भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेनायं सगरोऽप्यद्य गुरुगौरवयंत्रितः ।
भवन्निदेशं नात्येति वेलामिव महोदधिः ॥३६
त्वं नः सुहृत्पिता माता लोकानां च गुरुर्विभो ।
तस्मादस्मान्महाभाग परित्रातुं त्वमर्हसि ॥३७
जैमिनिरुवाच-
इति तेषां वचः श्रुत्वा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
शनैर्विलोकयामास शरणं समुपागतान् ॥३८
वृद्धस्त्रीबालभूयिष्ठान्हतशेषान्नृपान्वयान् ।
दृष्ट्वा त्वतप्यद्भगवान्सर्वभूतानुकंपकः ॥३९
चिरं निरूप्य मनसा तान्विलोक्य च सादरम् ।
उज्जीवयञ्छनैर्वाचा मा भैष्टेति महामतिः ॥४०
अथावोचन्महाभागः कृपया परयान्वितः ।
समये स्थापयामास राज्ञस्ताञ्जीविताथिनः ॥४१
भूपव्याकोपदग्धं नृपकुलविहिताशेषधर्मादपेतं
कृत्वा तेषां वसिष्ठः समयमवनिपालप्रतिज्ञानिवृत्त्यै ।
गत्वा तं राजवर्यं स्वयमथ शनकैः सांत्वयित्वा यथावत् ।
सप्राणानामरीणामपगमनविधावभ्यनुज्ञां ययाचे ॥४२

इस कारण से आज भी यह राजा सगर अपने कुलगुरु आपके गौरव से यन्त्रित है। यह कभी भी आपके आदेश का उलंघन अपनी मर्यादा को समुद्र की भाँति नहीं करता है।३६। हे विभो ! हमारे तो इस समय में आप लोगों के गुरु हैं। इसलिए हे महाभाग ! आप ही इससे हमारी रक्षा करने के योग्य होते हैं।३७। जैमिनि ने कहा—ऋषिवर भगवान् वसिष्ठजी ने उनके इस वचन का श्रवण करके शरणागति में समागत उनको धीरे से अवलोकित किया था।३८। उनसे सभी वृद्ध-स्त्री-और बालक बहुत से थे और मरने से बचे-बचाये नृप वंशज थे। ऐसी दुरवस्था में स्थित उन सबको देखा था तो वसिष्ठजी का हृदय करुणाद्र हो गया था क्योंकि यह तो सभी प्राणिमात्र पर अनुकम्पा करने वाले महा पुरुष थे।३९। बहुत काल पर्यन्त उनका निरूपण

सगर प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६६

किया था और मन में बड़ा आदर करके उनका विलोकन किया था । फिर उन महती मति वाले वसिष्ठजी ने उनको उज्जीवित करते हुए धीरे से कहा था—आप लोग डरो मत ।४०। इसके पश्चात् उन महाभाग ने अत्यधिक कृपा से समन्वित होकर कहा था तथा जीवन के चाहने वाले उन समस्त नृपों को समय में (सन्धि करने में) स्थापित कर दिया था ।४१। वसिष्ठजी ने राजा सगर की प्रतिज्ञा की निवृत्ति के लिए ऐसा समय किया था कि वह राजा सगर की क्रोधाग्नि से दग्ध नृप समुदाय नृपों के कुल में किए हुए सम्पूर्ण धर्म से अपेत हो गया था। फिर वे स्वयं ही धीरे से उस नृप श्रेष्ठ सगर के समीप में प्राप्त हुए थे और उनको यथा-रीति सान्त्वना दी थी तथा जीवित शत्रुओं के अपगमन के विधान में उनकी आज्ञा की याचना की थी। अर्थात् वे सभी जीवित ही चले जायें—ऐसी याचना की थी ।४२।

सक्रोधोऽपि महीपतिर्गुरुवचः संभावयस्तानरीन् धर्मस्य स्वकुलोचितस्य च तथा वेषस्य सत्यागतः । श्रौतस्मार्त्तविभिन्नकर्मनिरतान्विप्रैश्च दूरोज्झतान् सासूनकेवलमत्यजन्मृतसमानेकैकशः पार्थिवान् ॥४३

अर्द्धमुण्डाञ्छकांश्चक्रे पल्हवान् श्मश्रुधारिणः । यवनान्विगतश्मश्रूंन्कांबोजांश्चिबुकान्वितान् ॥४४

एवं विरूपानन्यांश्च स चकार नृपान्वयान् । वेदोक्तकर्मनिर्मुक्तान्विप्रैश्च परिवर्जितान् ॥४५

कृत्वा संस्थाप्य समये जीवतस्तान्व्यसर्जयत् । ततस्ते रिपवस्तस्य त्यक्तस्वाचारलक्षणाः ॥४६

व्रात्यतां समनुप्राप्ताः सर्ववर्णविनिंदिताः । धिक्कृताः सततं सर्वे नृशंसा निरपत्रपाः ॥४७

क्रूराश्च संघशो लोके बभूवुर्म्लेच्छजातयः ॥४८

मुक्तास्तेनाथ राज्ञा शकयवनकिरातादयः सद्य एव त्यक्तस्वाचारवेषा गिरिगहनगुहाद्याश्रयाः संवभूवुः । एता अद्यापि सद्भिः सततमवमता जातयोऽसत्प्रवृत्त्या वर्त्तन्ते दुष्टचेष्टा जगति नरपतेः पालयंतः प्रतिज्ञाम् ॥४९

४०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यद्यपि राजा सगर को बहुत अधिक क्रोध हो रहा था तो भी उस नृप ने अपने गुरुदेव की आज्ञा का समादर करते हुए ऐसा स्वीकार कर लिया था वे सब शत्रु तभी जीवित एक-एक छोड़े जा सकते हैं जब कि वे अपने कुल के उचित धर्म और वेष का त्याग कर देवें और श्रोत तथा स्मार्त्त कर्मों से भिन्न कर्मों में निरत रहें और विप्रों के द्वारा दूर ही से त्यागे हुए रहें मृत के ही समान रहे तो रह सकते हैं ॥४३॥ उसमें जो शक जाति वाले थे उनके शिर तो आधे मुण्डित कर दिये गये थे और जो पह्लव थे उनको श्मश्रुधारी करा दिया था। जो यवन थे उनकी श्मश्रुओं को मुँडा दिया गया था और काम्बोज को मुकान्वित करा दिया था ॥४४॥ इस तरह से उस सगर ने अन्यों को विरूप विप्रों के द्वारा परिवर्तित बना दिये गये थे ॥४५॥ ऐसा ही सबको बनाकर समय में (सन्धि में) अर्थात् इस प्रकार की शर्त में बाँधकर संस्थापित करते हुए जीवित ही छोड़ दिया था अर्थात् ऐसे ढंग से ही उनके रहने पर उनका हनन नहीं किया था। इसके अनन्तर उसके वे समस्त शत्रुगण आचार के लक्षणों के परित्याग कर देने वाले हो गए थे ॥४६॥ इस तरह से रहने पर वे सभी व्रात्य हो गये थे और सभी वर्णों के द्वारा विनिन्दित बन गये थे अर्थात् किसी भी वर्ण वाले नहीं रहे थे। सर्वदा उनको धिक्कार दिया जा जाता था—वे बहुत क्रूर हो गये थे तथा एकदम निर्लज्ज भी बन गये थे ॥४७॥ वे सभी अत्यन्त क्रूरों के समुदायों वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हुए थे ॥४८॥ उस समय में जो भी राजा सगर के द्वारा जीवित ही छोड़ दिये गये थे। वे शकयवन और किरात आदि थे वे तुरन्त ही आचार और वेष के त्याग देने वाले हो गये और फिर वे पर्वतों की गुफाओं में आश्रय लेने वाले हो गये थे। ये जातियाँ अब भी सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही नीच मानी जाती हैं क्योंकि बहुत ही बुरी प्रवृत्ति होती है और उनकी चेष्टाएँ भी दुष्ट हैं। ये जगत् में राजा सगर की प्रतिज्ञा का पालन किया करते हैं ॥४६॥

