भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

१४४ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

की तरह खींचना होगा। इसी में पुरुषार्थ है ! इसी में कीर्ति है !! और इसी में ब्रह्मचर्य की रक्षा है !!! प्रतिज्ञा का स्मारक रखो। (इस ग्रन्थ का “मन व इन्द्रियां” यह प्रकरण बार बार पढ़ो और रोज पढ़ो)।

“डायरी”

नियम सोलहवाः—

“स्मरण वही” अथवा Diary यह एक मनुष्य का सब से घनिष्ट मित्र है। उसके पास हम जो चाहे सो जी खोल के बोल सकते हैं। यदि आपको आत्म-सुधार करना हो तो रोज दिन भर के भले घुरे कार्यों का वर्णन डायरी में ज्यों का त्यों लिखा करो और सोते समय उस पर गंभीर विचार किया करो, जिससे कि मनुष्य की श्रेष्ठता का तथा नीचता का परिचय भली भाँति हो जाय और उसको अपने कर्मों के लिए हर्ष व पछतावा होकर, वह श्रेष्ठ पुरुषों के समान बनने के लिये कटिबद्ध हो जाय। प्रत्येक मास के अनन्तर दोष और गुण की सूची लिखा करोगे तो उसे अवलोकन करने में बहुत ही सुभीता तथा कल्याण होगा।

डायरी के लिखने से मनुष्य में सत्य का संचार होता है, आत्म-सुधार का दृढ़-संकल्प हठात् घुस जाता है, समय का आदर होने लगता है, नियमितता शरीर में भिन जाती है और आत्म-विश्वास के साथ ही साथ आत्मिक-बल भी बढ़ने लगता है।

“दूसरों के दोष देखने से मनुष्य दोषी बनता है और अपने

डायरी

[ १४५ ]

दोष देखने से वह पवित्र बन जाता है।” दूसरों के दोष देखने के वनिस्वत—जो कि पतन का मूल है—यदि मनुष्य अपने ही दोष देखा करेगा तो उसका उद्धार इसी जन्म में हो सकता है। महा पुरुष कहते हैं:—

यथाहि निपुणः सम्यक् परदोषेक्षणं प्रति । तथाचेन्नपुणःस्वेषु को न मुच्येत वंघनात् ॥

“जैसे यह पुरुष परदोषों के निरूपण करने में अति कुशल हैं तैसे ही यदि अपने दोषों के निरूपण करने में निपुण हो, तो ऐसा कौन पुरुष है कि जो संसार के कठोर बन्धनों से छूट कर मुक्त न हो जाय ?” दोषों के निरूपण करने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य को उसकी नीचता का परिचय भली भाँति हो जाय, उसे “सच्चा पछतावा” उत्पन्न हो और महा पुरुषों की तरह वह सदाचारी एवं श्रेष्ठ बन जाय। परमात्मा की जब बड़ी भारी कृपा होती है तब मनुष्य को अपने दोष दिखाई देते हैं और उसी क्षण उसकी उन्नति का आरम्भ समझना चाहिये। बड़ों के पास अपने दोष कहने से और छोटों के पास ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णन करने से भी दोषों की उत्कृष्ट शुद्धि होती है। महापुरुषों के और हमारे वर्ताव में क्या अन्तर है और कौन से दोष त्यागने से हम भी सदाचारी, ब्रह्मचारी और महापुरुष बन सकते हैं यह हमें हमारी “डायरी” बतला सकती है। अतएव आत्मोद्धार के लिए “रोज डायरी का लिखना” अतीव उपकारी है।

१०

१४६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“सततोद्योग”

नियम सत्रहवाँ:—

सम्पूर्ण दुर्गुणों का तथा दुर्भाग्य का मूल कारण एक मात्र आलस्य है, जो कि लोक और परलोक का प्रबल शत्रु है। बेकार स्त्री-पुरुष सदा विकारी व प्रमादी होते हैं और विकारी तथा प्रमादी स्त्री-पुरुषों का ब्रह्मचारी होना सर्वथा असम्भव है। नीचे विचारों को दमन करने के लिये सुविचार एक श्रेष्ठतम उपाय है; सुविचार से भी “सुकर्मरतता” ( न कि कुकर्मरतता ) सर्व-श्रेष्ठ साधन है। “Constant occupation prevents temptation” सुकर्म में फँसे हुए मनुष्य के पास प्रलोभन नहीं आ सकता। आलस्य से मनुष्य के भीतर की संपूर्ण उच्च शक्तियां दब जाती हैं और शुभ कर्मों से—सततोद्योग से संपूर्ण दैवी शक्तियां एक एक करके प्रगट होने लगती हैं और इसी जन्म में मनुष्य के जीवन का प्रचण्ड विकास हो, उसकी कीर्ति-सुगंधि चारों ओर फैल जाती है। निरुद्योगी अर्थात् आलसी पुरुष सप्त जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। एक मात्र सततोद्योगी ही ब्रह्मचर्य को धारण कर सकता है। आलसी पुरुष जीते जी ही मुर्दा बन जाता है, आलसी पुरुष सदा सर्वदा पापी बना रहता है, संक्षेपतः उद्योग ही जीवन है और आलस्य ही मरण है, उद्योग ही पुण्य है और आलस्य ही पाप है—नरक है अतः जिन्हें पुण्यवान्, भाग्यवान् कीर्तिवान् और वीर्यवान् महापुरुष बनना हो, उन्हें परमावश्यक है कि वे सदा, सर्वदा शुभ कर्मों ही में फँसे रहें। जब कभी कुकर्म की ओर मन जाय तब “तत्काल” कोई अच्छी किताब पढ़ने अथवा इस ग्रंथ

