अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
(57) जप करने से साधक संकटों से छुटकारा पा लेते हैं। भयंकर रोगों की शान्ति के लिए एक हजार आठ जप करें। इस अध्याय में हनुमान् के माला मन्त्र का भी विधान किया गया है तथा अनेक कामनाओं की सिद्धि के लिए जप से पूर्व अनेक प्रकार के ध्यान बतलाये गये हैं। यही हनुमान् यन्त्र का वर्णन है तथा उसे ताबीज में जड़कर पहनने का विधान है। आगे श्रीराम के यन्त्र और कवच का वर्णन किया गया है। श्रीराम के यन्त्र में कुल मिलाकर इक्कीस कोष्ठ हैं। यह वज्रपंजर नामक यन्त्र कहलाता है। आगे श्रीराम का कवच है, जिसका लेखन यन्त्र पर करने का विधान किया गया है। इस यन्त्र पर पूजन कर इसे धारण करने से शत्रुओं का शमन, सभी उपद्रवों का नाश, आयु, आरोग्य में वृद्धि, पुत्र-पौत्रादि में वृद्धि तथा सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।
विषयसूची 1 अगस्त्यसुतीक्ष्णसंवादे शिवपार्वत्युपाख्यानम् 1 2 परमेश्वरस्वरूपाख्यानम् 6 3 रामावतारोपक्रम् 10 4 ब्रह्मणा षडक्षरमन्त्रग्रहणम् 15 5 सगुणोपासनम् 21 6 श्रीतुलसीमाहात्म्यकथनम् 28 7 मन्त्रराजमाहात्म्यम् 35 8 गुरु-शिष्यलक्षणम् 41 9 यन्त्र-विधिः 47 10 पूजा-विधिः 51 11 पूजाविधि-भूतशुद्धिः 58 12 शरीर-न्यासः 65 13 रामपूजा-विधिः 77 14 कुण्डमान-होमान्तादिविधिः 85 15 प्रयोग-विधिः 95 16 पुरश्चरण-विधिः 103 17 पूजा-विधानम् 112 18 आसन-मुद्रा-प्रदर्शनम् 122
(59)
19 यम-नियम-व्रतम् 132 20 प्राणायाम-विधिः 142 21 ब्रह्मविद्या-निरूपणम् 151 22 शरीरोत्पत्तिः 158 23 योग-वर्णनम् 165 24 मन्त्रमहिमाख्यानम् 173 25 मन्त्रान्तरवर्णनम् 181 26 श्रीरामव्रत-कथनम् 188 27 रामनवमी-महिमाख्यानम् 198 28 रामनवमीव्रत-विधानम् 204 29 श्रीरामप्रतिष्ठा-विधिः 210 30 लक्ष्मणादिपूजन-विधिः 217 31 लक्ष्मणादिमन्त्र-कथनम् 225 32 श्रीरामयन्त्रमन्त्रकवचोद्धारकथनम् 229 परिशिष्ट : हेमाद्रि-कृत 'चतुर्वर्गचिन्तामणि' में उद्धृत अगस्त्य-संहिता 242 'अगस्त्य-संहिता' से उद्धृत रामनवमी-व्रत-कथा· 245 रामतापिनीयोपनिषद् में उद्धृत रामोपासना की फलश्रुति 256 श्रीमदगस्त्यसंहितान्तर्गत श्रीरामानन्दाचार्यजन्मोत्सवकथा 261
अगस्त्य-संहिता श्रीरामो जयति। १ अगस्त्यो नाम विप्रर्षिः सत्तमो गौतमीतटे। कदाचिद्दण्डकारण्यं सुतीक्ष्णस्याश्रमं ययौ।।१।। अगस्त्य नाम के श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि किसी समय में दण्डकारण्य में गौतमी नदी के तट पर स्थित सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पर पहुँचे। प्रत्युज्जगाम तं भक्त्या गन्धपुष्पाक्षतोदकैः। पाद्यार्घ्याद्यर्हणां चक्रे तस्मै ब्रह्मविदे मुनिः।।२। सुतीक्ष्णस्तं प्रणम्याह² सुखासीनं तपोनिधिम्। श्रीमदागमनेनैव जीवितं सफलं मम।।३।। अद्य जन्मसहस्रेषु तपः फलति संचितम्। मुनि सुतीक्ष्ण ने उनकी आगवानी की और चन्दन, पुष्प, अक्षत, जल, हाथ-पैर धोने का जल देकर उस ब्रह्मवेत्ता मुनि का पूजन किया। जब वे सुखपूर्वक आसन पर बैठ गये, तब सुतीक्ष्ण मुनि ने कहा कि श्रीमान् के आगमन से ही मेरा जीवन सफल हो गया। आज सैकड़ों जन्मों की तपस्या का फल मुझे मिल गया। कामक्रोधादिभिर्भूयो भूयोऽहं पीडितो मुने।।४।। नाद्राक्षं सम्यगिष्ट्वापि क्रतुभिर्बहुदक्षिणैः। ३ सत्पात्रे सर्वदानानि दत्वा तु मुनिसत्तम।।५।। भवाब्धेस्तरणोपायं तपस्तप्त्वा सुदुष्करम्। किं करिष्याम्यहं तात क्व यास्यामीति तद्वद।।६।। हे महामुनि! मैं काम क्रोध आदि से अत्यन्त पीड़ित हूँ। मैंने कई यज्ञ किये, जिनमें पर्याप्त दक्षिणा दी, सत्पात्र को दान किया, किन्तु संसार को पार लगाने का
- क. श्रीमते रामानुजाय नमः। ख. श्री गणेशाय नमः। 2. ख. मुनिं प्राह। 3.ख. ºभूरिदक्षिणैः।
