भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६७

थी ।२६। इसके अनन्तर वह दैत्यराज अपने मन्त्रियों के सहित वहाँ पर आ गया था । उसने वीणा की परम मधुर ध्वनि का श्रवण किया था और फिर उस वराङ्गना को भी देखा था ।२७। उस सुन्दर अंगों वाली को देख कर दूसरी विद्युत् की लेखा के ही समान थी वह मदन नामक माया से परिपूर्ण महान् गत्तं में गिर गया था ।२८।

अथास्य मंत्रिणोऽभूवन्हृदये स्मरतापिताः ॥२६
तेन दैतेयनाथेन चिरं संप्राथिता सती ।
तैश्च संप्राथितास्ताश्च प्रतिशुश्रुवुरंजसा ॥३०
यास्त्वलभ्या महायज्ञैरश्वमेधादिकैरपि ।
ता लब्ध्वा मोहिनीमुख्या निर्वृतिं परमां ययुः ॥३१
विसस्मरुस्तदा वेदांस्तथा देवमुमापतिम् ।
विजहुस्ते तथा यज्ञक्रियाश्चान्याः शुभावहाः ॥३२
अवमानहतश्चासीत्तेषामपि पुरोहितः ।
मुहूर्त मिव तेषां तु ययावब्दायुतं तदा ॥३३
मोहितेष्वथ दैत्येषु सर्वे देवाः सवासवाः ।
विमुक्तोपद्रवा ब्रह्मन्नामोदं परमं ययुः ॥३४
कदाचिदथ देवेंद्रं वीक्ष्य सिंहासने स्थितम् ।
सर्वदेवैः परिवृतं नारदो मुनिराययौ ॥३५

इसके अनन्तर उसके मन्त्रीगण भी उनका स्मरण करने वाले के साथ ही थे ।२६। उस दैत्यों के स्वामी ने बहुत समय तक उस सती से प्रार्थना की थी । उनके द्वारा जब भली भाँति उनसे प्रार्थना की गयी थी तो उन्होंने भी तुरन्त ही प्रति श्रवण किया था ।३०। जो बड़े-बड़े यज्ञों के द्वारा जैसे अश्व मेधादिक यज्ञ हैं इनके द्वारा भी अलभ्य होती हैं उनको जिनमें मोहिनी मुख्य थी प्राप्त करके उनको बहुत ही अधिक आनन्द प्राप्त हुआ था ।३१। फिर तो उन सबने उस समय में भोग विलास के आनन्द में निमग्न होकर वेदों को भुला दिया था और उमापति देव का जो अर्चन था वह भी छोड़ दिया था । यज्ञादिक की जो भी अन्य परम शुभ के देने वाली क्रियाएं थी उनका भी परित्याग कर दिया था ।३२। फिर तो उनके जो

१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पुरोहित थे उनका भी अपमान करके उन्हें छोड़ दिया था। उनके सहस्रों वर्ष एक मुहूर्त्त के ही समान व्यतीत हो गये थे ।३३। उन समस्त दैत्यों के विमोहित हो जाने पर इन्द्रदेव के सहित सब देवगण हे ब्रह्मन् ! विमुक्त उपद्रव वाले होकर परम आनन्द को प्राप्त हो गये थे ।३४। इसके अनन्तर किसी समय में देवेन्द्र को अपने सिंहासन पर विराजमान देखकर जो कि समस्त देवों से घिरा हुआ अवस्थित था नारद मुनि वहाँ पर समागत हो गये थे ।३५।

प्रणम्य मुनिशार्दूलं ज्वलन्तमिव पावकम् ।
कृतांजलिपुटो भूत्वा देवेशो वाक्यमब्रवीत् ॥३६
भगवन्सर्वधर्मज्ञ परापरविदां वर ।
तत्रैव गमनं ते स्याद्यं धन्यं कर्तुमिच्छसि ॥३७
भविष्यच्छोभनाकारं तवागमनकारणम् ।
त्वद्वाक्यामृतमाकर्ण्य श्रवणानंदनिर्भरम् ।
अशेषदुःखान्युत्तीर्य कृतार्थः स्याः मुनीश्वर ॥३८

नारद उवाच-
अथ संमोहितो भंडो दैत्येंद्रो विष्णुमायया ।
तया विमुक्तो लोकांस्त्रीन्दहेताग्निरिवापरः ॥३६
अधिकस्तव तेजोभिरस्त्रैर्मयाबलेन च ।
तस्य तेजोऽपहारस्तु कर्तव्योऽतिबलस्य तु ॥४०
विनाराधनतो देव्याः पराशक्तेस्तु वासव ।
अशक्योऽन्येन तपसा कल्पकोटिशतैरपि ॥४१
पुरैवोदयतः शत्रोराराधयत बालिशाः ।
आराधिता भगवती सा वः श्रेयो विधास्यति ॥४२

जाज्वल्यमान अग्नि के समान परम तेजस्वी मुनि शार्दूल को प्रणाम करके अपने दोनों हाथों को जोड़ कर देवेन्द्र ने यह वाक्य कहा था ।३६। हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञान रखने वाले हैं और आप परावर के ज्ञाताओं में भी परम श्रेष्ठ हैं। आपका गमन तो वहाँ पर हुआ करता है

ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६६

जिसको आप धन्य बनाना चाहते हैं ।३७। आपके शुभ आगमन का कारण भविष्य को परम शुभ बताने वाला होता है। हे मुनीश्वर ! श्रवणों को परमानन्द उपजाने वाले आपके मुख से निःसृत वाक्य को सुनकर मैं समस्त दुःखों को पार करके परम कृतार्थ होऊँगा ।३८। श्री नारदजी ने कहा—दैत्यों का स्वामी भण्ड विष्णु की माया से सम्मोहित हो गया है। उसके द्वारा विमुक्त हुआ वह तीनों लोकों को दूसरी अग्नि के ही समान दहन करता है ।३९। वह तेजों से-अस्त्रों से और मायाके बलसे आपसे भी अधिक है। उस अत्यधिक बलवान् के तेज का अपहरण अवश्य ही करना चाहिए ।४०। हे इन्द्र ! पराशक्ति देवी की आराधना के बिना किसी भी अन्य तप से सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी उसके अति बल का अपहरण नहीं हो सकता है ।४१। हे मूर्खो ! उदीयमान शत्रु के पूर्व में ही आराधना करो अर्थात् शत्रु जैसे ही बढ़ रहा हो उसी समय में पहिले ही आराधना करनी चाहिए। आराधना की हुई वह भगवती तुम्हारा श्रेय कर देगी ।४२।

