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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

कूटस्थनित्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४१


यारहितं, नित्यतृप्तं, निरवयवं, स्वयंज्योतिःस्वभावम्। यत्र धर्माधर्मौ सह कार्येण कालत्रयं च नोपावर्तेते। तदेतदशरीरत्वं मोक्षाख्यम्। 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च' कठ० २।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः। अतस्तद् ब्रह्म यस्येयं जिज्ञासा प्रस्तुता, तद्यदि कर्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात्। तत्रैवं सति यथोक्तकर्मफलेष्वेव तारतम्यावस्थितेष्वनित्येषु कश्चिदतिशयो मोक्ष इति प्रसज्येत। नित्यश्च मोक्षः सर्वैर्मोक्षवादिभिरभ्युपगम्यते, अतो न कर्तव्यशेषत्वेन ब्रह्मोपदेशो युक्तः। अपि च 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' (मुण्ड० ३।२।९) 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे' (मुण्ड० २।२।८)। 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तैत्ति० २।९)। 'अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि' (बृह० ४।२।४)। 'तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति तस्मात्तत्सर्वमभवत्' (वाजसनेयिब्राह्मणोप० १।४।१०)। 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' (ईशा० ७) इत्येवमाद्याः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं मोक्षं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति। तथा 'तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्च' (बृह० १।४।१०) इति ब्रह्मदर्शनसर्वात्मभावयोर्मध्ये कर्तव्यान्तरवारणायोदाहार्यम्। यथा तिष्ठन्गायतीति तिष्ठतिगायतयोर्मध्ये तत्कर्तृकं कार्यान्तरं नास्तीति


भामती

कर्मताम् ॐ सर्वविक्रियारहितम् ॐ । इति विकार्यकर्मताम्, ॐ निरवयवम् ॐ । इति संस्कार्यकर्मताम् । व्रीहीणां खलु प्रोक्षणेन संस्काराख्योऽतिशयो यथा जन्यते, नैवं ब्रह्मणि कश्चिदंशः क्रियाध्येयोऽस्त्यनवयवत्वात् । अनंशत्वादित्यर्थः । पुरुषार्थतामाह ॐ नित्यतृप्तम् इति ॐ । तृप्त्या दुःखरहितं सुखमुपलक्षयति । क्षुद्दुःख-निवृत्तिसहितं हि सुखं तृप्तिः । सुखं चाप्रतीयमानं न पुरुषार्थ इत्यत आह ॐ स्वयंज्योतिः इति ॐ । तदेवं स्वमतेन मोक्षाख्यं फलं नित्यं श्रुत्यादिभिरुपपाद्य क्रियानिष्पाद्यस्य तु मोक्षस्यानित्यत्वं प्रसञ्जयति ॐ तद्यदि इति ॐ । न चागमबाधः, आगमस्योक्तेन प्रकारेणोपपत्तेः । अपि च ज्ञानजन्यापूर्वजनितो मोक्षो नैयोगिक इत्यस्यार्थस्य सन्ति भूयस्यः श्रुतयो निवारिका इत्याह ॐ अपि च ब्रह्म वेद इति ॐ । अविद्या-


भामती-व्याख्या

की गई है, क्योंकि जैसे "व्रीहीन् प्रोक्षति"—इस श्रुति से विहित व्रीहि में प्रोक्षणरूप संस्कार के द्वारा अदृष्ट उत्पन्न होता है, वैसा ब्रह्म में कोई अंश उत्पन्न नहीं होता, ब्रह्म सर्वथा निरवयव और निरंश होता है। ब्रह्मभाव में पुरुषार्थता (पुरुषाभिलाषा) प्रकट करने के लिए 'नित्यतृप्तम्'—ऐसा कहा गया है। यहाँ 'तृप्ति' पद की दुःखाभावरूप सुख में लक्षणा विवक्षित है, क्योंकि क्षुधारूप दुःख की निवृत्ति का ही नाम तृप्ति है। अप्रतीयमान सुख पुरुषाभिलषित नहीं होता, अतः सदा प्रतीयमानता प्रकट करने के लिए कहा है—"स्वयंज्योतिः"। इस प्रकार अपने अद्वैत वेदान्त के अनुसार श्रुत्यादि के द्वारा मोक्षरूप फल की नित्यता का उपपादन करके पराभिमत कर्मजन्य मोक्ष में अनित्यता का प्रसञ्जन करते हैं—"तद् यदि कर्त्तव्यशेषत्वेनोपदिश्येत, तेन च कर्त्तव्येन साध्यश्चेन्मोक्षोऽभ्युपगम्येत, अनित्य एव स्यात्"। क्रिया-साध्य या अनित्य मोक्षवाद में मोक्षगत नित्यता के प्रतिपादक आगम वाक्यों का विरोध इसलिए प्रसक्त नहीं होता कि मोक्षगत नित्यता के प्रतिपादक आगम वाक्यों का उस (क्रिया-साध्य) मोक्ष में तात्पर्य न होकर नित्यमोक्ष में ही होता है। केवल इतना ही नहीं, ज्ञानजन्य अपूर्व या नियोग के द्वारा साध्य होने के कारण मोक्ष के नैयोगिकत्व-मत की निषेधिका बहुत सी श्रुतियाँ हैं, यह दिखाने के लिए कहा जाता है—"अपि च ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' इत्येवमादयः श्रुतयो ब्रह्मविद्यानन्तरं दर्शयन्त्यो मध्ये कार्यान्तरं वारयन्ति"। कथित द्विविध

१४२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

गम्यते । ‘त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसि’ ( प्रश्न० ६।८ ) ‘श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तं मां भगवान्छोकस्य पारं तारयतु’ ( छान्दो० ७।१।३ ) ‘तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति भगवान्सनत्कुमारः’ ( छान्दो० ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति । तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ (न्या०

भामती

द्वयप्रतिबन्धापनयमात्रेण च विद्याया मोक्षसाधनत्वे न स्वतःपूर्वोत्पादेन चेत्यत्रापि श्रुतिमुदाहरति ॐ त्वं हि नः पिता इति ॐ । न केवलमस्मिन्नर्थे श्रुत्यादयोऽपि त्वक्षपादाचार्यसूत्रमपि न्यायमूलमस्तीत्याह ॐ तथा चाचार्यप्रणीत० इति ॐ । आचार्यश्लोकलक्षणः पुराणे ।

‘आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि ।
स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन सोच्यते ॥ इति ।

तेन हि प्रणीतं सूत्रं "दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्ग इति" । पाठापेक्षया कारणमुत्तरं, कार्यं च पूर्वं, कारणापाये कार्यापायः, कफापाय इव कफोद्भवस्य ज्वरस्यापायः । जन्मापाये दुःखापायः प्रवृत्त्यपाये जन्मापायः, दोषापाये प्रवृत्त्यपायः, मिथ्याज्ञानापाये

भामती-व्याख्या

अविद्यारूप प्रतिबन्ध की निवर्तिका होने मात्र से विद्या ( ब्रह्म-वेदन ) को मोक्ष का साधन माना जाता है, वस्तुतः विद्या न तो स्वतः और न अपूर्वोत्पत्ति के द्वारा मोक्ष की जनिका मानी जाती है — इस रहस्य में प्रमाणभूत श्रुतियों का उदाहरण दिया जाता है—"त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं दर्शयति भगवान् सनत्कुमारः" ( छान्दो. ७।२६।२ ) इति चैवमाद्याः श्रुतयो मोक्षप्रतिबन्धनिवृत्तिमात्रमेवात्मज्ञानस्य फलं दर्शयन्ति ।" केवल श्रुतियाँ ही उक्त अर्थ में प्रमाण नहीं, अपि तु महर्षि अक्षपाद के द्वारा प्रणीत सूत्र भी प्रमाण है— "तथा चाचार्यप्रणीतं न्यायोपबृंहितं सूत्रम्—"दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः' ( न्या. सू. १।१।२ ) इति" । शिक्षा-दीक्षा के क्षेत्र में आचार्य का नितान्त उन्नत स्थान है, आचार्य की शरण लिए बिना विद्या फलवती ही नहीं होती— "आचार्याद्धि विद्या विहिता साधिष्ठं प्रापयति" ( छां. ४।९।३ ) । द्विजाति को उपनीत, संस्कृत एवं दीक्षित करने का दायित्व आचार्य पर ही है ( मनु. २।१४० ) निरुक्त (१।४), आपस्तम्ब धर्मसूत्र (१।१।१।४) एवं पुराणों में आचार्य का गौरव वर्णित है । कारण की निवृत्ति से कार्य की निवृत्ति, कारण पूर्ववृत्ति और कार्य उत्तर वृत्ति होना स्वाभाविक है, अतः पूर्वं-पूर्वं की निवृत्ति से उत्तरोत्तर की निवृत्ति का कथन न्याय-संगत है, किन्तु यहाँ सूत्रकार जो उत्तरोत्तर की निवृत्ति से पूर्व-पूर्वं की निवृत्ति का अभिधान करता है, वह अपने सूत्र में पठित पद-क्रम को ध्यान में रख कर कहा है । दुख, जन्म, प्रवृत्ति ( धर्माधर्म ), दोष ( राग-द्वेष ) और मिथ्याज्ञान में पूर्व-पूर्वं कार्य और उत्तरोत्तर कारण का निर्देश किया गया है, अतः 'उत्तरोत्तरापाये' का अर्थ 'कारणानामभावे सति'—ऐसा ही है । 'तत्पूर्वापायः' का अर्थ है—'कार्याणामभावः' । कारण का अभाव होने से वैसे ही कार्य का अभाव होता है, जैसे कफ दोष का अभाव हो जाने से कफज ज्वर का अभाव हो जाता है । अर्थात् जन्म का अभाव होने से दुःख का धर्माधर्मरूप प्रवृत्ति का अभाव होने से जन्म का, दोष ( राग द्वेष ) का अभाव होने से प्रवृत्ति का एवं मिथ्याज्ञान का अभाव हो जाने से दोष का अभाव हो जाता

सम्प्रद्रूपज्ञानविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४३

स० १।१।२ ) इति । मिथ्याज्ञानापायश्च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानाद्भवति । न चेदं ब्रह्मात्मैक- त्वविज्ञानं संपद्रूपम्, यथा 'अनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति' (बृह० ३।१।९) इति । न चाध्यासरूपम्, यथा 'मनो ब्रह्मेत्युपासीत' (छान्दो०

भामती

दोषापायः । मिथ्याज्ञानं चाविद्या, रागाद्युपजनितक्रमेण दृष्टेनैव संसारस्य परमं निदानम् । सा च तत्त्वज्ञानेन ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेनावगतिपर्यन्तेन विरोधिना निवर्त्यते । ततोऽविद्यानिवृत्त्या ब्रह्मरूपावि- र्भावो मोक्षः । न तु विद्याकार्यस्तज्जनितापूर्वकार्यो वेति सूत्रार्थः । तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञानापाय इत्येता- वन्मात्रेण सूत्रोपन्यासः, न त्वक्षपादसम्मतं तत्त्वज्ञानमिह सम्मतम् । तदनेनाचार्यान्तरसंवादेनायमर्थो दृढ़ीकृतः ।

स्यादेतत्—नैकत्वविज्ञानं स्थितवस्तुविषयं, येन मिथ्याज्ञानं भेदावभासं निवर्त्तयन्न विधि- विषयो भवेत् । अपि तु सम्पदादिरूपम् । तथा च विधेः प्रागप्राप्तं पुरुषेच्छया कर्त्तव्यं सद्‌विधिविगोचरो भविष्यति । यथा वृत्त्यनन्तत्वेन मनसो विश्वदेवसाम्याद् विश्वान् देवान् मनसि सम्पाद्य मन आल- म्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन सम्पाद्यानां विश्वेषामेव देवानामन्डुचिन्तनं तेन चानन्तलोकप्राप्तिः । एवं चिद्रूपसाम्याज्जीवस्य ब्रह्मरूपतां सम्पाद्य जीवमालम्बनमविद्यमानसभं कृत्वा प्राधान्येन ब्रह्मानुचिन्तनं तेन चामृतत्वफलप्राप्तिः । अध्यासे त्वालम्बनस्यैव प्राधान्येनाारोपिततद्भावस्यानुचिन्तनं, यथा मनो ब्रह्मेत्यु-

भामती-व्याख्या

है । मिथ्या ज्ञान का नाम ही अविद्या है, वह ( अविद्या ) जीव में राग-द्वेषरूप दोष को, दोष प्रवृत्ति को प्रवृत्ति जन्म को और जन्म विविध दुःखों को उत्पन्न करता है । उक्त अविद्या जीवब्रह्माभेद-साक्षात्काररूप तत्त्वज्ञान के द्वारा निवृत्त ( नष्ट ) की जाती है, क्योंकि विद्या अविद्या की सर्वथा विरोधिनी है । अविद्या की निवृत्ति से ब्रह्मभावरूप मोक्ष का आविर्भाव हो जाता है । मोक्ष न तो विद्या का कार्य होता है और न अविद्या-जनित अपूर्व या नियोग का फल । तत्त्व-ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का नाश होता है— इतना ही दिखाने के लिए भाष्यकार ने यहाँ न्याय-सूत्र उद्धृत किया है, न कि अक्षपाद-सम्मत तत्त्व-ज्ञान और मोक्ष से सम्मति प्रकट करने के लिए, क्योंकि आगे चल कर तर्कपाद में न्याय-मत का भी पूर्णतया निराकरण किया गया है । यहाँ अन्यमतावलम्बी आचार्य का संवाद दिखा कर अपने सिद्धान्त का दृढीकरणमात्र विवक्षित है ।

शङ्का—यह जो कहा गया कि यहाँ 'तत्त्वज्ञान' पद से जीव और ब्रह्म की एकता का ज्ञान विवक्षित है, वह संगत नहीं, क्योंकि वह एकत्व-विज्ञान केवल यथावस्थितवस्तुविषयक नहीं कि वह मिथ्या का निवर्तक होकर विधि का विषय न होता । वस्तु-स्थिति यह है कि यहाँ एकत्व-ज्ञान सम्पदादिरूप है । अन्य वस्तु में अन्यरूपता-का सम्पादन पुरुष की इच्छा पर निर्भर है, अतः विधि के पूर्व कर्त्तव्यत्वेन अप्राप्त होकर सम्परूप ज्ञान विधेय हो जाता है, जैसे कि मन की वृत्तियाँ अनन्त हैं और विश्वदेव भी अनन्त हैं, अतः अनन्तत्व की समानता को लेकर मन में विश्वदेवरूपता का सम्पादन किया जाता है । सम्पादन का अर्थ है—आलम्बनीभूत मन को अविद्यमान-जैसा करके प्रधानतः आरोप्यमान विश्वदेव का अनुचिन्तन । उससे अनन्त- लोक की प्राप्ति होती है । उसी प्रकार जीव और ब्रह्म के चिद्रूपत्वात्मक साम्य को लेकर जीव में ब्रह्मरूपता का सम्पादन अर्थात् आलम्बनीभूत जीव की उपेक्षा कर प्रधानतः ब्रह्मरूपता का अनुचिन्तन किया जाता है, उस अनुचिन्तन से अमृतत्व की प्राप्ति होती है। यद्यपि 'सम्पद्' और 'अध्यास'—दोनों ही आरोप-ज्ञान हैं, तथापि सम्पद में आरोप्य एवं अध्यास में अधिष्ठान वस्तु क? प्राधान्य विवक्षित होता है, जैसे "मनो ब्रह्मेत्युपा?

