अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ७: सुमन्त्रका प्रत्यागमन, राजा दशरथका स्वर्गवास तथा भरतजीका आगमन
| ७८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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सप्तम सर्ग
सुमन्त्रका प्रत्यागमन, राजा दशरथका स्वर्गवास तथा भरतजीका ननिहालसे आना और वसिष्ठजीके आदेशसे पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करना ।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**इधर सायंकालके समय |
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| सुमन्त्रोऽपि तदाऽयोध्यां दिनान्ते प्रविवेश ह।<br>वस्त्रेण मुखमाच्छाद्य बाष्पाकुलितलोचनः ॥ १ ॥ | सुमन्त्रने भी वस्त्रसे मुख ढाँपकर नेत्रोंमें जल भरे हुए अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ १ ॥ रथको बाहर ही |
| बहिरेव रथं स्थाप्य राजानं द्रष्टुमाययौ।<br>जयशब्देन राजानं स्तुत्वा तं प्रणनाम ह ॥ २ ॥ | खड़ाकर वे राजाको देखनेके लिये अन्तःपुरमें गये और जय-शब्दसे उनकी स्तुतिकर उन्हें प्रणाम किया ॥ २ ॥ |
| ततो राजा नमन्तं तं सुमन्त्रं विह्वलोऽब्रवीत् ।<br>सुमन्त्र रामः कुत्रास्ते सीतया लक्ष्मणेन च ॥ ३ ॥ | राजाने सुमन्त्रको नमस्कार करते देख दुःखसे व्याकुल होकर कहा—"सुमन्त्र ! सीता और लक्ष्मणके सहित राम कहाँ हैं ? ॥ ३ ॥ तुमने रामको कहाँ |
| कुत्र त्यक्तस्त्वया रामः किं मां पापिनमब्रवीत् ।<br>सीता वा लक्ष्मणो वाऽपि निर्दयं मां किमब्रवीत् ४ | छोड़ा है ? उन्होंने मुझ पापीके लिये क्या कहा ? तथा सीता और लक्ष्मणने भी मुझ निर्दयीके लिये क्या कहा है ? ॥ ४ ॥ हा राम ! हा गुणनिधे ! हा |
| हा राम हा गुणनिधे हा सीते प्रियवादिनि ।<br>दुःखार्णवे निमग्नं मां म्रियमाणं न पश्यसि ॥ ५ ॥ | प्रिय-वादिनि सीते ! क्या तुम मुझको दुःख-समुद्रमें डूबकर मरते हुए नहीं देखते हो?" ॥ ५ ॥ |
| विलप्यैवं चिरं राजा निमग्नो दुःखसागरे ।<br>एवं मन्त्री रुदन्तं तं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥ | इस प्रकार बहुत देरतक विलाप करके राजा दुःख-समुद्रमें डूब गये । महाराजको इस प्रकार रोते देख मन्त्रीने हाथ जोड़कर कहा—॥ ६ ॥ "महाराज ! |
| रामः सीता च सौमित्रिर्मया नीता रथेन ते ।<br>शृङ्गवेरपुराभ्याशे गङ्गाकूले व्यवस्थिताः ॥ ७ ॥ | मैं राम, सीता और लक्ष्मणको आपके रथमें बैठाकर ले गया था । वे श्रृंगवेरपुरके पास गंगाजीके किनारे जाकर टिके ॥ ७ ॥ वहाँ निषादराज गुह कुछ फल- |
| गुहेन किञ्चिदानीतं फलमूलादिकं च यत् ।<br>स्पृष्ट्वा हस्तेन सम्प्रीत्या नाग्रहीद्विससर्ज तत् ॥८॥ | मूलादि ले आया, किन्तु रामजीने उन्हें ग्रहण नहीं किया, केवल प्रीतिपूर्वक हाथसे छूकर ही छोड़ दिया ॥ ८ ॥ तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने गुहसे वटका |
| वटक्षीरं समानाय्य गुहेन रघुनन्दनः ।<br>जटामुकुटमाबद्ध्य मामाह नृपते स्वयम् ॥ ९ ॥ | दूध मँगवाकर अपनी जटाओंका मुकुट बनाया और फिर वे स्वयं मुझसे बोले—॥ ९ ॥ "सुमन्त्र ! महाराज- |
| सुमन्त्र ब्रूहि राजानं शोकस्तेऽस्तु न मत्कृते ।<br>साकेतादधिकं सौख्यं विपिने नो भविष्यति ।१०। | से कहना वे हमारे लिये शोक न करें; हमें वनमें अयोध्यासे भी अधिक सुख प्राप्त होगा ॥ १० ॥ मातासे |
| मातुर्मे वन्दनं ब्रूहि शोकं त्यजतु मत्कृते ।<br>आश्वासयतु राजानं वृद्धं शोकपरिप्लुतम् ॥११॥ | भी मेरा प्रणाम कहकर कहना कि मेरेलिये शोक करना छोड़ दें । महाराज वृद्ध और शोकाकुल हैं, उन्हें भली प्रकार ढाँढस बँधाना" ॥ ११ ॥ हे नृपश्रेष्ठ ! |
| सीता चाश्रुपरीताक्षी मामाह नृपसत्तम ।<br>दुःखगद्गदया वाचा रामं किञ्चिदवेक्षती ॥१२॥ | तदनन्तर नेत्रोंमें जल भरकर कुछ-कुछ रामकी ओर देखते हुए सीताने दुःखसे गद्गद-कण्ठ हो मुझसे कहा—॥ १२ ॥ "दोनों सासुओंके चरण- |
सर्ग ७ ] 'अयोध्याकाण्ड ७९
साष्टाङ्गं प्रणिपातं मे ब्रूहि श्वश्वोः पदाम्बुजे ।
इति प्ररुदती सीता गता किञ्चिदवाङ्मुखी ॥१३॥
ततस्तेऽश्रुपरीताक्षा नावमारुरुहुस्तदा ।
यावद्गङ्गां समुत्तीर्य गतास्तावदहं स्थितः ॥१४॥
अतो दुःखेन महता पुनरेवाहमागतः ।
ततो रुदन्ती कौसल्या राजानमिदमब्रवीत् ॥१५॥
कैकेय्यै प्रियभार्यायै प्रसन्नो दत्तवान्वरम् ।
त्वं राज्यं देहि तस्यैव मत्पुत्रः किं विवासितः ॥१६॥
कृत्वा त्वमेव तत्सर्वमिदानीं किं नु रोदिषि ।
कौसल्यावचनं श्रुत्वा क्षते स्पृष्ट इवाग्निना ॥१७॥
पुनः शोकाश्रुपूर्णाक्षः कौसल्यामिदमब्रवीत् ।
दुःखेन म्रियमाणं मां किं पुनर्दुःखयस्यलम् ॥१८॥
इदानीमेव मे प्राणा उत्क्रमिष्यन्ति निश्चयः।
'शप्तोऽहं बाल्यभावेन केनचिन्मुनिना पुरा ॥१९॥
पुराहं यौवने दृप्तश्चापबाणधरो निशि ।
अचरं मृगयासक्तो नद्यास्तीरे महावने ॥२०॥
तत्रार्धरात्रसमये मुनिः कश्चित्तृषार्दितः ।
पिपासार्दितयोः पित्रोर्जलमानेतुमुद्यतः ।
अपूरयज्जले कुम्भं तदा शब्दोऽभवन्महान् ॥२१॥
गजः पिबति पानीयमिति मत्वा महानिशि ।
बाणं धनुषि सन्धाय शब्दवेधिनमक्षिपम् ॥२२॥
हा हतोऽस्मीति तत्राभूच्छब्दो मानुषसूचकः ।
कस्यापि न कृतो दोषो मया केन हतो विधे ॥२३॥
प्रतीक्षते मां माता च पिता च जलकाङ्क्षया ।
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तस्ततोऽहं पौरुषं वचः ॥२४॥
शनैर्गत्वार्थ तत्पार्श्व स्वामिन् दशरथोऽस्म्यहम् ।
अजानते मया विद्धस्त्रातुमर्हसि मां मुने ॥२५॥
कमलोंमें मेरा साष्टांग प्रणाम कहना।” ऐसा कह कुछ शिर झुकाकर रोती हुई वे वहाँसे चली गयीं ॥ १३ ॥ इसके पीछे वे सब नेत्रोंमें जल भरे हुए नावपर चढ़े । जबतक वे गङ्गाजीको पार कर उस पार पहुँचे तबतक मैं वहीं खड़ा रहा ॥ १४ ॥ फिर वहाँसे चलकर बड़े दुःखसे मैं यहाँ पहुँचा हूँ।”
तब कौसल्याने रोते हुए राजासे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥ “राजन् ! आपने यदि प्रसन्न होकर अपनी प्रिया कैकेयीको वर दिया तो भले ही आपने उसीके पुत्रको राज्य दिया होता, किन्तु मेरे पुत्रको देशनिकाला क्यों दिया ? ॥ १६ ॥ और अपने आप ही यह सारी करतूत करके अब आप रोते क्यों हैं ?” कौसल्याके ये वचन सुनकर महाराजको ऐसी वेदना हुई मानो घावमें अग्निका स्पर्श हो गया हो ॥ १७ ॥
तब महाराजने नेत्रोंमें शोकाश्रु भरकर कौसल्यासे कहा— “मैं तो आप ही दुःखसे मर रहा हूँ, फिर इस प्रकार मुझे और दुःख क्यों देती हो ? इससे क्या लाभ है ? ॥ १८ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि मेरे प्राण अभी निकलनेवाले हैं। पूर्वकालमें मेरी मूर्खताके कारण मुझे एक मुनीश्वरने शाप दिया था ॥ १९ ॥
(वह कथा इस प्रकार है—) पहले एक बार मैं युवावस्थाके मदसे उन्मत्त हुआ मृगयामें आसक्त होकर रात्रिके समय धनुष और बाण लिये एक घोर वनमें नदीके किनारे घूम रहा था ॥ २० ॥ उस आधी रातके समय किन्हीं प्यासे मुनीश्वरने अपने तृषित माता-पिताके निमित्त जल ले जानेके लिये जलमें घड़ा डुबोया; उस समय उसका महान् शब्द हुआ ॥ २१ ॥ तब यह सोचकर कि इस घोर रात्रिमें कोई हाथी जल पी रहा है मैने अपने धनुषपर शब्दवेधी बाण चढ़ाकर छोड़ा ॥ २२ ॥ वहाँपर मनुष्यकी सूचना देनेवाला यह शब्द हुआ 'हाय! मैं मारा गया ! हे विधे ! मैंने तो किसीका भी कोई अपराध नहीं किया था, फिर मुझपर यह वार किसने किया ? ॥ २३ ॥ हाय ! मेरे माता-पिता भी जलकी आकांक्षासे मेरी बाट देख रहे होंगे।' यह मानुष-वचन सुनकर मैं अत्यन्त भयभीत हुआ और धीरेसे उनके पास जाकर बोला— “प्रभो ! मैं दशरथ हूँ, मैंने ही अनजानमें यह बाण छोड़ा है; हे मुने ! आप मेरी रक्षा कीजिये” ॥ २४-२५ ॥
| ८० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ७ |
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इत्युक्त्वा पादयोस्तस्य पतितो गद्गदाक्षरः।
तदा मामाह स मुनिर्मा भैषीर्नृपसत्तम ॥२६॥
ब्रह्महत्या स्पृशेन्न त्वां वैश्योऽहं तपसि स्थितः।
पितरौ मां प्रतीक्षेते क्षुत्तृड्भ्यां परिपीडितौ ॥२७॥
तयोस्त्वमुदकं देहि शीघ्रमेवाविचारयन्।
न चेत्त्वां भस्मसात्कुर्यात्पिता मे यदि कुप्यति॥२८॥
जलं दत्त्वा तु तौ नत्वा कृतं सर्वं निवेदय।
शल्यमुद्धर मे देहात्प्राणांस्त्यक्ष्यामि पीडितः॥२९॥
इत्युक्तो मुनिना शीघ्रं बाणमुत्पाट्य देहतः।
सजलं कलशं धृत्वा गतोऽहं यत्र दम्पती ॥३०॥
अतिवृद्धावन्धदृशौ क्षुत्पिपासादितौ निशि।
नायाति सलिलं गृह्य पुत्रः किं वाऽत्र कारणम्॥३१॥
अनन्यगतिकौ वृद्धौ शोच्यौ तृट्परिपीडितौ।
आवामुपेक्षते किं वा भक्तिमानावयोः सुतः॥३२॥
इतिचिन्ताव्याकुलौ तौ मत्पादन्यासजं ध्वनिम्।
श्रुत्वा प्राह पिता पुत्र किं विलम्बः कृतस्त्वया।३३।
देह्यावयोः सुपानीयं पिव त्वमपि पुत्रक।
इत्येवं लपतोर्भीत्या सकाशमगमं शनैः ॥३४॥
पादयोः प्रणिपत्याहमब्रुवं विनयान्वितः।
नाहं पुत्रस्त्वयोध्याया राजा दशरथोऽस्म्यहम्।३५।
पापोऽहं मृगयासक्तो रात्रौ मृगविहिंसकः।
जलावचाराद्दूरेऽहं स्थित्वा जलगतं ध्वनिम्।३६।
श्रुत्वाहं शब्दवेधित्वादेकं बाणमथात्यजम्।
हतोऽस्मीति ध्वनिं श्रुत्वा भयात्तत्राहमागतः ॥३७॥
जटा विकीर्य पतितं दृष्ट्वाहं मुनिदारकम्।
भीतो गृहीत्वा तत्पादौ रक्ष रक्षेति चाब्रवम् ॥३८॥
