चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
२८७ पाठान्तर—मनेर प्रति— शीर्षक—दास्तान सिफ़ते मौलाना दाउद व गुफ़्तारे ऊ (मौलाना दाऊद और उनकी रचनाकी प्रशंसा) १—दाउद कवि जो चौंशा गाईं । २—र । ३—बोल । ४—आखर । ५—छाँप उसी हीं सोइ बखानी । ६—काय । ७—सुनाथैँ । ८—मुक्लिक नयन सुनु बोल हमारी । ९—बनइ । १ —एक एक बोलि मौति अस फिरवा, कहउँ भो हीरा तोर । ३६१ ( मनेर १७१ ब ) विदभा कर्दने लोरक हकीम रा ( लोरकका चिकित्सकको बिदा करना ) गारुर समुँद चाँद लै चला । तैं हँ बात कहसि अति भला ॥१ बायें दिसि तूँ लोर न जाबसु । दाहिनें बाट बहुत फर पावसु ॥२ पिरम भुलान यह बोल न मानी । भाट चलत सहाइ न आनी ॥३ डांडी के लोरक चाँद चलाई । दाहिनें दिसिवैं दिस्टि मिलाई ॥४ घर आपुन दण्ड छाड़हि कहीं । जहाँ परिरोहि ठाड़े तहाँ ॥५ बार अँधवतैं जाइ सुलाना, लोरक सारगपूर ।६ दिनकर मूँड ऊघावा, राता जैस सिंदूर ॥७ टिप्पणी—(२) फर—फल । (४) डाँडी—एक प्रकार की पालकी । (५) परिरोहि—मना करें । ठाड़े—खड़ा । (६) बार—दिन । अँधवतैं—अन्त होत ही । सुलाना—जा पहुँचा । ३६२-३७० ( अनुपलब्ध ) अनुमान है कि पञ्जाब प्रतिम प्राप्त निम्नलिखित चार कड़वक इस स्थान के होंगे। किन्तु उनका क्रम और उचित स्थान निश्चित करना सम्भव नहीं है ।
१८८ (१) (पंजाब [क]) आइ महावत [ ] अलापा। माइ महावत असपत धावा ॥१ [----] लोरक [----] नाँ। जानु पहरु झाऊ कै बनां ॥२ [ - ] । [ ] ॥३ भट लोग भये असबारा। काढे बेरुफ होइ चमकारा ॥४ चढ़ेहि लोर तैं बाहु परा[ई]। [ ] कें न नहि पड़ा[इ] ॥५ [ ] छाड़ जाहु [ ] ।६ [ ] ॥७
(२) पंजाब [क] लोरक हरक खेद भिराई। धीर [ ] ॥१ [ ]र गढ़ै जिह सेस बैसा [रे]। पाठ बेरी [ ] ॥२ [ ] । [ ] ॥३ रमफ बन नान क[ ]बिस मोही। घर नर [घ]हुत न दे[खी] तोही ॥४ घर घर अछे [ ] नाँ मान। चित मन माठ [ - ] ॥५ [ - -- ] ।६ [ -] ।७
(३) (पंजाब [ख]) [ ] राज मधुबर लोरक रा [ ] (१) रादा महता एक मन्तर कीन्हा। लोर बुलाइ पान लै दीन्हा ॥१ लोरक काज अन्दारा कीयइ। पयना मोर हरेवहि दीजइ ॥२ बयना पाति आगें अरघायसु। परहितहिं पठया लार फुलायसु ॥३ पाहा कापर खारहिं छीन्दौं। इहवहिं समुदित अंका सीन्दौं ॥४ ताकें सार साहि [----]गवा। पाँइ तिहैं तह क धावा ॥५
२८९ मसबै फरसा निसरान, अइषा राख जो राजा [ ] ॥६ घोडैँ चढ़ेठ लोरक तिहाँ, चल [ - - ] ॥७ (४) (पंजाब [ख]) सुनि कै महुअर फोट उछावा । जानसि लोरक मारे [आया*] ॥१ गइ महँ कीन्हें काष सराचा । काट घरैँ [ - -]ावा ॥२ [ - ] इरबहि राउ डिंग [ ] । इरदीपाटन देस दिखाये ॥३ हमरै अइस दूरी न कीजइ । एक चढ़ाई भेद बहु दीवइ ॥४ अइस पुरुसँ आइ समानाँ । पुरुख तिरिया देखहि बहिराना ॥५ [ - - - - - - ] ॥६ [ - - - ] ॥७ टिप्पणी—ये चारों पृष्ठ जीर्ण हैं तथा उपलब्ध फोटोमें लाल स्याहीसे लिखी पंक्तियाँ स्पष्ट नहीं हैं। अतः प्रस्तुत पाठ सम्भाव्य वाचन मात्र है। ३७१ (मनेर १०३ख) बहोश शुदन चाँदा आँबा वा लोरक गुफ़्तन (चाँदाका होशमें आना और लोरकसे कहना) उठ गइ चाँद सँ नींद भल आई । जस सपनैं हीं नागन्हि खाई ॥१ फइसि पिछार पथ सर जाहीं । सपनहि सो ठिक पूछी नाहीं ॥