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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

२४ दक्षस्मृतिः ॥

लिङ्गेतुमृत्समाख्याता त्रिपर्वपूर्यतेयया ।
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ ८ ॥
त्रिगुणं तु वनस्थानां यतीनां च चतुर्गुणम् ।
दातव्यमुदकं तावन्मृदभावो यथा भवेत् ॥ ९ ॥
मृत्तिकानां सहस्रेण चोदकुम्भशतेन च ।
न शुद्ध्यन्ति दुरात्मानो येषां भावो न निर्मलः ॥ १० ॥
मृदा तोयेन शुद्धिः स्यान्न क्लेशो न धनव्ययः ।
यस्य शौचेऽपि शैथिल्यं चित्तं तस्य परीक्षितम् ॥ ११ ॥
अन्यदेव दिवा शौचमन्यद्रात्रौ विधीयते ।
अन्यदापदिनिर्दिष्टं ह्यन्यदेव ह्यनापदि ॥ १२ ॥
दिवोदितस्य शौचस्य रात्रावर्द्धं विधीयते ।
तदर्धमातुरस्याहुस्त्वरायामर्द्धवर्त्मनि ॥ १३ ॥
न्यूनाधिकं न कर्तव्यं शौचं शुद्धिमभीप्सता ।
प्रायश्चित्तेन युज्येत विहिताऽतिक्रमे कृते ॥ १४ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥


लिंग में इतनी मही लगावे जिस से सब अंगुलियों के तीनों अंगुल भर जावें, यह गृहस्थियों की शुद्धि कही, इस से दूनी ब्रह्मचारियों को ॥ ८ ॥ तिगुनी वानप्रस्थीं को, और चौगुनी संन्यासियों को करनी चाहिये और मही लगाके इतना जल छोड़े जिस से वह सब मही धो जाय ॥ ९ ॥ जिन का अन्तःकरण निर्मल नहीं, वे दुष्टात्मा मनुष्य सहस्रवार मही लगाने वा सौ घड़े जलसे भी शुद्ध नहीं होते ॥ १० ॥ मही और जल से शुद्धि होती है, इस में न तो कछ क्लेश और न धन का कुछ खर्च है. ऐसी शुद्धि करने में भी जिस को आलस्य है, उस के चित्त की परीक्षा हो गयी ॥ ११ ॥ दिन में अन्य, रात्रिमें अन्य, आपत्ति में अन्य, और बिना आपत् के समय अन्य शुद्धि कही है ॥ १२ ॥

दिन में जितनी शुद्धि करे, उससे आधी रात्रि में करे, उससे भी आधी रोगी करे, शीघ्रता के समय और मार्गमें चलने के समय भी आधी शुद्धि करे ॥१३॥

शुद्धिकी इच्छा करने वाला मनुष्य पूर्वोक्त से न्यून वा अधिक शुद्धि न करे । क्योंकि शास्त्र विहित कर्म का उल्लङ्घन करने में प्रायश्चित्त के योग्य हो जाता है ॥ १४ ॥

यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में पांचवां अध्याय पूरा हुआ ॥५॥

भाषार्थसंहिता ॥ २५

आशौचन्तुप्रवक्ष्यामि जन्ममृत्युनिमित्तकम् ।
यावज्जीवंतृतीयंतु यथावदनुपूर्वशः ॥ १ ॥
सद्यःशौचंतथैकाह स्ञ्यहश्चतुरहस्तथा ।
षड्दशद्वादशाहाञ्च पक्षोमासस्तथैवच ॥ २ ॥
मरणान्तंतथाचान्यद्दशपक्षास्तुसूतके ।
उपन्यासक्रमेणैव वक्ष्याम्यहमशेषतः ॥ ३ ॥
ग्रन्थार्थं योविजानाति वेदमङ्गैःसमन्वितम् ।
सकल्पंसरहस्यंच क्रियावांश्चेन्नसूतकी ॥ ४ ॥
राजर्त्विग्दीक्षितानांच बालेदेशान्तरेतथा ।
व्रतिनांसत्रिणांचैव सद्यःशौचंविधीयते ॥ ५ ॥
एकाहाच्छुद्ध्यतेविप्रो योग्निवेदसमन्वितः ।
त्र्यहात्केवलवेदस्तु द्विहीनोदशभिर्दिनैः ॥ ६ ॥
शुद्ध्येद्विप्रोदशाहेन द्वादशाहेनभूमिपः ।

जन्म और मरण निमित्त का आशौच कहते हैं तीसरा आशौच जीवने पर्यन्त का है क्रमसे तीन प्रकार के अशौच शास्त्रोक्त हैं ॥ १ ॥ सद्यः शौच (उसी समय शुद्धि करलेना,) एक दिन, तीन दिन, चार दिन, छः दिन, दश दिन, बारह दिन, पन्द्रह दिन, एकमास॥२॥और मरण पर्यन्त, ये दश पक्ष सूतक में मानेगये हैं। उनको क्रम से हम कहते हैं॥३॥जो पुरुष ग्रन्थों के अर्थको वेदके छः अङ्गों,कल्प और रहस्य के सहित वेदको जानताहै वह यदि श्रौतस्मार्त्त कर्मों को करताहीतो उसको सूतक नहीं लगता । अर्थात् वह स्नानादि करके तत्काल शुद्ध हो जाताहै ॥४॥ राजा, ऋत्विज्, दीक्षित, ( जिस ने यज्ञादि में दीक्षा ले रक्खी हो ) बालक, परदेश में जो रहता हो, व्रती, सत्री ( सत्रयज्ञ में जो बैठे हों ) इन सब को सद्यः तत्काल शुद्धि कही है ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्री तथा वेदपाठी हो वह एकही दिनमें शुद्धि करले । तथा केवल वेदाध्ययन कर्त्ता तीन दिन सूतक माने और अग्निहोत्र तथा वेदाध्ययन दोनों से हीन ब्राह्मण दशदिन में शुद्ध होता है ॥ ६ ॥ जातिमात्र ब्राह्मण को दशदिन का, क्षत्रिय को बारह

२६ दक्षस्मृतिः ॥

वैश्यःपञ्चदशाहेन शूद्रोमासेनशुध्यति ॥ ७ ॥ अस्नात्वाचाप्यहुत्वाच ह्यदत्त्वायैतुभुञ्जते । एवंविधानांसर्वेषां यावज्जीवंहिसूतकम् ॥ ८ ॥ व्याधितस्यकदर्यस्य ऋणग्रस्तस्यसर्वदा । क्रियाहीनस्यमूर्खस्य स्त्रीजितस्यविशेषतः ॥ ९ ॥ व्यसनासक्तचित्तस्य पराधीनस्यनित्यशः ॥ श्रद्धात्यागविहीनस्य भस्मान्तंसूतकंभवेत् ॥ १० ॥ नसूतकंकदाचित्स्याद्यावज्जीवन्तुसूतकम् । एवंगुणविशेषेण सूतकंसमुदाहृतम् ॥ ११ ॥ सूतकेमृतकेचैव तथाचमृतसूतके । एतत्संहतशौचानां मृताशौचेनशुद्ध्यति ॥ १२ ॥ दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायश्चनिवर्त्तते । दशाहात्तुपरंशौचं विप्रोऽर्हतिचधर्म्मवित् ॥ १३ ॥ दानंचविधिनादेयमशुभात्तारकंहितत् ।


