अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
कात्यायनस्मृतिः ॥
अथाग्रभूमिमासिंचेन् सुसंप्रोक्षितमस्त्विति ।
शिवाआपःसन्त्वितिच युग्मानेवोदकेनच ॥ ५ ॥
सौमनस्यमस्त्वितिच पुष्पदानमनन्तरम् ।
अक्षतञ्चारिष्टंञ्चास्त्वित्यक्षतान्प्रतिपादयेत् ॥ ६ ॥
अक्षय्योदकदानंतु अर्घ्यदानवदिष्यते ।
षष्ठ्यैवनित्यंतत्कुर्यान्नचतुर्थ्यांकदाचन ॥ ७ ॥
अर्घ्येऽक्षय्योदकेचैव पिण्डदानेऽवनेजने ।
तंत्रस्यतुनिवृत्तिःस्यात् स्वधावाचनएवच ॥ ८ ॥
प्रार्थनासुप्रतिप्रोक्ते सर्वास्वेवद्विजोत्तमैः ।
पवित्रांतर्हितान्पिंडान् सिंचेदुत्तानपात्रकृत् ॥ ९ ॥
युग्मानेवस्वस्तिवाच्यमङ्गुष्ठाग्रग्रहंसदा ।
कृत्वाधुर्यस्यविप्रस्य प्रणम्यानुव्रजेत्ततः ॥ १० ॥
एषश्राद्धविधिःकृत्स्न उक्तःसंक्षेपतोमया ।
जल से अपने आगे की पृथिवी को-(सुसंप्रोक्षितमस्तु) ऐसा कहकर और (शिवा आपः संतु) इस मन्त्र से दो ब्राह्मणों को साथ ही जल से सींचे ॥५॥ (सौमनस्यमस्तु) इस मंत्र से ब्राह्मणों को पुष्प समर्पण करे और (अक्षतं-चारिष्टमस्तु) इस मंत्र से अक्षत निवेदन करे ॥ ६ ॥ अर्घ देने के समान अक्षय्य जल का देना कहा है और उस अक्षय्योदक को षष्ठी (पितुः) विभक्ति बोलकर देवे किन्तु चतुर्थी (पित्रे) बोल कर कभी न देवे ॥ ७ ॥ अर्घ्य अक्षय्योदक—पिण्डदान—अवनेजन और स्वधा के वचन—इन कर्मों में तन्त्र (एक संकल्प से सब को अर्घ आदि न देवे किन्तु पृथक् २) से अर्घादि देने चाहिये ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों ने दिया जो यजमान की प्रार्थना का उत्तर उस के अनंतर अर्घ के पात्रों को सीधे करके पवित्रियों से ढके हुए पिंडों को सींचे ॥ ९ ॥ दो २ पिंडों को सींच के स्वस्तिवाचन और अंगूठे के अग्रभाग का ग्रहण प्रथम मुख्य ब्राह्मण का करे फिर नमस्कार करके ब्राह्मणों के पीछे चले ॥ १० ॥ यह श्राद्ध की संपूर्ण विधि संक्षेप से हमने कही जो लोग इस विधि को जानते हैं वे कभी भी श्राद्ध कर्म में मूढ़-
१० भाषाधर्मसंहिता ॥
येविदंतिनमुह्यन्ति श्राद्धकर्मसुतेक्वचित् ॥ ११ ॥ इदंशास्त्रंचगुह्यंच परिसंख्यानमेवच । वसिष्ठोक्तंचयोवेद सन्नाद्धंवेदनेतरः ॥ १२ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्थः खंडः ॥ ४ ॥ असकृद्यानिकर्माणि क्रियरन्कर्मकारिभिः । प्रतिप्रयोगनैताःस्युर्मातरःश्राद्धमेवच ॥ १ ॥ आधानेहोमयोश्चैव वैश्वदेवेतथैवच । बलिकर्म्मणिदर्शेच पौर्णमासेतथैवच ॥ २ ॥ नवयज्ञेचयज्ञज्ञा वदन्त्येवमनीषिणः । एकमेवभवेच्छ्राद्धमेतेषुनपृथक्पृथक् ॥ ३ ॥ नाष्टकासुभवेच्छ्राद्धं नान्नाद्धेश्राद्धमिष्यते । नसोष्यन्तीजातकर्म प्रोषितागतकर्मसु ॥ ४ ॥ विवाहादिःकर्म्मगणोयउक्तो गर्भाधानंशुश्रुमयरयचान्ते । विवाहादावेकमेवात्रकुर्यान्नाद्धंनादौकर्म्मणःकर्म्मणःस्यात् ५
ता को प्राप्त नहीं होते ॥११॥ इस धर्मशास्त्र को वेदान्त को और वशिष्ठ जी के कहे धर्म शास्त्र को जो जानता है वही श्राद्ध को जानता है अन्य नहीं॥१२॥ यह चौथा खण्ड पूर्ण हुआ ।
बारंबार जिन कर्मों को कर्म करने वाले करते हैं उन प्रत्येक कर्मों में ये षोडशमातृका और श्राद्ध ( नांदी मुख ) नहीं होते ॥ १ ॥ अग्नि स्थापन के आरम्भ में सायं प्रातः काल के अग्निहोत्रके आरम्भमें, चातुर्मास्य यज्ञोंके वैश्वदेव पर्व में, बलिदान में श्रौतदर्शष्टि तथा पौर्णमासेष्टि के आरम्भ में ॥ २ ॥ और नवाग्र्येष्टि के प्रारम्भ में यज्ञके जानने वाले विद्वान् याज्ञिक-लोग ऐसा कहते हैं कि इनमें से एक साथ सबन्ध होने वाले कामों में एकही श्राद्ध होता है पृथक २ नहीं ॥ ३ ॥ अष्टकाओं में और एक श्राद्ध के समय में दूसरा ( आभ्युदयिक ) श्राद्ध नहीं होता-परदेश में गई हुई सोष्यंती ( जिसके बालक हुआ हो ) उसके लौट आनेपर जातकर्मोंदि में नान्दी श्राद्ध न करे-॥ ४ ॥ विवाह आदि कर्म का जो समूह कहा है कि जिसके अन्त में वेद से गर्भाधान सुनते हैं उस विवाह के आदि में एकही नान्दी श्राद्ध होता है प्रति कर्म की आदिमें नहीं करे ॥ ५ ॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ ११
