कहते हैं। श्रुतियों में भी प्रतिपक्ष दर्श और पूर्णमास यज्ञ सम्पन्न करने का वर्णन मिलता है, 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत', 'सर्वेभ्यो दर्श पूर्णमासौ श्रुतिः' (वाच०पृ० ४४०२)। इसीलिए इन्हें श्रौतयाग कहा जाता है। दर्शपौर्णमास याग (यज्ञ) क्रमशः पूर्णिमा और अमावस्या को किये जाते हैं। समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु अग्निहोत्री इन अनुष्ठानों को प्रतिपक्ष करते रहते हैं- सर्वेभ्यः कामेभ्यो दर्शपूर्णमासौ (आप०श्रौ०सू० ३.१४.९)। दर्श और पौर्णमास में प्रमुखता पौर्णमास याग की ही है, इसी कारण पूर्णिमा को अग्नि परिग्रह के पश्चात् प्रथम पूर्णिमा आने पर ही पौर्णमास यागानुष्ठान प्रारम्भ होता है। अग्नि परिग्रह अमावस्या और पूर्णिमा दोनों को ही किया जा सकता है। यदि अमावस्या को अग्नि परिग्रह किया गया ही, तो पूर्णमासी आने तक प्रतीक्षा करने के बाद ही याग अनुष्ठान प्रारम्भ होता है। श्रौत ग्रन्थों में अग्निहोत्री को दर्श और पौर्णमास याग का अनुष्ठान सम्पूर्ण जीवन अथवा तीस वर्ष तक अथवा शारीरिक सामर्थ्य रहने तक करने का विधान है- त्रिंशतवर्षाणि दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत (का०श्रौ०सू० ४.२.४७)। यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत।........त्रिंशतं वा वर्षाणि जीर्णो वा विरमेत् (आप०श्रौ०सू० ३.१४.१२-१३)। कठरुद्रोपनिषद् में उच्चस्थिति के संन्यासी को स्थिति बताते हुए उपनिषद्कार ने कहा है कि उसके द्वारा अमावस्या को किया गया भोजन ही उसका दर्शयज्ञ तथा पूर्णिमा को किया गया भोजन ही उसका पौर्णमास यज्ञ है-यद्दर्शं तद्दर्शं यत्पौर्णमास्ये तत्पौर्णमास्यं.....वाप्येत्सोऽस्याग्निष्टोमः (कठरुद्रो० ३)। दर्श और पौर्णमास यज्ञ को दर्शेष्टि और पौर्णमासेष्टि भी कहते हैं। १३७. दहर पुण्डरीक - द्र०- अष्टदल कमल। १३८. दीक्षा - भारतीय संस्कृति में जीवन को सफलता तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए दीक्षा अति आवश्यक मानी गयी है। हिन्दी विश्वकोश में दीक्षा शब्द की रचना इस प्रकार वर्णित है- दक्षी भावे अ स्त्रियां टाप् । इसके कई अर्थ हैं, जैसे नियम-संकल्प पूर्वक अनुष्ठान, अभीष्ट देवमन्त्र ग्रहण, यजन, पूजन, व्रत-संग्रह, उपनयन संस्कार आदि। उपनयन संस्कार में भी गुरु या आचार्य यज्ञोपवीत प्रदान करते समय शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा प्रदान करते हैं। तन्त्र ग्रन्थों में दीक्षा का विस्तार से वर्णन हुआ है। एक तन्त्र ग्रन्थ के अनुसार दीक्षा को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- दीयते विमलं ज्ञानं क्षीयते कर्मवासना। तेन दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तन्त्रवेदिभिः (वाच०पृ० ३६००) अर्थात् जो विमल ज्ञान देकर कर्म वासना का क्षय कर देती है, उसे तन्त्रज्ञ मुनियों द्वारा दीक्षा कहा गया है। प्रख्यात तन्त्र ग्रन्थ रुद्रयामल में दीक्षा की परिभाषा इस प्रकार दी गई है-ददाति शिवतादात्म्यं क्षिणोति च मलत्रयम्। अतो दीक्षेति संप्रोक्ता दीक्षा तन्त्रार्थवेदिभिः (वाच०पृ० ३६०२) अर्थात् जिससे शिव (कल्याणकारी) से तादात्म्य प्राप्त होता है तथा मलत्रय (लोभ, मोह, अहंकार) का प्रक्षालन होता है, उसे तन्त्रज्ञों ने दीक्षा कहा है। योगिनी तन्त्र तृतीय भाग के षष्ठ पटल में भी दीक्षा की महत्ता बताते हुए तन्त्रकार ने लिखा है-दीयते ज्ञानमत्यर्थं क्षीयते पाशबन्धनम्। अतो दीक्षेति देवेशि! कथिता तत्त्वचिन्तकैः अर्थात् जो ज्ञान-मति प्रदान करती तथा पाशबन्धनों को क्षीण करती है, उसे तत्त्वचिन्तकों ने दीक्षा नाम दिया है। दीक्षा से जीवन जीने की कला में दक्षता प्राप्त हो जाती है, जिससे व्यक्ति स्वयं तो सुख-शान्तिमय जीवनयापन करता ही है, समाज और संस्कृति के उत्कर्ष के लिए भी बहुत कुछ कर गुजरने को समुद्यत होता है। सद्गुरु से दीक्षा लिए बिना व्यक्ति 'निगुरा' कहलाता है, जो एक प्रकार की गाली है। अस्तु, प्रत्येक व्यक्ति को श्रेष्ठ गुरु से दीक्षा अवश्य लेनी चाहिए। दीक्षा के बिना मंत्र का जप करना उसी प्रकार समुचित फलदायक नहीं होता, जिस प्रकार पत्थर की चट्टान में बोया बीज अंकुरित नहीं होता-अदीक्षितस्य निन्दाम्राह तन्त्रसारे-अदीक्षिता ये कुर्वन्ति जप पूजादिकाः क्रियाः। न भवन्ति श्रियै तेषां शिलायाममुमबीजवत् (वाच०पृ० ३६०२)। यों तो शुभकार्य जितना शीघ्र हो, कर लेना चाहिए; किन्तु दीक्षा के सम्बन्ध में कुछ समय श्रेष्ठ माने गये हैं। हिन्दी विश्वकोश के अनुसार-शुक्ल पक्ष में दीक्षा शुभफल प्रदायक होती है। कृष्ण पक्ष में भी पंचमी तिथि तक ली जा सकती है। श्रीकामी को शुक्ल पक्ष में और मुमुक्षु को कृष्ण पक्ष में मंत्र दीक्षा लेना उचित है। विद्वानों का मत है कि रविवार को दीक्षा लेने से धन संचय,चन्द्रवार को शान्ति, भौमवार को आयुः क्षय, बुधवार को सौन्दर्य प्राप्ति, गुरुवार को ज्ञान प्राप्ति, शुक्रवार को सौभाग्य और शनिवार को यशनाश होता है। ये बातें सामान्य स्थलों पर लागू होती हैं; किन्तु

