भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

४१ शङ्खस्मृतिः ॥

समानं खल्वशौचन्तु प्रथमेन समापयेत् ।
असमानं द्वितीयेन धर्मराजवचो यथा ॥ १० ॥
देशान्तरगतः श्रुत्वा कुल्यानामरणोद्भवौ ।
यच्छेषं दशरात्रस्य तावदेवाशुचिर्भवेत् ॥ ११ ॥
अतीते दशरात्रे तु त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।
तथा संवत्सरेऽतीते स्नानमेव विशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
अनौरसेषु पुत्रेषु भार्यास्वन्यगतासु च ।
परपूर्वासु च स्त्रीषु त्र्यहाच्छुद्धिर्विधीयते ॥ १३ ॥
मातामहे व्यतीते तु आवापे च गतासुनि ।
गृहे दत्तासुकन्यासु सुतापुत्रेष्वहस्तथा ॥ १४ ॥
विद्राविते जनपदे जामातुर्दौहित्रके गृहे ।
आचार्यपत्निपुत्रेषु प्रेतेष्वेकदिनमेव च ॥ १५ ॥
मातुले पक्षिणी रात्रित्रिर्गणितोऽभ्यन्तरं चरेत् ।


यदि जन्म वा मरण के दो सूतक दस दिन के भीतर आगे पीछे हों जाँय तो पहिलेके समाप्त होने पर दूसरे जन्मसूतक समाप्त हो जायगा यदि असमान होय तो धर्मराज के वचनानुसार दूसरे के अन्त पर्य्यन्त शुद्धि करे ॥ १० ॥ परदेश में गया मनुष्य दश दिन के बीच में अपने कुल के हरण मरण को सुन कर दश दिन में शेष रहे दिनों तक अशुचि रहे ॥ ११ ॥ यदि दश दिन बीतने पर सुने तो तीन दिन में और एक वर्ष बीतने पर सुने तो तत्काल सचैल स्नान करने से ही शुद्धि होती है ॥ १२ ॥ आत्मज भिन्न (दत्तक आदि) पुत्रों के व्यभिचारिणी और जो अपने पति को छोड़ कर दूसरे को करने वाली स्त्री इनके मरने पर भी तीन दिन में शुद्धि होती है ॥ १३ ॥ नाना आचार्य और विवाहित कन्या इनके मरने पर भी तीन दिन में शुद्धि होती है ॥१४॥ देशके राजा के मरने अपने घरमें दौहित्र के जन्मने पर गुरु की पत्नी, और पुत्री के मरने पर एक दिन में शुद्धि होती है ॥ १५ ॥ मामाके मरने पर एक दिन रात शिष्य ऋत्विक् और सात पीढ़ी से पृथक् कुटुम्बी इन के मरने पर एक दिन रात अशुद्धि माने । सब्रह्मचारी ( जो संग में वेद पढ़ा हो ।

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४१

सब्रह्मचारिण्येकाहमनूचाने तथा मृते ॥ १६ ॥
एकरात्रं त्रिरात्रं च षडूरात्रं मासमेव च ।
शूद्रे सपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १७ ॥
त्रिरात्रमथ षडूरात्रं पक्षं मासं तथैव च ।
वैश्ये सपिण्डे वर्णानामाशौचं क्रमशः स्मृतम् ॥ १८ ॥
सपिण्डे क्षत्रिये शुद्धिः षडूरात्रेण ब्राह्मणस्य तु ।
वर्णानां परिशिष्टानां द्वादशाहो विनिर्दिशेत् ॥ १९ ॥
सपिण्डे ब्राह्मणे वर्णाः सर्व एव अविशेषतः ।
दशरात्रेण शुद्ध्यन्त्याह भगवान् यमः ॥ २० ॥
भृग्वग्न्यनशनाम्भोभिर्मृतानामात्मघातिनाम् ।
पतितानां च नाशौचं शस्त्रविद्युद्धताश्च ये ॥ २१ ॥
यतिव्रतिब्रह्मचारिनृपकारुकर्मिणाम् ।
नाशौचभाजः कथिता राजाज्ञाकारिणश्च ये ॥ २२ ॥

और अनूचान (जो वेद से अधिक जानकार था) के मरने पर (एक दिन रात एक दिन) अशुद्धि रहती है ॥ १६ ॥ जो शूद्र अपना सपिण्ड हो अथवा ही उन के मरने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों को क्रमशः एक दिन, तीन दिन, छः दिन और एक मास में शुद्धि होती है ॥ १७ ॥ अथवा अपना सपिण्डी वैश्य होकर मर गया हो तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को क्रम से तीन दिन, छः दिन, १५ दिन और एक मास में शुद्धि होती है ॥ १८ ॥ अथवा अपने सपिण्ड का क्षत्रिय होकर मर गया हो तो ब्राह्मण को छः दिन में और शेष तीनों वर्णों को बारह दिन में शुद्धि होती है ॥ १९ ॥ ब्राह्मण सपिण्ड अर्थात् ब्राह्मण में क्षत्रियादि की स्त्री से उत्पन्न के मर जाने में विप्र आदि सब जाति वर्ण दश रात में शुद्ध होते हैं। यह बात धर्मशास्त्रकर्ता भगवान् यम ने कही है ॥ २० ॥ भृगु (ऊंची जगह वा पर्वत की शिखर से गिर कर), अग्नि से जल कर, अनशन (भोजन के त्याग से), जल में डूब कर, अथवा स्वयं आत्मघात करके, शस्त्र, और बिजली इन से जो मरे हों वा जो पतित होके मरे हों उन का अशौच नहीं लगता ॥ २१ ॥ सन्यासी, व्रती, (जिस ने कोई व्रत धारण किया हो) ब्रह्मचारी, राजा, कारीगर, दीक्षित (जिस ने यज्ञ आदि में दीक्षा ले रक्खी हो) और राजा की आज्ञा करने वाले ये सब सूतक में अशुद्ध नहीं होते ॥ २२ ॥

४२ शंखस्मृतिः ॥

यस्तुभुङ्क्तेपराशौचे वर्णीसोप्यशुचिर्भवेत् ।
आशौचशुद्धौशुद्धिश्च तस्याप्युक्तामनीषिभिः ॥ २३ ॥
पराशौचेनरोभुक्त्वा कृमियोनौप्रजायते ।
भुक्त्वाऽन्नंम्रियतेयस्य तस्ययोनौप्रजायते ॥ २४ ॥
दानंप्रतिग्रहोहोमः स्वाध्यायःपितृकर्मच ।
प्रेतपिण्डक्रियावर्जमाशौचेविनिवर्तते ॥ २५ ॥

इति शांखे धर्मशास्त्रे पञ्चदशोऽध्यायः ॥१५॥

मृन्मयंभाजनंसर्वं पुनःपाकेनशुद्ध्यति ।
मद्यैर्मूत्रैःपुरीषैर्वा ष्ठीवनैःपूयशोणितैः ॥ १ ॥
संस्पृष्टंनैवशुद्ध्येत पुनःपाकेनमृन्मयम् ।
एतैरेवतथास्पृष्टं ताम्रसौवर्णराजतम् ॥ २ ॥
शुद्ध्यत्यावर्तितंपश्चादन्यथाकेवलाम्भसा ।


जो ब्रह्मचारी पराये घर मृतक में खाता है, वह भी अशुद्ध होता है और मृतक की शुद्धि होने पर उस की भी बुद्धिमानों ने शुद्धि कही है ॥२३॥ पराये अशौच में खाकर मनुष्य कीड़ों की योनि में जन्म लेता है और जिस के अन्न को खाकर पेट में रक्खे हुए मरता है उसी की जाति में पैदा होता है ॥२४॥ दान देना, दान लेना, होम, वेदपाठ, पितरों का कर्म, ये सब, प्रेत के लिये पिण्ड दान के कर्म को छोड़ कर मृतक में निवृत्त हो जाते हैं। अर्थात् सूतक के समय दानादि कर्म नहीं करने चाहिये ॥ २५ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में पन्द्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥१५॥


मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से शुद्ध हो जाता है, परन्तु मदिरा, मूत्र, विष्ठा, थूक, राध (पीव) और रुधिर, ॥१॥ ये मद्यादि जिस में रक्खे गये हों, ऐसा मट्टी का पात्र दुबारा पकाने से भी शुद्ध नहीं होता और इन मद्यादि का ही स्पर्श जिस में हुआ हो, ऐसा तांबे, सोने और चांदी का पात्र ॥ २ ॥ फिर अचाने से शुद्ध होता और अन्य किसी प्रकार से अशुद्ध हो, तो केवल जल से धोकर शुद्ध होता है। खटाई के जल से धोने पर तांबा, सीसा और लास के

भाषार्थसंहिता ॥ ४३

अम्लोदकेनताम्रस्य सीसस्यत्रपुणस्तथा ॥ ३ ॥
क्षारेणशुद्धिः कांस्यस्य लोहस्यचविनिर्दिशेत् ।
मुक्तामणिप्रवालानां शुद्धिःप्रक्षालनेनतु ॥ ४ ॥
अब्जानांचैवभाण्डानां सर्वस्याश्ममयस्यच ।
शाकवर्जमूलफल द्विद्लानांतथैवच ॥ ५ ॥
मार्ज्जनाद्यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि ।
उष्णाम्भसातथाशुद्धिं सस्नेहानाविनिर्दिशेत् ॥ ६ ॥
शयनासनयानानां स्फ्यशूर्पशकटस्यच ।
शुद्धिःसंमोक्षणाद्यज्ञे कटामिन्धनयोस्तथा ॥ ७ ॥
मार्जनाद्वेश्मनांशुद्धिः क्षितेःशोधस्तुतक्षणात् ।
सम्मार्जितेनतोयेन वाससांशुद्धिरिष्यते ॥ ८ ॥
बहूनांप्रोक्षणाच्छुद्धिर्धान्यादीनांविनिर्दिशेत् ।
प्रोक्षणात्संहतानांच दारुवाणांचतक्षणात् ॥ ९ ॥
सिद्धार्थकानांकल्केन शुद्धेद्दन्तमयस्यच ।
गोवालैःफलपात्राणामस्थ्नां शृङ्गवतांतथा ॥ १० ॥


पात्रादि की शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ कांसे और लोह के पात्रादि की शुद्धि खारे जल से और मोती, मणि, मूंगा, इन की शुद्धि जल से धोने मात्र से ही जाती है ॥ ४ ॥ जल के विकारों से पैदा हुए वस्तु, सब प्रकार के पत्थर के पात्र, शाक को छोड़ कर, मूल, फल, और उड़द, मूंग आदि दाल वाले इन सब की शुद्धि धोने से होती है ॥ ५ ॥ यज्ञ कर्म में यज्ञ के पात्रों की मांजने से और चिकने पात्रों की गर्म जल से शुद्धि कही है ॥ ६ ॥ शय्या, आसन, सवारी, सूप, शकट (गाड़ी) चटाई, इन्धन, इन की यज्ञ में जल छिड़कने से शुद्धि होती ॥ ७ ॥ बुहारने से घरों की और उसी समय छील देने से पृथिवी की और जल के मार्जन से वस्त्रों की शुद्धि होती है ॥ ८ ॥ बहुत से अन्नादि राशि की संहत (मिले हुए) पदार्थों की छिड़कने से और काष्ठ के पात्रों की शुद्धि छील देने से होती है ॥ ९ ॥ सींग और हाथी के दांत आदि से बने वस्तुओं की शुद्धि ओषधियों के उबाले रस से और फल से बने पात्र, हाड़ और सींग वाले वस्तुओं की शुद्धि गौ के चंवर से होती है ॥ १० ॥

४३ | शंखस्मृतिः ॥

निर्यासानांगुडानांच लवणानांतथैवच । कुसुंभकुंकुमानांच ऊर्णाकार्पासयोस्तथा ॥ ११ ॥ प्रोक्षणात्कथिताशुद्धिरित्याहभगवान्यमः । भूमिष्ठमुदकंशुद्धं शुचितोयंशिलागतम् ॥ १२ ॥ वर्णगन्धरसैर्दुष्टैर्वर्जितंयदि तद्भवेत् । शुद्धंनदीगतंतोयं सर्वदैवनथाकरः ॥ १३ ॥ शुद्धंप्रसारितंपण्यं शुद्धेचाजाश्वयोर्मुखे । मुखवर्जंतुगौःशुद्धा मार्जारश्चाक्रमेशुचिः ॥ १४ ॥ शय्याभार्याशिशुर्वस्त्रमुपवीतंक्रमण्डलुः । आत्मनःशुचितंशुद्धं नशुद्धिःपरस्यच ॥ १५ ॥ नारीणांचैववत्सानां शकुनीनांशुनांमुखम् । रात्रौप्रस्रवणेवृक्षे मृगयायांसदाशुचि ॥ १६ ॥ शुद्धाभर्तुश्चतुर्थेऽन्हि स्नानेनस्त्रीरजस्वला । दैवेकर्मणिपित्र्येच पञ्चमेऽह्नि विशुद्ध्यति ॥ १७ ॥ रथ्याकर्दमतोयेन ष्ठीवनाद्येनवाप्यथ ।


गोंद, गुड़, लवण, कुसुम्भ, ऊन, और कपास इन की ॥११॥ शुद्धि भी भगवान् यमराजने छिड़कने से कही है। पृथिवीके शुद्ध स्थल में और शिला पर पड़ा जल स्वतः ही शुद्ध होता है ॥१२॥ यदि वह भूमिस्थ जल दुष्ट वर्ण, बुरा रस, और बुरे गंध से वर्जित हो, नदी का और आकर (खान) का जल सदा ही शुद्ध है ॥ १३ ॥ दूकान में फैली चीज़, बकरी और घोड़े का मुख भी शुद्ध है। मुख को छोड़कर गौके सब अंग शुद्ध हैं और आक्रमण (किसी जानवर को पकड़ के मार डालने) में बिलाव शुद्ध है ॥ १४ ॥ शय्या, स्त्री, बालक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, ये सब अपने ही शुद्ध कहे हैं और अन्य के नहीं ॥१५॥ स्त्री, बछड़े, पक्षि, और कुत्ते का मुख, क्रमसे रात्रि में प्रस्त्रवण थन चूसने में, वृक्ष से फल गिरने में और शिकार करने में सदैव शुद्ध है ॥ १६ ॥ रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करके अपने पति के लिये और देवता वा पितरोंके कर्म में पाचवें दिन शुद्ध हुई मानी जावे ॥ १७ ॥ यदि मनुष्य की नाभि से ऊपर के

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४५

नाभेरूर्ध्वंनरःस्पृष्टः सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ १८ ॥
कृत्वामूत्रंपुरीषंवा स्नात्वाभोक्तुमनास्तथा ।
भुक्त्वाक्षुत्वात्तथासुप्त्वा पीत्वाचाम्भोऽवगाह्यच ॥१९॥
रथ्यामाक्रम्यवाऽऽचामेद्वासोविपरिधायच ।
कृत्वामूत्रंपुरीषंच लेपगन्धापहंद्विजः ॥ २० ॥
उद्धृतेनाम्भसाशौचं मृदाचैवसमाचरेत् ।
मेहनेमृत्तिकाःसप्त लिङ्गेद्वेपरिकीर्तिते ॥ २१ ॥
एकस्मिन्विंशतिर्हस्तेद्वयोर्ज्ञेयाप्ततुर्दश ।
तिस्रस्तुमृत्तिकाज्ञेयाः कृत्वानखविशोधनम् ॥ २२ ॥
तिस्रस्तुपादयोर्ज्ञेयाः शौचकामस्यसर्वदा ।
शौचमेतद्गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥ २३ ॥
त्रिगुणंतुवनस्थानां यतीनांतुचतुर्गुणम् ।
मृत्तिकाचविनिर्दिष्टा त्रिपर्वपूरयेत्तया ॥ २४ ॥

इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे षोडशोऽध्यायः ॥१६॥

शरीर में गांव की गली का जल या थूक लगजाय तो उसी समय स्नान करने से शुद्ध होता है ॥१८॥ लघु शंका, मल का त्याग, भोजन करना, नाक छिनकना, सोना, जल पीना, और जल में अवगाहन (स्नान आदि) इन कामों को करके भोजन से पहिले ॥१९॥ गली में चल कर और वस्त्रों को धारण करके आचमन करे मल मूत्र का त्याग करके द्विज जिससे दुर्गन्ध दूर हो ॥ २० ॥ ऐसी शुद्धि कृपादि से निकाले जल और मिट्टी से करे, मल मूत्र त्यागने पश्चात् गुदेन्द्रिय में सात बार, लिंगेन्द्रिय में दो बार मट्टी लगानी कही है ॥ २१ ॥ एक बांय हाथ में बीस बार और फिर दोनों में चौदह बार फिर नखों की शुद्धि करके तीन बार मट्टी लगानी जानो ॥ २२ ॥ शुद्धि की इच्छा वाले पुरुष को तीन बार पगों में मट्टी लगानी कही है। यह शुद्धि गृहस्थों के लिये कही है इससे दूनी ब्रह्मचारियों को ॥२३॥ तिगुनी वानप्रस्थों को और चौगुनी संन्यासियों के लिये जानो और प्रत्येक बार में इतनी मट्टी लेवे जिससे हाथ के तीन अंगुल भर जावें ॥ २४ ॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सोलहवां अध्याय पूरा हुआ ॥

४६ शंखस्मृतिः ॥

नित्यं त्रिषवणस्नायी कृत्वापर्णकुटीं वने ।
अधःशायी जटाधारी पर्णमूलफलाशनः ॥ १ ॥
ग्रामं विशेच्च भिक्षार्थं स्वकर्म परिकीर्तयन् ।
एककालं समश्नीयादूर्ध्वं तु द्वादशे गते ॥ २ ॥
हेमस्तेयी सुरापश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ।
व्रतेनैतेन शुध्यन्ते महापातकिनस्त्विमे ॥ ३ ॥
यागस्थं क्षत्रियं हत्वा वैश्यं हत्वा च याजकम् ।
एतदेव व्रतं कुर्यादात्रेयीविनिषूदकः ॥ ४ ॥
कूटसाक्ष्यं तथैवोक्त्वा निःक्षेपमपहृत्य च ।
एतदेव व्रतं कुर्यात्त्यक्त्वा च शरणागतम् ॥ ५ ॥
आहिताग्नेः स्त्रियं हन्त्वा मित्रं हत्वा तथैव च ।
हत्वा गर्भमविज्ञातमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ ६ ॥
वनस्थं च द्विजं हन्त्वा पार्थिवं चाकृतागसम् ।
एतदेव व्रतं कुर्याद्द्विगुणं च विशुद्धये ॥ ७ ॥
क्षत्रियस्य च पादोनं वधेऽर्द्धं वैश्यघातने ।


प्रायश्चित्ती पुरुष वन में ढांक आदि के पत्तों की कुटी बनाकर उस में बसे, सायं, प्रातः और मध्यान्ह में तीन बार स्नान करे, पृथिवी पर सोवे, जटाओं को धारण करे, वृक्षों के पत्ते, मूल, फल, इन का भोजन करे ॥ १ ॥ अपने कर्म को कहता हुआ भिक्षा मांगने के लिये गांव में जाय, बारह वर्ष पर्यन्त एक काल भोजन करै ॥ २ ॥ इस प्रकार सुवर्ण का चौर, ब्रह्म हत्या करने वाला तथा—गुरुस्त्री गामी, ये चारो महापातकी ब्राह्मणादि इस व्रत से शुद्ध होते हैं ॥ ३ ॥ यज्ञ करते हुए क्षत्रिय को और यज्ञ करने वाले वैश्य को मारकर और रजस्वला स्त्री को मार डालने वाला भी यही व्रत करे ॥ ४ ॥ झूठी गवाही देकर, न्यास (धरोहर) को मार लेने पर और अपने शरण आये को त्याग करके भी यही व्रत करे ॥ ५ ॥ अग्निहोत्री की स्त्री, मित्र, और बिना जाने गर्भ को मार कर भी यही व्रत करे ॥ ६ ॥ वनवासी ब्राह्मण और अपराधी राजा इन को मार कर भी विशेष शुद्धि के लिये उक्त से दूना व्रत करे ॥ ७ ॥ वनवासी क्षत्रिय के मारने में पौन, वनस्थ वैश्य के और स्त्री के

पादन्तुशूद्रहत्यायामुदक्यागमनेतथा ।

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४१

अर्द्धमेवसदाकुर्यात्स्त्रीवधेपुरुषस्तथा ॥ ८ ॥
पादन्तुशूद्रहत्यायामुदक्यागमनेतथा ।
गोवधेचतथाकुर्यात्परदारगतस्तथा ॥ ९ ॥
पशून्हत्वातथाग्राम्यान् मासंकृत्वाविचक्षणः ।
आरण्थानांवधेतद्वत्तदर्धंतुविधीयते ॥ १० ॥
हत्वाद्विजंतथासर्पंजलेशयविलेशयान् ।
सप्तरात्रं तथाकुर्याद्व्रतंब्रह्महणस्तथा ॥ ११ ॥
अनस्थ्नांशकटंहत्वा सास्थ्नांदशशतंतथा ।
ब्रह्महत्याव्रतंकुर्यात्पूर्णंसंवत्सरंनरः ॥ १२ ॥
यस्ययस्यचवर्णस्य वृत्तिच्छेदंसमाचरेत् ।
तस्यतस्यवधेप्रोक्तं प्रायश्चित्तंसमाचरेत् ॥ १३ ॥
अपहृत्यतुवर्णानां भुवंप्राप्यप्रमादतः ।
प्रायश्चित्तंवधेप्रोक्तं ब्राह्मणानुमतंचरेत् ॥ १४ ॥
गोजाश्वस्यापहरणो मणेर्नांरजतस्य च ।
जलापहरणेचैव कुर्यात्संवत्सरव्रतम् ॥ १५ ॥
तिलानांधान्यवस्त्राणांमद्यानामामिषस्यच ।


मारने में उक्त में से आधा व्रत करे ॥ ८ ॥ शूद्र की हत्या, रजस्वला स्त्री के गमन, गोवध, और परस्त्री के गमन में उक्त में से चौथाई व्रत को करे ॥९॥ गांव के तथा बन के पशुओं को एक मास तक मार कर उक्त आधा व्रत कहा है ॥१०॥ पक्षी, सांप, जल और बिल में रहने वाले जीव, इन को मार कर ब्रह्महत्या का व्रत सात दिन तक करे ॥ ११ ॥ बिना हड्डी वाले जीवों की भरी गाड़ी और हाड़ वालों के एक हज़ार को मार कर मनुष्य एक वर्ष तक सम्पूर्ण ब्रह्म हत्या का व्रत करे ॥ १२ ॥ जिस २ वर्ण की जीविका में हानि करे, उसी २ वर्ण की हत्या का प्रायश्चित्त करे ॥१३॥ वर्णों की भूमि को चोरी से अनजाने लेकर ब्राह्मणों की आज्ञा से हत्या का जो प्रायश्चित्त है उस को करे ॥ १४ ॥ गौ, बकरी, घोड़ा, मणी, चांदी, जल, इन की जो चोरी करे वह एक वर्ष तक उक्त व्रत करे ॥ १५ ॥ तिल, अन्न, वस्त्र, मदिरा, मांस, इन

