अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
३३६ अध्यात्मरामायणं [ सर्ग १
दास्यामि पुत्रमेकं ते उभयोर्वंशवर्धनम् ॥३४॥
ततः प्रासूत सा पुत्रं पुलस्त्याल्लोकविश्रुतम् । विश्रवा इति विख्यातः पौलस्त्यो ब्रह्मविन्मुनिः ३५ तस्य शीलादिकं दृष्ट्वा भरद्वाजो महामुनिः । भार्यार्थं स्वां दुहितरं ददौ विश्रवसे मुदा ॥३६॥ तस्यां तु पुत्रः सञ्जज्ञे पौलस्त्याल्लोकसम्मतः । पितृतुल्यो वैश्रवणो ब्रह्मणा चानुमोदितः ॥३७॥ ददौ तत्तपसा तुष्टो ब्रह्मा तस्मै वरं शुभम् । मनोऽभिलषितं तस्य धनेशत्वमखण्डितम् ॥३८॥ ततो लब्धवरः सोऽपि पितरं द्रष्टुमागतः । पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता ॥३९॥ नमस्कृत्याथ पितरं निवेद्य तपसः फलम् । प्राह मे भगवान् ब्रह्मा दत्त्वा वरमनिन्दितम् ॥४०॥ निवासाय न मे स्थानं दत्तवान्परमेश्वरः । ब्रूहि मे नियतं स्थानं हिंसा यत्र न कस्यचित् ॥४१॥ विश्रवा अपि तं प्राह लङ्कानाम पुरी शुभा । राक्षसानां निवासाय निर्मिता विश्वकर्मणा ॥४२॥ त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्ते रसातलम् । सा पुरी दुष्प्रधर्षान्यैर्मध्ये सागरमास्थिता ॥४३॥ तत्र वासाय गच्छ त्वं नान्यैः साऽधिष्ठिता पुरा । पित्रादिष्टस्त्वसौ गत्वा तां पुरीं धनदोऽविशत् ॥४४॥ स तत्र सुचिरं कालमुवास पितृसम्मतः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षसः ॥४५॥ रसातलान्मर्त्यलोकं चचार पिशिताशनः । गृहीत्वा तनयां कन्यां साक्षाद्देवीमिव श्रियम् ॥४६॥ अपश्यद्धनदं देवं चरन्तं पुष्पकेण सः ।
"मैं तुझे दोनों वंशों (मातृपक्ष और पितृपक्ष) को बढ़ानेवाला एक पुत्र दूँगा" ॥३४॥
तब उस कन्याने पुलस्त्यजीद्वारा एक त्रिलोक- विख्यात पुत्रको जन्म दिया, जो पुलस्त्य-पुत्र ब्रह्म- वेत्ता मुनिवर विश्रवाके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३५ । विश्रवाका शील-स्वभावादि देखकर महामुनि भरद्वाजने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी ॥ ३६ ॥ उससे पुलस्त्यनन्दन विश्रवाने एक त्रिलोकमें प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न किया । वह विश्रवाका पुत्र अपने पिता- हीके समान था तथा ब्रह्माजीने भी उसकी प्रशंसा की थी ॥ ३७ ॥ उसके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे मनोवाञ्छित श्रेष्ठ वर देकर अखण्डित धनेश्वरता दी ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे धनाध्यक्ष होकर वह उन्हींके दिये हुए महातेजस्वी पुष्पक विमानपर चढ़कर अपने पितासे मिलनेके लिये आया ॥ ३९ ॥ और उन्हें अपने तपका फल निवेदन कर प्रणाम करके बोला— "भगवान् ब्रह्माजीने मुझे यह अत्युत्तम वर दिया है ॥ ४० ॥ किन्तु उन परमेश्वरने मुझे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं दिया । अतः आप मुझे कोई ऐसा निश्चित स्थान बताइये जहाँ रहनेसे किसीकी हिंसा न हो" ॥ ४१ ॥ तब विश्रवाने उससे कहा— "(दानवोंके) विश्वकर्माने लंका नामकी एक सुन्दर पुरी राक्षसोंके रहनेके लिये बनायी है ॥ ४२ ॥ किन्तु दैत्य- लोग विष्णुभगवान्के भयसे उसे छोड़कर रसातलको चले गये हैं। उस पुरीका किसी शत्रुसे आक्रान्त होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वह समुद्रके बीचमें बसी हुई है ॥ ४३ ॥ तुम वहीं रहनेके लिये जाओ । उस पुरीपर इससे पहले और किसीका अधिकार नहीं हुआ।" तब धनपति कुबेरने पिताकी आज्ञासे जाकर उस पुरीमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥ वहाँ अपने पिताकी सम्मतिसे उन्होंने बहुत समयतक निवास किया ।
किसी समय सुमाली नामक एक मांस-भोजी राक्षस साक्षात् लक्ष्मीदेवीके समान रूपवती अपनी छोटी पुत्री- को साथ लिये रसातलसे आकर मर्त्यलोकमें घूम रहा था ॥ ४५-४६ ॥ उसने भगवान् कुबेरको पुष्पक विमान- पर चढ़कर विचरते देखा । तब महामति सुमाली
सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३३३
| हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः ॥४७॥<br>उवाच तनयां तत्र कैकसीं नाम नामतः ।<br>वत्से विवाहकालस्ते यौवनं चातिवर्तते ॥४८॥<br>प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरैर्गृह्यसे शुभे ।<br>सा त्वं वरय भद्रं ते मुनिं ब्रह्मकुलोद्भवम् ॥४९॥<br>स्वयमेव ततः पुत्रा भविष्यन्ति महाबलाः ।<br>ईदृशाः सर्वशोभाढ्या धनदेन समाः शुभे ॥५०॥<br>तथेति साऽऽश्रमं गत्वा मुनेरग्रे व्यवस्थिता ।<br>लिखन्ती भुवमग्रेण पादेनाधोमुखी स्थिता ॥५१॥<br>तामपृच्छन्मुनिः का त्वं कन्याऽसि वरवर्णिनि ।<br>साऽब्रवीत्प्राञ्जलिर्ब्रह्मन् ध्यानेन ज्ञातुमर्हसि ॥५२॥<br>ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ।<br>ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्स्यसि ॥५३॥<br>दारुणायां तु वेलायामागतासि सुमध्यमे ।<br>अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ सम्भविष्यतः ॥५४॥<br>साऽब्रवीन्मुनिशार्दूल त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ।<br>तामाह पश्चिमो यस्ते भविष्यति महामतिः ॥५५॥<br>महाभागवतः श्रीमान् रामभक्त्यैकतत्परः ।<br>इत्युक्ता सा तथा काले सुषुवे दशकन्धरम् ॥५६॥<br>रावणं विंशतिभुजं दशशीर्षं सुदारुणम् ।<br>तद्रक्षोजातमात्रेण चचाल च वसुन्धरा ॥५७॥<br>बभूवुर्नाशहेतूनि निमित्तान्यखिलान्यपि ।<br>कुम्भकर्णस्ततो जातो महापर्वतसन्निभः ॥५८॥<br>ततः शूर्पणखा नाम जाता रावणसोदरी ।<br>ततो विभीषणो जातः शान्तात्मा सौम्यदर्शनः॥५९॥<br>स्वाध्यायी नियताहारो नित्यकर्मपरायणः ।<br>कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा द्विजान् सन्तुष्टचेतसः ॥६०॥ | राक्षसोंके हितका उपाय सोचने लगा ॥ ४७ ॥ वह कैकसी नामवाली अपनी कन्यासे बोला—"बेटी ! तेरे विवाहका समय और यौवनकाल बीता जा रहा है॥ ४८॥ किन्तु हे सुन्दरि ! 'तू छोड़ देगी' इस भयसे तुझे कोई वर वरण नहीं करता । अतः तेरा कल्याण हो, तू स्वयं ही जाकर ब्रह्माजीके वंशमें उत्पन्न हुए मुनिवर विश्रवाको वरण कर । हे शुभे ! उनसे तेरे इस कुबेरके समान सर्वशोभासम्पन्न महाबलवान् पुत्र उत्पन्न होंगे ॥ ४९-५० ॥<br><br>तब वह 'बहुत अच्छा' कह मुनीश्वरके आश्रमपर जाकर खड़ी हो गयी और नीचेको मुख किये चरणनखसे पृथिवी कुरेदने लगी ॥ ५१ ॥ मुनीश्वरने उससे पूछा—"हे सुन्दरवर्णवाली ! तू कौन और किसकी कन्या है ? (तथा किसलिये यहाँ आयी है?)" कैकसीने हाथ जोड़कर कहा—"ब्रह्मन् ! आप ध्यानद्वारा सभी कुछ जान सकते हैं" ॥ ५२ ॥ तब मुनिवरने ध्यानद्वारा सब बात जानकर उससे कहा—"मैं तेरी अभिलाषा जान गया, तू मुझसे पुत्रोंकी इच्छा करती है ॥ ५३ ॥ किन्तु, हे सुन्दरि ! तू इस दारुण समयमें आयी है इसलिये तेरे पुत्र भी दो महाभयंकर राक्षस होंगे" ॥ ५४ ॥ उसने कहा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! क्या आपके द्वारा भी ऐसे पुत्र होने चाहिये ? तब मुनीश्वरने उससे कहा—"उनके पश्चात् तेरे जो पुत्र होगा वह महाबुद्धिमान्, परम भगवद्भक्त, श्रीसम्पन्न और एकमात्र रामभक्तिमें ही तत्पर होगा।"<br><br>मुनीश्वरके ऐसा कहनेपर उसने यथासमय दश शिर और बीस भुजाओंवाले अति भयंकर रावणको जन्म दिया । उस राक्षसके जन्म लेते ही पृथिवी काँपने लगी ॥ ५५–५७ ॥ और संसारके नाशके समस्त कारण उपस्थित हो गये । उसके पश्चात् महापर्वतके समान बड़े डील-डौलवाला कुम्भकर्ण उत्पन्न हुआ ॥ ५८ ॥ फिर रावणकी बहिन शूर्पणखाका जन्म हुआ और उसके पीछे अति शान्तचित्त सौम्यमूर्ति विभीषण उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त स्वाध्यायशील मिताहारी और नित्यकर्मपरायण था । अत्यन्त दारुण दुष्टात्मा कुम्भकर्ण सन्तुष्टचित्त ब्राह्मण और ऋषियोंके समूहोंको |
| ३३४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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भक्षयन्नृपिसङ्घांश्च विचचारातिदारुणः।
रावणोऽपि महासत्त्वो लोकानां भयदायकः।
ववृधे लोकनाशाय ह्यादयो देहिनामिव ॥६१॥
राम त्वं सकलान्तरस्थमभितो जानासि विज्ञानदृक्
साक्षी सर्वहृदि स्थितो हि परमो नित्योदितो निर्मलः।
त्वं लीलामनुजाकृतिः स्वमहिमन् मायागुणैर्नज्यसे
लीलार्थं प्रतिचोदितोऽद्य भवता वक्ष्यामि रक्षोद्भवम् ॥६२॥
जानामि केवलमनन्तमचिन्त्यशक्तिं
चिन्मात्रमक्षरमजं विदितात्मतत्त्वम्।
त्वां राम गूढनिजरूपमनुप्रवृत्तो
मूढोऽप्यहं भवदनुग्रहतश्चरामि ॥६३॥
एवं वदन्तमिनवंशपवित्रकीर्तिः
कुम्भोद्भवं रघुपतिः प्रहसन्नभाषे।
मायाश्रितं सकलमेतदनन्यकत्वा-
न्मत्कीर्तनं जगति पापहरं निबोध ॥६४॥
भक्षण करता हुआ पृथिवीपर घूमने लगा। तथा सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करनेवाला महाबली रावण भी प्राणियोंका नाश करनेवाले रोगके समान त्रिलोकीको नष्ट करनेके लिये बढ़ने लगा ॥५९--६१॥
