१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४६३ करे, वह सारे जन्म के पापों को नष्ट कर देता है। जो ब्राह्मण इस गायत्री रहस्य को पढ़े तो उसने मानों गायत्री मन्त्र को साठ हजार लाख बार जप लिया है। उसने सारे वेदों का अध्ययन कर लिया। सभी तीर्थों में उसने स्नान कर लिया। न पीने लायक (शराब आदि) को पीने से जो पाप होता है उससे भी मुक्त हो जाता है। न खाने लायक को खाने से हुए पाप से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मचारी न भी हो तो ब्रह्मचारी के समान तेजस्वी हो जाता है। पंक्तियों में हजार बार (अपेय) पान कर पवित्र हो जाता है। तथा आठ ब्राह्मणों को इसका ग्रहण करवाकर, बताकर समझाकर ब्रह्मलोक को चला जाता है। ये सब भगवान् (प्रजापति) ब्रह्मा ने इस प्रकार उत्तर देकर समझाया। ॥ गायत्री रहस्योपनिषद् समाप्त ॥ —:o:—
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सावित्र्युपनिषत्
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निरा- कुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों; वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और सब इन्द्रियाँ वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं । मुझ से ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । ऐसे ब्रह्मरत रहते हुये मुझको उपनिषदों में प्रतिपादित ब्रह्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्ति, शान्तिः शान्तिः । कः सविता का सावित्री ? अग्निरैव सविता पृथिवी सावित्री स यत्राग्निस्तत् पृथिवी यत्र वा पृथिवी तत्राग्निस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥१॥ कः सविता का सावित्री ? वरुण एव सविताऽऽपः सावित्री स यत्र वरुणस्तदापो यत्र वा आपस्तद्वरुण- स्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥२॥ कः कविता काः सावित्री ? वायुरेव सविताऽऽकाशः सावित्री स यत्र वायुस्तदाकाशो यत्र वा आकाशस्तद्वायुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ३ ॥ कः सविता का सावित्री ? यज्ञ एव सविता छन्दांसि सावित्री स यत्र यज्ञस्तच्छ- न्दांसि यत्र वा छन्दांसि स यज्ञस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥४॥ कः सविता का सावित्री ? स्तनयित्नुदेव सविता, विद्युत् सावित्री
सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६५
स यत्र स्तनयित्नुस्तद्विद्युत् यत्र वा विद्युत्त स्तनयित्नुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ५ ॥ कः सविता का सावित्री ? आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री स यत्रादित्यस्तद् द्यौर्यत्र वा द्यौस्तदादि- त्यस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ६ ॥ कः सविता का सावित्री ? चन्द्र एव सविता नक्षत्राणि सावित्री स यत्र चन्द्रस्तन्नक्षत्राणि यत्र वा नक्षत्राणि स चन्द्रमास्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ७ ॥ कः सविता का सावित्री ? मन एव सविता वाक् सावित्री स यत्र वा मनस्तद्वाक् यत्र वा वाक् तन्मनस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथु- नम् ॥ ८ ॥ कः सविता का सावित्री ? पुरुष एव सविता स्त्री सावित्री स यत्र पुरुषस्तत् स्त्री यत्र वा स्त्री तत् पुरुषस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ९ ॥
सविता किसे कहते और सावित्री किसे ? अग्नि सविता और पृथिवी सावित्री हैं। जहाँ अग्नि हैं वहीं पृथिवी हैं और जहाँ पृथिवी हैं वहाँ अग्नि हैं । वे दोनों योनि अर्थात् संसार के जन्मदाता हैं, वे दोनों एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? वरुण देव ही सविता हैं और जल ही सावित्री, जहाँ वरुण देवता हैं वहीं जल है और जहाँ जल है वहीं वरुण देवता हैं । दोनों योनि अर्थात् संसार के उत्पत्ति- कर्ता हैं । वे दोनों एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? वायु सविता हैं और आकाश सावित्री । जहाँ वायु देव हैं वहीं आकाश है । जहाँ आकाश है वहीं वायु देव हैं । ये दोनों योनि हैं, एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? यज्ञ देव सविता हैं और छन्द सावित्री । जहां यज्ञ देव हैं वहीं छन्द हैं । जहाँ छन्द हैं वहीं यज्ञ देव हैं । वे दोनों योनि हैं एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? गरजन करने वाले बादल सविता हैं और विद्युत सावित्री । जहाँ गरजन करने वाले बादल हैं वहीं विद्युत हैं । जहाँ