(2) ————————— अगस्त्य-संहिता ————————— उपाय मैंने नहीं देखा। कठिन तपस्या भी की; किन्तु अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? इसका उपदेश करें। इत्युक्तः सोऽब्रवीत्तेन कुम्भभूर्विगतस्पृहः।¹ क्षणं विचार्य तत्पौर्वापर्य्येण मुनिपुङ्गवः॥7॥ ऐसा कहने पर वीतराग महामुनि अगस्त्य ने कुछ देर सोचकर बारी बारी से सुतीक्ष्ण को कहने लगे। अगस्त्य उवाच अस्ति वक्ष्यामि ते सर्वं रहस्यं वृषभध्वजः। यत्प्रत्यपादयत्पूर्वं ² पार्वत्यै कृपयात्मवित्॥8॥ अगस्त्य बोले – 'इसका भी उपाय है। प्राचीन काल में आत्मज्ञानी भगवान् शिव ने प्रेमपूर्वक पार्वती से जो रहस्य कहा था, वहीं मैं तुमसे कह रहा हूँ। ³कदाचित् पार्वती प्राह भर्तारं भक्तवत्सलम्। कथं मे देव निस्तारो भवाब्धेस्तरणं भवेत्॥9॥ भवाब्धौ मोहिताः सर्वे सद्गतिं प्राप्नुवन्ति ते। किसी समय में पार्वती ने भक्तवत्सल भगवान् शंकर से पूछा – हे देव! मुझे मुक्ति कैसे प्राप्त होगी और संसार से कैसे पार लगेगा? इस संसार रूपी समुद्र में मोह-ग्रस्त होकर कैसे सभी सद्गति को प्राप्त कर सकेंगे? ईश्वर उवाच कामक्रोधादिभिर्दोषैर्दुष्टास्तत्र पुनः पुनः। उत्पद्यन्ते विलीयन्ते⁴ पुनर्व्यामोहितास्त्वया॥10॥ ईश्वर बोले – काम, क्रोध आदि दोषों से इस संसार में लोग आपके द्वारा माया से मोहित होकर बार-बार उत्पन्न और विलीन होते देखे जाते हैं। रौरवादिषु पच्यन्ते पुनः संसारिणो भुवि। कर्मशेषात् प्रजायन्ते पंग्वन्धबधिरादयः॥11॥ वे पृथ्वी पर उत्पन्न होकर रौरव आदि नाम के नरकों में पचते हैं और पुण्य कर्म के क्षीण होने से लँगडे, अन्धे, बहरे आदि हो जाते हैं।
- क. बभूव विगतस्पृहः। 2. क. प्रीत्योत्पादयत्पूर्वं। 3. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 4. घ. प्रलीयन्ते।
प्रथमोऽध्यायः (3) कृमिकीटादयो भूत्वा पुनः संसारिणो भुवि। कुष्ठाद्युपहताः¹ केचिच्चौरव्याघ्रादिभिर्हताः ।।12।। फिर पृथ्वी पर कीड़े-मकोड़े के रूप में जन्म लेकर ये संसारी कुष्ठ आदि रोगों से जकड़े हुए तथा कुछ चोर-डाकू, बाघ आदि के द्वारा मार डाले जाते हैं। प्रविशन्ति जलेऽग्नौ वा देशाद् देशं व्रजन्ति हि। परस्त्रीधनहन्तारस्तापयन्ति सतः सदा ।।13।। जो लोग दूसरे की स्त्री अथवा धन का हरण करते हैं और सज्जनों को सताते हैं; वे पानी मे डूबते हैं, आग में झुलसते हैं अथवा इस स्थान से उस स्थान भटकते रहते हैं। देवब्राह्मणवित्तैस्तु येषां जीवनमन्वहम्। राजसाः तामसाश्चैव हर्तारो धनजीविनः ।।14।। पुत्रदारादिभिर्युक्ता दुःखवर्ते भ्रमन्त्यहो। जो देवता, ब्राह्मण और पुरोहितों के धन से जिनका जीवन चलता है, ऐसे राजस और तामस स्वभाव के लोग पुत्र, पत्नी आदि से युक्त होकर इस दुःख के भँवर में घूमते रहते हैं। ²कलौ प्रायेण सर्वेऽपि राजसा तामसास्तथा ।।15।। निसिद्धाचारिणः सन्तो मोहयन्त्यपरान्बहून्। यथाभूतः प्रभुल्लोके सेवकाः स्युस्तथाविधाः ।।16।। अतो मदीयाः सर्वेऽपि हिंसकाःस्वप्रियाः प्रिये। वश्याकर्षणविद्वेषस्तम्भनोच्चाटनादिषु ।।17।। शश्वदावां समाराध्य भवन्ति फलभागिनः। आवाभ्यां पिशितं रक्तं सुरां चापि सुरेश्वरि ।।18।। वर्णाश्रमोचितो धर्ममविचार्य्यार्पयन्ति ये। भूतप्रेतपिशाचास्ते भवन्ति ब्रह्मराक्षसाः ।।19।। कलियुग में प्रायः सभी राजस या तामस प्रवृत्ति के लोग होते हैं। निषिद्ध कर्म करनेवाले हैं और वे बहुत से दूसरे लोगों को कष्ट देते हैं। संसार में जैसा मालिक होता है, वैसे ही सेवक भी होते हैं। इसलिए हे प्रिये! वे सभी हिंसक मेरे
- घ. केचिच्छस्त्रहताः। 2. क. एवं ख. में पंक्ति के क्रम में अन्तर है ।
(4) अगस्त्य-संहिता प्रिय हैं। वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन, उच्चाटन आदि प्रयोगों में लीन रहनेवाले वे नित्य हम दोनों की आराधना करके फल पाते हैं। हमदोनों को तो मांस, रक्त, सुरा भी समर्पित करते हैं, किन्तु हे सुरेश्वरि! वर्ण और आश्रम के लिए विहित धर्म का विचार किए विना जो हमदोनों को मांस, रक्त, मदिरा अर्पित करते हैं, वे भूत, प्रेत, पिशाच और ब्रह्मराक्षस होते हैं। पुनस्तदन्ते जायन्ते विप्रदेवाधिकारिणः। तत्तद्रूपेण जायन्ते स्वस्वदोषानुरूपतः।।20।। और फिर मृत्यु पाकर पुरोहित और मन्दिर के अधिकारी होते हैं, फिर अपने दोषों के अनुसार भूत, प्रेत, पिशाच आदि के रूप में जन्म लेते हैं। पार्वत्युवाच नायं धर्मो हि देवेश परेषामुपकारकृत्। अतो मे ब्रूहि देवेश धर्मो यस्त्वं कृपानिधे।।