ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
•••• प्रकृतिखण्ड २२९
है, वह पुरुष श्री, बुद्धि और ज्ञानसे भ्रष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णुके लिये अर्पित की हुई वस्तुको पाते ही उसे पा लेनेवाला बड़भागी पुरुष अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वयं मुक्त हो जाता है। जो पुरुष नैवेद्य भोजन करके निरन्तर भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति करता है, वह भगवान् विष्णुके समान हो जाता है। उसका स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर तीर्थोंका समूह पवित्र हो जाता है। उसकी चरणरज लगते ही पृथ्वी पवित्र हो जाती है। श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न मांसके समान अभक्ष्य है। शिव-लिङ्गके लिये अर्पण किया हुआ अन्न तथा शूद्रयाजी, चिकित्सक, देवल, कन्याविक्रयी और योनि-जीविका अन्न, ठंडा, बासी, सबके भोजन करनेपर बचा हुआ अन्न, शूद्रापति एवं वृषवाही, अदीक्षित, शवदाही, अगम्यागामी, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्न तथा झूठी गवाही देनेवाले ब्राह्मणोंका अन्न अत्यन्त दूषित समझा जाता है; परंतु ये सब भी भगवान् विष्णुको अर्पण करके भोजन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता है तो वह करोड़ों वंशजोंका उद्धार कर सकता है। श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख मानव स्वयं अपनी भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि अज्ञानमें भी भगवान् विष्णुको समर्पित नैवेद्य ग्रहण कर लिया जाय तो वह पुरुष अपने सात जन्मोंके उपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। जान-बूझकर भक्तिपूर्वक जो श्रीहरिका प्रसाद ग्रहण करता है, उसके तो अनेक जन्मोंके पाप निश्चितरूपसे भस्म हो जाते हैं। इन्द्र ! तुमने जो अभिमानमें आकर भगवान्के प्रसादरूप पारिजातके पुष्पको हाथीके मस्तकपर रख दिया, इस अपराधके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान् श्रीहरिके समीप चली जाय। मैं भगवान् नारायणका भक्त हूँ। मुझे शिव तथा ब्रह्मासे भी किंचित् भी भय नहीं है। काल, मृत्यु और जरासे भी मैं नहीं डरता, फिर दूसरोंकी तो गिनती ही क्या है? तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप भी मेरा क्या करेंगे? देवराज ! तुम्हारे गुरु बृहस्पति भी मुझ निःशङ्क पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। देखो, यह पुष्प जिसके मस्तकपर है, उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। शिवके पुत्रका मस्तक कट जानेपर उसके पुनरुज्जीवनके लिये यही मस्तक (हाथीका सिर) जोड़ा जायगा।
मुनिवर दुर्वासाके ये वचन सुनकर देवराज इन्द्रने उनके चरण पकड़ लिये। भयके कारण उनके मनमें घबराहट छा गयी। शोकातुर होकर उच्च स्वरसे रोते हुए वे मुनिसे कहने लगे।
इन्द्रने कहा- प्रभो ! आपने मुझ मतवालेको यह शाप देकर बहुत ही उचित किया है। यदि आपने मेरी सम्पत्ति हर ली तो अब आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश करनेकी कृपा कीजिये। ऐश्वर्य तो विपत्तियोंका बीज है। उससे ज्ञान ढक जाता है। इसीसे इसको मुक्तिमार्गकी अर्गला कहा जाता है। इसके कारण हरि-भक्तिमें पद-पदपर बाधा उपस्थित हुआ करती है। सम्पत्ति जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और दुःखके बीजका उत्तम अङ्कुर है। धनरूपी रतौंधीसे अन्धा हुआ मानव मुक्तिके मार्गको नहीं देख सकता।* जो सम्पत्तिसे प्रमत्त हो गया है, उसे मदिरासे मत्त हुआ समझना चाहिये। उसे बान्धवजन घेरे रहते हैं; परंतु वह बन्धुजनोंसे द्वेष रखता है। वैभवमत्त, विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक व्यक्तिमें सत्त्वमार्गका अवलोकन करनेकी योग्यता नहीं रह जाती।
* ऐश्वर्यं विपदां बीजं प्रच्छन्नज्ञानकारणम्। मुक्तिमार्गार्गलं दाढ्यं हरिभक्तिव्यवाय कम् ॥
जन्ममृत्युजरारोगशोकदुःखाङ्कुरं परम्। सम्पत्तितिमिरान्धं च मुक्तिमार्गं न पश्यति ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६। ४८-४९)
२३० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विषयान्ध दो प्रकारके बताये गये हैं - राजस और बात है कि तुम अभीष्ट (मोक्ष)- मार्गका साक्षात्कार तामस । जिसमें शास्त्रका ज्ञान नहीं है, वह तामस करना चाहते हो। यह पहले तो दुःखका कारण कहलाता है और शास्त्रज्ञ राजस । मुनिश्रेष्ठ ! शास्त्र जान पड़ता है; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला है। दो प्रकारके मार्ग दिखलाते हैं - एक प्रवृत्ति - बीज जीवको जो गर्भकी यातना तथा मृत्युकष्ट सहन और दूसरा निवृत्ति-बीज। पहला जो प्रवृत्तिमार्ग करने पड़ते हैं, उन सबका खण्डन करनेवाला यह है, वह दुःखका रास्ता है, परंतु जीव क्लेशमें ही ज्ञान बताया जा रहा है। जिससे पार पाना कठिन सुख मानकर पहले उसीपर चलते हैं। वह मार्ग है, उस दुर्वार एवं असार संसार-पारावारसे उद्धार स्वच्छन्द, प्रसन्नतापूर्ण, विरोधशून्य एवं आपात- करनेवाला यह ज्ञान ही है। इससे कर्मरूपी वृक्षके मधुर होनेपर भी परिणाममें नाशका बीज तथा अङ्कुरका उच्छेद हो जाता है। यह सबका उद्धार जन्म-मृत्यु और जराके चक्करमें डालनेवाला है। करनेवाला है। ज्ञानका यह मार्ग सब मार्गोंसे श्रेष्ठ जीव अनेक जन्मोंतक अपने विहित कर्मके है। इससे संतोष और संततिकी प्राप्ति होती है। परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियोंमें क्रमशः दान, तप, व्रत और उपवास आदि कर्मसे भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे जीवधारियोंको स्वर्गभोग आदि सुखकी उपलब्धि मानव होकर सत्सङ्गका सुअवसर प्राप्त करता है। होती है। पहलेके सकाम कर्मोंका यत्नपूर्वक सैकड़ों और सहस्रों पुरुषोंमें कोई विरला ही मूलोच्छेद करके यह ज्ञान मोक्षका बीज वपन साधुपुरुष भवसागरसे पार उतारनेमें कारण बनता करता है। संकल्पका अभाव ही मोक्षका बीज है। है। साधुपुरुष सत्त्वगुणके प्रकाशसे मुक्तिमार्गका मनुष्य जो भी सात्त्विक कर्म करे, उसे कामना या दर्शन कराता है। तब जीवके हृदयमें बन्धनको संकल्पसे शून्य ही रखे। समस्त कर्मोंको श्रीकृष्णके तोड़नेके लिये यत्न करनेकी भावना उत्पन्न होती चरणोंमें समर्पित करके ज्ञानी पुरुष परब्रह्म है। जब अनेक जन्मोंके पुण्य एवं तपस्या और परमात्मामें लीन हो जाता है। संसारी पुरुषोंके उपवास सहायक होते हैं तब प्राणीको निर्विघ्न लिये इस गतिको निर्वाण- मोक्ष कहा गया है। और परम सुखद मुक्तिमार्गकी उपलब्धि होती है। परंतु वैष्णव पुरुष भगवत्सेवासे विरह होनेके यह बात मैंने विभिन्न प्रसङ्गों और अवसरोंपर गुरु भयसे कातर हो इस निर्वाण-मुक्तिकी इच्छा (बृहस्पति) - जी के मुखसे सुनी है। अब विधाताने नहीं करते हैं। वे उत्तम देह धारण करके गोलोक इस विपत्तिके समय मुझे ज्ञानका समुद्र प्रदान अथवा वैकुण्ठधाममें उन्हीं परमात्माकी नित्य किया है। मेरा उद्धार करनेवाली यह विपत्ति सेवा करते हैं। इन्द्र ! वैष्णवजन भगवत्सेवारूप वास्तवमें सम्पत्तिरूपिणी है। ज्ञानसिन्धो ! दीनबन्धो ! मुक्तिकी ही अभिलाषा रखते हैं। वे जीवन्मुक्त हैं दयानिधे ! इस समय मुझ दीनको कुछ ऐसा और अपने समस्त कुलका उद्धार कर देते हैं। सारभूत ज्ञान दीजिये, जो मुझे भवसागरसे पार भगवान् विष्णुका स्मरण, कीर्तन, अर्चन, पादसेवन, कर दे। वन्दन, स्तवन, नित्य भक्तिभावसे उनके नैवेद्यका इन्द्रकी यह बात सुनकर ज्ञानियोंके गुरु भक्षण, चरणोदकका पान तथा उनके मन्त्रका सनातन मुनि दुर्वासा जोर-जोरसे हँस पड़े और जप - यही जीवके उद्धारका बीज है, जो सबके अत्यन्त संतुष्ट होकर इन्द्रको ज्ञानका उपदेश लिये अभीष्ट हो सकता है। यह मृत्युञ्जय-ज्ञान है, देने लगे। जिसे भगवान् मृत्युञ्जयने मुझे दिया था। मैं उनका मुनि बोले- अहो महेन्द्र ! यह बड़े मङ्गलकी शिष्य हूँ। इसलिये उन्हींके कृपा-प्रसादसे सर्वत्र
३२- वैकुण्ठमें श्रीहरिका देवताओंको समझाकर लक्ष्मीदेवीसे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करनेको स्वीकार करनेके लिये कहना
प्रकृतिखण्ड २३१ निर्भय विचरता हूँ। जो तीनों लोकोंमें परम दुर्लभ हरिभक्ति प्रदान करता है, वही जन्मदाता पिता है, वही ज्ञानदाता गुरु है, वही बन्धु है और वही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है* । जो श्रीकृष्ण-सेवाके सिवा दूसरा कोई मार्ग दिखाता है, वह उस शिष्यका विनाश ही करता है। निश्चय ही उस गुरुको उसके वधके पापका भागी होना पड़ता है। भगवान् श्रीकृष्णका नाम ही सदा समस्त लोकोंके लिये मङ्गलकारक है। जो कृष्ण-नाम लेता है, उसके मङ्गलकी सदा वृद्धि होती है। उसकी आयुका अपव्यय नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तोंसे काल, मृत्यु, रोग, संताप और शोक उसी तरह दूर भागते हैं, जैसे गरुड़से सर्प । श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपासक ब्राह्मण हो या चाण्डाल, वह ब्रह्मलोकको लाँघकर उत्तम गोलोकमें चला जाता है। ब्रह्माजी मधुपर्क आदिके द्वारा उसकी पूजा करते हैं तथा देवताओं और सिद्धोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ वह परमानन्दका अनुभव करता है। भगवान् शिवने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवाको ही ज्ञान, तप, वेद तथा योगका सार बताया है। वही परम कल्याणस्वरूप है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या ही है। केवल परब्रह्म परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। वे प्रकृतिसे भी परे हैं। अतः तुम उन्हींकी आराधना करो। भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त सुखदायक, सारतत्त्वस्वरूप, भक्तिदाता, मोक्षदाता, सिद्धिदाता, योगप्रदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। योगी, यती, सिद्ध