२ सपनहि थार में गतरउ टीसी । कान्हि रन बो रन मँह पैसी ॥३ फरम हमार सिंघ एक आवा । जिहुत हम तुम्ह पर मिरावा ॥४ पाउ सिंघ कै छाड़ेउँ नाहीं । नभ लगि जीयहुँ सेउ कराई ॥५ देह अमीस सिंघ अस बोला, लोरक तूँ मुर माइ ॥६ पार माझ एक हूँटा बोगी मत बाँदहि लइ जाइ ॥७ टिप्पणी—(६) मुर (मोर)—मेरा । (७) हूँटा—अस्करी न इसे 'टोंटा' पढ़ा है और टन तोता (पक्षी) के रूपम ग्रहण किया है पर यह स्पष्टतः बोगीका विशेषण है । मनेर प्रतिके १
२१ पृष्ठ १४७-ब (कडवक १७४) के शीर्षकसे जान पडता है कि उस प्रतिके तैयार करने वालेने इसे 'टूँगा' पढा था (उसने इससे हाथ पाँव कटे होने का अभिप्राय ग्रहण किया है) । सम्भवतः इसका तात्पर्य किसी सम्प्रदाय विशेषके योगीसे है । टूँडा या ढूँवा नामक किसी योगी सम्प्रदाय की जानकारी हमें नहीं है। हो सकता है यह अपपाठ हो । १७२ ( मनेर १०१-ब ) नैं लोरक, तुरा रोजे बद उफ्पद मारा याद कुन ( लोरक यदि तुम पर विपत्ति आये तो मुझे स्मरण करना ) लोरक को तिह पीरा परही । चाँद तोर जो टूँटा हरई ॥१ दइ सँवरि मुहिं नैबरसि लोरा । ठाठें ठाठें मैं आउब सोरा ॥२ पसना कहि सिध चला उठाई । चाँद् लोर (दोइ) रहे सुमाई ॥३ परि इक सिधमैं पइठ नबाई । पुनि उठ चलि कै बाट घटाई ॥४ दवस चारि जो चलतहि भये । नगर एक पैसारथ किये ॥५ लोरक कहा चाँद् तुम्ह बइसहु, हौं सो नयर महँ आउँ ।६ कनक अन औ लागती, बर बेचन कछु र कराउँ ॥७ मूलपाठ—(१) बोर । टिप्पणी—(१) परहा—(इतना) बह । (५) पैसारथ—प्रवेश । (६) बइसहु—बैठो । नयर—नगर । (७) कनक—गेहूँ । अन—अन्न । १७३ ( मनेर २ प.अ ) दरमियाने कुश्तानए त्रिभुभान चाँदा रा मौद ( चाँदाको मन्दिरमें बैठाया ) चाँद मढ़ी बैठार छुपारई । लोर नगर महँ सीदँ आई ॥१ दूतं छभित देखि तों पावा । छंदलाइ चाँदा पहँ आवा ॥२
१९१ आसन मारि बैठ तिह आमी । अब मों पहँ कित चाँदा जामी ॥३ सिंगी पूर नाद तस किया । जन बैसन्दर परा विष दिया ॥४ सुनतहि चाँद बेधि तस गई । अपछठ मरन सनेही मई ॥५ जस अहेरिया पा बिरख, भिरिग बेधि लै जाइ ।६ टूटैटा भयतें अहेरिया, चाँदहि गोइन लाइ ॥७ टिप्पणी—(१) सौंहै—(इस वस्तुके) भ्रमके निमित्त । (२) कबिड—छवि । कँडकहूँ—बहाना बनाकर । पइँ—पाछ । ३७४ ( मनेर १७७ख ) चीजी कपसून इंसान कि चाँदा दीवान शुद ( उसका जादू करना चाँदका पागल हो जाना ) सिंगी पूर मन्त्र सो लाषा । चाँद सुन कछु चेत न आषा ॥१ चाँदा गोइन लइ चला भुलाई । गाठ गीत औ कछु न फराई ॥२ तइस संग भइ चाँद सुभागी । गाँव गाँव फिरि गोहन लागी ॥३ देखि सिंघ औ कण्ठ अधारी । भूली कछु न सँभारी घारी ॥४ चाँदहि बिसरा सब सर्वंसारू । बिसरा लोर जैं जीठ अधारू ॥५ सुनै नाद अउ देख, पाछे हेरि न बारि ।६ लोर आइओ देखी मढ़ी, चाँदा बिनु अँधियारि ॥७ ३७५ ( मनेर १७५क ) यूँ लोरक आमद व बीनदके चाँदा दर बुतखाना नीस्त ( लोरकने लौटकर देखा कि चाँद मन्दिरमें नहीं है ) सुनि मढ़ी देखि लोरक राषा । काहे कहूँ बिधि कीन्हि बिखोषा ॥१ अबहूँ जा र सरग चड़ धावउँ । तो वहँ खोज चाँद कर पावउँ ॥२ लार चहु दिसि भँमि भँमि आवा । खाय चाँद कर राव न पावा ॥३ रैन गइ पै चाँद न पाइ । उठा सुरुज चलि खोज फराइ ॥४
