ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
स्वप्न नहीं होते तो आप ब्रह्मचर्य या पवित्रता में उन्नति कर रहे हैं।
सदा कौपीन पहनिये। आपको ग्रंथकोष के कोई भी रोग नहीं होंगे। इससे आपको ब्रह्मचर्य के रक्षण में भी सहायता मिलेगी। जब निद्रा में वीर्य-पात होता है तो मन जो सूक्ष्म शरीर में कार्य कर रहा था, वह प्रचंडता से उत्तेजित होकर एकाएक स्थूल शरीर में प्रवेश हो जाता है। स्वप्नदोष का यही कारण है। बहुधा अशुद्ध स्वप्नों के कारण भी ऐसा होता है। जो सात्विक भोजन करते हैं उन्हें स्वप्न दोष नहीं होता। शम, दम, सात्विक भोजन तथा इस पुस्तक के बताए हुए अन्य आध्यात्मिक अभ्यासों के द्वारा इसका अवरोध किया जा सकता है।
स्वप्न दोष प्रायः रात्रि के पिछले पहर में हुआ करते हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल तीन और चार बजे के बीच में उठ जाया करते हैं, वे स्वप्न-दोष रूपी रोग से व्यथित नहीं होते। यदि आपको रात्रि में स्वप्न दोष हो जाय तो प्रातःकाल में शीघ्र स्नान कर लेना चाहिए। फिर वीस प्राणायाम कर ध्यान करना चाहिए। और धीरे आप इस रोग से मुक्त हो जायेंगे।
यदि आपको रात्रि में स्वप्न-दोष अधिक होता हो तो सोते समय गीली लंगोट पहिन कर सोइए। 'द्विग्न गाय' (कटि स्नान) लीजिए।
रात्रि में आपको जब जब पेशाब करने की इच्छा हो, शीघ्र ही उठकर पेशाब कीजिए। पेशाब को रोकना
स्वप्नदोष
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ही स्वप्न दोष का अन्य कारण है सोने के पहिले टडी पेशाब करके सोना चाहिए।
यदि आपको हृद कोष्ठवदता (कब्ज) की शिकायत के कारण दस्त साफ नहीं होता है और आंतें मल से भरी रहती हैं, तो इससे भी आपकी शुक्र संबंधी नाड़ियों पर दबाव पड़ेगा और तदनुसार आपको रात्रि में स्वप्न-दोष हो जायगा।
कभी कभी, टडी या पेशाब साफ न आने से, शरीर में गर्मा अधिक रहने से, अधिक घूमने फिरने से, तथा अधिक मिट्टाई, मिर्च और नमक के सेवन से भी स्वप्नदोष हो जाया करता है।
धातु संबंधी दुर्बलता, स्वप्नदोष, कामुक स्वप्न तथा दुराचारी जीवन के अन्य सभी परिणाम मनुष्य के जीवन को दुःखमय बना देंगे, यदि उचित साधना द्वारा उनकी यथा समय रोक न की गई। कैफर मोनोबोमेटा पिल्स Camphor (MonoPills) तथा अन्य प्रकार के मिक्स्चर जैसे Sp. Camphor, Tr. Belladone इत्यादि से भी स्वप्न-दोष का निवारण हो सकता है, परन्तु इनसे भी सदा के लिए रोग का छुटकारा नहीं होता। जब तक दवाई का सेवन किया जाता है, तब तक रोग से केवल क्षणिक मुक्ति मिलती है। पश्चिम के वैद्य लोग भी स्वीकार करते हैं कि इन औषधियों से सदा के लिये रोग से मुक्ति नहीं मिलती। ज्योंही औषधि का सेवन बढ़ गया कि रोग और भी अधिक बढ़ जायगा। कभी कभी ऐसा भी होता है कि इन दवाईयों के कारण रोगी गपु भुक हो जाता है। चिरस्थायी प्रभावशाली चिकित्सा
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तो केवल प्राचीन योग-प्रणाली के द्वारा ही हो सकती है। 'नास्ति योगात् परं बलम्'—योगबल के अतिरिक्त अन्य कोई भी बल नहीं है। यदि आप इस पुस्तक में बताये हुये विभिन्न साधना का नित्य नियमित रूप से अभ्यास करेंगे तो आपको अवश्य सफलता प्राप्त होगी।
दुराचारी जीवन से हानियाँ
आज कल हम क्या देखते हैं? पुस्र और स्त्री, बालक और बालिकायें, अशुद्ध विचार, कामवासना और लुट्ट इन्द्रिय-जनित सुख रूपी सागर में गोता लगा रहे हैं। यह वास्तव में अति शोचनीय दशा है।
कुछ बालकों की कहानियाँ सुनकर आपको वास्तव में दुःख होगा। अस्वाभाविक साधनों के द्वारा वीर्य के अधिक नष्ट हो जाने के कारण, खिन्न चित्त हो कर अपने अन्धकारमय दीन हीन जीवन की शोचनीय दुःखद कथाओं का वर्णन करने के लिए, मेरे पास अनेक कालेज के छात्रगण आया करते हैं। काम के नशे तथा काम की उत्तेजना के कारण उनकी विवेक बुद्धि नष्ट हो गई है। जो शक्ति आप कई सप्ताह और महीनों में प्राप्त करते हैं, उसको अनायास ही क्षणिक सुख के लिए नष्ट कर देना क्या बुद्धिमान्नी है?
