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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६७

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६७
ह्रस्वं च यः प्रश्वसिति व्याविद्धं स्पन्दते च यः ।
मृतमेव तमात्रेयो व्याचचक्षे पुनर्वसुः ॥ २५ ॥
ऊर्ध्वं च यः प्रश्वसिति श्लेष्मणा चाभिभूयते ।
हीनवर्णबलाहारो यो नरो न स जीवति ॥ २६ ॥
( ७ ) जो रोगी कराहै, ऊचा-गहरा सास ले और पतला मल प्रवाहित करे,
बल से क्षीण, प्यास से पीड़ित हो, मुख सूखता हो, ऐसा रोगी नहीं बचता ।
( ८ ) जिस रोगी का श्वास बहुत अल्प होगया है, और जिसका हृदय
कुटिल अनियमित रूप से स्पन्दन ( धड़कन ) करता है, ऐसे रोगी को आत्रेय
पुनर्वसु ने मृतक तुल्य ही कहा है ।
( ६ ) जो रोगी ऊंचा गहरा श्वास ले जिस में कफ का भी प्रकोप हो और
जिसके बल, वर्ण और आहार कम हो गये हों वह मनुष्य नहीं बचता ॥ २६ ॥
ऊर्ध्वाग्रे नयने यस्य मन्ये चानतकम्पने ।
बलहीनः पिपासातः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २७ ॥
यस्य गण्डावुपचितौ ज्वरकासो च दारुणो ।
शूली प्रद्वेष्टि चाप्यन्नं तस्मिन् कर्म न सिध्यति ॥ २८ ॥
व्यावृत्तमूर्धाजिह्वास्यो भ्रुवौ यस्य च विच्युते ।
कण्टकैश्चाचिता जिह्वा यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ २६ ॥
( १० ) जिस रोगी की आंखे ऊपर को चढ़ गईं, मन्या सिरायें निरन्तर
कापे, जो बलहीन और पिपासा से पीड़ित हो, जिसका मुख सूखता हो वह रोगी
नहीं बचता ।
( ११ ) जिस रोगी के गण्डस्थल ऊंचे, मोटे फूले हों, जिसको ज्वर और
खांसी विकट हो, सारे पेट में शूल चलते हों, जो अन्न से द्वेष करता हो, ऐसे
रोगी में चिकित्सा सफल नहीं होती ।
( १२ ) जिस रोगी के मूर्धा ( तालु ) जीभ और मुख फट गये हों, भौंहें
टेड़ी पड़ गई हो, जीभ कांटो से भरी हो वह रोगी मृत के समान है ॥२७-२६॥
शेफश्चात्यर्थमुत्सिक्तं निःसृतौ वृषणौ भृशम् ।
अतश्चैव विपर्यासो विकृत्या प्रेतलक्षणम् ॥ ३० ॥
( १३ ) जिसका लिंग इन्द्रिय एकदम अन्दर घुस जाये और अण्डकोश
बहुत बाहर निकल आये ( बढ़ जाये ), अथवा इसके विपरीत लिंग आगे
निकल आये और अण्डकोश अन्दर घुस जाये इस प्रकार के विकार से रोगीको
मृत के समान ही जानना चाहिये ॥ ३० ॥

१६८ चरकसंहिता [ अ० ८
निचितं यस्य मांसं स्यात्त्वगस्थि चैव दृश्यते ।
क्षीणस्यानशनतस्तस्य मासमायुः परं भवेत् ॥ ३१ ॥
(१४) जिस रोगी का मांस क्षीण होजावे, शरीर में केवल त्वचा का ही
अस्थिपञ्जर दीखे क्षीण तथा भोजन न खाने वाला, ऐसा रोगी एक मास से
अधिक नहीं जीता ॥ ३१ ॥
तत्र श्लोकः—इदं लिङ्गमरिष्टाख्यमनेकमभिजज्ञिवान् ।
आयुर्वेदविदित्याख्यां लभते कुशलो जन ॥ ३२ ॥
जो कुशल पुरुष इन कहे हुए अरिष्ट लक्षणों को भली प्रकार जानता-पह-
चानता है, वही कुशल पुरुष 'आयुर्वेद-वित्' इस उपाधि को प्राप्त करता है ॥३२॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने पन्नरूपी-
मिन्द्रिय नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातोऽवाक्शिरसीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'पाव ऊपर शिर नीचे किये' छाया आदि के अरिष्ट बतलाने
के लिये अवाक् शिरसीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
अवाक्शिरा वा जिह्मा वा यस्य वा विशिरा भवेत् ।
जन्तो रूपप्रतिच्छाया नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
जटीभूतानि पक्ष्माणि दृष्टिश्चापि निगृह्यते ।
यस्य जन्तोर्न तं धीरो भेषजेनोपपादयेत् ॥ ४ ॥
यस्य शूनानि वर्त्मानि न समायान्ति शुष्यतः ।
चक्षुषी चोपदिह्येते यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ ५ ॥
भ्रुवोर्वा यदि वा मूर्ध्नि सीमान्तावर्तकान् बहून् ।
अपूर्वान्कृतान् १व्यक्तान् दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ ६ ॥
त्र्यहमेतेन जीवन्ति लक्षणेनाऽऽतुरा नराः ।
अरोगाणां पुनस्त्वेतत्षड्रात्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥
१. 'असजानकृतान्' इति च पाठः ।

शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे ।

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १६३

( १ ) जिस रोगी की छाया वा प्रतिबिम्ब के शिर नीचे और पाव ऊपर
( अवाक्-शिर ) हो, अथवा जिसकी छाया वा प्रतिबिम्ब कुटिल हो, या जिस में
शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे ।
( २ ) जिस रोगी की दोनों पलकों के रोम जटा के समान गुझला जाये
तथा आखें बन्द हो जायें, ऐसे रोगी का औषध से उपचार न करे, ऐसे को
औषध देना व्यर्थ होता है ।
( ३ ) जिस रोगी की आंखें, नाक, कान आदि मूज जायें और फिर अच्छी
न हों वा अपने स्थान में न समावे, तथा आले लिपसी जावें, वह रागी प्रेत
( मृत ) के समान होता है ।
( ४ ) जिस रोगी के भोहों में या शिर के बालों में चमत्कारिक सीमन्त
( माग जैसी रेखा ) या बहुत से भवर ( गोल चक्कर ) बिना बनाये, अकारण
ही आ जाये उसे मरणासन्न कहे ।
( ५ ) ये लक्षण यदि रोगी पुरुष में दीखे, तो वह तीन दिन मे अधिक
नहीं जीता, और यदि स्वस्थ पुरुष मे ये लक्षण हों तो वह छ रात से अधिक
नहीं जीता ॥ ३-७ ॥
आयम्योत्पाटितान् केशान् यो नरो नावबुध्यते ।
अनातुरो वा रोगी वा षड्रात्रं नानिवर्तते ॥ ८ ॥
यस्य केशा निरभ्यङ्गा दृश्यन्तेऽभ्यक्तसन्निभाः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
( ६ ) जो स्वस्थ या रोगी पुरुष शिर के बालों को खींचकर उखाड़ने पर
भी नहीं जाने वह छ दिन से अधिक नहीं जीता ।
( ७ ) शिर के बालों पर तैल न लगाने पर भी जिस रोगी के बालों मे तैल
की-सी चमक दिखाई दे, उसकी आयु समाप्त जान कर बुद्धिमान् पुरुष उसकी
चिकित्सा न करे ॥ ८-६ ॥
ग्लायतो नासिकावंशः पृथुत्वं यस्य गच्छति ।
अशूनः शूनसकाशः प्रत्याख्येय स जानता ॥ १० ॥
अत्यर्थविवृता यस्य यस्य चात्यर्थसंवृता ।
जिह्वा वा परिशुष्का वा नासिका न स जीवति ॥ ११ ॥
( ८ ) जिस रोगी का नासिका वश निर्बल होकर नम जाये, या बहुत मोटा
वा बड़ा हो जाये वास्तव में सूजन न होने पर सूजा हुआ लगे, वह रोगी
त्याज्य है । (९) जिस रोगी की नासिका बहुत फैल जाये या बहुत सकुचित, तग
हो जाये, कुटिल हो जाये वा सूख जाये वह रोगी अधिक नहीं जीता ॥१०-११॥