❁ स्वधर्मानुष्ठान ❁

[ १४७ ]

के इन्हीं नियमों को पढ़ने व कोई अच्छा काम करने वा भगवान् का जोर से नाम स्मरण करने लगेँ अथवा कोई अच्छा भजन गाने लग जायँ। निसर्देह तुम्हारी नीच वासनायें दब जायँगी और पवित्र वासनाओं का उदय होगा। किंवा उस स्थान से हट कर तत्काल सन्निधों में आकर बैठने से और कोई अच्छा विषय छेड़ देने से हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम साफ बच जाओगे। अतः वीर्यरक्षा के लिये प्रत्येक व्यक्ति को आलस्य पर लात मार सततोंचोगी अवश्य ही बनना होगा; क्योंकि आलसी पुरुष को कामदेव पटक पटक कर मारता है। यदि हम सतत शुद्ध उचोगी न बनेंगे तो आलस्य ही हमें लात मार कर जमीन में मिला देगा, यह पूर्ण निश्चय जानो। अतः ब्रह्मचारी को सदैव शुभ कर्मों में ही डूबे रहना चाहिए हाथ पर हाथ रख कर निठल्ले बैठने में कुछ विश्रान्ति नहीं है। सच्ची विश्रान्ति काम को बदल बदल कर करने में अर्थात् भिन्न भिन्न कार्य करने ही में है।

“स्वधर्मानुष्ठान”

नियम अठारहवाँ:—

“स्वधर्मै निधनं श्रेयः परधर्मे भयावहः।”

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वधर्म में मृत्यु श्रेष्ठ परन्तु पर धर्म में जीना भयानक है—निन्दित है।” जो अपने धर्म में प्रीति नहीं कर सकता उसका दूसरे धर्म में प्रीति करना आडम्बर मात्र है, वह उसका व्यभिचार है। धर्म कोई भी हो परन्तु उसमें “हृद

१४८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

विश्वास” की परम आवश्यकता है। श्रद्धा वगैरः सभी धर्म-कर्म वृथा हैं। दृढ़ विश्वास होने पर धर्मान्तर करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है और दृढ़ विश्वास धर्म के अज्ञान से नहीं होने पाता। अतः सब से प्रथम अपने ही धर्म का पूरा ज्ञान कर लो। स्वधर्म के अज्ञान से ही मनुष्य पर-धर्म को स्वीकार करता है: जो कि उसकी प्रकृति यानी स्वभाव धर्म के विरुद्ध होने के कारण महान् विनाशक है। यह नितान्त सत्य है कि प्रत्येक धर्म उसी एक परमात्मा के तरफ जाने का रास्ता है; तब फिर स्वधर्म का त्याग कर, पर धर्म के स्वीकार करने की गरज ही क्या है? वैसा करना घोर मूर्खता व अधःपतन है। संपूर्ण धर्मों का सार “चित्त की शुद्धि” है। चित्त की शुद्धि बिना, सभी धर्म-कर्म अधर्म हैं। अद्यायुक्त स्वधर्माचरण से चित्त की शुद्धि अवश्य होती है। श्रीमनु महाराज ने अपने हिन्दू धर्म के लक्षण यों वतलाए हैं:—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौच इन्द्रियनिग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥१॥

( १ ) धृति अर्थात् धैर्य, ( २ ) क्षमा अर्थात् दयालुता, ( ३ ) दम यानी मनोनिग्रह, कुविचारों का दमन, ( ४ ) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना ( ५ ) शौच का अर्थ कायिक वाचिक मानसिक साँस-गिक आर्थिक वगैरह सब प्रकार की-पवित्रता, ( ६ ) इन्द्रियनिग्रह, ( ७ ) धी अर्थात् सुबुद्धि, ( ८ ) विद्या यानी जिससे मोहान्धकार नष्ट हो, ऐसा ज्ञान ( ९ ) सत्य अर्थात् हँसी-दिल्ली में भी भूँठ न बोलना और ( १० ) अक्रोध यानी क्रोध का न करना अर्थात् शान्ति;—ये धर्म के दश लक्षण हैं।

✽ नियमितता ✽

[ १४९ ]