मैथुन से अत्यधिक शक्ति का नाश होता है। मैथुन से समूचा नाड़ी मंडल प्रभावित होकर शिथिल पड़ जाता है। स्मरण शक्ति का ह्रास, असामयिक वृद्धावस्था, नपुंसकता, नाना प्रकार के नेत्र-रोग तथा अनेक प्रकार के नाड़ी मंडल संबंधी रोग, वीर्य के अधिक नष्ट होने के कारण उत्पन्न होते हैं। शौर्य और शक्ति के सहित
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द्विप्रगति व स्फूर्ति से गिलहरी की भांति कूदते फादते प्रसन्नता पूर्वक चलने के स्थान में हमारे अधिकांश नव-युवक आज कल वीर्य शक्ति की हीनता के कारण पीतमुख लड़खड़ाते हुए पैरों के साथ ही चलते दिखाई देते हैं। क्या यह वास्तव में शोक जनक अवस्था नहीं है ?
अपने वीर्य को अत्यधिक नष्ट करने वाले मनुष्य छोटी छोटी बातों के लिए कुद्ध हो जाते हैं। उनके मन स्थिर न रह कर छोटी छोटी बातों से उद्विग्न होते रहते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करते, वे क्रोध, ईर्ष्या, आलस्य, भय आदि दुर्गुणों के दास बन जाते हैं। यदि आपकी इन्द्रियाँ आपके वश में नहीं हैं तो आप ऐसे मूर्खता के कार्य करने लगेंगे जिन को करने का साहस एक छोटा बच्चा भी नहीं करेगा।
वीर्य शक्ति के नष्ट हो जाने के पश्चात् जो अनिष्ट परिणाम होते हैं, उन्हें जरा ध्यान पूर्वक देखिये। ब्रह्मचर्य के अभाव में वीर्य शक्ति को इस प्रकार अकारण ही नष्ट कर देने से मनुष्य, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दुर्बलता को प्राप्त करता है। शरीर और मन उत्साह सहित कार्य नहीं कर सकते। आपको अधिक थकावट और दुर्बलता का अनुभव होगा। नष्ट शक्ति को पुनः प्राप्त करने के लिए आपको दूध, फल तथा अन्य पौष्टिक पदार्थों का सेवन करना आवश्यक प्रतीत होगा। परन्तु स्मरण रहे कि इन चीजों से आपकी हानि की पूर्ति कदापि नहीं हो सकती। एक बार जो खो गया वह सदा के लिए चला गया। आरामो अप्रसन्नता, शिथिलता, उदासीनता तथा
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अन्वकारमय जीवन यापन करना पड़ेगा। शारीरिक और मानसिक शक्ति दिनों दिन क्षीण होती जायगी।
शारीरिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए जीवन में शुद्धता की बड़ी आवश्यकता है। लड़के तथा लड़कियाँ अपने शारीरिक अंगों के दुरुपयोग से मौन रूप में सहते हैं। वे शारीरिक अंग हमारे जीवनतत्त्व (मात्र) के ल्य लिए प्रणाली का काम करते हैं। जिससे मानसिक तथा शारीरिक विकास में बाधा पहुँचती है। यहाँ कारण है कि इस अज्ञानता के कारण आजकल बालक और बालिकाओं को अधिकतर दुःख उठाना पड़ता है। जब हमारे मानवी शरीर में प्राकृतिक रसतरलों की कमी होगी तो हमारे नाड़ी मंडल के शक्तियों में भी उसी अनुपात से अवश्य कमी होगी। यही कारण है कि इन्द्रिय संबंधी व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। व्याधियों की संख्या बढ़ रही है। नवयुवक रक्त हीनता, स्मरणशक्ति का ह्रास तथा दुर्बलता के शिकार बनते हैं। उन्हें अपनी पढ़ाई तक छोड़नी पड़ती है। व्याधियों का विस्तार इस प्रकार हो रहा है कि हजारों वैद्यों तथा डाक्टरों ने अपने अपने औषधालय खोल दिये हैं हजारों प्रकार के इंजेक्शन प्रचलित हो चुके हैं। फिर भी कष्ट दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। लोगों को अपने प्रयत्नों में सफलता प्राप्त नहीं होती। इसका क्या कारण है ? कारण दूर नहीं है। वह दुर्धर्षनों तथा असाधारण मंथन के कारण वीर्य का नाश ही है। वह अशुद्ध मन और अशुद्ध शरीर के कारण ही है।
