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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

ग्रन्थचर्य-विज्ञान

२९२

अब हम भादक द्रव्यों से होने वाली कतिपय हालियों का वर्णन करते हैं:—

भादक द्रव्य के खेलन से बुद्धि नष्ट हो जाती है, हृदय दुर्बल और निस्तेज हो जाता है, शरीर जर्जरित होने लगता है और कुकर्म में मन लगता है। आलस्य, अयुत्साह और क्रोध को बुद्धि होती है। वीर्य-नाश के लिये उत्तेजना मिलती है। भादक द्रव्य का भेमी पुरुष अग्नी, वरिद्र, दोषी, और तथा जुझारी हो जाता है। भादक द्रव्य से सब गुण नष्ट हो जाते हैं। आयु-वैल घट जाता है। इसके खेलन से समाज सदैव दास बना रहता है।

( ९ ) कुशिक्षा और कुसंग

“सङ्कात्संजायते कामः।”

( गीता )

विकारों के उत्पन्न होने वाले विषयों के सहवास से काम की उत्पत्ति होती है।

“कामिनां कामिनीनाञ्च, सङ्गारहामी भ “मुमान्।”

( बुद्धि )

कामी पुरुष या भोगवत्ती स्त्री के साथ रहने वाला भी कामी बन जाता है।

ग्रन्थचर्य के नाश करने वाले कारणों में कुशिक्षा और कुसङ्ग भी है।

आजकल की शिक्षा ऐसी अच्छी नहीं है जो कि बालकों को सच्चे से दूर रख सके। सौ में पचासी बालक निर्बल, दृष्टिहीन, धर्म-भ्रष्ट, अविचारी, गुप्त पापी और प्रमादी हो जाते हैं।

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भोग की तृष्णा

देश में अच्छे पुरुषों का भोग अभाव है। उतरे लोगों के सङ्ग में पड़ कर बालक अपने को नष्ट-ध्वष्ट कर डालते हैं। उनके माता-पिता और गुरु भी उनकी कुसङ्ग से रक्षा नहीं कर सकते। इस लिये सुबोध लोगों का कर्तव्य है कि वे बालक बालिकाओं की दुश्चिन्ता और कुसङ्ग से पूर्ण रूप से रक्षा करें।

५—भोग की तृष्णा

“भोगे रोग-भयम्।”

भोग में रोग होने का भय रहता है।

“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।”

( भर्तृहरि-शतक )

हम भोगों को नहीं भोग सके, प्रत्युत भोगों ने हमें ही नष्ट कर डाला।

इस संसार में मनुष्य वृद्धा विचित्र जीव है। वह ज्ञानवान् होने पर भी अपनी अज्ञानतावश भोगों में अतुरक्त रहता है। वह समझता है कि इसमें सुख है। अपनी तृष्णा को पूरी करने के लिये सर्वत्र लालायित रहता है। वह चाहता है कि इस भोग्य वस्तु को अधिकता से भोगने से मनोवृत्ति की शान्ति होगी, पर इसका विपरीत ही परिणाम होता है। अज्ञान के शिथिल हो जाने पर भी तृष्णा की शान्ति कदापि नहीं होती।

अहं नालितं पलितं सुषुम्नम् । दन्तविहीनं जातं तुषुम्नम् ॥

प्रज्ञाचर्य-विज्ञान

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कर धृत कम्पित शोभित दण्डम् । तदपि न मुञ्चत्याशा भगवद्भम् ॥

( साहसार्थ )

अङ्ग शिथिल पड़ जाते हैं, सिर हिलने लगता है, मुख में दौत नहीं रह जाते और हाथ में लाठी लेकर कौपते हुये चलते हैं । फिर भी पुरुष की एक न एक प्रकार की आशा बनी ही रह जाती है ।

इससे यह बात विदित होती है कि बुद्धता में भी तृष्णा का नाश नहीं होता । अतएव जो पुरुष भोग के भोगने की चेष्टा करता है, वह वास्तव में मृदुता करता है । भोगों के भोगने से आज तक किसी की न इच्छा पूरी हुई, और न हो सकती है । मनुष्य की इच्छायें इतनी चलबती हैं कि वे कभी तुष्ट नहीं होती हैं, वरन् दिन पर दिन बढ़ती जाती हैं ।

प्राचीन समय में यथाति नाम के एक राजा थे । वे किसी शापवशा जुवावस्था में ही बुद्धता को प्राप्त हो गये थे । पर चनकी भोगेच्छा नहीं गई । तब उन्होंने अपने सब लड़कों को बुलाकर पूछा कि हमें कौन अपनी जवानी देगा ?

