भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

ब्रह्मचर्य-विद्यान

२७०

चुके हैं। महवियों में वशिष्ठ, पराशर और यमद्वनि तथा राजाओं में सगर और धृतराष्ट्र अमोघवीर्य के उदाहरण हैं। देवव्रत भीष्म और महावीर हनुमान ऊर्ध्वरेता थे।

अमोघवीर्य की अपेक्षा ऊर्ध्वरेता बनना परम कठिन है। अमोघवीर्य अपनी सिद्धि से इच्छित सन्तान उत्पन्न कर सकता है, पर यह आशा ऊर्ध्वरेता के लिये नहीं है। उसे अपनी महावीर्यता से केवल संसार-सेवा करने का अधिकार है। अमोघवीर्य बनने के लिये नियमित ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है, पर ऊर्ध्वरेता के लिये ब्रह्मचर्य के साथ साथ योग का भी अनुशासन है। अमोघवीर्य होने से सर्वोन्नत मनुष्य की गति होती रहती है। इससे शरीर बलवान हो जाता है—मानसिक शक्ति की वृद्धि होती है—उत्साह और साहस नहीं नष्ट होता—मुख की कान्ति नहीं घटती एवं शीघ्र वृद्धता नहीं आती। उसकी सन्तान में भी तेजस्विता, विद्वत्ता और गुणवत्ता स्वाभाविक होती है। ऊर्ध्वरेता होने से वीर्य कभी नष्ट नहीं होता। इसलिये सब शरीर वज्र बन जाता है—रोगों का आक्रमण नहीं होता—दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है तथा परमात्मा की भी अभिलम्ब प्राप्त होती है। यहाँ तक कि मृत्यु को भी अधिकार में किया जा सकता है। उस का कोई व्रत निष्फल नहीं हो सकता। अब पाठक अमोघवीर्य और ऊर्ध्वरेता होने का तात्पर्य भली भाँति समझ गये होंगे। इस समय हमारे देश और समाज को दोनों प्रकार के ब्रह्मचारियों की नितान्त आवश्यकता है। बिना इनके सुधार होने की आशा केवल निराशा है।

२७१

ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश

१६—ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश

१—ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य को इहलोक और परलोक के सुधारने का साधन मिलता है ।

२—शास्त्रार्थ में और युद्ध में विजयी बनाने वाला ब्रह्मचर्य ही है ।

३—दीर्घ जीवन, उत्तम स्वास्थ्य, सुसन्तान तथा सम्पत्ति के लिये ब्रह्मचर्य ही परम साधन है ।

४—एक ब्रह्मचारी पुरुष ही यज्ञ करने वालों से श्रेष्ठ और प्रशंसित है ।

५—वीर्य ही इस शरीर का राजा है । इसके चीण होने से शारीरिक सभी शक्तियाँ दुर्बल और निस्तेज हो जाती हैं ।

६—वीर्य का एक एक कण जीवनी शक्ति से भरा हुआ है । जो इसे रक्षित रखता है, वह अपना आयुवृद्ध बढ़ाता है ।

७—जब तक वीर्य अपरिपक्व है, तब तक इसे कभी नष्ट न करना चाहिये ।

८—जो यौवनावस्था में अपने वीर्य का नाश कर देता है, वह कभी सुखी नहीं हो पाता ।

९—वीर्यवान होने के कारण ही प्राचीन लोग बड़े विद्वान् और पराक्रमी होते थे ।

१०—हीनवीर्य पुरुष को अपने कामों में बहुत कम सफलता मिलती है ।

११—काम-चिकारों को दवा देना ही इन्द्रिय-दमन है । जिसका मन शुद्ध और संयमी है, वही अपने वीर्य को रोक सकता है ।

ब्रह्मचर्य-विधान

२७२

१२—आदर्श ब्रह्मचर्य बही है, जिसमें मन में भी काम-विकार उत्पन्न न हो। यही वीर्य रक्षण का प्रधान उपाय है।

१३—अध्यापकों का धर्म है कि वे सब से पहले बालकों को ब्रह्मचर्य की महत्ता समझा कर फिर विद्यादान करें।

१४—पुरुष को कम से कम २५ वर्ष और स्त्री को १६ वर्ष तक ब्रह्मचर्य की रक्षा करने चाहिए। कारण यह है कि इतनी अवस्था तक उनका वीर्य और रज अपरिपक्व रहता है।

१५—जो लोग अपने अपरिपक्व वीर्य को नष्ट करते हैं, वे अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को हीन कर देते हैं।