"ऐसा कहकर मैं गद्गद-कण्ठ हो उनके चरणोंमें गिर पड़ा। तब उन मुनीश्वरने मुझसे कहा—'हे नृपश्रेष्ठ! डरो मत ॥२६॥ तुम्हें ब्रह्महत्या नहीं लगेगी, क्योंकि मैं तपस्यामें लगा हुआ वैश्य हूँ। मेरे माता-पिता भूख और प्याससे व्याकुल हुए मेरी बाट देखते होंगे ॥२७॥ इसलिये अब बिना कुछ सोच-विचार किये शीघ्र ही तुम उन्हें जल दे आओ, नहीं तो यदि मेरे पिता कुपित हो गये तो तुम्हें भस्म कर डालेंगे ॥२८॥ उन्हें जल देकर और नमस्कार कर अपना सारा कृत्य सुना देना। मुझे अत्यन्त पीड़ा हो रही है, तुम मेरे शरीरमेंसे बाण निकाल दो, अब मैं प्राण छोड़ूँगा' ॥२९॥
"मुनिके ऐसा कहनेपर मैंने तुरन्त ही उनके शरीरमेंसे बाण निकाल दिया और जलका घड़ा लेकर जहाँ उनके माता-पिता थे वहाँ गया ॥३०॥ उस समय वे इस प्रकार चिन्तामें व्याकुल हो रहे थे—'हम अत्यन्त वृद्ध और आँखोंसे लाचार हैं तथा भूख-प्याससे पीड़ित हो रहे हैं; क्या कारण है कि इस रात्रिके समयमें हमारा पुत्र अभीतक जल लेकर नहीं लौटा, हमारा और कोई सहारा नहीं है, हम वृद्ध, शोचनीय और प्याससे व्याकुल हैं। क्या कारण है कि ऐसी अवस्थामें हमारा पितृभक्त पुत्र हमारी उपेक्षा कर रहा है?' इसी समय मेरे पैरोंकी आहट सुनकर पिताने पूछा—"बेटा! आज तुमने इतनी देरी कैसे की? ॥३१-३३॥ लाओ, शीघ्र ही हमें पवित्र जल पिलाओ और तुम भी पिओ।" उनके इस प्रकार कहनेपर मैं डरते-डरते धीरेसे उनके पास गया ॥३४॥ और उनके चरणोंमें प्रणाम करके अति नम्रतापूर्वक कहा—'मैं आपका पुत्र नहीं हूँ, बल्कि अयोध्याका राजा दशरथ हूँ ॥३५॥ मैं पापात्मा मृगयाकी आसक्तिके कारण रात्रिके समय पशुओंका वध करता फिरता था। यद्यपि मैं उस समय जलके तीरसे दूर था किन्तु शब्दवेधी होनेके कारण जलमें हुए शब्दको सुनकर वहाँ मृग समझकर उसे मारनेके लिये मैंने एक बाण छोड़ दिया। पर जब मैंने यह शब्द सुना कि—'मैं मारा गया' तो डरता हुआ वहाँ आया ॥३६-३७॥ वहाँ आनेपर जब मैंने एक मुनिकुमारको जटा बिखेरे हुए पड़े देखा तो भयसे उसके चरण पकड़कर कहा 'रक्षा
सर्ग ७ ] अयोध्याकाण्ड ८१
माभैषीरिति मां प्राह ब्रह्महत्याभयं न ते ।
मत्पित्रोः सलिलं दत्त्वा नत्वा प्रार्थय जीवितम्॥३९॥
इत्युक्तो मुनिना तेन ह्यागतो मुनिहिंसकः ।
रक्षेतां मां दयायुक्तौ युवां हि शरणागतम् ॥४०॥
इति श्रुत्वा तु दुःखार्तौ विलप्य बहु शोच्य तम् ।
पतितौ नौ सुतो यत्र नय तत्राविलम्बयन् ॥४१॥
ततो नीतौ सुतो यत्र मया तौ वृद्धदम्पती ।
स्पृष्ट्वा सुतं तौ हस्ताभ्यां बहुशोऽथ विलेपतुः॥४२॥
हाहेति क्रन्दमानौ तौ पुत्रपुत्रेत्यवोचताम् ।
जलं देहीति पुत्रेति किमर्थं न ददास्यलम् ॥४३॥
ततो मामूचतुः शीघ्रं चितिं रचय भूपते ।
मया तदैव रचिता चितिस्तत्र निवेशिताः ।
त्रयस्तत्राग्निनुत्सृष्टे दग्धास्ते त्रिदिवं ययुः ॥४४॥
तत्र वृद्धः पिता प्राह त्वमप्येवं भविष्यसि ।
पुत्रशोकेन मरणं प्राप्स्यसे वचनान्मम ॥४५॥
स इदानीं मम प्राप्तः शापकालोऽनिवारितः ।
इत्युक्त्वा विललापाथ राजा शोकसमाकुलः ॥४६॥
हा राम पुत्र हा सीते हा लक्ष्मण गुणाकर ।
त्वद्वियोगादहं प्राप्तो मृत्युं कैकेयिसम्भवम् ॥४७॥
वदन्नेवं दशरथः प्राणांस्त्यक्त्वा दिवं गतः ।
कौसल्या च सुमित्रा च तथान्या राजयोषितः ।४८।
चुक्रुशुश्च विलेपुश्च उरस्ताडनपूर्वकम् ।
वसिष्ठः प्रययौ तत्र प्रातर्मन्त्रिभिरावृतः ॥४९॥
तैलद्रोण्यां दशरथं क्षिप्त्वा दूतानथाब्रवीत् ।
गच्छत त्वरितं साश्वा युधाजिन्नगरं प्रति ॥५०॥
तत्रास्ते भरतः श्रीमाञ्छत्रुघ्नसहितः प्रभुः ।
१६
करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगा ॥ ३८ ॥ तब उन्होंने मुझसे कहा— "डरो मत, तुम्हें ब्रह्महत्याका भय नहीं है। मेरे माता-पिताको जल देकर उन्हें प्रणाम कर जीवनदान माँगो" ॥ ३९ ॥ मुनिकुमारके ऐसा कहनेपर यह मुनिहिंसक आपके पास आया है। आप दोनों बड़े दयाशील हैं, मैं आपकी शरण आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें" ॥ ४० ॥
"यह सुनकर वे दुःखार्त होकर उसके लिये अत्यन्त शोक करते और रोते हुए पृथिवीपर गिर पड़े और बोले—"जहाँ हमारा बेटा है, हमें तुरन्त ही वहाँ ले चलो" ॥ ४१ ॥ तब, जहाँ वह लड़का पड़ा था वहीं उन वृद्ध-दम्पतिको मैं ले गया और वे उसे हाथोंसे स्पर्श कर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥४२॥ वे 'हा पुत्र ! हा पुत्र !' कहकर रोते हुए बोले— "बेटा ! हमें जल दो, हमें जल दो ! आज जल क्यों नहीं देते हो ?" ॥ ४३ ॥ फिर उन्होंने मुझसे कहा— "राजन् ! शीघ्र ही चिता बनाओ।" मैने तुरन्त ही वहाँ चिता बना दी। तब वे तीनों उसपर चढ़ गये और अग्नि लगानेपर उसमें भस्म होकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४४ ॥ उस समय वृद्ध पिताने मुझसे कहा— "तुम्हारे लिये भी ऐसा ही होगा, तुम भी मेरे वचनसे पुत्र-शोकसे ही मरोगे" ॥ ४५ ॥
"वही अनिवार्य शापकाल इस समय उपस्थित हुआ है।" ऐसा कहकर राजा दशरथ अत्यन्त शोकाकुल होकर विलाप करने लगे—॥ ४६ ॥ "हा पुत्र राम ! हा सीते ! हा गुणाकर लक्ष्मण ! तुम्हारे वियोगसे मैं कैकेयीसे उपस्थित की हुई मृत्युको प्राप्त हो रहा हूँ" ॥ ४७ ॥
इस प्रकार कहते हुए महाराज दशरथ प्राण त्याग-कर स्वर्गलोकको चले गये। उस समय कौसल्या, सुमित्रा और अन्यान्य रानियाँ छाती पीट-पीटकर रोने और विलाप करने लगीं। प्रातःकाल होनेपर वहाँ मन्त्रियोंके सहित मुनिवर वसिष्ठजी आये ॥ ४८-४९॥ और राजा दशरथके शवको एक तैल-पूर्ण नौकामें रखवाकर दूतोंसे बोले— "तुमलोग शीघ्र ही घोड़ोंपर चढ़कर युधाजित्की राजधानीको जाओ ॥५०॥ वहाँ शत्रुघ्नके सहित श्रीमान् महाराज भरत विराजमान हैं। उनसे मेरी आज्ञासे जाकर इस प्रकार कहना
| ८२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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उच्यतां भरतः शीघ्रमागच्छेदिति ममाज्ञया ॥५१॥
अयोध्यां प्रति राजानं कैकेयीं चापि पश्यतु ।
इत्युक्तास्त्वरितं दूता गत्वा भरतमातुलम् ॥५२॥
युधाजितं प्रणम्योचुर्भरतं सानुजं प्रति ।
वसिष्ठस्त्वाऽब्रवीद्राजन् भरतः सानुजः प्रभुः ॥५३॥
शीघ्रमागच्छतु पुरीमयोध्यामविचारयन् ।
इत्याज्ञप्तोऽथ भरतस्त्वरितं भयविह्वलः ॥५४॥
आययौ गुरुणादिष्टः सह दूतैस्तु सानुजः ।
राज्ञो वा राघवस्यापि दुःखं किञ्चिदुपस्थितम् ॥५५॥
इति चिन्तापरो मार्गे चिन्तयन्नगरं ययौ ।
नगरं भ्रष्टलक्ष्मीकं जनसम्बाधवर्जितम् ॥५६॥
उत्सवैश्च परित्यक्तं दृष्ट्वा चिन्तापरोऽभवत् ।
प्रविश्य राजभवनं राजलक्ष्मीविवर्जितम् ॥५७॥
अपश्यत्कैकेयीं तत्र एकामेवासने स्थिताम् ।
ननाम शिरसा पादौ मातुर्भक्तिसमन्वितः ॥५८॥
आगतं भरतं दृष्ट्वा कैकेयी प्रेमसम्भ्रमात् ।
उत्थायालिङ्ग्य रभसा स्वाङ्कमारोप्य संस्थिता ५९
मूर्द्धन्यवघ्राय पप्रच्छ कुशलं स्वकुलस्य सा ।
पिता मे कुशली भ्राता माता च शुभलक्षणा ॥६०॥
दिष्ट्या त्वमद्य कुशली मया दृष्टोऽसि पुत्रक ।
इति पृष्टः स भरतो मात्रा चिन्ताऽऽकुलेन्द्रियः ॥६१॥
दूयमानेन मनसा मातरं समपृच्छत ।
मातः पिता मे कुत्रास्ते एका त्वमिह संस्थिता ॥६२॥
त्वया विना न मे तातः कदाचिद्रहसि स्थितः ।
इदानीं दृश्यते नैव कुत्र तिष्ठति मे वद ॥६३॥
अदृष्ट्वा पितरं मेऽद्य भयं दुःखं च जायते ।
अथाह कैकेयी पुत्रं किं दुःखेन तवानघ ॥६४॥
या गतिर्धर्मशीलानाम्श्वमेधादियाजिनाम् ।
कि भरत शीघ्र ही अयोध्यापुरीमें आकर महाराज दशरथ और कैकेयीका दर्शन करें।"
वसिष्ठजीके इस प्रकार कहनेपर दूतोंने तुरन्त ही आकर भरतके मामा युधाजित् और छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित भरतको प्रणाम करके कहा—"राजन् ! वसिष्ठजीने आपके लिये यह कहा है कि छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित महाराज भरत तुरन्त ही बिना कुछ आगा-पीछा सोचे अयोध्यापुरीमें चले आयें।" ऐसी आज्ञा सुनकर श्रीभरतजी भयसे व्याकुल हो तुरन्त ही गुरुजीके आदेशसे छोटे भाईके सहित दूतोंके साथ चले। और यह सोचकर कि 'अवश्य ही महाराज या श्रीरघुनाथजीपर कोई घोर संकट उपस्थित हुआ है' ॥५१–५५॥ मार्गमें मन-ही-मन चिन्ता करते नगरमें पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि नगर शोभाहीन, जनसमूहसे रहित तथा उत्सवहीन हो रहा है। यह देखकर वे अत्यन्त चिन्तित हुए। राजभवनमें जाकर देखा तो वह राजलक्ष्मीसे शून्य हो रहा है और वहां अकेली कैकेयी एक आसनपर बैठी हुई है। माताको देखकर उन्होंने भक्तिपूर्वक उनके चरणोंमें शिर रखकर प्रणाम किया ॥५६-५८॥
भरतजीको आये देख माता कैकेयीने उन्हें प्रेमवश शीघ्रतासे उठाकर हृदय लगाया और अपनी गोदमें बैठा लिया ॥५९॥ फिर उनका शिर सूंघकर अपने कुलकी कुशल पूछी। वह बोलीं—"मेरे पिता, भाई और शुभलक्षणा माता कुशलपूर्वक हैं न ? ॥६०॥ बेटा ! आज बड़े भाग्यसे मैंने तुम्हें सकुशल देख पाया है।"
माताके इस प्रकार पूछनेपर भरतजीने चिन्ताकुल होकर दुःखी चित्तसे मातासे पूछा—"मां ! मेरे पिताजी कहाँ हैं जो तुम यहाँ अकेली बैठी हो ? ॥६१-६२॥ माँ ! तुम्हारे बिना तो पिताजी एकान्तमें कभी नहीं रहते थे; किन्तु इस समय वे दिखायी नहीं देते, सो बताओ तो कहाँ हैं ? ॥६३॥ पिताजीको न देखनेसे आज मुझे अत्यन्त भय और दुःख हो रहा है।"
तब कैकेयीने कहा "हे अनघ ! तुम्हारे लिये दुःखकी क्या बात है? ॥६४॥ हे पितृवत्सल ! अश्वमेधादि
सर्ग ७] अयोध्याकाण्ड ८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तां गतिं गतवानद्य पिता ते पितृवत्सल ॥६५॥ | यज्ञ करनेवाले धर्मपरायण पुरुषोंकी जो गति होती है उसीको आज तुम्हारे पिता भी प्राप्त हुए हैं" ॥६५॥ |