21।। पार्वती बोली- हे देवाधिदेव, हे करुणानिधि! यह वशीकरण आदि धर्म दूसरे का उपकार करनेवाला नहीं हैं, अतः जो धर्म है, वह मुझे बतलाइए। ईश्वर उवाच सत्यं वदाम्यहं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि। हन्ताहं सर्वलोकानां यतो हिंसैव मे प्रिया।।22।। महादेव बोले- हे देवि! मैं ठीक ही तो कहता हूँ, जो तुम मुझे पूछ रही हो। मैं तो सभी लोकों का अन्तक हूँ; अतः हिंसा मुझे प्रिय हैं। ये वा भूतानि निघ्नन्ति विधिनाविधिनापि वा। समर्पयन्ति भूतेभ्यो मत्प्रियास्ते सदा प्रिये¹।।23।। जो प्राणियों का वध विधानपूर्वक या विना विधान के भी करते हैं और भूत-प्रेतों को समर्पित करते हैं वे सदा मेरे प्रिय हैं। अहं तमोमयो नित्यं हन्मि भूतानि भामिनि। मत्कर्म हननं नित्यमतो हिंसैव मे प्रिया।।24।। हे भामिनि! मैं नित्य तमोमय हूँ और प्राणियों का संहार करता हूँ। संहार करना मेरा कर्म है, अतः हिंसा ही मेरा प्रिय है।
- घ. मत्प्रियाः सर्व्वदा प्रिये।
प्रथमोऽध्यायः (5) मत्कृत्याचारिणः सर्वे वल्लभा मम वल्लभे। लोके स्वाम्यनुकल्पेन सेवां कुर्वन्ति सेवकाः।।२५।। भक्त्यार्पयन्ति ये मह्यं तवापि पिशितादिकम्। उत्पादयन्ति चानन्दं गणेभ्यो वा सुरप्रिये।।२६।। हे स्वामिनि! प्रिये! जो कार्य मैं करता हूँ, उन कार्यों को करनेवाले सभी मेरे प्रिय हैं। इस संसार में स्वामी के समान ही सेवक भी सेवा करते हैं। हे देवप्रिये पार्वति! मुझे या तुम्हें जो भी व्यक्ति भक्तिपूर्वक मांस आदि अर्पित करते हैं उससे हमें या हमारे गणों भूत-प्रेत पिशाच आदि को प्रसन्नता होती है। तवापि च मदीयानामस्माकं पिशितादिकम्। तृप्तिमुत्पादयन्त्येव विधिनाविधिनार्पितम् ।।२७।। तुम्हें और मुझे दोनों को विधिपूर्वक या विना विधि के भी अर्पित किये गये मांस आदि संतुष्टि तो देते ही हैं। ब्रह्मा सृजति भूतानि विष्णुः तान्परिपालयेत्।¹ तान्यहं हन्मि भूतानि कृतिरस्भाकमीदृशी ।।२८।। ब्रह्मा प्राणियों की सृष्टि करते हैं, विष्णु उनका पालन करते हैं और मैं उनका संहार करता हूँ। हमलोगों के तो ये ही कार्य हैं। रजोगुणालयो ब्रह्मा विष्णुः सत्त्वगुणालयः। तमोगुणालयोऽहं स्यां स्वस्वकार्याणि कुर्महे।।२९।। ब्रह्मा में रजोगुण का निवास है, विष्णु सत्त्वगुण के आलय हैं और तमोगुण का आलय मैं हूँ। हमसब अपने अपने कार्य करते हैं। तत्तद्गुणानुगुण्येन क्रियतेस्माभिरीदृशम्। उन उन गुणों के अनुरूप हमसब इस प्रकार कार्य करते हैं। भवाब्धेस्तरणं देवि हिंसकानान्तु दुर्लभम्।।३०।। कामादिग्रस्तचित्तानां कुतो मुक्तिर्वद प्रिये।।३१।। हे प्रिये! लेकिन इस संसार रूपी सागर को पार करना हिंसकों के लिए दुर्लभ है। काम आदि से ग्रस्त लोगों के लिए मुक्ति कैसे होगी यह कहो। इत्यगस्त्यसंहितायां शिवपार्वत्युपाख्यानम् नाम प्रथमोऽध्यायः ।।१।।
- घ. विष्णुस्तान्येव पाति वै।
(6) अगस्त्य-संहिता अथ द्वितीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच। कमुपास्य लभेन्मुक्तिं क्रियया च कया प्रभो। मुमुक्षोः पुनरावृत्तिदुर्लताभयभञ्जन¹।।1।। हे शंकर! मोक्षार्थियों के लिए पुनर्जन्मरूपी दुष्टलता के भय का नाश करनेवाले! हे प्रभो! हे संसार का संहार करनेवाले! किस देवता की उपासना और कैसा कर्म करने से मुक्ति मिलेगी? ईश्वर उवाच शृणु देवि महाभागे रहस्यं कथयाम्यहम्। यज्ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।।2।। ईश्वर बोले- हे देवि, मैं उस रहस्य को बतला रहा हूँ, जिसे जान लेने पर प्राणी संसार के बन्धन से मुक्त हो जाता है। अपाणिपादो जवनो ग्रहीतापीक्ष्यतेऽप्यदृक्। अकर्णः स शृणोत्येतच्छब्दरूपं² परं महः।।3।। वेत्ति वेद्यं स सर्वज्ञानवेद्यो विद्यते प्रभुः।³ स महापुरुषः पुंसां स्त्रीणां पुंव्यक्तिलक्षणः ।।4।। वे महापुरुष परमेश्वर विना पैर के भी गतिशील हैं, विना हाथ के भी ग्रहण करने में समर्थ हैं, विना आँख देखते हैं और विना कान के सुनते हैं और शब्द के रूप में महान् हैं। वे सभी ज्ञातव्य विषयों को जानते हैं और वे प्रभु समग्र ज्ञान के द्वारा ज्ञेय हैं। पुरुषों में महापुरुष और स्त्रियों में पुरुष स्वरूप हैं। स्त्रीपुन्नपुंसकाकाररहितः पुरुषोत्तमः। सर्वेश्वरः सर्वरूप सर्वदेवमयो हरिः।।5।। स्त्री, पुरुष और नपुंसक के आकार से रहित निराकार पुरुषोत्तम हरि सबके स्वामी हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी देवताओं के रूप में हैं। सत्त्वज्ञानमयोऽनन्तोऽनादिरानन्द उच्यते। अजः स्मरणमात्रेण जन्मादिक्लेशभञ्जनः।।6।। तस्यात्मधीश्र्च सर्वेषां पुनरावृत्तिकर्त्तनी।