इस पर सब से छोटे लड़के के अतिरिक्त सभी ने अपने पिता की याचना को अस्वीकार कर दिया । इसलिये यथाति ने बस्ती की अपनी बुद्धता देख कर तरुण ताली और बहुत दिनों तक भोग में लगे रहे । अन्त में उन्होंने इस प्रकार अपने मन के उद्धार प्रकट किये :—

न जातु कामः कामानाजुपभोगेन शाम्यति । द्विषाण् कृष्ण वस्त्रम्, भूय पद्मभिर्वर्धते ॥

२९५

भोग की तुल्या

काम-वासनाओं की शान्ति उनके भोगने से कदापि नहीं होती, बल्कि उनकी वृद्धि होती जाती है। अग्नि में हृष्य पदार्थ के डालते रहने से उसकी ज्वाला बढ़ती ही जाती है। वह कभी घट नहीं सकता।

यत्पृथिव्यां ब्रह्मि यथं, हिरण्यं पशवः स्त्रिवः ।

एकस्यापि न पर्याप्तं, तस्मात्सृष्णां परित्यजेत् ॥

संसार में जितने अन्न, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, एक पुरुष के भोगने के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। इसलिये तृष्णा को छोड़ देना चाहिये।

या दुःस्थया दुर्मतिभिर्नजीर्यति सुजीर्यतः ।

योऽसौ प्राणात्तिकारोगास्तां तृष्णां त्यजेतः सुखी ॥

जो मूर्ख पुरुषों से छोड़ी नहीं जा सकती, जो जीर्ण हो जाने पर भी जीर्ण नहीं होती और जो प्राणों का नाश करने वाली व्याधि है—उस तृष्णा को छोड़ने से ही मनुष्य सुखी हो सकता है।

यह कह कर उन्होंने अपने पुत्र से पुनः दृष्टता ले ली और बहुत प्रकाश से आशीर्वाद दे कर उसे विदा किया।

अब पाठकों को यह इस आख्यायिका से शिक्षा लेनी चाहिये कि विषय-भोग में सुख नहीं। इसमें पड़ना मूर्खता है। इससे जो लोग पशुपत्र की भाँति जल से न्यारे रहते हैं, वे ही सत्पुरुष हैं। वास्तवमें ब्रह्मचर्य ही सुख-शान्ति का देने वाला है, जिसके मनमें इसके प्रति आदर है, वह भोग रूपी दोगोंमें पड़कर अपना जीवन नाष्ट नहीं कर सकता।

मनुष्य-विज्ञान

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६—दुराचार की निन्दा

वज्रोद्विषो यो विषयातुरागी । कावा विमुक्तिं विषये विरक्तिः ॥

(प्रसन्नोदरी)

कौन बंधा हुआ है ? वह, जो विषयों में लीन है। और कौन छूटा हुआ है ? वह जो विषयों से अतिस है।

मनुष्य ज्ञान-प्रधान प्राणी है। उसे कर्मों की नीचता और उच्चता का स्वयं ज्ञान होता है। पर वह अपनी तामसी बुद्धि के कारण ऊपर चढ़ने की अपेक्षा, नीचे जाने में विशेष रुचि रखता है। इसी से वह पतन के गत में गिरता ही जाता है। यदि वह इस दुर्गुण को दवादे, तो वह पापों से मुक्त हो सकता है। वह यह जानता है कि पाप का फल विप के समान होता है, जो दुष्कर्मों को अवश्य मिलता है, पर अध्यानता और प्रमाद-वश उसी ओर बढ़ता है। सत्य कहा गया है:—

“पोत्वा मोहमयी प्रमादमदिरा, सुन्मत्त भूतं जगत्।”

संसार मोहमयी सदिरा को पीकर उन्मत्त हो रहा है।

उन्मत्तता की दशा में मनुष्य की बुद्धि अष्ट हो जाती है। उसे दुरे-भले का ज्ञान नहीं रह जाता। इसी से वह असावधानी करता है, और उससे होने वाले कष्ट फल को चखता है। पर जब उसे स्वयं ज्ञान होता है, तब उसे अपनी करनी पर पश्चा-ताप होता है। वह अपने मन में इस बात की प्रतिष्ठा करता है कि अब मैं मूल कर के भी ऐसे दुष्कर्मों में न फसूंगा। यदि इसी भाँति छूटा रही, तो वह सुधर भी जाता है, पर बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो अपने को इस दुराचार के हाथसे बाहरकर सकते हैं।