दिन का, वैश्य को पन्द्रह दिन का, और शूद्र को महीने भर का सूतक लगता है ॥ ७ ॥ स्नान, होम, अतिथि पूजन आदि न करके जो भोजन करते हैं ऐसे सब मनुष्यों को जीवन पर्यन्त (अशौच) सूतक लगता है ॥८॥ रोगी, कदर्य (कञ्जूस,) सदैव ऋणी, क्रिया कर्मसे हीन, मूर्ख, और विशेष कर स्त्री ने जिसे जीत लिया हो ॥ ९ ॥ व्यसन (जुआ आदि) में जिस का चित्त आसक्त हो, नित्य जो पराधीन हो, श्रद्धा तथा त्याग (वैराग्य) से जो हीन हो उस को भस्मान्त (मरण पर्यन्त) सूतक लगता है ॥ १० ॥ सूतक कभी न हो और जीने तक सूतक रहे इसप्रकार गुण विशेषसे सूतक दो प्रकारका है ॥११॥ जन्म सूतक में यदि मरण सूतक हो तथा मरण सूतक में जन्म सूतक मिलजाय तो दोनों की शुद्धि मरण सूतक के संग होती है ॥ १२ ॥ सूतक में दान देना, प्रतिग्रह (दान लेना) होम, स्वाध्याय (वेदपाठ) ये सब काम निवृत्त हो जाते हैं। धर्म को जानने वाला ब्राह्मण दश दिनके पीछे सब कर्मों के योग्य शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ शास्त्रोक्त विधि से दान देना चाहिये क्योंकि वह दान अशुभ पाप से तारने वाला है। यदि पहिले

चतुर्थेऽहनिकर्तव्यमस्थिसंचयनंद्विजैः ।

भाषार्थसहिता ॥ २७

मृतकान्तेमृतोयस्तु सूतकान्तेचसूतकम् ॥ १४ ॥ एतत्संहतशौचानां पूर्वाशौचेनशुद्ध्यति । उभयत्रदशाहानि कुलस्यान्नंनभुज्यते ॥ १५ ॥ चतुर्थेऽहनिकर्तव्यमस्थिसंचयनंद्विजैः । ततःसंचयनादूर्ध्वमङ्गम्पर्शोविधीयते ॥ १६ ॥ वर्णानामानुलोम्येन स्त्रीणामेकोयदापतिः । दशाहषट्त्र्यहैकाहं प्रसवेसूतकंभवेत् ॥ १७ ॥ स्वस्थकालेत्विदंसर्वमशौचं परिकीर्तितम् । आपद्गतस्यसर्वस्य सूतकेऽपिनसूतकम् ॥ १८॥ यज्ञेप्रवर्तमानैतु जायेतार्थम्रियेतवा । पूर्वसंकल्पितेकार्ये नदोषस्तत्रविद्यते ॥ १९ ॥ यज्ञकालेविवाहेच देवयागेतथैवच । हूयमानेतथाचाग्नौ नाशौचं नापिसूतकम् ॥ २०॥ इति दाक्षे धर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


मरण सूतक का समय पूरा न होने तक जो अन्य कोई मरे अथवा ऐसे ही जन्म सूतक में अन्य जन्म हो जाय तो ॥१४॥ इन मिले हुए सूतकों में पूर्व सूतक के शेष दिनों में दोनों की एक साथ शुद्धि हो सकती है। दोनों सूतकों में दश दिन तक सूतक वाले कुल का अन्न न खावे ॥ १५ ॥ मरण के बाद चौथे दिन विद्वान् द्विज अस्थि संचयन करे। फिर अस्थि संचयन के पीछे सूतक वालों के शरीर का स्पर्श कहा है ॥ १६ ॥ वर्णों के अनुलोम क्रमसे यदि स्त्रियों का पति एक होय तो, ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या, शूद्रा, इन ब्राह्मण की चारों स्त्रियों को क्रम से दश, छः, तीन, एक, दिन का प्रसव में सूतक लगता है ॥१७॥ यह सब सूतक का विचार स्वस्थदशा में कहा है और आपत्तिकाल में सूतक के समय में भी सूतक नहीं लगता ॥ १८ ॥ यज्ञ का आरम्भ होजाने के समय यदि कोई जन्मे वा मरे तो, पूर्व जिस यज्ञ का संकल्प हो गया है उस को करने में दोष नहीं है ॥ १९ ॥ यज्ञ के समय, विवाह में प्रतिष्ठादि देवपूजन में, अग्निहोत्र में, मरण और जन्म दोनों के सूतक नहीं लगते ॥२०॥

यह दक्षस्मृति के भाषानुवाद में छठा अध्याय पूरा हुआ ॥६॥

२८ दक्षस्मृतिः ॥

अतःपरंप्रवक्ष्यामि योगस्यविधिमुत्तमम् ।
लोकावशीकृतायेन येनचात्मावशीकृतः ॥ १ ॥
इन्द्रियार्थास्तपस्तस्य योगंवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २ ॥
प्राणायामस्तथाध्यानं प्रत्याहारोऽथधारणा ।
तर्कश्चैवसमाधिश्च षडङ्गोयोगउच्यते ॥ ३ ॥
मैत्रीक्रियामुदेसर्वा सर्वप्राणिव्यवस्थिता ।
ब्रह्मलोकंनयत्याशु धातारमिवधारणा ॥ ४ ॥
नारण्यसेवनाद्योगो नानेकग्रन्थचिन्तनात् ।
व्रतैैर्यज्ञैस्तपोभिर्वा नयोगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ५ ॥
नचपद्मासनाद्योगो ननासाग्रनिरीक्षणात् ।
नचशास्त्रातिरिक्तेन शौचेनभवतिक्वचित् ॥ ६ ॥
नमन्त्रमौनकुहकैरनेकैःसुकृतैस्तथा ।
लोकयात्राभियुक्तस्य न योगःकस्यचिद्भवेत् ॥ ७ ॥
अभियोगात्तथाभ्यासात्तस्मिन्नेवसुनिश्चयात् ।


अब आगे योग का उत्तम विधान कहते हैं । संसारी लोगों को और अपने आप को जिस ने वश में किया है ॥ १ ॥ इन्द्रिय और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये विषय, ये सब जिसने वश में किये हैं, जो तप करने को तत्पर हो, उस के लिये संपूर्ण योग कहते हैं ॥ २ ॥ प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, तर्क, समाधि ये छः जिस के अंग ( भाग ) हैं उसे योग कहते हैं ॥ ३ ॥ आनन्द प्राप्ति के लिये सब प्राणियों के साथ ईर्ष्या द्वेष बैर विरोध छोड़ के मित्र दृष्टि करे, वह मैत्री योगी को ऐसे ब्रह्मलोक में लेजाती है जैसे धारणा ब्रह्मा जी को ब्रह्मलोक में पहुंचाती है ॥ ४ ॥ केवल वन में रहने से या अनेक ग्रंथों को शोधने विचार ने से, व्रत, यज्ञ और तप करने से किसी को योग नहीं होता ॥ ५ ॥ पद्मासन लगा के बैठसे, नाक के अग्रभाग को देखने से और शास्त्रविरुद्ध अधिक शुद्धि करने से भी योग कभी नहीं होता ॥ ६ ॥ मन्त्र जपने, मौन रहने धूनी लगाने, और अनेक प्रकार के पुण्य करने से और लोक के व्यवहारों में तत्पर रहने, से भी योग नहीं होता ॥ ७ ॥ योग के विचार में तत्परता होने, बार २ लगा तार योग का अभ्यास करने, योग में

भाषार्थसहिता ॥ २९

पुनः पुनश्चनिर्वेदाद्योगः सिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ८
आत्मचिन्ताविनोदेन शौचेनक्रीडनेनच ।
सर्वभूतसमत्वेन योगःसिद्ध्यतिनान्यथा ॥ ९ ॥
यश्चाऽऽत्ममिथुनोनित्यमात्मक्रीडस्तथैवच ।
आत्मानन्दस्तुसतत मात्मन्येवसमाहितः ॥ १० ॥
अस्मिन्नेवसुतृप्तश्च संतुष्टोनाऽन्यमानसः ।
आत्मन्येवसुतृप्तस्य योगोभवतिनान्यथा ॥ ११ ॥
सुप्तोऽपियोगयुक्तञ्च जाग्रदेवविशेषतः ।
ईदृक्चेष्टःस्मृतःश्रेष्ठो वरिष्ठोब्रह्मवादिनाम् ॥ १२ ॥
अस्त्वात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंनैवपश्यति ।
ब्रह्मभूतःसएवेह दक्षपक्षउदाहृतः ॥ १३ ॥
विषयासक्तचित्तोहि कश्चिद्योगंनविन्दति ।
यत्नेनविषयासक्तिं तस्माद्योगीविवर्जयेत् ॥ १४ ॥