और तपस्वी सबके लिये कर्मोंका भोग अनिवार्य है, परंतु नारायणके भक्तोंके लिये कर्मभोग नहीं है। जैसे प्रज्वलित अग्निमें डाला गया सूखा ईंधन शीघ्र ही जल जाता है, उसी प्रकार भगवद्भक्तोंके स्पर्शमात्रसे सारा पाप तत्काल भस्म हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्तसे रोग, पाप और भय सभी थर-थर काँपते हैं। यमदूत भी उससे डरकर दूर भागते हैं। विधाताके कारागाररूपी इस संसारमें मनुष्य तभीतक बँधा रहता है, जबतक कि गुरुके मुखसे उसको श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश नहीं प्राप्त होता। श्रीकृष्णका नाम किये हुए कर्मोंके भोगरूपी बेड़ीका उच्छेद करनेवाला, मायाजालको छिन्न-भिन्न कर देनेवाला तथा मायापाशका विनाशक है। गोलोकके मार्गका सोपान, उद्धारका बीज तथा भक्तिका नित्य बढ़नेवाला अविनाशी अङ्कुर है। पुरन्दर ! सम्पूर्ण तप, योग, सिद्धि, वेदाध्ययन, व्रत, दान, तीर्थ- स्नान, यज्ञ, पूजन और उपवास-इन सबका वही सार है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। श्रीकृष्णके मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। उसके स्पर्शसे तीर्थोंके समुदाय तथा सारी पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। अनेक जन्मोंतक जिसे कोई दीक्षा नहीं प्राप्त हुई है, वह लेशमात्र पुण्यके प्रभावसे किसी अन्य देवताका मन्त्र पाता है। अनेक जन्मोंतक अन्य देवताओंकी सेवाके फलस्वरूप उसको समस्त कर्मोंके साक्षी सूर्यदेवका मन्त्र प्राप्त होता है। तीन जन्मोंतक सूर्यकी सेवासे शुद्ध हुआ मनुष्य गणेशजीके सर्वविघ्नहारी मन्त्रका उपदेश पाता है। अनेक जन्मोंतक उनकी सेवासे मनुष्यकी सारी विघ्न- बाधाएँ दूर हो जाती हैं। फिर वह गणेशजीके कृपा-प्रसादसे दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। उस ज्ञानके प्रकाशमें भलीभाँति विचार करके अज्ञानान्धकारका निवारण करनेके पश्चात् मनुष्य विष्णुमायास्वरूपिणी प्रकृतिदेवी दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका भजन करता है। वे सिद्धिदायिनी, सिद्धिरूपिणी तथा परमा सिद्धियोगिनी हैं। वाणी,
- स जन्मदाता स गुरुः स च बन्धुः सतां परः । यो ददाति हरेर्भक्तिं त्रैलोक्ये च सुदुर्लभाम् ॥ (प्रकृतिखण्ड ३६। ७६)
२३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लक्ष्मी और श्रीकृष्णप्रिया राधा आदि उनके अनेक रूप हैं। अनेक जन्मोंतक उनकी उपासना करनेके पश्चात् उनकी कृपासे ज्ञानी होकर मनुष्य ज्ञानानन्दस्वरूप, श्रीकृष्णज्ञानके अधिदेवता सनातन महादेव कल्याणस्वरूप शिवका भजन करता है।
वे मङ्गलदायक, कल्याणकारक, परमानन्दरूप, परमानन्ददायी, सुखदायक, मोक्षदायक तथा समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं। अमरत्व, सुदीर्घ आयु, इन्द्रत्व तथा मनुत्वको भी वे अनायास ही देनेमें समर्थ हैं। राजेन्द्रपद, ज्ञान तथा हरिभक्तिके भी दाता हैं। तीन जन्मोंतक उनकी आराधना करके उन्हीं आशुतोष महात्मा शंकरके कृपा-प्रसादसे मनुष्य निश्चय ही हरिभक्ति प्राप्त कर लेता है। फिर श्रीकृष्ण-भक्तोंके संसर्गसे उसको कृष्णमन्त्रकी प्राप्ति होती है। तत्त्वज्ञ पुरुष निर्मल ज्ञान-दीपके प्रकाशित होनेसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को मिथ्या ही देखता है। वरदाता शंकरके वरसे जब निर्मल ज्ञान और भगवद्भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, तब मनुष्य परात्पर निवृत्तिभावको प्राप्त हो जाता है। जिस शरीरमें उसे श्रीकृष्ण-मन्त्रकी प्राप्ति होती है, वह शरीर जबतक टिका रहता है, तभीतक उसे भारतवर्षमें रहना पड़ता है। उस पाञ्चभौतिक शरीरको त्याग देनेके पश्चात् वह दिव्य रूप धारण कर लेता है और श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें उनका पार्षद बनकर उनकी सेवा किया करता है। वह परमानन्दसे सम्पन्न तथा मोह आदिसे रहित हो जाता है। इस प्राकृत जगत्में पुनः उसका आगमन नहीं होता। उसे पुनः माताका स्तन नहीं पीना पड़ता।
जो विष्णुमन्त्रके उपासक गङ्गा आदि तीर्थोंका सेवन करनेवाले तथा स्वधर्मपरायण भिक्षु हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। तीर्थमें पापका सर्वथा परित्याग करे और पुण्यकर्मका अनुष्ठान करते हुए श्रीहरिका भजन करे। विधाताने तीर्थसेवी पुरुषोंका यही धर्म बताया है। भगवान् विष्णुके नाम-मन्त्रका जप करे, उन्हींकी सेवा आदिमें तत्पर रहे तथा उन्हींके व्रत एवं उपवासमें संलग्न रहे। यह विष्णुसेवी पुरुषोंका धर्म बताया गया है।
जो सदन्न या कदन्नमें (उत्तम या निकृष्ट श्रेणीके अन्नमें), मिट्टीके ढेले अथवा सुवर्णमें सदा समभाव रखता है, वह संन्यासी कहा गया है। जो दण्ड, कमण्डलु तथा गेरुआ वस्त्रमात्र धारण करे, प्रतिदिन प्रवासमें रहे और एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे, उसे संन्यासी कहा गया है। जो लाभ आदिसे रहित होकर सदाचारी द्विजोंका दिया हुआ अन्न खाता है, किंतु किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो व्यापार न करे, आश्रम बनाकर न रहे, समस्त वैदिक कर्मोंसे विलग रहे तथा निरन्तर नारायणका ध्यान करे, उसे सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो सदा मौन रहे, ब्रह्मचर्यका पालन करे, दूसरोंसे बात न करे और सबको ब्रह्ममय देखे, उसे संन्यासी कहा गया है। जिसकी सर्वत्र समबुद्धि हो, जो हिंसा और माया आदिसे दूर रहता हो तथा क्रोध और अहंकारसे शून्य हो, वही सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो बिना माँगे प्रस्तुत हुए मीठे अथवा स्वादरहित अन्नको समभावसे भोजन करता है, किंतु खानेके लिये किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो स्त्रियोंका मुँह न देखे, उनके पास खड़ा न हो और काठकी बनी हुई नारीमूर्तिका भी स्पर्श न करे, वही सच्चा भिक्षु है। ब्रह्माजीने संन्यासियोंका यही धर्म बताया है। इसके विपरीत चलनेपर जन्म, मृत्यु और यमयातनाका भय सिरपर सवार रहता है अथवा पशु आदि क्षुद्र जन्तुओंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। गर्भवासके समय सभी प्राणी अपने सैकड़ों
प्रकृतिखण्ड
२३३
जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करते हैं; किंतु गर्भसे निकलते ही जीव विष्णुकी मायासे मोहित हो सब कुछ भूल जाता है।
देवता हो या कीट सभी यत्नपूर्वक अपने शरीरकी रक्षा करते हैं। स्त्रीकी योनिके भीतर जब पुरुषका वीर्य पड़ता है तो वह तत्काल उसके रक्तमें मिल जाता है। रक्तकी मात्रा अधिक होनेपर संतान माताके समान होती है और वीर्यकी अधिकता होनेपर संतानकी आकृति पितासे अधिक मिलती-जुलती है। ऋतुकालके बाद यदि युग्म दिनोंमें गर्भाधान हो तो पुत्रका जन्म होता है और विषम दिनोंमें आधान होनेपर कन्याकी उत्पत्ति होती है। युग्म दिनोंमें तथा रवि, मङ्गल और गुरुका वार होनेपर आधान हो तो पुत्र होता है। अन्य वारों तथा विषम दिनोंमें आधानसे कन्याका जन्म होता है। जिसका जन्म पहले पहरमें होता है, वह अल्पायु होता है, दूसरे पहरमें जन्म लेनेवालेकी आयु मध्यम होती है तथा तीसरे पहरमें जिसका जन्म होता है, वह दीर्घायु होता है। चतुर्थ पहरमें जन्म लेनेवाला चिरंजीवी माना जाता है। जिस क्षण या लग्नमें बालकका जन्म होता है, उस समयकी ग्रहस्थितिके अनुरूप उसका भावी जीवन हुआ करता है। वह पूर्वकर्मोंके अनुसार सुखी या दुःखी होता है। जैसे क्षणमें जन्म होता है, वैसे ही संतान होती है। प्रसवके क्षणकी चर्चा विद्वान् पुरुष ही करते हैं। रज-वीर्य परस्पर संयुक्त हो एक रातमें कललका आकार धारण करते हैं। फिर वह कलल दिनों-दिन बढ़ने लगता है। सातवें दिन उसकी आकृति बेरके समान होती है और एक मासमें वह लट्टूके समान हो जाता है। तीन महीना बीतते-बीतते वह बिना हाथ-पैरके मांसपिण्डके रूपमें परिणत हो जाता है। पाँचवें मासमें देहधारी जीवके सारे अवयव प्रकट हो जाते हैं। छठे महीनेमें जीवका संचार होता है। फिर वह सब तत्त्वोंको समझने लगता है। थोड़ी-सी जगहमें उसे रहना और सोना पड़ता है, इस बातको समझकर वह पिंजड़ेमें बँधे हुए पक्षीके समान दुःखी हो जाता है। अपवित्र स्थानमें रहकर वह माताके खाये हुए अन्न-पानका ही आहार करता है और 'हाय! हाय!' करके परमेश्वरका चिन्तन करने लगता है। इस तरह चार मासतक बड़ी भारी यातना भोगकर यथासमय वायुसे प्रेरित हो वह गर्भसे बाहर निकलता है। उस समय उसे दिशा, देश और कालका भान नहीं होता। विष्णुमायासे मोहित हो वह सब कुछ भूल जाता है। शैशवकालकी सीमातक वह शिशु सदा मल-मूत्रसे लिपटा रहता है। दूसरेके अधीन होता है। उसमें मच्छर आदिको हटानेकी भी शक्ति नहीं रहती। जब उसे कीड़े आदि काट खाते हैं, तब वह दुःखी होकर बारंबार रोता है। स्तन-पान करनेमें भी असमर्थ ही रहता है। अभीष्ट वस्तुकी याचना करनेके लिये उसकी वाणी नहीं निकलती। पौगण्डावस्थातक वह स्पष्ट बोल नहीं पाता। पौगण्डावस्थामें भी अनेक प्रकारकी यातना भोगकर जवान होता है। उस समय मायासे मोहित देहधारी जीव गर्भादिकी यातनाको भूल जाता है। आहार और मैथुनकी चिन्तासे पीड़ित तथा नाना प्रकारके मोह आदिसे वेष्टित होकर वह पुत्र, पत्नी तथा अनुचरोंका यत्नपूर्वक पालन करता है। जबतक वह उनके पालनमें समर्थ रहता है, तभीतक घरमें उसकी पूजा होती है—आदर-सत्कार होता है। असमर्थ हो जानेपर तो भाई-बन्धु उसे बूढ़े बैलकी भाँति व्यर्थका भार समझने लगते हैं। जब अत्यन्त जरा-जर्जर, जड एवं बधिर हो जाता है, खाँसी और दमा आदि रोग सताने लगते हैं तथा वह अत्यन्त मूढवत् हो सर्वथा दूसरोंके अधीन हो जाता है, तब सदा बारंबार पश्चात्ताप करने लगता है। वह कहता है—'अहो! मैंने श्रीहरिके तीर्थका तथा