विद्युत हैं वहीं गरजन करने वाले बादल हैं। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? सूर्य को सविता कहते हैं और द्युलोक को सावित्री। जहां सूर्यदेव हैं वहीं द्युलोक हैं, जहां द्युलोक हैं, वहीं सूर्यदेव हैं। वे दोनों योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते और सावित्री किसे ? चन्द्रदेव को ही सविता कहते हैं और नक्षत्र को सावित्री। जहां चन्द्रदेव हैं वहीं नक्षत्र हैं। जहाँ नक्षत्र हैं वहीं चन्द्रदेव हैं। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? मन को ही सविता कहा गया है और वाणी को सावित्री, जहाँ मन है वहीं वाणी है, जहाँ वाणी है वहीं मन है। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? पुरुष को ही सविता कहा गया है और स्त्री को सावित्री। जहाँ पुरुष है वहीं स्त्री है, जहाँ स्त्री है वहीं पुरुष है। वे दोनों एक योनि हैं। एक युग्म हैं ॥ १-६ ॥ तस्या एव (ष) प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमित्यग्नि- र्वै वरेण्यमापो वरेण्यं चन्द्रमा वरेण्यम् ॥ १० ॥ तस्या एव (ष)- द्वितीयः पादो भर्गमयो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीत्यग्निर्वै भर्ग आदित्यो वै भर्गश्चन्द्रमा वै भर्गः ॥ ११ ॥ तस्या एष तृतीयः पादः स्वधियो यो नः प्रचोदयादिति स्त्री चैव पुरुषश्च प्रजयनतः ॥ १२ ॥ यो वा एतां सावित्रीमेवं वेद स पुनर्मृत्युं जयति ॥ १३ ॥ सावित्री का पहला पाद—'भूः—तत्सवितुर्वरेण्यम' है। अग्नि, जल व चन्द्रमा देवता ही वरेण्य हैं। सावित्री का दूसरा पाद है 'भुवः— भर्गो देवस्य धीमहि' वह तेजोमय है। अग्नि, सूर्य व चन्द्रमा देवता ही वह भर्ग तेज हैं। सावित्री का तीसरा पाद है 'धियो योनः प्रचोदयात्।'
सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६७ इस सावित्री देवी को जो स्त्री और पुरुष गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए समझते हैं वे मृत्यु से छूट जाते हैं अर्थात् पुनः जन्म नहीं लेते ॥ १०–१३ ॥ बलातिबलयोर्विराट् पुरुष ऋषिः । गायत्री छन्द । गायत्री देवता । अकारोकारमकारा बीजाद्याः । क्षुधाऽऽदिनिरसने विनि- योगः । क्लामित्यादि षडङ्गम् । ध्यानम्— अमृतकरतलाग्रौ सर्वसंजीवनाढ्या- वघहरणसुदक्षो वेदसारे मयूखे । प्रणवमयविकारौ भास्कराकारदेहौ सततमनुभवेऽहं तौ बलातिबलान्तौ ॥ ओ३म् ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरु- षार्थसिद्धिप्रदे तत्सवितुर्व्वरदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्त वर- दात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुच्छ्रमोपनाशिनी धीमहि धियो यो नजर्ति प्रचुर्या या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहाः ॥ १४ ॥ एवं विद्वान् कृतकृत्यो भवति सावित्र्या एव सलोकतां जयतीत्युपनिषत् ॥ १५ ॥ बलि अतिबलि नाम की दो विद्याओं के ऋषि विराट पुरुष हैं और उनका छन्द और देवता गायत्री हैं । उसका 'अ'कार बीज है और 'उ'कार शक्ति । उनका 'म'कार कीलक है । भूख की निवृत्ति के लिए इसका विनियोग है । क्लीं के माध्यम से इनका षडङ्गन्यास करना चाहिए । ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम, ॐ क्लीं नेत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट् ।' अब ध्यान का वर्णन किया जाता है । मैं उन बला अतिबला
