भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
४२४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३३

वाद् गुणवादः स्यात्, आहोस्वित्प्रमाणान्तराविरोधाद्विद्यमानवाद इति प्रतीतिशरणैर्विद्यमानवाद आश्रयणीयो न गुणवादः। एतेन मन्त्रो व्याख्यातः। अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम्। न हि स्वरूपरहितेन्द्राद्यश्वस्तस्यारोपयितुं शक्यन्ते। नच चेतस्यानारूढायै तस्यै तस्यै देवतायै हविः प्रदातुं शक्यते। श्रावयति च — 'यस्य देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्तां ध्यायेद्वषट्करिष्यन्' (ऐ० ब्रा० ३।८।१) इति। नच शब्दमात्रमर्थस्वरूपं संभवति शब्दार्थयोर्भेदात्। तत्र


भामती

नन्वेवं सत्योदनं भुक्त्वा ग्रामं गच्छतीत्यत्रापि वाक्यभेदप्रसङ्गः। अन्यो हि संसर्ग ओदनं भुङ्क्तेति, अन्यस्तु ग्रामं गच्छतीति। न एकत्र प्रतीतेरपर्यवसानाद्, भुङ्क्तेति हि समानकर्तृकता पूर्वकालता च प्रतीयते। न चेयं प्रतीतिरपरकालक्रियान्तरप्रत्ययमन्तरेण पर्यवस्यति। तस्माद्यावति पदसमूहे पदाहिताः पदार्थस्मृतयः पर्यवस्यन्ति तावदेकं वाक्यम्। अर्थवादवाक्ये चेताः पर्यवस्यन्ति, विनैव विधिवाक्यं विशिष्टार्थप्रतीतेः। न च द्वाभ्यां द्वाभ्यां पदाभ्यां विशिष्टार्थप्रत्ययपर्यवसानात् पञ्चषट्पदवति वाक्ये एकस्मिन्नानात्वप्रसङ्गः। नानात्वेऽपि विशेषणानां विशेष्यस्यैकत्वात्, तस्य च सकृच्छ्रुतस्य प्रधानभूतस्य गुणभूतविशेषणानुरोधेनावर्त्तनायोगात्। प्रधानभेदे तु वाक्यभेद एव। तस्माद्विधिवाक्यादर्थवादवाक्यमन्यदिति वाक्ययोरेव स्वस्ववाक्यार्थप्रत्ययावसितव्यापारयोः पश्चात् कुतश्चिदपेक्षायां परस्परान्वय इति सिद्धम्।


भामती-व्याख्या

शङ्का — विभिन्नार्थ के प्रतिपादक वाक्यों की एकवाक्यता नहीं मानी जाती है, तब 'ओदनं भुक्त्वा ग्रामं गच्छति'— इत्यादि स्थल पर भी वाक्य-भेद होना चाहिए, क्योंकि 'ओदनं भुक्त्वा'— इसका अर्थ अन्य है और 'ग्रामं गच्छति'— इसका अन्य।

समाधान — उक्त स्थल पर एक अर्थ में प्रतीति का पर्यवसान नहीं होता, क्योंकि 'भुक्त्वा'— ऐसा कहने पर दो क्रियाओं की समानकर्तृता और भोजन क्रिया में पूर्वकालता प्रतीत होती है, जैसा कि आचार्य पाणिनि कहते हैं— "समानकर्तृकयोः पूर्वकाले क्त्वा" (पा. सू. ३।४।२१)। अतः यह प्रतीति अन्यकालीन क्रियान्तर की प्रतीति के बिना सम्भव नहीं। फलतः जितने पद-समूह में पदों के द्वारा उपस्थापित पदार्थों की स्मृतियाँ पर्यवसित होती हैं, उतने समूह को एक वाक्य कहते हैं। अर्थवाद वाक्य में उक्त पदार्थ-स्मृतियाँ पर्यवसित हो जाती हैं, क्योंकि विधि-वाक्य के बिना ही विशिष्टार्थ की प्रतीति उपपन्न हो जाती है। 'इस प्रकार तो दो-दो पदों के द्वारा विशिष्टार्थ की प्रतीति पर्यवसित हो जाती है, अतः पाँच-छः पदवाले एक वाक्य में भी नानात्व (वाक्य-भेद) होना चाहिए'— इस आपत्ति का परिहार यह है कि उक्त स्थल पर विशेषणों के अनेक होने पर भी विशेष्य एक ही है। वह प्रधानभूत है, अतः सकृत् श्रुत है, उसकी आवृत्ति गुणीभूत पदार्थों के अनुरोध पर नहीं हो सकती, अपितु 'प्रतिप्रधानं गुणावृत्तिः'— इस न्याय के आधार पर गुण (अङ्ग) रूप पदार्थों की आवृत्ति होती है, [जैसा कि महर्षि जैमिनि का सङ्केत है— "शेषस्य हि परार्थत्वाद् विधानात् प्रतिप्रधानभावः स्यात्" (जै. सू. ११।१।४)। भाष्यकार भी कहते हैं— "न च प्रधानं प्रतिगुणं भिद्यते, प्रतिप्रधानं हि गुणो भिद्यते" (शाबर. पृ. ६६७)। वार्तिककार की भी स्पष्ट उक्ति है—

प्रधानं नीयमानं हि तत्राङ्गान्न्यपकर्षति।
अङ्गमाकृष्यमाणं तु नाङ्गान्तरमसज्जते ॥ (तं. वा. पृ. ४८६) ]

दो प्रधान पदार्थ एक वाक्य के द्वारा प्रतिपादित नहीं होते, क्योंकि प्रधान पदार्थों का भेद होने

देवताया ब्रह्मविद्यायामधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२५


भामती

ॐ अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि इति ॐ । देवतामुद्दिश्य हविरवमृश्य च तद्विषयस्वत्वत्याग इति यागशरीरम् । न च चेतस्यानालिखिता देवतोद्देष्टुं शक्या, न च रूपरहिता चेतसि शक्यते आलेखितुमिति यागविधिनेव तद्रूपापेक्षिणा यावद्गम्यमपरेभ्योऽपि मन्त्रार्थवादेभ्यस्तद्रूपमवगतं तदभ्युपेयते । रूपान्तरकल्पनायां मानाभावात् । मन्त्रार्थवादयोरत्यन्तपरोक्षवृत्तिप्रसङ्गाच्च । यथा हि 'व्रात्यो व्रात्यस्तोमेन यजेत' इति व्रात्यस्वरूपापेक्षायां 'यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत् स व्रात्य' इति सिद्धवद् व्रात्यस्वरूपमवगतं व्रात्यस्तोमविध्यपेक्षितं सद्गिधिप्रमाणकं भवति, यथा वा स्वर्गस्वरूपमलौकिकं स्वर्गकामो यजेतेति विधिनापेक्षितं सदर्थवादतोऽवगम्यमानं विधिप्रमाणकम् , तथा देवतारूपमपि । ननूद्देशो रूपज्ञानमपेक्षते न पुनः रूपसत्तामपि, देवतायाः समारोपेणापि च रूपज्ञानमुपपद्यते इति

भामती-व्याख्या

पर वाक्य-भेद हो ही जाता है। फलतः विधि वाक्य से अर्थवाद वाक्य भिन्न है। विधि और अर्थवादरूप दोनों भिन्न वाक्य अपने-अपने वाक्यार्थों का बोध जब करा चुकते हैं, तब उत्थापित आकाङ्क्षा के द्वारा दोनों का परस्पर अन्वय होता है यह सिद्ध हो गया।

"अपि च विधिभिरेवेन्द्रादिदैवत्यानि हवींषि चोदयद्भिरपेक्षितमिन्द्रादीनां स्वरूपम्"— इस भाष्य का आशय यह है कि देवता के उद्देश्य से द्रव्य (हवि) का निर्देश करते हुए द्रव्यगत स्वत्व का मानस त्याग ही याग कहलाता है। [ "यजतिचोदना द्रव्यदेवताक्रियं समुदाये कृतार्थत्वात्" (जै. सू. ४।२।२७) की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है—"द्रव्यं देवतामुद्दिश्य त्यज्यते, तस्य च क्रिया, यया क्रियया तयोः सम्बन्धो भवति"। वार्तिककार ने याग और होम का स्वरूप बताते हुए कहा है—देवतोद्देशेन स्वत्वत्यागमात्रं यागः, देवतोद्दिश्यत्यज्यमानस्वत्वद्रव्यप्रक्षेपो जुहोतिः" (तं. वा. पृ. ९८१)]। देवता को तभी उद्देश किया जा सकता है, जब कि मन में उसका आलेख (रेखाङ्कन) हो। रूप-रहित पदार्थ का चित्त में आलेख कभी नहीं हो सकता, अतः याग-विधि के द्वारा ही देवता का वह रूप स्वीकृत किया जाता है, जो विधेय-स्तुतिपरक अर्थवाद वाक्यों से अवगत होता है। उससे भिन्न रूपान्तर की कल्पना में कोई प्रमाण नहीं। किसी प्रकार यदि रूपान्तर की कल्पना करते हैं, तब देवता के स्वरूप का रेखाङ्कन करनेवाले मन्त्र और अर्थवाद वाक्य अत्यन्त उपेक्षित और निरर्थक-से हो जाते हैं। जैसे "व्रात्यो वा व्रात्यस्तोमेन यजेत" [अपने कर्मों और संस्कारों से रहित द्विज व्रात्य कहलाता है, उसके लिए प्रायश्चित्त के रूप में व्रात्यस्तोम नाम के एकाह क्रतु का विधान 'लाट्यायन' (८।६), 'ताण्ड्य' (१७।२।१) और 'कात्यायन' (१७।४।१) इत्यादि शास्त्रों में किया गया है। सब व्रात्य चार प्रकार के माने गए हैं—(१) हीनाचार, (२) निन्दित, (३) कनिष्ठ और (४) ज्येष्ठ। व्रात्यस्तोम भी चार ही होते हैं। उनमें से प्रथम स्तोम का अधिकारी हीनाचार, द्वितीय का निन्दित, तृतीय का कनिष्ठ और चतुर्थ का ज्येष्ठ अधिकारी माना जाता है]। इन व्रात्यस्तोमों के विधि वाक्य को अपना कर्म-विधान सम्पन्न करने के लिए "यस्य पिता पितामहो वा सोमं न पिबेत्, स व्रात्यः"—इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित व्रात्य के स्वरूप की अपेक्षा है, अतः उस व्रात्य के स्वरूप में विधि-वाक्य ही मौलिक प्रमाण माना जाता है। अथवा जैसे "स्वर्गकामो यजेत"— इस विधि के द्वारा अलौकिक स्वर्ग-स्वरूप अपेक्षित है। वह किसी अर्थवाद से अवगत होने पर भी विधिप्रमाणक ही माना जाता है। वैसे ही अर्थवादादि से अवगत देवता-स्वरूप भी विधिप्रमाणक ही माना जाता है।

शङ्का—यह जो कहा गया कि यागरूप स्वत्व-त्याग किसी देवता के उद्देश्य से किया

५४

४२६ [ अ. १ पा. ३ सू. ३३

यादृशं मन्त्रार्थवादयोरिन्द्रादीनां स्वरूपमवगतं न तत्तादृशं शब्दप्रमाणकेन प्रत्याख्यातुं युक्तम् । इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण संभवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि साधयितुम् । प्रत्यक्षादिमूलमपि संभवति-भवति ह्यस्माकमप्रत्य- क्षमपि चिरंतनानां प्रत्यक्षम् । तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते । यस्तु ब्रूयादिदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवादिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्य- मिति, स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधेत् । इदानीमिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽ- स्तीति ब्रूयात् । ततश्च राजसूयादिचोदनोपरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरेऽप्य- व्यवस्थितप्रायान्वर्णश्रमधर्मान्प्रतिजानीते । ततश्च व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद्धर्मोत्कर्षवशाच्चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते । अपि च स्मरन्ति- 'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः' (यो० सू० २।४४) इत्यादि ।

भामती

समारोपितमेव रूपं देवतायाः मन्त्रार्थवादैरुच्यते । सत्यं, रूपज्ञानमपेक्षते । तच्चान्यतोऽसम्भवान्मन्त्रार्थ- वादेभ्य एव, तस्य तु रूपस्यासति बाधकेऽनुभवारूढं तथाभावं परित्यज्यान्यथात्वमननुभूयमानमसाम्प्रतं कल्पयितुम् । तस्माद्विध्यपेक्षितमन्त्रार्थवादैरन्यपरेरपि देवतारूपं बुद्धावुपनिधीयमानं विधिप्रमाणकमेवेति युक्तम् । स्यादेतत् - विध्यपेक्षायामन्यपरावपि वाक्यादवगतोऽर्थः स्वीक्रियते, तदपेक्षैव तु नास्ति, शब्द- रूपस्य देवताभावात्, तस्य च मानान्तरवेद्यत्वादित्यत आह ॐ न च शब्दमात्रम् इति ॐ । न केवलं मन्त्रार्थवादतो विग्रहसिद्धिरपि त्वितिहासपुराणलोकस्मरणेभ्यो मन्त्रार्थवादमूलेभ्यो वा प्रत्यक्षादि- मूलेभ्यो वेत्याह ॐ इतिहास इति ॐ । ॐ श्लिष्यते ॐ युज्यते । निगदव्याख्यातमन्यत् । तदेवं मन्त्रार्थ-

भामती-व्याख्या

जाता है, उसके लिए देवता-स्वरूप की अपेक्षा होती है। वहाँ यह शङ्का होती है कि अपेक्षित देवता का स्वरूप वस्तुसत् न होकर भी यदि आरोपित मान लिया जाता है, तब भी देवता के स्वरूप का ज्ञान सम्पन्न हो जाता है, अतः वास्तविक देव-स्वरूप की क्या आवश्यकता ?

