ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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१२—मन व इन्द्रियाँ
रहे शान्त जो युवा मैं , शान्त धीर वह वीर । नष्ट हुए पर वीर्य के, का न बने गम्भीर ? ॥ १ ॥
सच्चा कुशल सारथी वही है जो उन्मत्त घोड़ों को अपनी क़ाबू में रखता है; उन्हें उच्छृङ्खल नहीं होने देता । वैसे ही सच्चा वीर पुरुष वही है जो कि युवावस्था में भी प्रबल इन्द्रियों को अपने अधीन रखता है; उन्हें स्वतंत्र व स्वेच्छाचारी नहीं होने देता । शत्रुओं पर और संपूर्ण राजाओं पर विजय प्राप्त करने वाला सच्चा शूर नहीं कहा जा सकता । सच्चा शूर वही है जो मन और इन्द्रियों का स्वामी है और मन तथा इन्द्रियों पर केवल महापुरुष ही अधिकार चला सकते हैं और कोई भी मनुष्य यदि सदुपदेशों के अनुसार मन-क्रम-वचन से चले तो महापुरुष हो सकता है । इसमें कुछ भी कठिनता नहीं है । मैला कपड़ा जैसे पुनः साफ़ हो सकता है । वैसे ही विषय व दुर्धर्षन से गन्दा बना हुआ मन भी पुनः साफ़ हो सकता है । परन्तु अटल निश्चय व पूरी दृढ़ता होनीचाहिये । पवित्र मन माता, पिता, गुरु व मित्रों से भी अधिक उपकारी है; मन ही मनुष्य को नरक में फेंकता है और मन ही मनुष्य को नरकमें से निकाल कर ऊँचे पद पर पहुँचाता है; मन ही सुख दुःख का असली कारण है; मन ही स्वर्ग व नरक, वंध्य व मोक्ष का प्रदाता है,—ऐसा भगवान् श्री कृष्णचन्द्र का वचन है । अतः मन को इक्ष्वाकु में रखो । मन बड़ा दगा-बाज़ है । मन के वायदे को कभी न मानो । “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।” यह अटल सिद्धान्त जानो । मन को न
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बाँधोगे तो मन तुमको जहाँ चाहे वहाँ पटक देगा, यह निश्चय सम्भो । क्या आपको इसका अनुभव नहीं है ? “आत्मोद्धार कैसे हो ?” इस पर सन्त कहते हैं “मन की कथनी से उलटी रीति पर चलो—उलटी चाल चलो । मन का गुलाम सब का गुलाम है । वह पंडित होने पर भी महामूर्ख है, बलवान होने पर भी महान दुर्बल है और राजा होने पर भी पूरा दुखी, अभागा और मिखारी है ।” मन का स्वामी ही सम्पूर्ण जगत् का स्वामी है, चाहे वह शरीर से भले ही दुर्बल हो । श्रीगोस्वामो जी कहते हैं:—
काम कोष मद लोभ की, जब लग मन में खान ।
तुलसी परिडित मूरखो, दोनों एक समानं ॥ १ ॥
अतः हमें चाहिये कि इस अन्ध में दिये हुये सरल, श्रेष्ठ व अमूल्य नियमों द्वारा अपने मन को स्वाधीन कर ब्रह्मचर्य का सच्चा पालन करें तथा अपना सच्चा उद्धार कर लें ।
१३—वीर्य की उत्पत्ति
“रसाद्रकं ततो मांसम् मासान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्याऽस्थि ततो मज्जा मज्जायाः शुक्लसंभवः ॥
—श्रीशुश्रुताचार्य
मनुष्य जो कुछ भोजन करता है, वह प्रथम पेट में आकर पचने लगता है और उसका रस बनता है; उस रस का पांच दिन तक पाचन होकर उससे रक्त पैदा होता है; रक्त का भी पांच दिन तक पाचन होता है और उससे मांस बनता है । पाचन की यह क्रिया एक सेकण्ड भी बन्द नहीं रहती । एक को पचा कर
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दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा ऐसा एक से एक सार पदार्थ तैयार हुआ करता है और प्रत्येक क्रिया में फजूल चीजें मल; मूल, पसीना, आँख, कान व नाक का मैल, नाखून, केशादिक के रूप में बाहर निकल जाती हैं । इसी प्रकार पाँच दिन के बाद मेदा से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से सप्तम सार पदार्थ “वीर्य” बनता है । फिर उसका पाचन नहीं हो सकता । यही “वीर्य फिर ओजस्” रूप में संपूर्ण शरीर में चमकता रहता है । स्त्री के इस सप्तम शुद्धाति शुद्ध सार पदार्थ को “रज” कहते हैं । दोनों में भिन्नता होती है । वीर्य काँच की तरह चिकना और सफेद होता है और रज लाख की तरह लाल होता है । अस्तु । इस प्रकार रस से लेकर वीर्य वा रज तक छः धातुओं के पाचन करने में पाँच दिन के हिसाब से पूरे ३० दिन व क़रीब ४ घण्टे लगते हैं, ऐसा आर्य शास्त्रों का सिद्धान्त है । ❁