| तच्छ्रुत्वा निपपातोर्व्यां भरतः शोकविह्वलः ।<br>हा तात क्व गतोऽसि त्वं त्यक्त्वा मां वृजिनार्णवे॥६६<br>असमर्प्यैव रामाय राज्ञे मां क्व गतोऽसि भोः।<br>इति विलपितं पुत्रं पतितं मुक्तमूर्धजम् ॥६७॥<br>उत्थाप्यामृज्य नयने कैकेयी पुत्रमब्रवीत् ।<br>समाश्वसिहि भद्रं ते सर्वं सम्पादितं मया ॥६८ ॥ | यह सुनते ही भरत शोकाकुल होकर पृथिवीमें गिर पड़े; और बोले—"हा तात ! हा तात ! मुझे दुःख-समुद्रमें छोड़कर आप कहाँ चले गये ? ॥ ६६ ॥ हाय ! महाराज रामको मुझे सौंपे बिना ही आप कहाँ चले गये ?" इस प्रकार विलाप करते और बिखुरे हुए केशोंसे पृथिवीपर पड़े अपने पुत्रको उठाकर कैकेयीने उसके आँसू पोंछकर कहा—"बेटा ! धीरज रखो; तुम्हारा कल्याण हो । मैने तुम्हारे लिये सब कुछ ठीक कर लिया है" ॥ ६७-६८ ॥ |
| तामाह भरतस्तातो म्रियमाणः किमब्रवीत् ।<br>तमाह कैकेयी देवी भरतं भयवर्जिता ॥६९॥<br>हा राम राम सीतेति लक्ष्मणेति पुनः पुनः ।<br>विलपन्नेव सुचिरं देहं त्यक्त्वा दिवं ययौ ॥७०॥ | तब भरतजीने पूछा—"मरते समय महाराजने क्या कहा था ?" इसपर कैकेयीदेवीने निर्भय होकर भरतजीसे कहा—॥६९॥ "वे 'हा राम ! हा राम ! हा सीते ! हा लक्ष्मण !' इस प्रकार बहुत समयतक बारम्बार विलाप करते हुए अपना (शरीर) त्यागकर स्वर्गको गये हैं" ॥७०॥ |
| तामाह भरतो हेऽम्ब रामः सन्निहितो न किम् ।<br>तदानीं लक्ष्मणो वापि सीता वा कुत्र ते गताः॥७१॥ | तब भरतजीने पूछा—"माता ! तो क्या उस समय राम, सीता और लक्ष्मण भी उनके पास नहीं थे ? वे तीनों उस समय कहाँ गये थे ?" ॥७१॥ |
| कैकेय्युवाच<br>रामस्य यौवराज्यार्थं पित्रा ते सम्भ्रमः कृतः ।<br>तव राज्यप्रदानाय तदाऽहं विघ्नमाचरम् ॥७२॥<br>राज्ञा दत्तं हि मे पूर्वं वरदेन वरद्वयम् ।<br>याचितं तदिदानीं मे तयोरेकेन तेऽखिलम् ॥७३॥<br>राज्यं रामस्य चैकेन वनवासो मुनिव्रतम् ।<br>अतः सत्यपरो राजा राज्यं दत्त्वा तवैव हि ॥७४॥<br>रामं सम्प्रेषयामास वनमेव पिता तव ।<br>सीताप्यनुगता रामं पातिव्रत्यमुपाश्रिता ॥७५॥<br>सौभ्रात्रं दर्शयन् राममनुयातोऽपि लक्ष्मणः ।<br>वनं गतेषु सर्वेषु राजा तानेव चिन्तयन् ॥७६॥<br>प्रलपन् रामरामेति ममार नृपसत्तमः ।<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा वज्राहत इव द्रुमः ॥७७॥<br>पपात भूमौ निःसंज्ञस्तं दृष्ट्वा दुःखिता तदा । | कैकेयी बोली— तुम्हारे पिताने रामको युवराज बनानेकी तैयारी की थी, उस समय तुम्हें राज्य दिलानेके लिये मैने उसमें विघ्न खड़ा कर दिया ॥७२॥ पूर्वकालमें एक बार प्रसन्न होकर राजाने मुझे दो वर देनेको कहा था । इस समय उनमेंसे एकके द्वारा मैने तुम्हारे लिये सम्पूर्ण राज्य और दूसरेसे रामके लिये मुनिव्रतपूर्वक वनवास माँग लिया । इसलिये तुम्हारे पिता सत्यसंध महाराज दशरथने तुम्हें ही राज्य देकर रामको वनमें भेज दिया । पातिव्रत्यका पालन करनेवाली सीता भी रामके साथ ही वनमें चली गयीं ॥७३–७५॥ तथा लक्ष्मण भी भ्रातृस्नेह प्रकट करते हुए रामके अनुगामी हुए । इस प्रकार इन सबके वनको चले जानेपर उन्हींका स्मरण करते हुए और 'राम ! राम !' करके विलाप करते हुए नृपश्रेष्ठ महाराजने शरीर छोड़ दिया । माताके ये वचन सुनकर भरतजी वज्राहत वृक्षके समान अचेत होकर पृथिवीपर गिर पड़े । |
| ८४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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| कैकेयी पुनरप्याह वत्स शोकेन किं तव ॥७८॥<br>राज्ये महति सम्प्राप्ते दुःखस्यावसरः कुतः ।<br>इति ब्रुवन्तीमालोक्य मातरं प्रदहन्निव ॥७९॥<br>असम्भाष्यासि पापे मे घोरे त्वं भर्तृघातिनी ।<br>पापे त्वद्गर्भजातोऽहं पापवानस्मि साम्प्रतम् ।<br>अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि विषं वा भक्षयाम्यहम् ॥८०॥<br>खड्गेन वाथ चात्मानं हत्वा यामि यमक्षयम् ।<br>भर्तृघातिनि दुष्टे त्वं कुम्भीपाकं गमिष्यसि ॥८१॥ | उन्हें ऐसी दशामें देख कैकेयीने दुःखित होकर फिर कहा—"बेटा ! तुम शोक क्यों करते हो ? ॥ ७६-७८॥ ऐसे महान् राज्यको पाने-पर दुःखका कारण ही कहाँ रह जाता है ?" माताको इस प्रकार कहती देख भरतजीने क्रोधमे जलते हुए-से कहा—॥ ७९ ॥ "अरी पापिनी ! तू बात करनेयोग्य नहीं है ! अरी घोरे ! तू अपने पतिकी हत्या करनेवाली है ! अरी पापे ! तेरे गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण अब तो मैं भी प्रत्यक्ष ही महापापी हूँ । मैं या तो अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा या विष खा लूँगा ॥८०॥ अथवा खड्गसे आत्मघात करके यमलोकको चला जाऊँगा। हे भर्तृघातिनि ! हे दुष्टे ! तू भी कुम्भीपाकनरकमें पड़ेगी" ॥८१॥ |
| इति निर्भर्त्स्य कैकेयीं कौसल्याभवनं ययौ ।<br>साऽपि तं भरतं दृष्ट्वा मुक्तकण्ठा रुरोद ह ॥८२॥<br>पादयोः पतितस्तस्या भरतोऽपि तदाऽरुदत् ।<br>आलिङ्ग्य भरतं साध्वी राममाता यशस्विनी ।<br>कृशाऽतिदीनवदना साश्रुनेत्रेदमब्रवीत् ॥८३॥<br>पुत्र त्वयि गते दूरमेवं सर्वमभूदिदम् ।<br>उक्तं मात्रा श्रुतं सर्वं त्वया ते मातृचेष्टितम् ॥८४॥<br>पुत्रः सभार्यो वनमेव यातः<br> सल्लक्ष्मणो मे रघुरामचन्द्रः ।<br>चीराम्बरो बद्धजटाकलापः<br> सन्त्यज्य मां दुःखसमुद्रमग्नाम् ॥८५॥<br>हा राम हा मे रघुवंशनाथ<br> जातोऽसि मे त्वं परतः परात्मा ।<br>तथापि दुःखं न जहाति मां वै<br> विधिर्बलीयानिति मे मनीषा ॥८६॥ | कैकेयीको इस प्रकार डाँटकर वे कौसल्याके घर गये । भरतको देखते ही माता कौसल्या मुक्तकण्ठसे रोने लगीं ॥८२॥ तब भरतजी भी उनके चरणोंमें पड़कर रोने लगे । उन्हें गले लगाकर (चिन्तासे) महा दुर्बल और दीनबदना यशस्विनी राममाता कौसल्याने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—॥८३॥ "बेटा ! तुम्हारे बाहर चले जानेसे जो-जो अनर्थ हुए हैं अपनी माता-की वे सब करतूतें तुमने उसके मुखसे सुन ही लीं होंगी ॥८४॥ मेरा पुत्र रघुश्रेष्ठ रामचन्द्र अपनी पत्नी सीता और लक्ष्मणके सहित चीर-वस्त्र धारण कर और जटाजूट बाँधकर मुझे दुःख-समुद्रमें डुबोकर वनको चला गया ॥८५॥ हा राम ! हा मेरे रघुवंशशिरोमणि ! आप साक्षात् परम पुरुष परमात्माने मेरे गर्भसे जन्म लिया, तथापि दुःखने मेरा पल्ला नहीं छोड़ा । इससे मेरा विचार है कि विधाता ही बलवान् हैं" ॥८६॥ |
| स एवं भरतो वीक्ष्य विलपन्तीं भृशं शुचा ।<br>पादौ गृहीत्वा प्राहैदं शृणु मातर्वचो मम ॥८७॥<br>कैकेय्या यत्कृतं कर्म रामराज्याभिषेचने ।<br>अन्यद्वा यदि जानामि सा मया नोदिता यदि ॥८८॥<br>पापं मेऽस्तु तदा मातर्ब्रह्महत्याशतोद्भवम् ।<br>हत्वा वसिष्ठं खड्गेन अरुन्धत्या समन्वितम् ॥८९॥ | भरतजीने उन्हें इस प्रकार शोकसे अत्यन्त विलाप करती देख उनके चरण पकड़कर कहा--"माता ! मेरी बात सुनो—॥ ८७ ॥ कैकेयीने श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकके समय जो कुछ करतूत की है, अथवा उसने और भी जो कोई कार्य किया है उसे यदि मैं जानता होऊँ अथवा उसमें मेरी सम्मति हो ॥८८॥ तो हे मातः ! मुझे सौ ब्रह्महत्याओंका पाप लगे ! अथवा अरुन्धतीके सहित श्रीवसिष्ठजीको खड्गसे मारनेसे जो पाप होता है वही पाप मुझे भी लगे ।" |
सर्ग ७ ] अयोध्याकाण्ड . ८५
भूयात्तत्पापमखिलं मम जानामि यद्यहम् ।
इत्येवं शपथं कृत्वा रुरोद भरतस्तदा ॥ ९० ॥
कौसल्या तमथालिङ्ग्य पुत्र जानामि मा शुचः ।
एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा भरतस्य समागमम् ॥ ९१ ॥
आसन्नो मन्त्रिभिः सार्धं प्रययौ राजमन्दिरम् ।
रुदन्तं भरतं दृष्ट्वा वसिष्ठः प्राह सादरम् ॥ ९२ ॥
वृद्धो राजा दशरथो ज्ञानी सत्यपराक्रमः ।
भुक्त्वा मर्त्यसुखं सर्वमिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः ॥ ९३ ॥
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्लब्ध्वा रामं सुतं हरिम् ।
अन्ते जगाम त्रिदिवं देवेन्द्राद्धासनं प्रभुः ॥ ९४ ॥
तं शोचसि वृथैव त्वमशोच्यं मोक्षभाजनम् ।
आत्मा नित्योऽव्ययः शुद्धो जन्मनाशादिवर्जितः ॥ ९५ ॥
शरीरं जडमत्यर्थमपवित्रं विनश्वरम् ।
विचार्यमाणे शोकस्य नावकाशः कथञ्चन ॥ ९६ ॥
पिता वा तनयो वाऽपि यदि मृत्युवशं गतः ।
मूढास्तमनुशोचन्ति स्वात्मताडनपूर्वकम् ॥ ९७ ॥
निःसारे खलु संसारे वियोगो ज्ञानिनां यदा ।
भवेद्वैराग्यहेतुः स शान्तिसौख्यं तनोति च ॥ ९८ ॥
जन्मवान्यदि लोकेऽस्मिंस्तर्हि तं मृत्युरन्वगात् ।
तस्मादपरिहार्योऽयं मृत्युर्जन्मवतां सदा ॥ ९९ ॥
स्वकर्मवशतः सर्वजन्तूनां प्रभवाप्ययौ ।
विजानन्नप्यविद्वान्वैः कथं शोचति बान्धवान् १००
ब्रह्माण्डकोटयो नष्टाः सृष्टयो बहुशो गताः ।
शुष्यन्ति सागराः सर्वे कैवास्था क्षणजीविते ॥ १०१ ॥
चलपत्त्रान्तलम्बाम्बुबिन्दुवत्क्षणभङ्गुरम् ।
आयुस्त्यजत्यवेलायां कस्तत्र प्रत्ययस्तव ॥ १०२ ॥
देही प्राक्तनदेहोत्थकर्मणा देहवान्पुनः ।
इस प्रकार शपथ करके भरतजी रो उठे ॥ ८९-९० ॥
तब कौसल्याने उन्हें हृदयसे लगाकर कहा—"बेटा ! मैं यह सब जानती हूँ, तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो।"