—x—

सगर की दिग्विजय

जैमिनिरुवाच— अथानुज्ञाय सगरो वसिष्ठमृषिसत्तमम् । बलेन महता युक्तो विदर्भानभ्यवर्त्तत ॥१॥

सगर की दिग्विजय ] [ ४०१

ततो विदर्भराट् तस्मै स्वसुतां प्रीतिपूर्वकम् । केशिन्याख्यामनुपमामनुरूपां न्यवेदयत् ॥२॥ स तस्या राजशार्दूलो विधिवद्वहिनसाक्षिकम् । शुभे मुहूर्ते केशिन्याः पाणिं जग्राह भूमिपः ॥३॥ स्थित्वा दिनानि कतिचिद्गृहे तस्यातिसत्कृतः । विदर्भराज्ञा संमंत्र्य ततो गंतुं प्रचक्रमे ॥४॥ अनुज्ञातस्ततस्तेन पारिबर्हैश्च सत्कृतः । निष्क्रम्य तत्पुराद्राजा शूरसेनानुपेयिवान् ॥५॥ संभावितस्ततश्चैव यादवैर्मातृसोदरैः । धनौघैस्तर्पितस्तैश्च मधुराया विनिर्ययौ ॥६॥ एवं स सगरो राजा विजित्य वसुधामिमाम् । करैश्च स नृपान्सर्वाश्चक्रे संकेतगानपि ॥७॥

जैमिनी मुनि ने कहा-इसके अनन्तर नृप सगर ने परम श्रेष्ठ ऋषि वसिष्ठजी की अनुज्ञा प्राप्त करके महान सेना से समन्वित होकर विदर्भ देश पर आक्रमण किया था ।१। फिर विदर्भ के नृप ने अपनी केशिनी नाम वाली पुत्री को बहुत ही प्रीति के साथ उनकी सेवा में समर्पित कर दी थी । यह कन्या रूप लावण्यादि सब गुणों में अनुपम थी और उस नृप के सर्वथा अनुरूप थी ।२। उस राजशार्दूल नृप सगर ने अग्नि को साक्षी करके परम शुभ मुहूर्त में उस का पाणिग्रहण किया था ।३। वहाँ पर ससुराल ही में कुछ दिन तक स्थित रहकर उस विदर्भेश्वर के द्वारा बड़ा सत्कार प्राप्त किया था फिर विदर्भाधि अनुमति पाकर वहाँ से गमन करने का उपक्रम किया था ।४। उस राजा ने भी आज्ञा देदी थी तथा पारिबर्हों के अर्थात् दायों के द्वारा उसका अच्छा सत्कार किया था। फिर वहाँ पुर से राजा ने निकल कर शूरसेन देशों में पहुँचा था ।५। वहाँ पर भी माता के सादरों के द्वारा यादवों से उसका सम्मान किया गया था और बहुत-सा धन देकर उन्होंने भी उसको पूर्ण सन्तुष्ट किया था । इसके पश्चात् वहाँ से निकल कर चल दिया था ।६। मधुरा से चलकर इस रीति से उस राजा सगर ने इस सम्पूर्ण वसुधा पर विजय प्राप्त की थी और समस्त नृपों पर कर लगाकर उनको अपने ही संकेतों पर चलने वाले अनुगामी बना दिया था ।७।

४०२ ] [ कालिका पुराण

ततोऽनुमान्य नृपतीन्निजराज्याय सानुगान् । अनुजज्ञे नरपतिः समस्ताननुयायिनः ॥८ ततो बलेन महता स्कंधावारसमन्वितः । शनैरपीडयन्देशान्स्वराज्यमुपजग्मिवान् ॥६ संभाव्यमानश्च मुहुरुपदाभिरनेकशः । नानाजनपदैस्तूर्णमयोध्यां समुपागमत् ॥१० तदागमनमाज्ञाय नागरः सकलो जनः । नगरीं तामलंचक्रे महोत्सवसमुत्सुकः ॥११ ततः स नगरी सर्वा कृतकौतुकमंगला । सिक्तसंमृष्टभूभागा पूर्णकुम्भशतावृता ॥१२ समुच्छ्रितध्वजशता पताकाभिरलंकृता । सर्वत्रागरुधूपाढ्या विचित्रकुसुमोज्ज्वला ॥१३ सद्रत्नतोरणोत्तुंगगोपुराट्टालभूषिता । प्रसूनलाजवर्षैश्च स्वलंकृतमहापथा ॥१४

इसके उपरान्त उन नृपों को अपने राज्य पर स्थित बने रहने का आदेश देकर तथा सम्मान प्रदान करके कि वे अपने अनुगों के साथ अनुयायी रहें राजा ने प्रस्थान किया था इसके पश्चात् स्कन्धावार से संयुत उसने महान सैन्य के साथ सब देशों को पीड़ित करते हुए अन्त में अपनी ही राजधानी में आकर प्राप्त हो गया था ।८-६। उस राजा का अनेक प्रकार की भेटों से बड़ा सत्कार अनेक जनपदों के द्वारा किया गया था और फिर वह शीघ्र ही अयोध्या में आ गया था ।१०। वहाँ पर समस्त नागरिक जनों को जब ज्ञात हुआ कि राजा अयोध्या में आ गये हैं तो सबने बड़ा महान् उत्सव किया था और बड़ी उत्सुकता के साथ उस अयोध्यापुरी को सजाया था ।११। फिर वह समग्र नगरी माङ्गलिक कौतुकों से समलंकृत हुई थी। उसकी समस्त भूमि पर स्वच्छता हुई थी और छिड़काव किया गया था तथा जहाँ-तहाँ सैकड़ों ही पूर्ण कुम्भ स्थापित किये गये थे ।१२। उसमें सैकड़ों ध्वजाएं फहराई गयी थीं तथा अनेक पताकाओं से वह विभूषित बनायी गयी थी । वहाँ पर सभी अगरु की धूपों की महक हो रही थी एवं

सगर की दिग्विजय ] [ ४०३

नाना भाँति के सुन्दर सुमनों की मालाओं से वह समुज्ज्वल बनायी गयी थीं ।१३। अच्छे-अच्छे रत्नों के द्वारा निर्मित तोरण वन्दनवारें लगायी गयी थी तथा ऊँचे-ऊँचे गोपुर और अट्टालिकाओं से वह परम भूषित थी जो महापथ थे उनमें पुष्पों और लाजाओं की वर्षा की थी जिससे वे बहुत ही सुन्दर एवं सुशोभित हो रहे थे ।१४।