१४४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

३।१८।१) 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छान्दो० ३।१९।१) इति च मनआदित्यादिषु ब्रह्मदृष्टयध्यासः। नापि विशिष्टक्रियायोगनिमित्तं 'वायुर्वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।१) 'प्राणो वाव संवर्गः' (छान्दो० ४।३।३) इतिवत्। नाप्याज्यवेक्षणादिकर्मवत्कर्माङ्ग-संस्काररूपम्। संपदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८।७) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृह० १।४।१०) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्येवमादीनां वाक्यानां ब्रह्मात्मैकत्ववस्तुप्रतिपादनपरः पदसमन्वयः पीड्येत। 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः' (मुण्ड० २।२।८) इति चैवमादीन्यविद्या-

भामती

पासीतादित्यो ब्रह्मेत्यादेश एवं जीवमब्रह्म ब्रह्मेत्युपासीतेति। क्रियाविशेषयोगाद्वा, यथा वायुर्वाव संवर्गः प्राणो वाव संवर्गः। बाह्या खलु वायुदेवता वह्न्यादीन् संवृङ्क्ते। महाप्रलयसमये हि वायुर्वह्नयादीन् संवृज्य संहृत्यात्मनि स्थापयति। यथाह द्रविडाचार्यः—'संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद्वायुः संवर्गः' इति। अध्यात्मं च प्राणः संवर्ग इति। स हि सर्वाणि वागादीनि संवृङ्क्ते, प्रयाणकाले हि स एव सर्वाणी-न्द्रियाणि संगृह्योत्क्रामतीति। सेयं संवर्गदृष्टिर्वायौ प्राणे च दशाशागतं जगद्दर्शयति यथा, एवं जीवात्मनि बृंहणक्रियया ब्रह्मदृष्टिरमृतत्वाय फलाय कल्पत इति। तदेतेषु त्रिष्वपि पक्षेष्वात्मदर्शनोपासनादयः प्रधान-कर्मण्यपूर्वविषयत्वात् स्तुतशस्त्रवत्।

भामती-व्याख्या

(छां. ३।१८।१) यहाँ पर ब्रह्मरूपता का जिसमें आरोप किया है, ऐसे मन का अनुचिन्तन जब किया जाता है—'यह जो हमारा मन है, वही ब्रह्म है'। तब इसे अध्यासानुचिन्तन कहते हैं और जब मन की उपेक्षा कर ब्रह्म का अनुचिन्तन किया जाता है—यह हमारा मन नहीं अपितु ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्मप्रधानक अनुचिन्तन को सम्पत् कहा जाता है, जैसे अब्रह्मभूत जीव के लिए कहा गया है—"ब्रह्मेत्युपासीत"।

अथवा क्रिया-विशेष के सम्बन्ध से ब्रह्म-ज्ञान में विधेयता का निर्वाह हो सकता है, जैसे “वायववि संवर्गः, प्राणो वाय संवर्गः” (छां. ४।३।१-३)। अर्थात् बाह्य (अन्तरिक्षस्थ) वायु देवता प्रलय के समय अग्न्यादि पदार्थों को अपने में संवर्जित या उपसंहृत कर लेता है, जैसा द्रविडाचार्य ने कहा है—"संहरणाद्वा संवरणाद्वा सात्मीभावाद् वायुः संवर्गः"। बाह्य वायु के समान ही शरीर के अन्दर की प्राणसंज्ञक वायु भी संवर्ग है, क्योंकि वह वागादि सभी इन्द्रियों का संवर्जन करती है। अर्थात् प्राण मृत्यु के समय सभी इन्द्रियों को अपने में समेट कर शरीर से उत्क्रमण करता है। बाह्य वायु और प्राण में यह संवर्ग दृष्टि दसों दिशाओं में व्याप्त अन्नादत्व का दर्शन प्रस्तुत करती है।

उसी प्रकार जीवात्मा में बृंहण (शरीर को संवर्धित करना) क्रिया को देख कर जीव में ब्रह्म-दृष्टि अमृतत्वरूप फल प्रदान करती है। सम्पद्, अध्यास और क्रिया-विशेष के द्वारा जीव में ब्रह्म-दृष्टि'--ये तीनों उपासनाएँ अपूर्वविषयक होने के कारण वैसे ही प्रधान कर्म मानी जाती हैं, जैसे स्तुत और शस्त्र [मीमांसा-दर्शन के द्वितीय अध्याय में कहा गया है—"स्तुतशस्त्रयोस्तु संस्कारो याज्यावद् देवताभिधानत्वात्" (जै. सू. २।१।१३)। “आज्यैः स्तुवते”, “प्रउगं शंसति”—इत्यादि विधि वाक्यों के द्वारा 'स्तुत' और शास्त्र का विधान किया गया है। साम-गान-युक्त मन्त्रों के द्वारा देवता के गुण-गान को स्तोत्र और अप्रगीत मंत्रों के द्वारा देवता के गुणों का अभिधान शस्त्र कहलाता है। उसके विषय में पूर्व पक्षी ने कहा है कि वे दोनों प्रधान कर्म नहीं, अपितु गुणकर्म हैं, क्योंकि देवताभिधान के द्वारा वैसे हो

प्रधानगुणकर्मविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४५

निवृत्तिफलश्रवणान्यनुपरुध्येरन् । 'ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति' ( मुण्ड० ३।२।९ ) इति चैव- मादीनि तद्भावापत्तिवचनानि संपदादिपक्षे न सामञ्जस्येनोपपद्येरन् । तस्मान्न संपदा- दिरूपं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् । अतो न पुरुषव्यापारतन्त्रा ब्रह्मविद्या । किं तर्हि ? प्रत्यक्षादिप्रमाणविषयवस्तुज्ञानवद्वस्तुतन्त्रा । एवंभूतस्य ब्रह्मणस्तज्ज्ञानस्य च न

भामती

आत्मा तु द्रव्यं कर्मणि गुण इति संस्कारो वाऽऽत्मनो दर्शनं विधीयते । यथा दर्शपूर्ण- मासप्रकरणे पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवतीति समाम्नातं प्रकरणिना च गृहीतमुपांशुयागाङ्गभूताज्यद्रव्य- संस्कारतयाऽवेक्षणं गुणकर्म विधीयते, एवं कर्तृत्वेन क्रत्वङ्गभूते आत्मन्यात्मा वा अरे द्रष्टव्य इति दर्शनं गुणकर्म विधीयते । 'यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत' इति न्यायात्, अत आह ❀ न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानम् इति ❀ । कुतः, ❀ सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञाने इति ❀ । दर्शपूर्णमासप्रकरणे हि समाम्नातमाज्यावेक्षणं तदङ्गभूताज्यसंस्कार इति युज्यते । न चात्मा वा अरे द्रष्टव्य इत्यादि कस्यचित् प्रकरणे समाम्नातम् । न चानारभ्याधीतमपि यस्य पर्णमयी जुहूर्भवतीत्यूव्यभि-

भामती-व्याख्या

देवता में संस्कार उत्पन्न करते हैं, जैसे 'याज्या' मन्त्र, अत एव याज्या मन्त्र (ऋग्विशेष) का उच्चारण गुणकर्म माना गया है। भाष्यकार कहते हैं—"याज्या देवतोपलक्षणार्था" (जै. सू. २।३।१५)। इस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए सिद्धान्त स्थापित किया गया है- "अपि वा श्रुतिसंयोगात् प्रकरणे स्तौतिशंसती क्रियोत्पत्तिं विदध्यातां" (जै. सू. २।१।२२)। यहाँ 'श्रुति' पद शक्ति वृत्ति का बोधक है, अतः 'स्तौति' और 'शंसति'—इन दोनों धातुओं की शक्ति स्तुतिरूप अर्थ (देवतागत गुणों के प्रकाशन) में है। गुण-प्रकाशन का कोई दृष्ट फल नहीं, अतः क्रियोत्पत्ति (अपूर्व का उत्पादन) ही मुख्य फल है। अपूर्वार्थक कर्म प्रधान कर्म होता है]।

अथवा आत्म-दर्शन को गुण कर्म कहा जा सकता है, क्योंकि दर्शनरूप कर्म (क्रिया) का विषयीभूत आत्मा कर्मों का अङ्ग है, उसी का दर्शनरूप संस्कार 'द्रष्टव्यः' पद के द्वारा विहित है। जैसे दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित "पत्न्यवेक्षितमाज्यं भवति"—इस वाक्य के द्वारा जिस आज्य (घृत) द्रव्य का दर्शनरूप संस्कार विहित है, वह आज्य दर्शपूर्णमास- घटक उपांशुयाज नाम के कर्म की हवि है—"सर्वस्मै वा एतद्यज्ञाय गृह्यते यद् ध्रुवाया- माज्यम्" (तै. ब्रा. ३।३।५।५)। 'ध्रुवा' नाम के पात्र में रखा हुआ घृत साधारण द्रव्य होने के कारण उपांशुयाज का द्रव्य माना गया है। यजमान की पत्नी के द्वारा उसका निरीक्षण उस आज्य का संस्कार गुणकर्म है। वैसे ही सभी कर्मों में अपेक्षित कर्त्ता आत्मा द्रव्य है, उसी का "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" (बृह० २।४।५) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा दर्शनरूप संस्कार कर्म विहित है, ऐसे संस्कार कर्मों को गुण कर्म कहा गया है— "यैस्तु द्रव्यं चिकीर्ष्यते गुणस्तत्र प्रतीयेत" (जै. सू. २।१।८)। अर्थात् जिन संस्कार कर्मों के द्वारा कोई द्रव्य संस्कार्यत्वेन आकांक्षित होता है, उन कर्मों को गुण कर्म कहते हैं।

समाधान—इस प्रकार आशङ्कित आत्मदर्शन की सम्पदादिरूपता का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न चेदं ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं सम्पद्रूपम्"। जीव-ब्रह्म का एकत्व-दर्शन सम्पदादिरूप नहीं माना जा सकता क्योंकि "सम्पदादिरूपे हि ब्रह्मात्मैकत्व- विज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने 'तत्त्वमसि' (छां. ६।८।७) इत्यादि पदसन्दर्भः पीड्येत"। आशय यह है कि दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित आज्यावेक्षण दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गभूत आज्य का संस्कार कर्म है—यह तो युक्ति-संगत है. किन्तु "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य किसी भी कर्म के प्रकरण में पठित नहीं, अतः कर्माङ्गभूत द्रव्य का संस्कार क्योंकर होगा ?