यम-नियम अर्थात् मन तथा इन्द्रियनिग्रह करने वाला पुरुष ही केवल धार्मिक अर्थात् सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। ब्रह्मचर्य से और धर्म के इन दस लक्षणों से अत्यन्त ही निकट सम्बन्ध है। इन लक्षणों से रहित पुरुष कदापि ब्रह्मचारी हो ही नहीं सकता; धार्मिक पुरुष ही केवल सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। सारांश धर्म ही आत्मोन्नति की जड़ है और इसी में ब्रह्मचर्य का सारा रहस्य है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी सब प्रकार से उसकी पूर्ण रक्षा करता है। अतः स्वधर्मनिष्ठ बनो।

“नियमितता”

नियम उन्नीसवों :—

प्रकृति स्वयम् नियम-बद्ध है। “कारण बिना कोई भी कार्य नहीं होता” वस इसी एक वाक्य में प्रकृति की प्रचण्ड नियम बद्धता का परिचय मिल रहा है। नियमितता यही प्रकृति का स्वरूप है। और प्रकृति के नियानुसार चलने ही में प्राणिमात्र का कल्याण है। अनियमित पुरुष सदा दुःखी बना रहता है। स्वास्थ्य नाश के जितने कारण हैं उन सब में “अनियमितता” यही प्रमुख कारण है। बहुतेरों के काम बड़े ऊट-पटांग हुआ करते हैं। उनके न सोने का कोई निश्चित समय होता है, न जागने का, न नहाने का, न खाने-पीने तथा पाखाने जाने का। खेल, तमाशे, नाटकों आदि में रात रात जागते रहते हैं और इधर दिन भर सोया करते हैं—इस प्रकार अपने नेत्र, नीति, पैसा और स्वास्थ्य पर अपने हाथ कुल्हाड़ी मार लेते हैं। ऐसी

१५० ]

❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁

वेपरवाही से स्वास्थ्य की तथा ब्रह्मचर्य की आशा करना व्यर्थ है। सोने-जागने, पाखाने जाने, नहाने, ईश्वर-पूजन, भजन करने, खाने-पीने, पढ़ने पढ़ाने-घूमने तथा आराम करने आदि प्रत्येक कार्य का कम अर्थात् नियम बाँध लेने पर तुम्हें बहुत जल्द मालूम होगा कि तुम्हारा शरीर भी घड़ी की सुई की चाल से चल रहा है और प्रत्येक कार्य यंत्र के तुल्य सुखपूर्वक और उन्नतिप्रद हो रहा है। मन भी कर्तव्य-पालन से सुप्रसन्न घ वलिष्ट हो रहा है। नियमितता से मूर्ख भी ज्ञानी, रोगी भी निरोगी, दुर्बल भी प्रबल, अभागा भी भाग्यवान और नीच भी उच्च बन जाता है। नियमितता से मनुष्य में मनुष्यत्व एवं ईश्वरत्व प्रगट होने लगता है। आज तक जितने महापुरुष हुए हैं वे सब नियम के पूरे पावन्द हुए हैं। अनियमित पुरुष को हमने महापुरुष बना हुआ आज तक न देखा है, न सुना ही है। स्वास्थ्य-सुधार के जितने नियम संसार में विद्यमान हैं, उन सब में “नियमित समय पर काम करने का नियम”—सर्व-श्रेष्ठ है। अनियमित पुरुष कदापि निरोगी तथा ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अतएव आरोग्य तथा ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये नियमितता का पालन करना प्राणिमात्र का प्रथम तथा श्रेष्ठ कर्तव्य है। यह नितान्त सत्य है कि “जिसका कोई नियम नहीं है उसके जीवन का भी कोई नियम नहीं है।”

❁ लंगोट बंद रहना ❁

[ १५१ ]

“लंगोट बंद रहना”

नियम बोसवॉः —

वीर्यरक्षा के लिये सदा सर्वदा लंगोट कसे रहना बहुत ही उपकारी है लंगोट से मन शान्त होता है व अण्डकोप बढ़ने नहीं पाते । लंगोट दोहरा नहीं बल्कि एकहरा ही होना चाहिये जिससे अनावश्यक गर्मी के कारण वीर्यनाश न हो । लंगोट पहनने से पुरुषत्व घटता नहीं, बल्कि अधिक शुद्ध व अत्यन्त नियम-बद्ध होता है—इस बात को लंगोट से डरने वालों को स्मरण रखना चाहिये, क्योंकि यह हमारा क्रीव २० वर्षों का स्वानुभव है ।

“खड़ाऊँ”

नियम इक्कीसवॉः —

पैर के अँगूठे के पास जो बड़ी नस है उसका व जननेन्द्रिय का बड़ा ही भारी लगाव है । वह नस यदि टूट जाय तो मनुष्य एक ही घंटे के भीतर मर जाता है । खड़ाऊँ से जब वह नस दबती है तब उसके साथ साथ काम-वासनायें भी दबने लगती हैं । जूते की गन्दगी से जो जिन्दगी का नाश होता है, सो खड़ाऊँ से नहीं होने पाता । अक्सर सर्दी-गर्मी व रोगादि पैर व शिर इन द्वारों से ही प्रवेश करते हैं । जूते में कितनी बढ़बू भरी रहती है इसका अनुभव जूते के पहनने वालों को भली भाँति होता है । इसी कारण ब्रह्म चारी को जूता पहनना सर्वथा मना है । जूते के टुकड़े टुकड़े उड़