प्रदोषेश्राद्धमेकंस्याद् गोनिष्क्रामप्रवेशयोः । तत्राङ्गेयुज्यतेकर्त्तुं प्रथमेपुष्टिकर्मणि ॥ ६ ॥ हलाभियोगादिषुतु षट्सुकुर्यात्पृथक्पृथक् । प्रतिप्रयोगमप्येषा मादावेकन्तुकारयेत् ॥ ७ ॥ बृहत्पत्रिक्षुद्रपशुस्वस्त्यर्थंपरिविष्यतोः । सूर्य्येन्द्वोःकर्मणोयेतु तयोःश्राद्धंनविद्यते ॥ ८ ॥ नदशाग्रन्थिकेश्चैव विषवह्वर्ककर्मणि । कृमिदष्टचिकित्सायां नैवशेषेषुविद्यते ॥ ९ ॥ गणशःक्रियमाणेषु मातृभ्यःपूजनंसकृत् । सकृदेवभवेच्छ्राद्ध-मादौनपृथगादिषु ॥ १० ॥ यत्रयत्रभवेच्छ्राद्धं तत्रतत्रचमातरः ।
रात में विवाह का मुहूर्त्त अथवा सायंप्रातः काल में सन्तान उत्पन्न हो तो यही एक नान्दीश्राद्ध सायंकाल प्रदोष के समय वा प्रातःकाल होता है यह यदि प्रातःकाल में करना पड़े तो गौओं के चरने को निकलने के समय और सायंकाल में करना हो तो गौओं के घर आने समय करे ॥ ६ ॥
हलका अभियोग ( प्रथम जोतना ) आदि गृह्यसूक्तोक्त ६ कर्मों में पृथक् २ श्राद्ध होता है इस से प्रत्येक कर्म के आदि में एक नान्दीश्राद्ध करावे ॥ ७ ॥
बड़े २ पक्षी और छोटे २ पशु इन के कल्याण के लिये किये कर्म में सूर्य और चन्द्रमा के परिवेष [ चारों ओर मण्डलाकार होने ] के समय में किये कर्म में नान्दीश्राद्ध न करे ॥ ८ ॥
दशाग्रन्थि कर्म में—विषवाले जीव के काटलेने पर जो कर्म होता है उस में कीड़े के काटलेने की चिकित्सा में और जो कर्म बाकी रहजाने वाले हों उन में नान्दी श्राद्ध नहीं है ॥ ९ ॥
समूह से [एक बार] किये कर्मों में षोडश मातृकाओं का पूजन और कर्म की आदि में एक बार श्राद्ध करे पृथक् २ कर्म की आदि में नहीं ॥ १० ॥
जहां २ नान्दी होता है वहां २-१६ मातृकाओं का पूजन भी अवश्य करे यहां तक मातृसूक्त
| १२ | भाषार्थसहिता ॥ |
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प्रासङ्गिकमिदंप्रोक्त-मतःप्रकृतमुच्यते ॥ १९ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ पञ्चमः खण्डः ॥ ५ ॥
आधानकालायेप्रोक्तास्तथायेचाग्नियोनयः ।
तदाश्रयोग्निमादध्यादग्निमानग्रजोयदि ॥ १ ॥
दाराधिगमनाधाने यःकुर्यादग्रजाग्रिमः ।
परिवेत्तासविज्ञेयः परिवित्तिस्तुपूर्वजः ॥ २ ॥
परिवित्तिपरिवेत्तारौ नरकंगच्छतोध्रुवम् ।
अपचीर्णप्रायश्चित्तौ पादोनफलभागिनौ ॥ ३ ॥
देशान्तरस्थक्लीबैकवृषणानसहोदरान् ।
वेश्यासक्तपतितशूद्रतुल्यानिरोगिणः ॥ ४॥
जड़मूकान्धबधिरकुब्जवामनकुण्डकान् ।
अतिवृद्धानभार्यांश्च कृषिसक्तान्नृपस्यच ॥ ५ ॥
[ प्रसङ्ग में आया ] कहा अब प्रकृत ( जिस का प्रकरण था ) कहते हैं ॥ १९॥
यह पांचवां खंड पूरा हुआ ॥ ५ ॥
जो अग्नि के आधान के समय कहे हैं और जो अग्नि के कारण हैं उन्हीं में जेठा भाई अग्निहोत्र से युक्त हो तो छोटा अग्न्याधान पूर्वक अग्निहोत्र का ग्रहण करे ॥१॥
जो छोटा भाई बड़े भाई से पहिले विवाह और अग्न्याधान करता है वह परिवेत्ता और जेठा भाई परिवित्ति कहाता है ॥२॥
परिवित्ति और परिवेत्ता दोनों निश्चय नरक में जाते हैं यदि वे दोनों प्रायश्चित्त करलें तो पादोन [तीन भाग] फल के भागी होते हैं॥३॥
यदि जेठा भाई परदेश में हो वा नपुंसक हो वा जिस के एक ही अंडकोश हो वा अपना सहोदर [ सगा ] भाई न हो वा वेश्यागामी हो वा पतित हो वा शूद्र के समान हो-वा अत्यन्त रोगी हो ॥४॥
जड़ महाअज्ञानी हो वा गूंगा हो वा अंधा हो वा बहरा कुबड़ा हो खिलन्दिया बौना हो वा पिता के जीते ही जार से पैदा हुआ हो वा अत्यन्त बुड्ढा हो या जिस के स्त्री न हो वा जो राजा की खेती कराता हो ॥५॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ १४
धनवृद्धिप्रसक्तांश्च कामतःकारिणस्तथा । कुलटोन्मत्तचोरांश्च परिविन्दन्नदुष्यति ॥ ६ ॥ धनवार्द्धुषिकंराजसेवकंकर्म्मकस्तथा । प्रोषितञ्चप्रतीक्षेत वर्षत्रयमपित्वरन् ॥ ७ ॥ प्रोषितंयद्यशृण्वानस्तदूर्ध्वंसमाचरेत् । आगतेनुपुनस्तस्मिन्पादेतच्छुद्धयर्थमाचरेत् ॥ ८ ॥ लक्षणंप्राग्गतायास्तु प्रमाणंद्वादशाङ्गुलम् । तन्मूललग्नायोदीची तस्याप्येतद्द्वयोत्तरम् ॥ ९ ॥ उदग्गतायाःसंलग्नाः शेषाःप्रादेशमात्रिकाः । सप्तसप्ताङ्गुलांस्त्यक्त्वा कुशेनैवसमुल्लिखेत् ॥१०॥ मानक्रियायामुक्तायामनुक्तेमानकर्त्तरि ।