यह वीर्य वा रज कोई खास जगह में नहीं रहता । संपूर्ण शरीर ही इसका निवास स्थान है । वादाम या तिल में जैसे तेल, दूध में जैसे मक्खन, किसमिस व ईख में जैसी मिठास, काठ में जैसी अग्नि किंवा फूल में अथवा चन्दन में जैसे सुगन्ध सर्वत्र कण कण में भरी रहती है; उसी तरह वीर्य भी शरीर के प्रत्येक अणु परमाणु में भरा हुआ है । वीर्य का एक बूँद भी निकलना मानो अपने शरीर को नींबू की तरह निचोड़ ही डालना है ।
- धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।
अहो रात्रात्स्वयं पंच सादृं दण्डं च तिष्ठति ॥ इति भोजः ।
अर्थ—रस से मज्जान्त पर्यन्त प्रत्येक धातु पाँच दिन रात व ढेढ़ घड़ी तक रहती है । ( ढाई घड़ी का एक घन्टा होता है )
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जैसे मथने से दूध के प्रत्येक परमाणु से भस्मखन खींचा जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त नवधा मैथुन द्वारा शरीर के समस्त परमाणुओं से वीर्य खींचा जाता है। उस समय शरीर की तमाम नसें हिल जाती हैं; और शरीर के प्रत्येक अवयवों को रेल की तरह बड़ा भारी धक्का पहुँचता है।
हस्त-मैथुन❁ और प्रत्यक्ष मैथुन को छोड़ अन्य सप्त-मैथुनों द्वारा जो वीर्य शरीर से पसीज कर भीतर पतन होता है वह अखण्ड-कोप में आ ठहरता है। यह पतित वीर्य पदच्युत व कैंदी राजा की तरह हतबल व तेजोहीन बन जाता है। वीर्य का पतन होते ही शरीर भी उसी क्षण निर्बल, निस्तेज, दुःखी व अल्पायु बन जाता है। जब तक तेल ऊपर चढ़ता है तभी तक दीपक की ज्योति प्रकाश फैलाती रहती है और ज्यों ज्यों तेल का नाश होता जाता है त्यों त्यों वह मन्द होते होते अन्त में बुभुक्षु जाता है। वैसे ही जब तक वीर्य ऊपर चढ़ता रहता है तभी तक शरीर में चमक-दमक, उत्साह आनन्द व बल दिखाई देता है और ज्यों ज्यों वह नीचे उतर कर नष्ट होने लगता है त्यों त्यों चमक-दमक, उत्साह आनन्द बल और आयु सभी धीमे पड़ जाते हैं और अन्त में जीवन-दीप भी बुभुक्षु जाता है—जीवन का सर्वनाश होता है।
वीर्य के ऊपर चढ़ने ही को शास्त्र में ऊर्ध्व-रेता कहते हैं और पतन को अधःरेता। अखण्ड ब्रह्मचारी में और जिसका एक भरतवे भी वीर्य पतन हुआ हो—इन दोनों में बहुत ही फर्क होता
*पाठकों को स्मरण होगा कि ‘हस्तमैथुन’ में हमने वीर्यनाश के सभी अ-प्राकृतिक साधन समाविष्ट किये हैं।
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है। ऐसे पुरुष की ऊर्ध्व रेता बनने की दैवी शक्ति बहुत कुछ नष्ट हो जाती है तथा उसका अधःपात होता है। और यह बात, एक ही मरतबे के वीर्यनाश से विश्वामित्र का कितना भयङ्कर पतन हुआ, इस उदाहरण से भली भांति सिद्ध होती है। वीर्य का पतन होते ही मनुष्य का भी पतन तत्काल होता है। उस की संपूर्ण शक्तियों का ह्रास होने लगता है। ज्यों ज्यों वीर्य का नाश होगा त्यों त्यों जीवन का भी अवश्य नाश होगा और ज्यों ज्यों वीर्य धारण किया जायगा त्यों त्यों जीवन का भी तारण होगा और मनुष्य बहुत उम्र तक जीवित रहेगा। ब्रह्मचर्य ही से मनुष्य सौ वर्ष तक जीवित रह सकता है और उसमें दैवी शक्तियाँ प्रगट हो सकती हैं।
अब यह जानना अत्यावश्यक है कि कितने भोजन से कितना वीर्य पैदा होता है। इसका निश्चय वैज्ञानिकों ने इस प्रकार किया है कि एक मनुष्य यानी ५४० सेर खुराक से ५१ सेर रुधिर बनता है और ५१ सेर रुधिर से दो तोला वीर्य बनता है, यानी “एक तोला वीर्य के बराबर चालीस तोला किंवा आध सेर खून” यह उन का सिद्धान्त है।
यदि निरोग मनुष्य सेर भर खुराक रोज खावे तो ४० सेर खुराक ४० दिन में खावेगा। अतः यह सिद्ध हुआ कि चालीस दिन की कमाई दो तोला वीर्य है। इस हिसाब से ३० दिन की अर्थात् एक महीने को डेढ़ तोला हुई।
वीर्य का नाश
एक बार में मनुष्य का वीर्य डेढ़ तोला से कम क्या निकलता होगा ? जो कि ३० दिन की कमाई है। अब जरा विचारने की