१५२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

जाते हैं, परन्तु प्रेमी मनुष्य उस वेचारे का पिण्ड नहीं छोड़ते । फिर रोग व कामरिपु भी ऐसे पुरुष का पिण्ड नहीं छोड़ते । यद्यपि बाहर से तेल-पानी और सज-धज के कारण ऐसा पुरुष वेश्या की तरह सुन्दर दिखाई देता हो, परन्तु उसका वह सौंदर्य गुप्त-रोग व पाप से भरा रहता है और इस बात की सत्यता थोड़ा सा निष्पक्ष आत्म-संशोधन करने से तत्काल मालूम होती है । अस्तु ।

सभी जगह पवित्रता आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं । खड़ाऊँ से मनोविकार शान्त होते हैं, वह हमारा अनुभव है; तथा दृष्टि भी सतेज होती है । पर हाँ, ऐसा रही खड़ाऊँ न पहिनना चाहिये। जिससे कष्ट हो, खड़ाऊँ हल्का व सुखप्रद होना चाहिये । खड़ाऊँ का अच्छापन अथवा बुरापन उसकी खूँटी पर सर्वथा निर्भर है । अतः खूँटियों की गुण्डियाँ चौड़ी तथा सुखावह हों ।

“पैदल चलना”

नियम बाईसवाँ :—

ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये पैदल चलना आवश्यक बात है । व्यर्थ थोड़ी थोड़ी बात के लिये व थोड़ी दूर के लिये विना आवश्यकता के गाड़ी घोड़े, एक्का, टॉगा, साइकिल इत्यादि पर चढ़ना निःसन्देह ब्रह्मचर्य से नीचे गिरना है । साइकिल पर बैठने से तो ब्रह्मचर्य तथा स्वास्थ्य को बहुत हानि होती । कैसी ही दिशा मालूम होती हो परन्तु एक मील तक साइकिल पर बैठ के जाने से ही

❁ लोक-निन्दा का भय ❁

[ १५३ ]

वह दव जाती है, अंब कहो ! फिर स्कास्थ्य की आशा कहाँ ? साइकिल पर बैठने से जननेन्द्रिय की निचली नसों पर बड़ा कठोर दबाव पड़ता है, जिससे मनुष्य का पुरुष-बल घटने लगता है । साइकिल पर विशेष बैठने वाले विशेष नामर्द एवं नपुंसक होते हैं ।

आराम-तलब पुरुष सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता । और इस बात को पता धनी लोगों पर दृष्टि डालने से तत्काल लगता है । धनी पुरुष हमेशा बहुत दुःखी, बड़े लंगड़े और बहुत काम के कारण बेकाम बने हुए होते हैं । वे सदा सर्वदा रोगी ही बने रहते हैं । हे भगवन ! पैदल टहलने का महत्व इन लोगों के ध्यान में कब आवेगा और उनका तथा देश का उद्धार कब होगा ? हमें अब शीघ्र जागृत कीजिए, यही आप से हमारी नम्र प्रार्थना है !

“लोक-निन्दा का भय”

नियम तेईसवाँ :—

इस ग्रन्थ में वर्णन किए हुए “वीर्य-नाश के कुछ मुख्य लक्षण” बार बार पढ़ो और शीशे में अपना मुंह ज़रा देखो । घमण्डी बनने के भाव से नहीं, किन्तु घमण्ड को दूर करने के भाव से देखो । यदि तुम्हारे नेत्र, नाक के कोने के पास काले होने लगे हों तो उन्हें वीर्य के नाश से और भी काले मत बनाओ और फिर अपना काला मुँह लेकर अकड़ कर समाज में न घूमो; बुद्धिमान पुरुष तुम्हें देखते ही पहचान लेंगे कि तुम कितने बरबाद हुए हो; भला अब इस ग्रथ को पढ़ने वाले पुरुष से तम छिप सकोगे ? क्या

१५४ ]

