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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

२५८ ३१६ (रीडिंग्स २४६। मनेर १५६अ) अनदास्तने बाबन कमान व अफसोस कदन (बावनका धनुष फेंककर खेद प्रकट करना) बावन धनुफ सो दीन्ह उडारी¹। बारह बरीख बसी में नारी ॥१ इम³ माना धनुकाहि⁴ सिधि पाई। बान भरोसे जोइ गँवाई ॥२ धस लैं हौं गाँग परउँ⁵। बूडि मरउँ कै फूँकर म परउँ ॥३ अब हूँ धनुफ हाथ कस करउँ⁷। परु कंठसाय कुतारा परउँ ॥४ पर यहँ आँखि न देखत आई। लहगा सुरुझ चाँद भुलाई' ॥५ जो यह मोरी बार दियाही, माइ दीन्ह अउ बाप'' ।६ राज करो जप लोरक, चाँदहि खाइइ साँप'' ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान अन्दाख्तने बाबन तीरो कमाने खुदरा बर ज़मीं जद (बावनका धनुष-बाण भूमिपर फेंक देना)। इस प्रतिमे पंक्तियाँ ३, ४, ५ क्रमशः ५, ३, ४ हैं। १—जो दीन्ह उठारी। २—मै। ३—धनुष। ४—बान भरोसे तियै। ५—के धँस कें गंग महँ परउँ। ६—बूड़त मरउँ निकरि मन् मरउँ। ७—बरु कंठ मार कुठारी मरउँ। ८—पर यह रोख न देखउँ काई। ९—लेइगा लोरक चाँद पराही। १०—मोर। ११—लेगा करियो जरिया साँप। १२—लोर फिर एक सुरझा दिया भौरउ परा रून्धाथ। टिप्पणी—(१) बरीख—वर्ष। (२) जोइ—स्त्री पत्नी। ३१७ (रीडिंग्स २४७) बाज गुफ्तन बावन व गुजारात कर्दने लोरक व चाँदा बा विदा (१) (बावनका लौटना लोरक और चाँदासे विदा (?) की भेंट) बावन फिरि गोबर दिसि गये। लोर चाँद दोइ आगेँ भये ॥१ गइ करंका विदा दानी। माँग दान अहस अग न जानी ॥२

२५९ पान दिखावहि लीन्ह न सोई। पुरुख माँग के माँगी जोई ॥३ अस दान जग काऊ न लिया। कहि तइस जो काठ न दिया ॥४ देस देसन्तर मानुस जाइ। महरी अस बाप औ माई ॥५ ठौर ठौर जो मनुसें इहँ महँ, एक एक लेहिं ।६ घर महँ लोग सूखें मरहिं, बाहर पाठ न देंहि ॥७ ३१८ ( मनेर १५०ख ) दास्तान रवान शुदने बावन तरफ़े खानये खुद ( बावनका अपने घर लौटना ) भपर आइ राइ गुहरावा। कउतुक एक घोर दिखरावा ॥१ तिरिया एक ओ दधी उछारी। सरग हुतें जनु आछरि आई ॥२ इसी तिरिया कितहूँ नहि देखेउँ। चाँद तरायीं एक न लेखेउँ ॥३ पुरुख एक अहें जहि पासा। देखत दुहु कहूँ गयी भुर सासाँ ॥ और पिटार सब सोने भरा। अइस न जानउँ किह कँह धरा ॥५ चलहु राउ वहि मारि के, सूछे अबरइ जाइ ।६ घरहिं माझ होइ उजिआरा, अस तिरिया जो आइ ॥७ टिप्पणी—कडवकका शीर्षक विषयसे से सम्बन्ध नहीं रखता। ऐसा बान पड़ता है कि लिपिक उससे सम्बद्ध कडवक लिखना छोड़ गया है। ३१९ ( मनेर १५०ख ) दास्तान बाज गुश्तेन शुदन व आमदने राज गँगेव बर लोरक ( राज गँगेवका तैयार होकर लोरकके पास आना ) पहिल लोरक राइ घर आवा। फिर गँगेउ गइ होइ आवा ॥१ चाँद लेउँ ताहि सरग चलावउँ। सरग तरायीं माँझ यमावउँ ॥२ कहा सार तुम्ह खाँड मँभारहु। मुहि मेंड गँगेउ तुम्ह न पागुहु ॥३ एक खाँड लरिक तम लावा। फिर फाट तावर महँ आवा ॥४

५६ पाप पाप के आप उबारसि । मिल माइ कै पैं जिउ हारसि ॥५ कहसि घेर तोर हा, होइ हीँ अगसर के मुँह लाग ।६ कहा छोर सेटौं सेवक, गँगोट अइस बोल कहि भाग ॥७ टिप्पणी—(१) घर भाषा—'गुहरावा अथवा फिरावा पाठ भी सम्भव है। इस प्रसंग स्पष्ट न होनेसे पाठका निश्चय करना सम्भव नहीं है। ३२० (रीडिंग्स २४८ : बम्बई २७ ) तंग करने लोरक का कोतवाल व विद्यारानी ( लोरकका कोतवाल और विद्यारानीसे युद्ध ) तीनहुँ हाँक फिरा कोतवारा । पोलत बोलि माँछ सँदि मारा ॥१ देखि मकेरी' चितैहि न लागहिं । दुँहु मेह अनै लै चाहहिं ॥२ देहि दान औ बिनति कराहीं । कहा चलहु राजा पहँ वाहीं ॥३ कहा न सुनैं औ दान न लीन्हें । बात कहत अनउत्तर दीन्हें ॥४ लोरक चाँदहि अस मत कहई' । अस मनुखै कै बैरी मई' ॥५ लोरक खड़ग हथवासा, चाँदे धनुख चढ़ाइ ।१० छोट जन सबही मारे, जान न कोऊ पाइ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शी र्तक—नशिश्तने जकबारियान दरमियाने राह अज्याने चाँदा व लोरक (चाँदा और लोरकके मध्यमें दानियोंका बैठना ) ! १—बैठ दानी औ कतवारा । २—मजु । ३—अकेल । ४—जावा । —दानु मह एक पै रह धावा । ६—दान देहि औ बिनय कराहीं । ७—कह । ८—छोहन । ९—अल वाहत । १०—लोर चाँदा दुहुन कहि मई । ११—अस बिनती कहि औ इट गई । १२—लोर बीर हथवासा काढ़न चाँदा धनुख चढ़ाउ । १३—छोर जन सबै सँहारे, जान न कोऊ पाउ ॥ ३२१ (अनुपलब्ध)