यदि मनुष्य जीवन में उन्नति प्राप्त करना चाहता
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मन के भीतर प्रचुरता से प्रवेश करें, तो उन्हें रोकने या दवाने का प्रयत्न न कीजिए। अपने इष्ट मन्त्र का जप कीजिए। अपने दोषों तथा दुर्गुणों का विचार न कीजिए। यह पर्याप्त होगा यदि आप अपने दोषों को अच्छी प्रकार से जान लें। दुर्गुणों पर आक्रमण न कीजिए। ऐसा करने पर वे पुनः आप पर आक्रमण करेंगे। “मेरे भीतर इतने दोष और दुर्बलतायें भरी हुई हैं” इस प्रकार की चिंता न कीजिए। सत्य से असत्य पर विजय प्राप्त की जाती है। सात्विक वृत्तियों को उत्पन्न कीजिए। ध्यान और प्रतिपत्तु भावना के द्वारा शुद्ध सात्विक गुणों की वृद्धि होने से अशुद्ध दुर्गुणों का आप ही नाश हो जायगा। यह उचित रीति है।
दुर्विचार
मन में कुविचार के प्रवेश करते ही इन्द्रिय में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? क्योंकि यह बहुधा वारंवार हुआ करता है, इस लिए आपको इसमें कुछ आश्चर्य प्रतीत नहीं होता। शक्तिशाली सूर्य के उदय होते ही अखिल विश्व देदीप्यमान हो जाता है। यह भी एक महान् आश्चर्य है, आश्चर्यों का आश्चर्य है। क्योंकि नित्यप्रति ऐसा होता है, इसलिए आप इसे एक साधारण घटना समझते हैं। आत्मारूपी एक ही ज्ञान सूर्य सर्व मस्तिकों को प्रकाशमान करता है। यह आश्चर्यों का आश्चर्य है। अज्ञानता के कारण आप इस परमावश्यक विषय को तुच्छ समझते हैं। मन विदुषुत (विजली) की बड़ी शैटरी (यंत्र) है। वह वास्तव में एक डायनेमो (विजली पैदा करने का यंत्र)
दुविचार
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है। वह एक बिजली घर है। नाड़ियां बिजली के तार हैं जिनके द्वारा उत्तेजना रूपी बिजली धारायें हाथ पैरादि नाना प्रकार के इन्द्रियगण तक पहुँचाई जाती हैं। यदि आप नींबू या इमली के रस को किसी सोने के बर्तन में रखते हैं, तो वह दूषित या विषैला नहीं होता। यदि आप उसे पीतल या तांबे के बर्तन में रखते हैं तो वह अवश्य दूषित होकर विषैला हो जायगा। ठीक उसी प्रकार यदि किसी ऐसे मनुष्य के मत में जो नित्य ध्यान का अभ्यास करता है कुछ विषय वृत्तियां उत्पन्न हों भी तो वे उसमें विकार या कामुक उत्तेजना उत्पन्न नहीं करतीं और न उसे अपवित्र ही बना सकती हैं। इसके विपरीत अशुद्ध मनस वाले मनुष्यों के भीतर यदि विषय वृत्तियां हैं तो वे उनमें विषय पदार्थों के देखते ही, कामोत्तेजना उत्पन्न कर देंगी।
काम, कोष, लोभ, द्वेष, दंभ, अहंकार, चालाकी, कूटनीति आदि आंतरिक कंटक कहे जाते हैं। कुछ बाहरी कंटक भी हैं जैसे कुसंगति, अश्लील चित्र, उपन्यास, अश्लील गायन, सिनेमा आदि। कोई भी वस्तु जो मन में अशुद्ध विचार उत्पन्न करे, वास्तव में वही कुसंगति है। पशुओं को भोग करते देखना भी एक प्रकार की कुसंगति है, क्योंकि उससे मन में कामवासनायें उत्तेजित हो जाती हैं। क्या आप नहीं जानते कि दो मछलियों को भोग करते देख एक मूषिक के मन में भी कामवासना उत्तेजित हो गई थी ?