१९

१४६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

कयाचिद्युक्त्या शक्यः कार्यानुप्रवेशः कल्पयितुम् । न च विदिक्रियाकर्मत्वेन कार्यानुप्रवेशो ब्रह्मणः, 'अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि' ( केन० १।३ ) इति विदिक्रिया-

भामती चरितक्रतुसम्बन्धजुहूद्वारेण जुहूत्वं क्रतुं स्मारयद्वाक्येन यथा पर्णतायाः क्रतुशेषभावमापादयति, एवमात्मा-व्यभिचरितक्रतुसम्बन्धो येन तद्दर्शनं क्रत्वङ्गं सदात्मानं क्रत्वर्थं संस्कुर्यात् । तेन यद्ययं विधिस्तथापि सुवर्णं भार्यमितिवद् विनियोगभङ्गेन प्रधानकर्मैवापूर्वविषयत्वाच्च गुणकर्मेति स्थवीयस्तयैतद्दूषणमनभिधाय सर्वपक्षसाधारणं दूषणमुक्तम्, तदतिरोहितार्थतया न व्याख्यातम् । किञ्च ज्ञानक्रियाविषयत्वविधानमस्य बहुश्रुतिविरुद्धमित्याह ॐ न च विदिक्रिया इति ।

भामती-व्याख्या यद्यपि कर्म के प्रकरण में अपठित ( अनारभ्याधीत ) वाक्य के द्वारा विहित पदार्थ भी कर्म का अङ्ग हो सकता है, जैसे "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" ( तै. सं. ३।५।७।२ ) इस वाक्य के द्वारा जिस 'जुहू' पात्र के उद्देश्य से पर्णता [ "पलाशे किंशुकः पर्णो वातपोथः"—इस अमरकोष के अनुसार यहाँ पलाश वृक्ष का नाम पर्ण है, अतः जुहू बनाने के लिए पलाश की लकड़ी ] का विधान किया गया है । जुहू के बिना कोई याग सम्पन्न नहीं हो सकता, अतः जुहू का याग से अव्यभिचरित सम्बन्ध होने के कारण जुहू के प्रकृतिभूत पर्ण ( पलाश वृक्ष के काष्ठ ) में यागाङ्गत्व पर्यवसित हो जाता है । तथापि आत्मा का याग के साथ वैसा अव्यभिचरित सम्बन्ध न होने के कारण आत्मदर्शन में यागाङ्गत्व प्राप्त नहीं होता । अतः "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—यह वाक्य यदि विधि-वाक्य है, तब इसके द्वारा विहित दर्शन को वैसे ही गुणकर्म न मानकर प्रधान कर्म माना जायगा, जैसे—सुवर्ण-धारण । ["तस्मात् सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्, सुवर्ण एव भवति, दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" ( तै. ब्रा. २।२।४।५ ) इस अनारभ्याधीत वाक्य के द्वारा विहित शोभन वर्णवाले सुवर्ण का धारण ( कड़ा, मुन्द्रादि का हाथ और कान आदि में पहनना ) गुण कर्म है ? अथवा प्रधान कर्म ? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षी ने कहा है—"अद्रव्यत्वात्तु शेषः स्यात्" ( जै. सू. ३।४।२५ ) । अर्थात् इस कर्म का कोई विशेष द्रव्य ( हवि ) और देवता निर्दिष्ट नहीं, अतः प्रधान कर्म न होकर सुवर्ण-धारण सभी कर्मों का शेष ( अङ्गभूत गुण कर्म ) है । सिद्धान्ती ने उस पूर्व पक्ष का खण्डन करते हुए कहा है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" ( जै. सू. ३।४।२६ ) । अर्थात् सुवर्ण-धारण न तो किसी कर्म के प्रकरण में पठित है और न इसका कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध है, अतः यह गुण कर्म न होकर पुरुष का धर्मभूत प्रधान कर्म है ।] किसी कर्म के साथ सुवर्ण-धारण का विनियोग न होकर पुरुष के साथ विनियोग ( अङ्गाङ्गीभाव ) होता है । उसका फल परमापूर्व के द्वारा भ्रातृव्य ( शत्रु ) की दुर्वर्णता होती है । इसी प्रकार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः"—इस वाक्य से विहित आत्मदर्शन गुण कर्म न होकर प्रधान कर्म ही होगा—यह दोष अत्यन्त स्थूल और प्रसिद्ध होने के कारण भाष्यकार के द्वारा उद्भावित न होकर "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों का जो विरोथोद्भावन हुआ है, वह नितान्त स्पष्ट है कि उपासनादि में उपास्य, उपासक और उपासना का भेद अनिवार्य है, किन्तु "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्य सर्वथा भेद का संहार कर रहे हैं, अतः एकत्व-ज्ञान को सम्पदादिरूप न मानकर तत्त्व-साक्षात्कारात्मक ही मानना आवश्यक है ।

'ब्रह्म वेद'—इत्यादि वाक्यों के द्वारा विदि ( वेदन ) क्रिया की कर्मता ब्रह्म में प्रतिपादित है । क्रिया का विधान होता है, ज्ञान का नहीं, अतः विदि क्रिया की विधि के द्वारा ब्रह्म का कार्यानुप्रवेश हो जायगा'—ऐसी शङ्का नहीं की जा सकती, क्योंकि ब्रह्म को

अविषये शास्त्रयोनित्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४७

कर्मत्वप्रतिषेधाद्, ‘येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्’ (बृह० २।४।१३) इति च। तथोपास्तिक्रियाकर्मत्वप्रतिषेधोऽपि भवति – ‘यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते’ इत्यविषयत्वं ब्रह्मण उपन्यस्य, ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते’ (केन० १।४) इति। अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिरिति चेत्, – न; अविद्याकल्पितभेद-निवृत्तिपरत्वाच्छास्त्रस्य। न हि शास्त्रमिदंतया विषयभूतं ब्रह्म प्रतिपिपादयिषति। किं तर्हि? प्रत्यगात्मत्वेनाविषयतया प्रतिपादयदविद्याकल्पितं वेद्यवेदितृवेदनादिभेद-मपनयति। तथा च शास्त्रम् – ‘यस्याऽमतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं


भामती

शङ्कते ॐ अविषयत्वे इति ॐ। ततश्च शान्तिकर्मणि वेतालोदय इति भावः। निराकरोति ॐ न ॐ। कुतः? ॐ अविद्याकल्पितभेदन्निवृत्तिविषयत्वाद् इति ॐ। सर्वमेव हि वाक्यं नेदन्तया वस्तुभेदं बोधयितुमर्हति, न हीक्षुक्षीरगुडादीनां मधुररसभेदः शक्य आख्यातुम्, एवमन्यत्रापि सर्वत्र द्रष्टव्यम्। तेन प्रमाणान्तरसिद्धे लौकिक एवार्थे यदा गतिरीदृशी शब्दस्य, तदा केव कथा प्रत्यगात्मन्यलौकिके? अदूरविप्रकर्षेण तु कथञ्चित् प्रतिपादनमिहापि समानम्। त्वम्पदार्थो हि प्रमाता प्रमाणाधीनया प्रमित्या प्रमेयं घटादि व्याप्नोतीत्यविद्याविलसितम्। तदस्याविषयीभूतोदासीनतत्पदार्थप्रत्यगात्मसामानाधिकरण्येन प्रमातृत्वाभावाद् तन्निवृत्तौ प्रमाणाद्यस्तिस्रो विधा निवर्त्तन्ते। न हि पक्तुरवस्तुत्वे पाक्यपाकपचनानि वस्तुसन्ति भवितुमर्हन्तीति। तथा हि—

विगलितपराग्वृत्त्यर्थत्वं पदस्य तवस्तदा
त्वमिति हि पदेनैकार्थत्वे त्वमित्यपि यत्पदम्।
तदपि च तदा गत्वैकाग्र्यं विशुद्धचिदात्मतां
त्यजति सकलान् कर्तृत्वादीन् पदार्थमलाश्रयान्॥


भामती-व्याख्या

विदि क्रिया का कर्म मानने पर "अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि" (केन. १।३) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा ब्रह्म में विदि क्रिया की कर्मता का निषेध कर दिया गया है। 'ब्रह्म यदि किसी ज्ञान का विषय नहीं, तब सर्वथा अज्ञेय ब्रह्म में शास्त्रयोनित्व (शास्त्र-प्रतिपादितत्व) क्योंकर सम्भव होगा—यह शङ्का की जा रही है—"अविषयत्वे ब्रह्मणः शास्त्रयोनित्वानुपपत्तिः"। छोटे-से भूत को भगाने के लिए शान्ति कर्म आरम्भ किया था, देखते क्या हैं कि सामने उससे बड़ा खबीस मुँह फाड़े खड़ा है। चिन्ता की बात नहीं, उसे भी भगाने का मन्त्र पढ़ दिया गया है—"न, अविद्याकल्पितभेदनिवृत्तिविषयत्वात्"। जैसे इक्षु (ईख) क्षीर (दूध) और गुड़ादि के माधुर्य का अन्तर किसी भी वाक्य से नहीं कहा जा सकता, वैसे ही लोकोत्तर आनन्द की उत्ताल तरङ्गोंवाले उस महासागर (भूमा तत्त्व) का यथावत् प्रतिपादन किसी भी वाक्य से नहीं किया जा सकता, केवल (अदूरविप्रकर्ष) लक्षणादि के द्वारा ब्रह्म के सूचक शास्त्रों को ब्रह्म में प्रमाण मान कर उसे शास्त्रप्रमाणक कह दिया गया है। यह जो कहा जाता है कि त्वम्पदार्थभूत जीव प्रमाता है, वह प्रमाणाधीन प्रमिति के माध्यम से घटादि प्रमेय वर्ग को व्याप्त करता है। वह कथन पूर्णतया अविद्या-विलसित है, क्योंकि 'अहं घटं जानामि'—यहाँ अस्मत्पदार्थभूत प्रत्यगात्मा और शुद्ध चैतन्य का सामानाधिकरण्य प्रतीत होता है, किन्तु शुद्ध चैतन्य किसी भी प्रमा का विषय नहीं होता, तब उसमें प्रमातृत्व क्योंकर होगा? प्रमाता के बिना प्रमाता, प्रमाण और प्रमा—ये तीनों वैसे ही अनुपपन्न हो जाते हैं, जैसे पक्ता (पाचक पुरुष) के विना पाक्य, पाक और पचन का वास्तविक सद्भाव नहीं रहता। इस तथ्य का प्रकाश इस श्लोक के द्वारा किया जा सकता है—

१४८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

विजानतां विज्ञातमविजानताम्' ( केन० २।३ ) 'न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः', 'न विज्ञातेर्विज्ञा- तारं विजानीयाः' ( बृह० ३।४।२ ) इति चैवमादि । अतोऽविद्याकल्पितसंसारित्वनि- वर्तनेन नित्यमुक्तात्मस्वरूपसमर्पणान्न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः । यस्य तूत्पाद्यो मोक्षस्त- स्य मानसं, वाचिकं कायिकं वा कार्यमपेक्षत इति युक्तम् । तथा विकार्यत्वे च; तयोः पक्षयोर्मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम् । न हि दध्यादि विकार्यं उत्पाद्यं वा घटादि नित्यं दृष्टं

भामती

इत्यान्तरश्लोकः । अत्रैवार्थे श्रुतीरुदाहरति ॐ तथा च शास्त्रं, यस्यामतम् इति ॐ । प्रकृतमुपसंहरति ॐ अतोऽविद्याकल्पित इति ॐ । परपक्षे मोक्षस्यानित्यतामापादयति— ॐ यस्य तु इति ॐ । कार्यमपूर्व यागादिव्यापारजन्यं तमपेक्षते मोक्षः स्वोत्पत्ताविति । ॐ तयोः पक्षयोः इति ॐ निर्वर्त्यविकार्ययोः । क्षणिकं ज्ञानमात्मेति बौद्धाः । तथा च विशुद्धविज्ञानोत्पादो मोक्ष इति निर्वर्त्यो मोक्षः । अन्येषां तु संसाररूपा- वस्थापहाया कैवल्यावस्थावाप्तिरात्मनः स मोक्ष इति विकार्यो मोक्षः, यथा पयसः पूर्वावस्थापहानेनाव- स्थान्तरप्राप्तिर्विकारो दधोति । तदेतयोः पक्षयोरनित्यता मोक्षस्य, कार्यत्वाद् , दधिघटादिवत् । अथ

भामती-व्याख्या

विगलितपराग्वृत्त्यर्थत्वं पदस्य तदस्तदा
त्वमिति हि पदेनैकार्थत्वे त्वमित्यपि यत्पदम् ।
तदपि च तदा गत्वैकार्थ्य विशुद्धचिदात्मतां
त्यजति सकलान् कर्तृत्वादीन् पदार्थमलान् निजाम् ॥

[ 'तत् त्वमसि'—यहाँ पर प्रत्यक्पदार्थ की पराक्त्वेन वृत्तिता ( विद्यमानता ) सम्भव नहीं, तब तत्पद की उसमें वृत्ति ( शक्ति ) नहीं हो सकती, क्योंकि त्वम्पदार्थ तत्पदार्थ से अभिन्न या विशुद्ध होकर रह जाता है । तब आत्मा अपने में आरोपित सकल कर्तृत्वादि ( प्रमातृत्वादि ) धर्मों का परित्याग कर डालता है । इसी अर्थ ( ब्रह्मगत फल-व्याप्यताभाव के प्रदर्शन ) में श्रुति प्रमाण प्रस्तुत करते हैं—"यस्यामतं तस्य मतम्, मतं यस्य न वेद सः" (केनो. २।३) । [ जिस व्यक्ति को 'ब्रह्म अमतम्' ( ज्ञानाविषयः ) ऐसा निश्चय है, उस व्यक्ति को ही मतम् ( सम्यक् निश्चय ) है । उसके विपरीत जिस व्यक्ति को 'ब्रह्म मतम्' ( ज्ञानस्य विषयः ) ऐसा निश्चय होता है, वह ब्रह्म का वस्तुस्वरूप नहीं समझ पाया ] । प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"अतोऽविद्याकल्पितसंसारित्वनिवर्तनेन न मोक्षस्यानित्यत्वदोषः" ।