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दुराचार-की निन्दा।

दुराचार से बढ़ कर मनुष्य का संसार में दूसरा अहित नहीं ! जो इसका अनुयायी हुआ, उसको अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता है । यह उस राक्षस के समान है, जो जीते जी शरीर के सब रक्त को पी जाता है । यह मनुष्य के भीतर है, पर इसको न दृष्टाते रहने से यह मनुष्य का सर्वनाश कर के ही रहता है । दुराचार आदि में प्रिय और अन्त में अग्रिय होता है । इसीलिये मनुष्य भ्रमवश उसके लोभ में पड़ जाता है ।

देखिये, इस विषय में धर्माचार्य मनु क्या कहते हैं :—

दुराचारोहि पुरुषो, लोके भवति निन्दितः । दुःख-भागौ च सततं, व्यापितोऽहपायुरेव च ॥

दुराचारी मनुष्य संसार में निन्दा का पात्र, सदा दुखी, रोग-भस्त और अत्यायु होता है ।

वास्तव में पाप धीरे-धीरे बढ़ कर दुराचारी को मूल से नष्ट कर देता है । द्वार पर में यहु-वंशियों की सत्ता बहुत बढ़ गई थी । श्री कृष्ण के कारण वे दिन पर दिन उन्नत होते गये, पर जब उनकी शिलाओं का लोप होने लगा, वे लोग दुराचारी हो गये । कहा जाता है कि उनकी संख्या ५६ कोटि थी । उनमें मदिरा, भांस और मेश्रुत के दुर्जन्यसेन घुस गये । फिर ऐसा विमष्ट हुआ कि वे आपस में लड़ कर मर गिटे ।

दुराचारी पुरुष स्वयं अपने क्रूरता का फल भोगता है । भ्रायः सभी सदुग्रन्थों में दुराचार की निन्दा की गई है, और इससे पृथक् रहने का आदेश किया गया है । अतएव जो लोग आत्म-कल्याण चाहते हैं, वे प्रयत्न-पूर्वक दुराचार से पृथक् रहें ।

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मध्यचर्य-विधान

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यदि हृदय में अह्मचर्य के प्रति श्रद्धा है, तो दुःखानार से बँचना कोई कठिन काम नहीं।

७—काम-शमन के उपदेश

शरान्महाशयस्तमोस्ति कोऽषा । मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु ॥

(शंकराचार्य)

शूरों में भी महाशूर कौन है ? वह पुरुष जो कामदेव के वार्यों से न्यथित न हुआ हो।

वास्तव में कामदेव का दीक्षण बाण सहना कठिन काम है। जो उसके वार्यों को खा कर स्थिर चित्त रह जाय, उसे ही महाशूर कहना चाहिये। महाराज भरतहरि कहते हैं:—

मत्तैभक्तुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः।

केचित् प्रमत्त मृगराज-वधेऽपिदद्वाः॥

किन्तु प्रवीणि बलिनां पुरतः प्रसन्नाः।

कन्दर्प-दर्प-दलने विरला भद्रुष्याः॥

मतवाले हाथी के मस्तक को बिदीर्य करने वाले शूर तो संसार में बहुत से हैं—कोई-कोई ऐसे भी हैं, जो क्रोधित सिंह को भी मारने में निपुण हैं, किन्तु मैं बड़े-बड़े चली लोगों के सामने ललकार कर कहता हूँ कि कामदेव के दर्प को चूर्ण करने वाले-थिरले ही पुरुष होते हैं !

यद्यःवात बहुत ही सत्य है। विकारों के नाश करने वाले पुरुषों की संख्या संसार में बहुत कम होती है। पर ऐसी नात

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काम-शमन के उपदेश

नहीं कि है ही नहीं। हमारे विचार से काम-वासनाओं का नाश करना कोई असम्भव बात नहीं। आज तक अनेक ऐसे प्रातःस्मरणीय पुरुष हो गये हैं, जिन्होंने काम-विकारों को अपनी इच्छा के अनुकूल करके उससे लाभ उठाया है।

यह संसार बड़ा विचित्र है। यहाँ कोई वस्तु निर्गुण या निर्दोष नहीं है। विद्वान् पुरुष विष से भी अमृत का काम ले सकता है तथा मूर्ख अमृत को भी दूषित विष कर सकता है। कोई पातक ऐसा नहीं, जिसका प्रायश्चित्त न हो, कोई दोष ऐसा नहीं, जिसकी शान्ति न हो—कोई रोग ऐसा नहीं, जिसकी चिकित्सा न हो, और कोई विकार ऐसा नहीं, जिसको दूर करने का सपाथ न हो !