❁ ब्रह्मचर्य्ये ही जीवन है ❁

साधुन से वह नेत्र के काले धव्वे निकल सकेंगे ? कदापि नहीं ! सभ्य स्त्री-पुरुष या बालक को अपनी ऐसी पतित दशा देखकर— अपना काला मुँह देखकर 'निःसंदेह वड़ा ही दुख होगा—उन्हें कृत कर्मों' का पछतावा होगा । प्रिय मित्रो ! तुम्हें यदि सच्चा पछतावा होता हो तो हम आप को इसकी अत्यन्त सुलभ आप्धि बतलाते हैं कि "वीर्य-रक्षा करो" वस, यही इसकी सुलभ व अनुभव-सिद्ध आप्धि है । जितना अधिक तुम वीर्य धारण करोगे उतना ही अधिक तुम्हारा मुँह उज्ज्वल बनता जायगा । आँखों की वह कालिमा नष्ट होती जायगी और जितना अधिक तुम वीर्य-नाश करोगे उतना ही अधिक तुम्हारा मुँह काला बनता जायगा । यदि तुम छः ही मास वीर्य-संग्रह करोगे तो तुम्हारे तन, मन दोनों पवित्र बन जायेंगे और चेहरा स्वच्छ बन जायगा, पूर्ण विश्वास रखो । जब से तुम वीर्य धारण करने लगे तब से ऐसी 'हृद भावना' रखो किः— "हमारे नेत्र स्वच्छ हो रहे हैं ।" ( नेत्र पर से हाथ घुमाकर कहो कि—) अब कालिमा नष्ट हो रही है । सूर्य के माफिक मेरे नेत्र तेज संपन्न हो रहे हैं । मेरी दृष्टि पवित्र हो रही है—पाप दृष्टि नष्ट हो रही है । मैं निष्पाप हूँ ! पवित्र हूँ !! तेजस्वी हूँ !!!" इत्यादि । तुम इस ग्रन्थ में के दिव्य नियमानुसार चलने से वीर्य-रक्षा प्रतिज्ञापूर्वक कर सकते हो, ऐसा हमारा अत्यन्त हृद अनुभव है । प्राणायाम से दृष्टि अत्यंत तीव्र होती है । हाँ, कीर्ति की तथा आत्मोद्धार की सच्ची इच्छा जरूर होनी चाहिये । 'लोक निन्दा का भय वीर्यनाशकारिणी कुवृत्तियों को रोकने के लिये अति उत्तम उपाय है'—ऐसा सज्जनों का अनुभव है ।

❁ ईश्वर भक्ति ❁

[ १५५ ]

“ईश्वर भक्ति”

नियम चौबीसवाँ :—

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ब्यवसितोहि सः ॥१॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्चञ्चान्तिं निगच्छति ।

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ २ ॥

—गीता अ० ६ श्लो० ३०—३१ ।

अर्थः—“कितने ही दुराचारी क्यों न हों; परन्तु यदि वह मुझे ‘एक निष्ठ भाव से’ भजता है तो उसे साधू ही समझना चाहिये; क्योंकि उसकी बुद्धि का निश्चय अच्छा हुआ है। वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा होता है व चिर-शान्ति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय ! तू पूर्ण ध्यान में रख कि ‘मेरे भक्त को कभी अधोगति हो ही नहीं सकती।’”

संतप्त मन को शान्त करने के लिए और अपवित्र मन को पवित्र व सर्व श्रेष्ठ बनाने के लिए “भगवद्भक्ति” एक मात्र सब से श्रेष्ठ, सुलभ व सच्चा उपाय है। अन्य उपाय कष्टप्रद हैं। अतएव आत्म-शुद्ध्यर्थ भगवान का स्मरण, ध्यान, गान, आदि आप को रोज अवश्य ही करना होगा। जैसी हमारी भक्ति होगी वैसी ही हम में विरक्ति भी प्रकट होगी। “हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होहि मैं जाना।” श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छुद्धः स एव सः।” यानी “मनुष्य श्रद्धामय है; जैसी उसकी श्रद्धा होती है

  • भक्तियोगेनमक्षिष्टोमद्भावायोपपद्यते ॥—भगवान् श्रीकृष्ण ॥

१५६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

ठीक वैसा ही बन जाता है” ऐसा भगवान का भी वचन है। क्रोधी भाव से क्रोधी, कामी भाव से कामी, अभिमानी भाव से अभिमानी, व्यभिचारी भाव से व्यभिचारी, प्रेमी भाव से प्रेमी; ब्रह्मचारी भाव से ब्रह्मचारी व ईश्वरीय भाव से मनुष्य भी निसन्देह ईश्वररूप बन जाता है। वास्तव में मन जिसका ध्यान करता है, वह तद्रूप ही बन जाता है। दोषवर्णन से मनुष्य जैसा दोषी बन जाता है, वैसे ही सदगुण वर्णन से मनुष्य भी निसन्देह सदगुणी बन जाता है। तब फिर भगवान् के गुण वर्णन करने से और उसी का नियम पूर्वक ध्यान करने से हम प्रत्यक्ष भगवद्रूप ही क्यों बन जायेंगे ? अवश्य बन जायेंगे। यदि हम हनुमान जी का ध्यान और गुणगान करेंगे तो हम भी उन्हीं के समान भक्त व ब्रह्मचारी अवश्य बन जायेंगे। अतएव ब्रह्मचारी को चित्त-शुद्धि के लिये रोज “नियम-पूर्वक सुबह शाम दोनों वक्त भगवद्भजन, पूजन, स्मरण ध्यान आदि अवश्यावश्य करना ही चाहिये; क्योंकि भगवान कहते हैं “मेरी भक्ति करने वाले मेरे ही स्वरूप में आकर मिलते हैं और स्त्री की भक्ति करने वाले स्त्री-रूप में वा शूकर कूकर के रूप में जा मिलते हैं। “विषय विरक्त” वस, इसी एक शब्द में संपूर्ण ब्रह्मचर्य का सार भरा हुआ है जो कि “भगवद्भक्ति” से हर किसी को सहज ही में “निसन्देह” प्राप्त होती है। आत्मोद्धार चाहने वालों को अवश्य अनुभव करना चाहिये।