मुख्य प्राण के कंपन होने के कारण मन में विचार का संचलन होता है। यह विचार शक्ति महान् विद्युत
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गति के साथ नाड़ी मंडल के द्वारा दूरस्थ इन्द्रियों तक पहुँच जाती है। यह स्थूल शरीर एक मांसल सांन्ना है, जिसको मन ने ही अपने अनुभव और सुख के लिए, संस्कार और वासनाओं के द्वारा बनाया है। वह अशिक्षित कामुक मनुष्य की प्रचंड-द्रोही इन्द्रियों को प्रवृत्त कर देता है। वही मन एक अनुशासित जितेन्द्रिय योगी का आशाकारी, स्वामी-भक्त सेवक बन जाता है। सजग ब्रह्मचारी को नित्य अपने विचारों पर पूर्ण सावधानी के साथ दृष्टि रखनी चाहिए। उसे चाहिए कि वह किसी भी वृषित विचार को अपने मन रूपी कारखाने के द्वार में न प्रवेश होने दे। यदि उसका मन अपने लक्ष्य (ध्यान का पदार्थ) पर पूर्णतया स्थित है तो फिर दुर्विचार के मन में प्रवेश करने के लिए कोई स्थान ही नहीं है। यदि कोई दुर्विचार मन के कूट द्वार से प्रवेश हो भी जाय तो मनुष्य को चाहिए कि वह उसे स्वीकार ही न करे। यदि उसने उसे ग्रहण कर लिया तो वह विचार-धारा समस्त शरीर में फैल जायगी। इन्द्रियों और समस्त नाड़ी मंडल प्रज्वलित होने लगेंगी। यह अत्यन्त मार्मिक स्थिति है।
दुर्विचार के उत्पन्न होते ही उसे प्रतिपक्ष-भावना प्रयाली के अनुसार, शुद्ध सात्विक विचारों द्वारा जड़ से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए। यदि आपकी इच्छा शक्ति दृढ़ है तो वह दुर्विचार वृत्त ही दकेल दिया जा सकता है। प्राणायाम, प्रार्थना, आत्म विचार, ध्यान, सत्संग आदि के द्वारा दुर्विचारों को मानसिक-शिल्प शाला के प्रवेश-द्वार पर ही विनष्ट किया जा सकता है। आरंभ में शुद्ध होगा। जब आप शुद्ध हो जायेंगे, जब आपकी इच्छा
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“यन्मनसा ध्यायति तद् वाचा वदति । यद् वाचा वदति तद् कर्मणा करोति ॥”
अर्थात् जिसका मन से विचार किया जाता है वही वाणी बोलती है; जो वाणी बोलती है वही इन्द्रियों द्वारा किया जाता है । यही कारण है कि वेदों में कहा गया है “तन्मेमनः शुभ कल्पयत्” अर्थात् मेरा मन शुभ संकल्प ही किया करें । शुभ विचारों को ग्रहण कीजिए । जिस प्रकार लकड़ी के तख्ते में एक पुरानी कील के ऊपर एक नई कील को ठोंक देने से पुरानी कील आप ही बाहर निकल पड़ती है, ठीक उसी प्रकार एक नये शुद्ध सात्त्विक विचार के द्वारा पुराना दुर्विचार आप ही दूर हो जाता ।
नेत्र मन की खिड़की है । यदि मन पवित्र और शान्त है तो नेत्र भी पवित्र और शान्त होंगे । जो मनुष्य ब्रह्मचर्य में स्थित हैं उनके नेत्र चमकीले, वासी मीठी और आकृति सुन्दर होगी ।
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छठा अध्याय
मन, प्राण और वीर्य
मन, प्राण और वीर्य एक हैं। दूध और पानी की भांति मन और प्राण का संबंध है। मन, प्राण और वीर्य का एक ही संबंध है। यदि मन को अधीन कर लिया जाता है तो प्राण और वीर्य स्वयं अधीन हो जाते हैं। जो मनुष्य प्राण का निरोध करता है, तो उसके मन का व्यापार और वीर्य की गति आप ही आप कम हो जाती है। पुनः यदि वीर्य पर अधिकार किया जाता है और यदि उसे पवित्र विचारों और विपरीतकरनी मुद्राओं के द्वारा ऊर्ध्वरेता (यानी वीर्य को ऊपर की ओर मस्तिष्क में ले जाना) बनाया जाता है तो मन और प्राण स्वयं यश में हो जाते हैं। मन और इन्द्रियों में घनिष्ठ संबंध
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है। मन चेष्टा करता है और पंच-ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा इस संसार के अनुभवों को ग्रहण करता है। वह ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ही आनन्द को प्राप्त करता है। वह कर्मेन्द्रियों से दृष्टपूर्वक काम करवाता है। अतः इन्द्रियों को वश में करना वास्तव में मन ही को वश में करना है। यम, नियम, शम, दम, प्रत्याहार आदि के अभ्यास का उद्देश्य मन और इन्द्रियों को वश में करना ही है।