महोत्सवसमायुक्ता प्रतिगेहमभूत्पुरी ।
संपूजिताशेषवास्तुदेवतागृहमालिनी ॥१५
दिक्‌चक्रजयिनो राज्ञः संदर्शनमुदान्वितैः ।
पौरजानपदैर्हृष्टैः सर्वतः समलंकृता ॥१६
ततः प्रकृतयः सर्वे तर्थातः पुरवासिनः ।
वारकांताकदंबैश्च नगरीभिश्च संवृताः ॥१७
अभ्याययुस्ततः सर्वे समेत्य पुरवासिनः ।
स तैः समेत्य नृपतिर्लब्धाशीर्वादसत्क्रियः ॥१८
बधिरीकृतदिक्‌चक्रो जयशब्देन भूरिणा ।
नानावादित्रसंघोषमिश्रेण मधुरेण च ॥१९
सत्कृत्य तान्यथायोगं सहितस्तैर्मुदान्वितैः ।
आनंदयन्प्रजाः सर्वाः प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥२०
वेदघोषैः सुमधुरैर्ब्राह्मणैरभिनन्दितः ।
संस्तूयमानः सुभृशं सूतमागधवंदिभिः ॥२१

उस समय से अयोध्या पुरी में महान् उल्लास छाया हुआ था तथा प्रत्येक घर में महोत्सव मनाया जा रहा था । वहाँ पर सभी गृहों की पंक्तियों में भलीभाँति समस्त वास्तु देवताओं का पूजन किया गया था ।१५। दिग्विजय करने वाले चक्रवर्ती राजा सगर के दर्शन करने के आनन्द से युक्त नागरिक और देशवासी बहुत ही प्रसन्न थे और इनसे सभी ओर वह पुरी समलंकृत थी ।१६। फिर वहाँ पर सभी प्रकृतियाँ तथा अन्तःपुर के निवासी परम प्रसन्न थे और वार कान्ताओं के समुदायों से और नगरियों से संवृत थी । अर्थात् बहुत सी नर्तिका वेश्या से भी एकत्रित थीं ।१७। इसके पश्चात् सभी पुरवासी इकट्ठे होकर वहाँ पर आ गये थे और सबने एकत्रित होकर उस राजा को सत्कृत किया था तथा आशीर्वादों से मुदित किया था ।१८।

४०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उस समय में जयजयकार की समुच्च ध्वनि से सभी दिशाएं बधिर हो गयी थीं अर्थात् जयघोष में कहीं पर भी कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था। वहाँ पर बहुत से प्रकार के वाद्य बज रहे थे उनकी भी ध्वनि बहुत मधुर उसी जयघोष में मिल रही थी ।१९। राजा ने भी उन समस्त स्वागत करने वालों का योग्यता के अनुसार सत्कार किया था जिससे उनको भी परमाधिक हर्ष हो रहा था। इन प्रसन्न पुर वासियों के ही साथ में समस्त प्रजाजनों को आनन्दित करते हुए राजा ने पुर में प्रवेश किया था ।२०। उस समय में ब्राह्मणों ने भी परम मधुर वेद के मन्त्रों की ध्वनि से राजा का अभिनन्दन किया था। तथा सूत-मागध और वन्दियों के द्वारा उस शुभ समागमन के समय में राजा का संस्तवन किया जा रहा था ।२१।

जयशब्दैश्च परितो नानाजनपदेरितैः ।
करतालरचोन्मिश्रवीणावेणुतलस्वनैः ॥२२
गायद्भिर्गायकजनैर्नृत्यद्भिर्गणिकाजनैः ।
अन्वीयमानो विलसच्छ्वेतच्छत्रविराजितः ॥२३
विकीर्यमाणः परितः सहलाजकुसुमोत्करैः ।
पुरीमयोध्यामविशत्स्वपुरोमिव वासवः ॥२४
दृष्टिपूतेन गन्धेन ब्राह्मणानां च वर्त्मना ।
जगाम मध्येनगरं गृहं श्रीमदलंकृतम् ॥२५
अवरुह्य ततो यानाद्भार्याभ्यां सहितो मुदा ।
प्रविवेश गृहं मातुर्हृष्टपुष्टजनायुतम् ॥२६
पर्यंकस्थामुपामग्य मातरं विनयान्वितः ।
तत्पादौ संस्पृशन्मूर्ध्ना प्रणाममकरोत्तदा ॥२७
साभिनन्द्य तमाशीर्भिर्हर्षगद्गदया गिरा ।
ससंभ्रमं समुत्थाय पर्यष्वजत चात्मजम् ॥२८

उस नृपति के दोनों ओर अनेक जनपदों के द्वारा कहे गये जयजयकार का घोष हो रहा था और करताल—की ध्वनि से मिले हुए वीणा और वेणु के मधुर स्वर निकल रहे थे ।२२। राजा के पीछे-पीछे गान करने वाले गान कर रहे थे और गणिकाएं नृत्य करती हुई चली जा रही थीं। राजा के

सगर की दिग्विजय ] [ ४०५

ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था ॥२३॥ राजा के ऊपर लाजा और पुष्पों की वर्षा की जा रही थी । इस रीति से राजा ने अपनी पुरी अयोध्या में महेन्द्र-देव जिस तरह से इन्द्रपुरी में गमन कर रहे हों उसी भांति प्रवेश किया था ॥२४॥ दृष्टिपूत गन्ध से युक्त ब्राह्मणों के मार्ग से नगर के मध्य में जो भी सम्पन्न एवं अलंकृत गृह था उसमें राजा ने गमन किया था ॥२५॥ फिर अपनी दोनों भार्याओं के साथ प्रसन्नता से यान से नीचे उतर कर अपनी माताश्री के घर में राजा ने प्रवेश किया था जहाँ पर सहस्रों परम हृष्ट-पुष्ट जन विद्यमान थे ॥२६॥ उनकी माताजी एक पर्यङ्क पर विराजमान थीं उनके समीप में परम विनय से युक्त होकर उस समय में उनके चरणों का स्पर्श करके माथा टेककर प्रणाम किया था ॥२७॥ माताजी ने भी शुभाशीर्वाद देकर उसका अभिनन्दन किया था और फिर अत्यधिक हर्ष से गद्गद वाणी के द्वारा बड़े ही सम्भ्रम के साथ उठकर अपने परम प्रिय पुत्र को छाती से लगाकर परिष्वन किया था ॥२८॥

सहर्षं बहुधाशीर्भिरभ्यनंदद्शुभे स्नुषे । स तां संभाव्य कथया तत्र स्थित्वा चिरादिव ॥२९॥ अनुज्ञातस्तया राजा निश्चक्राम तदालयात् । ततः सानुचरो राजा श्वेतव्यजनवीजितः ॥३०॥ सुरराज इव श्रीमान्सभां समगमच्छनैः । संप्रविश्य सभां दिव्यामनेकनृपसेविताम् ॥३१॥ नत्वा गुरुजनं सर्वमाशीर्भिश्चाभिनंदितः । सिंहासने शुभे दिव्ये निषसाद नरेश्वरः ॥३२॥ संसेव्यमानश्च नृपैर्नानाजनपदेश्वरैः । नानाविधाः कथाः कुर्वंस्तत्र नृपसत्तमः ॥३३॥ संप्रीयमाणं सुतरामुवास सह बंधुभिः । प्रतिज्ञां पालयित्वैवं जितदिङ्मण्डलो नृपः ॥३४॥ अन्वतिष्ठद्यथान्यायमर्थत्रयमुदारधीः । स्वप्रभावजिताशेषवैरिदिङ्मण्डलाधिपः ॥३५॥