२६१ ३२२ (रीडैम्ब्डूस २७९; बम्बई ४५ मनेर १५९ अ) गिरफ्तार शुदने बिद्या व दस्त बुरीदने गोरक (विद्याका पकड़ा जाना और गोरकका उसका हाथ काटना) विद्यादानि¹ बीत कर गहा² । दस अँगुरी मुख मेलत³ अहा ॥१ कहा पीर मुँहि देहु⁵ जितैं दान् । जीठ छाड़ि काढ़ु मङ् कान्⁷ ॥२ मूँड़ मूँड़ि सब छारै घरे⁸ । हाथ काट अँगुरा⁹ मुँइँ परै¹⁰ ॥३ नौखंड प्रियमी सुना¹¹ न काऊ । वइस दान को देहि¹² बटाऊँ¹³ ॥४ अस कहि दानि अन्यायी होई¹⁴ । जो अस करै पाठ तस सोई¹⁵ ॥५ मुँह फारा कै¹⁶ विद्या,¹⁷ पठवा¹⁸ बेल बँधाई ।६ आपुन राउ¹⁹ फरका, विद्या²⁰ बेग हँकारहु²¹ जाइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(ब) कुसुम्मत शुदन बाज़ गवारियान व गोरक बा घोड़ा (गोरक और जोड़ेका दानियोंकी मरम्मत करना) (म) दास्तान इज्जो इनहाज कर्दने खुद पेशो गोरक (हुदरंका कारूसे अनुनय करना)। दोनों ही प्रतियोंम पंक्ति ४ और ५ क्रमशः ५ और ४ हैं। १—(ब) बिद्या जोर, (म) हुदरं बाह। २—(म) पर कहा। ३—(म) दस अँगुरी मुँह मेलत (१)। ४—(ब म) कहइ। ५— (ब) मुहि; (म) मोहि। ६—(म) दै। ७—(ब) किय। ८— (ब म) दानूँ। ९—(ब) कहा नाक औ काट काँनूँ (म) ठावेऊं नाक और काटउँ कानूँ। १०—(ब) मूँह मूँड़ि सर खोरिया परी; (म) मूँड सुझाइ सर बोरी घरी। ११—(ब म) अँगुरी। १२—(म) परी। १३—(ब; म) प्रियभी सुनों। १४—(ब) देह (म) दह। १५—(म) न पाऊ। १६—(ब) अस अन्याई दानि न हो- (म) अइस दानि अन्याइ न हाई। १७—(म) होई। १८—(ब; म) सुरत कापी। १९—(ब) कर। २०—(ब) बुदया; (म) हुदई। २१—(म) पैठि। २२—(म) राह। २३—(म) 'विद्या' शब्द नहीं है; (ब) हुदर। २४—(ब) बुलवैहु। २५— (म) कह बाह। टिप्पणी—(१) बीत कर गहा—'पीत कर गहा' पाठ भी सम्भव है। (४) प्रियमी—पृथिवी।

१६२ (६) बहवा—मेवा। बेल—सिरफल : श्रीफल एक फल जिसका छिलका अत्यन्त कड़ा होता है। (७) हँकारहु—पुकारो। ३२३ (रीडँगड्स १५ : मनेर १५१ख) आमदने बिद्या पेशे राव ब फरियाद करदन (विद्याका रायके पास आकर फरियाद करना) कटि हाथ मुख कीन्हा¹ फारा। बाँधे बेल तिँह जोरी बारा² ॥१ इहिँ बर बिद्या आइ तुलानाँ। देखि नगर महँ परा भगानौँ ॥२ देखत लोग अचम्मै⁵ रहा। पूछतँ⁶ बात न बिद्याहिँ कहा ॥३ बिद्यहिँ राइहिँ कीन्ह पुकारा। हुत जेवनारहिँ राऊ हँकारा⁷ ॥४ बिद्यहिँ राइहिँ कीन्हि (जुहारा)⁷। पूछा राऊ कँ यह सारा¹¹ ॥५ कौन परै अस राजा, आबा देस हमार¹² ॥६ राउत पायक बँदिको, लागो जाइ गुहार¹³ ॥७ मूलपाठ—(५) जुहार। पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान रफ्ती गुप्त बूरीदने नोरक ऊ रा (नोरकका उसका हाथ कान काट लेना)। १—हाथ काटि कीन्हो मुख। २—बाँध बेल थी जोरी बारा। ३— इहँ बिध सुरर। ४—म०—सभ। ५—अचम्मो। ६—पूछहि। ७— जुहारँ। ८—पानी फफ्ती सार। —बाँउ राउ वहाँ जेवनारा। ९— जुहार राजहि जाइ जुहारा। ११—पूछ मँडारी बिकठै जस बारा। १२— मयऊँ बड़े अस राजा बिद्यह देखन्त (?) हमार। १३—दानी मार कांधवार जा मारी जाग्रद् बेगि गुहार। टिप्पणी—(१) फारा—फाना। बेल—श्रीफल सिरफल। जोरी बारा—केशको बाँधा।