समाधान-यह ठीक है कि देवता के रूप-ज्ञान की अपेक्षा है, वह ज्ञान अन्य प्रकार से सम्भव न होकर मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों से उत्पन्न होता है। मन्त्रादि से प्रकाशित देवता के स्वरूप का जब कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता, तब उसे वास्तविक न मान कर आरोपित मानना सर्वथा अनुचित है। इस प्रकार मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों के द्वारा बुद्धि में देव-स्वरूप का जो चित्रण किया जाता है, वह विधिप्रमाणक ही है, अर्थवादादि- प्रमाणक नहीं, क्योंकि अर्थवादादि वाक्यों का तात्पर्य कर्म की प्रशंसा में ही होता है, देवता- स्वरूप-प्रकाशन में नहीं।

यह जो "यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात् तां मनसा ध्यायेत्" (ऐ. ब्रा. ३।८।१)-इस वाक्य में निर्दिष्ट देवता-ध्यान का स्वरूप बताते हुए देवस्वामी ने कहा है-"देवतासम्बन्धिनः शब्दस्यैव ध्येयत्वम्, श्रुतिसमवायात् । आग्नेयम्, ऐन्द्रमित्यादौ श्रुत्यैव देवताप्रतिपादकस्यैव तद्धितेन ध्येयत्वम्, नार्थं (सङ्कर्ष. पृ. २०५) । इससे शब्दात्मक देवता की ही प्रतीति होती है, उसका निराकरण किया जाता है-"न च शब्दमात्रमर्थस्वरूपं सम्भवति, शब्दार्थयो- र्भेदात्"। केवल मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों से ही देवता के विग्रहादि की सिद्धि नहीं होती, अपितु इतिहास, पुराण, लोक-प्रसिद्धि से भी होती है-"इतिहास-पुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सम्भवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि साधयितुम्" । "चिरन्तना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते"। यहाँ 'श्लिष्यते' का अर्थ है-युज्यते । अर्थात् यह जो प्रसिद्धि है कि व्यासादि महर्षियों में योगज धर्म का इतना उत्कर्ष था कि वे देवगणों

देवताया ब्रह्मविद्यायामधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२७

योगोऽप्यणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिफलः स्मर्यमाणो न शक्यते साहसमात्रेण प्रत्याख्यातुम्। श्रुतिश्च योगमाहात्म्यं प्रख्यापयति—‘पृथिव्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते। न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्’ (श्वे० २।१२) इति । ऋषीणामपि मन्त्रब्राह्मणदर्शिनां सामर्थ्यं नास्मदीयेन सामर्थ्येनोपमातुं युक्तम्। तस्मात्समूलमितिहासपुराणम्। लोकप्रसिद्धिरपि न सति संभवे निरालम्बनाऽध्यवसातुं युक्ता। तस्मादुपपन्नो मन्त्रादिभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमः। ततश्चार्थित्वादिसंभवादुपपन्नो देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामधिकारः। क्रममुक्तिदर्शना-न्यप्येवमेवोपपद्यन्ते ॥ ३३ ॥


भामती

वादादिसिद्धे देवताविग्रहादौ गुर्वादिपूजावद् देवतापूजात्मको यागो देवताप्रसादाद्वाऽद्वारेण सफलोऽवकल्पते अचेतनस्य तु पूजामप्रतिपाद्यमानस्य तदनुपपत्तिः। न चैवं यज्ञकर्मणो देवतां प्रति गुणभावाद् देवतात् फलोत्पादे यागभावनायाः श्रुतं फलवत्त्वं यागस्य च तां प्रति तत्फलांशं वा प्रति श्रुतं करणत्वं हातव्यम्। यागभावनाया एव हि फलवत्या यागलक्षणस्वकरणावान्तरव्यापारत्वाद् देवताभोजनप्रसादादीनां


भामती-व्याख्या

के साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे। वह अत्यन्त युक्ति-संगत है। शेष भाष्य अत्यन्त सुबोध है।

इस प्रकार मन्त्र और अर्थवादादि के द्वारा देवता के विग्रहादि-पञ्चक की सिद्धि हो जाने पर गुरु आदि के समान ही देवताओं की विधिवत् जो पूजा की जाती है वही याग है। उससे देवगण प्रसन्न होकर यजमान को फल देते हैं। शब्दात्मक जड़ देवता की पूजा से वह सफलता उपपन्न नहीं हो सकती।

शङ्का— यदि देवता अपनी यागरूप पूजा से प्रसन्न होकर फल देता है, तब देवता प्रधान और पूजारूप याग अङ्ग (गौण) हो जाता है, अतः ‘यजेत स्वर्गकामः’—यहाँ यागकरणक भावना में जो फल-वत्त्व एवं याग में उस भावना या स्वर्गादि फल का जो करणत्व श्रुत है, वह बाधित हो जाता है [क्योंकि यजिधातुरूप प्रकृति का अर्थ याग और ‘त’ प्रत्यय का भाट्टमतानुसार अर्थ भावना किया जाता है। कृतिरूप भावना में याग करण और स्वर्गादिफल साध्य या कर्म मान कर यागकरणक स्वर्गादिसाध्यक भावना या यागेन स्वर्गं भावयेत्—ऐसा शाब्द बोध किया जाता है, उसके अनुसार भावना में स्वर्गादि-जनकत्वरूप करणत्व एवं याग में उस भावना या स्वर्गादि को करणता पर्यवसित होती है। देवताओं को स्वर्ग का दाता मान लेने पर वह सब असंगत हो जाता है]।

समाधान— [जैसे ‘कुठारेण काष्ठं छिन्द्यात्’—यहाँ पर काष्ठ-छेदनरूप कार्य की करणता या प्रधानता अवगत होती है, करणत्व का अर्थ होता है—जनकत्व, जनकत्व का लक्षण है—अव्यवहितपूर्ववृत्तित्व । यद्यपि कुठार और काष्ठ-छेदन के मध्य में उद्यमन-निपातनरूप व्यापार का व्यवधान आ जाने से कुठार में काष्ठ-छेदन का अव्यवहितपूर्ववृत्तित्व नहीं रहता, तथापि व्यापार को व्यवधायक नहीं माना जाता, क्योंकि सव्यापार कुठारादि में ही करणता मानी जाती है, अतः व्यापार-युक्त कुठारादि में कार्याव्यवहितपूर्ववृत्तित्व होना चाहिए, वह प्रकृत में उपपन्न हो जाता है। वैसे ही] स्वर्गादि की करणता भावना में और भावना की करणता याग में श्रुत है। स्वर्गोत्पत्ति और भावना के मध्य में परमापूर्व एवं भावना और याग के मध्य में देवता-प्रसन्नतादि का व्यवधान रहने पर भी न तो भावनागत स्वर्गादि-जनकत्वरूप करणता समाप्त होती है और न यागगत भावना-जनकत्वरूप प्रधानता ।

४२८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३४

( ९ अपशूद्राधिकरणम् । सू० ३४—३८ )

शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात्सूच्यते हि ॥ ३४ ॥

यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य देवादीनामपि विद्यास्वधिकार उक्तस्तथैव द्विजात्यधिकारनियमस्यापवादेन शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादित्येतामाशङ्कां निवर्तयितुमिदमधिकरणमारभ्यते । तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यादिति तावत्प्राप्तम्, अर्थित्वसामर्थ्ययोः संभवात्, 'तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः' ( तै० सं० ७।१।१।६ ) इतिवत् 'शूद्रो

भामती

कृषिकर्मण इव तत्तदवान्तरव्यापारस्य सस्याधिगमसाधनत्वम् । आग्नेयादीनामिवोत्पत्तिपरमापूर्वावान्तरव्यापाराणां भवन्मते स्वर्गसाधनत्वम् । तस्मात् कर्मणोऽपूर्वावान्तरव्यापारस्य वा देवताप्रसादावान्तरव्यापारस्य वा फलवत्त्वात् प्रधानत्वमुभयस्मिन्नपि पक्षे समानम्, न तु देवताया विग्रहादिमत्त्वात् प्राधान्यमिति न धर्ममीमांसायाः सूत्रमपि वा शब्दपूर्वत्वाद्यज्ञकर्म प्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिरिति विरुध्यते । तस्मात्सिद्धो देवतानां प्रायेण ब्रह्मविद्यास्वधिकारः ॥ ३३ ॥

अवान्तरसङ्गतिं कुर्वन्नधिकरणतात्पर्यमाह ॐ यथा मनुष्याधिकार इति ॐ । शङ्काबीजमाह ॐ तत्र इति ॐ । निर्मृष्टनिखिलदुःखानुषङ्गे शाश्वतिक आनन्दे कस्य नाम चेतनस्यार्थिता नास्ति, येनार्थिताया अभावाच्छूद्रो नाधिक्रियेत । नाप्यस्य ब्रह्मज्ञाने सामर्थ्याभावः । द्विविधं हि सामर्थ्यं निजं चागन्तुकं च । तत्र द्विजातीनामिव शूद्राणां श्रवणादिसामर्थ्यं निजमप्रतिहतम् । अध्ययनाधानाभावादाग-

भामती-व्याख्या

जैसे कृषिरूप कर्म और हलाकर्षणादि अवान्तर व्यापार के द्वारा सस्याधिगम ( अन्नोत्पत्ति ) का जनक होता है अथवा जैसे आप ( मीमांसकों ) के मत में दर्शपूर्णमाससंज्ञक आग्नेयादि छः कर्म उत्पत्ति अपूर्व और परमापूर्व के द्वारा स्वर्गरूप फल के जनक माने जाते हैं। वैसे ही हमारे ( वेदान्तियों के ) मत में यागरूप कर्म देवता-प्रसन्नता के द्वारा अपने फल का साधन माना जाता है, फलतः दोनों मतों में कर्म की फलोत्पादकता और प्रधानता समानरूप से सुरक्षित है, देवता की प्रधानता यहाँ भी नहीं मानी जाती, अतः पूर्व मीमांसा के "अपि वा शब्दपूर्वत्वाद यज्ञकर्म प्रधानं गुणत्वे देवताश्रुतिः" ( जै. सू. ९।१।९ ) इस सूत्र का किसी प्रकार का भी विरोध उपस्थित नहीं होता । [ "देवता वा प्रयोजयेदतिथिवद् भोजनस्य तदर्थत्वात्" ( जै. सू. ६।१।१६ ) इस सूत्र के द्वारा देवता को कर्म का प्रयोजक मान कर प्रधानता देने की आशङ्का उठाई गई, उसका निराकरण करते हुए सूत्रकार ने कहा—"अपि वा शब्दपूर्वत्वाद यज्ञकर्म प्रधानं स्याद् गुणत्वे देवताश्रुति"। अर्थात् "यजेत स्वर्गकामः"—इस शब्द के द्वारा याग को ही स्वर्गरूप फल का जनक अत एव प्रधान माना गया है, देवतादि अन्य पदार्थ उसी कर्म के अङ्ग या गुण माने जाते हैं। इस सिद्धान्त का विरोध यहाँ तब होता, जब कि देवता को फल का जनक एवं प्रधान माना जाता ]। यहाँ तो केवल इतना सिद्ध किया जाता है कि देवताओं का विशुद्ध ब्रह्म-विद्या में पूर्ण अधिकार है ॥ ३३ ॥

संगति— पूर्वाधिकरण से इस अधिकरण की संगति दिखाते हुए इस अधिकरण का प्रयोजन प्रस्तुत किया जाता है—"यथा मनुष्याधिकारनियममपोद्य"।

पूर्वपक्ष— ब्रह्म-विद्या में शूद्रों का अधिकार है—"तत्र शूद्रस्याप्यधिकारः स्यात्" । दुःख का सम्बन्ध जिसमें लेशमात्र भी नहीं, ऐसे विशुद्ध शाश्वतिक आनन्द की कामना किस चेतन पुरुष को नहीं होती ? यदि वह शूद्र में न होती, तब अवश्य ब्रह्मविद्या के अधिकार से शूद्र

ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४२९

विद्यायामनवक्लृप्तः' इति च निषेधाश्रवणात्। यच्च कर्मस्वनधिकारकारणं शूद्रस्या- नग्नित्वं, न तद्विद्यास्वधिकारस्यापवादकं लिङ्गम्। न ह्याहवनीयादिरहितेन विद्या

भामती

न्तुकसामर्थ्याभावे सत्यनधिकार इति चेत्, हन्ताधानाभावे सत्यग्न्यभावादग्निसाध्ये कर्मणि मा भूदधि- कारः, न च ब्रह्मविद्यायामग्निः साधनमिति किमित्यनाहिताग्नयो नाधिक्रियन्ते ? न चाध्ययनाभावात- त्साधनायामनधिकारो ब्रह्मविद्यायामिति साम्प्रतम्, यतो युक्तं यदाहवनीये जुहोत्याहवनीयस्य होमाधि- करणतया विधानात्तद्रूपस्यालौकिकत्यानारभ्याधीतवाक्यविहितादाधानदन्यतोऽनधिगमादाधानस्य च द्विजा- तिसम्बन्धितया विधानात् । तत्साध्योऽग्निरलौकिको न शूद्रस्यास्तीति नाहवनीयादिसाध्ये कर्मणि शूद्रस्या- धिकार इति । न च तथा ब्रह्मविद्यायामलोकिकमस्ति साधनं यच्छूद्रस्य न स्यात् । अध्ययननियम इति चेत् । न, विकल्पासहत्वात्—तदध्ययनं पुरुषार्थं वा नियम्येत, यथा धनार्जने प्रतिग्रहादि । क्रत्वर्थं वा, यथा व्रीहीनवहन्तीत्यवघातः । न तावत् क्रत्वर्थं, नहि स्वाध्यायोऽध्येतव्य इति कञ्चित् क्रतुं प्रकृत्य