धन के बढ़ाने में आसक्त हो वा अपनी इच्छा के अनुसार जो कर्म करता हो वा घर २ में जो फिरे वा उन्मत्त वा चोर इतने जेठे भाइयों से पहिले विवाह करने वा अग्निहोत्र लेने में छोटा भाई दोषभागी नहीं होता ॥ ६ ॥ यदिवड़ा भाई व्याज में धन को बढ़ाने वाला हो वा राजा का सेवक हो वा परदेश में हो ऐसे को जीवना करने वाला भी अग्निहोत्रादि कर्म करना चाहता हुआ छोटा भाई तीन वर्ष तक उस बड़े भाई की बाट देखे ॥ ७ ॥ यदि परदेश में रहने की खबर न हो कि कहां है तो एक वर्ष पीछे विवाह आदि करले यदि जेठा भाई फिर आजाय तो उस पाप की शुद्धि के के लिये चोथाई प्रायश्चित्त करे ॥ ८ ॥ अग्निकुण्ड बनाने के लिये जो चिह्न किया हो उस में जो रेखा पूर्व को खींचे वह बारह अंगुल की हो और उस रेखा के मूल से लगी उत्तर की रेखा दश अंगुल की खींचे ॥ ९ ॥ उत्तर को गई रेखा से मिली हुई शेष रेखा प्रादेश मात्र दश २ अंगुल की हों । उन को सात २ अंगुल छोड़ कर शेष भाग में उल्लेखन संस्कार कुशों से करे ॥ १० ॥ जहां माप करना तो कहा हो पर माप का करने वाला न कहा हो वहां विद्वानों
१४ | भाषार्थसहिता ॥
मानकृद्यजमानःस्याद्विदुषामेषनिश्चयः ॥ ११ ॥
पुण्यवानादधीताग्निं सद्विद्वद्भिःप्रशस्यते ।
अनडुर्धुक्त्वमप्यस्य काम्यैस्तन्नीयतेशमम् ॥ १२ ॥
यस्यदत्ताभवेत्कन्या वाचासत्येनकेनचित् ।
सोऽन्त्यांसमिधमाधास्यन्नादधीतैवनान्यया ॥ १३ ॥
अनूढैवतु साकन्या पञ्चत्वंयदिगच्छति ।
नतथाव्रतलोपोऽस्य तेनैवान्यांसमुद्वहेत् ॥ १४ ॥
अथचेन्नलभेतन्यां याचमानोऽपिकन्यकाम् ।
तमग्निमात्मसात्कृत्वाक्षिप्रंस्यादुत्तराश्रमी ॥ १५ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ षष्ठः खंडः ॥ ६ ॥
अश्वत्थोध्वःशमीगर्भः प्रशस्तोर्द्ध्वीसमुद्भवः ।
का यह निश्चय है कि माप का कर्त्ता यजमान होता है अर्थात् यजमान की अंगुलियों से माप करना चाहिये ॥ ११ ॥ धनवान् न होने पर भी धर्मात्मा पुण्य शील पुरुष अग्नि को विधि पूर्वक स्थापन करे क्योंकि धर्मात्मा की ही सब प्रशंसा करते हैं । और जो उस की निर्धनता है वह काम्य कर्मों के अनुष्ठान से शान्त हो कर धनी हो जाता है ॥ १२ ॥ यदि किसी ने सत्यवाणी से किसी को कन्या दी हो अर्थात् सगाई करदी हो वह वर यदि उस कन्या के जीवन पर्यन्त अग्निहोत्र करना चाहता हो तो उसी के साथ विवाह करके अवश्य अग्न्याधान करे किन्तु अन्य स्त्री के साथ अग्निहोत्र न लेवे ॥ १३ ॥ यदि वह कन्या बिना विवाही मरजाय तो तिस से इस पुरुष के व्रत (अग्निहोत्र लेने की प्रतिज्ञा) का नाश नहीं होता उसी अग्नि से दूसरी स्त्री को विवाह लेवे ॥ १४ ॥ यदि मांगने से भी अन्य कन्या न मिले तो विधिपूर्वक आत्मा में उस अग्नि का समारोप करके संन्यासी हो जावे ॥ १५ ॥
यह छठा खण्ड पूरा हुआ ॥६॥
शमीनाम वृक्षोंकर जिस में मिलकर जम गयी हो ऐसा शुद्ध भूमि में उत्पन्न जो पीपल है उस की जो पूर्व को वा उत्तर को अथवा ऊपर को गई
कात्यायनस्मृतिः ॥ १५
तस्यप्राङ्मुखीशाखा चोदीचीयोर्द्धगापिवा ॥ १ ॥ अरणिरस्तन्मयीप्रोक्ता तन्मय्यैवोत्तरारणिः । सारवद्दारवञ्चात्र मोविलीचप्रशस्यते ॥ २ ॥ संसक्तमूलोयःशम्याः सशमीगर्भउच्यते । अलाभेत्वशमीगर्भादुद्धरेदविलम्बितः ॥ ३ ॥ चतुर्विंशतिरंगुष्ठदैर्घ्यंषडपि पार्थिवम् । चत्वारउच्छ्रयेमानमरण्योःपरिकीर्त्तितम् ॥ ४ ॥ अष्टाङ्गुलःप्रमन्थःस्याच्चात्रंस्याद्द्वादशाङ्गुलम् ॥ ओविलीद्वादशैवस्यादेतन्मंथनयंत्रकम् ॥ ५ ॥ अङ्गुष्ठाङ्गुलमानन्तु यत्रयत्रोपदिश्यते । तत्रतत्रबृहत्पर्वग्रंथिभिर्मिनुयात्सदा ॥ ६ ॥
होली शाखा है ॥ १ ॥ उस की नीचली और ऊपर की अधरारणी उत्तरा- रणी (जिस में बर्में को दबाकर बर्मा फेरते हैं) बनानी चाहिये और दृढ़ काठ का चात्र और ओविली [जो बर्में के नीचे ऊपर की छोटी २ लकड़ी होती हैं] श्रेष्ठ कहे हैं ॥ २ ॥ शमी-छोंकर की जड़ से जिस की जड़ मिलीहो उस पीपल को शमीगर्भ कहते हैं। यदि शमीगर्भ पीपल न मिले तो जो श- मीगर्भ नहीं उसी केवल पीपल से अरणी के लिये शीघ्र शाखा को काटलेवे ॥ ३ ॥ चौबीस अंगुष्ठ की लंबाई छः अंगुल की चौड़ाई चार अंगुल की मुटाई वा उंचाई का प्रमाण दोनों अरणियों का कहा है ॥ ४ ॥ आठ अंगुल का प्र- मंथ (उत्तरारणी का टुकड़ा जिस को अधरारणी में लगाकर मन्थन करतेहैं) होता है बारह अंगुल का चात्र (जिस लकड़ी में रस्सी लपेट कर खींचते हैं वह चात्र कहाता है) और ओविली (जिस लकड़ी को ऊपर से तिरछी र- खकर दोनों हाथ से दबाते वह ओविली कहाती है) होते हैं ये सब मिल कर अग्नि मथने का सामान है ॥ ५ ॥ जहां २ अंगूठे के अंगुल का प्रमाण कहा है वहां २ बीच की गांठ से सदैव नापै ॥ ६ ॥
| १६ | भाष्यसंहिता ॥ |
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गोवालैःशणसंमिश्रैस्त्रिवृत्तममलं।तमकम् ।