इसी समय भरतजीका आना सुनकर मन्त्रियोंके सहित वसिष्ठजी राजभवनमें आये और भरतको रोते देखकर आदरपूर्वक बोले— ॥ ९१-९२ ॥ "महाराज दशरथ वृद्ध, ज्ञानी और सत्य-पराक्रमी थे । वे मनुष्य-जन्मके समस्त सुख भोगकर, बहुत-सी दक्षिणाके सहित अश्वमेधादि यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन कर और रामचन्द्रके रूपमें साक्षात् विष्णुभगवान्को पुत्र-रूपसे पाकर अन्तमें स्वर्गलोकमें जाकर देवराज इन्द्रके आधे आसनके अधिकारी हुए हैं ॥ ९३-९४ ॥ वे सर्वथा अशोचनीय और मोक्षके पात्र हैं, उनके लिये तुम वृथा ही शोक करते हो; देखो, आत्मा तो नित्य, अविनाशी, शुद्ध और जन्म-नाशादिसे रहित है ॥ ९५ ॥ और शरीर जड, अत्यन्त अपवित्र और नाशवान् है । इस प्रकार विचार करनेपर शोकके लिये कोई स्थान नहीं रह जाता ॥ ९६ ॥ यदि कोई पिता या पुत्र मर जाता है तो मूढ़जन ही उसके लिये छाती पीटकर रोते हैं ॥ ९७ ॥ किन्तु, इस असार संसारमें यदि ज्ञानियोंको किसीसे वियोग होता है तो वह उनके लिये वैराग्यका कारण होता है और सुख तथा शान्तिका विस्तार करता है ॥ ९८ ॥ यदि किसीने इस लोकमें जन्म लिया है तो मृत्यु भी अवश्य ही उसके साथ लगी हुई है । अतः जन्म लेनेवालोंके लिये मृत्यु सर्वदा अनिवार्य है ॥ ९९ ॥ 'अपने कर्मानुसार ही सब प्राणियोंके जन्म-मरण होते हैं' यह जानकर भी देखो मूढ़लोग अपने बन्धु-बान्धवोंके लिये कैसे शोक करते हैं ॥ १०० ॥ करोड़ों ब्रह्माण्ड नष्ट हो गये, अनेकों सृष्टियाँ बीत गयीं, ये सम्पूर्ण समुद्र एक दिन सूख जायँगे, फिर इस क्षणिक जीवनमें भला क्या आस्था की जाय ? ॥ १०१ ॥ यह आयु हिलते हुए पत्तेकी नोकपर लटकती हुई जलकी बूँदके समान क्षणभंगुर है, असमय ही छोड़कर चली जाती है; उसका तुम क्या विश्वास करते हो ? ॥ १०२ ॥ इस जीवात्माने अपने पूर्व-देह-कृत कर्मोंसे यह शरीर धारण किया है और फिर इस देहके कर्मोंसे यह और शरीर धारण
| ८६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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तद्देहोत्थेन च पुनरेवं देहः सदात्मनः । १०३।
यथा त्यजति वै जीर्णं वासो गृह्णाति नूतनम् ।
तथा जीर्णं परित्यज्य देही देहं पुनर्नवम् । १०४।
भजत्येव सदा तत्र शोकस्यावसरः कुतः ।
आत्मा न म्रियते जातु जायते न च वर्धते । १०५।
षड्भावरहितोऽनन्तः सत्यप्रज्ञानविग्रहः ।
आनन्दरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी लयविवर्जितः । १०६।
एक एव परो ह्यात्मा ह्यद्वितीयः समः स्थितः ।
इत्यात्मानं दृढं ज्ञात्वा त्यक्त्वा शोकं कुरु क्रियाम् ॥
तैलद्रोण्याः पितुर्देहमुद्धृत्य सचिवैः सह ।
कृत्यं कुरु यथान्यायमसमाभिः कुलन्दन । १०८।
इति सम्बोधितः साक्षाद्गुरुणा भरतस्तदा ।
विसृज्याज्ञानजं शोकं चक्रे स विधिवत्क्रियाम् १०९
गुरुणोक्तप्रकारेण आहिताग्नेर्यथाविधि ।
संस्कृत्य स पितुर्देहं विधिदृष्टेन कर्मणा । ११०।
एकादशेऽहनि प्राप्ते ब्राह्मणांर्वेदपारगान् ।
भोजयामास विधिवच्छतशोऽथ सहस्रशः । १११।
उद्दिश्य पितरं तत्र ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु ।
ददौ गवां सहस्राणि ग्रामान् रत्नाम्बराणि च । ११२।
अवसत्स्वगृहे तत्र राममेवानुचिन्तयन् ।
वसिष्ठेन सह भ्रात्रा मन्त्रिभिः परिवारितः । ११३।
रामेऽरण्यं प्रयाते सह जनकसुता-
लक्ष्मणाभ्यां सुघोरं
माता मे राक्षसीव प्रदहति हृदयं
दर्शनादेव सद्यः ।
गच्छाम्यारण्यमद्य स्थिरमतिरखिलं
दूरतोऽपास्य राज्यं
रामं सीतासमेतं स्मितरुचिरमुखं
नित्यमेवानुसेवे ॥११४॥
| करेगा । इसी प्रकार आत्माको सदा पुनः-पुनः देहकी प्राप्ति होती रहती है ॥ १०३ ॥ मनुष्य जिस प्रकार पुराने वस्त्रोंको उतारकर फिर नये वस्त्र पहन लेता है उसी प्रकार देहधारी जीव पुराने शरीरको छोड़कर नवीन शरीर धारण कर लेता है । अतः इसमें शोकका क्या कारण है ? क्योंकि आत्मा तो न कभी मरता है, न जन्मता है और न बढ़ता ही है ॥ १०४-१०५ ॥ वह षड्-भाव-विकारोंसे रहित, अनन्त, सच्चिद्रूप, आनन्दरूप, बुद्धि आदिका साक्षी और अविनाशी है ॥ १०६ ॥ यह परमात्मा एक, अद्वितीय और समभावमें स्थित है । इस प्रकार तुम आत्माका दृढ़ ज्ञान प्राप्त कर शोकरहित हो समस्त कार्य करो ॥ १०७ ॥ हे कुलन्दन भरत ! अपने पिताका शरीर तैलकी नावमेंसे निकालकर मन्त्रियों और हम सब ऋषियोंके साथ उसका विधिपूर्वक अन्त्येष्टि-संस्कार करो ॥ १०८ ॥<br><br>तब गुरुजीके इस प्रकार समझानेपर भरतजीने अज्ञानजन्य शोकको छोड़कर राजाका विधिवत् अन्त्य कृत्य किया ॥ १०९ ॥ गुरुजीके कथनानुसार जैसे अग्निहोत्रीका अन्तिम संस्कार करना चाहिये उसी प्रकार विधिपूर्वक पिताके देहका शास्त्रानुकूल संस्कार कराकर ॥ ११० ॥ फिर एकादशाह आनेपर सैकड़ों-हजारों वेदज्ञ ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराया ॥ १११ ॥ तथा पिताके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन, हजारों गौएँ, अनेकों गाँव और रत्न तथा वस्त्रादि दिये ॥ ११२ ॥<br><br>फिर श्रीरामचन्द्रजीका ही स्मरण करते हुए वे गुरु वसिष्ठजी, भाई शत्रुघ्न और मन्त्रियोंके साथ अपने घरमें रहने लगे ॥ ११३ ॥ घरमें रहते हुए वे मन-ही-मन सोचा करते थे कि 'जनकनन्दिनी महारानी सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीके भयंकर वनमें चले जानेसे माता कैकेयी अपने दर्शनमात्रसे ही राक्षसीके समान मेरे हृदयमें दाह उत्पन्न करती है । अतः अब मैं निस्सन्देह शीघ्र ही सब राज-पाट छोड़कर वनको जाऊँगा और मधुर मुसकानसे जिनका मुखारविन्द अति शोभित हो रहा है उन राम और सीताकी नित्य-प्रति सेवा करूँगा' ॥ ११४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ८: भरतजीका वनको प्रस्थान, गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूट-दर्शन
'सर्ग ८] अयोध्याकाण्ड ८७
अष्टम सर्ग
भरतजीका वनको प्रस्थान, मार्गमें गुह और भरद्वाजजीसे भेंट तथा चित्रकूटदर्शन ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
|---|---|
| वसिष्ठो मुनिभिः सार्धं मन्त्रिभिः परिवारितः ।<br>राज्ञः सभां देवसभासन्निभामविशद्विभुः ॥ १॥ | हे पार्वति ! एक दिन गुनीश्वरोंके सहित मन्त्रियोंसे घिरे हुए भगवान् वसिष्ठजी देवसभाके सदृश राजसभामें आये ॥ १॥ |
| तत्रासने समासीनश्चतुर्मुख इवापरः ।<br>आनीय भरतं तत्र उपवेश्य सहानुजम् ॥ २॥ | वहाँ दूसरे ब्रह्माजीके समान आसनपर विराजमान श्रीवसिष्ठजीने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको बुलाकर आसनपर बैठाया ॥ २ ॥ |
| अब्रवीद्वचनं देशकालोचितमरिन्दमम् ।<br>वत्स राज्येऽभिषेक्ष्यामस्त्वामद्य पितृशासनात् ॥ ३॥ | और उन शत्रुदमन भरतजीसे इस प्रकार देशकालोचित वाक्योंमें कहा—"वत्स ! तुम्हारे पिताके कथनानुसार आज हम तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त करेंगे ॥ ३॥ |
| कैकेय्या याचितं राज्यं त्वदर्थे पुरुषर्षभ ।<br>सत्यसन्धो दशरथः प्रतिज्ञाय ददौ किल ॥ ४॥ | हे पुरुषश्रेष्ठ ! कैकेयीने तुम्हारे लिये राजा दशरथसे राज्य माँगा था । राजा सत्यपरायण थे, इसलिये प्रतिज्ञा करनेके कारण उन्होंने उसे दे दिया ॥ ४॥ |
| अभिषेको भवत्वद्य मुनिभिर्मन्त्रपूर्वकम् । | अतः मुनिजनोंद्वारा मन्त्रोच्चारपूर्वक आज तुम्हारा अभिषेक होना चाहिये ।" |
| तच्छ्रुत्वा भरतोऽप्याह मम राज्येन किं मुने ॥ ५॥ | यह सुनकर भरतजी बोले—"हे मुनिनाथ ! राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन है ? ॥ ५॥ |
| रामो राजाधिराजश्च वयं तस्यैव किङ्कराः ।<br>श्वःप्रभाते गमिष्यामो राममानेतुमञ्जसा ॥ ६॥ | महाराज राम ही राजाधिराज हैं, हम तो उन्हींके दास हैं । कल प्रातःकाल रामजीको लानेके लिये हम शीघ्र ही वनको जायँगे ॥ ६॥ |
| अहं यूयं मातरश्च कैकेयीं राक्षसीं विना ।<br>हनिष्याम्यधुनैवाहं कैकेयीं मातृगन्धिनीम् ॥ ७॥ | मैं, आप सबलोग और राक्षसी कैकेयीके सिवा अन्य सब माताएँ—ये सभी वनको चलेंगे । मैं क्या करूँ ? मैं तो इस नाममात्रकी माता कैकेयीको अभी मार डालता, |
| किन्तु मां नो रघुश्रेष्ठः स्त्रीहन्तारं सहिष्यते ।<br>तच्छ्वोभूते गमिष्यामि पादचारेण दण्डकान् ॥ ८॥ | किन्तु श्रीरघुनाथजी मुझ स्त्री-हत्यारेको क्षमा न करेंगे । अतः कुछ भी हो, कल प्रातःकाल होते ही, आप लोग चलें या न चलें, मैं तो शत्रुघ्नके सहित पैदल ही दण्डकारण्यको जाऊँगा । |
| शत्रुघ्नसहितस्तूर्णं यूयमायान्तु वा न वा ।<br>रामो यथा वने यातस्तथाऽहं वल्कलाम्बरः ॥ ९॥ | हे मुने ! जिस प्रकार रामजी गये हैं उसी प्रकार जबतक रामचन्द्रजी न लौटेंगे तबतक मैं भी, शत्रुघ्नके सहित वल्कल-वस्त्र और जटाजूट धारणकर कन्द-मूल-फलादिका भोजन करूँगा और पृथिवीपर शयन करूँगा" ॥ ७–१०॥ |
| फलमूलकृताहारः शत्रुघ्नसहितो मुने ।<br>भूमिशायी जटाधारी यावद्रामो निवर्तते ॥ १०॥ | |
| इति निश्चित्य भरतस्तूष्णीमेवावतस्थिवान् ।<br>साधुसाध्विति तं सर्वे प्रशंसुर्मुदान्विताः ॥ ११॥ | ऐसा निश्चयकर भरतजी मौन हो गये । तब सबलोग प्रसन्न होकर 'साधु-साधु' कहकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ११॥ |
| ततः प्रभाते भरतं गच्छन्तं सर्वसैनिकाः ।<br>अनुजग्मुः सुमन्त्रेण नोदिताः साश्वकुञ्जराः ॥ १२॥ | तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर भरतजीके कूच करते समय हाथी और घोड़ोंके सहित समस्त सैनिक सुमन्त्र- |
| ८८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८] |