हे राम ! आप सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं और साक्षीरूपसे अपनी ज्ञानदृष्टिद्वारा सबके हृदयस्थित विचारोंको भली भाँति जानते हैं। आप परम श्रेष्ठ, नित्य-प्रबुद्ध और निर्मल हैं। हे अपनी महिमामें स्थित रहनेवाले परमेश्वर ! आपने लीलासे ही यह मनुष्यरूप धारण किया है, किन्तु आप मायाके गुणोंसे लिप्त नहीं होते। आपने लीलावश मुझसे पूछा है, इसीलिये मैं यह राक्षसोंका जन्मवृत्तान्त सुना रहा हूँ ॥ ६२ ॥ हे राम! मैं आपको एकमात्र, अनन्त, अचिन्त्यशक्ति, चिन्मात्र, अक्षर, अजन्मा और आत्मबोधस्वरूप जानता हूँ तथा (मायाके द्वारा) अपने स्वरूपको गुप्त रखनेवाले आपमें (भजनद्वारा) परायण हो मैं मूढ़ भी आपकी कृपासे स्वच्छन्द विचरता रहता हूँ ॥ ६३ ॥ अगस्त्यजीके इस प्रकार कहनेपर सूर्यवंशके सुयशस्वरूप श्रीरघुनाथजीने अगस्त्यजीसे हँसकर कहा—"यह सम्पूर्ण संसार मायामय है, क्योंकि वास्तवमें यह मुझसे पृथक् नहीं है; हे मुने ! तुम मेरे गुण-कीर्तनको ही इस संसारमें सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला जानो ॥ ६४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण।
श्रीमहादेव उवाच
श्रीरामवचनं श्रुत्वा परमानन्दनिर्भरः।
मुनिः प्रोवाच सदसि सर्वेषां तत्र शृण्वताम् ॥ १ ॥
अथ वित्तेश्वरो देवस्तत्र कालेन केनचित्।
आययौ पुष्पकारूढः पितरं द्रष्टुमञ्जसा ॥ २ ॥
दृष्ट्वा तं कैकसी तत्र आजमानं महौजसम्।
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! रघुनाथजीके ये वचन सुनकर अगस्त्य मुनि अत्यन्त आनन्दसे भर गये और उस सभामें सबके सुनते हुए फिर कहने लगे—॥ १ ॥ "हे राम! किसी समय धनपति कुबेरजी अकस्मात् अपने पितासे मिलनेके लिये पुष्पक विमानपर चढ़कर आये ॥ २ ॥ जब राक्षसी कैकसीने महातेजस्वी कुबेरको पिताके पास विराजमान देखा तो
सर्ग २ ] उत्तरकाण्ड ३३५
| राक्षसी पुत्रसामीप्यं गत्वा रावणमब्रवीत् ॥ ३ ॥ | वह अपने पुत्र रावणके पास जाकर बोली—॥ ३ ॥ |
| पुत्र पश्य धनाध्यक्षं ज्वलन्तं स्वेन तेजसा । | "बेटा ! अपने तेजसे प्रकाशमान इस धनपतिको देखो |
| त्वमप्येवं यथा भूयास्तथा यत्नं कुरु प्रभो ॥ ४ ॥ | और हे समर्थ ! तुम भी वही प्रयत्न करो जिससे ऐसे हो जाओ" ॥४॥ यह सुनकर रावणने तुरन्त ही बड़े रोषसे |
| तच्छ्रुत्वा रावणो रोषात् प्रतिज्ञामकरोद्द्रुतम् । | प्रतिज्ञा की—"हे शुभव्रतवाली ! तुम खेद न करो, |
| धनेन समो वाऽपि ह्यधिको वाऽचिरेण तु ॥ ५ ॥ | देखो, मातः ! मैं शीघ्र ही कुबेरके समान अथवा इससे भी अधिक ऐश्वर्यशाली हो जाऊँगा।" |
| भविष्याम्यम्ब मां पश्य सन्तापं त्यज सुव्रते । | |
| इत्युक्त्वा दुष्करं कर्तुं तपः स दशकन्धरः ॥ ६ ॥ | ऐसा कह भाइयोंके सहित रावण इच्छित फल-प्राप्तिके लिये गोकर्ण-क्षेत्रमें दुष्कर तपस्या करने चला |
| अगमत्फलसिद्धयर्थं गोकर्णं तु सहानुजः । | गया । वहाँ वे तीनों भाई अपने-अपने व्रतमें दृढ़ रहकर |
| स्वं स्वं नियममास्थाय भ्रातरस्ते तपो महत् ॥ ७ ॥ | समस्त लोकोंको तपानेवाला अति महान् तप करने |
| आस्थिता दुष्करं घोरं सर्वलोकैकतापनम् । | लगे । उनमेंसे कुम्भकर्णने दश हजार वर्ष तप किया |
| दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्कषः ॥ ८ ॥ | ॥ ५–८ ॥ सत्यधर्मपरायण धर्मात्मा विभीषण भी |
| बिभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः । | पाँच हजार वर्षतक एक ही पाँवसे खड़े रहे ॥ ९ ॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान् ॥ ९ ॥ | रावण एक हजार दिव्य वर्षतक निराहार रहा, फिर |
| दिव्यवर्षसहस्रं तु निराहारो दशाननः । | सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर उसने अपना एक मस्तक अग्नि-में हवन कर दिया। इसी प्रकार उसे नौ हजार दिव्य वर्ष- |
| पूर्णे वर्षसहस्रे तु शीर्षमग्नौ जुहाव सः । | बीत गये ॥ १० ॥ जब दश हजार वर्ष बीतनेको हुए |
| एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः ॥१०॥ | और जिस समय रावण अपना दशवाँ शिर भी |
| अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः । | काटनेको उद्यत हुआ तो धर्मात्मा ब्रह्माजी प्रकट हुए |
| छेत्तुकामस्य धर्मात्मा प्रादुश्चाथ प्रजापतिः । | और बोले—"बेटा रावण ! मैं प्रसन्न हूँ ॥ ११ ॥ तू |
| वत्स वत्स दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत ॥११॥ | वर माँग, मैं तेरी जो इच्छा होगी वही पूर्ण करूँगा।" |
| वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि काङ्क्षितम् । | यह सुन रावणने अति प्रसन्न होकर कहा—॥१२॥ "हे |
| दशग्रीवोऽपि तच्छ्रुत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१२॥ | ईश्वर ! यदि आप मुझे वर ही देना चाहते हैं तो मैं अमरता |
| अमरत्वं वृणोमीश वरदो यदि मे भवान् । | माँगता हूँ । मैं गरुड, सर्प, यक्ष, देव और दानव आदि किसीसे भी न मारा जा सकूँ । ( बस, मैं यही वर |
| सुपर्णनागयक्षाणां देवतानां तथाऽसुरैः । | माँगता हूँ ) बेचारे मनुष्य तो तिनकोंके समान हैं— |
| अवध्यत्वं तु मे देहि तृणभूता हि मानुषाः ॥१३॥ | ( उनसे मुझे भय नहीं है) ॥ १३ ॥ तब ब्रह्माजीने 'ऐसा ही हो' यह कहकर रावणसे फिर कहा—"हे |
| तथास्त्विति प्रजाध्यक्षः पुनराह दशाननम् । | असुरश्रेष्ठ ! तुमने अपने जो शिर अग्निमें होम दिये |
| अग्नौ हुतानि शीर्षाणि यानि तेऽसुरपुङ्गव ॥१४॥ | हैं वे पहलेके समान फिर हो जायँगे तथा हे साधुश्रेष्ठ ! |
| भविष्यन्ति यथापूर्वंमक्षयाणि च सत्तम ॥१५॥ | उनका कभी नाश न होगा" ॥ १४-१५ ॥ |
| एवमुक्त्वा ततो राम दशग्रीवं प्रजापतिः । | हे राम ! रावणसे इस प्रकार कह फिर भक्तवत्सल |
| विभीषणमुवाचेदं प्रणतं भक्तवत्सलः ॥१६॥ | ब्रह्माजीने अति विनीत विभीषणसे कहा—॥ १६ ॥ |
| ३३६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| विभीषण त्वया वत्स कृतं धर्मार्थमुत्तमम् ।<br>तपस्ततो वरं वत्स वृणीष्वाभिमतं हितम् ॥१७॥<br>विभीषणोऽपि तं नत्वा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।<br>देव मे सर्वदा बुद्धिर्धर्मे तिष्ठतु शाश्वती ।<br>मा रोचयत्वधर्मे मे बुद्धिः सर्वत्र सर्वदा ॥१८॥<br>ततः प्रजापतिः प्रीतो विभीषणमथाब्रवीत् ।<br>वत्स त्वं धर्मशीलोऽसि तथैव च भविष्यसि॥१९॥<br>अयाचितोऽपि ते दास्ये ह्यमरत्वं विभीषण ।<br>कुम्भकर्णमथोवाच वरं वरय सुव्रत ॥२०॥<br>वाण्या व्याप्त्तोऽथ तं प्राह कुम्भकर्णः पितामहम् ।<br>स्वप्स्यामि देव षण्मासान्दिनमेकं तु भोजनम्॥२१॥<br>एवमस्त्विति तं प्राह ब्रह्मा दृष्ट्वा दिवौकसः ।<br>सरस्वती च तद्वक्त्रान्निर्गता प्रययौ दिवम् ॥२२॥<br>कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ।<br>अनभिप्रेतमेवास्यात्किं निर्गतमहो विधिः ॥२३॥ | "वत्स विभीषण ! तुमने यह श्रेष्ठ तप धर्मसम्पादनके लिये किया है, इसलिये बेटा ! तुम्हें जो हितकर वर अभीष्ट हो माँगो" ॥ १७ ॥ तब विभीषणने उन्हें नमस्कार कर उनसे हाथ जोड़कर कहा—"भगवन् ! मेरी बुद्धि सर्वदा निश्चलरूपसे धर्ममें ही रहे, उसकी कभी किसी अवस्थामें भी अधर्ममें रुचि न हो" ॥ १८ ॥ इसपर ब्रह्माजीने अति प्रसन्न होकर विभीषणसे कहा—"बेटा ! तुम बड़े धर्मनिष्ठ हो, तुम जैसा चाहते हो वैसा ही होगा ॥ १९ ॥ हे विभीषण ! यद्यपि तुमने माँगा नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें अमरत्वका वर और देता हूँ।" तदनन्तर वे कुम्भकर्णसे बोले—"हे सुव्रत ! तुम वर माँगो" ॥ २० ॥ तब कुम्भकर्णने (देवताओंकी प्रेरणासे फैलायी हुई ) सरस्वती देवीकी मायासे मोहित होकर ब्रह्माजीसे कहा—"हे देव ! मैं छः महीने सोऊँ और एक दिन भोजन करूँ" ॥ २१ ॥ ब्रह्माजीने उससे, देवताओंकी ओर देखते हुए कहा—" ऐसा ही हो।" उनके ऐसा कहते ही सरस्वती तुरन्त ही उसके मुखसे निकलकर स्वर्गलोकको चली गयीं ॥ २२ ॥ तब दुष्टचित्त कुम्भकर्णने मन-ही-मन दुःखित होकर सोचा—"अहो ! भाग्यका चक्र तो देखो, जिसकी मुझे इच्छा ही नहीं है ऐसी बात मेरे मुखसे क्यों निकल गयी ?" ॥ २३ ॥ |
| सुमाली वरलब्धांस्तान् ज्ञात्वा पौत्रान् निशाचरान्<br>पातालान्निर्भयः प्रायात् प्रहस्तादिभिरन्वितः॥२४॥<br>दशग्रीवं परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत् ।<br>दिष्ट्या ते पुत्र संवृत्तो वाञ्छितो मे मनोरथः॥२५॥<br>यद्भयाच्च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम् ।<br>तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ॥२६॥<br>अस्माभिः पूर्वमुषिता लङ्केयं धनदेन ते ।<br>भ्रात्राऽऽक्रान्तामिदानीं त्वं प्रत्यानेतुमिहार्हसि २७<br>साम्ना वाऽथ बलेनापि राज्ञां बन्धुः कुतः सुहृत् । | अपने नाती तीनों राक्षसोंको वर मिलनेका समाचार सुनकर सुमाली प्रहस्तादि राक्षसोंको साथ लिये निर्भयतापूर्वक पातालसे आया ॥ २४ ॥ और रावणको हृदयसे लगाकर बोला—"बेटा ! बड़े आनन्दकी बात है कि आज मेरा चाहा हुआ तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया ॥ २५ ॥ जिसके भयसे हम लंकापुरीको छोड़कर पाताललोकको चले गये थे हे महाबाहो ! आज हमारा वह विष्णुका भय जाता रहा ॥ २६ ॥ इस लंकापुरीमें, जो अब तुम्हारे भाई कुबेरके अधिकारमें है पहले हम रहा करते थे। अब तुम्हें इसे सामनीतिसे अथवा बलपूर्वक फिर लौटा लेना चाहिये, (बन्धुत्वका विचार न करना चाहिये) क्योंकि राजाओंके बन्धु उनके कब हितकारी हुए हैं ? |