मन पंच ज्ञानेन्द्रियों के सहयोग से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध के द्वारा आनन्द प्राप्त करता है। स्पर्श के द्वारा वह उत्तम आनन्द का अनुभव करता है। मैथुन का सुख ही मन के लिए एक विशिष्ट (सब से उत्तम) सुख है। प्रत्येक मनुष्य उसी सुख के पीछे दौड़ता है और उसी में समाप्त हो जाता है। अब रस (उत्तम खान पान) को लीजिए। रूप, आकार और सुन्दरता का सुख है। शब्द, वाद्य से प्राप्त होने वाला सुख है। अन्त में गंध को लीजिए। गंध की इन्द्रिय इतनी दुखदाई नहीं है जितनी रस की। यदि स्वादेन्द्रिय या जिह्वा वश में हो जाती है तो अन्य सब इन्द्रियां स्वयं वश में हो जाती हैं।
जिसने मन को वश में कर लिया उसने प्राण को भी वश में कर लिया। मन दो रूपों से कार्यनिमित्त होता है प्राण और वासनाओं के स्पन्दन से। यदि इन दोनों में से एक नष्ट हो जाय तो दूसरी वस्तु आप ही नष्ट हो जाती है। जब मन स्थिर होता है तो प्राण भी स्थिर हो जाता है। जब प्राण स्थिर होता है तो मन भी स्थिर होता है। जब मन और प्राण स्थिर नहीं होते तो सब इन्द्रियां चंचलता पूर्वक अपने अपने कार्यों में निमग्न रहती हैं।
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जीवन एक बहुत बड़ी सरिता है। इन्द्रियां उसमें पानी हैं। काम, क्रोध और लोभ रूपी उसमें बड़े बड़े मगर-मच्छ आदि जलचर हैं। जन्म और मरण रूपी दो भँवर हैं। ज्ञानी मनुष्य आत्म संयम और विचार रूपी नौका के द्वारा इस सरिता को पार करता है।
भूम शब्देन्द्रिय की प्रबलता के कारण जाल में फँस कर अपने प्राण गँवा देता है; इसी प्रकार हाथी, पतंग, मछली, तथा भ्रमर क्रमशः स्पर्श, रूप, रस तथा प्राणोन्द्रिय की प्रबलता के कारण अपने प्राणों को समाप्त कर देते हैं। जब एक ही इन्द्रिय की प्रबलता ऐसी है तो फिर मनुष्य की पंचेन्द्रियों के युक्त प्रभाव की प्रबलता किस प्रकार की होगी, उसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं।
जिस प्रकार खनिज पदार्थों की अशुद्धता धौकनी के द्वारा जलाकर भस्म कर दी जाती है, ठीक उसी प्रकार इन्द्रियों के कलंक भी प्राणों के निरोध के द्वारा दग्ध किये जाते हैं। अतः प्राणायाम का नियम अभ्यास करना चाहिये। वह अत्यन्त परिसोधक है।
सामान्य मनुष्यों को मन पर अधिकार नहीं होता। मन इधर उधर भागता रहता है। वह विध्वंस करता है। वह मनुष्य पर अधिकार जमाता है। वह नियं हल चल और कलह की स्थिति में रहता है। उसमें भावनायें और प्रवृत्तियां उठती रहती हैं। वह इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किये इच्छित पदार्थों के चित्रों से हर समय प्रभावित होता रहता है। प्रत्येक इन्द्रिय, अपनी वृत्ति के लिये मन को अपने विशेष भोग-पदार्थ की ओर खींचती रहती है। कर्ण जब कभी मीठी तान को सुन पाता है तो मन को अपनी
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और र्खाचिता है। जिह्वा मन को काफी की बुकानों की ओर भगा कर ले जाती है। मन के लिए एक सूख भी विश्राम नहीं है? चित्ता, शोक, आकुलता, भय, व्याधियां, दुर्बल्य, घृणा, काम, कोष, आदि मन के भीतर हल चल मचाते रहते हैं तथा उसको निरन्तर संतप्त करते रहते हैं। जिसने अपने विचार, भावनायें, चित्त-वृत्तियां, प्रेरणायें तथा अपनी इन्द्रियों पर आधिपत्य प्राप्त किया है वह वास्तव में सम्राटों का सम्राट् है। वह धन्य है। ब्रह्मचर्य के पूर्णतया रक्षण के लिये सब इन्द्रियों पर सर्वथा आधिपत्य प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है।
प्रतिक्रिया के संबंध में आपको अत्यन्त सावधान रहना पड़ेगा। जिन इन्द्रियों को आपने महीनों और वर्षों पर्यन्त वश में रखा है वे ही इन्द्रियां तनिक ही असावधानी के कारण उपद्रवी हो सकती हैं। अबसर प्राप्त होते ही वे आप पर बलात् आक्रमण करेंगी। कुछ लोग जो एक या दी-वर्षों तक ब्रह्मचर्य का अभ्यास करते हैं वे ही अनन्तर अधिक कामी होकर अपनी वीर्य शक्ति का अधिक नाश करते हैं। अन्त में वे असाध्य दुराचार भी बन जाते हैं।