परकीय पक्ष में मोक्ष की अनित्यतापत्ति का उद्भावन करते हैं—"यस्य तूत्पाद्यो मोक्षः, तस्य कार्यम् अपेक्षते" । यहाँ 'कार्य' पद से यागादि-जन्य अपूर्व विवक्षित है, मोक्ष अपनी उत्पत्ति में उसी अपूर्व को अपेक्षा करता है । 'तयोः पक्षयोः" का अर्थ है—'निर्वर्त्य- विकार्यपक्षयोः । 'मोक्षस्य ध्रुवमनित्यत्वम्, न हि दध्यादि विकार्यमुत्पाद्यं वा घटादि नित्यं दृष्टं लोके" । निर्वर्त्य ( उत्पाद्य ) और विकार्य पक्षों का उदाहरण यह है—( १ ) बौद्धगण क्षणिक विज्ञान को आत्मा मानते हैं, उनके पक्ष में विज्ञान-सन्तति में उत्पद्यमान विशुद्ध विज्ञानक्षणों को मोक्ष माना जाता है, अतः वह मोक्ष निर्वर्त्य है । [ चित्त या विज्ञान में क्लेशावरण और ज्ञेयावरण—ये दो प्रकार के मल माने जाते हैं, उनकी निवृत्ति ही चित्त की विशुद्धता है—"धर्माभावोपलब्धिश्च निःक्लेशविशुद्धता" । ( महायान सू. १३।१६ ) । बौद्ध- निकायों के विविध निर्वाणवाद हैं, उनका दिग्दर्शन भूमिका में देखा जा सकता है ] ।

अन्य आचार्यों के मत में संसाररूप अवस्था छोड़ कर कैवल्यावस्था को आत्मा वैसे ही प्राप्त करता है, जैसे सुवर्ण पिण्डावस्था को छोड़ कर कटकादि में विकृत होता है । यह अवस्थान्तर-प्राप्तिरूप मोक्ष वैसे ही विकार्य है, जैसे दूध का अपनी पूर्वावस्था को छोड़ कर

मोक्षस्योत्पाद्यत्वादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १४९

लोके । न चाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षा; स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात् । स्वरूपव्यति- रिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वं, सर्वगतत्वेन नित्याप्तस्वरूपत्वात्सर्वेण ब्रह्मणः, आकाश- स्येव । नापि संस्कार्यो मोक्षः, येन व्यापारमपेक्षेत । संस्कारो हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा ? न तावद् गुणाधानेन संभवति; अनाधेयातिशय-

भामती

‘यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते’ इति श्रुतेर्ब्रह्मणो विकृताविकृतदेशभेदावगमादविकृतदेशब्रह्मप्राप्तिरुपा- सनाविधिविधेया भविष्यति । तथा च प्राप्यकर्मता ब्रह्मण इत्यत आह ॐ न चाप्यत्वेनापि इति ॐ । अन्यदन्येन विकृतदेशपरिहाण्याऽविकृतदेशं प्राप्यते । तद्यथोपेवेलं जलधिरतिबहलचपलकल्लोलमालापर- स्परास्फालनसमुल्लसत्फेनपुञ्जस्तवकतया विकृतः, मध्ये तु प्रशान्तसकलकल्लोलोपसर्गः स्वस्थः स्थिर- तयाऽविकृतस्तस्य मध्यमविकृतं पोतिकः पोतेन प्राप्नोति । जीवस्तु ब्रह्मैवेति किं केन प्राप्यतां, भेदाश्रय- त्वात् प्राप्तेरित्यर्थः । अथ जीवो ब्रह्मणो भिन्नस्तथापि न तेन ब्रह्माप्यते, ब्रह्मणो विभुत्वेन नित्यप्राप्तत्वा- दित्याह ॐ स्वरूपव्यतिरिक्तत्वेऽपि इति ॐ । संस्कार्यकर्मतामपाकरोति ॐ नापि संस्कार्यं इति ॐ । द्वयी हि संस्कार्यता, गुणाधानेन वा यथा बीजपूरककुसुमस्य लाक्षारसावसेकस्तेन हि तत् कुसुमं संस्कृतं लाक्षासवर्णं फलं प्रसूते । दोषापनयेन वा यथा मलिनमादर्शतलं निघृष्टमिष्टकाचूर्णेनोद्भासितभास्वरत्वं

भामती-व्याख्या

अवस्थान्तर की प्राप्ति दधिरूप विकार है। इन दोनों पक्षों में घट और दधि के समान मोक्ष में अनित्यत्व सिद्ध होता है ।

शङ्का—मोक्ष यदि उत्पाद्य या विकार्य नहीं, तब प्राप्य तो अवश्य है, क्योंकि "अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु" ( छां. ३।१३।३ ) इत्यादि श्रुतियों के अनुरोध पर आत्मा के दो ( विकृत और अविकृत ) देश प्रतीत होते हैं। उनमें अविकृत देश की प्राप्ति उपासना-विधि की देन है, वही मोक्ष है, अतः मोक्ष में प्राप्य कर्मता स्थिर होती है।

समाधान—भाष्यकार ने उक्त पक्ष का खण्डन करने के लिए कहा है—"न चाप्यत्वेनापि कार्यापेक्षा, स्वात्मस्वरूपत्वे सत्यनाप्यत्वात्" । तात्पर्य यह है कि अन्य वस्तु अन्य साधन के द्वारा विकृत देश को छोड़ कर अविकृत देश को प्राप्त होती है, जैसे जलधि ( महासागर ) अपने तट के समीप अत्यन्त चपल और उत्ताल तरङ्गावलियों के परस्पर आस्फालन ( टकराहट ) से फेनिल अवस्था में विकृत होता है और वही मध्य भाग में जा कर सकल कल्लोल ( उछल-कूद ) को छोड़ कर नितान्त प्रशान्त होता है। नाविक अपने नौका यान के द्वारा उसी प्रशान्त क्षेत्र को प्राप्त करता है, किन्तु जीव तो ब्रह्म रूप ही है, अतः वह किस अन्य पदार्थ को प्राप्त करेगा ? प्राप्ति क्रिया सदैव प्रापक और प्राप्य के भेद की अपेक्षा करती है, प्रकृत में प्रापक ( जीव ) और प्राप्य ( ब्रह्म ) का भेद न होने के कारण प्राप्ति सम्भव नहीं, फलतः मोक्ष में प्राप्य कर्मता क्योंकर बनेगी ? यदि जीव को ब्रह्म से भिन्न भी मान लिया जाय, तब भी वह प्राप्य नहीं हो सकता, क्योंकि लोक में प्राप्य वही माना जाता है, जो कभी अप्राप्त हो, ब्रह्म तो विभु होने के कारण सदैव प्राप्त है—"स्वरूपव्यतिरिक्तत्वेऽपि ब्रह्मणो नाप्यत्वम्, सर्वगतत्वेन नित्याप्तस्वरूपत्वात्" ।

मोक्ष में संस्कार्यकर्मता का अपाकरण किया जाता है—"नापि संस्कार्यो मोक्षः"। संस्कार्य कर्मता दो प्रकार की होती है—( १ ) गुण-विशेष की उत्पत्ति के द्वारा जैसे—

कुसुमे बीजपूरादेः यल्लाक्षाद्युपसिच्यते ।
तद्रूपस्यैव संक्रान्तिः फले तस्येति वासना ॥ ( प्र. वा. भा. पृ. ३५८ )

बीजपूर ( बिजोरा निम्बू ) के फल को लाख के रस ( पानी ) से तर कर देने पर विजोरा

१५०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

ब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य । नापि दोषापनयनेन; नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य ।

स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः क्रियायात्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, यथाऽऽदर्शे निघर्षणक्रियया संस्क्रियमाणे भास्वरत्वं धर्म इति चेत्,—न; क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेरात्मनः । यदाश्रया क्रिया तमविकुर्वती नैवात्मानं लभते । यद्यात्मा क्रियया

भामती

संस्कृतं भवति । तत्र न तावद् ब्रह्मणि गुणाधानं सम्भवति । गुणो हि ब्रह्मणः स्वभावो वा भिन्नो वा ? स्वभावश्चेत् कथमाधेयस्तस्य नित्यत्वात् । भिन्नत्वे तु कार्यत्वेन मोक्षस्यानित्यत्वप्रसङ्गः । न च भेदे धर्मधर्मिभावो गवाश्ववत् । भेदाभेदश्च व्युदस्तो विरोधात् । तदनेनाभिसन्धिनोक्तम् ॐ अनाधेयातिशयब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य ॐ । द्वितीयं पक्षमपक्षिपति ॐ नापि दोषापनयनेन इति ॐ । अशुद्धिः सती दर्पणे निवर्त्तते, न तु ब्रह्मणि असती निवर्त्तनीया, नित्यनिवृत्तत्वादित्यर्थः ।

शङ्कते ॐ स्वात्मधर्म एव इति ॐ । ब्रह्मस्वभाव एव मोक्षोऽनाद्यविद्यामलावृत उपासनादिक्रिययाऽऽत्मनि संस्क्रियमाणेऽभिव्यज्यते, न तु क्रियते । एतदुक्तं भवति—नित्यशुद्धत्वमात्मनोऽसिद्धं, संसारावस्थायामविद्यामलिनत्वादिति । शङ्कां निराकरोति ॐ न ॐ । कुतः ? ॐ क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः ॐ । नाविद्या ब्रह्माaction/ब्रह्माश्रया, किन्तु जीवे, सा त्वनिर्वचनीयेत्युक्तं, तेन नित्यशुद्धमेव ब्रह्म । अभ्युपेत्य त्वशुद्धिं क्रियासंस्कार्यत्वं दूष्यते । क्रिया हि ब्रह्मसमवेता वा ब्रह्म संस्कुर्यात्, यथा घर्षणमिष्टकाचूर्णसंयोग-

भामती-व्याख्या

का फल अन्दर से लाल हो जाता है । यहाँ फूल पर लालिमात्मक गुण का आधान किया जाता है, वह फूल की लालिमा फल के रस में परिणत हो जाती है । (२) दूसरा संस्कार दोषापनयन के द्वारा किया जाता है, जैसे मलिन दर्पण-तल पर ईंट का चूर्ण रगड़ने से दर्पण संस्कृत अर्थात् निर्मल हो जाता है । ब्रह्म पर गुणाधानरूप संस्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ब्रह्म पर जो गुण उत्पन्न किया जाता है, वह क्या ब्रह्म का स्वरूप है ? अथवा ब्रह्म से भिन्न ? यदि स्वभाव है, तब वह आधेय नहीं हो सकता, क्योंकि नित्य ब्रह्म का स्वरूप भी नित्य ही है । संस्कार को ब्रह्म से भिन्न और उत्पाद्य मानने पर मोक्ष में अनित्यत्वापत्ति होती है । अत्यन्त भेद मानने पर संस्कार और ब्रह्म का वैसे ही धर्मधर्मिभाव नहीं बन सकता, जैसे गौ और अश्व का । भेदाभेद-पक्ष का निरास पहले ही किया जा चुका है, क्योंकि वह परस्पर-विरुद्ध है—इस आशय को मन में रखकर कहा है—"अनाधेयातिशयब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य" । संस्कार के दोषापनयनरूप द्वितीय कल्प का निरास किया जा रहा है—"नापि दोषापनयनेन, नित्यशुद्धब्रह्मस्वरूपत्वान्मोक्षस्य" । आशय यह है कि दृष्टान्त-स्थल पर मल या अशुद्धि वस्तुतः होती है, तब उसकी निवृत्ति हो सकी, किन्तु ब्रह्म पर अशुद्धि की सत्ता तीनों कालों में भी नहीं, तब नित्य असत् या निवृत्त पदार्थ की निवृत्ति क्योंकर होगी ?

शङ्का-सूचक शब्द न होने पर भी यह शङ्का-भाष्य है—'स्वात्मधर्म एव संस्तिरोभूतो मोक्षः' । यद्यपि मोक्ष ब्रह्म-स्वभाव है, तथापि वह अनादि अविद्यारूप मल से आच्छन्न है, उपासनादि क्रिया के द्वारा आत्मा के संस्कृत हो जाने पर वह अभिव्यक्त हो जाता है । शङ्कावादी का अभिप्राय यह है कि आत्मा में नित्यशुद्धत्व सिद्ध नहीं, क्योंकि संसारावस्था में वह अविद्यारूप मल से युक्त होता है । उक्त शङ्का का निराकरण किया जाता है—"न" । किसी भी क्रिया के द्वारा ब्रह्म का संस्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि "क्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः" । अविद्या भी ब्रह्म के आश्रित नहीं रहती, किन्तु जीव के आश्रित रहती है । अविद्या अनिर्वचनीय है—यह कहा जा चुका है । फलतः ब्रह्म नित्य शुद्ध ही है । ब्रह्म में अविद्यारूप अशुद्धि को मानकर क्रिया के द्वारा संस्कार्यत्व का निरास किया गया है, क्योंकि क्या क्रिया ब्रह्म के

ब्रह्मणोऽविषयत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५१

विक्रियेत, अनित्यत्वमात्मनः प्रसज्येत । ‘अविकार्योऽयमुच्यते’ ( भ. गी. २।२५ ) इति चैवमादीनि वाक्यानि बाध्येरन् । तच्चानिष्टम् । तस्मान्न स्वाश्रया क्रियाऽऽत्मनः संभवति । अन्याश्रयायास्तु क्रियाया अविषयत्वान्न तयाऽऽत्मा संस्क्रियते । ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः, न; देहादिसंहतस्यैवाविद्यागृहीतस्यात्मनः संस्क्रियमाणत्वात् । प्रत्यक्षं हि स्नानाचमनादेर्देहसमबायित्वम् । तया देहाश्रयया तत्संहत एव कश्चिदविद्ययात्मत्वेन परिगृहीतः संस्क्रियत इति युक्तम् । यथा देहाश्रयचिकित्सानिमित्तेन धातुसाम्येन तत्संहतस्य तदभिमानिन आरोग्यफलम् , अहमरोग इति बुद्धिरुत्पद्यते । एवं स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिना अहं