परिशिष्ट ३६९ धारणा गङ्गादि पुण्य तीर्थ स्थलों, काशी, प्रयाग, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में दीक्षा लेने के सम्बन्ध में कोई विचार नहीं किया जाता। दीक्षा के अनेक प्रकार हैं—जैसे—मंत्रदीक्षा, अग्रिदीक्षा, प्राणदीक्षा। तान्त्रिकों में प्रचलित दीक्षा भी कई प्रकार की होती है, जैसे-समयीदीक्षा, लोकदीक्षा, क्रियादीक्षा और कला दीक्षा आदि। उपनिषद् ग्रन्थों में भी दीक्षा की कई स्थानों पर महिमा गायी गई है। बृहदारण्यक उपनिषद् में बताया गया है कि दीक्षा सत्य में प्रतिष्ठित है-कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति सत्य इति (बृह०उ० ३.९.२३)। इसी प्रकार सोम की प्रतिष्ठा दीक्षा में निर्दिष्ट है-सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति दीक्षायाम् (बृह० ३.९.२३)। निर्वाणोपनिषद् में अवधूत लक्षण में दीक्षा के सम्बन्ध में कहा गया है कि परब्रह्म से संयोग ही उसकी दीक्षा है। उसके लिए किसी स्थूल कर्मकाण्ड की आवश्यकता नहीं है—परमहंसः सोऽहम् ...........संयोग दीक्षा (निर्वाणो० २-१४)। १३९. देव - द्र०-ज्ञानखण्ड । १४०. देवयजन—वेदों, उपनिषदों आदि आर्ष ग्रन्थों में देवयजन शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। हिन्दी विश्वकोश में 'देवयजन' शब्द की रचना इस प्रकार विवेचित है-देवा इज्यन्तेऽत्र यज आधारे ल्युट्। इसके तीन अर्थ हैं- वेदिस्यान (यज्ञवेदी), यज्ञ करने का स्थल और पृथिवी। सामान्यतया इस शब्द का अर्थ 'देवताओं के लिए यज्ञ क्रिया' जैसा प्रतीत होता है; किन्तु इसका वास्तविक अर्थ यज्ञवेदी, यज्ञकुण्ड, यज्ञस्थल आदि है। शतपथ ब्राह्मण और कात्यायन श्रौत्र सूत्र आदि ग्रन्थों में इसका अर्थ यज्ञवेदी, यज्ञ स्थल होने की पुष्टि की गई है-"वेदीमार्जन प्रशंसार्थमितिहासमाह। आ समन्तात् मृतं सर्वदा नश्वरमामृतं तद्विपरीतं यद्देवयागाधिकरणभूतं स्थानम्" (वाच०पृ०३७३९)। जाबालोपनिषद् में देवयजन का दार्शनिक स्वरूप इस प्रकार विवेचित है- "याज्ञवल्क्य के यह पूछने पर कि प्राणों का क्षेत्र तथा इन्द्रियों का देवयजन क्या है? बृहस्पति ने कहा कि अविमुक्त ही प्राणों का स्थल (कुरुक्षेत्र) है और वही इन्द्रियों का देवयजन (यज्ञस्थल) है तथा वही प्राणियों का ब्रह्मसदन भी हैं-यदमु कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम्। अविमुक्तं वै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनम् (जाबालो० १.१)। कात्यायन यज्ञ पद्धति विमर्श में उल्लेख है कि यागोचित स्थल में ही देवयजन का निर्माण किया जाता है। देवयजन के निमित्त उस स्थल की कुछ विशेषताएँ होनी चाहिए, जैसे- जहाँ कृष्णसार मृग स्वाभाविक रूप से विचरते हों, वह स्थान देवयजन के लिए उपयुक्त होता है- कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः। स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः (मनु० २.२३)। १४१. द्रष्टा - आर्ष ग्रन्थों में 'द्रष्टा' शब्द कई स्थलों पर प्रयुक्त हुआ है। सामान्यतः 'देखने वाले' के अर्थ में ही द्रष्टा शब्द प्रचलित है; किन्तु विशेषणों सहित इसके कई प्रकार के शब्द व अर्थ बनते हैं; जैसे-मूकद्रष्टा (चुप रहकर देखने वाला), भविष्यद्रष्टा (भविष्य देखने वाला), दूरद्रष्टा (दूर तक देखने वाला), युगद्रष्टा (वर्तमान युग की समस्याओं के समाधान खोजने वाला अथवा भावी युग के दृश्य को पहले से देख लेने वाला) आदि। इसी प्रकार ईश्वर का एक नाम भी सर्वद्रष्टा (सब कुछ देखने वाला) है। इसीलिए मैत्रेयी उपनिषद् में साधक कहता है कि मैं जगत् का सर्वद्रष्टा नहीं हूँ अर्थात् वह ईश्वर ही जगत् का सर्वद्रष्टा है- न जगत्सर्वद्रष्टास्मि (मैत्रे० ३.१४)। निरुक्तकार यास्क मुनि ने मन्त्रों का दर्शन करने वाले ऋषियों को भी 'द्रष्टा' की संज्ञा प्रदान को है। उनके अनुसार मन्त्रों अथवा ऋचाओं का दर्शन या साक्षात्कार करने के कारण ही वे ऋषि कहलाते हैं- दर्शनात् ऋषिः (नि०२.३.१२)। इसीलिए ऋषियों को मन्त्रद्रष्टा कहा गया है-साक्षात्कृत धर्माण ऋषयो बभूवुः । .....ऋषयो मन्त्रद्रष्टारो मन्त्रकाले बभूवुः (नि० १.६.२०)। पातञ्जल योग सूत्र में आत्मा को द्रष्टा तथा अन्तःकरण को दृश्य बताते हुए सूत्रकार ने इन दोनों के संयोग को दुःख का हेतु कहा है-द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः (पात० यो०सू० २.१७)। मैत्रेयी उपनिषद् २.२९ में उल्लेख है कि मुमुक्षु को चाहिए कि वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन को वासना के साथ ही त्यागकर उस आत्मा का ही भजन करे (उसी में रमण करे), जिसमें दर्शन का सर्वप्रथम आभास होता है-द्रष्टृदर्शन दृश्यानि त्यक्त्वा ........... केवलं भज। भगवान् कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में देहस्थित पुरुष को साक्षी होने से उपद्रष्टा कहा है-उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः (गी० १३.२२)। १४२. द्वैत - द्र०-ज्ञानखण्ड-अद्वैत। १४३. धर्म - द्र०-ज्ञानखण्ड-धर्म-अधर्म। १४४. धारणा - द्र०-ज्ञानखण्ड।