एवं संबोधितस्तेन शक्रो देवगणेश्वरः ।
तं मुनिं पूजयामास सर्वदेवैः समन्वितः ।
तपसे कृतसन्नाहो ययौ हैमवतं तटम् ॥४३
तत्र भागीरथीतीरे सर्वर्तुं कुसुमोज्ज्वले ।
पराशक्तेर्महापूजां चक्रेऽखिलसुरैः समम् ।
इन्द्रप्रस्थमभून्नाम्ना तदाद्यखिलसिद्धिदम् ॥४४
ब्रह्मात्मजोपदिष्टेन कुर्वतां विधिना पराम् ।
देव्यास्तु महतीं पूजां जपध्यानरतात्मनाम् ॥४५
उग्रे तपसि संस्थानामनन्यार्पितचेतसाम् ।
दशवर्षसहस्राणि दशाहानि च संययुः ॥४६
मोहितानथ तान्दृष्ट्वा भृगुपुत्रो महामतिः ।
भंडासुरं समभ्येत्य निजगाद पुरोहितः ॥४७
त्वामेवाश्रित्य राजेंद्र सदा दानवसत्तमाः ।
निर्भयास्त्रिषु लोकेषु चरंतीच्छाविहारिणः ॥४८

२०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जातिमात्रं हि भवतो हंति सर्वान्सदा हरिः ।
तेनैव निर्मिता माया यया संमोहितो भवान् ॥४६

उस महामुनि के द्वारा इस प्रकार से जब देवगणों के स्वामी को सम्बोधित किया गया था तो उस इन्द्र ने सब देवों के सहित मुनि का पूजन किया था और तपश्चर्या करने के लिये तैयारी करने वाला वह हैमवान् के तट पर चला गया था ।४३। वहाँ पर सब ऋतुओं के कुसुमों से समुज्ज्वल भागीरथी गंगा के तीर पर समस्त सुरगणों के साथ उस इन्द्र ने उस परा शक्ति की महा पूजा की थी । उस समय से ही लेकर अखिल सिद्धियों का प्रदान करने वाला वह स्थल इन्द्रप्रस्थ नाम वाला हो गया था ।४४। ब्रह्माजी के पुत्र नारदजी के द्वारा उपदेश की गयी विधि से जप और ध्यान में निरत आत्मा वालों की उस देवी की महती परा पूजा करने वालों को बहुत समय व्यतीत हो गया था ।४५। वे सभी परम उग्र तप में संस्थित थे तथा अन्य किसी में भी उनका चित्त न लगकर उसी में निरत था । ऐसे उनको करते हुए दश सहस्र वर्ष और दश दिन बीत गये थे ।४६। इधर महामति भृगु के ने उन समस्त दैत्यों को मोहित देखकर वह भण्डासुर के समीप में पहुँचे थे और उससे पुरोहित जी ने कहा था ।४७। हे राजेन्द्र ! आपका ही समाश्रय लेकर सदा ही सब दानव गण निर्भय होकर तीनों लोकों में चरण किया करते हैं और अपनी इच्छा से ही विहार करते हैं ।४८। हरि भगवान् तो आपकी पूर्ण जाति का ही हनन किया करते हैं और सदा सबका विनाश करते हैं । उन्हीं के द्वारा इस माया की रचना की गयी है जिसके द्वारा आप संमोहित हो गये हैं ।४६।

भवंतं मोहितं दृष्ट्वा रंध्रान्वेषणतत्परः ।
भवतां विजयार्थाय करोतींद्रो महत्तपः ॥५०
यदि तुष्टा जगद्धात्री तस्यैव विजयो भवेत् ।
इमां मायामयीं त्यक्त्वा मंत्रिभिः सहितो भवान् ।
गत्वा हैमवतं शैलं परेषां विघ्नमाचर ॥५१
एवमुक्तस्तु गुरुणा हित्वा पर्यंकमुत्तमम् ।
मंत्रिवृद्धानुपाहूय यथावृत्तांतमाह सः ॥५२
तच्छ्रुत्वा नृपतिं प्राह श्रुतवर्मा विमृश्य च ।

ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २०१

षष्टिवर्षसहस्राणां राज्यं तव शिवार्पितम् ॥५३ तस्मादप्यधिकं वीर गतमासीदनेकंशः । अशक्यप्रतिकार्योऽयं यः कालश्शिवचोदितः ॥५४ अशक्यप्रतिकार्योऽयं तदभ्यर्चनतो विना । काले तु भोगः कर्त्तव्यो दुःखस्य च सुखस्य वा ॥५५ अथाह भीमकर्माख्यो नोपेक्ष्योऽरिर्यथाबलम् । क्रियाविघ्ने कृतेऽस्माभिर्विजयस्ते भविष्यति ॥५६

जब आप मोहित हो गये हैं तो ऐसी अवस्था में आपको देखकर छिद्रों की खोज में परायण इन्द्र आपके ऊपर विजय प्राप्त करने के लिये महान् तप कर रहा है ।५०। यदि जगत् की धात्री देवी प्रसन्न हो गयी तो फिर उसी की विजय होगी। इसलिए इस मायामयी को छोड़कर मन्त्रियों के साथ अन्य है मवन्त पर्वत पर जाओ और उन देवों के तप में विघ्न पैदा करो ।५१। श्री गुरुदेव के द्वारा जब इस रीति से कहा गया था तब दैत्येन्द्र ने अपना उत्तम पर्यंक त्याग दिया था और वृद्ध मन्त्रियों को बुलाकर जो भी वृत्त था वह सब कह सुनाया था ।५२। इसका श्रवण करके श्रुतवर्मा ने विचार करके राजा से कहा था। आपका राज्य शासन साठ हजार वर्षों तक ही शिव ने आपको प्रदान किया था ।५३। हे वीर ! अब तो उतने समय से भी अधिक समय व्यतीत हो चुका है और अनेकों वर्ष निकल गये हैं। यह समय तो भगवान् शिव के द्वारा ही दिया गया था। अब इसका कोई भी प्रतीकार नहीं किया जा सकता है ।५४। अब उनके ही अभ्यर्चना के बिना यह राज्य का रहना असम्भव है और इसका कोई भी प्रतिकार नहीं हो सकता है। यह तो काल है इसमें तो सुख और दुःख का भोग करना होगा ।५५। इसके अनन्तर जो भीमकर्मा नाम वाला मन्त्री था उसने कहा— जहाँ तक बल है शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। हम लोगों के द्वारा जब क्रिया का विघ्न किया जायेगा तो ऐसा करने पर आपका ही विजय होगा ।५६।

तव युद्धे महाराज परार्थं बलहारिणी । दत्ता विद्या शिवेनैव तस्मात्ते विजयः सदा ॥५७ अनुमेने च तद्वाक्यं भण्डो दानवनायकः ।