यह के एक भूत पर नियन्त्रण रखना कितना कठिन है। शरीर की एक इन्द्रिय को अपने आधीन रखना कितना अधिक कठिन है। पुनः यदि पांचों इन्द्रियों को एक साथ वश में रखना है, तो आप समझ सकते हैं कि वह और भी कितना अधिक कठिन होगा। वह योगी जो जितेन्द्रिय है वह इस संसार में एक प्रभान शास्त्री महाराजा ॥
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वासनाओं की इतिथी कीजिये
वासना, चित्त रूपी सरोवर में एक प्रकार की लहर है। पदार्थों के प्रति जो आकर्षण और आसक्ति होती है उसका कारण वासना है; वही बंधन का कारण है।
यदि आपके मन में वासना नहीं है तो आप का किसी भी व्यक्ति के प्रति आकर्षण नहीं होगा। मन में उत्पन्न होने वाली वासनाओं पर आक्रमण करने के लिए, विज्ञान-मय कोश साधक के लिए एक दुर्ग का कार्य करता है। शम के अभ्यास के द्वारा आप सब वासनाओं का एक एक करके नाश कर सकते हैं। आप बुद्धि के द्वारा विवेक से सहायता प्राप्त कर सकते हैं। ब्रह्मचर्य की प्राप्ति में वासना के त्याग से पूरी पूरी सहायता मिलती है।
वासना ही मन की अशांति का कारण है। ज्योंही वासना प्रकट होती है, त्योंही विषय-वृत्ति-प्रवाह के द्वारा मन और इच्छित पदार्थ के बीच में एक आत्मीय संबंध स्थापित हो जाता है। मन कदापि पीछे नहीं हटेगा, जब तक कि वह बान्छित पदार्थ को प्राप्त कर उसका उपभोग न कर लेगा। जब तक भोग प्राप्त न होगा, तब तक मन में अशांति ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वृत्ति पदार्थ की ओर भागी रहेगी जब तक वह उसे प्राप्त कर उसका उपभोग न कर ले। सामान्य मनुष्य दुर्बल इच्छा के कारण किसी भी वासना को दबा नहीं सकते। जिससे किसी भी वासना को दबा सकता है। परन्तु ज्यों-उपयुक्त प्रवृत्ति प्राप्त हुआ कि वह द्विगुण-शक्ति के द्वारा पुनः प्रकट हो जाती है। जब सब वासनाओं का सर्वथा नाश हो जायगा तो फिर किसी भी बाहरी पदार्थ के
ब्रह्मचर्य साधना
प्रति आकर्षण व आसक्ति नहीं होगी। शम और दम साधक के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।
जिस प्रकार चीजों में पुष्प गुप्त रहते हैं, ठीक उसी प्रकार अन्तःकरण और कारण शरीर में वासनायें गुप्त रहती हैं। नित्य नये पुष्प खिलते हैं और पुनः एक या दो दिनों में वे सुरक्षा जाते हैं। ठीक इसी प्रकार वासनायें भी चित्त में एक के पीछे दूसरी उत्पन्न हो हो कर संकल्पों के द्वारा जीवों को अपने इच्छित पदार्थों को प्राप्त करने तथा उनका उपभोग करने के लिये निरन्तर उत्तेजित करती रहती हैं। वासनाओं से कार्य उत्पन्न होते हैं और कार्यों से पुनः वासनाओं को बल प्राप्त होता है। यह एक चक्रिका भी है। आत्म ज्ञान के उदय होते ही सब वासनायें सर्वथा दग्ध हो जाती हैं।
नाट्यशालाओं में जाने तथा चल-चित्रों के देखने की इच्छा एक प्रकार की अशुभ वासना है। गीता के अध्ययन तथा आध्यात्मिक साधनाभ्यास की इच्छा शुभ वासना है। शुभ वासनाओं की वृद्धि कीजिये। अशुभ वासनायें सारी आप ही नष्ट हो जायेंगी। आत्म साक्षात्कार की तीव्र इच्छा के द्वारा सर्व प्रकार की वासनायें नष्ट हो जायेंगी। शुद्ध वासनाओं की वृद्धि करने में कोई हानि नहीं है। आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में वे आपके लिए एक बहुमूल्य पूँजी हैं।
जब कभी आपके मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो आप सदा अपने विवेक या विचार शक्ति से सम्मति प्राप्त करें। इस विवेक के द्वारा आप तुरत जान सकेंगे कि यह इच्छा दुःख पूर्ण है और वह एक निरर्थक प्रलोभन के
वासनाओं की इतिश्री कीजिये