धृति ३७० परिशिष्ट १४५. धृति— सामान्यतः धृति का उल्लेख धर्म के दस लक्षणों के अन्तर्गत आता है। मनुस्मृति ६.९२ में धृति (धैर्य या सन्तोष) को धर्म का प्रथम लक्षण माना गया है- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ धृ+क्तिन् से निर्मित धृति शब्द के कोश ग्रन्थों में कई अर्थ हैं जैसे- धारण करना, तुष्टि, सन्तोष, तृप्ति, धैर्य, मन की दृढ़ता और षोडश मातृकाओं में से एक का नाम आदि। श्री मल्लिनाथ ने रघुवंश को अपनी टीका में धृति को धैर्य या प्रीति माना है- 'धृतिर्धैर्यं प्रीतिर्वा' (वाच०पृ० ३९०६)। मानसिक धारणा को भी धृति कहते हैं। गीता (१८.३३- ३५) में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को इसके सात्त्विकी, राजसी और तामसी तीन भेद बताये हैं-धृत्या यया धारयते मनः प्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ औपनिषदिक परिप्रेक्ष्य में यमों के भी दस प्रकार हैं। पातञ्जल योग के अनुसार सामान्यतः पाँच यम व पाँच नियम माने जाते हैं; किन्तु जाबाल दर्शनोपनिषद् में इन्हें दस-दस माना गया है। जिनमें एक यम 'धृति' भी है-अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश (जा०दर्शनो० १.६)। उपनिषदकार ने धृति को इन शब्दों में परिभाषित किया है- वेदादेव विनिर्मोक्षः संसारस्य न चान्यथा। इति विज्ञान निष्पत्तिर्धृतिः प्रोक्ता हि वैदिकैः (जा०दर्शनो० १.१७) अर्थात् वेदादि की अनुकूलता (वैदिक मार्ग पर चलने) से ही सांसारिक प्राणियों को मोक्ष प्राप्त होता है। इससे भिन्न मोक्ष प्राप्ति का अन्य कोई साधन नहीं है। इस प्रकार के दृढ़ निश्चय या दृढ़ धारणा को ही ज्ञानी जनों द्वारा धृति कहा गया है। १४६. ध्यान— द्र०-ज्ञानखण्ड। १४७. धुवाग्नि-द्र०-ज्ञानाग्नि। १४८. नवद्वार— आध्यात्मिक सन्दर्भ में मानव शरीर में स्थित नवद्वारों की चर्चा की जाती है। ये नव (९ की संख्या) द्वार शरीर में स्थित विभिन्न इन्द्रियों के छिद्र ही हैं। प्रख्यात कोशग्रन्थ वाचस्पत्यम् में नवद्वार इन शब्दों में विवेचित है-नवद्वा- राणीव चित्तवृत्त्यादेर्बहिर्गमन साधनत्वात् यत्र। देहे तत्र नवभिश्छिद्रैश्चित्तादेर्बहिर्गमनातस्य तथात्वम्। तथा हि द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके च मुखमेकमिति शीर्ष स्थानि सप्त द्वे पायूपस्थे अधः स्थे इति नवच्छिद्र रूपाणि द्वाराणि देहे सन्ति (वाच.पृ. ३९८८) अर्थात् देहस्थित नवद्वारों के माध्यम से चित्त वृत्तियाँ बहिर्गमन करती हैं, इसीलिए दो कान, दो आँखें, दो नासिका छिद्र, एक मुख, एक उपस्थ तथा एक गुदा इन नौ छिद्रों वाली इन्द्रियों को नवद्वार कहते हैं। शास्त्रों को ऐसी मान्यता है कि इस शरीर से जब प्राण बहिर्गमन करता है, तो इन्हीं नौ द्वारों में से किसी एक से होकर निकलता है; किन्तु योगीजन सहस्रार चक्र से प्राण निष्क्रमण करते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् में उल्लेख है-नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः .....(श्वेता०३.१८) तात्पर्य यह है कि वह परम पुरुष-आत्मा प्रकाश स्वरूप है, जो नवद्वार वाले शरीर रूप नगर में अन्तर्यामी होकर विद्यमान है, वही बाह्यजगत् में विविध प्रकार से लीलाएँ कर रहा है-मैत्रेयी उपनिषद् में शरीरगत नौ छिद्रों को मल निष्कासन करने वाला कहकर यह विधान बताया गया है कि इसे (इस शरीर की) छूकर स्नान करना चाहिए अथवा पवित्र रखना चाहिए-विकाराकारविस्तीर्णं स्पृष्ट्वा स्नानं विधीयते। नवद्वारमलस्रावं सदाकाले स्वभावजम् (मैत्रे० २.५-६)। १४९. नाद— द्र०-अनाहत नाद। १५०. निःस्पृह-द्र०-ज्ञानखण्ड। १५१. निदिध्यासन— भारतीय दर्शन के अन्तर्गत ब्रह्म साक्षात्कार अथवा आत्मानुसन्धान के विविध आयामों में श्रवण, मनन आदि के क्रम में निदिध्यासन का भी उल्लेख है। वेदान्त दर्शन में यह उल्लेख इन शब्दों में है-एवंभूतस्वरूप चैतन्य साक्षात्कारपर्यन्तं श्रवणमनननिदिध्यासनसमाध्यनुष्ठानस्यापेक्षित तत्त्वात्तेऽपि प्रदर्श्यन्ते (वे०सा०३०) अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप चैतन्य (ब्रह्म) के साक्षात्कार हो जाने तक श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि, ये अनुष्ठान आवश्यक हैं। ब्रह्म साक्षात्कार हेतु साधना का प्रथम चरण 'श्रवण' है। श्रुति वाक्यों द्वारा ब्रह्म के सन्दर्भ में सुनना (श्रवण करना) चाहिए; तदुपरान्त ही उस पर मनन, निदिध्यासन व समाधि (ध्यान की उच्चतम स्थिति) सम्भव है। इन सबके बाद ही ब्रह्म साक्षात्कार हो सकता है। साधक द्वारा किसी सुयोग्य गुरु की शरण में जाकर 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों

परिशिष्ट ३७१ नियम को सुनकर षड्विधलिङ्ग द्वारा ब्रह्म के सन्दर्भ में उनका अभिप्राय निर्धारित करना वेदान्त की भाषा में 'श्रवण' कहलाता है- श्रवणं नाम षड्विधलिङ्गैरशेषवेदान्तानामद्वितीय वस्तुनि तात्पर्यावधारणम् (वे०सा०३०)। अध्यात्मोपनिषद् में भी 'श्रवण' इसी प्रकार निर्दिष्ट है- इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसंधानं श्रवणं भवेत् (अध्यात्मो० ३३) अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा जीव-ब्रह्म ऐक्य का अर्थानुसंधान 'श्रवण' है। इसे और सरल शब्दों में कहें, तो इस प्रकार कह सक ते हैं कि आप्त पुरुषों अथवा गुरु आदि के द्वारा जीव-ब्रह्म ऐक्य, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करना 'श्रवण' अथवा 'सिद्धान्त श्रवण' कहलाता है। वेदान्तसार रचयिता श्री सदानन्द ने 'श्रवण' के अगले उपक्रम 'मनन' का अर्थ, श्रवण को गई अद्वितीय वस्तु का वेदान्तानुरूप तर्कों द्वारा चिन्तन करना बताया है-मननं तु श्रुतस्याद्वितीय वस्तुनो वेदान्तानुगुण युक्तिभिरनवरतमनुचिन्तनम् (वे०सा० ३०)। उपनिषद् में भी शब्दान्तर से मनन की यही परिभाषा वर्णित है-युक्त्या संभावितत्वानुसंधानं मननं तु तत् (अध्यात्मो० ३३) अर्थात् श्रवण किए गए तथ्य के अर्थ पर तर्क पूर्वक विचार करना 'मनन' कहलाता है। मनन का अगला चरण निदिध्यासन है। इसमें साधक श्रवण और मनन किए गए विषय में सन्देहरहित होकर, उसमें चित्त को एकाग्र कर स्थिर कर लेता है, चित्त का यही एकतानत्व निदिध्यासन कहलाता है। उपनिषदकार ने निदिध्यासन की स्थिति इस प्रकार बतायी है-ताभ्यां निर्विचिकित्सेऽर्थे चेतसः स्थापितस्य यत्। एकतानत्वमेतद्धि निदिध्यासनमुच्यते (अध्यात्मो० ३४)। वेदान्तसार में निदिध्यासन की परिभाषा करते हुए ग्रन्थकार ने लिखा है-विजातीय देहादि प्रत्ययरहिता द्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्ययप्रवाहो निदिध्यासनम् (वे०सा० ३०)। इसका अभिप्राय यह है कि शरीर आदि जड़ होने से (आत्मा के) विजातीय हैं, इन विजातीय विचारों से रहित तथा अद्वितीय वस्तु ब्रह्म विषयक सजातीय विचारों का सतत (तैलधारावत्) अविच्छिन्न प्रवाह ही निदिध्यासन है। दूसरे शब्दों में आत्मा को सजातीय प्रतीतियों में चित्त का अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित होना ही निदिध्यासन है। निदिध्यासन के बाद अन्तिम अवस्था समाधि है। चित्त की एकाग्रता का नाम समाधि है। इसकी व्युत्पत्ति से ही इसका अर्थ स्पष्ट है-सम्यक् आधीयते एकाग्रीक्रियते विक्षेपान् परिहृत्य मनः यत्र स समाधिः (घे०वि०पृ० २७९) अर्थात् विक्षेपों का परिहार हो जाने पर जब मन एकाग्र हो जाता है, उस स्थिति को 'समाधि' कहते हैं। स्थिति के अनुरूप इसके कई भेद भी होते हैं। इस सन्दर्भ में १०८ उपनिषद् ज्ञानखण्ड के परिभाषा कोश परिशिष्ट में समाधि प्रकरण में विस्तृत उल्लेख किया गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् में आत्मा को ही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य बताते हुए महर्षि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को आत्मदर्शन-आत्म साक्षात्कार को ही जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य बताया है-आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् (बृह०३०२.४.५)। १५२. नियम- योग दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए नियम पालन आवश्यक है। जिस प्रकार पातञ्जल योग में पाँच यम वर्णित हैं, उसी प्रकार पाँच नियम-शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान भी हैं। योगदर्शन में उल्लेख है- शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः (पातं०यो० सू०-३२)। अध्यात्म पथ के पथिक को अपने जीवन क्रम में इन नियमों को समाविष्ट करना आवश्यक है। शब्द कल्पद्रुम में नियम को व्युत्पत्ति इस प्रकार है-नियमः पुं- (नियमनमिति। नि+यम) अर्थात् आत्म नियमन=नियन्त्रण। यमों (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) को स्वभाव का अंग बनाने के लिए इन नियमों (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान या ईश्वर पूजन) आवश्यक है। वस्तुतः यम और नियम अन्योन्याश्रित हैं। कुछ उपनिषदों व शास्त्रों में दशविध नियम वर्णित हैं- तपः संतोषमास्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम्। सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीमंतिश्च जपो व्रतम्॥ एते च नियमाः प्रोक्तास्तान्वक्ष्यामि क्रमाच्छृणु (जा०दर्शनो० २.१) अर्थात् तप, सन्तोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर पूजन, सिद्धान्त-श्रवण, ह्री (लज्जा), मति, जप और व्रत ये नियम हैं; किन्तु ऊपर वर्णित योग दर्शन के पाँच नियम (शौच, सन्तोष, तप आदि) ही अधिक प्रचलित हैं। प्रथम-नियम शौच है। शौच अर्थात् पवित्रता, १. बाह्यशौच २. आभ्यन्तर शौच। मिट्टी और जल से शरीर, वस्त्र, पात्र, स्थान आदि को शुद्ध रखना बाह्य शौच है। मैत्री आदि से ईर्ष्या, अभिमान, घृणा आदि मलों को साफ करना आन्तरिक या आभ्यन्तर शौच है। जाबाल दर्शनोपनिषद् में उल्लेख है- स्वदेहमलनिर्मोक्षो मृज्जलाभ्यां महामुने। यत्तच्छौचं भवेद् बाह्यं मानसं मननं विदुः । अहं शुद्ध इति ज्ञानं ........ रमते नरः (जा०दर्शनो० १.२०-२२) अर्थात् मिट्टी और जल से शरीर को पवित्र रखना बाह्य शौच है; किन्तु ज्ञानीजन 'मैं विशुद्ध आत्मा हूँ' ऐसा भाव रखने को ही सर्वोत्कृष्ट शौच कहते हैं। शरीर तो बाहर-भीतर उभयविध अशुद्ध है; पर इसमें निवास करने वाला देही अत्यन्त निर्मल है। ऐसा ज्ञान होने