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कौसल्याद्या राजदारा वसिष्ठप्रमुखा द्विजाः ।<br>छादयन्तो भुवं सर्वे पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ॥१३॥<br>शृङ्गवेरपुरं गत्वा गङ्गाकूले समन्ततः ।<br>उवास महती सेना शत्रुघ्नपरिचोदिता ॥१४॥<br>आगतं भरतं श्रुत्वा गुहः शङ्कितमानसः ।<br>महत्या सेनया सार्धमागतो भरतः किल ॥१५॥<br>पापं कर्तुं न वा याति रामस्याविदितात्मनः ।<br>गत्वा तद्धृदयं ज्ञेयं यदि शुद्धस्तरिष्यति ॥१६॥<br>गङ्गां नोचेत्समाकृष्य नावास्तिष्ठन्तु सायुधाः ।<br>ज्ञातयो मे समात्ताः पश्यन्तः सर्वतोदिशम् ॥१७॥<br>इति सर्वान्समादिश्य गुहो भरतमागतः ।<br>उपायनानि संगृह्य विविधानि बहून्यपि ॥१८॥<br>प्रययौ ज्ञातिभिः सार्धं बहुभिर्विविधायुधैः ।<br>निवेश्योपायनान्यग्रे भरतस्य समन्ततः ॥१९॥<br>दृष्ट्वा भरतमासीनं सानुजं सह मन्त्रिभिः ।<br>चीराम्बरं घनश्यामं जटामुकुटधारिणम् ॥२०॥<br>राममेवानुशोचन्तं रामरामेति वादिनम् ।<br>ननाम शिरसा भूमौ गुहोऽहमिति चाब्रवीत् ॥२१॥<br>शीघ्रमुत्थाप्य भरतो गाढमालिङ्ग्य सादरम् ।<br>पृष्ट्वानामयमव्यग्रः सखायमिदमब्रवीत् ॥२२॥<br>भ्रातस्त्वं राघवेणात्र समेतः समवस्थितः ।<br>रामेणालिङ्गितः सार्द्रनयनेनामलात्मना ॥२३॥<br>धन्योऽसि कृतकृत्योसि यत्त्वया परिभाषितः ।<br>रामो राजीवपत्राक्षो लक्ष्मणेन च सीतया ॥२४॥<br>यत्र रामस्त्वया दृष्टस्तत्र मां नय सुव्रत ।<br>सीतया सहितो यत्र सुप्तस्तद्दर्शयस्व मे ॥२५॥<br>त्वं रामस्य प्रियतमो भक्तिमानसि भाग्यवान् ।<br>इति संस्मृत्य संस्मृत्य रामं साश्रुविलोचनः ॥२६॥ | की प्रेरणासे उनके साथ चले ॥ १२ ॥ कौसल्या आदि महारानियाँ तथा वसिष्ठ आदि द्विजगण पृथिवीको आच्छादन कर उनके आगे-पीछे और इधर-उधर यथा-योग्य रीतिसे चलने लगे॥ १३ ॥ इस प्रकार शृंगवेरपुर पहुँचनेपर वह महान् सेना शत्रुघ्नकी प्रेरणासे गंगातट-पर जहाँ-तहाँ ठहर गयी ॥ १४ ॥<br>भरतका आगमन सुन गुहको यह शंका हुई कि भरत बड़ी सेना लेकर आये हैं अतः ये रामके अनजान-में उनका कोई अनिष्ट करनेके लिये न जाते हों ? मुझे उनके पास जाकर उनका मर्म जानना चाहिये । यदि उनका भाव ठीक हो तब तो वे भले ही पार चले जायें ॥ १५-१६ ॥ नहीं तो ( इसके विपरीत उपाय करना पड़ेगा अतः ) मेरे जातिवाले अस्त्र-शस्त्र लेकर सावधानी-से सब ओर चौकस रहें और सब नावोंको खींचकर गंगाके बीचमें खड़ी कर दें ॥ १७ ॥<br>इस प्रकार सबको आज्ञा दे गुह नाना प्रकारकी बहुत-सी भेंटें लेकर अपने बहुत-से हथियारबन्द जाति-भाइयोंके साथ भरतजीके पास आया। वहाँ उनके सामने सब सामग्री रखकर इधर-उधर देखते हुए उसने देखा कि मेघश्याम भरत चीर-वस्त्र और जटाजूट धारण किये मन्त्रियोंके साथ बैठे हैं ॥ १८-२० ॥ वे राम-हीका स्मरण कर रहे हैं और 'राम-नाम' का ही जप कर रहे हैं। यह देखकर उसने पृथिवीपर शिर रखकर भरतजीको प्रणाम किया और बोला 'मैं गुह हूँ' ॥ २१ ॥<br>भरतजीने उसे शीघ्र ही उठाकर आदरपूर्वक गाढ़ आलिंगन किया और प्रसन्न-मुखसे उसकी कुशल पूछ-कर उससे सखा-भावसे इस प्रकार बोले—॥ २२ ॥ "भैया ! तुम यहाँ श्रीरामचन्द्रजीके साथ रहे थे और निर्मलहृदय श्रीरामने नेत्रोंमें जल भरकर तुम्हारा आलिंगन किया था ॥ २३ ॥ तुमसे सीता और लक्ष्मण-के सहित कमल-नयन रामने वार्तालाप की अतः तुम धन्य हो, तुम्हारा जीवन सफल है ॥ २४ ॥ हे सुव्रत ! तुमने श्रीरामचन्द्रजीको जहाँ देखा था मुझे वहीं ले चलो, जहाँ वे सीताके सहित सोये थे वह स्थान मुझे दिखाओ ॥ २५ ॥ तुम रामके प्रियतम सखा और भाग्यवान् भक्त हो ।” इस प्रकार पुनः-पुनः रामका स्मरण करनेसे भरतजीके नेत्रोंमें जल भर आया ॥२६॥
| सर्ग ८ ] | अयोध्याकाण्ड | ८९ |
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| गुहेन सहितस्तत्र यत्र रामः स्थितो निशि ।<br>ययौ ददर्श शयनस्थलं कुशसमास्तृतम् ॥२७॥<br>सीताऽऽभरणसंलग्नस्वर्णबिन्दुभिरञ्चितम् ।<br>दुःखसन्तप्तहृदयो भरतः पर्यदेवयत् ॥२८॥<br>अहोऽतिसुकुमारी या सीता जनकनन्दिनी ।<br>प्रासादे रत्नपर्यङ्के कोमलास्तरणे शुभे ॥२९॥<br>रामेण सहिता शेते सा कथं कुशविष्टरे ।<br>सीता रामेण सहिता दुःखेन मम दोषतः ॥३०॥<br>धिङ् मां जातोऽस्मि कैकेय्यां पापराशिसमानतः।<br>मन्निमित्तमिदं क्लेशं रामस्य परमात्मनः ॥३१॥<br>अहोऽतिसफलं जन्म लक्ष्मणस्य महात्मनः।<br>राममेव सदान्वेति वनस्थमपि हृष्टधीः ॥३२॥<br>अहं रामस्य दासा ये तेषां दासस्य किङ्करः।<br>यदि स्यां सफलं जन्म मम भूयान्न संशयः ॥३३॥<br>भ्रातर्जानासि यदि तत्कथयस्व ममाखिलम्।<br>यत्र तिष्ठति तत्राहं गच्छाम्यानेतुमञ्जसा ॥३४॥ | इस प्रकार विरहव्याकुल हुए वे गुहके साथ उस स्थानपर पहुँचे जहाँ रात्रिके समय श्रीरामने निवास किया था। वहाँ जाकर उन्होंने उस कुशा बिछे हुए शयन-स्थानको देखा ॥ २७॥ वह सीताजीके आभूषणोंसे झड़े हुए सुवर्णकणोंसे सुशोभित था। उसे देखकर भरतजीका हृदय दुःखसे भर आया और वे इस प्रकार विलाप करने लगे—॥ २८ ॥ “अहो ! जो अति सुकुमारी जनकदुलारी सीता राजमहलमें कोमल बिछौनेसे युक्त अति सुन्दर रत्नपर्यङ्कपर श्रीरघुनाथजीके साथ शयन किया करती थीं वे ही मेरे दोषसे श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस कुशाओंकी साथरीपर किस प्रकार क्लेशपूर्वक सोती होंगी ? ॥ २९-३० ॥ मुझे धिक्कार है ! जो मैं मूर्त्तिमान् पापपुञ्जके समान कैकेयीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ । हाय ! मेरेलिये ही परमात्मा रामको यह क्लेश उठाना पड़ा ! ! ॥ ३१ ॥ अहा ! महात्मा लक्ष्मणका जन्म अत्यन्त सफल है जो भगवान् रामके वनमें रहते समय भी सदा प्रसन्नमनसे उन्हींका अनुसरण करते हैं ॥३२॥ जो लोग रामके दास हैं उनके दासोंका दास भी यदि मैं हो जाऊँ तो मेरा जन्म सफल हो जाय—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥ भाई ! यदि तुम्हें मालूम हो तो मुझे यह सब बताओ कि राम कहाँ हैं ? वे जहाँ कहीं भी होंगे, मैं उन्हें तुरन्त लानेके लिये वहीं जाऊँगा” ॥३४॥ |
| गुहस्तं शुद्धहृदयं ज्ञात्वा सस्नेहमब्रवीत् ।<br>देव त्वमेव धन्योऽसि यस्य ते भक्तिरीदृशी ॥३५॥<br>रामे राजीवपत्राक्षे सीतायां लक्ष्मणे तथा।<br>चित्रकूटाद्रिनिकटे मन्दाकिन्यविदूरतः ॥३६॥<br>मुनीनामा श्रमपदे रामस्तिष्ठति सानुजः।<br>जानक्या सहितो नन्दन्सुखमास्ते किल प्रभुः॥३७॥<br>तत्र गच्छामहे शीघ्रं गङ्गां तर्तुमिहार्हसि ।<br>इत्युक्त्वा त्वरितं गत्वा नावः पञ्चशतानि ह ॥३८॥<br>समानयत्तत्सैन्यस्य तर्तुं गङ्गां महानदीम् ।<br>स्वयमवानिनायैकां राजनावं गुहस्तदा ॥३९॥<br>आरोप्य भरतं तत्र शत्रुघ्नं राममातरम् ।<br>वसिष्ठं च तथान्यत्र कैकेयीं चान्ययोषितः ॥४०॥<br>तीर्त्वा गङ्गां ययौ शीघ्रं भरद्वाजाश्रमं प्रति। | गुहने उनका चित्त शुद्ध देखकर स्नेहपूर्वक कहा—“स्वामिन् ! आपकी कमलनयन राम, सीता और लक्ष्मणमें ऐसी विशुद्ध भक्ति है, अतः आप ही धन्य हैं। छोटे भाई लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्र चित्रकूट-पर्वतके पास मन्दाकिनी नदीके समीप मुनियोंके आश्रममें रहते हैं। वहाँ जानकीके सहित भगवान् राम आनन्द और सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥ ३५—३७॥ चलिये, शीघ्र ही हमलोग वहाँ चलें। पहले आपलोग यहाँ गङ्गाजी पार कर लें।” ऐसा कहकर उसने तुरन्त ही सेनाके सहित भरतजीको गङ्गाजीसे पार करनेके लिये पाँच सौ नावें मँगवायीं और स्वयं एक राजनौका ले आया ॥ ३८-३९ ॥ उसमें भरत, शत्रुघ्न, रामकी माता कौसल्या और वसिष्ठजीको चढ़ाया तथा एक दूसरी नावमें कैकेयी आदि अन्य राजमहिलाओंको सवार किया ॥४०॥<br><br>इस प्रकार शीघ्र ही गङ्गाजीको पार कर वे भरद्वाज |
१२
| ९० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८ |
|---|
| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दूरे स्थाप्य महासैन्यं भरतः सानुजो ययौ ॥४१॥<br>आश्रमे मुनिमासीनं ज्वलन्तमिव पावकम् ।<br>दृष्ट्वा ननाम भरतः साष्टाङ्गमतिमक्तितः ॥४२॥ | मुनिके आश्रमकी ओर चले। वहाँ अपनी महान् सेनाको आश्रमसे दूर छोड़कर भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी आश्रमपर गये ॥४१॥ और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी मुनिवर भरद्वाजको आश्रममें बैठे देख उन्हें अति भक्तिपूर्वक साष्टांग प्रणाम किया ॥ ४२ ॥ |
| ज्ञात्वा दाशरथिं प्रीत्या पूजयामास मौनिराट् ।<br>पप्रच्छ कुशलं दृष्ट्वा जटावल्कलधारिणम् ॥४३॥<br>राज्यं प्रशासत्तस्तेऽद्य किमेतद्वल्कलादिकम् ।<br>आगतोऽसि किमर्थं त्वं विपिनं मुनिसेवितम् ॥४४॥ | मुनीश्वरको जब मालूम हुआ कि वे दशरथनन्दन भरत हैं तो उन्होंने प्रीतिपूर्वक उनकी पूजा की और उन्हें जटा-वल्कलादि धारण किये देख कुशल-प्रश्नके अनन्तर पूछा—॥४३॥ "भाई भरत ! राज्य-शासन करते हुए तुमने आज यह वल्कलादि कैसे धारण कर लिये और इस मुनिजनसेवित तपोवनमें तुम किसलिये आये हो ?" ॥४४॥ |