इसके अनन्तर जो परम सुन्दर दो पुत्र वधुएं साथ में ही समुपस्थित हुई थीं उनको भी बहुत आशीर्वादों से माताजी ने अभिनन्दित किया था।

४०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

फिर राजा ने अपनी सब सुन कर कुछ काल पर्यन्त वहाँ पर स्थिति की थी ।२६। फिर माताजी से अनुज्ञा प्राप्त करके राजा उनके घर से बाहिर निकल आये थे और इसके अनन्तर अनुचरों के सहित वहाँ से गमन कर रहे थे और श्वेत व्यजनों के द्वारा सेवकगण उनकी हवा करते जा रहे थे ।३०। देवराज इन्द्र के ही समान श्री सम्पन्न राजा धीरे-धीरे अपनी सभा के मण्डप में समागत हो गये थे । राजा ने अनेक अधीन नृपों से संसेवित परम दिव्य सभा में प्रवेश किया था ।३१। सर्व प्रथम वहाँ पर जो गुरुजन विराजमान थे उनको प्रणाम किया था और उनके द्वारा दिये हुए आशीर्वाद प्राप्त कर अभिनन्दित हुए थे । फिर नरेश्वर ने परम शुभ एवं अतीव दिव्य सिंहासन पर अपनी संस्थिति की थी ।३२। वहाँ पर अनेक जनपदों के स्वामी नृपों के द्वारा वह भली-भाँति सेव्यमान हुए थे और अनेक प्रकार की उस श्रेष्ठ नृप ने वहाँ पर कथालाप किया था ।३३। इस तरह से बन्धुओं के साथ सुतरां परम प्रसन्नता प्राप्त करते हुए वहाँ पर निवास किया था । इस रीति से नृप ने समस्त दिशाओं को जीतकर अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन किया था ।३४। न्याय के अनुसार उस उदार बुद्धि वाले नृप ने तीनों धर्म-अर्थ और काम को प्राप्त किया था । उस राजा का प्रभाव ही ऐसा था कि जिसके द्वारा विविध एवं समस्त दिशाओं के मण्डल के स्वामियों को पराजित कर दिया था ।३५।

एकातपत्रां पृथिवीमन्वशासद्वृषो यथा । स्वर्यातस्य पितुः पूर्वं परिभावममर्षितः ।।३६ स यां प्रतिज्ञामारूढस्तां सम्यक्परिपूर्य च । सप्तद्वीपाब्धिनगरग्रामायतनमालिनीम् ।।३७ जित्वा शत्रूनशेषेण पालयामास मेदिनीम् । एवं गच्छति काले च वसिष्ठो भगवानृषिः ।।३८ अभ्याजगाम तं भूयो द्रष्टुकामो जनेश्वरम् । तमायांतमति क्ष्य मुनिवर्यं ससंभ्रमः ।।३६ प्रत्युज्जगामार्घ्यहस्तः सहितस्तंनृपैनृपः । अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महामतिः ।।४० प्रणाममकरोत्तस्मै गुरुभक्तिसमन्वितमः ।

सगर की दिग्विजय ] [ ४०७

आशीभिर्वर्द्धयित्वा तं वसिष्ठः सगरं तदा ॥४१॥ आस्यतामिति होवाच सह सर्वैर्नरेश्वरैः । उपाविशत्ततो राजा कांचने परमासने ॥४२॥

स्वर्ग में गये हुए पिताजी के पूर्व में परिभव से यह सगर अत्यन्त क्रुद्ध हुए थे और फिर दिग्विजय करके एक छत्र समग्र वसुधा पर इसने अनुशासन किया था। ३६। उसने जिस प्रतिज्ञा को किया था उसको अच्छी तरह परिपूर्ण करके ही छोड़ा था। समस्त शत्रुओं को जीतकर सातों द्वीप और सागर से युक्त नगर-ग्राम और आयतनों की माला मेदिनी का पालन किया था। इस रीति से जब कुछ काल व्यतीत हो गया था तब भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने वहाँ पर पदार्पण किया था। ३७-३८। उस राजा को पुनः देखने की कामना वाले ऋषि वहाँ पर समागत हुए थे। जैसे ही वहाँ पर पदार्पण करते हुए ऋषि का अवलोकन राजा ने किया था वैसे ही सम्भ्रम के साथ राजा ने अपने हाथों में अर्घ-सामग्री ग्रहण कर तुरन्त ही उनका शुभागमन किया था उस समय में उसके साथ अन्य सभी नृप विद्यमान थे। महामति नृप ने अर्घा-पाद्य आदि समग्र उपचारों से भली भाँति उन ऋषि-वर का अर्चन किया था। ३६-४०। गुरुदेव की भक्ति से युक्त होकर उनको प्रणाम किया था। उस समय में वसिष्ठ जी ने भी आशीर्वचनों से सगर का वर्धन किया था। ४१। मुनि ने राजा को आज्ञा दी थी कि आठ बैठ जाइए तब फिर सब नृपों के सहित राजा सुवर्ण निर्मित आसन पर उपविष्ट हो गये थे। ४२।

मुनिना समनुज्ञातः सभार्य सह राजभिः । आगतस्तु नृपश्रेष्ठमुपासीनमुपह्वरे ॥४३॥ उवाच शृण्वतां राज्ञां शनैमृद्वक्षरं वचः । वसिष्ठ उवाच- कुशलं ननु ते राजन्बाह्येष्वाभ्यंतरेषु च ॥४४॥ मंत्रिष्वमात्यवर्गेषु राज्ये वा सकलेऽधुना । दिष्ट्या च विजिताः सर्वे समग्रबलवाहनाः ॥४५॥ अयत्नेनैव युद्धेषु भवता रिपवो हि यत् । दिष्ट्यारूढप्रतिज्ञेन मम मानयता वचः ॥४६॥ अरयस्त्यक्तधर्म्माणस्त्वया जीवविसर्जिताः ।

४०८ ] [ ब्रह्माण्डपुराण

तान्विजित्येतराञ्जेतुं पुनर्दग्विजयच्छयो ॥ ४७ ॥
गतस्सवाहनबलस्त्वेवमित्यश‍ृणवं वचः।
जितदिङ्मण्डलं भूयः श्रुत्वा त्वां नगरस्थितम् ॥ ४८ ॥
प्रीत्याहमागतो द्रष्टुमिदानीं राजसत्तम।
जैमिनिरुवाच—
वसिष्ठनैवमुक्तस्तु सगरस्तालजंघजित् ॥ ४९ ॥