१६—वीर्य की परिपक्वता से सब शक्तियाँ भी परिपक्व और दृढ़ हो जाती हैं।

१७—बेद में पुरुषों की भौँचि स्त्रियों को भी ब्रह्मचर्य-पालन की आज्ञा है।

१८—ब्रह्मचर्य के बल से ही राजा पृथु ने समस्त प्रुथिवी को अधिकार में कर लिया था। ब्रह्मचर्य से ही परशुरामजी ने इक्ष्वाकु वार भूमण्डल के क्षत्रियों का नाश किया था। ब्रह्मचर्य के ही संरक्षण से भगवान् शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा से मार्कण्डेय ऋषि अमर हो गये। ब्रह्मचर्य की ही शक्ति से नक्षिकेता नाम के बाल-ब्रह्मचारी यमराज के यहाँ से सानन्द लौट आये। ब्रह्मचर्य से ही वित्तमह भीष्म महाभारत में अद्वितीय पुरुष कहलाये। ब्रह्मचर्य से ही हनुमानजी का नाम महावीर पड़ गया और वे जन्म भर श्रीरामचन्द्र के प्रिय सेवक और जानकी के व्यापार वने रहे। ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही लक्ष्मण जी ने महाबली सेवताद को मारा। ब्रह्मचर्य के ही बल से श्रीराम

१७३

ब्रह्मचर्य के कुछ उपदेश

ने जनकपुर में शिवजी के भीषण पिनाक को खण्ड-खण्ड कर ढाला। ब्रह्मचर्य की ही महिमा से शुकदेवजी को ८८ सहस्र बड़े-बड़े श्रुतियों में उच्चासन दिया गया। ब्रह्मचर्य-व्रत से ही शङ्कराचार्य ने पुनः वैदिक धर्म का प्रचार किया। ब्रह्मचर्य के ही पालन से स्वामी दयानन्द ने पाखण्डों का खण्डन कर सत्य धर्म को पुनः जागृत किया। जो कुछ संसार में उत्तमता नाम से प्रसिद्ध है, वह सब ब्रह्मचर्य की ही विभूति है।

षष्ठ स्कन्ध

—✥—

१—ब्रह्मचन्दना

ॐ अग्ने नय सुपथा राये ब्रह्मान्, विभ्वानि देव षड्वानि विद्वान् । युयोष्यस्मन्नु हुराप मेनो— भूविष्ठा ते नम उक्तिं विधेम ॥

( यजु० अ० ४० म० १६ )

हे अग्नि-रूप परमेश्वर ! तुम सब संसार के मार्ग-प्रदर्शक हो । अतएव तुम हमें उत्तम मार्ग से चलाओ ! जो हम में दुर्गुण हों, उन्हें बल-पूर्वक दूर करो ! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं कि तुम हमें सुबुद्धि प्रदान करो !

तुम में अग्नि की सी तेजस्विता और दिव्यता है । तुम्हारी आर्थना से हमारे पापों का नाश होता है । हमें तुम आत्मवेज प्रदान कर दो, ताकि हम स्वयं अपने दुर्गुणों को नष्ट कर सकें । तुम में सर्वज्ञता है । वह बुद्धि के ही बल से प्राप्त होती है । यह ज्योति जिसे प्राप्त हो जाती है, वही निर्मल और निर्मय रह सकता है । हम तुम्हारी इसी के हेतु षपासना करते हैं । कृपा कर हमें बुद्धि-मान बनाओ, जिससे कि ब्रह्मचर्य में विघ्न न पड़ने पर हम दुर्गुणों का शीघ्र नाश कर सकें !

२७५

आधुनिक विद्यार्थी

२—आधुनिक विद्यार्थी

चित्तायत्तं नृणां शुक्रं, शुक्रायत्तच्च जीवितम् । तस्माच्छुक्रं मनश्चेव, रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥

चित्त के अधीन मनुष्य का वीर्य होता है, और वीर्य के बश- में जीवन है। इसलिये मन और वीर्य को अन्न-पूर्वक रक्षा करनी चाहिये।

आजकल देश का वायु-मण्डल इतना दूषित हो गया है कि उसके कारण हमारे बालक-विद्यार्थियों का सर्वनारा हो रहा है। जो विद्यार्थी शिक्षा के प्रधान पात्र समझे जाते हैं, वे अब दुर्गुणों के संधार या यों कहिये कि उत्पादक हो रहे हैं।

