ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
ब्रह्मचर्य साधना
पहला अध्याय
ब्रह्मचर्य क्या है ?
ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म की पवित्रता है। ब्रह्मचर्य अविवाहित जीवन है, ब्रह्मचर्य अत्यधिकार है, केवल जननेन्द्रिय को ही काबू में करना ब्रह्मचर्य नहीं है। यह ब्रह्मचर्य की विस्तृत (स्पष्ट) अर्थ में व्याख्या है। ब्रह्मचर्य वेदों और ईश्वर के आशय को निर्दिष्ट (सूचित) करता है। ब्रह्मचर्य में चरित्र निर्माण सम्मिलित है। ब्रह्मचर्य परमावश्यक है। ब्रह्मचर्य एक यान्त्रित पदार्थ है। ब्रह्मचर्य बड़े महत्व की वस्तु है। लोग कहते हैं “ज्ञान शक्ति है।” परन्तु मैं पूर्ण विश्वास के
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साथ तथा अपने निजी अनुभव द्वारा यह घोषणा करके कहता हूँ कि चरित्र ही शक्ति है और चरित्र ज्ञान से भी कई अधिक श्रेष्ठतर है।
‘यम’ राजयोग का पहला अंग है। वह है—अहिंसा (किसी प्रकार की हिंसा न करना), सत्य (सत्य बोलना), अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (अविवाहित पवित्र जीवन-यापन करना), और अपरिग्रह (किसी से कुछ न लेना)—इनमें ब्रह्मचर्य का महत्व सब से अधिक है। ज्ञानयोग में साधक के लिए साधना की नींव दम (आत्म-संयम) है। महाभारत (शान्ति पर्व) में आपको मिलेगा “धर्म की कई शाखायें हैं, परन्तु उन सब का आधार ‘दम’ है।” जो मनुष्य आधिभौतिक या आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए ब्रह्मचर्य का विषय बड़े महत्व का है। बिना ब्रह्मचर्य के मनुष्य सांसारिक कार्यों या आध्यात्मिक अभ्यासों के लिए पूर्ण अयोग्य है।
ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म से पवित्र (अविवाहित) रहने का व्रत है जिसके द्वारा मनुष्य ब्रह्म की प्राप्ति करता है। ब्रह्मचर्य एक दिव्य शब्द है। यह योग का तथ्य (सार) है। अविद्या के कारण हम इसे भूल गए हैं। यह उत्तम योग है जिसके लिए भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में बड़े जोर के साथ स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ध्यान के लिये ब्रह्मचर्य व्रत परम आवश्यक है—(अध्याय ६. श्लोक १४, अध्याय १७. श्लोक १४४ में)। भगवान् कृष्ण कहते हैं कि शारीरिक त्यों के लिये जो जो आवश्यक वस्तुयें हैं, उनमें ब्रह्मचर्य एक है। पुनः अध्याय ८. श्लोक ११. में
ब्रह्मचर्य क्या है ?
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कहा है “योगी जन ध्येय (जिसको वेद वेत्ताओं ने बताया है) को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं।” यही बात कटोपनिषद् अध्याय १-२-१५ में मिलती है।
ईश्वर रस है। रस वीर्य है। रस या वीर्य प्राप्त कर के ही आप नित्यानन्द प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य का अर्थ है—वीर्य पर अधिकार, वेदों का अध्ययन, और व्रत चिन्तन। जैसा कि महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है—
कायेन मनसा वाचा सर्वावस्थातु सर्वदा ।
सर्वत्र मैथुन त्यागो ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥
अर्थात् शरीर, मन और वचन से सब स्थानों और सब स्थितियों में मैथुन से सदा बचे रहना ब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य दो प्रकार का कहा गया है—एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। शरीर पर नियन्त्रण रखना शारीरिक ब्रह्मचर्य है। डुरे विचारों पर नियन्त्रण रखना मानसिक ब्रह्मचर्य है। मानसिक ब्रह्मचर्य में कोई भी डुरे विचार मन में प्रविष्ट नहीं होंगे। मानसिक ब्रह्मचर्य शारीरिक ब्रह्मचर्य से कुछ अधिक कठिन है, परन्तु सच्ची लगन और परिश्रम के द्वारा मानसिक ब्रह्मचर्य पर वास्तविक आधिपत्य स्थापित किया जा सकता है। आपको सदा मानसिक ब्रह्मचर्य की भावना अपने सामने रखनी चाहिये। तब आप उसका शीघ्र ही अनुभव करेंगे। इसमें तनिक भी रुन्देए नहीं है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल जननेन्द्रिय को ही काबू में राना नहीं है, परन्तु मन, वचन और कर्म से सारो