२६३

३२४

(रीडिंग्स् २५१ : मनेर १६ अ) पुरखीदन राव बिदा रा, व जवाब दादने ऊ (रावका बिदासे पूछना और उसका उत्तर देना)

निधइँ आन घोर१ एक दीन्हौं । पूछहि बात२ सो आगें कीन्हा ॥१ डरनहिपुरुख सो कैसें अहा३ । कौन सँजोग कौन निधि रहा४ ॥२ एक पुरुख औ दूसर नारी५ । तीसर न कोउ नाठ औ पारी६ ॥३ मत बुध होइ पच कहत न सोई । वैं खतरी पुरुख औ जोई७ ॥४ वह रे अचूक८ पान सर मारइ । वह रन खेले९ सैरंग सँभारइ ॥५ देख सँजोग राइ तिहँ बोलेउँ१० , माँगिउ११ अजफर दान ॥६ बन मानुस सम१ जीव गँवायउँ, आपुन१२ नाकि औ कान ॥७

पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—पुरखीदने राव बुन्दै रा (रावका बुदरसे पूछना)। १—बुदर तुरी फन्दान । २—बात पूछि । ३—टर तिव पुरूस केर कस आही । ४—रही । ५—एक पुरुस दूसर इइ भारी । ६—तस न कठनों नाउ बारी । ७—इप बुद्ध कै पच जग मोहइ । रेन माँझ चाँद अस सोहइ ॥ ८—वह अचूक । ९—वह सुन गारी । १०—दवी सँजोग राइ मत मुहि कहें । ११—बिह माँगे बीउ । १२—उपरी ।

३२५

(रीडिंग्स् २५२ : मनेर १६ ब) मुशावरत कर्दने राव करका बा दानायाने खुद रा (राव करंका का अपने मन्त्रियोंसे परामर्श करना)

पाठ सुनत१ सब मिले समाने । कै तुम्ह२ नरपइ भये अयाने ॥१ जो परदेसी एक नर होई३ । रुख जो मिलै मान लें सोई४ ॥२ यहिफर साइन को सुधि पावइ । दयीं सँजोग दख न चखावइ ॥३ जानइ बात सबै संसैसारा । एक हारीं औ होई मुँह कारा ॥४ काई पाच दइ वह हँकवाई । अस खतरी जो रहु अरुझाई ॥५

२१४ यह पर साथ बुलाइ, अमरित बचन सुनाइ ९।६ गाँउ ठाँउ सब वहँकौं' दीजइ नित भाषइ तित जाइ" ॥७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीषस—दास्तान तलबीने कर्दने बल्लभ रायतने मर्दुमान (जपन काज मिपासे पद्यमर्थ) १—सुनी। २—सबाने। ३—तुम्ह पुनि। ४—अपाने। ५—को परदेसी भाषा हाई। ६—एकहि एक मियरे होई। ७—सबी लैबोय बर बहि वमसनावइ। ८—दार। ९—सुहाइ। १ —विह। ११—नित नित भाषइ तुर आइ। ३२६ (री०कण्डम १५३। मनेर १६१अ) दिरस्तायने राव करका यह जुभारदाशन रा बरे गोरक (राव करंकरका दस ब्राह्मनोंको कोरबके पास भेजना) बाँमन दस बिप्रबंस बुलाये। बोल' बाष दै राठ' पठाए ॥१ जिहँ पर' आवहँ तिहँ पुन आनहु। जो यह कहँ सोइ तुम्ह मानहु ॥२ कही दान्ति हुत यह अन्यामी' । नाँक कान भल कूँचि कटाई ॥३ और जो मारे यह कोतबारा। तिहि औगुन है नियाउ तुम्हारा ॥४ राह पूर वह तुम्ह हँकराबै । जब चित पावई तब उठ जाई ॥५ इम राया" के परजा, बिप्रबंस पण्डित सब आइ" ॥६ दिस्टि पसार देखों को पावइ, इसै जूफरा काह" ॥७ पाठान्तर —मनेर प्रति— शीषस—दास्तान तलबीदने राव जुभारदाषन (रायका ब्राम्हनोंको बुलाना) १—बाध (?)। २—राड। ३ —विधि। ४—विधि। ५—कत। ६ —कहेउ बानी हुते अन्यायी। ७—कीन्ह कटाइ। ८—बुलवाइ। —ओ तिह। १ —बाध (?)। ११—पुनि नित भाषइ तुम्ह आई। —राभा (?)। १३—बोहि। १४—दिरिट अपार देखको पारे, पैन जगत कह आइ ॥