व्यामप्रमांणं नेत्रंस्या-त्प्रमध्यस्तेनपावकः ॥ ७ ॥
मूर्द्धाक्षिकर्णवक्त्राणि कन्धराचापि पञ्चमी ।
अङ्गुष्ठमात्राण्येतानि द्व्यंगुष्ठंवक्षउच्यते ॥ ८ ॥
अंगुष्ठमात्रंहृदयं त्र्यंगुष्ठमुदरंस्मृतम् ।
एकांगुष्ठाकटिर्ज्ञेयाद्वौवलिद्वौंचगुह्यकम् ॥ ९ ॥
ऊरुजंघचपादौचचतुरुकैर्मथाक्रमम् ।
अरण्यवयवा ह्येते याज्ञिकैःपरिकीर्त्तिताः ॥ १० ॥
यत्तद्गुह्यमितिप्रोक्तं देवयोंनिस्तुसोच्यते ।
अस्यांयोजायतेवन्हिः सकल्याणकृदुच्यते ॥ ११ ॥
अन्येषुयेतुमथ्नन्ति तेरोगभयमाप्नुयुः ।
प्रथमेमन्थनेत्वेषा नियमोनोत्तरंपुनः ॥ १२ ॥
शण जिन में मिला हो ऐसे गौ के बालों से तिगुना ऐंठा हुआ निर्मल साढ़े तीन हाथ लम्बा नेत्र नामक रस्सी बनावे उस से अग्नि को मथे ॥ ७ ॥ शिर-नेत्र-कान-मुख-गला ये पांचों एक २ अंगूठे के प्रमाण कल्पना करे दो अंगूठे प्रमाण छाती ॥ ८ ॥ एक अंगूठा हृदय-तीन अंगूठे प्रमाण उदर हो-एक अंगूठे नाभि से निचला भाग [ पेंचन ] और दो अंगुष्ठ प्रमाण उपस्थेन्द्रिय ॥ ९ ॥ ऊरु [ घोंटने ऊपर का भाग ] जंघा [ घोंटने नीचेका भाग ] और पग ये तीनों क्रमसे चार तीन एक अंगुष्ठ भर कल्पना करे वहां २ चिह्नकर देखे ये सब यज्ञ कर्त्ताओंने अरणी के अवयव कहे हैं ॥ १० ॥ जो पूर्व गुह्यस्थल-उपस्थ कहा है उसे देव ( अग्नि ) की योनि [ कारण ] कहते हैं इसमें जो अग्नि उत्पन्न होता है वह कल्याण करने वाला कहा है बीच में गुह्यस्थल जानने के लिये अरणी के सब अंगोंकी कल्पना की गई है । अग्न्याधानके समय प्रथम अवश्य ही गुह्यस्थल में मन्थन कर अग्नि को निकाले ॥ ११ ॥ अन्य जगह जो अग्नि को मथते हैं वे रोग और भय को प्राप्त होते हैं । पहिले पहिल मथने में ही यह नियम है आगे अग्नि मथनेमें गुह्यस्थल का नियम नहीं है ॥ १२ ॥
१८ भाषार्थसहिता ॥
पूर्व्वमन्थन्त्यवस्थास्ताः प्राच्यग्नेःस्याद्यथाच्युतिः ॥४॥ नैकया विविनाकार्य्यमाधानंभार्य्ययाद्विजैः । अश्रुतंतद्विजानीयात्सर्व्वान्वाचारमन्तियत् ॥५॥ वर्णज्यैष्ठ्येनबह्वीभिः सवर्णाभिश्चजन्मतः । कार्य्यमग्निच्युतेराभिः साध्वीभिर्मन्थनंपुनः ॥६॥ नात्रशूद्रींप्रयुञ्जीत नद्रोहाद्द्वेषकारिणीम् । नचैवाव्रतस्थांनान्यपुंसाचसहसङ्गताम् ॥७॥ ततःशक्ततरापश्चादासामन्यतरापिवा । उपेतानांवान्यतमामन्थेद्ग्निंनिकामतः ॥८॥ जातस्यलक्षणंकृत्वा तंप्रणीयसमिध्यच । आधायसमिधंचैव ब्रह्माणंचोपवेशयेत् ॥९॥ ततःपूर्णाहुतिंहुत्वा सर्वमन्त्रसमन्विताम् । गांदद्याद्यज्ञवानन्ते ब्रह्मणेवाससीतथा ॥१०॥
मथे जिस से अरणी में से पूर्व दिशा में अग्नि निकल के गिरे ॥४॥ ब्राह्मणादि द्विज एक भी पत्नी न हो तो अग्नि का आधान न करे यदि करे तो उस को नहीं किया जाने, जिस से स्त्री सब मनुष्यों को वाणी से वश में करती हैं॥५॥ यदि बहुत स्त्री हों तो जो उत्तम वर्ण हो उस के साथ और यदि उत्तम वर्ण की ही बहुत हों तो जो अवस्था में बड़ी हो उसके साथ अग्नि का आधान करे यदि मथित अग्नि नष्ट होजाय तो सीधे स्वभाव वाली स्त्रियां फिर मन्थन करें ॥६॥ अग्नि के स्थापन में इन स्त्रियों को नियुक्त न करे-शूद्री, क्रोधिनी, लड़ाका, जो किसी नियम में स्थित न हो, और जिस ने अन्य पुरुष का संग किया हो ॥ ७ ॥ फिर उन दो प्रकार की सवर्णा असवर्णा स्त्रियों में जो अत्यन्त समर्थ बलवती हो अथवा एक वर्ण की प्राप्त हुई बहुत स्त्रियों में कोई अवस्था में छोटी भी हो तो वह इच्छापूर्वक अग्नि को मथे ॥८॥ पैदा हुए अग्नि के लक्षण प्रकाश कर अग्निशाला में लाके प्रज्वलित करके और समिधा ढांक की लकड़ी अग्नि में रख के अग्निकुण्ड से दक्षिण में विधिपूर्वक वरण करके ब्रह्मा को बैठावे ॥९॥ फिर पूर्णाहुति के सब मन्त्रों से पूर्णाहुति देकर अन्त में ब्रह्मा को दो वस्त्र और गौ दान देवे ॥१०॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ १९
होमपात्रमनादेशे द्रवद्रव्येषुस्रुवःस्मृतः ।
पाणिरेवेतरस्मिंस्तु स्रु चैवात्रातुहूयते ॥ ११ ॥
खादिरोवाथपालाशो द्विवितस्तिःस्रुवःस्मृतः ।
स्रुग्बाहुमात्राविज्ञेया वृत्तस्तुप्रग्रहस्तयोः ॥ १२ ॥
स्रुवाग्रेघ्राणवत्खातं द्व्यंगुष्ठपरिमंडलम् ।
जुह्वाःशराववत्खातं संनिर्वाहंषडंगुलम् ॥ १३ ॥
तेषांप्राक्शःकुशैःकार्यः संप्रमार्गेजुहूपता ।
प्रतापनञ्चलिप्तानां प्रक्षाल्योष्णेनवारिणा ॥ १४ ॥