ही अटल श्रद्धा विश्वास होने और बार वार संसार से प्रबल उदासीनता वैराग्य होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥ ८ ॥ परमात्मा की चिन्ता के आनंद, शौच, अपने आत्मा में ही क्रीड़ा करने और सब प्राणियों में समदृष्टि होने से योग सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं ॥९॥ जो नित्य ही आत्म विचार में आनन्दित, आत्मा क्रीड़ा में तत्पर, अपने आत्मा में ही आनन्द मानने वाला और निरंतर एकाग्र चित्त से अपने आपे में रहने वाला ॥ १० ॥ इसी अध्यात्म विचार में सम्यक् तृप्त और मन से संतुष्ट रहे अन्य बात में जिस का मन न लगता हो और आत्मा में ही अच्छे प्रकार तृप्त पुरुष को योग सिद्ध होता है, अन्य था नहीं ॥ ११ ॥ सोता हुआ भी योगी विशेष कर जागता ही है, ऐसी जिस की चेष्टा हो, वही श्रेष्ठ तथा ब्रह्मवादियों में बड़ा है ॥ १२ ॥ जो योगी विद्वान् अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता अर्थात् सब प्राणियों को एक ब्रह्मात्मरूप अभेद भाव से देखता है वही ब्रह्मरूप दक्ष ऋषि के पक्ष में कहा है ॥ १३ ॥ विषयों में जिसका चित्त आसक्त है, वह कोई भी योग को प्राप्त नहीं होता तिससे योगी पुरुष विषयों की फसावट को बड़े यत्न से छोड़ देवे ॥ १४ ॥

३० दक्षस्मृतिः ॥

विषयेन्द्रियसंयोगं केचिद्योगंवदन्तिवै । अधर्मोधर्मबुद्ध्यातु गृहीतस्तैरपण्डितैः ॥ १५ ॥

आत्मनोमनसश्चैव संयोगन्तुततःपरम् । उत्तानमनसोह्येते केवलंयोगवञ्चिताः ॥ १६ ॥

वृत्तिहीनंमनःकृत्वा क्षेत्रज्ञंपरमात्मनि । एकीकृत्यविमुच्येत योगोऽयंमुख्यउच्यते ॥ १७ ॥

कषायमोहविक्षेप लज्जाशङ्कादिचेतसः । व्यापारास्तुसमाख्यातास्तान्जित्वावशमानयेत् ॥१८॥

कुटुम्बैःपञ्चभिर्ग्रामः षष्ठस्तत्रमहत्तमः । देवासुरैर्मनुष्यैश्च सजंतुर्नैवशक्यते ॥ १९ ॥

मनसैवेन्द्रियाण्यत्र मनश्चात्मनियोजयेत् । सर्वभावविनिर्मुक्तं क्षेत्रज्ञंब्रह्मणिन्यसेत् ॥ २० ॥

बलेनपरराष्ट्राणि गृह्णन्शूरस्तुनोच्यते । जितोयेनेन्द्रियग्रामः सशूरःकथ्यतेबुधैः ॥ २१ ॥


कोई मनुष्य विषय और इन्द्रियों के संयोग को ही योग कहते हैं। उन निर्बुद्धियों ने अधर्म को धर्म बुद्धि से ग्रहण किया जानो ॥१५॥ तथा अन्य कोई लोग आत्मा और मन के संयोग को योग कहते हैं। ये लोग उत्कृष्ट चित्त वाले होने से केवल योग से वञ्चित रहते हैं ॥ १६ ॥ मन को वृत्तियों से हीन निश्चल करके और क्षेत्रज्ञ आत्मा को परमात्मा में एक करके मुक्त हो जाय यह मुख्य योग कहा है ॥ १७ ॥ कषाय (मन की मलिनता) मोह (अविद्या) विक्षेप (चित्त की चञ्चलता) लज्जा और शंका इत्यादि चित्त के व्यापार कहे हैं। उन कषायादि व्यापारों को जीत कर मन को वश में करे ॥ १८ ॥ पांच कुटुम्बों (५ इन्द्रियों) का ग्राम होता है और उस ग्राम में छठा (मन) अत्यन्त बड़ा है उस को देवता मनुष्य और असुर भी जीतने को समर्थ नहीं होते ॥ १९ ॥ इन्द्रियों को मन से रोक कर और मन को आत्मा में युक्त करे और सब भावों (पदार्थों) से रहित क्षेत्रज्ञ आत्मा को ब्रह्म में लीन करे ॥२०॥ जो बल से पराये राज्यों को छीन ले वह शूर नहीं कहाता किन्तु विद्वान् जन उसे ही शूर कहते हैं जिस ने सब इन्द्रियों को जीत लिया है ॥ २१ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ३१

बहिर्मुखानिसर्वाणि कृत्वाचान्तर्मुखानिवै ।
एतद्ध्यानंतथाज्ञानं शेषस्तुग्रन्थविस्तरः ॥ २२ ॥
त्यक्त्वाविषयभोगांस्तु मनानिश्चलताङ्गतम् ।
आत्मशक्तिस्वरूपेण समाधिःपरिकीर्तितः ॥ २३ ॥
चतुर्णांसन्निकर्षेण फलंयत्तदशाश्वतम् ।
द्वयोस्तुसन्निकर्षेण शाश्वतंपदमव्ययम् ॥ २४ ॥
यन्नास्तिसर्वलोकस्य तदस्तीतिविरुद्धयते ।
कथ्यमानंतथान्यस्य हृदयेनावतिष्ठते ॥ २५ ॥
स्वयंवेद्यंचतद्ब्रह्म कुमारीमैथुनंयथा ।
अयोगीनैवजानाति जात्यन्धोहियथाघटम् ॥ २६ ॥
नित्याभ्यसनशीलस्य स्वसंवेद्यंहितद्भवेत् ।


बहिर्मुख (विषयों में लगी) सब इन्द्रियों को अन्तर्मुख (आत्मा में लीन) करके जो योगी रहता है, यही ध्यान और ज्ञान है। बाकी सब ग्रन्थों का विस्तार है ॥ २२ ॥ संसारी विषय भोगों को त्याग कर आत्मा की शक्ति रूप से निश्चय कर निश्चल हुआ जो मन उसे समाधि कहते हैं ॥ २३ ॥ चारो आश्रम के सामान का संग्रह से वा चार आश्रमियों के मेल से जो फल होता है वह अनित्य है और पिछले दो आश्रमी वानप्रस्थ तथा संन्यासी के मेल से सनातन अविनाशी ब्रह्मपद प्राप्त होता है। सब लोगों को जो ब्रह्म नास्ति अभावसा प्रतीत होता है। वह अस्ति शब्द से कहना विरुद्ध पड़ता है इसी से कहा हुआ भी दूसरे के हृदय में नहीं ठहरता अचल विश्वास नहीं जमता ॥ २५ ॥ वह ब्रह्म इस प्रकार स्वयं जानने योग्य है कि जैसे कुमारी का मैथुन (युवति स्त्री को अनुकूल युवा पतिके प्रथम ही संयोग में जो आनन्द होता है वह अकथनीय स्वयं ज्ञेय होता है वैसे ही ब्रह्मज्ञान का आनन्द भी कहने में नहीं आ सकता) और योग मार्ग से हीन पुरुष उस ब्रह्म को इस प्रकार नहीं जानता जैसे जन्मान्ध पुरुष घट के रूप को नहीं देख सकता ॥२६॥