२१२ आजु राति जो चाँद न पाई। सारस भरु र मरौं भदाइ ॥५ ठाँउ ठाँउ सो लोरक पूछी, न सुना एक सिंघ पाइ ॥६ अँधयें सुरुज चाँद जस तिरिया, टूँटा देखि लइ धाइ ॥७ टिप्पणी—(५) सारस—सारस दम्पतिका अटूट प्रेम प्रसिद्ध है। एकके मरने पर दूसरा भी अपना प्राण दे देता है। ३७६ ( मनेर १०१ब ) चूँ शनीद लोरक कि दस्त पा बुर्रीदः कर दरख्त ( लोरकने सुना कि उसके हाथ पाँव कटे हैं ) लोरक जो टूँटा सुनि पावा। खोजत खोज जाइ नियरावा। नगर एक पइसत सुधि पाई। टूँटा सग तिरिया एक आई ॥२ पीर नगर सो धाइन लागा। फीक होत टूँटा कर रागा ॥३ सुनतहि नाद लोर गा आई। देख चाँद मन रही लजाई ॥४ दौरि लोर टूँटा कर गहा। अरि भिखारि सिंह मारतैं काहा ॥५ धरी जटा ले चला राउ पहँ, तोहि फिराऊँ घरि ॥६ झूँठि जटा लगि पहिरा छै, औहट मा चलि दूर ॥७ टिप्पणी—इस कड़बकका शीर्षक टूँटा के शाब्दिक अर्थ पर आधारित है। विषयसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। (१) खोजत—खोजते हुए। (२) पइसत—प्रवेश करते ही। ३७७ ( मनेर १०२अ ) चश्म कुशावद कर्द व दीदने टूँटा लोरक रा ( लोरककी ओर टूँटाका आँख फाड़कर देखना ) आँखि फाड़ि क टूँटा धावा। लोर कहा हौँ खीन वै खावा ॥१ लोरक मागि चला सो डराइ। पन्थ टूँटा सुहि भसम कराइ ॥२
२११ टूंटै कहूँ लोर मैंगरावा। सिध बचन हुत मन महँ आवा ॥३ सिध आइ लोरक पैंथ ठाढ़ा। लोरहि टूंटहि बोल जो पाढ़ा ॥४ दूनौ कहहिं चाँद सुर जोई। औ तिह माँझ मुकाउब होई ॥५ बाँदा ठाढ़ी कौतुक देखइ, मुँह मँह बकत न आठ ॥६ बन खेल औ गीत भुलानें, रावल सीस डोलाठ ॥७ ३७८ (मनेर १०२ब) दरमियाने खोगी व लोरक गुफ्तगू शुदन (जोगी और लोरकमें बातचीत) सिध कहैइ तुम्ह काहे जूझहु। करहु गियान मन मँह सूझहु ॥१ सभा करहु अउ करहु बिचारा। दुँहु को जीती को दुँहु हारा ॥२ जूझइ चाहु जो पूछा भला। बाहाँ जोरे लोरक चला ॥३ चाँद साथ भइ औ सिध भवा। पुँनि नगर-सभा महँ गवा ॥४ नगर उहाँ पै भइठ जो दीठी। इँदर सभा बरु सभा पईठी ॥५ सभा सँवारि जो राउत, भइठ उहाँ पै बाइ। ६ चारि खण्ड का नियाउ नियारहि, एकउ फरह न जाइ ॥७ टिप्पणी-(१) गियान-ज्ञान। (७) नियाउ-न्याय। नियारहि-निर्णय करते हैं। एकउ-एक भी। फरह-यह शब्द भोजपुरीमें बहुत प्रचलित है और कायदेके वाक्य अदालतके प्रयोगमें प्रयुक्त होता है। यहाँ तात्पर्य 'वराके बाहर से है। ३७९ (मनेर १०७अ) हर चहार कस सलाम रसीदन (चारों जनोंका प्रणाम करना) आइ चहूँ मिलि कीन्हि जुहारू। जुझ मरत इहिं करहु विचारू ॥१ बारा सभा कहँहु दुहु आई। कहि लागि तुम्ह जूझहु भाई ॥२
२९४ एक एक आपुन बात चलावहु । झूठ साच आपुन तुम्ह पावहु ॥३ उठि लोरक तो गइसा कहा। भइठ ढूँढै यह सेतक अहा ॥४ सिंगी पूर चाँद हर लीन्हा। सगरें रैन खोज मैं कीन्हा ॥५ खोजत पायतँ ढूँटा, घरेउँ फेरि कै पार ।६ झूठ बटा लाग फिरौंइँ, जानौं सब सैंसार ॥७ ३८० (मनेर १० ब) गुफ्त[न] जोगी ई कन मन कन्दा (जोगीका कहना कि यह मेरी स्त्री है) पूछहु सभा कहहु पैंह लोरा। कतैन लोग घर कहुवाँ तोरा ॥१ कहवाँ अइसी तिरी सैं पाई। काफर भिय यह कहवाँ काई ॥२ काहे निसरहु दोइ बन होई । इतर साप न मइइ कोई ॥३ कउन पुहुमिहुत लोरक आइह। कहवाँ नाउ कहौं यह (जाइह) । ४ घर हुत काढे निसरे लोरा । लोग कुटुंब कछु कही न चोरा ॥