भामती-व्याख्या

को वञ्चित रहना पड़ता। शूद्र में ब्रह्म-ज्ञान का सामर्थ्य नहीं—यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि सामर्थ्य दो प्रकार का होता है—(१) स्वाभाविक और (२) आगन्तुक (यत्न-साध्य) । श्रवणादि की स्वाभाविक शक्ति शूद्रों में भी वैसी ही हैं, जैसे द्विजाति में। ‘अध्ययन-साध्य वेद-ग्रहणादि की आगन्तुक शक्ति न होने के कारण शूद्रों को ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं’— ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि गुरुमुखाच्चारणानुच्चारणरूप अध्ययन को शक्ति भी स्वाभाविक है, केवल अग्न्याधान के द्वारा अग्निमत्ता नहीं, अतः शूद्र को अग्नि-साध्य यागादि कर्मों में अधिकार न दिया जाय, किन्तु ब्रह्मविद्या में अग्नि का कोई अपेक्षा नहीं, अतः जिन्होंने अग्नि का आधान नहीं किया, ऐसे शूद्रों का ब्रह्म-विद्या में अधिकार क्यों नहीं ? “यदाहवनीये जुहोति” (तं. ब्रा. १।१।१०।५) यह वाक्य होमाधिकरणत्वेन अग्नि का विधान करता है, अतः समस्त कर्मकाण्ड में अनाहिताग्नि का अधिकार नहीं—यह तो ठीक है, क्योंकि यह अग्नि लौकिक अग्नि न होकर दृष्टादृष्ट संस्कारात्मक अलौकिक अग्नि है एवं अनारभ्याधीत [किसी एक कर्म के प्रकरण में पठित न होकर सामान्यतः विहित] होने के कारण समस्त कर्मों का अङ्ग है, [जैसा कि भाष्यकार कहते हैं— “सर्वकर्मार्थं वाधानम्। सर्वकर्मार्थं यदग्नि- द्रव्यम्” (शाबर. पृ. १०३८)। वार्तिककार भी कहते हैं— “अनारभ्यवादेनाहवनीयः सर्व- होमार्थ इति तद्रहितकर्मान्तराभावादाहिताग्नेरधिकारः” (तं. वा. पृ. ७९८) ]। आधान कर्म का विधान भी तीन वर्णों के लिए ही किया गया है—"वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, ग्रीष्मे राजन्यः, शरदि वैश्यः” (तै. ब्रा. १।१।२।६।७)। इस प्रकार कर्म-कलाप में शूद्र का अधिकार न होने पर भी ब्रह्मविद्या में किसी प्रकार का वैसा अलोकिक पदार्थ अपेक्षित नहीं कि उसमें शूद्र को अधिकार न होता ।

शङ्का—विधिपूर्वक अध्ययन में त्रैवर्णिक का ही अधिकार है और अध्ययन के विना वेदार्थ-ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि 'अध्ययनेनैवार्थज्ञानं भावयेत्'—इस प्रकार नियम स्वीकार किया जाता है, नियम-जन्य अपूर्व भी वेदार्थानुष्ठान का अङ्ग माना जाता है, शूद्र अध्ययन नहीं कर सकता, अतः वह अध्ययन के नियम से जनित अपूर्व से वञ्चित होने के कारण किसी भी वेदार्थ के अनुष्ठान का अधिकारी नहीं माना जा सकता ।

समाधान—उक्त नियम का आकार क्या (१) अध्ययनेनैव पुरुषार्थं भवेत्—ऐसा है ? अथवा (२) अध्ययनेनैव यागानुष्ठानं भावयेत्—ऐसा ? जैसे “व्रीहीनवहन्ति”—यहाँ पर अवघातेनैव वैतुष्यं भावयेत्—ऐसा नियम माना जाता है, उस नियम से जन्य अदृष्ट के विना

४३०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३४

वेदितुं न शक्यते। भवति च लिङ्गं शूद्राधिकारस्योपोद्वलकम्। संवर्गविद्यायां हि

भामती

पठ्यते, यथा दर्शपूर्णमासं प्रकृत्य व्रीहीनवहन्तीति । न चानारभ्याधीतमप्यव्यभिचरितं क्रतुसम्बन्धितया क्रतुमुपस्थापयति, येन वाक्येनेव क्रतुना सम्बध्येताध्ययनं, न हि यथा जुह्वाद्यव्यभिचरितक्रतुसम्बद्धमेवं स्वाध्याय इति। तस्मान्नैव क्रत्वर्थे नियमो नापि पुरुषार्थे । पुरुषेच्छाधीनप्रवृत्तिर्हि पुरुषार्थो भवति, यथा फलं तदुपायो वा । तदुपायेऽपि हि विधितः प्राक् सामान्यरूपा प्रवृत्तिः पुरुषेच्छानिबन्धनेव। इतिकर्तव्यतासु तु सामान्यतो विशेषतश्च प्रवृत्तिर्विधिपराधीनंव। नह्यनधिगतकरणभेद इतिकर्तव्यतासु घटते । तस्माद्विध्यधीनप्रवृत्तितायज्ञानां क्रत्वर्थता । क्रतुरिति हि विधिविषयेण विधि परामृशति विषयिणम् । तेनाथंते विषयीक्रियत इति क्रत्वर्थः । न चाध्ययनं वा स्वाध्यायो वा तदर्थज्ञानं वा प्राग् विधेः पुरुषेच्छाधीनप्रवृत्तियेन पुरुषार्थः स्यात् । यदि चाध्ययनेनैवार्थोवबोधरूपं नियम्येत ततो मानान्तरविरोधः । तद्रूपस्य विनाप्यध्ययनं पुस्तकादिपाठनाप्यधिगमात् । तस्मात्सुवर्णं भार्यमितिवदध्ययनादेश्च फलं कल्पनीयम् । तथा चाध्ययनविधेरनियमकरवाच्छूद्रस्याध्ययनेन वा पुस्तकादिपाठेन वा सामर्थ्यमस्तीति सोऽपि ब्रह्मविद्यायामधिकृतः । मा भूद्धाऽध्ययनाभावात्सर्वत्र ब्रह्मविद्यायामधिकारः, संवर्गविद्यायां तु

भामती-व्याख्या

प्रकृत (दर्शपूर्णमास) कर्म सम्पन्न नहीं होता, क्योंकि "व्रीहीनवहन्ति"-यह वाक्य दर्शपूर्णमास के प्रकरण में पठित है, किन्तु "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" (शत. ब्रा. ११।५।६) यह वाक्य किसी क्रतु के प्रकरण में पठित न होने के कारण किसी ऋतु के लिए अध्ययन का नियम नहीं करा सकता। अनारभ्याधीत अध्ययन भी सामान्यतः ऋतु का उपस्थापक हो सकता था, यदि उसका क्रतु के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध होता, किन्तु "यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति" (तै. सं. ३।५।७।२) यहाँ जुहू अनारभ्याधीत होने पर भी ऋतु का अव्यभिचरित सम्बन्धी होने कारण क्रतु का जैसे उपस्थापक है, वैसा अध्ययन नहीं।

पुरुषार्थ में भी अध्ययन का नियम नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'पुरुषार्थ' शब्द से वही पदार्थ अभिहित होता है, जिसमें पुरुष की अपनी इच्छा से प्रवृत्ति हो, जैसे—स्वर्गादि फल और उसका साधन यागादि। यागादिरूप साधन में विधि से पूर्व पुरुष की सामान्यतः प्रवृत्ति होती है। यागादि साधन पदार्थ के इतिकर्तव्यभूत (प्रयाजादि अङ्ग-कलापरूप सहायक) व्यापार में तो प्रवृत्ति विधि के पूर्व नहीं, अपितु विधि के अधीन ही होती है, क्योंकि किस व्यापार का कौन साधन (करण) है—इस प्रकार का विशेष ज्ञान जब तक न हो, तब तक इतिकर्तव्य में प्रवृत्ति नहीं होती, वह विशेष ज्ञान विधि वाक्य से ही होता है। अतः अङ्गभूत पदार्थों में विधितः प्रवृत्ति होने के कारण क्रत्वर्थता मानी जाती है। 'क्रत्वर्थता' पद में ऋतु (याग) अपनी विधि का विषय है, अतः विधि के विषयीभूत अङ्ग-कलापरूप विषयों का उपलक्षक है, उसके लिए जो अभ्यर्थित हो, उसे क्रत्वर्थ कहते हैं। अध्ययन या स्वाध्याय अथवा अर्थ-ज्ञान—इनमें से कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं, जिसमें विधि के पूर्व अपनी इच्छा से पुरुष की प्रवृत्ति होती हो, जिससे कि वह पुरुषार्थ कहा जा सके। यदि "अध्ययनेनैवार्थज्ञानं भावयेत्"—ऐसा नियम माना जाता है, तब प्रमाणान्तर से विरोध आता है, क्योंकि वेदार्थ का ज्ञान विधिपूर्वक अध्ययन के बिना अपने-आप पुस्तकों के पढ़ने से भी उपपन्न हो जाता है। फलतः "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस विधि को नियम विधि न मान कर "सुवर्णं भार्यम्" (तै. ब्रा. २।२।४।५) इस विधि के समान अपूर्व विधि मान कर अध्ययन के द्वारा ही अर्थज्ञान-रूप फल की कल्पना करनी होगी। अध्ययन (गुरुमुखोच्चारणानुच्चारण) का स्वाभाविक सामर्थ्य तो शूद्र में भी है, अतः ब्रह्मविद्या में उसका अधिकार क्यों न होगा ?

ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३१

जानश्रुतिं पौत्रायणं शुश्रूषुं शूद्रशब्देन परामृशति—'अह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु' (छा० ४।२।३) इति। विदुरप्रभृतयश्च शूद्रायोनिप्रभवा अपि विशिष्ट-विज्ञानसंपन्नाः स्मर्यन्ते। तस्मादधिक्रियते शूद्रो विद्यास्विति। एवं प्राप्ते ब्रूमः—न शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात्। अधीतवेदो हि विदितवेदार्थो वेदार्थेष्वधिक्रियते। न च शूद्रस्य वेदाध्ययनमस्ति, उपनयनपूर्वकत्वादध्ययनस्य। उपनयनस्य

भामती

भविष्यति। अह हारेत्वा शूद्र इति शूद्रं सम्बोध्य तस्याः प्रवृत्तेः। न चैष शूद्रशब्दः कदाचिदवयवव्युत्पत्त्याऽशूद्रे वर्णनीयः। अवयवप्रसिद्धितः समुदायप्रसिद्धेरनपेक्षतया बलीयस्त्वात्। तस्माद्यथाऽनधीयानस्येष्टौ निषादस्थपतेरधिकारो वचनसामर्थ्यादेवं संवर्गविद्यायां शूद्रस्याधिकारो भविष्यतीति प्राप्तम्।

एवं प्राप्ते ब्रूमः—न शूद्रस्याधिकारो वेदाध्ययनाभावादिति। अयमभिसन्धिः—यद्यपि स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्यध्ययनविधिर्न किञ्चित्फलवत्कर्माभ्याम्नातः, नाप्यव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धपदार्थंगतः, न हि जुह्वादिवत्स्वाध्यायोऽव्यभिचरितक्रतुसम्बन्धस्तथापि स्वाध्यायस्याध्ययनसंस्कारविधिरध्ययनस्यापेक्षितोपायतामवगमयन् किं पिण्डपितृयज्ञवत् स्वर्गं वा सुवर्णं भार्यमितिवदार्थवादिकं वा फलं कल्पयित्वा विनियोगभङ्गेन स्वाध्यायेनाधीयीतेत्येवमर्थः कल्पतां ? किंवा परम्परयाऽध्यय्यतोऽपेक्षितमधिगम्य निर्वृणोत्विति विषये, न दृष्टद्वारेण परम्परयाऽध्यय्यतोऽपेक्षितप्रतिलम्भे च यथाश्रुतविनियोगोपत्तौ च सम्भवन्त्यां श्रुतविनियोगभङ्गेनाध्ययनादेवाश्रुतादृष्टफलकल्पनोचिता। दृष्टश्च स्वाध्यायाध्ययनसंस्कारस्तेन हि पुरुषेण

भामती-व्याख्या

यदि अध्ययन न होने के कारण सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्या में शूद्र का अधिकार नहीं, तब "वायुर्वाव संवर्गः" (छां. ४।३।१) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित संवर्ग-विद्या में अधिकार अवश्य होना चाहिए, क्योंकि वहाँ "अह हारेत्वा शूद्र ! तवैव सह गोभिरस्तु" (छां. ४।२।३) इस प्रकार रैक्वाचार्य ने जानश्रुति को 'शूद्र' शब्द से सम्बोधित करके कहा है कि 'हे शूद्र ! ये सब 'रथ, काञ्चनमय हार एवं गौएँ तू अपने पास ही रख। यह 'शूद्र' शब्द जो 'शुचा द्रवति'—इत्यादि अवयवार्थ के द्वारा क्षत्रियादि वर्णों का बोधक माना जाता है, वह उचित नहीं, क्योंकि अवयव-शक्ति की अपेक्षा समुदाय (रूढ़) शक्ति प्रबल होती है। फलतः जैसे निषाद-स्थपति को अध्ययनादि के विना ही इष्टि-विशेष में विशेष वचन के आधार पर अधिकार है, वैसे ही संवर्ग-विद्या में शूद्र का अधिकार माना जायगा।