२३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सत्संगका भी स्वेच्छापूर्वक कभी सेवन नहीं किया। यदि पुनः भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाऊँगा, तब तीर्थोंमें जाऊँगा और भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा करूँगा।' देवेन्द्र! इस तरह संकल्प करते हुए उस जडको यथासमय आकर अत्यन्त भयंकर यमदूत पकड़ लेता है। वह उस दूतको देखता है। उसके हाथोंमें पाश और दण्ड होते हैं। उसकी आँखें अत्यन्त क्रोधसे लाल होती हैं, आकृति विकराल एवं भयंकर होती है। उसे किन्हीं भी उपायोंद्वारा रोक पाना कठिन होता है। वह बलिष्ठ, भयानक, दुर्दर्श, सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञाता तथा अन्य सबकी दृष्टिसे ओझल होता है। सामने खड़े हुए उस दूतपर दृष्टि पड़ते ही वह अत्यन्त भयभीत हो मल-मूत्रका त्याग करने लग जाता है। फिर तत्काल ही प्राणों तथा पाञ्चभौतिक देहको भी त्याग देता है।
यमदूत अंगूठेके बराबर आकारवाले जीवको लेकर भोगदेह (या यातना-शरीर)-में स्थापित कर देता है; तब उसे तीव्रगतिसे अपने स्थानपर ले जाता है। जीव वहाँ पहुँचकर सब धर्मोंके ज्ञाता यमराजको देखता है। वे रत्नसिंहासनपर सुस्थिरभावसे बैठकर मन्द-मन्द मुस्कराते दिखायी देते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, धर्माधर्मके विचारको जानते हैं तथा सब ओर उनका मुख है। विधाताने पूर्वकालसे ही यमको सम्पूर्ण विश्वके नियमनका एकमात्र अधिकार दे रखा है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करते हैं। रत्नमय आभूषणोंसे भूषित हैं, तीन करोड़ दूत और पार्षदगण उन्हें सदा घेरे रहते हैं। वे शुद्ध स्फटिकमणिकी माला लेकर उसके द्वारा श्रीकृष्णके नामोंका जप करते रहते हैं तथा रोमाञ्चित शरीरसे मन-ही-मन उनके युगल चरणारविन्दोंका ध्यान किया करते हैं। उस समय उनकी वाणी गद्गद होती है, नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती रहती है। भगवान् यम सबपर समान दृष्टि रखते हैं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर एवं कमनीय है। उनका शरीर सदा सुस्थिर यौवनसे सुशोभित होता है। वे अपने तेजसे उद्भासित होते रहते हैं। उनकी कान्ति शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी शोभाको लज्जित कर देती है। उनकी ओर सुखपूर्वक देखा जा सकता है। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और चित्रगुप्तके सामने विराजमान रहते हैं। पुण्यात्माओंके समक्ष उनका रूप उपर्युक्त रूपसे शान्त ही रहता है, परंतु पापियोंको वे बड़े भयानक दिखायी देते हैं। उन्हें देखकर देहधारी जीव प्रणाम करता है और अत्यन्त भयभीत होकर खड़ा हो जाता है। सूर्यनन्दन यम चित्रगुप्तके साथ विचार करके जिनके लिये जो उचित होता है, वैसा ही शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार उन जीवोंको आवागमनके चक्करसे कभी छुटकारा नहीं मिलता। श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका सेवन ही जीवको उससे छुटकारा दिला सकता है।
देवराज! ये सब बातें मैंने आनुषङ्गिकरूपसे तुम्हें बतायी हैं, अब मनोवाञ्छित वर माँगो। वत्स! मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा। मेरे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।
महेन्द्रने कहा— याचकोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप मुनिश्रेष्ठ! मेरा इन्द्रत्व तो चला ही गया। अब ऐश्वर्यसे क्या प्रयोजन है? आप मुझे परमपद प्रदान कीजिये।
महेन्द्रकी यह बात सुनकर मुनिवर दुर्वासा हँसे और वेदोक्त सारतत्त्वस्वरूप सत्य वचन बोले।
मुनिने कहा— महेन्द्र! विषयी पुरुषोंके लिये परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। तुम-जैसे लोगोंको तो प्राकृत प्रलय-कालमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती। सृष्टिकालमें जीवोंका आविर्भाव तथा प्रलयकालमें तिरोभावमात्र होता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रातःकाल प्राणियोंका जागरण और रात्रिकालमें शयन हुआ करता है। जैसे काल-चक्र भ्रमण करता रहता है, उसी प्रकार
प्रकृतिखण्ड २३५
विषयी जीव भी ईश्वरकी इच्छासे गाड़ीके पहियेकी तरह सदा ही आवागमनका चक्कर काटते रहते हैं। साठ विपलोंका एक पल, साठ पलोंका एक दण्ड, दो दण्डोंका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात, पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण नामक दो पक्षोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुओंका एक अयन, दो अयनोंका एक वर्ष, तैंतालीस लाख बीस हजार मानववर्षोंके चार युग तथा मनुष्योंके पचीस हजार पाँच सौ साठ चतुर्युगोंकी एक इन्द्रकी आयु होती है। यही एक मनुकी भी आयु कही गयी है। दस लाख आठ हजार इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। तभी 'प्राकृतिक लय' होता है। वत्स ! प्राकृतिक प्रलयके समय परमात्मा श्रीकृष्णकी पलकें गिरती हैं। जब फिर उनकी पलकें उठती या आँख खुलती है, तब पुनः नयी सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रुतिमें ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयोंको असंख्य बताया गया है। जैसे पृथ्वीके धूलिकणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह सृष्टि और प्रलयोंकी भी कोई गिनती नहीं है। यह चन्द्रशेखर शिवका कथन है। उपर्युक्त इन्द्रोंका मोक्ष नहीं होता। अतः देवराज ! तुम कोई दूसरा वर माँगो, जो सृष्टिसूत्रके अनुरूप हो।
मुने ! मुनीश्वर दुर्वासाकी यह बात सुनकर देवराजको बड़ा विस्मय हुआ। तब उन्होंने वहाँ अपने पूर्व-ऐश्वर्यका ही वरण किया। 'तुम अपने पूर्व ऐश्वर्यको शीघ्र ही प्राप्त कर लोगे'—ऐसा कहकर मुनि दुर्वासा अपने घरको चले गये।
नारदजीने पूछा—भगवान् श्रीहरिका गुणगान सुनकर इन्द्रको जब ज्ञान प्राप्त हो गया, तब उन्होंने घर जाकर क्या किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण बोले—ब्रह्मन्! श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर इन्द्र संसारके ऐश्वर्य-भोगसे विरक्त हो गये। वे दिनोंदिन अपने वैराग्यभावको बढ़ाने लगे। मुनिवर दुर्वासाके पाससे घर जाकर उन्होंने अपनी अमरावतीपुरीकी दशा देखी। वह दैत्यों तथा असुर-समूहोंसे भरी होनेके कारण भयसे व्याकुल जान पड़ती थी। उस पुरीमें कहीं तो उनके बन्धु-बान्धव विषादमें डूबे थे और कहीं-कहींके बन्धुजन पुरी छोड़कर बाहर चले गये थे। अपनी पुरीको पिता-माता-पत्नी आदिसे रहित, अत्यन्त हलचलसे पूर्ण तथा शत्रुओंसे आक्रान्त देखकर इन्द्रदेव गुरु बृहस्पतिके पास गये। उस समय शक्तिशाली बृहस्पतिजी मन्दाकिनीके तटपर विराजमान हो परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते हुए देवराज इन्द्रको दृष्टिगोचर हुए। फिर देखा तो वे गङ्गाके जलमें पूर्वाभिमुख खड़े होकर सूर्यका अभिवादन कर रहे थे। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे। उनका शरीर पुलकित था। वे अत्यन्त आनन्दित थे। वे परम श्रेष्ठ, गाम्भीर्य-सम्पन्न, धर्मात्मा, श्रेष्ठ पुरुषोंसे सेवित, बन्धुवर्गमें आदरणीय, भ्रातृ-समुदायमें ज्येष्ठ तथा देव-शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी गुरुवर बृहस्पतिजी मन्त्रका जप कर रहे थे। देवराज एक पहरतक उन्हें देखते रह गये। तत्पश्चात् उन्हें ध्यानसे उपरत देखकर प्रणाम किया। फिर वे गुरुदेवके चरणकमलोंमें मस्तक झुकाकर उच्चस्वरसे रोने लगे। तदनन्तर दुर्वासाजीके द्वारा दिये गये शापके सम्बन्धकी सारी बातें इन्द्रने बृहस्पतिजीको बतायीं। इन्द्रकी सारी बातें सुनकर परम बुद्धिमान् एवं वक्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा।
बृहस्पति बोले—सुरश्रेष्ठ ! मैं सब कुछ सुन चुका हूँ। तुम विषाद मत करो; मेरी बात सुनो। नीतिज्ञ पुरुष विपत्तिके अवसरपर कभी भी घबराता नहीं है; क्योंकि यह विपत्ति और सम्पत्ति स्वस्वरूपिणी है। इसे नश्वर कहा जाता है। यह सम्पत्ति और विपत्ति अपने ही
३०- भगवती स्वाहा तथा भगवती स्वधाका उपाख्यान, उनके ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्रोंका वर्णन
| २३६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका फल है। जीव स्वयं ही उन दोनोंका निर्माता है। प्रायः सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये प्रत्येक जन्ममें यही शाश्वत नियम है। चक्रकी भाँति वह सदा घूमता रहता है; फिर इस विषयमें चिन्ता किस बातकी ? शुभ हो अथवा अशुभ, जिस-किसी प्रकारके अपने कर्मफलको भोगनेके लिये ही पुरुष शरीर प्राप्त करता है। शतकोटि कल्प क्यों न बीत जायँ, किंतु बिना भोग किये कर्मका अन्त नहीं होता। अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। इस प्रकारकी बातें परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको सम्बोधित करके सामवेदकी कौथुमी शाखामें कही हैं। किये हुए सम्पूर्ण कर्मोंका भोग शेष रह जानेपर कर्मानुसार प्राणियोंका भारतवर्षमें अथवा कहीं अन्यत्र जन्म होता है। करोड़ों जन्मोंके किये हुए कर्म प्राणीके पीछे लगे रहते हैं। पुरन्दर ! छायाकी भाँति वे बिना भोगे अलग नहीं होते। काल, देश और पात्रके भेदसे कर्मोंमें न्यूनाधिकता हुआ ही करती है। जिस प्रकार कुशल कुम्भकार दण्ड, चक्र, शराव और भ्रमणके द्वारा क्रमशः मिट्टीसे सुन्दर घटका निर्माण कर लेता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्रसे प्राणियोंको फल प्रदान करते हैं। अतः देवराज ! जिनकी आज्ञासे इस जगत्की सृष्टि हुई है, उन भगवान् नारायणकी तुम उपासना करो। वे प्रभु त्रिलोकीमें विधाताके विधाता, रक्षकके रक्षक, स्रष्टाके स्रष्टा, संहर्ताके संहारकर्ता तथा कालके भी काल हैं। जो पुरुष महान् विपत्तिके अवसरपर उन भगवान् मधुसूदनका स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्तिमें भी सम्पत्तिकी ही भावना उत्पन्न हो जाती है; ऐसा भगवान् शंकरने आदेश दिया है*।