२०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निर्गत्य सह सेनाभिर्ययौ हैमवतं तटम् ॥५८ तपोविघ्नकरान्दृष्ट्वा दानवाञ्जगदंबिका । अलंघ्यमकरोदग्रे महाप्राकारमुज्ज्वलम् ॥५९ तं दृष्ट्वा दानवेंद्रोऽपि किमेतदिति विस्मितः । संक्रुद्धो दानवास्त्रेण बंभजातिबलेन तु ॥६० पुनरेव तदग्रेऽभूदलंघ्यः सर्वदानवैः । वायव्यास्त्रेण तं धीरो वभंज च ननाद च ॥६१ पौनः पुन्येन तद्भस्म प्राभूत्पुनरुपस्थितम् । एतद्दृष्ट्वा तु दैत्येंद्रो विषण्णः स्वपुरं ययौ ॥६२ तां च दृष्ट्वा जगद्धात्रीं दृष्ट्वा प्राकारमुज्ज्वलम् । भयाद्विव्यथिरे देवा विमुक्तसकलक्रियाः ॥६३

हे महाराज ! आपके युद्ध में परों के बल के हरण करने वाली विद्या भगवान् शिव ने ही प्रदान की है इसलिए आपकी सदा ही विजय होगी ।५७। दानवों के नायक भण्ड ने उसके वाक्य को मान लिया था और सेनाओं के साथ वह निकल कर हैमवत के तट पर चला गया था ।५८। जगम्बिका ने तपश्चर्या के अन्दर विघ्न डालने वालों को देखा था उसने आगे उज्ज्वल जो महा प्रकार था उसको न लांघने के योग्य बना दिया था ।५९। उसको देखकर वह दानवेन्द्र भी यह क्या है—इस बात से अत्यधिक विस्मित हो गया था । वह अधिक क्रुद्ध होगया था और उसने दानवास्त्र के द्वारा उसको भंग करना चाहा था ।६०। वह फिर भी उसके आगे गया था किन्तु वह सभी दानवों के द्वारा न लांघने के योग्य हो गया था । और उस धीर ने दानवास्त्र के द्वारा उसका भंग किया था और बड़ी गजना भी की थी ।६१। बारम्बार भी ऐसा करने से वह भस्म फिर समुत्पन्न हो गयी थी और उपस्थित हो गयी थी । यह देखकर वह दानवेन्द्र परम विषाद से युक्त होकर अपने पुर को चला गया था ।६२। देवों ने उस जगत् की धात्री का दर्शन किया था और उस उज्ज्वल प्राकार को भी देखा था । देवगण भय से बहुत ही व्यथित हो गये थे और उन्होंने समस्त क्रियाओं को छोड़ दिया था ।६३।

ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २०३

तानुवाच ततः शक्रो दैत्येन्द्रोऽयमिहागतः ।
अशक्यः समरे योद्धुमस्माभिरखिलैरपि ॥६४
पलायितानामपि नो गतिरन्या न कुत्रचित् ।
कुण्डं योजनविस्तारं सम्यक्कृत्वा तु शोभनम् ॥६५
महायागविधानेन प्रणिधाय हुताशनम् ।
यजामः परमां शक्तिं महामांसैर्वयं सुराः ॥६६
ब्रह्मभूता भविष्यामो भोक्ष्यामो वा त्रिविष्टपम् ।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ॥६७
विधिवज्जुहुवुर्मांसा न्युत्कृत्योत्कृत्य मंत्रतः ।
हुतेषु सर्वांगेषु पादेषु च करेषु च ॥६८
होतुमिच्छत्सु देवेषु कलेवरमशेषतः ।
प्रादुर्बभूव परमन्तेजः पुंजो ह्यनुत्तमः ॥६६
तन्मध्यतः समुद्भूच्चक्राकारमनुत्तमम् ।
तन्मध्ये तु महादेवीमुदयार्कसमप्रभाम् ॥७०

इसके पश्चात् इन्द्र देव ने उन देवगणों से कहा था कि यह दैत्येन्द्र यहाँ पर आ गया है और इसको इन सभी लोग भी जीतने में युद्ध में असमर्थ है ।६४। अगर हम सब लोग यहाँ से भागते भी हैं तो भी हमारी कहीं पर भी अन्य कोई गति नहीं है। एक योजनके विस्तार वाला कुण्ड बनाकर जो बहुत ही अच्छा और सुन्दर हो हम सब यज्ञ का कार्य सम्पन्न करें ।६५। महायाग का जो भी विधान है उसी से हुताशन का प्रणिधान करें। हम सब सुरगण महा मांसो से इस परमा शक्ति का ही इस समय में यजन करें ।६६। हम सब लोग ऐसा करने से ब्रह्मभूत हो जायेंगे अथवा स्वर्ग लोक का भोग करेंगे। इस प्रकार से जब सब देवों से कहा गया था तो इन्द्र ही जिनमें अग्रणी था वे सभी देवगण प्रस्तुत हो गये थे ।६७। फिर उन्होंने मन्त्रों के द्वारा काट-काट कर विधि पूर्वक मांसों से हवन किया था। शरीरों के समस्त मांस का हवन करने पर तथा चरणों और करों का भी होम करने पर जब उन्होंने अपना सम्पूर्ण शरीर ही हवन कर देने की इच्छा की थी तो उसी समय एक परम उत्तम तेज का पुञ्ज प्रादुर्भूत हुआ था ।६८-६६।

२०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उस तेज के पुञ्ज के मध्य से एक चक्र के समान आकार का पदार्थ समुत्पन्न हुआ था और उसके मध्य में समुदित सूर्य के सदृश प्रभा से समन्वित देवी प्रकट हुई थी ।७०।

जगदुज्जीवनकरीं ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ।
सौन्दर्यसारसीमां तामानन्दरससागराम् ॥७१
जपाकुसुमसंकाशां दाडिमीकुसुमांबराम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तां शृङ्गारैकरसालयाम् ॥७२
कृपातरंगितापांगनयनालोककौमुदीम् ।
पाशांकु शेक्षुकोदण्डपंच बाणलसत्कारम् ॥७३
तां विलोक्य महादेवी देवाः सर्वे सवासवाः ।
प्रणेमुर्मुदितात्मानो भूयोभूयोऽखिलात्मिकाम् ॥७४
तया विलोकिताः सद्यस्ते सर्वे विगतज्वराः ।
सम्पूर्णांगा दृढतरा वज्रदेहा महाबलाः ।
तुष्टुवुश्च महादेवीमंबिकामखिलार्थदाम् ॥७५

