श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५
सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५
शिखाबंधनमोक्षार्थं शबरी भवबंधनात् । कृता मुक्ता तु रामेण जलस्पर्शनहेतवे ॥१८८॥
नेत्रयोर्निहतो वाली दत्तं तद्रुधिरं तदा । काथिलंकार्युरी दग्धा कुंभकर्णस्तथौदनः । १८९॥
पक्वान्नमिंद्रजिज् ज्ञेयः शाकार्थं राक्षसा हताः । वरान्नं सारणो ज्ञेयः प्रहस्तो वटकः स्मृतः ॥१९०॥
निकुंभः पर्पटो ज्ञेयः कुंभस्तु लवणं स्मृतः । पायसार्थं कालनेमिस्त्वतिकायः स शर्करः ॥१९१॥
क्षीरमैरावणो ज्ञेयो घृतं मैरावणः स्मृतः । दध्योदनः समाम्नौ तु आहवे च स रावणः ॥१९२॥
हत्वा निवेदितः पात्रे तस्य कालानलस्य च । उच्छिष्टवलिमत्यागः केशत्वक्थिक्षसादिनाम् ॥१९३॥
संत्यागोऽत्र रणे ज्ञेयस्तदा तृप्तो बभूव सः । ततो रणाध्वरस्यात्र राघवेण विसर्जनम् ॥१९४॥
अयोध्यायां प्रवेशो हि कृतस्तन्मे वदाम्यहम् । अध्वरावभृथस्नानं ज्ञेयं राज्याभिषेचनम् ॥१९५॥
मंगलानि समस्तानि यज्ञांगविहितानि हि । ज्ञातव्यानीति रामेण रणयागो विसर्जितः ॥१९६॥
एवं प्रोक्तो मया देवि रणयागः सविस्तरः । रामोऽथ परमारमापि कार्याध्यक्षोऽतिनिर्मलः॥१९७॥
कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा । स्वाऽनन्देनापि संतुष्टो लोकानामुपदेशकत् । १९८॥
चकार विविधान् धर्मान् गार्हस्थ्यमनुलंघ्य च । न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥१९९॥
न व्याधिजं भय चासीद्रामे राज्यं प्रशासति । औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत् प्रजाः ॥२००॥
सीतया बन्धुभिः सार्द्धं साकेते सुखमाप सः । इदं युद्धचरित्रं ते प्रोक्तं देवि मया तव ॥२०१॥
इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानंदरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
युद्धचरिते रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
तृप्तियं दी ॥ १८७॥ जिसकी गाँठ खोलनेके जगह रामने शबरीको संसारबन्धनसे छुड़ाकर मुक्त कर दिया । रामने बालीको मारकर उसके रुधिररूपी जलसे नेत्रोंमें स्पर्श किया । लंकाको जलाकर कालानलके लिये दाल तथा कढ़ी बनायी । अर्थात् लंका दाल-कढ़ीके स्थानमे गिनी गयी । कुम्भकर्णरूपी भात, मेघनादरूपो पक्वान और सब राक्षसोंका शाक बना । अन्य उत्तम पदार्थोंके स्थानपर सारण मारा गया । प्रहस्त बड़ा, निकुम्भ पापड़, कुम्भ नमक, कालनेमि खीर, अतिकाय शक्कर, ऐरावणरूपी दूधमे मैरावणरूपी घी तथा दधिभक्तके स्थानपर रावणको मारकर रामने कालानलके पात्रमें परोस दिया । कालानलने इन सबका भोजन करके केश, चर्म तथा अस्थियोंका जूठन रणमे छोड़ दिया । तब वह तृप्त हुआ । उसके पश्चात् रामका अयोध्यामें प्रवेश करना ही रणरूपी यज्ञकी समाप्ति अर्थात् रणयज्ञका विसर्जन हुआ । यहाँ रामका राज्याभिषेक ही यज्ञके अन्तका अवभृथस्नान था ॥ १८८–१९५ ॥ अन्यान्य मांगलिक कार्य उस यज्ञके अंग थे । इस प्रकार रामने सांगोपांग रणयज्ञ पूरा किया ॥ १९६ ॥ हे देवि ! मैने तुमको उपर्युक्त प्रकारसे समस्त रणयाग कह सुनाया । तदनंतर साक्षात् परमात्मा, कार्यसमुदायके अधिष्ठाता, कर्तृत्वादि अभिमानसे रहित, सदा निर्विकार स्वरूप, निज आनन्दसे ही संतुष्ट तथा सब प्राणियोंको सदुपदेश देनेवाले राम भी गृहस्थधर्मका पालन करते हुए अनेक धर्मोका आचरण करने लगे । उनके राज्यकालमें कोई भी स्त्री विधवा होकर रोती नहीं थी । किसोको साँप तथा व्याघ्र आदिका भय नहीं था और न किसीको रोगका ही भय था। रामने भी समस्त प्रजाको, पिता जिस प्रकार अपने सगे लड़कोंका पालन करता है, उसी प्रकार पालन किया । हे देवि ! यह मैंने तुमको रामका युद्धचरित्र कह सुनाया ॥ १९७–२०१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकांडे युद्धचरित्रे रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
१४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
त्रयोदशः सर्गः ( अगस्त्य-रामसंवाद )
श्रीशिव उवाच
एकदा राघवं द्रष्टुं मुनिभिः कुम्भसम्भवः। ययौ रामेण सन्मानमानितः स उपाविशत् ॥ १ ॥ उपविष्टाः प्रहृष्टाश्च मुनयो रामपूजिताः। संसृष्टकुशलाः सर्वे रामं कुशलमब्रुवन् ॥ २ ॥ कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनंदन। दिष्ट्येदानीं प्रपश्यामो हतशत्रुमरिंदम ॥ ३ ॥ दिष्ट्या त्वया हताः सर्वे मेघनादादयोऽसुराः। हन्वा रक्षोगणान्सर्वान् कृतकृत्योऽद्य जीवसि ॥ ४ ॥ इति तेषां वचः श्रुत्वा रामस्तानाह सुस्मितः। किमर्थमादौ युष्माभिर्मेघनादोऽद्य कीर्तितः ॥ ५ ॥ इति रामवचः श्रुत्वाऽगस्तिस्तैस्त्ववलोकितः। कुंभयोनिस्तदा रामं प्रीत्या वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ शृणु राम यथा वृत्तं मेघनादस्य चेष्टितम्। जन्मकर्मवरप्राप्तिं संक्षेपादद्वदतो मम ॥ ७ ॥ पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः। तृणबिंदुसुतायां स पुत्रं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ८ ॥ निर्ममे विश्रवा नामधेयं वेदनिधिं शुभम्। भरद्वाजसुतायां च विश्रवा निर्ममे सुतम् ॥ ९ ॥ श्रेष्ठं वैश्रवणं तस्मै प्रमन्नोऽभूद्विधिश्विरात्। विधिर्वैश्रवणायोध तुष्टस्तन्पमसा ददौ ॥१०॥ मनोज्ञमभिलषितं यानं धनेशत्वमखंडितम्। पुष्पकं चाप्येकदाऽसौ द्रष्टुं विश्रवसं ययौ ॥११॥ पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता। नत्वा तातं तदा प्राह न स्थानं ब्रह्मणा मम ॥१२॥ दत्तं स्थेयं मया कुत्र तद्विचार्य वदस्व माम्। विश्रवा अपि तं प्राह विश्वकर्मविनिर्मिता ॥१३॥ लंकानाम्नी पुरी श्रेष्ठा सागरेऽस्ति सुमंडिता। त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्तं रसातलम् ॥१४॥ सुयं त्वं वस तस्यां हि तथेत्युक्त्वा धनेश्वरः। गत्वा तस्यां चिरं कालमुवास पितृसम्मतः ॥१५॥
श्रीशिवजी बोले- हे प्रिये ! एकदिन बहुतसे मुनियोंके साथ अगस्त्यमुनि श्रीरामका दर्शन करने आये । रामसे सम्मानित होकर वे सब बैठे ॥ १ ॥ अन्यान्य मुनि भी रामसे पूजित होकर प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये । रामके पूछनेपर सबने अपना कुशल क्षेम सुनाया ॥ २ ॥ और कहा- हे रघुनन्दन ! बड़े हर्षकी बात है कि शत्रुको मारकर सकुशल आपको हम लोग राज्यसिंहासनपर विराजमान देख रहे हैं। हे अरिन्दम (शत्रुओं-को संता दिखलानेवाले)! आपने बड़े भाग्यसे मेघनाद आदि सब असुरोंको मार गिराया है। उन्हें मार तथा कृतकार्य होकर आप विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनका ऐसा वचन सुनकर राम कुछ मुसकराते हुए बोले-आपलोगोंने सब राक्षसोंमसे मेघनादका नाम पहले क्यों लिया ? रामका यह प्रश्न सुनकर वे सब मुनि अगस्त्य मुनिका मुख देखने लगे। यह देखकर अगस्त्य बहुत प्रेमपूर्वक रामसे बोले - ॥ ५ ॥ ६ ॥ हे राम ! मैं आपसे मेघनादका चरित्र, जन्म, कर्म तथा वरप्राप्तिका वृत्तान्त संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें ॥ ७ ॥ हे राम ! सत्ययुगमें पुलस्त्य नामके ब्रह्मपुत्रने तृणबिन्दुकि पुत्रीस तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध वेदवेत्ता विश्रवा नामका पुत्र उत्पन्न किया। विश्रवाने भारद्वाजकी पुत्रीसे वैश्रवण नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया कुछ दिनोंके बाद वैश्रवणकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माने उसको उसका मनोवांछित पुष्पक विमान, अखण्ड धनेशत्व तथा कुबेरकी पदवी प्रदान की। एक दिन ब्रह्माके दिये हुए उस सुन्दर पुष्पक विमानपर सवार होकर धनाधिप कुबर अपने पिता विश्रवाका दर्शन करने गये। वहाँ जाकर कुबेरने पिताको नमस्कार करके कहा- हे पिताजी ! ब्रह्माने मुझे निवासके लिये कोई स्थान नहीं दिया है। अतः आप विचार करके कोई मेरे रहने योग्य स्थान बताइए। विश्रवाने कहा-विश्वकर्माकी बनायी हुई एक सुन्दर और श्रेष्ठ लंका नामकी नगरी समुद्रके बीचमें विद्यमान है। विष्णुके डरसे दैत्य लोग उसे छोड़कर पातालमें चले गये हैं ॥ ८-१४ ॥ तुम जाकर उसमें सुखपूर्वक निवास करो। 'तथास्तु' कहकर कुबर पिताके कथनानुसार जाकर बहुत काल
सर्गः १३] सारकाण्डम् १४७
कस्मिश्चिच्च काले हि सुमालीनाम राक्षसः । दुहित्रा व्यचरद्भूमा पुण्यकेतुं ददर्श सः ॥१६॥
हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः । कैकसीं तनयामाह गच्छ विश्रवसं मुनिम् ॥१७॥
वरयस्व मुनेस्तेजःप्रतापात्ते सुताः शुभाः । भविष्यन्ति धनाध्यक्षतुल्या नो हितकारिणः ॥१८॥
सा संध्यायां ययौ शीघ्रं मुनेरग्रे व्यवस्थिता । लिखन्ती भुवि पादाङ्गुष्ठेन चाधोमुखी स्थिता ॥१९॥
तामपृच्छन्मुनिः का त्वं साऽऽह त्वं वेत्तुमर्हसि । ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ॥२०॥
ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्ससि । दारुणायां तु वेलायामागताऽसि सुमध्यमे ॥२१॥
अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ संभविष्यतः । साऽब्रवीन्मुनिशार्दूलं त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ॥२२॥
तामाहान्तिमजो यस्ते भविष्यति महामतिः । ततः सा सुषुवे पुत्रान् यथाकाले सुमध्यमा ॥२३॥
रावणं कुम्भकर्णं च क्रौंचीं शूर्पणखां शुभाम् । कुंभीनसीं कनीयांसं तृतीयं न विभीषणम् ॥२४॥
रावणः कुम्भकर्णश्च त्रयो दुहितरस्तथा । दुर्वृत्ताः प्राणिघ्नाश्चैव बभूवुर्मुनिहिंसकाः ॥२५॥
एकदा रावणो मात्रा लिङ्गार्थे प्रेषितः शिवम् । कर्तुं प्रसन्नमगमत् कैलासं कर्म दुष्करम् ॥२६॥
किञ्चित्स्वीयं शिरश्छित्त्वा वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । कृत्वा पीठं हि देहस्य तन्मूलं शिरसस्तथा ॥२७॥
तदग्रं पादयोः कृत्वा शंकूनांगुलिमस्तथा । तन्त्रीः कृत्वाऽन्त्रमालाभिः क्षतशोध्य सहस्रशः ॥२८॥