विद्यार्थी-अवस्था में बालकों की देख-रेख की बड़ी आवश्यक- कता है। उन पर जो संस्कार इस अवस्था में डाले जाते हैं, वे सर्वदा के लिये स्थायी होते हैं।

वास्तव में विद्यार्थी-जीवन बड़े महत्व का होता है। इस प्रागैभिक अवस्था में ही भाग्य-निर्माण का गुरुतर काम किया जाता है। इसी समय में विद्यार्थी को जितेन्द्रियता, परोपकार, ब्रह्मचर्य, सदाचार, ज्ञान-विज्ञान तथा संसार के विविध प्रकार के कला-कौशल का ज्ञान कराना जा-सुकता है। अतएव यह ज्ञान- वस्था बड़े दायित्व की समझी जानी चाहिये।

अत्यन्त खेद के साथ लिखना पड़ता है कि वर्तमान समय के विद्यार्थियों की दशा बड़ी शोचनीय हो रही है। वैदिक आर्य- धर्म-प्रशाली से शिक्षा न होने के कारण आधुनिक विद्यार्थी- समाज में नाना प्रकार के दोष घुस गये हैं। बालकों को सच्ची

महात्म्य-विज्ञान

२७।

शिक्षा तो दी ही नहीं जाती। उन्हीं धर्म की शिक्षा न मिलने के कारण वे अपने जीवन को किसी योग्य नहीं बना पावे वात्स्यायस्था से ही उन पर कुसंस्कार पढ़ने लगते हैं। विद्या में अपूर्ण अज्ञों से उनमें पूर्ण ज्ञान का प्रकाश नहीं होने पाता। अज्ञानता-बश वे छुट्टे व्यवसनों के अभ्यासी बन जाते हैं। सौ में पाँच विद्यार्थी भी ब्रह्मचारी तथा कर्मनिष्ठ नहीं निकलते। विद्यालय में साक्षरता के साथ साथ अनेक दुर्गुण प्राप्त हो जाते हैं, जे यौवनावस्था में उसके पतन के प्रधान कारण होते हैं।

यह बात पूर्ण रूप से देखी गई है कि आधुनिक शिक्षित की अपेक्षा अधिक्षित लोग विशेष संयमी, ब्रह्मचारी, स्वस्थ तथा चतुर होते हैं! ऐसा क्यों? इसका उत्तर यही है कि आधुनिक विद्यार्थी-जीवन में अनेक दुर्गुण भर जाते हैं! शिक्षा-प्रणाली इस प्रकार की है कि उनका संशोधन नहीं कर सकती। अतः बॉ सुधार की आवश्यकता है।

हमारे प्यारे विद्यार्थियों, यदि तुम सच्चे विद्यार्थी बन क कुछ संसार की सेवा करना चाहते हो तो, उस कुशिक्षा से बचो जिसमें पंड कर सदाचार, स्वास्थ्य, ज्ञान, आत्मवेत तथा धर्म क नाश होता हो। यदि हमारी सम्मति लेना चाहते हो तो, उन गुरुकुलों की शिक्षा को प्राप्त कर, ब्रह्मचारी, विद्वान् तथा तेजस्वी बन कर, अपने मनुष्य-जीवन को सार्थक करो! तुम्हारी शक्ति ज्ञान, तुम्हारी इच्छा और तुम्हारे साहस से हां स्वाधीनता प्राप्त हो सकती है। हृत्-बीर्य लोगों के हाथों में कभी भी शासन नहीं उठर सकता। यदि धर्म के प्रति, जाति के प्रति और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कुछ भी श्रद्धा है और यदि तुम अपने को योग्य

२५७

अपक धीर्य-पात के दोष

थाना चाहते हो, तो ज़ाज़वारी मनो—धीर्य के एक विन्दु को भी नष्ट न होने दो !

३—अपक धीर्य-पात के दोष

“मरणं विन्दुपातेन, जीवनं विन्दु-धारयाम् ।”

धीर्य के एक विन्दु नष्ट का होना मरण और एक विन्दु का धारण करना जीवन है ।

“अपकं दोष-कारयाम् ।”

अपरिपक्व वस्तु में दोष होते हैं ।

वास्तव में अपरिपक्वता बड़ी खुरी वस्तु है । इसकी रक्षा से ही जीवन में सफलता मिल सकती है । इस विषय में बहुत उत्तम कहा गया है—

वनस्पते रपकानि, फलानि प्रचिनोत्तियः ।

वनान्मोति रसं पन्थ्यो, बीजं च्वास्थं चिनश्च्यति ॥

( सृक् )