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अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है जो केवल इस उपद्रवी मन की ही रचना है। विवेक आपको उस इच्छा का तत्काल त्याग कर देने के लिए तथा आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करने के लिए सुसम्मति प्रदान करेगा। वह संकल्प-शक्ति की सहायता के द्वारा आपकी इच्छा को तत्काल समूल नष्ट कर देगा। दुष्ट काम और प्रलोभन को नष्ट करने के लिए ज्ञान मार्ग के साधक के लिए विवेक और संकल्प-शक्ति ये दो प्रबल शस्त्र हैं।
यह आक्रमण आंतरिक आक्रमण है। बाहर की ओर से भी आक्रमण होना चाहिए। वह आक्रमण दम यानी इन्द्रिय-निग्रह के द्वारा किया जाता है। विषय-संवेदन को बाहर से इन्द्रियों के मार्गों द्वारा अपने मन के भीतर प्रवेश ही न होने दीजिए। यह भी आवश्यक है। केवल शम पर्याप्त नहीं है। दम के अभ्यास से इन्द्रियों को शान्त रखना चाहिए। उदाहरणार्थ ज्योंही आपके मन में कामवासना उत्पन्न हो, त्योंही आप उसे जहां का तहां भीतर ही भीतर शम (वासना त्याग) के द्वारा समूल नष्ट कर डालिये। जब कभी आपको इधर-उधर घूमते फिरते किसी लौ/पुरुष को देखने का अवसर प्राप्त हो तो आप दम के अभ्यास के द्वारा तुरंत अपनी काम-दृष्टि को यहां मे हटाकर अयोग्य कामेच्छा का सर्वथा त्याग कर दीजिए। मन के नियंत्रण में दम, शम का ही पूरक है। वासनाओं के त्याग में दम एक प्रकार से सहायता प्रदान करता है। मोक्ष की तीव्र कामना के द्वारा लौकिक इच्छायें, वासनायें और तृष्णाओं के नष्ट करने में अवश्य सहायता मिलती है। शुभ वासनाओं के द्वारा अशुभ वासनाओं
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का त्याग कीजिये । ईश्वर-साक्षात्कार के लिए एक ही तीव्र इच्छा के द्वारा इन शुभेच्छाओं का भी त्याग कर दालिये । अन्त में पुनः इस भगवत् प्राप्ति की इच्छा का भी त्याग कर दीजिये । यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार कि एक काटे को दूसरे काटे से निकाल कर पुनः दोनों काटों को फँक देना । यह रीति अत्यन्त सरल है ।
जब वासना दूर हो जाती है तो इच्छा शक्ति बढ़ती है । यदि आपने पाँच वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली तो आपके लिए छठी वासना पर विजय प्राप्त करना अत्यंत सरल होगा, क्योंकि आप में अधिकाधिक शक्ति का संचार हो रहा है आप इसका वास्तव में अनुभव कर सकते हैं । वासनाओं के नाश का अर्थ मनोनाश से ही है । मन, वासनाओं के समूह के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।
अधिकांश मनुष्यों में मैथुन की लालसा अत्यन्त तीव्र रहती है । उनमें यह इच्छा पूर्ण रूप से विद्यमान रहती है । कुछ मनुष्यों में काम-वासना कभी कभी उत्पन्न होती है, परन्तु शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं । केवल मन में थोड़ा उद्वेग प्रतीत होता है । उचित प्रकार की आध्यात्मिक साधना के द्वारा यह भी सर्वथा नष्ट किया जा सकता है ।
उत्पत्ति का बीज (कारण) तृष्णा है ! इन तृष्णाओं से संकल्प-और कर्म उत्पन्न होते हैं । इन्हीं से संसार चक्र चलता रहता है । तृष्णायें मन को उत्तेजित करती हैं और आप कामी बन जाते हैं । मुनि वाल्मीकि योग वाशिष्ठ में लिखते हैं “आप अखिल समुद्र का पान कर सकते हैं । आप अग्नि को निगल सकते हैं । आप हिमालय पर्वत को अपने हाथ में धारण कर सकते हैं । परन्तु वासनाओं को
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नष्ट करना अत्यन्त कठिन है।” दृढ़ प्रतिज्ञा, धैर्य तथा तीव्र वैराग्य और विवेक से युक्त मनुष्य के लिए यह कार्य कुछ भी नहीं है। वह एक पल भर में किया जा सकता है। उचित साधना के द्वारा वासना का त्याग कीजिये। श्रन्तःकरण में गोता लगाकर तृष्णाओं के कार्यों को दृढ़िये और उन्हें समूल नष्ट कीजिये।
जिस प्रकार एक स्वर्णकार, कुस्तित स्वर्ण को बारंबार तपाकर तथा उसमें अम्पलीय पदार्थ मिला कर उसे निर्मल (शुद्ध) बना देता है, ठीक उसी प्रकार आपकी भी अपने अपवित्र मन और शरीर को निरंतर साधना के द्वारा पवित्र बनाना होगा।