जब मुनिवर ने अपनी आज्ञा प्रदान की थी तो नृप भार्याओं तथा अधीन नृपों के सहित मुनि के ही समीप में नीचे की ओर उपासीन हो गये थे। वहाँ पर समस्त नृपों का समुदाय श्रवण कर रहा था तभी मुनिवर ने धीरे से कोमल कान्त वचन राजा से कहे थे। वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन्! बाहिर-भीतर सर्वत्र कुशल-क्षेम तो है न ? ॥४४॥ समस्त मन्त्रियों में, अमात्यवर्गों में अथवा समग्र राज्य में इस समय कुशल तो है न? यह तो परम हर्ष की बात है कि आपने युद्धों में सेना और वाहनों के सहित सब अपने शत्रुओं को बिना ही किसी प्रयत्न के बहुत ही साधारण कर्मों द्वारा पराजित कर दिया है। मुझे बड़ी प्रसन्नता इसकी है कि अपनी प्रतिज्ञा पर समारूढ़ होते हुए भी आपने मेरे कथित वचनों को मान लिया है ॥४५-४६॥ आपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके उनको समस्त धर्मों का त्याग कर देने वाले बना कर जीवित ही रहने वाले छोड़ दिये हैं। इस रीति से उन सबको जीत कर आप अन्यों को पराजित करने के वास्ते आप दिग्विजय करने की इच्छा से सेना और वाहनों से संयुत होकर गये हैं—यह भी वचन मैंने सुन लिया है। फिर मैंने यह श्रवण किया है कि आप दिग्विजय करके वापिस लौट आये हैं और अपने ही नगर में इस समय समवस्थित हैं ॥४७-४८। हे परम श्रेष्ठ राजन् ! इस वर्तमान काल में प्रीति से ही आपसे मिलने के ही लिये यहाँ पर समागत हुआ हूँ। जैमिनि मुनि ने कहा—महामुनीन्द्र वसिष्ठ जी ने जब इस रीति से कहा था तो तालजङ्घ पर विजय पाने वाले राजा सगर ने उनसे निवेदन किया था ॥४९॥

कृतांजलिपुटो भूत्वा प्रत्युवाच महामुनिम् ।
सगर उवाच—
कुशलं ननु सर्वत्र महर्षे नात्र संशयः ॥ ५० ॥
कल्याणाभिमुखाः सर्वे देवताश्च मुनेऽनिशम् ।
भवान्ध्यायति कल्याणं मनसा यस्य संततम् ॥ ५१ ॥

सगर की दिग्विजय ] [ ४०६

तस्य मे चोपसर्गश्च संभवंतिकथं मुने।
भवताऽनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थश्चाधुना कृतः ॥५२
यन्मां द्रष्टुमिहायातः स्वयमेव भवान्गुरो।
यन्मह्यमाह भगवान्विपक्षविजयादिकम् ॥५३
तत्तथाऽनुष्ठितं किन्तु सर्वं भवदनुग्रहात् ।
भवत्प्रसादतः सर्वं मन्ये प्राप्तं महीक्षिताम् ॥५४
अन्यथा मम का शक्तिः शत्रून्हंतुं तथाविधान् ।
अनल्पी कुरुते फल्यं यन्मे व्यवसितं भवान् ॥५५
फलमल्पमपि प्रीतये स्यादगस्याधिरोपितुः।
जैमिनिरुवाच—
एवं संभावितः सम्यक्सगरेण महामुनिः ॥५६

दोनों हाथों को जोड़कर महामुनि को सगर ने उत्तर दिया था। सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरा सर्वत्र कुशल है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥५०॥ जिस मुझ सेवक का निरन्तर ही आप जैसे महापुरुष कल्याण की कामना का ध्यान रखा करते हैं उस सेवक मेरे प्रति सभी देवगण कल्याणाभिमुख अर्थात् श्रेय करने वाले सदा ही रहा करते हैं ॥५१॥ हे मुने ! ऐसे मुझको उपद्रव कैसे हो सकते हैं। मैं तो आपके परमाधिक अनुग्रह का भाजन हो गया हूँ और अब अपने समस्त कार्यों में सफल भी बना दिया गया हूँ ॥५२॥ हे गुरुदेव ! आप जो स्वयं ही मुझको अपना दर्शन देने के लिए यहाँ पर पधारे हैं और जो आपने विपक्षियों पर विजय आदि प्राप्त करने की बातें मुझसे कही हैं ॥५३॥ यह सभी कुछ वैसा ही किया गया है किन्तु यह सब आपकी ही अनुकम्पा से हुआ है। मैं स्वयं ही इस बात को मानता हूँ कि शत्रु तथा अन्य नृपों पर जो भी मैंने विजय प्राप्त की है—यह सब आपके ही प्रसाद से ही हुआ है ॥५४॥ नहीं तो ऐसे-ऐसे प्रबल शत्रुओं का हनन कर पराजित करने की मेरे जैसे की क्या शक्ति है। जो भी मेरा व्यवसित है उसको सफल आप जैसे महान् पुरुष ही किया करते हैं ॥५५॥ अग अधिरोपिता का अनल्प भी फल प्रीति के लिए ही होता है। जैमिनी मुनि ने कहा—इस रीति से राजा सगर के द्वारा उन महामुनि का समादर किया गया था।

४१० ] | ब्रह्माण्ड पुराण

अभ्यनुज्ञाय तं भूपः प्रजगाम निजाश्रमम् । वसिष्ठे तु गते राजा सगरः प्रीतमानसः ॥५७ अयोध्यायामभवत्सन्प्रशशासाखिलां भुवम् । भार्याभ्यां समुपेताभ्यां रूपशीलगुणादिभिः ॥५८ बुभुजे विषयान्ग्राम्यान्यथाकामं यथासुखम् । सुमतिकेशिनी चोभे विकसद्वदनांबुजे ॥५९ रूपौदार्यगुणोपेते पीनवृत्तपयोधरे । नील कुंचितकेशाढ्ये सर्वाभरणभूषिते ॥६० सर्वलक्षणसंपन्ने नवयौवनगोचरे । प्रिये सन्निहिते तस्य नित्यं प्रियहिते रते ॥६१ स्वाचारभावचेष्टाभिर्जह्रतुस्तुस्तन्मनोऽनिशम् । स चापि भरणोत्कर्ष प्रतीतात्मा महीपतिः ॥६२

फिर वह मुनि नृप सगर से आज्ञा ग्रहण करके अपने आश्रम को चले गये थे। वसिष्ठ मुनि के गमन कर जाने पर राजा के मन में परम हर्ष हुआ था ।५७। वह राजा फिर अयोध्या पुरी अपनी राजधानी में निवास करता था और उसने समस्त भूमण्डल पर प्रशासन किया था। दोनों भार्याओं को भी अपने पास में रखता था जो रूप लावण्य, शील स्वभाव और गुण गण आदि से सुसम्पन्न थीं ।५८। उस राजा सगर ने ग्राम्य विषयों के सुख का पूर्ण अपनी इच्छा के अनुरूप ही उपभोग किया था। सुमति और केशिनी ये दोनों ही विकसित कमल के समान परम सुन्दर मुखों वाली थीं ।५९। सुन्दर स्वरूप के साथ-साथ इन दोनों पत्नियों में विशाल उदारता भी थी। इनके उरोज युग्म परिपुष्ट वृत्ताकार एवं समुन्नत थे। इनके केशपाश नील वर्ण के कुञ्चित अर्थात् छल्लेदार परम सुहावने थे। ये सभी आभरणों से विभूषित रहा करती थीं ।६०। नूतन यौवन के उद्गम में दिखलाई देने वाली नारियों में जो गुण गण हुआ करते हैं। उन सभी से ये दोनों रानियां सुसम्पन्न थीं। ये दोनों बहुत ही प्रिय थीं और सदा राजा के समीप में रहा करती थीं तथा नित्य ही अपने परम प्रिय स्वामी के हित कार्य में रति रखने वाली थीं ।६१। इन दोनों के अपने आचरण राजा के प्रति इतने सुन्दर थे वे अपने हाव-भाव और चेष्टाओं के द्वारा निरन्तर ही राजा के मन को अपनी ओर आकर्षित रखा करती थीं। वह राजा भी उन दोनों के भरण के उत्कर्ष से प्रसन्न मन वाला था ।६२।

