भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

राग तथा उस पर विजय

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जायेंगे । आपके फैशन के वस्त्र आप से छीन लिए जायेंगे । फिर अर्थोपार्जन कर फैशनेवल पोशाक बनाने के लिए आप इतना स्वार्थपूर्ण प्रयास क्यों कर रहे हैं । अपनी मूर्खता को प ह्वानिये । विवेक करना सीखिये । आत्मज्ञान को प्राप्त कर शाश्वत शांति में विश्राम कीजिए ।

हे फैशनेवल मनुष्य, हे फैशनेवल महिलायें ! आप आत्म-हन्ता न बनें । आप इस पाखंडपूर्ण जीवन के लिए समय, शक्ति तथा आयु को क्यों बरबाद कर रहे हैं ? यह भारी दंभ है । आपके हृदयों के प्रकोष्ठ में सौंदर्यों का सौंदर्य—अमर आत्मा विभासित हो रहा है । उस आत्मा के सौंदर्य की ही छाया यहां के सारे सौंदर्य हैं । अपने हृदय को शुद्ध बनाओ । अपने मन तथा इन्द्रियों को नियंत्रित करो । किसी कमरे में शांत होकर बैठ जाओ तथा अपने अमर मित्र आत्मा का ध्यान करो । इस आत्मा का साक्षात्कार करो । तभी आप सच्चमुच्च में सुन्दर हो सकेंगे । तभी आप सच्चमुच्च धनी हो जायेंगे । तभी आप महान् हो जायेंगे ।

राग तथा उस पर विजय

राग

किसी भी प्रबल कामना को राग कहते हैं ।

राग के द्वारा मन चलायमान हो जाता है ।

किसी भी उग्र आवेग जैसे सांसारिक प्रेम, अभिमान, ईर्ष्या, लोभ इत्यादि विशेष कर लिंगात्मक आसक्ति को राग कहते हैं । कामुक भावना राग है । क्रोध का आवेग भी राग है ।

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ब्रह्मचर्य साधना

राग वह आवेग है जिससे बुद्धि चलायमान हो जाती है। प्रबल कामना की वस्तु भी राग है। हम कहते हैं “संगीत राम के लिए राग बन गया है।”

यह शांति, भक्ति तथा ज्ञान का शत्रु है। यदि राग के ऊपर आप विजय न पावें तो इससे आपके सुख, स्वास्थ्य एवं शांति विनष्ट हो जायेंगे।

जो राग के वशीभूत है वह गुलामों का गुलाम है।

राग लौकिक आवेश तथा उत्तेजना है। भोगोपरांत यह आपको दुर्बल बना डालता है।

राग उपद्रवी शोड़े के समान है। बुद्धिमानी, वैराग्य तथा विवेक के द्वारा इस पर शासन कीजिये तथा अधिकाधिक शान्ती बनते जाइये। राग से मुक्त बनिये। आप स्वतन्त्र हो जायेंगे।

अपने प्रबल राग को पहले नष्टकीजिये। दूसरे प्रकारके राग सुगमतया नष्ट हो जायेंगे।

अधिनायक अथवा राजा लोगों पर शासन करता है परन्तु राग तो अधिनायक अथवा राजा पर ही शासन करता है। योगी ही राजा का अधिपति है। बही सदा मुखी, आनन्दपूर्ण तथा शांत है।

आपका उग्र राग ही आनन्द के असीम साम्राज्य के द्वार को बन्द कर देता है। इस राग को मारकर आनन्द के धाम में प्रवेश पाइये।

सब से प्रबल तो पाशविक राग है जिससे आप जगत के साथ बंधे हुए हैं।

ईश्वर साक्षात्कार के लिए राग रहिये। यह सभी सांसारिक रागों को नष्ट कर डालेगा।

राग जय

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राग-जय

साधारण व्यवहार में राग का अर्थ प्रबल कामुक प्रवृत्ति है। यह काम-तृप्ति के लिए सांसारिक तृष्णा है। वारंवार यौन-संबंध के द्वारा यह बहुत ही प्रबल होता जाता है।

रजोगुण के प्राधान्य होने पर मन में राग-वृत्ति उत्पन्न होती है। यह अविद्या का कार्य है। यह मन का विकार है। आत्मा सदा शुद्ध है। आत्मन् विमल या निर्मल है यह निर्वाकार है। यह नित्य शुद्ध है। भगवान् की लीला कायम रखने के लिये अविद्या शक्ति ने राग का रूप धारण कर लिया है। आप “चन्दी पाठ” या “हुणांशुमशती” में पायेगे:—

“या देवी सर्व भूतेषु कामरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ॥

मैं उस देवी को नमस्कार करता हूँ जो कि सभी प्राणियों में कामरूप से संस्थित है”

छोटे बालकों तथा बालिकाओं में राग वृत्ति रूप ले रहता है। यह उनको परेशान नहीं करता। स्त्रि प्रकार वृत्त बीज में प्रसुप्त रहता है उनी प्रकार काम भी वृद्धों में प्रसुप्त रहता है। वृद्धों में काम का राग दब जाता है। यह अविद्ध उपद्रव नहीं करता। युवकों तथा युवतियों के लिए ही यह काम अधिक उपद्रवी बन जाता है। पुत्र तथा त्रियों राग का गुलाम बन जाते हैं।