उत्तरकाण्ड - सर्ग २: राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण
सर्ग २] उत्तरकाण्ड ३३७
इत्युक्तो रावणः प्राह नार्हस्येवं प्रभाषितुम् ॥ २८ ॥
वित्तेशो गुरुरस्माकमेवं श्रुत्वा तमब्रवीत् ।
प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यं रावणं दशकन्धरम् ॥ २९ ॥
शृणु रावण यत्नेन नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ।
नाधीता राजधर्मास्ते नीतिशास्त्रं तथैव च ॥ ३० ॥
शूराणां नहि सौभ्रात्रं शृणु मे वदतः प्रभो ।
कश्यपस्य सुता देवा राक्षसाश्च महाबलाः ॥ ३१ ॥
परस्परमयुध्यन्त त्यक्त्वा सौहृदमायुधैः ।
नैवेदानीन्तनं राजन् वैरं देवैरनुष्ठितम् ॥ ३२ ॥
सुमालीके ऐसा कहनेपर रावणने कहा—"आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ धनपति कुबेर हमारे बड़े हैं।" यह सुनकर प्रहस्तने रावणसे अति नम्रतापूर्वक कहा—॥ २९ ॥ "हे रावण ! मैं जो कुछ कहता हूँ सावधान होकर सुनो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। अभी तुमने राजधर्म और नीतिशास्त्रका अध्ययन नहीं किया है ॥ ३० ॥ शूरवीरोंमें भ्रातृत्व नहीं हुआ करता । हे समर्थ ! इस विषयमें मैं जो कुछ निवेदन करता हूँ सुनिये । महर्षि कश्यपजीकी सन्तान देवता और राक्षस बड़े शूरवीर थे ॥ ३१ ॥ इसलिये वे बन्धुत्वको तिलाञ्जलि देकर परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंसे लड़ने लगे । हे राजन् ! देवताओंके साथ हमारा वैर कुछ हालहीका नहीं है ( यह तो आरम्भसे ही चला आता है )" ॥ ३२ ॥
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा दशग्रीवो दुरात्मनः ।
तथेति क्रोधताम्राक्षस्त्रिकूटाचलमन्वगात् ॥ ३३ ॥
दूतं प्रहस्तं सम्प्रेष्य निष्कास्य धनदेश्वरम् ।
लङ्कामाक्रम्य सचिवै राक्षसैः सुखमास्थितः ॥ ३४ ॥
धनदः पितृवाक्येन त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः ।
गत्वा कैलासशिखरं तपसाऽतोषयच्छिवम् ॥ ३५ ॥
तेन सख्यमनुप्राप्य तेनैव परिपालितः ।
अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा ॥ ३६ ॥
दिक्पालत्वं चकारात्र शिवेन परिपालितः ।
दुरात्मा प्रहस्तके ये वचन सुनकर रावणने कहा—'तो ठीक है।' उस समय उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तुरन्त ही त्रिकूट पर्वतपर पहुँचा ॥ ३३ ॥ उसने प्रहस्तको अपना दूत बनाकर भेजा और कुबेरको लंकापुरीसे निकालकर उसपर अपना अधिकार किया तथा अपने राक्षस-मन्त्रियोंके सहित वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ३४ ॥ महायशस्वी कुबेरने लंकापुरीको छोड़कर पिताके कहनेसे कैलास-पर्वतपर जाकर तपस्याद्वारा श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥ ३५ ॥ तथा उनसे मित्रता स्थापित कर उन्हींसे सुरक्षित हो वहाँ विश्वकर्मासे अलका नामकी नगरी बनवायी ॥ ३६ ॥ वहाँ वे भगवान् शंकरकी रक्षामें रहकर दिक्पालत्व ( एक दिशाका अधिकार ) भोगने लगे ।
रावणो राक्षसैः सार्धमभिषिक्तः सहानुजैः ॥ ३७ ॥
राज्यं चकारासुराणां त्रिलोकीं बाधयन्खलः ।
भगिनीं कालखञ्जाय ददौ विकटरूपिणीम् ॥ ३८ ॥
विद्युज्जिह्वाय नाम्नासौ महामायी निशाचरः ।
ततो मयो विश्वकर्मा राक्षसानां दितेः सुतः ॥ ३९ ॥
सुतां मन्दोदरीं नाम्ना ददौ लोकैकसुन्दरीम् ।
इधर, महादुष्ट रावण राक्षसोंसे अभिषिक्त हो अपने भाइयोंके सहित तीनों लोकोंको कष्ट देता हुआ राक्षसोंका राज्य करने लगा । उस महामायावी राक्षसने अपनी विकरालबदना बहिन कालखञ्जके वंशमें उत्पन्न हुए विद्युज्जिह्व नामक राक्षसको विवाह दी। इसी समय, राक्षसोंके विश्वकर्मा दितिपुत्र मयने अपनी त्रिलोकसुन्दरी कन्या मन्दोदरी रावणको दी, और फिर उसे प्रसन्न-चित्तसे एक अमोघ
४३
| .३३८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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रावणाय पुनः शक्तिममोघां प्रीतमानसः ॥४०॥
वैरोचनस्य दौहित्रीं वृत्रज्वालेति विश्रुताम् ।
स्वयन्दत्तामुद्वहत्कुम्भकर्णाय रावणः ॥४१॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः ।
विभीषणस्य भार्यार्थे धर्मज्ञां समुदवहत् ॥४२॥
सरमां नाम सुभगां सर्वलक्षणसंयुताम् ।
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् ॥४३॥
जातमात्रस्तु यो नादं मेघवत्समुमोच ह ।
ततः सर्वेऽब्रुवन्मेघनादोऽयमिति चासकृत् ॥४४॥
कुम्भकर्णस्ततः प्राह निद्रा मां बाधते प्रभो ।
ततश्च कारयामास गुहां दीर्घा सुविस्तराम् ॥४५॥
तत्र सुष्वाप मूढात्मा कुम्भकर्णो विघूर्णितः ।
निद्रिते कुम्भकर्णे तु रावणो लोकरावणः ॥४६॥
ब्राह्मणान् ऋषिमुख्यांश्च देवदानवकिन्नरान् ।
देवश्रियो मनुष्यांश्च निजघ्ने समहोरगान् ॥४७॥
धनदोऽपि ततः श्रुत्वा रावणस्याक्रमं प्रभुः ।
अधर्मं मा कुरुष्वेति दूतवाक्यैर्न्यवारयत् ॥४८॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जगाम धनदालयम् ।
विनिर्जित्य धनाध्यक्षं जहारोत्तमपुष्पकम् ॥४९॥
ततो यमं च वरुणं निर्जित्य समरेऽसुरः ।
स्वर्गलोकमगात्तूर्णं देवराजजिघांसया ॥५०॥
ततोऽभवन्महद्युद्धमिन्द्रेण सह दैवतैः ।
ततो रावणमभ्येत्य बबन्ध त्रिदशेश्वरः ॥५१॥
तच्छ्रुत्वा सहसाऽऽगत्य मेघनादः प्रतापवान् ।
कृत्वा घोरं महद्युद्धं जित्वा त्रिदशपुङ्गवान् ॥५२॥
इन्द्रं गृहीत्वा बद्ध्वाऽसौ मेघनादो महाबलः ।
मोचयित्वा तु पितरं गृहीत्वेन्द्रं ययौ पुरम् ॥५३॥
ब्रह्मा तु मोचयामास देवेन्द्रं मेघनादतः ।
दत्त्वा वरान्वहूस्तस्मै ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ॥५४॥ | शक्ति भी दी ॥ ३७-४० ॥ तदनन्तर रावणने, स्वयं लाकर दी हुई वैरोचनकी धेवती वृत्रज्वालाके साथ कुम्भकर्णका विवाह किया ॥ ४१ ॥ तथा गन्धर्वराज महात्मा शैलूषकी पुत्री सरमाको, जो अति सुन्दरी सर्व-सुलक्षणसम्पन्ना और सुसन्न धर्मको जाननेवाली थी, उसने पत्नीरूपसे विभीषणको विवाह दिया । तत्पश्चात् मन्दोदरीने मेघनाद नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥४२-४३॥ जिसने उत्पन्न होते ही मेघके समान शब्द किया । इसलिये सबने बारम्बार यही कहा कि 'यह मेघनाद है' ॥ ४४ ॥ तदनन्तर कुम्भकर्ण बोला— "प्रभो ! मुझे निद्रा सता रही है !" (उसके सुख-पूर्वक सोनेयोग्य कोई स्थान नहीं था इसलिये) फिर उसने एक बड़ी लम्बी-चौड़ी गुहा बनवायी ॥४५॥ वहाँ मन्दमति कुम्भकर्ण खुर्राटे लेता हुआ सो गया । कुम्भकर्णके सो जानेपर सकल लोकोंको रुलानेवाले रावणने ब्राह्मण, मुख्य-मुख्य ऋषि, देवता, दानव, किन्नर, सर्प और मनुष्य सभीको मारा तथा देवताओंकी सम्पत्ति नष्ट कर दी ॥ ४६-४७ ॥<br><br>भगवान् कुबेरने जब रावणकी उच्छृङ्खलताका समाचार सुना तो उन्होंने दूतके मुखसे यह संदेश भेजकर कि 'अधर्म मत करो' उसे रोका ॥ ४८ ॥ इसपर रावण क्रोधित होकर कुबेरकी पुरीपर चढ़ आया और उन्हें परास्त कर उनका अति उत्तम पुष्पक विमान छीन लाया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर वह राक्षस युद्धमें यम और वरुणको भी जीतकर इन्द्रका वध करनेकी इच्छासे तुरन्त ही स्वर्गलोकपर चढ़ आया ॥ ५० ॥ वहाँ इन्द्र और अन्य देवताओंके साथ उसका बड़ा घमासान युद्ध हुआ । इस समय देवराज इन्द्रने आगे बढ़कर रावणको बाँध लिया ॥ ५१ ॥ जब यह समाचार महाप्रतापी मेघनादने सुना तो उसने अकस्मात् आकर देवताओंसे घोर युद्ध किया और उन्हें जीतकर इन्द्रको पकड़कर बाँध लिया । फिर महाबली मेघनादने अपने पिताको छुड़ाया और इन्द्रको अपने साथ लेकर लंकापुरीमें लौट आया ॥ ५२-५३ ॥ फिर ब्रह्माजीने जाकर इन्द्रको मेघनादसे छुड़ाया और उसे बहुतसे वर देकर वे अपने लोकको चले गये ॥ ५४ ॥
| सर्ग २ ] | उत्तरकाण्ड | ३३९ |
|---|
| रावणो विजयी लोकान्सर्वान् जित्वा क्रमेण तु ।<br>कैलासं तोलयामास बाहुभिः परिघोपमैः ॥५५॥<br>तत्र नन्दीश्वरेणैव शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः ।<br>वानरैर्मानुषैश्चैव नाशं गच्छेति कोपिना ॥५६॥<br>ततोऽप्यगणयन् वाक्यं ययौ हैहयपत्तनम् ।<br>तेन बद्धो दशग्रीवः पुलस्त्येन विमोचितः ॥५७॥<br>ततोऽतिबलमासाद्य जिघांसुर्हरिपुङ्गवम् ।<br>धृतस्तेनैव कक्षेण वालिना दशकन्धरः ॥५८॥<br>भ्रामयित्वा तु चतुरः समुद्रान् रावणं हरिः ।<br>विसर्जयामास ततस्तेन सख्यं चकार सः ॥५९॥<br>रावणः परमप्रीत एवं लोकान्महाबलः ।<br>चकार स्ववशे राम बुभुजे स्वयमेव तान् ॥६०॥<br>एवम्प्रभावो राजेन्द्र दशग्रीवः सहेन्द्रजित् ।<br>त्वया विनिहतः सङ्ख्ये रावणो लोकरावणः ॥६१॥<br>मेघनादश्च निहतो लक्ष्मणेन महात्मना ।<br>कुम्भकर्णश्च निहतस्त्वया पर्वतसन्निभः ॥६२॥<br>भवान्नारायणः साक्षाज्जगतामादिकृद्विभुः ।<br>त्वत्स्वरूपमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥६३॥<br>त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>अग्निस्ते मुखतो जातो वाचा सह रघूत्तम ॥६४॥<br>बाहुभ्यां लोकपालांश्चाद्यश्चक्षुर्भ्यां चन्द्रभास्करौ ।<br>दिशश्च विदिशश्चैव कर्णाभ्यां ते समुत्थिताः ॥६५॥<br>घ्राणात्प्राणः समुत्पन्नश्चाश्विनौ देवसत्तमौ ।<br>जङ्घाजानूरुजघनाद्भूवर्लोकादयोऽभवन् ॥