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बात है कि इतने कठोर परिश्रम से तीस दिन में प्राप्त होने वाली देढ़ तोला अमूल्य व अतुल्य दौलत एक क्षण ही में फूँक डालना कितनी घोर मूर्खता है ? यह किवना घोर पतन है ? ऐसा पुरुष उस मूर्ख वागवान के समान है, जो तन, मन, धन से दिन-रात परिश्रम कर फूलों का सुन्दर वारा तैयार करता है और पैदा हुए असंख्य फूलों का इत्र निकलवा कर उसे मोरियों में डालता वा डलवाता है । आमदनी एक रुपया की खर्च तीस रुपयों का ऐसा जितना अन्धा, मूर्ख, पागल और भिखारी है, उससे करोड़ गुना वह मनुष्य मूर्ख, पागल, अन्धा, भिखारी, रोगी, दुःखी, अभाग्य और काल का शिकार है जो एक महीने से कहीं ज्यादा की वीर्य-सम्पदा एक दिन में खाक कर डालता है । एक मरतबे के वीर्यनाश से ही यदि मनुष्य की महा दुर्दशा होती है तब रोज दो-दो तीन मरतबे अथवा चौधे, आठवे दिन वीर्यनाश करने वाले फिर अति शीघ्र नष्ट होंगे इसमें संदेह ही क्या है ? अतः जिन्हें 'दीर्घायु व सुखी बनना है, उन्हें' महीने में एक मरतबे से अधिक अथवा श्रीमनु महाराज के आज्ञानुसार 'ऋतुकाल' का सच्चा अर्थ समझ कर महीने में दो मरतबे से अधिक तो, कभी भी वीर्यनाश न करना चाहिये । नहीं तो उलटा अपना ही नाश हो जायगा, यह बात याद रखो ।
ग्रीस ( यूनान ) के महा ज्ञानी तत्ववेत्ता साक्रेटीज़ ( सुकरात ) से किसी ने पूछा कि "छो प्रसंग कितने मरतबे करना चाहिये ?" उत्तर मिला कि "जन्म भर में एक बार !" फिर पूछा "यदि इतने से शान्ति न हुई तो ?" "अच्छा, फिर साल भर में एक बार करे ।" "उतने से भी मन न माने तो ?" "अच्छा फिर मास
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भर में एक बार करें” “इतने पर भी न रहा जाय तो ?” अच्छा फिर एक मास में दो बार कर सकते हो; परन्तु जल्दी मृत्यु होगी ?” “इतने पर भी शान्ति न मिली तो ?” अच्छा तो, फिर ऐसा करे कि अपने कफन का सब सामान लाकर घर में पहले रख दें और फिर जैसा दिल में आवै वैसा किया करें ! क्योंकि न मालूम किस समय उसकी मौत आ जावे और उसे खा डाले !”
रति-प्रसंग में अनेकों के अनेक मत हैं। चाहे कितना ही मत-भेद क्यों न हो परन्तु सार बात यह है कि वीर्यनाश जितना ही कम किया जायगा उतना ही स्वास्थ्य अधिक अच्छा होगा और मनुष्य दीर्घायु रहेगा, यह मत सभी को मान्य है। जितना ही अधिक विषय का सेवन किया जाता है उतना ही मन अधिक अशान्त, मलीन, पतित व दुःखी हो जाता है। वह तब ही शान्त हो सकता है जब वह या तो धर्म के अथवा प्रकृति के नियमानुसार चले किंवा मिट्टी में मिल जाय !
सब के सब ब्रह्मचारी
कोई कह सकता है “सभी लोग ब्रह्मचारी बन जायँ तो फिर स्मृति चलेगी कैसे” ? हम कहते हैं—“भित्रो ! स्मृति चलाने की फिक आप न करें। स्मृति का चलाने वाला निराला ही है। केवल आपही अपनी फिक करो और विषय के कारण अकाल में नष्ट-भ्रष्ट न बनो ! ब्रह्मचर्य से स्मृति नष्ट तो नहीं किन्तु मुक्त अवश्यमेव हो सकती है। क्योंकि ब्रह्मचर्य ही आत्मोद्धार का तथा विश्वोद्धार का सच्चा रहस्य है। अखण्ड वीर्यधारण तथा शाश्वत विषय सेवन का नाम ही ब्रह्मचर्य है। वस्तुतः ‘ब्रह्मचर्य से स्मृति
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नष्ट होगी' ऐसी शंका करता ही व्यर्थ व मूर्खतापूर्ण है। प्रकृति शान्त होते हुए भी 'अनन्त है वस इसी एक वाक्य में इस प्रश्न का मुँह-तोड़ उत्तर है। हमारे ब्रह्मचारी होने से अनन्त अर्थात् अन्त-रहित प्रकृति का अन्त कदापि नहीं हो सकता, यह बात हमें कभी न भूलनी चाहिए। अतः मित्रो ! प्रथम अपने ही उद्धार की कोशिश करो। क्योंकि आत्मोद्धार ही लोकोद्धार है। यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारी चमगीदड़ की भांति उल्टी स्थिति होगी, निश्चय जानो।
१४—गृहस्थी में ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्यं समाप्याय गृहधर्मं समाचरेत्।
ऋणश्रय विमुक्त्यर्थं धर्मणोत्पादयेत् प्रजाम् ॥ १ ॥