मांस, मछली, अंडे इत्यादि, राजसिक वस्त्र तथा राजसिक जीवन-यापन, इत्र, सिनेमा, उपन्यास-पठन, विषय-वार्ता, कुसंगति, मद्यपान, सभी प्रकार के उत्सेचक पदार्थ, बीड़ी, सिगरेट, आदि काम को उत्तेजित करते हैं।

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तथाकथित शिष्टित जनों के लिये भी यह समझना बड़ा ही कठिन है कि आत्मा में ही इन्द्रियातीत सुख है जो कि विषयों पर आश्रित नहीं है। सुषुप्ति में सभी आत्म सुख का अनुभव करते हैं। रात्रि में सभी अपनी आत्मा में निवास करते हैं। वे इसकी प्रतीक्षा करते हैं। वे इसके बिना नहीं रह सकते। वे सुन्दर विलक्षण वैश्वर करते हैं, इसी आत्मानन्द के लिए जहाँ पर कि इन्द्रियों काम नहीं करती तथा राग व द्वेष का गुजारा नहीं। हर सवेरे वे कहते हैं “रात्रि में गहरी नींद आई। मैंने बड़ा सुख अनुभव किया। मैं कुछ भी नहीं जानता था। मुझे जरा भी अशांति नहीं थी। मैं रात्रि में सोने के लिए गया तथा सवेरे प्रातः उठा सात बजे।” फिर भी मनुष्य इस अनुभव को भूल जाता है। माया की शक्ति प्रबल है। माया रहस्यमयी है। यह मनुष्य को अन्धकार के खड्ड में गिरा डालती है। मनुष्य प्रातः से ही दुबारा अपने विषयी जीवन आरम्भ करता है। इसका कोई अन्त नहीं।

कुछ अज्ञानी जन कहते हैं “काम को रोकना ठीक नहीं। हमें प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए। ईश्वर ने सुन्दरी युवतियों का निर्माण क्यों किया ? उनका दृष्टि में कुछ उपयोग तो होना ही चाहिए। हमें उपयोग करना चाहिये तथा सन्तति उत्पन्न करनी चाहिए। यदि सभी संन्यासी बनने लगेँ तथा अरण्य वास करना चाहें तो संसार का क्या होगा ? यह तो नष्ट ही हो जायगा। काम को रोकने से रोग उत्पन्न हो जाते हैं। हमको चाहिए कि अधिकाधिक सन्तानों की उत्पत्ति करें। शक्ति सन्तान के रहने से घर में सुख रहता है। यही जीवन का चरम लक्ष्य है। मैं वैराग्य, त्याग तथा निवृत्ति को पसन्द नहीं

राग जय

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करता ।” यही उनका स्थूल दर्शन है । वे लोग चर्वाक तथा विरोचन की सन्तान हैं । अतिभोजन ही उनके जीवन का लक्ष्य है । इनके अनुयायी बहुत हैं । वे शैतान के मित्र हैं । उनका दर्शन कितना प्रशंसनीय है ! अपनी सम्पत्ति, स्त्री, सन्तान के नष्ट होने पर, असाध्य बीमारियों के द्वारा पीड़ित होने पर वे कहेंगे “हे ईश्वर हमें इस भयानक बीमारी से मुक्ति दे । मेरे पापों को क्षमा कर । मैं महान् पापी हूँ ।”

हर हालत में राग पर विजय पाना चाहिये । राग तथा काम को रोकने में बीमारियाँ उत्पन्न नहीं होतीं । स्थूल आविष्काधिक सुख तथा आनन्द की प्राप्ति होती है । प्रकृति के विरुद्ध जाकर ही तो आप आत्मा को पा सकते हैं । आत्मा प्रकृति से परे है । जिस तरह नदी में मछली पानी की धारा के विरुद्ध तैरती है उसी तरह आपको संसार धारा के विरुद्ध चलना होगा । तभी आपको आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति हो सकती है । यदि आप अज्ञेय आत्मानन्द को पाना चाहते हैं तो राग पर विजय पाना होगा । यौन सुख तो कोई भी सुख नहीं । यह विपत्ति निराशा, थकावट तथा दुःख से परिपूर्ण है । यदि आप आत्मा अथवा योग विद्या को जान लें तो आप सुगमता के साथ राग पर विजय पा सकते हैं । आत्म सुख की प्राप्ति तभी होगी जब कि आप संसार के सभी सुखों को त्याग दें । यही ईश्वर आपसे अपेक्षा रखता है । ये सुन्दरी स्त्रियाँ तथा धन माया के ही निमित्त हैं । इनके द्वारा ही माया आपको अपने प्रलोभनों में पड़ाना चाहती है । यदि आप एक सांसारी ध्यक्ति—कुसित कामनाओं, निम्न विचारों से पूर्ण बना रहना चाहते हैं तो आप हर तरह से ऐसा कर सकते हैं ।