१७० चरकसंहिता [ अ० ८

मुखं शब्दश्रवावोष्ठौ शुक्लश्यावातिलोहितौ ।
विकृतौ यस्य वा नीलौ न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १२ ॥
( १० ) जिस रोगी का मुख, दोनों कान और दोनों ओठ (विकार के
कारण) श्वेत, काले, लाल, वा नीले हो जाते हैं, वह रोग से मुक्त नहीं होता,
वह मर जाता है ॥ १२ ॥
अस्थिश्वता द्विजा यस्य पुष्पिताः पङ्कसंवृताः ।
विकृत्या न स रोगं तं विहायाऽऽरोग्यमश्नुते ॥ १३ ॥
( ११ ) जिस रोगी के दांत विकार से अस्थि के समान श्वेत, पुष्पित
अथवा कीचड़ या मैल से ढक जाते हैं, वह रोगी रोग से छूट कर कभी आरोग्य
लाभ नहीं करता ॥ १३ ॥
स्तब्धा निश्चेतना गुर्वी कण्टकापचिता भृशम् ।
श्यावा शुष्काऽथवा शूना प्रेतजिह्वा बिसर्पिणी ॥ १४ ॥
( १२ ) जिस रोगी की जीभ स्तब्ध, —जड़, कड़ी, चेतना रहित, भारी
और बहुत से कांटों से भर जाये, काली, लाल, सूखी या सूजी हुई अथवा
बाहर को निकल २ आवे, यह जिह्वा मृतपुरुष का लक्षण है ॥ १४ ॥
दीर्घमुच्छ्वस्य यो ह्रस्वं नरो निःश्वस्य ताम्यति ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
( १३ ) जोर से बाहर सांस फेंक कर जो रोगी अन्दर छोटा (थोड़ा वायु)
सांस लेता है, और सांस लेते समय कष्ट अनुभव करता या मूर्च्छित हो जाता है,
उस रोगी की आयु मरणासन्न समझकर उसे त्यागना चाहिये ॥ १५ ॥
हस्तौ पादौ च मन्ये च तालु चैवातिशीतलम् ।
भवत्यायुःक्षये क्रूरमथवाऽतिभवेन्मृदु ॥ १६ ॥
( १४ ) जीवन के नाश के समय हाथ, पाव, गले की नसे, तालु बहुत
ठण्डे या बहुत कठोर अथवा बहुत कोमल हो जाते हैं ॥ १६ ॥
घट्यञ्जानुना जानु पादावुद्यम्य पातयन् ।
योऽपास्यति मुहुर्वक्त्रमातुरो न स जीवति ॥ १७ ॥
( १५ ) जो रोगी घुटनों से घुटनों को रगड़ता है, पाव को ऊपर उठाकर
जमीन पर पटकता है, बार-बार मुख को इधर-उधर चलाता है वह रोगी
नहीं बचता ॥ १७ ॥
दन्तैश्छिन्दन्नखाग्राणि नखैश्छिन्दञ्छिरोरुहान् ।
काष्ठेन भूमिं बिलिखन्न रोगात्परिमुच्यते ॥ १८ ॥

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १७१
दन्तान् खादति यो जाग्रदसान्ना विरुदन् हसन् ।
विजानाति न चेद् दुःखं न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १६ ॥
मुहुर्हसन्मुहुः श्वेडङ्खट्यां पादेन हन्ति यः ।
उच्चैश्छिद्राणि विमृशन्नातुरो न स जीवति ॥ २० ॥
( १६ ) जो रोगी दांतों से नखो को काटता है, और नखों से बालों को
नोचता है और लकडी से भूमि पर कुरेदता है, वह रोगी रोग से नहीं बच
सकता । ( १७ ) जो रोगी जागता हुवा दांतों को कट कटाता है और वेमत-
लब जोर से रोता या हँसता हुआ दुःख का अनुभव नहीं करता, वह रोग से
मुक्त नहीं होता । (१८) जो रोगी क्षण मे हसता, क्षण मे रोता, बकवाद करता
है, पलंग पर पाव पटकता है, हाथों को ऊंचा करके नाक, कान, आख के
छिद्रों को स्पर्श करता है वह रोगी नहीं बचता ॥ १८–२० ॥
यैर्विन्दति पुरा भावै समेतैः परमा रतिम् ।
तैरेवारममाणस्य ग्लानोर्मरणमादिशेत् ॥ २१ ॥
( १९ ) जिन वस्तुओं से पहिले रोगी का विशेष प्रेम हो और पीछे उन्हीं
पदार्थों से वह द्वेष, घृणा प्रकट करते ऐसे रोगी की मृत्यु ही हुई बतलावे ॥२१॥
न बिभर्ति शिरोग्रीव न पृष्ठं भारमात्मन ।
न हनू पिण्डमास्यस्थमातुरस्य मुमूर्षतः ॥ २२ ॥
( २० ) जो रोगी अपनी गर्दन या शिर को, अथवा अपनी पीठ के भार
को न सम्भाल सके, जो मुख में स्थित ग्रास को जबड़ों मे न सम्भाल सकें,
( जबड़े खुले रहे ), वह रोगी नही बचता ॥ २२ ॥
सहसा ज्वरसन्तापस्तृष्णा मूर्च्छा बलक्षयः ।
विश्लेषणं च संधीना मुमूर्षोरुपजायते ॥ २३ ॥
गोसर्गे वदनाद्यस्य स्वेदः प्रचयवते भृशम् ।
लेपज्वरोपतप्तस्य दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ २४ ॥
( २१ ) मरणासन्न रोगी को एक दम से ज्वर, सन्ताप, प्यास, मूर्च्छा,
बलनाश, अर्थात् सन्धिया शिथिल हो जाती हैं । ( २२ ) लेप ज्वर ( प्रलेपक
ज्वर ), थोड़ी सी सर्दी से कफ ज्वर हो के रोगी के मुख पर यदि प्रातः काल के
समय बहुत पसीना आये, तो उसका बचना असम्भव है ॥ २४ ॥
नोपैति कण्ठमाहारो जिह्वा कण्ठमुपैति च ।
आयुष्यन्तं गते जन्तोर्बल च परिहीयते ॥ २५ ॥
( २३ ) जिस रोगी की आयु समाप्त हो जाती है, उसके गले में पहुचा