- क. एवं ख. पुरावृत्तिं दुर्लभां भवभञ्जक। 2. घ. छन्दोरूपे। 3. घ. वित्ति वेद्यं स सर्वज्ञो नावेद्यं विद्यते प्रभोः।
द्वितीयोऽध्यायः (7) सत्त्व-स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप, अनन्त, अनादि, आनन्दमय तथा अजन्मा कहे जाते हैं तथा केवल स्मरण करने से जन्म आदि के कारण उत्पन्न कष्ट को दूर करते हैं। उनमें जो ध्यान लगाते हैं उनकी बुद्धि इस संसार में पुनर्जन्म को काटनेवाली कैंची बन जाती है। नियमेनैव वर्णानां स्वाश्रमोक्तेन स प्रभुः ।। 7 ।। ध्येयः संसारनाशाय १ न चैवावर्तते पुनः । सभी वर्णों के अपने अपने आश्रमों के अनुरूप बने नियमों के अनुरूप ध्यान किये गये वे प्रभु पुनः संसार में जन्मग्रहण के नाशक हैं। वह भक्त इस संसार में पुनः उत्पन्न नहीं होता। स्वाश्रमोक्तं परित्यज्य य आत्मानमुपासते ।। 8 ।। तद्रूपेण ततो देवि मुच्यते भवबन्धनात्। हे देवि! अपने आश्रम के लिए कथित विधान को छोड़कर अर्थात् संन्यास लेकर जो आत्मा की उपासना करते हैं, वे उसी रूप में इस संसार के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणेषु यो यो नियम उच्यते ।। 9 ।। यस्य यस्याश्रमन्वायो न मोक्तव्यो मुमुक्षुभिः । अतो नियममादृत्य कुर्याद् ध्यानमनन्यधीः ।। 10 ।। वेद, स्मृति एवं पुराणों में जो जो नियम बतलाये गये हैं तथा जिसका जो आश्रम है, उस आश्रम के अनुरूप जो नियम बनाये हैं, मोक्षार्थियों को उन नियमों का त्याग नहीं करना चाहिए। नियमों के अनुसार एकचित्त होकर प्रभु का ध्यान करें। एतच्चराचरं विश्वं स्वप्नप्रत्ययवत्सुधीः । मिथ्यादृग्व्यतिरिक्तं यद् दृश्यतेद्धा तथा प्रिये ।। 11 ।। दृग्रूपेणात्मना ज्ञानं सत्यानन्दात्मनः स्वयम्। एकाकी जितचित्तात्मा चिन्तयेत् तदनन्यधीः ।। 12 ।। सोऽहमित्यात्मनात्मानं त्वाज्ञानपरिकल्पितम्। एतत् स्वव्यतिरिक्तं यद्यतः स्वेनैव कल्पते ।। 13 ।। न पारमार्थिकं देवि यद्यद् बालो हि कल्पयेत् ।। बालाज्ञयोर्वा को भेदः कल्पेते न तु चक्षुषा ।। 14 ।।
- क. संसृतिनाशाय।
(8) अगस्त्य-संहिता विद्वान् इस चराचर जगत् को स्वप्न के ज्ञान के समान मानते हैं। यह संसार दिखाई पड़ता है, अतः मिथ्या है। कुछलोग इसे मिथ्यादृष्टि से भिन्न अर्थात् वास्तविक मानते हैं। आत्मदृष्टि से ज्ञान को सत्य रूप और आनन्द स्वरूप समझते हुए स्वयं साधक एकाकी होकर चित्त और आत्मा को जीतकर उस ज्ञानमय ब्रह्म का चिन्तन करे कि 'वह ब्रह्म मैं हूँ '(सोऽहम्)। किन्तु मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण इस संसार को स्वप्न से भिन्न वास्तविक मानता है और उसी के अनुसार चलता है। बच्चे जो जो कल्पना करते हैं, वे परम तत्त्व (वास्तविक) नहीं हैं, तब बच्चे और अज्ञानियों में भेद भी कहाँ है? वे दोनों तत्त्वचक्षु से अवधारण नहीं करते हैं। ¹अयं पन्थाः पुराणः स्यादनुप्राप्तः पुरातनः। अध्यात्मविद्भिरर्चितो ज्ञापितः स परः स्मृतः।।15।। ब्रह्मज्ञान का यह प्राचीन मार्ग है, जो परम्परा से परम्परा के द्वारा प्राप्त है। अध्यात्मज्ञानियों ने देवता की अर्चना के द्वारा इसे लोगों को समझाया है, अतः वह परम तत्त्व है। आब्रह्मशुद्धवंश्यानां मातापित्रोः कुले च ये। स्त्रियो वाऽव्यभिचारिण्यः पुरुषाश्चैव धार्मिकाः।।16।। जो ब्रह्म से लेकर शुद्ध वंशवाले कुल में उत्पन्न माता-पिता से उत्पन्न पुरुष हैं तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, वे धार्मिक हैं। यज्ञाश्च वेदाध्ययनमेधेते प्रतिपूरुषम्। पूज्यन्तेऽतिथयो यत्र गुरुशिष्यपरम्परा।।17।। स्वप्नेऽपि चलनं नैव² स्त्रीष्वपि ब्रह्मचारिषु। नियमोऽप्याश्रमस्थेषु कदाचिदपि भामिनि³।।18।। यज्ञ और वेद का अध्ययन ये दोनों प्रति व्यक्ति में वृद्धि प्राप्त करते हैं। जहाँ गुरु-शिष्य की परम्परा और अतिथियों की पूजा होती है। उन आश्रमों में स्थित स्त्रियों और ब्रह्मचारियों के नियमों में स्वप्न में भी विचलन नहीं होता।