जो पुरुष विना पकी हुई वनस्पति के फलों को तोड़ना चाहता है उसे उसमें रस नहीं मिलता और उसका बीज भी नष्ट हो जाता है ।

कच्चे फल में सीठा रस नहीं होता । उसके बीज में पुष्टता और उत्पादन-शक्ति नहीं रहती । अतः इचित्त समय पर ही फल लेना योग्य है ।

यही बात मनुष्यों के लिये भी घटती है । मनुष्य शरीर में जब तक धीर्य अपरिपक्व है, तब तक उसकी रक्षा करनी चाहिये ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

२७८

चीर्य के बल से सब कार्य होते हैं। इसके बिना सारे कार्य निष्फल होते हैं।

पञ्चविशे ततो वर्पे पुमान् नारी तु पोडये।

समत्वा गतचीर्यौ तौ, जानीयात् कुशलौ मिषक् ॥

पचीस वर्ष में पुरुष का चीर्य और सोलह वर्ष में स्त्री का रज दोनों समान हो जाते हैं। इस बात को चतुर वैद्य जान सकते हैं।

यदि लोग इस वचन का उल्लंघन कर चीर्य-पात करने में प्रवृत्त हों, तो इससे निम्नलिखित दोष उत्पन्न हो जाते हैं:—

(१) कल्चे चीर्य के बाहर होने से शरीर की सभी धातुयें मिलतेज हो जाती हैं।

(२) शारीरिक विकास और सौन्दर्य नष्ट हो जाता है।

(३) ओज की कमी हो जाने से असन्तता और उत्साह भी घट जाता है।

(४) सब अङ्गों की शक्ति घट जाने से आयुर्वल भी कम हो जाता है।

(५) असमय में औरों की व्योति चीर्य हो जाती है। मुख के दाँत गिर जाते हैं। बाल भी पकने लगते हैं।

(६) पुरुष थोड़े ही दिनों में नपुंसक हो जाता है और स्त्री आत्चे से हाथ धो बैठती है।

(७) पहले तो सन्तान उत्पन्न नहीं होती। यदि होती भी है, तो बहुत कम दिन जीनेवाली और सब अङ्गों से दुर्बल होती है।

२७९

वीर्य-नाश के प्रधान कारण

४—वीर्य-नाश के प्रधान कारण

विकार हेतो सति विकियन्ते । येषां न चेतानसि त एव धीराः ॥

( शक्ति )

विकार उत्पन्न करने वाले कार्यों के रहने पर भी, जिन पुरुषों की मनोवृत्तियाँ नहीं दिगवृत्तों, वे ही धीर कहलाते हैं ।

हमारी आर्य-जाति का दिन पर दिन पतन होता जा रहा है । इसकी चिन्तानजनक श्रवस्था पर विचार करने से एक बार हृदय पर घोर आघात होता है । प्राचीन गौरव के इतिहास की आधुनिक परिस्थिति से मिलाने से यही बात ज्ञात होती है कि इसकी अवनति का प्रधान कारण 'वीर्य-नाश' है । जब तक जाति में विषय-वासनाओं से घृणा रहती है, ज्यमिच्छार बुरी दृष्टि से देखा जाता है, ब्रह्मचर्य-विद्या के लिये पूर्ण रूप से उद्योग होता रहता है और सदाचार की शिक्षाएँ बढ़ती रहती हैं, तब तक वह कदापि वनति के शिखर से नहीं गिरती । जिस देश में वीर्य-नाश प्रारम्भ हो जाता है, वह अधिक दिनों तक नहीं जी सकता ।

अब हम वीर्य-नाश के कई प्रधान कार्यों का उल्लेख यहाँ पर कर देना चाहते हैं, जो जनता में अपना बिकराल रूप धारण कर उसको रसातल की ओर ले जा रहे हैं ।

ब्रह्मचर्य-विद्यान

२८०

(१) बाल-विवाह

इसमें निर्वाध बालक का विवाह एक अव्योध बालिका के साथ कर दिया जाता है। ये दोनों अध्यात्मावश विषय में रत होकर कुछ दिनों में हृत्-वीर्य हो जाते हैं और इससे प्राणों का भय भी हो जाता है। यदि पुरुष मरा तो जन्म भर वह स्त्री विषवा दुःख घटती है, और यदि स्त्री मरी तो उसका हीन-वीर्य पति दूसरी कन्या से विवाह कर उसका भी सर्वनाश कर देता है।

देखिये ! बाल विवाह के सम्बन्ध में स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं:—