६६॥<br>कुक्षिदेशात्समुत्पन्नाश्चत्वारः सागरा हरे ।<br>स्तनाभ्यामिन्द्रवरुणौ वालखिल्याश्च रेतसः ॥६७॥<br>मेढ्राद्यमो गुदान्मृत्युर्मन्यो रुद्रस्त्रिलोचनः । | विजयी रावणने क्रमसे सब लोकोंको जीतकर अपनी परिघके समान बड़ी-बड़ी भुजाओंसे कैलास पर्वतको उठा लिया ॥५५॥ वहाँ नन्दीश्वरने क्रोधित होकर राक्षसराज रावणको शाप दिया कि 'तू मनुष्य और वानरोंके हाथसे मारा जायगा' ॥५६॥ किन्तु रावणने इस शापको कुछ भी न गिना और तुरन्त ही हैहयराज (सहस्रार्जुन) की राजधानीको चल दिया । वहाँ सहस्रार्जुनने रावणको बाँध लिया । तब उसे पुलस्त्यजीने जाकर छुड़ाया ॥५७॥ फिर वह अत्यन्त बली वानरराज वालीको मारनेके लिये उद्यत हुआ, किन्तु उल्टे उन्होंने रावणको अपनी काँखमें दबा लिया ॥५८॥ और फिर चारों समुद्रोंपर घुमाकर उसे छोड़ दिया । तब रावणने उनसे मित्रता कर ली ॥५९॥ हे राम ! इस प्रकार महाबली रावण सम्पूर्ण लोकोंको अपने अधीन कर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही भोगने लगा ॥६०॥<br>हे राजेन्द्र ! ये दशानन और इन्द्रजित् ऐसे प्रभावशाली थे । (उनमेंसे) लोकोंको रुलानेवाले रावणको आपने मारा और मेघनादका वध महात्मा लक्ष्मणजीने किया तथा पर्वतके समान दीर्घकाय कुम्भकर्णका भी आपनेही संहार किया ॥६१-६२॥ आप सब लोकोंके रचनेवाले साक्षात् सर्वव्यापक नारायणदेव हैं । यह सारा चराचर जगत् आपहीका स्वरूप है ॥६३॥ लोकपितामह ब्रह्माजी आपकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे उत्पन्न हुए हैं तथा हे रघुश्रेष्ठ ! वाणीके सहित अग्निदेवने आपके मुखसे जन्म लिया है ॥६४॥ आपकी भुजाओंसे लोकपालोंके समूह, नेत्रोंसे चन्द्रमा और सूर्य तथा कानोंसे दिशा-विदिशाएँ उत्पन्न हुई हैं ॥६५॥ इसी प्रकार आपकी घ्राणेन्द्रियसे प्राण और देवताओंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार प्रकट हुए हैं तथा जङ्घा, जानु, उरु और जघनादि अङ्गोंसे भुवर्लोक आदि हुए हैं ॥६६॥ हे हरे ! आपकी कुक्षिसे चार समुद्र, स्तनोंसे इन्द्र और वरुण तथा वीर्यसे बालखिल्यादि मुनीश्वर हुए हैं ॥६७॥ आपकी उपस्थेन्द्रियसे यम, गुदासे मृत्यु, क्रोधसे त्रिनयन |
३४० अध्यात्मरामायण [सर्ग २
अस्थिभ्यः पर्वता जाताः केशेभ्यो मेघसंहतिः॥६८॥
ओषध्यस्तव रोमेभ्यो नखेभ्यश्च खरादयः।
त्वं विश्वरूपः पुरुषो मायाशक्तिसमन्वितः ॥६९॥
नानारूप इवाभासि गुणव्यतिकरे सति।
त्वामाश्रित्यैव विबुधाः पिबन्त्यमृतमध्वरे ॥७०॥
त्वया सृष्टमिदं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।
त्वामाश्रित्यैव जीवन्ति सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥७१॥
त्वद्भक्तमखिलं वस्तु व्यवहारेऽपि राघव।
क्षीरमध्यगतं सर्पिर्यथा व्याप्याखिलं पयः ॥७२॥
त्वद्भासा भासतेऽर्कादि न त्वं तेनावभाससे।
सर्वगं नित्यमेकं त्वां ज्ञानचक्षुर्विलोकयेत् ॥७३॥
नाज्ञानचक्षुस्त्वां पश्येदन्धदृग्भास्करं यथा।
योगिनस्त्वां विचिन्वन्ति स्वदेहे परमेश्वरम्॥७४॥
अतन्निरसनमुखैर्वेदशीर्षैरहर्निशम् ।
त्वत्पादभक्तिलेशेन गृहीता यदि योगिनः ॥७५॥
विचिन्वन्तो हि पश्यन्ति चिन्मात्रं त्वां न चान्यथा।
मया प्रलपितं किञ्चित्सर्वज्ञस्य तवाग्रतः।
क्षन्तुमर्हसि देवेश तवानुग्रहभागहम् ॥७६॥
दिग्देशकालपरिहीनमनन्यमेकं
चिन्मात्रमक्षरमजं चलनादिहीनम्।
सर्वज्ञमीश्वरमनन्तगुणं व्युदस्त-
मायं भजे रघुपतिं भजतामभिन्नम् ॥७७॥
महादेवजी, अस्थियोंसे पर्वतसमूह, केशोंसे मेघ, रोमोंसे ओषधियाँ तथा नखोंसे गधे आदि उत्पन्न हुए हैं। अपनी मायाशक्तिसे युक्त आप ही विश्वरूप परम पुरुष हैं॥६८-६९॥ प्रकृतिके गुणोंके युक्त होनेपर आप ही नानारूप-से दिखायी देने लगते हैं; आपहीके आश्रयमें देवगण यज्ञोंमें अमृतपान करते हैं॥७०॥ यह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् आपनेही रचा है और समस्त चराचर प्राणी आपहीके आश्रयमें जीवित रहते हैं॥७१॥ हे रघुनाथजी ! जिस प्रकार दूधमें मिला हुआ घी उसमें सर्वत्र व्याप्त रहता है उसी प्रकार व्यवहारकालमें भी सम्पूर्ण वस्तुएँ आपहीसे व्याप्त रहती हैं॥७२॥ सूर्य-चन्द्रादि भी सब आपहीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं किन्तु आप उनसे प्रकाशित नहीं होते। आप सर्वगत, नित्य और एक हैं, जिस पुरुषको ज्ञानदृष्टि प्राप्त हो जाती है वही आपको देख सकता है॥७३॥ जिस प्रकार अन्धेको सूर्य नहीं दिखायी दे सकता उसी प्रकार जो ज्ञाननेत्रसे रहित हैं वह आपका दर्शन नहीं कर सकता। योगिजन अनात्म-पदार्थोंका बाध करनेवाले उपनिषद्वाक्योंद्वारा अहर्निश आप परमात्माको अपने शरीरमें ही खोजते हैं। यदि उन योगियोंपर आपके चरणोंकी भक्तिका लेशमात्र भी प्रभाव होता है तभी वे खोजते-खोजते अन्तमें चिन्मात्रस्वरूप आपको देख पाते हैं, और किसी प्रकार नहीं। मैंने आप सर्वज्ञके सामने कुछ प्रलाप (बकवाद) किया है, सो आप क्षमा करें, क्योंकि हे देवेश्वर! मैं आपकी कृपाका पात्र हूँ॥७४—७६॥ जो दिशा, देश और कालसे रहित तथा अनन्य, एक, चिन्मात्र, अविनाशी, अजन्मा और चलनादि क्रियासे रहित हैं उन सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनन्तगुणसम्पन्न, मायाहीन और अपने भक्तजनोंसे सदा अभिन्न रहनेवाले रघुनाथजीको मैं भजता हूँ॥७७॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥
सगे ३ ] उत्तरकाण्ड ३४१
तृतीय सर्ग
वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद ।
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले—हे मुने ! मैं वाली और सुग्रीवके जन्मका यथावत् वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। मैंने सुना है कि ये इन्द्र और सूर्य ही वानररूपसे उत्पन्न हुए थे ॥१॥ |
|---|---|
| वालिसुग्रीवयोजन्म श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।<br>रवीन्द्रौ वानराकारौ सञ्जात इति नः श्रुतम् ॥ १ ॥ | |
| अगस्त्य उवाच | अगस्त्यजी बोले—हे राम ! मेरु पर्वतके मणिके समान प्रकाशमान सुवर्णमय मध्यशिखरपर ब्रह्माजीकी सौ योजन विस्तारवाली सभा है ॥२॥ उसमें चतुर्मुख ब्रह्माजी किसी समय ध्यानस्थ हुए बैठे थे, उस समय उनके नेत्रोंसे बहुत-से दिव्य आनन्दाश्रु गिरे ॥३॥ उन्हें अपने हाथमें लेकर ब्रह्माजीने कुछ चिन्तन कर पृथिवीपर डाल दिया। पृथिवीपर गिरते ही उनसे एक बहुत बड़ा वानर उत्पन्न हुआ ॥४॥ उससे ब्रह्माजीने कहा "वत्स ! तू कुछ समय यहाँ मेरे पास इस सर्वशोभासम्पन्न स्थानमें रह, इससे तेरा कल्याण होगा" ॥५॥ ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वह वानरश्रेष्ठ वहीं रहने लगा । इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर एक दिन उस परमबुद्धिमान् ऋक्षराजने* फल-मूलादिके लिये घूमते-घूमते एक दिव्य जलपूर्ण और रत्नजटित शिलाओंसे सुशोभित बावड़ी देखी ॥६-७॥ जब वह वहाँ पानी पीनेके लिये गया तो उसने जलमें एक छायामय वानर देखा। उसे अपना प्रतिद्वन्द्वी वानर समझकर वह जलमें कूद पड़ा ॥८॥ किन्तु वहाँ कोई भी वानर न मिलनेपर वह तुरन्त ही उछलकर बाहर निकल आया और अपनेको एक अति सुन्दरी रमणीके रूपमें देखकर बड़ा ही चकित हुआ ॥९॥ |
| मेरोः स्वर्णमयस्याद्रेर्मध्यशृङ्गे मणिप्रभे ।<br>तस्मिन्सभाऽऽस्ते विस्तीर्णा ब्रह्मणः शतयोजना ॥ २॥ | |
| तस्यां चतुर्मुखः साक्षात्कदाचिद्योगमास्थितः ।<br>नेत्राभ्यां पतितं दिव्यमानन्दसलिलं बहु ॥ ३ ॥ | |
| तद्गृहीत्वा करे ब्रह्मा ध्यात्वा किञ्चित्तदत्यजत् ।<br>भूमौ पतितमात्रेण तस्माज्जातो महाकपिः ॥ ४ ॥ | |
| तमाह द्रुहिणो वत्स किञ्चित्कालं वसत्र मे ।<br>समीपे सर्वशोभाढ्ये ततः श्रेयो भविष्यति ॥ ५ ॥ | |
| इत्युक्तो न्यवसत्तत्र ब्रह्मणा वानरोत्तमः ।<br>एवं बहुतिथे काले गते ऋक्षांधिपः सुधीः ॥ ६ ॥ | |
| कदाचित्पर्यटन्नद्रौ फलमूलार्थमुद्यतः ।<br>अपश्यद्दिव्यसलिलां वापीं मणिशिलान्विताम् ॥ ७ ॥ | |
| पानीयं पातुमागच्छत्तत्र छायामयं कपिम् ।<br>दृष्ट्वा प्रतिकपिं मत्वा निपपात जलान्तरे ॥ ८ ॥ | |
| तत्रादृष्ट्वा हरिं शीघ्रं पुनरुत्प्लुत्य वानरः ।<br>अपश्यत्सुन्दरीं रामामात्मानं विस्मयं गतः ॥ ९ ॥ | |
| ततः सुरेशो देवेशं पूजयित्वा चतुर्मुखम् ।<br>गच्छन्मध्याह्नसमये दृष्ट्वा नारीं मनोरमाम् ॥ १० ॥ | उस समय देवराज इन्द्र मध्याह्न कालमें ब्रह्माजीकी पूजा करके लौट रहे थे । उस परमसुन्दरी स्त्रीको देखकर वे कामदेवके बाणोंसे बिंध गये और उनका उत्तम वीर्य स्खलित हो गया । वह वीर्य उस स्त्रीको प्राप्त न होकर उसके बालोंको छूता हुआ पृथिवीपर गिर पड़ा ॥१०-११॥ उससे इन्द्रके समान पराक्रमी वालीका जन्म हुआ । देवराज इन्द्र उसे एक सुवर्णमयी माला देकर स्वर्गलोकको चले गये ॥१२॥ |
| कन्दर्पशरविद्धाङ्गस्त्यक्तवान्वीर्यमुत्तमम् ।<br>तामप्राप्यैव तद्वीजं वालदेशेऽपतद्भुवि ॥ ११ ॥ | |
| वाली समभवत्तत्र शक्रतुल्यपराक्रमः ।<br>तस्य दत्त्वा सुरेशानः स्वर्णमालां दिवं गतः ॥ १२॥ |
* यह उस वानरका नाम था ।
| ३४२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
भानुरप्यागतस्तत्र तदानीमेव भामिनीम् ।