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आपको पूरी स्वतन्त्रता है कि आप तीन सौ पचास श्रोतों गं शादी कर लें तथा जितनी अधिक संतति चाहें पैदा कर सकते हैं। कोई भी आपको रोकता नहीं। परन्तु आपको बहुत ही शीघ्र यह पता चल जायगा कि संसार आपको तृप्ति नहीं दे सकता। जैसा कि आप चाहते हैं। क्योंकि सभी विषय-पदार्थ देश, काल तथा कारणत्व से सीमित हैं। वे मृत्यु, रोग, ब्रह्मावस्था, चिंता, शोक, भय, तृति; निराशा, विकलता, गर्मी, सर्दी, सर्पदंश, विच्छू देश, भूकंप से हमेशा आच्छन्न हैं। एछ क्षण के लिए भी आप शांति को नहीं पा सकते। आपका मन काम तथा मल से परिपूर्ण है। आपकी बुद्धि विपरीत हो चली है। आप समझते नहीं। आप जगत के मिथ्या रूप को नहीं समझ सकते। काम को सफलता पूर्णक वशीभूत किया जा सकता है। इसके लिए शक्तिशाली साधन हैं। काम की वश में कर लेने के बाद आप आन्तरिक नित्य सुख का उपभोग करेंगे—जो आत्मा है। सभी संन्यासी नहीं बन सकते। वे कामुक हैं अतः वे संसार का त्याग नहीं कर सकते। उनके बन्धन विशाल हैं। वे अपने बच्चों सम्भति तथा स्त्रियों से गुंथे हैं। आपका कथन पूर्णतः गलत है। यह असंभव है। क्या कभी आपने इतिहास के पन्नों में ऐसा देखा है कि सभी ने संन्यास ले लिया हो और यह जगत शून्य हो गया हो। फिर भी आप इस गलत विचार को क्यों रखते हैं? यह आपके मन की धूर्तवाजी है जिसके द्वारा आपके मूर्खतापूर्ण तर्क को सहारा मिलता है और काम-तृप्ति के सौतान-दर्शन की परिपुष्टि होती है। भविष्य में ऐसी बातें ल कीजिए। इसके द्वारा आपकी मूर्खता तथा कामुकता का प्रदर्शन होता है। इस जगत की अधिक

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चिंता न कीजिए। अपना काम संभालिये। ईश्वर सर्व शक्तिमान है। यदि ऐसा भी हो कि सयों के संन्यास लेने से सारा जगत क्षय पर जात्र तो ईश्वर पल मात्र में ही करोड़ों मनुष्यों की सृष्टि कर सकता है। इसके लिए आपको पेशान होने की अवश्यकता नहीं है। अपने काम को निर्मूल करने की विधि आप द्वंद्व निकालिए।

जगत की आवादी बराबर बढ़ती जा रही है तथा लोगों में जरा भी धार्मिक भावना नहीं। राग का ही बोलबाला है। लोगों के मन कामुक विचारों से भरे हुये हैं। यह जगत फैशन, रिस्तरों, होटेल, भोजन, नृत्य तथा सिनेमा से ही भरा हुआ है। भोजन, पान तथा सन्तानोत्पादन—यही उनके जीवन का आरम्भ तथा अन्त है। लोगों की आवादी बढ़ने के अनुपात में अब्र की वृद्धि नहीं हो रही है। अकाल तथा विनाश की संभावना है। जगन्माता अधिक आवादी को बहा ले जाती है। लोग कृत्रिम साधनों के द्वारा जन्म-निरोध करना चाहते हैं। परन्तु वे सारे साधन मूर्खता से पूर्ण हैं। किसी को भी उसमें सफलता नहीं मिली है। एक शुक्रकीट में भी प्रबल शक्ति है। वीर्य की क्षति होती है। ब्रह्मचर्य के द्वारा इस शक्ति को अंजुस् में बदल दिया जाता है। सारा जगत प्रबल कामोत्तेजन से परिपूर्ण है। तथाकथित शिक्षित जन भी इसके अपवाद नहीं हैं। सभी भ्रम में पड़े हैं तथा जगत में विपरीत बुद्धि के अनुसार ही वर्तते हैं। उनकी अवस्था दयनीय है। ईश्वर उनको उन्नत बनावे तथा उनकी आँखें आध्यात्मिक धामों की ओर लगावे। जन्म-निरोध के लिये आत्म-संयम तथा ब्रह्मचर्य ही एकमात्र प्रभावशाली साधन हैं।

बाल विवाह तथा अल्पावस्था में ही विवाह का हो

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जाना समाज के लिए घातक है। बंगाल तथा मद्रास युवती विधवाओं से भरे पड़े हैं। बहुत से युवक जिनमें कि आध्यात्मिक जागरण है, दयनीय शब्दों में मुभनो लिखते हैं—“प्रिय स्वामी जी, मेरा हृदय उन्नत आध्यात्मिक वस्तुओं के लिये उत्कटित होता है। मेरे माता पिता को प्रसन्न करना था। उन लोगों ने मुझे कई प्रकार से धमकी दी थी। अब मैं रोता हूँ। मैं क्या करूँ?” आठ या दस माल की आयु में ही बालकों की शादी कर दी जाती है। जिस समय कि उनको विवाह के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। बच्चों के भी बच्चे उसन होते हैं। बच्ची भातायें हैं। आठारह वर्ष के एक लड़के के भी तीन लड़के हैं। कितनी दयनीय अवस्था है। दीर्घायु नहीं है। सभी अत्यायु हैं। अधिक सन्तानोत्पादन के कारण स्त्री का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। इस तरह से अनेकानेक रोग पैदा होते हैं।