प्राञ्चंप्राङ्मुदगग्नेरुदगग्रंसमीपतः ।
तत्तथासादयेद्द्रव्यं यद्यथाविनियुज्यते ॥ १५ ॥
आज्यद्रव्यमनादेशे जुहोतिषुविधीयते ।
मन्त्रस्यदेवतायाश्च प्रजापतिरितिस्थितः ॥१६॥
जहां गीले वस्तुका होम करना हो और कोई होमपात्र न कहा हो तो वहां स्रुवा को होम का पात्र समझना चाहिये अन्य सूखे साकल्य में हाथ से होम और यहां अग्निहोत्र में स्रुच् से ही होम होता है ॥११॥ खैर अथवा ढाक का दोबित्तस्त लंबा स्रुव कहा है और एक भुजानर लम्बी स्रुच् होती है इन दोनों का प्रग्रह [पकड़नेकी जगह] वृत्त [गोल] होती है ॥ १२ ॥ स्रुव के अग्रभाग में नासिका के समान दो गर्त होते दो अंगूठे की बराबर गहरे गोलाकार बनावे और जुहू (होमपात्र) के अग्रभाग में शराव (सरवा) के समान संनिर्वाह (पनाले के समान) छः अंगुल का गर्त करना चाहिये ॥१३॥ उनके पहिले भागमें कुशाग्रोंसे प्रमार्ज (अच्छी सफाई) हवन करना चाहता हुआ करें-यदि ये तीनों घी आदिसे लिपे होंतो उष्ण जलसे धोकर इनको तपाय ले ॥ १४ ॥ अग्नि से उत्तर में पूर्व को अग्नि के समीप ही उत्तर को अग्रभाग कर २ पात्रासादन कर्म करे जिस २ पात्रादिका जैसा २ आगे पीछे काम पड़े उन २ को वैसा २ क्रम से स्थापित करे ॥१५॥ सब होर्मों में जहां किसी होम के वस्तु का नाम नहीं कहा वहां गौ के घी को ही हव्य जानो जहां किसी मंत्र का देवता नहीं कहा वहां प्रजापति देवता समझो यही मर्यादा है ॥१६॥
२७ | भाषावेमसंहिता ॥
नांगुष्ठादधिकाग्राह्या समिथ्स्थूलतयाक्वचित् ।
नवियुक्तात्वचाचैव नसकीटानपाटिता ॥ १९ ॥
प्रादेशान्नाधिकानोना नतथास्याद्विशाखिका ।
नसपर्णाननिर्वर्या होमेषुचविजानता ॥ १८ ॥
प्रादेशद्वयमिध्मस्य प्रमाणंपरिकीर्तितम् ।
एवंविधाःस्युरेवेह समिधःसर्वकर्मसु ॥ १९ ॥
समिधोऽष्टादशेध्मस्य प्रवदन्तिमनीषिणः ।
दर्शचपौर्णमासेच क्रियास्वन्यासुविंशतिः ॥ २० ॥
समिधादिषुहोमेषु मंत्रदैवतवर्जिता ।
पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्च हीन्धनार्थंसमिद्भवेत् ॥ २१ ॥
इध्मोऽप्येंधार्थमाचार्यैर्हविराहुतिपुरस्कृतः ।
यत्रचास्यनिवृत्तिःस्यात्तत्स्पष्टीकरवाण्यहम् ॥ २२ ॥
जो अंगूठे से अधिक मोटी हो जिस के त्वचा (बक्कल) न हो जिस में कीड़े हों—और जो फटी हो ऐसी समिधा किसी होम में नहीं लेनी चाहिये ॥ १९ ॥
जो प्रादेश (अंगूठा और तर्जनी की लम्बाई प्रमाण) से अधिक लम्बी हो वा कम हो और जिसके शाखा (डाली) न हों—और जिसके पत्ते हों—और जो घूनी हो—ज्ञानवान् पुरुष होम में ऐसी समिधा न लेवे ॥ १८ ॥
दो एकप्रादेश होम में जलाने के इध्म का प्रमाण कहा है सब कर्मों में ऐसी ही समिधा होनी चाहिये ॥ १९ ॥
विद्वान् लोग दर्शपौर्णमास की इष्टियों में इध्मसञ्ज्ञक अठारह १८ समिधा कहते हैं जिन में पञ्चदश सामिधेनी की दो परिधि परिधान के अन्त में चढ़ाने की और एक अनुयाजों की ये १८ हुई और अन्य इष्टियों में सप्तदश सामिधेनी होने से बीश होती हैं ॥ २० ॥
जो होम समिधां से किये जाते हैं उन के पहिले अथवा पीछे ईंधन के लिये जो समिधा होती है उन का मंत्र और देवता कोई भी नहीं होता ॥ २१ ॥
एव (ईंधन) के लिये इध्म [अठारह समिध] को भी आचार्य कहते हैं कि वह तो पुरोडाशादि हव्य की आहुतियों में संनिहित है। और जिस कर्म में यह इध्म नहीं उस को हम स्पष्ट करेंगे ॥ २२ ॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ २१
अंगहोमसमित्तन्त्र सोपन्त्याख्येषुकर्म्मसु ।
येषांचैतदुपर्युक्तं तेषुतत्सदृशेषुच ॥ २३ ॥
अक्षभंगादिबिपदि जलहोमादिकर्म्मणि ।
सोमाहुतिषुसर्वासुनैतेष्विध्मोविधीयते ॥ २४ ॥
इति कात्यायनस्मृतौ अष्टमः खण्डः ॥ ८ ॥
सूर्येऽन्तशैलमप्राप्ते षट्त्रिंशद्भिःसदांगुलैः ।
प्रादुष्करणमग्नीनां प्रातर्भासांचदर्शनात् ॥ १ ॥
हस्तादूर्ध्वंरविर्यावद् गिरिंहित्वानगच्छति ।
तावद्धोमविधिःपुण्यो नात्येत्युदितहोमिनाम् ॥ २ ॥
यावत्सम्यङ्नभाष्यंते नभस्यृक्षाणिसर्वतः ।
नचलौहित्यमापैति तावत्सायंचहूयते ॥ ३ ॥
रजोनीहारधूमाभ्रवृक्षाग्रान्तरितेरवौ ।
अंग होम ( बड़े यज्ञ में कर्नव्य छोटे यज्ञ में जो होता है ) समित्तन्त्र गर्भाधान आदि संस्कार—और जिन में पहिले कहा है उन में और उन के समान कर्म्म में ॥ २३ ॥ गाड़ी की धुरी टूट जाने आदि विपत्ति में जल के निमित्त जो होम तिस में और संपूर्ण सोम की आहुतियों में इध्म नहीं कहा है ॥ २४ ॥