अब उस महादेवी के स्वरूप का वर्णन किया जाता है—वह देवी इस जगत् के उज्जीवन करने वाली थी और ब्रह्मा—विष्णु और शिव के स्वरूप वाली थी । उसका स्वरूप सौन्दर्य के सार की सीमा ही था । और वह आनन्द के रस का सागर थी ।७१। उसका कलेवर जपा के पुष्पों के सदृश था और उसके वस्त्र दाड़िमी के कुसुमों के समान वर्ण वाले थे । वह सभी आभरणों से भूषित थी तथा शृङ्गार रस का एक स्थल स्वरूप वह थी ।७२। कृपा से तरंगित अपांगों वाले नेत्रों से प्रकाश करने वाली वह कौमुदी थी । उसके करों में पाश-अंकुश-इक्षु-को दण्ड और पांच बाण थे जिससे वह परम सुशोभित थी ।७३। उस महादेवी का दर्शन करके इन्द्र के सहित समस्त देवगणों ने बारम्बार प्रसन्न मनों वाले होकर उस अखिलात्मिका के चरणोंमें प्रणाम किया था ।७४। उसके द्वारा अवलोकित होकर सभी देवगण दुःख रहित हो गये थे । उनके सब अंग पूर्ण हो गये थे और बहुत अधिक सुदृढ़—वज्र के समान देहों वाले तथा महान् बल से सम्पन्न हो गये थे । सब कुछ देने वाली उस अम्बिका महादेवी का उन्होंने स्तवन किया था ।७५।

—X—

ललिता स्तवराज वर्णन ] [ २०५

॥ ललिता स्तवराज वर्णन ॥

देवा ऊचुः- जय देवि जगन्मातर्जय देवि परात्परे ।
जय कल्याणनिलये जय कामकलात्मिके ॥१
जयकारि च वामाक्षि जय कामाक्षि सुन्दरि ।
जयाखिलसुराराध्ये जय कामेशि मानदे ॥२
जय ब्रह्ममये देवि ब्रह्मात्मकरसात्मिके ।
जय नारायणि परे नन्दिताशेषविष्टपे ॥३
जय श्रीकण्ठदयिते जय श्रीललितेम्बिके ।
जय श्रीविजये देवि विजयश्रीसमृद्धिदे ॥४
जातस्य जायमानस्य इष्टापूर्तस्य हेतवे ।
नमस्तस्यै त्रिजगतां पालयित्र्यै परात्परे ॥५
कलामुहूर्तकाष्ठाहर्मासतुंशरदात्मने ।
नमः सहस्रशीर्षायै सहस्रमुखलोचने ॥६
नमः सहस्रहस्ताब्जपादपंकजशोभिते ।
अणोरणुतरे देवि महतोऽपि महीयसि ॥७

देवों ने कहा—हे परसे भी परे ! हे देवि ! आप तो इस समस्त जगत् की माता हैं, आपकी जय हो। आप तो सबके कल्याण करने का स्थल हैं और आप काम कला का स्वरूप वाली है, आपकी जय हो ।१। हे परम सुन्दर नेत्रों वाली ! हे कामाक्षि ! हे सुन्दरि ! आप जय करने वाली हैं । आप समस्त सुरों की आराधन करने के योग्य हैं। हे कामेशि ! आप मान देने वाली हैं आपकी जय हो-जय हो ।२। हे ब्रह्ममये ! हे देवि ! आप तो ब्रह्मात्मक रस के स्वरूप वाली हैं। हे नारायणि ! आप परा हैं जो सम्पूर्ण स्वर्ग वासियों के द्वारा वन्दित हैं ।३। आप श्री कण्ठ (शिव) की दायिता हैं आपकी जय हो। हे श्री ललिताम्बिके ! हे देवि ! आप श्री की विजय तथा श्री की समृद्धि का प्रदान करने वाली है ।४। हे पर से भी परे ! जो जन्म धारण कर चुका है और जन्म लेने वाला है आप उसके इष्टा पूत्त की हेतु

२०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हैं। तीनों जगतों की पालन करने वाली उन आपके लिए हमारा सबका नमस्कार है ।५। कला-काष्ठा-मुहूर्त्त-दिन-मास-ऋतु और वर्षों के स्वरूप वाली आप हैं। सहस्र शीर्ष-मुख और लोचनों वाली आपके लिए हमारा प्रणाम है ।६। आप सहस्र हाथ-चरण कमलों से परम शोभित हैं। आप अणु तथा महान् से भी अधिक महान् से भो अधिक महान् है। हे देवि ! आपके लिए हमारा नमस्कार है ।७।

परात्परतरे मातस्तेजस्तेजीयसामपि । अतलं तु भवेत्पादौ वितलं जानुनी तव ॥८ रसातलं कटीदेशः कुक्षिस्ते धरणी भवेत् । हृदयं तु भुवर्लोकः स्वस्ते मुखमुदाहृतम् ॥९ दृशश्चन्द्रार्कदहना दिशस्ते बाहवोंबिके । मरुतस्तु तवोच्छ्वासा वाचस्ते श्रुतयोऽखिलाः ॥१० क्रीडा ते लोकरचना सखा ते चिन्मयः शिवः । आहारस्ते सदानन्दो वासस्ते हृदये सताम् ॥११ दृश्यादृश्यरूपाणि स्वरूपराणि भुवनानि ते । शिरोरुहा घनास्ते तु तारकाः कुसुमानि ते ॥१२ धर्माद्या बाहवस्ते स्युरधर्माद्यायुधानि ते । यमाश्च नियमाश्चैव करपादरुहास्तथा ॥१३ स्तनौ स्वाहास्वधाकरौ लोकोज्जीवनकारकौ । प्राणायामस्तु ते नासा रसना ते सरस्वती ॥१४

हे माता ! आप पर से भी पर हैं और जो भी तेज धारण करने वाले हैं उनका भी तेज आप ही हैं। यह अतल लोक आपके दोनों चरण हैं और वितल लोक आपके दोनों जानु हैं ।८। रसातल आपका कटिभाग है और यह धरणी आपकी कुक्षि हैं। आपका मुख स्वर्लोक है तथा भुवर्लोक आपका हृदय है ।९। चन्द्र-सूर्य और अग्नि आपके नेत्र हैं। वायु आपके अच्छ्वास हैं और श्रुति (कान) आपकी वाणी है ।१०। यह समस्त लोकों की रचना आपकी क्रीड़ा है और ज्ञान से परिपूर्ण भगवान् शिव ही आपके सखा हैं। सर्वदा आनन्द का रहना ही आपका आहार हैं तथा आपका

ललिता स्तवराज-वर्णन ] [ २०७

निवास स्थल सत्पुरुषों का हृदय है ॥११॥ ये समस्त भुवन ही आपके देखने के योग्य और अदृश्य रूप हैं । ये घन ही आपके केश हैं तथा तारागण आपके केशों में लगे हुए पुष्प हैं ।१२। ये धर्म आदि सब आपकी भुजाएँ हैं और अधर्म आदि सब आपके आयुध हैं । समस्त यम और नियम आपके कर और पाद के ।१३। स्वाहा और स्वधा के आकार वाले ही आपके दो स्तन हैं जो लोकों के उज्ज्‍ीवन करने वाले हैं । प्राणायाम ही आपकी नासिका है तथा सरस्वती देवी ही आपकी रचना है ।१४।

