भारतकोश
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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

१७८ पाठांतर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(बं) सदकशीरींवे खुद नमूदन गोरक राख करदेशम्पद शुदन क्यार औंडा रा (गोरखका बाँदके लिए व्यथित होना और पश्चात्ताप करना) । (म) याद कदने गोरक साकले बद अख्तर रफटन (गोरखका दुष्टाहमें यात्रा आरम्भ करनेकी बात याद करना) । १—(ब म) र । २—(ब) के र । (म) कै । ३—(म) कशप । ४—(बं, म) गोरक । ५—(बं म) र । ६—(बं) के र, (म)—दे । ७—(बं) मुदि । ८—(बं म) कै । ९—(बं) मैं मैं कुसगुन, (म) के कुसगुन हम । १०—(ब म) चाँद न । ११— (म) हीं । १२—(ब) महर : (म) पाहिर (?) १३—(ब) चाँद न बोली (म) चाँध बदोसी । १४—(बं म) कै र । १५—(म) के केई कहु वर सुकराई; (म) के केहूँ कछु दर सुकराथा । १६— (ब, म) तुम्ह । १७—(बं म) सुतहू । १८—(म) जसनाहिं । टिप्पणी—(१) कै—जातो । कुरिन—अशुभ दिन । पौषत—प्रस्थान । कशप— दुखसे व्यथित हृदयसे निकला हुआ शाप । (२) सराप—शाप । भाई—गई, भाटा । (३) बरी—घड़ी । बरत—रखते हुए । गा—गथा 'का' पाठ भी सम्भव है । उस अवस्था में अर्थ होगा—क्या । कुसगुन—अपशकुन । कीत—किया । पयानाँ—प्रस्थान रवानगी । (४) इव—इतना । चाँट—चींटी । रहसा—दैव ईश्वर । (५) बदोसी—निर्दोष । बिपूनी—सन्तानहीन की । कोपी— शाप दिया । ३५१ (रीडिंग्स २६६ : बम्बई ३ । मनेर १२७५) ऐंजन (बही) नाग मेस होइ पनि धरी¹। छोरहि राम अवस्था परी ॥१ रामहिं हनिवन्त भयउ संपाता । सुद्दि न कोइ करु इहँ² विधाता ॥२ मरिहउँ कोई जो करइ उपकारा³। सिरजनहार देबहिं⁴ निस्तारा ॥३ हनिवन्त सीता कइ पसि मारी । लंका खोट खोट कँ जारी ॥४ हौं पुनि चाँद हरी सो पाऊँ । लंका छाड़ि पलँका जाऊँ ॥५

२७९

औखद मूरि चाँद किंह' जियै', ' कोऊ दे बताई' ॥६ सासो पादर" सात सुई, इक इक ढूँढउँ" जाइ ॥७

पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(बं ) बाकये हाले खुद नमूवने लोरक बंब (१) राम रा उफ़तादने खुद बराये सीता रा (सीता-इश्कसे राम की जो अवस्था हुई थी उससे लोरकका अपनी अवस्थाकी तुलना करना) । (म ) फरियाद व जारी कर्दैन लोरक व गरीबी व तनहाई खुद रा (लोरकका अपनी विवशता और असहाय अवस्थापर खेद करना) । १—(बं ; म ) होइ कै । २—(बं म ) हरी । ३—(बं ) केठवन (म ) कोठएँ । ४—(ब म ) दूसर न केउ जो करि उपकारा । ५— (बं ; म ) देहि । ६—(बं ) फिर । ७—(म ) फुनि । ८—(बं ) हौं जो चाँद हरी सुन पावतौं । ९—(ब ) माबँठौं । १०—(ब ; म ) बिंइँ । ११—(बं ) जीयइ : (म ) फिरै । १२—(बं ) को केउ बद दैलाइ (म ) बों कोई देइ देखाइ । १३—(बं ; म ) सुरग । १४—(म ) हेरउँ ।

टिप्पणी— (१) बनि—स्त्री, पत्नी । परी—पड़ा । (२) भएउ—हुए । संघाता—साथी सहायक । (३) सिरजहार—सृष्टिकर्त्ता ईश्वर । देखहि—दे । बिस्तारा— फुत्कार । (४) बाँट बाँट कै जारी—चुन चुन कर जलाया । (५) लंका छाडि पलंका जाऊँ—इस मुहावरेका प्रयोग कुतबन और जायसीने भी किया है (मिरगाबति १ १३१ पदमावत २०६।३ ३५५।३) । भोजपुरी क्षेत्रमें यह मुहावरा आज भी बोल चालमें प्रचलित है । निकटवर्ती उपलब्धियो छोड़कर किसी दूरस्थ वस्तुके लिए प्रयास करनेके प्रसंगमे लोग इसे चरितार्थ किया करते हैं । प्रस्तुत: प्रसंगमें भाव इससे कुछ भिन्न जान पडता है । असम्भवको भी सम्भव कर दिखानेकी हिम्मत व्यक्त करनेके लिए कविने इस मुहावरेका प्रयोग किया है । जिन दिनों इस मुहावरेने रूप धारण किया उन दिनों जान पडता है लंका जाना भी सुगम न था और पलंका तो कोई ऐसी जगह थी जहाँ सामान्यतः पहुँचना असम्भव समझा जाता था । पलंका (तु पाताल लंका>पायाल लंका> पायालंका>पालंका>पलंका) नामस ऐसा ध्वनित होता है कि लंका की तरह वह कोई अति दूरवती द्वीप था । हो सकता है