१७२ चरकसंहिता [ अ० ६
हुआ भोजन भी नीचे नहीं उतरता, और जीभ कण्ठभाग में आ लगती है तथा
बल नष्ट हो जाता है ॥ २५ ॥
शिरो विक्षिप्तते कृच्छ्रान्मुञ्चयित्वा प्रपाणिकौ ।
ललाटप्रस्रुतस्वेदो मुमूर्षुश्च्युतबन्धनः ॥ २६ ॥
( २४ ) जो रोगी बड़े कष्ट से पीड़ित होकर अपने दोनों कलाईयों या कोह-
नियों को छोड़कर शिर को इतना धुनता-पटकता है कि माथे से पसीना टपकने
लगे और सन्धिबन्ध ढील पड़ जायें वह रोगी मरने वाला होता है ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकः ।
इमानि लिङ्गानि नरेषु बुद्धिमान्विभावयेतावहितो मुहुर्मुहुः ।
क्षणेन भूत्वा ह्युपयान्ति कानिचिन्न चाफल लिङ्गमहास्ति किंचन ॥२७॥
बुद्धिमान् मनुष्य को मरणोन्मुख रोगियों में होने वाले लक्षण खूब ध्यान से
देखने चाहियें । क्योंकि कितने लक्षण क्षणभर मे उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं,
इस प्रकरण में कहा एक भी लक्षण निष्फल नहीं ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने अवाक्शिरसीय-
मिन्द्रिय नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो यस्य श्यावानिमित्तीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'श्याव-निमित्तीय' नामक इन्द्रिय-अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
यस्य श्यावे परिध्वस्ते हर्रिते चापि दर्शने ।
आपन्नो व्याधिरन्ताय ज्ञेयस्तस्य विजानता ॥ ३ ॥
( १ ) जिस रोगी की दोनों आखें काली, लाल रग की, नष्टप्राय, हरे रग
की हो जाये विद्वान् वैद्य उस रोगी की व्याधि प्राण नाश के लिये जाने ॥ ३ ॥
निःसंज्ञः परिशुष्कास्यः संविद्धो व्याधिभिश्च यः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥
हरिताश्च सिरा यस्य लोमकूपाश्च संवृताः ।
सोऽम्लाभिलाषी पुरुषः पित्तान्मरणमश्नुते ॥ ५ ॥

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १७३

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १७३
(२) जो रोगी अचेत हो, जिसका मुख सूखता हो, अनेक रोगों से
आक्रान्त हो उस, रोगी की आयु को समाप्त हुआ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य
उसकी चिकित्सा न करे। (३) जिस रोगी की सिराये (त्वचा) हरी पड़
जाये, जिसके लोम छेद बन्द हो गये हों (पसीना नहीं आता हो), खट्टे रस
की चाह रखता हो ऐसा रोगी पित्त से ही मरता है ॥ ४-५ ॥
शरीरान्ताश्च शोभन्ते शरीरं चोपशुष्यति ।
बलं च हीयते यस्य राजयक्ष्मा हिनस्ति तम् ॥ ६॥
अंसाभितापो हिक्का च छर्दनं शोणितस्य च ।
आनाहः पार्श्वशूलं च भवत्यन्ताय शोषिणः ॥ ७ ॥
(४) जिस रोगी के हाथ पाव अच्छे दिखाई देते हैं, और शरीर
सूखता जाता है, शरीर का बल दिन पर दिन घटता जाता है वह रोगी राज
यक्ष्मा से मरता है। (५) जिस रोगी को हिचकी आवे और कन्धे भी दुखें,
रक्त का वमन हो, पेट में अफारा और पार्श्व मे तीव्र वेदना (शूल) हो, ये
लक्षण शोष-रोगी की मृत्यु के लिये होते हैं ॥ ६-७ ॥
वातव्याधिरपस्मरी कुष्ठी शोफी तथोदरी ।
गुल्मी च मधुमेही च राजयक्ष्मी च यो नरः ॥ ८ ॥
अचिकित्स्या भवन्त्येते बलमांसक्षये सति ।
अन्येष्वपि विकारेषु तान्भिषक्परिवर्जयेत् ॥ ६॥
विरेचनहतानाहो यस्तृष्णानुगतो नरः ।
विरिक्तः पुनराध्माति यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥
पेयं पातुं न शक्नोति कण्ठस्य च मुखस्य च ।
उरसश्च विशुष्कताद्यो नरो न स जीवति ॥ ११ ॥
स्वरस्य दुर्बलीभावं हानिं च बलवर्णयोः ।
रोगवृद्धिमयुक्तां च दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वश्वास गताष्माणं शूलोपहतवङ्क्षणम् ।
शर्म चानाधिगच्छन्तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
अपस्वरं भाषमाणं प्राप्त मरणमात्मनः ।
श्रोतारं चाप्यशब्दस्य दूरतः परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥
(६) वात रोगी, अपस्मार रोगी, कुष्ठी, शोफयुक्त, उदर रोगी, गुल्मी,
मधुमेही और राजयक्ष्मा से पीड़ित मनुष्य बल और मांस के क्षय होने पर असाध्य
हो जाते हैं। इसके सिवाय इन रोगियों को अन्य कोई दूसरे भी रोग हो जायें