- क. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध। 2. घ. स्वल्पोऽपि स्खलते नैव। 3. घ. कदाचिन्न विमुच्यते।
द्वितीयोऽध्यायः (9) तत्तत्कालेषु¹ दानं हि तदर्थिभ्यः प्रदीयते। येषु वंशेषु सर्वेषां तेषामेव प्रकाशते।।19।। ब्रह्म ब्रह्मविदा देवि गुरुशिष्योक्तिशिक्षया। हे देवि! गुरु और शिष्य द्वारा किए गये उपदेश से जिन वंशों में विहित अवसरों पर प्रार्थियों को दान किए जाते हैं उन वंशों के ब्रह्मज्ञानी के द्वारा ब्रह्म प्रकाशित होते हैं। अयमेव परं ब्रह्म नान्यत्किञ्चिन्न विद्यते।।20।। इदमेव परं ब्रह्म ततोऽन्यं नास्ति किंचन। तदेतदखिलं ब्रह्म सत्यं सत्यं प्रकाशते।।21।। एक परम ब्रह्म स्वयं है, इससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, यह समग्र ब्रह्माण्ड सत्य स्वरूप है, जो निश्चय ही प्रकाशवान् है। जन्मकोटिसहस्रेषु प्रक्षीणाशेषदुष्कृतैः। कैश्चिदेव नियम्यासूनपरोक्षं निरीक्ष्यते।।22।। सुखामृतरसास्वादसत्यज्ञानैकरूपता । भागाश्रयेण विदुषा स्वयमेवानुभूयते।।23।। अहो पुण्यमहो धर्म्यं नातः परतरं क्वचित्। अकृत्येषु च सर्वेषु प्रायश्चित्तमिदं परम्।।24।। सैकड़ो करोड़ जन्मों की तपस्या से जिन्होंने अपने सभी दुष्कर्म के फलों का नाश कर लिया है, वह कोई कोई प्राणवायु को नियंत्रित कर प्रत्यक्ष रूप में ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं। सुख, अमृत रस का आस्वादन और वास्तविक ज्ञान इन तीनों भेदों को एक रूप में अद्वैत की भावना का आश्रय लेकर विद्वान् स्वयं अनुभव करते हैं। अहो! यह पुण्य है, यह धर्म का फल है, इससे भिन्न कुछ भी नहीं सभी दुष्कर्मों में यही परम प्रायश्चित्त है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमेश्वरस्वरूपाख्यानम् नाम द्वितीयोऽध्यायः।
- घ. स्व स्वकालेषु।
(10) अगस्त्य-संहिता अथ तृतीयोऽध्यायः पार्वत्युवाच सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन। सर्वेषां सुगमः१ पन्थाः को मे वद दयानिधे।।1।। पार्वती बोलीं- हे सभी लोकों के स्वामी! सबके दुःखों का निवारण करने वाले हे दयानिधि! मोक्ष पाने के लिए ऐसा उपाय बतलायें, जो सबके लिए आसान हो। ईश्वर उवाच शृणुष्वावहिता देवि यदेतत्प्रतिपाद्यते। सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतहिते रतः।।2।। सर्वेषामुपकाराय साकारोऽभून्निराकृतिः। हे देवि! मैं जो कह रहा हूँ उसे ध्यानपूर्वक सुनो। निराकार प्रभु जो सबके ईश्वर हैं, सभी रूपों में हैं तथा सभी प्राणियों की भलाई में लगे रहते हैं, सबके उपकार के लिए आकार ग्रहण कर अवतार लेते हैं। स भक्तवत्सलो लोके संसारीव व्यचेष्टत।।3।। भक्तानुकम्पया देवो दुःखं सुखमिवान्वभूत्। भक्तवत्सल भगवान् इस संसार में संसारी प्राणी के समान क्रियाएँ करते हैं और भक्त पर अनुकम्पा के कारण वे प्रभु दुःखों को सुख के समान अनुभव करते हैं। यदा यदा च भक्तानां भयमुत्पद्यते तदा।।4।। तत्तद्भक्तस्य चिन्तायै तत्तद्रूपो व्यजायत। जब जब भक्तों पर किसी प्रकार का भय उपस्थित होता है, तब उन उन भक्तों की चिन्ता करते हुए उसी रूप में अवतार लेते हैं। मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थवित्२।।5।। तत्तत्कालेषु संभूय सर्वेषामप्युपाकरोत्। मत्स्य, कूर्म, वराह आदि रूप ग्रहण कर परोपकार करनेवाले वे महाप्रभु उन उन कालों में उत्पन्न होकर सबकी भलाई करते हैं।
- घ. निगमः। 2. घ. परमात्मदृक्।
---------------- तृतीयोऽध्यायः ---------------- (11) साधूनामाश्रमस्थानां भक्तानां भक्तवत्सलः ।। 6 ।। उपकर्ता निराकारस्तदाकारेण जायते। साधुओं तथा चारों आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास के भक्तों का उपकार करनेवाले वे भक्तवत्सल भगवान् तब आकार ग्रहण करते हैं। अजोऽयं जायतेऽनन्तः सान्तोऽभूद् भूतभावनः ।। 7 ।। कदाचिदवतीर्य्याऽयं मन्दभक्तानुकम्पया। ये अजन्मा हैं फिर भी जन्म लेते हैं, अनन्त होकर भी मरणशील होने की लीला करते हैं, प्राणियों की सृष्टि करते हैं, वे किसी समय हतभाग्य भक्तों पर अनुकम्पा करने के लिए अवतार लेते हैं। क्षीराब्धेः देवदेवेशो लक्ष्म्या नारायणो भुवि ।। 