एवं कृत्वा स्वदेहस्य वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । चकार स्वमुखेनैव गांधर्वं गायन शुभम् ॥२९॥
तदा नंदीश्वरं प्राह शङ्करो लोकशङ्करः । शिरः संधाय हस्तेन त्वया वाच्योऽयं रावणः ॥३०॥
आत्मलिंगं राक्षसं त्वां शङ्करो न प्रदास्यति । हृद्गतं हि मया ज्ञातं शंभोस्त्वं याहि स्वस्थलम् ॥३१॥
इत्युक्त्वा प्रेषणीयोऽयं स रावणः स्वस्थलं यथा । इति शंभोर्वचः श्रुत्वा ययौ नंदी स रावणम् ॥३२॥
तक वहाँ रहे ॥ १५॥ पश्चात् किसी समय सुमाली राक्षसने अपनी पुत्रीको साथ लेकर पृथ्वीपर भ्रमण करते समय पुण्यकेतुको देखा । १६ । तब महात्मा सुमालीने राक्षसोंका हित सोचकर अपनी लड़की कैकसीसे कहा कि तुम विश्रवा मुनिके पास जाकर मुनिके तेज-प्रतापसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्तिके लिये वर माँगो । वे पुत्र कुबेरके समान प्रतापी तथा हमलोगोंके हितकारी होंगे । १७॥ १८॥ तदनुसार सायंकालके समय मुनिके पास जाकर पाँवके अङ्गुठेसे धरतीको कुरेदती हुई वह नीचा मुख करके खड़ी हो गयी ॥ १९ ॥ मुनिने उससे पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा कि आप स्वयं इस बातको समझ सकते हैं। तब मुनिने ध्यान करके सब कुछ जान लिया और उससे बोले— ॥ २० ॥ मुझे मालूम हो गया कि मुझसे तू पुत्र पाना चाहती है, परन्तु हे सुमध्यमे ! तू इस भयानक समयमें यहाँ आयी है। इसलिये तुझसे दो भयानक राक्षस पुत्र उत्पन्न होंगे। तब वह मुनिशार्दूलसे बोली—हे महाराज ! क्या आपसे भी मुझे ऐसे ही पुत्र प्राप्त होंगे ? ॥ २१ ॥ २२ ॥ तब मुनि बोले—अच्छा जा, तेरा आखिरी पुत्र बड़ा बुद्धिमान होगा। पश्चात् उस सुन्दर कमरवाली कैकसीने यथासमय तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ २३ ॥ रावण कुम्भकर्ण, क्रौंची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी और सबसे छोटा तीसरा पुत्र विभीषण उससे उत्पन्न हुआ ॥ २४ ॥ उनमेंसे रावण, कुम्भकर्ण और तीन लड़कियें बड़ी दुराचारिणी, जीवघातिनी तथा मुनिहिंसक हुई । २५ ॥ एक दिन रावणको माता कैकसीने रावणको शिवजीके पास लिङ्ग लेने भेजा । कैलासपर जाकर रावणने शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये बड़ा दुष्कर काम किया । २६ । उसने अपने सिरका कुछ भाग काटकर वीणा बनायी । सिरसे वीणाका मूलभाग बनाकर अपनी देहसे उसका पृष्ठभाग तैयार किया पाँवोंसे उस वीणाका अग्रभाग बनाया और अँगुलियोंसे वीणाकी खूँटियें तैयार कीं। अपने पेटके भीतरकी आँतोंसे सैकड़ों एवं हजारों तार बनाकर अपने शरीरसे ही वीणा रची । पश्चात् षड्ज आदि स्वरोंसे रावणने अपने मुखसे ही गंधर्वके समान सुन्दर गायन आरम्भ किया ॥ २७-२९॥ तब लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर नन्दीश्वरसे बोले कि तुम अपने हाथसे रावणका सिर संधान करके उससे कहो कि शंकरजी तुम जैसे राक्षसको आत्मलिङ्ग कभी न देंगे । मैं शिवजीके हृदयकी बात जानता हूँ।
| १६८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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शिरः संयोज्य हस्तेन शिवोक्तं तं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि समतिक्रम्य तां निशाम् ॥३३॥ चकार पूर्ववद्गानं द्वितीयदिवसे पुनः । नन्दिना शंकरश्चापि पूर्ववत्तं न्यवेदयत् ॥३४॥ इत्थं दश दिनान्येव गतानि रावणस्य च । अथ तत्कर्मणा तुष्टः शङ्करो गायनेन च ॥३५॥ भूत्वा प्रसन्नस्तं प्राह वरं वरय चेति वै । दृष्ट्वा शंभुं रावणोऽपि शिरासा तेन संधितः ॥३६॥ वरयामास मन्मात्रे ह्यात्मलिंगं तथा मम । पत्न्यर्थं पार्वतीं देहि तथेत्युक्त्वा ददौ शिवः ॥३७॥ गृहीत्वा गंतुकामं तं पुनः प्राह हरस्तदा । मतोपार्थं त्वया वीर दशवारं निजं शिरः ॥३८॥ खङ्गेन छेदितं यस्मात्तस्मात्तेऽद्य शिरांसि हि । दश विंशद्भुजाश्चापि भविष्यन्ति गिरो मम ॥३९॥ ततः स रावणस्तुष्टो गिरिर्जालिंगमभ्युतः । विंशद्भुजो दशग्रीवः सम्प्रत्थ गन्तुमुद्यतः ॥४०॥ कल्पभेदाच्छतशिराः शतवारं प्रमादितैः । स प्रोक्तः स्वशिरोभिर्हि शतद्वयभुजः कचित् ॥४१॥ तस्माद्धि हृतवान् विष्णुस्त्वं तं मार्ग प्रतार्य च । तयोश्चाधस्तटे लिंगं गोकर्णं रावणात्तथा ॥४२॥ गृहीत्वा स्थापितं पूर्वं रावणोऽपि गृहं ययौ । मंदोदरीं हरैर्वोक्त्यल्लभ्वा मयसुतां शुभाम् ॥४३॥ मातुः कार्यमसंपाद्य तूष्णीमेवातिलज्जितः । मन्दोदर्याऽभवन्स्वीयं विवाहं चोपपूरितः ॥४४॥ दृष्ट्वोदा धनाध्यक्षं पुष्पकस्थं तु कैकसी । पुत्रान् धिक्कारयामास यूयं पढा मृतोपमाः ॥४५॥ मापत्न्याश्चैषु ये दृष्ट्वा जायते नात्र लज्जिताः । ते मातृवचनं श्रुत्वा ययुर्गोकर्णमुत्तमम् ॥४६॥ दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्तपः । विभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः ॥४७॥
'भलिए तुम अपने स्थानको वापस चले जाओ' ॥ ३०, ३१ ॥ ऐसा कहकर उसको उनके स्थानपर भेज दा, नन्दीश्वर शिवका यह बचन सुनकर रावणके पास गये । ३२ ॥ उन्होंने अपने हाथसे उसका सिर धड़से जोड़कर शिवका वचन उसको कह सुनाया। रावण यह सुनकर भी उस रातको वहीं रहा और दूसरे दिन फिर उसी विधिसे शिवजीका गुणगान करने लगा । शिवजीने उस दिन भी अपना संदेश नन्दीके द्वारा रावण का कहल भेजा । परन्तु रावणने फिर भी अपना गायन उसी प्रकार दस दिनतक जारी रक्खा । तब शंकरजी उस उम्र भयानक कर्म तथा मनोहर गायनसे प्रसन्न हो गये और उससे कहा-वर मांगो । ऐसा कहकर शिवजी ने उसका वह सिर भी धड़से जोड दिया, तब उसने शंभुसे वर माँगा कि आप मेरा माताके लिए आत्म- लिंग तथा पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती जीको दे दें जिये । 'तथाऽस्तु' कहकर शिवजीने उसको वे दोनों चीजें दे दीं । ३३-३७ ॥ जब उनकों लेकर रावण चलने लगा, उस समय शिवजी कहने लगे-हे वीर ! तुमने मुझको प्रसन्न करनेके लिये अपना सिर दस बार तलवारसे काटा है। इसलिए मेरे कथनानुसार तुम्हारे दस मिर तथा बीस भुजायें हो जायेंगी ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ तब रावण प्रसन्नतापूर्वक दस सिर और बीस हाथवाला बनकर पार्वती तथा शिवलिंग लेकर अपने स्थानकी ओर चला ॥ ४० ॥ कहीं-कहीं कल्पभेदसे रावण सौ बार मस्तक काटनेसे सौ सिर तथा दो सौ हाथोंवाला भी कहा गया है । ४१ ॥ बादमें रास्तेसे ही विष्णुभगवान् रावणके हाथसे तुमको (पार्वतीको) छीन ले गये । तब तुम (पार्वती) भी श्रीहरिको धोखा देकर उनसे अदृश्य हो गयीं । विष्णुकी तरह तुमने रावणके हाथसे शिवलिंग भी छीन लिया और उस लिंगको समुद्रके किनारेपर ही गोकर्ण नामसे स्थापित कर दिया। तब रावण खाली हाथ लौट गया और विष्णुके कथनानुसार मय राक्षसकी सुन्दरी पुत्री मन्दोदरी उसको प्राप्त हुई ॥४२॥४३॥ माताके कार्यका सम्पादन न कर सकनेके कारण वह बहुत लज्जित हुआ और कुछ भी नहीं कह सका । पश्चात् मन्दोदरीके साथ विवाह करके वह सन्तुष्ट हुआ ॥ ४४ ॥ एक समय उसकी माता कैकसी धनपति कुबेरको पुष्पक विमानपर बैठा देखकर अपने पुत्रोको धिक्कार- कर कहने लगी कि तुम लोग नपुंसक तथा मृतक सदृश हो ॥ ४५ ॥ अपने सोतेले भाईका उत्कर्ष देखकर तुम लोगोंको लज्जा नहीं आती' माताके इस कटु वचनको सुनकर वे तीनो भाई पूजनीय गोकर्ण महादेवके पास गये ॥ ४६ ॥ वहाँ कुम्भकर्णने दस हजार वर्ष तपस्या की। धर्मात्मा विभीषणने भी सत्यधर्मपरायण होकर
सर्गः १२ ]
सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४९
पंचवर्षसहस्राणि पादांगुष्ठेन तस्थिवान्। दिव्यवर्षसहस्रं तु धूमाह रो दशाननः ॥४८॥ पूर्णे वर्षसहस्रे स्वं शीर्षमग्नौ जुहाव सः। एवं वर्षसहस्राणि नव दशानिश्चक्रमुः॥४९॥ अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः। छेत्तुकामस्य धर्मात्मा प्रत्यक्षोऽभूत्प्रजापतिः॥५०॥ उवाच वचनं ब्रह्मा वरं वरय वांछितम्। ततोऽब्रवीद्दशास्यन्ममदत्त्वञ्च कुतोप्यहम्॥५१॥ सुपर्णनागयक्षेभ्यो देवेभ्यश्चासुरादपि। त्वत्तः शभोर्महाविष्णोर्मानुषा मे तृणोपमाः ॥५२॥ तथेत्युक्त्वा विधिस्तस्मै दश शीर्षाणि संददौ। विभीषणाय सद्बुद्धिममरत्वं ददौ मुदा ॥५३॥ विमोहितं सरस्वत्या देवेन्द्रपदकांक्षिणम्। कुंभकर्णं विधिः प्राह वरं वरय वांछितम् ॥५४॥ सोऽपि तं वरयामास निद्रां षण्मासिकीं शुभाम्। षण्मासीये चैकदिनेऽशनं ब्रह्माऽपि दत्तवान् ॥५५॥ ततोऽन्तर्धानमगमद्विधिस्तेऽपि गृहं ययुः। सुमाली वरलब्धांस्तान् ज्ञात्वा दौहित्रयन्मनान् ॥५६॥ पातालान्निर्गत्यः प्रायात्प्रहस्ताद्यैर्युतं सुखम्। मन्त्रिवाक्याद्दशग्रीवोऽपि निष्कास्य धनदं बलात्॥५७॥ लंकापुर्यां राक्षसँस्तु लंकाराज्यं चकार सः। धनदः पितुः पृष्ट्वा त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः ॥५८॥ गत्वा कैलासशिखरं तपसाऽतोषयच्छिवम्। तेन सख्यमनुप्राप्य तेनैव परिनोदितः ॥५९॥ अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा। दिक्पालत्वमनुप्राप्य शिवस्य वरदानतः ॥६०॥ रावणो विद्युज्जिह्वाय ददौ शूर्पणखां तदा। पारिबर्हं ददौ तस्मै दंडकारण्यमुत्तमम् ॥६१॥ मातृष्वसुः सुतान् यंश्च त्रिशिरःखरदूषणान्। सहायतार्थं ददौ तस्मै तन्क्रान्ते तु मृतेऽचिरात्॥६२॥ कुंभीनसीं ददौ हृष्टां मधुदैत्याय रावणः। ददौ मधुवनं तस्मै पारिबर्हमनुत्तमम् ॥६३॥ खड्गजिह्वाय तां क्रौंचीं ददौ प्रेम्णा दशाननः। पटलङ्कां पारिबर्हे ददौ तस्यै मनोरमम् ॥६४॥