एक बार कलकत्ते में गंगा पार करते हुए एक बंगाली महाराज ने क्रोध में आकर एक सिक्का महाराज के प्रति “साला नदमास” शब्द का प्रयोग किया। सिक्का महाराज ने उद्द्वेग में आकर तुरत उस बंगाली महाराज को पकड़ कर गंगा में फेंक दिया। वे बंगाली महाराज डूब कर मर गये। देखिये ! वे सिक्का महानुभाव मन से कितने दुर्बल थे, यद्यपि वे शरीर से बलवान थे। एक ही शब्द के भ्रमण से उनके मन की स्थिरता नष्ट हो गई। वे क्रोध के गुलाम बन गये। यदि उच्चमं ब्रह्मचर्य, विवेक और विचार होता तो वे पृथ्वी पूर्वक इस असम्य कार्य को कदापि नहीं करते।
काम एक प्रकार की तीव्र इच्छा है। बार बार दुहराते रहने से कोमल इच्छा तीव्र इच्छा बन जाती है। विचार ही वास्तविक कर्म है। मैथुन से चित्त में संस्कार उत्पन्न होता है। यह संस्कार मन में वृत्ति (विचारधारा) उत्पन्न
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ब्रह्मचर्य साधना
करता है और यह वृत्ति पुनः संस्कार को उत्पन्न करती है। भोग से वासनायें प्रबल होती हैं। स्मरणशक्ति और विचार के द्वारा पुनः कामवासना उत्पन्न हो जाती है।
कामेच्छा को नष्ट करने में पूर्ण साधना रहिये। संसार का सृजनहार ब्रह्मा भी नहीं जानता कि काम का यथार्थ स्थान कहाँ है। गीता में आपको मिलेगा कि इन्द्रियां, मन और बुद्धि काम के वासस्थान हैं। प्राणमय कोष उसका अन्य स्थान है। काम, शरीर, मन और इन्द्रियों में सर्वत्र व्यापक है। शरीर के रग-रग, अणु-अणु और कण-कण में काम व्यापक रहता है। काम रूपी महासागर के बाह्य तथा अन्तस्थ-धारा-प्रवाहों में तृष्णा रूपी मगर तैरते रहते हैं। आपको इन सभी स्थानों में काम को संपूर्णता से नष्ट करना पड़ेगा।
अज्ञानी मनुष्य संस्कार और कर्मों का वंच (निमित्त) बना रहता है। आध्यात्मिक साधना के अभ्यास तथा वासना व अहंकार के त्याग के द्वारा वह अपने वास्तविक स्वभाव को समझने लगता है और तदनुसार वह धीरे धीरे बल प्राप्त करता है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ नियन्त्रण से न कि काम-वासना को दवाने-से। यदि आप ध्यान, जप, प्रार्थना, स्वाध्याय, आत्मचिन्तन (मैं कौन हूँ ?) के द्वारा अपने मन में शुद्ध सात्विक विचार भरें तो आप अपनी कामवासना को मन के शमन के द्वारा निर्जांव करने में समर्थ होंगे। मन भी क्रमशः सूक्ष्म हो जायगा। अवरोधित कामेच्छा आप पर पुनः पुनः आक्रमण करेगी जिससे आपको स्वप्नदोष, चिह-चिहपन और मन में अशांति उत्पन्न होगी। पुनः आपको
कामवासनाओं की इतिश्री कीजिये
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ध्यान, कीर्तन और प्रार्थना आदि के द्वारा मन को शुद्ध करना पड़ेगा। प्रथम मन पर नियंत्रण करना चाहिए। मन को शिक्षित कीजिये। तब आपके लिये मन पर नियंत्रण करना सरल हो जायगा। तत्पश्चात् दम का अभ्यास कीजिए। मन के बिना इन्द्रियों अकेली कार्य नहीं कर सकती। इसीलिए ब्रह्मचर्य के लिये प्रथम मन को वश में करना चाहिए न कि इन्द्रियों को। ह उत्तम उपाय है।
परन्तु नये साधकों के लिये मन को वश में करना कठिन है; क्योंकि जब इन्द्रियां इधर उधर भागती रहती हैं तो मन को वश में करना अत्यन्त कठिन होता है। यही कारण है कि भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं— “हे अर्जुन ! प्रथम तू इन्द्रियों को वश में करके पुनः इस बुद्धि और ज्ञान के नष्ट करने वाले पापी काम को मार।” अध्याय ३ श्लोक ४१।
“प्रथम मन को वश में करना चाहिए” यह सिद्धांत सर्वथा सही है। इसका अभ्यास उत्तम साधकों के लिए प्रशस्त है। सामान्य (मध्यम श्रेणी के) साधकों को प्रथम इन्द्रियों को वश में करना चाहिए। इन्द्रियों की प्रवृत्ति सदा बाहर की ओर रहती है। मन इन्द्रियों के द्वारा कार्य करता है। एक को वश में करना दूसरे को वश में करना है। इन्द्रियों को वश में करने से भी मन वश में हो जाता है, क्योंकि मन केवल इन्द्रियों का ही तो गहर (समूह) है। बिना इन्द्रियों के मन का कुछ भी प्रतित्व नहीं है।
“मन को प्रथम वश में कीजिए, इन्द्रियां सहज ही वश में हो जायंगी।” (एक दृष्टि कोण), “पहले इन्द्रियों