प्रत्याहारस्त्विन्द्रियाणि ध्यानं ते धीस्तु सत्तमा । मनस्ते धारणाशक्तिर्हृदयं ते समाधिकः ॥१५॥ महीरुहास्त्वंगरुहाः प्रभातं वसनं तव । भूतं भव्यं भविष्यच्च नित्यं च तव विग्रहः ॥१६॥ यज्ञरूपा जगद्धात्री विश्वरूपा च पावनी । आदौ या तु दयाभूता ससर्ज निखिलाः प्रजाः ॥१७॥ हृदयस्थापि लोकानामदृश्या मोहनात्मिका ॥१८॥ नामरूपविभागं च या करोति स्वलीलया । तान्यधिष्ठाय तिष्ठन्ती तेष्वसक्तार्थकामदा । नमस्तस्यै महादेव्यै सर्वशक्त्यर्थं नमोनमः ॥१९॥ यदाज्ञया प्रवर्तंते वह्निन्सूर्येन्दुमारुताः । पृथिव्यादीनि भूतानि तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२०॥ या ससर्जादिधातारं सर्गादावादिभूरिदम् । दधार स्वयमेवैका तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२१॥

आपका प्रत्याहार ही इन्द्रियाँ हैं और ध्यान ही परम श्रेष्ठ बुद्धि है । आपकी धारणा शक्ति ही मन है और आपका हृदय समाधिक है ।१५। पर्वत ही आपके अङ्गरुह हैं और प्रभात आपका वसन है । भूत-भव्य-भविष्य और नित्य आपका विग्रह है ।१६। जगत् की धात्री आप यज्ञ स्वरूप वाली हैं और परम पावनी विश्व के रूप वाली हैं । जिसने आदि काल में दया के स्वरूप वाली होकर इन समस्त प्रजाओं का सृजन किया था ।१७। आप सबके हृदयों में स्थित भी रहती हुई मोहन स्वरूप वाली लोकों के लिए

२०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अदृश्य हैं।१८। आप अपने नामों का और रूप का विभाग अपनी ही लीला से किया करती है। आप उनमें अधिष्ठित रहकर ही स्थित रहा करती है और उनमें जो असक्त हैं उनके अर्थ और कामनाओं के प्रदान करने वाली हैं। उन महादेवी के लिए बारम्बार नमस्कार है और सर्वशक्ति को बार-बार प्रणाम है।१९। जिसकी आज्ञा से ही ये अग्नि-सूर्य तथा चन्द्रमा अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त हुआ करते हैं और पृथिवी आदि ये भूत भी कार्यरत रहा करते हैं उस देवी के लिये बारम्बार प्रणाम है।२०। जिसने आदि धाता का सृजन किया था और जिसने सर्ग के आदि काल में आदि भू का रूप धारण किया था तथा इस सबको स्वयं एक ही ने धारण किया था उस देवी के लिए अनेक बार प्रणाम है।२१।

यया धृता तु धरणी ययाकाशममेयया ।
यस्यामुदेति सविता तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२२
यत्रोदेति जगत्कृत्स्नं यत्र तिष्ठति निर्भरम् ।
यत्रांतमेति काले तु तस्यै देव्यै नमोनमः ॥२३
नमोनमस्ते रजसे भवायै नमोनमः सात्त्विकसंस्थितायै ।
नमोनमस्ते तमसे हरायै नमोनमो निर्गुणतः शिवायै ॥२४
नमोनमस्ते जगदेकमात्रे नमोनमस्ते जगदेकपित्रे ।
नमोनमस्तोऽखिलरूपतंत्रे नमोनमस्तोऽखिलयन्त्ररूपे ॥२५
नमोनमो लोकगुरुप्रधाने नमोनमस्तोऽखिलवाग्विभूत्यै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै जगदेकतुष्ट्यै नमोनमः
शांभवि सर्वशक्तये ॥२६
अनादिमध्यांतमपाञ्चभौतिकं ह्यवाङ्मनोगम्यमतर्क्यवैभवम्
अरूपमद्वंद्वमदृष्टिगोचरं प्रभावमग्र्यं कथमंब वर्णये ॥२७
प्रसीद विश्वेश्वरि विश्ववंदिते प्रसीद विद्येश्वरि वेदरूपिण
प्रसीद मायामयि मंत्रविग्रहे प्रसीद सर्वेश्वरि सर्वरूपिणि ॥२८

जिसने इस धरणी को धारण किया है और जिस अमेया ने इस आकाश को धारण किया है जिसमें सविता समुदित होता है उस महादेवी

यह अन्त को प्राप्त हो जाता है उस देवी के लिए बार-बार नमस्कार निवेदित है ।२३। आप रजो रूपा भवा के लिए मेरा नमस्कार है तथा सात्विक संस्थिता के लिए नमस्कार है। तमोरूपहरा आपको नमस्कार है। निर्गुण स्वरूपा शिवा आपको प्रणाम है ।२४। आप इस सम्पूर्ण जगत् की एक ही माता हैं ऐसी आपको बारम्बार नमस्कार है । इस जगत् की आप ही एकमात्र पिता अर्थात् जनक हैं ऐसी आपके लिए अनेक बार नमस्कार हैं। आपका यह सम्पूर्ण स्वरूप तन्त्र है तथा आप अखिल यन्त्र रूपा हैं ऐसी आप की सेवा में अनेकशः हमारा प्रणाम निवेदित है ।२५। आप लोक गृह की प्रधान हैं ऐसी अखिल वाग् की विभूति के लिए हमारा बार-बार प्रणाम है। लक्ष्मी के लिए तथा जगत की एक तुष्टि के लिए हमारा बारम्बार नमस्कार है । हे शाम्भवि ! सर्वशक्ति आपको प्रणाम है ।२६। हे अम्ब ! आपका प्रभाव अत्युत्तम है तथा अनादि मध्यान्त हैं—अपाञ्च भौतिक है—वाणी मन से अगम्य है और अप्रतर्क्य वैभव वाला है । वह रूप तथा द्वन्द्व से रहित है एवं दृष्टिगोचर नहीं है, मैं किस प्रकार से इसका वर्णन करूँ ।२७। हे विश्वेश्वरि ! हे विश्व वन्दिते ! हे वेदों के स्वरूप वाली ! आप प्रसन्न होइये । हे मायामयि ! हे मन्त्रों के विग्रह वाली ! हे सर्वेश्वरि ! हे सर्वरूपिणि ! आप प्रसन्न होइए ।२८।