8 ।। सशेषः शंखचक्राभ्यां देवैर्ब्रह्मादिभिः सह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणो बभौ ।। 9 ।। क्षीरसागर में लक्ष्मी के साथ शयन करनेवाले वे देवेश शेषनाग, शंख, चक्र और ब्रह्मा आदि देवताओं के साथ त्रेता युग में इस संसार में दशरथ के पुत्र के रूप में अवतरित होकर विराजमान हुए।। शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीः शंखचक्रे च जानकी। जातौ भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः ।। 10 ।। शेषनाग के अवतार लक्ष्मण हुए, लक्ष्मी जनकनन्दिनी जानकी के रूप में अवतरित हुईं। शंख और चक्र के अवतार भरत और शत्रुघ्न हुए तथा सभी देवता वानर के रूप में अवतरित हुए। बभूवुरेवं सर्वेऽपि देवर्षिभयशान्तये। तत्र नारायणो देवो श्रीराम इति विश्रुतः ।। 11 सर्वलोकोपकाराय भूमौ सौर्येष्ववातरत्।¹ इस प्रकार सभी देवों और ऋषियों के भय को दूर करने के लिए भगवान् नारायण धराधाम पर अवतरित हुए, जिनमें सभी लोकों के उपकार के लिए सूर्यवंशियों के बीच श्रीराम के नाम से प्रख्यात होकर अवतरित हुए।
- घ. सोऽयमवातरत्।
(12) अगस्त्य-संहिता
तपः कुर्वन्ति तं केचिदपरोक्षं निरीक्षितुम् ।। पञ्चाग्निमध्ये ग्रीष्मेषु वर्षासु दिवि शेरते ।।12 कुछ लोग उस भगवान् श्रीराम के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए तपस्या करते हैं। कुछ तपस्वी ग्रीष्मकाल में पाँच अग्नियों के बीच (चारों दिशाओं में अग्नि तथा ऊपर प्रचण्ड सूर्य- ये पाँच अग्नियाँ कहलाती है।) वर्षा ऋतु में खुले आकाश के नीचे तपस्या करते हैं। शिशिरेषु जलेष्वेवं तपः केचन तेपिरे। केचिद् भिक्षां पर्यटन्ति कृत्वा धारणपारणाम्¹ ।।13।। शोषयन्ति पुनर्देहमपरे कृच्छ्रचर्यया। इसी प्रकार जाड़े के दिनों में जल में खड़ा होकर कुछ लोग तपस्या करते हैं, कुछ लोग भिक्षाटन कर जो मिले उसी से भोजन करने का व्रत करते हुए तथा अन्य लोग न्यूनतम भोजन करने का व्रत करते हुए शरीर को सुखाते हैं। कालश्चान्द्रायणैरेव कैश्चित् पार्वति नीयते ।।14।। शाकमेवापरे देहमश्नन्तः शोषयन्त्यहो। हे पार्वती! कुछ लोग चान्द्रायण व्रत कर समय व्यतीत करते हैं तथा कुछ तो केवल साग खाते हुए अपने शरीर को सुखा डालते हैं। इह केचिद् वरारोहे नक्तायाचितभोजना ।।15।। चिन्तयन्ति चिरं कालं वनेष्वेकाकिनो² हृदि। हे पार्वती! कुछ लोग इस संसार में रात्रि में एक बार बिना माँगे जो मिल जाये वही खाकर, वन में अकेले रहकर चिरकाल तक अपने हृदय में भगवान् का चिन्तन करते रहते हैं। अनन्यमनसः शश्वद् गणयन्तोऽक्षमालया ।।16।। जपतो रामरामेति सुखामृतनिधौ मनः। प्रविलीयामतीभूय सुखं तिष्ठन्ति केचन ।।17।। एकाग्रभाव से रुद्राक्ष की माला पर गिनते हुए राम, राम का जप लगातार करते हुए सुख रूपी अमृत के भाण्डार में मन को एकाकार कर अमरत्व पाकर सुख से रहते हैं।
- घ. धारणपूरणे। 2. घ. बिल्ववनेष्वेकाकिनो।
तृतीयोऽध्यायः (13) मत्पश्चिमाभिमुख्येन केचित्प्रासादकोटरे। भावयन्ति चिरं देवि मम तत्प्राप्तये बुधाः।।18।। परिचर्यापराः केचित्प्रासादेष्वेव शेरते।। कुछ समझदार लोग मुझसे पश्चिम में अभिमुख बैठकर अर्थात् पूजा-स्थल के पश्चिम में पूर्वाभिमुख होकर अपने घर में हीं रहते हुए मेरे उस स्वरूप की प्राप्ति के लिए उनकी परिचर्या (सेवा) करते हुए घर में ही जीवन व्यतीत करते हैं। ¹मनुष्यस्य चिरं देवि भगवत्प्राप्तये बुधाः।।19।। मनुष्यमिव तं द्रष्टुं व्यवहर्तुं च बन्धुवत्। अध्यापनाय विद्यानां योद्धुमप्यपरे तपः।।20।। चक्रिरे वामनो भूत्वा केचिद्रोषेण तेपिरे²। क्षीराहाराः परे चाब्धेस्तीरेष्वेव निषेविरे।।21।। चञ्चलाक्ष्यथ केषांचित्तपः स्मर्तुं न शक्यते। किं करिष्यति देवोऽयं एवं दृष्ट्वा सुदारुणम्।।22।। तपस्तपस्विनामेतत्कृपयानुग्रहादिह । मानुषीभूय सर्वेषां भक्तानां भक्तवत्सलः।।23।। ध्यानमात्रेण देवेशि महापातकनाशकृत्। कृतेन स्मरणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः।।