सिद्धान्त—उक्त पूर्व-पक्ष का खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न शूद्रस्याधिकारः, वेदाध्ययनाभावात्"। आशय यह है कि यद्यपि "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—यह अध्ययन-विधि न तो किसी फल के साधनीभूत कर्म के प्रकरण में अधीत है और न अध्ययन का कर्म के साथ अव्यभिचरित सम्बन्ध ही है। तथापि यहाँ एक यह संशय उपस्थित होता है कि क्या यह स्वाध्याय (अपनी शाखा) के अध्ययनरूप संस्कार का विधायक वाक्य अध्ययन में इष्ट-साधनता का बोध कराता हुआ पिण्डपितृयज्ञ अथवा स्वर्ण-धारण-विधि के समान अर्थवाद-प्रतिपादित स्वर्गादि फलों की कल्पना करके अध्ययनेन स्वाध्यायः संस्कार्यः'—ऐसा विनियोग भङ्ग करते हुए 'स्वाध्यायेनाधीयीत'—इस प्रकार के साध्य-साधनभाव का गमक माना जाय ? अथवा परम्परा या अन्य युक्तियों के द्वारा अवगत पदार्थ को ही अपना कर निराकाङ्क्ष हो जाय ? अक्षरावाप्ति पदार्थ-व्युत्पत्त्यादि परम्परा के द्वारा पदार्थ-ज्ञानरूप दृष्ट फल का लाभ जब अध्ययन से हो जाता है, तब अध्ययन का स्वर्गादिरूप अदृष्ट फल नहीं माना जा सकता एवं जब "अध्ययनेन स्वाध्यायं भावयेत्"—ऐसा यथाश्रुत साध्य-साधनभाव उपपन्न हो जाता है, तब इस विनियोग का भङ्ग करना भी उचित नहीं। अध्ययन-संस्कार दृष्टफलक इसलिए है

४३२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३४

च वर्णत्रयविषयत्वात्। यत्त्वर्थित्वं न तदसति सामर्थ्येऽधिकारकारणं भवति। सामर्थ्यमपि न लौकिकं केवलमधिकारकारणं भवति, शास्त्रीयेऽर्थे शास्त्रीयस्य सामर्थ्यस्यापेक्षितत्वात्, शास्त्रीयस्य च सामर्थ्यस्याध्ययननिराकरणेन निराकृतत्वात्। यच्चेदं 'शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः' इति 'तन्न्यायपूर्वकत्वाद्विद्यायामप्यनवक्लृप्तत्वं द्योतयति,

भामती

सम्प्राप्यते प्राप्तश्च फलवत्कर्मब्रह्मावबोधमभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनमुपजनयति, न तु सुवर्णधारणादौ दृष्टद्वारेण परम्परयाप्यस्त्यपेक्षितं पुरुषस्य, तस्माद्विपरिवृत्त्य साक्षाद्धारणादेव विनियोगभङ्गेन फलं कल्प्यते । यदा चाध्ययनसंस्कृतेन स्वाध्यायेन फलवत्कर्मब्रह्मावबोधो भाव्यमानोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजन इति स्थापितं तदा यस्याध्ययनं तस्यैव कर्मब्रह्मावबोधोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनो नान्यस्य, यस्य चोपनयनसंस्कारस्तस्यैवाध्ययनं, स च द्विजातीनामेवेत्युपनयनाभावेनाध्ययनसंस्काराभावात् पुस्तकादिपठितस्वाध्यायजन्योऽर्थावबोधः शूद्राणां न फलाय कल्पत इति शास्त्रीयसामर्थ्याभावान्न शूद्रो ब्रह्मविद्यायामधिकृत इति सिद्धम् ।

यज्ञेऽनवक्लृप्तःइति यज्ञग्रहणमुपलक्षणार्थम् । विद्यायामप्यनवक्लृप्त इत्यपि द्रष्टव्यम् ।

भामती-व्याख्या

कि उसके द्वारा पुरुष की अपनी शाखा प्राप्त होती है । [(१) उत्पत्ति, (२) विकृति, (३) संस्कृति और (४) आप्ति—इन चार प्रकारों के जनक कर्म संस्कार कर्म हैं—जैसे आधान संस्कार से अग्नि की उत्पत्ति, अवघात से व्रीहि की विकृति होती है और प्रोक्षण कर्म से व्रीहि संस्कृत होते हैं। वैसे ही अध्ययन संस्कार से स्वाध्याय (अपनी शाखा) की आप्ति (प्राप्ति या कण्ठस्थता) होती है]। प्राप्त स्वाध्याय अभ्युदय के हेतुभूत कर्म (धर्म) के ज्ञान और निःश्रेयस के साधनीभूत ब्रह्म-ज्ञान को जन्म देता है। सुवर्ण-धारणादि कर्म किसी दृष्ट फल के द्वारा पुरुषार्थ का उत्पादन परम्परा भी नहीं करते, अतः 'धारणेन सुवर्णं भावयेत्' ऐसा यथाश्रुत विनियोग भङ्ग करके 'सुवर्णधारणेन भ्रातृव्यस्य दुर्वर्णत्वं भावयेत्'—ऐसा साध्य-साधनभाव माना जाता है, किन्तु प्रकृत में उसकी कोई आवश्यकता नहीं [ "सुवर्णं हिरण्यं भार्यम्" तस्माद् दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवति" (तै. ब्रा. २।२।४।६) इस वाक्य के विषय में सन्देह किया गया है कि इस वाक्य के द्वारा विहित सुवर्ण-धारण क्या क्रत्वर्थ है? अथवा पुरुषार्थ? सिद्धान्त-सूत्र है—"अप्रकरणे तु तद्धर्मस्ततो विशेषात्" (जै. सू. ३।४।२०)। अर्थात् उक्त वाक्य किसी कर्म के प्रकरण में नहीं अप्रकरण-पठित (अनारभ्याधीत) है, अतः कर्म के प्रकरण में पठित वाक्य की अपेक्षा इस अनारभ्याधीत वाक्य का यह अन्तर है कि इसके द्वारा विहित सुवर्ण-धारण क्रत्वर्थ नहीं, अपितु पुरुषार्थ है, फलतः आर्थवादिक भ्रातृव्य (शत्रु) की दुर्वर्णता ही सुवर्ण-धारण का फल है, जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"तस्माद् दुर्वर्णोऽस्य भ्रातृव्यो भवतीत्येवमादिना एवंजातीयकानां फलेन सम्बन्धः" (शाबर. पृ. ९५५)]।

जब कि 'अध्ययन के द्वारा संस्कृत (प्राप्त) स्वाध्याय अभ्युदयफलक कर्मावबोध और निःश्रेयसफलक ब्रह्मावबोध का साधन है'—ऐसा स्थापित (निर्णीत) हो गया, तब जिस व्यक्ति ने अध्ययन किया है, उसी को अभ्युदयार्थक कर्मावबोध और निःश्रेयसार्थक ब्रह्मावबोध होगा, अन्य को नहीं। अध्ययन वही कर सकता है, जिसका उपनयनसंस्कार हो गया हो, उपनयन संस्कार केवल त्रैवर्णिक पुरुषों का ही विहित है, अतः उपनयन और अध्ययन से वञ्चित शूद्रों को जो अपने-आप पुस्तकादि के पढ़ लेने मात्र से अर्थावबोध होता है, वह अभीष्ट फल नहीं दे सकता। इस प्रकार आगन्तुक शास्त्रीय सामर्थ्य न होने के कारण शूद्र ब्रह्म-विद्या का अधिकारी नहीं माना जा सकता—यह सिद्ध हो गया।

ब्रह्मविद्यायां शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३३

न्यायस्य साधारणत्वात् । यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे, न तल्लिङ्गं, न्यायाभावात् । न्यायोक्ते हि लिङ्गदर्शनं द्योतकं भवति । न चात्र न्यायोऽस्ति । कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात्, तद्विषयत्वात्, न

भामती

सिद्धवदभिधानस्य न्यायपूर्वकत्वात् न्यायस्य चोभयत्र साम्यात् । द्वितीयं पूर्वपक्षमनुभाषते ॐ यत् पुनः संवर्गविद्यायाम् इति ॐ । दूषयति ॐ न तल्लिङ्गम् ॐ । कुतः ? ॐ न्यायाभावात् ॐ । न तावच्छूद्रः संवर्गविद्यायां साक्षाच्चोद्यते : यथैतया निषादस्थपतिं याजयेदिति निषादस्थपतिः किन्तु अर्थवादवगतोऽयं शूद्रशब्दः स चान्यतः सिद्धमर्थमवद्योतयति न तु प्रापयतीत्यध्वरमीमांसकाः । अस्माकं त्वन्यपरादपि वाक्यादसति बाधके प्रमाणान्तरेणार्थोऽवगम्यमानो विधिना चापेक्षितः स्वीक्रियत एव । न्यायश्चास्मिन्नर्थे उक्तो बाधकः । न च विध्यपेक्षाऽस्ति, द्विजात्यधिकारप्रतिलम्भेन विधेः पर्यवसानात् । विध्युद्देशगतत्वे त्वयं न्यायोऽपोद्यते वचनबलान्निषादस्थपतिवन्न त्वेष विध्युद्देशगत इत्युक्तम् । तस्मान्नार्थवादमात्राच्छूद्राधिकारसिद्धिरिति भावः । अपि च किमर्थवादबलाद्विद्यामात्रेऽधिकारः शूद्रस्य कल्प्यतां संवर्गविद्यायां वा ? न तावद्विद्यामात्र इत्याह ॐ कामं चायम् इति ॐ । न हि संवर्गविद्यायामर्थवादः श्रुतो विद्यामात्रेऽधिका-

भामती-व्याख्या

“तस्माच्छूद्रो यज्ञेऽनबक्लृप्तः (असमर्थः)” (तै. सं. ७।१।१।६) इस वाक्य में ‘यज्ञ’ शब्द ब्रह्म-विद्या का भी उपलक्षक है, अतः ‘ब्रह्मविद्यायामनवक्लृप्तः’—ऐसा निषेध-वाक्य भी सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि शूद्र की यज्ञानवक्लृप्ति का नियामक जो हेतु है—सामर्थ्याभाव, वह कर्म-विद्या और ब्रह्म-विद्या—दोनों में समान है ।

द्वितीय पूर्वपक्ष का अनुवाद किया जा रहा है—“यत्पुनः संवर्गविद्यायां शूद्रशब्दश्रवणं लिङ्गं मन्यसे”। इस पूर्व पक्ष का भी खण्डन किया जाता है—“न तल्लिङ्गम्, न्यायाभावात्”। दृष्टान्त-साधक युक्ति का दार्ष्टान्त में अभाव है, क्योंकि निषादस्थपति-इष्टि में निषादस्थपति का “एतया निषादस्थपतिं याजयेत्” (मै. सं. २।२।४) इस विधि के द्वारा साक्षात् विधान किया गया है [ “वास्तुमध्ये रौद्रं चरुं निर्वपेद्, यत्र रुद्रः प्रजाः शमयेत्”—इस वाक्य के द्वारा विहित रौद्र इष्टि के प्रकरण में कहा गया है—“एतया निषादस्थपतिं याजयेत्”। “स्थपतिर्निषादः स्यात्, शब्दसामर्थ्यात्” (जै. सू. ६।१।५१) इस सूत्र के द्वारा सिद्धान्त स्थापित किया गया है कि निषाद नाम की शूद्र जाति का स्थपति (राजमिस्त्री) उस इष्टि का अधिकारी है ] । संवर्ग-विद्या के प्रकरण में किसी शूद्र का विधि वाक्य प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता, किन्तु अर्थवाद वाक्य में ‘शूद्र’ शब्द आया है । वह अन्य प्रमाण से ज्ञात पदार्थ का अवद्योतनमात्र (अनुवादमात्र) करता है, अज्ञात-ज्ञापक या विधायक नहीं—ऐसा धर्म-मीमांसकों का मत है । हमारा (ब्रह्म-मीमांसकों का) यह कहना है कि अन्यार्थक वाक्य के द्वारा अवगत वह पदार्थ भी विधि वाक्य के द्वारा स्वीकृत होता है, जिसका कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो । प्रकृत में वैसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि विधि-वाक्य द्विजातिरूप अधिकारियों को लेकर पर्यवसित हो जाता है । यदि साक्षात् विधि वाक्य में ‘शूद्र’ शब्द का उल्लेख होता, तब प्रत्यक्ष वचन के द्वारा निसर्ग-सिद्ध द्विजाति के अधिकार का अपवाद हो सकता था किन्तु वैसा प्रकृत में कोई वाक्य उपलब्ध नहीं, केवल एक अर्थवाद के आधार पर शूद्राधिकार की सिद्धि नहीं हो सकती ।

यह भी यहाँ जिज्ञासा होती है कि उक्त अर्थवाद के बल पर समस्त विद्याओं में शूद्राधिकार की कल्पना की जाती है? अथवा केवल संवर्ग-विद्या में? प्रथम कल्प का निरास किया जाता है—“कामं चायं शूद्रशब्दः संवर्गविद्यायामेवैकस्यां शूद्रमधिकुर्यात्, तद्विषयत्वात्,