काम-विकारों के उत्पन्न होने का स्थान हृदय और मस्तिष्क है। यहीं से ये मनत-चिन्तन द्वारा उद्भूत होकर सर्वोच्च में उचो-जना प्रकट करते हैं। जब सारे शरीर में गुप्त रूप से इनका प्रभाव हो जाता है, तब भला लिङ्गन्दिग्य कैसे बँच सकता है ? और इसमें विकार होते ही मैथुन के लिये लोग वाञ्छ्य होते हैं। अन्त में इनका प्रभुत्व बढ़ता ही जाता है, जो किसी न किसी रूप में वीर्य-नाश का प्रधान कारण होता है। हमारा विचार है कि जैसे ही मनी-वृत्तियों में विकार उत्पन्न होने लगे, वैसे ही इसका रोकना श्रेयस्कर है, अतएव हृदय तथा मस्तिष्क को संयमित करने के उपायों से ही इनको अपने हुक्मनों से रोकना जा सकता है।

अब हम काम-विकारों को रोकने के कुछ अत्यन्त उपयोगी और अनुपम नियमों का वर्णन करते हैं। जिस समय मन में विकार चढने लगे, निम्नलिखित क्रियायें अत्यन्त उपयोगी हैं:—

शास्त्रार्थ-विज्ञान

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१—शीतल जल से शिर को तब तक धोते रहना, जब तक चित्त स्थिर न हो जाय ।

२—बूछ्छा से अधिक ठंडा जल पी लेना चाहिये ।

३—किसी खट्टे फल को अनिच्छा होते हुये भी खा लेना हितकर है ।

४—नदी समीप हो, तो उसमें शरीर मल-मल कर खूब स्नान कर लेना ।

५—आधा या पाव कोस तक दौड़ जाना या दानों कानों को खूब मलाना ।

६—१५, २० मिनट तक शीघ्रता से श्वास-प्रश्वास लेना ।

७—रमशान-भूमि को देखना या वहाँ की गति का स्मरण करना ।

८—आश्रयजनक या कीर्तुहल-वर्धक ग्रन्थ पढ़ने लगना ।

९—संसार की असारता और अपने त्वर शरीर से घृणा करना ।

१०—परमेश्वर के ध्यान और स्मरण में लग जाना ।

ऊपर लिखे किसी भी उपाय का यथा विधि अवलम्बन करने से क्राम-विकारों का निश्चयपूर्वक नाश हो सकता है—ये कई सज्जनों के अनुभूत उपाय हैं ।

८—स्वास्थ्य की शिल्पार्थ

प्रसिद्ध डा० डिफोरनेट ने स्वस्थ रहने के सर्वोच्च १० उपाय बतलाये हैं । अमेरिका की कई सभाओं में एक डाक्टर

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स्वास्थ्य को शिखार्ये

सहोदय को पुरस्कार भा इसके कारण मिल चुके हैं। हम उन्हें नहीं देते हैं:—

(१) वायु-सेवन—बहुत सवैरे ठठकर, टहलने को जाना और सब दिन परिश्रम करना।

(२) श्वास-प्रश्वास—पानी और रोटी से जीवनो शक्ति बढ़ती है। नीरोगता के लिये शुद्ध वायु और सूर्य-किरणों की बड़ी आवश्यकता है।

(३) आचार-उदार—धीर्घ जीवन के लिये परिमित आचार और थोड़ा आहार ही सबसे उत्तम है।

(४) शारीरिक स्वच्छता—जैसे स्वच्छ किया हुआ यन्त्र अधिक दिनों तक चलता है, वैसे ही शरीर भी स्वच्छता से नीरोग रहता है।

(५) उचित निद्रा—निद्रा शरीर को फिर से शक्ति प्रदान कर देती है। बहुत पड़े रहने से दुर्बलता आती है।

(६) वस्त्र-व्यवहार—शीत और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिये ऐसे कपड़े हों, जिनसे चलने-फिरने में रुकावट न हो।

(७) रहने का घर—बहुत स्वच्छ और खुला हुआ हो; वायु और प्रकाश के पहुँचने योग्य हो।

(८) नैतिक स्वास्थ्य—आमोद-प्रमोद से मन अवश्य प्रसन्न होता है, पर इसकी अधिकता से शरीर-शुद्ध ईर्ष्या से उत्तेजित होकर, मनुष्य को पाप की ओर ले जाते हैं।

(९) मानसिक श्रवस्था—मन की प्रसन्नता स्वस्थता को बढ़ाती है किन्तु दुःख और विपाद से असमय में दुष्टता प्राप्त होती है।

प्रहारचर्य-विज्ञान

३०२

(१०) परिश्रम—केवल मस्तिष्क-परिश्रम से ही काम नहीं चलता। शारीरिक श्रम करने से ही आहार मिलता और परिपाक होता है।