| भरद्वाजवचः श्रुत्वा भरतः साश्रुलोचनः ।<br>सर्वं जानासि भगवन् सर्वभूताशयस्थितः ॥४५॥<br>तथापि पृच्छसे किञ्चित्तदनुग्रह एव मे ।<br>कैकेय्या यत्कृतं कर्म रामराज्यविघातनम् ॥४६॥<br>वनवासादिकं वापि नाहि जानामि किञ्चन ।<br>भवत्पादयुगं मेऽद्य प्रमाणं मुनिसत्तम ॥४७॥ | भरद्वाजके ये वचन सुनकर भरतने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भगवन् ! आप सब जानते हैं, क्योंकि आप सर्वान्तर्यामी हैं ॥४५॥ फिर भी आप जो पूछ रहे हैं वह मेरे ऊपर आपकी कुछ कृपा ही है। कैकेयीने श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित करनेवाला और वनवासादि-विषयक जो कुछ कार्य किया है, हे मुनिश्रेष्ठ ! आपके चरणोंकी साक्षी करके कहता हूँ; मुझे उसके विषयमें कुछ भी पता नहीं था" ॥४६-४७॥ |
| इत्युक्त्वा पादयुगलं मुनेः स्पृष्ट्वाऽऽर्त्तमानसः ।<br>ज्ञातुमर्हसि मां देव शुद्धो वाऽशुद्ध एव वा ॥४८॥ | ऐसा कह उन्होंने अति आर्त्तचित्त हो मुनिके चरण-युगल पकड़कर कहा—"भगवन् ! आप स्वयं जान सकते हैं कि मैं दोषी हूँ या निर्दोष ॥४८॥ |
| मम राज्येन किं स्वामिन् रामे तिष्ठति राजनि।<br>किङ्करोऽहं मुनिश्रेष्ठ रामचन्द्रस्य शाश्वतः ॥४९॥ | हे स्वामिन् ! महाराज रामके रहते हुए मुझे राज्यसे क्या प्रयोजन है ? हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं तो सदासे ही श्रीरामचन्द्रका दास हूँ ॥४९॥ |
| अतो गत्वा मुनिश्रेष्ठ रामस्य चरणान्तिके ।<br>पतित्वा राज्यसम्भारान् समर्प्यैत्रैव राघवम्॥५०॥<br>अभिषेक्ष्ये वसिष्ठाद्यैः पौरजानपदैः सह ।<br>नेष्येऽयोध्यां रमानाथं दासः सेवेऽतिनीचवत् ॥५१॥ | अतः हे मुनिनाथ ! मैं श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर उनके चरण-कमलोंमें पड़कर यह सारी राजपाटकी सामग्री उन्हें यहीं सौंप दूँगा ॥५०॥ तथा वसिष्ठ आदि पुरजन और जनपदवासियोंके साथ मिलकर उनका राज्याभिषेक कर अयोध्या ले जाऊँगा और अति तुच्छ दासके समान उन लक्ष्मीपतिकी सेवा करूँगा" ॥५१॥ |
| इत्युदीरितमाकर्ण्य भरतस्य वचो मुनिः ।<br>आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय प्रशंस सविस्मयः॥५२॥ | मुनीश्वरने भरतके ये उद्गार सुनकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और विस्मयपूर्वक शिर सूँघकर उनकी प्रशंसा करने लगे ॥५२॥ |
| वत्स ज्ञातं पुरैवैतद्भवष्यिं ज्ञानचक्षुषा ।<br>मा शुचस्त्वं परो भक्तः श्रीरामे लक्ष्मणादपि ॥५३॥ | वे बोले—"बेटा ! अपने ज्ञानचक्षुओंसे मैंने पहले ही ये होनेवाली बातें जान ली थीं। तुम शोक न करो; तुम तो लक्ष्मणकी अपेक्षा भी रामके परम भक्त हो ॥५३॥ हे अनघ ! मैं सेनाके |
सर्ग ८ ] अयोध्याकाण्ड ९१
| आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि ससैन्यस्य तवानघ ।<br>अद्य भुक्त्वा ससैन्यस्त्वं श्वो गन्ता रामसन्निधिम् ॥५४॥ | सहित तुम्हारा आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ । आज सेनासहित तुम यहीं भोजन करो, कल रामके पास जाना" ॥५४॥ |
| यथाऽऽज्ञापयति भवांस्तथेति भरतोऽब्रवीत् ।<br>भरद्वाजस्त्वपः स्पृष्ट्वा मौनी होमगृहे स्थितः ॥५५॥ | भरतजीने कहा—"आपकी जैसी आज्ञा होगी, वही होगा।" तब मुनिवर भरद्वाज आचमन कर मौन होकर यज्ञशालामें बैठे ॥५५॥ |
| दध्यौ कामदुघां कामवर्षिणीं कामदो मुनिः ।<br>असृजत्कामधुक् सर्वं यथाकाममलौकिकम् ॥५६॥ | वहाँ बैठकर उन कामप्रद मुनीश्वरने समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनुका स्मरण किया । तब उस कामधेनुने इच्छानुसार सम्पूर्ण अलौकिक भोग प्रस्तुत कर दिये ॥ ५६ ॥ |
| भरतस्य ससैन्यस्य यथेष्टं च मनोरथम् ।<br>यथा ववर्ष सकलं तृप्तांस्ते सर्वसैनिकाः ॥५७॥ | उसने सेनाके सहित भरतजीके सम्पूर्ण मनोरथोंको इस प्रकार पूर्ण किया जिससे वे समस्त सैनिक सन्तुष्ट हो गये ॥५७॥ |
| वसिष्ठं पूजयित्वाग्रे शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ।<br>पश्चात्ससैन्यं भरतं तर्पयामास योगिराट् ॥५८॥ | फिर उन योगिराजने शास्त्रानुकूल प्रथम वसिष्ठजीकी पूजा की और तदनन्तर सेनाके सहित भरतजीको तृप्त किया ॥५८॥ |
| उषित्वा दिनमेकं तु आश्रमे स्वर्गसन्निभे ।<br>अभिवाद्य पुनः प्रातर्भरद्वाजं सहानुजः ।<br>भरतस्तु कृतानुज्ञः प्रययौ रामसन्निधिम् ॥५९॥ | इस प्रकार उस स्वर्ग-सदृश आश्रममें एक दिन रहकर प्रातःकाल मुनिवरको प्रणाम कर उनकी आज्ञा ले भाईके सहित भरतजी रामचन्द्रजीके पास चले ॥५९॥ |
| चित्रकूटमनुप्राप्य दूरे संस्थाप्य सैनिकान् ।<br>रामसंदर्शनाकाङ्क्षी प्रययौ भरतः स्वयम् ॥६०॥ | चित्रकूटके निकट पहुँचनेपर उन्होंने सैनिकोंको दूर खड़ा कर दिया और स्वयं राम-दर्शनकी लालसासे आगे बढ़े ॥६०॥ |
| शत्रुघ्नेन सुमन्त्रेण गुहेन च परन्तपः ।<br>तपस्विमण्डलं सर्वं विचिन्वानो न्यवर्तत ॥६१॥ | परंतप भरतजी शत्रुघ्न, सुमन्त्र और गुहके साथ समस्त तपस्वियोंके आश्रमोंमें खोजते-खोजते फिर आये ॥६१॥ |
| अदृष्ट्वा रामभवनमपृच्छदृषिमण्डलम् ।<br>कुत्रास्ते सीतया सार्धं लक्ष्मणेन रघूत्तमः ॥६२॥ | किन्तु उन्हें श्रीरामचन्द्रजीकी कुटी कहीं न मिली। तब उन्होंने ऋषि-मण्डलीसे पूछा—"सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजी कहाँ रहते हैं?" ॥६२॥ |
| ऊचुरग्रे गिरेः पश्चाद्गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>विविक्तं रामसदनं रम्यं काननमण्डितम् ॥६३॥ | उन्होंने कहा—"सामनेवाले पर्वतके उस ओर श्रीमन्दाकिनीके उत्तरीय तटपर वनावलीसे सुशोभित रामकी परम रमणीक एकान्त कुटी है ॥६३॥ |
| सफलैराम्रपनसैः कदलीखण्डसंवृतम् ।<br>चम्पकैः कोविदारैश्च पुन्नागैर्विपुलैस्तथा ॥६४॥ | वह फलयुक्त आम्रवृक्ष, पनस और कदलीखण्ड (केलेकी क्यारियों) से घिरी हुई है। तथा उसके चारों ओर बहुत-से चम्पक, कोविदार और पुन्नाग आदिके भी वृक्ष सुशोभित हैं" ॥६४॥ |
| एवं दर्शितमालोक्य मुनिभिर्भरतोऽग्रतः ।<br>हर्षाययौ रघुश्रेष्ठभवनं मन्त्रिणा सह ॥६५॥ | मुनियोंके इस प्रकार बतलानेपर भरतजी प्रसन्नतापूर्वक मन्त्रियोंको साथ ले सबसे आगे रघुनाथजीके निवास-स्थानको चले ॥६५॥ आगे बढ़नेपर उन्होंने दूरहीसे रामका |
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ९: भगवान् राम और भरतका मिलन, भरतजीका लौटना और अत्रिमुनिसे भेंट
| ९२ | अध्यात्मरामायणं | [सर्ग ९ |
|---|
| ददर्श दूरादतिभासुरं शुभं<br>रामस्य गेहं मुनिवृन्दसेवितम् ।<br>वृक्षाग्रसंलग्नसुवल्कलाजिनं<br>रामाभिरामं भरतः सहानुजः ॥ ६६॥ | मुनिजनसेवित अति सुन्दर और भासमान सुन्दर भवन देखा। जिसमें वृक्षकी शाखापर वल्कल-वस्त्र और मृगचर्म टँग हुए थे और श्रीरामचन्द्रजीके वास करनेके कारण जो परम रमणीक था ॥ ६६ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अयोध्याकाण्डेऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवम सर्ग
भगवान् राम और भरतका मिलन, भरतजीका अयोध्यापुरीको लौटना और श्रीरामचन्द्रजीका अत्रिमुनिके आश्रमपर जाना ।
</div>| श्रीमहादेव उवाच<br>अथ गत्वाऽऽश्रमपदसमीपं भरतो मुदा ।<br>सीतारामपदैर्युक्तं पवित्रमतिशोभनम् ॥ १ ॥ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीभरतजी अति मग्न मनसे सीता और रामके चरण-चिह्नोंसे सुशोभित आश्रमके समीप अति सुन्दर और पवित्र स्थलमें पहुँचे ॥ १ ॥ |
| स तत्र वज्राङ्कुशवारिजाञ्चित-<br>ध्वजादिचिह्नानि पदानि सर्वतः ।<br>ददर्श रामस्य भुवोऽतिमङ्गला-<br>न्यचेष्टयत्पादरजःसु सानुजः ॥ २ ॥ | वहाँ उन्होंने सब ओर भगवान् रामचन्द्रके वज्र, अंकुश, कमल और ध्वजा आदिके चिह्नोंसे सुशोभित तथा पृथिवीके लिये अति मंगलमय चरण-चिह्न देखे । उन्हें देखकर भाई शत्रुघ्नके सहित वे उस चरण-रजमें लोटने लगे ॥ २ ॥ |
| अहो सुधन्योऽहममूनि राम-<br>पादाराविन्दाङ्कितभूतलानि ।<br>पश्यामि यत्पादरजो विमृग्यं<br>ब्रह्मादिदेवैः श्रुतिभिश्च नित्यम् ॥ ३ ॥ | और मन-ही-मन कहने लगे—<br>“अहो ! मैं परम धन्य हूँ, जो आज श्रीरामचन्द्रजीके उन चरणारविन्दोंके चिह्नोंसे सुशोभित भूमिको देख रहा हूँ जिनकी रजको ब्रह्मा आदि देवगण और सम्पूर्ण श्रुतियाँ भी सदा खोजती रहती हैं” ॥ ३ ॥ |
| इत्यद्भुतप्रेमरसाप्लुताशयो<br>विगाढचेता रघुनाथभावने ।<br>आनन्दजाश्रुस्नापितस्तनान्तरः<br>शनैरवापाश्रमसन्निधिं हरेः ॥ ४ ॥ | इस प्रकार जिनका हृदय अद्भुत प्रेमरससे भरा हुआ है, मन रघुनाथजीकी भावनामें डूबा हुआ है तथा वक्षःस्थल आनन्दाश्रुओंसे भीगा हुआ है वे भरतजी धीरे-धीरे श्रीहरिके आश्रमके निकट पहुँचे ॥ ४ ॥ |
| स तत्र दृष्ट्वा रघुनाथमास्थितं<br>दूर्वादलश्यामलमयतैक्षणम् ।<br>जटाकिरीटं नववल्कलाम्बरं<br>प्रसन्नवक्त्रं तरुणाणद्युतिम् ॥ ५ ॥<br>विलोकयन्तं जनकात्मजां शुभां<br>सौमित्रिणा सेवितपादपङ्कजम् । | वहाँ उन्होंने दूर्वा-दलके समान श्याम-शरीर और विशाल-नयन श्रीरघुनाथजीको बैठे हुए देखा, जो जटाओं-का मुकुट और नवीन वल्कल-वस्त्र धारण किये थे तथा प्रसन्नवदन और नवीन सूर्यके समान प्रभायुक्त थे ॥ ५ ॥ एवं जो शुभलक्षणा श्रीजनक-नन्दिनीकी ओर निहार रहे थे तथा श्रीलक्ष्मणजी जिनके चरणकमलोंकी सेवा कर रहे थे। उन्हें देखते ही श्रीभरतजीने दौड़कर |
सर्ग ९]
अयोध्याकाण्ड
९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदामिभिदुद्राव रघूत्तमं शुचा<br>हर्षाच्च तत्पादयुगं त्वराग्रहीत् ॥६॥ | हर्ष और शोकयुक्त होकर तुरन्त उनके चरण-युगल पकड़ लिये ॥ ६ ॥ |