नारद! इस प्रकार कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पतिजीने देवराज इन्द्रको हृदयसे लगा लिया और शुभाशीर्वाद देकर उन्हें पूर्णरूपसे सारी बातें समझा दीं।
(अध्याय ३५—३७)
भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन
**भगवान् नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीको आगे करके सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माकी सभाके लिये प्रस्थान किया। वे शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। सबको ब्रह्माजीके दर्शन हुए। इन्द्र और बृहस्पतिसहित समस्त देवताओंने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी हँस पड़े। उन्होंने देवराजसे कहा।
**ब्रह्माजी बोले—**वत्स ! तुम मेरे वंशज हो। तुम्हें उत्तम बुद्धि प्राप्त है। मेरे प्रपौत्र हो। बृहस्पतिजी तुम्हारे गुरु हैं और तुम स्वयं भी देवताओंके स्वामी हो। परम प्रतापी विष्णुभक्त दक्ष प्रजापति तुम्हारे मातामह हैं। भला, जिसके तीनों कुल ऐसे पवित्र हों, वह सुयोग्य पुरुष अहंकार क्यों करे ? जिसकी माता परम पतिव्रता, पिता शुद्धस्वरूप और मातामह एवं मातुल जितेन्द्रिय हों, वह व्यक्ति अहंकारी क्यों बन जाय ? क्योंकि यदि पिता, मातामह और गुरु—ये तीन दोषी हों
* महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम्। विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्करः॥
(प्रकृतिखण्ड ३७। ४०)
प्रकृतिखण्ड २३७
तो इन्हींके दोषसे सम्पन्न होकर पुरुष भगवान् श्रीहरिका द्रोही बन सकता है—यह निश्चित है। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें विराजमान रहते हैं। उनके देहसे निकल जानेपर उसी क्षण प्राणी शव बन जाता है। वे स्वामी हैं और हम सब लोग उनके अनुचर हैं। मैं प्राणियोंके शरीरमें इन्द्रियोंका स्वामी मन होकर रहता हूँ। शंकर ज्ञानका रूप धारण करके रहते हैं। विष्णुके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी भगवती श्रीराधा प्रकृतिके रूपमें विराजमान रहती हैं। बुद्धिको साध्वी दुर्गाका रूप माना गया है। निद्रा एवं क्षुधा आदि—ये सभी भगवती प्रकृतिकी कलाएँ हैं। आत्माका जो बुद्धिमें प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। उसीने इस भोग-शरीरको धारण कर रखा है। जब शरीरका स्वामी आत्मा देहसे निकलकर जाने लगता है, तब ये सब भी तुरंत उसीके साथ-साथ चल पड़ते हैं; जैसे रास्तेमें वरके आगे चलनेपर सभी बराती सज्जन उसका अनुसरण करते हैं। मैं, शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म एवं महाविराट् तथा तुम सब लोग—ये सब जिनके अंश और भक्त हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यरूप पुष्पका तुमने अपमान कर दिया है। भगवान् शिवने जिस पुष्पसे उन श्रीहरिके चरणकमलोंकी पूजा की थी, वही पुष्प सौभाग्यवश मुनिवर दुर्वासाकी कृपासे तुम्हें प्राप्त हुआ था; परंतु तुमने उसका सम्मान नहीं किया। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलसे च्युत पुष्प जिसके मस्तकपर स्थान पाता है, वह सौभाग्यशाली व्यक्ति सम्पूर्ण देवताओंमें प्रधान माना जाता है और उसीकी पहले पूजा होती है। हाय! दैवने तुम्हें ठग लिया। वास्तवमें दैव बड़ा प्रबल होता है। इस समय भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यका परित्याग करनेसे रोषमें आकर भगवती श्रीदेवी तुम्हारे पाससे चली गयी हैं। अब तुम मेरे तथा बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठमें चलो। मैं वर देता हूँ, अतः तुम वहाँ लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिकी सेवा करके लक्ष्मीको अवश्य प्राप्त कर लोगे।
नारद! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंको साथ ले वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ जानेपर उन्हें परब्रह्म सनातन भगवान् श्रीहरिके दर्शन हुए। उस समय वे तेजःपुञ्ज प्रभु अपने ही तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह ऐसा जान पड़ता था, मानो ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक असंख्य सूर्य एक साथ चमक रहे हों। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि शान्तरूपसे विराजमान थे। वे चार भुजावाले पार्षदोंसे और भगवती सरस्वतीसे युक्त थे। चारों वेदोंसहित भगवती गङ्गा भक्ति प्रदर्शित करती हुई उनके पास विराजमान थीं। उन्हें देखकर ब्रह्माके अनुयायी सम्पूर्ण देवताओंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके प्रत्येक अङ्गमें भक्ति और विनयका विकास हो चुका था। आँखोंमें आँसू भरकर वे परम प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे। स्वयं ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर भगवान्से यथावत् समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। उस समय समस्त देवता अपने अधिकारसे च्युत होनेके कारण रो रहे थे। विपत्तिने उनके हृदयमें भलीभाँति स्थान प्राप्त कर लिया था। भयके कारण उनमें घबराहटकी सीमा नहीं थी। उनके शरीरपर एक भी रत्न या आभूषण नहीं था। वे सवारीसे भी रहित थे। उन सभीके मुख म्लान थे। श्री तो पहले ही उनका साथ छोड़ चुकी थी। वे निस्तेज एवं भयग्रस्त थे। कुछ भी करनेकी शक्ति उनमें नहीं रह गयी थी। देवताओंको ऐसी दीन दशामें पड़े हुए देखकर भयको दूर करनेवाले भगवान् श्रीहरिने उनसे कहा।
भगवान् श्रीहरि बोले—ब्रह्मन् तथा देवताओ! भय मत करो। मेरे रहते तुमलोगोंको किस बातका भय है। मैं तुम्हें परम ऐश्वर्यको बढ़ानेवाली अचल लक्ष्मी प्रदान करूँगा; परंतु मैं कुछ
३३- भगवती स्वाहाको श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन
२३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण समयोचित बात कहता हूँ, तुमलोग उसपर ध्यान दो। मेरे वचन हितकर, सत्य, सारभूत एवं परिणाममें सुखावह हैं। जैसे अखिल विश्वके सम्पूर्ण प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने भक्तोंके अधीन हूँ। मैं अपनी इच्छासे कभी कुछ नहीं कर सकता। सदा मेरे भजन- चिन्तनमें लगे रहनेवाला निरङ्कुश भक्त जिसपर रुष्ट हो जाता है, उसके घर लक्ष्मीसहित मैं नहीं ठहर सकता-यह बिलकुल निश्चित है। मुनिवर दुर्वासा महाभाग शंकरके अंश एवं वैष्णव पुरुष हैं। उनके हृदयमें मेरे प्रति अटूट श्रद्धा भी है। उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है। अतएव तुम्हारे घरसे लक्ष्मीसहित मैं चला आया हूँ; क्योंकि जहाँ शङ्खध्वनि नहीं होती, तुलसीका निवास नहीं रहता, शंकरकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं। ब्रह्मन् तथा देवताओ ! जहाँ मेरे भक्तोंकी निन्दा होती है, वहाँ रहनेवाली महालक्ष्मीके मनमें अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अतः वे उस स्थानको छोड़कर चल देती हैं। जो मेरी उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमीके दिन अन्न खाता है, उस मूर्ख व्यक्तिके घरसे भी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो मेरे नामका तथा अपनी कन्याका विक्रय करता है एवं जहाँ अतिथि भोजन नहीं पाता, उस घरको त्यागकर मेरी प्रिया लक्ष्मी अन्यत्र चली जाती हैं। जो ब्राह्मण पुंश्चलीके उदरसे उत्पन्न हुआ है अथवा पुंश्चलीका पति है, उसे 'महापापी' कहा गया है। उसके घर लक्ष्मी नहीं ठहर सकतीं। जो ब्राह्मण बैल जोतता है, वह कमलालया भगवती लक्ष्मीका प्रेमभाजन नहीं हो सकता। अतः उसके यहाँसे वे चल देती हैं। जो अशुद्धहृदय, क्रूर, हिंसक और निन्दक है, उस ब्राह्मणके हाथका जल पीनेमें भगवती लक्ष्मी डरती हैं, अतः उसके घरसे वे चल देती हैं। जो शूद्रोंसे यज्ञ कराता है, कायर व्यक्तियोंका अन्न खाता है, निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है, नखोंसे पृथ्वीको कुरेदता रहता है; जो निराशावादी है, सूर्योदयके समय भोजन करता है, दिनमें सोता और मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे मूर्खोंके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो अल्पज्ञानी व्यक्ति भीगे पैर अथवा नंगा होकर सोता है तथा निरन्तर बेसिर-पैरकी बातें बकता रहता है, उसके घरसे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो सिरपर तैल लगाकर उसीसे दूसरेके अङ्गको स्पर्श करता है अर्थात् अपने सिरका तैल दूसरेको लगाता है तथा अपनी गोदमें बाजा लेकर उसे बजाता है, उसके घरसे रुष्ट होकर लक्ष्मी चली जाती हैं। जो द्विज व्रत, उपवास, संध्या और विष्णुभक्तिसे हीन है, उस अपवित्र पुरुषके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो ब्राह्मणोंकी निन्दा तथा उनसे द्वेष करता है, जीवोंकी सदा हिंसा करता है और दयारहित है, उसके घरसे जगज्जननी लक्ष्मी चली जाती हैं। जिस स्थानपर भगवान् श्रीहरिकी चर्चा होती है और उनके गुणोंका कीर्तन होता है, वहींपर सम्पूर्ण मङ्गलोंको भी मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं। पितामह ! जहाँ भगवान् श्रीकृष्णका तथा उनके भक्तोंका यश गाया जाता है, वहीं उनकी प्राणप्रिया भगवती लक्ष्मी सदा विराजती हैं। जहाँ शङ्खध्वनि होती है तथा शङ्ख, शालग्राम, तुलसी-इनका निवास रहता है एवं उनकी सेवा, वन्दना और ध्यान होता है, वहाँ लक्ष्मी सदा विद्यमान रहती हैं। जहाँ शिवलिङ्गकी पूजा और पवित्र कीर्तन तथा दुर्गापूजन एवं कीर्तन होता है, वहाँ कमलालया लक्ष्मी निवास करती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा होती है, उन्हें उत्तम पदार्थ भोजन कराये जाते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंका अर्चन होता है, वहाँ
प्रकृतिखण्ड २३९
पद्ममुखी साध्वी लक्ष्मी विराजती हैं।