वयोवृद्ध नेता दादाभाई नौरोजी ८६ वर्ष के होने पर भी हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्न-सुख तथा स्वस्थ रहते थे। एक समाचार-पत्र के ख़ामो के पृष्ठाने पर उन्होंने इसके जो कारण और स्वास्थ्य सम्बन्धी नौ नियम बतलाये, वे भी नीचे दिये जाते हैं:—

मैंने आज तक एक दिन भी सदिया पान नहीं किया। मैंने मांस का स्पर्श तक नहीं किया है। मैंने कभी तम्बाखु नहीं पिया, नहीं खाया और नहीं सूँघा। मैंने कभी भी अधिक मिर्चों का चटपटा भोजन नहीं किया है। मैं वासी भोजन से बँचता आया हूँ। मैं अब तक समीरुण्य के पास नहीं गया अर्थात् क्रोध में भर कर गाली-गलौज या मार-पीट नहीं की। मैंने सदा परिश्रम के साथ अपने और दूसरों के बहुत से काम किये हैं। मैंने प्रत्येक काम नियम से किये हैं।

१—केवल स्थूल शरीर का नीरोग रहना ही सच्चा आरोग्य नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म, दोनों शरीर विकास-रहित होने चाहियें।

२—शरीर, मन और आत्मा—इन तीनों की, जिसमें आगे की वरावर चन्तति होती चली जाय, ऐसा काम करना आरोग्य का सच्चा नियम है।

३—आरोग्य रहने के लिये केवल सुख से खा-पी लेना ही पर्याप्त नहीं है, किन्तु सदगुणों में प्रवृत्ति रखनी चाहिये, जिससे क्ती आयु बढ़े।

४—स्थूल और सूक्ष्म, इन दोनों शरीरों का परस्पर संम्बन्ध है। इन दोनों में एक के बिना दूसरा नहीं ठहर सकता। स्थूल

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स्वास्थ्य की शिर्शायें

को स्थूल और सूक्ष्म का सूक्ष्म भोजन देना चाहिये। नियमित खाना-पीना स्थूल शरीर का, और सदाचार आदि सूक्ष्म का भोजन है।

५—ज्वर, खाँसी, लूथ आदि रोग स्थूल शरीर के, और काम, क्रोध, ईर्ष्या, अ्यात्म्य आदि सूक्ष्म शरीर के रोग हैं।

६—सात्विक भोजन स्थूल शरीर को नीरोग रखता है, और मन को सत्व गुणी बनाता है।

७—तामसी भोजन मन को तमोगुणी बनाता है।

८—परीपकार, दया, चमा, प्रेम, स्वार्थ-त्याग, स्वदेश और जाति-सेवा आदि उत्तम गुण मनुष्य को उन्नत बनाते, और शरीर को नीरोग रख कर आगु बढ़ाते हैं।

९—शारीरिक और मानसिक, दोनों प्रकार का आरोग्य होने पर ही, आनन्द मिलता है; आगु बढ़ती है और प्रसिद्धा प्राप्त होती है।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर एडवर्ड ड्यूई ने सदैव स्वस्थ रहने के लिये निम्नलिखित तीन नियम बतलाये हैं। इनका पालन करने वाला मनुष्य थोड़े ही दिनों में सत्यता की परीक्षा कर सकता है:—

( १ ) स्वच्छ वायु में दहलना और प्राणायाम साधना।

( २ ) स्वाभाविक श्रृंख लगने पर ही चचित मात्रा में भोजन करना।

( ३ ) प्रत्येक कचल को भली भाँति चबा-चबा कर खाना।

सप्तम स्कन्ध

१—ब्रह्म-वन्दना

ॐ तेजोऽस्ति तेजो मयि धेहि, वीर्यं मस्ति वीर्यं मयि धेहि । वल मस्ति वलं मयि धेहि, शोडोऽस्योजो मयि धेहि । मन्त्र्युरस्ति मन्त्र्यु मयि धेहि, सहोऽस्ति सहो मयि धेहि ।

( यजु० श्र० १६ म० ६ )

हे प्रभो ! तुम तेज हो—हमें तेज प्रादान करो ! तुम वीर्य हो हमें वीर्य प्रदान करो ! तुम वल हो—हमें वल प्रदान करो ! तुम शोड हो—हमें शोड प्रदान करो ! तुम आनन्द हो—हमें आनन्द प्रदान करो और तुम पराक्रम हो, अतः हमें पराक्रम प्रदान करो ।