२४५ ३२७ (रीडिंग्स २५५; बम्बई २७) आमदने जुम्लारदारान व गुफ़्तन लोरक रा (ब्राह्मणोंका लोरकमे आकर कहना) बाँभन जाइ सो दीन्हि असीसा । बात सुनत सब' उतरी रीसा ॥१ लोरक कहा चाँ० कस कीजइ । इहँ बाँभन का' उत्तर दीजइ ॥२ बहुतै जन हम इहँके मारे । मूँड़ फाट के दीन्ह अवाय" ॥३ जं पर राजा लागि गुहारा । क्षस मरत कै दयी उपारा' ॥४ राजा आइ मल_तहँ नियाइ । सुनफे घास तिहिं कइसि पठाई ॥५ मता जो इम तुम उपजं, चाँदा अउर न काऊ आह' ।६ माइ पाप बन्धु कोउ नाहीं, बाँभन पूछहु काह' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—रसीदने जुम्लारदारान बर लोरक व चाँदा (लोरक और चाँदाके निकट ब्राह्मणोंका आना) १—बाँभन दीन्हि आ० अशीसा । २—मन । ३—इ पहुनहि (?) कस । ४—बहुत लोग । ५—मूँ० मुंड़ार जो रीस निसारे । ६—जै ऊपर अब उठे गुभारी । सूझि मरै जो लागि गुहारी ॥ ७—राउ बरा औ महै निवाइ । धन पान दइ बाघ पठा ॥ ८—सों पर भल आहि । ९—भा० बपु लोग न कुटुँबा पहुन (?) पुछ अब जाहि ॥ ३२८ (रीडिंग्स २५५ बम्बई २८; मनेर १९१ख) बाज आमदने जुम्लासदारान बर लोरक कलामे राव करका (ब्राह्मणोंका आकर लोरक से राव करका का सन्देश कहना) एक बाँभन गा फिर दस आये । बचन राइ कै आइ सुनाये ॥१ चलहु लोर अपने पी' धारहु । हम जियतैं जीउ जिन हारहु ॥२ पठा लोर सँजोइ उतारा । आइ करफ्स राइ जुहारा ॥३ बहुतै बैँरँ चलि हम आये । राजा सोक घरी सँवामे ॥४ नैन न देखा सुनौं न काऊ । दुइँ महँ दान लीन्ह बटाऊँ ॥५

२६६ वरइ^{१३} बिरोधैं^{१४} नरबइ, छाड़ि चलै घर बार। ६ इमरे अकेले दो मनई, न भिखारी फुटबार^{१५} ॥७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति- शीर्षक—(ब) गुफ्तने शुमारदारान दर लोरक व पौदा करदन रवान करदन पेश राजे (लोरक और चाँदेसे ब्राह्मणोंका एकके पास एकका चलनेको कहना) ; (म)—रफ्तने लोरक पीछे राज करका (लोरकका राज करकाके सम्मुख जाना) दोनो प्रतियोंमें पंक्ति १ और २ क्रमशः २ और १ हैं। १—(ब) नै पुनि। २—(ब) आपुन पा; (म) आपुन पउ। ३—(ब म) हम बिफरें मन महँ किन हारहू। ४—(ब) नेवरि। ५—(ब) सँबो (म)—सँबोह। ६—(ब) जाइ करका पठ; (म) पठ करका जाइ दुआरा। ७—(ब म) भुवि। ८—(ब) चली (म)—पउत। ९—(ब) राह सेवै हम (म) रे सो हम। १०—(ब म) रुताये। ११—(म) दुँहु महँ एक थान ले राज; (ब) दुँह मह एक ले थान राउ। १२—(ब म) बीर। १३— (म) बिरोधैं। १४—(ब) हमरे अकेले आह दो जन, माइ बीर घरबार, (म) हम अकेले दोइ मानुस बैरी भए सर्वखार। टिप्पणी—(७) मनई—मनुष्य व्यक्ति। ३२९ (रीडींग्स १५६ बम्बई २१ : मनेर १६२ (१) क) जबाब दादन राव मर लोरक रा (रावका लोरकको उत्तर) सुनि राजे अस उतर दीन्हा। जो हम सूझी सो^{१} तुम कीन्हाँ ॥१ अर्थ कहु मो पात कराऊँ^{२}। के पारी कें घर फिराऊँ^{३} ॥२ सीस नाइ लोरहिं^{४} अस कहा। गरु नरिन्द^{५} राठ तूँ अहा ॥३ मेदिन कई बड़ा हुँत राऊ। राइ दुहुँ हैं बड़ा नियाऊ ॥४ तुम्ह नरबइ नियाठ सब मानहु। जो धुर करहिँ देस घर आनहु^{६} ॥५ मारग चले यहैँ दिसि, लोग असीस तोहि। ६ जो रे संतापइ कोइ, सा हत्या पुनि मोहि^{७} ॥७

२६७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(बं ) बयान गुफ्तन राव करंगा लोरक व चाँदा रा (लोरक और चाँदा को राव करंगा का उत्तर) (म०) रीसैण्ड्स प्रतिके समान । १—(बं ) राजा : (म ) राजै । २—(बं ) बूझी : (म ) बाहँहि । ३—(बं ; म ) सो । ४—(बं ) कहु कबहुँ । ५—(म ) अबहुँ कहु सो र हाँ करौं । ६—(ब ) जी मारे के खरि पिराया (म ) जी मारौ के छुरी मरी । ७—(ब म ) लोरक । ८—(म) नरिन्दर । ९—(बं ) मेदिन कहै बड़ा है राउ । (म ) मेदिन कहै भला है राउ । १ —(बं ) राठ हुतै न होइ अन्याऊ; (म ) राय हुतै बड़ होइ न काऊ । ११— (ब ) तुम नरबइ अस्बाठ न जानहु (म ) जो तुम्ह नरबइ निकाहि जानहु । १२—(बं ) जो सुर करहि देस कहँ पानहु (म ) जो मस होइ छोइ तुम्ह मानहु । १३ (ब ) राजा भया करउ तुम हरदी पठवहु मोहि (म ) राजा भया मोह कइ, हरदी पठवहु मोहि । ३३० ( रीसैण्ड्स २५० ) शफ़कत कर्दने राव करका बर लोरक ( राव करका का लोरकके प्रति उदारता प्रकट करना ) रावैं आगे लोर हँकारा । अँकवन' लाइ पाट बैसारा ॥१ पूछइ बात लोर महँ कूहऊ । माँस चार तुम इहवाँ रहऊ ॥२ पुनि मैं पठउब पाटन लोरा । बार न बंफा होइ बिहि तोरा ॥३ चाँदहि आन मंदिर बैसावहु । तुम्ह सँसोइ छतसार उतारहु ॥४ घोर आन बाँधहु घोरसारा । हमार कुटुंब वानउ परिवारा ॥५ सुन लोरक अस भवैं, राजा हम न रहाहिं ।६ गोवर छोड़ हम आये इहवाँ, अब हरदी दिसि जाहिं ॥७ टिप्पणी—(१) अँकवन—अँकमे। (२) इहवाँ—यहाँ। (३) पठउब—भेजूँगा । बंका—धोखा देना । (६) रहाहिं—रहेंगे । (७) जाहिं—जा रहे हैं ।