निरञ्जन ३७२ परिशिष्ट पर उसे पवित्र किया जाए। अतः हे मुने ! जो ज्ञान रूप पवित्रता को छोड़कर बाह्य पवित्रता में ही रमा रहता है, वह स्वर्ण के स्थान पर मिट्टी के ढेलों का ही संग्रह करता है। दूसरा-नियम सन्तोष है। अपनी स्थिति के अनुरूप उचित प्रयास करने पर जो भी फल प्राप्त हो, उसी में प्रसन्न रहना सन्तोष है। सन्तोष को सुख का मूल और इसके विपरीत स्थिति को दुःख का मूल कहा गया है-सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्। सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः (मनु० ४.१२)। इसी तथ्य की पुष्टि जाबाल दर्शनोपनिषद् में भी मिलती है-यदृच्छालाभतो नित्यं प्रीतिर्या जायते नृणाम्। तत्सन्तोषं विदुः प्राज्ञाः परिज्ञानैक तत्पराः (जा०दर्शनो० २.५)। प्रभु इच्छा से जो कुछ प्राप्त हो जाए, उसी में सन्तुष्ट रहना विद्वानों ने सन्तोष कहा है। सर्वत्र अनासक्त भाव से रहकर ब्रह्मलोक तक के सुख से विरक्ति और हर स्थिति में प्रसन्नता यही सर्वश्रेष्ठ सन्तोष है। तीसरा-नियम तप है। अश्व विद्या के कुशल सारथी द्वारा चञ्चल घोड़ों को साधने के समान, साधक द्वारा शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को समुचित प्रकार से वश में करना तप कहलाता है। जाबालदर्शन उपनिषदकार ने तप की परिभाषा इस प्रकार की है- वेदोक्तेन प्रकारेण कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः । शरीरशोषणं यत्तत्तप इत्युच्यते बुधैः (जा० दर्शनो० २.३) अर्थात् वेदोक्त कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करके शरीर को क्षीण करना ही तप है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। वस्तुतः उच्च आदर्शों के लिए कष्ट सहन करने का नाम ही तप है। महर्षि पतञ्जलि ने तप तीन प्रकार के माने हैं- शरीर का तप, वाणी का तप और मन का तप। शारीरिक तप के अन्तर्गत युक्त आहार- उचित आहार, सादा-सात्त्विक, सुपाच्य और मिताहार तथा युक्त विहार के अन्तर्गत संतुलित यात्रा, चलना-फिरना आदि है। इसी प्रकार युक्त कर्मचेष्टा अर्थात् नियमित रूप से कर्तव्य पालन, न अधिक श्रम, न आलस्य-प्रमाद बरतना, युक्त स्वप्नावबोध अर्थात् न अधिक सोना, न अधिक जागना। इस सन्दर्भ में गीता का यह श्लोक-'युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु । युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा' (गी०६.१७)। वाणी के तप का अर्थ है-वाणी को संयमित रखना। हितकर, प्रिय, मधुर और मित बोले। मन का तप मन को संयमित रखना है। द्वेष, घृणा, ईर्ष्या आदि के भाव मन में न रखना मन का तप है। चौथा-नियम स्वाध्याय है। जिस प्रकार शरीर के लिए भोजन आदि को सतत आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार विचार संस्थान मन-मस्तिष्क को सुव्यवस्थित-सन्तुलित रखने के लिए स्वाध्याय की आवश्यकता अनिवार्य रूप से है। स्वाध्याय का शाब्दिक अर्थ है- स्व-अपना, अध्याय-अध्ययन। अपना अध्ययन अर्थात् आत्मावलोकन ही स्वाध्याय है। वाचस्पत्यम् में स्वाध्याय की व्युत्पत्ति इन शब्दों में दी है- स्वः स्वकीयत्वे विहित अध्यायः .......। स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इति श्रुतिः । स्वाध्याय के द्वारा वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता व अन्य आर्षग्रन्थों का अध्ययन करके उससे प्राप्त ज्ञान के दर्पण में साधक अपने को देखकर आत्म समीक्षा करता है, जिससे आत्म सुधार होता है व आध्यात्मिक उन्नति होती चली जाती है। पातञ्जल योग के अनुसार ओंकार सहित गायत्री मंत्र का जप ही स्वाध्याय है। पाँचवाँ-नियम ईश्वर प्रणिधान है। फल सहित समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देना ईश्वर प्रणिधान है। यह समस्त नियमों में प्रमुख है। पातञ्जल योग प्रदीप में साधन पाद सूत्र- ३२ को व्याख्या में ग्रन्थकार ने महर्षि वेदव्यास कृत भाष्य का उद्धरण देते हुए ईश्वर प्रणिधान का फल इस प्रकार विवेचित किया है-शय्यासनस्थोऽथ पथि व्रजन्वा स्वस्थः परिक्षीण वितर्कजालः । संसारबीजक्षयमीक्षमाणः स्यान्नित्ययुक्तोऽमृतभोगभागी ॥ जो योगी पुरुष शय्या और आसन पर विराजमान या पथ पर गमन करता हुआ अथवा एकान्तस्थ हो, हिंसा आदि वितर्कजाल को विनष्ट करके ईश्वर प्रणिधान करता है, वह अविद्या आदि क्लेशों का विनाश करता हुआ नित्य स्वरूप परमात्मा से युक्त हुआ जीवन्मुक्त का सुख प्राप्त करता है। अतः सभी यमों और नियमों को परब्रह्म में अर्पण करके ईश्वर प्रणिधान करे। जाबालदर्शनोपनिषद् ने ईश्वर प्रणिधान को ईश्वर पूजन कहा है, जिसकी परिभाषा इस प्रकार दी है- रागाद्यपेतं हृदयं वागदुष्टाऽनृतादिना । हिंसादिरहितं कर्म यत्तदीश्वर पूजनम् (जा० दर्शनो० २.८) अर्थात् अनृत भाषण आदि दोषों से रहित तथा हिंसा आदि क्रूरता से मुक्त कर्म ही ईश्वर पूजन है। १५३. निरञ्जन - द्र०-चिद्घन । १५४. निरहंकारिता - द्र०-अमानित्व गुण । १५५. निर्गुण - द्र०-ज्ञानखण्ड -निर्गुण-सगुण । १५६. निर्वाण - निर्+वा+क्त से निर्मित निर्वाण शब्द का प्रयोग प्रायः निवृत्ति, शान्ति, अस्तागमन, वाणशून्य, शून्य, विश्रान्ति और मुक्ति या मोक्ष के अर्थ में होता है। दर्शन में इसका मुक्ति के अर्थ में ही अधिक प्रयोग हुआ है। सामान्य धारणा यह