५ काहि लाग तुम्ह निसरे, साच कहु तुम्ह बात ।६ हम पुन देख नियाउ नियारहि, पूछि तुम्हारी बात ॥७ मूलपाठ—(४) माहह (बीमके ऊपर अनावश्यक गरवज असावधानी बन दिया गया है। टिप्पणी—इस कडबकका शीर्षक विषयसे सर्वथा भिन्न है। वस्तुतः यह कडबक ३८२ का शीर्षक है। उसे लिपिने दुहरा दिया है। ३८१ (मनेर १०४ब) पुरसीदन बातें गुवाल रस्म लोरक जन चांदा (ग्वालकी बात और लोरक और चाँदाका ग्राम पूछना) जात अहीर हम लारक नाऊँ। गोवर नगर हमार पुर ठाऊँ ॥१ सहदेव महर कह चाँदा बिया। महर बियाह बाभन सेठें किया ॥२
२९५ पायन फेर नारि लै आयउँ । चाँदा तिरी महर थिय पायउँ ॥३ हौं जो आइ जें बाँठा मारा । एसौं राउ रूपचंद हारा ॥४ हम पुनि हरदीपाटन चाली । राजा महूभर कें [—*] फानी ॥५ चाँद सनेह जो निसरेउँ, छाड़ि कुटुंब घर बार ।६ तुम्हरे देस यह टूँटा जोगी, रहा होइ भटपार ॥७ टिप्पणी—(७) भटपार—भटमार, बटोद्दियोंको मार्गमें लूटने वाला । ३८२ ( मनेर १८ ख ) गुफ्त[न] जोगी कि ई जन मनस्त ( जोगीका कहना कि यह मेरी स्त्री है ) टूँटा कहै मोर भार वियाही । परी राढ़ तोरै गवाही ॥१ सभा कहै दुन्हु अब का कीजइ । इँह र बह कँइ कस उतर दीजइ ॥२ दोउ कहहि यह मोरी जोई । इँह हुन्हु महँ हरसाख न होई ॥३ यह टूँटा यह राषन अहई । धनि पूछहु दुन्हु वह का कहइ ॥४ चाँदहि मन कुछ चेत न आवा । अइस मन्त्र पढ़ि टूटें लावा ॥५ लोर कहा यह मोरी तिरिया, औ मुहि गोहन आइ ।६ भा भिखार है टूँटा जोगी, सकति घड़इ लइ जाइ ॥७ ३८३–३८८ (अनुपलब्ध) ३८९ ( रीडिङ्ग्स १७४ ) रवान शुदने लोरक व चाँदा व रसीदने नजदीके हरदी ( लोरक और चाँद का चलकर हरदीके निकट पहुँचना ) बाह्र कोस दस ऊपर भये । बहुत भाँति महेहुव रवे ॥१ सभ निसि कहहिं पिरम कहानी । पाठ गहरु दिन रैन पिहानी ॥२
२६ पहर रात उठ चले पहारा। कोस चार पर भा भिनसार ॥३ हरदी सीम तुलाने बाइ। सगुन भये एक पाँदुक राई ॥४ महर दाहिने पायें कर बावा। औ दाहिने मिगध के दावा ॥५ महर कहा हुत दाहिनें पायें, सगुन होइ पनार ।६ सिंह मरय तुम्ह सिध पायहु, लोरक बाने सर्वसार ॥७ टिप्पणी—(४) हरदी—इसे काव्यमें अनेक स्थलोंपर हरदीपटन कहा गया है। क० ब० ३९७ क शीर्षकमें उसे केवल 'पाटन' कहा गया है। पाटन (पट्टन <पत्तन) से ऐसा जान पड़ता है कि यह स्थान किसी नदी अथवा समुद्रके तटपर स्थित था। सर्वे आफ इण्डियाकी सूचीके अनुसार हरदी नामक स्थान मध्यप्रदेशमें ३३ महाराष्ट्रमे १, राज स्थानमें २ उत्तरप्रदेशमें ६ और बिहारमें २ हैं। इनमेंसे काव्यमें वर्णित हरदी कौन है, कहना कठिन है। ३९० ( रीडिंग्स २०५ ) सलाम कदने लोरक राव रा दर शिकार व पुरखीदने राव क्षेत्तम रा ( शिकारके निमित्त आये हुए रावको लोरकका सलाम करना और राव क्षेतमका पूछना ) क्षेत्तम राइ बहेर चढ़ा। हरदी फिरहुँत दइ जो कढ़ा ॥१ निकसत राठ ओहारसि सोई। राइ पूछि जाये हँह कोई ॥२ अति गुनवन्त आइ रूपवन्ता। सहसफरों बइस सीमन्ता ॥३ काऊ न चीन्हि सब कइहिं बटाऊ। पाछें राठ पठवा नाऊ ॥४ जो तुम्ह चीन्हउ देखि लै आयसु। यो परदेसी उतार दिवावसु ॥५ हरदी पइठे लोरक, खोर खोर फिर आठ ।६ जाँवेह नगरहि चीन्हिन कोय, सबै लोग पराउ ॥७ ३९१ ( रीडिंग्स १३ ) पुरस्तादने राव इसाम रा बरे लोरक ( रावका लोरकके पास नाई भेजना ) गउ इयाई रावल इक आये। ऊँच मंदिर बलसार सुहाये ॥१