| रामस्तमाकृष्य सुदीर्घबाहु-<br>र्दोर्भ्यां परिष्वज्य सिषिञ्च नेत्रजैः ।<br>जलैरथाङ्कोपरि संन्यवेशयत्<br>पुनः पुनः संपरिपस्वजे विभुः ॥७॥ | बड़ी भुजाओंवाले श्रीरामचन्द्रजीने अपनी दोनों बाहुओंसे उन्हें उठाकर आलिङ्गन किया और उन्हें गोदमें बैठाकर अपने आँसुओंसे सींचते हुए बारम्बार हृदय लगाया ॥ ७ ॥ |
| अथ ता मातरः सर्वाः समाजग्मुस्त्वरान्विताः ।<br>राघवं द्रष्टुकामास्तास्तृषार्ता गौर्रथा जलम् ॥८॥ | फिर प्यासी गौएँ जिस प्रकार जलकी ओर दौड़ती हैं उसी प्रकार कौसल्या आदि समस्त माताएँ रघुनाथजीको देखनेके लिये बड़ी शीघ्रतासे चलीं ॥ ८ ॥ |
| रामः स्वमातरं वीक्ष्य द्रुतमुत्थाय पादयोः ।<br>ववन्दे साश्रु सा पुत्रमालिङ्ग्यातीव दुःखिता ॥९॥ | रामजीने अपनी माताको देखते ही शीघ्रतासे उठकर उनका चरण-वन्दन किया और उन्होंने अत्यन्त दुःखसे नेत्रोंमें जल भरकर पुत्रको हृदयसे लगाया ॥ ९ ॥ |
| इतराश्च तथा नत्वा जननी रघुनन्दनः ।<br>ततः समागतं दृष्ट्वा वसिष्ठं मुनिपुङ्गवम् ॥१०॥ | फिर श्रीरघुनाथजीने उसी प्रकार अन्य माताओंको भी प्रणाम किया।<br>तदनन्तर, मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीको आते देख ॥ १० ॥ |
| साष्टाङ्गं प्रणिपत्याह धन्योऽस्मीति पुनः पुनः ।<br>यथार्हमुपवेश्याह सर्वानैव रघूद्वहः ॥११॥ | उन्हें साष्टांग प्रणामकर बारम्बार कहने लगे 'मैं धन्य हूँ, मैं धन्य हूँ !'<br>फिर श्रीरघुनाथजीने सबको यथायोग्य बैठाकर पूछा— ॥ ११ ॥ |
| पिता मे कुशली किंवा मां किमाहातिदुःखितः ।<br>वसिष्ठस्तमुवाचेदं पिता ते रघुनन्दन ॥१२॥ | "कहिये, हमारे पिताजी कुशलसे हैं ? उन्होंने मेरे वियोगसे अत्यन्त दुःखातुर होकर मेरिलिये क्या आज्ञा दी है ?" तब वसिष्ठजीने कहा— |
| त्वद्वियोगाभितप्तात्मा त्वामेव परिचिन्तयन् ।<br>रामरामेति सीतेति लक्ष्मणेति ममार ह ॥१३॥ | "हे रघुनन्दन ! तुम्हारे पिताने तुम्हारे वियोगसे अति सन्तप्त होकर 'हे राम ! हे राम ! हे सीते ! हे लक्ष्मण !' इस प्रकार तुम्हारा ही चिन्तन करते हुए अपने प्राण छोड़ दिये" ॥ १२-१३ ॥ |
| श्रुत्वा तत्कर्णशूलाभं गुरोर्वचनमञ्जसा ।<br>हा हतोऽस्मीति पतितो रुदन् रामः सलक्ष्मणः ॥१४॥ | कानोंमें शूलके समान लगनेवाले गुरुके इन वचनों-को सुनकर श्रीराम और लक्ष्मण 'हाय ! हम मारे गये' इस प्रकार रोते हुए सहसा गिर पड़े ॥ १४ ॥ |
| ततोऽनुरुददुः सर्वा मातरश्च तथापरे ।<br>हा तात मां परित्यज्य क्व गतोऽसि घृणाकर ॥१५॥ | तब समस्त माताएँ और अन्यान्य सभी उपस्थित लोग रोने लगे। श्रीरामचन्द्रजी बारम्बार कहने लगे—"हा तात ! हे दयामय ! आप मुझे छोड़कर कहाँ चले गये ? ॥ १५ ॥ |
| अनाथोऽस्मि महाबाहो मां को वा लालयेदितः ।<br>सीता च लक्ष्मणश्चैव विलेपतुग्तो भृशम् ॥१६॥ | हे महाबाहो ! मैं अनाथ हो गया; अब मुझे कौन लाड़ लड़ायेगा।" फिर इसी प्रकार सीता और लक्ष्मण भी बहुत विलाप करने लगे ॥ १६॥ |
| वसिष्ठः शान्तवचनैः शमयामास तां शुचम् ।<br>ततो मन्दाकिनीं गत्वा स्नात्वा ते वीतकल्मषाः ॥१७॥ | तब वसिष्ठजीने शान्तिमय वाक्योंसे वह शोक शान्त किया और फिर सब लोग मन्दाकिनीपर जाकर स्नान करके पवित्र हुए ॥ १७ ॥ |
| राज्ञे ददुर्जलं तत्र सर्वे ते जलकाङ्क्षिणे ।<br>पिण्डान्निर्वपयामास रामो लक्ष्मणसंयुतः ॥१८॥ | वहाँ सबने जलकांक्षी महाराज दशरथको जलाञ्जलि दी तथा लक्ष्मणजीके सहित श्रीरामचन्द्रजीने पिण्डदान किया ॥ १८ ॥ 'जो |
| ९४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
|---|
[संस्कृत मूल पाठ]
इङ्गुदीफलपिण्याकरचितान्मधुसम्प्लुतान् ।
वयं यदन्नाः पितरस्तदन्नाः स्मृतिनोदिताः ॥१९॥
इति दुःखाश्रुपूर्णाक्षः पुनः स्नात्वा गृहं ययौ ।
सर्वे रुदित्वा सुचिरं स्नात्वा जग्मुस्तदाश्रमम् ॥२०॥
तस्मिंस्तु दिवसे सर्वे उपवासं प्रचक्रिरे ।
ततः परेद्युर्विमले स्नात्वा मन्दाकिनीजले ॥२१॥
उपविष्टं समागम्य भरतो राममब्रवीत् ।
राम राम महाभाग स्वात्मानमभिषेचय ॥२२॥
राज्यं पालय पित्र्यं ते ज्येष्ठस्त्वं मे पिता तथा ।
क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम् ॥२३॥
इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैः पुत्रानुत्पाद्य तन्तवे ।
राज्ये पुत्रं समारोप्य गमिष्यसि ततो वनम् ॥२४॥
इदानीं वनवासस्य कालो नैव प्रसीद मे ।
मातुर्मे दुष्कृतं किञ्चित्स्मर्तुं नार्हसि पाहि नः।२५।
इत्युक्त्वा चरणौ भ्रातुः शिरस्याधाय भक्तितः ।
रामस्य पुरतः साक्षाद्दण्डवत्पतितो भुवि ॥२६॥
उत्थाप्य राघवः शीघ्रमारोप्याङ्केऽतिमक्तितः ।
उवाच भरतं रामः स्नेहार्द्रनयनः शनैः ॥२७॥
शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि त्वयोक्तं यत्तथैव तत् ।
किन्तु मामब्रवीत्तातॊ नव वर्षाणि पञ्च च ॥२८॥
उषित्वा दण्डकारण्ये पुरं पश्चात्समाविश ।
इदानीं भरतायेदं राज्यं दत्तं मयाखिलम् ॥२९॥
ततः पित्रैव सुव्यक्तं राज्यं दत्तं तवैव हि ।
दण्डकारण्यराज्यं मे दत्तं पित्रा तथैव च ॥३०॥
अतः पितुर्वचः कार्यमावाभ्यामतियत्नतः ।
पितुर्वचनमुल्लङ्घ्य स्वतन्त्रो यस्तु वर्तते ॥३१॥
[हिन्दी अनुवाद]
हमारा अन्न है वही हमारे पितरोंको प्रिय होगा, यही स्मृतिकी आज्ञा है' ऐसा कह उन्होंने इंगुदी फलके पिण्ड बना उनपर मधु डालकर उन्हें दान किया ॥ १९॥ फिर नेत्रोंमें शोकाश्रु भरे हुए वे पुनः स्नानकर आश्रममें आये । इसी प्रकार और सब भी बहुत देरतक रोकर अन्तमें स्नान करके आश्रमको लौटे ॥२०॥
उस दिन सबने उपवास किया। दूसरे दिन, मन्दाकिनीके निर्मल जलमें स्नान कर भरतजीने आश्रममें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर कहा—"हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! आप अपना अभिषेक कीजिये ॥ २१-२२ ॥ यह पैतृक राज्य आपहीका है, आप इसका पालन करें । आप हमारे बड़े भाई हैं, अतः पितृतुल्य हैं। महाराज ! प्रजाका पालन करना यही क्षत्रियोंका मुख्य धर्म है। ॥ २३॥ अतः आप नाना प्रकारके यज्ञोंसे यजन करके फिर वंशवृद्धिके लिये पुत्र उत्पन्न कर उसे (बड़े होनेपर) राजसिंहासनपर बैठाकर तब वनको जायें ॥ २४ ॥ हे प्रभो ! अभी वनवासका समय नहीं है, आप मुझपर प्रसन्न होइये । मेरी माताका जो कुछ अपराध है उसे भूल जाइये और हमारी रक्षा कीजिये" ॥ २५॥ ऐसा कहकर उन्होंने भाईके चरणोंको भक्तिपूर्वक अपने मस्तकपर रख लिया और श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख दण्डके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥
रामजीने भरतको शीघ्रतासे उठाकर अति प्रेमपूर्वक गोदमें बैठा लिया और नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भरकर धीरे-धीरे उनसे कहने लगे—॥ २७॥ “भाई ! मैं जो कहता हूँ वह सुनो । तुम जो कुछ कहते हो सो बिलकुल ठीक है । किन्तु पिताजीने मुझे आज्ञा दी थी कि चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहकर फिर अयोध्यामें आना; इस समय यह सम्पूर्ण राज्य मैं भरतको देता हूँ ॥ २८-२९ ॥ अतः स्पष्ट ही पिताजीने यह राज्य तो तुम्हींको दिया है और वैसे ही मुझे उन्होंने दण्डकारण्यका राज्य दिया है ॥ ३० ॥ इसलिये हम दोनोंको ही प्रयत्नपूर्वक पिताजीके वचनोंको सफल करना चाहिये । जो मनुष्य अपने पिताके वचनोंका उल्लङ्घन कर स्वेच्छापूर्वक बरतता है वह जीता हुआ भी मृतकके समान है और शरीर छोड़नेपर नरकको जाता है ।
| सर्ग ९ ] | अयोध्याकाण्ड | ९५ |
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| स जीवन्नेव मृतको देहान्ते निरयं व्रजेत् ।<br>तस्माद्राज्यं प्रशाधि त्वं वयं दण्डकपालकाः ॥३२॥ | अतः तुम राज्य-शासन करो, हम दण्डकवनकी रक्षा करेंगे ॥ ३१-३२ ॥ |
| भरतस्त्वब्रवीद्रामं कामुको मूढधीः पिता ।<br>स्त्रीजितो भ्रान्तहृदय उन्मत्तो यदि वक्ष्यति ।<br>तत्सत्यमिति न ग्राह्यं भ्रान्तवाक्यं यथा सुधीः ३३ | तब भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"यदि पिताजीने कामी, मूढ़बुद्धि, स्त्रीके वशीभूत, भ्रान्तचित्त और उन्मत्त होनेके कारण ऐसा कह भी दिया है तो भी उसे सत्य न मानना चाहिये; जिस प्रकार बुद्धिमान् लोग भ्रान्त पुरुषोंके वाक्यका आदर नहीं करते ॥३३॥ |
| श्रीराम उवाच<br>न स्त्रीजितः पिता ब्रूयान्न कामी नैव मूढधीः ।<br>पूर्वं प्रतिश्रुतं तस्य सत्यवादी ददौ भयात् ॥३४॥<br>असत्याद्भीतिरधिका महतां नरकादपि ।<br>करोमीत्यहमप्येतत्सत्यं तस्यै प्रतिश्रुतम् ॥३५॥<br>कथं चाक्यमहं कुर्यामसत्यं राघवो हि सन् ।<br>इत्युदीरितमाकर्ण्य रामस्य भरतोऽब्रवीत् ॥३६॥<br>तथैव चीरवसनो वने वत्स्यामि सुव्रत ।<br>चतुर्दश समास्त्वं तु राज्यं कुरु यथासुखम् ॥३७॥ | **श्रीरामजी बोले—**पिताजीने स्त्रीवश, कामवश अथवा मूढ़बुद्धि होकर ऐसा नहीं कहा। उन सत्यवादीने अपनी पूर्व-प्रतिज्ञानुसार ही प्रतिज्ञा-भंगके भयसे ये वर दिये थे ॥ ३४ ॥ महान् पुरुषोंको असत्यसे नरककी अपेक्षा भी अधिक भय हुआ करता है। मैं भी 'ऐसा ही करूँगा' यह कहकर उनसे सत्य-प्रतिज्ञा कर चुका हूँ ॥ ३५ ॥ फिर, मैं रघुवंशमें जन्म लेकर अपना वचन कैसे उलट सकता हूँ ?<br><br>रामजीका ऐसा कथन सुनकर भरतजी बोले—॥३६॥ “हे सुव्रत ! पिताजीके कथनानुसार मैं तो आपके समान चौदह वर्षतक वल्कल-वस्त्र धारणकर वनमें रहूँगा और आप सुखपूर्वक राज्य भोगिये" ॥ ३७ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>पित्रा दत्तं तवैवैतद्राज्यं मह्यं वनं ददौ ।<br>व्यत्ययं यद्यहं कुर्यामसत्यं पूर्ववत् स्थितम् ॥३८॥ | **श्रीरामजी बोले—**पिताजीने तुमको यह राज्य और मुझे वनवास दिया है। अब यदि मैं इसका उलटा करूँ तो असत्य ज्यों-का-त्यों ही रहता है ॥ ३८ ॥ |