४६८ ] [ सावित्र्युपनिषत् विद्याओं के देवताओं को सदैव अनुभव करता हूं जो सूर्य के समान चमकते हुए शरीर वाले, प्रणव स्वरूप, किरणात्मक, वेदों के साररूप, पापों को समाप्त करने में दक्ष, सब तरह की सञ्जीवनी शक्तियों से अधिष्ठित हैं और जिनके हाथ अमृत से भरे हुए हैं। बलि और अतिबलि दोनों विद्याओं के देवताओं का मन्त्र इस प्रकार है:-- ॐ ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि- प्रदे तत्सवतुर्वरात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्व- दयामूर्ते बले सपंक्षुत्भ्रमोपनाशिनि धीमहिधियो या नो जाते ऽप्रचुर्य या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहा । इस तरह इन विद्याओं को जानने वाला धन्य हो जाता है। वह सावित्री देवी के लोक में पहुंचने की सामर्थ्य रखता है । यह उपनिषद् है ॥ १४ ॥ ॥ सावित्र्युपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सरस्वतीरहस्योपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रात्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयं प्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिये मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ । मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ऋषयो ह वै भगवन्तमाश्वलायनं संपूज्य पप्रच्छु— केनोपायेन तज्ज्ञानं तत्पदार्थविभासकम् । यदुपासनया तत्त्वं जानासि भगवन् वद ॥१॥ सरस्वतीदशश्लोक्या संऋचा बीजमिश्रया । स्तुत्वा जप्त्वा परां सिद्धमलभं मुनिपुंगवाः ॥२॥ ऋषय ऊचुः— कथं सारस्वतप्राप्तिः केन ध्यानेन सुव्रत । महासरस्वती येन तुष्टा भगवती वद ॥३॥
४७० ] सरस्वतीरहस्योपनिषत् स होवाचाश्वलायनः- अस्य श्रीसरस्वतीदशश्लोकमहामन्त्रस्य-अहमाश्वलायन ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीवागीश्वरी देवता । यद्वागिति बीजम् । देवीं वाचमिति शक्तिः । प्रणो देवीति कीलकम् । विनियोगस्तत्प्रीत्यर्थे । श्रद्धा मेधा प्रज्ञा धारणा वाग्देवता महासरस्वतीत्येतैरंगन्यासः ॥ ४ ॥ एक समय की बात है भगवान् आश्वलायन के निकट ऋषिगण गये और उनकी विधिवत् पूजा कर प्रश्न किया 'भगवन् ! जिस ज्ञान के द्वारा 'तत्' पदात्मक परमेश्वर का स्पष्ट बोध होता है, उस ज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार हो ? आपको जिस देवता की उपासना द्वारा तत्त्व- ज्ञान की प्राप्ति हुई है, इसके सम्बन्ध में बताने की कृपा करिये ।' भगवान् आश्वलायन ने कहा- 'ऋषियो ! मैंने बीज मन्त्र सहित दस ऋचाओं वाली सरस्वती दशश्लोकी के द्वारा उपासना करते हुए परासिद्धि को प्राप्त किया है ।' ऋषियों ने पुनः प्रश्न किया- 'हे श्रेष्ठव्रती महर्षे ? उस सारस्वत मन्त्र की उपलब्धि आपको किस ध्यान के द्वारा किस प्रकार हुई, जिससे आप पर भगवती महासरस्वतीजी का अनुग्रह हुआ है। हमारे प्रति भी उस उपाय को कहने की कृपा करें ।' इस पर उन प्रसिद्ध आश्वलायन ने कहा- 'इस श्री सरस्वती दशश्लोकी महामन्त्र का ऋषि मैं ही हूँ। इसका छन्द अनुष्टुप, देवता वागीश्वरी और बीज यद्वाग् है। शक्ति 'देवीं वाचं' कीलक 'प्रणो देवी' है। इसका विनियोग श्री वागीश्वरी देवता के प्रीत्यर्थ है। अंगन्यास श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, धारणा, वाग्देवता और महासरस्वती इन नाम-मन्त्रों से किया जाता है ॥ १-४ ॥ नीहारहारघनसारसुधाकराभा
सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४७१- CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri कल्याणदां कनकचम्पकदामभूषाम् । उत्तुंगपीनकुचकुम्भमनोहरांगीं वाणीं नमामि मनसा वचसां विभूत्यै ॥५ प्रणो देवीत्यस्य मन्त्रस्य—भरद्वाज ऋषिः। गायत्री छंदः। श्रीसरस्वती देवता । प्रणवेन बीज । शक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनियोगः । मन्त्रेण न्यासः ॥ ६ ॥ या वेदांतार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमेश्वरी । नामरूपात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥७ ॐ प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । धीनामवित्र्यवतु ॥