पावँके अंगूठेपर पाँच हजार वर्षतक खड़ा रहकर तप किया और दस हजार वर्षतक केवल धूम पीकर दशाननने तपस्या की ॥ ४३ ॥ ४८ । इस प्रकार वर्ष पूरे हो जानेपर वह अपना एक सिर काटकर अग्निमें होम देता था, ऐसा करते करते नौ हजार वर्ष बीत गये ॥ ४९ ॥ अब दस हजार वर्ष पूरे हुए और रावण अपना दसवाँ सिर काटकर आगमें हवन करनेके लिए तैयार हुआ, तब प्रजापति ब्रह्मा उसपर प्रसन्न हुए ॥ ५० ॥ ब्रह्माने कहा- हे वत्स ! तू अपना इच्छित वर माँग । तब रावणने कहा कि मैं गरुडय, सर्पाम यक्षांस, देवताओंसे, असुरोंसे आप (ब्रह्मा) से, शंभुसे तथा विष्णुसे भी अवध्यत्वका वर माँगता हूँ और मनुष्य तो मेरे लिए तिनकेके बराबर हैं ॥५१। ५२॥ तथास्तु कहकर ब्रह्मा ने रावणको दस सिर दिये और विभीषणको सुबुद्धि तथा अमरत्व दिया ॥ ५३ ॥ इन्द्रपदकी इच्छा रखनेवाले कुम्भकर्णसे ब्रह्माने कहा कि अपना अभिलषित वर माँगो ॥ ५४ ॥ तब सरस्वतीके द्वारा माहमें पडकर कुम्भकर्ण ने महान् तककी न द माँगा। तदनन्तर ब्रह्माने उसको छः महीनेतक सोना और फिर भोजन करना तथा छः महीनेतक फिर शयन का वर दिया ॥ ५५ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे लोग भी अपने घर चले गये। सुमाली अपने दौहित्रों को वर प्राप्त किए हुए जानकर प्रहस्त आदिके साथ पातालसे निकलकर निर्भय माध्यम पृथ्वीपर विचरने लगा सुमन्त्रीके कथनानुसार रावण लंकासे कुबेरको निकलवा दिया और वहाँ स्वयं राक्षसोंको लेकर लंकाका राज्य करने लगा। तब महान् यशस्वी कुबेरने अपने पिता से पूछकर लङ्काको छोड़ दिया और कैलासके शिखरपर जाकर तपश्र्चर्यासे शिवको प्रसन्न किया । उन्होंने उनसे मित्रता जोड़ी और उन्हें के कहनेसे वहाँ विश्वकर्मा द्वारा अलका पुरी बनवायी और शिवजीके वरदानसे दिक्पालकी पदवी प्राप्त की ॥ ५६-६०। बादमें रावणने अपनी शूर्पणखा नामकी बहिन विद्युज्जिह्वको ब्याह दी और उत्तम दण्डकारण्य उसको दहेजमें दे दिया ॥ ६१ ॥ थोडे ही दिनों बाद जब उसका पति मर गया । तब रावणने अपनी मौसीके लड़के त्रिशिरा खरदूषण आदिको उसकी सहायताके लिए भेजा ॥ ६२ । रावणने कुम्भीनसी नामकी बहिन मधु दैत्यको ब्याही तथा श्रेष्ठ मधुवन उसको दहेजमें दिया ॥ ६३ ॥ दशाननने अपनी क्रौंची नामकी बहिन खङ्गजिह्व राक्षसको
| १५० | आनन्दरामायणे | [सर्ग १३] |
|---|
वैरोचनस्य दौहित्रीं वृत्तज्वालेति विश्रुताम् । स्वयंदत्तां मुदोद्वाह कुम्भकर्णाय रावणः ॥६५॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः । विभीषणस्य भार्यार्थे सरमां स मुदाऽवहत् ॥६६॥
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् । जातमात्रस्तु यो नादं मेघवत्प्रचकार ह ॥६७॥
तः सर्वऽप्यदन्मेघनादोऽयमिति वै जनाः गुहायां कुम्भकर्णोऽपि निद्राव्याप्तो विनिद्रितः ॥६८॥
ततः स रावणश्चापि देवगन्धर्वकिन्नरान् हत्वा क्रोधोद्धतान्नागान् स्त्रियस्तेषामपाहरत् ॥६९॥
धनदोऽपि च तच्छ्रुत्वा रावणस्याक्रमं तदा । अधर्मं मा कुरुष्वेति दूतवाक्यैर्न्यवारयत् ॥७०॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जगाम धनदालयम् । विनिर्जित्य धनाध्यक्षं जहार तस्य पुष्पकम् ॥७१॥
अलकायां यदाऽऽसीन्मे सेनया रावणस्तदा निशायमेकदा भ्रातुः कुबेरस्य सुतेन हि ॥७२॥
प्रार्थिता सा पुरा रम्भा मकार नियतं दिनम् अज्ञानवृत्त्या वेगेन ययौ क्वानन्नुपुरस्वना ॥७३॥
रावणोऽपि च तां दृष्ट्वा बलादेव प्रभुक्तवान् चिगन्मुक्ताऽथ वृत्तं सा कीवेरं सन्यवेदयत् ॥७४॥
क्रुद्धः सोऽपि ददौ शापं रावणाय महात्मने । अवारभ्य दशास्यश्चे द्वेग्तां स्त्रियमूत्तमाम् । ७५।।
हठाद्भोक्ष्यति चेत्तर्हि क्षणमात्रान्मरिष्यति । इति शापं रावणोऽपि शुश्राव चरवाक्यतः ॥७६।
तदारभ्य स्त्रियं काममनिच्छन्तीं न धर्षयेत् ततो यमं च वरुणं निर्जित्य समरेऽसुरः ॥७७।
स्वर्गलोकयगात्तूर्ण देवराजजिघांसया । ततो रावणमभ्येत्य बबन्ध त्रिदशेश्वरः । ७८।।
तच्छ्रुत्वा सहसाऽऽगत्य मेघनादः प्रतापवान् । कृत्वा युद्ध महाघोरं जित्वा त्रिदशपुङ्गवम् । ७९।।
इन्द्रं धृत्वा दृढं बद्ध्वा मेघनादो महाबलः । मोचयित्वा स्वपितरं गृहीत्वेन्द्रं ययौ पुरीम् ॥८०॥
ब्रह्मा त मोचयामास देवेन्द्रं मेघनादतः । दत्त्वा वरान्त्राक्षसाय ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ॥८१॥
दी तथा उसको दहेज़में अविचल मनोहर पद्मलका पुरी दे दी । ६४ । वैरोचनकी दोहित्री (नतिनी) प्रसिद्ध वृत्तज्वालाका उसके पिताने कुम्भकर्णके लिये रावणका दंर ६५ । महात्मा गन्धर्वराज शैलूषकी सुता सरमाको रावण विभीषणके लिय ल आया ६६ ।। तदनन्तर मन्दोदरीसे मेघनाद पुत्र उत्पन्न हुआ। जो कि पैदा होनेके साथ हो मेघकी तरह गर्जन करने लगा था । ६७। इसीलिये सब लोग उसका मेघनाद कहने लगे । कुंभकर्ण गुफामें जाकर सो गया । ६८ । उधर रावण देव, गन्धर्व, किन्नर, ऋषीश्वर और नागोंको मार मारकर उनकी स्त्रियोंका अपहरण करने लगा ।। ६९ ।। जब कुबेरने रावणका इस प्रकार दुराचार सुना, तब उन्होंने अपने दूतों द्वारा कहला भेजा कि हे रावण ! तू ऐसा अधर्म करना छोड़ दे
७० ।। यह सुना ही रावण और भी क्रुद्ध होकर कुबेरके यहाँ गया तथा उनको जीतकर पुष्पक विमान छन लाया ।। ७१ ।। जब रावण अपनी सेनाके साथ अलकापुरीमें था । उसी समय रावणके भाई कुबेरके पुत्र नलकूबरकी प्रार्थना स्वीकार करके रम्भा अप्सरा युद्धके वातावरनको न जाननेके कारण एकाएक नियत दिनपर आकाशसे वहीं आ पहुँची । उसके पैरोंमें सुन्दर एवं मनोहर नूपुरकी ध्वनि हो रही थी । ७२ । रावणने उसको सहसा देखकर उसके साथ हठात् भोग किया । बहुत देरके बाद उससे मुक्त हो रम्भाने जाकर वह सब हाल कुबेरके पुत्रको कह सुनाया ॥ ७३ ।। तब क्रुद्ध नलकूबरने रावणको शाप देते हुए कहा--' हे दशास्य ! आजसे यदि तुम किसी भी तुमको न चाहनेवाली सती स्त्रीसे हठात् भोग करोगे तो उसी क्षण मर जाओगे ।' इस शापको दूतके मुखसे रावणने भी सुन लिया । ७४ ॥ ७५ ॥ तबसे रावणने अपनेसे विमुख स्त्रीका अपमान करना छोड़ दिया । तदनन्तर युद्धमे यमराज तथा वरुणको जीतकर वह देवराज इन्द्रको मारनेकी इच्छासे शीघ्र ही स्वर्ग गया । त्रिदशेश्वर इन्द्रने रावणके सामने जाकर उसको कैद कर लिया ।। ७६-७८ ।। पिताको कैद किया हुआ सुनकर प्रतापी मेघनाद शीघ्र वहीं आ पहुँचा तथा भयानक युद्ध करके इन्द्रको जीत लिया ।। ७९ ।। तब महाबलवान् मेघनादने अपने पिता-को छुड़ा लिया और इन्द्रको पकड़ तथा बांधकर अपने नगरमें ले आया ।। ८० ।। पश्चात् ब्रह्माने इन्द्रको
सर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५१
सर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५१
इन्द्रजिन्नाम तस्याभून्नराधिप शृणुष्व तत् । रावणादपि यश्चासीद्वलिष्ठः समरप्रियः ॥८२॥ मेघनादादयश्चेति तस्मान्प्रोक्तं तवाग्रतः । एतन्मुनीश्वरैः पूर्वं तन्निमित्त मयेरितम् ॥८३॥ रावणो विजयी लोकान्सर्वान् जित्वा क्रमेण तु । जित्वा वह्निं निरृतिं च वायुमीशं ययौ मुदा ॥८४॥ कैलासं तोलयामास बाहुभिः परिघोपमैः । तदा भीता शिवं देवी दोर्भ्यां सा परिषस्वजे ॥८५॥ शिवोऽपि वामपादाङ्गुष्ठेन कैलासमुद्धर्नि । भारं दत्त्वा गिरिं त्वेवं चकाराधः शनैः शनैः ॥८६॥ तदा तद्गिरिमग्नप्रबलिसन्धिषु दोर्लताः । विंशत्यपि रावणस्य न ता अगमन्बहिः क्षणात् ॥८७॥ स तेनाक्रन्दयामास स्तम्भसम्बद्धचोरवत् । तदा नन्दीश्वरेणापि शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः ॥८८॥ यच्चलं कर्म यस्यास्ते कपितुल्यमतोऽसुर । वानरैर्मानुषैश्चैव नाशं गच्छसि कोविदैः ॥८९॥ ततः कालान्तरेणाथ शम्भुनैव विमोचितः । शप्तोऽप्यगणयन्वाक्यं ययौ हैहयपत्तनम् ॥९०॥ बहिर्गतं नृपं श्रुत्वा सहस्रार्जुननामकम् । मध्याह्ने रावणश्चक्रे रेवायाँ शिवपूजनम् ॥९१॥ अधस्तस्मान्नर्मदायां भुजपार्यैश्च सेतुवत् । स्तम्भयामास नीरौघं जलक्रीडां गतोऽर्जुनः ॥९२॥ चेष्टितोऽयुतनारीभिस्तत्तोयं रावणं तदा । प्लावयामास ध्यानस्थं ज्ञातस्तत्कर्मचार्जुनः ॥९३॥ मुक्त्वा ध्यानादिकं सर्वं युद्धं चक्रेऽर्जुनेन सः । तेन बद्धो दशग्रीवः कण्ठे रन्तुं सुताय तम् ॥९४॥ ददौ दशाननं प्रीत्या काष्ठनिर्मितहस्तिवत् । कियत्कालान्तरेणैव पुलस्त्येन स मोचितः ॥९५॥ ततोऽतिबलमासाद्य जिघांसुर्हरिपुङ्गवम् । गतो ध्यानमपीनं पश्चाद्वां शनैर्ययौ ॥९६॥ धृतस्तेनैव कक्षेण वालिना दशकन्धरः । भ्रामयित्वा तु चतुरः समुद्रान् रावणं द्रुतं ॥९७॥
मेघनादसे छुड़ाया और राक्षसोंको वर देकर ब्रह्मा अपने भवनको चले गये ॥ ८१ ॥ हे रघूत्तम ! तबसे मेघनाद-का इन्द्रजित् नाम पड़ा । जोकि रावणसे भी अधिक बलवान् तथा युद्धन था ॥ ८२ ॥ इसलिये मैने आपके सामने मेघनादका पहिले नाम लिया । इस ऋषियोंने इसका कारण पहले ही बता दिया था ॥ ८३ ॥ विजयशील रावणने क्रमशः सब लोकोंको जीतकर वह्नि निर्ऋति, वायु तथा ईशानको जीत लिया और बादमें अपनी अर्गलाके समान भुजाओंसे कैलास पर्वतको उठाने लगा । उस समय डरकर पार्वती देवी शिवजी से लिपट गयी ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ पश्चात् शिवने अपने बायें पांवके अङ्गूठेसे उस पर्वतको दबा दिया । जिससे कैलास धीरे धीरे नीचे धंसने लगा ॥ ८६ ॥ उस समय पर्वतके नीचे आ जानेसे रावणकी बीसों भुजायें दब गयीं और वह खम्भेसे बँधे हुए चोरकी तरह चिल्लाने लगा । उस समय नन्दीश्वरने भी रावणको शाप देते हुए कहा- ॥ ८७ । ८८ ॥ हे असुर ! तुम्हारेसे बानरके समान चंचलता होनेके कारण युद्धवानोंगे तथा मनुष्योंसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी ॥ ८९ । बहुत कालके बाद शिवजीने उसे छुड़ा दिया । छूटनेके साथ ही वह शापको भूल गया और शिवजीके वचनका तिरस्कार करके युद्ध करनेके लिए हैहयराजके नगरको गया ॥ ९० । वहाँ जाकर पूछने तां ज्ञात हुआ कि सहस्रार्जुन नामवाला वहाँका राजा वहाँ उपस्थित नहीं है । तब रावण नर्मदा नदीके किनारे जाकर दसके बीचमें एक टापूपर बैठकर मध्याह्न समयम शिवजीका पूजन करने लगा । ९१ ॥ उससे नीचकी ओर राजा सहस्रार्जुन जलक्रीड़ा कर रहा था । उसने अपनी भुजारूपी सेतुसे खेल-खलम उस नदीके जलप्रवाहको रोक दिया । उस समय हजारों स्त्रियाँ उसे घेरकर जलक्रीड़ा कर रही थीं । परन्तु उस जलप्रवाहके रुक जानेसे शिवके ध्यानमे स्थित रावण जलमें बहने लगा । इस घटनाको देखकर उसने जान लिया कि यह काम सहस्रार्जुनका है । यह जानत ही वह तुरन्त ध्यान छोड़कर सहस्रार्जुनके पास गया और उनको युद्धके लिए ललकारने लगा । तब उसने रावणके गलेमें रस्सी डालकर बांध लिया और अपने पुत्रको खेलनेके लिए लकड़ीके बने हुए हाथीकी तरह दे दिया । कुछ दिनोंके बाद पुलस्त्य मुनिने जाकर उसको वहींस छुड़ाया ॥ ९२-९५ ॥ बादमें रावण बल संचय करके वानरश्रेष्ठ बालिको मारनेकी इच्छासे समुद्रके किनारे ध्यान धरकर बैठे हुए वानरराजके पास जाकर धीरेसे पीछे