भामती

विभागप्रचयो निरन्तर आदर्श तलसमवेतोऽन्यसमवेतो वा । न तावद् ब्रह्मधर्मः क्रिया, तस्याः स्वाश्रयविकारहेतुत्वेन ब्रह्मणो नित्यत्वव्याघातात् । अन्याश्रया तु कथमन्यस्योपकरोति, अतिप्रसङ्गात् । न हि दर्पणे निघृष्यमाणे मणिविशुद्धो दृष्टः । ॐ तच्चानिष्टम् इति ॐ । तदा बाधनं परामृशति । अत्र व्यभिचारं चोदयति ॐ ननु देहाश्रयया इति ॐ । परिहरति ॐ न, देहसंहतस्य इति ॐ । अनाद्यनिर्वचनीयाविद्योपधानमेव ब्रह्मणो जीव इति च क्षेत्रज्ञ इति चाचक्षते । स च स्थूलसूक्ष्मशरीरेन्द्रियादिसंहतस्तत्सङ्घातमध्यपतितस्तदभेदेनाहमितिप्रत्ययविषयीभूतोऽतः शरीरादिसंस्कारः शरीरादिधर्मोऽप्यात्मनो भवति, तदभेदाध्यवसायात् । यथाऽङ्गरागधर्मः सुगन्धिता कामिनीनां व्यपदिश्यते । तेनात्रापि यदाश्रिता क्रिया सांव्यवहारिकप्रमाणविषयोकृता तस्यैव संस्कारी नान्यस्येति न व्यभिचारः । तत्त्वतस्तु न क्रिया न


भामती-व्याख्या

आश्रित होकर वैसे ही ब्रह्म को संस्कृत करती है, जैसे आदर्श-तल पर इष्टिका-चूर्णका निरन्तर संयोग-विभाग-प्रचयरूप घर्षण ? अथवा अन्य वस्तु में रहकर क्रिया ब्रह्म को संस्कृत करती है ? क्रिया ब्रह्म का धर्म नहीं हो सकती, क्योंकि वह नियमतः अपने आश्रय को विकृत करती है, यदि ऐसा मान लिया जाय, तब ब्रह्मगत नित्यत्व-प्रतिपादक श्रुतियों का विरोध होता है । ब्रह्म से अन्य पदार्थ में रहनेवाली क्रिया के द्वारा ब्रह्म संस्कृत नहीं हो सकता, अन्यथा दर्पण पर इष्टिका-चूर्ण रगड़ने पर स्फटिक मणि भी संस्कृत हो जायगी, किन्तु वैसा कभी लोक में देखा नहीं जाता । "तच्चानिष्टम्"-इस भाष्य में 'तत्' पद के द्वारा ब्रह्मगत अनित्यत्व का बाध गृहीत होता है, अर्थात् ब्रह्मगत अनित्यत्व का बाध किसी को भी अभीष्ट नहीं । 'यदाश्रिता क्रिया भवति, तया तदेव संस्क्रियते'-इस नियम के व्यभिचार की शङ्का की जा रही है-"ननु देहाश्रयया स्नानाचमनयज्ञोपवीतादिकया क्रियया देही संस्क्रियमाणो दृष्टः" । उक्त शङ्का का परिहार किया जा रहा है-"न, देहादिसंहतस्यैवात्मनः संस्क्रियमाणत्वात्" । अर्थात् देह-तादात्म्यापन्न आत्मा ही स्नानादि क्रिया का कर्त्ता ( आश्रय ) और वही उसके फल का भोक्ता माना जाता है, अतः उसकी क्रिया से वह ( विशिष्ट ) आत्मा संस्कृत होता है, शुद्ध ब्रह्म नहीं, क्योंकि अनादि और अनिर्वचनीय अविद्यारूप उपाधि से युक्त ब्रह्म को जीव, क्षेत्रज्ञादि पदों के द्वारा अभिहित किया जाता है । वह स्थूल शरीर एवं इन्द्रियादि-घटित सूक्ष्म शरीर से विशिष्ट होता है । देहादि संघात के मध्य में निविष्ट वह देहादि-तादात्म्याध्यास के कारण देहादि को 'अहम्' ही मानता है, इस प्रकार शरीर का संस्कार शरीर-विशिष्ट आत्मा का वैसे ही माना जाता है, जैसे कामिनी के शरीर पर मले हुए चन्दन-चूर्ण की सुगन्धि का व्यवहार कामिनी में होता है, फलतः व्यावहारिक प्रत्यक्षादि प्रमाणों के द्वारा स्नानादि क्रिया जिस आश्रय में देखी जाती है, वह संस्कृत होता है, उक्त नियम में किसी प्रकार का व्यभिचार नहीं होता । तत्त्वतः ( पारमार्थिक दृष्टि से ) पृथक्

१५२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

शुद्धः संस्कृत इति यत्र बुद्धिरुत्पद्यते स संस्क्रियते। स च देहेन संहत एव। तेनैव ह्यहंकर्त्राऽहंप्रत्ययविषयेण प्रत्ययिना सर्वाः क्रिया निर्वर्त्यन्ते। तत्फलं च स एवाश्नाति; ‘तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’ (मुण्ड० ३।१।१) इति मन्त्र-वर्णात्। ‘आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः’ (काठ० १।३।४) इति च। तथा च ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च’ (श्वेता० ६।११) इति, ‘स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम-स्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्’ (ईशा० ८) इति चैतौ मन्त्रावनाधेयातिशयतां नित्यशुद्धतां च ब्रह्मणो दर्शयतः। ब्रह्मभावश्च मोक्षः। तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः। अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानुप्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद्दर्शयितुम्। तस्माज्ज्ञानमेकं मुक्त्वा क्रियाया


भामती

संस्कार इति। सनिदर्शनं तु शेषमध्यासभाष्य एव कृतव्याख्यानमिति नेह व्याख्यातम्। ॐ तयोरन्यः पिप्पलं इति ॐ। अन्यो जीवात्मा, पिप्पलं कर्मफलम्। ॐ अनश्नन्नन्य - इति ॐ। परमात्मा। संहतस्यैव भोक्तृत्वमाह मन्त्रवर्णः। ॐ आत्मेन्द्रिय इति ॐ। अनुपहितशुद्धस्वभावब्रह्मप्रदर्शनपरो मन्त्रौ पठति ॐ एको देवः इति ॐ। "शुक्रं" दीप्तिमत् , "अव्रणं" दुःखरहितम्, "अस्नाविरम्" अविगलितम् , अविनाशीति यावत्। उपसंहरति ॐ तस्माद् इति ॐ। ननु मा भून्निर्वर्त्यादिकर्मताचतुष्टयी, पञ्चमी तु काचिद् विधा भविष्यति यया मोक्षस्य कर्मता घटिष्यत इत्यत आह ॐ अतोऽन्यद् इति ॐ। एभ्यः प्रकारेभ्यो न प्रकारान्तरमन्यदस्ति, यतो मोक्षस्य क्रियानुप्रवेशो भविष्यति। एतदुक्तं भवति - चतसृणां विधानां मध्येऽन्यतमतया क्रियाफलत्वं व्याप्तं, सा च मोक्षाद् व्यावर्त्तमाना व्यापकानुपलब्ध्या मोक्षस्य क्रियाफलत्वं व्यावर्त्तयतीति। तत् किं मोक्षे क्रियेव नास्ति, तथा च तदर्थानि शास्त्राणि तदर्थाश्च प्रवृत्तयोऽ-


भामती-व्याख्या

न कोई क्रिया होती है और न तज्जन्य संस्कार। आध्यासिक दृष्टि का विशेष वर्णन "परत्र पूर्वदृष्टावभास"—इस भाष्य की व्याख्या में विविध उदाहरणों के द्वारा पहले किया जा चुका है, अतः यहाँ विशेष व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। "तयोरन्यः" इस श्रुति में 'अन्यः' का अर्थ जीव, 'पिप्पलं' का अर्थ कर्म-फल और 'अनश्नन् अन्यः' का अर्थ ब्रह्म या परमात्मा है, क्योंकि शुद्ध चैतन्य में फल-भोक्तृत्व नहीं होता, संहत, उपहित या विशिष्ट आत्मा में ही भोक्तृत्व का वर्णन मन्त्र वर्ण (संहिता-मन्त्र) करता है—"आत्मा इन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः" (कठ० १।३।४)। अनुपहित या शुद्धस्वभाव ब्रह्मपरक दो मन्त्रों का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है—"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा" (श्वेता. ६।११)। द्वितीय मन्त्र में 'शुक्रम्' का अर्थ—दीप्तिमान् (शुक्ल), 'अव्रणम्' का अर्थ दुःख-रहित, 'अस्नाविरं' का अर्थ—अविगलित (अविनाशी) है। प्रकरण का उपसंहार किया जाता है—"तस्मान्न संस्कार्योऽपि मोक्षः"। यदि ऐसी शङ्का हो कि निर्वर्त्य, आप्य, विकार्य और संस्कार्यरूप चार प्रकारों से भिन्न पाँचवीं कोई विधा हो सकती है, जिसको लेकर मोक्ष में कर्मता (क्रियाश्रयता) घट जायगी। तो वैसी शङ्का का निरास किया जाता है—"अतोऽन्यन्मोक्षं प्रति क्रियानुप्रवेशद्वारं न शक्यं केनचिद् दर्शयितुम्"। अर्थात् इन चार प्रकारों को छोड़ कर कोई पञ्चम प्रकार ऐसा नहीं दिखाया जा सकता, जिसके द्वारा मोक्ष में क्रिया की अपेक्षा सिद्ध की जा सके। 'यत्र-यत्र क्रियाफलत्वम्, तत्र-तत्र निर्वर्त्यत्वादिचतुष्टयान्यतमत्वम्'—इस प्रकार की व्याप्ति पर्यवसित होती है, अतः प्रकृत (ब्रह्मभावरूप) मोक्ष में निर्वर्त्यत्वाद्यन्यतमता की निवृत्ति से क्रिया-जन्यत्व की निवृत्ति हो जाती है। यह जो शङ्का होती है कि यदि मोक्ष में किसी प्रकार की क्रिया (कृति-साध्यता)

ज्ञानस्य मानसक्रियात्वविचारः ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् १५३

गन्धमात्रस्याप्यनुप्रवेश इह नोपपद्यते ।

ननु ज्ञानं नाम मानसी क्रिया न, वैलक्षण्यात् । क्रिया हि नाम सा, यत्र वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव चोद्यते, पुरुषचित्तव्यापाराधीना च । यथा—‘यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेद्वषट् करिष्यन्’ इति, ‘संध्यां मनसा ध्यायेत्’ ( ऐ० ब्रा० ३।८।१ ) इति चैवमादिषु । ध्यानं चिन्तनं यद्यपि मानसं, तथापि पुरुषेण कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्यं; पुरुषतन्त्रत्वात् । ज्ञानं तु प्रमाणजन्यम् । प्रमाणं च यथाभूतवस्तुविषयम्, अतो ज्ञानं कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुमशक्यम्, केवलं वस्तुतन्त्रमेव तत् । न चोदनातन्त्रम् । नापि पुरुषतन्त्रम् । तस्मान्मानसत्वेऽपि ज्ञानस्य महद्वैलक्षण्यम् । यथा च ‘पुरुषो वाव गौतमाग्निः’ ‘योषा वाव गौतमाग्निः’ ( छान्दो० ५।७, ८।१ ) इत्यत्र योषित्पुरुषयोरग्निबुद्धिर्मानसी भवति । केवलचोदनाजन्यत्वात् क्रियैव सा

भामती

नर्थकानीत्यत उपसंहारव्याजेनाह ॐ तस्माज् ज्ञानमेकम् इति ॐ । अत्र ज्ञानं क्रिया मानसी कस्मान्न विधिगोचरः, कस्माच्च तस्याः फलं निर्वर्त्यादिष्वन्यतमं न मोक्ष इति चोद्यति ॐ ननु ज्ञानम् इति ॐ । परिहरति ॐ न, वैलक्षण्यात् ॐ । अयमर्थः—सत्यं ज्ञानं मानसी क्रिया, न त्वियं ब्रह्मणि फलं जनयितुमर्हति, तस्य स्वयम्प्रकाशतया विदिक्रियाकर्मभावानुपपत्तेरित्युक्तम् । तदेतस्मिन् वैलक्षण्ये स्थिते एव वैलक्षण्यान्तरमाह ॐ क्रिया हि नाम सा इति ॐ । “यत्र” विषये “वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव चोद्यते” यथा देवतासम्प्रदानकहविर्ग्रहणे देवतावस्तुस्वरूपानपेक्षा देवताध्यानक्रिया । यथा वा योषिति अग्निवस्त्वनपेक्षाऽग्निबुद्धिर्या सा क्रिया हि नामेति योजना । न हि यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन्नित्यस्माद्विधेः प्राग्देवताध्यानं प्राप्तं, प्राप्तं त्वधीतवेदान्तस्य विदितपवतदर्थसम्बन्धस्याधिगतशब्दन्याय-

भामती-व्याख्या

ही नहीं, तब मोक्ष-सम्पादन करने के लिए उपदिष्ट शास्त्र एवं मुमुक्षुओं की प्रवृत्ति अत्यन्त व्यर्थ हो जाती है । उस शङ्का का समाधान उपसंहार के बहाने किया जाता है—“तस्माज्ज्ञानमेकं मुक्त्वा क्रियाया गन्धमात्रस्याप्यनुप्रवेश इह नोपपद्यते” ।