१५८ ३३१ ( बम्बई ३ ; मनेर १६२ (१) ब ) सुनीने गुफ़्तारे लोरक मरहमत कर्दन राज्य बर लोरक ( लोरककी बात सुनकर राजाका लोरकपर उदारता दिखाना ) सुनि राजा अस किन्हि बिसाऊ । माइ हमार जो आइ भगाऊ ॥१ दीन्हि सिंघासन (अउर)¹ तुरंगा²। पन्थ लाग तुम्ह राइ फरका³ ॥२ रफा नाइस परसाद दिवाई । [तुरत बेग पतरा लेइ आई]⁴ ॥३ सेठ करौं⁵ जो इहवाँ रहहू । सो मन मान तिह तुम्ह जाहू ॥४ तिह के बात न पूछै कोई । बिहके साथ तिरी एक होई ॥५ राइ बाँमन दुइ दीन्ह⁷, जित भाषइ तित जाहु ।६ घर फै कही न पारौं, मया¹¹ करहु तो रहाहु ॥७ मूल पाठ—(२) आखठ (अलिफ वाव शाव) । ३ के स्थानपर 'शम' लिपिकरकी भूल है । पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—मरहमत कर्दन राव करका बर लोरक (राव करकाका लोरकके प्रति उदारता प्रकट करना) १—अउर । २—तुरंगू । ३—बड्डु लाय तुम्ह लाग करंकू । ४—कात । ५—लै आयी । ६—करहु । ७—नहि जो मन होइ तिहवाँ जाहू । ८—बात करै न कोई । ९—जो परदेशी तहँगा होई । १०—राइ बाँम्मन दून दीन्हे अगूवा । ११—मयाह । ३३२ ( रीडिंग्स १५८ : मनेर १६२ (२) अ ) अर्ज दाश्त कर्दन लोरक पेशी राव करका ( राव करकाके लोरकका निवेदन ) सुन राजा एक ब...रा । हा बास ... बिहारा¹ ॥१ हरदी आहि हम... । मन धरि घ... तेहिँ जोगू ॥२ अस रात गाहिं ... । भीम नाइरे ... लीन्हा ॥३

२६

दीन्हि सिंघासन औ तुरगू । पथ लाइ तुम्ह रायि फरगू ॥४ उतरे आईं पौंमन के अवासा । मँगता मिलया आइ जिह पासा ॥५ पूनेठैं रात सपूरन सूते, फूलहिं सेज पिछाइ ' ।६ पास लुपुध सुअँग एक आधा, अउतहिं चाँदहि खाइ ' ॥७

पाठान्तर—मनेर प्रति — शीर्षक—बाज कत्ने लोरक राब रा बाजी मतुम (रायत लोरकका निवेदन) इस प्रतिमें पंक्ति ४ नहीं है । उसके स्थानपर पाँचवी पंक्ति है । पाँचवी पंक्तिक स्थानपर एक नयी पंक्ति है । १—मुनहु राऊ । २—रइ चले सो गोप तुम्हारा । ३—हमारैठ । ४— रा० उतर सुनि बीरा दीन्हा । ५—सीस चढाइक लोरक कीन्हा । ६— यह पंक्ति नहीं है । ७—बा० । ८—अथवा (लिपिक 'बात' क बाद 'अलिफ' लिखना भूल गया है ।) —मंगता आइ मिल जिह पासा । इसके आगे पाँचवी पंक्तिके रूपम नयी पंक्ति है—बीकहि कछू दाय क देइ । जस कीरत आपु कहँ बढ़इ ॥ ९ —मइ । ११—अवति संज बिठाइ । १२—म —पास हुपुध सुअँग न मानी चाँदह खाइ अधाइ । टिप्पणी—पंक्ति ४ और कड़बक ३३१ की पंक्ति २ एक समान हैं । सम्भवतः यह पुनरुक्ति लिपिकके प्रमादका परिणाम है ।

३३१ ( मनेर १६३ (१) ब ) दास्तान बेहोश शुदने चाँदा बेमुकर्ररबे खुदने मार ( साँपके काटते ही चाँद का मूर्छित हो जाना)

डँसतहिं चाँद भइ अँधियारी । पंग भरत बिसँभर गइ भारी ॥१ खबरी खाइ चला फुफकारी । लोर बीर सुनि लागि गुहारी ॥२ पेट पवान लोर कत गहा । तम टेक्स्रि जस ठाउ न अहा ॥३ पार सुअँग लोर को आवा । चाँद मुई लोरक घबरावा ॥४ डारक बाँभन छत जगायउ । घर घर फहही फिरइ खायउ ॥५ निकर सुरु उप अँधवा, परा धरहिं पर सोक ।६ तिरिया पुरुख ऊपर किया, तिह बिधि दीन्ह बियोग ॥७