ब्रह्मचर्य की अवस्था पूर्ण होने के बाद पत्नीस, वर्ष की युवावस्था में गृहस्थ धर्म को स्वीकार करे और ऋणश्रय विमुक्त्यर्थ ( देव-ऋण, ऋषि-ऋण व पितृ-ऋण इनसे छुटकारा पाने के हेतु ) धर्म की विधि से सुप्रजा निर्माण करे, न कि कुप्रजा।
शास्त्रों में हमारे आचार्यों ने प्रकृति के नियमानुसार ब्रह्मचर्य के नियम पहले ही से बाँध रखे हैं। प्रकृति के नियमों के तोड़ने से किसी का भला नहीं हो सकता। यदि उन नियमों के अनुसार चले तो मनुष्य स्त्री के रहते हुए भी ब्रह्मचारी हो सकता है। अखण्ड ब्रह्मचारी में और गृहस्थ-ब्रह्मचारी में यद्यपि बहुत फर्क होता है, तब भी धर्म-नियम के अनुसार चलने वाला गृहस्थ-ब्रह्मचारी भी महान् तेजस्वी, ओजस्वी, यशस्वी, मनस्वी अर्थात् मनोनिग्रही व सामर्थ्य-सम्पन्न होता है। जिस स्थान में सच्चा
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ब्रह्मचारी पहुँच सकता है उसी स्थान में सच्चा गृहस्थ भी जा सकता है। परन्तु आज सच्चे गृहस्थ ब्रह्मचारी भारत में कितने होंगे ? बहुत ही कम ! यह नितान्त सत्य है कि सच्चे गृहस्थ ब्रह्मचारी के न होने से ही भारत गारत हो रहा है; घर घर में कुसन्तान फैल गई है, जो कि १२ वर्ष की उम्र के बाद ही अपने ब्रह्मचर्य का सत्यानाश करने में प्रवृत्ति होती है। स्वयं माता-पिता ही अपने कन्या-पुत्रों के ब्रह्मचर्य के नाश का बाल-विवाहद्वारा खुल्लमखुल्ला यथेष्ट प्रबन्ध कर रहे हैं। भला ऐसे नादानों से, खुद उन्हीं की नहीं, तो देश के भलाई की आशा कैसे की जा सकती है ? जो प्रकृति के नियमों को पैरों के तले कुचलता है, उसे प्रकृति भी कठोरता से कुचल डालती है। बहुत से विवाहित पुरुषों का ख्याल है कि अपनी धर्मपत्नी के साथ महीने में चाहे जब, हफ्ते में कोई भी दिन और रात में चाहे जितने मरतबे, कितने ही काल तक, विषयोपभोग करना विलकुल शास्त्र-संगत और ईश्वरीय आज्ञा के अनुसार है; उसमें कुछ भी पाप या अधर्म नहीं है और न उसमें कुछ हानि ही होती है। परन्तु यह ख्याल अत्यन्त गलत और महा नाशकारी है। भाइयो ! जरा प्रकृति की ओर तो देखो ? पशुओं की अपेक्षा मनुष्य कितना बलहीन है ? तथा पशुओं का जननेन्द्रिय सामर्थ्य कितना अल्प व नियमित है ? इस पर से मनुष्यों को, जो कि घोड़ा, बैल, हाथी, सिंहदिकों से कम शारीरिक सामर्थ्य रखता है, कितना अत्यल्प व अत्यन्त नियमित विषय सेवन करना चाहिये, इसका आप ही हिसाव लगाइये ! सच कहा जाय तो मनमाना विषय सेवन करने वाला पशुओं से भी गया बीता है। ऋषियों का सिद्धान्त है कि:—
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ऋतावृतौ स्वदारेषु संगतिर्या विधानतः । ब्रह्मचर्यतदेवोक्तं गृहस्थाश्रमवासिनाम् ॥
—श्रीयाक्षवल्क्ष्य
“ऋतुकाल में अपनी स्त्री से ( धर्मपत्नी से ) विधियुक्त अर्थात् शाखाज्ञानुसार केवल सन्तान के हेतु समागम करने वाला पुरुष, गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी, ब्रह्मचारी ही है ।” ‘सन्तानार्थं च मैथुनम्’ यह स्पष्ट व सख शाखाज्ञा है, याद रखो । श्री मनुमहाराज कहते हैं—“मास में ऋतुकाल में केवल दो ही रात्रि में जो धर्म-शाखाज्ञानुसार स्त्री-सेवन करता है वह धर्मात्मा पुरुष स्त्री रहते हुए भी ब्रह्मचारी है ।”
इसमें का “ऋतुकालः” यह शब्द अत्यन्त महत्व का है । ऋतुकाल का मतलब स्त्री के रजोदर्शन काल का चौथा ही दिन नहीं है उस दिन यदि शिवरात्री एकादशी अथवा नवरात्र आया
- ऋतुकाल का सच्चा अर्थ जानना हो और घर में ‘होरे’ निर्माण करने हों तो लेखक को “मन-यांचिद्धत सन्तति” नामक अत्यन्त महत्व पूर्ण करीब ४०० पृष्ठों को मौलिक किताब जरूर पढ़ो, मनन करो व आचरण में लाओ । इसमें का एक एक नियम लाख लाख रुपयों का है । किताब हृदय में ही रखने योग्य है । एक हजार आर्डर्स आने पर छपवाना शुरू कर देंगे । मूल्य दो रुपया रहेगा । किताब में लगभग सात आठ सुन्दर चित्र भी रहेंगे ।
आर्डर भेजने का मुख्य पताः—
मैनेजर, राष्ट्रोद्धार-कार्यालय,