पचास रुपये मासिक वेतन पाने वाले किरानों के ६ बच्चे हैं। और हर दूसरे साल में एक बच्चे की बुद्धि होजाती है। वह कभी नहीं सोचता कि “मैं इतने बड़े परिवार का भरण पोषण किस प्रकार करूँगा?” मैं अपने पुत्रों को किस प्रकार शिक्षित करूँगा? मैं अपनी पुत्री के विवाह का प्रबन्ध किस प्रकार से करूँगा?” कामोसेवन में वह अनिष्ट कार्य को बारम्बार करता है। उसमें जरा भी आत्मसंयम नहीं। वह काम का पूर्ण गुलाम है। खरहों की भांति वह सन्तान पैदा करता है और वे बच्चे संसार में भिखारियों की संख्या बढ़ाते हैं। जानवरों में भी आत्मसंयम है। सिंह वर्ष में एक बार ही सिंहनी के पास जाता है मनुष्य ही स्वस्थ के नियमों को तोड़ता है।

राग जय

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प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने के परिणामस्वरूप उसको भविष्य में भारी सजा भोगनी पड़ेगी।

पश्चिम से आपने फैशन तथा पोशाक सम्बन्धी बहुत सी आदतें सीखी हैं। आप नकल करने वाले जीव बन बैठे हैं। परन्तु पश्चिम में लोग तब तक विवाह नहीं करते जब तक कि पूरे परिवार को पालने में समर्थ न हो जायें। उनमें अधिक आत्मसंयम है। वे पहले किसी अच्छे काम में लग जाने पर तथा अर्थोपार्जन कर लेने पर ही विवाह की चिन्ता करते हैं। यदि उनके पास पर्याप्त धन नहीं है तो वे आजीवन कुश्रारे ही रह जाते हैं। वे इस संसार में भिखारियों की बुद्धि करना नहीं चाहते। जिसने मानव-दुख की विशालता को समझ लिया है वह स्त्री के गर्भ से एक बच्चा भी उत्पन्न करने का साहस कदापि नहीं करेगा।

कम वेतन प्राप्त करने वाला मनुष्य जिसे बड़े परिवार का पालन पोषण करना है उसे घूस लेने के लिये बाध्य होना पड़ता है। वह अपनी सम्भू खो बैठता है तथा अर्थोपार्जन के लिये कितना भी निकुट कार्य को करने में हिचकता नहीं। ईश्वर की याद नहीं आती। वह राग का गुलाम हो जाता है। वह अपनी पत्नी का गुलाम बन जाता है। उसकी माँगों की पूर्ति न कर सकने पर वह अपनी पत्नी के व्यंग्य वचनों को मन मारकर सहता रहता है। उसे कर्म, संस्कार तथा आन्तरिक मानसिक फँसटरी के कार्य व्यापार का ज्ञान नहीं है। घूस लेना, दूसरों को ठगना, झूठ बोलना आदि की सुखी आदतें उसके चित्त में घुसी हुई हैं तथा भविष्य के हर शरीर में उन आदतों का समावेश हो जाता है। वह आने वाले

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जन्मों में भी अपने बुरे संस्कारों को लाता है तथा उसी दगा तथा फूट की आदत को शुरू करता है। जो व्यक्ति संस्कारों के इस अटल नियम को जानता है क्या वह कभी भी अशुभ कार्यों को कर सकता है? बुरे कार्यों के द्वारा मनुष्य अपने मन को ही विगाड़ता है तथा भावी जन्म में बोर या ठग बन जाता है। वह आसुरी स्वभाव से सम्बन्ध बनता है। मनुष्य को अपने विचारों भावनाओं तथा जन्मों में बहुत ही सावधान रहना चाहिये। वह सदा अपने विचारों तथा कार्यों का निरीक्षण करे तथा दिव्य विचार, दिव्य भावना को प्रश्न दे साथ ही दिव्य कार्यों को करे, किया के अनुरूप ही प्रतिक्रिया भी होती है। इस नियम को याद रखना चाहिये। तब वह बुरे कार्यों को नहीं करेगा।

गीता में इस बात पर बल दिया गया है कि वही मनुष्य सुखी है जिसने अपनी राजसिक प्रकृति पर विजय पाई है। आप अपने महान् वासु राम पर आसानी से विजय पा सकते हैं यदि आप पूरे हृदय से धारणा तथा एकाग्रता के साथ आध्यात्मिक साधना में संलग्न हो जायें। इस जगत में कुछ भी असम्भव नहीं हैं। आहार की शुद्धता अत्यन्त आवश्यक है। दूध, फल, दाल, गेहूँ आदि सात्विक आहार को ग्रहण कीजिये। अन्चार, चटनी, खट्टाई आदि गरम चटपटे पदार्थों का परित्याग कीजिये। सरल आहार कीजिये। विचार कीजिये। ओश्म का जप कीजिये। आत्मा पर ध्यान कीजिये। विचार कीजिये कि “मैं कौन हूँ?”। याद रखिये आत्मा में वासना नहीं है। वासना मन में ही है। अलग अलग सोइये। चार बजे प्रातः उठिये। महामंत्र अश्वत् “ओश्म नमः शिवाय”