१७८ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—( ब ) करदबंशिरिये खुद नमूनन गोरक राव अन्वेशमन्द शुदन बुरई पाँवा रा (गोरकका नौंरके लिए व्यथित होना और पश्चात्ताप करना)। (म) बाद कर्दने गोरक साखते बद बत्तर रफ्तन (गोरकका कुसाइतमें यात्रा आरम्भ करनेकी बात याद करना)। १—(बं, म) र । २—(बं) के र । (म) के। ३—(म) कशप । ४—(बं, म) भाँवर । ५—(बं, म) र । ६—(ब) कै र, (म)—के। ७—(ब) मुदि । ८—(ब, म) के । ९—(बं) कै गै कुसगुन; (म) के कुसगुन हम । १०—(ब, म) बाँटन । ११— (म) ही । १२—(ब) नहर: (म) पाहिर (?) १३—(ब) पाँव न वोधी (म) बाँद अकोसी । १४—(बं, म) कै र । १५—(ब) के नेहूँ कनु बर सुकुराई (म) के नेहूँ कछु बर सुकनाथा । १६— (ब, म) तुम्ब । १७—(बं, म) रुहाहु । १८—(म) रुपनहिं । टिप्पणी—(१) के—घातो। कुदिन—अशुभ दिन। पाँचव—प्रस्थान। कश्यप— दुःखसे व्यथित हृदयसे निकला हुआ शाप । (२) शराप—शाप। माई—माँ माता । (३) घरी—घड़ी। धरत—रखते हुए। गा—गया 'का' पाठ भी सम्भव है। उस अवस्था में अर्थ होगा—क्या। कुसगुन—अपशकुन । कीत—किया। पयानाँ—प्रस्थान रवानगी। (४) इत—इतना। चाँट—चींटी। रुहपा—दैव ईश्वर। (५) अकोसी—निर्दोष। विवंसी—सन्तानहीन स्त्री। कोसी— शाप दिया। ३५१ (रीडिंग्स १६६; बम्बई ३०; मनेर १६०ख) ऐकन (वही) नाग मेस होइ' धनि घरी' । छोरहि राम अपस्सा परी ॥१ रामहिं इनिबन्त भयउ संघाता। मुहिं न फोइ बुरु दई' विधाता ॥२ मरिउँउँ कोइ जो करइ उपकारा' । सिरजनहार देयहि निस्तारा ॥३ इनिरन्त मीठा फल धसि मारी । लंका खोंट खोंट कें जारी ॥४ हां पुनि पाँद हरी जो पाऊँ । संका छाड़ि पतंगअ धाऊँ ॥५

२८१ टिप्पणी—(१) भै भैं—चीत्कार कर रोना । मीत—मित्र । होत—था । रई— ईश्वर । बिछोवा—बिछोह कराया । (२) सायर—सागर । पराई—भर गया । (३) गहि—पकड़ कर । गुहरावइ—पुकारे । (४) जोवा—उत्सुकता पूर्वक देखता रहा । (५) बिखम उचार—विष उतारने वाला । (६) कूहह—गुहारा । (७) जनि—मत न । 'जिन' पाठ भी सम्भव है । उसका भी वही तात्पर्य है । बोलचालमे दोनों ही रूप प्रचलित हैं । ३५३ ( रौडण्डम् २१० ब ; मनेर १६८ ब ) ऐजन (वही) जरम न छूट पिरम कर बाँधा । पिरम खाँड होइ¹ पिस साँधा ॥१ जिहैं यह घोट लागि² सो बानी । कै लोरक कै चाँदा रानी ॥२ कोइ³ न जान दुख काहू केरा । सोइ आन परे जिहँ पीरा ॥३ पिरम झार⁴ जिहँ हिरदैं⁵ लागी । नींद न जान पिवत निसि जागी ॥४ सात सरग जौं बरसहिँ आई । पिरम आग कैसैं⁶ न बुझाई ॥५ चिनग एक जो बाहर मारै, येहि पिरम कै झार । ६ भसम होइ जल धरती, तिल एक सरग पतार⁷ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— पूर्वसन्दी व सोज़े आतिशाने इश्क़ (प्रेमियोंकी व्यथा और प्रेमाग्निका उल्लेख) १—पिरम खाँड कहै । २—लागे । ३—गुनी । ४—आनइ धोह । ५—आँच । ६—हिजरै । ७—नींद जाइ तप तप (?) निसि भागी । ८—कैसहु । ९—येँहि र । १० —भसम होइ जर रिसन इक धरती सरग पतार ।