तुम सब प्रकार की योग्यताओं के केन्द्र हो । तुममें संसार की समस्त शक्तियाँ भरी हुई हैं और तुम उनको अधीश्वर हो ! जिसके पास जो वस्तु होती है, वह उसी से माँगने पर प्राप्त होती है, अतएव हम तुमसे याचना करते हैं कि हमें तुम्हारे दिव्य गुण प्राप्त हो ! जिनसे हम अपने ब्रह्मचर्य का पालन कर जनता का हित करें । बिना तुम्हारी कृपा के यह महान्त फलित नहीं हो सकता । हमें पूर्ण आशा है कि स्वच्छ हृदय की प्रार्थना अवश्य स्वीकृत होगी ।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधय

२- वीर्य-रत्ना के सन्निधय

‘वीर्यं रक्षति रक्षितम् !’

( सृष्टि )

जो अपने वीर्य की रक्षा करता है, वह (वीर्य) भी उसका संरक्षण करता है ।

‘वन्धाय विपयासक्तं, मुच्ये निर्लिप्य मनः !’

( सृष्टि )

विपय में आसक्त मन बन्धन और विद्युद्द मन मोक्ष का कारण होता है ।

ब्रह्मचर्य (वीर्य-संरक्षण) का विधिवत् पालन करना अत्यन्त कठिन काम है । साधारण से साधारण नियम का उल्लङ्घन करने से भी यह व्रत टूट जाता है । इसके पालन करने वालों में से बहुत ही थोड़े लोग सफल मनोरथ होते हैं । इसके निर्वह करने में कभी कभी महात्माओं से भी असावधानी हो जाती है । इसी लिये हमारे यहाँ शास्त्रों में बहुत से स्तब्ध और इन्द्रिय-निग्रह सम्बन्धी नियम लिखे गये हैं । यदि उनके काम में लाया जाय, तो ब्रह्मचर्य के पालन करने में अच्छी सहायता मिल सकती है ।

इस देश में दुर्भाग्य-वश ऐसी कुरीतियाँ फैल गई हैं कि उनके कारण सर्वत्र वीर्य का दुर्लभपोग हो रहा है । इस ईश्वरीय अनुपम शक्ति से लोग अपने को शून्य बना रहे हैं । कुछ लोगों को अम सा हो गया है कि वीर्य को रक्षित रखना असम्भव है ! पर ऐसी बात नहीं ! वीर्य का संरक्षण अवश्य किया जा सकता है, और यह प्रत्येक स्त्री-पुरुष का कर्तव्य धर्म है । परमात्मा ने

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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सृष्टि करने और सुख-शान्ति से जीवन विताने के लिये ही मनुष्य का शरीर दिया है। ऐसे बड़े अधिकार को जो खोता है, व कदापि दीर्घजीवी होकर, इस संसार का आनन्द नहीं भोगता।

यह बात प्रायः देखी जाती है कि पशुओं में भी वीर्य-रक्षा व भाव होता है। पक्षियों को भी असमय में वीर्य-नाश करते हुं प्रायः नहीं देखा गया है। पशु-पक्षी सभी संयम से रह कर समाज पर ही केवल सन्तान-वृद्धि के लिये अपने इस स्वाभाविक बल का उपयोग करते हैं। पर मनुष्य-जाति इतने भी गिर हुई है। उसमें भी सम्भ्य और सुशिक्षितों की दशा बहुत ही दुर्लभ है। इनकी अपेक्षा ग्रामीण और वन-पर्वत के रहने वाले स्त्री-पुरुषों में भी वीर्य-रक्षा विरोध रूप से होती है। ये लोग भी काम-चेष्ट में पड़ कर अपने सबन्ध(वीर्य) का अधिकता से क्षय नहीं करते

ऊपर लिखी हुई बातों को ध्यान में रख कर अब हम कुछ ऐसे नुने हुए उच्च सद्गुणों का वर्णन करते हैं, जिनके पालन करते रहने से बहुत अंशों में वीर्य-रक्षा आप ही आप हो सकती है। हमें पूर्ण विश्वास है कि जो स्त्री-पुरुष नियम काये इनको अपनावेगे, वे अवश्य अपने श्रेय (ब्रह्मचर्य) को प्राप्त कर सकेंगे। ये नियम वैज्ञानिक संदर्भ से भरे हुए हैं। इन्हें स्थाय्य और संयम के सिद्धान्त हैं। यही कारण है कि हमारे आर्य ऋषियों ने जहाँ-तहाँ शाकों में इन पर चलने के लिये उपदेश किया है। जो लोग वीर्य-रक्षा से हताश हो गये हैं, या ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हों, वे कुछ संयम के लिये संतत्या की परीक्षा कर देखें। अन्त में हम उन्हें यह भी दृढ़ विश्वास दिलाते

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वीर्य-रक्षा के सत्रियम

हैं कि इन सदुपायों के करने में यदि उनमें कुछ लाभ न हुआ, तो हानि तो किसी प्रकार की हो ही नहीं सकती। विरोध कहना न्यर्थ है !