१७४ चरकसंहिता [ अ० ६
तो भी असाध्य हैं । (७) जिस रोगी का विरेचन के द्वारा पेट फूलने का रोग
शान्त करने पर प्रबल तृष्णा उत्पन्न हो जाये, अथवा विरेचन के पीछे पुन
अनाह (अफ़ारा) हो जाये वह रोगी प्रेत के समान है। (८) जो रोगी कण्ठ,
मुख, छाती, के शुष्क होने के कारण जल वा दूध भी नहीं पी सके वह रोगी नहीं
बचता। (६) आवाज कमजोर पड जाये, बल और वर्ण मे न्यूनता आ जाये,
अनुचित रूप से रोग बढ़ जाये, तो ऐसे रोगी का मरण हो कहे। (१०) जिस
रोगी को ऊर्ध्व श्वास आरम्भ हो जाये, अग ठण्डे हो जाये, वक्षण प्रदेश में खूब
शूल रहे, किसी भी प्रकार से रोगी को शान्ति न मिले बुद्धिमान् ऐसे रोगी को छोड़
दे। (११) जो रोगी विकृत स्वर से अपनी आई मृत्यु को बतला रहा हो, जो
बिना शब्द के भी शब्द सुने, उस रोगी को वैद्य दूर से ही त्याग दे ॥ ८-१४ ॥
यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति ।
संशयप्राप्तमात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ १५ ॥
अथ चेज्ज्ञातयस्तस्य याचरेन् प्रणिपाततः ।
रसेनाद्यादिति ब्रूयान्नास्मै दद्याद्विशोधनम् ॥ १६ ॥
मासेन चेन्न दृश्येत विशेषस्तस्य शोभनः ।
रसैश्चान्यैर्बहुविधैर्दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ १७ ॥
निष्ठीवतं च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति ।
यस्य तस्याऽऽयुषः प्राप्तमन्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
निष्ठीयूते यस्य दृश्यन्ते वर्णा बहुविधाः पृथक्।
तच्च सीदत्यधः प्राप्य न स जीवितुमर्हति ॥ १६ ॥
(१२) जिस निर्बल हुए रोगी को रोग एकदम से छोड़ जाये, ऐसे रोगी
के जीवन को भगवान आत्रेय संशय-ग्रस्त मानते हैं। (१३) जिस रोगी के सब
सम्बन्धी बहुत नम्रता और विनय के साथ चिकित्सा करने की प्रार्थना करे,
चिकित्सा के समय वैद्य इस रोगी को मास रस देने को कहे। परन्तु साथ मे
विरेचन या वमन रूप सशोधन कार्य नही करे । इस प्रकार एक मास तक
चिकित्सा करने पर भी कुछ शुभ परिवर्त्तन न दीखे, इसी प्रकार अनेक प्रकार के
मास रस देने पर भी जब फायदा न हो, तो उस रोगी का जीवन दुर्लभ है।
(१४) जिस रोगी का थूक (कफ), मल और वीर्य पानी में डूब जाता
है, बुद्धिमान् लोग उसकी आयु को समाप्त हुआ बतलाते हैं। (१५) जिस
रोगी के कफ में नाना प्रकार के बहुत से रंग दिखाई देते हैं और वह कफ
पानी में डूब जाता हो तो वह रोगी जी ने मे असमर्थ है ॥ १५-१९ ॥

अ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५

अ० १० ] इन्द्रियस्थानम् १७५
पित्तमूष्मानुगं यस्य शङ्खौ प्राप्य विमूर्च्छति ।
स रोगः शङ्खको नाम्ना त्रिरात्राद्धन्ति जीवितम् ॥ २० ॥
सफेनं रुधिरं यस्य मुहुरास्यात्प्रमुच्यते ।
शूलैश्च तुद्यते कुक्षिः प्रत्याख्येयः स तादृशः ॥ २१ ॥
बलमांसक्षयस्तीव्रो रोगवृद्धिररोचकः ।
यस्याऽऽतुरस्य लक्ष्यन्ते त्रीन् पक्षान्न स जीवति ॥ २२ ॥
( १६ ) उष्मा से मिला पित्त जिस समय शंख प्रदेश ( कनपटियों ) में
आकर रुक जाता है, उस समय ‘शङ्खक’ नाम का रोग उत्पन्न होता है । इस
रोग से तीन दिन में रोगी मर जाता है । ( १७ ) जिस रोगी के मुख से झागदार
रक्त गिरता है, और पेट या पार्श्व में तीव्र वेदना रहती हो, उस रोगी को असाध्य
समझना चाहिये । ( १८ ) जिस रोगी में तीव्रता ( शीघ्रता ) से बल और मांस
का क्षय हो रहा हो, रोग में वृद्धि हो, अरुचि हो, वह रोगी तीन पक्ष से अधिक
नहीं जाता ॥ २०-२२ ॥
तत्र श्लोकौ—विज्ञानानि मनुष्याणां मरणे प्रत्युपस्थिते ।
भवन्त्येतानि सपश्येदन्यान्येवंविधानि च ॥ २३ ॥
तानि सर्वाणि लक्ष्यन्ते न तु सर्वाणि मानवम् ।
विशन्ति विनशिष्यन्तं तस्माद्बोध्यानि सर्वशः ॥ २४ ॥
मरणोन्मुख मनुष्यों में इस प्रकार के तथा अन्य इसी तरह के दूसरे नाना
प्रकार के लक्षण होते हैं । सब लक्षण होते तो अवश्य हैं, परन्तु एक ही रोगी में
सब लक्षण स्पष्ट नहीं होते । सब लक्षण एक साथ पुरुष में नहीं आते, इसलिये
इनको विशेष रूप से जानना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने यस्य श्याव-
निमित्तीयमिन्द्रियं नाम नवमोऽध्याय ॥ ९ ॥
दशमोऽध्यायः
अथातः सद्योमरणोयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ‘सद्यो-मरणीय इन्द्रिय’ नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

१७६ चरकसंहिता [ अ० १०

सद्यस्तितिक्षतः प्राणांल्लक्षणानि पृथक् पृथक् ।
अग्निवेश प्रवक्ष्यामि सस्पृष्टो येर्न जीवति ॥ ३ ॥
वाताष्ठीला सुसंवृत्ता तिष्ठन्ती दारुणा हृदि ।
तृष्णयाऽभिपरीतस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ४ ॥
पिण्डिके शिथिलीकृत्य जिह्मीकृत्य च नासिकाम् ।
वायुः शरीरे विचरन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ५ ॥
हे अग्निवेश ! शीघ्र प्राण छोड़ने वाले रोगी के लक्षणो को पृथक् पृथक्
कहता हू, जिनसे युक्त होने पर रोगी नहीं बचताछ । ( १ ) वाताष्ठीला कठोर
रूप से व्याप+ हाकर हृदय-प्रदेश मे आकर रुक जाये, रोगी को प्यास बहुत
लगती हो तो उस रोगी का जीवन बहुत शीघ्र हर लेती है । ( २ ) वायु
पिण्डलियों को शिथिल बना दे ओर नासिका का टेढ़ी कर दे तथा
सम्पूर्ण शरीर म वायु दौड़ता फिरे तो वह रोगी का जीवन हर लेता है ॥३-५॥
भ्रुवौ यस्य च्युते स्थानादन्तर्दाहश्च दारुणः ।
तस्य हिक्काकरो रोगः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ६ ॥
( ३ ) जिस रोगी का भोहे अपने स्थान से स्खलित हो जायें, शरीर मे
बहुत तीव्र, कष्टदायी दाह ( जलन ) हो, और उसका रोग हिचकियें पैदा कर
दे तो वह उसके प्राण को हर लेता है ॥ ६ ॥
क्षीणशोणितमांसस्य वायुरूध्वंगतिश्चरन् ।
उभे मन्ये समे यस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ७ ॥
अन्तरेण गुदं गच्छन्नाभि च सहसाऽनिलः ।
कृशस्य वंक्षणो गृह्णन् सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ८ ॥
वितत्य पर्शुकाग्राणि गृहीत्वोरश्च मारुतः ।
स्तिमितस्यायताक्षस्य सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ९ ॥
हृदयं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
दुर्बलस्य विशेषेण सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १० ॥
वंक्षणं च गुदं चोभे गृहीत्वा मारुतो बली ।
श्वासं संजनयञ्जन्तोः सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ ११ ॥
नाभिं मूत्रं बस्तिशीर्षं पुरीषं चापि मारुतः ।
विबध्य जनयञ्छूलं सद्यो मुष्णाति जीवितम् ॥ १२ ॥
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❀ 'सद्यः' शब्द से कुछ तो सात दिन गिनते हैं और कुछ आचार्य तीन
दिन मानते हैं ।