इति स्तुत्वा महादेवीं देवाः सर्वे सवासवाः ।
भूयोभूयो नमस्कृत्य शरणं जग्मुरञ्जसा ॥२९

ततः प्रसन्ना सा देवी प्रणतं वीक्ष्य वासवम् ।
वरेणाच्छन्दयामास वरदाखिलदेहिनाम् ॥३०

इन्द्र उवाच–
यदि तुष्टासि कल्याणि वरं दैत्येन्द्र पीडितः ।
दुर्धरं जीवितं देहि त्वां गताः शरणार्थिनः ॥३१

श्री देव्युवाच–
अहमेव विनिर्जित्य भंडं दैत्यकुलोद्भवम् ।
आहरात्तव तास्यामि त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥३२

२१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निर्भया मुदिताः सन्तु सर्वे देवगणास्तथा ।
ये स्तोष्यन्ति च मां भक्त्या स्तवेनानेन मानवाः ॥३३
भाजनं ते भविष्यन्ति धर्मश्रीयशसां सदा ।
विद्याविनयसंपन्ना नीरोगा दीर्घजीविनः ॥३४
पुत्रमित्रकलत्राढ्या भवन्तु मदनुग्रहात् ।
इति लब्धवरा देवा देवेन्द्रोऽपि महाबलः ॥३५
आमोदं परमं जग्मुस्तां विलोक्य मुहुर्मुहुः ॥३६

इस प्रकार से बहुत से बहुत लम्बी स्तुति करके इन्द्र के सहित समस्त देवगण महादेवी को बार-बार प्रणाम करके तुरन्त ही जगदम्बा के शरण में चले गये थे ।२६। फिर वह देवी परम प्रसन्न हो गयी थी और उसने इन्द्र को अपने चरणों में प्रणत देखा था। फिर समस्त देहधारियों को वरदान देने वाली देवी ने उसको वरदान देने के लिए कहा था ।३०। इन्द्र ने कहा—हे कल्याणि ! यदि आप मुझ पर सुप्रसन्न हैं तो मैं तो दैत्येन्द्र से पीड़ित हूँ । मुझे यही वरदान देवें कि मेरा दुर्धर जीवित होवे । हम लोग आपकी शरण में समागत हैं ।३१। श्री देवी ने कहा—मैं स्वयं ही दैत्य कुल में समुत्पन्न भण्ड को विनिर्जित करके धरा से लेकर तीनों लोकों को जिसमें सभी चर-अचर है तुझको दे दूँगी ।३२। फिर समस्त देवगण निर्भय और प्रसन्न होंगे और जो मनुष्य सदा ही धर्म-श्री और यश के भाजन होंगे तथा वे नीरोग-विद्या तथा विनय से सम्पन्न और दीर्घ जीवन होंगे ।३४। वे मेरे अनुग्रह से पुत्र-मित्र और कलत्र से सुसम्पन्न होंगे । इस रीति से देवगण और महान बलवान देवेन्द्र भी वर प्राप्त करने वाले होगये थे और बारम्बार उस जगदम्बा का दर्शन करके परमाधिक आनन्द को प्राप्त हो गये थे ।३५-३६।

—X—

॥ मदन कामेश्वर प्रादुर्भाव वर्णन ॥

हयग्रीव उवाच–
एतस्मिन्नेव काले तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
आजगामाथ देवेशीं द्रष्टुकामो महर्षिभिः ॥१

मदन कामेश्वर प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २११

आजगाम ततो विष्णुरासढो विनतासुतम् ।
शिवोऽपि वृषमारूढः समायातोऽखिलेश्वरीम् ॥२
देवर्षयो नारदाद्याः समाजग्मुर्महेश्वरीम् ।
आययुस्तां महादेवीं सर्वे चाप्सरसां गणाः ॥३
विश्वावसुप्रभृतयो गन्धर्वाश्चैव यक्षकाः ।
ब्रह्मणाथ समादिष्टो विश्वकर्मा विशांपतिः ॥४
चकार नगरं दिव्यं यथामरपुरं तथा ।
ततो भगवती दुर्गा सर्वमन्त्राधिदेवता ॥५
विद्याधिदेवता श्यामा समाजग्मतुरंबिकाम् ।
ब्राह्मयाद्या मातरश्चैव स्वस्वभूतगणावृताः ॥६
सिद्धयो ह्यणिमाद्याश्च योगिन्यश्चैव कोटिशः ।
भैरवाः क्षेत्रपालाश्च महाशास्ता गणाग्रणीः ॥७

हयग्रीव ने कहा—इसी समय में लोकों के पितामह—ब्रह्माजी उस देवेशी के दर्शन करने की इच्छा वाले महर्षियों के साथ वहाँ पर समागत हो गये थे । इसके पश्चात् भगवान् विष्णु भी गरुड़ पर समारूढ़ होकर वहाँ पर आ गये थे । भगवान् शिव भी वृष पर सवार होकर अखिलेश्वरी के दर्शनार्थ आ गये थे ।१-२। नारद आदि देवर्षिगण महेश्वरी के समीप में समागत हो गये थे । सभी अप्सराओं के समुदाय भी महादेवी के दर्शनार्थ आ गये थे ।३। विश्वावसु आदि गन्धर्व और यक्ष भी वहाँ पर आये थे । ब्रह्माजी के द्वारा आदेश पाकर विशांपति विश्वकर्मा ने एक दिव्य नगर की रचना की थी जैसा कि साक्षात् अमर पुर ही होवे । इसके पश्चात् सब मन्त्रों की अधिदेवता श्यामा ये सब अम्बिका के समीप में समागत हुए थे । ब्राह्मी आदि समस्त मातृगण अपने-अपने भूतगणों के साथ समावृत होकर वहाँ पर आयीं थीं ।४-६। अणिमा-महिमा आदि आठ सिद्धियाँ और करोड़ों योगिनियों वहाँ पर आ गयी थीं । भैरव और क्षेत्रपाल-महाशास्ता गणों के अग्रणी वहाँ समागत हुए ।७।