ज्ञान को मानस क्रिया क्यों न मान लिया जाय, वह विधि का विषय भी हो सकती है और उसके फलभूत मोक्ष में कथित चतुर्विधान्यतमत्व भी—ऐसी शङ्का उठाई जा रही है—“ननु ज्ञानं नाम मानसी क्रिया” । उस शङ्का का परिहार किया जा रहा है—“न” । ज्ञान को मानस क्रिया नहीं मान सकते, क्योंकि इसमें क्रिया से वैलक्षण्य पाया जाता है । आशय यह है कि यह सत्य है कि ज्ञान भी एक मानस क्रिया है, किन्तु यह ब्रह्म में किसी प्रकार का फल उत्पन्न नहीं कर सकती, क्योंकि ब्रह्म स्वयं प्रकाश होने के कारण ज्ञानरूप विदि क्रिया का कर्म नहीं हो सकता । इस प्रकार के वैलक्षण्य के रहने पर भी अन्य वैलक्षण्य प्रदर्शित किया जा रहा है—“क्रिया हि नाम सा यत्र वस्तुस्वरूपनिरपेक्षैव चोद्यते” । यहाँ ‘यत्र’ का अर्थ है—जिस विषय में, इस प्रकार यहाँ क्रिया का यह लक्षण विवक्षित है—‘यत्र विषये या वस्त्वनपेक्षा चोद्यते, तत्र विषये सा क्रिया’ । जैसे देवतारूप सम्प्रदान के लिए हवि की ग्रहण क्रिया के अवसर पर “यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात् तां ध्यायेद् वषट् करिष्यन्” ( ऐ. ब्रा. ११।८।१ ) इस वाक्य के द्वारा जो ध्यान क्रिया विहित है, वह अपने विषयीभूत देवता की अपेक्षा नहीं करती, क्योंकि ज्ञेय वस्तु ज्ञान से पहले जैसे अपने स्वरूप में व्यवस्थित होती है, ध्येय वस्तु वैसी नहीं, सम्पदादि स्थलों पर अन्य वस्तु में ध्यान अन्य का ही होता है, जैसे योषित् (स्त्री) में अग्नि-भावना । देवता-ध्यान विहित भी इसी लिए है कि “तां मनसा ध्यायेत्”—इस विधि वाक्य के श्रवण से पहले देवता-ध्यान प्राप्त नहीं, किन्तु जिस

२०

१५४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

पुरुषतन्त्रा च। या तु प्रसिद्धेऽग्नावग्निबुद्धिः, न सा चोदनातन्त्रा, नापि पुरुषतन्त्रा। किं तर्हि ? प्रत्यक्षविषयवस्तुतन्त्रैवेति ज्ञानमेवैतन्न क्रिया। एवं सर्वप्रमाणविषयवस्तुषु वेदितव्यम्। तत्रैवं सति यथाभूतब्रह्मात्मविषयमपि ज्ञानं न चोदनातन्त्रम्। तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात्कुण्ठीभवन्ति, उपलादिषु प्रयुक्तक्षुरतैक्ष्ण्या-

भामती

तत्त्वस्य सदेव सोम्येदमित्यादेस्तत्त्वमसीत्यन्तात्सन्दर्भाद् ब्रह्मात्मभावज्ञानं शब्दप्रमाणसामर्थ्यात् । इन्द्रियार्थ-सन्निष्कर्षसामर्थ्यादिव प्रणिहितमनसः स्फीतालोकमध्यवर्तिकुम्भानुभवः। न ह्यसौ स्वसामग्रीबललब्धजन्मा मनुजेच्छयाऽन्यथाकर्तुमकर्तुं वा शक्यः, देवताध्यानवत्, येनार्थवानत्र विधिः स्यात्। न चोपासना वाऽनु-भवपर्यन्तता वाऽस्य विधेर्गोचरस्तयोरन्वयव्यतिरेकावधृतसामर्थ्ययोः साक्षात्कारे वाऽनाद्यविद्यापनये वा विधिमन्तरेण प्राप्तत्वेन पुरुषेच्छयाऽन्यथाकर्तुमकर्तुं वाऽशक्यत्वात् । तस्माद् ब्रह्मज्ञानं मानसी क्रियाऽपि न विधिगोचरः । पुरुषचित्तव्यापाराधीनायास्तु क्रियाया वस्तुस्वरूपनिरपेक्षता क्वचिदविरोधिनी, यथा देवताध्यानक्रियायाः । न ह्यत्र वस्तुस्वरूपेण कश्चिद्विरोधः । क्वचित्स्तुविरोधिनी, यथा योषित्पुरुषयो-रग्निबुद्धिरित्येतावता भेदेन निदर्शनमिथुनद्वयोपन्यासः । क्रियैवेत्येवकारेण वस्तुतन्त्रत्वमपाकरोति ।

नन्वात्मेत्येवोपासीतेत्यादयो विधयः श्रूयन्ते, न च प्रमत्तगीताः, तुल्यं हि साम्प्रदायिकं, तस्माद्वि-धेयेनात्र भवितव्यमित्यत आह ❖ तद्विषयं लिङादयः इति ❖। सत्यं श्रूयन्ते लिङादयः, न त्वमी विधि-

भामती-व्याख्या

व्यक्ति ने वेदान्त का अध्ययन किया है एवं पद-पदार्थ का संगति-ग्रह भी कर लिया है, उस व्यक्ति को “सदेव सोम्येदमग्रआसीत्”—यहाँ से लेकर “तत्त्वमसि”—यहाँ तक के सन्दर्भ (प्रकरण) से शब्द प्रमाण के बल पर वैसे ही ब्रह्म में आत्मत्व-बोध हो जाता है, जैसे इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष के बल पर समाहितमनवाले व्यक्ति की उज्ज्वल प्रकाश में अवस्थित घट का अनुभव हो जाता है, क्योंकि ऐसे घटानुभव का जो अपनी इन्द्रिय-सन्निकर्षादि-घटित सामग्री से उत्पन्न हुआ है, किसी पुरुष की इच्छा से न तो अन्यथा किया जा सकता है और न अकरण । यदि इसका इच्छामात्र के बल पर ध्यानादि के समान अन्यथाकरण या अकरण सम्भव होता, तब इसके विधान की सार्थकता हो सकती थी। इस ‘द्रष्टव्यः’ विधि के द्वारा उपासना (श्रावण ज्ञान की आवृत्ति) या अविद्यापनयनार्थ परोक्ष ज्ञान की साक्षात्कार-पर्यन्तता का विधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के आधार पर उपासना (निरन्तरानुचिन्तन) में साक्षात्कार की एवं साक्षात्कार-पर्यन्त ज्ञान में अविद्या-निवृत्ति की जनकता विधि के बिना ही स्वतः सिद्ध है, पुरुष की इच्छा के द्वारा उसका अन्यथा-करणनहीं हो सकता। फलतः ब्रह्मज्ञान को मानस क्रिया मान लेने पर भी उसमें विधि-विषयता सम्भव नहीं। क्रिया में सर्वत्र वस्तुस्वरूप-निरपेक्षता का विरोध नहीं होता, कहीं-कहीं अविरोध भी होता है, जैसे देवताविषयक ध्यान क्रिया में, क्योंकि वस्तुस्वरूप (देवता-स्वरूप) के साथ इसका कोई विरोध नहीं होता । कहीं-कहीं क्रिया अवश्य ही वस्तुस्वरूप की विरोधिनी होती है, जैसे स्त्री और पुरुष में अग्नि का ध्यान । क्रियाओं के इस अन्तर को ध्यान में रख कर देवता-ध्यान और स्त्री आदि में अग्नि-ध्यान इन द्विविध ध्यान क्रियाओं का उदाहरण भाष्यकार ने दिया है। भाष्यकार ने जो कहा है ‘क्रियैव सा’। वहाँ एवकार के द्वारा क्रिया में वस्तु-तन्त्रता का निराकरण किया गया है।

शङ्का— “आत्मेत्येवोपासीत” (बृह० उ० १।४।७) इत्यादि विधि वाक्य जब वेदान्त-क्षेत्र में उपलब्ध होते हैं, तब उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि ये वाक्य कोई प्रमत्त पुरुष के प्रलाप के समान निरर्थक नहीं, एवं अर्थवाद-वाक्यों की प्रामाणिकता और

वेदान्तेषु लिङ्गादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५५

दिवद् ; अहेयानुपादेयवस्तुविषयत्वात् । किमर्थानि तर्हि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' (बृ. २।४।५ ) इत्यादीनि विधिच्छायानि वचनानि ? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषय- विमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः । यो हि बहिर्मुखः प्रवर्तते पुरुषः 'इष्टं मे भूयादनिष्टं मा भूद्' इति, न च तत्रात्यन्तिकं पुरुषार्थं लभते, तमात्यन्तिकपुरुषार्थवाञ्छिनं स्वाभाविक्रार्य- करणसंघातप्रवृत्तिगोचराद्विमुखीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोतस्तया प्रवर्तयन्ति - 'आत्मा वा


भामती

विषयाः, तद्विषयत्वेऽप्रामाण्यप्रसङ्गात् । हेयोपादेयविषयो हि विधिः । स एव च हेय उपादेयो वा यं पुरुषः कर्तुमकर्त्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्नोति । तत्रैव च समर्थः कर्ताऽधिकृतो नियोज्यो भवति । न चेव- म्भूतात्मात्मश्रवणमननोपासनदर्शनानीति विषयतदनुष्ठात्रोर्विधिव्यापकतयोरभावाद् विधेरभाव इति प्रयुक्ता अपि लिङादयः प्रवर्तनायामसमर्था उपल इव क्षुरतैक्ष्ण्यं कुण्ठप्रमाणीभवन्तीति । ॐ अनियोज्यविषय- त्वाद् इति ॐ । समर्थो हि कर्ताऽधिकारी नियोज्यः । असामर्थ्ये तु न कर्तृता ततोऽनधिकृतो न नियोज्य इत्यर्थः । यदि विधेरभावान्न विधिवचनानि, किमर्थानि तर्हि वचनान्येतानि विधिच्छायानीति पृच्छति ॐ किमर्थानि इति ॐ । न चानर्थकानि युक्तानि, स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वानुपपत्तेरिति भावः । उत्तरम् ॐ स्वाभाविक इति ॐ । अन्यतः प्राप्ता एव हि श्रवणादयो विधिसरूपैर्वाक्यैरनूद्यन्ते । न चानुवाद्योऽप्य-


भामती-व्याख्या

सार्थकता की पुष्टि में कहा जाता है— "तुल्यं च साम्प्रदायिकम्" (जै. सू. १।२।८) अर्थात् अध्ययनाध्यापन की परम्परा में अन्य विधि में वाक्यों के समान ही इन वाक्यों को मान्यता प्राप्त है, अतः इनकी विधिरूपता निश्चित है, तब आत्मोपासना का विधान क्यों नहीं माना जाता ?

समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "तद्विषये लिङादयः श्रूयमाणा अप्यनियोज्यविषयत्वात् कुण्ठीभवन्ति"। अर्थात् इस बात को कभी भी नकारा नहीं जा सकता कि आत्मोपासना-विधि-बोधक वाक्य उपलब्ध नहीं होते । ऐसे वाक्य अवश्य हैं, किन्तु उनका विधि में तात्पर्य मानने पर प्रामाण्य अक्षुण्ण नहीं रहता, क्योंकि विधि सदैव हेय और उपादेय विषय की होती है, हेय ( त्याज्य ) या उपादेय ( ग्राह्य ) वही होता है, जिस विषय का पुरुष अपनी इच्छा से त्याग या ग्रहण कर सके । जिस विषय के करण, अकरण या अन्यथाकरण में पुरुष सर्वथा समर्थ और स्वतन्त्र होता है, उसी विषय का पुरुष कर्त्ता, अधिकारी या नियोज्य माना जाता है । इस प्रकार यह एक नियम या व्याप्ति स्थिर होती है कि "यत्र यत्र पुरुषस्वातन्त्र्यं सनियोज्यत्वं तत्र तत्र विधेयत्वम्"। आत्मा के श्रवण, मनन और उपासन ( निदिध्यासन ) में विधेयत्व सम्भव नहीं, क्योंकि उनमें विधेयत्व का व्यापकीभूत हेयत्वोपादेयत्वरूप पुरुष-स्वातन्त्र्य एवं सनियोज्यत्व नहीं, व्यापक का अभाव होने पर व्याप्य का अभाव निश्चित है। लिङादि प्रत्यय अवश्य ही विधि या प्रवर्तना में शक्त होते हैं, किन्तु प्रवर्तना के अविषयीभूत पदार्थ के बोधन में प्रयुक्त लिङादि वैसे ही कुण्ठित या विवश हो जाते हैं, जैसे पत्थर को काटने के लिए चलाया गया छुरा, पत्थर काटने में समर्थ नहीं होता। अविषयीभूत पदार्थ में लिङादि प्रमाण या प्रवर्तक नहीं हो सकते, क्योंकि उस विषय का नियोज्य या अधिकारी व्यक्ति ही सुलभ नहीं, समर्थ कर्त्ता पुरुष को अधि- कारी या नियोज्य माना जाता है, जिस पदार्थ के सम्पादन में जो समर्थ नहीं, उसका वह न कर्त्ता हो सकता है और न नियोज्य ( अधिकारी ) । विधि के अभाव में विधि-वचन यदि प्रयुक्त नहीं हो सकते, तब "आत्मेत्येवोपासीत'—इस प्रकार श्रूयमाण विध्याभास-वचन किस लिए ? ऐसी शङ्का की जा रही है—किमर्थानि तर्हि "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्य" इत्येवमादीनि विधिच्छायानि वचनानि ?""स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस स्वाध्याय-विधि के