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१८ ३९३ ( रीव्हिंग्सन २०८ ) बाज आमदने राव अज शिकार व मालूम कदन इतआम खफियते लोरक ( रावके शिकारस वापस आने पर नाईका लोरकके सम्बन्धमें बताना ) होइ अहेर राउ घर आवा । नाठ जाइ कही फुर पावा ॥१ पूछा राइ कठन यहु भवा । बस सुनाैँ तस नाउँ कहा ॥२ राठ कहा फबँ दीन्हि उतारा । ऊँच मंदिर नीक घोरसारा ॥३ रहै नर नाँखेड थियमी जानैं । अस दिनभर तस फिरति बखानै ॥४ सुन रायँ अस कीरत कीन्हा । बोर्ग जगत मदिर पैहि दीन्हा ॥५ आहि गोवर फर, लोरक नाउँ कहा जुझार ॥६ जिह कारन राठ रूपचंद मारा, ऊँहै पाँछा नार ॥७ टिप्पणी—(४) दिनभर—दिनरर, सूध । (७) कदै—वही । ३९४ ( रीव्हिंग्सन २९ : बम्बई १ ) आमदने लोरक पेशा राव सेतम ( लोरकका राव सेतमके पास आना ) खेम हुसर निसि खेलि बिहानी' । रग राती निसि पिरम कह्वानी ॥१ देइ पिछौरा राठ' जोहारा । राठ मया कै लोर हँकारा ॥२ राठ पूछहि तुम्ह कैसँ आयहु । बाट घाट कस आपन पायहु ॥३ नगर सोगोर' छोड़ि हम आये । राठ करिका मेज बुठाये ॥४ देखन पाइ राइ के आमठैँ । दयी सैंबोगैं आन पिरायठैँ ॥५ भले लोर तुम्ह आयउ इहवाँ, राखहु चित्त हमार ।६ जो कछु आह हमारैं'', सो पुनि जानु तुम्हार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—आमदने लोरक बर रावके सेतम व सलाम कदन (लोरका राव सेतम के पास आकर जुहार करना )
२९९ १—बिहानी । २—कहानी । ३—रा० । ४—बीर । ५—राइ । ६—मागीर । ७—राइ । ८—हँऊरामे । ९—सँबोगे । १० — मिलवउँ । ११—हमारैं । टिप्पणी—(४) सोगीर—सम्भवतः शुद्ध पाठ मागीर है जैसा कि बम्बई प्रतिमें है । यह उड़ीसाका एक प्रसिद्ध स्थान है । राइ करिंका—सम्भवतः करिका, कलिङ्गका रूप है और यहाँ तात्पर्य कलिङ्गनरेशसे है । इन भौगोलिक पहचानोंकी प्रामाणिकता काव्यमें आये अन्य भौगोलिक पहचानों पर ही निर्भर है । ३९५ ( रौलेण्ड्स २८ : बम्बई २ ) अस्वान दहानीदने राव मर लोरक रा व बर्गे सम्ब दादन ( रावको लोरकको घोड़ा और पान देना ) सेंइप राइ पान कर लीन्हों । निभर$^१$ हँकार लोर कहँ दीन्हों ॥१ सीस चढ़ाइ$^२$ लोरक$^३$ लेतसि । रहसि फैंकान राइ फुनि देतसि ॥२ सिंहि तुरिया चढ़ि लोर पहिरावा । इनै$^४$ ताजिन घोर दौराया$^५$ ॥३ रहैंसा लोर तुरी सो पावा । बचन सगुन सो इहवाँ आवा ॥४ पुरुख सोइ जो पर हिथें$^६$ जाइ । जग सुने तिन्हि करत भलाई ॥५ लोर चाँद गोबर बिसार$^१०$, अगयै$^११$ हरदी धास । ६ बरस दिवस औ कतिक मासा$^१२$ कीन्हा भोग बिलास ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—मरहमत कर्दने राव अस्तम व बर्गे दादन लोरक रा (राव सेतकका लोरकके प्रति कृपा भाव व्यक्त करना और पान देना) । इस प्रति में पंक्ति ३ और ४ के पद इस प्रति में परस्पर मिले हुए हैं । अर्थात् पदों क्रम है ३।२ और ४।१; ३।१ और ४।२ । यही क्रम ठीक भी जान पड़ता है । १—बीर । २—जाइ कें । ३—लोरक । ४—एक । ५—हने । ६— बीरवा । ७—हीं । ८—दिठै । ९—गिद्द । १०—विसारा । ११— ऐहल । १२—केतिक । टिप्पणी—(१) सेंइप राइ—हरदीपाटनके रावका नाम जान पड़ता है । पर कड़वक १०५ में उनका नाम ऐम्प प्रकट होता है । हो सकता है पाठ में