४८ शंखस्मृति ॥

संवत्सराद्धं कुर्वीत व्रतमेतत्समाहितः ॥ १६ ॥ तृणेक्षुकाष्ठतक्राणां रसानामपहारकः । मासमेकंव्रतं कुर्याद्गन्धानांसर्पिषांतथा ॥ १७ ॥ लवणानांगुडानांच मूलानांकुसुमस्यच । मासाद्धंतुव्रतं कुर्यादेतदेवसमाहितः ॥ १८ ॥ लोहानांवैदलानांच सूत्राणांचर्मणांतथा । एकरात्रंव्रतं कुर्यादेतदेवसमाहितः ॥ १९ ॥ भुक्त्वापलाण्डुलशुनं मद्यंचकवकानिच । नारंमलंतथामांसं विड्वराहंखरंतथा ॥ २० ॥ गौधेरकुञ्जरोष्ट्रंच सर्वंपञ्चनखंतथा । क्रव्यादंकुक्कुटंग्राम्यं कुर्यात्संवत्सरव्रतम् ॥ २१ ॥ भक्ष्याःपञ्चनखास्त्वेते गोधाकच्छपशल्लकः । खड्‌गश्चशशकश्चैव तान्हत्वाचाचरेद्व्रतम् ॥ २२ ॥ हंसंमद्गुंबकं काकं काकोलंखञ्जरीटकम् । मत्स्यादांश्चतथामत्स्यान्बलाक्रंशुकसारिके ॥ २३ ॥


की चोरी करके छः महीने तक सावधानी से उक्त व्रत करै ॥ १६ ॥ तृण, गांठ, काठ, मठा, रस, सुगन्ध, घी इन का चोर एक महीना तक व्रत करै ॥ १७ ॥ लवण, गुड़, मूल, फूल, इन की चोरी करने वाला सावधानी से पन्द्रह दिन यही व्रत करै ॥ १८ ॥ लोहे के पात्र बांस के पात्र, सूत, चाम, इन की चोरी करने वाला सावधान हो कर एकदिनरात यही व्रत करै ॥ १९ ॥ पलाण्डु, (प्याज) लहशुन, मदिरा, कवक (कटफल) मनुष्य का मल, मनुष्य का मांस विष्ठा खाने वाले सूकर और गधा का मांस इन को खा कर ॥ २० ॥ गोधेय (गोह का बच्चा) हाथी, ऊंट, सब पांच नखवाले, कच्चा मांस खाने वाले जीव, और गांव का मुरगा इन सब का मांस खा कर एक वर्ष तक उक्त व्रत करै ॥ २१ ॥ परन्तु गोह, कछुआ, सेही, गेंडा, खरगोश, ये पांच नखों वाले पांच भक्ष्य हैं और इन पांचों को मारकर भी एकवर्ष तक व्रत को करै ॥ २२ ॥ हंस-मद्गुर, (मत्स्यभेद या जलकाक) बगुला, बलाका, कौआ, काकोल, (सर्प) खञ्जरीट (खञ्जन पक्षि) मछलीको खानेवाली - मछली, तोता, सारिका (मैना,)॥ २३ ॥

भाषाधर्मसंहिता ॥ ४९

चक्रवाकंप्रप्लवंकौकं मण्डूकंभुजगंतथा ।
मासमेकंव्रतंकुर्याद्धेनञ्चैवनभक्षयेत् ॥ २४ ॥
राजीवान्सिंहतुण्डांश्च शकुलांश्चतथैवच ।
पाठीनरोहितौभक्ष्यो मनुष्येषुपरिकीर्तितौ ॥ २५ ॥
जलेचरांश्चजलजान् मुखाग्रनखविष्किरान् ।
रक्तपादान्जालपादान्सप्ताहांतव्रतमाचरेत् ॥ २६ ॥
तित्तिरिंचमयूरंच लावकंचकपिञ्जलम् ।
वार्ध्रीणसंवर्त्तकंच भक्ष्यानाहयमस्तथा ॥ २७ ॥
भुक्त्वाचोभयतोदन्त मन्यैकशफदीर्घोर्णः ।
तथाभुक्त्वातुमांसांश्च मासाद्धैव्रतमाचरेत् ॥ २८ ॥
स्वयंमृतंष्टथामांसं माहिषंवाजमेवच ।
गौरचक्षीरंविवत्सायाः संधिन्थाश्चतथापयः ॥ २९ ॥
संधिन्यमेध्यमशित्वा पक्षंतुव्रतमाचरेत् ।
क्षीराणियान्यभक्ष्याणि तद्विकाराननेबुधः ॥ ३० ॥
सप्तरात्रंव्रतंकुर्याह्येतत्परिकीर्त्तितम् ।


चक्रवा, प्लव (जल का पंछी) कंक (बगुला) मेढक, सर्प इनको खाकर एक महीना तक व्रत करे और आगे इनको कभी न खावै ॥ २४ ॥ राजीव, सिंहतुंड, श-कुल, पाठीन, रोहित, इन२ नामों वाली मच्छी भक्ष्य कही हैं ॥ २५ ॥ जल में विचरने और जल में पैदा होने वाले, मुख के अग्रभाग में जो नख उनसे खोदने वाले जिनके पग लाल हों, और जिनके जाल के समान पग हों, उन पक्षियों का मांस खाकर सात दिन व्रत करे ॥ २६ ॥ तीतर, मोर, लावक (लावपंछी) कपिंजल, वा-र्ध्रीणस, बत्तक, ये यमराजने भक्ष्य कहे हैं ॥ २७ ॥ जिनके दोनों ओर दांत होते, जिनके एक जुड़े खुर होते, जो एक ओर दानवाले हैं इनका मांस खाकर पंद्रह दिन व्रत करे ॥ २८ ॥ स्वयं मरे जीवका मांस, भैंस और बकरेका मांस, जिस का बछड़ा मरगयाहो अथवा जो संधिनी (गाभिन हो जाने पर दूध देती हो) उस गौ का दूध ॥ २९ ॥ संधिनी गौ का अशुद्ध मूत्रादि इनको खाकर पंद्रह दिन व्रत करे और जो दूध अभक्ष्य हैं उनके विकार (दही, मट्ठा, कढ़ी आदि) को खाकर बुद्धिमान् पुरुष ॥ ३० ॥ सात दिन तक उक्त व्रतको करे। जिसका लाल गोंड़, और जो गोंड़ वृक्षके