२८ द्वीपान्तर (हिन्द एशिया) के द्वीप-समूहों के किसी द्वीपको पलका कहते रहे हों। मलयस्थित पेनांगका भी नाम पलंगा हो सकता है। किन्तु जायसीने पलकामें शिवका निवास बताया है। (२६६।१४)। सम्भव है शिवके निवास कैलासको फलंका कहते रहे हों। इस सम्बन्धमें दृश्य है कि एलोराके कैलास मन्दिरके दोनों ओर जो गुफा-मण्डप हैं उनमेंसे एकको लंका और दूसरेको फलंका कहते हैं। (७) बादर—बादर आकाश, जहाँ तात्पर्य स्वर्गसे है। भुईं— भूमि। ३५२ (रीडिंग्स २६०अ । बम्बई ३६ । मनेर १३८भ) प्रेमन (वही) संग न साथी में में रोवा। मीत जो होत' सो दई बिछोवा ॥१ आँसू सायर भरा फटाइ। नैनन्हि बनखंड' रोइ बहाइ ॥२ कर गहि' चाँद चाँद गुहरावइ । धुनि धुनि सीस नारि पैं' लायइ ॥३ उठइ न दहि नारि मुख' जोया। नाग' डसे बिस लहरँ' सोया ॥४ गाँउ ठाँउ होइ तहाँ धाऊँ। बिखम उघार गुनी कित पाऊँ ॥५ माइ बाप कर दूलह, दुख न आन कस होइ ।६ सो सर परा सो जानै, दुखी होय अति कोइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(ब) अफसोस व जारी गर्दन गोरख व हमराह खुद शायद (गोरखका दुःखी होकर रोना और अपने कंधेसे होनेरी चर्चा करना)। (म) दर तनहायगी व गरीरिय खुद गुफ्तन गोरख (गोरखका अपनी बेरंगी और अकेलेपनका उल्लेख करना)। १—(म) होता। २—(म) बनखण्डमें। ३—(म) कर धर। ४— (ब) पायइ; (म) धर धर सीस मार पैं। ५—(ब) न दैहि ओर मुँह (म) म दइ कार मुँह। ६—(म) साव। ७—(ब) लहर मदि (म) लहरैहि। ८—(ब) दिह। ९—(ब) परा सा प्यान्या; (म) जौ हर परै साहि पै पायनि।

२८१ एक परस मड़ि देउर जागेउँ । जोगी भेस होइ भीख मागेउँ ॥४ बरहा मेलि सरग चइ धायउँ । सिर सेटैं खेलि चाँद लै आयउँ ॥५ घोर चोर कर मारत उबरेउँ, चाँद लियउ लुकाइ ॥६ अब ते' धनि बनखंड गै छाड़ेउँ, फिरि घर आयउँ जाइ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दर्दमन्दिये खुद गुफ्तन लोरक दरख्ते मुकाबिल (!) (लोरफका साम्हनेके पेड़से अपनी व्यथा कहना) । इस प्रतिमे पंक्ति ३ और ४ क्रमशः ४ और ३ हैं। १—देखा । २—कउन सो छेया । ३—कियहुँ । ४—महरा । ५— फिरम । ६—जोगी भेष भीख पुनि मँगिहूँ । ७— छूटेउँ । ८—त धनि भित्रठ फुड़ाइ । ९—तैं । १ —आबठँ । टिप्पणी—(१) महराई—महता बड़प्पन । (५) बरहा—मोटी रस्सी । मेलि—फेंककर । ३५६ (रौंड्स १६९ : मनेर १४९ब) दुअम रोज आमदने गुनी व पाय उफ्तादने लोरक बर ऊ रा (दूसरे दिन गुनीका आना और लोरकका उसके पैरपर गिरना) एक दिन दुवै रैन सस भई' । चाँद न छूटे गहन जो' गही ॥१ मन चिन्ता कैं² नींद गँवानी । दयी दयी कै रैन बिहानी ॥२ लोरक देख नियर भिनुसारा । चन्दन फाटि कैं चितहिँ³ सँभारा ॥३ चाँद माँध लै सरि पहुंछाई⁴ । नैन नीर तिह आग बुझाई ॥४ फिर जो दीख गुनी एक आवा । मन्त्र बोल औ डाक पठावा ॥५ घालि पाग गियँ अपनें लोरक, परा पाइ सहराइ ॥६ सोवत साँप डसी धनि चाँदा, सो मनि देइँ' जियाइ ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दु शबोरोज माँदने चाँदा दर बेहोशी (चाँदका दो दिन रात मूर्छित रहना) १—एक दिन दूहर रैन तर भइ । २—स्मु । ३—खर । ४—नियर

१८४ देउ। ५-चितैं। ६-चाँद काढ़ि के सरि पहुँचाई। ७-आनसि आगि आहि परझाई। ८-पाठ। ९-सुतहिँ। १-नूँ महि देहु। टिप्पणी-(३) निअर-निकट। भिनुसारा-सवेरा। (४) सरि-छिप। (५) शुभी-शुभी गबड़ी विज्जैत। डाक-उका (६) बाधि-डाककर। पाग-पगड़ी। सहराइ-सीधे लेटकर। ३५७ (रैलेण्ड्स १७ : मनेर १७ अ) घिरीनी (?) कबूल करने गोरकका मरगुनी रा (गोरखका गुनीको मिठाई (?) देनेका वादा करना) हाथ क मूँदरी१ सरग२ कतारा। कान क कुन्डल चौंक३ गियँ हारा ॥१ अउर जो साथ गाँठ है मोरें४। सो पुनि देउँ बिखारी तोरे५ ॥२ कर उपकार कर जो पारसि। पिता मोर जो महि६ निस्तारसि ॥३ तोरें कइँ चाँद जो लइउँ७। इहाँ अरम घेर होइ रहिउँ८ ॥४ जो न होइ एतबार हमारा। बचा बाँधि कर करहु९ पतियारा ॥५ कोने रात यस मेलउँ, कै सतइस सेउ१०।६ जो र असत११ में बोली, चाँद नियर तुम्ह१२ देउ ॥७ पाठान्तर-मनेर प्रति- शीर्षक-उरीन कबूल करने गोरक हरीने अरथून गर रा (गोरखका मन्त्र पूँछने बालेको आभूषन देनेका बचन देना)। १-कुंतरा। २-कमर। ३-फान कुण्डल चौंका। ४-अउर साथ है गोठी मरैं। ५-देही सब भिखारी तोरें। (बापका असरूज छूट जाने से भिखारी बन्दहारी परा जाता है)। ६-दैहि। ७-तोर बचन चांद जो पहई। ८-घर तोर होहिई। ९-पतियार। १०-के कय। -कातिन वरश यस मेलैं सतसर दाइ तो सेउं। ११-कसिहि (?) १२-तू। टिप्पणी-(१) मुंदरी-अँगूठी। ( ) गाँठ-दाम। मोरे-मेरे। भिखारी-(न भिखारी)-विरोध। (३) निस्तारसि-उद्धार करे। ( ) इतवार-विश्वास। बचा-बचन। पतियारा-विश्वास।