(१) ब्राह्ममुहूर्त्त-जागरपा

ब्राह्मे मुहूर्त्तं वृष्येत्, धर्माभ्यां चासुचित्तयेत् । कायकृशोश्च तन्मूलान्वेदतत्पार्थ मेव च ॥

( मनुस्मृति )

ब्राह्म मुहूर्त्त में व्रत कर धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिये। अपने शरीर के क्लेशों और उनके कारणों पर विचार करना चाहिये और वैदों के तत्वों का अध्ययन करना चाहिये।

रात के चौथे पहर का नाम ब्राह्ममुहूर्त्त है। बहुत प्राचीन समय से इस समय व्रतने का विधान है। क्योंकि इस समय त्रिविध वायु चलती है, प्रकृति सौम्यता और सुन्दरता से भर जाती है, तथा सर्वत्र शान्ति और प्रसन्नता के दृश्य दिखलाई पड़ते हैं। सूर्योदय से पहले व्रत जाना स्वास्थ्य के लिये बड़ा ही उपयोगी है। इस समय में व्रतने की आज्ञा धर्म-शास्त्र और आयुर्वेद-शास्त्र, दोनों के मत में हितकर माना गया है। इसे देव-बेला भी कहते हैं। दिन रात में यह समय बहुत ही उत्तम होता है। सत्कार्यों के करने के लिये ही ईश्वर ने यह समय बनाया है। इस समय में व्रतने वाला मनुष्य स्वस्थ और सदाचारी बन जाता है। जो लोग इस समय सोते रहते हैं, वे प्रायः अल्पायु, आलसी, दरिद्री, दुरात्मा इती और विषयी होते हैं। इसलिये वीर्य-रक्षा के इन्तुकों को चाहिये कि सदा ब्राह्ममुहूर्त्त में व्रतने का उपयोग करें।

मनुष्य-विज्ञान

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अब हम ब्राह्मसूहर्त में उठने के कुछ लाभों को नीचे लिखते हैं: (१) ब्राह्मसूहर्त में जागने से दुःख तीव्र होती है। (२) मनुष्य रोग रहित और स्वस्थ बनता है। तथा लक्ष्मीबायू और यशस्वी होता है। (३) मन की सद्वृत्तियाँ जागृत होती हैं।

( २ ) उपःपान

सचितुः समुदयकाले, प्रसूती सलिलस्य पिवेदष्टो। रोगजरा परिमुक्तो, जीवेष्टस्वर शतं सायम् ॥

( आशुर्वेद

जो मनुष्य सूर्य के उगने से कुछ पहले आठ अञ्जली जल पीता है, वह रोग और दुःखता से रहित हो कर दो वर्षों से भी अधिक जीता है।

वैद्यक के प्रायः सभी आचार्यों ने उपःपान करने का समय सूर्योदय से पहले ( ब्राह्मसूहर्त ) माना है। इस समय का जल पीना बड़ा लाभदायक होता है। शरीर के सब रोग इससे दूर हो सकते हैं। हमें स्वयं भी इस बात का अनुभव है। अब तक हमने कई रोगियों को उपःपान की विधि से अच्छा किया है। ऊप के श्लोक में आठ अञ्जली जल पीने को लिखा गया है। पर देश, काल तथा बल के अनुसार कम भी कर दिया जा सकता है।

अब हम उपःपान के गुणों को नीचे लिखते हैं:—

  • ( १ ) उपःपान से वीर्यसम्बन्धी कई रोग दूर हो जाते हैं।
  • ( २ ) काम-विकार को शान्ति मिलती है।
  • ( ३ ) और शरीर में बल्यता नहीं बढ़ती।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

( ४ ) मेधा और शक्ति की वृद्धि होती है । ( ५ ) कोष्ण-वृद्धता, अजीर्ण तथा स्तम्भ-दोष आदि राग नहीं होते ।

( ३ ) मल-मूत्र-विमर्जन

मूत्रोच्च्चारसमुत्सर्गः, दिवाकुर्यादुदड्मुखः । दक्षिणामिमुखो रात्रौ, सन्ध्ययोश्च यथादिव॥

( मवृत्स्थिति )

दिन में उत्तर मुख करके तथा रात में दक्षिण मुख करके मल-मूत्र-त्याग करना चाहिये !