“जिस देश में ब्रह्मचर्य-विद्या-रहित बाल्यावस्था में विवाह होता है, वह देश दुःख (सागर) में डूब जाता है। क्योंकि ब्रह्मचर्य-विद्या के ग्रहण-पूर्वक विवाह के सुधार से सुधार और बिगाड़ से बिगाड़ होता है।”

अब हम बाल-विवाह से होनेवाली कुछ हानियों को नीचे लिखते हैं:—

(१) तेजस्वी बालक भी बाल्यावस्था के विवाह से मूर्ख तथा हतभागी बन जाता है।

(२) प्रथम तो सन्तान होती ही नहीं, यदि होती भी है, तो रोगी और निर्वल हो कर शीघ्र ही मर जाती है।

(३) युवावस्था आते आते सब शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं।

(४) बाल-विवाह से बालिकाओं का भी बड़ी अहित होता है जो बालकों का।

२८९

वीर्य-नाश के प्रधान कारण

(५) वालिकायें कृष्णा, निर्बला, कुलदा, बुद्धिहीना होकर शीघ्र मर जाती हैं।

*(६) बाल-विवाह से देश और जाति की सब से बड़ी हानि होती है।

(२) वृद्ध-विवाह

“वृद्धस्य तरुणी विपम् ।”

( वर्क )

वृद्ध पुरुष के लिये तरुणी की विप के समान होती है।

इसमें घन के लोभ से एक वृद्ध पुरुष के साथ निरी वालिका का विवाह कर दिया जाता है। जब तक वह युवती होती है, तब तक ये यमपुरी को प्रस्थान कर देते हैं। वह अब अवज्ञा वैधव्य के कठोर दण्ड को न सहकर गुप्त रूप से न्यभिचार करती है। गर्भ रह जाने पर भ्रूण-हत्या के पाप को भी लाल-भय के कारण कर बैठती है। इस प्रकार भी काम न चला, तो वह घर से बाहर निकल जाती है, और बेरहा हो जाती है या किसी विधर्मी के यहाँ आश्रय पाती है।

वृद्धावस्था में मैथुन की शक्ति यों ही घट जाती है। इस समय पुरुष को जितेन्द्रिय होकर योग-द्वारा जीवन व्यतीत करना सिखा है। इसी अवस्था में संसार में धर्म तथा जाति की सेवा हो सकती है। पर हमारे आत्मानि वृद्ध हिन्दू-धर्म के मूलोच्छेदन पर तुले हुये हैं। इससे बढ़कर परिताप की और क्या बात होगी!

१७

मूलचर्य-विधान

२८२

देखिये, वृद्ध-विवाह के सम्बन्ध में स्वामी स्व-श्रद्धानन्द जी क्या कहते हैं:—

“वृद्ध-विवाह से विधवाओं की संख्या बढ़ रही है। इनके कारण समाज में बड़ी अमर्यादा हो रही है, पर द्विजाति लोग इनका उद्धार करने से डरते हैं। इसलिये हमारा तो यही अनुरोध है कि ४० वर्ष की अवस्था के पश्चात् किसी पुरुष का विवाह न होने देना चाहिये।”

अब हम वृद्ध-विवाह से होने वाली कुछ हानियों को नीचे लिखते हैं:—

(१) वृद्ध-विवाह से कुल का नाश हो जाता है।

(२) जाति में स्त्रियों की कमी से नवयुवकों का अधिकार लज्जित जाता है।

(३) विधवायें अधिक उत्पन्न होती हैं।

(४) वृद्ध से विवाहित स्त्रियाँ व्यभिचार कराती हैं।

(५) बहुत सी आत्म-हत्यायें और भ्रूण-हत्यायें हो जाती हैं।

(६) वृद्ध पुरुष की सन्तान में अनेक दुर्गुण होते हैं।

(७) वृद्ध लोग समाज की सेवा से विरक्त रह जाते हैं।

(८) वृद्ध-विवाह से देश में वेश्याओं की संख्या बढ़ती है।

( ३ ) वेश्या-गमन

वेश्यास्त्री भदन-ज्वाला, रूपेण्डन समेधिता । कामसिर्ष्य हृष्यन्ते, यौधनानि धनानि च ॥

( भरद्वाज-शतक )

२८३

चौर्य-नाश के प्रधान कारण

यह वेश्या रूप-ईश्वर से सजाई हुई कामाग्नि की ज्वाला होती है। कामी पुरुष इसमें अपने जीवन और धन की आहुती देते हैं।