१८५ ३५८ ( रीबैण्ड्स २०१ : मनेर १७ ब ) मन्तर खान्दीदने गुनी व होशियार शुदने चाँदा ( गुनीका मन्त्रोपचार करना और चाँदाका जीवित होना ) कउन लोग तुम्ह गरुड़ि पूछी । ठाँठ कहु' आँ जातहि' पूछी ॥१ धात गोवार गोषर मोर४ ठाऊँ । घनि चाँदा मँहि लोरक नाऊँ ॥२ गुनी कहा जिन जीउ हुलावसु । धीर बँधहु' अब चाँदहि' पावसु ॥३ बोलि मन्त्र छिरकसि लइ पानी । उतरा बिस चाँद अँगरानी८ ॥४ धाइ लोर घर माँइ उठाई । पिरम पियार सौंपि गियँ लाई ॥५ सरग हुत चाँद उतरि जनु आइ, देख खर बिहसान' ।६ कँवल भाँति मुख बिगसा, दुख जो होत कुँभलान ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—पुरशीदने हकीम बात व नामे लोरक व चाँदा (चिकित्सकका लोरक और चाँदाका नाम और जाति पूछना) १—नाँउ कहु । २—जातो । ३—मुर । ४—है । ५—बाँधहु । ६— चाँदा । ७—पानी । ८—म —चाँदा अँगगरानी । ९—सरगहि चाँद उतरि जनु, देखित लोर विहसान । १ कुँझलान । टिप्पणी—(२) गोवार—ग्वाल । ३५९ ( रीबैण्ड्स २०२ ) होशियार शुदने चाँदा व दादने लोरक गुनी रा जेवर ( चाँदाका उठ बैठना और लोरकका गुनीको आभूषण देना ) हिया सिरान जरत जो अहा । छूटि चाँद निसि गहनँ गहा ॥१ लोरक होत सो आस पियासा । जियइ चाँद मन पूजी आसा ॥२ अभरन अनि फै सम लोरा । तरुवन हाँस आँ सोने खूरा ॥३ इतपुर मोर भाँ कान कै पूरी । मूद भंग और फर्रै क चूरी ॥४ हाथ क करणा सोभन नाँधी । अँगूठी मानिक के फाँठी ॥५

२८४ अनघट बिछवइ पांवर, लौर चाँद फर लीन्हि ।६ अरथ दरप औ खरग कटारा, मान गुनी कहँ दीन्हि ॥७ टिप्पणी— (१) हिया—हृदय । सिराने—शीतल हुआ । बरत—जल रहा । कहा—था। (२) तरकन—तरौना कानका आभूष जिसे तरकी कहते हैं। यह फूलके आकारका गोल और रवेदार होता है । हाँस—हँसली (सं०— अंसाह्निका)- गलेका एक आभूषण जो चन्द्राकार होता है और गलेसे चिपटा रहता है। चूरा—चूड़ी । 'जोरा'(जोड़ा) पाठ भी सम्भव है। (४) हस्तुर—(सं हस्तपूरक) हाथका कड़ा। जोर—सामने मस्तक पर लगाया जाने वाला आभूषण । पूरी—पूरी फूलके आकारकी कील। मूंड मंग—सम्भवतः यह मौली माँगका अशुद्ध रूप है। मागमें भरी जानेवाली मोतियों की लड़ी। करें—कर (हाथ) का। (५) बाधी—जब भागमें पहननेका आभूषण । काँढी—कण्ठी कण्ठ में पहनने का आभूषण। (६) अनघट—पैरके अँगूठामें पहना जाने वाला आभूषण । (७) बिछवई—बिछुआ विछिया । पैरकी उँगलियोंमें पहना जानेवाला आभूषण जिसे विवाहिता स्त्रियाँ ही पहनती हैं । १६० (रौडैण्डथ ५ ३ मनेर १ ३अ ) आखिर बिसहर सबद कत्थ गुफ़्तन फ़रमूढने मौलाना नषन ( मौलाना नषनक बिसहर पर कुछ कहना ) मौलाना दाउद यह गित गाई । जें रें सुनौ सो गा मुरझाई ॥१ धनि ते सबद धनि लेखनहारा । धनि ते बोल' धनि अरथ बिचारा ॥२ हरषी आठ सो चाँदा रानी। नाग डसी हुत सो महि रखानी' ॥३ तोर कहा मैं यह खड गानतें । कया कबित' के लोग सुनावउँ ॥४ नषन मलिक दुख बात उमारी । सुनहु फान दइ यह गुनियारी ॥५ और कबित मैं फरउँ बनाई, सीस नाइ कर जोर ।६ एक एक जा तुम्ह पूछउ बिभार कहहुतौ सिंह सोर ॥७