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दन्दिद्वयों को भी । निर्वाण पद का द्वार पूर्णब्रह्मचर्य है परमानन्द के राज्य-द्वार को खोलने के लिए पूर्ण (शुद्ध) ब्रह्मचर्य एकमात्र कुंजी है । परम शान्ति रूपी धाम क मार्ग ब्रह्मचर्य या पवित्रता से ही आरम्भ होता है ।
सांसारिक पदार्थों की इच्छा पूर्ति ही पाप है । स्थूल शरीर तो अलौकिक पदार्थों के विषय में निरन्तर चिंतन करने वाली आध्यात्मिक भावना का एक तुच्छ गुलाम है । मनुष्य की उत्पत्ति इस लिये हुई थी कि वह ब्रह्म या ईश्वर के साथ आध्यात्मिक सम्पर्क रखते हुये जीवन-यापन करे, परन्तु वह उन दुष्ट अशुभों के प्रलोभनों के अधीन हो गया जिन्होंने उसको उसके विषय-सुख वाले स्वभाव की ओर प्रवृत्त कर उसे भगवत् चिंतन से दूर कर दिया तथा उसको सांसारिक जीवन यापन करने में जुटा दिया । इसलिये सब विषय सुखों के त्यागने, विवेक और वैराग्य के द्वारा अपने को संसार से दूर रखने, आत्मा के पीछे अकेला जीवन यापन करने तथा ईश्वर की पूर्णता और पवित्रता का अनुसरण करने में ही धर्मानुरूप भलाई है । ब्रह्मचर्य वसंत ऋतु का खिला हुआ पुष्प है जिसकी पंखुरियों में से अमरत्व निकलता है । धैर्य और वीरता के असाधारण गुण ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं । केवल छी मसंग (मैथुन) से बचे रहना ही पर्याप्त नहीं, परन्तु अनियंत्रित भावुकताओं हस्त और वंसे ही अन्य कार्य तथा सब प्रकार के विपरीत मैथुन-अभ्यासों से दूर रहना भी परमावश्यक है । वैसे ही प्रेम संबंधी चिन्ताओं तथा विषय भोग संबंधी वृथा चिंतन से सदा दूर रहना भी नितांत अनिवार्य है ।
ब्रह्मचर्य क्या है ।
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काय-सिद्धि प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य एक आधार है । पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये । यह परम आवश्यक है । योग के अभ्यास से वीर्य श्रोत्र शक्ति में बदल जाता है । योगी का शरीर पूर्ण स्वस्थ होगा । उसकी चाल में आकर्षण और अनुग्रह होगा । वह (इच्छा मृत्यु) जब तक चाहे उतने ही वर्षों तक जीवित रह सकता है । यही कारण है कि भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं “तस्मात् योगो भवार्जुन” —अर्थात् हे अर्जुन तू योगी बन ।
मैथुन संबंधी विचारों और भावनाओं से मुक्त रहना ही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचर्य मन, वचन और कर्म से इन्द्रिय-निग्रह है । यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिये समान रूप से आवश्यक है । भीष्म, हनुमान, लक्ष्मण, मीरा-वार्हा, सुलभा, और गार्गी—ये सब ब्रह्मचारी थे । भगवान् शंकर ने कहा है—“ब्रह्मचर्य सब से उत्तम तप है; ऐसा पूर्ण पवित्र ब्रह्मचारी वास्तव में ईश्वर है ।”
ब्रह्मचर्य अमरत्व प्राप्त करने के लिये मूल आधार है । ब्रह्मचर्य से आधिभौतिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है । ब्रह्मचर्य शरीर के भीतर रहने वाले काम, क्रोध, लोभ आदि शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिये एक प्रमोष शस्त्र है । यह विशिष्ट आनन्द, अस्वंड और नित्य सुख का देने वाला है । वह आर्यभिक वल, शुद्ध मस्तिष्क, विशालबुद्धि और इच्छाशक्ति, धारणा-शक्ति और उत्तम विचारशक्ति प्रदान करता है । केवल ब्रह्मचर्य के द्वारा ही आप शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं ।