दृष्ट्वा कामवशो भूत्वा ग्रीवादेशेऽसृजन्महत् ॥ १३ ॥
बीजं तस्यास्ततः सद्यो महाकायोऽभवद्धरिः ।
तस्य दत्त्वा हनूमन्तं सहायार्थं गतो रविः ॥ १४ ॥
पुत्रद्वयं समादाय गत्वा सा निद्रिता क्वचित् ।
प्रभातेऽपश्यदात्मानं पूर्ववद्वानराकृतिम् ॥ १५ ॥
फलमूलादिभिः सार्धं पुत्राभ्यां सहितः कपिः ।
नत्वा चतुर्मुखस्याग्रे ऋक्षराजः स्थितः सुधीः ॥ १६ ॥
ततोऽब्रवीत्समाश्वास्य बहुशः कपिकुञ्जरम् ।
तत्रैकं देवदूतमाहूयामरसन्निभम् ॥ १७ ॥
गच्छ दूत मयाऽऽदिष्टो गृहीत्वा वानरोत्तमम् ।
किष्किन्धां दिव्यनगरीं निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ १८ ॥
सर्वसौभाग्यवलितां देवैरपि दुरासदाम् ।
तस्यां सिंहानेने वीरं राजानमभिषेचय ॥ १९ ॥
सप्तद्वीपगता ये ये वानराः सन्ति दुर्जयाः ।
सर्वे ते ऋक्षराजस्य भविष्यन्ति वशेऽनुगाः ॥ २० ॥
यदा नारायणः साक्षाद्रामो भूत्वा सनातनः ।
भूभारासुरनाशाय सम्भविष्यति भूतले ॥ २१ ॥
तदा सर्वे सहायार्थं तस्य गच्छन्तु वानराः ।
इत्युक्तो ब्रह्मणा दूतो देवानां स महामतिः ॥ २२ ॥
यथाऽऽज्ञप्तस्तथा चक्रे ब्रह्मणा तं हरीश्वरम् ।
देवदूतस्ततो गत्वा ब्रह्मणे तन्न्यवेदयत् ॥ २३ ॥
तदादि वानराणां सा किष्किन्धाऽभून्नृपाश्रयः । २४ ।
सर्वेश्वरस्त्वमेवासीरिदानीं ब्रह्मणाऽर्थितः ।
भूमेर्भारो हृतः कृत्स्नस्त्वया लीलानृदेहिना ।
सर्वभूतान्तरस्थस्य नित्यमुक्तचिदात्मनः ॥ २५ ॥
अखण्डानन्तरूपस्य कियानेष पराक्रमः ।
उसी समय वहाँ सूर्यदेव भी आये। उस सुन्दरीको देखकर वे कामवश हो गये तथा उसकी ग्रीवापर अपना उग्र वीर्य छोड़ा। उससे उसी समय एक बहुत बड़े शरीरवाला वानर उत्पन्न हुआ। सूर्यदेव उसकी सहायताके लिये उसको हनुमान्जी देकर चले गये ॥१३-१४॥
उन दोनों पुत्रोंको लेकर वह स्त्री कहीं जाकर सो गयी। दूसरे दिन सबेरे (उठनेपर) उसने पहलेके समान अपनेको फिर वानररूप ही देखा ॥१५॥ फिर वह परम बुद्धिमान् ऋक्षराज फल-मूलादि लेकर अपने पुत्रोंके सहित ब्रह्माजीकी सभामें आया और उन्हें नमस्कार कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥१६॥ तब ब्रह्माजीने उस वानर-वीरको बहुत कुछ समझाया और एक देवतुल्य देवदूतको बुलाकर उससे कहा—॥१७॥ 'हे दूत ! तू मेरी आज्ञासे इन वानरश्रेष्ठको लेकर विश्वकर्माकी बनायी हुई किष्किन्धा नामकी दिव्य पुरीको जा ॥१८॥ वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न है और देवताओंके लिये भी दुर्जय है। उसके सिंहासनपर इस वीरका राज्याभिषेक कर दे ॥१९॥ सातों द्वीपोंमें जो-जो बड़े दुर्जय वानर-वीर हैं वे सब ऋक्षराजके अधीन रहेंगे ॥२०॥ जिस समय साक्षात् सनातन पुरुष नारायणदेव पृथिवीका भार उतारनेके लिये भूलोकमें रामरूपसे अवतीर्ण हों उस समय समस्त वानरगण उनकी सहायताके लिये जायें।' ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर उस महाबुद्धिमान् देवदूतने जिस प्रकार उनकी आज्ञा हुई थी उसी प्रकार उस वानरराजकी सब व्यवस्था कर दी और फिर ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हें सब समाचार सुना दिया। तबसे वह किष्किन्धापुरी वानरोंकी राजधानी हो गयी ॥२१-२४॥
हे राम ! आप सबके स्वामी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे अब माया-मानव-रूप धारणकर आपने पृथिवीका सब भार उतार दिया। जो सब भूतोंके भीतर विराजमान नित्यमुक्त और चेतनस्वरूप हैं उन अखण्ड और अनन्तरूप आपके लिये यह ऐसा कौन बड़ा पराक्रम है ? तथापि सम्पूर्ण लोकोंके
| सर्ग ३ ] | उत्तरकाण्ड | ३४३ |
|---|
तथाऽपि वर्ण्यते सद्भिर्लीलामानुषरूपिणः ॥२६॥
यशस्ते सर्वलोकानां पापहर्त्यै सुखाय च ।
य इदं कीर्तयेन्मर्त्यो वालिसुग्रीवयौर्महत् ॥२७॥
जन्म त्वदाश्रयत्वात्स मुच्यते सर्वपातकैः ॥२८॥
...न्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां राम त्वदाश्रयाम्।
सीता हृता यदर्थं सा रावणेन दुरात्मना ॥२९॥
पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतं विभुम् ।
सनत्कुमारमेकान्ते समासीनं दशाननः ।
विनयावनतो भूत्वा ह्यभिवाद्येदमब्रवीत् ॥३०॥
को न्वस्मिन्प्रवरो लोके देवानां बलवत्तरः ।
देवाश्च यं समाश्रित्य युद्धे शत्रुं जयन्ति हि ॥३१॥
कं यजन्ति द्विजा नित्यं कं ध्यायन्ति च योगिनः।
एतन्मे शंस भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदांवर ॥३२॥
ज्ञात्वा तस्य हृदिस्थं यत्तदशेषेण योगदृक् ।
दशाननमुवाचेदं शृणु वक्ष्यामि पुत्रक ॥३३॥
भर्ता यो जगतां नित्यं यस्य जन्मादिकं नहि ।
सुरासुरैर्नुतो नित्यं हरिर्नारायणोऽव्ययः ॥३४॥
यन्नाभिपङ्कजाज्जातो ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ।
सृष्टं येनैव सकलं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥३५॥
तं समाश्रित्य विबुधा जयन्ति समरे रिपून् ।
योगिनो ध्यानयोगेन तमेवानुजपन्ति हि ॥३६॥
महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच दशाननः ।
दैत्यदानवरक्षांसि विष्णुना निहतानि च ॥३७॥
कां वा गतिं प्रपद्यन्ते प्रेत्य ते मुनिपुङ्गव ।
तमुवाच मुनिश्रेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम् ॥३८॥
दैवतैर्निहता नित्यं गत्वा स्वर्गमनुत्तमम् ।
भोगक्षये पुनस्तस्माद्भ्रष्टा भूमौ भवन्ति ते ॥३९॥
पापोंका नाश करनेके लिये और उन्हें सुख देनेके लिये साधुजन आप माया-मानुष-रूप भगवान्का सुयश वर्णन करते ही हैं। जो मनुष्य वाली और सुग्रीवके इस महान् चरित्रका कीर्तन करेगा वह आपके आश्रित होनेके कारण सब पापोंसे छूट जायगा ॥२५—२८॥
हे राम ! अब आपसे सम्बन्ध रखनेवाली एक वह कथा और सुनाता हूँ जिस कारण कि दुरात्मा रावणने सीताजीको हरा था ॥ २९॥ पहले एक बार रावणने एकान्तमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र श्रीसनत्कुमारजीसे अति नम्रतापूर्वक प्रणाम करके कहा—॥३०॥ “जिसका आश्रय पाकर देवगण संग्राममें शत्रु-को जीतते हैं इस संसारमें सब देवताओंमें श्रेष्ठ और अधिक बलवान् वह कौन देव है ? ॥३१॥ ब्राह्मणगण किसका पूजन करते हैं और योगीगण किसका ध्यान धरते हैं ? भगवन् ! आप सब प्रकारके प्रश्नोंका उत्तर जाननेवालोंमें श्रेष्ठ हैं, अतः मेरे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये” ॥३२॥ भगवान् सनत्कुमारने योगदृष्टिसे रावणके अन्तःकरणकी सब बात जानकर उससे कहा--“वत्स ! मैं तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ, सुनो ॥३३॥ जो सर्वदा सम्पूर्ण संसारका पोषण करनेवाले हैं, जिनके जन्म-मृत्यु आदि नहीं होते, जो देवता और दैत्योंसे सदा वन्दित अविनाशी नारायण श्रीहरि कहलाते हैं ॥ ३४॥ सृष्टि-कर्त्ताओंके स्वामी श्रीब्रह्माजी भी जिनके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, तथा जिन्होंने यह स्थावर-जङ्गम-रूप संसार भी रचा है उन्हींके आश्रयसे देवगण संग्राममें शत्रुओंको जीतते हैं तथा योगिजन भी ध्यानयोगके द्वारा उन्हींका जप करते हैं” ॥३५-३६॥
महर्षि सनत्कुमारके ये वचन सुनकर रावणने फिर पूछा—“हे मुनिश्रेष्ठ ! उन विष्णुभगवान्द्वारा मारे हुए दैत्य, दानव और राक्षसगण मरकर किस गतिको प्राप्त होते हैं ?” तब मुनिवर सनत्कुमारने राक्षसराज रावणसे कहा—॥३७-३८॥ “अन्य साधारण देवताओं-के हाथसे मरकर तो वे अति उत्तम स्वर्गलोकको ही जाते हैं और अपना भोग क्षीण होनेपर वहाँसे गिरकर फिर भूर्लोकमें उत्पन्न होते हैं ॥३९॥ फिर पूर्व-जन्मोंमें किये हुए
उत्तरकाण्ड - सर्ग ३: वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद
| ३४४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
पूर्वार्जितैः पुण्यपापैर्म्रियन्ते चोद्भवन्ति च ।<br>विष्णुना ये हतास्ते तु प्राप्नुवन्ति हरेर्गतिम् ॥४०॥ | अपने पाप-पुण्योंके अनुसार जन्मते-मरते रहते हैं; किन्तु जो भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाते हैं वे तो विष्णु-पद ही प्राप्त कर लेते हैं” ॥४०॥
श्रुत्वा मुनिमुखात्सर्वं रावणो हृष्टमानसः ।<br>योत्स्येऽहं हरिणा सार्धमिति चिन्तापरोऽभवत् ४१ | श्रीसनत्कुमारजीके मुखसे ये सब बातें सुनकर रावण मन-ही-मन अति प्रसन्न हुआ और वह सोचने लगा कि मैं श्रीहरिके साथ अवश्य युद्ध करूँगा ॥४१॥
मनःस्थितं परिज्ञाय रावणस्य महामुनिः ।<br>उवाच वत्स तेऽभीष्टं भविष्यति न संशयः ॥४२॥<br>कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व सुखी भव दशानन । | मुनिवरने रावणके चित्तकी बात जानकर कहा—“वत्स ! इसमें सन्देह नहीं तेरी इच्छा अवश्य सफल होगी ॥ ४२ ॥ हे दशानन ! अभी चैनसे रह, कुछ काल और प्रतीक्षा कर ।”
एवमुक्त्वा महाबाहो मुनिः पुनरुवाच तम् ॥४३॥ | हे महाबाहो रघुनाथजी ! रावणसे ऐसा कह मुनि उससे फिर बोले—॥४३॥
तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि ह्यरूपस्यापि मायिनः ।<br>स्थावरेषु च सर्वेषु नदेषु च नदीषु च ॥४४॥ | “रावण ! वे रूप-रहित हैं, तथापि मैं तुझे उन मायावीके (मायासे धारण किये हुए ) रूप बतलाता हूँ। वे नद और नदी आदि समस्त स्थावरोंमें व्याप्त हैं ॥ ४४ ॥