८ आ नो दिव इति मन्धूस्य—अत्रिऋर्षिः। त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । ह्रीमिति बीजशक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनि- योगः । मन्त्रेण न्यास ॥ ६ ॥ या सांगोपांगवेदेषु चतुष्वेंकव गीयते । अद्वैता ब्रह्मणः शक्तिः सा मां पातु सरस्वती ॥१० ह्रीं आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । हवं देवी जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥११ पावका न इति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । श्रीमिति बीजशक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनियोगः मन्त्रेण न्यास ॥ १२ ॥ या वर्णपदवाक्यार्थस्वरूपेणैव वर्तते । अनादिनिधनाऽनन्ता सा मां पातु सरस्वती ॥१३ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४७२ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् श्रीं पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टुं धिया वसुः ॥१४ चोदयित्रीति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । ब्लूमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १५.॥ ध्यान इस प्रकार करना चाहिए—'कल्याण प्रदायिनी, हिम, कपूर, मुक्ता अथवा चन्द्रप्रभा के समान शुभ्र कान्तिवती, सुवर्ण के समान पीले चम्पक पुष्पों की माला से अलंकृत, उन्नत सुपुष्ट वक्ष सहित सुन्दर अंगवाली वागेश्वरी को मन और वाणी द्वारा विभूति की सिद्धि के निमित्त नमस्कार करता हूँ ।' 'ॐ प्रभो देवी' मन्त्र के ऋषि भरद्वाज, छन्द गायत्री और देवता सरस्वतीजी हैं । ॐ नमः' बीज, शक्ति तो है ही, साथ ही कीलक भी हैं । अभीष्ट कार्य की सिद्धि के निमित्त इसका विनियोग और मंत्र के द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । 'जिस सरस्वती का स्वरूप वेदांत का सारभूत ब्रह्मतत्व ही है और जो विभिन्न नाम रूपों में प्रकट हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका हों ।' दान से सुशोभित होने वाली, स्तोताओं की रक्षिका एवं अन्नवती भगवती सरस्वती हम साधकों को अन्न से परिपूर्ण करें । 'आ नो दिवा०' इस मंत्र के ऋषि अत्रि, छन्द त्रिष्टुभ् और देवता सरस्वती हैं । 'ह्रीं बीज, शक्ति और कीलक है । इच्छित कार्य की सिद्धि के लिए इसका विनियोग तथा इसी मन्त्र द्वारा न्यास किया जाता है । 'वेदों और उनके अङ्ग-उपांगों में जिन एक देव की स्तुति की जाती है तथा जो परमब्रह्म की अद्वैत शक्ति हैं, वे भगवती सरस्वती हमारी रक्षिका हों ॥ ५—१० ॥
सरस्वतीरहस्योपनिषत् [ ४७३ हमारे द्वारा उपासना के योग्य देवी सरस्वती ज्योतिर्मान् सुलोक से नीचे पर्वताकार मेघों के मध्य होती हुई हमारे यज्ञ में पधारें। वे देवी हमारे स्तोत्र से प्रसन्न होकर स्वेच्छा से हमारे सुख उत्पन्न करने वाले स्तोत्रों को श्रवण करें ॥ २ ॥ 'पावकानः' इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छदा, छन्द गायत्री, देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक 'श्रीं' है। इसका विनियोग कामना सिद्धि के निमित्त है तथा इसी मन्त्र द्वारा अंगन्यास करने का विधान है। 'जो वर्ण, पद, वाक्य में अर्थों सहित सर्वत्र व्याप्त है, जो आदि अन्त से परे एवं अनन्त रूप वाली हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करने वाली हों।' जो देवी सरस्वती सबको पवित्र करती हैं, जो अन्न और कर्म द्वारा प्राप्त होने वाले धन् के प्राप्त कराने में कारणरूपिणी हैं, वे देवी हमारे यज्ञ में आने की इच्छा करें ॥ ३ ॥ 'चोदयित्री०' इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छान्दा, छन्द गायत्री देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक 'ब्लूं' तथा कार्य पूर्ति के लिए इसका विनियोग एवं मन्त्र द्वारा ही अ ंगन्यास किया जाता है ॥११-१५॥ अध्यात्ममधिदैवं च देवानां सम्यगीश्वर । प्रत्यगास्ते वदंती या सा मां पातु सरस्वती ॥१६ ब्लूं चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥१७ महो अर्णोति मन्त्रस्य - मधुमच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । सौरिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १८ ॥ अन्तर्याम्यात्मना विश्वं त्रैलोक्यं या नियच्छति ।