वैद्यक-शास्त्र के मत से भी सूर्योदय से पहले मल-मूत्र का त्याग करना उपयोगी है । जहाँ तक हो खुले मैदान वाएकान्त स्थान में बस्ती में कुछ दूर मल-त्याग करना चाहिये; साथ ही दूसरे के किये हुए पर भी न करना चाहिए ।

प्राचीन समय में लोग प्रायः बस्ती से दूर जंगलों में टह्री जाया करते थे । इससे उन्हें छुट्टा वायु-खेवन का भी लाभ हो जाता था । साथ ही बस्ती में गंदगी भी नहीं फैलने पाती थी । पर खेद है कि इस नये फेरान के फेर में पड़ कर लोग प्राचीन और उपयोगी प्रणाली को भूलते जाते हैं !

मल-मूत्र की हाजत होने पर उसे न रोकना चाहिए । क्योंकि ऐसा करने से अनेक व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ।

आलस्य-वश जो लोग इस आवश्यकता को रोकते हैं, वे अपने स्वास्थ्य को खो बैठते हैं । उनके मलाशय और मूत्राशय में विकार

महाचर्य-विज्ञान

३१

सपन्न हो जाते हैं इस से वीर्य तथा अन्य धातुओं की ह्रां होती है ।

‘सर्वेषामेव रोगाणां, निदानं कुरपिता मलाः ।’

( वैद्यक

मल के बिगड़ने से ही प्रायः अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है । ठीक समय से साफ़ पालवाना हो जाने से दिन भर स्फूर्ति, उद्योग शीलता, प्रसन्नता, सुखुद्धि और सदगुणों कं बृद्धि होती है । प्रसाद, अग्नि मन्दता, पीड़ा तथा न्वर आदि रोग नहीं सवाते ।

प्रातःकाल मल-मूत्र त्यागाने वाले का वीर्य शुद्ध और विका से रहित रहता है ।

( ४ ) उपस्थेन्द्रिय की स्वच्छता

‘उपस्थेन्द्रियमेवास्ति, पाप-रोग-प्रदायकम् ।’

( सृष्टि )

गुप्तेन्द्रियों की स्वच्छता से मन को शान्ति प्राप्त होती है, काम-विकारों की सम्भावना नहीं रहती तथा दाह, खुजली, दुर्गन्धि, क्रिभि और खण्डोष आदि से रक्षा होती है । नेत्रों में व्योति, मस्तिष्क में विचार की स्फूर्ति भी बढ़ती है ।

वास्तव में मनुष्य के लिये गुप्त इन्द्रियों को स्वच्छ रखना भी बड़ा हित कर है । इनकी अपवित्रता से भी विचार उत्पन्न हो जाता है । कई प्रकार के इन्द्रिय सम्बन्धी गुप्त रोग भी उत्पन्न

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वीर्य-रत्ना के सलियम

होते हैं। अस्वच्छता के कारण इन्द्रियों में उत्तेजना होने से वीर्य-पात का कारण भी हो सकता है। इसलिये शीघ्र के समय प्रायः दोनों चार गुप्त इन्द्रियों को शुद्ध और ठण्डे जल से धो डालना चाहिये। इस समय के अतिरिक्त जननेन्द्रिय का दूना बहुत ही हानिकारक माना गया है।

वहूत से लोग तो मूत्र-स्थाने के पश्चात् भी अपने गुप्त इन्द्रिय को जल से धो देते हैं। यह प्रणाली भी वहूत अच्छी है। इस में भी वीर्य-रत्ना का तत्व भरा हुआ है।

( ५ ) वायु-सेवन

सुख प्रवातं सेवेत, श्रीषो शरदि चान्तरा । निर्वातमायुषे सेव्यमारोग्यायच सवदा ॥

( वायुवैद )

श्रीष्म और शरद् ऋतु में सुख-पूर्वक वायु-सेवन करना चाहिये। और अन्य ऋतुओं में भी आयु और आरोग्य के लिये कम हवा के स्थान पर घूमना चाहिये।

वैद्यक-शास्त्र में भिन्न-भिन्न दिशा की वायु का भिन्न-भिन्न गुण लिखा गया है। आधिक वायु में घूमना कभी कभी हानिकारक होता है, इसलिये वर्जित है। प्रातःकाल त्रिभिष वायु चलती है, जो स्वास्थ्य के लिये वहूत ही अच्छी मानी गई है।

वहूत से लोग सन्ध्या समय छवियों में टहलने जाते हैं। पर प्रातःकाल का टहलना विशेष उपयोगी होता है। वायु-सेवन न करने वालों का स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं रह सकता। कई दोनों