नित्य योगाभ्यास के स्वभाव वाले मनुष्य को अनायास से ब्रह्म स्वयं जानने योग्य होता है। वह सूक्ष्म होने से सनातन पर ब्रह्म अनिर्देश्य (दिखाने

३२ | दक्षस्मृतिः ॥

तत्सूक्ष्मत्वादनिर्देश्यं परंब्रह्मसनातनम् ॥ २७ ॥
बुधास्त्वाभरणंभारं मलमालेपनंतथा ।
मन्यन्तेस्त्रीचमूर्खश्च तदेवबहुमन्यते ॥ २८
सत्वोत्कटाःसुराःसर्वे विषयैश्चवशीकृताः ।
प्रमादिनिक्षुद्रसत्त्वे मनुष्येचात्रकाकथा ॥ २९ ॥
तस्मात्त्यक्तकषायेन कर्तव्यंदण्डधारणम् ।
इतरस्तुनाशक्नोति विषयैरभिभूयते ॥ ३० ॥
नस्थिरंक्षणमप्येकमुदकंचयथोर्मिभिः ।
वाताहतंतथाचित्तं तस्मात्तस्यनविश्वसेत् ॥ ३१ ॥
ब्रह्मचर्यंसदारक्षेद्दष्टधामैथुनंपृथक् ।
स्मरणंकीर्तनंकेलिः प्रेक्षणंगुह्यभाषणम् ॥ ३२ ॥
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेवच ।
एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्तिमनीषिणः ॥ ३३ ॥
वैणवेनत्रिदण्डेन नत्रिदण्डीतिकथ्यते ।


के अयोग्य नहीं) है ॥२७॥ पण्डित लोग आभूषणों के धारण को बोझा तथा शरीर पर मलिनता का लेपन मानते हैं। स्त्री और मूर्ख लोग आभूषण को ही बहुत उत्तम मानते हैं ॥ २८ प्रबल सत्व गुण वाले सब देवता भी विषयों ने जब अपने वशमें करलिये तब प्रमादी (भूल में पड़े) कम सत्त्व गुण वाले मनुष्यों के कामादि वश होनेका कहना ही क्या है ! ॥ २९ ॥ तिससे जिस ने मन की मलिनता त्यागी हो वह विषयों के साथ युद्ध करने के लिये दंड का धारण करै। जिस ने मन की मलिनता नहीं त्यागी वह दंड धारण के लिये समर्थ नहीं होता, क्योंकि विषय ही उस को दबालेते हैं ॥ ३० ॥ जैसे तरंगों के उठने से जल एक क्षण मात्र भी स्थिर नहीं रहता इसी प्रकार विषय वासनाओं के वायु से चलायमान हुए चित्त का भी अनुचित विषयों में न फंसने का विश्वास न करै ॥ ३१ ॥ आठो प्रकार के मैथुन से ब्रह्मचर्य की सदैव रक्षा करै । सुन्दरी युवति स्त्रियों का स्मरण, कीर्तन (उन के अङ्ग प्रत्यङ्गों का वर्णन करना, क्रीड़ा (स्त्रियों के साथ खेलना) प्रेक्षण (देखना) एकान्त में बातें करना, संकल्प (स्त्री संग का मनोरथ होना) अध्यवसाय (संग करने का दृढ़ निश्चय) क्रिया की सिद्धिअर्थात् साक्षात् संयोग करना यह आठ प्रकार का मैथुन बुद्धिमान् कहते हैं ॥३३॥ बांस के त्रिदण्ड रखने से संन्यासी

भाषार्थसहिता ॥ ३३

अध्यात्मदण्डयुक्तोयः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३४ ॥
वाग्दण्डोऽथमनोदण्डः कर्मदण्डश्चतेत्रयः ।
यस्यैतेतुत्रयोदण्डाः सन्त्रिदण्डीतिकथ्यते ॥ ३५ ॥
त्रिदण्डव्यपदेशेन जीवन्तिबहवोनराः ।
यस्तुब्रह्म नजानाति नत्रिदण्डीहिसस्मृतः ॥ ३६ ॥
नाध्येतव्यंन वक्तव्यं नश्रोतव्यंकथञ्चन ।
एतैः सर्वैःसुसंपन्नोयतिर्भवतिनेतरः ॥ ३७ ॥
पारिव्राज्यंगृहीत्वातु यःस्वधर्मेनतिष्ठति ।
श्वपदेनाङ्कयित्वातं राजाशीघ्रंप्रवासयेत् ॥ ३८ ॥
एकोभिक्षुर्यथोक्तस्तु द्वौभिक्षुमिथुनंस्मृतम् ।
त्रयोग्रामःसमाख्यात ऊर्ध्वंतुनगरायते ॥ ३९ ॥
नगरंहिनकर्त्तव्यं ग्रामोवामिथुनंतथा ।
एतत्त्रयंप्रकुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवतेयतिः ॥ ४० ॥
राजवार्त्तादितेषांतु भिक्षावार्त्तापरस्परम् ।


त्रिदण्डी नहीं कहाता किन्तु अध्यात्म विचार से काम क्रोध लोभ को पकड़ के वश में रखने ते त्रिदण्डी कहाता है ॥३४॥ तथा द्वितीय प्रकार यह है कि वाणी, मन, और शरीर को दण्ड के समान पकड़ के वश में रखने से भी संन्यासी त्रिदण्डी कहाता है ॥३५॥ त्रिदण्ड के बहाने से कि हम त्रिदण्डी संन्यासी सर्वमान्य जगद्गुरु हैं ऐसा प्रसिद्ध करते हुए बहुत से साधु जीविका करते हैं परन्तु जो ब्रह्म को नहीं जानता वह त्रिदंडी ( संन्यासी ) नहीं है ॥ ३६ ॥ न पढ़े न उपदेश व्याख्यान करे, न कथा उपदेशादि सुने किन्तु इन से जो युक्त हो वही संन्यासी है अन्य नहीं ॥ ३७ ॥ जो संन्यास लेकर अपने धर्म पर स्थिर न रहे उस के मस्तक पर कुत्ते के पग का दाग देकर शीघ्र ही राजा देश से निकलवा देवे ॥ ३८ ॥ संन्यासी अकेला रहे तो ठीक उचित है दो मिलकर रहे तो मिथुन कहाते हैं । तीन मनुष्यों के संगम को ग्राम कहते हैं इस से अधिकों का संग नगर कहाता है ॥ ३९ ॥ इस से संन्यासी ग्राम नगर दोनों ही को त्यागे और किसी दूसरे को भी साथ न रक्खे दूसरे का साथी होना मिथुन है । इन तीन को जो संन्यासी करता है वह अपने धर्म से पतित हो जाता है ॥४०॥ क्योंकि एक से अधिक दो आदि के मिलने से राजा की अथवा भिक्षा की बातें परस्पर होती हैं ।

३४ दक्षस्मृति ॥

स्नेहपैशुन्यमात्सर्यं सन्निकर्षान्नसंशयः ॥ ४१ ॥
लाभपूजानिमित्तं हि व्याख्यानं शिष्यसंग्रहः ।
एते चान्ये च बहवः प्रपञ्चास्तु तपस्विनाम् ॥ ४२ ॥
ध्यानं शौचं तथा भिक्षा नित्यमेकान्तशीलता ।
भिक्षोश्चत्वारिकर्माणि पञ्चमंनोपपद्यते ॥ ४३ ॥
यस्मिन्देशे वसेद्योगी ध्यानयोगविचक्षणः ।
सोऽपि देशो भवेत्पूतः किं पुनस्तस्य बान्धवाः ॥ ४४ ॥
तपोजपैः कृशीभूत्वा व्याधितावसथार्हणः ।
वृद्धारोगगृहीताश्च ये चान्ये विकलेन्द्रियाः ॥ ४५ ॥
नारुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथार्हतः ।
संदूषयति तत्स्थानं वृद्धादीन्पीडयत्यपि ॥ ४६ ॥
नीरुजश्च युवा चैव ब्रह्मचर्याद्विनश्यति ।