रूप राह' हो । पर उसकी कोई संगति नहीं बैठती । बियर—निकट । हँकार—पुकारर । (२) हँसि—हंसित होकर, प्रसन्न होकर । कशान—चोहा । (३) तुरपा—घोड़ा । ताजिब—(वा ताज़ियाना)—चाबुक कोड़ा । ( ) पर दियेँ—यह अशुद्ध पाठ जान पड़ता है । शुद्ध पाठ होगा "पर दियेँ" जैसा कि बम्बई प्रतिमें है । (६) अध्यैँ—अङ्गीकार किया । ३९६ ( रीडँड्र्स २८१ ) मताये जाना व कनीज़गान व गुलामान व जामहा बौरकराव राब भोरक रा ( लोरकके पास राघका गृहस्थीका सामान दासी नौकर और वस्त्र यादि भेजना ) जना सहस रथि राउ दौराये । चींभर झापर पाग पहिराये ॥१ डला बीस फुरि मरि लीन्हें । ते लै चेरन्हि माथै दीन्हें ॥२ चेरन्हि काँबर काँधैँ लिया । हरदि लोन तेल सभ दिया ॥३ चेरी दस फेर अमरन दीन्हें । अठर संजोग जो काठ न दीन्हें ॥४ औनों भाँत जुजहबा अहे । खाट पालकी पार्संग सहे ॥५ मरु अमरन रानी दीन्हें, चाँद पहिरन जोग ।६ लोर चाँद कहूँ मया जस कीन्हें, कौतुक मयठ सो लोग ॥७ ३९७ ( रीडंग्स २९१ बम्बई ७ ) : बस्त्व पर्यने लोरक बर पाउन रा ( पाउन नगरमें लोरकका वास ) टाँका सौ एक' लाख लीन्हा । पीर पालि नाऊँ कहूँ दीन्हाँ ॥१ औरहिं दीन्हि जिहूँ जस बानों । सभ लोगहिं कहूँ देवसि थानों ॥२ धीर बस्तर आगें लै आये । जे आये सो सम्पुद पठाये ॥३
५१ खोल पिटारा झपर देखे । अभरन अछरन आहँ पिसेखे ॥४ घेर लोग भरा घर बारू । जस चाहत तस दीन्ह करतारू ॥५ चाँद सुरुज मन रहँसे, तिल तिल करहिं बढ़ाउ ।६ एक समो गोवर हुँत आये, हरदींपाटन रहाउ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सखावत कर्दने लोरक बराय फुकरा दर शहर (नगरम लोरक का फकीरो (?) को दान देना) । इस प्रतिम पंक्ति ३ के पद पीछे-आगे हैं । १—एक सी । २—जोराँइँ । ३—सिह । ४—सने । ५—होग । ६—पुनि । ७—कीन्हि । ८—घरी फेर । ९—भाठ । टिप्पणी—(१) टँका—टंका चाँदीका एक सिक्का जो दिल्ली-सुल्तानोंक समयमे प्रचलित था । पीरै (फारसी-पीर)—ब्राह्मण । झाकि—निछावर करके । भाड—नाई, हज्जाम । (२) थानों—पहनावा । (३) बस्तर—वस्त्र । (७) समो—समय । ३९८ ( बम्बई १८ ) बयान कर्दैन पुरखारिये मैना ( मैनाके दुःखका वर्णन ) निसि दुख भैनहि रोइ बिहाई । सभ दिन रहैं नैन पँथ लाई ॥१ मकु लोरक इहिं मारग आवइ । फे फे[रि*]आफे आपु जनावइ ॥२ निसि दिन झुरपइ आस बजासी । रोइ रोइ खिन खिन होइ निरासी ॥३ लोर लोर कहि दिन पुरावइ । अउर पधनहर मुइँदि न आवइ ॥४ छपते असुदी रैन बिहाइ । जस मछरी बिनु नीर झुरसाइ ॥५ बिरह सँताई मना, अँहि परि दिन औ रात ।६ सभ लीन्हेइ दुख लोरगैं फेरा, बिरहा कीन्हि भैपात॥७ टिप्पणी— (६) मकु—कदाचित् शायद । फे फे [रि ] आफे—यह अनुमानित किन्तु संगत पाठ है । मूलमें फार वे पे है य, भाँर फार ए,