२७ १३४ (सुमेर १६६अ) शब्दान कर्दन लोरक अज खोये चाँदा (चाँदके बिरहमें लोरक) सात देवस लगि सरग ढफारा। सोक मँझर भान बिसियारा ॥१ राहु केतु यह देखत आहा। सुरज सनेह पाउँ न अहा ॥२ सुक्र बिरस्पति दोउ बुलाये। चाँद क छितवत गरह दुहुँ आये।३ यहु महि छंकर मारि अटामहु। चाँद मोर पिय आजु बियावहु ॥४ गगहा भिगा कीन्हा पै घरी। भै सँग आगो होइ गिरी ॥५ सुरज क रोवत घरैँ, और नखत को आइ ।६ नदिक झार सरग सब जरै, अउर धरति को आइ ॥७ १३५ (सुमेर १६६ब) एज्मो इस्तहोबारी कर्दने लोरक (लोरुकका विलाप) रैन माँग परकाहू सूर। जैँ र सुनौ सो धाहहिं आवा ॥१ तन्त्र न मन्त्र न औखद मूरा। और सहेलिहूँ पन्हन तोरा ॥२ लोरक पीर बहु फारन करइ। धाहि कपारै कुन्त दै मरइ ॥३ बिहिसंगित जेउँ सम घर भारू। तिहि बिन कस अब जीउँ अधारू॥४ चन्दन काटि कै चितइ रची। आन आग तिह ऊपर सची ॥५ तैं बैसन्दर बारी, कसै धरि सरियाइ ।६ इपी गुनी एक आनाँ, चाँदा लीन्हि जियाइ ॥७ टिप्पणी—(१) जैँ—जिसने। धाहहिं—रोता हुआ। (२) पन्हन—कंचन। (५) बैसन्दर (स वैश्वानर> प्रा बइस्साणर, बरत्ताणर>बैताँदर)— अग्नि। बारी—ज्वाला। सरियाइ—सजाकर। (७) शुनी (गुणी)—गारुड़ी सर्पवैद्य। लीन्हि—लिया।

२७१ ३३६ ( मनेर १६७भ ) दास्तान आमदने गारुड़ी न गुफ्तने मन्तर बर चांदा ( गारुड़ीका जाकर चाँदपर मन्त्र फूँकना ) रूपन लागि मन्त्र उँह कही । सुनतहि लोग अचम्भै रही ॥१ भरि एक रात चाँद हुत डसी । डसतहि मुई न बिसफर बसी ॥२ अगनित गुनी सबै चलि आवा । होई अकारन मरन न पावा ॥३ बिपतैं जीउ न काहुँ माई । डसतहि मुयई परट पर आई ॥४ अब सो गुनी मन्त्र एक बोली । सुन पावा इसराफस टोली ॥५ देख गुनी मन चिन्ता, अखेतैं मन्त्र एक बार ।६ गुरु कै बचन सँभारउँ, जीउ देइ करतार ॥७ ३३७ ( मनेर १६७ब ) दास्तान जिन्दाशुदने चाँदाका बेफरमाने मुरादारा ( ईश्वरेच्छासे चाँदाका जीवित होना ) पिरम मन्त्र जो गारुड़ पढ़ा । बँफर लहर सुन चाँदहि चढ़ा ॥१ कर कगन अमरन सभ दीन्हा । औ सो गारुड़ माँगि कै लीन्हा ॥२ हरदी समत चले फिर आयी । कीन्हि सिघासन चाँद भलाई ॥३ दुँहु के मन कै पूवी आसा । करहिं बहुत मन भोग बिलासा ॥४ अलखनिरंजन आदि बियातइ । दई क लिखा सो मानुस पावइ ॥५ भरम दरम सभ सोही, चाँदा ओ बीउँ संसार ।६ तुम्ह मुई तुम्हहुत जिउ देवेतैं, मरत न लागत बार ॥७ टिप्पणी—(१) गारुड (स गारुडिक)—विषवैद्य सरपका मन्त्र जाननेवाला । (३) बिलासा—देखिये टिप्पणी १५२।६ । (५) अलख निरंजन—(नाथ पंथियोंकी भाषामे) ईश्वर । आदि—निश्चय । दई—ईश्वर, भाग्य ।

१७२ (६) दरब (द्रव्य)—धन । (७) बार—विलम्ब, देर । ३३८-३४३ (अनुपलब्ध । सम्भवतः निम्नलिखित कड़वक इस बीचके हैं।) [ १ ] ( बम्बई ३१ ) जंग कर्द गोरक बा अमीरपान व पूज्यानान व बाजीउफ़तन्द व बाज़ीगुरीख्तन ( गोरकका अहीरों और महलियोंसे लड़ना कुछ मारे गये कुछ भाग गये ) सभ महलियों गिरे घरू आनी । नियरे मीचु दसी दइ आनी ॥१ धँस बीर कोप्या सब जीउ आन । ओही धनुष परो गिउ आन ॥२ जो सँभारे सो तस मारा । को रोवइ कइ करइ पुकारा ॥३ एक महँ होइ उठे सोमहाई । बहु मारे बहु गये पराइ ॥४ आतहिं मरहिं ब्यान नहिं पारैं । आगें मास पाछें निहारैं ॥५ धीबो रहम पहेलिया, तिहकौं मीचु घटान ।६ कउवा चील्ह सा(भाग) मा, जम्बुक गीध अधान ॥७ मूल पाठ—भुग (बे हे गाफ) । [ २ ] ( बम्बई ३२ ) बाजे जंग शुजायस्त रवान शुदने चाँदा व गारक तरफ हरदी ( चाँद और गोरकका युद्ध क्षेत्रसे हरदीकी ओर रवाना होना ) रकत कँहूँनी उबे गँधाई । चला छोर छोड़िहूँ सो ठाँई ॥१ पुनि बीर ओडन कर लीन्हा । पुरुख दिसा तब पाँवत कीन्हा ॥२ करि कै खेती साझर घाती । चौरासी सत्त निंदरा मूती ॥३ रुण्ड मुण्ड मँह मेदिन पारा । बहु रोवैं बहु करहिं पुकारा ॥४ बैंतरत नदी बो भइ पनबारा । डाकिन आगिन उतरहिं पारा ॥५