राग जव

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अथवा “ओ३म् नमो नारायणाय किसी भी मंत्र का जप अपनी इच्छा तथा रुचि के अनुसार कीजिये। सर्व शक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक आदि ईश्वरीय गुणों पर ध्यान कीजिये। नित्य गीता का एक अध्याय पढ़िये। मृत्यु भी क्यों न हो जाय पर भूट न बोलिये। जब कभी काम प्रबल हो अथवा एकादशी के दिन उपवास कीजिये। उपन्यास पाठ तथा सिनेमा दर्शन का परित्याग कीजिये। हर मिनट को उपयोग में लाहिये। प्राणायाम का अभ्यास कीजिये। काम-दृष्टि से स्त्रियों की ओर न देखिये। गलियों में टहलते समय अपने पैर के अंगूठे पर दृष्टि रखिये। तथा अपने दृष्टदेव पर ध्यान लगाये रखिये। खाते समय, टहलते समय, ओफिस में काम करते समय सदा गुरुमंत्र का जप करते रहिये। हर वस्तु में ईश्वर को देखिये। अपनी दैनिक डायरी को नित्य भरिये तथा उसका पालन कीजिये। तथा हर महीने के अन्त में मेरे अवलोकनार्थ भेज दीजिये। नोट-पुस्तक में अपने गुरुमंत्र को साफ रोज लिखिये तथा उस जव पुस्तक को भी मेरे पास भेज दीजिये।

यदि आप उपर्युक्त उपदेशों का अक्षरशः पालन करते हैं तो आप काम को वशीभूत करने में समर्थ रहेंगे। यदि आपको सफलता न मिले तो मेरी हंसी उड़ा सकते हैं। वह मनुष्य घन्य है जिसने काम को वशीभूत कर लिया है क्योंकि वह ईश्वर साक्षात्कार को प्राप्त करेगा। ऐसे महात्मा की जय हो।

शीर्षासन, सर्वांगसन तथा सिद्धासन का प्राणायाम के साथ क्रमशः अभ्यास कीजिये। काम पर विजय पाने के लिये ये सभी सहायक हैं। रात्रि में अपने पेट को अति न भरिये। गन्धि के आहार रहने होने चाहिये। कुछ फूल

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ब्रह्मचर्य साधना

तथा आधा सेर दूध रात्रि के लिये उपयुक्त आहार है। इस आदर्श को रखिये। सरल जीवन उच्च विचार।

श्री शंकराचार्य के अन्य जैसे “भज गोविन्दम्” “मणिरत्नमाला” अथवा ‘प्रश्नोत्तरी’, ‘विवेक चूडामणि’ आदि का अध्ययन कीजिये। सावधानीपूर्वक भर्तृहरि के “वैराग्य शतक” को पढ़िये। वे सभी प्रेरणात्मक हैं। सदा आत्म विचार का अभ्यास कीजिये। सत्संग कीजिये। कथा, कीर्तन तथा दार्शनिक चर्चा में उपस्थित रहिये। किसी व्यक्ति के साथ अधिक नाता न जोड़िये अधिक हिलने से धूषा की उसति होती है मित्रों की संख्या न बनाइये। उनसे हिलिये मिलिये नहीं। स्त्रियों से अधिक हिलने मिलने से अन्ततः आपका सर्वनाश हो जायगा। इस बात को कभी न भूलिये। मित्र ही आपके वासविक शत्रु हैं।

काम-दृष्टि से न देखिये। दिव्य भाव को बढ़ाइये। आप अनेक बार विफल होंगे। बारम्बार इस भाव का अभ्यास कीजिये। शरीर के विकारों पर विचार कीजिये। इससे वैराग्य की दृष्टि होगी।

काम-दृष्टि के लिये अपने को दखिलत कीजिये। रात्रि को भोजन करना त्याग दीजिये। नीस माला अधिक जप कीजिये। काम से धूषा कीजिये। स्त्रियों से धूषा न कीजिये। सदा लंगोट पहनिये। भगवान् कृष्ण आपको साहस तथा बल प्रदान करें जिससे आप अध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण कर जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लें।

आत्म-संयम

अपने ऊपर संयम रखना ही आत्म संयम है। अपने आवेगों, रुचियों, काम-वासनाओं, इन्द्रियों तथा मन को

आत्म-संयम

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अपने अधीन रखने की शक्ति अथवा आदत ही आत्म-संयम है।

अपने को पहले वशीभूत करो। फिर आप दूसरों को वश में ला सकते हैं।

आत्म-संयम मन को शुद्ध बनाता, विचार शक्ति को मजबूत करता है तथा आपके आचरण को ऊपर उठाता है। यह आपको मुक्ति, शान्ति, सुख तथा आनन्द प्रदान करता है। यह आपकी संकल्प शक्ति को मजबूत बनाता है।