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प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह अपने चरित्र को सुधारने का भरसक प्रयत्न करे। आपका सारा जीवन तथा जीवन में सफलता केवल आपके चरित्र निर्माण पर ही भरसक निर्भर है। संसार में सभी महापुरुषों ने जो प्रभुता प्राप्त की है वह केवल अपने चरित्र के ही द्वारा की है। संसार के प्रसिद्ध बुद्धिमान पुरुषों ने जो कर्त्तव्ययाति और मान प्राप्त किया है, वह केवल उनके चरित्र के ही द्वारा हुआ है।
ब्रह्मचर्य के अष्ट अंग
ब्रह्मचर्य के निम्नलिखित आठ अंग हैं। तदनुसार अष्ट ब्रह्मचर्य की धारा में आठ अवरोध (विघ्न)। आपको इन विघ्नों से पूर्ण विचार, पूर्ण पुरुषाध ॐ पूर्ण सावधानी के साथ बचना चाहिये।
(१) दुर्शन—किसी स्त्री या स्त्री के चित्र (फोटो) को कामातुर हृदि से देखना।
(२) स्पर्शन—स्त्री के पास बैठने, उसको छूने या उस को गले लगाने की इच्छा।
(३) केली—स्त्री के साथ खेलना।
(४) कीर्तन—स्त्री के गुणों की अपने मित्रों के सामने प्रशंसा करना।
(५) गुह्य भाषण—स्त्री के साथ एकांत में बातचीत करना।
(६) संकल्प—स्त्री का चिंतन करना।
(७) अध्यवसायम्—स्त्री के साथ विषय-भोग करने का हृदय संकल्प।
(८) क्रिया—स्त्री प्रसंग।
वीर्य
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जो मनुष्य उपर्युक्त आठ प्रकार की वाधाओं से मुक्त है केवल वही सच्चा ब्रह्मचारी कहा जा सकता है। सच्चे ब्रह्मचारी को चाहिये कि वह इन वाधाओं से सर्वथा बचा रहे।
मनु महाराज का कथन है कि जब तक विद्यार्थी पाठशाला में अध्ययन करते हैं, तब तक उनको चाहिये कि वे अपनी इन्द्रियों पर पूरा पूरा नियंत्रण रखने का अभ्यास करें। उनको चाहिए कि वे मदिरा, मांस, सुगन्धित तैल या द्रव, फूल मालाएँ, व्री, गर्भ और तीक्ष्ण पदार्थ, अंजन, जूते, छाता, जूआ, गपशष्प, मिथ्या भाषण, स्त्रियों की ओर देखना, धनकम धनका करना और अन्यो के साथ शयन करना आदि आदि बातों से सदा बचे रहें। विद्यार्थी को स्वप्न में भी अपने वीर्य को नष्ट नहीं होने देना चाहिये। यदि वह जाने या अनजाने किसी भी प्रकार से वीर्य नष्ट करता है तो वह अपने कर्तव्य से न्युत होता है। यह उसकी मृत्यु है। यह पाप है। वह एक पतित व्यक्ति है। उसे चाहिये कि वह उचित साधना के द्वारा अपने वीर्य की रक्षा करे। केवल ब्रह्मचर्य और ब्रह्मचर्य के ही द्वारा आप जीवन में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।
वीर्य
अस से रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से चरवी, चरवी से हड्डी, हड्डी से मज्जा, और अन्त में मज्जा से शुक्र या वीर्य बनता है।
जो गुदा (मज्जा) हड्डियों के भीतर कुम्भ द्वारा रहता है, उससे वीर्य उत्पन्न होता है। वह सूक्ष्म स्थिति में शरीर
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के सब सूक्ष्म भागों में पाया जाता है। अन्न से रस बन है। रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से चरबी, चर से हड्डी और हड्डी से मज्जा और मज्जा से वीर्य उत् होता है। ये ही सात धातु इस शरीर और जीवन आधार हैं। गौर कीजिये कि वीर्य कितना कीमती है। वह अन्तिम सार है। वह सभी सारों का सार है। रक्त की ४ बूँदों से वीर्य की एक बूँद बनती है।
आयुर्वेद के अनुसार रक्त की ८० बूँदों से वीर्य व एक बूँद बनती है, ऐसा माना गया है। जिस प्रकार ईश्वर में रस और दूध में मक्खन सर्वत्र व्यापक रहता है ठीक उसी प्रकार सब शरीर में वीर्य व्यापक रहता है। जिस प्रकार दूध से मध्य कर मक्खन निकाल लेने के बाद पतली छाछ रह जाती है, ठीक उसी प्रकार वीर्य क्षय होने से वह पतला पड़ जाता है। जितना अधिक वीर्य का क्षय होगा उतना ही अधिक मनुष्य अशक्त होगा। योग शास्त्रों में कहा है “मरणम् त्रितु पातेन जीवनम् त्रितु रक्ष्यात्।” अर्थात् त्रितु (वीर्य) के पतन से मृत्यु और उसके रक्षण से जीवन प्राप्त होता है वीर्य ही मनुष्य में वास्तविक सार-भूत शक्ति है। वह मनुष्य के लिए गुप्त निधि है। वह मुख पर कांति (ब्रह्मतेज) और बुद्धि में तीव्रता प्रदान करता है।