यह आठवां खंड पूरा हुआ ॥८॥
जिस समय सूर्य्य अस्ताचल पर्वत से छत्तीस अंगुल ऊपर हों उस समय संध्या को और प्रातःकाल किरणों के दीखने पर अग्नियों को प्रज्वलित करे॥१॥ सूर्योदय हो जाने पर होम करने वालों का होमविधि तब तक भ्रष्ट नहीं होता जब तक उदयाचल से एक हाथ से ऊपर सूर्य न पहुंचे अर्थात् एक हाथ सूर्य्य के चढ़ने तक उदय काल ही रहता है यह विचार उदित होम करने वालों के लिये है ॥ २ ॥ जब तक सब आकाश में भले प्रकार नक्षत्र न दीखें और आकाश की लाली दूर न हो तब तक संध्या को होम कर सकता है ॥३॥ यदि धूली कोहरा धुआं-मेघ और वृक्ष-इन की
२२ भाषार्थसहिता ॥
संध्यामुद्दिश्यजुहुयाहु तमप्यनलुप्यते ॥ ४ ॥ नकुर्यात्क्षिप्तहोमेषु द्विजःपरिसमूहनम् । वैरूपाक्षंचनजपेत्प्रपदं चविवर्जयेत् ॥ ५ ॥ पर्युक्षणंचसर्वत्रकर्त्तव्यमुदितेन्विति । अंतेचवामदेव्यस्य गानंकुर्याहिचस्त्रिधा ॥ ६ ॥ अहोमकेष्वपिभवेद्यथोक्तं चंद्रदर्शनम् । वामदेव्यंगणेष्वन्ते वल्यन्तेवैश्वदेविके ॥ ७ ॥ यान्यधस्तरणान्तानि नतेपुस्तरणंभवेत् । एककार्यार्थसाध्यत्वात्परिधीनपिवर्जयेत् ॥ ८ ॥ बर्हिःपर्युक्षणंचैव वामदेव्यजपस्तथा । क्रत्वाहूतिषुसर्वासु त्रिकमेतन्नविद्यते ॥ ९ ॥ हविष्येषुयथा मुख्यास्तदनुव्रीहयः स्मृतः ।
झाड़ में होनेसेसूर्य न दीखेंतो सन्ध्या समय समझ कर जो होम करै उसका होम नष्ट नहीं होता ॥४॥ द्विज पुरुष शीघ्रता के होमों में परिसमूहन न करै-और विरूपाक्ष मंत्र न जपे प्रपद नामक कर्म भी छोड़ देवे ॥ ५ ॥ सब होमों की आदि में पर्युक्षण (ईशान कोण से प्रदक्षिण अग्नि कुंड के सब ओर जल सेचन करना) और अंत में वामदेव्य साम का तीन प्रकार से गान करे ॥६॥ जिन कर्मों में होम नहीं होता उन में चन्द्रमा का दर्शन जैसे होता है ऐसे सब गणों (कर्मों के समूहों) के अंत में और बलिदान के अन्त में वैश्वदेव के अंत में वामदेव्य साम का गान करना चाहिये ॥ ७ ॥ नीचे स्थल में बिछाये कुशों तक जिन कर्मों की समाप्ति होती है उन में अलग २ कुश नहीं बिछाने चाहिये और एक ही कार्य की सिद्धि के लिये होने से पृथक् २ बने अग्निकुण्डों में अलग २ परिधि नामक लकड़ी भी स्थापित न करे ॥ ८ ॥ बर्हिः [ चार मुट्ठी कुशों के बिछाने का विनियोग ] पर्युक्षण वामदेव्य साम का गान ये तीन कर्म यज्ञों की आहुतियों में नहीं होते ॥ ९ ॥ सब हविष्योँ में जो मुख्य धान वा जौ हैं वे न मिलें तो अन्य कोई अन्न ले लेवे परन्तु उड़द-कोदों-गेहूं
कात्यायनस्मृतिः ॥ २३
माषकोद्रवगौरादिसर्वालाभेऽपिवर्जयेत् ॥ १० ॥
पाण्याहुतिर्द्वादशपर्व्वपूरिका
कंसादिनाचेत्स्रुवमात्रपूरिका ।
दैवेनतीर्थेनचहूयतेहविः
स्वंगारिणिस्वर्चिषितच्चपावके ॥ ११ ॥
योऽनार्च्चिषिजुहोत्यग्नौ व्यंगारिणिचमानवः ।
मन्दाग्निररामयावी च दरिद्रश्चसजायते ॥ १२ ॥
तस्मात्समिद्धेहोतव्यं नासमिद्धेकदाचन ।
आरोग्यमिच्छतायुश्च श्रियमात्यंतिकींपराम् ॥१३॥
होतव्येचहुतेचैव पाणिशूर्पस्फ्यदारुभिः ।
नकुर्यादग्निधमनं कुर्याद्भाव्यजनादिना ॥ १४ ॥
मुखेनैकेधमन्त्यग्निंमुखाद्ध्ये षोऽध्यजायत ।
इन को सदा ही वर्ज दे और तिल आदि की आहुति दे देवे ॥१०॥ सूखे चांवल तिलादि से होम करने में हाथ से जो आहुति देनी हो तो इतने की देवे जिस से बारह पर्व्व ( अंगुल ) चारों अंगुलियों के भर जायं यदि पात्र से देतो स्रुवे को भरके दे और साकल्य को देवतीर्थ [ अंगुलियों के अग्रभाग में होता है ] से अंगारों वाले अच्छे प्रज्वलित अग्नि में आहुति देवे ॥ ११ ॥ जिस में ज्वाला और अंगार नहीं ऐसे अग्नि में जो मनुष्य होम करता है वह मंदाग्नि वाला रोगी और दरिद्री होता है ॥ १२ ॥ तिस से नीरोगता बड़ी अवस्था-और अत्यन्त श्रेष्ठ लक्ष्मी की इच्छा करने वाला पुरुष अच्छे जलते हुए अग्नि में होम करे-जो अग्नि न जलता हो उस में कभी नकरै ॥ १३ ॥ जिस अग्नि में होम करना हो या कर चुका हो उस को हाथ-सूप-स्फ्य [ खङ्ग के तुल्य बना ] तथा लकड़ी से न धोंके किन्तु वीजने आदि से ही जलावे ॥ १४ ॥ कोई आचार्य मुख से अग्नि को जलाना कहते हैं क्योंकि यह अग्नि मुख से ही पैदा हुआ है यदि कोई यह कहे कि अग्नि
२४ भाषार्थसहिता ॥
नाग्निंमुखेनेतिचयलौकिकेयोजयन्तितत् ॥ १५ ॥ इति कात्यायनस्मृतौ नवमः खंडः ॥ ९ ॥