नारद! रमापति भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण देवताओंसे यों कहकर श्रीलक्ष्मीसे कहा—'देवि! तुम अपनी कलासे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करना स्वीकार कर लो।' इस प्रकार लक्ष्मीसे कहनेके पश्चात् उन जगत्प्रभुने पुनः ब्रह्मासे कहा—'पद्मज! तुम समुद्रका मन्थन करो, उससे लक्ष्मी प्रकट होंगी। तब उन्हें देवताओंको सौंप देना।' मुने! यों अपना प्रवचन समाप्त करके कमलाकान्त भगवान् श्रीहरि अन्तःपुरमें चले गये। देवता उसी क्षण क्षीरसागरकी ओर चल पड़े। वहाँ सभी देवता और दानव एकत्रित हुए। मन्दराचल पर्वतको मन्थनकाष्ठ, कच्छपको पात्र तथा शेषनागको मन्थनकी रस्सी बनाकर वे क्षीरसमुद्रको मथने लगे। फलस्वरूप धन्वन्तरि वैद्य, अमृत, उच्चैःश्रवा घोड़ा, विविध रत्न, हाथियोंमें रत्न ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शनचक्र तथा वनमाला—ये अमूल्य पदार्थ उन्हें प्राप्त हुए। मुने! उस समय भगवान् विष्णुमें अपार श्रद्धा रखनेवाली साध्वी श्रीलक्ष्मीने क्षीरशायी सर्वेश्वर श्रीहरिके गलेमें वनमाला पहना दी। फिर देवता, ब्रह्मा और शंकरके पूजन एवं स्तवन करनेपर उन्होंने देवताओंके भवनपर केवल दृष्टि फैला दी। इतनेमें ही देवताओंने दुर्वासामु निके शापसे मुक्त होकर दैत्योंके हाथमें गये हुए अपने राज्यको प्राप्त कर लिया। नारद! यों महालक्ष्मीकी कृपासे वर पाकर वे परम सुखी हो गये।
इस प्रकार महालक्ष्मीका सम्पूर्ण श्रेष्ठ उपाख्यान मैंने बतला दिया। इस सारभूत उपाख्यानके प्रभावसे समस्त सुख प्राप्त हो जाता है। अब पुनः तुम क्या सुनना चाहते हो ?
नारदजीने कहा— प्रभो! मैं भगवान् श्रीहरिका मङ्गलमय गुणानुवर्णन, उत्तम ज्ञान तथा भगवती लक्ष्मीका अभीष्ट उपाख्यान सुन चुका। अब आप ध्यान और स्तोत्रका प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! प्राचीन समयकी बात है, देवराज इन्द्रने क्षीर-समुद्रके तटपर तीर्थमें स्नान किया, दो स्वच्छ वस्त्र पहने, एक कलश स्थापित किया और छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा। इन देवताओंकी गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक भलीभाँति पूजा करनेके पश्चात् इन्द्रने परम ऐश्वर्यस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीका आवाहन किया। अपने पुरोहित बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके बताये अनुसार पूजा सम्पन्न की। मुने! उस समय उस पवित्र देशमें अनेक मुनिगण, ब्राह्मण-समाज, गुरुदेव, श्रीहरि, देववृन्द तथा आनन्दमय ज्ञानस्वरूप भगवान् शंकर विराजमान थे। नारद! देवराजने पारिजातका चन्दन-चर्चित पुष्प लेकर भगवती महालक्ष्मीका ध्यान किया और उनकी पूजा की। पूर्वकालमें भगवान् श्रीहरिने ब्रह्माजीको जो ध्यान बतलाया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानसे इन्द्रने भगवतीका चिन्तन किया। मैं वह ध्यान तुम्हें बताता हूँ, सुनो—'परम-पूज्या भगवती महालक्ष्मी सहस्र दलवाले कमलकी कर्णिकाओंपर विराजमान हैं। इनकी सुन्दर साड़ी शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न है। ये परम साध्वी
३४- पितरोंकी प्रार्थनापर ब्रह्माजीद्वारा मानसी कन्या (स्वधा)-को प्रकट करना तथा उसे पत्नीरूपमें पितरोंको सौंपना
२४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
देवी स्वयं अपने तेजसे प्रकाशित हो रही हैं। इन परम मनोहर देवीका दर्शन पाकर मन आनन्दसे खिल उठता है। इनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। रत्नमय भूषण इनकी छवि बढ़ा रहे हैं। इन्होंने पीताम्बर पहन रखा है। इन प्रसन्न वदनवाली भगवती महालक्ष्मीके मुखपर मुस्कान छा रही है। ये सदा युवावस्थासे सम्पन्न रहती हैं और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाली हैं। ऐसी कल्याणस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीकी मैं उपासना करता हूँ।'
नारद! इस प्रकार ध्यान करके ब्रह्माजीके आज्ञानुसार सोलह प्रकारके उपचारोंसे देवराज इन्द्रने असंख्य गुणोंवाली उन भगवती महालक्ष्मीकी पूजा की। प्रत्येक वस्तुको भक्तिपूर्वक मन्त्र पढ़ते हुए विधिके साथ समर्पण किया। अनेक प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें उपस्थित कीं। [आसन—] 'भगवती महालक्ष्मी! जो अमूल्य रत्नोंका सार है तथा विश्वकर्मा जिसके निर्माता हैं, ऐसा यह विचित्र आसन सेवामें प्रस्तुत है, इसे स्वीकार कीजिये। [पाद्य—] कमलालये! इस शुद्ध गङ्गा-जलको सब लोग मस्तकपर चढ़ाते हैं। सभीको इसे पानेकी इच्छा लगी रहती है। पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये यह अग्निस্বরূপ है। आप इसे पाद्यरूपमें स्वीकार करें। [अर्घ्य—] पद्मवासिनि! शङ्खमें पुष्प, चन्दन, दूर्वा आदि श्रेष्ठ वस्तुएँ तथा गङ्गाजल रखकर शुद्ध अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे ग्रहण कीजिये। [सुगन्धित तैल—] श्रीहरिप्रिये! यह उत्तम गन्धवाले पुष्पोंसे सुवासित तैल तथा सुगन्धपूर्ण आमलकी फल शरीरकी सुन्दरता बढ़ानेका परम साधन है। आप इस स्नानोपयोगी वस्तुको स्वीकार करें। [धूप—] श्रीकृष्णकान्ते! वृक्षका रस सूखकर निर्यास (गोंद)-के रूपमें परिणत हो गया है। इसमें सुगन्धित द्रव्य मिला दिये गये हैं। ऐसा यह पवित्र धूप स्वीकार कीजिये। [चन्दन—] देवि! यह मनोहर चन्दन मलयगिरिसे उत्पन्न हुआ है। यह चन्दन-वृक्षका सार तत्त्व है, सुगन्धयुक्त एवं सुखदायक है। सेवामें समर्पित हुए इस चन्दनको स्वीकार करें। [दीप—] परमेश्वरि! जो जगत्के लिये चक्षुःस्वरूप है, जिसके सामने अन्धकार टिक नहीं सकता तथा जो शुद्धस्वरूप है, ऐसे इस प्रज्वलित दीपको स्वीकार कीजिये। [नैवेद्य—] देवि! यह नाना प्रकारका उपहारस्वरूप नैवेद्य नाना प्रकारके रससे पूर्ण तथा विविध स्वादसे युक्त है। इसे स्वीकार कीजिये। [अन्न—] देवि! अन्नको ब्रह्मस्वरूप माना गया है। प्राणकी रक्षा इसीपर निर्भर है। तृप्ति और पुष्टि प्रदान करना इसका सहज गुण है। आप इसे ग्रहण कीजिये। [खीर—]महालक्ष्मी! यह उत्तम पक्वान्न (खीर) चीनी और घृतसे युक्त है, इसे अगहनीके चावलसे तैयार किया गया है। आप कृपया इसे स्वीकार कीजिये। [स्वस्तिक नामक मिष्टान्न—] लक्ष्मि! शर्करा और घृतमें सिद्ध किया हुआ यह परम मनोहर स्वादिष्ट स्वस्तिक नामक नैवेद्य है। इसे आपकी सेवामें समर्पित किया गया है, स्वीकार करें। [फल—] कमले! ये अनेक प्रकारके सुन्दर पके हुए फल हैं, जो स्वादिष्ट होनेके साथ ही मनोवाञ्छित फल देनेवाले हैं। इन्हें ग्रहण कीजिये। [दुग्ध—] अच्युतप्रिये! सुरभी गौके स्तनसे निकला हुआ यह मृत्युलोकके लिये अमृतस्वरूप परम सुस्वादु दुग्ध है। आप इसे स्वीकार कीजिये। [गुड़—] देवि! ईखके स्वादभरे रसको अग्निपर पकाकर बनाया गया यह गुड़ है। इसे ग्रहण कीजिये। [मिष्टान्न—] देवि! जौ, गेहूँ आदिके
३१- भगवती दक्षिणाके प्राकट्यका प्रसङ्ग, उनका ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्र-वर्णन एवं चरित्र-श्रवणकी फल-श्रुति
प्रकृतिखण्ड २४१
चूर्णसे तैयार किया हुआ यह मिष्टान्न है। गुड़ और घृतके साथ अग्निपर यह सिद्ध किया गया है। इसे आप स्वीकार करें। [पिष्टक—] देवि! धान्यके चूर्णसे बनाये गये स्वस्तिक आदि चिह्नोंसे युक्त इस पिष्टकको भक्तिपूर्वक आपकी सेवामें समर्पित किया है; स्वीकार कीजिये। [ईख—] देवि! ईख इस भूतलका एक विशिष्ट वृक्ष है, इससे गुड़ आदि अनेक पदार्थ तैयार किये जाते हैं; अतः यह सुस्वादु रससे युक्त ईख सेवामें अर्पित है। इसे ग्रहण करें। [व्यजन—] कमले! शीतल वायु प्रदान करनेवाला यह व्यजन तथा स्वच्छ चँवर उष्णकालके लिये परम सुखदायी है। इसे ग्रहण कीजिये। [ताम्बूल—] देवि! यह उत्तम ताम्बूल कर्पूर आदि सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित एवं जिह्वाको स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है। इसे आप स्वीकार कीजिये। [जल—] देवि! प्यासको शान्त करनेवाला अत्यन्त शीतल, सुवासित एवं जगत्के लिये जीवन-स्वरूप यह जल स्वीकार कीजिये। [माल्य—] देवि! विविध ऋतुओंके पुष्पोंसे गूँथी गयी, असीम शोभाको देनेवाली तथा देवराजके लिये भी परम प्रिय इस पवित्र मालाको स्वीकार करें। [आचमनीय—] कृष्णकान्ते! यह पवित्र तीर्थ-जल, स्वयं शुद्ध तथा अन्यको भी सदा शुद्ध करनेवाला है। इसे आप रम्य आचमनीयके रूपमें स्वीकार करें। [शय्या—] देवि! यह अमूल्य रत्नोंसे बनी हुई सुन्दर शय्या वस्त्र और आभूषणोंसे सजायी गयी है, पुष्प और चन्दनसे चर्चित है। इसे आप स्वीकार करें। [अपूर्व द्रव्य—] देवि! यही नहीं, किंतु पृथ्वीपर जितने भी अपूर्व द्रव्य शरीरको सजानेके लिये परम उपयोगी हैं तथा देवराज इन्द्रके भी योग्य हैं, वे दुर्लभ वस्तुएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं। इन्हें स्वीकार करें*।'
मुने! देवराज इन्द्रने इस सूत्ररूप मन्त्रको
* प्रशस्यानि प्रकृष्टानि दुर्लभानि वराणि च। अमूल्यरत्नसारं च निर्मितं विश्वकर्मणा ॥
आसनं च विचित्रं च महालक्ष्मि प्रगृह्यताम् ॥
शुद्धं गङ्गोदकमिदं सर्ववन्दितमीप्सितम्। पापेन्धनवह्निरूपं च गृह्यतां कमलालये ॥
पुष्पचन्दनदूर्वादिसंयुतं जाह्नवीजलम्। शङ्खगर्भस्थितं शुद्धं गृह्यतां पद्मवासिनि ॥
सुगन्धिपुष्पतैलं च सुगन्धामलकीफलम्। देहसौन्दर्यबीजं च गृह्यतां श्रीहरेः प्रिये ॥
वृक्षनिर्यासस्वरूपं च गन्धद्रव्यादिसंयुतम्। श्रीकृष्णकान्ते धूपं च पवित्रं प्रतिगृह्यताम् ॥
मलयाचलसम्भूतं वृक्षसारं मनोहरम्। सुगन्धयुक्तं सुखदं चन्दनं देवि गृह्यताम् ॥
जगच्चक्षुःस्वरूपं च ध्वान्तप्रध्वंसकारणम्। प्रदीपं शुद्धरूपं च गृह्यतां परमेश्वरि ॥
नानोपहाररूपं च नानारससमन्वितम्। नानास्वादुकरं चैव नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
अन्नं ब्रह्मस्वरूपं च प्राणरक्षणकारणम्। तुष्टिदं पुष्टिदं चैव देव्यन्नं प्रतिगृह्यताम् ॥