बड़ौदा
( BARODA )
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हो तो ? अथवा घर में ही कोई मर गया तो ? क्या उस दिन कामरिपुचरितार्थ करना ही होगा ? नहीं, कदापि नहीं ! वैसा करना पूर्ण अधर्म व महापाप होगा ।
वस इससे अधिक हम यहाँ पर इस बात का जिक्र नहीं करना चाहते । विप भी यदि डाक्टर की राय से खा ले तो वह भी अमृत के तुल्य फल देता है, वैसे ही अपनी स्त्री का सेवन भी, यदि धर्म-शास्त्रानुसार सुतिथि, सुनक्षत्र का विचार कर, 'प्रमाण' में करे तो वह भी परम कल्याणकारी होता है । 'अ-प्रमाण' में निस्संदेह नाश है । प्रमाण से लेने पर विप भी रोगियों के लिये अमृत बन जाता है । कुसमय पर बीज बोने वाला किसान डूब जाता है । ठीक यही न्याय अपनी स्त्री के सेवन में भी समझ लीजिये । याद रखो, धर्मानुकूल चलने ही से हम, गृहस्थी में भी, ब्रह्मचारी बन सकते हैं और घर में जैसी चाहे वैसी शूर, वीर, श्रेष्ठ पुत्र-पुत्रियाँ उत्पन्न कर सकते हैं । अन्यथा पर-दारा-गमन न करने पर भी, मनुष्य व्यभिचारी पद को प्राप्त होता है और उसकी सब तरह से दुर्गति होती है । प्रमाणः—
धर्माथौ यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानुगः । श्रीप्राणधनदारेभ्योः क्षिप्रं स परिहीयते ॥
• जो धर्मतत्व का परित्याग करके, इन्द्रिय-नश हो स्वेच्छाचार अर्थात् अपनी मनमानी करता है, शीघ्र ही, धन, प्राण, स्त्री, पुत्रादि सभी नष्ट होकर, उसकी महान दुर्गति होती है । और जो धर्मतत्वानुसार चलता है, उसका देखते ही देखते सब तरह से उत्कर्ष होता है और अंत में सद्गति होती है । "तरमात्सर्वप्रयत्नेन
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धर्मं शुक्लं च रक्षयेत् !” इसलिये सर्व प्रकार से प्रयत्नपूर्वक धर्म व ब्रह्मचर्य की रक्षा कीजिये । क्योंकि धर्म ही जीवन है और अधर्म ही मृत्यु है ! तथा ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है ।
१५—बाल-विवाह
बाल-विवाह यह अत्यन्त काल-विवाह ही है । यह पूर्णतया ब्रह्मचर्य का नाशक है । बाल विवाह सर्वथा धर्म-विरुद्ध व अप्र-कृतिक है । तथा वेद शास्त्र के अतिकूल ❁ है । प्रकृति के नियमानुसार ही धर्मशास्त्र में नियम है । अतः बालविवाह प्रकृति एवं धर्म के विरुद्ध कैसा है सो अब सुन लीजिए—
( १ ) जो पेड़ जल्दी बढ़ते, जल्दी फूलते-फलते हैं ( जैसे केला, पपीता, रेंड इत्यादि ) वे उतने ही जल्दी नष्ट भी होते हैं । वैसे ही जो बालक बालिकायें जल्दी ब्याही जाती हैं, जल्दी ऋतु मति होती हैं, ( केवल ऋतु प्राप्त होना यही स्त्री की युवावस्था का
- वेदानधीत्य वेदौ वा वेद वापि यथाक्रमम् ।
अविष्णुतब्रह्मचर्ये गृहस्थाश्रममाश्रयेत् ॥ १ ॥
सबसे श्रेष्ठ स्मृतिकार साक्षात् वेदमूर्ति मनु जी कहते हैं—‘ जब तक लड़का तीन दो वा एक वेद पूर्ण न सीख ले और कम से कम २५ वर्ष तक अर्बुद ब्रह्मचर्य व्रत पालन कर अपने को गृहस्थी चलाने के लिये पूर्ण समर्थ न बना ले तब तक अपनी शादी कदापि न करे । यही वेद की आज्ञा है ।’ स्त्रियों के लिये भी ऐसी ही आज्ञा है । इसके लिये प्रमाण :—
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।
अत्ढवाश् ब्रह्मचर्येणाश्रवो वासं जिगीर्वति ॥
❁ बाल-विवाह ❁
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लक्ष्ण नहीं है। दुध-मुँहें दाँत को ईख चूसने के लायक समझना घोर मूर्खता है। ऋतुकाल का सच्चा अर्थ समझो ! कम से कम गर्भाधान के समय स्त्री की आयु १६ वर्ष की होनी चाहिए। और पुरुष की २५ वर्ष की ) और जो जल्दी लड़के, बच्चे वाली होती हैं, वे बहुत जल्द रोगग्रस्त हो मृत्यु को प्राप्त होती हैं। प्रत्यक्ष उनकी ही यह हालत है, तब फिर उनके सन्तान की कौन कहे ? “बाप से बेटे सवाई” जल्दी मरते हैं। तदनन्तर माता-पिता रोते हैं और अपने ही हाथ से अपने कन्या-पुत्रों को चिता पर लिटा कर फूँकते हैं और अपना काला मुँह लेकर घर वापस आते हैं। वाह रे प्रेम !