प्रेम की बाते, चुगली की चर्चा, निन्दा स्तुति, मत्सरता, ये राज वार्त्तादि कई के मिलने से अवश्य निःसन्देह होती हैं ॥ ४१ ॥ उपदेश व्याख्यान करना कथा सुनाना और बहुत शिष्यों को रखना, इन इत्यादि कामों को संन्यासी लोग धन वस्त्रादि का लाभ और प्रशंसा प्रतिष्ठा होने के लिये करते हैं । सो ऐसे अन्य भी बहुत प्रपञ्च तपस्वी लोगोंको अधोगति में गिराते हैं ॥ ४२ ॥ ध्यान करना, शुद्धि करना, भिक्षा मांगकर खाना, और सब से पृथक् एकान्त में ठहरने का स्वभाव, संन्यासी के ये चार कर्म मुख्य तथा नित्य कर्त्तव्य हैं पांचवां सिद्ध नहीं होता ॥ ४३ ॥ ध्यान योगाभ्यास करने में चतुर योगी संन्यासी जिस देश में बसता है। वह देश भी जब पवित्र होजाता है तब उसके कुटुम्बी लोग पवित्र क्यों न होंगे ? ॥ ४४ ॥ तप तथा जप करनेसे कृश हल्के शरीर वाले होके जो रोगी हो गये हैं वे किसी छये पटे घर में निवास करें। तथा जो वृद्ध हों, रोग से युक्त हों और जो लूले, लंगड़े, अन्धे आदि हो गये हों वेभी किसी घर में बसें ॥ ४५ ॥

जो रोगसे हीन युवा अवस्था का संन्यासी हो वह घर में बसाने योग्य नहीं है। वह उस स्थान को दोष युक्त करता और वृद्ध आदि को दुःख देता है ॥ ४६ ॥ रोग हीन और युवा अवस्था का भिक्षु ब्रह्मचर्य से नष्ट हो जाता

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३५

ब्रह्मचर्याद्विनष्टश्च कुलगोत्रंचनाशयेत् ॥ ४७ ॥
वसन्नावसथेभिक्षुर्मैथुनंयदिसेवते ।
तस्यावसथनाशःस्यात्कुलान्यपिनिकृन्तति ॥ ४८ ॥
आश्रमेतुयतिर्यस्य मुहूर्तर्मापविश्रमेत् ।
किंतस्यान्येनधर्मेण कृतकृत्योऽभिजायते ॥ ४९ ॥
संचितंयदगृहस्थेन पापमामरणान्तिकम् ।
निर्दहत्येवतत्सर्वमेकरात्रोषितोयतिः ॥ ५० ॥
अध्वश्रमपरिश्रान्तं यस्तुभोजयतेयतिम् ।
अखिलंभोजितंतेन त्रैलोक्यंसचराचरम् ॥ ५१ ॥
द्वैतंचैवतथाद्वैतं द्वैताद्वैतंतथैवच ।
नद्वैतं नापिचाद्वैत मित्येतत्पारमार्थिकम् ॥ ५२ ॥
नाहंनैवतुसंबंधो ब्रह्मभावेनभावितः ।
ईदृशायांत्ववस्थायामवाप्तं परंमपदम् ॥ ५३ ॥
द्वैतपक्षःसमाख्यातो यद्वै तेतुव्यवस्थिताः ।


है। ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट हुआ अपने कुल और गोत्र को भी नष्ट करदेता है ॥४७॥ किसी के घरमें बसता हुआ संन्यासी यदि मैथुन करे तो-उस घर के स्वामी को और कुलों को जड़मूल से नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ जिस के आश्रम में शुद्ध संन्यासी मुहूर्त मात्र दो घड़ी भी विश्राम करे, उसको अन्य धर्म के करने से क्या प्रयोजन है ? क्योंकि वह उस के विश्राम से ही कृतकृत्य हो जाता है ॥ ॥४९॥ अपने देह में गृहस्थ पुरुष ने जो पाप जन्मभर में संचय (इकट्ठा) किया है ॥ उस सब को एक रात भर बसा हुआ भी यति नष्ट कर ही देता है ॥५०॥ मार्ग में चलने के परिश्रम से श्रांत (थके) हुए यति संन्यासी को जो जिमाता है। उस ने जानो चर अचर सब त्रिलोकी को जिमादिया ॥ ५१ ॥ द्वैत ( दो जीव ब्रह्म वा प्रकृति पुरुष को पृथक् २ देखना ), अद्वैत ( केवल एक ब्रह्म को देखना ) द्वैत, अद्वैत, दोनों को संसार परमार्थ भेद से ठीक मानना ये तीन पक्ष हैं। न द्वैत है और न अद्वैत है यही पारमार्थिक ( सच्चा ) ज्ञान है ॥ ५२ ॥ न मैं कोई हूं और न मेरा कुछ है न मेरा किसी से संबंध है किन्तु मैं ब्रह्म रूप हूं ऐसी अवस्था में परम पद प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥ जो द्वैत विचार में स्थित हैं उन के लिये द्वैत पक्ष कहा गया है। अद्वैत पक्ष वालों का

३६ दक्षस्मृतिः ॥

अद्वैतानांप्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रस्यनिश्चयः ॥ ५४ ॥
अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयंयोनपश्यति ।
अतःशास्त्राण्यधीयन्ते श्रूयन्तेग्रन्थविस्तराः ॥ ५५ ॥
दक्षशास्त्रेयथाप्रोक्तमाश्रमप्रतिपालनम् ।
अधीयन्तेतुयेविप्रास्तेयान्त्यमरलोकताम् ॥ ५६ ॥
इदंतुयःपठेद्भक्त्या श्रृणुयादपियोनरः ।
सपुत्रपौत्रपशुमान् कीर्त्तिंचसमवाप्नुयात् ॥ ५७ ॥
श्रावयित्वात्विदंशास्त्रं श्राद्धकालेऽपियोद्विजः ।
अक्षय्यंभवतित्छ्राद्धं पितॄंश्चैवोपतिष्ठते ॥ ५८ ॥
इति दाक्षे धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इति दक्षस्मृतिः समाप्ता ॥


शास्त्रानुसार जैसा निश्चय है उस को कहते हैं ॥ ५४ ॥ इस अद्वैत विषय में जो अपने आत्मा से भिन्न द्वितीय को नहीं देखता इसी से शास्त्रों को पढ़ते और ग्रन्थों के विस्तारों को सुनते हैं ॥ ५५ ॥ दक्ष ऋषि के इस धर्म शास्त्र में कहे आश्रमों के धर्म का प्रतिपालन करते और जो ब्राह्मण इस धर्म शास्त्र को पढ़ते हैं वे देवलोक को प्राप्त होते हैं ॥ ५६ ॥ जो इस शास्त्र को भक्ति से पढ़े अथवा जो अधम वर्ण भी इस को सुने वह मनुष्य पुत्र पौत्र और पशु-ओं वाला होकर कीर्ति को प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ श्राद्ध के समय इस शास्त्र को जो द्विज सुनाता है। उस का श्राद्ध अक्षय फलदायी होता और पितरों को श्राद्ध का फल प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥

यह दक्षस्मृति के पं० भीमसेन शर्म कृत भाषानुवाद में सातवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ और यह स्मृति भी समाप्त हुई ॥