| भरत उवाच<br>अहमप्यागमिष्यामि सेवे त्वां लक्ष्मणो यथा ।<br>नोचेत्प्रायोपवेशनं त्यजाम्येतत्कलेवरम् ॥३९॥<br>इत्येवं निश्चयं कृत्वा दर्भानास्तीर्य चातपे ।<br>मनसापि विनिश्चित्य प्राङ्मुखोपविवेश सः ॥४०॥<br>भरतस्यापि निर्बन्धं दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।<br>नेत्रान्तसंज्ञां गुरवे चकार रघुनन्दनः ॥४१॥ | भरतजी बोले—( अच्छा, यदि आप वनसे नहीं लौटना चाहते तो मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे ) मैं भी वनमें आकर लक्ष्मणके समान ही आपकी सेवा करूँ, नहीं तो मैं अन्न-जल छोड़कर इस शरीरको त्याग दूँगा ॥ ३९ ॥ अपना ऐसा निश्चय प्रकट कर और मनमें भी यही ठानकर वे धूपमें कुशा बिछाकर पूर्वकी ओर मुख करके बैठ गये ॥ ४० ॥ भरतजीका ऐसा हठ देखकर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त विस्मित हो गुरु वसिष्ठजीको नेत्रोंसे संकेत किया ॥ ४१ ॥ |
| एकान्ते भरतं प्राह वसिष्ठो ज्ञानिनां वरः ।<br>वत्स गुह्यं शृणुष्वेदं मम वाक्यात्सुनिश्चितम् ॥४२॥<br>रामो नारायणः साक्षाद्ब्रह्मणा याचितः पुरा ।<br>रावणस्य वधार्थाय जातो दशरथात्मजः ॥४३॥ | तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने भरतको एकान्तमें ले जाकर कहा, "वत्स ! मैं जो कहता हूँ यह सुनिश्चित गुह्य रहस्यकी बात सुनो ॥४२॥ भगवान् राम साक्षात् नारायण हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर उन्होंने रावणको मारनेके लिये दशरथके यहाँ पुत्र- |
९६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ९
योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी । शेषोऽपि लक्ष्म॑णो जातो राममन्वेति सर्वदा ॥४४॥ रावणं हन्तुकामास्ते गमिष्यन्ति न संशयः। कैकेय्या वरदानादि यद्यन्निष्ठुरभाषणम् ॥४५॥ सर्वं देवकृतं नोचेदेवं सा भाषयेत्कथम् । तस्मात्त्यजाग्रहं तात रामस्य विनिवर्तने ॥४६॥ निवर्तस्व महासैन्यैर्मातृभिः सहितः पुरम् । रावणं सकुलं हत्वा शीघ्रमेवागमिष्यति ॥४७॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं भरतो विस्मयान्वितः । गत्वा समीपं रामस्य विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥४८॥ पादुके देहि राजेन्द्र राज्याय तव पूजिते । तयोः सेवां करोम्येव यावदागमनं तव ॥४९॥ इत्युक्त्वा पादुके दिव्ये योजयामास पादयोः। रामस्य ते ददौ रामो भरतायातिभक्तितः ॥५०॥ गृहीत्वा पादुके दिव्ये भरतो रत्नभूषिते । रामं पुनः परिक्रम्य प्रणनाम पुनः पुनः ॥५१॥ भरतः पुनराहेदं भक्त्या गद्गदया गिरा । नवपञ्चसमान्ते तु प्रथमे दिवसे यदि ॥५२॥ नागमिष्यसि चेद्राम प्रविशामि महानलम् । बाढमित्येव तं रामो भरतं संन्यवर्तयत् ॥५३॥ ससैन्यः सवसिष्ठश्च शत्रुघ्नसहितः सुधीः । मातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं गमनायोपचक्रमे ॥५४॥ कैकेयी राममेकान्ते स्रवन्नेत्रजलाकुला । प्राञ्जलिः प्राह हे राम तव राज्यविघातनम् ॥५५॥ कृतं मया दुष्टधिया मायामोहितचेतसा । क्षमस्व मम दौरात्म्यं क्षमासारा हि साधवः ॥५६॥
रूपसे जन्म लिया है ॥४३॥ इसी प्रकार योगमाया- ने जनकनन्दिनी सीताके रूपसे अवतार लिया है। और शेषजी लक्ष्मणके रूपसे उत्पन्न होकर उनका अनुगमन कर रहे हैं ॥४४॥ वे रावणको मारना चाहते हैं इसलिये निस्सन्देह वनको ही जायेंगे। कैकेयी- के जो कुछ भी वरदान आदि और निष्ठुर भाषण आदि कार्य हैं वे सब देवताओंकी प्रेरणासे ही हुए हैं, नहीं तो वह ऐसे वचन कैसे बोल सकती थी ? इस- लिये हे तात ! तुम रामको लौटानेका आग्रह छोड़ दो ॥४५-४६॥ और भाई शत्रुघ्न तथा सेनाके सहित अयोध्याको लौट चलो; राम भी कुलसहित रावणका संहार करके वहाँ शीघ्र ही आ जायेंगे" ॥४७॥
गुरुजीके ये वचन सुनकर भरतको अति विस्मय हुआ और उन्होंने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्र- जीके पास जाकर कहा-॥४८॥ "हे राजेन्द्र ! आप मुझे राज्य-शासनके लिये अपनी जगत्पूज्य चरण- पादुकाएँ दीजिये । जबतक आप लौटेंगे तबतक मैं उन्हींकी सेवा करता रहूँगा ।" ॥४९॥
ऐसा कह भरतजीने उन्हें उनके चरणोंमें दो दिव्य पादुकाएँ (खड़ाऊँ) पहना दीं । श्रीरामचन्द्र- जीने भरतका भक्ति-भाव देखकर वे खड़ाऊँ उन्हें दे दीं ॥५०॥ भरतजीने वे रत्नजटित दिव्य पादुकाएँ लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की और उन्हें बारम्बार प्रणाम किया ॥५१॥
तदनुसार, वे भक्तिवश गद्गद्-वाणीसे बोले, "हे राम ! यदि चौदह वर्षके व्यतीत होनेपर आप पहले दिन ही अयोध्या न पहुँचे तो मैं महान् अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ।" तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह भरतजीको विदा किया ॥ ५२-५३ ॥
तदुपरान्त बुद्धिमान् भरतजीने सम्पूर्ण सेना, वसिष्ठ, शत्रुघ्न, समस्त माताओं तथा मन्त्रियोंके साथ चलनेकी तैयारी की ॥५४॥
इसी समय कैकेयीने एकान्त स्थानमें नेत्रोंमें जल भरकर हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा-"हे राम ! मायासे मुग्धचित्त हो जानेके कारण मुझ कुबुद्धिने तुम्हारे राज्याभिषेकमें विघ्न डाल दिया सो तुम मेरी इस कुटिलताको क्षमा करना क्योंकि साधुजन सर्वदा क्षमाशील ही होते हैं ॥ ५५-५६ ॥ आप साक्षात्
| सर्ग ९ ] | अयोध्याकाण्ड | ९७ |
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| त्वं साक्षाद्विष्णुरव्यक्तः परमात्मा सनातनः।<br>मायामानुषरूपेण मोहयस्यखिलं जगत्।<br>त्वयैव प्रेरितो लोकः कुरुते साध्वसाधु वा ॥५७॥<br><br>त्वदधीनमिदं विश्वमस्वतन्त्रं करोति किम्।<br>यथा कृत्रिमनेर्तक्यो नृत्यन्ति कुहकेच्छया ॥५८॥<br><br>त्वदधीना तथा माया नर्तकी बहुरूपिणी।<br>त्वयैव प्रेरिताऽहं च देवकार्यं करिष्यता ॥५९॥<br><br>पापिष्ठं पापमनसा कर्माचरमरिन्दम।<br>अद्य प्रतीतोऽसि मम देवानामप्यगोचरः ॥६०॥<br><br>पाहि विश्वेश्वरानन्त जगन्नाथ नमोऽस्तु ते।<br>छिन्धि स्नेहमयं पाशं पुत्रवित्तादिगोचरम् ॥६१॥<br><br>त्वज्ज्ञानानलखङ्गेन त्वामहं शरणं गता।<br><br>कैकेय्या वचनं श्रुत्वा रामः सस्मितमब्रवीत् ॥६२॥<br><br>यदाह मां महाभागे नानृतं सत्यमेव तत्।<br>मयैव प्रेरिता वाणी तव वक्त्राद्विनिर्गता ॥६३॥<br><br>देवकार्यार्थसिद्धयर्थमत्र दोषः कुतस्तव।<br>गच्छ त्वं हृदि मां नित्यं भावयन्ती दिवानिशम् ॥<br><br>सर्वत्र विगतस्नेहा मद्भक्त्या मोक्ष्यसेऽचिरात्।<br>अहं सर्वत्र समदृग् द्वेष्यो वा प्रिय एव वा ॥६५॥<br><br>नास्ति मे कल्पकस्येव भजतोऽनुभजाम्यहम्।<br>मन्मायामोहितधियो मामम्ब मनुजाकृतिम् ॥६६॥<br><br>सुखदुःखाद्यनुगतं जानन्ति न तु तत्त्वतः।<br>दिष्टया मद्गोचरं ज्ञानमुत्पन्नं ते भवापहम् ॥६७॥<br><br>स्मरन्ती तिष्ठ भवने लिप्यसे न च कर्मभिः। | विष्णु भगवान्, अव्यक्त परमात्मा और सनातन पुरुष हैं। अपने मायामय मनुष्यरूपसे आप समस्त संसारको मोहित कर रहे हैं। आपकी ही प्रेरणासे लोग शुभ अथवा अशुभ कर्म करते हैं॥ ५७॥ यह सम्पूर्ण विश्व आपहीके अधीन है, अस्वतन्त्र होनेके कारण यह स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता; जिस प्रकार कृत्रिम नर्त्तकियां (कठपुतलियाँ) सूत्रधार (बाजीगर) की इच्छानुसार ही नाचती हैं॥ ५८॥ उसी प्रकार नाना आकार धारण करनेवाली यह मायारूपिणी नटी आपहीके अधीन है। और हे शत्रुदमन! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छावाले आपहीके द्वारा प्रेरित होकर मुझ पापिनीने अपनी दुष्टबुद्धिसे यह पापकर्म किया था। आज मैंने आपको जान लिया, आप देवताओंके भी मन और वाणी आदिसे परे हैं॥ ५९-६०॥ हे विश्वेश्वर ! हे अनन्त ! आप मेरी रक्षा कीजिये। हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है। हे प्रभो ! मैं आपकी शरण हूँ। आप अपने ज्ञानाग्निरूप खड्गसे मेरे पुत्र और धन आदिके स्नेह-बन्धनको काट डालिये।"<br><br>कैकेयीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराकर कहा—॥ ६१-६२॥ "हे महाभागे ! तुमने जो कुछ कहा है वह ठीक ही है, मिथ्या नहीं। मेरी प्रेरणासे ही देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये तुम्हारे मुखसे वे शब्द निकले थे। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अब तुम जाओ; अहर्निश निरन्तर मेरी ही भावना करनेसे तुम सर्वत्र स्नेहरहित होकर मेरी भक्तिद्वारा शीघ्र ही मुक्त हो जाओगी। मैं सर्वत्र समदर्शी हूँ, मेरा कोई भी प्रिय या अप्रिय नहीं है ॥ ६३-६५॥ मायावी पुरुष जिस प्रकार अपनी ही मायासे रचे पदार्थोंमें राग-द्वेष नहीं करता उसी प्रकार मेरा भी किसीमें राग-द्वेष नहीं है। जो पुरुष जिस प्रकार मेरा भजन करता है मैं भी वैसे ही उसका ध्यान रखता हूँ। हे मात: ! मेरी मायासे मोहित होकर लोग मुझे सुख-दुःखके वशीभूत साधारण मनुष्य जानते हैं। वे मेरे वास्तविक स्वरूपको नहीं जानते। तुम्हारा बड़ा भाग्य है जो तुम्हें संसार-भयको दूर करनेवाला मेरा तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ है॥ ६६-६७॥ तुम मेरा स्मरण करती हुई घरहीमें रहो, इससे तुम कर्म-बन्धनमें नहीं बँधोगी।" |