ओङ्कारश्चैव सत्यं च सावित्री पृथिवी च सः ।<br>समस्तजगदाधारः शेषरूपधरो हि सः ॥४५॥ | ओंकार, सत्य, सावित्री, पृथिवी तथा सम्पूर्ण जगत्के आधार शेषनाग भी वे ही हैं ॥ ४५ ॥
सर्वे देवाः समुद्राश्च कालः सूर्यश्च चन्द्रमाः ।<br>सूर्योदयो दिवारात्री यमश्चैव तथाऽनिलः ॥४६॥<br>अग्निरिन्द्रस्तथा मृत्युः पर्जन्यो वसवस्तथा ।<br>ब्रह्मा रुद्रादयश्चैव ये चान्ये देवदानवाः ॥४७॥ | सम्पूर्ण देवगण, समुद्र, काल, सूर्य, चन्द्रमा, सूर्योदय, दिन, रात्रि, यम, वायु, अग्नि, इन्द्र, मृत्यु, मेघ, वसुगण, ब्रह्मा और रुद्र आदि तथा और भी जितने देव या दानव हैं वे सब भी उन्हींके रूप हैं ॥ ४६-४७ ॥
विद्योतते ज्वलत्येष पाति चात्तीति विश्वकृत् ।<br>क्रीडां करोत्यन्यथात्मा सोऽयं विष्णुः सनातनः ४८ | सम्पूर्ण विश्वको रचनेवाले वे सनातन विष्णुभगवान् निर्विकार होकर भी ( अपनी मायाके आश्रयसे ) नाना प्रकार-की लीलाएँ करते हैं। वे (विद्युत् होकर) चमकते हैं, (अग्नि होकर) प्रज्वलित होते हैं, (विष्णु-रूपसे) रक्षा करते हैं और (रुद्ररूपसे) सबको भक्षण कर जाते हैं ॥४८॥
तेन सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।<br>नीलोत्पलदलश्यामो विद्युद्वर्णाम्बरावृतः ॥४९॥ | यह स्थावर-जंगम सम्पूर्ण त्रिलोकी एकमात्र उन्हींसे व्याप्त है। वे नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण और बिजलीकी-सी आभावाला पीताम्बर धारण किये हुए हैं ॥४९॥
शुद्धजाम्बूनदप्रख्यां श्रियं चामाङ्कसंस्थिताम् ।<br>सदानपायिनीं देवीं पश्यन्नालिङ्ग्य तिष्ठति ॥५०॥ | तथा अपने वाम भागमें बैठी हुई शुद्ध सुवर्णकी-सी कान्तिवाली कभी नष्ट न होनेवाली भगवती लक्ष्मीजीकी ओर निहारते हुए उन्हें आलिङ्गन किये विराजमान हैं ॥५०॥
द्रष्टुं न शक्यते कैश्चिद्देवदानवपन्नगैः । | वे किसी भी देव, दानव या नागसे देखे नहीं जा
सर्ग ३ ]
उत्तरकाण्ड
३४५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यस्य प्रसादं कुरुते स चैनं द्रष्टुमर्हति ॥५१॥<br><br>न च यज्ञतपोभिर्वा न दानाध्ययनादिभिः ।<br>शक्यते भगवान्द्रष्टुमुपायैरितरैरपि ॥५२॥<br><br>भक्तैस्तद्गतप्राणैस्तच्चित्तैर्धूतकल्मषैः ।<br>शक्यते भगवान्विष्णुर्वेदान्तामलदृष्टिभिः ॥५३॥<br><br>अथवा द्रष्टुमिच्छा ते शृणु त्वं परमेश्वरम् ।<br>त्रेतायुगे स देवेशो भविता नृपविग्रहः ॥५४॥<br><br>हितार्थं देवमर्त्यानामिक्ष्वाकूणां कुले हरिः ।<br>रामो दाशरथिर्भूत्वा महासत्त्वपराक्रमः ॥५५॥<br><br>पितुर्नियोगात्स भ्रात्रा भार्यया दण्डके वने ।<br>विचरिष्यति धर्मात्मा जगन्मात्रा स्वमायया ॥५६॥<br><br>एवं ते सर्वमाख्यातं मया रावण विस्तरात् ।<br>भजस्व भक्तिभावेन सदा रामं श्रिया युतम् ॥५७॥ | सकते; जिसपर उनकी प्रसन्नता होती है वही उनका दर्शन कर सकता है ॥५१॥ यज्ञ, तप, दान, अध्ययन अथवा और किसी भी उपायसे भगवान् नहीं देखे जा सकते ॥५२॥ जो उनके भक्त हैं, जिनके प्राण और मन उन्हींमें लगे रहते हैं तथा वेदान्त-विचारसे जिनकी दृष्टि मलहीन हो गयी है उन निष्पाप महात्माओंको ही भगवान् विष्णुके दर्शन हो सकते हैं ॥५३॥ अब यदि तुझे भी (बिना किसी उपायके ही) उन परमेश्वरके दर्शनोंकी इच्छा है तो सुन—वे देवाधिदेव श्रीहरि, त्रेतायुगमें देव और मनुष्योंके कल्याणके लिये, राजवेषसे, इक्ष्वाकुके वंशमें दशरथजीके पुत्र महावीर और पराक्रमी भगवान् राम होकर अवतीर्ण होंगे ॥५४-५५॥ वे परम धार्मिक रघुनाथजी पिताकी आज्ञासे अपने भाई (लक्ष्मण) और अपनी स्त्री जगज्जननी मायाके सहित दण्डक वनमें विचरेंगे ॥५६॥ हे रावण ! इस प्रकार यह सारा तत्त्व मैंने तुझे विस्तारसे सुना दिया । अब तू लक्ष्मीजी सहित भगवान् रामका सदा भक्तिपूर्वक भजन कर" ॥५७॥ |
अगस्त्य उवाच
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं श्रुत्वाऽसुराध्यक्षो ध्यात्वा किञ्चिद्विचार्य च ।<br>त्वया सह विरोधेप्सुर्मुमुदे रावणो महान् ॥५८॥<br><br>युद्धार्थी सर्वतो लोकान् पर्यटन् समवस्थितः ।<br>एतदर्थं महाराज रावणोऽतीव बुद्धिमान् ।<br>हृतवान् जानकीं देवीं त्वत्ताऽऽत्मवधकाङ्क्षया ॥५९॥<br><br>इमां कथां यः शृणुयात्पठेद्वा<br>संश्रावयेद्वा श्रवणार्थिनां सदा ।<br>आयुष्यमारोग्यमनन्तसौख्यं<br>प्राप्नोति लाभं धनमक्षयं च ॥६०॥ | अगस्त्यजी बोले—हे राम ! यह सुनकर राक्षसराज रावणने कुछ देर सोच-विचार करनेके अनन्तर आपके साथ विरोध करना निश्चित किया और ऐसा निश्चय कर वह मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ ॥५८॥ वह युद्धकी इच्छासे सम्पूर्ण लोकोंमें घूमने लगा । हे महाराज ! आपके हाथसे मारे जानेकी इच्छासे ही महाबुद्धिमान् रावणने देवी जानकीजीको चुरा लिया था ॥५९॥ जो पुरुष इस कथाको सुने या पढ़ेगा अथवा सुननेकी इच्छावालोंको सदा सुनावेगा वह दीर्घ-आयु, आरोग्य, अनन्त सुख, इच्छित लाभ और अक्षय धन प्राप्त करेगा ॥६०॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
| ३४६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
|---|
चतुर्थ सर्ग
राम-राज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास।
श्रीमहादेव उवाच
एकदा ब्रह्मणो लोकादायान्तं नारदं मुनिम्।
पर्यटन् रावणो लोकान्दृष्ट्वा नत्वाऽब्रवीद्वचः॥ १ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! लोकान्तरोंमें घूमते हुए रावणने एक दिन श्रीनारदजीको ब्रह्मलोकसे आते हुए देखकर उनसे नमस्कार करके पूछा—॥ १ ॥
भगवन्ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं ज्ञाताऽसि जगत्त्रयम्॥ २ ॥
"भगवन् ! मैं बलवानोंके साथ युद्ध करना चाहता हूँ, आप तीनों लोकोंसे परिचित हैं। कृपया बतलाइये, मुझसे लड़नेयोग्य महाबली पुरुष कहाँ हैं ?"॥ २ ॥
मुनिर्ध्यात्वाऽऽह सुचिरं श्वेतद्वीपनिवासिनः।
महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते॥ ३ ॥
तब मुनीश्वरने बहुत देरतक सोचकर कहा— "हे महामते ! श्वेतद्वीपके रहनेवाले बड़े बलवान् और विशाल शरीरवाले हैं; तुम वहीं जाओ ॥ ३ ॥
विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये।
त एव तत्र सञ्जाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥ ४ ॥
जो लोग भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहते हैं अथवा जो स्वयं विष्णुभगवान्के ही हाथसे मारे गये हैं वे ही वहाँ उत्पन्न हुए हैं। वे देवता या दानव आदि किसीसे भी नहीं जीते जा सकते" ॥ ४ ॥
श्रुत्वा तद्रावणो वेगान्मन्त्रिभिः पुष्पकेण तान्।
योद्धुकामः समागत्य श्वेतद्वीपसमीपतः॥ ५ ॥
यह सुनकर रावण तुरन्त ही अपने मन्त्रियोंके सहित पुष्पक विमानपर चढ़कर श्वेतद्वीपके निकट आया ॥ ५ ॥
तत्रप्राहततेजस्कं पुष्पकं नाचलत्ततः।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ मन्त्रिणश्च दशाननः॥ ६ ॥
उस द्वीपकी प्रभासे तेजोहीन हो जानेके कारण पुष्पक और आगे नहीं बढ़ सका। अतः विमान और मन्त्रियोंको छोड़कर रावण स्वयं ही चला ॥ ६ ॥
प्रविशन्नेव तद्द्वीपं धृतो हस्तेन योषिता।
पृष्टश्च त्वं कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद ॥ ७ ॥
उस द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसका हाथ पकड़कर पूछा— "बता, तू कौन है ? कहाँसे आया है ? और यहाँ तुझे किसने भेजा है ?" ॥ ७ ॥
इत्युक्तो लीलया स्त्रीभिर्हसन्तीभिः पुनः पुनः।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः॥ ८॥
इसी प्रकार वहाँ बहुत-सी स्त्रियोंने लीलापूर्वक हँसते-हँसते उससे वही बात कही और रावणको उन स्त्रियोंके हाथसे बड़ी कठिनतासे छुटकारा मिला ॥ ८ ॥
आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः।
विष्णुना निहतो यामि वैकुण्ठमिति निश्चितः ॥९॥
यह देखकर उसे असीम आश्चर्य हुआ और वह दुर्बुद्धि सोचने लगा, 'मैं विष्णुभगवान्के हाथसे मरकर निःसन्देह वैकुण्ठको जाऊँगा ॥ ९ ॥
मयि विष्णुर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम्।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार विपिनेऽसुरः॥१०॥
अतः मुझे ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे भगवान् विष्णु मुझपर कुपित हों' ऐसा सोचकर ही उस असुरने वनमें श्रीजानकीजीको हर लिया था ॥ १० ॥
जानन्नेव परात्मानं स जहारावनीसुताम्।
मातृवत्पालयामास त्वत्तः काङ्क्षन्वधं स्वकम्॥११॥
हे राम ! आपके हाथसे अपना वध करानेकी इच्छासे ही रावणने आपको परमात्मा जानते हुए भी श्रीसीताजीको चुरा लिया और उनका माताके समान पालन किया ॥ ११॥
राम त्वं परमेश्वरोऽसि सकलं
जानासि विज्ञानदृक्
हे राम ! आप परमेश्वर हैं, आप त्रिकालदर्शी
सर्ग ४] उत्तरकाण्ड ३९७
| भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलना- | एवं विकल्पसे रहित होकर अपनी ज्ञान-दृष्टिसे भूत, |
| साक्षी विकल्पोज्झितः। | भविष्य और वर्तमान ये सब कुछ जानते हैं, हे |
| भक्तानामनुवर्तनाय सकलां | स्वामिन् ! आप अपने भक्तोंको मार्ग दिखानेके लिये |
| कुर्वन् क्रियासंहतिं | ही सारी लीलाएँ रचते हैं तथा आप सम्पूर्ण |
| त्वं शृण्वन्मनुजाकृतिर्मुनिवचो | लोकोंसे पूजित होकर भी मनुष्यरूपसे हम-जैसे |