अथ गौतमस्मृतिप्रारम्भः

वेदो धर्ममूलं तद्विदां च स्मृतिशीले ॥१॥ दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महतां नतु दृष्टोऽर्थोऽवरदौर्बल्यात्तुल्यबलविरोघे विकल्पः ॥२॥ उपनयनं ब्राह्मणस्याष्टमे नवमे पंचमे वा काम्यं गर्भादिः संख्यावर्षाणां तद्द्वितीयं जन्म ॥३॥ तद्यस्मात्स आचार्यों वेदानुवचनाच्च ॥ ४ ॥ एकादशद्वादशयोः क्षत्रियवैश्ययोः ॥ ५ ॥ आषोडशाद्ब्राह्मणस्यापतिता सावित्री द्वाविंशतेराजन्यस्य द्व्यधिकाया वैश्यस्य ॥६ ॥ मौञ्जीज्यामौर्वी सौत्र्यो मेखलाः क्रमेण कृष्णरुरुबस्ताजिनानि


भाषार्थः—धर्मका मूल वेद है और वेदको जानने वाले मनु आदि महर्षियों के स्मृति और स्वभाव भी धर्मके मूल हैं ॥ १ ॥ धर्मका व्यतिक्रम (कुछ का कुछ हो जाना) और धर्मबाधक साहस [बिना विचारे काम करना] भी देखा जाता है। परन्तु महापुरुषों के विचार से दृष्टार्थ (जिस का फल इसी लोक में हो) धर्म उत्तम नही है। दृष्टार्थ अदृष्टार्थ दोनों में तुल्य बल विरोध प्रतीत हो तो अवर नाम दृष्टार्थ के निर्बल होने से अदृष्टार्थ को मुख्य जानो ॥ २ ॥ ब्राह्मण का यज्ञोपवीत गर्भस्थिति के समय से आठवें वा नववें वर्ष में करना चाहिये। यदि ब्रह्मतेज की कामना से उपनयन करना होय तो पांचवें वर्ष में करे। वर्षों की गिनती सर्वत्र गर्भसे लेनी चाहिये। यज्ञोपवीत संस्कार दूसरा जन्म है ॥ ३ ॥ द्वितीय जन्मका दाता आचार्य है। वेद पढ़ाने से भी आचार्य द्वितीय जन्म का पिता है ॥ ४ ॥ ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत करना चाहिये ॥ ५ ॥ सोलह वर्ष तक ब्राह्मण बाईस वर्ष तक क्षत्रिय और चौबीस वर्ष तक वैश्य सावित्री नाम अपने २ गुरु मन्त्र से पतित नहीं होते अर्थात् मन्त्रोपदेश के गौण अधिकारी रहते हैं ॥ ६ ॥ ब्राह्मण की मूंज की क्षत्रिय की मूर्वा नामक घास की

२ गौतमस्मृति ॥

वासांसि शाणक्षौमचीरकुतपाः सर्वेषां कार्पासं चाविकृतम् ॥ ७ ॥ काषायमप्येके ॥ ८ ॥ वार्क्षं ब्राह्मणस्य माञ्जिष्ठहारिद्रे इतरयोः ॥ ९ ॥ बैल्वपालाशौ ब्राह्मणस्य दण्डौ ॥१०॥ आश्वत्थपैलवौ शेषे ॥ ११ ॥ यज्ञिया वा सर्वेषाम् ॥ १२ ॥ अपीडितायूपवक्राः सबल्कला मूर्द्धललाटनासाग्रप्रमाणा मुण्डजटिलशिखाजटाश्च ॥ १३ ॥ द्रव्यहस्तउच्छिष्टोऽनिधायाचामेत् ॥ १४ ॥ द्रव्यशुद्धिः परिमार्जनप्रदाहतक्षणनिर्णेजनानि तैजसमार्त्तिकदारवतान्र्तवानाम् ॥ १५ ॥ तैजसवदुपलमणिशंखशुक्तीनां दारुवदस्थिभूम्योरावपनं च

और वैश्य ब्रह्मचारी की सूत की मेखला नाम कन्धनी बनावे। काले मृग का रुरुमृग का, और बकरे का चर्म, शण अलसी, और पहाड़ी ऊन के वस्त्र क्रम से हों अथवा कोई आचार्य यह कहते हैं कि तीनों वर्षों के ब्रह्मचारियों को कपासके नवीन वस्त्र हों ॥ ७ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि गेरूंमें रंगे वस्त्र सब ब्रह्मचारी धारण करें ॥ ८ ॥ वृक्ष की बल्कल का खाखी वा बदामी सुनहरी रंग का वस्त्र ब्राह्मण ब्रह्मचारी का, मजीठ का लाल रंग क्षत्रिय का और हल्दी का पीला रंग वैश्य ब्रह्मचारी के वस्त्रों का होना चाहिये ॥ ९ ॥ बेल वा ढांक का दण्ड ब्राह्मण का हो ॥ १० ॥ पीपल का क्षत्रिय और पीलू [ जाल वृक्ष ] का दण्ड वैश्य ब्रह्मचारी धारण करे ॥ ११ ॥ अथवा सब वर्णों के ब्रह्मचारी किसी यज्ञिय वृक्ष का दण्ड धारण करें ॥ १२ ॥ और वे तीनों दण्ड फटे टूटे नहीं वा यज्ञके यूपस्तम्भ कीसी बनावट के हों, बल्कल सहित हों, ब्राह्मण का दण्ड मूर्द्धा तक, क्षत्रिय का मस्तक तक और वैश्य का नासिका तक प्रमाण का हो, और तीनों ब्रह्मचारी मुण्ड, जटिल, अथवा केवल शिखामात्रजटा रखने वाले हों ॥ १३ ॥ यदि कोई द्रव्य (वस्तु) हाथ में होय और उच्छिष्ट हो जाय तो उस को नीचे रक्खे विना ही आचमन करे ॥ १४ ॥ अब द्रव्यों की शुद्धि कहते हैं-तेजस् धातु के पात्रों की मांजने धोने से, मट्टी के पात्रों की फिर अग्नि में पकाने से, लकड़ी के पात्रों की छीलने से, और सूत के वस्त्रों की पखोरने से शुद्धि होती है ॥ १५ ॥ पत्थर, मणि (मूंगा) शंख, सीपी, इन की शुद्धि तेजस (धातु) के समान मांजने धोने से होती है। हड्डी से बने पदार्थों और भूमिकी शुद्धि काष्ठ के समान छीलने से होती है।

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३

भूमेरश्चै लवद्रज्जुविदलचर्म्मणामुत्सर्गो ऽवात्यन्तोपहतानाम्। १६ प्राङ्मुखउदङ्मुखो वा शौचमारभेत् ॥ १७ ॥ शुचौ देश आसीनो दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा कृत्वा यज्ञोपवीत्यामणि- बन्धनात्पाणी प्रक्षाल्य वाग्यतो हृदयस्पृशस्त्रिश्चतुर्वाऽप- आचामेद् द्विःपरिमृज्यात्पादौ चाभ्युक्षेत् खानिचोपस्पृशे- च्छीर्षण्णानि मूर्द्धनि च दद्यात् ॥ १८ ॥ सुप्त्वा भुक्त्वा क्षुत्वा चपुनः ॥ १९ ॥ दन्तश्लिष्टेषु दन्तवदन्यत्र जिह्वा भिमर्शनात् प्राक्च्युतेरित्येके ॥ २० ॥ च्युतेरास्राववद्विद्यान्निगिरन्नेवत- च्छुचिः ॥ २१॥ न मुख्या विप्रुष उच्छिष्टं कुर्वन्ति ताश्चेदङ्- गे निपतन्ति ॥ २२॥ लेपगन्धापकर्षणे शौचममेध्यस्य ॥२३॥ तदद्भिः पूर्वं मृदा च मूत्रपुरीषरेतोविसंसनाभ्यवहारसंयोगेषु