यथाहनितथाप्रातर्नित्यंस्नायादनातुरः । दन्तान्प्रक्षालयनद्यादौ गृहेचेत्तदमन्त्रवत् ॥ १ ॥ नारदाद्युक्तवृक्षांयदष्टाङ्गुलमपाटितम् । सत्वचंदन्तकाष्ठंस्यात्तदग्रेणप्रधावयेत् ॥ २ ॥ उत्थायनेत्रेप्रक्षाल्य शुचिर्भूत्वासमाहितः । परिजप्यचमन्त्रेण भक्षयेद्दन्तधावनम् ॥ ३ ॥ आयुर्बलंयशोवर्चः प्रजाःपशून्वसूनिच । ब्रह्मप्रज्ञांचमेधांच तन्नोधेहिवनस्पते ॥ ४ ॥ मासद्वयंश्रावणादिसर्वांनद्योरजस्वलाः । तासुस्नानंनकुर्वीत वर्जयित्वासमुद्रगाः ॥ ५ ॥
को मुख से न फूके ऐसा मनु ने कहा है तो वह मनु जी का कथन लौकिक (साधारण) अग्नि के लिये है ॥ १५ ॥
यह नवां खंड पूरा हुआ ॥ ९ ॥
नीरोग मनुष्य जैसे दिन में स्नान करे तैसे ही प्रातःकाल भी करे नदीआदि के समीप दातौन करके स्नान करे और घर में करे तो मन्त्रों के बिनाहीकरे ॥१॥ नारद आदि ऋषियों ने कहे जो वृक्ष उन की आठ अंगुल लम्बी बिना फटी और वक्कल सहित-दांतौन होनी चाहिये उस के अग्रभाग से दातों को अच्छी तरह शुद्ध करे ॥२॥ प्रातःकाल सोते से उठ कर नेत्रों को धोके सावधानी से शुद्ध होकर और (अन्नाद्यायव्यूहध्वं०) इत्यादि मन्त्र को जप के दातौन करे॥३॥ और वनस्पति से प्रार्थना करे कि हे वृक्ष तू मुझे अवस्था-बल कीर्त्ति तेज,प्रजा, पशु, धन, वेद और उत्तम बुद्धि इन को दे ॥४॥ श्रावण आदि दो महीनों में सब नदी रजस्वला [मलिन जल वाली] होजाती हैं जो नदी समुद्र तक जाती हैं उन को छोड़ कर रजस्वला नदियों में स्नान न करे ॥ ५ ॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ २५
धनुःसहस्राण्यष्टौतु गतिर्यासांनविद्यते ।
नतानदीशब्दवहा गर्त्तास्ताःपरिकीर्त्तिताः ॥ ६ ॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे प्रेतस्नानेतथैवच ।
चन्द्रसूर्यग्रहेचैव रजोदोषोनविद्यते ॥७॥
वेदाश्छन्दांसिसर्वाणि ब्रह्माद्याश्चदिवौकसः ।
जलार्थिनोऽथपितरो मरीच्याद्यास्तथर्षयः ॥८॥
उपाकर्मणिचोत्सर्गे स्नानार्थंब्रह्मवादिनः ।
पिपासूननुगच्छन्ति सन्तुष्टाःस्वशरीरिणः ॥६॥
समागमस्तुयत्रैषां तत्रहत्यादयोमन्नाः ।
नूनंसर्वेक्षयंयान्ति किमुतैकंनदीरजः ॥१०॥
ऋषीणांसिच्यमानाना-मन्तरालंसमाश्रितः ।
सम्पिबेद्यःशरीरेण पर्षन्मुक्तजलच्छटाः । ११॥
विद्यादीन्ब्राह्मणःकामान्वरादीन्कन्यकाऽऽप्नुयात् ।
आठ हजार धनुष तक जो नहीं जातीं उन को नदी नहीं कहते किन्तु उनका नाम गर्त है ॥६॥ उपाकर्म नाम श्रावणी के दिन होने वाला वेदारम्भ और उत्सर्ग नाम वेद समाप्ति का स्नान प्रेत के निमित्त स्नान चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण का स्नान इन में नदी के रजस्वला होने का दोष नहीं है ॥७॥ वेद, संपूर्ण छंद ब्रह्मादिक देवता और जल के अभिलाषी पितर और मरीचि आदि ऋषी ॥ ८ ॥ ये सब अपना २ सूक्ष्म शरीर धारण कर उस समय उन के पीछे चलते हैं जिस समय सन्तोषी वेद के ज्ञाता देहधारी उपाकर्म और उत्सर्ग के स्नान के निमित्त जाते हैं ॥ ९ ॥ जहां इन वेद आदिकों का समागम है वहां जब हत्या आदि बड़े २ सब पाप निश्चय से नष्ट हो जाते हैं तब नदी का रज नष्ट क्यों न होगा?॥१०॥ सींचे जाते ( हुए ) ऋषियों के मध्य में ठहरा जो मनुष्य अपने शरीर के द्वारा शिष्य समुदाय से छुट्टी जल की छटाओं ( बूंदों ) को पीता है अर्थात् ऋषि आदि के तर्पणो गङ्ग के छींटें अपने शरीर पर लेता है ॥ ११ ॥
२६ भाषार्थसहिता ॥
आमुष्मिकान्यपिसुखान्याप्नुयात्सनसंशयः ॥१२॥ अशुचयशुचिनादत्त माममन्तर्जलादिना । अनिर्गतदशाहास्तु प्रेतारक्षांसिभुञ्जते ॥१३॥ स्वर्धुन्द्यम्भःसमानिस्युः सर्वाण्यम्भांसिभूतले । कूपस्थान्यपिसोमार्क ग्रहणेनात्रसंशयः ॥१४॥ इति कात्यायनस्मृतौ चतुर्दशः खण्डः ॥ इतिकर्म्मप्र- दीपे परिशिष्टे कात्यायनविरचिते प्रथमः प्रपाठकः १ अतऊर्द्धंप्रवक्ष्यामि संन्ध्योपासनकंविधिम् । अनर्हःकर्मणांविप्रः सन्ध्याहीनोयतःस्मृतः ॥१॥ सव्येपाणौकुशान्कृत्वाकुर्यादाचमनक्रियाम् ॥ ह्रस्वाःप्रचरणीयाःस्युः कुशादीर्घास्तुवर्हिषः ॥२॥ दर्भाःपवित्रमित्युक्तमतःसन्ध्यादिकर्मणि । सव्यःसोपग्रहःकार्यो दक्षिणःसपवित्रकः ॥३॥