जो स्वयं पर विजय प्राप्त करता है, वह उस सेनापति, से बढ़कर है जो किसी देश पर विजय प्राप्त करता है।

आत्मसंयम वह कुञ्जी है जिससे नित्य सुख तथा अमृतत्व धाम का द्वार खुलता है।

अपने ऊपर विजय प्राप्त करने से बढ़कर अन्य कोई भी विजय नहीं है।

अपने इन्द्रियों तथा मन को नियन्त्रित करो। आप आत्मसाक्षात्कार करेंगे।

आत्मप्रभुत्व प्राप्त कीजिए। अपने ऊपर विजय प्राप्त पाइए। जब तक आपने ऐसा नहीं किया आप अपनी इन्द्रियों के गुलाम ही बने रहेंगे।

जो अपने काम का गुलाम है वह इस पृथ्वी पर सब से निकट गुलाम है जो अपने काम, इच्छा, तृष्णा तथा इन्द्रियों पर शासन करता है वह वास्तव में राजाओं का भी राजा है। वह आत्म-राज्य का सम्राट् है। उसके लिए राज्य तथा मुकुट आदि कुछ भी नहीं है। उसका साम्राज्य सर्वोत्तम है।

हर प्रलोभन को दवाने से, हर घुरे विचार का दमन करने से, हर कामना अथवा तृष्णा को नष्ट करने से,

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ब्रह्मचर्य साधना

हर कटु शब्द को रोके रखने से, हर खुरे कार्य को निर्बंधि करने से शाश्वत शान्ति तथा सुख के लिए पथ प्रशर बनता है।

जो स्वयं पर हुक्मयत तथा शासन करता है वह दूषण पर भी शासन तथा हुक्मयत कर सकता है।

आत्मसंयम से कठिनाइयों को सहन करने की शक्ति तथा आपत्तियों का सामना करने की ताकत मिलती है।

आत्मसंयम से सर्वोच्च पुरुष की प्राप्ति होती है। आत्मसंयम मनुष्य का नित्य कर्तव्य है। दान तथा वेदाध्ययन से भी अधिक पुरुषकर है आत्मसंयम।

आत्मसंयम से आपकी शक्ति बढ़ती है। आत्मसंयम वड़ा ही पवित्र है। आत्मसंयम से आप सारे पापों को विशुद्ध हो जायेंगे। आप सच्चरित्र होंगे तथा शक्ति प्राप्त करेंगे। आप परम कल्याण को प्राप्त करेंगे।

आत्मसंयम के समान कोई कर्तव्य नहीं है। आत्मसंयम जगत में सर्वोच्च धर्म है। आत्मसंयम के द्वारा आप इस जगत में तथा परलोक में सर्वोच्च सुख का भोग करेंगे। आत्मसंयम से युक्त होकर आप महान् पुरुष प्राप्त करेंगे।

आत्मसंयमी व्यक्ति सुखपूर्वक उठता तथा इस संसार में विचरण करता है। वह सदा प्रसन्न रहता है। आत्मसंयम सब से महान् व्रत है।

आत्मसंयम रहित व्यक्ति सदा दुःख भोगता है। वह बहुत ही विपत्तियों को निमन्त्रित कर बैठता है। वे सभी उसके ही दोषों के कारण उत्पन्न होते हैं। क्षमा, धैर्य, अहंकार, निष्कृता, सत्य, इन्द्रिय दमन, कुशलता, तथा भद्रता, शील, दृढ़ता, उदारता, अक्रोध, सन्तोष, मधुर भाषण, दानशीलता, अद्भुत— इन सबों का समन्वय ही

आत्म संयम है ।

गुरु के प्रति आदर तथा सबों के प्रति करुणा भी आत्मसंयम है । आत्मसंयमी व्यक्ति दूसरों की निन्दा नहीं करता । आत्मसंयमी व्यक्ति भूठ बोलना, अपहरण करना, तिन्दा करना, काम, लोभ, मद, अभिमान, भय, द्वेष, अनादर, आदि का परित्याग करता है ।

वह कभी भी कलंकित नहीं बनता । वह द्वेष से मुक्त रहता है ।

आत्म संयम द्वारा ही ब्रह्म के उस अमर धाम की प्राप्ति हो सकती है जो हृदय गुहा में छिपा हुआ है ।

आत्मसंयमी व्यक्ति सांसारिक सम्बन्धों तथा भावनाओं से उत्पन्न राग-पाशों से बद्ध नहीं होता ।

जहां आत्मसंयमी व्यक्ति रहता है वहीं अरण्य है । वही पवित्र स्थान है । आत्मसंयमी के लिए अरण्य की क्या आवश्यकता है ? जिसे आत्मसंयम नहीं उसके लिए भी अरण्यवास से क्या लाभ ?