सगर की दिग्विजय ] [ ४११

रममाणो यथाकामं सह ताभ्यां पुरेऽवसत् । अन्येषां भुवि राज्ञां तु राजशब्दो न चाप्यभूत् ॥६३ गुणेन चाभवत्तस्य सगरस्य महात्मनः । अल्पोऽपि धर्मः सततं यथा भवति मानसे ॥६४ राज्ञस्तस्यार्थकामौ तु न तथा विपुलावपि । अलुब्धमानसोऽर्थं च भेजे धर्ममपीडयन् ॥६५ तदर्थमेव राजेंद्र कामं चापीडयंस्तयोः ॥६६

वह राजा सगर उन दोनों अपनी परम प्रिय पत्नियों के साथ अपनी इच्छा के अनुसार रमण करता हुआ अपने नगर में निवास किया करता था। इस भूमि में अन्य राजा के लिए राजा—यह शब्द ही नहीं था। राजा का अर्थ होता जो राजित (शोभित) होता है। वह अर्थ इसी में घटित होता है। अन्य अर्थ यह भी है कि यही एक चक्रवर्ती राजा था ।६३। इस राजा में ही ऐसे गुण गण विद्यमान थे कि महान् आत्मा वाले इसके लिए ही राजा शब्द अन्वर्थ होता था। इसके मन ने अल्प भी धर्म निरन्तर रहा करता था ।६४। इस राजा में विशेष अधिक भी अर्थ और काम वैसे नहीं थे जो उसके मन को अधिक समासक्त कर सकें। इतना लुब्धक नहीं था कि अर्थ संग्रह में ही व्यस्त रहे। यह तो धर्म में कुछ भी बाधा न करके ही अर्थ का सेवन किया करता था। इसमें काम वासना भी उतनी ही थी कि हे राजेन्द्र ! जिससे दोनों पत्नियों को सर्वदा आप्यायित करता रहे ।६५-६६।

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॥ सगर का और्वाश्रम में आगमन ॥

जैमिनिरुवाच— एवं स राजा विधिवत्पालयामास मेदिनीम् । सप्तद्वीपवतीं सम्यक्साक्षाद्धर्म इवापरः ॥१ ब्राह्मणादींस्तथा वर्णांन्स्वेस्वे धर्मे पृथक्पृथक् । स्थापयित्वा यथान्यायं ररक्षाव्याहतेन्द्रियः ॥२ प्रजाश्च सर्ववर्णेषु यथाश्रेष्ठानुवर्तिनः । वर्णांश्चैवानुलोम्येन तद्वदर्थेषु च क्रमात् ॥३

४१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

न सति स्थविरे बालं मृत्युरभ्युपगच्छति । सर्ववर्णेषु भूपाले महीं तस्मिन्प्रशासति ॥४ स्फीतान्यपेतबाधानि तदा राष्ट्राणि कृत्स्नशः । तेष्वसंख्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यजनावृताः ॥५ ते चासंख्यगृहग्रामशतोपेता विभागशः । देशाश्चावासभूयिष्ठा नृपे तस्मिन्प्रशासति ॥६ अनाश्रमी द्विजः कश्चिन्न बभूव तदा भुवि । प्रजानां सर्ववर्णेषु प्रारंभाः फलदायिनः ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—उस राजा ने सात द्वीपों वाली मेदिनी का विधि के साथ परिपालन साक्षात् दूसरे मूर्तिमान् धर्म के ही समान किया था ॥१॥ अव्याहत इन्द्रियों वाले उस नृप सगर ने न्यायानुरूप ब्राह्मण आदि चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म में पृथक्-पृथक् स्थापित कर दिया था ॥२॥ सब ही वर्णों में जो भी प्रजाजन थे वे उचित रीति से अपने से श्रेष्ठों के अनुवर्त्तन करने वाले थे। जो वर्ण आनुलोम्य से हुए थे उनकी भी उसी भाँति कार्यों में क्रम से लगा दिया था। उच्च वर्ण वाले से नीचे वर्ण वाली स्त्री में जो समुत्पन्न होते हैं वे अनुलोम सृष्टि वाले होते हैं। इसके विपरीत क्षत्रिय से ब्राह्मणी आदि में समुत्पन्ने विलोम हैं, जिसका शास्त्र में सर्वथा निषेध है ॥३॥ वृद्ध माता-पिता के जीवित रहने पर उस नृप के राज्य में बालक की मृत्यु नहीं हुआ करती थी। यह बात उस महीपति के शासन करने पर सभी वर्णों में हुआ करती थी ॥४॥ उस समय में राष्ट्र पूर्णतया बाधा रहित और स्फीत अर्थात् विस्तृत थे। उन राष्ट्रों में अगणित जनपद थे जिनमें चारों वर्णों के मानव रहा करते थे ॥५॥ उस नृप के प्रशासन करने पर सभी देशों में बहुत अधिक आवास गृह थे तथा विभक्त रूप से संख्या रहित सैकड़ों ही गृह और ग्राम थे ॥६॥ वह ऐसा समय था कि इस भू मण्डल में कोई भी द्विज ऐसा नहीं था जिसका कोई आश्रम न होवे। ब्रह्मचर्य—गार्हस्थ्य—वानप्रस्थ और संन्यास ये चार ही आश्रम थे। सभी वर्णों की प्रजाओं में जो भी आरम्भ होते हैं वे सभी निष्फल न होकर फल देने वाले हुआ करते थे ॥७॥

स्वोचितान्येव कर्माणि प्रारभंत च मानवाः । पुरुषार्थोपपन्नानि कर्माणि च तदा नृणाम् ॥८

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१३

महोत्सवसमुद्युक्ताः पुरग्रामव्रजाकराः । अन्योन्यप्रियकामाश्च राजभक्तिसमन्विताः ॥८ न निन्दितोऽभिशस्तो वा दरिद्रो व्याधितोऽपि वा । प्रजासु कश्चिल्लुब्धो वा कृपणो वापि नाभवेत् ॥९ जनाः परगुणप्रीताः स्वसम्पर्काभिकाङ्क्षिणः । गुरुषु प्रणता नित्यं सविद्याव्यसनेदृताः ॥११ परपवादभीताश्च स्वदाररतयोऽनिशम् । निसर्गतः खलसंसर्गविरता धर्मतत्पराः ॥१२ आस्तिकाः सर्वशोऽभवन् प्रजास्तस्मिन्प्रशासति । एवं सुबाहुतनये स्वप्रतापार्जितां महीम् ॥१३ ऋतवश्च महाभाग यथाकालानुवर्तिनः । शालिभूयिष्ठसस्याढ्या सदैव सकला मही ॥१४