अंडकोष की शैली में जो दो अंडकोष रहते हैं, उनको स्नाय या रस-ग्रन्थियां कहते हैं। इन अंडकोषों में एक विशिष्ट पदार्थ रहता है जो रक्त से वीर्य उत्पन्न करता रहता है। जिस प्रकार मधु-मन्त्रियां बूँद बूँद करके छुने में मधु एकत्रित करती हैं, ठीक उसी प्रकार इन अंडकोषों
वीथ
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के सूक्ष्म-भाग रक्त की एक-एक बूँद के द्वारा वीर्य को एकत्रित करते हैं। तब यह स्नाव दो नाड़ियों के द्वारा शुक्र संबंधी स्थान को ले जाया जाता है। उच्चेजना या प्रकोप की अवस्था में वह विशिष्ट नाड़ियों के द्वारा मूत्र-नली में फँक दिया जाता है जहाँ वह शिश्न संबंधी स्नाव के साथ मिल जाता है। (इस विषय में विशेष जानकारी के लिए किसी शरीर रचना संबंधी शास्त्र का अवलोकन कीजिए) इस ज्ञान की आवश्यकता है। अब मैं परमावश्यक विभाग साधना की ओर चलता हूँ जिसमें वीर्य रक्षण के आभ्यासिक तरीके बताये गये हैं।
आयुर्वेद के अनुसार वीर्य सातवीं यानी आखिरी धातु है जो मज्जा से बनता है। इन सात धातुओं का निश्चित वर्णन ऊपर कर दिया गया है। प्रत्येक धातु के तीन भाग होते हैं। वीर्य स्थूल शरीर की, हृदय तथा बुद्धि की पुष्टि करता है। जो मनुष्य स्थूल शरीर, हृदय और बुद्धि तीनों का सदुपयोग करता है केवल वही पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है। एक पहलवान या कुश्ती करने वाला जो केवल अपने स्थूल शरीर ही को पुष्ट रखता है परन्तु अपनी बुद्धि और हृदय को उन्नत नहीं करता वह पूर्ण ब्रह्मचर्य कदापि नहीं रख सकता। वह केवल शारीरिक ब्रह्मचर्य ही रख सकता है न कि मानसिक और हार्दिक। वह धातु जिसका सम्बन्ध हृदय और मन से है नितन्देह वह जायगा। यदि कोई साधक केवल जप और ध्यान करता है और यदि वह अपने हृदय को उन्नत नहीं बनाता और यदि वह शारीरिक व्यायाम नहीं करता तो वह केवल मानसिक ब्रह्मचर्य ही प्राप्त कर सकेगा।
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वीर्य का वह भाग जिससे हृदय और शरीर की पुष्टि होती है, वह निकल जायगा। (परन्तु एक पूर्ण योगी जो निरन्तर ध्यान में मग्न रहता है, वह पूर्ण ब्रह्मचर्य प्राप्त करेगा यदि वह शारीरिक व्यायाम न भी करे)।
बुद्ध प्रृथ्वी से रस प्राप्त करता है। वह रस उस बुद्ध की टहनियाँ, शाखायें, पत्तियाँ, फूल, फल आदि में सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। फलों, पत्तियों आदि में जो सुन्दरता और चमक दमक है उसका कारण वह रस ही है। ठीक उसी प्रकार वीर्य जो अंडकोंपों के सूक्ष्म भागों के द्वारा रक्त से बनता है वह (वीर्य) ही शरीर और उसकी अन्य इन्द्रियों को सुन्दरता और बल प्रदान करता है।
भगवान् धन्वन्तरि के शिष्यों में से एक शिष्य ने अपनी आयुर्वेद की शिक्षा समाप्त कर लेने के पश्चात् उनसे कहा, “हे भगवन् अब आप मुझे कुण्डलन कर स्वास्थ्य का रहस्य बतलाइये।” भगवान् धन्वन्तरि ने जवाब दिया “यह वीर्य ही आत्मा है।” इस सारभूत शक्ति की रक्षा करने में ही स्वास्थ्य का रहस्य प्रस्तुत है। जो मनुष्य इस शक्ति को नष्ट करता है, वह शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक किसी प्रकार भी उन्नति प्राप्त नहीं कर सकता।
यदि वीर्य मनुष्य में निरन्तर अद्भूत है, तो वह या तो बाहिर निकल जाना चाहिए या पुनः सूख जाना चाहिये। वैज्ञानिक अनुसन्धान (खोज) के द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि धातु जब एकत्रित किया जाकर पुनः शरीर में सुखाया जाता है तो वह रक्त को शुद्ध व सुशोभित कर मस्तिष्क को बल प्रदान करता है। डायर लुई का