अ० १० ] १२ इन्द्रियस्थानम् १७७

अ० १० ] १२ इन्द्रियस्थानम् १७७

भिद्येते वक्षणौ यस्य वातशूलैः समन्ततः ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यः प्राणाञ्जहाति सः ॥ १३ ॥
आप्लुतं मारुतेनेह शरीरं यस्य केवलम् ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १४ ॥
शरीरं शोफितं यस्य वातशोफेन देहिनः ।
भिन्नं पुरीषं तृष्णा च सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १५ ॥
(४) शरीर में रक्त और मांस क्षीण हो जाये, वायु उर्ध्व गति करे, दोनों
मन्याएं (ग्रीवा की शिराये) एक समान हो तो वायु उस रोगी का जीवन
शीघ्र हर लेता है । (५) जिस निर्बल रोगी में वायु गुद द्वार से प्रवेश करके नाभि
प्रदेश में पहुँच कर वक्षण प्रदेश को पीड़ित करता है वह वायु रोगी का जीवन
शीघ्र ही हर लेता है । (६) जिस रोगी में वायु उरो-भाग (छाती) में पहुँच
कर पर्शुकाओं के अग्र भागों को दबाता है और रोगी स्तब्ध तथा आंखें फैलाये
हो, तो वायु उसके शीघ्र प्राण ले लेता है । (७) जिस निर्बल शरीर वाले रोगी
के हृदय और गुदा इन दोनों अवयवों में बलवान् वायु व्याप्त हो जाता है, वह
रोगी शीघ्र मर जाता है । (८) बलवान् वायु वक्षण और गुदा को पीड़ित
करके ऊर्ध्व श्वास उत्पन्न करदे तो रोगी के प्राणो को वायु शीघ्र ही हर लेता है ।
(६) वायु, नाभि, मूत्र, बस्ति, शिर और मल इनको बन्द करदे अथवा इन
स्थानों पर काटने के समान (छेदन के समान) शूल उत्पन्न कर दे तो वायु
उसके प्राणों को शीघ्र हर लेता है । (१०) वात-शूल के कारण जिस रोगी के
वक्षण प्रदेशों में सर्वत्र और भिन्न भिन्न प्रकार की वेदना होती रहती है, रोगी
को अतिसार और प्यास रहती हो तो वह प्राणों को शीघ्र छोड़ देता है । (११)
जिस रोगी के सम्पूर्ण शरीर में वायु व्याप्त हो जाये, अतिसार तथा प्यास हो वह
रोगी शीघ्र ही प्राण त्याग देता है । (१२) जिस रोगी का शरीर वायु के शोफ
के कारण सूज जाये, रोगी को अतिसार हो तथा प्यास रहे वह शीघ्र प्राणों
को छोड़ देता है ॥ ७-१५ ॥
आमाशयसमुत्थाना यस्य स्यात्परिकर्त्तिका ।
तृष्णा गुदग्रहश्चाग्रः सद्यो जहात्स जीवितम् ॥ १६ ॥
पक्वाशयमधितिष्ठाय हत्वा सञ्ज्ञां च मारुतः ।
कण्ठे घुर्घुरकं कृत्वा सद्यो हरति जीवितम् ॥ १७ ॥
दन्ताः कर्द्दमचूर्णाभा मुखं चूर्णकसंनिभम् ।
सिप्रायन्ते च गात्राणि लिङ्गं सद्यो मरिष्यतः ॥ १८ ॥

१७८ चरकसंहिता [ अ० ११
तृष्णा-श्वास-शिरोरोग-मोह-दौर्बल्य-कूजनैः ।
स्पृष्टः प्राणाञ्जहात्याशु शकृद्भेदेन चाऽऽतुरः ॥ १९ ॥
(१३) जिस रोगी के आमाशय मे काटने के समान (परिकर्त्तिका) वेदना
उत्पन्न हो, प्यास हो, गुदा का अवरोध हो, वह रोगी शीघ्र मर जाता है । (१४)
वायु पक्वाशय का आश्रय लेकर सञ्ज्ञा (चेतना) को नष्ट करदे, तथा गले में घुर्घर
शब्द उत्पन्न हो जाये तो रोगी शीघ्र मर जाता है । (१५) दान्तों मे कीचड
के लेप के समान और मुख (चेहरा) चूने के समान सफेद हो जाये और
शरीर के अगों पर पसीना (सिप्रा नदी के समान) आने लगे वा वे ढीले
पड़ जावें तो ये शीघ्र मरने वाले के लक्षण हैं । (१६) जिस रोगी को प्यास,
श्वास, शिरोरोग, मोह, दुर्बलता, अगो मे कूजन तथा अतीसार हो, वह रोगी
शीघ्र मर जाता है ॥ १६ १६ ॥
तत्र श्लोक —एतानि खलु लिङ्गानि यः सम्यगवबुध्यते ।
स जीवितं च मर्त्यानां मरणं चावबुध्यते ॥ २० ॥
जो वैद्य इन लक्षणों को भली प्रकार जानता है वह मनुष्यो के जीवन और
मरण को भली प्रकार जानता है ॥ २० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने सद्योमरणो-
यमिन्द्रियं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
अथातोऽणुज्योतीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'अणुज्योतीय' (मन्दाग्नि) अथवा 'शरीर का मन्द-तेज'
नामक इन्द्रिय-अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ।१-२।
अणुज्योतिरणेकाग्रो दुश्छायो दुर्मनाः सदा ।
रतिं न लभते याति परलोकं समान्तरम् ॥ ३ ॥
बलिं बलिभुजो यस्य प्रणीतं नोपभुञ्जते ।
लोकान्तरगतः पिण्डं भुक्ते संवत्सरेण सः ॥ ४ ॥
सप्तर्षीणां समीपस्थां यो न पश्यत्यरुन्धतीम् ।
संवत्सरान्ते जन्तुः स संपश्यति महत्तमः ॥ ५ ॥