चलो सो बनखंड लोरक, बसेउ विपिन बन जाइ ।६ पाकर रूख देख फर, तिह तर रहे लुभाइ ॥७ ३४४ (रीसेंड्स ३५९; बम्बई ३३) मौंदने लोरक व चाँदा शब दर बयाबाँ व मार खुर्दने चाँदा रा जेरे दरख्त (रात्रिके समय चाँद और लोरकका वृक्षके नीचे रुकना और चाँदाको साँपका डँसना) चलत चलत जो भइ गइ साँझा । कीन्हि बसेरा बनखंड माँझा ॥१ पाकर रूख देखि छितनारी । तिहिं तर बसे पुरुख औ नारी ॥२ सेइ मूँज सुख सेज डलाई । सूता सुरुज चाँद गियँ लाई ॥३ बँधवें जोन' मयठ अँधियारा । पाछिल रात होत भिनसारा ॥४ सिंहिस्त बिसहर दीन्हि दिखाई । चाँदहिं डसिकै गयउ लुकाई ॥५ अस सुकुमार लहर जो आई, खात' गयी मुरझाइ ।६ एक बोल पै बोलसि चाँदा, लोरहि सोवत जगाइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—शब रफ़्तने राह शब दर बामद व कुरुद बामदन्द । जेर दरख्त पाकर ब मार कसीद चाँदा रा (मार्गमें रात्रि होजाने पर रुककर पाकड़के वृक्षके नीचे सो रहना और साँपका चाँदाको डसना)। १—अधवें जोन्ह । २—म । ३—चाँदहि । ४—सति । ५—ओ कइरंहि । ६—कार्टेन्हि । ७—एक बोल पै बोली चाँदें सुता लोर जगाइ । टिप्पणी—(१) बसेरा—निवास । माँझा—मध्य बीच । (२) पाकर—पीपलकी जातिका एक वृक्ष । रूँख—वृक्ष । छितनारी—घना । (४) पाछिल—पिछला । भिनसारा—सुबह । (५) सन—उस समय । बिसहर—साँप । (६) सुकुमार—सुकुमार, कोमल । (७) लहर—विषका प्रभाव । (८) खात—खाते ही (सर्पके विषसे प्रभावित होनेको 'लहर खाना' कहते हैं) ।

१७४ ३४५ (मधुरकथा) ३४६ (रौतँबूल २६१ : बम्बई ३७) गिरिया करने लोरक अज बेहोशिये बाँदा (चाँदो मूछँपर लोरकक विलाप ) छाड़ेउ माइ बाप' महतारी । तजेउँ बियाही मैना नारी ॥१ लोग कुटुंब घर बार बिसारेउँ । देख छाड़ि परदेस सिधारेउँ ॥२ गाँठ ठाँठ पोखर अँबराई । परहरि निसरेउँ कवन उपाई' ॥३ अरब खरब कर लोग न कीन्हेउँ । चाँद सनेह देसन्तर लीन्हेउँ ॥४ विष होइ बाट बात' परी करतारा । न धनि भयउ न मीत पियारा॥५ भइ मात अब आनेउँ, चाँदा तोरें मरन निदान' ।६ जो जिठ जाइ कसा कस देखहि', मैं का करब मधान ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—तन्हाई व बेकशीए खुद ममूवने लोरक अज बराये चाँदा मुम- एक शुदन (लोरका अपने अकेलेपन और विवशता पर तड़पना और चाँदके लिये परेशान होना) । १—बाप माइ। २---कवान पाई (काफ मूल आलिफ सून थे, बालिफ ये धून) सम्भवत बालिफ सून आये पीछे किगर गये हैं। मूलपाठ 'कँवन उपाई' है। ३—'बात' शब्द यहाँ है। ४-ना। ५- भइ र बात अब ब्यानहि चाँदा मोर छन होत परान । ६—दैठौ । टिप्पणी-(१) परिहरि-परित्याग करके । बिसरेउँ-निकला । ३४७ (रौतँबूल २६२ बम्बई ३५ सबेर ३६५ख ) पैंजन (वही) जीउ पियारा निसर न जाई । पिस न गाँठि मरतेउँ कें खाई' ॥१ मरिहउँ कोइ करुँ सो उपकारा । जीम' खाँड़ इनि मरउँ कटारा ॥२

२०५

चाँद मुयँ कित पावइँ' लोरा । साथ किये सो पहिगै मोरा' ॥३ नैन नीर मरि' सायर पाटी । नाव चढ़ाइ चाँद गुन झटी ॥४ दयों गुसाँई सिरजनहारा । तोहि छाड़ि कस करउँ पुकारा ॥५ जस कीन्हेउँ तस पायउँ, चाँद रहेउँ मन लाइ ।६ जो पाउर मनुसँ चित बाँधि, सो अइसै पछताइ ॥७

पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— शीर्षक—(बं ) मने खुद किवा साखने लोरक बज बजये चाँदा वाकवाये हाले खुद बाव नमूदन् (चाँदाके वियोगमे लोरकका आत्महत्या करने की बात कहना); (म ) गिरीस्तने लोरक व फरियाद कर्दने ऊ ( लोरक का रोना और फरियाद करना ) । १—(ब ) किउ नहि गाँठ जो मरतेउँ खाई, (म ) किस नहि गाँठ मरब जो खाई । २—(बं ) मरिहउँ कठनै करै उपकार; (म ) माणिहउँ कठनैउँ के उपकारा । ३—(म ) ओहि । ४—(बं ) पाठब (म ) पाबहि । ५—(ब ) साथ किये सो बहि गै हम नहिं भोरा (म ) सो कहि ने तोरा । ६—(ब म ) गै । ७—(बं म ) रूपी । ८—(बं म ) किह । —(म ) खंड पाँव । ९ —(ब ) मनुसे (म ) मनुसहिं । ११—(ब म ) अन्सहिं ।