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कहना है कि शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि तथा बुद्धि की तीव्रता के लिए वीर्य की रक्षा करना आवश्यक है।
एक दूसरे लेखक डान्टर ६० पी० मित्रा लिखते हैं “वीर्य, चाहे जाने वा अनजाने यदि नष्ट किया जाता है, तो यह सान्तात् जीवन-शक्ति का ही हास है।”
यह सर्वत्र स्वीकार किया गया है कि रक्त के उत्तमोत्तम तत्व के द्वारा ही वीर्य का निर्माण होता है। यदि ये उप-युक्त सिद्धांत सही हैं तो यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की भलाई व उन्नति के लिए पवित्र जीवन परमावश्यक है।
वीर्य की रक्षा के लिए नित्य कौपीन (लंगोट) पहिनना आवश्यक है; इससे श्रंङकोष की वृद्धि तथा रात्रि में प्रवाह (स्वप्नदोष आदि द्वारा) नहीं होगा। ब्रह्मचारी के लिए यह योग्य है कि वह नित्य खड़ाऊं पढ़ने, क्योंकि इससे वीर्य की रक्षा होगी, नेत्रों को लाभ होगा, आगु दीर्घ होगी तथा शरीर की पवित्रता और कांति बढ़ेगी।
जब वीर्य एक बार नष्ट हो जाता है तो पुनः उसकी पूर्ति आप जन्म भर में भी नहीं कर सकते, चाहे आप कितने ही वादम, दूध, मक्खन, च्यवनप्राश या मकरध्वज आदि पौष्टिक श्रोपथियों का सेवन करें। यह वीर्य जब सावधानी के साथ रक्षित किया जाता है, तो वह एक विचित्र कुजी का काम देता है कि जिसके द्वारा आप आत्मा-परमात्मा या नित्यानन्द के राज्य-द्वारों को खोल सकते हैं तथा जीवन में सब प्रकार की उन्नति क्रियाओं में मगलता प्राप्त कर सकते हैं।
ब्रह्मचर्य-व्रत
ब्रह्मचर्य वा व्रत आपको प्रलोभनों से बचने के लिए
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ब्रह्मचर्य साधना
सहायता प्रदान करेगा। काम पर आक्रमण करने के लिए वह एक अमोघ शस्त्र है। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत धारण नहीं करते हैं तो आपका मन किसी भी समय लालायित हो सकता है। उस प्रलोभन को दवाने के लिए आपके पास कोई भी शक्ति नहीं होगी और आप अवश्य उसका शिकार बन जायेंगे। जो मनुष्य अशक्त और स्त्री स्वभाव का है, वह इस व्रत को ग्रहण करने से डरता है वह इसके लिए कई बहाने प्रस्तुत करता है और कहता है “मैं संकल्प के द्वारा क्यों अपने को बन्धन में डालूँ। मेरी इच्छा-शक्ति बलवान और समर्थ है। मैं किसी भी प्रकार प्रलोभन को दबा सकता हूँ। मैं भक्ति करता हूँ। मैं इच्छाशक्ति की बढ़ाने का अभ्यास करता हूँ।” उसको आगे जाकर पछुताना पड़ता है। उसका इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता। जिस मनुष्य के अन्तःकरण में त्याज्य पदार्थ की सूक्ष्म वासना बनी रहती है, केवल वही मनुष्य इस प्रकार के बहाने प्रस्तुत (पेश) करता है। आपका विचार, विवेक और वैराग्य उचित या सही होना चाहिए। केवल तब ही आपका त्याग नित्य और स्थिर हो सकता है। यदि त्याग विवेक और विचार के द्वारा नहीं किया गया है, तो मन केवल उस वस्तु को पुनः प्राप्त करने का अवसर हूँदता रहेगा जिसका कि उसने त्याग किया है।
यदि आप अशक्त या दुर्बल हैं तो पहिले एक महीने के लिए ब्रह्मचर्यव्रत धारण कीजिए पुनः उसको तीन महीने के लिए बढ़ाइए। आप कुछ बल प्राप्त कर लेंगे; आप उसी व्रत को ६ महीने के लिए बढ़ा सकेंगे। इस प्रकार शनैः शनैः आप इसी व्रत को एक दो या तीन वर्षों तक
ब्रह्मचर्य व्रत
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तक बढ़ाने के लिए सशक्त हो जाएंगे। अकेले सोहृये और नित्य सूत्र जप, ध्यान और कीर्तन कीजिए। अब आप काम से घृणा करने लगेंगे। आप स्वतंत्रता और अकथनीय और आनन्द का अनुभव करेंगे। आपकी धम-पत्नी को भी आपके साथ नित्य जप, ध्यान और कीर्तन करना चाहिए।