२८७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान सिफ़ते मौलाना दाउद व गुफ़्तारे ऊ (मौलाना दाऊद और उनकी रचनाकी प्रशंसा) १—दाउद कवि जो चौंशा गाईं । २—र । ३—बोल । ४—आखर । ५—छाँप उसी हीं सोइ बखानी । ६—काय । ७—सुनाथैँ । ८—मुक्लिक नयन सुनु बोल हमारी । ९—बनइ । १ —एक एक बोलि मौति अस फिरवा, कहउँ भो हीरा तोर । ३६१ ( मनेर १७१ ब ) विदभा कर्दने लोरक हकीम रा ( लोरकका चिकित्सकको बिदा करना ) गारुर समुँद चाँद लै चला । तैं हँ बात कहसि अति भला ॥१ बायें दिसि तूँ लोर न जाबसु । दाहिनें बाट बहुत फर पावसु ॥२ पिरम भुलान यह बोल न मानी । भाट चलत सहाइ न आनी ॥३ डांडी के लोरक चाँद चलाई । दाहिनें दिसिवैं दिस्टि मिलाई ॥४ घर आपुन दण्ड छाड़हि कहीं । जहाँ परिरोहि ठाड़े तहाँ ॥५ बार अँधवतैं जाइ सुलाना, लोरक सारगपूर ।६ दिनकर मूँड ऊघावा, राता जैस सिंदूर ॥७ टिप्पणी—(२) फर—फल । (४) डाँडी—एक प्रकार की पालकी । (५) परिरोहि—मना करें । ठाड़े—खड़ा । (६) बार—दिन । अँधवतैं—अन्त होत ही । सुलाना—जा पहुँचा । ३६२-३७० ( अनुपलब्ध ) अनुमान है कि पञ्जाब प्रतिम प्राप्त निम्नलिखित चार कड़वक इस स्थान के होंगे। किन्तु उनका क्रम और उचित स्थान निश्चित करना सम्भव नहीं है ।

१८८ (१) (पंजाब [क]) आइ महावत [ ] अलापा। माइ महावत असपत धावा ॥१ [----] लोरक [----] नाँ। जानु पहरु झाऊ कै बनां ॥२ [ - ] । [ ] ॥३ भट लोग भये असबारा। काढे बेरुफ होइ चमकारा ॥४ चढ़ेहि लोर तैं बाहु परा[ई]। [ ] कें न नहि पड़ा[इ] ॥५ [ ] छाड़ जाहु [ ] ।६ [ ] ॥७

(२) पंजाब [क] लोरक हरक खेद भिराई। धीर [ ] ॥१ [ ]र गढ़ै जिह सेस बैसा [रे]। पाठ बेरी [ ] ॥२ [ ] । [ ] ॥३ रमफ बन नान क[ ]बिस मोही। घर नर [घ]हुत न दे[खी] तोही ॥४ घर घर अछे [ ] नाँ मान। चित मन माठ [ - ] ॥५ [ - -- ] ।६ [ -] ।७

(३) (पंजाब [ख]) [ ] राज मधुबर लोरक रा [ ] (१) रादा महता एक मन्तर कीन्हा। लोर बुलाइ पान लै दीन्हा ॥१ लोरक काज अन्दारा कीयइ। पयना मोर हरेवहि दीजइ ॥२ बयना पाति आगें अरघायसु। परहितहिं पठया लार फुलायसु ॥३ पाहा कापर खारहिं छीन्दौं। इहवहिं समुदित अंका सीन्दौं ॥४ ताकें सार साहि [----]गवा। पाँइ तिहैं तह क धावा ॥५

२८९ मसबै फरसा निसरान, अइषा राख जो राजा [ ] ॥६ घोडैँ चढ़ेठ लोरक तिहाँ, चल [ - - ] ॥७ (४) (पंजाब [ख]) सुनि कै महुअर फोट उछावा । जानसि लोरक मारे [आया*] ॥१ गइ महँ कीन्हें काष सराचा । काट घरैँ [ - -]ावा ॥२ [ - ] इरबहि राउ डिंग [ ] । इरदीपाटन देस दिखाये ॥३ हमरै अइस दूरी न कीजइ । एक चढ़ाई भेद बहु दीवइ ॥४ अइस पुरुसँ आइ समानाँ । पुरुख तिरिया देखहि बहिराना ॥५ [ - - - - - - ] ॥६ [ - - - ] ॥७ टिप्पणी—ये चारों पृष्ठ जीर्ण हैं तथा उपलब्ध फोटोमें लाल स्याहीसे लिखी पंक्तियाँ स्पष्ट नहीं हैं। अतः प्रस्तुत पाठ सम्भाव्य वाचन मात्र है। ३७१ (मनेर १०३ख) बहोश शुदन चाँदा आँबा वा लोरक गुफ़्तन (चाँदाका होशमें आना और लोरकसे कहना) उठ गइ चाँद सँ नींद भल आई । जस सपनैं हीं नागन्हि खाई ॥१ फइसि पिछार पथ सर जाहीं । सपनहि सो ठिक पूछी नाहीं ॥२ सपनहि थार में गतरउ टीसी । कान्हि रन बो रन मँह पैसी ॥३ फरम हमार सिंघ एक आवा । जिहुत हम तुम्ह पर मिरावा ॥४ पाउ सिंघ कै छाड़ेउँ नाहीं । नभ लगि जीयहुँ सेउ कराई ॥५ देह अमीस सिंघ अस बोला, लोरक तूँ मुर माइ ॥६ पार माझ एक हूँटा बोगी मत बाँदहि लइ जाइ ॥७ टिप्पणी—(६) मुर (मोर)—मेरा । (७) हूँटा—अस्करी न इसे 'टोंटा' पढ़ा है और टन तोता (पक्षी) के रूपम ग्रहण किया है पर यह स्पष्टतः बोगीका विशेषण है । मनेर प्रतिके १