३ २ इस प्रकार तीन शब्द या शब्द-खण्ड हैं जो 'के वया के' पढ़े जा सकते हैं । उन्हें 'वैप दिया क' भी पढ़ सकते हैं । पहला पाठ अर्थ- हीन है । दूसरे पाठका अर्थ होगा—'हवसकी व्यथाको' । इस अर्थके साथ पाठ ग्रहण किया जा सकता है । जो भी हो, पाठ सन्दिग्ध है । (३) हरबइ—(स० स्मृ धातुका प्रा० यात्वादेश हरइ) याद करती है चिन्तन करती है; सोचती है । भास बेआसी—बिना आशाके आशा । निरासी—निराश । (५) पुरावइ—व्यतीत करती है । बचनहर—शब्द । ३९९ (रीसेंण्ड्स ५८३ : बम्बई ४८) पुरखीदने सोझिन सिरमन य पुरखीदने अरुवारे गोरक (झोझिनका सिरजनसे गोरककी खबर पूछना) दीदी सुनउ सुनी एक बाता । आवा ठाँव कहा दोसौ साता ॥१ केंरें आइ सेंकट¹ कें मेला । पूछहु आन कवन मुँह खोला² ॥२ झोझिन नायक परहि³ पुछावा । पूछसि ठाँव कहाँ⁴ हुत आवा ॥३ कउन मनिज लादेते⁵ पर परधाना । कउन रात⁶ तुम्ह देत⁷ पयाना ॥४ कउन लोग घर कहाँ तुम्हारा । कउन नाँउ किंह कुटुंब हँकारा⁸ ॥५ आसा सुषुधैं पूछउँ, को परदेसी आइ ।६ मोर धार परबस बिरोधा, सुखहिं जाहि को पाइ⁹ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सुनीदने मैना व झोझिन कि कसी ताजस्यान अस तरफे हरदौं आमद (मैना और झोझिनका सुनना कि हरदौरी ओरसे कोई वणिक आया है) । १—कौंदे सैंकट आइ । २—पूछेउ ठाँव कवन मुखं लेग । ३— मन्दिर । ४—कहवाँ । ५—वाषो । ६—रेत । ७—दैत । ८— हमारा । ९—आसा षड़पै हीं हुत, पूछउ को परदेशी आड । ⁹ —पाठ । टिप्पणी—(१) दीदी—मैनाने यहाँ अपनी सासको 'दीदी' सम्बोधित किया है जो असाधारण है । कड़वक ४६ में मैनाकी ननदने अपनी माँके लिए इस
३ ३
सम्बोधनका प्रयोग किया है। टाँड—साथवाह, कारवाँ, व्यापारी समूह। ढोर्से—'दिबसे' पाठ भी सम्भव है। (२) बार—बाल, पुत्र।
४०० (रीडिंग्स २८४) जवाब दादने नायक खोकिन रा कैफियते बनिज (नायकका खोकिमसे वणिजका वृत्तान्त कहना)
मैज मँजीठ चिरौंजि सुपारी। नरियर गोवा लौंग छुहारी ॥१ सौ दिक मँइहूँ कुँकूँ चलाषा। पतरज बरनहि गनति न बाषा॥२ पाट पटोर चीवर बहु भाँती। दिये मैं सहस सहस कै पाँती ॥३ हीर पटोर रूप बहुतायता। बेर्ना चन्दन अगर भर लायता ॥४ गोबर फा भौमन सिरजन नाऊँ। हरदीपाटन पुरुबहि बाऊँ ॥५ बरद सहस दस जापन, औ मेला यह आइ ।६ दखिन हुतैं भर लायता, पाटन मेलसि बाइ ॥७
टिप्पणी—(१) मैज—सम्भवतः मेनफल एक फल जो ओषधि के काम आता है। मंजीठ—एक फल जो औषधि के काम आता है; लाल रंग। नरियर—नारियल। गोवा—(सं गुवाक)—एक प्रकारकी सुपारी। छुहारी—छुहारा। (३) पाट पटोर—देखिये टिप्पणी ३२७। चीवर—वस्त्र। (४) हीर पटोर—देखिये टिप्पणी २८७। बेर्ना (सं बीरण)—खस। (५) भौमन—ब्राह्मण। (६) बरद—बैल।
४०१ (रीडिंग्स २४५: काफी) गिरियाकदने खोकिन व पाये सिरजन उफ्तादने मैना (खोकिमका रोना और मैनाका सिरजनके पैर पड़ना)
सुन पाग्न रोलिन सम राधा। नैन नीर¹ मुख धूड़ी² धाधा ॥१ मैना माइ पायँ लै परी। सिरजन पाँगु कहूँ एक घरी ॥२
१४ नाँह मोर हाँ पारि पियारी । ल गइ चाँदा पाटन ताही ॥३ लोरक नाँउ सुरुझ कें करा। सेठ लैं चाँद पाटन धरा ॥४ मई सज सुरुझ चाँद लैं भागा। दूसर समो आइ अब लागा ॥५ सब दिन नैन जोवत पन्थ, औ निसि जागत आइ ।६ मोर संदेस लोर कहूँ, इहैं पर गेइ घड़ाइ ॥