( २ ) जो पेड़ जल्दी नहीं बढ़ते ( जैसे आम, इमली, अमरुद इत्यादि ) और जल्दी फूलते-फलते नहीं वे जल्दी मरते भी नहीं। वैसे ही जो बालक बालिकायें ज्यादा उम्र में व्याही जाती हैं और गर्भाधान के समय स्त्री की १६ व पुरुष की २५ वर्ष की आयु होती है और जो धर्म-नियमों के अनुसार चलते हैं, वे निस्सन्देह सौ वर्ष तक जीवित रहते हैं, ऐसा भीष्म-पितामह का सिद्धान्त है। परन्तु अकाल ही में माता-पिता बने हुए अकाल ही में यमपुर सिवारते हैं। “अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः।”
—श्रीभीष्म ।
( ३ ) घास की अग्नि जैसी जल्दी बढ़ती है वैसी ही जल्दी बुभुक्षी जाती है और खैर, आम, इमली की अग्नि जल्दी नहीं बढ़ती और इस कारण जल्दी बुभुक्षी भी नहीं। “जो जल्दी बढ़ता है सो जल्दी गिरता भी है” यही प्रकृति का नियम है।
( ४ ) आम को जब बौर आती है तो उसमें से बहुत कुछ नष्ट हो जाती है। फिर छोटे छोटे फल ( अम्बिरियाँ ) लगते हैं उसमें से
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
भी बहुत नष्ट होते हैं। फिर आविले जैसे बड़े होते हैं तिसमें से भी बहुत कुछ नष्ट होते हैं। जब वे और भी पुष्ट होते हैं तब कहीं वे आखिर तक उस पेड़ पर स्थिर रह सकते हैं। वैसे ही जो बालक-बालिकायें बचपन ही में व्याहे जाते हैं उनमें से बहुत भर जाते हैं, जिसका अनुभव आज प्रत्यक्ष हम आप कर रहे हैं, और जो पचीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन कर गृहस्थाश्रम में विधियुक्त प्रवेश करते हैं वे ही केवल सौ वर्ष तक जीवित रहकर जीवन का पूर्ण आनन्द ल्हटते हैं।
(५) कच्ची कलियाँ तोड़ने से पुष्पों की महक मारी जाती है। उनमें सुगन्धि नहीं मिल सकती। कच्चे फल रस हीन, कसैले और रोगकारी होते हैं। कच्चा भोजन पेट में अनेक रोग पैदा करता है वैसे ही कच्चेपन में विवाह करने और वीर्य को नष्ट करने से अर्थात् अ-पक वीर्य-पात, से नपुंसकता, दुर्बलता, चय, प्रमेहादि भीषण रोग उत्पन्न होते हैं, जो उस व्यक्ति को अकाल ही में मृत्यु की गोद में पहुँचाने में पूर्ण सहायक बनते हैं।
(६) कच्चा बीज कोई भी किसान खेत में नहीं बो सकता क्योंकि उससे खेती का और बीज वाले मालिक दोनों का नाश होता है। किसान लोग खेत में बोने वाले बीज को प्राण के तुल्य सम्भाल कर रखते हैं। यदि कभी भूखे भी रहना पड़े तो भी कुछ परवाह नहीं करते परन्तु उस बीज को अतुल्य (फसल) तक हाथ नहीं लगाते। वैसे ही मनुष्य को भी अपने वीर्यरूपी बीज को २५ वर्ष तक पूरे तौर से संभालना चाहिये और नव-मैथुन से सर्वथा बचा रहना चाहिये। “जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे” यह ध्यान में रखो।
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( ७ ) कच्चे मुट्ठों में या कच्चे काठ में घुन जल्दी लग जाता है और पक्के में विलकुल नहीं लगता । वैसे ही बचपन में वीर्य को नष्ट करने वाले, जब गाँव में कोई रोग फैलता है तब सब से पहले काल के शिकार बनते हैं; वैसे २५ वर्ष वाले ब्रह्मचारी शिकार नहीं बनते । यथार्थ में ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है ।
( ८ ) मट्टी में कम पका हुआ घड़ा ( सेवर घड़ा ) पानी के संयोग से बहुत जल्दी टूट जाता है, परन्तु पक्का जल्दी नहीं टूटता वैसे ही कच्चे वीर्य का पुरुष स्त्री संयोग से अथवा अनुचित वीर्य-पात से जल्दी ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है ।
प्रकृति के इन आठ प्रमाणों से आपने अब भली भाँति समझ लिया होगा कि “बाल-विवाह प्रत्यक्ष काल-विवाह ही है ।” “विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात् ।” अर्थात् सच्चा विद्यार्थी वह ही है जो ब्रह्मचारी है । वह किसी बात में असफल नहीं होता क्योंकि उसकी बुद्धि, प्रतिभा, विचार-शक्ति स्मरणशक्ति आदि सभी शक्तियाँ तीव्र होती हैं । वीर्यभ्रष्ट विद्यार्थी ज्ञान-प्राप्ति में पूर्ण असफल सिद्ध होता है । हा ! जिस देश में विद्यार्थी—अवस्था ही में—बचपन ही में—ब्रह्मचर्य का नाश किया जाता है; लड़के को तैरना सीखने के पहले ही जो माता पिता उस बेचारे के गले में स्त्रीरूपी पत्थर बांधकर उसे दुस्तर संसार-सागर में ढकेल देते हैं, उस देश की उन्नति कैसे हो सकती है ?