२१ पृष्ठ १४७-ब (कडवक १७४) के शीर्षकसे जान पडता है कि उस प्रतिके तैयार करने वालेने इसे 'टूँगा' पढा था (उसने इससे हाथ पाँव कटे होने का अभिप्राय ग्रहण किया है) । सम्भवतः इसका तात्पर्य किसी सम्प्रदाय विशेषके योगीसे है । टूँडा या ढूँवा नामक किसी योगी सम्प्रदाय की जानकारी हमें नहीं है। हो सकता है यह अपपाठ हो । १७२ ( मनेर १०१-ब ) नैं लोरक, तुरा रोजे बद उफ्पद मारा याद कुन ( लोरक यदि तुम पर विपत्ति आये तो मुझे स्मरण करना ) लोरक को तिह पीरा परही । चाँद तोर जो टूँटा हरई ॥१ दइ सँवरि मुहिं नैबरसि लोरा । ठाठें ठाठें मैं आउब सोरा ॥२ पसना कहि सिध चला उठाई । चाँद् लोर (दोइ) रहे सुमाई ॥३ परि इक सिधमैं पइठ नबाई । पुनि उठ चलि कै बाट घटाई ॥४ दवस चारि जो चलतहि भये । नगर एक पैसारथ किये ॥५ लोरक कहा चाँद् तुम्ह बइसहु, हौं सो नयर महँ आउँ ।६ कनक अन औ लागती, बर बेचन कछु र कराउँ ॥७ मूलपाठ—(१) बोर । टिप्पणी—(१) परहा—(इतना) बह । (५) पैसारथ—प्रवेश । (६) बइसहु—बैठो । नयर—नगर । (७) कनक—गेहूँ । अन—अन्न । १७३ ( मनेर २ प.अ ) दरमियाने कुश्तानए त्रिभुभान चाँदा रा मौद ( चाँदाको मन्दिरमें बैठाया ) चाँद मढ़ी बैठार छुपारई । लोर नगर महँ सीदँ आई ॥१ दूतं छभित देखि तों पावा । छंदलाइ चाँदा पहँ आवा ॥२

१९१ आसन मारि बैठ तिह आमी । अब मों पहँ कित चाँदा जामी ॥३ सिंगी पूर नाद तस किया । जन बैसन्दर परा विष दिया ॥४ सुनतहि चाँद बेधि तस गई । अपछठ मरन सनेही मई ॥५ जस अहेरिया पा बिरख, भिरिग बेधि लै जाइ ।६ टूटैटा भयतें अहेरिया, चाँदहि गोइन लाइ ॥७ टिप्पणी—(१) सौंहै—(इस वस्तुके) भ्रमके निमित्त । (२) कबिड—छवि । कँडकहूँ—बहाना बनाकर । पइँ—पाछ । ३७४ ( मनेर १७७ख ) चीजी कपसून इंसान कि चाँदा दीवान शुद ( उसका जादू करना चाँदका पागल हो जाना ) सिंगी पूर मन्त्र सो लाषा । चाँद सुन कछु चेत न आषा ॥१ चाँदा गोइन लइ चला भुलाई । गाठ गीत औ कछु न फराई ॥२ तइस संग भइ चाँद सुभागी । गाँव गाँव फिरि गोहन लागी ॥३ देखि सिंघ औ कण्ठ अधारी । भूली कछु न सँभारी घारी ॥४ चाँदहि बिसरा सब सर्वंसारू । बिसरा लोर जैं जीठ अधारू ॥५ सुनै नाद अउ देख, पाछे हेरि न बारि ।६ लोर आइओ देखी मढ़ी, चाँदा बिनु अँधियारि ॥७ ३७५ ( मनेर १७५क ) यूँ लोरक आमद व बीनदके चाँदा दर बुतखाना नीस्त ( लोरकने लौटकर देखा कि चाँद मन्दिरमें नहीं है ) सुनि मढ़ी देखि लोरक राषा । काहे कहूँ बिधि कीन्हि बिखोषा ॥१ अबहूँ जा र सरग चड़ धावउँ । तो वहँ खोज चाँद कर पावउँ ॥२ लार चहु दिसि भँमि भँमि आवा । खाय चाँद कर राव न पावा ॥३ रैन गइ पै चाँद न पाइ । उठा सुरुज चलि खोज फराइ ॥४