५५

४३४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. सू. ३४

सर्वासु विद्यासु। अर्थवादस्थत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते। शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम्। कथमित्युच्यते? 'कंवर एनमेतत्‌सन्तं सयुग्वान-

भामती

रिणमुपनयति, अतिप्रसङ्गात्। अस्तु तर्हि संवर्गविद्यायामेव शूद्रस्याधिकार इत्यत आह ॐ अर्थवादस्थत्वाद् इति ॐ। तत्किमेतच्छूद्रपदं प्रमत्तगीतं, न चैतद् युक्तं तुल्यं हि साम्प्रदायिकमित्यत आह। ॐ शक्यते चायं शूद्रशब्द इति ॐ। एवं किलात्रोपाख्यायते- जानश्रुतिः पौत्रायणो बहुदायी श्रद्धादेयो बहुपाक्यः प्रियातिथिर्बभूव। स च तेषु तेषु ग्रामनगरशृङ्गाटरेषु विविधानामन्नपानानां पूर्णानितिथिम्य आवसथान् कारयामास। सर्वत एत्येतेष्वावसथेषु ममान्नपानमर्थिन उपयोग्क्ष्यन्त इति। अथास्य राज्ञो दानशौण्डस्य गुणगरिमसन्तोषिताः सन्तो देवर्षयो हंसरूपमास्थाय तदनुग्रहाय तस्य निदाघसमये दोषा हर्म्यतलस्थस्योपरि मालामाबध्याजग्मुस्तेषामग्रेसरं हंसं सम्बोध्य पृष्ठतो व्रजन्नेकतमो हंसः साद्भुतमभ्युवाच। भल्लाक्ष! भल्लाक्ष! जानश्रुतेरस्य पौत्रायणस्य द्युलोक आयतं ज्योतिस्तन्मा प्रसाङ्क्षीर्मैतस्त्वा धाक्षीदिति। तमेवमुक्तवन्तमग्रगामी हंसः प्रत्युवाच--कं वर! एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ। अयमर्थः-वर इति सोपहासमवरमाह। अथवा वरो वराकोऽयं जानश्रुतिः। कमित्याक्षेपे, यस्मादयं वराकस्तस्मात्कमेनं किम्भूतमैतत् सन्तं प्राणिमात्रं रैक्वमिव सयुग्वानमात्थ। युग्वा गन्त्री शकटी तया सह

भामती-व्याख्या

न सर्वासु विद्यासु”। उक्त अर्थवाद वाक्य केवल संवर्ग-विद्या में श्रुत है, अतः समस्त विद्याओं में अधिकार का प्रयोजक नहीं हो सकता, अन्यथा अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है। वस्तुतः उक्त वाक्य अर्थवाद होने के कारण संवर्ग-विद्या में भी शूद्राधिकार का विधायक नहीं हो सकता—“अर्थवादत्वात्तु न क्वचिदप्ययं शूद्रमधिकर्तुमुत्सहते।” यहाँ ‘शूद्र’ शब्द यदि किसी विद्या में भी शूद्र के अधिकार का नियामक नहीं हो सकता, तब क्या यह निरर्थक और प्रमत्त-गीतमात्र है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है—‘शक्यते चायं शूद्रशब्दोऽधिकृतविषयो योजयितुम्’। छान्दोग्योपनिषत् में ऐसा उपाख्यान आया है कि पुत्रनाम के राजा का पौत्र और जनश्रुति का पुत्र जानश्रुति राजा था, जो ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दान एवं अतिथियों का भोजनादि से पूर्ण सत्कार किया करता था। उसने अपने राज्य के नगरों और गाँवों के चौराहों पर अतिथियों के लिए विविध अन्न-पानादि से परिपूर्ण धर्मशालाएं बनवाई थीं। अन्न-पानार्थी सभी ओर से आकर उन धर्मशालाओं में अन्न-पानादि का पूर्ण उपयोग किया करते थे। उस दानवीर राजा के सद्गुणों से सन्तुष्ट होकर देवता और ऋषिगण हंसों का रूप धारण कर राजा को अनुगृहीत करने के लिए जब वह गर्मियों के समय रात्रि में अपने महल की खुली छत पर सो रहा था, तब आकाश मार्ग से ऊपर-ऊपर उड़ते जा रहे थे। उन हंसों की पंक्ति के आगे उड़नेवाले हंस को पीछे उड़नेवाले हंस ने कहा भो भल्लाक्ष ! [‘भल्लाक्ष’ शब्द का मूल शब्द है-भद्राक्ष, जिसका अर्थ होता है—स्वस्थनेत्रवाला। यहाँ कटाक्षपूर्ण उक्ति या विपरीत-लक्षणा से अन्धे व्यक्ति का बोधक है, इस प्रकार अग्रगामी हंस को पृष्ठगामी हंस कहता कि हे अन्धे ! ] सामने यह जो द्युलोक को छूता हुआ ज्योतिःस्तम्भ दिखाई दे रहा है, यह महाराज जानश्रुति का यशःपुञ्ज है, इसके बीच से मत निकलना नहीं तो भस्मीभूत हो जाओगे। इसके उत्तर में अग्रगामी हंस ने पृष्ठगामी हंस को कहा—‘कंवर ! एनमेतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति” [ ‘वर’ शब्द भी ‘भल्लाक्ष’ शब्द के समान कटाक्षपूर्ण सम्बोधन या विपरीत-लक्षणा के द्वारा अवर या ‘नीच’ अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अग्रगामी हंस पृष्ठगामी को वैसा ही उत्तर देता है कि ‘हे नीच हंस !] किस ऐसे साधारण राजा की बात करता है? तूने क्या इसे शकट (बैलगाड़ी) पर चलनेवाला

ब्रह्मज्ञाने शूद्रानधिकारः ] | हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् | ४३५

मिव रैकमात्थ' ( छा० ४।१।३ ) इत्यस्माद्धंसवाक्यादात्मनोऽनादरं श्रुतवतो जानश्रुतेः पौत्रायणस्य शुगुत्पेदे, तामृषी रैकः शूद्रशब्देनानेन सूचयां बभूवात्मनः परोक्षज्ञताख्या-

भामती

वर्तत इति सयुग्वा रैकवस्तमिव कमेनं प्राणिमात्रं जानश्रुतिमात्थ । रैकवस्य हि ज्योतिरसहानं न त्वेतस्य प्राणिमात्रस्य । तस्य हि भगवतः पुण्यज्ञानसम्पन्नस्य रैकवस्य ब्रह्मविदो धर्मे त्रैलोक्योदरवर्तिप्राणभृन्मात्रधर्मोऽन्तर्भवति न पुनारैकवधर्मकक्षां कस्यचिद्धर्मोऽवगाहत इति । अथैष हंसवचनादात्मनोऽत्यन्तनिकर्षमुत्कर्षकाष्ठां च रैकवस्योपश्रुत्य विषण्णमानसो जानश्रुतिः कितव इवाक्षपराजितः पौनःपुन्येन निःश्वसन्नुद्वेलं कथमपि निशीथमतिवाहयाम्बभूव । ततो निशान्तपिशुनमनुभूतवन्दारुवृन्दप्रारब्धस्तुतिसहस्रसंवलितं मङ्गलतूर्यनिर्घोषमाकर्ण्य तल्पतलस्थ एव राजेकपदे यन्तारमाहूयाविवेश-वयस्य रैकवाह्वयं ब्रह्मविद्वमेकरतिं सयुग्वानमतिविविक्तेषु तेषु येषु विपिननगनिकुञ्जनदीपुलिनादिप्रदेशेष्वन्विष्य प्रयत्नतोऽस्मभ्यमाचक्ष्वेति । स च तत्रान्विष्यन् क्वचिदतिविविक्ते देशे शकटस्याधस्तात् पामानं कण्डूयमानं ब्राह्मणायनमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा च रैक्वोऽयं भवितेति प्रतिभावानुपविश्य सविनयमप्राक्षीत् त्वमसि हे भगवन् सयुग्वा रैकव इति । तस्य च रैकवभावानुमतिं च तेस्तेरिङ्गतैर्ज्ञातेर्गाहस्थ्येच्छां धनायां चोन्नीय यन्ता राज्ञे निवेदयामास । राजा तु तं निशम्य गवां षट्शतानि निष्कं च हारं चाश्वतरीरथं चादाय सत्वरं रैकवं प्रतिचक्रमे । गत्वा चाभ्युवाव हे रैकव गवां षट्शतानीमानि निष्कञ्च हारश्चायमश्वतरीरथ एतदादत्स्व, अनुशाधि मां भगवन्निति । अथैवमुक्तवन्तं प्रति साटोपं च सस्पृहं चोवाच रैकवः—अह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिर-

भामती-व्याख्या

महातेजस्वी रैक ऋषि समझ लिया है ? यह रैक कैसे हो सकता है ? कहाँ वह ब्रह्मवेत्ताओं का आदर्श महापुरुष पुण्यात्मा महात्मा रैकव और कहाँ यह एक साधारण राजा ? वस्तुतः आज महर्षि रैकव के यशः सूर्य की एक रश्मि की भी बराबरी किसी का यशःपुञ्ज नहीं कर सकता। अग्रगामी हंस की उक्ति के द्वारा जानश्रुति ने अपना अपकर्ष और रैकव का उत्कर्ष सुना, असह्य आघात से जानश्रुति का मन आहत हो गया, रातभर, नींद नहीं आई, बड़े-बड़े निःश्वासों और फूत्कारों के साथ करवटें बदल-बदल कर किसी प्रकार रात बिताई । रात बीतने की सूचना देनेवाले बन्दी और चारणगणों के द्वारा उच्चारित विरुदावलियों के घोष से मिश्रित प्रभाती स्वर-लहरियों को सुन कर राजा ने विस्तरे पर बैठे-ही-बैठे एकदम सारथी या धावक को बुलाकर आदेश दिया कि मित्रवर ! रैकव नाम के शकट-धारी (बैलगाड़ीवाले) ब्रह्म-वेत्ता को वन की सघन झाड़ियों, पर्वत-कन्दराओं, नदी के बालुकामय आदि एकान्त प्रान्तों में खोज कर हमें बताओ । सारथि ने खोजते-खोजते देखा कि एक व्यक्ति निर्जन स्थान पर बैलगाड़ी के नीचे बैठा अपने शरीर की खाज खुजाता है । उस ब्राह्मण को देखा 'यही रैकव होगा'—ऐसी सम्भावना कर के सारथि ने बैठ कर विनयपूर्वक पूछा—हे भगवन् ! शकटधारी रैकव आप ही हैं ? प्रश्नोत्तर एवं चिह्न-चक्रों से यही, रैकव है'—ऐसा जान लिया और प्रसङ्गतः यह भी जानकारी प्राप्त कर ली कि रैकव की गृहस्थ बनने की लालसा एवं धनाया [ “अशनायोदन्यधनायाबुभुक्षापिपासागधेषु” ( पा. सू. ७।४।३४ ) इस सूत्र के द्वारा निष्पन्न 'धनाया' शब्द का अर्थ—धनिक बनने की इच्छा ] है । सारथि ने अपनी यह समस्त जानकारी महाराज को दे दी । राजा ने वह सब सुना और छः सौ गौएँ, एक निष्क ( सोने का कण्ठा ), एक मोतियों का हार, खच्चर-जुता रथ —यह भेंट-पूजा की सामग्री लेकर रैकव की ओर प्रस्थान किया । वहाँ पहुँच कर रंकव से प्रार्थना की—हे रैकव ! ये छः सौ गौएँ, एक निष्क, एक हार और खच्चरवाही रथ आप स्वीकार करें और हमें ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश करें । रैकव ने उत्तर दिया— “अह हारेत्वा शूद्र ! तवैव सह गोभिरस्त्विति”

४३६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३४

पनायेति गम्यते, जातिशूद्रस्यानधिकारात् । कथं पुनः शूद्रशब्देन शुगुत्पन्ना सूच्यत इति ? उच्यते—तदाद्रवणात् । शुचमभिदुद्राव, शुचा वाऽभिदुद्रुवे, शुचा वा रैक-मभिदुद्रावेति शूद्रः, अवयवार्थसंभवादूढार्थस्य चासंभवात् । दृश्यते चायमर्थोऽस्यामा-ख्यायिकायाम् ॥ ३४ ॥

भामती

स्त्विति । अहेति निपातः साटोपमामन्त्रणे । हारेण युक्ता इत्वा गन्त्री रथो हारेत्वा गोभिः सह तवैवास्तु किमेतन्मात्रेण मम धनेनाकल्पवर्तिनो गार्हस्थ्यस्य निर्वाहानुपयोगिनेति भावः । अहर् त्वेति तु पाठोऽन-र्थकतया च गोभिः सहेत्यत्र प्रतिसम्बन्ध्यनुपादानेन चाचार्यैर्दूषितः । तदस्यामाख्यायिकायां शक्यः शूद्रशब्देन जानश्रुती राजन्योऽप्यवयवव्युत्पत्त्या वक्तुं, स हि रैकवः परोक्षज्ञतां चिख्यापयिषुरातमनो जान-श्रुतेः शूद्रेति शुचं सूचयामास । ❖ कथं पुनः शूद्रशब्देन शुगुत्पन्ना सूच्यत इति ❖ । उच्यते ? ❖तदाद्रव-णात्❖ । तद्व्याचष्टे ❖शुचमभिदुद्राव❖ जानश्रुतिः । शुचं प्राप्तवानित्यर्थः । ❖ शुचा वा ❖ जानश्रुतिः । ❖दुद्रुवे❖ शुचा प्राप्त इत्यर्थः । अथवा शुचा रैकवं जानश्रुतिर्दुद्राव, गतवान् । तस्मात्तदाद्रवणादिति तच्छ-ब्देन शुग्वा जानश्रुतिर्वा रैक्वो वा परामृश्यत इत्युक्तम् ॥ ३४ ॥