१६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
किष्किन्धां स्वां ययौ वेगादग्रे दृष्ट्वांगदं शिशुम्। प्रीत्या तं चुंबनं दातुं दोर्भ्यां कण्ठे न्यवेशयत् ॥९८॥ तदा बाहोश्चलनात्काक्षाद्यः पतितो भुवि। तं दृष्ट्वा स्वजनान् स्वीय दर्शयामास वै मुदा ॥९९॥ प्रेङ्खस्योपरि पुत्रस्य बबन्धाधोमुखं चिरम्। आत्मानमाङ्कदमूत्रस्य धारामीशाननोऽसुरः। १००॥ स्वयमेव ततो बाली बहुकाले गते मयि। ददवाज्ञां दशान्याय तेन सख्यं चकार सः। १०१॥ रावणः स पुनः स्थित्वा पुष्पंके व्यचरत्सुखम्। पश्यन्नानाविधान्वीरान् ययौ पातालमुत्तमम्॥ १०२॥ तत्र दृष्ट्वा पुरं रम्यं बलेः कोटिरविप्रभम्। तत्तजसाहतेऽहस्तत्पुष्पकं न चचाल वै ॥१०३॥ ततः स्वयं ययौ तूर्णामक एव दशाननः। पुरं प्रविश्य तद्द्वारि त्वां ददर्श च वामनम् १०४॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं पीतकौशेयवासमम्। चतुर्भुजं सपतनीकं द्वाररक्षणतत्परम् ॥१०५॥ त्वां प्राह स दशग्रीवः कोऽत्र राजाऽस्ति मां वद। तूष्णीं स्थितो वामनस्त्वमपि नोत्तरं रिपोः। १०६॥ तदा त्वां बधिरं मन्वा स विवेश बलेर्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा बलिं पत्न्या सार्धं क्रीडनकण्डुकम् ॥१०७॥ तस्थौ तत्र भृशं तूष्णीं बलेर्लक्ष्मीं व्यलोकयत्। तावद्दूरे बलेर्हस्तात्क्रीडापासोऽपतद्भुवि ॥१०८॥ तमानेतुं रावणाय बलिराज्ञापयत्तदा। रावणोऽपि तमानेतुं ययौ पासांतिकं जवात्। १०९॥ प्रोच्चचाल भुवः पासं करेण न चचाल सः। विंशदोर्भिः क्रमेणायं यावत्पास प्रचालयत् ॥११०॥ तावदंगुलयः सर्वाः पासभारेण पीडिताः। न निष्क्रमुः पासतलाच्चूर्णिता रुधिराप्लुताः ॥१११॥ सदा चुक्रोश दीनं स विह्वल दशाननः। ततो विहस्य दास्या तं पायमानीय वै बलिः ॥११२॥ धिग्धिक्कृत्या रावणं तं गृहान्निष्क्रामयद्बहिः। ततो धृतो राजहंसस्तदुच्छिष्टैस्तु पोषितः ॥११३॥
की ओर जा खड़ा हुआ ॥९६॥ तब वालीने उसको कांखत उलटा दबाकर चारों समुद्रोंके भीतरफि घुमाया ॥९७॥ पश्चात् अपनी किष्किन्धा पुरीमें ले गया। वहां जाकर उसने अपने पुत्र अङ्गदको देखा। ज्यों ही वह अङ्गदके प्रेममें चूमनेके लिए अपनी भुजाओंमें उसे कण्ठपर बैठाने लगा ॥ ९८ । त्यां ही हाथोंके हिलनेसे रावण कांखमे से निकलकर गिर पड़ा। तबो उसको अपने प्राणप्रतापूर्वक स्वजनोंको दिखलाने लगे ॥९९॥ उसके ऊपर पुत्र अङ्गदका पालना बांधकर नीचे रावणका मुख करके उन्होंने बहुत दिनोंतक बांधकर रक्खा। जिससे रावणका मुख अङ्गदका मूत्रधरामं डूबता रहा। १००॥ तदनन्तर स्वयं बलीने ही रावणको जानेकी आज्ञा दे दी और उससे मित्रता कर ली ॥ १०१॥ रावण पुनः पुष्पक विमानपर सवार होकर आनंदके साथ विचरने लगा। अनेक वीरोंको देखता हुआ वह पातालम जा पहुँचा॥ १०२॥ वहाँ कोटिसूर्यके सदृश प्रकाशमयो उस नगरीके तेजसे प्रतिहत होकर पुष्पय विमानकी गति रुक गया ॥ १०३ । तब उससे उतरकर दशानन चुपचाप अकेला ही पुरीकी ओर चल पड़ा। उसने पुरॉमें प्रवेश करने-के बाद वामनरूपधारी आपका देखा ।१०४॥ करारों सूर्यके समान तेजस्वी आपने पीताम्बर धारण कर रक्खा था। आप चतुर्भुज होकर लक्ष्मीके साथ वहीं रहते हुए राजा बलिके द्वारकी रक्षा कर रह थे ॥ १०५ ॥ उस दशग्रीवन आपसे पूछा कि इस नगरका राज कौन है, बताओ। रावण कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, पर आपने उसे अपना शत्रु समझकर कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ १०६ ॥ तब आपको बधिर समझकर वह बलिक भवनमें घुसा। वहाँ उसने राजा बलिकी अपनी स्त्रीके साथ चौसर खेलत देखा। १०७। वहां चुपकेसे खड़ा होकर वह बलिकी राज्यलक्ष्मीको क्षणभर देखता रहा। इतनेमें राजा बलिके हाथसे छूटककर पाँसा दूर जा गिरा ॥ १०८। उसी समय बलिने रावणको उस पांसेको उठा लानेके लिए कहा रावण भी उसे उठानेके लिये शीघ्र ही उसके पास जा पहुँचा ॥ १०९॥ वह उसे एक हाथसे उठाने लगा। पर वह पाँसा हिल्ल तक नहीं। तब रावणने दो, तीन, चार करके बीसों हाथोंमें उस पाँसेको उठानेकी चेष्टा की, परन्तु तौ भी वह नहीं हिला ॥ ११० ॥ प्रत्युत उसके सब हाथोंकी अंगुलियाँ पाँसेके वाससे दब गयीं और कुचल जानेसे खून निकलने लगा परन्तु वे निकलीं नहीं । १११ । अतएव दशानन बहुत जोरसे चिल्लाने लगा। तब
सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५४
अश्वानां शकृतं नीत्वा क्षिपत्प्रत्यहं बहिः । एकदा द्वारे गत्वा प्रार्थयामास त्वां मुहुः ॥ ११४ ॥
त्वया स्वपादलग्नः स्वपदांगुष्ठेन खेडितः । तदाऽतिमुदितो लंकां चिरकालेन रावणः ॥ ११५ ॥
ययौ मेने निजं जन्म द्वितीयं जातमद्य वै । रावणः परमप्रीत एव लोकान्मनावशन् ॥ ११६ ॥
कर्तुं वांस्त्वनवशाञ्जिग्ये व्यभ्राम पुष्पकस्थितः ।
दृष्ट्वैकदाऽत्र साकेते पूर्वजं तव दीक्षितम् ॥ ११७ ॥
अनरण्यं संगरेण चकार पतितं रणे ।
तदा शप्तोऽनरन्येन मद्वंशे रघुनन्दनः ॥ ११८ ॥
भूत्वा त्वां सगरेणैव सकुटुम्बं बधिष्यति इत्युक्त्वा स गतो नाकं रावणोऽपि पुरीं ययौ ॥ ११९ ॥
सनत्कुमारमेकांते स राक्षसोंऽथैकदासुरः । नत्वा पप्रच्छ देवेषु को वा श्रेष्ठेति सादरम् ॥ १२० ॥
मुनिः प्राह महाविष्णुं तच्छ्रुत्वा प्राह तं पुनः ।
विष्णुना ये हता युद्धे राक्षसाद्या लभंति काम् ॥ १२१ ॥
गतिं चेति मुनिः प्राह ते मुक्तिं यांति दुर्लभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तं नत्वा केनोपायेन वै हरेः ॥ १२२ ॥
भविष्यत्यत्र मे मृत्युस्तदा तं मुनिरब्रवीत् । त्रेतायां नररूपेण रामो विष्णुर्भविष्यति ॥ १२३ ॥
अयोध्यायां तदा तेन कृत्वा वैरं सुदारुणम् । तस्माद्वधं कुरुष्व स्वमात्मनः परमात्मनः ॥ १२४ ॥
तेन गच्छसि मुक्तिं त्वं तच्छ्रुत्वा स दशाननः ।
विरोधार्थं जनकजामहरद्गौतमीनटात् १२५ ॥
अशोके रक्षिता तेन मातृवत्स्ववधेच्छया ।
राजा बलिकी एक दासीने शीघ्र बलिको उठाकर राजाको दे दिया ॥ ११२ ॥ बलिने उसी समय रावणको धिक्कार-कर अपने महलसे निकाल दिया। बाहर राजा बलिके दूतोंने उसको फिर पकड़ लिया और अपने जूठनसे उसका पोषण करने लगे ॥ ११३ ॥ रावणको गोदामेली लींड उठा-उठाकर बाहर फेंक आनेका काम सौंपा गया। कुछ दिनों बाद एक दिन रावण द्वारपर स्थित आप विष्णुके पास आकर नगरके बाहर जाने देनेकी प्रार्थना करन लगा और आपके चरणोंपर गिर पड़ा। तब आपने अपने पाँवके अङ्गूठेसे उसको आकाशकी ओर उछाल दिया। जिससे रावण बहुत कालके बाद प्रसन्नतापूर्वक अपनी लङ्कामे जा पहुँचा ॥ ११४ ॥ ११५ । वह आज मेरा दूसरा जन्म हुआ है, ऐसा मानने लगा। तब वही रावण पुनः प्रसन्न होकर पूर्ववत् सब लोकोंको अपने वशमे करनेकी इच्छासे पुष्पकपर चढ़कर नित्यप्रति इधर उधर भ्रमण करन लगा। उसने एक दिन अयोध्यामे आपके पूर्वज दीक्षित ( सोमयागकी दीक्षा लिये हुए ) राजा अनरण्यको देखा। उनके साथ युद्ध करके रावणने रणमे उन्हे हरा दिया। तब अनरण्यने उसको शाप दिया कि मेरे वंशमे जन्म लेकर रघुनन्दन राम सकुटुम्ब तुमको मारेंगे ॥ ११६ । ११८ । इतना कहकर वे स्वर्ग सिधार गये तथा रावण अपने नगरको चला गया ॥ ११९ ॥ उस राक्षसने एक दिन सनत्कुमारको नमस्कार करके एकान्तमें पूछा-हे मुने ! कृपा करके मुझे यह बताइए कि देवताओंमे सबसे श्रेष्ठ देवता कौन है ? ॥ १२० ॥ मुनिने विष्णुको श्रेष्ठ बताया। यह सुनकर वह असुर रावण फिर बोला कि विष्णुने आजतक जिन राक्षसोको मारा है, वे किस गतिको प्राप्त हुए हैं ? । १२१ ॥ मुनिने कहा-वे सब उत्तम तथा दुर्लभ मुक्तिको प्राप्त हुए हैं। उस राक्षसन फिर प्रश्न किया कि किस उपायसे मेरी मृत्यु श्रीहरिके हाथो हो सकती है ? मुनिने उसके प्रश्नका उत्तर देते हुए कहा कि त्रेतायुगमे विष्णु अयोध्यामें मनुष्यका रूप धारण करेंगे । १२२ ॥ १२३ । उस समय उनसे घोर वैर करके उन परमात्मा रामके हाथों तुम अपना वध करवा लेना ॥ १२४ ॥ उससे तुम मुक्तिपदको प्राप्त हो जाओगे यह बात मनमें रखकर रावणने रामके साथ विरोध करनेके लिए ही गौतमी नदीके तटसे जनकनन्दिनी सीताका
१५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
एकदा नारदं दृष्ट्वा नत्वा पप्रच्छ रावणः ।१२६॥
भगवन् ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः ।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं जानासि जगत्त्रयम्॥१२७॥
मुनिर्ध्यात्वा चिरञ्चाह श्वेतद्वीपनिवासिनः । महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते ॥१२८॥
विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये । त एव तत्र सजाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥१२९॥
तच्छ्रुत्वा रावणो वेगात्सन्त्रिभिः पुष्पकेण तैः ।
योद्धुकामो ययौ गर्वाच्छ्वेतद्वीपान्तिकं मुदा ॥१३०॥
तत्प्रभाहतनेत्रार्कं पुष्पकं नाचलत्पुरः ।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ स्वयमेव दशाननः ॥१३१ ।
प्रविशन्नेव तद्द्दीपं धृतो हस्तेन योषिता ।
गच्छन्त्या कस्यचिद्दास्या पुष्पाण्यानयितुं वनम् ॥१३२ ।
तया पृष्टः कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद । इत्युक्त्वा लीलया स्त्रीभिर्हसतीभिर्मुहुर्मुहुः ॥१३३ ।