आज कल जहाँ जाइये, वहाँ वेश्याओं की दृष्टि होती देख पड़ेगी। इससे अनुमान होता है कि इनके चाहने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। वेश्याओं से चढ़े-चढ़े नगरों का शोभा बढ़ाई जाती है।

हमारे देश में अज्ञानता का सत्राज्य तो है ही। धनी लोग प्रायः लाइ-प्यार के मारे तथा धन के सद में आकर अपने पुत्रों की ब्रह्मचर्य तथा विद्या से विहीन रखते हैं। इसका यह परिणाम होता है कि उनके बालक बाल्यावस्था से ही कुसङ्ग में पड़ कर विचार-भ्रष्ट हो जाते हैं। वे ही कुल दिनों में युवक हो कर, वेश्या लय में जाने लग जाते हैं। वहाँ वेश्यायें भी इनको अपने माया-जाल में फँसाने के लिये सदा तत्पर रहती हैं। जो युवक एक बार भी इनके संसर्ग में पड़ा, वह जीवन पर्यन्त छूट नहीं सकता। इनके समागम से गर्मी, सुजाक, पथरी, राजयहमा और प्राण-नाशक भयङ्कर रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इनके संसर्ग से घर की स्त्री को भी इनके रोग लग जाते हैं। यदि सन्तान हुई, तो वह भी अत्यन्त विकारों युक्त होकर इनके कुकर्मों का फल भोगती है। इन वेश्याओं के कारण अनेक बेरा नष्ट हो गये।

वेश्याओं के प्रचार का एक कारण वनका नृत्य भी है। हमारे बहुत से अज्ञानी भाई इनके नृत्य के विना विवाह या किसी प्रकार के उत्सव को अच्छा ही समझते हैं। इनके हावभाव तथा कटाक्ष पर कितने ही अच्छे पुरुष मोहित होकर भ्रष्ट होते हैं। इनके

प्रसन्नचर्य-विज्ञान

२८१

सुसज्जीकरण पर सुगंध होकर बहुत सी स्त्रियाँ भी दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाती हैं ।

अब हम वेश्याओं से होने वाली कुछ हानियों को नीचे देते हैं-

( १ ) वेश्या-गमन से पुरुष महा पातकी हो जाता है ।

( २ ) वेश्यागामी का अन्तःकरण इतना मलिन हो जाता कि वह अपने कुटुम्ब की स्त्रियों पर भी कुट्टि डाल देता है ।

( ३ ) वेश्यागमन से निश्चय ही भयङ्कर रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।

( ४ ) वेश्यागामी पुरुष कभी-कभी नर-हत्या या आत्म-हत्या भी कर बैठता है ।

( ५ ) वेश्यागामी का कुल कभी उन्नत नहीं हो सकता उसकी सम्पात्ति, कीर्ति और धर्म का नाश हो जाता है ।

(४) पर-स्त्री-गमन

नहीदधमनायुष्मं, लोके किञ्चन दृश्यते ।

यादृशं पुरुषस्थेह, परदाग्नोप सेवनम् ॥

( मनुस्मृति

इस संसार में पुरुष का आयुर्वैल चीख करने वाला पेर कोई भी कार्य नहीं है, जैसा कि पराई स्त्री के साथ रमण करना है हमारे समाज में कुछ ऐसे भी पुरुष हैं, जो प्रत्यक्ष रूप में वेश्याओं की तो निन्दा करते हैं, पर उनके विचार में पर-स्त्री-गमन बुरा नहीं है । कारण इसका यह बताते हैं कि वेश्याओं से रोग व उत्पत्ति होती है, पर गृहस्थ स्त्रियों से ऐसी सम्भावना नहीं ।

२८५

वीर्य-नाश के प्रधान कारण

हमारे मत से वेरया-गमन पर-स्त्री-गमन में विशेष अन्तर नहीं। जो अपनी स्त्री से भिन्न है, वही पर-स्त्री कही जाती है। ऊपर की महामति मनु की सम्मति से विदित होता है कि पर-स्त्री-गमन बहुत ही दुष्ट है। वात्सव में ऐसा ही है। पर-स्त्री-गामी पुरुष निर्बल, निस्सन्तान, दुष्ट, गुप्त पापी, हठी, क्रूर, अल्पानु और महानिन्दित हो जाता है। पर स्त्री के प्रेम में रत रहने वाला अपनी पत्नी को कभी तुष्ट नहीं कर सकता। जो पति अपनी विवाहिता स्त्री पर ससृचित प्रेम नहीं रखता, उसकी स्त्री भी पर-पुरुष से मिल जाती है। इस प्रकार स्त्रियों का पातिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। और पुरुष भी अपने परमोत्तम एक पत्नी-वृष का नाश कर देता है। पर-स्त्री-गामी पुरुष अन्त में वेरयागामी भी हो जाता है। पुरुष हो या स्त्री, जिसका सदाचार दूष्ट जाता है, उसका मन फिर सधत्ता कठिन होता है। अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि ऊपर कहे गये दोनों दोषों से भी हमारी जाति का वीर्य, तेज, धर्म तथा धन नष्ट हो रहा है।