दूसरा अध्याय
दीर्घायु का रहस्य
केवल सदाचार ही के द्वारा आप पूर्ण आयु और नित्यमन्द प्राप्त कर सकते हैं, यद्यपि आप में अन्य गुण न भी हों। चरित्र-निर्माण ही आचार है। आपका चरित्र उत्तम होना चाहिए। अन्यथा आप ब्रह्मचर्य या बल (बल) हीन होकर असामयिक मृत्यु प्राप्त करेंगे। श्रुतियों में मनुष्य की पूरी आयु एक सौ वर्षों की घोषित की गई है। यह केवल ब्रह्मचर्य ही के द्वारा प्राप्त की जा सकती है। यहां आपको एक बात और स्मरण रखने की है : वह यह है कि दीर्घायुष्य का रहस्य, खान-पान के विचार, संयम, अरुपाहार, पवित्रता (ब्रह्मचर्य) और जीवन में आशावाद की दृष्टि पर निर्भर है। तदनुसार पेद्रू (अधिक भोजन करने वाला), शराबी, आलसी, दुराचारी और निरुद्योगी मनुष्य कभी भी पूरा आयुष्य प्राप्त करने की आशा नहीं रख सकता।
“मनुष्य की आयु सौ या सौ से भी अधिक हो सकती है;” यह कोई काल्पनिक उक्ति (कथन) नहीं है। प्राकृतिक और आध्यात्मिक सिद्धांतों के अनुसार, प्रौढ़ावस्था प्राप्त करने के लिए जितना समय की आवश्यकता है, उससे
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दीर्घायु का रहस्य
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कम से कम पांच गुणा समय मनुष्य की सम्पूर्ण आयु का होना ही चाहिए। यह एक प्रचलित नियम है जिसका उदाहरण पशु-सृष्टि में दिया जाता है। घोड़ा प्रायः चार वर्ष तक बढ़कर मौजूद हो जाता है और प्रायः १२ से १४ वर्ष तक जीता है; ऊँट प्रायः ८ वर्ष की आयु तक बढ़ता है और प्रायः ४० वर्ष तक जीवित रहता है। पाश्चात्य देश के श्री मिल्टन सेचरेन का कथन है कि मनुष्य प्रायः २० या २५ वर्षों तक बढ़ कर युवावस्था प्राप्त करता है और पुनः यदि कोई असाधारण घटना न हो, पूरे सौ वर्षों से कम नहीं जी सकता। अब इसकी तुलना, हमारे भूति पुराणादि हिंदू शास्त्रों में बताए हुए समय तथा पूरे २५ वर्ष तक की ब्रह्मचर्यावस्था के साथ कीजिए। ब्रह्मचारी के लिए पूर्ण बुद्धि का जो समय बताया गया है वह केवल वीर्य रक्षण तथा पूर्ण ब्रह्मचर्य के द्वारा स्थापित किया जा सकता है; अतः राज योग के लेखक महर्षि पातंजलि का कथन है—“ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्य लाभः”
ऐसे भी उदाहरण मिलेंगे कि जिनमें कतिपय चरित्र-भ्रष्ट मनुष्य भी बुद्धिमान हुए हैं तथा दीर्घायु प्राप्त की है। इसका प्रत्यक्ष कारण केवल उनका प्रारब्ध ही कहा जा सकता है। परन्तु यदि उनमें ब्रह्मचर्य और चरित्र की पवित्रता होती तो वे इससे भी अधिक शक्ति-शाली और प्रतापी होते।
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य
पवित्र जल, वायु, स्वास्थ्य-प्रद भोजन, शारीरिक-व्यायाम, मैदान के खेल, तीव्र गति में दहलना, नाच चलाना, तैरना, टैनिंग आदि खेल खेलना—ये सब ही
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ब्रह्मचर्य साधना
उत्तम स्वास्थ्य, शारीरिक बल और मानसिक शक्ति के रक्षण में सहायक हैं। वास्तव में स्वास्थ्य और बल प्राप्त करने के अनेक विधान हैं। ये विधान निश्चयात्मक अत्यन्त आवश्यक हैं। परन्तु इन सब में ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ है। ब्रह्मचर्य के बिना आपके सब व्यायाम निरर्थक हैं। स्वास्थ्य और आनन्द के राज्य-द्वार को खोलने के लिए ब्रह्मचर्य एक मात्र कुञ्जी है। वह परम कल्याण और आनन्द रूपी भवन की नींव है। वह वास्तविक मनुष्यत्व की रक्षा करने वाली एक मात्र उत्तम वस्तु है। वीर्य (प्राण शक्ति) जो आपके जीवन का आधार है, जो प्रार्थों का प्राण है, जो आपके सुन्दर कपोलों में और चमकीले नेत्रों में प्रकाशित होता है, आपके लिए एक वास्तविक निधि है। इस बात का अच्छी तरह से स्मरण रखिए। जीवन के इस सार-भूत तत्व का महत्व तथा इसकी आवश्यकता को पूर्ण रूप से समझिए। वीर्य ही पूर्ण शक्ति है। वीर्य ही परम धन है। वीर्य ही ईश्वर है। वीर्य ही गति-युक्त ईश्वर है। वीर्य ही इच्छा-शक्ति संचालक है। वीर्य ही आत्म-बल है। वीर्य ही ईश्वर की विभूति है। गीता में कहा है—“पौरुषम् शुभु” मनुष्यों में मैं पौरुषत्व अर्थात् संतान उत्पन्न करने की शक्ति हूँ। वीर्य विचार, बुद्धि और ज्ञान का सार तत्व है।