मुखेषु ताडितो हस्तैर्भ्रामितोऽथोत्प्लुतं चिरम् । अन्यैकं तत्पदं ताभिः क्षिप्तः कंदुकवन्मुहुः ॥१३४॥
परस्परं हि क्रीडद्भिः कया त्यक्तस्तु लीलया । पपात परलंकायां क्रौंचायाः शौचकूपके ॥१३५।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः ।
आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः ॥१३६।
विष्णुना ये हता युद्धे तेषामेतादृशं बलम् । तन्नैव निहतस्तेन श्वेतद्वीप व्रजाम्यहम् ॥१३७।
मयि विष्णूर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम् ।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार रावणो वनात् ॥१३८॥
हरण कर लिया था ॥ १२५ । अपने बच्चोंकी इच्छासे ही उसने सीताको अशोकवनमें रखकर माताके समान रक्षा की थी। एक बार रावणने नारद मुनिको देखकर नमस्कार किया और पूछा -॥ १२६ ॥ हे भगवन् ! आप कृपा करके यह बताइये कि मुझसे लड़नेवाले बलवान् लोग कहाँ हैं ? मै बलवानोंसे युद्ध करना चाहता हूँ आप तीनों लोकके लोगोंको जानते हैं ॥ १२७ । मुनिने स्तिक देर ध्यान करके कहा कि श्वेतद्वीपके लोग बड़े भारी शरीरवाले होते हैं और वे नित्य भगवान्की पूजामे लगे रहते हैं, जो लोग विष्णुके हाथों मारे जाते हैं, वे ही सुरों तथा असुरोंसे अजय होकर वहाँ जन्म लेते हैं ॥ १२८ ॥ १२९ । यह सुनकर प्रसन्न रावण अपने मन्त्रियोंके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर गर्व तथा दंभके साथ उन लोगोंसे युद्ध करनेकी इच्छासे श्वेतद्वीपकी ओर चल पड़ा । १३० । परन्तु उस द्वीपकी कान्तिसे चौंधियाकर उसका विमान रुक गया । तब रावण विमान छोड़कर पैदल चलने लगा । १३१ ॥ द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसको एक हाथसे पकड़ लिया। वह किसीकी दासी थी और वनमें पुष्प लेने जा रही थी ॥ १३२ । उस स्त्रीने रावणसे पूछा कि तू कौन है और तुझे यहाँ किसने भेजा है ? बता। इतना कहकर कुछ स्त्रियां बारम्बार हँसकर लीलापूर्वक उसके मुखपर तमाचे लगाने लगीं। बादमें उसका पाँव पकड़ तथा उसको औंधे सिर घुमाकर गेंदकी भाँति दूर फेंक दिया । १३३ ॥ १३४ ॥ आपसमें एक दूसरेके साथ खेलती हुई किसी एक स्त्रीने ही यह काम किया था। इस प्रकार फेंकनेपर रावण परलंकामें क्रौंच के शौचालयमें जा गिरा। १३५ ।। इस प्रकार रावण उन स्त्रियोंके हाथोंसे बड़ी कठिनईसे छूटा और आश्चर्यचकित होकर यह दुष्ट विचारने लगा -॥ १३६ ॥ ओहो ! विष्णु जिनको मारते हैं, वे लोग इतने बलवान् हो जाते हैं। इसलिए मैं भी उनसे मारा जाकर श्वेतद्वीपमें जाऊँगा ॥ १३७ । अब मैं वही काम करूँगा कि जिससे विष्णु मेरे ऊपर क्रुद्ध हों यही सोचकर वनमें रावणने
सर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५५
सर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५५
वानवेवं महाशर्मा स अहोरात्रनीसुताम् ।
मातृवत्पालयामास स्वतः काङ्क्षन्वधं निजम् ॥ १३९॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
वालिसुग्रीवयोर्जन्म श्रोतुमिच्छामि नन्मुखात् । स्वीयौ वानरकारौ जाताव इति तच्छ्रुतम् ॥ १४०॥
अगस्त्य उवाच
मेरौ स्वर्णमये पूर्वं सभायां ब्रह्मणः कदा । नेत्राभ्यां पतितं दिव्यमानंदाश्रुजलं तदा ॥ १४१॥
तद्गृहीत्वा करे ब्रह्मा ध्यात्वा किंचिनदधस्त्यजत् ।
भूमौ पतितमात्रेण तस्माज्जातो महाकपिः ॥ १४२॥
तमाह द्रुहिणो वत्स त्वमत्र वस सर्वदा ।
एवं बहुतिथे काले गतेर्षवरिङ्गः सुधीः ॥ १४३॥
कदाचित्पर्यटन्मेरौ फलमूलाद्यनेषणः । अपश्यद्धिरण्मयशिलां वापीं मणिशिलाचिताम् ॥ १४४॥
पानीय पातुमगमत्तत्र छायामथ कपिस्त्वभूत् । दृष्ट्वा प्रतिकपिं मत्वा निपपात जलांतरे ॥ १४५॥
तत्रादृष्ट्वा हरिं शीघ्रं बहिर्हप्तुत्य संययौ । अपश्यत्सुन्दरीं नारीमात्मानं विस्मयं गतः ॥ १४६॥
ततो ददर्श मघवा सोऽप्यजद्वीर्यमुत्तमम् । तामप्राप्यैव तद्वीर्यं बालदेशेऽपतद्भुवि ॥ १४७॥
वाली समभवत्तत्र शक्रतुल्यपराक्रमः ।
भानुष्यागात्तसत्र तदनीमेव भामिनीम् ॥ १४८॥
दृष्ट्वा कामवशो भूत्वा ग्रीवादेशेऽसृजन्महतू । वीजं तस्यास्ततः सद्यो सुग्रीवो बलवानभूत् ॥ १४९॥
अङ्के च समादाय गतवा सा निद्रिता क्वचित् । प्रभावेऽकस्यदानभान पूर्ववद्वानराकृतिम् ॥ १५०॥
तद्वृत्तं तु विधिः श्रुत्वा किष्किन्धाराज्यमुत्तमम् ।
ददौ स वानरेन्द्राय पुत्राभ्यां तत्र संस्थितः ॥ १५१॥
बंदरोंका हरण कर लिया ॥ १३८ ॥ उसने यह भी जान लिया था कि ये दावानल पवनिसुता रुद्रभो हैं। इसीलिए उसने अपने वधकी इच्छा करके शाताको माताके समान पाला था ॥ १३९ ॥ श्रीरामचन्द्र बोले हे मुने ! मैं आपके मुखसे बालि और सुग्रीवके जन्मकी कथा सुनना चाहता हूँ । मैंने सुना है कि स्वयं सूर्य तथा इन्द्र वानरका रूप धारणकर बालि-सुग्रीवके रूपमें उत्पन्न हुए थे ॥ १४० ॥ अगस्त्य मुनि बोले—मेरु पर्वतके स्वर्णशिखरपर एक बार भरी सभामें सहसा ब्रह्माके नेत्रसे दिव्य आनन्दाश्रु निकल पड़ा ॥ १४१ ॥ ब्रह्माजीने उसको हाथमें ले तथा कुछ ध्यान धरनेके पश्चात् जमीनपर डाल दिया । गिरनेके साथ ही उससे एक महान् कपि उत्पन्न हो गया । १४२ ॥ तब ब्रह्माने उससे कहा—हे वत्स ! तुम सदा यहीं रहो। वहीं रहते हुए कुछ दिन बीतनेपर वह ऋक्षविरजः कपि किसी समय मेरु पर्वतपर घूमता फिरता फल मूल आदिके लिए एक वावली पर पहुँचा । उसने वहाँ मणिकी शिलाओंसे बनी हुई स्वच्छ जलवाली एक बावली देखा ॥ १४३ ॥ १४४ ॥ जब वह पानी पीने लगा तो उसे अपना छाया दिखाई दी । उसे अपना प्रतिपक्षी समझकर वह जलम कूद पड़ा ॥ १४५ ॥ किन्तु उसने जब उसको दूसरा वानर नहीं दिखाई पड़ा, तब वह उछलकर बाहर निकल आया । बाहर निकलनेके साथ ही वह एक सुन्दरी स्त्रीके रूपमें परिणत हो गया । यह देखकर उसको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ १४६ ॥ बादमे जब इन्द्रने उसको देखा तो कामवश उनका वीर्य निकलकर उस स्त्रीके बालों-पर जा गिरा ॥ १४७ ॥ उससे इन्द्रतुल्य पराक्रम वानर वालि पैदा हुआ। उसी समय सूर्यदेव भी वहाँ पर पहुंचे ॥ १४८ ॥ उस सुन्दरी कामिनीको देखकर वे भी कामातुर हो उठे और उस स्त्रीकी गर्दनपर उनका महद् वीर्य गिर पड़ा। जिससे उसी समय बलवान् वानर सूर्यज उत्पन्न हुआ ॥ १४९ ॥ उन दोनों पुत्रोंको कहीं गोद में बांधकर वह स्त्री सो गयी । प्रातःकाल होनेपर उसने फिर अपने आपका वानररूपमें पाया ॥ १५० ॥
१५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
मृतेऽर्क्षरजस्याभूद्वाली पूर्वी कपीश्वरः । एवं ते कथितं राम यथा पृष्टं त्वया मम ॥१५२॥
श्रीरामचन्द्र उवाच
यदाऽसौ वालिना बंधुः किष्किन्धाया बहिष्कृतः ।
तदा तस्यैव सचिवः श्रीमत्पवननंदनः ॥१५३॥
न वेद किं बलं नैजं वालितुल्यपराक्रमः । इति रामवचः श्रुत्वा पुनस्तं मुनिरब्रवीत् ॥१५४॥
अगस्त्यउवाच
केसरीनाम विख्यातः कपिरंजनपर्वते ।
तस्यास्तां च शुभे पत्न्यो वानयर्विकटा गिरौ ॥१५५॥
प्लवंगस्याञ्जनीनाम्नी स्थिता तावच्च खात्तदा ।
पपात पायसमयः पिंडो गृध्रोन्मुखाद्भुवि ॥१५६॥
यदा नीतस्तु कैकेय्या कराद्गृध्रया शुभः पुरा । तं पिंडं भक्षयामास वानरी चामृतोपमम् ॥१५७॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र मार्जारास्या समागता । पतिना रहिते ते द्वे क्रीडन्त्यौ वसनं तयोः ।१५८॥
अहरत्पवनो वेगादूर्ध्वदृष्ट्वा वायुस्तदूरूः ।
अञ्जनीं प्रार्थयामास तया भोगं चकार सः ॥१५९॥
यथैव प्रार्थयामास मार्जारास्यां स निर्ऋतिः । तयाऽकरोद्रतिं तत्र सोऽपि पर्वतसूर्द्धनि ।१६०॥
तयोस्ताभ्यां समुत्पन्नौ वानरौ मारुतात्मजः ।
मार्जार्याः समभूद्घोरः पिशाचो बर्घरस्वनः ॥१६१॥
चैत्रे मासि सिते पक्षे हरिदिन्यां मघामिखे । नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान् रिपुसूदनः ॥१६२॥
महाचैत्रीपूर्णिमायां समुत्पन्नोऽञ्जनीसुतः । वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन ॥१६३॥
बालभावेऽपि च. पूर्वं दृष्ट्वैव विभावसुम् ।
मत्वा पक्वफलं चेति जिघृक्षुर्खत्यपोत्प्लुतः ॥१६४॥
यह वृत्तान्त सुनकर ब्रह्माजीने वानरेन्द्र ऋक्षरजाको किष्किन्धा नगरीका उत्तम राज्य दे दिया। जहाँपर वह अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहने लगा ॥ १५१ ॥ उस ऋक्षरजाके मर जानेपर किष्किन्धापुरीका राजा बलीश्वर बाली हुआ। हे राम ! जो आपने पूछा, मैने वह सब कह दिया ॥ १५२ । श्रीरामचन्द्र बोले— जब सुग्रीवको बालीने किष्किन्धासे बाहर निकाल दिया था, उस समय इनके मन्त्री ये वायुनन्दन हनुमान् भी साथ थे ॥ १५३ ॥ पर इनको बालीके समान अपना बल क्यों नहीं याद आया ? रामके इस वचनको सुनकर मुनि अगस्त्य फिर कहने लगे— ॥ १५४ ॥ अंजन पर्वतनिवासी केसरी नामसे विख्यात कपिकी दो बानरी स्त्रियें थीं ॥ १५५ ॥ किसी समय उस कपिकी अंजनी नामकी स्त्री वहाँ बैठी थी । इतनेमे आकाशसे किसी गृध्रीके मुखसे छूटकर पायसका एक पिण्ड आ गिरा ॥ १५६ ॥ यह पिण्ड वही था जो कि पहले कैकेयी- के हाथसे एक गृध्री छीन ले गयी थी । उस अमृततुल्य पिण्डको बानरीने खा लिया ॥ १५७ ॥ इतनेमें वहाँ वह दूसरी मार्जारास्या बानरी भी आ पहुंची । पतिकी अनुपस्थितिमें वे दोनो क्रीड़ा कर रही थीं । तत्रो उन दोनोंके वस्त्रोंको पवनने उड़कर ऊंचे उठाया तथा उनकी जाँघोंको देख लिया। पश्चात् अंजनीसे प्रार्थना करके उसके साथ वायुने भोग किया ॥ १५८ ॥ १५९ ॥ उसी प्रकार निर्ऋतिने मार्जारास्यासे प्रार्थना करके पर्वतके शिखरपर इसके साथ रति की ॥ १६० ॥ उन दोनोंसे उन दोनोंने—बानरीसे मारुतात्मज हनुमान् तथा मार्जारीसे घोर बर्घरस्वन पिशाच उत्पन्न हुआ ॥ १६१ ॥ चैत्र शुक्ल एकादशीके दिन मघानक्षत्रमें रिपुसूदन हनुमान्- का जन्म हुआ था ॥ १६२ ॥ कुछ पण्डित कल्पभेदसे चैत्रकी पूर्णिमाके दिन हनुमान्का शुभ जन्म हुआ, ऐसा कहते हैं ॥ १६३ ॥ वे हनुमान् बाल्यकालमें ही सूर्यको देख तथा उन्हें पका फल समझकर उसको लेनेकी