अब हम पर-स्त्री-गमन से होने वाली कुछ हानियों का वर्णन करते हैं:—

  1. (१) पर-स्त्री-गामी की स्त्री कर्कशा और दुष्टा हो जाती है।
  2. (२) पर-स्त्री-गामी के घर में कभी शान्ति नहीं रहती।
  3. (३) उसका रहस्य खुलने पर संसार में चोर निन्दा होती है।
  4. (४) उन्नत पुरुष भी पर-स्त्री के प्रेम से दिन पर दिन ध्वनित हो जाता है।
  5. (५) उसके चरित्र पर कभी अपनी या पर-स्त्री भी विश्वास नहीं करती।

प्रसन्चर्य-विज्ञान

२८६

अतः समाज सुधारकों में हमारी यही विनय है कि यदि आप कुछ वास्तविक सुधार करना चाहते हैं, तो जाति के नव युवकों को वैश्यागमन तथा पर-ख्री-गमन जैसे वीर्य-नाशक कार्यों के रोकने का यथाशक्ति प्रयत्न करें।

(५) अति मैथुन

अति खीसम्प्रयोगाच्छ, रक्षोद्वात्मनमात्मवान् । क्रीड्यामपि मेधावी, हितार्थो परिचञ्चेयत् ।

( वैष्णव )

सावधान मनुष्य को उचित है कि अत्यन्त ख्री-प्रसङ्ग से अपने को बचाये रहे। अपना भला चाहने वाला बुद्धिमान् पुरुष क्रीड़ा ( ख्री-विहार ) में भी अति प्रसंग ( अत्यन्त वीर्य-पात ) को त्याग दे।

बहुत से लोग ऐसे हैं, जो नैश्य-गमन और पर-स्त्री-गमन को ठुरा समझते हैं, पर अपनी स्त्री के साथ अति मैथुन को ठुरा नहीं समझते। उनकी धारणा है कि अपनी स्त्री के साथ विशेष-रमण करना पाप नहीं। वह तो इसी लिये है ही। ऐसे विचार वालों से हमारा नश्र निवेदन है कि अति मैथुन सर्वथा निन्दित है। वह भी एक प्रकार का व्यभिचार है। असमय में वीर्य-पात से कुछ लाभ नहीं होता, प्रत्युत ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है। वीर्य से ही बालक की उत्पत्ति होती है। हम पहले कह भी चुके हैं कि वीर्य में असंख्य कीट रहते हैं। अति मैथुन से उन सबों का दूषा नाश होता है। इसी कारण से वैष्णव-शास्त्र में अति मैथुनः

२८७

वीर्य नाश के प्रधान कारण

का निषेध किया गया है। अब हम अति मैथुन से होने वाले कई रोगों का वर्णन करते हैं:—

शूल कास्त ज्वर श्वलित, क शर्य पादुषामयद्वयः।

श्रुति व्यवथायाञ्जायन्ते, रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥

अति मैथुन ( श्त्री-प्रसङ्ग ) से शूल, खाँसी, ज्वर, खास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय तथा आक्षेप आदि ( वातन्याधि ) रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

(६) अनैसर्गिक मैथुन

श्त्री-प्रसङ्ग सृष्टि-विधान के अनुकूल माना गया है। प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध अन्य उपायों द्वारा वीर्य-पात करने का नाम “अनैसर्गिक मैथुन” है। अज्ञान के कारण आजकल हमारे देश में कई प्रकार के कुमैथुनों का प्रचार हो गया है। इनमें पड़ कर जन-समूह का बड़ा भारी अहित हो रहा है।

कई अनैसर्गिक मैथुनों में से हम दी के नाम यहाँ देते हैं। एक का नाम गुदा-मैथुन और दूसरे का नाम हस्त-मैथुन है। हमारी आर्य-जाति में ये दोनों पहले नहीं थे। यदि प्राचीन काल में ये रहे होते, तो कुछ न कुछ चरलेख तो अवश्य मिलता। पर ऐसा कहीं भी नहीं देखने में आया।