ब्रह्मचर्य से मनुष्य की मानसिक शक्ति अधिक बढ़ती है। मानसिक शक्ति शारीरिक बल से कोई अधिक श्रेष्ठ है। महात्मा गांधी जी को लीजिए। शरीर से तो वे बड़े दुबले पतले थे परन्तु उनका तीव्र बुद्धि-बल वक्ता की प्रशंसनीय था। वह केवल उनके ब्रह्मचर्य के ही कारण था।
ब्रह्मचर्य का तात्पर्य
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ब्रह्मचर्य मोक्ष का आधार है। यदि आधार हट नहीं है तो अधिक वर्षा में सकान गिर जायगा। ठीक इसी प्रकार यदि आप ब्रह्मचर्य में स्थित नहीं है और यदि आप का मन कुसित विचारों से चलायमान हो जाता है तो आप का पतन हो जायगा। आप निर्विकल्प समाधि—जो योग रूपी नियन्त्रण की शिक्षा है, को नहीं प्राप्त कर सकते।
श्रुति का वचन है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्य”—यह आत्मा निर्वल व्यक्ति के द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता। गीता का कथन है “वदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरति”—जो उस ब्रह्म को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें ब्रह्मचर्य का आचरण करना चाहिए। गीता अध्याय ८, श्लोक ११, “त्रिविधं नधस्थेदं द्वारं नाशनमात्मनः; कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतन्नर्थं त्यजेत्”—अर्थात् हे अर्जुन ! काम, क्रोध और लोभ ये नर्क के तीन द्वार हैं अतः तू इन तीनों का त्याग कर। गीता अध्याय १६, श्लोक २१।
श्री लंवीचस का कथन है कि जो मनुष्य कामुकता या मैथुन से अपवित्र है, उसकी प्रार्थना देवतागण नहीं सुनते। इस्लाम धर्म के अनुसार भी जब मनुष्य हज करने के लिए मक्का जाता है तो उसके लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है। यहूदी धर्म परिपद् के अनुसार भी देव मन्दिर में प्रवेश करने तथा देव दर्शन के पूर्व ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता की आवश्यकता है। प्राचीन भारत, मिश्र और यूनान देशों की धर्म-सम्प्रदाय के अनुसार भी भगवान के पूजन के पूर्व तथा पूजन के समय मनुष्य के लिए ब्रह्मचर्य रूपी पवित्रता, अनिवार्य है। ईसाई धर्म में भी ठीक ऐसा ही है, नामकरण संस्कारादि धर्म-कार्यों में इस पवित्रता की
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ब्रह्मचर्य साधना
आवश्यकता है।
इसाई धर्म का सर्वोच्च आदर्श यही पवित्रता थी। ईसाई धर्म के पादार्थों ने भी ब्रह्मचर्य की विशेष प्रशंसा की उन्होंने विवाह प्रणाली को तो अमुल्य ही माना और वह भी केवल उन लोगों के लिए जो कि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने में असमर्थ थे। यूतान के पादरी सर्वदा ब्रह्मचारी होते हैं; उनका चुनाव योगी संन्यासियों में से ही किया जाता है।
जिम मनुष्य ने थोड़ा बहुत ही ब्रह्मचर्य का अभ्यास किया है, वह किसी भी प्रकार की व्याधि क्यों न हो उसे बहुत सुगमता से हटा देगा। यदि किसी साधारण मनुष्य को ठीक होने में एक माह की आवश्यकता है, तो वह केवल एक ही सप्ताह में पूर्ण स्वस्थ हो जायगा।