भोजन के प्रत्येक कौर से जैसे भूख की शान्ति व शरीर की पुष्टि तथा कान्ति बढ़ती जाती है, वैसे ही ज्यों ज्यों भक्ति का सेवन किया जाता है, त्यों त्यों विरक्ति व मुक्ति भी मनुष्य को निसन्देह प्राप्त होती रहती है।

❁ ईश्वर भक्ति ❁

[ १५७ ]

संक्षेप में कहा जाय तो, विषय-वैराग्य ही भाग्य है और वही शान्ति का मूल है। आचार्य कहते हैं:—“दुखी सदा कः ?” सदा दुखी व अभागा कौन है ? “विषयानुरागी,” जो विषयासक्त है सो ! “शान्ति शान्तिमान्नोति नकाम कामी” भगवान कहते हैं:—“कामी पुरुष कदापि शान्त नहीं हो सकता,” विषयवासना ही संपूर्ण दुःखों को जड़ है और विषय-वैराग्य ही संपूर्ण सुखों की एक मात्र कुञ्जी है। और यह विषय-वैराग्य किंवा विषय विरक्ति भगवान की भक्ति से हमें निस्सन्देह प्राप्त होती है, ऐसा असंख्य महापुरुषों का तथा श्रीतुलसीदास जी जैसे कट्टर महाभक्त का स्वानुभाविक सिद्धान्त है—“प्रेम भक्ति जल-विद्युत् खग राई, अभ्यन्तर मल कवहु न जाई ।” अहह ! बहुत ही सत्य है

सत्य वचन अरु नम्रता परतिय मात समान' ।

इतने पर हरि ना मिलै तुलसीदास जमान ॥ १ ॥

अतः यदि हमें अपना उद्धार करना हो, अपने मन को दुरुस्त करना हो, परम शुद्ध व परम श्रेष्ठ बनाना हो, तो “रोज्ञ नित्य नियम पूर्वक” परम कृपालु परमात्मा का भजन, पूजन हमें अवश्य ही करना चाहिये। भगवद्भक्ति ही सब दुःखों से मुक्ति पाने का तथा चित्त शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उपाय है; और चित्त शुद्धि ही ब्रह्मचर्य का सच्चा रहस्य है।

१५८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“नियम नियमावली का पाठ”

नियम पचीसवाँ :—

रोज़ प्रातः इस ब्रह्मचर्य की नियमावली का अवलोकन व पठन करना कभी न भूलना चाहिये; क्योंकि इसी में ब्रह्मचर्य रक्षा का सार है—इसीमें चैतावनी है इसीमें ब्रह्मचर्य के संस्कार हैं। नियमावली को एक बार ‘प्रातःकाल में रोज़ देखो ? बहुत उपकार होगा। हम विश्वास दिलाते हैं कि यह आपका “नियम दर्शन वा पठन कभी निष्फल नहीं होगा,” तुम्हें वह अवश्य वलपूर्वक सन्मार्गपथ पर घसीट कर ले आवेगा। इतना ही नहीं बल्कि यदि कोई इस नियमावली का सतत एक वर्ष तक पाठ शुरू रखेगा तो उसमें क्या ही ऊँचे भाव पैदा होंगे इसका खुद उसी को अनुभव हो जावेगा, हाथ कंगन को आरसी क्या ? हम प्रतिज्ञापूर्वक कह सकते हैं कि यह पचीस नियम वा ‘ब्रह्मचर्य-नियम पचीसा’ मुद्दे को भी चैतन्यमयी बना सकता है ! वस ! इससे अधिक क्या कहें ! स्वयं अनुभव कीजिये ! ॐ ! इति !

१६—सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य

आजकल देश भर में शूरों की सेना बढ़ रही है। जिसे देखो वही व्याख्यानदाता और देशसुधारक बनता फिरता है। इधर-उधर मण्डूकमंडली का टर्न टर्न कोलाहल सुनाई दे रहा है। कागजी घोड़ों के खुरों की खनखनाहट जोर शोर से कानों में घुस रही है।

❁ सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य ❁

[ १५९ ]