४७४ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् रुद्रादित्यादिरूपस्था सा मां पातु सरस्वती ॥१९॥ सौः महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना । धियो विश्वा विराजति ॥२०॥ ‘ओ सरस्वती देवताओं की प्रेरणात्मिका शक्ति, अधिदैवरूपिणी एवं हमारे भीतर वाणी रूप में प्रतिष्ठित है, वे भगवती मेरी रक्षिका हों।’ ‘जो भगवती सत्य एवं प्रिय वाणी बोलने की प्रेरणा देती हैं तथा श्रेष्ठ बुद्धि वाले कर्मशील पुरुषों को उनके कर्त्तव्य का ज्ञान कराती हैं, उन्हीं देवी सरस्वती ने हमारे इस यज्ञ को धारण किया है। ‘महो अर्णः; इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छन्दा, छन्द गायत्री, और देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक ‘सौः’ है। इसमें मन्त्र के द्वारा ही न्यास किया जाता है। ‘जो सरस्वती अन्तर्यामी रूपसे लोकत्रय का नियंत्रण करने वाली हैं तथा जो रुद्र-आदित्य आदि अनेक देवताओं के रूप में अवस्थित हैं, वे हमारी रक्षिका हों। ‘नदी रूप में आविर्भूत सरस्वती अपने प्रवाह रूप कर्म के द्वारा अपने में निहित अगाध जल राशि का परिचय देती हैं। वे ही सरस्वती सब प्रकार की कर्त्तव्यात्मक बुद्धि का विकास करती हैं ॥१६-२०॥ चत्वारि वागिति मन्त्रस्य — उचथ्यपुत्र ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सरस्वती देवता । ऐमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २१ ॥ या प्रत्यग्दृष्टिभिर्जीवैर्व्यज्यमानाऽनुभूयते । व्यापिनी ज्ञप्तिरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥२२ ऐं चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
[Header] सरस्वतीरहस्योपनिषत् [ ४७५
गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥२३ यद्वाग्वदन्तीति मन्त्रस्य- भार्गव ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । क्लीमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २४ ॥ नामजात्यादिभिर्भेदैरष्टधा या विकल्पिता । निर्विकल्पात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥२५ क्लीं यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मंद्रा । चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम् ॥२६ 'चत्वारि वाक्०' ऋषि उचथ्य-पुत्र दीर्घतमा, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती, बीज, शक्ति, कीलक 'ऐं'। मन्त्र द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । जो सरस्वतीदेवी अन्तर्दृग् वाले जीवों के समक्ष विभिन्न रूपों में प्रकट होती तथा जो ज्ञप्ति रूपसे व्याप्त हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका बनें । वाणी, परा पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार पदों वाली है। इन पदों को ज्ञानी जन भले प्रकार जानते हैं । इनमें से प्रथम तीन तो हृदयगह्वर में स्थित होने से प्रकट नहीं होती । परन्तु वैखरी ही मनुष्यों के बोलने में प्रयुक्त होती है ॥ ५ ॥ 'यद्वाग्वदन्ति०' ऋषि भार्गव, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती है । बीज, शक्ति कीलक 'क्लीं' है। मन्त्र द्वारा ही न्यास होता है। 'जो देवी सरस्वती नाम-रूप के द्वारा अष्टधा बनी हुई तथा निर्विकल्प रूप में भी प्रकट हैं, वे भगवती मेरी रक्षा करने वाली हों।' दिव्य भावों को को प्रकट करने वाली और देवताओं को आनन्दित करने वाली, अज्ञानियों को ज्ञान प्रदान करती हुई यज्ञ में विराजमान