सभी मानव उस शासन में अपने जो भी समुचित कर्म थे उन्हीं का प्रारम्भ किया करते थे। उस काल में मानवों के सभी कर्म पुरुषार्थ से समुत्पन्न हुआ करते थे ।८। नगर-ग्राम-व्रज और आकर सब महोत्सवों से समुद्युक्त थे। उनमें सभी मानव परस्पर में एक दूसरे के प्रिय करने की कामना वाले थे और सबके मनों में अपने राजा के प्रति भक्ति की भावना विद्यमान रहा करती थी ।८। उस समय में प्रजाओं में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखाई पड़ता था कि जो निन्दित-अभिशस्त-दरिद्र-व्याधित लुब्धक अथवा कृपण होते। तात्पर्य यही है कि किसी भी प्रकार से हीनता या खिन्नता आदि नहीं थी ।९। उस काल में सभी जन ऐसे थे जो दूसरों के गुणों को देख या जानकर परम हर्षित हुआ करते थे तथा अपने से सम्पर्क करने की अभिकाङ्क्षा रखा करते थे, सभी मानव सद्विद्या के व्यसन से समाहृत और ज्ञान दाता गुरुजनों में उनकी नित्य ही प्रणत भावना रहा करती थी ।११। सभी जन दूसरों की बुराई से डरा करते थे—सब लोग निरन्तर अपनी ही स्त्री में रति रखने वाले थे अर्थात् पर स्त्री गामिता का नाम भी नहीं था। सबको स्वाभाविक रूप से खलों के संसर्ग से विरक्तता होती है और सभी धर्म में परायण रहा करते थे ।१२। उस धार्मिक नृप के शासन काल में सभी प्रजा सभी ओर आस्तिक अर्थात् परम प्रभु के अस्तित्व को मानने वाले थे। अपने प्रताप से अर्जित मही पर सबाय तनय के शासन में इस प्रकार के सब ऋतुएं हे महाभाग ! ठीक-ठीक समय पर अनुवर्त्तन

४१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

किया करती थीं और सम्पूर्ण भूमि सदा ही शाली और सस्य की बहुलता वाली थी । अर्थात् धान्य परिपूर्ण था ।१३-१४।

बभूव नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यानि शासति ।।१५ यस्याष्टादशमंडलाधिपतिभिः सेवार्थमभ्यागतैः प्रख्यातोरुपराक्रमेनृपशतैर्मूर्द्धाभिषिक्तैः पृथक् । संविष्टैर्मणिविष्टरेषु नितरामध्यास्यमानाऽमरैः शक्रस्येव विराजते दिवि सभा रत्नप्रभोद्भासिता ।।१६ संकेतादपयांतराभ्युपगमाः सर्वेऽपि सोपायनाः कृत्वा सैन्यनिवेशनानि परितः पुर्याः पृथक् पार्थिवाः । द्रष्टुं कांक्षितराजकाः सतनया विज्ञापयंतो मुहु- र्द्वास्थैरेव नरेश्वराय सुचिरं वत्स्यन्तमन्तः पुरं ।।१७ नमन्नरेंद्रमुकुटश्रेणीनामतिघर्षणात । किणीकृतौ विराजते चरणौ तस्य भूभुजः ।।१८ सेवागतनरेंद्रौघविनिकीर्णैः समंततः । रत्नैर्भांति सभा तस्य गुहा सोमे रवी यथा ।।१९ एवं स राजा धर्मेण भानुवंशशिखामणिः । अनन्यशासनामूर्वीमन्वशासदरिंदमः ।।२० इत्थं पालयतः पृथ्वीं सगरस्य महीपतेः । न चापपात मृत पुत्रमुखालोकनजृंभिता ।।२१

जब यह राजशार्दूल इस भूमि पर शासन कर रहा था उस समय में भूमि धान्योत्पत्ति करके सबको सुखी करता था ।१५। उस राजा की सभा रत्नों की प्रभा से उद्भासित स्वर्ग में इन्द्र की सभा के ही समान शोभा दे रही थी जिसमें अठारह मण्डलों की अधिपति राजा की सेवा के लिये समागत हुए विद्यमान थे । इनके अतिरिक्त मूर्द्धाभिषिक्त सैकड़ों ही नृप पृथक् विराजमान थे जिनके विशाल पराक्रम प्रख्यात थे—जिस सभा में मणि मण्डित आसनों पर नृपगण ऐसे ही संस्थित थे जैसे देवगण निरन्तर इन्द्र देवकी सभा में समवस्थित रहा करते हैं ।१६। वे सभी नृप सङ्केत से ही अन्य विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले अपने-अपने उपायनों को साथ में लिये हुए थे और उन पार्थिवों ने उस पुरी के चारों ओर अपनी सेनाओं का पृथक् निवेशन कर दिया था । राजा सगर उस समय में अन्तःपुर में थे तो ये नृप गण अपने पुत्रों के सहित राजा के दर्शन करने की इच्छा वाले थे

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१५

और द्वार पर स्थित द्वारपालों के द्वारा बारम्बार बहुत काल पर्यन्त राजा को विज्ञापन करते हुए स्थित थे ।१७। उस राजा सगर के चरण युग्म समागत नृपों के मस्तक झुकाने से उनके मुकुटों से रत्नों की अतिवृष्टि होने से किणीकृत हो गये थे अर्थात् रत्नों के कण उन पर बिखरे हुए थे जिससे एक अद्भुत शोभा हो रही थी ।१८। नृप की सेवा करने के लिए जो नृपों का समुदाय वहाँ पर समागत हुआ था उनके द्वारा सभी ओर बिखर गये रत्नों से उस सगर की सभा ऐसी शोभित हो रही थी जैसे चन्द्र और सूर्य के प्रकाश में गुहा विभात हुआ करती है ।१९। इस रीति से अरियों का दमन करने वाला सूर्य वंश का शिरोमणि वह नृप धर्म से इस भूमि का जो किसी भी अन्य के शासन में न होकर इसी नृप के प्रशासन में थी शासन किया करता था ।२०। इस प्रकार से पृथ्वी के पालन करने वाले राजा सगर की उत्कंठा अपने एक पुत्र के मुख का अवलोकन करने की हुई थी क्यों कि उसके कोई भी पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ था ।२१।

विना तां दुःखितोऽत्यर्थं चिंतयामास नैकधा ।
अहो कष्टपुत्रोऽहमस्मिन्वंशे ध्रुवं तु यत् ।।२२
प्रयांति नूनमस्माकं पितरः पिंडविप्लवम् ।
निरयादपि सत्पुत्रे संजाते पितरः किल ।।२३
प्रीत्या प्रयांति तद्गेहं जातकर्मक्रियोत्सुकाः ।
महता सुकृतेनापि संप्राप्तस्य दिवं किल ।।२४
अपुत्रस्यामराः स्वर्गे द्वारं नोद्घाटयंति हि ।
पिता तु लोकमुभयोः स्वर्लोकं तत्पितामहाः ।।२५
जेष्यंति किल सत्पुत्रे जाते वंशद्वयेऽपि च ।
अनपत्यतयाऽहं तु पुत्रिणां या भवेद्गतिः ।।२६
न तां प्राप्स्यामि वै नूनं सुदुर्लभतरा हि सा ।
पदादेंद्रात्किलाभिन्नमृद्धं राज्यमखंडितम् ।।२७
मम यत्तदपुण्यस्य याति निष्फलतामिह ।
इदं मत्पूर्वजैरेव सिंहासनमधिष्ठितम् ।।२८