कन्यां यच्छति वृद्धाय नीचाय धनलिप्सया । कुरुपाय कुशीलाय स प्रेतो जायते नरः ॥ १ ॥
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श्री भगवान् स्कन्ध कहते हैं:—“जो पुरुष धन की अथवा दहेज के लालच से अपनी अबोध कन्या किसी वृद्ध को—खूसट वृद्धे को, नीच को दुराचारी व्यभिचारी को कुरूप को अर्थात् अन्धे, लंगड़े, ल्ले, कुबड़े, रोगी, कोढ़ी, अपाहिज—इनमें से किसी को अथवा दुर्गुणी, दुर्न्यसनी को यदि व्याह दें तो वह मरने के बाद नीच पिशाच योनि में वरावर जन्म लेता है और अपने नीच कर्मों के नीच फल भोगता है ।
बाल-विवाह तथा वृद्ध-विवाह आदि दुष्ट-विवाहों की कुप्रथायें उठा देने ही से देश में ब्रह्मचारी बालक-बालिकायें उत्पन्न हो सकती हैं और उनकी वागडोर एक मात्र माता-पिताओं ही के हाथ में है ! अतएव ऐ माता-पिताओं ! अब विवेक से काम लो । लकीर के फकीर मत बनो । धर्म के तथा प्रकृति के नियमानुसार चल कर पुराय के भागी बनो और कुल तथा देश का उद्धार करो ।
१६—वीर्य का प्रचण्ड प्रताप
समुद्रतरणे यवत् उपायो नौः प्रकीर्तिता ।
संसार तरणे तद्वत् ब्रह्मचर्यं प्रकीर्तितम् ॥ १ ॥
“जैसे समुद्र के पार जाने के लिये नौका ही श्रेष्ठ साधन है वैसे ही इस भव-सागर से पार जाने के लिये अर्थात् सब दुःखों से मुक्त होने के लिये ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट साधन है ।” क्योंकि “ब्रह्मचारी न कांचन आर्तिमाच्छ्रुति ।” अर्थात् “ब्रह्मचर्य ही से सम्पूर्ण सुखों की उत्पत्ति है ।” ऐसी श्रुति है ।
सम्पूर्ण विश्व में प्राणिमात्र में जो कुछ जीवन-कला दिखाई देती
❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁
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है वह सब ब्रह्मचर्य का ही प्रताप है । जीवनकला में सौन्दर्य, तेज, आनन्द, उत्साह, सामर्थ्य, असामान्यता, मोहकता अर्थात् आकर्षकत्व व सजीवत्व आदि अनेकानेक उच्च बातों का समावेश होता है । जैसे हाथी के पैर में सभी जीवों के पैर समाते हैं; वैसे ही एक ब्रह्मचर्य ही में सब कुछ आ जाता है । “एकहि साधे सब सधे” ऐसा शक्ति-सम्पन्न साधन यदि विश्व में कोई है तो वह एकमात्र ब्रह्मचर्य ही है । अतः प्रयत्नपूर्वक एकमात्र ब्रह्मचर्य ही को सम्हालो । क्योंकि ब्रह्मचर्य ही सन्पूर्ण शक्तियों का खजाना है ।
जो ब्रह्मचारी है उसमें दैवी तेज कूट कूट कर भरा रहता है । आप की आँखों में जो इतनी ज्योति है वह किसका प्रभाव है ? गाल पर गुलाबी छटा, मुख पर कमनीयता, छाती में अकड़, चाल में फौजी ढव आदि यह किसका प्रताप है ? हास में प्रथम नम्बर रहना, खेल में अमग्रण्य रहना, कुशती में किसी से हार न जाना, बड़े भारी बोझ को सहज ही में उठा लेना, हाथ में लिया हुआ काम पूरा करना, एक शब्द ही से दूसरों को वश में कर लेना, बड़ी बड़ी सभाओं में खड़े होते ही, अपनी सुरीली तथा प्रभावशाली आवाज से बड़े बड़े विद्वानों की अच्छी अच्छी युक्तियाँ, अपनी वाक्धारा प्रवाह में बहा देना, अत्यन्त निर्भयता, साहस तथा हृद निश्चय का होना—यह सब किसका प्रताप है ? निश्चय जानिए यह सब केवल ब्रह्मचर्य ही का अद्भुत प्रताप है ! कुमार अवस्था में सम्हल कर चलने के ही ये सब चमत्कार हैं ।
ये तपश्च तपस्यन्ति कौमाराः ब्रह्मचारिणः । विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ १ ॥
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❧ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❧
“जो कुमार ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यरूपी तपः के तपस्वी हैं और जिन्होंने सुविद्या ( वेद ) से अपने को पवित्र बना लिया है वे ही केवल अद्वुत और कठिन से कठिन कर्मों को कर सकते हैं और इस दुस्तर संसार-सागर से तर सकते हैं।”