७ पाठान्तर—काशी प्रति— शीर्षक—दर पाव सिरजन उफ्तादन मैना व अहवाल गुफ्तन (सिरजनक पैरों पर गिरकर मैना का अपना हाल कहना) १—पेड़ैम । २—रकत । ३—झूठी । ४—छोरि । ५—चाँदा । ६— नैन जुवाई । ७—ओ सब निसि । ८—अन्तिम पद प्रतिमे मिट गया है । टिप्पणी—(१) कहूँ—कहीं । (३) नाँह—पति । पारि—पाला दुपटी । (४) करा—कजा । सेठ—उठे । (५) समो—समय । (६) जोवत--निहारते हुए । ४०२ ( रॉकण्डूल २८६ ) कैफियते माह सावन गुफ्तने मैना बर सिरजन बाँज दुखारी खुद (मैनाका सिरजनसे अपनी सावन मासकी अवस्था कहना ) साँवन मास नैन झर लाये । जखरन नाँह दिन एकौ पाये ॥१ बरसि भरे भुइँ खार खँदोला । मियें न छकै खीर अमोला ॥२ घरउ काजर चख रहे न पावा । खिन खिन मैना रोइ बहावा ॥३ सावन चाँद लोर लै भागी । मैना नैन पूर झर लागी ॥४ इहैं पर नैन जुवाई अरघानी । सरि गै झार ढोर तिहूँ पानी ॥५ जिह सावन सुरुझ गवनें, सो मैना धरत साग ।६ सिरजन कहहु लोरकौँ, माँवर फेर अभाग ॥७
२०५ ४०३ ( रीजेन्ड्स २८० ; बम्बई ४९ ) कैफियते माह भादों ( भादों मासकी अवस्था ) भादों मास निसि भइ' अँधियारी । रैन डरावन हौं घनि पारी ॥१ बिजुलि' चमक मोर हियग' भागै । मंदिर नाह बिनु अहि डहिलागै ॥२ संग न साथी न सखी सहेली । देखि फाटि हिय मंदिर अकेली' ॥३ तिहि दुख नैन फूटि निसि बहैं' । धरती पूरि सायर भर रहे ॥४ निफर चलतें पाँ' घली न जाइ । भुइँ' बूड़ि रहा थल छाइ ॥५ दुखत पचन स्रवन' कँ, लोर बिदेसहि' छाण्ड ।६ नीर लाइ नैन दुइ बरखा", सिरजन रोइ पहायठ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सफतो माह ग्वधों गुफ्तन मैना पेशे सिरजन पैगाम बजानिबे लोरक (सिरजन के आगे मैनाका अपनी भादों मासकी दुरवस्था कहना और लोरकके लिए संदेशा भेजना ) १—मादों बरत चमक । २—पंचम । ३—हीउर । ४—हाधि । ५—सहनी । ६—अपनी । ७—एहि दुख फूटि नैन छल । ८—पग । ९—भुमहि । १०—सर्वैन । ११—परबसहि । १२—लाइ नैन दुइँ वरखा । ४०४ ( रीजन्ड्स २८८क ) कैफियते माह कुआर ( कुआरकी अवस्था ) चढ़ा कुआर अगस्त घिताथा । नीर घट पै कन्त न आवा ॥१ फुल फांस हाँस सिर छाय । मागस दुरलाई खिडरिज आय ॥२ निरवा पार न अपुम्प पारी । अति रम भइ नाँइ पियारी ॥३ नव रितु लाग पितरपख होई । राइ राँक घर सीस रझाइ ॥४ ९
१८ सिरजन छोर बनिज गा, हौं नित गारतौं माँस ॥६ कौन ठाम फिइ भूले, लोरक पूँछी होइ बिनास ॥७ ४०८ ( रीडैंग्स २९ ब ) कैफियते माह माघ ( माघ मासकी अवस्था ) माह माँस निसि परै तुसारू । कँपहि हार डोर बनहारू ॥१ कँपहि दसन नीर चखु झरा । बिरह अँगूठी हींउर धरा ॥२ एफ बिरहँ अरु दुहेतँ तुसारा । मार बिरह यह जीवँ हमारा ॥३ तुम बिनु पात भइस हौं भमी । पुरई वइस भूख दहि गभी ॥४ भर हीउ बहुर बँग साठैं । लेगइ चाँद सुरुज कित पाऊँ ॥५ हेँवत मोहिं पिसारे, बिहि पर कामिनि राखइ ।६ सिरजन मुयउँ तुसार, बेग कहु अहन्त आवइ ॥७ टिप्पणी—(१) माह—माघ । ४०९ ( रीडैंग्स २९ ब ) कैफियते माह फागुन ( फागुन मासकी अवस्था ) फागुन सीठ फागुन फहा । अठर पवन सकति होइ रहा ॥१ भाग सराइउँ ठार मो आवइ । सीठ मरत गिय साइ जियावइ ॥२ घर पर रचहिं दन्डाहर थारी । अति सुहाग यह राजदुलारी ॥३ मुगु बँधाल चरत फाजर पूरहिं । अग माँग मिर चीर सिंदूरहिं ॥४ नापहि फागु इइ झनफाग । विह रस भइ नइ सर्यसारा ॥५ रक्त राइ म अस क, चोलि चीर रवनार ।६ कहु मिरगन तार चैनाँ, भइ होरी जरि छार ॥७ टिप्पणी (७) छार—राख ।