अ० ११] इन्द्रियस्थानम् १७९

अ० ११] इन्द्रियस्थानम् १७९
विकृत्या विनिमित्तं यः शोभामुपचयं धनम् ।
प्राप्नोत्यतो वा विभ्रंशं समान्तं न स जीवति ॥ ६ ॥
वर्षान्त अरिष्ट—
( १ ) अणुज्योति अर्थात् मन्द जाठराग्नि वाला व्याकुल चित्त, अशुभ
छाया वाला, निर्बल दुःखी मनवाला, जा किसी भी प्रकार से सुख अनुभव
नहीं करता, ऐसा पुरुष एक वर्ष के अन्दर २ मर जाता है । ( २ ) जिस रोगी
की दी हुई बलि (अन्न) को कौवे आदि पक्षी नहीं खाते, वह एक साल के
अन्दर परलोक मे पिण्ड (कर्मफल) का भोग करता है । ( ३ ) जो सप्तर्षियों
के पास स्थित अरुन्धती नाम नक्षत्र को नहीं देखता, वह एक साल के अन्दर
महा-अन्धकार (मृत्यु) को देखता है । ( ४ ) जो मनुष्य बिना किसी कारण
शोभा (शरीर की पुष्टि, अथवा धन सञ्चय को या इनके सहसा विनाश को पाता
है वह एक साल पर्यन्त भी नहीं जीता ॥ ३-६ ॥
भक्तिः शीलं स्मृतिस्त्यागो बुद्धिर्बलमहेतुकम् ।
षडेतानि निवर्तन्ते षड्भिर्मासैर्मरिष्यतः ॥ ७ ॥
धमनीनामपूर्वाणां जालमत्यर्थशोभनम् ।
ललाटे दृश्यते यस्य षण्मासान्न स जीवति ॥ ८ ॥
लेखाभिश्चन्द्रवक्राभिर्ललाटमुपचीयते ।
यस्य तस्यायुषः षड्भिर्मासैरन्तं समादिशेत् ॥ ९ ॥
( ५ ) षण्मासान्त अरिष्ट—छः मास में मरने वाले मनुष्य के छः गुण
भक्ति-इच्छा, शील स्वभाव, स्मृति, त्याग, बुद्धि और बल बिना कारण के ही
नष्ट हो जाते हैं । ( ६ ) जिस रोगी के माथे पर नाड़ियों का सुन्दर जाल दीखने
लगे (जो पहिले न हों), वह छः मास के पीछे नहीं जीता । ( ७ ) जिसके
माथे पर द्वितीया या तृतीया के चन्द्रमा के समान टेढी रेखाये दीखने लगें,
उसकी आयु छः मास में समाप्त हुई बतला दे ॥ ७-९ ॥
शरीरकम्पः संमोहो गतिर्वचनमेव च ।
मत्तस्येवोपलक्ष्यन्ते यस्य मासं न जीवति ॥ १० ॥
रेतोमूत्रपुरीषाणि यस्य मज्जन्ति चाम्भसि ।
स मारुताशनद्वेष्टा मृत्युद्वारिणि मज्जति ॥ ११ ॥
हस्तपादं मुखं चोभौ विशेषाद्यस्य शुष्यतः ।
शूयेते वा विना देहात्स च मासं न जीवति ॥ १२ ॥
( ८ ) मासान्त अरिष्ट—जिसके शरीर में कम्पन, मूर्छा और चाल और
वाणी शराबी की भाति हो जाती हैं, वह मास भर भी नहीं जीता । ( ९ ) जिस-

१८० चरकसंहिता [ अ० ११
का वीर्य, मूत्र और मल पानी में डूब जाता है, जो स्वबन्धुओं से द्वेष करता हो,
वह व्यक्ति एक मास के भीतर मृत्यु के पानी में डूब जाता है । (१०) जिसके
हाथ, पाव और मुख बिना दाह के शुष्क होने लगें वह एक मास से अधिक
नहीं जीता ॥ १०-१२ ॥
ललाटे मूर्ध्नि बस्तौ च नीला यस्य प्रकाशते ।
राजी बालेन्दुकुटिला न स जीवितुमर्हति ॥ १३ ॥
प्रवालगुटिकाभासा यस्य गात्र मसूरिकाः ।
उत्पद्याशु विनश्यन्ति न चिरात्स विनश्यति ॥ १४ ॥
ग्रीवावमर्दो बलवाञ्जिह्वाश्वयथुरेव च ।
ब्रध्नास्यगलपाकश्च यस्य पक्व तमादिशेत् ॥ १५ ॥
संभ्रमोऽति प्रलापोऽति भेदोऽस्थ्नामतिदारुणः ।
कालपाशपरीतस्य त्रयमेतत्प्रवर्तते ॥ १६ ॥
(११) सद्योमरण के अरिष्ट—जिस रोगी के माथे, शिर और बस्ति मे
मे नवीन चन्द्रमा के समान टेड़ी नीली रेखाये दीखती हैं उसकी मृत्यु निकट
समझनी चाहिये । (१२) जिस रोगी के शरीर पर मूंगे के समान फुन्सिया
(मसूरिका चेचक) निकल कर शीघ्र ही फिर नष्ट हो जायें वह शीघ्र ही मरता
है । (१३) जिस रोगी की ग्रीवा में अकड़ान (दर्द) बहुत अधिक हो, जीभ
पर सूजन हो जाये, गुदा, गला, और मुख पक जाये वह शीघ्र मर जाता है ।
(१४) भ्रम, प्रलाप और भयंकर रूप में अस्थियों का टूटना हो, काल के
पाश में फसे मनुष्य में ये तीन लक्षण होने लगते हैं ॥ १३-१६ ॥
प्रमुह्य लुञ्चयेत्केशान् परिगृह्णात्यतीव च ।
नरः स्वस्थवदाहारमबलः कालचोदितः ॥ १७ ॥
समीपे चक्षुषोः कृत्वा मृगयेताङ्गुलीकरम् ।
स्मयतेऽपि च कालान्ध ऊर्ध्वगानिमिषेक्षणः ॥ १८ ॥
शयनादासनाद्गात्रात्काष्ठात्कुड्यात्तथापि वा ।
असन्मृगयते किंचित्स मुह्यन्कालचोदितः ॥ १९ ॥
अहास्यहासी समुह्यन् प्रलेढि दशनच्छदौ ।
शीतपादकरोच्छ्वासो यो नरो न स जीवति ॥ २० ॥
आह्वयन्तं समीपस्थं स्वजनं जनमेव वा ।
महामोहावृतमनाः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ २१ ॥
(१४) जो रोगी बेसुध होकर बालों को खींचता तथा स्वस्थ पुरुष के
समान भोजन करता है वह काल से प्रेरित होता है । (१५) जो मनुष्य आख