परिशिष्ट | ३७३ | पञ्च तत्त्व-पंच तन्मात्राएँ


है कि शरीर छूटने के उपरान्त पूर्व कर्मानुसार पुनर्जन्म होता है, पर किसी-किसी योगी के समस्त कर्मक्षय हो जाने पर मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म नहीं होता, यही स्थिति निर्वाण अथवा मोक्ष अथवा मुक्ति कहलाती है; किन्तु दर्शन ग्रन्थों में तृष्णा की सम्यक् निवृत्ति को ही निर्वाण कहा गया है-तृष्णाया विप्रहाणेन निर्वाणमिति कथ्यते ( हि०वि०को० खं० १२) अर्थात् यह जगत् कल्पित और आधाररहित है। अतः इस मिथ्या संसार के साथ अपने को सम्बद्ध रखने की प्रबल आकांक्षा का नाम ही तृष्णा है। इस तृष्णा के विनष्ट हो जाने पर ही संसारोच्छेद, आत्माभिमान का विनाश और निर्वाण प्राप्त होता है। प्रज्ञापारमिता ग्रन्थ के अनुसार अपनेपन और संसार के अभाव का नाम ही निर्वाण है। जिस अवस्था में न संसार है, न मैं हूँ, वह स्थिति दुर्बोध और गम्भीर है, यही स्थिति निर्वाण है। बौद्ध दर्शन में निर्वाण शब्द का बहुत प्रयोग हुआ है। वहाँ सर्वत्र इसका अभिप्राय मुक्ति से ही लिया गया है। उनका मन्तव्य है कि जिस प्रकार ईंधन न होने पर अग्नि निर्वाण की प्राप्त हो जाती है (बुझ जाती है), ठीक उसी तरह काम, कोध, लोभ और मोह जनित संस्कार के समूल नष्ट हो जाने से सत्ता या अस्तित्व का विलोप हो जाता है। सत्ता का निरोध ही निर्वाण कहलाता है। अश्वघोष ने बुद्ध चरित में उल्लेख किया है- करुणायमाना न्यायस्यो मृत्युभयविमोहिताः। नैर्वाणे स्थापनीयास्तत् पुनर्जन्मनिवर्त्तके (हि०वि०को०खं० १२ पृ० ७१) अर्थात् निर्वाण द्वारा पुनर्जन्म से निवृत्ति हो जाती है। समस्त (अच्छे या बुरे) संस्कारों का क्षय हो जाने पर पुनर्जन्म से निवृत्ति हो जाती है (हि०वि०को०)। अस्तु, संस्कार समूह के क्षय हो जाने पर ही निर्वाण को प्राप्ति होती है। बोधिचर्यावतार ग्रन्थ में उल्लेख है कि सर्वत्याग (जगत्, सुख-दुःख और अभिमान आदि सभी का त्याग) का ही दूसरा नाम निर्वाण है-सर्वत्यागश्च निर्वाणं निर्वाणार्थि च मे मनः (हि०वि०को०खं० १२ पृ० ७२)। निरालम्ब उपनिषद् के अनुसार मुक्ति या मोक्ष (निर्वाण) नित्य और अनित्य वस्तुओं के विचार से नश्वर संसार के सुख-दुःख प्रदाता सम्पूर्ण विषयों से ममत्व रूप बन्धन को नष्ट कर देना है-मोक्ष इति च नित्यानित्यवस्तु विचारादनित्य संसारसुखदुःखविषयसमस्तक्षेत्रममताबन्धक्षयो मोक्षः (निरा० २९)। गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने ज्ञानाग्नि द्वारा समस्त कर्मों के क्षय का उपदेश दिया है-ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा (गी० ४.३७)। आत्मज्ञान हो जाने पर समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं। ब्रह्म की अनुभूति हो जाने पर साधक अपने को अजर, अव्यय, सूक्ष्म, अक्षर, अविकल, निर्मल और निर्वाण मूर्ति अनुभव करने लगता है। "एकोऽहम ...........निर्वाणमयसंविदम्" (मैत्रे० १.१४)। १५७. निर्विकल्प - द्र०-ज्ञानखण्ड -समाधि। १५८. निर्विकार - द्र०-चिद्घन। १५९. निष्कल - द्र०-चिद्घन। १६०. निष्काम कर्म - द्र०- ज्ञानखण्ड। १६१. पञ्चकोश-द्र०- ज्ञानखण्ड। १६२. पञ्चतत्त्व-पञ्च तन्मात्राएँ- सम्पूर्ण सृष्टि पञ्चतत्त्वों अथवा पञ्चमहाभूतों से निर्मित मानी जाती है। यह शरीर भी पञ्चतत्त्वों का ही बना हुआ है। ये पाँच तत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। ये ही पाँचों तत्त्व समस्त पद के रूप में पंच तत्त्व कहलाते हैं। प्रख्यात कोशग्रन्थ वाचस्पत्यम् में उल्लेख है-पञ्चानां तत्त्वानां समाहारः। पञ्चसु भूतेषु स्वरोदयः। तंत्र ग्रन्थों में पञ्च मकार-मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन को पञ्च तत्त्व कहा गया है- "मद्यं मांसं तथा मत्स्यो मुद्रा मैथुनमेव च। पञ्चतत्त्वमिदं प्रोक्तं देवि! निर्वाणहेतवे। मकारपञ्चकं देवि! देवानामपि दुर्लभम्। पञ्चतत्त्वविहीनानां कलौ सिद्धिर्न जायते (वाच० पृ०-४१८४)" अर्थात् मद्य-मांसादि पञ्च तत्त्व देवों को भी दुर्लभ हैं। इनके बिना कलियुग में निर्वाण सिद्धि नहीं मिल पाती। यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह आलङ्कारिक वर्णन है। प्रत्यक्षतः इनका सेवन करके सिद्धि प्राप्त होने की बात नहीं कही गई है। अन्य तन्त्रग्रन्थों में गुरुतत्त्व, मंत्र तत्त्व, मनस्तत्त्व, देवतत्त्व