भूमि की शुद्धि जोतने से भी होती है। रस्सी बिदल (बांस के पात्र) तथा चर्म पात्रों की शुद्धि वस्त्रों के समान पछारने से होती है। यदि ये सब अत्यन्त भ्रष्ट हो गये हों तो त्याग देवे ॥ १६ ॥ पूर्व को वा उत्तर को मुख करके शौच (मल मूत्र के त्याग) का प्रारंभ करै ॥१७॥ अब आचमन करने की विधि कहते हैं कि शुद्ध देश में बैठा दहिनी भुजा को गोड़ों के बीच करके सव्य यज्ञोपवीत धारण किये हुये गट्टों (पहुंचो) तक दोनों हाथ धोकर मौन हुआ जो हृदय तक पहुंचे इतने जल से तीन वा चार वार आचमन करै पश्चात् दो बार मुख को शुद्ध करै और पगों को भी धोवे। शिर के आंखें, नाक, कान, मुख इन सातों छिद्रों का स्पर्श करै और मूर्द्धा पर भी जल का मार्जन करै ॥ १८ ॥ शयन, भोजन, करके तथा छींक कर फिर आचमन और इन्द्रिय स्पर्श करै ॥१९॥ यदि जिह्वा से स्पर्श न हो तो दांतों में लगा अन्नादि दांतों के समान अशुद्ध नहीं है। कोई आचार्य यह कहते हैं कि जब तक दांतों से पृथक् न हो तब तक दांतों के समान है ॥ २० ॥ और दांतों से पृथक् होने पर आस्राव (मुख से जल गिरना) के समान है इस से उस को निगल लेने पर शुद्ध हो जाता है ॥ २१ ॥ जो मुख के जल की बूंद वा छींटें अपने अंग पर गिरें तो वे अशुद्ध नहीं करतीं ॥ २२ ॥ अशुद्ध वस्तु का लेप और गन्ध दूर कर देने पर अशुद्ध वस्तु के लगी अशुद्धि निवृत्त हो जाती है ॥ २३ ॥ उस अशुद्ध वस्तु को प्रथम

४ गौतमस्मृतिः ॥

च यत्र चाम्नायो विदध्यात् ॥ २४ ॥ पाणिना सव्यमुपसंगृ- ह्याऽङ्गुष्ठमधीहि भोइत्यामन्त्रयेत गुरुः ॥ २५ ॥ तत्र चक्षुर्मनः प्राणोपस्पर्शनं दर्भैःप्राणायामास्त्रयः पञ्चदशमात्राः प्राक्कूले- ष्वासनं च ओंपूर्वा व्याहृतयः पञ्चसप्तान्ताः ॥ २६ ॥ गुरोः पा- दोपसंग्रहणं प्रातर्ब्रह्मानुवचने चाद्यन्तयोरनुज्ञातउपविशेत् ॥२७॥ प्राङ्मुखो दक्षिणतः शिष्य उदङ्मुखो वा सावित्रीं चानु- वचनमादितो ब्राह्मण आदाने ओंकारस्यांन्यत्रापि ॥ २८ ॥ अन्तरागमने पुनरुपसदनंश्वनकुलमण्डूकसर्प्पमार्ज्जाराणां त्र्यहमुपवासो विप्रवासश्च ॥ २९ ॥ प्राणायामा घृतप्राशनं


जल से धो कर फिर मट्टी से मांज कर जल से धोवे । यदि मूत्र, विष्ठा लग- जाय वा वीर्य स्खलित हो जाय वा अशुद्ध वस्तु खालेवे इन में जहां वेद वा स्मृतियों में जैसी शुद्धि कही हो वहां वैसी ही मट्टी जल से शुद्धि करे ॥ २४॥ अपने हाथ से शिष्य का दाहिने हाथ का अंगूठा पकड़ कर भोः शिष्य ! तूं पढ़ ऐसे गुरु बुलावे ॥ २५ ॥ शिष्य जब गुरु के पास वेद पढ़ने को बैठे उस से पहिले आंखें हृदय और नासिका का कुशों से मार्जन करे फिर पूर्व को जिन का अग्रभाग हो ऐसे कुश विछा कर उन पर बैठ कर से गुरु मुख से वेद पढ़ने के समय वा अन्यत्र वेदाध्ययन के आरम्भ में अथवा ओंकार के जप के प्रारम्भ में पन्द्रह अंगुल तक जिन के श्वास वायु की गति हो ऐसे तीन प्राणायाम करे फिर (प्रणव) ओं पूर्वक पांच वा सात व्याहृतियों का उ- च्चारण करे ॥ २६ ॥ प्रातःकाल वेद पढ़ाने के आरम्भ तथा समाप्ति समय शि- ष्य खड़ा होकर गुरु के पगों का स्पर्श (व्यत्यस्त हाथों से जिस में दहिने हाथ से दहिना पग और वाम से बांया छुआ जाय) करके खड़ा रहे और गुरु आज्ञा देवें तब बैठ जावे ॥ २७ ॥ गुरु से दक्षिण ओर पूर्व अथवा उत्तर को मुख करके शिष्य बैठ कर प्रथम प्रणव व्याहृति सहित गायत्री मन्त्र का उच्चारण करे ॥ २८ ॥ यदि वेदाध्ययन के समय कुत्ता, न्योला, मेंढक सांप, विलाव, ये जीव गुरुशिष्य के बीच से निकल जायं तो ब्राह्मण वेदपढ़ना रोक देवे तथा तीन दिन बन में रहकर उपवास करे ॥२९॥ क्षत्रिय और वैश्य

भाषाधर्मसंहिता ॥ ५

चेतरेषाम् ॥ ३०॥ श्मशानाध्ययने चैवम् ॥ ३१ ॥

इति श्रीगौतमीये धर्म्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥१॥

प्रागुपनयनात्कामचारवादभक्षोऽहुतोऽब्रह्मचारी यथोपपादंमूत्रपुरीषो भवति नास्याचमनकल्पो विद्यतेऽन्यत्रापमार्ज्जनप्रधावनावोक्षणेभ्यो न तदुपस्पर्शनादशौचं नत्वेवैनमग्निहवनबलिवरणयोर्नियुञ्ज्यान्न ब्रह्माभिव्याहारयेदन्यत्र स्वधानिनयनात् ॥ १ ॥ उपनयनादिनियमः ॥ २॥ उक्तं ब्रह्मचर्यमग्नीन्धनभैक्षचरणे सत्यवचनमपामुपस्पर्शनम् ॥ ३ ॥

प्राणायाम करके घृत को चाटै ॥३०॥ श्मशान (मरघट) के समीप वेद पढ़ने में भी यही प्रायश्चित्त करै ॥ ३१ ॥

यह गौतम स्मृति के भाषानुवाद में प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

यज्ञोपवीत से पहिले बाल्यावस्था में बातचीत करने, बोलने, और भोजन में कामचार है (धर्म शास्त्र के अनुसार नियम नहीं) होम और ब्रह्मचर्य के नियम भी उस बालक के लिये नहीं हैं। चाहे जैसे चाहे जिस ओर मुख करके मूत्र पुरीष (मल मूत्र का त्याग) करै । आचमन की रीति भी इस बालक के लिये नहीं है। किन्तु मार्जन करना हाथ पग आदि धोना, और भूमिपर जल को छिड़क के भोजनादि करना उस को भी उचित है । और उस अशुद्ध बालक के स्पर्श से अशुद्धि भी नहीं लगती, इस बालक को अग्निहोत्र तथा वैश्वदेव करने में भी न लगावै । और स्वधानिनयन (पिंडदान) के बिना वेद मन्त्रों का उच्चारण भी यज्ञोपवीत से पहिले बालक को न करावै अर्थात् ब्राह्मणादि द्विजों के बालक भी यज्ञोपवीत संस्कार से पहिले शूद्र के तुल्य होते हैं इससे उनको वेद मन्त्र न पढ़ावे न बुलवावै किन्तु स्मृति पुराणादि में लिखे स्तोत्र मन्त्रादि भले ही पढ़ावे और यदि उपनयन से पहिले पिता मर जावै तो वही असंस्कृत पुत्र वेद मन्त्रों द्वारा होने वाले अपने पिता के और्ध्वदेहिक श्राद्ध को करे वहाँ वेद मन्त्रोच्चारण में उसको दोष नहीं लगेगा यही बात मनु० अ० २।१३२ में कही है ॥ १ ॥ यज्ञोपवीत के आरम्भ से द्विज बालक के लिये धर्मशास्त्र में कहे सब नियम हैं ॥ २ ॥ पूर्व कहा ब्रह्मचर्य, अग्नि का प्रज्वालन (समिदाधान) भिक्षा मांगना, सच बोलना, जल से मार्जन आचमनादि करना, उपनयन के पश्चात इन सब को नियम से करे ॥ ३ ॥