२१२ आजु राति जो चाँद न पाई। सारस भरु र मरौं भदाइ ॥५ ठाँउ ठाँउ सो लोरक पूछी, न सुना एक सिंघ पाइ ॥६ अँधयें सुरुज चाँद जस तिरिया, टूँटा देखि लइ धाइ ॥७ टिप्पणी—(५) सारस—सारस दम्पतिका अटूट प्रेम प्रसिद्ध है। एकके मरने पर दूसरा भी अपना प्राण दे देता है। ३७६ ( मनेर १०१ब ) चूँ शनीद लोरक कि दस्त पा बुर्रीदः कर दरख्त ( लोरकने सुना कि उसके हाथ पाँव कटे हैं ) लोरक जो टूँटा सुनि पावा। खोजत खोज जाइ नियरावा। नगर एक पइसत सुधि पाई। टूँटा सग तिरिया एक आई ॥२ पीर नगर सो धाइन लागा। फीक होत टूँटा कर रागा ॥३ सुनतहि नाद लोर गा आई। देख चाँद मन रही लजाई ॥४ दौरि लोर टूँटा कर गहा। अरि भिखारि सिंह मारतैं काहा ॥५ धरी जटा ले चला राउ पहँ, तोहि फिराऊँ घरि ॥६ झूँठि जटा लगि पहिरा छै, औहट मा चलि दूर ॥७ टिप्पणी—इस कड़बकका शीर्षक टूँटा के शाब्दिक अर्थ पर आधारित है। विषयसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। (१) खोजत—खोजते हुए। (२) पइसत—प्रवेश करते ही। ३७७ ( मनेर १०२अ ) चश्म कुशावद कर्द व दीदने टूँटा लोरक रा ( लोरककी ओर टूँटाका आँख फाड़कर देखना ) आँखि फाड़ि क टूँटा धावा। लोर कहा हौँ खीन वै खावा ॥१ लोरक मागि चला सो डराइ। पन्थ टूँटा सुहि भसम कराइ ॥२

२११ टूंटै कहूँ लोर मैंगरावा। सिध बचन हुत मन महँ आवा ॥३ सिध आइ लोरक पैंथ ठाढ़ा। लोरहि टूंटहि बोल जो पाढ़ा ॥४ दूनौ कहहिं चाँद सुर जोई। औ तिह माँझ मुकाउब होई ॥५ बाँदा ठाढ़ी कौतुक देखइ, मुँह मँह बकत न आठ ॥६ बन खेल औ गीत भुलानें, रावल सीस डोलाठ ॥७ ३७८ (मनेर १०२ब) दरमियाने खोगी व लोरक गुफ्तगू शुदन (जोगी और लोरकमें बातचीत) सिध कहैइ तुम्ह काहे जूझहु। करहु गियान मन मँह सूझहु ॥१ सभा करहु अउ करहु बिचारा। दुँहु को जीती को दुँहु हारा ॥२ जूझइ चाहु जो पूछा भला। बाहाँ जोरे लोरक चला ॥३ चाँद साथ भइ औ सिध भवा। पुँनि नगर-सभा महँ गवा ॥४ नगर उहाँ पै भइठ जो दीठी। इँदर सभा बरु सभा पईठी ॥५ सभा सँवारि जो राउत, भइठ उहाँ पै बाइ। ६ चारि खण्ड का नियाउ नियारहि, एकउ फरह न जाइ ॥७ टिप्पणी-(१) गियान-ज्ञान। (७) नियाउ-न्याय। नियारहि-निर्णय करते हैं। एकउ-एक भी। फरह-यह शब्द भोजपुरीमें बहुत प्रचलित है और कायदेके वाक्य अदालतके प्रयोगमें प्रयुक्त होता है। यहाँ तात्पर्य 'वराके बाहर से है। ३७९ (मनेर १०७अ) हर चहार कस सलाम रसीदन (चारों जनोंका प्रणाम करना) आइ चहूँ मिलि कीन्हि जुहारू। जुझ मरत इहिं करहु विचारू ॥१ बारा सभा कहँहु दुहु आई। कहि लागि तुम्ह जूझहु भाई ॥२

२९४ एक एक आपुन बात चलावहु । झूठ साच आपुन तुम्ह पावहु ॥३ उठि लोरक तो गइसा कहा। भइठ ढूँढै यह सेतक अहा ॥४ सिंगी पूर चाँद हर लीन्हा। सगरें रैन खोज मैं कीन्हा ॥५ खोजत पायतँ ढूँटा, घरेउँ फेरि कै पार ।६ झूठ बटा लाग फिरौंइँ, जानौं सब सैंसार ॥७ ३८० (मनेर १० ब) गुफ्त[न] जोगी ई कन मन कन्दा (जोगीका कहना कि यह मेरी स्त्री है) पूछहु सभा कहहु पैंह लोरा। कतैन लोग घर कहुवाँ तोरा ॥१ कहवाँ अइसी तिरी सैं पाई। काफर भिय यह कहवाँ काई ॥२ काहे निसरहु दोइ बन होई । इतर साप न मइइ कोई ॥३ कउन पुहुमिहुत लोरक आइह। कहवाँ नाउ कहौं यह (जाइह) । ४ घर हुत काढे निसरे लोरा । लोग कुटुंब कछु कही न चोरा ॥५ काहि लाग तुम्ह निसरे, साच कहु तुम्ह बात ।६ हम पुन देख नियाउ नियारहि, पूछि तुम्हारी बात ॥७ मूलपाठ—(४) माहह (बीमके ऊपर अनावश्यक गरवज असावधानी बन दिया गया है। टिप्पणी—इस कडबकका शीर्षक विषयसे सर्वथा भिन्न है। वस्तुतः यह कडबक ३८२ का शीर्षक है। उसे लिपिने दुहरा दिया है। ३८१ (मनेर १०४ब) पुरसीदन बातें गुवाल रस्म लोरक जन चांदा (ग्वालकी बात और लोरक और चाँदाका ग्राम पूछना) जात अहीर हम लारक नाऊँ। गोवर नगर हमार पुर ठाऊँ ॥१ सहदेव महर कह चाँदा बिया। महर बियाह बाभन सेठें किया ॥२