और ध्यान तत्त्व इन्हें पञ्चतत्त्व माना गया है- गुरुतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं मनस्तत्त्वं सुरेश्वरि! देवतत्त्वं ध्यानतत्त्वं पञ्चतत्त्वं प्रकीर्तितम् (निर्वाण तंत्र)। सृष्टि में विद्यमान जिन पञ्चतत्त्वों का वर्णन है, वे पृथ्वी आदि पञ्चतत्त्व ही हैं। रामचरित मानस के किष्किन्धा काण्ड में एक चौपायी में इन तत्त्वों का उल्लेख इन शब्दों में हुआ है-क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा। पञ्च रचित अति अधम सरीरा ।। त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद् में इस अखिल जगत् को उत्पत्ति के क्रम में भी पञ्च तत्त्वों का उल्लेख मिलता है-इन तत्त्वों का अनुपात इस प्रकार है-पृथ्वी १/२+जल १/८+अग्नि १/८+आकाश १/८+वायु १/८=पृथ्वीतत्त्व, इसी प्रकार अन्य चारों तत्त्वों के १/२ अंश में शेष चारों तत्त्वों का अनुपात १/८, १/८ होने पर ही वे

पूर्ण तत्त्व बनते हैं। जाबाल दर्शनोपनिषद् में शरीर स्थित अङ्ग विशेषों में तत्त्वों की प्रधानता के सन्दर्भ में इस प्रकार उल्लेख है- देहमध्यगते व्योम्नि बाह्याकाशं तु धारयेत्। प्राणे बाह्यानिलं तद्वज्ज्वलने चाग्निमौदरे। आकाशांशस्तथा प्राज्ञः मूर्धांशः परिकीर्तितः (जा०दर्शनो० ८.१-५) अर्थात् तत्त्वाधिक्य की दृष्टि से पाँव से घुटने तक का भाग (पृथिवी तत्त्व के आधिक्य के कारण) पृथिवी तत्त्व का भाग कहलाता है, घुटने से गुदा तक जलीय अंश, गुदा से हृदय तक का अग्न्यंश, हृदय से भौहों तक वाय्वंश तथा मस्तक क्षेत्र आकाशांश कहा गया है। इन तत्त्वों में देवों के ध्यान के सन्दर्भ में वर्णन है कि पृथिवी तत्त्वांश में ब्रह्मा का, जलतत्त्वांश में विष्णु का, अग्नितत्त्वांश में महेश का, वायुतत्त्वांश में ईश्वर का तथा आकाश तत्त्वांश में सदाशिव का ध्यान करना चाहिए-ब्रह्माणं पृथिवीभागे विष्णुं तोयांशके तथा। अग्न्यंशे च महेशानमीश्वरं चानिलांशके। आकाशांशे महाप्राज्ञ धारयेत्तु सदाशिवम् (जा०दर्शनो० ८.५-६)। १६३. पञ्चमहायज्ञ - द्र०-वानप्रस्थ । १६४. पञ्चमात्रा - द्र०-अवधूत। १६५. परब्रह्म - द्र०- ज्ञानखण्ड -ब्रह्म । १६६. परमगति - द्र०-ज्ञानखण्ड । १६७. परमज्योति - द्र०-चिद्घन । १६८. परम तत्त्व- द्र०चिद्घन । १६९. परम पद - द्र०-ज्ञानखण्ड । १७०. परमपुरुष-द्र०-चिद्घन। १७१. परम व्योम- वेद, उपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में परमव्योम शब्द का उल्लेख हुआ है। व्योम शब्द सामान्यतः अन्तरिक्ष या आकाश के लिए प्रयुक्त होता है; किन्तु इसमें परम विशेषण जोड़ देने से इसका अर्थ पराचेतना हो जाता है, जो सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का मूल कारण है। ऋग्वेद १.१६४.३९ में वेदों की ऋचाओं के परमव्योम में स्थित होने का वर्णन है- ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः अर्थात् अविनाशी ऋचाएँ परमव्योम में विद्यमान हैं, जहाँ सम्पूर्ण देव शक्तियों का वास है। कहा जाता है कि प्रलय हो जाने पर भी यह दिव्य ज्ञान तथा सृष्टि के तत्त्व कभी नष्ट नहीं होते; वरन् अपनी परम चेतना, पराचेतना या परमव्योम में समाहित हो जाते हैं और जब पुनः सृष्टि का आविर्भाव होता है, तब प्रकट होते हैं। यों तो यह बात कल्पित जैसी लगती है; किन्तु इसकी यथार्थता को कम्प्यूटर तन्त्र के मास्टर कम्प्यूटर के उदाहरण से स्पष्टतया समझा जा सकता है- जिस प्रकार मास्टर कम्प्यूटर के साथ माइक्रोवेव टावर्स द्वारा विभिन्न कम्प्यूटर जुड़े रहते हैं। देश के किसी भी कम्प्यूटराइज्ड रेलवे स्टेशन से कहीं के भी रेलवे का टिकट बुक कराने से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय आँकड़ों को जानने तक में कम्प्यूटर की इस प्रणाली का उपयोग किया जाता है, किन्तु यदि किसी कम्प्यूटर में गड़बड़ी हो जाये, तो उसके पर्दे पर आँकड़े न आने पर भी वे पूर्णतः नष्ट नहीं होते, वरन् अपने मास्टर कम्प्यूटर में समा जाते हैं। जब मशीनरी ठीक हो जाती है, तो वे आँकड़े पुनः उस कम्प्यूटर पर भी आने लगते हैं, जो कुछ समय पहले खराब हो गया था। ठीक इसी तरह पराचेतना-परमव्योम में सम्पूर्ण ज्ञान व सृष्टि के सभी तत्त्व अवस्थित रहते हैं। पृथिवी आदि किसी एक केन्द्र (ग्रह) के नष्ट हो जाने पर भी वे नष्ट नहीं होते तथा परम व्योम में समाहित हो जाते हैं और नये सिरे से पुनः प्रकट होते हैं। ऋग्वेद में वाणीरूपी गौ के सहस्राक्षरों से युक्त होकर परम व्योम में संख्यात होने को बात इस मंत्र में द्रष्टव्य है- गौरीर्भिमाय ...सहस्राक्षरा परमे व्योम (ऋ० १.१६४. ४१)। एकाक्षरोपनिषद् में भी उस अक्षर ब्रह्म को संसार का आदि कारण, समस्त प्राणियों का स्वामी, पुराण पुरुष तथा समस्त भुवनों का रक्षक कहकर उस पराचेतना का ही संकेत दिया गया है- एकाक्षरंत्वक्षरेऽत्रास्ति ...भुवनस्य गोप्ता (एकाक्षरो० १)। उस एकाक्षर ब्रह्म को हिरण्यगर्भ स्वरूप कहकर प्राणियों के हृदय व्योम (हृदयाकाश) में प्रकाशित होने वाला विवेचित किया गया है- वितत्य बाणं तरुणार्कवर्णं व्योमान्तरे भासि हिरण्यगर्भः ...... अरिष्टनेमिः (एकाक्षरो०४) । ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में उस विराट् ब्रह्म को त्रिपादूर्ध्व कहकर यह बताया गया है कि उसके एक चरण में ये समस्त प्राणी हैं तथा तीन चरण अनन्त दिव्य लोक (परम व्योम) में स्थित हैं- ... पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि (ऋ० १०.९०.३) त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः ....अभि (ऋ० १०.९०.४) । अध्यात्मोपनिषद् में उल्लेख है कि जिस प्रकार घटाकाश (शरीर स्थित आकाश), महाकाश (परमव्योम) में स्थित है, उसी प्रकार परमात्मा में आत्मा को एकरूप करके योगी को