५२ | शंखस्मृतिः ॥

लोहितान्वृक्षनिर्यासान्व्रश्चनप्रभवांस्तथा ॥ ३१ ॥
केवलानिचशुक्तानि तथापर्युषितंचयत् ।
गुडशुक्तंतथाभुक्त्वा त्रिरात्रंचव्रतीभवेत् ॥ ३२ ॥
दधिभक्ष्यंचशुक्तेषु यच्चान्यद्दधिसंभवम् ।
गुडशुक्तंतुभक्ष्यंस्यात् ससर्पिष्कमितिस्थितिः ॥ ३३ ॥
यवगोधूमजाःसर्वे विकाराःपयसश्चये ।
राजवाड्वकुल्यंच भक्ष्यंपर्युषितंभवेत् ॥ ३४ ॥
सजीवपक्वंमांसंच सर्वयत्नेनवर्जयेत् ।
संवत्सरंव्रतंकुर्यात् प्राश्यैतानज्ञानतस्तुतान् ॥ ३५ ॥
शूद्रान्नंब्राह्मणोभुक्त्वा तथारङ्गावतारिणः ।
चिकित्सकस्यक्षुद्रस्य तथास्त्रीमृगजीविनः ॥ ३६ ॥
षण्डस्यकुलटायाश्च तथाबन्धनचारिणः ।
वद्धस्यचैवचौरस्य अवीरायाःस्त्रियस्तथा ॥ ३७ ॥
चर्मकारस्यवेनस्य क्लीवस्यपतितस्यच ।
रुक्मकारस्यधूर्त्तस्य तथावार्द्धुपिकस्यच ॥ ३८ ॥
कदर्यस्यनृशंसस्य वेश्यायाःकितवस्यच ।


गोंदने से निकलेहों ॥३१॥ केवल शुक्त (खटाये हुए) और वासी पदार्थ, खटाया बिगड़ा हुआ गुड़ का विकार इन को खाकर तीन दिन व्रत करे ॥ ३२ ॥ विकार से खटाये हुए पदार्थों में दही, तथा दही से बने कढ़ी, रायतादि, घी जिस में मिला हो ऐसा खटाया गुड़ ये शुक्तों में भक्ष्य कहे हैं ॥ ३३ ॥ जौ, गेहूं, दूध,-इन से बने सब विकार और राजवाड़व नामक जीव का मांस ये वासी (धरे हुए) भी भक्ष्य हैं ॥३४॥ जीते जीवों के पकाये मांस को सब प्रकार त्याग देवे और इन पूर्वोक्त अभक्ष्य पदार्थों को ज्ञान पूर्वक खावे तो एक वर्ष तक व्रत करे ॥३५॥ शूद्र, रंगावतारी (नाटकी) वैद्य, क्षुद्रबुद्धि, स्त्री को नचा के तथा मृगों को मार के जीविका करने वाला ॥३६॥ नपुंसक, व्यभिचारिणी स्त्री, बन्धन चारी, (डाकिये) कैदी चोर, पति पुत्र हीन स्त्री, ॥ ३७ ॥ चमार, वेन, क्लीव, (नामर्द) पतित, सुनार, धूर्त्त नाम अन्य की हानि करने वाला, व्याज लेने वाला, ॥ ३८ ॥ कंजूस, हिंसक, वेश्या, जुवारी, इन शूद्रादि

भाषार्थसहिता ॥ ५१

गणान्नंभूमिपालान्न मन्नंचैवम्प्रजीविनाम् ॥ ३९ ॥
मौञ्जिकानांसूतिका नं भुक्त्वामा संव्रतंचरेत् ।
शूद्रस्यसततं भुक्त्वा षण्मासान्व्रतमाचरेत् ॥ ४० ॥
वैश्यस्यतुतथाभुक्त्वा त्रीन्मासान्व्रतमाचरेत् ।
क्षत्रियस्यतथाभुक्त्वा द्वौमासौव्रतमाचरेत् ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणस्यतथाभुक्त्वा मासमेकंव्रतंचरेत् ।
आपःसुराभाजनस्थाः पीत्वापक्षंव्रतंचरेत् ॥ ४२ ॥
मद्यभाण्डगताःपीत्वा सप्तरात्रंव्रतंचरेत् ।
शूद्रोच्छिष्टाशनेमासं पक्षमेकंतथाविशः ॥ ४३ ॥
क्षत्रियस्यतुसप्ताहं ब्राह्मणस्यतथादिनम् ।
अग्रश्राद्धाशनेविद्वान् मासमेकंव्रतीभवेत् ॥ ४४ ॥
परिवित्तिःपरिवेत्ता ययाचपरिविन्दति ।
व्रतंसंवत्सरंकुर्य्युर्दातृयाजकपञ्चमाः ॥ ४५ ॥
काकोच्छिष्टंगवाघ्रातं भुक्त्वापक्षंव्रतीभवेत् ।


का अन्न, बहुत मनुष्यों के चन्द का अन्न, राजा का अन्न शिकारी कुत्ते रखने वालों का अन्न, ॥३९॥ सूत के व्यापारी और सूतिका का अन्न खाकर एक मास तक व्रत करे और निरन्तर शूद्र के अन्न को खाकर छ मास तक व्रत करे ॥४०॥ वैश्यका अन्न निरन्तर खाकर तीन महीने और क्षत्रिय का अन्न निरन्तर खाकर दो महीने व्रत करे ॥ ४१ ॥ ब्राह्मणका अन्न निरन्तर खाकर एक महीने तक व्रत करे और मदिरा के पात्र में रक्खा जल पीकर पन्द्रह दिन तक व्रत करे । ४२॥ गुड़ की मदिरा के पात्र का जलपीकर सातदिन व्रत करे । शूद्रका उच्छिष्ट खाकर एक महीना और वैश्य का उच्छिष्ट खाकर पन्द्रह दिन व्रत करे ॥ ४३ ॥ क्षत्रिय का उच्छिष्ट अन्न खाकर सात दिन, ब्राह्मण का उच्छिष्ट अन्न खाकर एक दिन और अद्यादशाह के श्राद्ध में खाकर एक महीना ज्ञानवान् मनुष्य व्रत करे ॥ ४४ ॥ परिवेत्ता परिवित्ति जिस स्त्री के साथ परिवित्ति ने जेठे भाई से पहिले विवाह किया हो वह स्त्री कन्या का दाता और पांचवा याजक (विवाह पढ़ने वाला ) ये पांचों एक वर्ष तक व्रत करें ॥ ४५ ॥ कौवे का उच्छिष्ट, गौ का सूँघा अन्न इन को खाकर पंद्रह दिन व्रत करे और बाल कीड़ा, मूसा, हत इन में जो दूषित हो अर्थात बाल आदि पड़ गये हों

५२ | शंखस्मृतिः ॥

दूषितंकेशकीटैश्च मूषिकालाङ्गुलेनच ॥ ४६ ॥
मक्षिकामशकेनापि त्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ।
वृथाकृसरसंयावपायसापूपशष्कुलीः ॥ ४७ ॥
भुक्त्वात्रिरात्रंकुर्वीत व्रतमेतत्समाहितः ।
नील्याचैवक्षतोविप्रः शुनादष्टस्तथैवच ॥ ४८ ॥
त्रिरात्रंतुव्रतं कुर्यात् पुंश्चलीदशनक्षतः ।
पादप्रतापनंकृत्वा वह्निकृत्वात्तथाप्यधः ॥ ४९ ॥
कुशैःप्रमृज्यपादौच दिनमेकंव्रतीभवेत् ।
नीलीवस्त्रंपरीधाय भुक्त्वास्नानार्हमस्तथा ॥ ५० ॥
त्रिरात्रंव्रतं कुर्याच्छित्वागुल्मलतास्तथा ।
अध्यास्यशयनंयानमासनंपादुकेतथा ॥ ५१ ॥
पलाशन्वादिजंपृष्ट्वात्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ।
वाग्दुष्टंभाजदुष्टंच भाजनेभावदूषिते ।
भुक्त्वाऽन्नंब्राह्मणः पश्चात्त्रिरात्रंतुव्रतीभवेत् ॥ ५२ ॥
क्षत्रियस्तुरणेदत्वा पृष्ठंप्राणपरायणः ।