24।। मनुष्यों की कालगणना के अनुसार चिरकाल तक भगवान् को पाने के लिए, उन्हें मानवाकार में देखने और सखा की तरह उनके साथ व्यवहार करने के लिए, उन्हें सभी विद्या पढ़ाने के लिए तथा उनके साथ युद्ध भी करने के लिए, कुछ कायर भगवान् विष्णु के शत्रु राक्षस बनकर आक्रोश के साथ तप करने लगे। वे केवल दूध पीकर सागर के उस पार ही सेवा करने लगे। हे चंचल आँखोंवाली पार्वती! ऐसे किसी ऐरे-गैरे की तपस्या तो स्मरण नहीं की जा सकती है, किन्तु ये देव भी क्या करेंगे? इस दारुण तपस्या को देखकर कृपापूर्वक अनुग्रह कर इस संसार में मनुष्य होकर वे सभी भक्तों के लिए भक्तवत्सल भगवान् बने। हे देवी! भगवान् तो केवल स्मरण करने से हीं महान् पापों का नाश करते हैं और कर्म और स्मरण दोनों करने से तो कोटि कोटि हत्याओं के भी महापाप का निवारण करते हैं। रामरामेति रामेति ये वदन्त्यपि पापिनः। पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा।।25।।
- घ. दो चरण अनुपलब्ध। 2. घ. केचिद्रोषीषु तेपिरे।
(14) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————— जो पापी राम, राम, राम इस प्रकार उच्चारण करते हैं उन्हें भगवान् करोड़ों पापों से उद्धार करते हैं, यह निष्फल नहीं होता है। उग्रेण तपसा तेषां सोऽभूदेवं दयानिधिः। यतो वाचो निवर्त्तन्ते मनोभिः सह योगिनाम्।।26।। भागधेयेन सर्वेषां स प्रत्यक्षमजायत। अहोभाग्यातिरेकेण मनुष्योऽपि व्यवहरत्।।27।। तपो ददाति सौभाग्यं तपो विद्यां प्रयच्छति। तपसा दुर्लभं कञ्चिन्नास्ति भामिनि देहिनाम्।।28।। उनकी उग्र तपस्या से वे पृथ्वी पर इस प्रकार उत्पन्न हुए। योगियों के मन के साथ वाणी भी जहाँ जाकर लौट जाती है, वे परब्रह्म परमेश्वर सबके भाग्य से प्रत्यक्ष अवतरित हुए। भक्तों के अहोभाग्य में वृद्धि होने से मनुष्य ने भी उनके साथ देवता जैसा व्यवहार किया। हे देवी! पार्वती! तपस्या से सौभाग्य और विद्या की प्राप्ति होती है। मनुष्यों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तपस्या से नहीं मिले। अवाप्तसर्वकामोऽयं वाङ्मनोऽगोचरो विभुः। मनुष्य इव मानुष्यमाधाय भुवि मोदते।।29।। अहो कृपातिरेकेण सर्वत्र समुपैति वै। एतस्मादपि किं लाभादधिकं गजगामिनि।।30।। तपो धनं तपो भाग्यं तपः सर्वत्र सर्वदम्। अतस्तपस्विनां देवि दासत्वमपि दुर्लभम्।।31।। सभी प्रकार की कामनाओं को प्राप्त कर लेनेवाले ये प्रभु, जो वाणी और मन से भी अप्रत्यक्ष हैं, वे मानव का रूप धारण कर मनुष्य के समान इस संसार में प्रसन्न हैं। अहोभाग्य है कि अत्यधिक कृपा करने के कारण वे सभी जगह पहुँच जाते हैं। हे गजगामिनी पार्वती! इससे अधिक लाभ और क्या हो सकता है? अतः हे देवि! तपस्या धन है, तप ही भाग्य है, तप से ही हर स्थानों पर सब कुछ प्राप्त हो जाते हैं। अतः हे देवी पार्वती! जो तपस्या करते हैं, उनके लिए दासता दुर्लभ है; क्योंकि तपस्वी देवस्वरूप हो जाते हैं। इत्यगस्त्यसंहितायां रामावतारोपक्रमम् नाम तृतीयोऽध्यायः।।
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चतुर्थोऽध्यायः (15) अथ चतुर्थोऽध्यायः पार्वत्युवाच योगीन्द्रं वन्द्यचरणद्वन्द्वानन्दैकलक्षण। कथमेनमुपास्त्यैव मुक्तिं सर्वेऽपि भेजिरे।।1।। तदेतद् ब्रूहि देवेश यद्यस्ति करुणा मयि। पार्वती बोलीं- हे देवेश! आपके चरणकमल की वन्दना सभी करते हैं और आप एकमात्र आनन्दस्वरूप हैं। यदि मेरे ऊपर करुणा हो, तो कृपा कर यह बतलाइये कि योगियों के राजा श्रीराम की कैसी उपासना कर सब लोगों ने मुक्ति पायी थी। ईश्वर उवाच हैरण्यगर्भसिद्धान्तरहस्यमनघे शृणु।।2।। यज्ज्ञात्वा मुच्यते मोहाद् दौर्भाग्यव्याधिसाध्वसात्। भद्रे तदभिधास्यामि तत्सारग्राहिणी भव।।3।। भगवान् शिव ने कहा- हे निष्कलुष देवि! हिरण्यगर्भ भगवान् विष्णु का जो सिद्धान्त है, उसका रहस्य सुनो। इसे जानकर दुर्भाग्य और व्याधियों को मिटाते हुए लोग संसार के मोह का भी त्याग कर देते हैं। हे भद्रे! मैं वह रहस्य बतला रहा हूँ; उसके मूलतत्त्व को ग्रहण करो। पूर्वं ब्रह्मा तपस्तेपे कल्पकोटिशतत्रयम्। मुनीन्द्रैर्बहुभिः सार्द्धं दुर्द्धर्षानशनव्रतम्।।4।। प्राचीन काल में ब्रह्मा ने तीन सौ करोड़ वर्ष तक निराहार रहकर बहुत सारे मुनिश्रेष्ठ के साथ तपस्या की। पुरस्कृत्याग्निमध्यस्थस्तदाराधनतत्परः । आदरातिशयेनास्य नैरन्तर्येर्चनादिना।।5।। अग्नि के मध्य में रहकर और विष्णु को समक्ष में रखकर आदरपूर्वक लगातार पूजा-अर्चना करते हुए वे आराधना करते रहे। चिराय देवदेवोऽपि प्रत्यक्षमभवत्तदा। किञ्च पुण्यातिरेकेण सर्वेषां तस्य च प्रिये।।6।।