६ गौतमस्मृतिः ॥

एके गोदानादि ॥ ४ ॥ बहिः संध्यार्थंचातिष्ठेत्पूर्वा मातीतो- त्तरां सज्योतिष्याज्योतिषोदर्शनाद्वाग्यतोनादित्यमीक्षेत ॥ ५ ॥ वर्जयेन्मधुमांसगन्धमाल्यदिवास्वप्नाञ्जनाभ्यञ्जनया- नोपानच्छत्रकामक्रोधलोभमोह वाद्यवादनस्नानदन्तधावन- हर्षनृत्यगीतपरिवादभयानि गुरुदर्शने कर्णप्रावृतावसक्थिका- याश्रयणपादप्रसारणानि निष्ठीवितहसितविजृम्भितास्फोट- नानिस्त्रीप्रेक्षणालम्भने मैथुनशंकायां द्यूतं हीनसेवामदत्तादानं हिंसामाचार्यतत्पुत्रस्त्रीदीक्षितनामानिशुष्कां वाचं मदं नित्यं ब्राह्मणः ॥६॥ अधःशय्याशायी पूर्वोत्थायी जघन्यसंवेशी वा- ग्बाहूदरसंयतः ॥७॥ नामगोत्रे गुरोः संमानतो निर्द्दिशेत् ॥८॥

कोई आचार्य्य इन नियमों को गोदान ( १६ सोलह आदि वर्षों में होने वाले केशान्त) संस्कार से आगे कहते हैं ॥ ४ ॥ संध्या के लिये ग्राम से बाहर जाय प्रातःकाल की पहिली संध्या सूर्यके दीखने समय तक खड़े होकर करे और सायंकाल की सूर्य दीखने समय से तारागणों के उदय होने तक बैठ के करे। दोनों सन्ध्या मौन होकर करे और सूर्यनारायण को न देखें ॥ ५ ॥ मदिरा, शहद, मांस, सुगन्ध, (इतर फुलेल आदि लगाना) फूलमाला, दिन में सोना, आंखों में अंजन सुरमा लगाना, शरीर में तैल मलना, यान (सवारी पर च- ढ़ना,) जूता, छत्री, काम, क्रोध, लोभ, मोह, बाजे (सितार आदि) बजाना, जल में धस कर स्नान करना, दातौन, हर्ष (आनन्द मानना,) नाचना, गाना, किसी की निन्दा, और भय इन मदिरा आदि सब को ब्रह्मचारी छोड़ देवे । गुरु के देखते कानों को बांधना वा शिर कण्ठ में कपड़ा लपेटना, गोड़े उठाकर बैठना, पग फैलाना, थूकना, हंसना, जंभाई लेना, आस्फोटन (किसी अंग को हाथ से बजाना) ताली बजाना, मैथुन की शंका के लिये स्त्रीको देखना व स्पर्श कर- ना, जुआ खेलना, नीच की सेवा करना, बिना दिये किसी के वस्तु को लेना, हिंसा करना, आचार्य और गुरु के पुत्र, स्त्री और दीक्षित इन का नाम लेना, सूखी कठोर वाणी बोलना, और भांगादि नशा पीना इन कर्मों को भी ब्रा- ह्मण ब्रह्मचारी नित्य ही त्याग देवै ॥ ६ ॥ गुरु से नीचे भूमि पर सोवे, गुरु से पहिले उठे, गुरु के बैठ जाने पर पीछे बैठे, लेट जाने पर लेटे, वाणी, भु- जा, और उदर इन को वश में रक्खे ॥७॥ गुरु का वा उनके गोत्र का नाम जब कभी उच्चारण करने पड़े तो सम्मान सूचक श्रीमान् आदि शब्द लगा के बोले ॥८॥

भाषार्थसहिता ॥ ९

अर्च्चिते श्रेयसि चैवम् ॥ ९ ॥ शय्यासनस्थानानि वि- हाय प्रतिश्रवणमभिक्रमणं वचनं नादृष्टेनाधःस्थानासनस्ति- र्यग्वा तत्सेवायाम् ॥ १० ॥ गुरुदर्शने चोत्तिष्ठेत्, गच्छन्तमनु- व्रजेत्, कर्म्म विज्ञाप्याख्यायाऽहूताध्यायी युक्तः प्रियहितयो- स्तद्भार्यापुत्रेषु चैवम् ॥ ११ ॥ नोच्छिष्टाशनस्नपनप्रसाधन- पादप्रक्षालनोन्मर्द्दनोपसंग्रहणानि ॥ १२ ॥ विप्रोष्योपसंग्रहणं गुरुभार्याणां तत्पुत्रस्य च ॥ १३ ॥ नैके युवतीनाम् ॥ १४ ॥ व्यवहारप्राप्तेन सार्व्ववर्णिकं भैक्षचरणमभिशस्तपतितवर्ज्जम् ॥ १५॥ आदिमध्यान्तेषु भवच्छब्दः प्रयोज्यो वर्णानुपूर्व्येण॥१६॥


इसी प्रकार पूजा सत्कार के योग्य श्रेष्ठ उत्तम मान्य पुरुषों का नाम लेने में भी आचरण करे ॥ ९ ॥ गुरु जी जब कुछ कहें तब शय्या, आसन, और स्थान को छोड़के समीप जा कर गुरु के वचन को सुने किन्तु शय्यादि पर बैठा २ बात न करे। यदि गुरु जी खड़े हों तो उनके इधर उधर चलता हुआ बात करे, गुरु से अदृष्ट छिपा हुआ न बोले, गुरु से नीचे स्थलमें खड़ा हो वा बैठे, गुरु की सेवा में तिरछा भी न बैठा रहे ॥ १० ॥ गुरु के देखने पर खड़ा होजाय, और गुरुजी टहलने लगें तो पीछे २ चल, कोई भी काम हो गुरु को जता कर वा कह कर करे बिना पूछे कुछ न करे। गुरु जब पढ़ने को बुलावें तब नम्रता से समीप बैठ के पढ़ाकरे। गुरु का प्रिय और हित करने में तत्पर रहै। गुरु के स्त्री पुत्रों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव करे ॥ ११॥ उच्छिष्ट भोजन, स्नान कराना, प्रसाधन (श्रृंगार करना) पग धोना, शरीर मलना, वा उबटना, पगों का स्पर्श, ये काम गुरु की स्त्री पुत्रों के कभी न करे ॥ १२॥ जब परदेश से आवे तब गुरुपत्नियों और गुरुपुत्रों के भी पगों का स्पर्श करे ॥ १३ ॥ कोई आचार्य कहते हैं कि युवति गुरुपत्नी के पाद् स्पर्श न करे ॥ १४ ॥ व्यवहार (न्याय) से प्राप्त हुये वस्तु की भिक्षा सब वर्णों से मांग लेवे परन्तु हिंसक वा निन्दित और पतितों को छोड़देवे ॥ १५ ॥ ब्राह्मण के यहां भिक्षा मांगे तब (भवति ! भिक्षां देहि) क्षत्रिय के घर पर (भिक्षां भवति ! देहि) और वैश्यके घर में भिक्षा मांगने को जावे तब (भिक्षां देहि भवति !) ऐसा वाक्य कहे ॥ १६ ॥