भामती-व्याख्या

( छां. ४।१।३ ) । अर्थात् हे शोकातुर राजन् ! यह निष्कादि समस्त सामग्री आप के पास ही रहे । यहाँ 'अह' शब्द गर्वपूर्वक सम्बोधन में प्रयुक्त हुआ है । हारेत्वा ( 'हारेण युक्ता इत्वा इत्वरी' अर्थात् हारादि के साथ यह रथ और गौएँ हम ( जानश्रुति ) इनको लेकर क्या करेंगे ? गृहस्थ जीवन का निर्वाह इतने से नहीं हो सकता । उक्त श्रुति-वाक्य में जो कहीं 'अहरेत्वा'—ऐसा पाठ उपलब्ध होता है । वहाँ यद्यपि 'अह' और 'रे' दोनों पद सम्बोधनार्थ-कत्वेन सार्थक हैं, तथापि 'त्वा' पद अनर्थक होने के कारण उक्त श्रुति-वाक्य के भाष्य में भाष्यकार के द्वारा निरस्त कर दिया गया है। दूसरी बात यह भी है कि 'गोभिः'—यह पद भी प्रतिसम्बन्धी का ग्रहण न होने से साकांक्ष रह जाता है और जब वहाँ 'अह हारेत्वा'—ऐसा पाठ मानकर रथार्थक स्त्रीलिङ्ग 'इत्वा' पद का छेद किया जाता है, तब 'गोभिः सह इत्वा तवैव'—ऐसा अन्वय सम्पन्न हो जाने से 'गोभिः' पद साकाङ्क्ष भी नहीं रह जाता । [ इस समय उक्त श्रुति-वाक्य के उस भाष्य की आनुपूर्वी ऐसी उपलब्ध होती है—"अहेत्ययं निपातो विनिग्रहार्थीयोऽन्यत्र इह त्वनर्थकः, एवशब्दस्य पृथक्प्रयोगात्" ( छां. भा. पृ. २०२ ) । अर्थात् 'अह' शब्द तिरस्कारपूर्वक सम्बोधन में अन्यत्र प्रयुक्त होकर सार्थक माना जाता है, किन्तु यहाँ वह अनर्थक है, क्योंकि रैकव ने जो कह दिया है—तवैव । वहाँ एवकार के प्रयोग से ही जानश्रुति का तिरस्कार सिद्ध हो जाता है ] ।

इस उपाख्यान में यद्यपि जानश्रुति क्षत्रिय है, तथापि अवयवार्थ को लेकर 'शूद्र' शब्द के द्वारा अभिहित किया जा सकता है, क्योंकि वह रैकव अपनी परोक्षज्ञता को प्रकट करने के लिए जानश्रुति के शोक की सूचना 'शूद्र' पद के द्वारा देता है । जानश्रुति के हृदय में उत्पन्न शोक 'शूद्र' पद के द्वारा कैसे सूचित होता है ? इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है—"तदाद्रव-णात्" । उसकी व्याख्या है—"शुचमभिदुद्राव जानश्रुतिः" । अभिदुद्राव का अर्थ है—प्राप्तवान् । या 'शुचा दुद्रुवे जानश्रुतिः' अर्थात् शोक के द्वारा अभिभूत हुआ । अथवा 'शुचा दुद्राव' शोक-सन्तप्त जानश्रुति रैकव की शरण में गया । इस प्रकार सूत्रकार ने "तदाद्रवणात्"—यहाँ 'तत्' पद के द्वारा शुक् ( शोक ) या जानश्रुति अथवा रैकव का ग्रहण किया है । [ "शुचेर्दश्च" ( उणा. २।१९ ) इस सूत्र के द्वारा 'शुच शोके' धातु से 'रक्' प्रत्यय, चकार को दकार का आदेश एवं उकार को दीर्घ करने पर 'शूद्र' शब्द की निष्पत्ति पाणिनि ने मानी है, जिसका

ब्रह्मज्ञाने शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३७

क्षत्रियत्वगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ ३५ ॥

इतश्च न जातिशूद्रो जानश्रुतिः । यत्कारणं प्रकरणनिरूपणेन क्षत्रियत्वमस्योत्तरत्र चैत्ररथेनाभिप्रतारिणा क्षत्रियेण समभिव्याहाराल्लिङ्गादवगम्यते । उत्तरत्र हि संवर्गविद्यावाक्यशेषे चैत्ररथिरभिप्रतारी क्षत्रियः संकीर्त्यते—'अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारो बिभिक्षे' ( छा० ४।३।५ ) इति । चैत्ररथित्वं चाभिप्रतारिणः कापेययोगादवगन्तव्यम् । कापेययोगो हि चित्ररथस्यावगतः 'एतेन वै चित्ररथं कापेया अयाजयन्' ( ताण्ड्यब्रा० २०।१२।५ ) इति । समानान्वयानां च प्रायेण समानान्वया याजका भवन्ति । 'तस्माच्चैत्ररथिर्नामैकः क्षत्रपति-

भामती

❀ इतश्च न जातिशूद्रो जानश्रुतिः यत्कारणं ❀ प्रकरणनिरूपणे क्रियमाणे क्षत्रियत्वमस्य जानश्रुतेरवगम्यते । चैत्ररथेन लिङ्गादिति व्याचक्षाणः प्रकरणं निरूपयति ❀ उत्तरत्र ❀ संवर्गविद्यावाक्यशेषे । चैत्ररथेनाभिप्रतारिणा निश्चितक्षत्रियत्वेन समानायां संवर्गविद्यायां समभिव्याहाराल्लिङ्गात् सन्दिग्धक्षत्रियभावो जानश्रुतिः क्षत्रियो निश्चीयते । अथ ह शौनकञ्च कापेयमभिप्रतारिणञ्च काक्षसेनिं सूदेन परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारो बिभिक्ष इति प्रसिद्धयाजकत्वेन कापेयेनाभिप्रतारिणो योगः प्रतीयते । ब्रह्मचारिभिक्षया चास्याशूद्रत्वमवगम्यते । नहि जातु ब्रह्मचारो शूद्रान्नं भिक्षते । याजकेन च कापेयेन योगाद्ब्राह्मण्योऽभिप्रतारी । क्षत्रियत्वं चास्य चैत्ररथित्वात् । तस्माच्चैत्ररथिनामैकः क्षत्रपतिरजायतेति वचनात् । चैत्ररथित्वं चास्य कापेयेन याजकेन योगात् । ❀ एतेन वै चित्ररथं कापेया अयाजयन्निति ❀ छन्दोगानां द्विरात्रे श्रूयते । तेन चित्ररथस्य याजकाः कापेयाः । एष चाभिप्रतारो चित्ररथादन्यः सन्नेव

भामती-व्याख्या

अर्थ है—शोचक या शोक-कर्त्ता । श्री रामानुजाचार्य ने यही व्युत्पत्ति अपनाई है, किन्तु सूत्रकार का आशय वैसा नहीं प्रतीत होता, क्योंकि 'तदाद्रवण' शब्द के द्वारा जो 'शुचाद्रवण' सूचित किया गया है, उसके अनुसार 'तमाद्रवणम्' और 'तेनाद्रवणम्'—ये दो प्रकार सम्भव है । 'तेन'—यह तृतीया कर्त्ता और करण में हो सकती है, इस प्रकार सब तीन रूप सम्पन्न होते हैं—(१) शोकमादुद्राव ( प्राप्तवान् ) जानश्रुतिः, (२) शुचा कर्जा दुद्रुवे ( प्राप्तः) जानश्रुतिः और (३) शुचा करणेन रैकवं दुद्राव ( प्राप्तवान् ) जानश्रुतिः । अर्थात् शोककर्मक, या शोककर्त्तक अथवा शोककरणक आद्रवण के निमित्त से जानश्रुति को शूद्र कह दिया गया है ]। यहाँ कर्म कारक प्रथम प्रकार में शोक, द्वितीय प्रकार में जानश्रुति और तृतीय प्रकार में रैकव है, अतः 'तं प्रति'—इस अर्थ के द्योतक 'तत्' पद के द्वारा इन्हीं तीनों का ग्रहण किया गया है ॥ ३४ ॥

इस कारण से भी जानश्रुति जातितः शूद्र नहीं सिद्ध होता, कि प्रकरण के आधार पर जानश्रुति में चित्ररथ के समभिव्याहार से क्षत्रियत्व सिद्ध होता है । संवर्ग-विद्या के अन्त में प्रसङ्ग आया है कि—"अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी विभिक्षे" (छां. ४।३।५ ) अर्थात् जब शौनक-पुत्र कापेय और कक्षसेन के पुत्र अभिप्रतारी ये दोनों एक साथ भोजन करने बैठे थे, उनके लिए अन्न परोसा जा रहा था, तब एक ब्रह्मचारी ने भिक्षा माँगी । अभिप्रतारी चैत्ररथ के वंश का था, "एतेन वै चित्ररथं कापेया अयाजयन्" (ताण्ड्य. ब्रा. २०।१२।५) । अर्थात् इस द्विरात्र यज्ञ का कापेय गणों ने चैत्ररथ से अनुष्ठान कराया । कापेय याजक और चैत्ररथ यजमान था । यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि कोई ब्रह्मचारी शूद्र से भिक्षा नहीं माँग सकता, अभिप्रतारी क्षत्रिय था, क्योंकि उसके लिए कहा गया है—"तस्माच्चैत्ररथी नामैकः क्षत्रपतिरजायत" । अभिप्रतारी चैत्ररथी

४३८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३६

रजयत' इति च क्षत्रपतित्वावगमात्क्षत्रियत्वमस्यावगन्तव्यम् । तेन क्षत्रियेणाभिप्रतारिणा सह समानायां विद्यायां संकीर्तनं जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वं सूचयति । समानानामेव हि प्रायेण समभिव्याहारा भवन्ति । क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाच्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः । अतो न शूद्रस्याधिकारः ॥ ३५ ॥

संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ॥ ३६ ॥

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यद्विद्याप्रदेशेषूपनयनादयः संस्काराः परामृश्यन्ते -- 'तं होपनिन्ये' (श० ब्रा० ११।५।३।१३) । 'अधीहि भगव इति होपससाद' (छा० ७।१।१) 'ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः' (प्र० १।१) इति च । 'तान्हानुपनीयैव'


भामती

कापेयानां याज्यो भवति यदि चैत्ररथः स्यात्, समानान्वयानां हि प्रायेण समानान्वया याजका भवन्ति । तस्माच्चैत्ररथत्वादभिप्रतारी काक्षसेनिः क्षत्रियः । तत्समभिव्याहाराच्च जानश्रुतिः क्षत्रियः सम्भाव्यते । इतश्च क्षत्रियो जानश्रुतिरित्याह ॐ क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाच्च ॐ । क्षत्तृप्रेषणे चार्थसम्भारे च तादृशि तस्य वदान्यप्रकृष्टस्यैश्वर्यं प्रायेण क्षत्रियस्य दृष्टं युधिष्ठिरादिवदिति ॥ ३५ ॥

न केवलमुपनीताध्ययनविधिपरामर्शन न शूद्रस्याधिकारः किन्तु तेषु तेषु विद्योपदेशप्रदेशेषूपनयनसंस्कारपरामर्शात् शूद्रस्य तदभावाभिधानाद् ब्रह्मविद्यायामनधिकार इति । नन्वनुपनीतस्यापि ब्रह्मोपदेशः श्रूयते तान् हानुपनीयैवेति । तथा शूद्रस्यानुपनीतस्यैवाधिकारो भविष्यतीत्यत आह ॐ तान् हानुपनीयै-


भामती-व्याख्या

था—यह बात इसके याजक कापेय के सम्बन्ध से अवगत होती है, क्योंकि याजकगण प्रायः अपने समान वंशवालों को यजन कराते हैं। यह अभिप्रतारी चित्ररथ से अन्य होकर ही कापेयगणों का यजमान हो सकता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि अभिप्रतारी चैत्ररथी होने के कारण क्षत्रिय था। इसका सम्बन्ध जिस संवर्ग-विद्या से जोड़ा गया है, उसी विद्या से जानश्रुति भी जुड़ा हुआ है। इस प्रकार समभिव्याहाररूप लिङ्ग (सामर्थ्य) प्रमाण के द्वारा जानश्रुति का क्षत्रिय होना निश्चित होता है। केवल इतने से ही नहीं, क्षत्ता (अपने सारथि) को रैक्य के अन्वेषण के लिए भेजता है, युधिष्ठिर के समान सैकड़ों गौएँ, काञ्चन और मणिमय हारों का दान करता है, अतः निश्चितरूप से जानश्रुति क्षत्रिय था—"क्षत्तृप्रेषणाद्यैश्वर्ययोगाच्च जानश्रुतेः क्षत्रियत्वावगतिः"। फलतः जानश्रुति को 'शूद्र' शब्द गौणी वृत्ति (शोकवत्त्वरूप गुण के सम्बन्ध) से ही कह सकता है, मुख्य वृत्ति से नहीं कि वैदिक विद्या में शूद्र का अधिकार सिद्ध हो जाता ॥ ३५ ॥

"अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत तमध्यापयीत"—इत्यादि वाक्यों से सूचित उपनीत व्यक्ति के अध्ययन-विधान का परामर्श ही शूद्राधिकार का विरोधी नहीं, अपितु अनेकत्र ब्रह्म-विद्या के उपदेश-प्रदेशों में उपनयनादि संस्कारों का परामर्श किया गया है, वे संस्कार शूद्र के होते नहीं, अतः ब्रह्म-विद्या में शूद्र का अधिकार नहीं—"इतश्च न शूद्रस्याधिकारः, यद् विद्याप्रदेशेषूपनयनादयः संकाराः परामृश्यन्ते—'तं होपनिन्ये" (शत. ब्रा. ११।३।१३), "अधीहि भगव इति होपससाद" (छां. ७।१।१)। तम् उपनिन्ये (उपनीतवान्) यहाँ उपनयन और 'अधीहि भगव'--यहाँ अध्ययनाध्यापन का उल्लेख किया गया है, क्योंकि 'अधीहि'—इस मन्त्र-पद से विवक्षित है—अध्यापय।

शङ्का—उपनयन संस्कार से रहित व्यक्ति को भी ब्रह्म-विद्या का उपदेश किया गया है—"तान् हानुपनीयैवैतदुवाच" (छां. ५।११।७) अर्थात् महाराज अश्वपति ने प्राचीन-

ब्रह्मज्ञाने शूद्रानधिकारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४३९

( छा० ५।११।७ ) इत्यपि प्रदर्शितैवोपनयनप्राप्तिर्भवति। शूद्रस्य संस्काराभावोऽभिलप्यते, 'शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजातिः' ( मनु० १०।४ ) इत्येकजातित्वस्मरणात्। 'न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति' (मनु० १०।१२६) इत्यादिभिश्च ॥ ३६ ॥

तदभावनिर्धारणे च प्रवृत्तेः ॥ ३७ ॥

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः । यत्सत्यवचनेन शूद्रत्वाभावे निर्धारिते जाबालं गौतम उपनेतुमनुशासितुं च प्रववृते, 'नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहरोपत्वा नेष्ये न सत्यादगाः' (छा० ४।४।५) इति श्रुतिलिङ्गात् ॥ ३७ ॥

भामती

वेत्यपि प्रदर्शितैवोपनयनप्राप्तिः ॐ । प्राप्तिपूर्वकत्वात् प्रतिषेधस्य येषामुपनेयनं प्राप्तं तेषामेव तन्निषिध्यते। तच्च द्विजातीनामिति द्विजातय एव निषिद्धोपनयना अधिक्रियन्ते न शूद्र इति ॥ ३६ ॥

सत्यकामो ह वै जाबालः प्रमीतपितृकः स्वां मातरं जवालामपृच्छत् । अहमाचार्यकुले ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि, तद् ब्रवीतु भवती किङ्गोत्रोऽहमिति । साऽब्रवीत् — त्वज्जनकपरिचरणपरतया नाहमज्ञासिषं यद्गोत्रं तवेति । स त्वाचार्यं गौतममुपससाद । उपसद्योवाच — हे भगवन् ब्रह्मचर्यमुपेयां त्वयीति । स होवाच, नाविज्ञातगोत्र उपनीयत इति किङ्गोत्रोऽसीति । अथोवाच सत्यकामो नाहं वेद स्वं गोत्रं, स्वां मातरं जबालामपृच्छं, सापि न वेदेति । तदुपश्रुत्याभ्यधाद् गौतमः — नाद्विजन्मन आर्जवं युक्तमीदृशं वचस्तेनास्मिंश्च शूद्रत्वसम्भावनास्तीति त्वां द्विजातिजन्मानमुपनेष्य इत्युपनेतुमनुशासितुं च जाबालं गौतमः प्रवृत्तः । तेनापि शूद्रस्य नाधिकार इति विज्ञायते ॐ न सत्यादगाः इति ॐ । न सत्यमतिक्रान्तवानसीति ॥ ३७ ॥

भामती-व्याख्या

शालादि ऋषियों का उपनयन किए बिना ही उन्हें वैश्वानर-विद्या का उपदेश किया। उसी प्रकार उपनयन संस्कार-रहित शूद्र का भी ब्रह्म-विद्या में अधिकार मानना होगा।

समाधान—महाशालादि ब्राह्मण थे, अतः उनका उपनयन प्राप्त था, किन्तु उनकी अपेक्षा राजा की जाति हीन थी, अतः हीन जाति के द्वारा उच्च जाति का उपनयन निषिद्ध माना गया। शूद्र का उपनयन प्राप्त ही नहीं कि उसका निषेध होता, निषेध सदैव प्राप्तिपूर्वक ही होता है। यदि शूद्र का उपनयन प्रसक्त होता, तब भी उसका वहाँ निषेध नहीं होता, क्योंकि शूद्र की अपेक्षा क्षत्रिय जाति हीन नहीं, उन्नत मानी गई है। फलतः ब्रह्म-विद्या में यदि अनुपनीत का अधिकार है, तो द्विजाति का ही, शूद्र का नहीं ॥ ३६ ॥

छान्दोग्य उपनिषत् (४।४।१) में एक उपाख्यान आता है कि सत्यकाम नाम का एक बालक था, उसके पिता का देहान्त हो चुका था। वह अपनी 'जबाला' नाम की माता से कहने लगा कि मैं आचार्य के पास ब्रह्मचर्य धारण करना चाहता हूँ, अतः आप यह बता दें कि मैं किस गोत्र का हूँ? जबाला ने उत्तर दिया कि मैं तुम्हारे पिता की सेवा में तल्लीन रही, तुम्हारा गोत्र न जान सकी। सत्यकाम आचार्य गौतम की शरण में गया और प्रार्थना की कि भगवन् मैं आप से ब्रह्मचर्य-दीक्षा लेना चाहता हूँ। गौतम ने कहा—जिसके गोत्र का ज्ञान नहीं होता, उसका उपनयनादि नहीं किया जाता, अतः तुम्हारा गोत्र क्या है? सत्यकाम ने उत्तर दिया कि मैं अपना गोत्र नहीं जानता। मैंने अपनी 'जबाला' नाम की माता से पूछा था, वह भी नहीं जानती थी। आचार्य गौतम ने सत्यकाम से कहा कि तुम्हारे-जैसा निष्छल और स्पष्ट वक्ता अब्राह्मण नहीं हो सकता, अतः तुम्हारा उपनयन अवश्य करेंगे। शीघ्र ही आचार्य ने सत्यकाम का उपनयन करके वेदाध्ययन करना आरम्भ कर दिया। इस कथानक से भी यही सिद्ध होता है कि शूद्र का अधिकार वेद-विद्या में नहीं। उक्त श्रुति में जो गौतम

४५०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३९

श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात्स्मृतेश्च ॥ ३८ ॥

इतश्च न शूद्रस्याधिकारः। यदस्य स्मृतेः श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधो भवति। वेदश्रवणप्रतिषेधो वेदाध्ययनप्रतिषेधस्तदर्थज्ञानानुष्ठानयोश्च प्रतिषेधः शूद्रस्य स्मर्यते। श्रवणप्रतिषेधस्तावत् 'अथास्य वेदमपश‍ृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणम्' इति। 'पद्यु ह वा एतच्छ्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम्' इति च। अत एवाध्ययनप्रतिषेधः। यस्य हि समीपेऽपि नाध्येतव्यं भवति, स कथमश्रुतमधीयीत? भवति च वेदोच्चारणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेद इति। अत एव चार्थार्थज्ञानानुष्ठानयोः प्रतिषेधो भवति—'न शूद्राय मतिं दद्यात्' इति, 'द्विजातीनामध्ययनमिज्या दानम्' इति च। येषां पुनः पूर्वकृतसंस्कारवशाद्विदुरधर्मव्याधप्रभृतीनां ज्ञानोत्पत्तिस्तेषां न शक्यते फलप्राप्तिः प्रतिषेद्धुं, ज्ञानस्यैकान्तिकफलत्वात्। 'श्रावयेच्चतुरो वर्णान्' इति चेतिहासपुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्यस्याधिकारस्मरणात्। वेदपूर्वकस्तु नास्त्यधिकारः शूद्राणामिति स्थितम् ॥ ३८ ॥

--- ० ---

( १० कम्पनाधिकरणम्। सू० ३९ )

कम्पनात् ॥ ३९ ॥

अवसितः प्रासङ्गिकोऽधिकारविचारः। प्रकृतामेवेदानीं वाक्यार्थविचारणां प्रवर्तयिष्यामः। 'यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति' (का० २।६।२) इति। एतद्वाक्यं 'एजू कम्पने' इति धात्वर्थानुगमाल्लक्षितम्। अस्मिन्वाक्ये सर्वमिदं जगत्प्राणाश्रयं स्पन्दते, महच्च किंचिद्भयकारणं वज्रशब्दितमुद्यतं, तद्विज्ञानाच्चामृतत्वप्राप्तिरिति श्रूयते। तत्र कोऽसौ प्राणः, किं तदुद्यानकं वज्रमित्यप्रतिपत्तेर्विचारे क्रियमाणे प्राप्तं तावत्प्रसिद्धेः पञ्चवृत्तिर्वायुः प्राण इति। प्रसिद्धेरेव चाशनिर्वज्रं स्यात्। वायोश्चेदं माहात्म्यं संकीर्त्यते। कथम्?

भामती

निगदव्याख्यातेन भाष्येण व्याख्यातम्। अतिरोहितार्थमन्यत् ॥ ३८ ॥

प्राणवज्रश्रुतिबलाद्भाष्यं प्रकरणं च भङ्क्त्वा वायुः पञ्चवृत्तिराध्यात्मिको बाह्यश्चात्र प्रतिपाद्यः।

भामती-व्याख्या

ने सत्यकाम से कहा है कि 'न सत्यादगाः', उसका अर्थ है—हे सत्यकाम ! तू ने सत्य का अतिक्रमण नहीं किया ॥ ३७ ॥

इस अड़तीसवें सूत्र में विशेषतः स्मृति-वाक्यों के द्वारा शूद्र के श्रवण, अध्ययन, वेदार्थ-ज्ञान एवं वेदार्थानुष्ठान का निषेध दिखाया गया है, जो कि अत्यन्त स्पष्ट और सुबोध है। शूद्र के लिए कहा गया है कि 'पद्युः ह वा एतच्छ्मशानं यच्छूद्रः'। अर्थात् शूद्र एक पद्युः ( पाव-युक्त या चलता-फिरता ) श्मशान है ॥ ३८ ॥

विषय—'यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्, महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति' (कठो० २।६।२)। इस वाक्य में जगत् को कम्पायमान करनेवाला प्राण विचारणीय है।

संशय—उक्त प्राण वज्र है ? या वायु ? अथवा ईश्वर ?

पूर्वपक्ष—'श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या'—इन छः प्रमाणों में

विज्ञानमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४४१

सर्वमिदं जगत्पञ्चवृत्तौ वायौ प्राणशब्दिते प्रतिष्ठायैजति । वायुनिमित्तमेव च महद्भयानकं वज्रमुद्यम्यते, वायौ हि पर्जन्यभावेन विवर्तमाने विद्युत्स्तनयित्नुवृष्ट्यशनयो विवर्तन्त इत्याचक्षते । वायुविज्ञानादेव चेदममृतत्वम् । तथा हि श्रुत्यन्तरम् - वायुरेव व्यष्टि- र्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद' इति । तस्माद्वायुरयमिह प्रतिप- त्तव्य इति । एवं प्राप्ते ब्रूमः - ब्रह्मैवेदमिति प्रतिपत्तव्यम् । कुतः ? पूर्वोत्तरालोचनात् ।

भामती

तथाहि—प्राणशब्दो मुख्यो वायावाध्यात्मिके, वज्रशब्दश्चाशनौ । अशनिश्च वायुपरिणामः । वायुरेव हि बाह्यो धूमज्योतिःसलिलसंवलितः पर्जन्यभावेन परिणतो विद्युत् स्तनयित्नुवृष्ट्यशनिभावेन विवर्तन्ते । यद्यपि च सर्वं जगदिति सवायुकं प्रतीयते, तथापि सर्वशब्द आपेक्षिकोऽपि न स्वाभिधेयं जहाति किन्तु सङ्कु- चितवृत्तिमवति । प्राणवज्रशब्दौ तु ब्रह्मविषयत्वे स्वार्थमेव त्यजतः । तस्मात् स्वार्थत्यागाद्वरं वृत्तिसङ्कोचः, स्वार्थलेशावस्थानात् । अमृतशब्दोऽपि मरणाभाववचनो न सार्वकालिकं तदभावं ब्रूते, ज्योक्जीवित्वापि तदुपपत्तेः । यथा अमृता देवा इति । तस्मात् प्राणवज्रश्रुत्यनुरोधाद्वायुरेवात्र विवक्षितो न ब्रह्मेति प्राप्तम् । एवं प्राप्ते उच्यते— ॐ कम्पनात् ॐ सवायुकस्य जगतः कम्पनात्, परमात्मैव शब्दात् प्रमित इति मण्डूकप्लुत्यानुषज्यते । ब्रह्मणो हि बिभ्यदेतज्जगत् कृत्स्नं स्वव्यापारे नियमेन प्रवर्त्तते न तु मर्यादामति- वर्त्तते । एतदुक्तं भवति— न श्रुतिसङ्कोचमात्रं श्रुत्यर्थपरित्यागे हेतुरपि तु पूर्वापरदाढ्येनेकवाक्यताप्रकर-