महागणेश्वरः स्कन्दो वटुको वीरभद्रकः ।
आगत्य ते महादेवीं तुष्टुवुः प्रणतास्तदा ॥८

२१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्राथ नगरीं रम्यां साट्टप्राकारतोरणाम् ।
गजाश्वरथशालाढ्यां राजवीथिविराजिताम् ॥६
सामंतानाममात्यानां सैनिकानां द्विजन्मनाम् ।
वेतालदासदासीनां गृहाणि रुचिराणि च ॥१०
मध्यं राजगृहं दिव्यं द्वारगोपुरभूषितम् ।
शालाभिर्बहुभिर्युक्तं सभाभिरुपशोभितम् ॥११
सिंहासनसभां चैव नवरत्नमयीं शुभाम् ।
मध्ये सिंहासनं दिव्यं चिंतामणिविनिर्मितम् ॥१२
स्वयं प्रकाशमद्वंद्वमुदयादित्यसंनिभम् ।
विलोक्य चिंतयामास ब्रह्मा लोकपितामहः ॥१३
यस्त्वेतत्समधिष्ठाय वर्तते बालिशोऽपि वा ।
पुरस्यास्य प्रभावेण सर्वलोकाधिको भवेत् ॥१४

महान् गणों के ईश्वर स्वामी कार्त्तिकेय-वटुक-वीरभद्र-इन सबने आकर उस समय में प्रणत होकर महादेवी का स्तवन किया था।८। वहाँ पर जो एक नगरी की थी वह नगरी परमाधिक सुरम्य थी उसमें बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं—प्राकार और विशाल तोरण थे। उसमें गजअश्व और रथ शालाएं थीं। तथा राज वीथियाँ भी विद्यमान थीं। जिनसे वह परम शोभित हो रही थी ।६। उसमें सभी के पृथक्-पृथक् परम सुन्दर गृह बने थे—सामन्तों के—अमात्यों के—सैनिकों के और ब्राह्मणों के एवं वेताल के—दासों के और दासियों के गृह निर्मित थे ।१०। उस नगरी के मध्य में द्वारों और गोपुरों से समन्वित परम दिव्य राजगृह था। जिसमें बहुत सी शालायें और सभाएँ बनी हुई थीं। जिससे वह राजगृह उपशोभित था ।११। उसमें एक सिंहासन सभा थी जो नौ प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण और परम शुभ थी। उसके मध्य में एक दिव्य सिंहासन था जो चिन्ता मणियों के द्वारा ही निर्मित था। जिस मणि के समक्ष में जो चिन्तन किया जावे वही प्राप्त हो जाता है उसी को चिन्तामणि कहा जाता है ।१२। वह सिंहासन स्वयं प्रकाश करने वाला—अद्वन्द्व और उदित सूर्य के समान प्रभा वाला था। लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने जब उसका अवलोकन किया तो वे मन में चिन्तन करने लगे थे ।१३। जो भी कोई चाहे बालिश (महामूर्ख) ही क्यों

मदन कामेश्वर प्रादुर्भाव वर्णन ] [ २१३

न हो, इस पर अधिष्ठित होता है वह इस परम सुरम्यपुर के प्रभाव से सभी लोकों से अधिक होता है ।१४।

न केवला स्त्री राज्यार्हा पुरुषोऽपि तया विना ।
मंगलाचार्यसंयुक्तं महापुरुषलक्षणम् ।
अनुकूलांगनायुक्तमभिषिच्छेदिति श्रुतिः ॥१५॥
विभातीयं वरारोहा मूर्ता शृङ्गारदेवता ।
वरोऽस्यास्त्रिषु लोकेषु न चान्यः शङ्करादृते ॥१६॥
जटिलो मुण्डधारी च विरूपाक्षः कपालभृत् ।
कल्माषी भस्मदिग्धांगः श्मशानास्थिविभूषणः ॥१७॥
अमंगलास्पदं चैनं वरयेत्सा सुमंगला ।
इति चिंतयमानस्य ब्रह्मणोऽग्रे महेश्वरः ॥१८॥
कोटिकन्दर्पलावण्ययुक्तो दिव्यशरीरवान् ।
दिव्यांबरधरः स्रग्वी दिव्यगन्धानुलेपनः ॥१९॥
किरीटहारकेयूरकुण्डलाद्यैरलंकृतः ।
प्रादुर्बभूव पुरतो जगन्मोहनरूपधृक् ॥२०॥
तं कुमारमथालिंग्य ब्रह्मा लोकपितामहः ।
चक्रे कामेश्वरं नाम्ना कमनीयवपुर्धरम् ॥२१॥

केवल स्त्री तो इस राज्य के योग्य नहीं है और केवल पुरुष भी स्त्री से रहित जो हो वह भी इसके योग्य नहीं है । श्रुति का कथन तो यही है कि—मङ्गल मय आचार्य से संयुत और महापुरुषों के लक्षण वाला तथा जो अनुकूल अङ्गना से युक्त हो उसीका राज्यासन पर अभिषेक करना चाहिए ।१५। यह वरारोहा शोभित होती है जो मूर्तिमती शृङ्गार की देवता है । इसका वर भी तीनों लोकों में भगवान् शिव के अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं है ।१६। किन्तु शङ्कर तो जटा जूट धारीमुण्डों की माला धारण करने वाले-विरूप नेत्रों से युक्त और हाथ में कपाल ग्रहण करने वाले हैं वे तो कल्माषी-भस्म से भूषित अङ्गों वाले और श्मशान की अस्थियों के भूषणों वाले हैं ।१७। शिव तो पूर्णतया अमङ्गलों के स्थान हैं । क्या यह सुमङ्गला उनका वरण करेगी यही इस प्रकार से ब्रह्माजी मन में विचार कर रहे थे

२१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कि उसी समय में ब्रह्माजी के आगे महेश्वर प्रकट हो गये थे ।१८। उनका स्वरूप उस समय में करोड़ों कामदेवों के लावण्य से युक्त था और परम दिव्य शरीर से वे युक्त थे । उनके वस्त्र भी परम दिव्य थे तथा मालाऐं धारण किये हुए दिव्य सुगन्धित अनुलेपन वाले थे ।१६। वे किरीट—कुण्डल—केयूर और हार आदि आभरणों से समलङ्कृत थे । इस प्रकार का जगत् के तोहन करने वाले स्वरूप को धारण किये हुए ब्रह्माजी के सामने प्रादुर्भूत हुए थे ।२०। लोक पितामह ब्रह्माजी ने उस कुमार का आलिङ्गन करके उनका नाम कामेश्वर रख दिया था क्योंकि वे परम कमनीय को धारण करने वाले थे ।२१।

तस्यास्तु परमाशक्तेरनुरूपो वरस्त्वयम् ।
इति निश्चिय्य तेनैव सहितास्तामथाययुः ॥२२

अस्तुवंस्तु परां शक्तिं ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
तां दृष्ट्वा मृगशावाक्षीं कुमारो नीललोहितः ।
अभवन्मन्मथाविष्टो विस्मृत्य सकलाः क्रियाः ॥२३

सापि तं वीक्ष्य तन्वङ्गीमूर्तिमंतमिव स्मरम् ।
मदनाविष्टसर्वाङ्गी स्वात्मरूपममन्यत ।
अन्योन्यालोकनासौ तावुभौ मदनातुरौ ॥२४