यह यदि ब्राह्मण हो तो विद्या आदि मनोरथों को यदि कन्या हो तो उत्तम वर आदि को प्राप्त होती हैं और परलोक के सुखों को भी प्राप्त होते हैं इस में संशय नहीं ॥ १२ ॥ मरे के दश दिन के भीतर अशुद्ध पुरुष ने दिया जो निमन्त्र अन्न और जलादि है उस को प्रेत और राक्षस भोगते हैं इस से दश दिन के भीतर अन्न दानादि न करे ॥ १३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी पर के और कुये के जल चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण में गंगा जल के समान हैं इस में सन्देह नहीं ॥१४॥ यह चौदहवां खंड पूरा हुआ- और कात्यायन के रचे परिशिष्ट कर्म प्रदीप में प्रथम प्रपाठक पूरा हुआ ।
इस से आगे संध्या वंदन की विधि कहते हैं जिस से संध्या हीन ब्राह्मण सब कर्मों के अयोग्य कहा ॥१॥ बांये हाथ में कुशा रख कर आचमन करे छोटे दाभ कुश कहाते हैं और बड़े कुश बर्हि कहाते हैं ॥२॥ इस से सन्ध्या आदि कर्म में दर्भ ही पवित्र कहे हैं बांये हाथ में सोपग्रह (१६कुशा) ले और दहिने में पवित्री ॥३॥
कात्यायनस्मृतिः ॥ ५९
रक्षेद्द्वारिणात्मानं परिक्षिप्यसमंततः । शिरसोमार्जनंकुर्यात्कुशैः सोदकविन्दुभिः ॥ ४ ॥ प्रणवोभूर्भुवःस्वश्च सावित्रीचतृतीयिका । अब्दैवतंस्यृचश्चैव चतुर्थमितिमार्जनम् ॥ ५ ॥ भूराद्यास्तिस्रएवैता महाव्याहृतयोऽव्ययाः । महर्जनस्तपःसत्यं गायत्रीचशिरस्तथा ॥ ६ ॥ आपोज्योतीरसोमृतं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरितिशिरः । प्रतिप्रतीकं प्रणवमुच्चारयेदन्तेचशिरसः ॥ ७ ॥ एताएतांसहानेनतथैभिर्दशभिःसह । त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ॥ ८ ॥ करेणोद्धृत्यसलिलंघ्राणमासज्यतत्रच । जपेदनायतासुर्वात्रिःसकृद्वाघमर्षणम् ॥ ९ ॥ उत्थाय कर्मातिप्राहेसवित्रेकेणाऽञ्जलिनाम्भसः ।
अपने शरीर के चारों ओर जल भ्रमा के अपनी रक्षा करे और जल को लेकर कुशाओं से शिर का मार्जन करे । प्र० ओंकार भूः, भुवः, स्वः, और तीसरी गायत्री, जल है देवता जिन का ऐसी तीन ऋचा ( आपो हिष्ठा० आदि ) यह चौथा मार्जन है ॥ ५ ॥ भूः भुवः स्वः ये तीन नित्य अविनाशी महाव्याहृती हैं महःजनः तपः सत्य और गायत्री और शिरः ॥ ६ ॥ (आपोज्योती रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वः) यह शिर मंत्र है। भूः आदि प्रत्येक के साथ और शिरः मंत्र के पीछे ओंकार का उच्चारण करे ॥ ७ ॥ ये सात व्याहृति गायत्री यह शिरोमंत्र और ओंकार इन दशों का प्राणों को रोक कर तीन बार जो जप करना है उसे प्राणायाम कहते हैं ॥ ८ ॥ हाथ में जल को उठा के और नासिका में लगाकर तीन बार वा एकबार प्राणों को रोके हुए वा न रोके हुए अघमर्षण (ऋतंच सत्यंचा०) इत्यादि मंत्र को जपै ॥ ९ ॥ उठकर जल की अंजलि से सूर्य के सम्मुख हो अर्थात् गायत्री मन्त्र पढ़ के अंजली देवे फिर ( उदुत्यं
८८ पाराशर्य्यसंहिता ॥
उद्यच्चित्रम्ऋग्द्वयेनाथचोपतिष्ठेदनन्तरम् ॥ १० ॥ संध्याद्वयेऽप्युपस्थानमेतदाहुर्मनीषिणः । मध्येत्वन्ह उपस्थायविभ्राडादीच्छयाजपेत् ॥ ११ ॥ तदसंसक्तपाष्णिर्वाएकपाददृढंपादपि । कुर्यात्कृताञ्जलिर्वापि ऊर्ध्वबाहुरथापिवा ॥ १२ ॥ यत्रस्यात्कृच्छ्रभूयस्त्वं श्रेयसोऽपिमनीषिणः । भूयस्त्वंब्रुवतेतस्यकृच्छ्रेणोहावाप्यते ॥ १३ ॥ तिष्ठेदुदयनात्पूर्वामध्यनामपिशक्तितः । आसीनस्तुसमाप्तान्त्यां संध्यांपूर्वेत्रिकंजपन् ॥ १४ ॥ एतत्संध्यात्रयंप्रोक्तं ब्राह्मण्यंयत्प्रतिष्ठितम् । यस्यनास्त्यादरस्तत्र नसब्राह्मणउच्यते ॥ १५ ॥ सन्ध्यालोपाच्चचकितः स्नानशीलश्चयःसदा ।
ज्ञान० । चित्रंदेवानां ) इत्यादि दो ऋचाओं से सूर्य की स्तुति करे ॥ १० ॥ दोनों संध्याओं में यही सूर्य का उपस्थान है ऐसा मुनीश्वर लोग कहते हैं और मध्यान्ह में स्तुति के पीछे अपनी इच्छा हो तो (विभ्राड्) इस अनुवाकादि को जपे ॥ ११ ॥ उस स्तुति के समय ऐड़ी पृथ्वी पर न लगे अथवा एक ही पैर से खड़ा रहे अथवा आधे पैर से फिर हाथ जोड़ कर अथवा ऊपर को भुजा करके सूर्य की स्तुति करे ॥ १२ ॥ एक पग से खड़े होने आदि जिस प्रकार करने में कष्ट बहुत हो उसी में कल्याण भी बहुत होता है यह बुद्धिमान् कहते हैं क्योंकि कष्ट से ही कल्याण प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ उदय से पूर्व प्रातःकाल और मध्याह्न की संध्या में यथाशक्ति यथावकाश पूर्वाभिमुख खड़े होके गायत्री जपे और सायंकाल में सूर्यास्त होने से पूर्व बैठ कर गायत्री जपे ॥ १४ ॥ ये जो तीन संध्या कही हैं उन्हीं में ब्राह्मण्य (ब्राह्मणपन) ठहरता है जिस को इन तीनों में आदर श्रद्धा नहीं वह ब्राह्मण भी नहीं है ॥ १५ ॥ जो सन्ध्या के न करने में पाप से भयभीत है और स्नान करने