भामती-व्याख्या

श्रुति प्रमाण सबसे प्रबल माना जाता है, अतः 'प्राण' और 'वज्र'—ये दोनों शब्द श्रुति प्रमाण होने के कारण वाक्य और प्रकरण के बाधक हैं । फलतः यहाँ 'कम्पन' शब्द के द्वारा पञ्चवृत्त्यात्मक प्राण अथवा बाह्य वायु का अभिधान करना उचित है, क्योंकि 'प्राण' शब्द आध्यात्मिक ( शरीरान्तर्वर्ती ) वायु को मुख्यरूप से कहता है । 'वज्र' शब्द भी अशनि का वाचक है और अशनि वायु का परिणाम है, क्योंकि बाह्य वायु ही धूम, ज्योति और जल से संवलित होकर वर्षा के रूप में परिणत होकर विद्युत्, मेघ, वृष्टि और अशनि के रूप में विवर्तित हो जाती है । यद्यपि 'सर्वं जगत्' शब्द के द्वारा वायु-सहित संसार प्रतीत होता है, तथापि 'सर्व' शब्द अपने अभिधेयार्थ का सर्वथा त्याग न करके संकुचित अर्थ का बोधक हो जाता है । 'प्राण' और 'वज्र' शब्द यदि ब्रह्मपरक माने जाते हैं, तब स्वार्थ का सर्वथा त्याग कर डालते हैं । सर्वथा स्वार्थ-त्याग से तो संकुचित अर्थ का बोधन ही अच्छा है, क्योंकि संकुचित अर्थ में स्वार्थ का कुछ भाग अवस्थित ही रहता है । 'अमृत' शब्द भी मरणाभाव का वाचक है किन्तु मरण के सार्वकालिक अभाव को नहीं कहता, कादाचित्क जीवन में भी उसकी उपपत्ति हो जाती है, जैसे कि देवगणों को अमर कहा जाता है, वे सदा अमर नहीं, केवल चिरजीवी होने के कारण ही अमर कह दिए जाते हैं । इस प्रकार 'प्राण' और 'वज्र' इन शब्दों के अनुरोध पर वायु ही उक्त श्रुति में विवक्षित है, ब्रह्म नहीं । सिद्धान्त—'कम्पनात्' सूत्र के द्वारा वायु-सहित समस्त जगत् का कम्पन विवक्षित है । समस्त जगत् को कँपानेवाला तो परमात्मा ही है । 'कम्पनात्'—यह हेतुवाक्य है, इसका अन्वय इसी पाद के "शब्दादेव प्रमितः"—इस चौबीसवें सूत्र के साथ वैसे ही होता है, जैसे कि एक मेंढक लम्बी छलांग भर कर अपने दूर बैठे साथी से जा मिलता है । [ “इको गुणवृद्धी” ( पा. सू. १।१।३ ) इस सूत्र के भाष्य में भाष्यकार ने कहा है—"यथा मण्डूका उत्प्लुत्योत्प्लुत्य गच्छन्ति, तद्वदधिकारः” । शब्द जड़ होने पर भी आकांक्षा के आधार पर व्यवहितान्वयी हो जाता है, जैसा कि प्रदीपकार ने कहा है—"बुद्धिशब्दस्येहाकांक्षावशादुप- ५६

४४२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३९

पूर्वोत्तरयोर्हि ग्रन्थभागयोर्ब्रह्मैव निर्दिश्यमानमुपलभामहे। इहैव कथम कस्मादन्तराले वायुं निर्दिश्यमानं प्रतिपद्येमहि ? पूर्वत्र तावत् 'तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन' ( का० २।६।१) इति ब्रह्म निर्दिष्टं, तदेवेहापि, संनिधानात्, जगत्सर्वं प्राण एजतीति च लोकाश्रयत्वप्रत्यभिज्ञानान्निर्दिष्टमिति गम्यते । प्राणशब्दोऽप्ययं परमात्मन्येव प्रयुक्तः, 'प्राणस्य प्राणम्' ( बृ० ४।४।१८ ) इति दर्शनात् । एजयितृत्वमपीदं परमात्मन एवोपपद्यते न वायुमात्रस्य । तथा चोक्तम्— 'न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ' ( का० २।५।५) इति । उत्तरत्रापि 'भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः' ( का० २।६।३ ) इति ब्रह्मैव निर्दिश्यते न वायुः। सवायुकस्य जगतो भयहेतुत्वाभिधानात्। तदेवेहापि सन्निधानात् 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्' इति च भयहेतुत्वप्रत्यभिज्ञानान्निर्दिष्टमिति गम्यते। वज्रशब्दोऽप्ययं भयहेतुत्वसामान्यात्प्रयुक्तः। यथा हि वज्रमुद्यतं ममैव शिरसि निपतेद्यद्यहमस्य शासनं न कुर्यामित्यनेन भयेन जनो नियमेन राजादिशासने प्रवर्तते एवमिदमग्निवायुसूर्यादिकं जगदस्मादेव ब्रह्मणो बिभ्यन्नियमेन स्वव्यापारे प्रवर्तत इति भयानकं वज्रोपमितं ब्रह्म। तथा च ब्रह्मविषयं श्रुत्यन्तरम्— 'भीषाऽस्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः' ( तै० ८।१) इति । अमृतत्वफलश्रवणादपि ब्रह्मैवेदमिति गम्यते। ब्रह्मज्ञानाद्धमृतत्वप्राप्तिः। 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' (श्वे० ६।१५ ) इति मन्त्रवर्णात् । यत्तु वायुविज्ञानात्क्वचिदमृतत्वमभिहितं, तदापेक्षिकम् । तत्रैव प्रकरणान्तरकरणेन

भामती

णाभ्यां संवलितः श्रुतिसङ्कोचः। तदिदमुक्तं ॐ पूर्वापरयोर्ग्रन्थभागयोर्ब्रह्मैव निर्दिश्यमानमुपलभामहे, इहैव कथमन्तराले वायुं निर्दिश्यमानं प्रतिपद्येमहि इति ॐ । तदनेन वाक्यैकवाक्यता दर्शिता । ॐ प्रकरणादपीति ॐ भाष्येण प्रकरणमुक्तम् । यत् खलु पृष्टं तदेव प्रधानं प्रतिवक्तव्यमिति तस्य प्रकरणम्। पृष्टादन्यस्मिंस्तूच्यमाने शास्त्रमप्रमाणं भवेदसम्बद्धप्रलापित्वात् । ॐ यत्तु वायुविज्ञानात् क्वचिदमृतत्वमभिहितमापेक्षिकं तदिति ॐ । अपपुनमृत्युं जयतीति श्रुत्या ह्यपमृत्युविजय उक्तो न तु परममृत्युविजय इत्यापेक्षिकत्वं

भामती-व्याख्या

स्थानम्''। हेतु वाक्य को प्रतिज्ञा वाक्य की आकांक्षा होती है, प्रतिज्ञा-वाक्य यदि दूर हो, तब मण्डूकप्लुति-न्याय से हेतु वाक्य उसके साथ जुड़ता है ]। इस प्रकार 'शब्दादेव प्रमितः (परमात्मा), कम्पनात्' ऐसा पूरा वाक्य सम्पन्न हो जाता है। ब्रह्म के भय से नियन्त्रित होकर यह जगत् अपने व्यापार में नियमतः प्रवृत्त होता है और अपनी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करता । आशय यह है कि केवल श्रुति का संकोच श्रुत्यर्थ के परित्याग का नियामक नहीं, अपितु पूर्वापर की एकवाक्यता और प्रकरण—इन दो प्रमाणों से संवलित श्रुति-सङ्कोच, भाष्यकार ने यही कहा है—"पूर्वापरयोर्ग्रन्थभागयोर्ब्रह्मैव निर्दिश्यमानमुपलभामहे, इहैव कथमन्तराले वायुं निर्दिश्यमानं प्रतिपद्येमहि"। इतने भाष्य के द्वारा वाक्यैकवाक्यता प्रदर्शित की गई है। "प्रकरणादपि"—इस भाष्य से प्रकरण दिखाया है, क्योंकि जो पदार्थ पूछा जाता है, वही प्रधानतया प्रतिपाद्य होता है—यही प्रकरण का स्वरूप है। जिज्ञासित पदार्थ से भिन्न अर्थ का अभिधान करने पर शास्त्र असम्बद्धाभिधायी होने के कारण अप्रमाण हो जायगा । 'यत्तु वायु-विज्ञानात् क्वचिदमृतत्वमभिहितम्, तदापेक्षिकम् ।' अर्थात् "वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद"—इत्यादि श्रुतियों के द्वारा जो वायु के

ज्योतिःशब्दं ब्रह्मः ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्४४३

परमात्मानमभिधाय 'अतोऽन्यदार्तम्' (बृ० ३।४) इति वाय्वादेरार्तत्वाभिधानात् । प्रकरणादप्यत्र परमात्मनिश्चयः, 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद' (का० १।२।१४) इति परमात्मनः पृष्टत्वात् ॥ ३९ ॥

( ११ ज्योतिरधिकरणम् । सू० ४० )

ज्योतिर्दर्शनात् ॥ ४० ॥

'एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभि- निष्पद्यते' (छा० ८।१२।३) इति श्रूयते । तत्र संशय्यते—किं ज्योतिःशब्दं चक्षुर्विषय- तमोऽपहं तेजः, किंवा परं ब्रह्मेति । किं तावत्प्राप्तम् ? प्रसिद्धमेव तेजो ज्योतिःशब्द- मिति । कुतः ? तत्र ज्योतिःशब्दस्य रूढत्वात् । 'ज्योतिश्चरणाभिधानात्' (ब्र० सू० १।१।२४) इत्यत्र हि प्रकरणाज्ज्योतिःशब्दः स्वार्थं परित्यज्य ब्रह्मणि वर्तते । न चेह तद्वत्किंचित्स्वार्थपरित्यागे कारणं दृश्यते । तथा च नाडीखण्डे—'अथ यत्रैतदस्माच्छ-

भामती

तच्च तत्रैव प्रकरणान्तरकरणेन हेतुना । न केवलमपमृत्या तदापेक्षमपि तु परमात्मानमभिधायातोऽन्य- दार्तमिति वाय्वादेरार्तत्वाभिधानात् । नह्यार्त्तोऽभ्यासादमर्त्तो भवतीति भावः ॥ ३९ ॥


अत्र हि ज्योतिःशब्दस्य तेजसि मुख्यत्वाद् ब्रह्मणि जघन्यत्वात् प्रकरणाच्च श्रुतेर्बलीयस्त्वात् पूर्ववच्छ्रुतिसङ्कोचस्य चात्राभावात् , प्रत्युत ब्रह्मज्योतिःपक्षे क्त्वाश्रुतेः पूर्वकालार्थायाः पीडनप्रसङ्गात् । समुत्थानश्रुतेश्च तेज एव ज्योतिः । तथाहि—समुत्थानमुद्गमनमुच्यते, न तु विवेकविज्ञानम् । उद्गमनञ्च

भामती-व्याख्या

विज्ञान से अमृतत्व की प्राप्ति बताई है, वह अमृतत्व आपेक्षिक [ मनुष्य-लोक की अपेक्षा वायु-लोक का चिरस्थायित्व मात्र ] है, वायु-विज्ञान से केवल अपमृत्यु पर विजय-प्राप्ति का उल्लेख है, परम मृत्यु पर विजय नहीं, क्योंकि वहीं पर प्रकरणान्तररूप करण (हेतु) के द्वारा परमात्मा का अभिधान करके वाय्वादि के आर्तत्व (मृतत्व या नश्वरत्व) का अभिधान किया गया है—"अतोऽन्यदार्तम्" (बृह. उ. ३।४)। ऐसा कभी सम्भव नहीं कि आर्त (मृत) पदार्थ उपास्यमान (अभ्यस्यमान) होकर अमृत बन जाय ॥ ३९ ॥

विषय—"एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणा- भिनिष्पद्यते" (छां. ८।१२।३) यहाँ ज्योतिःशब्द विचारणीय है ।

संशय—उक्त श्रुति-वाक्य में 'ज्योतिः' पद के द्वारा भौतिक तेज विवक्षित है ? अथवा पर ब्रह्म ?

पूर्वपक्ष—जोतिःशब्द भौतिक तेज में रूढ या मुख्य और ब्रह्म में गौण माना जाता है, अतः निरपेक्ष शब्दरूप श्रुति प्रमाण से भौतिक तेज और प्रकरण प्रमाण से ब्रह्म विवक्षित प्रतीत होता है । प्रकरण प्रमाण से श्रुति-प्रमाण प्रबल होता है, अतः पूर्वाधिकरण के समान यहाँ श्रुति का संकोच सम्भव नहीं, प्रत्युत ब्रह्मरूप ज्योति का ग्रहण करने पर 'उपसम्पद्य'— यहाँ पूर्वकालार्थक 'क्त्वा' प्रत्यय बाधित हो जाता है, क्योंकि ब्रह्म ज्योति की प्राप्ति के अनन्तर अन्य कोई क्रिया होती ही नहीं, किन्तु आदित्यादि ज्योति (अचिरादि मार्ग) के द्वारा ब्रह्मलोकादि की प्राप्ति के अनन्तर मुक्ति का लाभ होता है ।