ऐसा मालूम होता है मानों अब कोई बड़ा भारी कर्मवीर हमारी सहायता करने के लिये आ ही रहा है ! परन्तु देखते हैं क्या : “कुछ नहीं !” कोई देशभक्ति के बहाने, कोई देशकार्य के बहाने, कोई समाजस्थापन के बहाने, अपना अपना स्वार्थसाधन कर रहे हैं । कोई ऐसे उदार पुरुष हैं, कि विना पैसे लिये व्याख्यान ही नहीं देते ? भला ऐसे देशभक्तिशून्य वाक्य पंडितों से देश का क्या सुधार हो सकता है ? केवल बातों के लड्डुओं से कौन घृत हो सकता है ? हमें ऐसे/प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीरों की बड़ी भारी आवश्यकता है, जिनके केवल मुख ही नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर ही हमारे सच्चे कर्तव्य की हमें सच्ची शिक्षा दे सकते हैं । एक आदर्श पुरुष देश का जितना सुधार कर सकता है, उस सुधार का एक सहस्रांश भी सुधार हजारों निर्वीर्य वाक्यपंडित अपने आयु भर के कोरे व्याख्यानों से नहीं कर सकते ! व्याख्यानवाजी से कोई कदाचित् समझता हो कि भारत अब जाग उठा है, तो यह उसकी गलती है । भारत जैसा पहले था वैसा ही आज भी है; हिन्दुस्तान पहले की तरह आज भी ठण्डा ही है । विशेष फ़रक हुआ है सो यही कि वह पहले से आज अधिक बढ़बढ़ करने लगा है । भारत में प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीर बहुत ही कम दिखाई देते हैं; स्वयं दुराचारी, अत्याचारी व दम्भी होने पर भी अपने को सदाचारी और ब्रह्मचारी समझना तथा लोगों के नेता होने का दम भरना, इससे सुधार तो नहीं बल्कि भारत का विगाड़ ही अधिक हुआ है और होता है । वगैर नीतिवल के—चारित्र्यवल के—कोई पुरुष कदापि श्रेष्ठ व यशस्वी हो ही नहीं सकता, यह अटल सिद्धान्त है । और नीतिवल, चारित्र्यवल किंवा आत्मवल, विना ब्रह्मचर्य के धारण

१६० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवत है ❁

किये समजम्म में भी प्राप्त नहीं हो सकता, यह भी उतना ही सत्य सिद्धान्त है। अपने को नेता समझने वाले बड़े बड़े लोग आज दो चार ही नहीं बल्कि सैकड़ों सुधारों के पीछे पड़े हैं। क्या सामाजिक, क्या धार्मिक, क्या व्यवहारिक, कोई भी सुधार क्यों न हो, परन्तु बिना इस एक विषय में अर्थात् ब्रह्मचर्य में सुधार किये, कोई भी सुधार कदापि चिरस्थायी व यशस्वी हो नहीं सकता यह सिद्धान्त वाक्य हमें हृदय पट में अंकित कर वा अपनी दृष्टि के समाने बड़े बड़े अक्षरों में टैंगवा कर रखना चाहिये और रोज उसका दर्शन करना चाहिये। चणिक सुधार किस काम का? पानी पर लकीरें खींचने से क्या मतलब व जड़ को छोड़ कर डाल और पत्तियों पर पानी छिड़कने से क्या लाभ? यह नितान्त सत्य है कि, सम्पूर्ण सुधारों की और यश की कुंजी एक मात्र ब्रह्मचर्य ही है। बिना वीर्यधारण किये कोई भी जाति कदापि उन्नत नहीं हो सकती। निवीर्य जाति दूसरों की सदा गुलाम ही बनी रहती है। यदि हमें गुलामी को जड़ मूल से हटाना हो, हमें स्वतंत्र, सुखी, सत्ताशाली और वैभवसम्पन्न बनना हो, और पहले की तरह पुनः श्रेष्ठ बनना हो तो हमें पहले के समान पुनः वीर्यसम्पन्न अवश्य ही बनना होगा ! बिना ब्रह्मचर्य धारण किये हम कदापि पूर्व वैभव प्राप्त नहीं कर सकते। ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण उन्नति का वीज मंत्र है ! ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण सुखों का निधान है !! ब्रह्मचर्य ही एक मात्र सम्पूर्ण सुधारों का दादा है !!!

❁ हमारी भारत माता ❁

[ १६१ ]

२०—हमारी भारत माता

अब स्पष्ट मालूम हो गया है कि केवल ब्रह्मचर्य धारण ही में हमारा तथा देश का सच्चा कल्याण है, पुनरुद्धार है। ब्रह्मचर्य ही से हम पुनः सिंह बन सकते हैं ब्रह्मचर्य ही से हम सभी को भयभीत कर सकते हैं, ब्रह्मचर्य ही से हम सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं ब्रह्मचर्य ही से हम स्वतंत्र तथा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी बन सकते हैं, यही नहीं बल्कि ब्रह्मचर्य ही से हम परब्रह्म को भी वशीभूत कर सकते हैं फिर सामान्य लोगों की कथा ही क्या है।