सर्गः १३ ] | सारकाण्डम् | १५७
| सर्गः १३ ] | सारकाण्डम् | १५७ |
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योजनानां पंचशतं वायुवेगेन मारुतिः । राहुस्तस्मिन्दिने दर्शे ययौ सूर्यं रघूत्तम ॥१६५॥ तावद्दृष्ट्वा भर्तुकामं रखेरग्रे कपिं स्थितम् । तदा राहुर्भयादेव रविं मुक्त्त्वेंद्रमाययौ ॥१६६॥ राहुः प्राह शचीनाथ सत्र पीडां करोम्यहम् । दत्तः पूर्वं त्वया सूर्यः पीडां कर्तुं सुरेश्वर ॥१६७॥ अत्र विघ्नं समुत्पन्नं तन्मे शीघ्रं निवारय । तद्राहुवचनादिंद्रः समारुह्य गजोपरि ॥१६८॥ देवैर्वृतो ययौ वेगाद्ददर्श प्लवगं पुरः तदा मुमोच तं वज्रं मघवा मारुतिं प्रति ॥१६९॥ वज्रपातान्मारुतिः खात् पपात गिरिकन्दरे । तदा भग्ना हनुस्तस्य हनुमानिति वै यतः ॥१७०॥ ख्यातिं गतोऽयं सर्वत्र सदा वायुश्चुकोप ह । सांत्वयित्वा हनूमंतं स्वयं स्तब्धोऽभवत्तदा ॥१७१॥ वायुस्तम्भाज्जनाः सर्वे निपेतुर्धरणीतले त्रैलोक्यं शववज्जातं हाहाकारोऽभवद्दिवि । १७२॥ तदा धिक्कृत्य देवेंद्रं वेधा वायुं ययौ जवात् । प्रार्थयामास तं नत्वा पुनर्वायुं वचोऽब्रवीत् ॥१७३॥ देवेन्द्रस्यापराधं त्वं क्षन्तुमर्हसि कंपना। तव पुत्राय दास्यामि वरानद्य हनूमते ।१७४॥ तदा तुष्टोऽभवद्वायुरुचाल पूर्ववत्पुनः । अभूत्सजीवितं सर्वं त्रैलोक्यं क्षणमात्रतः । १७५॥ तदा ददौ वरान् ब्रह्मा मारुतिं पुरतः स्थितम् । भविष्यसि स्वयममरो वज्रदेहो वरान्मम ॥१७६॥ ते कुंठिता गतिर्माऽस्तु कुत्राप्यंजनिसंभव । भविष्यति हरौ भक्तिस्तव नित्यमनुत्तमा ॥१७७॥ त्वं विष्णोरपि साहाय्यं करिष्यसि वरान्मम । इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे वेधा राहुः सूर्यं ययौ पुनः ॥१७८॥
इच्छासे लीलापूर्वक ऊपरको उछले ॥ १६४ ॥ उस समय मारुति वायुवेगसे पांच सौ योजन ऊपर उठ गये थे । हे रघूत्तम ! उसी दर्श ( अमावस्या ) के दिन राहु भी ग्रसनेके लिए सूर्यके पास गया, किन्तु उन्हें पकड़नेकी इच्छासे खड़े हनुमान्को देखा । तब राहु डरा और सूर्यको छोड़कर इन्द्रके पास जा पहुँचा ॥१६५॥१६६॥ शचीपति इन्द्रसे राहु बोला—अब मैं आपको ही सताऊँगा । क्योंकि पूर्वकालमे आपने मुझे सतानेके लिये सूर्यको दिया था । १६७ ॥ परन्तु उसमें इस समय विघ्न उपस्थित हो गया है। अतः उसका आप निवारण करें, नहीं तो मैं आपहीको दुःख दूँगा । इस प्रकार राहुके कथनानुसार इन्द्र गजपर सवार होकर देवताओंके साथ सूर्यके पास गये तो वहाँ उनके सामने हनुमान्को खड़ा देखा । तत्काल इन्द्रने उनके ऊपर वज्रप्रहार किया ॥ १६८ ॥ १६९ ॥ वज्रके आघातसे हनुमान् नीचे गिरिकन्दरामें जा गिरे और उनकी ठुड्डी टेढी हो गयी । जिससे कि उनका हनुमान् नाम पड़ा ॥ १७० ॥ उनका यह नाम सर्वत्र प्रसिद्ध हो गया । यह देखकर उनके पिता वायुदेवने कुपित होकर अपनी गति बन्द कर दी ॥ १७१ ॥ वायुके बन्द हो जानेसे सब लोग मर-मरकर धरणीपर गिरने लगे । तीनों लोक मृतक जैसे हो गये और देवलोकमें भी हाहाकार मच गया ॥ १७२ । तब ब्रह्मा इन्द्रको धिक्कारकर शीघ्र वायुके पास गये और नमस्कार करके प्रार्थनापूर्वक कहा—॥ १७३ ॥ हे कंपन ! तुम देवेन्द्रके अपराधको क्षमा कर दो । मैं तुम्हारे पुत्र हनुमान्को वर देता हूँ ॥ १७४ ॥ तब प्रसन्न होकर वायु पुनः पूर्ववत् बहने लगा । अतः क्षणमात्रमे तीनों लोक फिर जीवित हो गये ॥ १७५ । पश्चात् ब्रह्माने सामने खड़े मारुतिको वर दिया कि तुम मेरे वचनसे वज्रदेह होकर अमर हो जाओगे । १७६ ॥ हे अंजनीपुत्र ! तुम्हारी गति कहीं भी प्रतिहत न होगी और नित्य श्रीहरिमें तुम्हारी उत्तम भक्ति बनी रहेगी ॥१७७॥ मेरे वरदानसे तुम विष्णुकी सहायता करनेमें भी समर्थ होओगे। इतना कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और राहु पुनः
| १५८ | आनन्दरामायणे | सर्गः १२ |
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श्रीराम उवाच
देवेन्द्रेण कथं दत्तो रविस्तस्मै स राहवे । तत्सर्वं विस्तरेणैव कथयस्व ममाग्रतः ॥१७९॥
अगस्तिरुवाच
सुधापानादयं राहुर्देत्योऽभूदमरः स्वयम् । ग्रहोऽष्टमोऽभवन्सोऽपि यदाऽवांछद्दूषं सुरान् ॥१८०॥
पीडां कर्तुं तदा देवाः सूर्य सोमं ददुस्तु तं । ज्ञात्वा धर्मैर्जनाः सर्वे निजकर्मादिहेतवे ॥१८१॥
मोचयिष्यन्ति राहोश्च शशिनं भास्करं प्रति । यदा यदा भविष्यत्यापरागों जगतीतले ॥१८२॥
तदा तदा जना धर्मैर्निजप्रत्यर्थमादरात् ।
तोषयित्वा सदा राहुं तौ तस्मान्मोचयन्ति हि । १८३।।
एतत्सर्वं मया प्रोक्तमुपरागस्य कारणम् । जन्म कर्म चराज्ञाने मारुतेश्चापि विस्तरात् । १८४॥
अनन्तद्वलमाहात्म्यं को वा शक्नोति वर्णितुम् । स एकदा मुनीनां हि चाश्रमेषु कुशादिकान् ॥१८५॥
चकारंतस्ततः सर्वान्नर्षयन्मुनिलालकान् । तस्य तत्कर्म मुनिभिर्दृष्ट्वा शप्तोऽञ्जनिसुतः ॥१८६॥
अद्यप्रभृत्य कपिश्रेष्ठ न ज्ञास्यसि स्वपौरुषम् ।
यदाऽन्यस्य मुखात्स्वीयं बलं श्रोष्यसि विस्तरात् ॥१८७॥
भविष्यति तदा पूर्वस्मृतिस्ते पौरुषं पुनः । अतः सुग्रीवसख्ये विस्मृतः स्वपराक्रमः ।१८८॥
यद स्तुतो जांबवता पुरा प्रायोपवेशने तदा स्मृतिस्तस्य जाता स्वबलस्य हनूमतः ।।१८९॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं त्वया पृष्टं मया तत्र । यथा तथा सविस्तार कपिरावणचेष्टितम् ।।१९०।।
राम त्वं परमेशोऽसि सकलं जानासि विज्ञानदृक्
भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलनासाक्षी विकल्पोज्झितः ।
भक्तानामनुदर्शनाय सकलां कुर्वन् क्रियासंहति
चाशृण्वन् मनुजाकृतिर्मम वचो भासीह लोकचितः ॥१९१॥
सूर्यके पास गया ।। १७८ ।। श्रीरामजीने पूछा कि देवेन्द्रने सूर्य राहुको क्यों दे दिया था ? हे मुनीन्द्र ! यह कथा आप विस्तारसे कहें ॥ १७९॥ अगस्त्य ऋषि बोले- हे राम, दैत्य राहु सूर्यकालमें सुधापान करके अमरत्वको प्राप्त हो गया था। बादमें जब वह अष्टम ग्रह हो गया, तब उसने देवताओंका दुख देना चाहा। यह देखकर देवताओने सूर्य तथा चन्द्रमा राहुको दे दिया और यह सोचा कि संसारके लोग अपने कामके लिए धर्मके द्वारा राहुसे सूर्य तथा चन्द्रमाको छुड़ा लेंगे। उसीके अनुसार सूर्य-चन्द्रको जब-जब ग्रहण लगता है, तब-तब मनुष्य अपने कार्यसाधनके लिये आदरपूर्वक दान-धर्मसे राहुको सन्तुष्ट करके उससे सूर्य-चन्द्रको छुड़ा लेते हैं ॥ १८०-१८३ ।। इस प्रकार मैंने ग्रहणका कारण तथा मारुतिका जन्म-कर्म आदि वृत्तान्त सविस्तार आपको कह सुनाया ।। १८४ ।। पूरी तरह हनुमान्के बल-प्रतापका वर्णन कौन कर सकता है। उन्होंने एक दिन मुनियोंके आश्रममें जाकर उनके बालकोंको डराया-धमकाया और कुशा आदि सब सामग्री इधर-उधर बिखेर दी। उनके इस कामको देखकर मुनियोंने अञ्जनीसुत हनुमान्को शाप देते हुए कहा-॥ १८५ ।' हे कपिश्रेष्ठ ! आजसे तुम अपने पुरुषार्थको भूल जाओगे और जब कभी दूसरेके मुखसे अपना बल विस्तारसे सुनोगे ।। १८६ । १८७ ।। तब स्मरण होगा। * सुग्रीवके पास रहते समय इसी कारण अपना पुरुषार्थ भूल गये थे। बादमें समुद्रतटपर उपवासके समय जब जाम्बवान्ने उनकी स्तुति करके उनके बलका स्मरण दिलाया, तब हनुमान्को तुरन्त अपना बल याद आ गया था । १८८ ॥ १८९ ।। यह सब मैंने आपके पूछनेके अनुसार सविस्तार कपि-हनुमान् तथा रावणका कार्यकलाप कह सुनाया ।। १९० ।। हे राम ! आप परमेश्वर हैं, ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देखते हैं, विकल्परहित आप भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालकी क्रियाके विज्ञ और सबके साक्षी हैं। भक्तोंके अनुरोधसे आप समस्त क्रियाकलाप करते हुए मनुष्य बनकर मेरे बचनको
सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५१
सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १५१
श्रीशिव उवाच स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुंभसंभवः । स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ गुप्तविग्रहः ॥१९२॥ विन्ध्याचलं निजं रूपं स मुनिर्नैव दर्शयन् । पुनरुत्थास्यति गिरिर्श्वेति मन्वा तु तद्भयात् ॥१९३॥ रामस्तु सीतया सार्द्धं भ्रातृभिः सह मंत्रिभिः । संसारीव रमानाथो रममाणोऽभवद्गृहे ॥१९४॥ अनासक्तोऽपि विषयान् बुभुजे प्रियया सह । हनुमत्प्रभृतैः सद्भिवानरैः परिसेवितः ॥१९५॥ राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ । वसुधा सस्यसंपन्ना फलवंतश्च भूरुहाः ॥१९६॥ जनाः स्वधर्मनिरताः पतिभक्तिपराः स्त्रियः । नापश्यन्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥१९७॥ समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह । वानरैर्भ्रातृभि सार्द्धं संचचारार्ववनि प्रभुः ॥१९८॥ अमानुषाणि कर्माणि चकार बहुशो भुवि । लोकानामुपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥१९९॥ कोटिशः शिवलिंगानि स्थापयामास सर्वतः । अश्वमेधादिविविधान् यज्ञान् विपुलदक्षिणान् ॥२००॥ चकार परमानन्दो मानुषं वपुरास्थितः । सीतां नो रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२०१॥ शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् । कथाः संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाः ॥२०२॥ एकादशसहस्राणि सैकदशशतानि च । त्रेतायुगभवान्येव वर्षाणि रघुनन्दनः ॥२०३॥ चकार राज्यं धर्मेण लोकवन्द्यपदाम्बुजः । कलेर्मनेन ह्येतानि शताण्येकादशैव हि ॥२०४॥ सैकदशप्लवान्तञ्च रामो राज्यं चकार सः । एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ॥२०५॥ यस्यैकमेव तच्चासीत् पत्नीवाक्यं शरस्तथा । गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षितुं नरान् ॥२०६॥ सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च । भर्तुर्मनोज्ञा साध्वी चाप्याज्ञां ता दिवा निशाम् ॥२०७॥