१५६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ४

अरे द्रष्टव्यः' इत्यादीनि । तस्यात्मान्वेषणाय प्रवृत्तस्याहेयमनुपादेयं चात्मतत्त्वमुपदिश्यते । 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृह० २।४।६) 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् केन कं विजानीयात्', 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' (बृह० ४।५।१५) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृह० २।५।१९) इत्यादिभिः । यदप्यकर्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपादानाय वा न भवतीति, तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते अलंकारो ह्ययमस्माकं यद् ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्वकर्तव्यताहानिः कृतकृत्यता चेति । तथा च श्रुतिः—'आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ।' (बृह०


भामती

प्रयोजनः, प्रवृत्तिविशेषकरत्वात् । तथाहि—तत्तदिष्टानिष्टविषयेप्साजिहासापहृतहृदयतया बहिर्मुखो न प्रत्यगात्मनि समाधातुमर्हति । आत्मश्रवणादिविधिसरूपैस्तु वचनैर्मनसो विषयस्रोतः खिलीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोतः उद्घाट्यते इति प्रवृत्तिविशेषकरत्वानुवादानास्तीति सप्रयोजनतया स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वमुपपद्यत इति ।

यच्च चोदितमात्मज्ञानमननुष्ठानाङ्गतत्वादपुरुषार्थमिति । तदयुक्तम्, स्वतोऽस्य पुरुषार्थत्वे सिद्धे यदनुष्ठानानङ्गत्वं तद् भूषणं न दूषणमित्याह ॐ यदपि इति ॐ । "अनुसंज्वरेत्" शरीरं परितप्यमानमनु-


भामती-व्याख्या

द्वारा गृहीत होने के कारण उक्त वाक्यों को अनर्थक नहीं कहा जा सकता । उक्त शङ्का का समाधान है — “स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानि ब्रूमः” । वैषयिक सुख की लिप्सा में जीव की सहज प्रवृत्ति को रोकने के लिए "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः" — ऐसा कह दिया गया है । वह भी विधि वाक्यों के द्वारा आत्म-साक्षात्कारार्थ श्रवणादि का विधान नहीं, अपितु अन्यतः (लोक-प्रसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक के माध्यम से) जो श्रवणादि में साक्षात्कार-जनकत्व प्राप्त है, उसी का अनुवादमात्र कर दिया गया है। यह अनुवाद भी निरर्थक नहीं, श्रवणादिगत प्राशस्त्य का गमक होकर आत्म-श्रवणादि में रुचि और अनात्म-चिन्तन में अरुचि का जनक हो जाता है। विविध इष्ट विषयों की लिप्सा और अनिष्ट विषयों की जिहासा के मोहक प्रपञ्च में फँसा जीव आत्म-चिन्तन में मन को नहीं लगा सकता, कथित आत्मश्रवणादि-बोधक विध्याभासों के द्वारा विषयाभिमुख मानस प्रवाह को रोककर प्रत्यगात्माभिमुख प्रवृत्त किया जाता है। इस प्रकार सार्थक श्रवणादि-विषयक अनुवाद के गमक कथित विधि के समान रूपवाले "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः"—इत्यादि वाक्यों का स्वाध्याय-विधि के द्वारा ग्रहण उपपन्न हो जाता है ।

यह जो आक्षेप किया था कि आत्म-ज्ञान किसी कर्मानुष्ठान का अङ्ग न होने के कारण निरर्थक है। वह आक्षेप युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि जब कि आत्म-ज्ञान स्वयं पुरुषार्थ सिद्ध हो जाता है, तब उसमें किसी कर्मानुष्ठान की अङ्गता आवश्यक नहीं—यह कहा जा रहा है— “यदपि अकर्त्तव्यप्रधानमात्मज्ञानं हानायोपादानाय न भवतीति, तत्तथैवेत्यभ्युपगम्यते, अलङ्कारो ह्ययमस्माकं यद् ब्रह्मात्मावगतौ सत्यां सर्वकर्त्तव्यताहानिः कृतकृत्यता च”। जैसे धर्म-ज्ञान के पश्चात् धर्म का अनुष्ठान अपेक्षित होता है, वैसे ब्रह्म-ज्ञान के पश्चात् किसी प्रकार का अनुष्ठान अवशिष्ट नहीं रहता—यह हमारे अद्वैत-सिद्धान्त में कोई दोष नहीं, अपितु गुण है, अलंकार है, महती कृतकृत्यता है, श्रुति भगवती का विजय-घोष हमारे पक्ष में है—

“आत्मानं चेद् विजानीयादयमस्मीति पूरुषः ।
किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥” (बृह. उ. ४।४।१२)

[ यदि यह पुरुष (जीव) अपने वास्तविक शुद्ध बुद्ध ब्रह्मस्वरूप का विज्ञान (साक्षात्कार)

औपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५७


४।४।१२) इति । 'एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत' (भ० गी० १५।२०) इति स्मृतिः । तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया ब्रह्मणः समर्पणम् ।

यदपि केचिदाहुः— 'प्रवृत्तिनिवृत्तिविधितच्छेषव्यतिरेकेण केवलवस्तुवादी वेदभागो नास्ति' इति, — तन्न; औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात् । योऽसावुपनिष-


भामती

तप्येत । सुगममन्यत् । प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मान्न प्रतिपत्ति इति ॐ । प्रकृतसिद्धयर्थमेकदेशिमंत दूषयितुमनुभाषते ॐ यदपि केचिदाहुः इति ॐ । दूषयति ॐ तन्न इति ॐ । इदमत्राकूतम्—

कार्यबोधे यथा चेष्टा लिङ्गं हर्षादयस्तथा ।
सिद्धबोधेऽर्थवत्त्वं च शास्त्रत्वं हितशासनात् ।

यदि हि पदानां कार्याभिधाने तदर्थार्थाभिधाने वा नियमेन वृद्धव्यवहारे सामर्थ्यमवधृतं भवेत्, न भवेत्, अहेयोपादेयभूतब्रह्मात्मतापरत्वमुपनिषदाम् । तत्राविदितसामर्थ्यत्वात् पदानां लोके तत्पूर्वकत्वाच्च वैदिकार्थप्रतीतेः । अथ तु भूतेऽप्यर्थे पदानां लोके शक्यः सङ्गतिग्रहस्तत उपनिषदां तत्परत्वं पौर्वापर्यपर्यालोचनयाऽवगम्यमानमपह्नुत्य न कार्यपरत्वं शक्यं कल्पयितुं, श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाप्रसङ्गात् । तत्र तावदेवमकार्यार्थे न सङ्गतिग्रहः, यदि तत्परः प्रयोगो न लोके दृश्येत, तत्प्रत्ययो वा


भामती-व्याख्या

कर ले, तब और किस फल की इच्छा से अथवा अपने से भिन्न किस पुरुष के लिए शरीर-सन्ताप के द्वारा अनुसन्तप्त होगा ? ] 'अनुसंज्वरेत्' शब्द का अर्थ भाष्यकार ने ही श्रुति की व्याख्या में किया है— “शरीरमनुसंज्वरेत्, शरीरोपाधिकृतदुःखमनु दुःखी स्यात्, शरीरतापमनुतप्येत” (बृह. भा. पृ. ६७७) । प्रकरण का उपसंहार किया जाता है— “तस्मान्न प्रतिपत्तिविधिविषयतया ब्रह्मणः समर्पणम्” ।

अपने सिद्धान्त की दृढ़ता के लिए एकदेशी के दूषित मत का अनुवाद करते हैं— “यदपि केचिदाहुः” । उसमें दोषोद्भावन किया जा रहा है— “तन्न” । आशय यह है कि—

कार्यबोधे यथा चेष्टा लिङ्गं हर्षादयस्तथा ।
सिद्धबोधेऽर्थवत्त्वं शास्त्रत्वं हितशासनात् ॥

[ विगत पृ. १२६ पर एकदेशी की ओर से कहा गया था कि (१) 'अज्ञातसंगतित्व', (२) 'शास्त्रत्व', (३) 'अर्थवत्त्व' और (५) 'मननादिप्रतीत्या'—इन चार हेतुओं के द्वारा वेदान्त-क्षेत्र में भी कार्यानुप्रवेश आवश्यक है । उसी का यहाँ निराकरण किया जाता है कि संगति-ग्रह से लेकर तत्त्व-निश्चय करने तक वेदान्त में कहीं भी कार्यानुप्रवेश आवश्यक नहीं] । आनयनादि कार्यरूप अर्थ के बोध में जैसे चेष्टा (प्रवृत्ति) अपेक्षित है, वैसे ही पुत्रादि सिद्धरूप अर्थ के बोधन में “पुत्रस्ते जातः”—इत्यादि वाक्यों को सुनकर श्रोता के मुख-मण्डल पर बिखरी हुई हर्ष की रेखाएँ लिङ्ग (गमक) रूपेण अपेक्षित हैं । यदि कार्यार्थ के अभिधान में पदों को नियमतः उत्तम और मध्यम वृद्धों के व्यवहार अपेक्षित होते, तब हेयोपादेय-रहित ब्रह्म-परता वेदान्त-वाक्यों में नहीं होती, क्योंकि लोक में पदों का वैसा शक्ति-ग्रह सम्भव नहीं था और शक्ति-ग्रह पूर्वक ही वैदिकार्थ की प्रतीति होती है । यदि भूत (सिद्ध) अर्थ में पदों का शक्ति-ग्रह सम्भव है और उसके आधार पर उपनिषद्-ग्रन्थों में उपक्रमोपसंहारादि-न्याय का सहारा लेकर ब्रह्मपरता निश्चित है, तब उसका अपलाप करके कार्यार्थपरत्व की स्थापना कभी नहीं की जा सकती, अन्यथा श्रुत (सिद्धार्थपरत्व) की हानि और अश्रुत (कार्यपरत्व) की प्रसक्ति वेदान्त में होगी ।

अकार्य (सिद्ध) रूप अर्थ में तब शक्ति-ग्रह नहीं हो सकता था, जब कि लोक में

१५८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. ४

भामती व्युत्पन्नस्योन्नेतुं न शक्येत । न तावत्तत्परः प्रयोगो न दृश्यते लोके, कुतूहलभयादिनिवृत्त्यर्थानामाकार्य- पराणां पदसन्दर्भाणां प्रयोगस्य लोके बहुलमुपलब्धेः । तथाह्याऽऽखण्डलादिलोकपालचक्रवालदिवसतिः सिद्धविद्याधरगन्धर्वाप्सरःपरिवारो ब्रह्मलोकावतीर्णमन्दाकिनीपयःप्रवाहपातधौतकलधौतमयशिलातलो नन्दनादिप्रमदवनविहारिमणिमयशकुन्तककमनीयनिनादमनोहरः पर्वंतराजः सुमेरुरिति । नैष भुजङ्गो रज्जुरित्यादि ।

नापि भूतार्थबुद्धिव्युत्पन्नपुरुषवर्तिनी न शक्या समुन्नेतुं हर्षदिरन्यहेतोः सम्भवात् । तथाह्या- विदितार्थजनभाषार्थो द्रविड़ो नगरगमनोद्यतो राजमार्गभ्रणं देवदत्तमन्दिरमध्यासीनः प्रतिपन्नजनका- नन्दनिबन्धनपुत्रजन्मा वार्त्ताहारेण सह नगरस्थदेवदत्ताभ्याशमागतः पटवासोपायनार्पणपुरःसरं दिष्ट्या वर्धसे पुत्रस्ते जात इति वार्त्ताहारव्याहारश्रवणसमनन्तरमुपजातर रोमाञ्चकञ्चुकं विकसितनयनोत्पलमसि- स्मेरमुखमहोत्पलमवलोक्य देवदत्तमुत्पन्नप्रमोदमनुमिमीते, प्रमोदस्य च प्रागभूतस्य तद्व्याहारश्रवणसम- नन्तरं भवतस्तद्धेतुताम् । न चायमप्रतिपादयन् हर्षहेतुमर्थं हर्षाय कल्पत इत्यनेन हर्षहेतुरर्थ उक्त इति प्रतिपद्यते । हर्षहेत्वन्तरस्य चाप्रतीतेः पुत्रजन्मनेश्च तद्धेतोरवगमात्तदेव वार्त्ताहारेणाभ्यधायीति निश्चि- नोति । एवं भयशोकादयोऽप्युदाहार्याः । तथा च प्रयोजनवत्ता भूतार्थाभिधानस्य प्रेक्षावत्प्रयोगोऽप्यु-

भामती-व्याख्या सिद्धार्थ-बोधक शब्द-प्रयोग उपलब्ध न होता अथवा व्युत्पन्न पुरुष के द्वारा शब्दों में सिद्धार्थ- परत्व की ऊहा नहीं की जा सकती हो, किन्तु वे दोनों बातें नहीं, क्योंकि सिद्धार्थक पदों का प्रयोग लोक में भी होता देखा जाता है, जैसे सुमेरुपर्वत कैसा होगा ? इस प्रकार के कुतूहल को निवृत्त करने के लिए कहा जाता है—आखण्डल ( इन्द्र ) आदि लोक-पाल देवगणों का अधिवास जिस पर है; सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व और अप्सरादिसंज्ञक देवजातियाँ विहरण कर रही हैं जिस पर; ब्रह्म-लोक से अवतीर्ण मन्दाकिनी के धवल जल से प्रक्षालित हैं सुवर्णमय शिला-तल जिसके; नन्दनादि प्रमद-वन में क्रीडा-रत मणिमय पक्षियों के कमनीय कूजन से जो नितान्त मोहक है; ऐसा पर्वत-राज है—सुमेरु । सर्प-भ्रम-जनित भय की निवृत्ति के लिए कहा जाता है—"नैष भुजङ्गो रज्जुरियम्" ।