शाल्यक्षतसुपक्वं च शर्करागव्यसंयुक्तम्। स्वादुयुक्तं महालक्ष्मि परमान्नं प्रगृह्यताम् ॥
शर्करागव्यपक्वं च सुस्वादु सुमनोहरम्। मया निवेदितं लक्ष्मि स्वस्तिकं प्रतिगृह्यताम् ॥
नानाविधानि रम्याणि पक्वानि च फलानि च। स्वादुयुक्तानि कमले गृह्यतां फलदानि च ॥
सुरभिस्तनसम्भूतं सुस्वादु सुमनोहरम्। मर्त्यामृतं सुगव्यं च गृह्यतामच्युतप्रिये ॥
सुस्वादुरससंयुक्तमिक्षुवृक्षसमुद्भवम् । अग्निपक्वमतिस्वादु गुडं च प्रतिगृह्यताम् ॥
यवगोधूमशस्यानां चूर्णीणुसमुद्भवम्। सुपक्वं गुडगव्याक्तं मिष्टान्नं देवि गृह्यताम् ॥
शस्यचूर्णोद्भवं पक्वं स्वस्तिकादिसमन्वितम्। मया निवेदितं देवि पिष्टकं प्रतिगृह्यताम् ॥
पार्थिवो वृक्षभेदश्च विविधद्रव्यकारणम्। सुस्वादुरससंयुक्तं ईक्षुश्च प्रतिगृह्यताम् ॥
२४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पढ़कर भगवती महालक्ष्मीको उपर्युक्त द्रव्य समर्पण | रत्नमय भूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक विधिसहित उनके | मुखपर मुस्कान छायी थी। भक्तपर कृपा करनेके मूलमन्त्रका दस लाख जप किया, जिसके फलस्वरूप | लिये वे परम आतुर थीं। उनके गलेमें रत्नोंका हार उन्हें मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो गयी। यह मूल-मन्त्र | शोभा पा रहा था। असंख्य चन्द्रमाके समान सभीके लिये कल्पवृक्षके समान है। ब्रह्माजीकी | उनकी प्रभा थी। ऐसी शान्तस्वरूपा जगदम्बा कृपासे यह उन्हें प्राप्त हुआ था। पूर्वमें श्रीबीज | भगवती महालक्ष्मीको देखकर देवराज इन्द्र उनकी (श्रीं), मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और | स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रके सर्वाङ्गमें वाणीबीज (ऐं) का प्रयोग करके 'कमलवासिनी' | पुलकावली छा गयी थी। उनके नेत्र आनन्दके इस शब्दके अन्तमें 'ङे' विभक्ति लगानेपर | आँसुओंसे पूर्ण थे और उनकी अञ्जलि बँधी थी। अन्तमें 'स्वाहा' शब्द जोड़ दिया जाय (श्रीं ह्रीं | ब्रह्माजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट प्रदान करनेवाला क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा) - यही इस मन्त्रराजका | वैदिक स्तोत्रराज उन्हें स्मरण था। इसीको पढ़कर स्वरूप है। कुबेरने इसी मन्त्रसे भगवती महालक्ष्मीकी | उन्होंने स्तुति आरम्भ की। आराधना करके परम ऐश्वर्य प्राप्त किया। | देवराज इन्द्र बोले- भगवती कमलवासिनीको इसी मन्त्रके प्रभावसे दक्षसावर्णि मनुको | नमस्कार है। देवी नारायणीको बार-बार नमस्कार राजाधिराजकी पदवी प्राप्त हुई है तथा मङ्गल सातों | है। संसारकी सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्माको द्वीपोंके राजा हुए हैं। | अनेकशः नमस्कार है। कमलरत्नके समान नेत्रवाली नारद ! प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा राजा केदार- | कमलमुखी भगवती महालक्ष्मीको नमस्कार है। इन सिद्धपुरुषोंको राजेन्द्र कहलानेका सौभाग्य | पद्मासना, पद्मिनी एवं वैष्णवी नामसे प्रसिद्ध भगवती इसी मन्त्रने दिया है। | महालक्ष्मीको बार-बार नमस्कार है। इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर भगवती | सर्वसम्पत्स्वरूपिणी सर्वदात्री देवीको नमस्कार है। महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन दिये। उस समय वे | सुखदायिनी, मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवीको वरदायिनी सर्वोत्तम रत्नसे निर्मित विमानपर | बारंबार नमस्कार है। भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न विराजमान थीं और अपनी प्रभासे सप्तद्वीपवती | करनेवाली तथा हर्ष प्रदान करनेमें परम कुशल पृथ्वीको आच्छादित कर रही थीं। उनकी | देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके पुष्पके समान थी। | वक्षःस्थलपर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवीको शीतवायुप्रदं चैव दाहे च सुखदं परम्। कमले गृह्यतां चेदं व्यजनं श्वेतचामरम्॥ ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्। जिह्वाजाड्यच्छेदकरं ताम्बूलं देवि गृह्यताम्॥ सुवासितं शीतलं च पिपासानाशनकारणम्। जगज्जीवनरूपं च जीवनं देवि गृह्यताम्॥ देहसौन्दर्यबीजं च सदा शोभाविवर्धनम्। कार्पासजं च कृमिजं वसनं देवि गृह्यताम् ॥ रत्नस्वर्णविकारं च देहभूषाविवर्धनम्। शोभाधानं श्रीकरं च भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥ नानाकुसुवनिर्माणं बहुशोभाप्रदं परम्। सुरभूपप्रियं शुद्धं माल्यं देवि प्रगृह्यताम्॥ पुण्यतीर्थोदकं चैव विशुद्धं शुद्धिदं सदा। गृह्यतां कृष्णकान्ते त्वं रम्याचमनीयकम्॥ रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनसंयुतम्। रत्नभूषणभूषाढ्यं सुतल्पं देवि गृह्यताम्॥ यद्यद् द्रव्यमपूर्वं च पृथिव्यामपि दुर्लभम् । देवभूपार्हभोग्यं च तद्द्रव्यं देवि गृह्यताम्॥ (प्रकृतिखण्ड ३९। १५-४०)
प्रकृतिखण्ड २४३ बारंबार प्रणाम है। रत्नपद्मे ! शोभने ! तुम श्रीकृष्णकी शोभास्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी एवं महादेवी हो; तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ। शस्यकी अधिष्ठात्री देवी एवं शस्यस्वरूपा हो, तुम्हें बारंबार नमस्कार है। बुद्धिस্বরূপा एवं बुद्धिप्रदा भगवतीके लिये अनेकशः प्रणाम है। देवि ! तुम वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, क्षीरसमुद्रमें लक्ष्मी, राजाओंके भवनमें राजलक्ष्मी, इन्द्रके स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी, गृहस्थोंके घरमें गृहलक्ष्मी, प्रत्येक घरमें गृहदेवता, गोमाता सुरभि और यज्ञकी पत्नी दक्षिणाके रूपमें विराजमान रहती हो। तुम देवताओंकी माता अदिति हो। कमलालयवासिनी कमला भी तुम्हीं हो। हव्य प्रदान करते समय 'स्वाहा' और कव्य प्रदान करनेके अवसरपर 'स्वधा' का जो उच्चारण होता है, वह तुम्हारा ही नाम है। सबको धारण करनेवाली विष्णुस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। भगवान् नारायणकी उपासनामें सदा तत्पर रहनेवाली देवि ! तुम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हो। तुममें क्रोध और हिंसाके लिये किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। तुम्हें वरदा, शारदा, शुभा, परमार्थदा एवं हरिदास्यप्रदा कहते हैं। तुम्हारे बिना सारा जगत् भस्मीभूत एवं निःसार है। जीते-जी ही मृतक है, शवके तुल्य है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी श्रेष्ठ माता हो। सबके बान्धवरूपमें तुम्हारा ही पधारना हुआ है। तुम्हारे बिना भाई भी भाई-बन्धुओंके लिये बात करने योग्य भी नहीं रहता है। जो तुमसे हीन है, वह बन्धुजनोंसे हीन है तथा जो तुमसे युक्त है, वह बन्धुजनोंसे भी युक्त है। तुम्हारी ही कृपासे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार बचपनमें दुधमुँहे बच्चोंके लिये माता है, वैसे ही तुम अखिल जगत्की जननी होकर सबकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण किया करती हो। स्तनपायी बालक माताके न रहनेपर भाग्यवश जी भी सकता है; परंतु तुम्हारे बिना कोई भी नहीं जी सकता। यह बिलकुल निश्चित है। अम्बिके! सदा प्रसन्न रहना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। अतः मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सनातनी ! मेरा राज्य शत्रुओंके हाथमें चला गया है, तुम्हारी कृपासे वह मुझे पुनः प्राप्त हो जाय। हरिप्रीये ! मुझे जबतक तुम्हारा दर्शन नहीं मिला था, तभीतक मैं बन्धुहीन, भिक्षुक तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे शून्य था। सुरेश्वरि ! अब तो मुझे राज्य दो, श्री दो, बल दो, कीर्ति दो, धन दो और यश भी प्रदान करो। हरिप्रीये ! मनोवाञ्छित वस्तुएँ दो, बुद्धि दो, भोग दो, ज्ञान दो, धर्म दो तथा सम्पूर्ण अभिलषित सौभाग्य दो। इसके सिवा मुझे प्रभाव, प्रताप, सम्पूर्ण अधिकार, युद्धमें विजय, पराक्रम तथा परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति भी कराओ।* नारद! इस प्रकार कहकर सम्पूर्ण देवताओंके
- इन्द्र उवाच ॐ नमो महालक्ष्म्यै ॥ ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः। कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः ॥ पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः। पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः। सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः ॥ हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः। कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ॥ कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने। सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ॥ शस्याधिष्ठातृदेव्यै च शस्यायै च नमो नमः। नमो बुद्धिस্বরূপायै बुद्धिदायै नमो नमः ॥ वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्या लक्ष्मीः क्षीरसागरे। स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥ गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता। सुरभिः सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥ अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये। स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥
३५- दक्षिणासे यज्ञपुरुषका अपने-आपको स्वामी बनानेके लिये निवेदन