ब्रह्मचारी पुरुष सर्वत्र दिग्विजयी होते हैं; उन्हें कभी अपयश नहीं मिलता। सम्पूर्ण अपयश का मूल एक मात्र वीर्यहीनता ही है ! वीर अभिमन्यु का नाश क्यों हुआ ? वह समय में जाने के पहले भारत-वंश विस्तार का “वीज” आरोपण करके गया था। पृथ्वीराज क्यों पकड़ा व मारा गया ? कहते हैं युद्ध में जाते समय उसकी कमर उसकी खी ने कस दी थी ! जो वीर्य को नष्ट करता है, वह हर जगह नष्ट किया जाता है और जो वीर्य को धारता है वही सब जगह विजयी होता है सच्चा ब्रह्मचारी काल का भी काल होता है ! दुश्मन भी उसके सामने कान्तिहीन पड़ जाते हैं। “आत्मिक तेज” जिसको अंग्रेजी में परसनल म्याग्नेटिज्म (Personal Magnetism) अथवा तेजोबल यानी परसनल श्रोरा (Personal Aura) कहते हैं, ब्रह्मचारी में कूट कूट कर भरा रहता है, जिसके प्रताप से लोग उस पर अनायास लट्ट हो जाते हैं। वह जो कुछ कहता है, वही प्रिय व सत्य मालूम देने लगता है। और सब के चित्त में उसके लिये पूज्यभाव पैदा होता है।
एक धनी अच्छे अच्छे कपड़े पहिनता है, चेहरा भी उसका सफेद होता है, पर उसके तरफ देखते ही, हमारा हृदय भी अपराध न करने पर भी, हम में एकाएक उसके लिये तिरस्कार बुद्धि जागृति
❧ ब्रह्मचर्य परंतपः ।” ब्रह्मचर्य ही सब से श्रेष्ठ तपश्चर्या है।
❁ वीर्य का प्रचण्ड प्रताप ❁
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होती है। इसका क्या कारण ? इसका एक मात्र कारण उसकी वीर्यहीनता ही है। दूसरा एक कोई गरीब का नवयुवक सतेज बालक होता है, परन्तु उसे देखते ही मनुष्य के चित्त में उसके लिये एकाएक स्नेहभाव जागृत होता है। यह किसका प्रताप है ? यह सब वीर्यपुष्टता वा ब्रह्मचर्य का ही दिव्य प्रताप है। सारांश शुक्रसंचय ही स्नेह का एकमात्र आदि कारण है यह बात अक्षर अक्षर सत्य है।
स्वामी विवेकानन्द जब शिकागो ( अमेरिका ) की प्रचण्ड विद्वत्सभा में खड़े हुए, तब वहाँ के समस्त विद्वानों को उन्होंने केवल पाँच ही मिनट में कठपुतलियों की तरह मुग्ध कर लिया। उनकी अच्छी अच्छी युक्तियों को अपनी वाक्शक्ति-प्रवाह में, चरण ही में, वहा दिया और लोगों को अपना पूर्ण व स्थायी भक्त बना लिया। यह किसका प्रताप है ? यह केवल ब्रह्मतेज ही का प्रताप है, जो कि एक मात्र ब्रह्मचर्य ही से प्राप्त हो सकता है और अन्य किसी से नहीं। एक विद्वान आता है तीन घंटे व्याख्यान देता है और लोगों को अपनी वाक्सामर्थ्य से हिला छोड़ता है, पर लोग घर पर जाते ही वह सब भूल जाते हैं। ऐसा क्यों ? यह सब वीर्यहीनता के ही बदौलत ! दूसरा एक ऐसा ही मामूली मनुष्य आता है, दो-चार ही शब्द सुनाता है। परन्तु वे ही दो-चार शब्द मनुष्य आखीर दम तक नहीं भूलता। यह किसका प्रताप है ? यह सब आत्मतेज का अर्थात् वीर्यवत्ता का प्रताप है ! वीर्यभ्रष्ट पुरुष कभी आत्मबली नहीं हो सकता और न वह स्थायी प्रभाव ही डाल सकता है, चाहे वह फिर जटा बढ़ाये हो, चाहे मूँड मुँडाये हो अथवा चारों वेदों का ज्ञाता हो ! कहा है :—“एकतश्चतुरो वेदाः ब्रह्मचर्यं तथैकतः ।”
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
एक तरफ चारों वेदों का पुराय और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य का पुराय, दोनों में ब्रह्मचर्य ही का पुराय विशेष है ।
ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही श्री भीष्मपितामह के सामने उनके महान प्रतापी गुरु परशुरामजी को हार माननी पड़ी । इतना ही नहीं किन्तु श्रीकृष्ण भगवान् को भी उनके सामने अपना प्रण भूल कर आखीर में मुक ही जाना पड़ा ! अहा ! कहते रोवें खड़े हो जाते हैं ! श्री हनुमान जी ने एक ही घूँसे से इतने बड़े भारी प्रतापी रावण को बेहोश कर दिया और उसके मुख से खून बहाया । एक ही उड़ान में समुद्र को लीघना, बड़े बड़े पर्वतों को सहज ही में उठा ले आना और काल के भी मुंह में थप्पड़ लगाना, यह किस का सामर्थ्य है ? यह सब अखण्ड ब्रह्मचर्य का ही सामर्थ्य है ! ब्रह्मचर्य से मनुष्य में निस्संशय अद्वितीय ब्रह्मतेज प्रकट होता है, जिसके कारण वह बड़े बड़े अद्भुत कार्य बड़ी आसानी से कर दिखा लाता है । आज तक जो कुछ बड़े बड़े धार्मिक व सामाजिक परिवर्तन हुए हैं वे सब ब्रह्मचारियों ही के द्वारा अथवा ब्रह्मचर्य ही के बल पर हुए हैं ।
वीर्यहीनता के कारण आज हम लोगों में अपने पूर्वजों की अद्भुत शक्तियों में भी सन्देह प्राप्त हो रहा है । क्यों न हो ! हमारे ही सौ वर्ष तक जीवित रहने का यदि हमें सन्देह है, तो फिर ईश्वरीय शक्तियों के लिये सन्देह प्राप्त होना स्वाभाविक बात है ! पुष्पक विमान के लिये भी तो हमें पहले ऐसा ही सन्देह था ? परन्तु आज जब ब्रह्म विमानों को देख रहे हैं तब चुप मार कर सिर हिला कर कहने लगे कि ‘होगा भाई, ये लोग यंत्र से चलावे