वा सूयादि ने खाया हो ॥ ४६ ॥ मक्खी मच्छर इनके पड़जाने से दूषित हुए को खा कर तीन दिन व्रत करे और वृथा (केवल अपने लिये) कृसर, (मिले हुए दाल तिल चावल की खिचड़ी) संयाव (सोहनभोग) खीर, पूआ, पूरी, ॥४७॥ इनको खा कर सावधानी से तीन दिन तक व्रत करे । जिस ब्राह्मण के शरीर में नील की लकड़ी से घाव हो जाय वा जिस को कुत्ता काटे ॥ ४८ ॥ वह तीन दिन व्रत करे, जिसके पुंश्चली (वेश्या आदि व्यभिचारिणी) के दांतों से घाव हो जाय और नीचे अग्नि रखकर जो पग तपाये ॥४९॥ वह कुशाओं से पगों को शुद्ध कर के एक दिन व्रत करे । और नील का रंगा वस्त्र पहन कर और जिस के छूने से स्नान करना योग्य है उस का अन्न खा कर ॥ ५०॥ तीन दिन व्रत करे गुल्म (गुच्छे) लता, इन को काट कर शय्या (खटिया) सवारी, आसन पट्ठा वा पलन और खड़ाऊं इन पर बैठ कर ॥ ५१ ॥ यदि ये खटिया आदि सब पलाश (ढाक) के काष्ठादि से बनी हों तो तीनदिन व्रत करे । वाणी से और भावना से दूषित पदार्थ को, खाके तथा भाव से दूषित पात्र में अर्थात् जो निन्दित घृणित नाम से बोला गयाहो । खाकर ब्राह्मण तीन दिन व्रत करे ॥ ५२ ॥ और अपने प्राणों की रक्षा में तत्पर क्षत्रिय रण

भाषाधर्मसंहिता ॥ ५३

संवत्सरंव्रतंकुर्याच्छित्त्वावृक्षंफलप्रदम् ॥ ५३ ॥
दिवाचमैथुनंगत्वा स्नात्वानग्नस्तथाम्भसि ।
नग्नांपरस्त्रियंदृष्ट्वा दिनमेकंव्रतीभवेत् ॥ ५४ ॥
क्षिप्त्याग्नावशुचिद्रव्यं तदेवाम्भसिमानवः ।
मासमेकंव्रतंकुर्यादुपक्रुध्यत्तथागुरुम् ॥ ५५ ॥
पातावशेषंपानीयं पीत्वाचब्राह्मणःक्वचित् ।
त्रिरात्रंतुव्रतंकुर्याद्वामहस्तेनवापुनः ॥ ५६ ॥
एकपङ्क्त्युपविष्टेषु विषमंयःप्रयच्छति ।
सचनावदसौपक्षं कुर्यात्तुब्राह्मणोव्रतम् ॥ ५७ ॥
धारयित्वा तुलाधार्यं विषमं कारयेद्बुधः ।
सुरालवणमद्यानां दिनमेकंव्रतीभवेत् ॥ ५८ ॥
मांसस्यविक्रयं कृत्वा कुर्याञ्चैवमहाव्रतम् ।
विक्रीयपणिनामद्यं तिलस्यचतथाचरेत् ॥ ५९ ॥
हुंकारंब्राह्मणस्योक्त्वा त्वंकारंचगरीयसः ।
दिनमेकंव्रतंकुर्यात् प्रयतःसुसमाहितः ॥ ६० ॥
प्रेतस्यप्रेतकार्याणि अकृत्वाधनहारकः ।

( युद्ध ) में पीठ दे कर भाग आवै तो एक वर्ष तक व्रत करै, फल देने हुए वृक्ष को काट कर ॥ ५३ ॥ दिन में मैथुन करके, नंगा होकर जलाशय में स्नान करके और अन्य की स्त्री को नंगी देखकर एक दिन व्रत करे ॥ ५४ ॥ अग्नि और जल में अशुद्ध पदार्थ डाल कर, और गुरु पर क्रोध करके एक मास तक व्रत करे ॥ ५५ ॥ और पीने में बचे पानी को ब्राह्मण कदाचित् पीकर, और बाये हाथ से जल पीकर तीन दिन व्रत करै ॥ ५६ ॥ एक पङ्क्ति में बैठे हुओं के आगे जो विषम किसी मित्र या प्रतिष्ठित को उत्तम पदार्थ तथा अन्यों को साधारण वस्तु परोसे जिसको अच्छा परोसा हो वह और परोसने वाला दोनों पन्द्रह दिन व्रत करें ॥ ५७ ॥ तौला को रखकर जो कम तुलवावे तथा सुरा, मदिरा, लवण, मद्य, इनको बेंचै या बिकवावे वह एक दिन व्रत करै ॥ ५८ ॥ मांस को बेंच कर महाव्रत करे । अपने हाथ से मदिरा और तिलों को बेंच कर भी महाव्रत करे ॥ ५९ ॥ और ब्राह्मण को हुंः और बड़े प्रतिष्ठित पुरुष को तू कह कर सावधान होके एकाग्र मन से एक दिन व्रत करै ॥ ६० ॥ मरे मनुष्य के दाहादि कर्म न करके उस के धनादि सामान को लेने

५४ शंखस्मृतिः ॥

वर्णानांयद्व्रतंप्रोक्तं तद्व्रतंप्रयतःचरेत् ॥ ६१ ॥
कृत्वापापंनगूहेत गूह्यमानंविवर्द्धते ।
कृत्वापापंबुधःकुर्यात् पर्षदोऽनुमतंव्रतम् ॥६२॥
तस्करश्वापदाकीर्णे बहुव्यालमृगेवने ।
नव्रतंब्राह्मणःकुर्यात् प्राणव्याधाभयात्सदा ॥६३॥
सर्वत्रजीवनंरक्षेज्जीवन्पापमपोहति ।
व्रतैःकृच्छ्रैश्चदानैश्च इत्याहभगवान्यमः ॥६४॥
शरीरंधर्मसर्वस्वं रक्षणीयं प्रयत्नतः ।
शरीरात्स्रवतेधर्मः पर्वतात्सलिलंयथा ॥६५॥
आलोच्यधर्मशास्त्राणि समेत्यब्राह्मणैःसह ।
प्रायश्चित्तंद्विजोदद्यात् स्वेच्छयानकदाचन ॥६६॥
इति श्रीशांखे धर्मशास्त्रे सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
त्र्यहं त्रिषवणस्नायी स्नानेस्नानेऽघमर्षणम् ।
निमग्नस्त्रिःपठेद्प्सु नभुञ्जीतदिनत्रम् ॥१॥
वीरासनंचतिष्ठेत गांदद्याच्चपयस्विनीम् ।


वाला. ब्राह्मणादि वर्णों को जो २ व्रत कहा है उसी को मन लगाके करे ॥६१॥ पाप को करके न छिपावे क्योंकि छिपाने से पाप बढ़ता है। इस कारण पाप को करके ज्ञानवान् पुरुष धर्मसभा की अनुमति से व्रत करे ॥ ६२ ॥ चोर, भड़िया, सांप मृग ये जिस में हों ऐसे वन में ब्राह्मण प्राणों के भय से सदैव व्रत न करे ॥ ६३ ॥ क्योंकि जीवन की रक्षा सब जगह करनी चाहिये जीवित रहता हुआ मनुष्य कृच्छ्र प्राजापत्यादि व्रतों तथा दानों के द्वारा पाप को दूर कर सकता है यह बात भगवान् धर्मशास्त्रकर्त्ता यम ने कही है ॥६४॥ धर्म का सर्वस्व जो शरीर है उस की प्रयत्न से रक्षा करनी चाहिये। शरीर से धर्म इस प्रकार निकलता है जैसे पर्वत में से जल के झरने निकलते हैं ॥६५॥ इस से ब्राह्मणों के संग मिल के धर्मशास्त्रों को देख विचार कर विद्वान् ब्राह्मण अपराधी को प्रायश्चित्त बतावे किन्तु अपनी इच्छा से कभी न बतावे ॥६६॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में सत्रहवां अध्याय पूरा हुआ ॥