अ० ११] इन्द्रियस्थानम् १८१

अ० ११] इन्द्रियस्थानम् १८१
के समीप और अगुलियों को रखकर फिर उनको खोजता, ऊपर को देखता,
हैरान होता है, वह मानों काल के कारण अन्धा है। जो बिस्तर, आसन, अंग,
लकड़ी अथवा भित्ति पर कुछ न होते हुए भी कुछ टटोलता रहता है, वह काल
( मृत्यु ) से प्रेरित होकर मोह में पड़कर ऐसा करता है। ( १६ ) जो हंसने का
कारण न रहने पर भी हंसे, ओठों को चाटता रहे, हाथ पांव और श्वास ठंडे
हों, और ऊर्ध्व श्वास चलता हो तो वह रोगी नहीं बचता । ( १७ ) अपने
बान्धव या अन्य मनुष्य को समीप में खड़े, उसे बुलाते हुए को न देखे, न सुने
वह बड़े भारी अन्धकार से घिरा होने के कारण देखता हुआ भी नहीं देखता ॥२१॥
अयोगमतियोगं वा शरीरे मतिमान् भिषक् ।
खादीना युगपद् दृष्ट्वा भेषज नावचारयेत् ॥ २२ ॥
अतिप्रवृद्धया रोगाणा मनसश्च बलक्षयात् ।
वासमुत्सृजति क्षिप्र शरीरी देहसंज्ञकम् ॥ २३ ॥
वर्णस्वराग्निवलं वागिन्द्रियमनोबलम् ।
हीयतेऽसुक्षये निद्रा नित्या भवति वा न वा ॥ २४ ॥
( १८ ) आकाश, वायु, अग्नि जल और पृथ्वी इन भूतों का शरीर में
अयोग या अतियोग दीखने लगे, तब वैद्य चिकित्सा नहीं करे । ( १९ ) रोग
के बहुत बढ़ जाने से तथा मानसिक बल के क्षय होने से, मनुष्य उस शरीर के
वासस्थान को शीघ्र छोड़ देता है, मर जाता है। ( २० ) मरणासन्न मनुष्य में
वर्ण, स्वर, अग्नि, बल, वाणी, इन्द्रिय और मन का बल कम हो जाता है और
रोगी को या तो नींद खूब आती है अथवा आती ही नहीं ॥ २२-२४ ॥
भिषग्भेषज-पानान्न गुरु-मित्र द्विषश्च ये ।
वशगाः सर्व एवैते बोद्धव्याः समवर्तिन ॥ २५ ॥
एतेषु रोगः क्रमते भेषजं प्रतिहन्यते ।
नैषामन्नानि भुञ्जीत न चोदकमपि स्पृशेन् ॥ २६ ॥
पादाः समेताश्चत्वार संपन्नाः साधकैर्गुणैः ।
व्यर्था गतायुषो द्रव्य विना नास्ति गुणोदयः ॥ २७ ॥
परीक्ष्यमायुर्भिषजा नीरुजस्याऽऽतुरस्य च ।
आयुर्ज्ञानफल 'कृत्स्नमायुर्न ह्यनुवर्तते ॥ २८ ॥
( २१ ) वैद्य, औषध खान, पान, गुरु और मित्र से जो रोगी द्वेष करें
तो समझना चाहिये कि ये यम के वश में हैं, वे मरनेवाले हैं। ऐसे रोगियों
१. 'आयुर्वेदफल' इति च पाठः ।

१८२ चरकसंहिता [ अ० १२
के रोग भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी बढ़ते हैं, औषध कुछ काम नहीं
करती । इन रोगियों का न तो अन्न खाना चाहिये और न पानी छूना चाहिये ।
गतायुष मनुष्य में समग्र गुणों से युक्त चिकित्सा के भी चारों चरण व्यर्थ
होते हैं । जिस प्रकार गुण द्रव्य के आश्रय से रहते और प्रकट होते हैं, उसी
प्रकार चिकित्सा का गुण आयुष्य के कारण से ही प्रकट होता है। वैद्य को
चाहिये कि वह रोगी और स्वस्थ दोनों व्यक्तियों की आयु का परीक्षा करे ।
आयु का जानना ही आयुर्वेद का फल है, आत्मा ही आयुष्य का सहचारी है ॥२८॥
तत्र श्लोकः-क्रियापथमतिक्रान्ताः केवलं देहमाप्लुता ।
चिह्नं कुर्वन्ति यद्दोषस्तदरिष्टं निरुच्यते ॥ २६ ॥
जब सब दोष चिकित्सा कर्म के मार्ग को लांघ कर शरीर में व्याप्त होकर
लक्षणों को प्रकट करते हैं, तब इन लक्षणों को 'अरिष्ट' कहते हैं ॥ २६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थानेऽणुज्ज्योतीय-
मिन्द्रिय नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

द्वादशोऽध्यायः
अथातो गोमयचूर्णीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'गोमयचूर्णीय' नामक इन्द्रिय स्थान का व्याख्यान करेंगे जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते ।
सस्नेहं भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥ ३ ॥
निकषन्निव यः पादौ च्युतांसः परिधावति ।
विकृत्या न स लोकेऽस्मिंश्चिरं वसति मानवः ॥ ४ ॥
यस्य स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरो भृशम् ।
आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति ॥ ५ ॥
यमुद्दिश्याऽऽतुरं वैद्यः संवर्तयितुमौषधम् ।
यतमानो न शक्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ६ ॥

आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम् ।

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८३
विज्ञातं बहुशः सिद्धं विधिवच्चावचारितम् ।
न सिध्यत्यौषधं यस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ ७ ॥
आहारमुपयुञ्जानो भिषजा सूपकल्पितम् ।
यः फलं तस्य नाऽऽप्नोति दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
( १ ) जिस रोगी के सिर पर गोमय ( गोवर ) के चूर्ण के समान भुर-
भुरा चूर्ण उत्पन्न हो, रूक्षता आ जाये और शिर पर तेल या चिकनाई के साथ
नीचे बह आवे, उसका जीवन एक मास तक ही होता है । ( २ ) जो मनुष्य
पाव को जमीन पर घिस कर चलता है और विकृति के कारण जिसके कन्धे बैठ
गये हों या जो कन्धों को आगे झुका कर ( छाता को अन्दर की ओर दवा कर )
दौड़ता है, वह मनुष्य देर तक इस लोक में नहीं रहता, वह शीघ्र मर जाता
है। ( ३ ) जिस मनुष्य के स्नान करने के उपरान्त चन्दनादि के लेप करने
पर भी पहिले छाती पर लगा लेप सूखता है और शेष अंगों पर लेप गीला रहता
है वह पन्द्रह दिन भी नहीं जीता । ( ४ ) जिस रोगी को लक्ष्य कर वैद्य अति
प्रयत्न करने पर भी औषध तैयार नहीं कर पाता उस रोगी का जीना बहुत
कठिन है। ( ५ ) बहुत प्रकार से जानी हुई नियमपूर्वक रोगों पर सफलता
पूर्वक प्रयोग की हुई, विधिपूर्वक दी हुई औषध भी जिस रोगी पर फल न देवे,
सफल न हो, उस रोगी का बचना असम्भव है। ( ६ ) वैद्य द्वारा उत्तम रीति
से बनाये भोजन का उपयोग करता हुआ भी जो रोगी उत्तम फल न पाये उस
रोगी का जीवित रहना असम्भव है ॥ ३–८ ॥
दूताधिकारे वक्ष्यामो लक्षणानि मुमूर्षताम् ।
यानि दृष्ट्वा भिषक् प्राज्ञः प्रत्याख्यायादसशयम् ॥ ६ ॥
मुक्तकेशेऽथवा नग्ने रुदत्यप्रयतेऽथवा ।
भिषगभ्यागतं दृष्ट्वा दूतं मरणमादिशेत् ॥ १० ॥
सुप्ते भिषजि ये दूताश्छिन्दत्यपि च भिन्दति ।
आगच्छन्ति भिषक् तेषां न भर्तारमनुव्रजेत् ॥ ११ ॥
जुह्वत्यग्निं तथा पिण्डं पितृभ्यो निर्वपत्यपि ।
वैद्ये दूता य आयान्ति ते घ्नन्ति प्रजिघांसवः ॥ १२ ॥
कथयत्यप्रशस्तानि चिन्तयत्यथवा पुनः ।
वैद्ये दूता मनुष्याणामागच्छन्ति, मुमूर्षताम् ॥ १३ ॥
मृतदग्धविनष्टानि भजति व्याहरत्यपि ।
अप्रशस्तानि चान्यानि वैद्ये दूता मुमूर्षताम् ॥ १४ ॥