आत्मसंयमी व्यक्ति परलोक में महान् पुण्यसंस्कार प्राप्त करता है । वह इस जगत में सम्मान प्राप्त करता है तथा दूसरे जगत में उन्नत पथ पर आरूढ़ होता है । वह नक्ष पद को प्राप्त करता है वह मुक्ति प्राप्त करता है ।

—o:—

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ब्रह्मचर्य साधना

तीन आदर्श ब्रह्मचारी

श्री भीष्म

भीष्म का पहला नाम देवव्रत था। वे महार शान्तनु के लड़के थे। इनकी माता गंगादेवी थीं। वे देवता के अवतार थे। किसी आपवश उनकी इस भू पर जन्म धारण करना पड़ा था।

एक बार महाराजा शान्तनु एक मछुआ-सरदार की लड़की सत्यवती पर आसक्त हो गए। वे उसके पि के पास शादी का प्रस्ताव लेकर गये। मछुआ सरदार कहा—“मैं अपनी लड़की देने के लिए तैयार हूँ पर आपको एक प्रतिज्ञा करनी होगी। मेरी लड़की से उस पुत्र को ही अपना उत्तराधिकार प्रदान करेंगे।”

अपने प्रिय पुत्र देवव्रत के रहते राजा यह प्रतिज्ञा नहीं कर सकते थे। वे खिन्न होकर लौट आये। त्रिीर दुख रहने लगे। देवव्रत को यह बात मालूम हुई। अपने पिता का दुख दूर करने के लिए स्वयं वे मछुआ-सरदार के पास गये। उस सरदार के समक्ष ही उन्होंने प्रतिज्ञा की “इस लड़की से उत्पन्न पुत्र ही इस राज्य का उत्तराधिकारी होगा। मैं इस राज्य का त्याग करता हूँ।”

सरदार ने कहा—“मैं आपकी शिष्टता की स्तुति करता हूँ। परन्तु आपके पुत्र मेरी लड़की के पुत्र को बलपूर्वक राज्य से हटा सकते हैं।

देवव्रत ने कहा—हे सरदार सुनो ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजीवन नैष्ठिक ब्रह्मचारी बना रहूँगा। जगत की सारी रजियां मेरे लिए माता हैं। मैं हस्तिनापुर के राजा का परम भक्त बना रहूँगा। पुत्र रहित मृत्यु प्राप्त

तीन आदर्श ब्रह्मचारी

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करने पर भी मैं नित्य सुख तथा अमृतत्व को प्राप्त करूँगा।

स्वर्ग के देवताओं ने पुष्पवृष्टि की तथा कहा—“यह भीष्म प्रबल है।” तब से ही देवव्रत भीष्म कहलाये।

सत्यवती तथा शान्तनु के बीच विवाह हो गया। शान्तनु बहुत ही प्रसन्न हुए तथा उन्होंने अपने पुत्र को यह वरदान दिया—“ईश्वर सदा तुम्हारी रक्षा करे ! जब तक तुमको जीवित रहने की इच्छा है तब तक मृत्यु तुम्हारे पास नहीं फटकेगी। मैं तुमको इच्छा-मृत्यु का वर देता हूँ।”

भीष्म ने आदर्श ब्रह्मचर्य का जीवन बिताया। महाभारत के युद्ध में वे मय से बड़े योद्धा थे। वे एक दार्शनिक सलाहकार भी थे। वे गुरु, राजनीतिज्ञ तथा धर्म-मर्मज्ञ थे। वे आत्म संयम तथा तिलीक्षा के अवतार थे। वे कई दिनों तक शरशैल्या पर पड़े रहे। उन्होंने युधिष्ठिर को राजनीति, धर्म, दर्शन, सामाजिक नीति तथा सदाचार आदि विषयों पर अनमोल उपदेश दिए। उनके उपदेश तथा उनके जीवन का आदर्श आज भी मानव इतिहास में जाज्वल्यामान है। वे आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं।

उस भीष्म को मेरा नमस्कार है। हम सभी उनके आदशों को अपने जीवन में उतारें। श्री भीष्म जी की जै !

श्री हनुमान जी

श्री हनुमान जी माता अंजना के पुत्र थे। इनके पिता थे वायुदेव। बचपन से ही श्री हनुमान जी की वीरता समुद्र के समान असीम थी।

बचपन में ही वे सूर्यदेव को निगलने के लिए चला पड़े। सूर्य की तप्त किरणें हनुमान जी के शरीर पर पड़ती थीं परन्तु फिर भी वे आकाश की छाती को चिरते हुये

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ब्रह्मचर्य साधना

बढ़ते गये। इन्द्र ने क्रोधित होकर इन पर अपने वज्र का प्रहार किया जिसके कारण इनकी हड्डी टूटी हो गई तब से ही यह हनुमान कहलाये।

वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। वे आज्ञेय, महावीर तथा माक्षति के नाम से प्रसिद्ध हैं। वे सब से महान् वीर हैं। वे सात चिरंजीवियों में से एक हैं। वे ब्रह्मचर्य के साक्षर रूप हैं। वे ज्ञानी शिरोमणि हैं।

हनुमान को अग्निमा, लघिमा, गरिमा आदि सारी सिद्धियां प्राप्त थीं। श्री राम ने भी इनको ही सीता की खोज के लिए अपना दूत चुना।