जो भारत एक समय सिंह-तुल्य निर्भय, स्वतंत्र व बलिष्ठ था; जिसके गर्जन तर्जन से सम्पूर्ण दिग् मण्डल कांप उठता था, जिसके तरफ कोई भी राष्ट्र आँख उठा के नहीं देख सकता था, जिस भारत में मणि मौक्तिक के खिलौने हमारे हाथ में रहते थे, उसी भारत में आज हमारे हाथ में की रोटी का टुकड़ा भी छीन लूट कर और मार पीट कर दूसरे लोग ले जा रहे हैं और हमें भूखों मार रहे हैं ! हांय ! इससे बढ़कर और दुःखमय स्थिति कौन सी हो सकती है ? आज हम वकरी के माफिक बन गये हैं; जो आता है सोई हमें हलाल करता है। हम अपना सच्चा सिंह स्वरूप भूल गये हैं। हमारे में पूर्वजों का वीर्य नहीं दिखाई देता; हम आज निर्वीर्य से हो गये हैं।

ऐ मेरे परम प्रिय भाइयो और बहिनों ! अब आँखें खोलो ! जागो ! विषय की मोहनिद्रासे अति शीघ्र जागो। और अपनी तथा देश की स्थिति पर कृपादृष्टि डालो ! हमारी असहाय भारत माता आँसू-भरे नयनों से आशायुक्त अन्तःकरण से हमारी तरफ देख

११

१६२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

रही है। भाइयों ! अपनी इस परमप्यारी भारत माता को अब दास्य से मुक्त कीजिये, उसका वैभव उसे पुनः प्राप्त कर दीजिये ! भारत की स्वतंत्रता एक मात्र हमारी स्वतंत्रता के ऊपर सर्वथा निर्भर है और हमारी स्वतंत्रता एक मात्र विपय की गुलामी छोड़ने में अर्थात् पूर्वजों की तरह वीर्य धारण करने ही में है।

जैसे कोई गत-वैभव असहाय विधवा अपने एकलौते पुत्र पर सुख की आशा रखकर दुःख में दिन बिताती है, उसी प्रकार यह परम दुखी भारत-माता भी तुम जैसे बालकों पर सुख की आशा रखकर जीवन धारण किये हुये है और बड़े कष्ट व आपदा को सह रही है। वह अब कहां तक धीरे पंकड़ेगी मालूम नहीं।

चेतावनी

“तू सिंहशावक हिन्दवालक ! छोड़ अपनी भीरुता । पूर्वजों के तुल्य जग में अब दिखा दे वीरता ॥ १ ॥

“वीर्य ही में वीरता है वीर्य धारण अब करो । आर्यमाता दास्य में है दुःख उसका तुम हरो ॥ २ ॥

“प्राणधारण कर रही है बाट अपनी हूँठ रही । हाय ! तौ भी हिन्दजनता विपयसुखमें सो रही ॥ ३ ॥

“घोर निद्रा छोड़ करके जग उठो अब एक दम । आर्यपुत्रो ! शीघ्रता से अब बंदाओ निज कदम ॥

“दासता से मृत्यु अच्छी दीनता को फेंक दो । राज्य अपना आत्म-बल से प्राप्त कर दिखलाय दो ॥

❁ हमारी भारत माता ❁

[ १६३ ]

“वीर्यही में वीरता है ! बाहुबल है !! राज्य है !!!

आत्मबल❁ में मुक्तता है ! और मारगत्याज्य है ॥ ६ ॥

अतएव ऐ वीर-पुत्रो ! अब ऐसा सुदीपन छोड़ दो ! स्वयं अपने पूर्वजों की तरह ब्रह्मचर्य धारण कर, वीर्यवान् और नरसिंह बन कर अपनी दुःखी माता को अब तत्काल मुक्त करो व मुक्त करके उसे उसके पूर्व वैभवयुक्त स्वातंत्र्य-सिंहासन पर आदरपूर्वक विठला दो । अहह ! क्या ही वह आनन्द का दिन होगा ! प्रभो ! अब कृपा करो और “वह शुभ दिन” अति शीघ्र दिखलाओ !

परमात्मा तुम्हें सुबुद्धि तथा बल प्रदान करे ऐसा हमारा आप को पूर्ण प्रेमाशीर्वाद है ।

“पद्य”

“वताओ मुझे देश कोई कहीं, इसी हिन्द का हो ऋणी जो नहीं ॥ १ ॥

“जहाँ ये भीष्म भीम जैसे बली । सुखी, दीर्घजीवी, शुची, निच्छृंखली ॥ २ ॥

“रहा विश्व में जो बड़े से बड़ा । वही देश ! हा ! आज नीचे पड़ा ॥ ३ ॥

*आत्मबल यानी अपना बल, सच्ची स्वतन्त्रता अपने ही बाहुबल से मेल सकती है और चिरकाल तक उपभोगी जा सकती है ! दूसरों के बल : मिली हुई स्वतन्त्रता परतन्त्रता के तुल्य ही होती है; क्योंकि वह विना आत्मबल के— अपने बल के— बहुत काल तक अपने पास रह ही नहीं कती ! सारांश “बल में बल अपना ही बल !”