४७६ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् होने वाली देवी सब दिशाओं के निमित्त अन्न-जल दुहती है। जो इस मध्यमा वाणी में श्रेष्ठ है, उसका गमन कहाँ होता है ? ॥ ६ ॥ 'देवी वाच' ऋषि भार्गव, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती । बीज, शक्ति, कीलक 'सौः' है । मन्त्र द्वारा ही न्यास करना चाहिये । 'जिन वाणी रूपा भगवती सरस्वती का प्रकट अप्रकट वाणी वाले देवादि सम्पूर्ण जीव उच्चारण करते हैं तथा जो भगवती सभी इच्छित पदार्थों को दुग्ध रूप में प्रदान करने वाली कामधेनु हैं, वे मेरी रक्षा करें।' ॥ २१-२६ ॥ देवो वाचमिति मन्त्रस्य-भार्गव ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सरस्वती देवता । सौरिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २७ ॥ व्यक्ताव्यक्तगिरः सर्वे वेदाद्या व्याहरन्ति याम् । सर्वकामदुधा धेनुः सा मां पातु सरस्वती ॥२८ सौः देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपमुष्टुतैतु ॥२९ उत त्व इति मन्त्रस्य-बृहस्पतिर्ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । समिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ ३० ॥ यां विदित्वाऽखिलं बन्धं निर्मथ्या खिलवर्त्मना । योगी याति परं स्थानं सा मां पातु सरस्वती ॥३१ स उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वां विसस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥३२ अम्बितम इति मन्त्रस्य-गृत्समद ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । ऐमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ ३३ ॥
सरस्वतीरहस्योपनिषद् ] [ ४७७ नामरूपात्मकं सर्वं यस्यामावेश्यतां पुनः । ध्यायन्ति ब्रह्मरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥३४ ऐं अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥३५ जो प्रकाशमती वैखरी वाणी प्राण रूप से देवताओं द्वारा उत्पन्न हुई है, उस वाणी का अनेक प्रकार के देहधारी उच्चारण करते हैं । कामधेनु के समान सुख देने वाली तथा अन्न-बल प्रदायिनी वाणी रूपिणी देवी श्रेष्ठ स्तुतियों से प्रसन्न होती हुई हमारे समीप प्रकट हों । ‘उत त्व०’ ऋषि वृहस्पति, छन्द त्रिष्टुप, देवता सरस्वती । बीज शक्ति और कीलक ‘सं’ । मन्त्र द्वारा ही न्यास करना चाहिए । ‘जिन सरस्वती को ब्रह्मविद्या रूप से जान लेने पर योगीराज सभी बन्धनों को काट डालते हैं, जिससे पूर्ण मार्ग द्वारा उन्हें परमपद की प्राप्ति होती है, वे देवी मेरी रक्षा करने वाली हों ।’ वाणी को देखकर भी कुछ लोग उसे नहीं देखते, सुनकर भी नहीं सुनते । परन्तु कुछ लोग तो ऐसे भाग्यशाली हैं जिनके सामने जैसे पतिक्रामा स्त्री अपने पति के समक्ष अनावृत्त रूप में उपस्थित होती है, वैसे ही ये वाग्देवी अपने स्वरूप को प्रकट कर देती हैं । ‘अम्बित मे’ ऋषि गृत्समद, छन्द अनुष्टुप् देवता, सरस्वती, बीज, शक्ति कीलक ‘ऐं’। मन्त्र द्वारा न्यास करें । जिन सरस्वती देवी में ब्रह्मतत्ववेत्ताजन नाम-रूप वाले सम्पूर्ण प्रपञ्च को आविष्ट करते हुए उनका ध्यान करते हैं, वे देवी मेरी रक्षिका हों । हे सरस्वते ! तुम देवियों में, नदियों में और माताओं में भी सर्वश्रेष्ठ हो । हम धन के अभाव से निन्दा को प्राप्त हुए के समान हो रहे हैं । तुम हमें धन रूप समृद्धि दो ॥ २७-३५ ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [सरस्वती रहस्योपनिषत् ४७८ ] चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूमर्म । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥३६ नमस्ते शारदे देवि काश्मोरपुरवासिनी । त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे ॥३७ अक्षसूत्राङ्कुशधरा पाश पुस्तकधारिणी । मुक्ताहारसमायुक्ता वाचि तिष्ठतु मे सदा ॥३८ कम्बुकण्ठी सुताम्रोष्ठी सर्वाभरणभूषिता । महासरस्वती देवी जिह्वाग्रे संनिवेश्यताम् ॥३९ या श्रद्धा धारणा मेधा वाग्देवी विधिवल्लभा । भक्तजिह्वाग्रसदना शमादिगुणदायिनी ॥