पुत्रोत्पत्ति के बिना वह अत्यधिक दुःखित रहा करता था और अनेक प्रकार से उसने चिन्तन किया था । अहो ! बड़ा ही कष्ट है इस वंश में मैं बिना पुत्र वाला हूँ । यह परम ध्रुव है कि मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ ।२२। निश्चय

४१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ही हमारे पितृगण पिण्डदान के विप्लव को प्राप्त होंगे। यदि सत्पुत्र जन्म ग्रहण कर लेता है तो फिर वे नरक से भी निकल आया करते हैं। वे प्रीति से जातकर्म में समुत्सुक होकर उसके घर में प्रयाण किया करते हैं। यदि कोई महान् पुण्य उन्होंने किया हो तो उसके प्रभाव से वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।२३-२४। किन्तु जिसके पुत्र नहीं होता है वह सुकृत के प्रभाव से स्वर्ग के द्वार तक ही पहुँच पाता है और फिर पुत्रहीन के लिए देवगण स्वर्ग का द्वार नहीं खोला करते हैं और अन्दर प्रवेश नहीं कर पाता है। पिता भी दोनों लोकों में और उसके पितामह स्वर्गलोक को दोनों वंशों में सत्पुत्र के समुत्पन्न होने पर ही जय प्राप्त करेंगे। मैं तो सन्तान हीन होने से पुत्र वालों की जो गति होती है उसको मैं निश्चय ही प्राप्त नहीं करूँगा क्योंकि पुत्रहीन के लिए वह गति अतीव दुर्लभ है। इन्द्र के पद से अभिन्न यह अखण्ड और समृद्ध राज्य भी व्यर्थ ही है। २५-२७। पुण्यहीन मेरा यह सब कुछ यहाँ पर निष्फलता को ही प्राप्त हो रहा है। यह राज्यासन जिस पर मेरे पूर्वज पुरुष विराजमान हुए थे, सब व्यर्थ ही है।२८।

अपुत्रत्वेन राज्यं च पराधीनत्वमेष्यति ।
तस्मादौर्वाश्रममहं मत्ख्यातं मुनिपुङ्गवम् ॥२९॥
प्रसादयिष्ये पुत्रार्थं भार्याभ्यां सहितोऽधुना ।
गत्वा तस्मै स्वपुत्रत्वं विनिवेद्य महात्मने ॥३०॥
स यद्वक्ष्यति तत्सर्वं करिष्ये नात्र संशयः ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा सगरो राजसत्तमः ॥३१॥
इत्येष कृत्यविद्राजन्गन्तुमौर्वाश्रमं प्रति ।
स मन्त्रिप्रवरे राज्यं प्रतिष्ठाप्य ततो वनम् ॥३२॥
प्रययौ रथमारुह्य भार्याभ्यां सहितो मुदा ।
जगाम रथघोषेण मेघनादातिशङ्किभिः ॥३३॥
स्तब्धेक्षणैर्लक्ष्यमाणो मार्गोपान्ते शिखण्डिभिः ।
प्रियाभ्यां दर्शयन्नाजन्सारङ्गांस्तिमितेक्षणान् ॥३४॥
श्रृणमूर्ध्वमुखान्सद्यः पलायनपरान्पुनः ।
वृक्षान्पुष्पफलोपेतान्विलोक्य मुदितोऽभवत् ॥३५॥

जब मेरे कोई पुत्र ही नहीं है तो इस सिंहासन पर भविष्य में कौन बैठेगा। बड़े दुःख का विषय है यह भी आगे किसी दूसरे की ही अधीनता में चला जायेगा। इसलिए मैं अब और्व मुनि के समीप में जाकर उनसे ही

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१७

यह प्रार्थना करूँ ।२६। इस समय में दोनों अपनी पत्नियों के सहित वहाँ पहुँच कर उन महामुनि को प्रसन्न करूँगा । वे महान् आत्मा वाले महापुरुष हैं वहाँ जाकर अपने पुत्र हीनता के विषय में उनसे विशेष निवेदन करना ही उचित है ।३०। वे इसके लिए जो भी कुछ उपाय बतलायेंगे वह सभी मैं करूँगा इसमें तनिक भी संशय नहीं है । नृपश्रेष्ठ सगर ने ऐसा विचार अपने मन में किया था । हे राजन् ! इसलिए कृत्यों के ज्ञाता उस नृप सगर ने और्व महामुनि की सन्निधि में गमन करने का निश्चय कर लिया था । उसने जो परम श्रेष्ठ मन्त्री था उसको राज्य के प्रशासन का भार सौंपकर फिर वन में चल दिया था ।३१-३२। बड़ी प्रसन्नता से अपनी दोनों पत्नियों को साथ में लेकर रथ पर समारूढ़ हो गया था और वहाँ से चल दिया था । जिस समय में उसका रथ चला है उसका ऐसा महान घोष हुआ था कि मयूरों को मेघों की गर्जना की शंका हो गयी थी ।३३। मार्ग के समीप में मयूरों ने एकटक होकर उसको देखा था । राजा भी उन स्तिमित नेत्रों वाले मयूरों की ओर संकेत करके अपनी पत्नियों को उनकी इस तरह से दृष्टि करने को दिखाता जा रहा था ।३४। उन वन्य मयूरों ने एक क्षण तक तो ऊपर की ओर अपने मुख किये थे और फिर वे वहाँ से पलायन करने में तत्पर हो गये थे । राजा भी उस वन में विविध भाँति के पुष्पों से और फलों से लदे हुए वृक्षों को अवलोकित करके अत्यन्त प्रसन्न हुआ था ।३५।

अम्लानकुसुमैः स्वादुफलैः शाद्वलगर्भकैः ।
सुस्निग्धपल्लवच्छायैरभितः सम्भृतं नगैः ।।३६।।
चूताग्रपल्लवास्वादुस्निग्धकंठपिकारवैः ।
श्रोत्राभिरामजनकैस्सधुष्टं सर्वतो दिशम् ।।३७।।
सर्वर्तुकुसुमोपेतं भ्रमद्भ्रमरमण्डितम् ।
प्रसूनस्तवकानम्रवल्लरीवेल्लितद्रुमम् ।।३८।।
कपित्थसमाक्रान्तवनस्पतिशतैरावृतम् ।
उन्मत्तशिखिसारङ्गकूजत्पक्षिगणान्वितम् ।।३९।।
गायद्विद्याधरवधूगीतिकासुमनोहरम् ।
संचरत्किन्नरीद्वन्द्वविराजद्वृक्षगह्वरम् ।।४०।।
हंससारसचक्राव्हकारण्डवशूकादिभिः ।
सुस्वरंरावतोषांतःसरोभिः परिवारितम् ।।४१।।