(16) अगस्त्य-संहिता बहुत दिनों के बाद पुण्य की वृद्धि के कारण ब्रह्मा तथा अन्य सभी मुनियों के सामने देवों के स्वामी भगवान् विष्णु प्रकट हुए। नवनीलाम्बुदश्यामः सर्वाभरणभूषितः। शङ्खचक्रगदापद्मजटामुकुटशोभितः ।।7।। भगवान् नवीन एवं नीले मेघ के समान श्यामल वर्ण के थे, उनके शरीर पर सभी गहने शोभित हो रहे थे तथा शंख, चक्र गदा, कमल, जटा और मुकुट से वे सुशोभित थे। किरीटहारकेयूररत्नकुण्डलमण्डितः । संतप्तकाञ्चनप्रख्यपीतवासोयुगावृतः ।।8।। मुकुट, हार, बाजूबन्द, रत्न के कुण्डल से वे विभूषित थे और तपे हुए सोने के समान पीले रंग के जोड़े वस्त्र उनके शरीर पर थे। तेजोमयः सोमसूर्य्यविद्युदुल्काग्निकोटयः । मिलित्वाविर्भवन्तीव प्रादुरासीत्पुरः प्रभुः ।।9।। भगवान् इस प्रकार सामने प्रकट हुए जैसे करोड़ों चन्द्रमा, सूर्य, बिजली, उल्का और अग्नि एक साथ मिलकर प्रकट हुए हों। स्तम्भीभूय तदा ब्रह्मा क्षणं तस्थौ विमोहितः । तुष्टाव मुनिभिः सार्द्धं प्रणम्य च पुनः पुनः।। 10।। कुछ देर तक तो ब्रह्मा घबराकर खम्भे की तरह ठिठक गये। पुनः मुनियों के साथ बार बार उन्हें प्रणाम कर स्तुति करने लगे। धन्योऽस्मि कृतकृत्योस्मि कृतार्थोस्मीह बन्धुभिः। प्रसन्नोऽसीह भगवन् जीवितं सफलं मम ।।11।। हे भगवन्! आज मैं अपने बन्धुओं के साथ धन्य हो गया; आज मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये। हे भगवन्! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं, इससे मेरा जीवन सफल हो गया। कथं स्तोष्यामि देवेश भगवन्निति चिन्तयन्। ऋग्यजुःसामवेदैश्च शास्त्रैर्बहुभिरादरात् ।।12।। साङ्गैर्मन्वादिभिर्धर्मप्रतिपादनतत्परैः । तुष्टावेश्वरमभ्यर्च्य सन्तुष्टो मुनिभिः सह।।13।। Rarest Archiver
चतुर्थोऽध्यायः (17) 'हे देवेश! मैं कैसे आपकी स्तुति करूँगा' यह सोचते हुए मुनियों के साथ सन्तुष्ट होकर ब्रह्मा ने वेदांग सहित ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अन्य अनेक शास्त्र, मनुस्मृति आदि धर्म को बखानने वाले शास्त्रों से भगवान् की अर्चना कर उनकी स्तुति की- त्वमेव विश्वतश्चक्षुर्विश्वतोमुख उच्यसे। विश्वतोबाहुरेकः सन् विश्वतः स्यात्तथा परः।।14।। जनयन् भूर्भुवर्लोकौ स्वर्लोकं सर्वशासकः। अक्षिभ्यामपि बाहुभ्यां कर्णाभ्यां भुवनत्रयम् ।।15।। पद्भ्यां च नासिकाभ्यां¹ च सर्वं सर्वत्र पश्यसि। समाधत्से शृणोष्येतत् सर्वं गच्छसि सर्वकृत्।।16।। जिघ्रस्येवं न ते किञ्चिदविज्ञातं प्रभोस्त्विह। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्वमेव ननु केशवः।।17।। सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। पृथिव्यप्तेजसां रूपं मरुदाकाशयोरपि।।18।। कार्यं कर्ता कृतिर्देव कारणं केवलं परम्। अणोरणीयान् महतो महीयान् मध्यतः स्वयंम्।।19।। मध्योऽसि निर्विकल्पोऽसि कस्त्वं देवावगच्छति। हे भगवन्! आपके नेत्र सभी दिशाओं में हैं; आपके मुख भी सभी दिशाओं में हैं तथा आपकी बाहें भी सभी ओर फैली हुई हैं, फिर भी आप संसार से परे हैं। आप दोनों आँखों, बाहुओं और कानों, पैरों और नासिकाओं से भूलोक, भुवर्लोक, और स्वर्गलोक इन तीनों को उत्पन्न कर सब पर शासन करते हैं, सभी जगहों पर सब कुछ देखते-सूँघते हैं; सब कुछ सुनकर उनका समाधान करते हैं और सारे कार्य करते हैं। हे प्रभो! ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे आप जानते न हों। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं तथा केशव भी आप ही हैं। पुरुष रूप में आपके हजारों शिर हैं, हजारों नेत्र हैं तथा हजारों पैर हैं। हे देव!, पृथ्वी, जल, अग्नि के तथा मरुत् और आकाश स्वरूप आप हैं। आप ही करने योग्य, करनेवाले, किये गये पदार्थ तथा क्रिया के परम साधन भी आप ही हैं। हे देव! आप अणु से भी सूक्ष्म और महत् से भी महान् हैं और उनके बीच में भी आप ही हैं; आपका विकल्प कोई नहीं है; आपको भला कौन जान सकता है?'
- घ. पादाभ्यां नासिकाभ्यां च।