तीन दिन तक त्रिकाल स्नान करे और तीनों स्नानों में जल में डूबा हुआ तीन २ वार अघमर्षण सूक्त जपे और तीन दिन तक भोजन न करे निराहार व्रत करे ॥१॥ वीरासन से बैठा रहे और दूध देती गौ का दान करे

भाषार्थसंहिता ॥ ५५

अघमर्षणमित्येतद् व्रतंसर्वाघनाशनम् ॥२॥
त्र्यहंसायंत्र्यहंप्रातस्त्र्यहमद्यादयाचितम् ।
त्र्यहंपरंचनाश्नीयात्प्राजापत्यंचरन्व्रतम् ॥३॥
त्र्यहमुष्णंपिवेत्तोयं त्र्यहमुष्णंघृतंपिवेत् ।
त्र्यहमुष्णंपयःपीत्वा वायुभक्षस्त्र्यहंभवेत् ॥ ४ ॥
तप्तकृच्छ्रं विजानीयाच्छीतैः शीतमुदाहृतम् ।
द्वादशाहोपवासेन पराकःपरिकीर्तितः ॥ ५ ॥
विधिनोदकसिद्धान्नं समश्नीयात्प्रयत्नतः ।
सकृद्वासोदकान्मासं कृच्छ्रंवारुणमुच्यते ॥ ६ ॥
विल्वैरामलकैर्वापि पद्माक्षैरथवाशुभैः ।
मासेनलोकेऽतिकृच्छ्रः कथ्यतेबुद्धिसत्तमैः ॥ ७ ॥
गोमूत्रंगोमयंक्षीरं दधिसर्पिःकुशोदकम् ।
एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सांतपनंस्मृतम् ॥ ८ ॥
एतैस्तुत्र्यहमभ्यस्तं महासांतपनंस्मृतम् ।

यह तीन दिन का अघमर्षण व्रत सब पापों का नाशक है ॥ २ ॥ जो मनुष्य प्राजापत्य व्रत करे वह तीन दिन तक सायंकाल, तीन दिन तक प्रातःकाल, तीन दिनतक जो विनामांगे मिले उसे खावे और तीनदिन तक सर्वथा भोजन न करे निराहार रहे ॥३॥ तीनदिन तक गर्म जल, तीनदिन गर्म घी, तीनदिन गौकागर्म दूध पीवे और तीन दिन वायु मात्र का भक्षण करे अन्य कुछ न खावे ॥४॥ इस को तप्तकृच्छ कहते और पूर्वोक्त क्रमसे यदि शीतल जल आदि पीवे तो शीत कृच्छ कहा जायगा । और बारह दिनके उपवास से शुद्ध पराक कृच्छ्र व्रत कहाता है ॥ ५ ॥ विधि पूर्वक जल से बनाये अन्न को बड़े यत्न से जो खावे यदि वह मनुष्य एक महीने तक सोदक करे अर्थात् भोजन के बिना अन्न न पीवे उसे वारुण कृच्छ्र कहते हैं ॥ ६ ॥ बेल, आंवले, अच्छे कमलगट्टे, इन को एक महीने खाने से बुद्धिमानों ने अतिकृच्छ्र कहा है ॥ ७ ॥ गोमूत्र गोबर, दूध, दही, घी, कुशा का जल इन सब को एक दिन खाना और एक दिन का उपवास करना इस को सांतपन कृच्छ्र कहते हैं ॥ ८ ॥ तीन दिन तक इन के करने से महासांतपन कहाता है । तिलों का खल बिना जल का मठा.

५६ शंखस्मृतिः ॥

पिण्याकंवामतक्रांबुसक्तूनांप्रतिवासरम् ॥ ९ ॥ उपवासान्तराभ्यामात्तुलारुरुषउच्यते । गोपुरीषाशनोभूत्वा मासंनित्यंसमाहितः ॥ १० ॥ व्रतंतुयावकंकुर्यात्सर्वपापापनुत्तये । ग्रासंचन्द्रकलावृद्ध्या प्राश्नीयाद्वर्द्धयन्सदा ॥ ११ ॥ ह्रासयेच्चकलावृद्ध्या व्रतंचान्द्रायणंचरन् । मुण्डस्त्रिपवणस्नायी अधःशायोजितेन्द्रियः ॥ १२ ॥ स्त्रीशूद्रपतितानांच वर्जयेत्परिभाषणम् । पवित्राणिजपेच्छक्त्या जुहुयाच्चैवशक्तिः ॥ १३ ॥ अयंविधिःसविज्ञेयः सर्वकृच्छ्रेषुसर्वदा । पापात्मानस्तुपापेभ्यः कृच्छ्रैःसंतारितानराः ॥ १४ ॥ गतपापादिवंयान्ति नात्रकार्याविचारणा । शंखप्रोक्तमिदंशास्त्रं योऽधीतेबुद्धिमान्नरः ॥ १५ ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तस्स्वर्गलोकेमहीयते ॥ १६ ॥ इतिशांखेधर्मशास्त्रेअष्टादशोऽध्यायः॥१८॥इतिशंखस्मृतिःसमाप्ता॥

सत्तू इन के प्रतिदिन ॥९॥ बीच २ में उपवास करके अभ्यास (करना) से तुला- पुरुष व्रत कहा है । गोवर को एक महीने तक प्रतिदिन सावधानी से खाकर ॥१०॥ सब पापों के नाश के लिये इस यावक व्रत को करे । चन्द्रमा की कला की वृद्धि के साथ २ एक २ ग्राम प्रति दिन बढ़ाकर खावे ॥११॥ और कला की हानि के साथ २ एक २ ग्राम प्रति दिन वह पुरुष घटावे जो चान्द्रायण व्रत करे । मुंडन किये हुये त्रिकाल स्नान करे भूमि पर सोवेइन्द्रियों को जीते ॥१२॥ स्त्री, शूद्र, पतित नीच इनके संग न बोले पवित्रता के मन्त्र स्तोत्र आदि को जपे और यथा शक्ति होम करे ॥ १३ ॥ यह विधान सब कृच्छ्रों में सदैव जानो । कृच्छ्रों के प्रताप से पापों से छूटे पापी पुरुष ॥१४॥ नष्ट हुआ है पाप जिन का ऐसे होकर स्वर्ग में जाते हैं इस में कुछ सन्देह नहीं है। शंख ऋषि के कहे इस शास्त्र को जो बुद्धिमान् नर पढ़ता है ॥ १५ ॥ वह सब पापों से पृथक् होकर स्वर्गलोक में पूजता है ॥१६॥

यह शंखस्मृति के भाषानुवाद में अठारहवां अध्याय पूरा हुआ और यह ग्रन्थ भी समाप्त हुआ ॥

अथलिखितस्मृतिप्रारम्भः॥


इष्टापूर्त्तेतुकर्तव्ये ब्राह्मणेनप्रयत्नतः।
इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्त्तमौक्षमवाप्नुयात् ॥ १ ॥
एकाहमपिकर्त्तव्यं भूमिष्ठमुदकंशुभम् ।
कुलानितारयेत्सप्त यत्रगौर्वितृषाभवन् ॥ २ ॥
भूमिदानेनयेलोका गोदानेनचकीर्त्तिताः।
तांल्लोकान्प्राप्नुयान्मर्त्यः पादपानांप्ररोपणे ॥ ३ ॥
वापीकूपतड़ागानि देवतायतनानिच ।
पतितान्युद्धरेद्यस्तु सपूर्त्तफलमश्नुते ॥ ४ ॥
अग्निहोत्रंतपःसत्यं वेदानांचैवपालनम् ।
आतिथ्यंवैश्वदेवंच इष्टमित्यभिधीयते ॥ ५ ॥
इष्टापूर्त्तेद्विजातीनां सामान्योधर्मउच्यते।