समुद्र लांघ कर लंका पहुंचना सभी वानरों के लिये एक महान् समस्या थी। जाम्बवन्त के द्वारा प्रेरित होकर हनुमान लंका-यात्रा के लिए कटिबद्ध हो गये। उन्होंने सवों में आशा तथा साहस का संचार करते हुये ये शब्द कहे—“मैं उस वार्य का पुत्र हूँ जो पर्वतों को ध्वस्त कर देता है। मैं मेघ पर्वत की सहस्र बार परिक्रमा कर सकता हूँ। मैं सारे समुद्र की सोख सकता हूँ। समुद्र को उलांच सकता हूँ। मैं पर्वतों को ध्वस्त कर सकता हूँ तथा सूर्य और चन्द्रमा का अतिक्रमण कर सकता हूँ।”

इस प्रकार से गर्जन करते हुए हनुमान लंका को पधारे। रास्ते में नागों की जननी सुरसा ने उनके बल, वीर्य, कौशल तथा ज्ञान की परीक्षा की। हनुमान सफल निकले।

लंका में जाकर सीता को उन्होंने राम-श्रृंगट्टी दी। लंका-दहन किया तथा सन्देश लेकर वानरों को प्रसन्न करते हुए श्री राम के पास लौट आए। उन्होंने श्री सीता जी की चूड़ामणि श्री राम को प्रदान की।

तीन आदर्श ब्रह्मचारी

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रावण के साथ युद्ध के समय लक्ष्मण जी के लिये हनुमान जी हिमालय से संजीवनी बूटी लाये ।

हनुमान श्रीराम के परम भक्त हैं । वे महान् कर्मयोगी है । उनका शरीर वज्र के समान दृढ़ है । वे नव व्याकरण के पंडित हैं ।

श्री-हनुमान हम सबों को अपना आशीर्वाद प्रदान करें ।

श्री हनुमान जी को अनेकानेक प्रणाम ।

श्री हनुमान जी की जै !

श्री लक्ष्मण

श्री लक्ष्मण जी महाराजा दशरथ के पुत्र थे । इनकी माता सुमित्रा थी । वे श्री राम के छोटे भाई थे । वे सदा श्री राम के सेवक, आज्ञाकारी तथा अनुगामी थे ।

श्रीराम के वनवास का आदेश मिलने पर श्री लक्ष्मण ने अपनी माता, पत्नी तथा सब का त्याग कर दिया । वे श्रीराम तथा श्री सीता की सेवा में सदा तत्पर रहे ।

चौदह वर्षों तक वनवास-काल में उन्होंने आदर्श ब्रह्मचारी का जीवन का पालन किया ।

सुग्रीव ने सीता द्वारा गिराये गये आभूषणों को एवं वस्त्रों को श्रीराम को दिखाया था । श्री राम ने उनकी श्री लक्ष्मण को दिखाया था तथा पूछा था “प्रिय लक्ष्मण सीता के इन आभूषणों को पहचानो । क्या वे सीता के ही हैं ?”

लक्ष्मण ने कहा—“मैं कर्णाभूषण तथा वाज्रबन्दी को तो नहीं पहचानता परन्तु मैं पैरों की पायल को पहचानता हूँ क्योंकि मैं सदा उनके पैरों की ही पूजा करता था ।”

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ब्रह्मचर्य साधना

लक्ष्मण के इन वाक्यों में ही उनकी दृष्टि का सारा रहस्य छिपा हुआ है। उनके लिए सारी स्त्रियां माता थीं। वे माता सीता के चरण की पूजा किया करते थे।

उनका भाव दिव्य था।

ब्रह्मचर्य के बल के कारण ही लक्ष्मण ने मेथनाद को मार डाला।

श्री लक्ष्मण वीर, दूरदर्शी, साहसी तथा आत्मावलंबी थे। वे अपने सिद्धांतों के पक्के थे। वे ठीक समय पर ठीक कार्य को किया करते थे। उन 'आतुर प्रेम अदभुत था।

“अपने भाइयों के प्रति प्रेम रखिये। विश्व बन्धुत्व का विकास कीजिए। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कीजिए।”

श्री लक्ष्मण के पदचिन्हों का अनुगमन कीजिए।

श्री लक्ष्मण को अनेकानेक प्रणाम।

हम सभी उनकी कृपा को प्राप्त करें।

स्वास्थ्य तथा ब्रह्मचर्य

१. बहुत से युवक स्वप्नदोष तथा धातु क्षीणता के शिकार बने हुये हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं।—कंज, त्रति भोजन, उत्तेजक तथा वायुकारक पदार्थ, मलिन विचार, तथा अज्ञान के कारण किये गये दुष्कृत। इसके द्वारा उनके मन में एक प्रकार का भय उत्पन्न हो जाता है। परन्तु निराश होने की कोई भी बात नहीं है। संयम (लघु सात्विक आहार) शिष्ट आदतें, स्वास्थ्य के नियमों का पालन, पूर्ण सदाचार तथा शुद्ध विचार के द्वारा इस रोग का पूर्णतः निवारण किया जा सकता है।

२. सर्वप्रथम ईश्वर-भक्ति के द्वारा अपने मन को शुद्ध बनाइये। जप तथा ध्यान का अभ्यास कीजिये।