| २४४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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साथ देवराज इन्द्रने मस्तक झुकाकर भगवती महालक्ष्मीको बार-बार प्रणाम किया। उस समय उनकी आँखोंमें प्रेमानन्दके आँसू भर आये थे। देवताओंके कल्याणार्थ ब्रह्मा, शंकर, शेषनाग, धर्म तथा केशव—इन सभी महानुभावोंने भगवती महालक्ष्मीसे प्रार्थना की। तब उस देवसभामें शोभा पानेवाली भगवती प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने देवताओंको वर दिया और भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर पुष्पमाला समर्पण की। सभी देवता अपने-अपने स्थानपर चले गये। स्वयं भगवती महालक्ष्मी क्षीरशायी भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर प्रसन्नतापूर्वक पधार गयीं। मुने! ब्रह्मा और शंकर भी देवताओंको शुभ आशीर्वाद देकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए अपने-अपने धामको चले गये। यह स्तोत्र महान् पवित्र है। इसका त्रिकाल पाठ करनेवाला बड़भागी पुरुष कुबेरके समान राजाधिराज हो सकता है। पाँच लाख जप करनेपर मनुष्योंके लिये यह स्तोत्र सिद्ध होता है। यदि इस सिद्ध स्तोत्रका कोई निरन्तर एक महीनेतक पाठ करे तो वह महान् सुखी एवं राजेन्द्र हो जायगा—इसमें कोई संशय नहीं है।
(अध्याय ३८-३९)
भगवती स्वाहा तथा भगवती स्वधाका उपाख्यान, उनके ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्रोंका वर्णन
नारदजीने कहा—प्रभो! मुनिवर नारायण! आप रूप, गुण, यश, तेज एवं कान्तिमें साक्षात् भगवान् नारायणके ही समान हैं। मुने! आप ही ज्ञानियों, सिद्धों, योगियों, तपस्वियों और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी कृपासे मुझे महालक्ष्मीका महान् अद्भुत उपाख्यान ज्ञात हो गया। अब आप उचित समझें तो भगवती स्वाहा, भगवती स्वधा और भगवती दक्षिणाके चरित्र तथा उनका महत्त्व सुनायें।
सूतजी कहते हैं—मुनियो! नारदजीकी बात सुनकर मुनिवर नारायण हँस पड़े और उन्होंने पुराणोक्त प्राचीन उपाख्यान कहना आरम्भ किया।
त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वधारा वसुंधरा। शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा॥
क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा च शुभानना। परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा॥
यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम्। जीवन्मृतं च विश्वं च शवतुल्यं यया विना॥
सर्वेषां च परा त्वं हि सर्वबान्धवरूपिणी। यया विना न सम्भाव्यो बान्धवैर्बान्धवः सदा॥
त्वया हीनो बन्धुहीनो त्वया युक्तः सबान्धवः। धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी॥
यथा माता स्तनन्धानां शिशूनां शैशवे सदा। तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः॥
मातृहीनः स्तनान्धश्च स चेज्जीवति दैवतः। त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम्॥
सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मां प्रसन्ना भवाम्बिके। वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि॥
वयं यावत् त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः। सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये॥
राज्यं देहि श्रियं देहि बलं देहि सुरेश्वरि। कीर्तिं देहि धनं देहि यशो मह्यं च देहि वै॥
कामं देहि मतिं देहि भोगान् देहि हरिप्रिये। ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम्॥
प्रभावं च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च। जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च॥
(प्रकृतिखण्ड ४९। ५१-७१)
३२- देवी षष्ठीके ध्यान, पूजन, स्तोत्र तथा विशद महिमाका वर्णन
प्रकृतिखण्ड २४५
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! सृष्टिके प्रारम्भिक समयकी बात है—देवता भोजनकी व्यवस्थाके लिये ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी मनोहारिणी सभामें गये। मुने! वहाँ जाकर उन्होंने अपने आहारके लिये ब्रह्माजीसे प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें भोजन देनेकी प्रतिज्ञा करके श्रीहरिके चरणोंकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि अपनी कलासे यज्ञरूपमें प्रकट हुए। उस यज्ञमें जिस-जिस हविष्यकी आहुति दी गयी, वह सब ब्रह्माजीने देवताओंको दिया; किंतु ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण भक्तिपूर्वक जो हवन करते थे, वह देवताओंको उपलब्ध नहीं होता था। इसीसे सब उदास होकर ब्रह्मसभामें गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने आहार न मिलनेकी बात बतलायी। ब्रह्माजीने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। फिर भगवान्की आज्ञासे उन्होंने ध्यानके द्वारा ही मूलप्रकृतिकी पूजा की। तब सर्वशक्तिस्वरूपिणी भगवती प्रकृति अपनी कलाद्वारा अग्निकी दाहिकाशक्ति ‘स्वाहा’ के रूपमें प्रकट हुई। उन परम सुन्दरी देवीके विग्रहकी सुन्दर श्याम कान्ति थी। वे मनोहारिणी देवी मुस्करा रही थीं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्यग्रचित्तवाली उन भगवती स्वाहाने ब्रह्माजीके सम्मुख उपस्थित होकर उनसे कहा—‘पद्मयोने! तुम वर माँगो!’ तदनन्तर ब्रह्माजीने भगवतीका वचन सुनकर सम्भ्रमपूर्वक कहा।
ब्रह्माजी बोले—तुम अग्निकी दाहिकाशक्ति तथा उनकी परम सुन्दरी पत्नी होनेकी कृपा करो। तुम्हारे बिना अग्नि आहुतियोंको भस्म करनेमें असमर्थ हैं। जो मानव मन्त्रके अन्तमें तुम्हारे नामका उच्चारण करके देवताओंके लिये हवनीय पदार्थ अर्पण करें, उनका वह हविष्य देवताओंको सहज ही उपलब्ध हो जाय। अम्बिके! तुम अग्निदेवकी सर्वसम्पत्स्वरूपा एवं श्रीरूपिणी गृहस्वामिनी बनो। देवता और मनुष्य सदा तुम्हारी पूजा करेंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवती स्वाहा देवी उदास हो गयीं। उन्होंने स्वयं ब्रह्माजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया।
स्वाहा बोलीं—ब्रह्मन्! मैं दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करूँगी। उन परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त जो कुछ भी है सब स्वप्नके समान भ्रममात्र है। तुम जो जगत्की सृष्टि करते हो, भगवान् शंकरने जो मृत्युपर विजय प्राप्त की है, शेषनाग जो अखिल विश्वको धारण करते हैं, धर्म जो समस्त देहधारियोंके साक्षी हैं, गणेशजी जो सम्पूर्ण देव-समाजमें सर्वप्रथम पूजा प्राप्त करते हैं तथा जगदम्बा प्रकृतिदेवी जो सर्वपूज्या हुई हैं—यह सब उन भगवान् श्रीकृष्णके कृपा-प्रसादका ही फल है। भगवान् श्रीकृष्णके सेवक होनेसे ही ऋषियों और मुनियोंका सर्वत्र सम्मान है। अतः पद्मज! मैं भी एकमात्र उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णके चरण-कमलोंका सानुराग चिन्तन करती हूँ।
ब्रह्माजीसे यों कहकर वे कमलमुखी देवी स्वाहा निरामय भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये चल दीं। फिर एक पैरसे खड़ी होकर उन्होंने श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। तब प्रकृतिसे परे निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्णके दर्शन उन्हें प्राप्त हुए। भगवान्के परम कमनीय सौन्दर्यको देखकर सुरूपिणी देवी स्वाहा मूर्च्छित-सी हो गयीं; क्योंकि वे उन कामेश्वर प्रभुको कान्तभावसे चाहने लगी थीं।
| २४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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चिरकालतक तपस्या करनेके कारण क्षीण शरीरवाली देवी स्वाहाके अभिप्रायको वे सर्वज्ञ प्रभु समझ गये। उन्होंने उन्हें उठाकर अपने अङ्कमें बैठा लिया और कहा।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— कान्ते! तुम वाराहकल्पमें अपने अंशसे मेरी प्रिया बनोगी। तुम्हारा नाम 'नाग्नजिती' होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्तिके रूपमें अग्निकी प्रिय पत्नी बनो। मेरे प्रसादसे तुम मन्त्रोंकी अङ्गभूता एवं परम पवित्र होओगी। अग्निदेव तुम्हें अपनी गृहस्वामिनी बनाकर भक्ति-भावके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम परम रमणीया देवीके साथ वे सानन्द विहार करेंगे।
नारद! देवी स्वाहासे इस प्रकार सम्भाषण करके उन्हें आश्वासन दे भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये। फिर ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार डरते हुए अग्निदेव वहाँ आये और सामवेदमें कही हुई विधिसे जगज्जननी भगवतीका ध्यान करके उन्होंने देवीकी भलीभाँति पूजा और स्तुति की। तत्पश्चात् अग्निदेवने मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्वाहादेवीका पाणिग्रहण किया। देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक वे उनके साथ आनन्द करते रहे। परम सुखप्रद निर्जन देशमें रहते समय देवी स्वाहा अग्निदेवके तेजसे गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं, तत्पश्चात् दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्निके क्रमसे उनके मनको मुग्ध करनेवाले परम सुन्दर तीन पुत्र उनसे उत्पन्न हुए। तब ऋषि, मुनि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय आदि सभी श्रेष्ठ वर्ण 'स्वाहान्त' मन्त्रोंका उच्चारण करके अग्निमें हवन करने लगे और देवताओंको वह आहाररूपसे प्राप्त होने लगा। जो पुरुष स्वाहायुक्त प्रशस्त मन्त्रका उच्चारण करता है, उसे केवल मन्त्र पढ़नेमात्रसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार विषहीन सर्प, वेदहीन ब्राह्मण, पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्याहीन पुरुष तथा फल एवं शाखाहीन वृक्ष निन्दाके पात्र हैं, वैसे ही स्वाहाहीन मन्त्र भी निन्द्य है। ऐसे मन्त्रसे किया हुआ हवन शीघ्र फल नहीं देता। फिर तो सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गये। देवताओंको आहुतियाँ मिलने लगीं। स्वाहान्त मन्त्रसे ही उनके सारे कर्म सफल होने लगे। मुने! भगवती स्वाहासे सम्बन्ध रखनेवाला इस प्रकार यह सारा श्रेष्ठ उपाख्यान कह सुनाया। यह सारभूत प्रसङ्ग सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हो ?