एक ऐतिहासिक का कहना है कि इन दोनों मैथुनों के जन्म-दाता पाश्चात्य देश हैं। पहले पहल विदेशों में ही इनका प्रचार हुआ। फिर क्रमशः जो जो जातियों सक्षम-समय पर भारत में घुसी-उन्होंने के साथ इनका यहाँ भी प्रचार हो गया।

गृहस्थ-विज्ञान

२८८

“गुदा-मैथुन” बालकों के साथ दुर्जयवहार करने को कहते हैं। यह दूषण विधार्थियों और अविवाहित पुरुषों में बहुत फैल रहा है। इसके कारण पुरुष बल-रहित हो जाता है। सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति मारी जाती है। इन्द्रिय में उत्तेजना नहीं रहती। गुदा-मैथुनी पुरुष को स्वप्न-दोष, प्रमेह, शूल, संयमहर्षी, कौष्ठबन्धता, मन्दाग्नि, उरःक्षत और उपवर्द्ध जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। वह पुरुष थोड़े ही दिन में नाना प्रकार के रोगों का कोष बन कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर देता है।

डाक्टर हिल साहब कहते हैं:—“हस्त-मैथुन वह जबरदस्त कुल्हाड़ा है जिसे आशानी युवक अपने ही हाथों अपने पैरों में मारता है और चेत तब होता है, जब कि हृदय, मस्तिष्क, आमाशय और मूत्राशय निर्बल होकर, स्वरमदोष, शीघ्रपतन, प्रमेह आदि कुछ रोग आ घेरते हैं और जननेन्द्रिय छोटी देही और निर्बल होकर ग्रहस्थ धर्म के सर्वथा अयोग्य हो जाती है।”

“हस्त-मैथुन” उस कुकर्म का नाम है, जो हाथ के द्वारा वीर्य-स्खलन का कारण होता है। इस दुर्जयसन का प्रचार नवयुवक विधार्थी तथा अविवाहित पुरुषों में विरोधतर हो रहा है। इस कुकृत्य के कारण बहुत से लोगों का सर्वनाश तक हो जाता है। जो इसमें पड़ जाता है, वह मर कर ही इससे छूटता है। हमने कई सद्वैधों के सूचीपत्रों में इस बुढ़ी क्रिया के करनेवालों के पत्र पढ़े हैं। प्रत्येक पत्र के पढ़ने से धृष्टा, दुःख तथा परम शोक हुआ। ऐसे पुरुष वैधों की शरण में जाते रहते हैं, पर-कुछ भी लाभ नहीं होता। इससे निम्नलिखित रोग उत्पन्न होते हैं:—

मूत्राशय निर्बल हो जाता है—धातु में चीखता आ जाती

२८९

वीर्य नाश के प्रधान कारण

है—टष्टि की कमी, श्रुधा, रुपा, मन्दाग्नि, स्वप्नोप, सूनी, वन्माद, बुद्धि-भ्रंश, च्यव, वरक्षत, कोष्ठ-बद्धता, शिरः पीड़ा तथा मधु मेह जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।

अज्ञानता तथा कुसङ्ग के कारण बालक इस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। प्रारम्भ में तो इससे उन्हें सुख प्रतीत होता है, पर कुछ दिनों में इसके कारण होने वाली हानियाँ भी सूचित हो जाती हैं। यदि उसी समय यह अवगुण छूटा, तब तो कुछ सुधार भी हो जाता है। इससे जो रोग उत्पन्न होते हैं, वे स्थायी होते हैं।

अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि ऊपर कही गयी दो अनैसर्गिक क्रियायें, वीर्य-नाश के लिये पूरी राक्षसी सिद्ध हो चुकी हैं। अतएव हम शिष्टकों, विद्यार्थियों तथा बालकों के संरक्षकों से नम्रनिवेदन करते हैं कि वे पूर्ण रूप से इन दुर्न्यवहारों से होने वाली हानियों का वर्णन कर बालकों को जीवन-दान दें !

(७)—तामस तथा राजस भोजन

“कुभोजनं दुःखकरं न योग्यम्।”

( सृक् )

खुरे भोजन से दुःख प्राप्त होता है, इसलिये अयोग्य है।

सात्विक भोजन के विपरीत आहार का नाम तामस भोजन है। तामसी भोजन से मनुष्य में तमोगुण की वृद्धि होती है। इसीलिये शास्त्रों में इसका निषेध किया गया है।

यह बात सभी लोग जानते हैं कि जैसा आहार किया जाता