ब्रह्मचर्य के अभ्यास से शक्ति प्राप्त होती है। पूर्ण मानसिक और शारीरिक ब्रह्मचर्य के द्वारा योगी सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त करता है। उससे वह आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है। जब पवित्रता रहती है, तो मन की बुत्तियों का अपव्यय नहीं होता। मन की एकाग्रता सुगम हो जाती है। मन की एकाग्रता और पवित्रता साथ-साथ रहती हैं। यद्यपि साधु या शास्त्री अत्यन्त कम भाषण करता है, तथापि सुनने वालों के मन पर उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। इसका कारण उसकी श्रोत्र शक्ति है, जो उसने वीर्य की रक्षा तथा उसकी शुद्धि के द्वारा प्राप्त की है।
ब्रह्मचर्य के अभ्यास से उत्तम स्वास्थ्य, अन्तः शक्ति, मन की शान्ति, और दीर्घायु प्राप्त होती है। वह मन
ब्रह्मचर्य का महत्व
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और मांस पेशियों को पुष्ट करता है। वह शारीरिक और मानसिक शक्ति को सुरक्षित रखने में सहायता प्रदान करता है। वह साहस और प्राण शक्ति की वृद्धि करता है। वह मनुष्य को दैनिक जीवन-संग्राम में कठिनाइयों का सामना करने के लिए बल प्रदान करता है, अखंड ब्रह्मचारी सारे संसार को चलायमान कर सकता है, वह महात्मा ज्ञानदेव की भांति प्रकृति और पंचमहाभूतों पर शासन कर सकता है।
ऐ मेरे प्रिय मित्रों! क्या आपने ब्रह्मचर्य की आवश्यकता को समझ लिया है? क्या आपने उसके वास्तविक अभिप्राय और महत्व को भली प्रकार जान लिया है? जो शक्ति आप अनेक साधनों द्वारा बड़ी कठिनाई व प्रयत्न के साथ प्राप्त करते हैं, वह शक्ति यदि नित्य नष्ट कर दी जाय, तो फिर आप किस प्रकार से बलवान और स्वस्थ रहने की आशा कर सकते हैं? जब तक पुरुष और स्त्रियां, बालक और बालिकायें सब ब्रह्मचर्य व्रत का भरसक पालन नहीं करेंगे तब तक बलवान और स्वस्थ बनना उनके लिए असंभव है।
ब्रह्मचर्य का महत्व
स्वर रहित कोई भी भाषा नहीं हो सकती। विना टाट, दीवार या अन्य आधार के आप चित्र नहीं खींच सकते। ठीक इसी प्रकार आप विना ब्रह्मचर्य के उत्तम स्वास्थ्य और आध्यात्मिक जीवन नहीं प्राप्त कर सकते। ब्रह्मचर्य में भौतिक और आध्यात्मिक उत्पत्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मचर्य ग्रहण प्राप्त करने का मूल कारण है। वह शुद्ध
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ब्रह्मचर्य साधना
शांतिमय आध्यात्मिक जीवन तथा ज्ञान का आधार है। जिस ब्रह्म-निद्रा की आकांक्षा संत, जिज्ञासु और योगाभ्यासी साधक करते हैं, उसका ब्रह्मचर्य ही एक अवलंबन है। वह हमारे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि आंतरिक शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए एक अमोघ शस्त्र है। वह परम सुख, अखंड और अविनाशी आनन्द का देने वाला है। बड़े-बड़े ऋषि, देवता, गंधर्व आदि भी नैष्ठिक ब्रह्मचारी के चरणों की सेवा करते हैं। केवल इस ब्रह्मचर्य की शक्ति के द्वारा ही मनुष्य सुषुम्ना के द्वार को खोल कर कुण्डलिली शक्ति का उत्थान करता है। आठ सिद्धियाँ और नव निधियाँ तो ब्रह्मचारी के चरणों में रमण करती हैं तथा उसकी आशा का पालन करने के लिए सदा उद्यत रहती हैं। यम भी ब्रह्मचारी से दूर भागता है। वास्तविक ब्रह्मचारी के गौरव, महत्व और प्रभुता का कौन वर्णन कर सकता है !
अर्जुन एक वीर योद्धा था, परन्तु रणक्षेत्र में उसने भी क्षिप्रि होकर शस्त्र त्याग दिया। उस समय भगवान् श्री कृष्ण ने किस प्रकार स्थिर और शांत चित्त होकर अर्जुन को गीता के सिद्धांतों का उपदेश दिया। यह उनके ब्रह्मचर्य की शक्ति का कारण था।
भीष्म पितामह के कानों को देखिए उनमें दिव्य शक्तियाँ थीं वे अपनी कनिष्ठ अंगुली के द्वारा संसार को हिला सकते थे। उन्होंने जीवन पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करने का संकल्प किया। उनका प्रथम नाम देवव्रत था; परन्तु 'देवताओं ने उन्हें 'भीष्म' (भयानक) नाम—'वया नाम तथा गुण' की लोकोक्ति के अनुसार—केवल