अन्य पुरुषों में समुत्पन्न सिद्धार्थविषयक ज्ञान की ऊहा भी सम्भव है, क्योंकि श्रोता के मुख पर लहराई हुई हर्ष की रेखाएँ ही श्रोता के हृदय में उठी हर्ष की तरङ्गों का समुन्नयन करा देती हैं, जैसे कि किसी अन्य प्रान्त की भाषा से अनभिज्ञ द्रविड़देश का कोई व्यक्ति अपने नगर में देवदत्त के घर पर पुत्र-जन्म का महोत्सव देख चुका था, किसी ऐसे सन्देशवाहक के साथ देशान्तर के लिए चल पड़ता है, जिसके हाथ में पुत्र-पद-लिप्त केसर की छापवाला वस्त्रोपहार था । अन्य प्रान्त के किसी नगर में अवस्थित देवदत्त के घर पर पहुँचता है । संदेश-वाहक ने देवदत्त के लिए लाया उक्त वस्त्रादि का उपहार देवदत्त के सामने रख कर कहता है—'दिष्ट्या वर्धसे पुत्रस्ते जातः' । सन्देश-वाहक का इतना कहना था कि देवदत्त के अन्दर उठीं हर्ष की उत्ताल तरङ्गं मुख-मण्डल पर लहराने लग जाती है, नेत्र-कमल सहसा खिल उठते हैं । इस पूरे दृश्य को देखकर वह देश भाषानभिज्ञ द्रविड़ देश-वासी व्यक्ति यह सोच लेता है कि यह देवदत्त सन्देश-वाहक के वाक्य को सुनकर जो हर्षविभोर हो गया, अवश्य ही इसके हर्ष का जनक अर्थ इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित है । प्रकृत में पुत्रोत्पत्ति ही हर्ष की जनक है, जो कि इस वाक्य के द्वारा अभिहित है, इस प्रकार लिङादि से अघटित वाक्य भी सिद्धार्थ का बोधक निश्चित हो जाता है । इसी प्रकार भय और शोकादि के जनक उदाहरण भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं । प्रयोजनवत्ता भी कार्यार्थक वाक्यों में ही सीमित होती है—ऐसी

औपनिषदपुरुषविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १५९

त्स्वेवाधिगतः पुरुषोऽसंसारी ब्रह्म, उत्पाद्यादिचतुर्विधद्रव्यविलक्षणः स्वप्रकरण-

भामती

पपन्नः । एवं च ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य परमपुरुषार्थहेतुभाववादनुपदिशतामपि पुरुषप्रवृत्तिनिवृत्तौ वेदान्तानां पुरुषहितानुशासनाच्छास्त्रत्वं सिद्धं भवति । तस्सिद्धमेतद् — विवादाध्यासितानि वचनानि भूतार्थविषयाणि, भूतार्थविषयप्रमाजनकत्वात् , यद्यद्विषयप्रमाजनकं तत्तद्विषयं, यथा रूपादिविषयं चक्षुरादि, तथा चैतानि, तस्मात्तथेति । तस्मात्सुष्ठूक्तं ॐ तन्नोपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वाद् इति ॐ । उपनिपूर्वात्सदेर्विशरणार्थात् क्विप्युपनिषत्पदं व्युत्पादितमुपनीयाद्वयं ब्रह्म सवासनामविद्यां हिनस्तीति ब्रह्मविद्यामाह, तद्धेतुत्वाद्द्वेदान्ता अप्युपनिषदः, तत्र विदित औपनिषदः पुरुषः । एतदेव विभजते ॐ योऽसावुपनिषत्सु इति ॐ । अहम्प्रत्ययविषयाद्भिनत्ति ॐ असंसारी इति ॐ । अत एव क्रियारहितत्वाच्चतुर्विधद्रव्यविलक्षणः । अतश्च चतुर्विधद्रव्यविलक्षणो यदनन्यशेषः । अन्यशेषं हि भूतं द्रव्यं चिकीर्षितं सदुत्पत्त्याद्याप्यं सम्भवति । यथा यूपं तक्षतीत्यादि । यत् पुनरनन्यशेषं भूतभाष्युपयोगरहितं, यथा सुवर्णं भार्य्यं, सक्तून् जुहोतीत्यादि, न तस्योत्पत्त्याद्याप्यता । कस्मात्पुनरस्यानन्यशेषतेत्यत आह ॐ यतः स्वप्रकरणस्थः ॐ ।

भामती-व्याख्या

बात नहीं, अपितु सिद्धार्थक वाक्य भी कुतूहल और भयादि-निवृत्तिरूप प्रयोजन के जनक होने के कारण प्रयोजनवान् होते हैं, अत एव प्रेक्षावान् व्यक्तियों के द्वारा उनका लोक में बहुल प्रयोग किया जाता है । जब कि ब्रह्मस्वरूप ज्ञान में परम पुरुषार्थ की हेतुता निश्चित है, तब उसके बोधक वेदान्त-वाक्यों में भले ही प्रवृत्ति निवृत्ति की जनकता न हो, उनकी प्रामाणिकता और शास्त्ररूपता में सन्देह नहीं रह जाता, क्योंकि वे भी मुमुक्षु पुरुषों का हितानुशासन करते हैं, अतः यह अनुमान पर्यवसित होता है— “विवादाध्यासितानि (“ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति” इत्यादीनि ) सिद्धार्थबोधकानि, सिद्धार्थविषयकप्रमाजनकत्वात् । यद् यद्विषयकप्रमाजनकम् तत् तद्विषयकम्, यथा रूपादिविषयकं चक्षुरादि तथा चैतानि, तस्मात्तथा' । अतः भाष्यकार ने बहुत सुन्दर ही कहा है—'‘तन्न, औपनिषदस्य पुरुषस्यानन्यशेषत्वात्” । 'उप' और 'नि' इन दोनों उपसर्ग पदों के उत्तर ‘षदॢ विशरणगत्यवसादनेषु’ इस धातु से किप् प्रत्यय करके 'उपनिषत्' पद सम्पन्न हुआ है, 'अद्वयं ब्रह्मोपनीय सवासनामविद्यां सादयति हिनस्ती उपनिषत्, इस प्रकार उपनिषत्' पद ब्रह्म-विद्या का वाचक है । उस विद्या के हेतुभूत वेदान्त-वाक्य भी उपनिषत् कहे जाते हैं, उपनिषत्सु विदित इति औपनिषदः पुरुषः । यही “औपनिषद' पद की व्याख्या प्रस्तुत की जा रही है— “योऽसावुपनिषत्स्वेवाधिगतः” । 'अहम्'-इस प्रतीति के विषयीभूत जीव से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए उक्त पुरुष को “असंसारी” कहा गया है । अत एव क्रिया-रहित होने के कारण उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्य से वह विलक्षण है । चतुर्विध द्रव्य से विलक्षण होने के कारण किसी कर्म का शेष ( अङ्ग ) नहीं, किन्तु “अनन्यशेष” है । अन्य-शेष ( कर्म का अङ्गभूत द्रव्य उत्पत्त्यादि में से किसी एक क्रिया के द्वारा चिकीर्षित होकर उत्पाद्यादि चतुर्विध द्रव्यों में अन्यतम ) होता है, जैसे-“यूपं तक्षति” इत्यादि । जो द्रव्य अन्य शेष न होकर अतीत और अनागत क्रिया से रहित होता है, जैसे “सुवर्णं भार्यम्”, “सक्तून् जुहोति”—वह उत्पत्त्यादि क्रियाओं से रहित है । ब्रह्म अनन्यशेष क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर है—“स्वप्रकरणस्थः” । उपनिषद्वाक्य आत्मा के प्रकरण का आरम्भ करके समाम्नात हैं, पौर्वापर्य की आलोचना से यह निश्चित हो जाता है कि उक्त पुरुष तत्त्व स्व-प्रकरणस्थ और प्रधान है । जैसे याग से बाहर जुहू पात्र नहीं होता, अत एव याग का अव्यभिचरित सम्बन्धी होता है, वैसे पुरुष तत्त्व क्रतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी नहीं— यह पहले ही कहा जा चुका है। ऐसा प्रधानभूत पुरुष उपनिषद्वाक्यों से प्रतीयमान है, अतः

१६०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. ४

स्थोऽनन्यशेषः- नासौ नास्ति नाधिगम्यत इति वा शक्यं वदितुम्, 'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृह० ३।९।२६) इत्यात्मशब्दाद् आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वाद्, य

भामती

उपनिषदामनारभ्याधीतानां पौर्वापर्यपर्यालोचनया पुरुषप्रतिपादनपरत्वेन पुरुषस्यैव प्राधान्येनेदं प्रकरणं, न च जुह्वादिवदव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धः पुरुष इत्युपपादितम् । अतः स्वप्रकरणस्थः सोऽयं तथाविध उपनिषद्बुद्धः प्रतीयमानो न नास्तीति शक्यो वक्तुमित्यर्थः ।

स्यादेतत्—मानान्तरागोचरत्वेनागृहीतसङ्गतितयाऽपदार्थस्य ब्रह्मणो वाक्यार्थत्वानुपपत्तेः कथमुपनिषदर्थतेत्यत आह ॐ स एष नेति नेत्यात्मेत्यात्मशब्दात् ॐ । यद्यपि गवाविवन्मानान्तरगोचरत्वमात्मनो नास्ति तथापि प्रकाशात्मन एव सतस्तत्तदुपाधिपरिहाण्या शक्यं वाक्यार्थत्वेन निरूपणं, हाटकस्येव कटककुण्डलादिपरिहाण्या । नहि प्रकाशः स्वसंवेदनो न भासते, नापि तदवच्छेदकः कार्यकारणसङ्घातः । तेन स एष नेति नेत्यात्मेति तत्तदवच्छेदपरिहाण्या बृहत्त्वाद्वापनाच्च स्वयम्प्रकाशः शक्यो वाक्याद् ब्रह्मेति चात्मेति च निरूपयितुमित्यर्थः । अथोपाधिनिरासवदुपहितमप्यात्मरूपं कस्मान्न निरस्यते इत्यत आह ॐ आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात् ॐ । प्रकाशो हि सर्वस्यात्मा तदधिष्ठानत्वाच्च प्रपञ्चविभ्रमस्य, न चाधिष्ठानाभावे विभ्रमो भवितुमर्हति । न हि जातु रज्ज्वभावे रज्ज्वां भुजङ्ग इति वा धारेति वा विभ्रमो दृष्टपूर्वः । अपि चात्मनः प्रकाशस्य भासा प्रपञ्चस्य प्रथा । तथा हि श्रुतिः 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति । न चात्मनः प्रकाशस्य प्रत्याख्याने प्रपञ्चप्रथा युक्ता । तस्मा-


भामती-व्याख्या

'नास्ति'—इस प्रकार उसकी सत्ता का अपलाप नहीं किया जा सकता । ब्रह्म तत्त्व यदि केवल औपनिषद है, तब अन्य किसी प्रत्यक्षादि प्रमाण का विषय न होने के कारण किसी पद की उसमें शक्ति का ज्ञान न हो सकेगा, जो पदार्थ ( पद का शक्यार्थ ) नहीं, वह वेदान्त-वाक्यार्थ क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"स एष नेति-नेति आत्मा" इत्यात्मशब्दप्रयोगात्" । यद्यपि गवादि के समान आत्मा में प्रमाणान्तर-गोचरता नहीं, तथापि पदार्थभूत सोपाधि तत्त्व की उपाधि का निषेध करके वाक्यार्थता का शुद्ध ब्रह्म में सामञ्जस्य वैसे ही किया जा सकता है, जैसे कटक-कुण्डलादि उपाधियों का परिहाण करके सुवर्ण तत्त्व का । अवच्छेदद्यभूत स्वसंवेदनात्त्मक प्रकाश तत्त्व अवभासित नहीं होता—ऐसा नहीं, अपितु अवभासित होता है । उसी प्रकार उसकी अवच्छेदकीभूत शरीर-संघातरूप उपाधि नहीं प्रती। होती—ऐसा भी नहीं, अपितु प्रतीत होती है । फलतः "स एष नेति नेत्यात्मा'—इस प्रकार अवच्छेदकीभूत उपाधियों का निषेध करके ब्रह्म और आत्मा के रूप में निरूपित हो सकता है, क्योंकि वह बृहत् ( व्यापक ) एवं 'सर्वत्र अतति आप्नोति'—ऐसे व्यवहार का विषय है । "नेति नेति" वाक्यों के द्वारा उपाधियों के निषेध के समान उपहित आत्मा का भी निषेध क्यों नहीं माना जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है—"आत्मनश्च प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात्" । उपहित ( उपाधि से उपलक्षित ) प्रकाश तत्त्व सबका आत्मा होने के कारण निषेध्य नहीं हो सकता । अर्थात् आरोप-स्थल पर जैसे रजतादि आरोप्य पदार्थों का निषेध होता है, वैसे अधिष्ठानरूप शुक्ति तत्त्व का निषेध नहीं हो सकता । आत्मप्रकाश तत्त्व सकल अनात्म-भ्रान्ति का अधिष्ठान है, अधिष्ठान के बिना कोई भ्रान्ति हो ही नहीं सकती, रज्जु के अभाव में सर्प या धारादि का विभ्रम कभी नहीं देखा जाता । अपि च आत्म प्रकाश के प्रकाश से ही प्रपञ्च का प्रकाश होता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्" ( कौ. २।५।१५ ) । आत्मप्रकाश का प्रत्याख्यान कर देने पर प्रपञ्च की प्रथा ( प्रतीति ) ही नहीं हो सकती । अतः आत्मा का निषेध सम्भव न हो सकने के कारण वेदान्त-वाक्यों के द्वारा प्रमाणान्तरा-