४० नमामि यामिनीनाथलेखाऽलंकृतकुन्तलाम् । भवानीं भवसंतापनिर्वापणसुधानदीम् ॥४१ यः कवित्वं निरातङ्कं भुक्तिमुक्ती च वाञ्छति । सोऽभ्यर्च्यैनां दशश्लोक्या नित्यं स्तौति सरस्वतीम् ॥४२ तस्यैवं स्तुवतो नित्यं समभ्यर्च्य सरस्वतोम् । भक्तिश्रद्धाऽभियुक्तस्य षाण्मासात् प्रत्ययो भवेत् ॥४३ ततः प्रवर्तते वाणी स्वेच्छया ललिताक्षरा । गद्यपद्यात्मकः शब्दैरप्रमेयैर्विवशितैः ॥४४ अश्रुतो बुध्यते ग्रन्थः प्रायः सारस्वतः कविः ॥४५ सा होवाच सरस्वती— आत्मविद्या मया लब्धा ब्रह्मणेव सनातने । ब्रह्मत्वं मे सदा नित्यं सच्चिदानन्दरूपतः ॥४६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
सरस्वतीरहस्योपनिषद् ] [ ४७६ जो सरस्वती ब्रह्मा के मुख-कमल रूप वन में राजहंस के समान विचरण करती हैं, वे श्वेत कान्ति और अंगवाली देवी हमारे मन रूपी हृदय में नित्य रमण करें। हे काश्मीरपुर वासिनी शारदे ! मैं नित्य तुम्हारी स्तुति करता हूँ। मुझे विद्या-दान दो। तुम्हें नमस्कार है। तुम अपनी चार भुजाओं में अक्षसूत्र, अंकुश, पाश और पुस्तक धारण करने वाली हो। तुम्हारे हृदय देश पर मुक्ताहार सुशोभित रहता है। तुम सदा मेरी वाणी में निवास करो। तुम्हारी ग्रीवा शंख के समान सुन्दर और लाल ओष्ठ हैं तथा तुम विभिन्न आभूषणों से अलंकृत हो। तुम मेरी जिह्वा के अग्रभाग में प्रतिष्ठित होओ। भक्तों की जिह्वा के अग्रभाग में निवास कर उन्हें शम दम प्रदान करने वाली वे सरस्वती श्रद्धा, धारणा और मेधा स्वरूपिणी तथा ब्रह्माजी की प्रियतमा हैं। चन्द्रकला से विभूषित केश-पाश वाली तथा संसार-बन्धन को काटने वाली अमृत जलयुक्त नदी रूपिणी भगवती सरस्वती को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कवित्व, भोग, निर्भयता अथवा मोक्ष की इच्छा करता हो वह इन दशों मन्त्रों के द्वारा भगवती सरस्वती की भक्ति पूर्वक पूजा-स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धा सहित विधिपूर्वक पूजा कर नित्य स्तुति करने वाला भक्त छः मास में ही उनकी कृपा को प्राप्त कर लेता है। इसके अनन्तर गद्य-पद्य से निहित सुन्दर शब्दों वाली वाणी उसके मुख से स्वयं ही उद्भूत होने लगती है। सरस्वती की भक्ति करने वाला कवि दूसरों से सुने बिना ही ग्रन्थों के अर्थों का समझने वाला होता है। हे विप्रो ! भगवती सरस्वती ने ही अपनी भक्ति के इस प्रभाव को अपने श्री मुख से कहा था। ब्रह्माजी के द्वारा ही पुरातन आत्मविद्या को प्राप्त कर सका और अब में सच्चिदा- नन्द रूप वाले नित्य ब्रह्मत्व से सम्पन्न हूँ ॥३६-४६॥ प्रकृतिवत्वं ततः सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यतः । सत्यामाभाति चिच्छाया दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥४७ तेन चित्प्रतिबिम्बेन त्रिविधा भाति सा पुनः ।
४८० ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत्
प्रकृत्यवच्छिन्नत या पुरुषत्वं पुनश्च ॥४८ शुद्धसत्त्वप्रघादायां मायायां बिम्बितो ह्यजः । सत्त्वप्रधाना प्रकृतिर्मयेति प्रतिपाद्यते ॥४९ सा माया स्ववशोपाधिः सर्वज्ञस्येश्वरस्य हि । वंश्यमायत्वमेकत्वं सर्वज्ञत्व च तस्य तु ॥५० सात्त्विकत्वात् समष्टित्वात् साक्षित्वाज्जगतामपि । जगत् कर्तुमकर्तुं वा चान्यथा कर्तुमीशते । यः स ईश्वर इत्युक्तः सर्वज्ञत्वादिभिर्गुणैः ॥५१ शक्तिद्वयं हि मायाया विक्षेपा वृतिरूपकम् । विक्षेप शक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत् सृजेत् ॥५२ अन्तर्दृग्दृश्योर्भेदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयोः । आवृणोत्यपरा शक्तिः सा संसारस्य कारणम् ॥५३ साक्षिणः पुरतो भातं लिङ्गदेहेन संयुतम् । चितिच्छायासमावेशाज्जीवः स्याद्व्यावहारिकः ॥५४ अस्य जीवत्वमारोपात् साक्षिण्यप्यवभास्ते । आवृत्तौ तु विनष्टायां भेदे भातेऽपयाति तत् ॥५५ तथा सर्गब्रह्मणोश्च भेदमावृत्य तिष्ठति । या शक्तिस्तद्वशाद्ब्रह्म विकृतत्वेन भासते ॥ . ६ अत्राप्यावृत्तिनाशे न विभाति ब्रह्मसर्गयोः । भेदस्तयोर्विकारः स्यात् सर्गे न ब्रह्मणि क्वचित् ॥५७ अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् । आद्यं त्रयं ब्रह्मरूप जगद्रूपं ततो द्वयम् । उपेक्ष्यं नामरूपे द्वे सच्चिदानन्तत्परः ॥५८
सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४८१ फिर सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों की समानता से प्रकृति रची गई। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है वैसे ही प्रकृति में चेतन का प्रतिबिम्ब सत्य के समान लगता है। उस चेतन के प्रतिबिम्ब से प्रकृति तीन प्रकार की लगती है । प्रकृति के योग से ही तुम्हें यह देह मिला है। सत्व गुण की प्रधानता वाली प्रकृति माया कही जाती है। उस माया में प्रतिबिम्बित चेतन ही अजन्मा है। यह माया सब के जानने वाले ब्रह्म की आज्ञाकारिणी उपाधि है। माया को अपने वश में रखना, अद्वितीय और सर्वज्ञ होना यही ब्रह्म के मुख्य लक्षण हैं। यह ब्रह्म सब लोकों के साक्षी स्वरूप होने के कारण संसार की रचना करने, न करने तथा उससे भी भिन्न कार्य करने में पूर्ण समर्थ हैं। विशेष और आवरण माया की यह दो शक्तियां कही गई हैं। विशेष रूप शक्ति लिंगदेह से ब्रह्माण्ड पर्यन्त सभी संसार की रचना करती है। आवरण शक्ति द्रष्टा और दृश्य के अन्तर को तथा ब्रह्म और सृष्टि के अन्तर को ढकने वाली है। साक्षी को वह लिंग-देह वाली प्रतीत होने से बन्धन के देने वाली है। चेतन का प्रतिबिम्ब जब कारण रूपा प्रकृति में निहित होता है तब विश्व में कार्यकारी जीव की उत्पत्ति होती है। आरोपित होने से उसका जीवत्व साक्षी रूप ब्रह्म में भी परिलक्षित होता हैं। आवरण-शक्ति के हट जाने पर भेद का स्पष्ट रूप से आभास होने लगता है और जीवत्व की स्थिति समाप्त हो जाती है। सृष्टि और ब्रह्म के भेद को आवृत करने वाली शक्ति के वशीभूत हुआ ब्रह्म विकारयुक्त प्रतीत होता है। आवरण के हटते ही ब्रह्म और सृष्टि के भेद की प्रतीति होने लगती है। परन्तु विकार की स्थिति ब्रह्म में नहीं होती, सृष्टि में ही होती है। अस्ति, भांति, प्रिय. रूप और नाम इन पांच अंशों में से प्रथम तीन तो ब्रह्म के स्वरूप हैं और नाम, रूप यह दोनों ही विश्व रूपार्थक हैं। दोनों से सम्बन्धित हो जाने पर ही ब्रह्म इस विश्व के रूप में स्थित होता है ।।१६-५०।।
४८२ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् समाधिं सर्वदा कुर्याद्धृदये वाऽथ वा बहिः ॥५८ सविकल्पो निर्विकल्पः समाधिर्द्विविधो हृदि । दृश्यशब्दानुभेदेन सविकल्पः पुनर्द्विधा ॥६० कामाद्याश्चित्तगा दृश्यास्तत्साक्षित्वेन चेतनम् । ध्यायेद्दृश्यानुविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥६१ असङ्गः सच्चिदानन्दः स्वप्रभो द्वैतवर्जितः । अस्मीतिशब्दविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥६२ स्वानुभूतिरसावेशाद्दृश्यशब्दद्यपेक्षितुः । निर्विकल्पसमाधिः स्यान्निवातस्थितदीपवत् ॥६३ हृदि वा बाह्यदेशेऽपि यस्मिन् कस्मिंश्च वस्तुनि । समाधिराद्यः सन्मात्रान्नामरूपपृथक्कृतिः ॥६४ स्तब्धीभावो रसास्वादात् तृतीयः पूर्ववन्मतः । एतैः समाधिभिः षड्भिर्नयेत् कालं निरन्तरम् ॥६५ देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परामृतम् ॥६६ भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्प कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥६७ मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो न प । इति यस्तु विजानाति स मुक्तो नात्र संशयः ॥ इत्युपनिषत् ॥६८ साधना करने वाला पुरुष बाह्याभ्यांतरिक रूप से सदा ही समाधिरत रहे। हृदय में सविकल्प और निर्विकल्प इन दो प्रकारों की समाधि होती है। सविकल्प समाधि के भी दो रूप हैं दृश्यानुविद्ध और शब्दानुबिद्ध। चित्त में जो कामादि विकारों की उत्पत्ति होती है, वे सब विकार दृश्य हैं और चेतन आत्मा उनके साक्षी रूप में है। यही