टिप्पणी—(१) निउर—निकष । (४) सायर—सागर, समुद्र । पाटी—भर दिया । गुन—रस्सी । (५) कस—किस प्रकार । (७) पाउर—पामर, मूख । अइसै—इसी प्रकार ।

३४८ ( रीडिंग्स ३५३ : मनेर ३५५अ ) गुफ्तने लोरक बरख्ते पाकर (लोरकका पाकर वृक्षके प्रति उद्गार) बैरिन भइ सो पाकर रूखा' । जिंह तर बसें परा महिँ दूखा ॥१ फाटि पेड़ जरि भूर उपारों । डार डार चीर कै पारों' ॥२ सरि रच आग चहूँ दिसि बारों । चाँद लाइ गियँ आपुहिँ जारों ॥३ देस देसन्तर गये मोर लाजा' । सुरुज चाँद कइ निसि लै (माजा)' ॥४

१७६ जो यह पिख और बिरी बाह्रैँ⁷ । नरक कुण्ड मह पुरखा पाड़ैँ⁸ ॥५ पत्त न होइ सत छाड़ें, हानि न होइ फुर कान ।६ तोरें पुभि फोर मञ्जानों⁹, घिय पराइ आन ॥७ मूलपाठ—(४) भागा । पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—मलामत करने गोरक बान दरख्त रा (गोरखका पेड़की भर्त्सना करना) १—करता । २—भादि । ३—डार बार कै बाहली पारौं । ४—भाग । ५—देख देख मुर बहि गइ गाजा । ६—सूरज चाँबहि के निशि माथा । ७—अप को फिरित विह और न बारौं । ८—नरक कुण्ड हम पैंदा (?) पाड़ौं । ९—तोर और बोलर मैझानों । टिप्पणी—(१) तूखा—फल कलेवा । (२) अरिमूर—जड़ मूल । उपारौं—उखाड़ूँ । डार बार—डाल डाल । बारौं—बहाऊँ । (३) सरि—चिन्ता । (५) पुरखा—पूर्वज । (६) फुर—कुछ । कान—लाज, प्रतिष्ठा । ३४९ (राँचेन्ड्स १६७ : बम्बई ६२ : मनेर १६५क) गुफ्तने गोरक बर मार रा व तासुक कुर्दैन (गोरखका सर्पके प्रति उद्गार और खेद) कारे¹ नाग सत्तुर बटपारे² । मीत³ विछोह कीन्हि हलबारे ॥१ बरु यहिं खावसि बहुत रे कुघाती । काहे देखी हैं मोर संघाती⁴ ॥२ तोरेह ढैंठ आइ जो बसे । पुरुष छाड़ि कित नारी डसे५ ॥३ मन्त्र सक्ति कै सत्तुर चलावा । कैं रे नाग तू गाइन आवा ॥४ कै तों बावनबीर पठावा । छाँद उसहिँ¹¹ नाग होइ आवा ॥५ विहने⁷ कारन मैं¹२ जीव नियारा ' दखतौं मळसन्ताप ।६ विह सेतें बिषपाही, जरबज मारी साँप ॥७

२७७ पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रति— टीका—(बं ) दामाद गुफ्तने लरक बाक्ये हार गुन अन बुझइ चाँदा अन्देशमन्द (लोरकका मने प्रति उद्गार अन चान्दा किए व्याकुल होना)। (म) सलामत बदने लोरक ब पटकुआ बदने मार रा (लोरकी भर्त्सना करना और शाप देना) १—(सं०) काते। ५—(ब ; म) वरकारे। ३—(बं ) मील। ४— (बं, म) ह। ५—(बं म०) काइ दोगी मार अघाती। ६—(बं ) पुरुष छाडि मरोहि बल देखै। (म) पुरुष छाडि बल बिगिदि टने। ७ (बं) कै। ८—(सं०, म) पठाबा। —(सं०) बैठ कान तूं गुलनहि लगा; (म) बैठ कान से गुलन लगा। ९—(बं) तुहि। ११—(बं म) बाँसहि हम। १२—(बं म) जिह। १३—(म) हौं। १४—(म) नियण्ठ। टिप्पणी—(१) वरचार—वरभार। (२) दुआती बुरे कुल्भे रच्छा हुआ। गंवाती—नासी। (३) डाँड—म्यान। (४) गाहब—माप। (५) बाबन बीर—चाँदबा पति। (६) बिचगाडी—बीस रातामें। असवत—अकारण शत्रुता उत्पन्न करना। ३५० (रीसंण्ड्म २३५ ; बम्बई ३६ ; मनेर १६२ख) अस्नान करुन लोरक बम गदहाही चाँदा (चाँदकी मूर्छापर लोरकका विलाप) कै रे¹ कुदिन हम पौंयत घरा। कै रे² कलाप³ मैना कर परा ॥१ कै रे⁴ कुलुप जिउ भारी कीन्हों। कै रे⁵ सराप माइ मुहिं दीन्हों ॥२ घरी धरत गा पंडित पुरानाँ। कै हम कुसगुन कीत पयानाँ ॥३ इत पइ भयउँ न चौंट⁷ दुछायतें। कउन पाप दइया में¹⁰ पायउं ॥४ यह रे¹¹ महर जिय नारि अदोसी¹²। कै रे¹³ निपूती चाँदा कोसी ॥५ कै गयउँ कछु दइ मुकरावा¹⁴, दोस सुबरहि लाग। ६ कउन नींद सुम¹⁵ सती¹⁶ चाँदा, सपनें¹⁷ मयउ सुहाग ॥७