सुनते हैं। हे ईश ! सब लोगोंसे पूजित होकर आप बड़ी ही शोभाको प्राप्त हो रहे हैं ॥ १९१ ॥ श्रीशिवजी बोले- इस प्रकार रामकी स्तुतिकर तथा उनसे पूजा-सत्कार प्राप्त करके गुप्तविग्रह अगस्त्य मुनि, सब मुनियोंको साथ लेकर अपने आश्रमको चले गये ॥ १९२ ॥ जाते समय मुनिने अपना रूप विन्ध्याचलको इस डरसे नहीं दिखलाया कि वह कही फिर उठकर न खड़ा हो जाय ॥ १९३ ॥ उधर रामचन्द्रजी सीता, मन्त्रिगण तथा भ्राताओंके साथ संसारी जीवोंके समान क्रीडा करते हुए अपने घरमें रहने लगे ॥ १९४ ॥ आसक्त न होते हुए भी अपनी प्रिया सीताके साथ ऐहिक विषयोंका आनन्द लेते रहे। हनुमान् आदि अच्छे वानर श्रीहरिकी सेवामें लग गये ॥ १९५ ॥ रमापति तथा लोकनाथ रामके शासनकालमें धरा धन-धान्यपूर्ण हो गयी, वृक्ष खूब फलने लगे ॥ १९६ ॥ मानवगण अपने-अपने धर्मपथपर चलने लगे और स्त्रियें पतिभक्तिपरायणा होकर रहने लगीं। रामके राज्यमें माता-पिताके जीते जी कहींपर पुत्रमरण नहीं होता था ॥ १९७ ॥ वे प्रभु राम-सीता, लक्ष्मण आदि भाइयों तथा वानरोंके साथ विमानपर सवार होकर अवनीतत्तलपर विचरते थे ॥ १९८ ॥ पृथ्वीपर उन्होंने अनेक लोकोत्तर कार्य किये। परमात्मा रामने लोगोंको उपदेश देनेके लिए सर्वत्र करोड़ों शिव-लिङ्ग स्थापित किये। परमानन्दस्वरूप परमेश्वर रामने मनुष्यका रूप धारण करके बहुतेरी दक्षिणावाले विविध अश्वमेध यज्ञ किये। मनुष्योंको दुर्लभ अनेक भोगसाधनोंसे रामने सीताको सन्तुष्ट किया ॥१९९॥२००॥२०१॥ परम धर्मज्ञ रामने न्यायपूर्वक राज्यका शासन करके लोगोंके पापोंको दूर करनेवाली अनेक कथाएँ स्थापित कीं ॥ २०२ ॥ त्रेतायुगके ग्यारह हजार वर्ष पर्यन्त लोगों द्वारा वन्दनीय चरणकमलवाले रघुनन्दनने धर्मपूर्वक राज्य किया। कलियुगके हिसाबसे रामने यहाँ ग्यारह लाख ग्यारह वर्षतक राज्य किया। राजर्षि राम सर्वदा पवित्र रहकर एकपत्नीव्रतमें स्थिर रहे ॥ २०३-२०५ ॥ जिनके लिए पत्नीका वाक्य और बाण एक समान था। उन्होंने समस्त गृहस्थाश्रमका कार्य एकमात्र लोगोंको शिक्षा देनेके लिए किया था
१६० आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
युक्ता सं रञ्जयामास राजानं राघवं मुदा । एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं रामराज्योत्तरोद्भवम् ॥२०८॥ चरितं रघुनाथस्य यथा पृष्टं त्वया मम । श्रवणात्सर्वपापघ्नं महामंगलकारकम् । २०९॥ सारकांडमिदं देवि ये शृण्वन्ति नरोत्तमाः । तेषां मनोरथाः सर्वे परिपूर्णा भवन्ति हि । २१० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे अगस्तिरामशिवपार्वतीसंवादे त्रयोदशः सर्गः । १० ॥
प्रथमसर्गे श्लोकाः ॥ १०९ ॥ द्वितीये ॥ ३१ ॥ तृतीये ॥ १६४ ॥ चतुर्थे १७० ॥ पंचमे ॥ १४० । षष्ठे ॥ १३० ॥ सप्तमे ॥ १६१ । अष्टमे ॥ १२५ ॥ नवमे ॥ ३१० । दशमे ॥ २७३ ॥ एकादशे ॥ २८८ । द्वादशे ॥ २०२ ॥ त्रयोदशे ॥ २१० ॥ एवं सारकाण्डस्य पूर्णश्लोकसंख्या ॥ २५५८ ।
॥ २०६ ॥ सीता प्रेमके अनुकूल बर्तावसे, नम्रतासे, लज्जासे, डरसे, पातिव्रत धर्मसे, मनोहरभावसे तथा पतिके मनोभावको जानकर उसके अनुसार व्यवहारसे राजा रामको प्रेमपूर्वक आनन्दित करने लगीं । हे गिरीन्द्रजे ! इस प्रकार मैंने तुमको रामके राज्यकालके बादका सब वृत्तान्त कह सुनाया, जैसा कि तुमने पूछा था । यह रामचरित्र श्रवणमात्रसे सब पापोंका नाशक तथा महामंगलकारी है ॥ २०७-२०९ ॥ हे देवि, जो लोग इस सारकांडको श्रद्धासे सुनते हैं, उन नरश्रेष्ठोंके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥ २१० ॥ इति श्रीमच्छतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानंदरामायणे वाल्मीकीये सारकांडे अगस्तिरामशिवपार्वतीसंवादे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
इस सारकाण्डके पहिले सर्गमें १०९ श्लोक दूसरेमें ३१, तीसरेमें १६४, चौथेमें १७०, पाँचवेंमें १४०, छठवें १३०, सातवेंमें १६१, आठवेंमें १२५, नवेंमें ३१०, दसवेंमें २७३, ग्यारहवेंमें २८८, बारहवेंमें २०२ तथा तेरहवेंमें २१० श्लोक हैं । इस प्रकार इस सारकाण्डमें कुल २५५८ श्लोक हैं ।
* इति श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डं समाप्तम् *
श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु
॥ श्रीरामचन्द्रो विजयतेतराम् ॥
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
यात्राकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
( रामायणकी उत्पत्तिका वृत्तान्त )
श्रीपार्वत्युवाच
सारकाण्डं त्वया शंभो कीर्तितं बहुपुण्यदम् । मया श्रुतं तु पृच्छामि यत्तद्वक्तुं त्वमर्हसि ॥ १ ॥
कथं कृता वाजिमेधा राघवेण बलीयसा । रामादीनां चतुर्णां हि बन्धूनां सन्ततिं वद ॥ २ ॥
स्वपुत्रबन्धुपुत्राश्च कथं स्त्रीभिः सुयोजिताः । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥ ३ ॥
तथैकादश वर्षाणि त्रेतायुगमदानि हि । राज्यं कृतं त्वया प्रोक्तं विस्तराद्ब्रूस्व माम् ॥ ४ ॥
यानि यानि चरित्राणि राघवेण कृतानि हि । तानि तानि हि कृत्स्नानि विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥ ५ ॥
इति देविवचः श्रुत्वा शंभुस्तां पुनरब्रवीत् ।
श्रीमहादेव उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया देवि राघवस्य कथानकम् ॥ ६ ॥
ममापि हर्षः संजातस्तद्वदामि तवान्तिकम् । चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ ७ ॥
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् । वाल्मीकिना कृतं पूर्वमेकदा तद्वदामि ते ॥ ८ ॥
श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीपार्वतीजी बोलीं—हे शम्भो ! आपने अतिपुण्यदायक सारकाण्डकी जो कथा कही, सो मैंने सुनी परन्तु अब मैं जो आपसे पूछती हूँ, वह कृपा करके कहें ॥ १ ॥ बलवान् रामने अश्वमेधयज्ञ किस प्रकार किये ? राम आदि चारों भाइयोंकी कौन-कौन-सी सन्ततियां हुईं ॥ २ ॥ रामने अपने पुत्रों तथा भाइयोंके पुत्रोंका किस प्रकार और कौन-कौन-सी स्त्रियोंके साथ विवाह किया ? आपने कहा है कि रामने त्रेतायुगमें ग्यारह हजार ग्यारह वर्ष पर्यन्त राज्य किया था । अतएव ये सब बातें विस्तारपूर्वक कहें ॥ ३ ॥ ४ ॥ रामने जो जो चरित्र किये हों, वे सब आपके द्वारा सविस्तार कहनेके योग्य हैं ॥ ५ ॥ देवीके इस वचनको सुनकर शम्भुने कहा। श्रीमहादेवजी बोले—हे देवि ! तुमने बहुत अच्छा किया कि जो रामकी कथा पूछी ॥ ६ ॥ इससे प्रसन्न होकर मैं तुमको रघुनाथजीका सौ करोड़ श्लोकोंमें कहा हुआ चरित्र सुनाता हूँ । ७ ॥ जिसका कि एक-एक अक्षर पुरुषोंके महान् पापोंको नष्ट करनेवाला है, वाल्मीकिने जो कार्य
| १६२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १ |
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वाल्मीकिस्त्वेकदा स्नातुं जगाम तमसां नदीम् । शिष्येण सहितो गत्वा भूमौ स्थाप्य कमण्डलुम् ॥९॥
आवश्यकं तु संपाद्य कृत्वा शौचविधिं ततः । यावच्चलति स्नानार्थं दर्भपाणिः स वै मुनिः ॥१०॥
तावद्ददर्श तमसातीरे कौतुकमुत्तमम् । क्रौञ्चयुग्मे हतः क्रौञ्चो निषादेन पतत्त्रिणा ॥११॥
क्रौञ्ची शोकसमाविष्टा विललापातिदुःखिता । वियुक्ता पतिना तेन द्विजेन सहचारिणा ॥१२॥
ताम्रशीर्षेण मत्तेन पत्रिणा मा हतेन च । तथाविधं द्विजं दृष्ट्वा निषादेन निपातितम् ॥१३॥
ऋषेर्धर्मात्मनस्तस्य कारुण्यं समजायत । ततः करुणयाऽऽविष्टस्त्वधर्मोऽयमिति द्विजः ॥१४॥
निशम्य रुदतीं क्रौञ्चीमिदं वचनमब्रवीत् । मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ॥१५॥
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् । तस्येत्थं ब्रुवतश्चिन्ता बभूव हृदि वीक्षतः ॥१६॥
शोकार्तेनास्य शकुनेः किमिदं व्याहृतं मया । चिन्तयन् महाप्राज्ञश्चकार मतिमान् मतिम् ॥१७॥
शिष्यं चैवाब्रवीद्वाक्यमिदं स मुनिपुंगवः । पादबद्धोऽक्षरसमस्तन्त्रीलयसमन्वितः । १८॥
शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा । शिष्यस्तु तस्य श्रुवतो मुनेर्वाक्यमनुत्तमम् । १९॥
प्रतिजग्राह संतुष्टस्तस्य तुष्टोऽभवन्मुनिः । सोऽभिषेकं ततः कृत्वा तीर्थे तस्मिन्यथाविधि ॥२०।
तमेव चिंतयन्नर्थमुपावर्तत वै मुनिः । भारद्वाजस्ततः शिष्यो विनीतः श्रुतवान् गुरोः ॥२१॥
कलशं पूर्णमादाय पृष्ठतश्च जगाम ह । स प्रविश्याश्रमपदं शिष्येण सह धर्मवित् ॥२२॥
उपविष्टः कथाश्चान्याश्चकार ध्यानमास्थितः । तत्राजगाम लोकानां कर्ता ब्रह्मा स्वयं प्रभुः । २३।