सर्वभावविशेषज्ञौ धृतिमंतौ मनस्विनौ ।
परैज्ञातचारित्रौ मुहूर्तंस्वस्थचेतनौ ॥२५

अथोवाच महादेवीं ब्रह्मा लोकैकनायिकाम् ।
इमे देवाश्च ऋषयो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
त्वामीशां द्रष्टुमिच्छन्ति सप्रियां परमाहवे ॥२६

को वानुरूपस्ते देवि प्रियो धन्यतमः पुमान् ।
लोकसंरक्षणार्थाय भजस्व पुरुषं परम् ॥२७

राज्ञी भव पुरस्यास्य स्थिता भव वरासने ।
अभिषिक्तां महाभागैर्देवर्षिभिरकल्मषैः ॥२८

साम्राज्यचिह्नसंयुक्तां सर्वाभरणसंयुताम् ।
सप्रियामासनगतां द्रष्टुमिच्छामहे वयम् ॥२६

वैवाहिकोत्सव वर्णन ] [ २१५

उन्होंने कहा था कि यह तो उस परमा शक्ति के सर्वथा अनुकूलवर हैं—ऐसा निश्चय करके शिव के ही साथ वे वहाँ देवी के समीप में समागत हो गये थे ।२२। उन ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर ने उस पराशक्ति का स्तवन किया था । उस शक्ति का अवलोकन करके ही जो मृगशावक के समान परम सुन्दर नेत्रों वाली थी वे नीललोहित कुमार समस्त क्रियाओं को भुला कर कामासक्त हो गये थे ।२३। वह तन्वङ्गी भी मूर्त्तिमान् कामदेव के सदृश उनको देखकर मदन से आविष्ट अङ्ग वाली उसने भी उसको अपने ही अनुरूप मान लिया था । परस्पर में एक दूसरे के देखने में आसक्त दोनों ही काम से आतुर हो गये थे । ये दोनों ही सक्त भावों की विशेषता के ज्ञाता- धृति (धीरज) मान् और परम मनस्वी थे । दूसरों के द्वारा इनका चरित्र ज्ञात नहीं हो सकता है ऐसे ये दोनों ही एक मुहूर्त्त मात्र समय तक तो चेतना से शून्य हो गये थे ।२५। इसके उपरान्त ब्रह्मा जी उस लोकों की एक नायिका से बोले—ये देवगण—ऋषि लोग—गन्धर्व और अप्सराओं का समुदाय स्वामिनी आपको इस परमाहव में अपने प्रिय के ही साथ में सम- न्वित देखने की इच्छा रखते हैं ।२६। हे देवि ! अब आप यही कृपया बत- लाइए कि आपका अनुरूप प्रिय कौनसा धन्यतम पुरुष है ? अब आप लोकों के सरक्षण के लिए परम पुरुष का सेवन करिए ।२७। आप इस नगर की महारानी बनिए और इस वरासन पर विराजमान होइए । इन कल्मष रहित देवर्षियों के द्वारा ही हे महाभागे आप अभिषिक्त हो जाइए ।२८। हम तो अब यही अपने नेत्रों से देखने की अभिलाषा रखते हैं कि आप साम्राज्य के चिह्नों से समन्विता होवें और सभी आभरणों से समलङ्कृत होवें । आप अपने परम प्रिय के साथ आसन पर स्थित होवें ।२६।

—X—

वैवाहिकोत्सव वर्णन

तच्छ्रुत्वा वचनं देवी मंदस्मितमुखांबुजा । उवाच स ततो वाक्यं ब्रह्मविष्णुमुखान्सुरान ॥१ स्वतंत्राहं सदा देवाः स्वेच्छाचारविहारिणी । ममानुरूपचरितो भविता तु मम प्रियः ॥२ तथेति तत्प्रतिश्रुत्य सर्वैर्देवैः पितामहः । उवाच च महादेवीं धर्मार्थसहितं वचः ॥३

२१६ ] [ कालिका पुराण

कालक्रीता क्रयक्रीता पितृदत्ता स्वयंयुता ।
नारीपुरुषयोरेवमुद्वाहस्तु चतुर्विधः ॥४
कालक्रीता तु वेश्या स्यात्क्रयक्रीता तु दासिका ।
गन्धर्वोद्वाहिता युक्ता भार्या स्यात्पितृदत्तका ॥५
समानधर्मिणी युक्ता पितृवशंवदा ।
यदद्वैतं परं ब्रह्म सदसद्भाववर्जितम् ॥६
चिदानन्दात्मकं तस्मात्प्रकृतिः समजायत ।
त्वमेवासीच्च तद्ब्रह्म प्रकृतिः सा त्वमेव हि ॥७

यह श्रवण करके देवी के मुख कमल पर मन्द सी मुस्कान रेखा दौड़ गयी थी। इसके अनन्तर उस देवी ने उन ब्रह्मादिक जिनमें प्रमुख थे उन देवों से कहा था—हे देवगणो ! मैं परम स्वतन्त्र हूँ और सदा ही अपनी ही इच्छा से विहार करने वाली हूँ। मेरे ही अनुरूप चरित वाला ही मेरा प्रिय होगा ।१-२। ऐसा ही होगा—यह प्रतिज्ञा करके सब देवों के साथ पितामह ने उस देवी से धर्मार्थ के सहित वचन कहा था ।३। विवाह तो चार प्रकार का हुआ करता है—नारी और पुरुष का विवाह होता है—एक तो काल क्रीता नारी होती है—एक क्रय क्रीतानारी है—एक पितृदत्ता है और एक स्वयं युता होती है। काल क्रीता वेश्या होती है जो कुछ काल तक उपभोग के काम आती है। क्रयक्रीता दासी होती है जिसको जीवन भर भोग के लिए खरीद लिया जाया करता है। गान्धर्व विवाह से अर्थात् दोनों ही रजा मन्दी से प्रेम करके नारी बना लेते हैं यह स्वसंयुता होती है और जो भार्या होती है वह तो कन्या को पिता दान किया करता है, यही पितृदत्ता है ।५। समान धर्म वाली भार्यायुक्त होती है जो पिता के वशंवदा होती है और पिता जिसको भी योग्य वर समझता है उसे ही अपनी कन्या को दे दिया करता है। जो ब्रह्म अद्वैत है और सदसद्भाव से वर्जित है वह चिदानन्द स्वरूप वाला है। उससे प्रकृति समुत्पन्न हुआ करती है। आप ही तो वह ब्रह्म हैं और आप ही प्रकृति हैं ।६-७।

त्वमेवानादिरखिला कार्यकारणरूपिणी ।
त्वामेव सि विचिन्वंति योगिनः सनकादयः ॥८