परिशिष्ट ३७५ पुर्यष्टक सतत शान्त रहना चाहिए-घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परमात्मनि .........तूष्णीं भव सदा मुने (अध्यात्मो० ७)। १७२. परमसिद्धान्तश्रवण - द्र०-निदिध्यासन। १७३. परमहंस - द्र०-अवधूत। १७४. परमात्मभाव - द्र०- अद्वयानन्द । १७५. परमानन्द - द्र०-अद्वयानन्द । १७६. परलोक - द्र०-ज्ञानखण्ड - परलोक, समलोक । १७७. परात्पर-द्र०-चिद्घन । १७८. परिव्राजक - द्र०-ज्ञानखण्ड-परिव्रज्या, परिव्राजक । १७९. पश्चिमलिङ्ग- भारतीय संस्कृति में चार आश्रम माने गये हैं, जो जीवन को चार भागों में विभाजित करते हैं। जीवन के प्रथम चरण का आश्रम ब्रह्मचर्य, द्वितीय चरण का गृहस्थ, तृतीय चरण का वानप्रस्थ और चतुर्थ चरण का आश्रम संन्यास कहलाता है। संन्यास आश्रम में रहने वाले व्यक्ति को परिव्राजक भी कहते हैं। इनका प्रमुख कार्य अपने को पूर्णरूपेण परिष्कृत करके सतत लोकोपयोगी कार्यों में अपने को निरत रखकर परिव्रज्या करना होता है। संन्यासियों के कुछ चिह्न भी होते हैं, जैसे- शिक्य, कमण्डलु, दण्ड आदि। इन चिह्नों को धारण करने वाले संन्यासी (परिव्राजक) व्यक्त विष्णुलिङ्ग कहलाते हैं। उल्लेखनीय है कि परिव्राजकों (संन्यासियो) को विष्णुरूप मानने के कारण उन्हें विष्णुलिङ्ग कहते हैं। इनमें कुछ पूर्व लिङ्ग तथा कुछ पश्चिम लिङ्ग परिव्राजक कहलाते हैं-परिव्राजकाः पश्चिमलिङ्गाः (निर्वाणो० ३)। पूर्वेोलिङ्ग (व्यक्त विष्णु लिङ्ग) परिव्राजक होते हैं, जो संन्यास के गुणों, दया, क्षमा, करुणा, निरहंकारिता, निर्विकारिता आदि गुणों को धारण करके संन्यासी के बाह्य लिङ्ग (चिह्न) शिक्य, कमण्डलु, दण्ड आदि भी धारण करते हैं। पश्चिम लिङ्ग अथवा (अव्यक्त विष्णुलिङ्ग) परिव्राजक (संन्यासी) उन्हें कहते हैं, जो बाह्य चिह्न धारण न करके भी अन्तःकरण में संन्यासियों के समस्त गुण धारण किये रहते हैं। इन्हें ही अव्यक्त विष्णु लिङ्ग परिव्राजक भी कहते हैं। अड्यार से प्रकाशित निर्वाणोपनिषद् की टीका में ब्रह्मयोगी ने लिखा है-पश्चिममन्तः संन्यासलक्षणमव्यक्तविष्णुलिङ्गिनश्चेति ....स्वबाह्यान्तर्विलसितविक्षेपग्रासव्याक्ताव्यक्तविष्णुलिङ्गधारिण इत्यर्थः (निर्वाणो० १.५८ टीका)। १८०. पाप-पुण्य - द्र०-ज्ञानखण्ड - पाप-पुण्य । १८१. पिङ्गला - द्र०-ज्ञानखण्ड - सुषुम्ना नाड़ी। १८२. पितर - द्र०-ज्ञानखण्ड । १८३. पुनर्जन्म-द्र०-ज्ञानखण्ड । १८४. पुराण-पुरुष- द्र०-चिद्घन। १८५. पुर्यष्टक - यह शरीर विभिन्न तत्त्वों से निर्मित है। प्रत्यक्षतः यह स्थूल शरीर ही दिखाई देता है। यह भी पृथिवी, जल, वायु, अग्नि और आकाश तत्त्वों के सम्मिलन से निर्मित है। इसके अतिरिक्त इसी के अन्दर दो अदृश्य शरीर और हैं, जिन्हें सूक्ष्म व कारण शरीर कहा जाता है। इन दोनों शरीरों की रचना में पृथिवी आदि स्थूल पञ्चतत्त्व न होकर इनके सूक्ष्म तत्त्व रहते हैं। वेदान्त में सूक्ष्म शरीर को लिङ्ग शरीर भी कहते हैं। इसे देखा या स्पर्श नहीं किया जा सकता; वरन् अनुमान किया जा सकता है। सुख-दुःखादि की अनुभूति सूक्ष्म शरीर द्वारा ही होती है। लिङ्ग शरीर का अर्थ करते हुए स्वामी रामतीर्थ ने लिखा है- लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, तानि च तानि शरीराणि च .... लिङ्गशरीराणि . (वे०सा० टीका खं० १३) अर्थात् जिसके माध्यम से प्रत्यगात्मा के सद्भाव का ज्ञान होता है, वह लिङ्ग शरीर है। स्थूल शरीर के अन्त हो जाने पर, यह सूक्ष्म शरीर (लिङ्ग शरीर) ही निकलकर अन्य स्थूल शरीर में प्रविष्ट होकर, नूतन जन्म धारण करता है। वेदान्त में सूक्ष्म शरीर के सत्रह तत्त्व (अंग) माने गये हैं। ये तत्त्व पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, पञ्च वायु (प्राण), मन और बुद्धि हैं। शारीरकोपनिषद् में सूक्ष्म शरोर के अंग इन शब्दों में वर्णित हैं- 'बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशभिः सुसूक्ष्मं लिङ्गमुच्यते (शारीरको० ५)। ब्राह्मणग्रंथों में सूक्ष्म शरीर या लिंग शरीर के सत्रह अंगों की गणना एक अन्य प्रकार से भी की गई है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार पाँच सूक्ष्मभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) और पंच वृत्तियों (प्राण,