ब्राह्मण प्रयत्न से इष्ट ( श्रौत अग्निहोत्रादि ) और पूर्त ( कूप बन वाना प्याऊ बैठाना आदि ) धर्म के कामों को बड़े यत्न से करै क्योंकि इष्ट से स्वर्ग मिलता और पूर्त से मोक्षको प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जिसमे एक गौ की प्यास निवृत्त होजाय इतना जल यदि एक दिन भी पृथिवी में जो करदे, वह सात कुलों को तारता है ॥ २ ॥ भूमि और गौ के दान से जिन लोकों के भोग मिलते हैं उन्हीं लोकों को वृक्षों के लगाने से मनुष्य प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ बावड़ी, कुआ, तालाब, और देवताओं के मन्दिर, इन में जो २ टूटे फूटे पुराने हो गये हों, उन की जो ठीक २ मरम्मत करै, वह भी पूर्त कर्मों के फल को भोगता है ॥ ४ ॥ अग्निहोत्र, तप, सत्य, वेदों की रक्षा, अभ्यागत का सत्कार और वैश्वदेव, इन सब को इष्ट कहते हैं ॥ ५ ॥ द्विजातियों के इष्ट और पूर्त ( वापी कूप तालाब देव मन्दिरादि का बनवाना ) साधारण धर्म

२ लिखितस्मृतिः ॥

अधिकारोभवेच्छूद्रः पूर्त्तेधर्मेनवैदिके ॥ ६ ॥ यावदस्थिमनुष्यस्य गंगातोयेषुतिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोकेमहीयते ॥ ७ ॥ देवतानांपितॄणांच जलेद्याज्जलाञ्जलिम् । असंस्कृतमृतानांच स्थलेद्याज्जलाञ्जलिम् ॥ ८ ॥ एकादशाहेप्रेतस्य यस्यचोत्सृजतेवृषः । मुच्यतेप्रेतलोकात्तु पितृलोकंसगच्छति ॥ ९ ॥ एष्टव्याबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांव्रजेत् । यजेतवाश्वमेधेन नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ १० ॥ वाराणस्यांप्रविष्टस्तु कदाचिन्निनिक्रमेद्यदि । हसन्तिस्तस्यभूतानि अन्योन्यंकरताडनैः ॥ ११ ॥ गयाशिरेतुयत्किंचिन्नाम्नापिण्डन्तुनिर्वपेत् । नरकस्थोदिवंयाति स्वर्गस्थोमोक्षमाप्नुयात् ॥ १२ ॥ आत्मनोवापरस्यापि गयाक्षेत्रेयतस्ततः ।


कहे हैं । शूद्र मनुष्य पूर्त धर्म का अधिकारी है वेदोक्त इष्ट धर्म का नहीं ॥६॥
मनुष्य की हड्डी जब तक गंगा जल में पड़ी रहती है उतने ही हजार वर्ष तक
वह स्वर्ग लोक में पूजता है ॥ ७ ॥ देवता और पितरों को जलाशय में, और
संस्कार से पहिले जो मरे हों, उन को स्थल में तर्पण के समय जल की अंजली
देवे ॥ ८ ॥ जिस मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग होता है वह प्रेत
योनि से छूट कर पितृलोक में जाता है ॥९॥ बहुत से पुत्रों की इच्छा करनी
चाहिये, यदि उन में से एक भी गया को जाय, वा अश्वमेध यज्ञ करे, अथवा
नील बैल का उत्सर्ग करे, वही पुत्र पिता को तारने वाला होता है ॥ १० ॥
कोई मनुष्य काशी में जाकर यदि कदाचित् वहां से निकल आता है तो
उस को सब भूत आपस में ताली देकर हंसते हैं ॥ ११ ॥ गया में जाकर जिस
किसी के नाम से पिण्ड दान करै, यदि वह नरक में हो तो स्वर्ग में जाता
और स्वर्ग में हो तो मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥ अपने कुल के वा अन्य इष्ट
मित्र सम्बन्धी आदि जिस किसी के नाम से गया में पिण्ड देवे, वह पिण्डदान

भाषार्थसहिता ॥ ३

यन्नाम्नापातयेत्पिण्डं तंनयेद्ब्रह्मशाश्वतम् ॥ १३ ॥
लोहितोयस्तुवर्णेन शंखवर्णखुरस्तथा ।
लाङ्गूलशिरसोश्चैव संवनीलवृषःस्मृतः ॥ १४ ॥
नवश्राद्धंन्त्रिपक्षेच द्वादशस्वेवमासिकम् ।
षण्मासेचाब्दिकंचैव श्राद्धान्येतानिषोडश ॥ १५ ॥
यस्यैतानिनकुर्वीत एकोद्दिष्टानिषोडश ।
पिशाचत्वंस्थिरन्तस्य दत्तैःश्राद्धशतैरपि ॥ १६ ॥
सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रतिसंवत्सरंद्विजः ।
मातापित्रोःपृथक्कूर्यादेकोद्दिष्टंमृतेऽहनि ॥ १७ ॥
वर्षेवर्षेतुकर्तव्यं मातापित्रोस्तुसन्ततम् ।
अदैवंभाजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकन्तुनिर्वपेत् ॥ १८ ॥
संक्रान्तावुपरागेच पर्वण्यपिमहालये ।
निर्व्वाप्यास्तुत्रयःपिण्डा एकत्रस्तुक्षयेऽहनि ॥ १९ ॥
एकोद्दिष्टंपरित्यज्य पार्व्वणंकुरुतेद्विजः ।
अकृतन्तद्विजानीयात् समातापितृघातकः ॥ २० ॥
अमावास्याक्षयोयस्य प्रेतपक्षेऽथवायदि ।

उस को सनातन ब्रह्म को पहुंचाता है ॥ १३ ॥ जिस का रंग लाल हो खुर पूंछ, शिर ये सफेद हों, उसे नील बैल कहते हैं ॥ १४॥ एक ग्यारहवें दिन का नवक श्राद्ध,–द्वितीय १॥ महीने में, बारह महीनों के बारह, छठे महिने की पूर्त्ति के दिन १ और एक वर्षी ये सोलह एकोद्दिष्ट श्राद्ध हैं ॥ १५ ॥ जिस के ये सोलह एकोद्दिष्ट नहीं किये गये हों, उस को सैकड़ो श्राद्ध देने पर भी प्रेत योनि नहीं छूटती है ॥ १६ ॥ सपिण्डी श्राद्ध किये पीछे प्रति वर्ष माता पिता के मरने के दिन में पृथक् २ एकोद्दिष्ट श्राद्ध किया करे ॥ १७ ॥ माता पिता का श्राद्ध वर्ष २ में निरन्तर करे और विश्वेदेवा को छोड़ के श्राद्ध में ब्राह्मण जिमावे और एक पिण्ड देवे ॥ १८ ॥ संक्रान्ति, ग्रहण, पर्व्वदिन (अमावास्या) महालय (कनागत) इन में पितृपक्ष में तीन पिण्ड और मातृ पक्ष में तीन पिण्ड देवे और पिता माता के मरने के दिन ॥ १९ ॥ एकाद्दिष्ट को छोड़ कर पार्व्वण श्राद्ध करता है, उस श्राद्ध को नहीं किया जानो क्योंकि वह पुत्र माता पिता का मारने वाला है ॥ २० ॥ जो अमावास्या को