पहिले एक समयमें किया था, सो तुम्हे सुनाता हूँ ॥ ८ ॥ एक समय वाल्मीकिमुनि अपने शिष्य भारद्वाजको साथ लेकर तमसा नदीपर स्नान करनेके लिए गये, वे रास्ते में जमीनपर कमंडलु रख तथा आवश्यक शौचादि कर्ममें निवृत्त होकर ज्यों ही हाथमें कुशा ग्रहण करके स्नान करनेके लिए चले । ६ ॥ १० ॥ त्यों ही उन्होंने तमसा नदीके तटपर एक उत्तम कौतुक देखा। वह यह कि एक निषादने बाणसे क्रौंच तथा क्रौंचीके जोड़ेमेंसे क्रौंच (बगुले) को मार डाला ॥ ११ ॥ तब क्रौंची शोकातुर होकर अतिदुःखसे विलाप करने लगी। वह बेचारी अपने सहचर, तांबेके समान लाल मस्तकवाले, मत्त और बाणसे मारे गये अपने पति पक्षी से वियुक्त गयी थी। निषादके द्वारा मारे गये उस पक्षीकी दशा देखकर धर्मात्मा वाल्मीकि ऋषिके मनमें बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। पश्चात् उस क्रौंचीके दयाजनक रुदनको सुननेसे करुणाक्रान्त हो और 'यह बड़ा अधर्म हुआ' ऐसा विचारकर मुनि बोले- ॥१२-१४॥ अरे निषाद ! तूने एक कामासक्त जोड़ेके क्रौंच पक्षीको मार डाला है, इसलिए तू भी प्रत्युत वर्षोंतक प्रतिष्ठाको नहीं प्राप्त होगा अर्थात् बहुत काल पर्यन्त जीवित नहीं रहेगा ॥ १५ ॥ इस प्रकार अनुष्टुप्-छन्दोबद्ध वाणी सहसा अपने मुखसे निकल पड़नेके कारण आश्चर्य पाकर तथा क्रौंचके शोकसे पीडित उस ऋषिके मनमें 'ओह ! इस निषादको मैने यह क्या कह दिया ! इससे वा मुझे बडा भारी पाप लग गया' ऐसी चिन्ता होने लगी ॥ १६ ॥ ओह ! यह तो मुझसे बड़ा भारी अपयश देनेवाला काम हो गया। ऐसी चिंता करते हुए मनमें कुछ निश्चय करके महामतिमान् मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने अपने शिष्य भारद्वाजसे कहा-॥ १७॥ वत्स ! शोकवश होकर मैने निषादको शाप दे दिया। यह हुआ तो अनुचित, तथापि शोकसे दुःखित होनेके कारण मेरे मुखसे आठ अक्षरोंवाले चार चरणोंयुक्त समान पदोंसे विशिष्ट तथा ताल-स्वरपर गाने योग्य यह अनुष्टुप् छन्द श्लोकरूपमें (यशरूपमें) ही प्रवृत्त हो अपयशस्वरूप न हो । १८ ॥ पश्चात् मुनिके इन श्रेष्ठ वाक्यों सुनकर उनके प्रसन्नवदन शिष्य भारद्वाजने 'यह श्लोक आपके इच्छानुसार यशरूप ही होगा' ऐसा कहकर उनकी बातका समर्थन किया इससे वाल्मीकि उनके ऊपर प्रसन्न हुए ॥ १९ । तदनन्तर तमसा नदीके जलमें यथाविधि स्नान आदि कृत्य करके वे महर्षि 'मेरा अपयश कैसे यशरूपमें परिणत हो जाय' ऐसा विचार करते हुए अपने आश्रमकी ओर चल दिये ॥ २० ॥ उनके पीछे उनके विद्वान् और विनम्र शिष्य भारद्वाज भी कलश उठायकर चल पड़े ॥२१॥ आश्रममें पहुँचनेपर भी वे "निषादको दिया हुआ शाप यशरूपमें कैसे परिणत हो" इसी बातका मनमें
सर्गः २ ] बालकाण्डम् १५३
चतुर्मुखं महातेजा द्रष्टुं तं मुनिपुंगवम् । भार्यादित्यं तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय वाग्यतः ॥२४॥
प्रांजलिः प्रयतो भूत्वा तस्थौ परमविस्मितः । पूजयामास तं देवं पाद्यार्घ्यासनवन्दनैः ॥ २५॥
प्रणम्य विधिवच्चैनं पृष्ट्वा चैव निरामयम् । अथोपविश्य भगवान्त्ससने परमाविरे ॥ २६॥
महर्षये वाल्मीकये सन्दिदेशासनं ततः । ब्रह्मण समनुज्ञातः सोऽप्युपाविशदासने ॥२७॥
उपविष्टे तदा तस्मिन् साक्षाल्लोकपितामहे । तद्गतेनैव मनसा वाल्मीकिर्ध्यानमास्थितः ॥ २८॥
पापात्मना कृतं कष्टं वैरग्रहणबुद्धिना यस्तादृशं चारुरवं क्रौंच हन्यादकारणम् ।२९॥
शोचन्नेव पुनः कौञ्चीमुपश्लोकमिमं जगौ पुनरंतर्गतमना भूत्वा शोकपरायणः ॥३०॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा प्रहसन् मुनिपुंगवम् । श्लोक एष त्वया बद्धो नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥
मच्छन्दादेव ते ब्रह्मन् प्रवृत्तेयं सरस्वती । रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमृषिसत्तम ॥ ३२॥
धर्मात्मनो गुणवतो लोके रामस्य धीमतः ॥३३॥
वृत्तं कथय धीरस्य यथा ते नारदाच्छ्रुतम् । रहस्यं च प्रकाशं च यद्वृत्तं तस्य धीमतः ॥ ३४॥
रामस्य सह सौमित्रेः कीशानां रक्षसां तथा । वैदेह्याश्चैव यद्वृत्तं प्रकाशं यदि वा रहः ॥ ३५॥
तच्चाप्यविदितं सर्वं विदितं ते भविष्यति । न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति ॥ ३६॥
कुरु रामकथां पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् । यावत्स्थास्यंति गिरयः सरितश्च महीतले ॥३७॥
तावद्रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति । यावद्रामायणकथा त्वत्कृता प्रचरिष्यति ॥३८॥
विचार करते हुए वे धर्मज्ञ मुनि शिष्योंके साथ बैठकर सम्भाषण हास्य करने लगे ॥ २२ ॥ इतनेमें वहीं समस्त लोकोंके कर्त्ता चतुर्मुख प्रभु महातेजस्वी ब्रह्मा उस मुनिश्रेष्ठसे मिलनेके लिए आ पहुँचे ॥ २३ ॥ उनको अचानक आये देखकर वाल्मीकि मुनि विस्मयान्वित तथा अवाक् हो गये। परन्तु वे तुरन्त हाथ जोड़कर नम्रभाव उनके सामने खड़े हो गये ॥ २४ ॥ पश्चात् धीरेसे मनको स्थिर करके मुनिने ब्रह्माजीसे कुशल समाचार पूछा तथा पाद्य, अर्घ्य, आसन, स्तुति, प्रणाम आदिसे उनका सत्कार किया। ब्रह्माजीने भी उनके तप आदिका कुशल पूछा और अपने लिए बिछाये हुए आसनपर स्वयं बैठकर वाल्मीकिजीको भी आसनपर बैठनेके लिए कहा। लोकोंके साक्षात् पितामह ब्रह्माजीके आसनपर बैठ जानेपर उनकी आज्ञासे वाल्मीकि ऋषि भी बैठ गये ॥ २५-२७॥ किन्तु उस समय भी उनका मन क्रौञ्चपक्षीके विषयमें ही सोच रहा था कि पापो अगाध करण तथा निर्दोष जीवोंपर मिथ्या वैरभाव रखनेवाले उस व्याधने यह बड़ा कष्टप्रद काम किया ॥ २८ ॥ जो कि सुन्दर बोली बोलनेवाले, निर्दोष तथा कामके वशीभूत उस पक्षीको बिना कारण ही मार डाला और मैंने भी उस व्याधको शाप दे दिया, सो भी बड़ा खराब काम हुआ। ऐसे विचारमें मन और शोकमें डूबें हुए वाल्मीकि कौञ्चका शोक करते हुए फिर पड़ो बात मनमें सोचने लगे। बादमें उन्होंने व्याधको शाप देते समय जो श्लोक कहा था, उसीको उन्होंने ब्रह्मा के के सम्मुख कहा। उसको सुनकर ब्रह्माजी हँसकर मुनिसे कहने लगे ॥ २९ ५ ३० । हे ब्रह्मन् ! तुम्हारे एकाएक कहा हुआ यह श्लोक यशके रूपमें परिणत हो जायगा। इसमें तुम क्षणिक भी संशय न करना। यह तो मेरी इच्छा तथा प्रेरणासे ही तुम्हारे मुखसे यह सरस्वती प्रवृत्त हुई है ॥ ३१ ॥ हे मुनीश्वर ! तुम मेरी आज्ञासे धर्मात्मा क्षमावान् अखिललोकके स्वामी परम बुद्धिमन् राजा रामका संपूर्ण चरित रचो ॥ ३२ ॥ धैर्यशाली तथा बुद्धिमान् रामका जो चरित्र तुमने नारदसे सुना है, वह तथा और भी गुप्त व प्रकट चरित्र हो, उसको तुम रचकर प्रकाशित करो ॥ ३३ । सुमित्रानुज लक्ष्मण सहित रामचन्द्रका, वानरोंका, सब राक्षसोंका तथा सीताका गुप्त अथवा प्रकट जो भी वृत्तान्त तुम न जानते होगे, वह सब भी मेरी कृपासे जान जाओगे और शुभके चरित्रसे भरे हुए उस काव्यमें निहित तुम्हारी वाणी असत्य नहीं होगी ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ तुम ऐसे श्लोकोंमें ही मनको आनन्द देनेवाली पवित्र रामकथा लिखो। जबतक संसारमें सूर्य-चन्द्र रहेंगे, तबतक तुम्हारे रची हुई रामकथा की लोकमें प्रसारित होती रहेगी। जबतक तुम्हारी रची हुई रामकथा पृथ्वीमण्डलपर स्थित रहेगी, तबतक तुम मेरे ऊपरके तथा नीचेके सब लोकोंमें
| १६४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः २ |
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तावदूर्ध्वमधश्च त्वं मन्लोकेषु निवत्स्यसि । इत्युक्त्वा भगवान् ब्रह्मा स्वयं रामस्य धीमतः । ३९॥
चरित्रं श्रावयामास वेदवाक्यैः सुपुण्यदैः । ततः संपूजितो ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत ॥४०॥
ततः सशिष्यो भगवान् मुनिर्विस्मयमाययौ । तस्य शिष्यास्ततः सर्वे जगुः श्लोकमिमं पुनः ॥४१॥
मुहुर्मुहुः प्रीयमाणाः प्राहुश्च भृशविस्मिताः । समाक्षरैश्चतुर्भिर्यः पादैर्गीतो महर्षिणा ।
शोचन्नुव्याहृतोऽभूद्यः शोकः श्लोकत्वमागतः । ४२॥
तस्य बुद्धिरियं जाता महर्षेर्भावितात्मनः । कृत्स्नं रामायणं काव्यमीदृशैः करवाण्यहम् ॥४३॥
उदारवृत्तार्थपदैर्मनोगर्भैस्सदाऽस्य रामस्य चकार कीर्तिमान् ।
समाक्षरैः श्लोकवरैर्यशस्विनो मुनिः स काव्यं शतकोटिमितम् ४४॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीयः सर्गः
श्रीशिव उवाच
वाल्मीकिना कृतं देवि शतकोटिप्रविस्तरम् । रामायणं महाकाव्य जगृहुर्मुनयश्च ते ॥ १ ॥
आश्रमे तत्पठंति स्म कथयंति स्म ते मुदा । तच्छ्रोतुममराः सर्वे विमानैश्च दिवि स्थिताः २ ॥
श्रुत्वा सर्वं सविस्तारं वाल्मीकिं पुष्पवृष्टिभिः । ववृषुर्जगदुश्चंदस्ते प्रशशंसुर्मुनीश्वरम् ॥ ३ ॥
ततो देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नरा । मुनीश्वरा गुह्यकाश्च पार्थिवाः पद्मभूस्त्वहम् । ४ ॥
परस्परं ते कलहं चक्रुः कार्यार्थमादरात् ब्रह्माद्या निर्जराः सर्वे पन्नगान्दितिजान्नरान् ॥ ५ ॥
वय काव्यं विनेष्यामो दिव वाल्मीकिना कृतम् । दितिजाः पन्नगाः प्रोचुर्विनेष्यामो रसातले ॥ ६ ॥
सुखसे रहोगे। इतना कहकर स्वयं भगवान् ब्रह्माने पुण्यप्रद वेदवाक्यों द्वारा बुद्धिमान् रामका चरित्र उन्हें कह सुनाया। पश्चात् मुनिसे पूजित होकर ब्रह्मा वहींपर अन्तर्धान हो गये ॥३९-४०॥ तब शिष्यों सहित भगवान् वाल्मीकि मुनिको बड़ा भारी विस्मय हुआ और उनके शिष्य उस श्लोकका बारम्बार आनन्दसे गान लगे ॥ ४१ ॥ महर्षिने समान अक्षरोंवाला तथा चार चरणों युक्त जिस श्लोकको गाया था, उसको वे शिष्य भी प्रसन्न होकर आश्चर्यसे परस्पर कहने-सुनने लगे ॥ ४२ ॥ उस श्लोकका मुनि शोकरूप बार-बार कहते थे। अन्तमें अहो शोक श्लोक (पद्य) रूपमें परिणत हो गया, पश्चात् उन शुद्धात्मा महर्षिकी यह इच्छा हुई कि मैं इसी प्रकारके श्लोकोंमें समस्त रामायणका निर्माण करूँ ॥ ४३॥ अन्तमें उन कीर्तिमान् मुनिने मनको आनन्द देनेवाला तथा जिससे उदार चरित्र भरे अर्थोंका ज्ञान प्राप्त हो, ऐसे पद और समान अक्षरोंवाले सौ करोड़ श्लोकोंवाला यशस्वी रामका काव्य (रामायण) रचा ॥ ४४॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यात्राकाण्डे भाषाटीकायां श्लोकोत्पत्तिरामायणकथनं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
श्रीशिवजी बोले-हे देवि ! वाल्मीकि मुनिका बनाया हुआ सौ करोड़ श्लोकात्मक उस महाकाव्य रामायणको सब मुनियोंने अपनाया और वे हर्षपूर्वक उसे अपने आश्रमोंमें पढ़ने तथा सुनने लगे । उसको सुननेके लिए सब देवता विमानोंमें बैठकर आकाशमें छा गये ॥ १ ॥ २ ॥ उन लोगोंने विस्तारपूर्वक सम्पूर्ण रामायण सुना और मुनीश्वर वाल्मीकिजीकी स्तुति करके जयजयकार करते हुए उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ ३ ॥ बादमें देवता, गंधर्व यक्ष, नाग, किन्नर, मुनिगण, गुह्यक, राजे-महाराजे, ब्रह्मा तथा मैं सब एक साथ उस रामायण महाकाव्यकी प्राप्तिके लिए परस्पर आदरपूर्वक झगड़ने लगे। ब्रह्मादि देवता पन्नगों, दैत्यों तथा मनुष्योंसे कहने लगे कि इस वाल्मीकीय काव्यको हमलोग स्वर्गमें ले जायँगे दैत्य तथा पन्नग कहने लगे कि हम