नारदजीने कहा— प्रभो! मुनीश्वर! अब मुझे भगवती स्वाहाकी पूजाका वह विधान, ध्यान एवं स्तोत्र बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे अग्निदेवने उनकी पूजा करके स्तुति की थी।
भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! मुनिवर! भगवती स्वाहाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाका जो विधान सामवेदमें कहा गया है, वही मैं तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। पुरुषको चाहिये कि फल प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भमें शालग्रामकी प्रतिमामें अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका पूजन करके यज्ञ आरम्भ करे। ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—'देवी स्वाहा मन्त्रोंकी अङ्गभूता होनेसे परम पवित्र हैं। ये मन्त्रसिद्धिरूपिणी हैं। सिद्ध एवं सिद्धिदायिनी हैं तथा मनुष्योंको उनके सम्पूर्ण कर्मोंका फल
तथा सुव्रतको उसे प्रदान करना
प्रकृतिखण्ड २४७
देनेवाली हैं। मैं उनका भजन करता हूँ।' मुने ! यों ध्यान करके मूलमन्त्रसे पाद्य आदि अर्पण करनेके पश्चात् स्तोत्रका पाठ करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मूलमन्त्र यह है—'ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजायायै देव्यै स्वाहा'। इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक जो भगवती स्वाहाकी पूजा करता है, उसके सारे मनोरथ अवश्य पूर्ण हो जाते हैं।
अग्निदेव बोले—स्वाहा, आद्या, प्रकृत्यंशा, मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी, मन्त्रफलदात्री, जगद्धात्री, सती, सिद्धस्वरूपा, सिद्धा, सदा नृणां सिद्धिदा, हुताशदाहिकाशक्ति, हुताशप्राणाधिकरूपिणी, संसारसाररूपा, घोरसंसारतारिणी, देवजीवनरूपा और देवपोषणकारिणी—ये सोलह नाम भगवती स्वाहाके हैं। जो भक्तिपूर्वक इनका पाठ करता है, उसे इस लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है*। उसका कोई भी कर्म अङ्गहीन नहीं होता। उसे सब कर्मोंमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। इन सोलह नामोंके प्रभावसे पुत्रहीनको पुत्र तथा भार्याहीनको प्रिय भार्या प्राप्त हो जाती है।
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने ! अब भगवती स्वधाका उत्तम उपाख्यान कहता हूँ, सुनो। यह पितरोंके लिये तृप्तिप्रद एवं श्राद्धोंके फलको बढ़ानेवाला है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माने सृष्टिके आरम्भमें सात पितरोंका सृजन किया; उनमें चार तो मूर्तिमान् थे और तीन तेजःस्वरूप थे। उन सातों सिद्धस्वरूप मनोहर पितरोंको देखकर उनके भोजनके लिये श्राद्ध-तर्पणपूर्वक दिया हुआ पदार्थ निश्चित किया। तर्पणान्त स्नान, श्राद्धपर्यन्त देवपूजन तथा त्रिकालसंध्यान्त आह्निक कर्म—यह ब्राह्मणोंका परम कर्तव्य है। यह बात श्रुतिमें प्रसिद्ध है। जो ब्राह्मण नित्य त्रिकालसंध्या, श्राद्ध, तर्पण, बलिवैश्वदेव और वेदध्वनि नहीं करता, उसे विषहीन सर्पके समान शक्तिहीन समझना चाहिये। नारद ! श्रीहरिकी सेवासे वञ्चित तथा भगवान्को भोग लगाये बिना खानेवाला मनुष्य जीवनपर्यन्त अपवित्र रहता है। उसे कोई भी शुभकार्य करनेका अधिकार नहीं है। इस प्रकार ब्रह्माजी तो पितरोंके आहारार्थ श्राद्ध आदिका विधान करके चले गये; परंतु ब्राह्मण आदि उनके लिये जो कुछ देते थे, उसे पितर पाते नहीं थे। अतः वे सभी क्षुधा शान्त न होनेके कारण दुःखी होकर ब्रह्माजीकी सभामें गये। उन्होंने वहाँ जाकर ब्रह्माजीको सारी बातें बतायीं। तब उन महाभाग विधाताने एक परम सुन्दर मानसी कन्या प्रकट की।
सैकड़ों चन्द्रमाकी प्रभाके समान मुखवाली वह देवी रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। उस साध्वी देवीमें विद्या, गुण, बुद्धि और रूप सम्यक् प्रकारसे विद्यमान थे। श्वेत चम्पाके समान उसका उज्ज्वल वर्ण था। वह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित थी। मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी अंशभूता वह शुद्धस्वरूपा देवी मन्द-मन्द मुस्करा रही थी। वर देनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी उस सुन्दरीका नाम 'स्वधा' रखा गया। भगवती लक्ष्मीके सभी शुभ लक्षण उसमें विराजमान थे। उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह अपने चरणकमलोंको शतदल
* वह्निरुवाच—
स्वाहाद्या प्रकृतेरंशा मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी । मन्त्राणां फलदात्री च धात्री च जगतां सती ॥
सिद्धस्वरूपा सिद्धा च सिद्धिदा सर्वदा नृणाम् । हुताशदाहिकाशक्तिस्तत्प्राणाधिकरूपिणी ॥
संसारसाररूपा च घोरसंसारतारिणी । देवजीवनरूपा च देवपोषणकारिणी ॥
षोडशैतानि नामानि यः पठेद्भक्तिसंयुतः । सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य इहलोके परत्र च ॥
(प्रकृतिखण्ड ४०। ५१—५४)
| २४८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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कमलपर रखे हुए थी। उसके मुख और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उसे पितरोंकी पत्नी बनाया गया। ब्रह्माजीने पितरोंको संतुष्ट करनेके लिये यह तुष्टिस्वरूपिणी पत्नी उन्हें सौंप दी। साथ ही अन्तमें 'स्वधा' लगाकर मन्त्रोंका उच्चारण करके पितरोंके उद्देश्यसे पदार्थ अर्पण करना चाहिये—यह गोपनीय बात भी ब्राह्मणोंको बतला दी। तबसे ब्राह्मण उसी क्रमसे पितरोंको कव्य प्रदान करने लगे। यों देवताओंके लिये वस्तुदानमें 'स्वाहा' और पितरोंके लिये 'स्वधा' शब्दका उच्चारण श्रेष्ठ माना जाने लगा। सभी कर्मों (यज्ञों)-में दक्षिणा उत्तम मानी गयी है। दक्षिणाहीन यज्ञ नष्टप्राय कहा गया है। उस समय देवता, पितर, ब्राह्मण, मुनि और मानव—इन सबने बड़े आदरके साथ उन शान्तस्वरूपिणी भगवती स्वधाकी पूजा एवं स्तुति की। देवीके वर-प्रसादसे वे सब-के-सब परम संतुष्ट हो गये। उनकी सारी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं।
मुने! इस प्रकार भगवती स्वधाके सम्पूर्ण उपाख्यानका वर्णन मैंने तुम्हारे सामने कर दिया। यह सबके लिये तुष्टिकारक है। पुनः क्या सुनना चाहते हो?
नारदजीने कहा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महामुने! अब मैं भगवती स्वधाकी पूजाका विधान, ध्यान और स्तोत्र सुनना चाहता हूँ। यत्नपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! देवी स्वधाका ध्यान-स्तवन वेदोंमें वर्णित है, अतएव सबके लिये मान्य है। शरत्कालमें आश्विन मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रमें अथवा श्राद्धके दिन यत्नपूर्वक भगवती स्वधाकी पूजा करके तत्पश्चात् श्राद्ध करना चाहिये। जो अभिमानी ब्राह्मण स्वधा देवीकी पूजा न करके श्राद्ध करता है, वह श्राद्ध और तर्पणके फलका भागी नहीं होता—यह सर्वथा सत्य है। 'भगवती स्वधा ब्रह्माजीकी मानसी कन्या हैं, ये सदा तरुणावस्थासे सम्पन्न रहती हैं। पितरों और देवताओंके लिये सदा पूजनीया हैं। ये ही श्राद्धोंका फल देनेवाली हैं। इनकी मैं उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके शालग्राम-शिला अथवा मङ्गलमय कलशपर इनका आवाहन करना चाहिये। तदनन्तर मूलमन्त्रसे पाद्य आदि उपचारोंद्वारा इनका पूजन करना चाहिये। महामुने! 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्राह्मण इनकी पूजा, स्तुति और इन्हें प्रणाम करें। ब्रह्मपुत्र विज्ञानी नारद! अब स्तोत्र सुनो। यह स्तोत्र मानवोंके लिये सम्पूर्ण अभिलाषा प्रदान करनेवाला है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इसका पाठ किया था।
ब्रह्माजी बोले— 'स्वधा' शब्दके उच्चारण-मात्रसे मानव तीर्थस्नायी समझा जाता है। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर वाजपेय-यज्ञके फलका अधिकारी हो जाता है। 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाय तो श्राद्ध, बलि और तर्पणके फल पुरुषको प्राप्त हो जाते हैं। श्राद्धके अवसरपर जो पुरुष सावधान होकर स्वधा देवीके स्तोत्रका श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धोंका फल पा लेता है—इसमें संशय नहीं