| भासीश लोकाञ्चितः ॥१२॥ | मुनियोंके वचन सुनते हुए दिखलायी दे रहे हैं॥१२॥ |
| स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुम्भसम्भवः। | इसप्रकार श्रीरघुनाथजीकी स्तुतिकर और उनसे |
| स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ हृष्टमानसः ॥१३॥ | सत्कार पा श्रीअगस्त्यजी अन्य मुनीश्वरोंके साथ प्रसन्न-चित्तसे अपने आश्रमको चले गये ॥ १३ ॥ |
| रामस्तु सीतया सार्धं भ्रातृभिः सह मन्त्रिभिः। | लक्ष्मीपति भगवान् राम सीताजी, भाइयों तथा |
| संसारीव रमानाथो रममाणोऽवसद्गृहे ॥१४॥ | मन्त्रियोंके सहित संसारी पुरुषोंके समान रमण (आचरण) करते हुए घरमें रहने लगे ॥ १४ ॥ |
| अनासक्तोऽपि विषयान्वभुजे प्रियया सह। | उन्होंने असंग होते हुए भी अपनी प्रियाके साथ नाना प्रकारके भोगोंको भोगा। वे सदा ही हनुमान् |
| हनुमत्प्रमुखैः सद्भिर्वानरैः परिवेष्टितः ॥१५॥ | आदि श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे रहते थे ॥ १५ ॥ एक बार |
| पुष्पकं चागमद्राममेकदा पूर्ववत्प्रभुम्। | पहलेहीके समान भगवान् रामके पास पुष्पक विमान आया और बोला—"भगवन् ! मुझे कुबेरजीने अपने |
| प्राह देवं कुबेरेण प्रेषितं त्वामहं ततः ॥१६॥ | यहाँसे फिर आपकीही सेवामें भेजा है ॥ १६ ॥ (वे कहते हैं कि ) पहले तुझे रावणने जीता था |
| जितं त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितम्। | और फिर उससे श्रीरामचन्द्रजीने जीता है। अतः |
| अतस्त्वं राघवं नित्यं वह यावद्वसेद्भुवि ॥१७॥ | जबतक वे पृथिवीतलपर रहें तबतक तू उन्हींको धारण कर ॥ १७॥ जिस समय रघुनाथजी वैकुण्ठको |
| यदा गच्छेद्रुघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा। | चले जायँ उस समय तू मेरे पास आ जाना।" यह |
| तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह पुष्पकं सूर्यसन्निभम् ॥१८॥ | सुनकर श्रीरघुनाथजीने सूर्यके समान देदीप्यमान पुष्पकसे कहा—॥ १८ ॥ "तेरा कल्याण हो, जिस |
| यदा स्मरामि भद्रं ते तदाऽऽगच्छ ममान्तिकम्। | समय मैं तेरा स्मरण करूँ उसी समय तू मेरे पास आ जाना, अब तू जा और मेरी आज्ञासे गुप्तरूपसे |
| तिष्ठान्तर्धाय सर्वत्र गच्छेदानीं ममाज्ञया ॥१९॥ | सर्वत्र रह" ॥ १९ ॥ पुष्पकको इसप्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों और मन्त्रियोंके साथ |
| इत्युक्त्वा रामचन्द्रोऽपि पौरकार्याणि सर्वशः। | मिलकर पुरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य यथायोग्य रीतिसे |
| भ्रातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं यथान्यायं चकार सः ॥२०॥ | करने लगे ॥ २० ॥ |
| राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ। | त्रिलोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान् रामके शासन- |
| वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तश्च भूरुहाः ॥२१॥ | कालमें पृथिवी धनधान्यसे पूर्ण और वृक्ष फलादिसे सम्पन्न थे ॥ २१ ॥ श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त |
| जना धर्मपराः सर्वे पतिभक्तिपराः स्त्रियः। | पुरुष धर्मपरायण थे, स्त्रियाँ पति-सेवामें तत्पर रहती |
| नापश्यत्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥२२॥ | थीं और किसीको भी अपने पुत्रका मरण नहीं देखना |
| ३४८. | अध्यात्मरामायण | [सर्गः ४ |
|---|
| समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह ।<br>वानरैर्भ्रातृभिः सार्धं सञ्चचारावनिं प्रभुः ॥२३॥<br>अमानुषाणि कार्याणि चकार बहुशो भुवि ।<br>ब्राह्मणस्य सुतं दृष्ट्वा बालं मृतमकालतः ॥२४॥<br>शोचन्तं ब्राह्मणं चापि ज्ञात्वा रामो महामतिः।<br>तपस्यन्तं वने शूद्रं हत्वा ब्राह्मणबालकम् ॥२५॥<br>जीवयामास शूद्रस्य ददौ स्वर्गमनुत्तमम् ।<br>लोकानाम्युपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥२६॥<br>कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः ।<br>सीतां च रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२७॥<br>शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् ।<br>कथां संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाम् ॥२८॥<br>दशवर्षसहस्राणि मायामानुषविग्रहः ।<br>चकार राज्यं विधिवल्लोकवन्द्यपदाम्बुजः ॥२९॥ | पड़ता था ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीताजी, भाइयों और वानरोंके साथ विमानपर चढ़कर पृथिवीपर घूमा करते थे ॥२३॥ उन्होंने संसारमें बहुत-सी अमानवीय लीलाएँ कीं । एक बार एक ब्राह्मण-पुत्रको बाल्यावस्थामें ही असमय मरा देख और उस ब्राह्मणको बहुत शोक करते जान रघुश्रेष्ठ परमात्मा महामति रामने वनमें तपस्या करते हुए एक शूद्रको (उसका कारण मानकर) मारा और उस बालकको जीवित किया तथा शूद्रको अत्युत्तम स्वर्गलोक दिया ॥२४-२६ ॥ उन्होंने लोगोंको उपदेश देनेके लिये जगह-जगह करोड़ों शिव-लिंग स्थापित किये और सीताजीका सब प्रकारके अलौकिक भोगोंसे अनुरञ्जन किया ॥ २७ ॥ इस प्रकार परमधार्मिक भगवान् राम धर्मपूर्वक राज्य-शासन करते रहे और उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके पाप दूर करनेवाली अपनी पवित्र कीर्ति-कथा संसारमें स्थापित की ॥ २८ ॥ तीनों लोक जिनके चरणकमलोंकी वन्दना करते हैं उन माया-मानव-शरीरधारी श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक दश हजार वर्ष राज्य किया ॥ २९ ॥ |
| एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ।<br>गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षयन् जनान् ॥३०॥<br>सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च ।<br>भर्तुर्मनोहरा साध्वी भावज्ञा सा हिया भिया ॥३१॥<br>एकदा क्रीडाविपिने सर्वभोगसमन्विते ।<br>एकान्ते दिव्यभवने सुखासीनं रघूत्तमम् ॥३२॥<br>नीलमाणिक्यसंकाशं दिव्याभरणभूषितम् ।<br>प्रसन्नवदनं शान्तं विद्युत्पुञ्जनिभाम्बरम् ॥३३॥<br>सीता कमलपत्राक्षी सर्वाभरणभूषिता ।<br>राममाह कराभ्यां सा लालयन्ती पदाम्बुजे ॥३४॥ | राजर्षि भगवान् राम एकपत्नीव्रतका पालन करने-वाले थे। वे पवित्र-चरित्र रामजी लोगोंको शिक्षा देते हुए गृहस्थाश्रमके समस्त धर्मोंका पालन करते रहे ॥३०॥ साध्वी सीताजी भी उनके हृदयका रुख परखने-वाली थीं। उन्होंने अपने प्रेम, आज्ञापालन, नम्रता, इन्द्रियसंयम, लज्जा और भीरुता आदि गुणोंसे पतिका मन हर लिया था ॥ ३१ ॥ एक दिन श्रीरघुनाथजी अपने क्रीडावनके सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न भवनमें एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे थे। उनके शरीरकी आभा नीलमाणिके समान थी, वे दिव्य भूषणोंसे भूषित थे, उनका मुख प्रसन्न और भाव गम्भीर था तथा वे विद्युत्पुञ्जके समान देदीप्यमान पीताम्बर धारण किये थे। उस समय सर्वालङ्कारसुसज्जिता कमलदललोचना श्रीसीताजीने अपने करकमलोंसे रघुनाथजीकी चरणसेवा करते हुए उनसे कहा-॥ ३२-३४ ॥ “हे देवाधिदेव ! हे |
उत्तरकाण्ड - सर्ग ४: रामराज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास
सर्ग ४ ] : उत्तरकाण्ड ३४९
| संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवदेव जगन्नाथ परमात्मन्सनातन ।<br>चिदानन्दादिमध्यान्तरहिताशेषकारण ॥३५॥<br>देव देवाः समासाद्य मामेकान्तेऽब्रुवन्वचः ।<br>बहुशोऽर्थ्यमानास्ते वैकुण्ठागमनं प्रति ॥३६॥<br>त्वया समेतश्चिच्छक्त्या रामस्तिष्ठति भूतले ।<br>विसृज्यास्मान्स्वकं धाम वैकुण्ठं च सनातनम्॥३७॥<br>आस्ते त्वया जगद्धात्रि रामः कमललोचनः ।<br>अग्रतो याहि वैकुण्ठं त्वं तथा चेद्रघूत्तमः ॥३८॥<br>आगमिष्यति वैकुण्ठं सनाथान्नः करिष्यति ।<br>इति विज्ञापिताऽहं तैर्मया विज्ञापितो भवान् ॥३९॥<br>यद्युक्तं तत्कुरुष्वाद्य नाहमाज्ञापये प्रभो ।<br>सीतायास्तद्वचः श्रुत्वा रामो ध्यात्वाऽब्रवीत्क्षणम्४०<br>देवि जानामि सकलं तत्रोपायं वदामि ते ।<br>कल्पयित्वा मिषं देवि लोकवादं त्वदाश्रयम्॥४१॥<br>त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीत इवापरः ।<br>भविष्यतः कुमारौ द्वौ वाल्मीकेराश्रमान्तिके॥४२॥<br>इदानीं दृश्यते गर्भः पुनरागत्य मेऽन्तिकम् ।<br>लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं कृत्वा शपथमादरात् ॥४३॥<br>भूमेर्विवरमात्रेण वैकुण्ठं यास्यसि द्रुतम् ।<br>पश्चादहं गमिष्यामि एष एव सुनिश्चयः ॥४४॥<br>इत्युक्त्वा तां विसृज्याथ रामो ज्ञानैकलक्षणः ।<br>मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्बलमुख्यैश्च संवृतः ॥४५॥<br>तत्रोपविष्टं श्रीरामं सुहृदः पर्युपासत ।<br>हास्यप्रौढकथासुज्ञा हासयन्तः स्थिता हरिम् ॥४६॥<br>कथाप्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् ।<br>पौरा जानपदा मे किं वदन्तीह शुभाशुभम् ॥४७॥ | जगन्नाथ ! हे सनातन परमात्मन् ! हे चिदानन्द-स्वरूप ! हे आदि, मध्य और अन्तसे रहित सबके कारण ! हे देव ! देवताओंने आकर मुझसे एकान्तमें बहुत कुछ प्रार्थना करते हुए आपके वैकुण्ठ पधारनेके विषयमें कहा है ॥ ३५-३६ ॥ वे कहते हैं कि 'तुझ चिच्छक्तिसे युक्त होकर ही राम हम सबको और अपने सनातन स्थान वैकुण्ठको छोड़कर पृथिवीतलमें ठहरे हुए हैं ॥ ३७ ॥ हे जगद्धात्रि ! कमलनयन राम सदा तेरे साथ ही रहते हैं । यदि तू पहले वैकुण्ठको चली जाय तो श्रीरघुनाथजी भी वहाँ आकर हमें सनाथ कर देंगे ।' मुझसे उन्होंने इसप्रकार कहा है सो मैंने आपको सुना दिया ॥ ३८-३९ ॥ हे प्रभो ! मेरा कोई आदेश तो है नहीं, अब आप जैसा उचित समझें वैसा करें ।”<br><br>सीताजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने कुछ देर सोचकर कहा- ॥ ४० ॥ “देवि ! मैं यह सब जानता हूँ । उसके लिये मैं तुम्हें उपाय बतलाता हूँ । मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले लोकापवादके मिषसे तुम्हें लोकनिन्दासे डरनेवाले अन्य पुरुषोंके समान वनमें त्याग दूँगा । वहाँ श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमके पास तुम्हारे दो बालक होंगे ॥ ४१-४२ ॥ इस समय तुम्हारे शरीरमें गर्भावथाके चिह्न दिखायी दे रहे हैं । (बालकोंके उत्पन्न होनेपर) तुम मेरे पास फिर आओगी और लोकोंकी प्रतीतिके लिये आदरपूर्वक शपथ करके तुरन्त ही पृथिवीके (फटनेपर उसके) छिद्रद्वारा वैकुण्ठको चली जाओगी । पीछे मैं भी वहाँ आ जाऊँगा; बस, अब यही निश्चय रहा" ॥४३-४४॥<br><br>एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान् रामने सीताजीसे ऐसा कह उन्हें अन्तःपुरको भेज दिया और स्वयं नीतिशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियों तथा मुख्य-मुख्य सेनापतियोंसे घिरकर वहाँ विराजमान हुए । सुहृद्गण वहाँ बैठे हुए रामकी परिचर्यामें लगे हुए थे और हास्योक्तिमें कुशल विदूषकगण उन्हें हँसा रहे थे ॥ ४५-४६ ॥<br><br>तब भगवान् रामने प्रसंगवश विजय-नामक एक दूतसे पूछा- "मेरे, सीताके, मेरी माता और |
| ३५० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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सीतां वा मातरं वा मे भ्रातॄन्वा कैकयीमथ।<br>न भेतव्यं त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममोपरि ॥४८॥ | भाइयोंके अथवा कैकेयीके विषयमें पुरवासी लोग क्या कहते हैं? मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, तुम भय न करके सच-सच कहना" ॥४७-४८॥ इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदन्ति ते ।<br>कृतं सुदुष्करं सर्वं रामेण विदितात्मना ॥४९॥<br>किन्तु हत्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ।<br>अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा स्वं वेश्म प्रत्यपादयत् ॥५०॥<br>कीदृशं हृदये तस्य सीतासम्भोगजं सुखम् ।<br>या हृता विजनेऽरण्ये रावणेन दुरात्मना ॥५१॥<br>अस्माकमपि दुष्कर्म योषितां मर्षं भवेत् ।<br>यादृग् भवति वै राजा तादृश्यो नियतं प्रजाः ॥५२॥ | भगवान्के इस प्रकार पूछनेपर विजयने कहा—<br>"देव ! सभी लोग कहते हैं कि आत्मज्ञानी महाराज रामने जो कार्य किये हैं वे सभी बड़े दुष्कर हैं ॥४९॥ किन्तु उन्होंने रावणको मारकर सीताको बिना किसी प्रकारका सन्देह किये ही अपने साथ लाकर घर रख लिया ( यह ठीक नहीं किया) ॥५०॥ भला, जिस सीताको दुरात्मा रावणने निर्जन वनमें हर लिया था न जाने उसके साथ भोग भोगते हुए उन्हें क्या सुख मिलता है? ॥५१॥ अब हमें भी अपनी स्त्रियोंके दुश्चरित्रको सहन करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा राजा होता है प्रजा भी निःसन्देह वैसी ही होती है" ॥५२॥ श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनान्पर्यपृच्छत ।<br>तेऽपि नत्वाऽब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥५३॥ | उसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने आत्मीयोंसे पूछा। उन्होंने भी रघुनाथजीको प्रणाम करके यही कहा कि निःसन्देह ऐसी ही बात है ॥५३॥ ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा ।<br>आहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥५४॥<br>लोकापवादस्तु महान्सीतामाश्रित्य मेऽभवत् ।<br>सीतां प्रातः समानीय वाल्मीकेराश्रमान्तिके ॥५५॥<br>त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण ।<br>वक्ष्यसे यदि वा किञ्चित्तदा मां हतवानसि ॥५६॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने मन्त्रीगण, विजय और अपने सुहृदोंको विदाकर श्रीलक्ष्मणजीको बुलाया और उनसे इस प्रकार कहने लगे—"भैया लक्ष्मण ! सीताके कारण मेरी बड़ी लोकनिन्दा हो रही है। अतः तुम कल सबेरे ही सीताको रथपर चढ़ाकर वाल्मीकि मुनिके आश्रमके समीप छोड़ आओ । इस विषयमें यदि तुम कुछ कहोगे तो मानो मेरी हत्या ही करोगे" ॥५४-५६॥ इत्युक्तो लक्ष्मणो भीत्या प्रातरुत्थाय जानकीम् ।<br>सुमन्त्रेण रथे कृत्वा जगाम सहसा वनम् ॥५७॥<br>वाल्मीकेराश्रमस्यान्ते त्यक्त्वा सीतामुवाच सः।<br>लोकापवादभीत्या त्वां त्यक्तवान् राघवो वने॥५८॥<br>दोषो न कश्चिन्मे मातर्गच्छाश्रमपदं मुनेः ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणः शीघ्रं गतवान् रामसन्निधिम् ॥ | भगवान्की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी डर गये । उन्होंने सबेरे उठते ही सुमन्त्रसे रथ जुड़वाया और उसमें जानकीजीको चढ़ाकर तुरन्त वनको चल दिये ॥५७॥ वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचते ही उन्होंने सीताको उतार दिया और उनसे कहा—"रघुनाथजीने लोकापवादसे डरकर तुम्हें त्याग दिया है ॥५८॥ हे मातः ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, अब तुम मुनीश्वरके आश्रमपर चली जाओ ।" सीताजीसे इस प्रकार कह लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीरामचन्द्रजीके पास चले आये ॥ ५९ ॥ सीताऽपि दुःखसन्तप्ता विललापातिमुञ्चवत् । | उस समय सीताजी अत्यन्त दुःखार्ता होकर अति
सर्ग ५ ] : उत्तरकाण्ड ३५१
| शिष्यैः श्रुत्वा च वाल्मीकिः सीतां ज्ञात्वा स दिव्यदृक्।<br>अर्घ्यादिभिः पूजयित्वा समाश्वास्य च जानकीम् ।<br>ज्ञात्वा भविष्यं सकलमार्पयन्मुनियोषितम् ॥६१॥ | मूर्खा स्त्रियोंके समान विलाप करने लगीं। महर्षि वाल्मीकिने जब शिष्योंके मुखसे यह बात सुनी (कि एक स्त्री रो रही है) तो उन्होंने दिव्यदृष्टिसे जान लिया कि वह सीताजी ही हैं ॥६०॥ मुनि भविष्यमें होनेवाली सब बातें जानते थे। अतः उन्होंने अर्ध्यादिसे सीताजीका पूजन किया और उन्हें समझा-बुझाकर मुनिपत्नियोंको सौंप दिया ॥६१॥ वे मुनि-पत्नियाँ मुनीश्वरके कहनेसे उन्हें साक्षात् परमात्माकी भार्या लक्ष्मीजी जानकर नित्यप्रति भक्ति-भावसे उनकी पूजा करतीं और सदा ही अत्यन्त आदरसे नम्रतापूर्वक उनकी सेवा करती थीं ॥६२॥ इधर, सीताजीको त्याग देनेपर, जिनके चरणकमलोंका मुनिजन सेवन करते हैं वे विज्ञानचक्षु, अद्वितीय, आदिदेव परमात्मा राम भी समस्त भोगोंको छोड़कर वैराग्यपूर्वक मुनियोंके समान रहने लगे ॥६३॥ |
| तास्तां सम्पूजयन्ति स्म सीतां भक्त्या दिने दिने ।<br>ज्ञात्वा परात्मनो लक्ष्मीं मुनिवाक्येन योषितः ।<br>सेवा चक्रुः सदा तस्या विनयादिभिरादरात् ॥६२॥ | |
| रामोऽपि सीतारहितः परात्मा<br>विज्ञानदृक्केवल आदिदेवः ।<br>सन्त्यज्य भोगानखिलान्विरक्तो<br>मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेविताङ्घ्रिः ॥६३॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चम सर्ग
रामगीता।
| श्रीमहादेव उवाच<br>ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना<br>विधाय रामायणकीर्त्तिमुत्तमाम् ।<br>चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो<br>राजर्षिचर्यैरभिसेवितं यथा ॥ १ ॥ | श्रीमहादेवजी बोले- हे पार्वती! तदनन्तर, रघुश्रेष्ठ भगवान् राम, संसारके मङ्गलके लिये धारण किये अपने दिव्यमङ्गल देहसे रामायणरूप अति उत्तमकीर्तिकी स्थापना कर पूर्वकालमें जैसा आचरण राजर्षिश्रेष्ठोंने किया है वैसा ही स्वयं भी करने लगे ॥१॥ |
| सौमित्रिणा पृष्ट उदारबुद्धिना<br>रामः कथाः प्राह पुरातनीः शुभाः ।<br>राज्ञः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो<br>द्विजस्य तिर्यक्त्वमथाह राघवः ॥ २ ॥ | उदारबुद्धि लक्ष्मणजीके पूछनेपर वे प्राचीन उत्तम कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रसंगमें श्रीरघुनाथजीने, राजा नृगको प्रमादवश ब्राह्मणके शापसे तिर्यग्योनि प्राप्त होनेका वृत्तान्त भी सुनाया ॥ २ ॥ |
| कदाचिदेकान्त उपस्थितं प्रभुं<br>रामं रमालालितपादपङ्कजम् ।<br>सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः<br>प्रणम्य भक्त्या विनयान्वितोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥ | किसी दिन, भगवान् राम, जिनके चरणकमलोंकी सेवा साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्तमें बैठे हुए थे। उस समय शुद्ध विचारवाले लक्ष्मणजीने (उनके पास जा) उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीतभावसे कहा- ॥ ३ ॥ "हे महामते! आप शुद्धज्ञानस्वरूप, समस्त- |