२९५ पायन फेर नारि लै आयउँ । चाँदा तिरी महर थिय पायउँ ॥३ हौं जो आइ जें बाँठा मारा । एसौं राउ रूपचंद हारा ॥४ हम पुनि हरदीपाटन चाली । राजा महूभर कें [—*] फानी ॥५ चाँद सनेह जो निसरेउँ, छाड़ि कुटुंब घर बार ।६ तुम्हरे देस यह टूँटा जोगी, रहा होइ भटपार ॥७ टिप्पणी—(७) भटपार—भटमार, बटोद्दियोंको मार्गमें लूटने वाला । ३८२ ( मनेर १८ ख ) गुफ्त[न] जोगी कि ई जन मनस्त ( जोगीका कहना कि यह मेरी स्त्री है ) टूँटा कहै मोर भार वियाही । परी राढ़ तोरै गवाही ॥१ सभा कहै दुन्हु अब का कीजइ । इँह र बह कँइ कस उतर दीजइ ॥२ दोउ कहहि यह मोरी जोई । इँह हुन्हु महँ हरसाख न होई ॥३ यह टूँटा यह राषन अहई । धनि पूछहु दुन्हु वह का कहइ ॥४ चाँदहि मन कुछ चेत न आवा । अइस मन्त्र पढ़ि टूटें लावा ॥५ लोर कहा यह मोरी तिरिया, औ मुहि गोहन आइ ।६ भा भिखार है टूँटा जोगी, सकति घड़इ लइ जाइ ॥७ ३८३–३८८ (अनुपलब्ध) ३८९ ( रीडिङ्ग्स १७४ ) रवान शुदने लोरक व चाँदा व रसीदने नजदीके हरदी ( लोरक और चाँद का चलकर हरदीके निकट पहुँचना ) बाह्र कोस दस ऊपर भये । बहुत भाँति महेहुव रवे ॥१ सभ निसि कहहिं पिरम कहानी । पाठ गहरु दिन रैन पिहानी ॥२

२६ पहर रात उठ चले पहारा। कोस चार पर भा भिनसार ॥३ हरदी सीम तुलाने बाइ। सगुन भये एक पाँदुक राई ॥४ महर दाहिने पायें कर बावा। औ दाहिने मिगध के दावा ॥५ महर कहा हुत दाहिनें पायें, सगुन होइ पनार ।६ सिंह मरय तुम्ह सिध पायहु, लोरक बाने सर्वसार ॥७ टिप्पणी—(४) हरदी—इसे काव्यमें अनेक स्थलोंपर हरदीपटन कहा गया है। क० ब० ३९७ क शीर्षकमें उसे केवल 'पाटन' कहा गया है। पाटन (पट्टन <पत्तन) से ऐसा जान पड़ता है कि यह स्थान किसी नदी अथवा समुद्रके तटपर स्थित था। सर्वे आफ इण्डियाकी सूचीके अनुसार हरदी नामक स्थान मध्यप्रदेशमें ३३ महाराष्ट्रमे १, राज स्थानमें २ उत्तरप्रदेशमें ६ और बिहारमें २ हैं। इनमेंसे काव्यमें वर्णित हरदी कौन है, कहना कठिन है। ३९० ( रीडिंग्स २०५ ) सलाम कदने लोरक राव रा दर शिकार व पुरखीदने राव क्षेत्तम रा ( शिकारके निमित्त आये हुए रावको लोरकका सलाम करना और राव क्षेतमका पूछना ) क्षेत्तम राइ बहेर चढ़ा। हरदी फिरहुँत दइ जो कढ़ा ॥१ निकसत राठ ओहारसि सोई। राइ पूछि जाये हँह कोई ॥२ अति गुनवन्त आइ रूपवन्ता। सहसफरों बइस सीमन्ता ॥३ काऊ न चीन्हि सब कइहिं बटाऊ। पाछें राठ पठवा नाऊ ॥४ जो तुम्ह चीन्हउ देखि लै आयसु। यो परदेसी उतार दिवावसु ॥५ हरदी पइठे लोरक, खोर खोर फिर आठ ।६ जाँवेह नगरहि चीन्हिन कोय, सबै लोग पराउ ॥७ ३९१ ( रीडिंग्स १३ ) पुरस्तादने राव इसाम रा बरे लोरक ( रावका लोरकके पास नाई भेजना ) गउ इयाई रावल इक आये। ऊँच मंदिर बलसार सुहाये ॥१

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