१८४ चरकसंहिता [ अ० १२
दूतारिष्ट-( १ ) वैद्यगत अरिष्ट लक्षण—
इसके आगे दूताधिकार में मरणोन्मुख रोगियों के लक्षण कहते हैं, जिनको
देख कर बुद्धिमान् वैद्य मरणोन्मुख रोगी को तत्काल निश्चय से पहिचान कर
उनकी चिकित्सा न करे। ( १ ) यदि वैद्य के बाल खोले हुए, नग्न अवस्था
में, रोते हुए अथवा अपवित्र अवस्था में, वैद्य को दूत बुलाने आवे तो वैद्य दूत
को देख कर रोगी की मृत्यु बतलावे। ( २ ) वैद्य के सोते हुए जो दूत तोड़
फोड़ कर घर में आते हैं, इन दूतों के स्वामी को वैद्य देखने न जाये ( उनको
मृतप्राय जाने)। ( ३ ) वैद्य यदि अग्नि में हवन कर रहा हो अथवा पितरों
को पिण्डदान कर रहा हो, ऐसी अवस्था में जो दूत बुलाने आते हैं वे रोगी
को मारने वाले होते हैं। [ यद्यपि दूत स्वयं रोगी की हितचिन्ता से आते हैं,
वे स्वयं रोगी को नहीं मारते तो भी ऐसे दूत रोगी की मृत्यु की सूचना देते हैं,
रोगी के मरण के पूर्व ऐसे दूतों के आने और दूतों के पूर्वभावी होने से उपचार
ने कारणरूप मान लिया है ]। ( ४ ) वैद्य के अशुभ बातचीत करते हुए
अथवा चिन्ता करते समय दूत द्वारा वैद्य को बुलाने वाले रोगी अति शीघ्र मरने
वाले होते हैं। ( ५ ) वैद्य किसी मृत पुरुष के सम्बन्ध में या जली अथवा नष्ट
वस्तु के विषय में या इसी प्रकार की किसी अशुभ घटना के विषय में बातचीत
कर रहा हो, ऐसी अवस्था में जो दूत बुलाने आते हैं, वे मरणासन्न रोगियों के
ही होते हैं। उनका रोगी मृत्यु के मुख में रहता है ॥ ९-१४ ॥
विकारसामान्यगुणे देशे कालेऽथवा भिषक् ।
दूतमभ्यागतं दृष्ट्वा नाऽऽतुरं तमुपाचरेत् ॥ १५ ॥
दीन-भीत-द्रुत-त्रस्त मलिनामसतीं स्त्रियम् ।
त्रीन् व्याकुलांश्च षण्ढांश्च दूतान्विद्यान्मुमूर्षताम् ॥ १६ ॥
( २ ) देश काल गत अरिष्ट लक्षण—
( ६ ) रोग के समान गुणवाले देश या काल में यदि दूत आवे तो उस
रोगी के पास दूत के बुलाने पर न जाये उनकी चिकित्सा न करे। [ रोग के
समान गुणवाला देश जैसे रक्त-पित्त रोग में अग्नि के समीप स्थान हो, काल
जैसे रक्त-पित्त का मध्याह्न काल है ]। ( ७ ) मलिन, असती ( वेश्या आदि )
स्त्री, दीनता से युक्त, भयभीत, भागती हुई, घबड़ाई हुई वा तीन मनुष्य एक
साथ या एक के पीछे एक लगातार और नपुंसक दूत बुलाने आयें तो समझना
चाहिये कि उनके रोगी मरना ही चाहते हैं ॥ १५-१६ ॥
अङ्गव्यसनिनं दूतं लिङ्गिनं व्याधितं तथा ।
संप्रेक्ष्य चोग्रकर्माणं न वैद्यो गन्तुमर्हति ॥ १७ ॥

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८५

अ० १२ ] इन्द्रियस्थानम् १८५

आतुरार्थमनुप्राप्तं खरोष्ट्ररथवाहनम् ।
दूतं दृष्ट्वा भिषग्विद्यादातुरस्य पराभवम् ॥ १८ ॥
पलाल-बुस-मांसास्थि-केश-लोम-नख-द्विजान् ।
मार्जनीं मुसलं सूपमुपानच्चर्म विच्युतम् ॥ १९ ॥
तृण-काष्ठ-तुषाङ्गारं स्पृशन्तो लोष्टमश्म च ।
तत्पूर्वदर्शने दूता व्याहरन्ति मुमूर्षताम् ॥ २० ॥
यस्मिंश्च दूते ब्रुवति वाक्यमातुरसंश्रयम् ।
पश्येन्निमित्तमशुभं तं च नातुरजेद्विषक् ॥ २१ ॥
तथा व्यसनिनं प्रेतं प्रेतालङ्कारमेव वा ।
भिन्नं दग्धं विनष्टं वा तद्वाहीनि वचांसि वा ॥ २२ ॥
रसो वा कटुकस्तीव्रो गन्धो वा कौणपो महान् ।
स्पर्शो वा विपुलः क्रूरो यद्वाऽन्यदशुभं भवेत् ॥ २३ ॥
( ३ ) दूतगत अरिष्ट लक्षण—
( ८ ) जिस दूत के नाक, कान आदि कोई अंग कटा फटा हो, संन्यासी,
रोगी, वध आदि उग्र काम करने वाले दूत को देख कर वैद्य को रोगी के घर जाना
ठीक नहीं । ( ६ ) दूत यदि गधे, ऊठ या रथ या सवारी पर चढ कर बुलाने
के लिये आवै, तो वैद्य समझ ले कि रोगी का मरण होगा । ( १० ) पलाल
( पुराली ), भूसा, मांस, अस्थि, केश, लोम, नख, दात, झाडू, भूषण, छाज,
जूता, चमड़ा, टूटी या गिरी हुई वस्तु, तिनका, काठ, लकड़ी, तुष, अंगार,
मिट्टी का ढेला, पत्थर इन वस्तुओं का प्रथम प्रवेश काल मे ही स्पर्श करते
हुए दूत मरने वाले रोगी की सूचना देते है । ( ११ ) रोगी के सम्बन्ध में बात
करते हुए जिस दूत में वैद्य को अशुभ लक्षण दिखाई देवे, उस रोगी के घर
वैद्य न जावे । ( १२ ) अशुभ लक्षण—दूत में किसी प्रकार का व्यसन ( शराब
पीना या जुआ खेलना ), मृत मनुष्य की कथा का कहना, मृतक के अलकार
धारण करना, टूटी, जली अथवा नष्ट हुई वस्तु की बातचीत, कटु रस या तीव्र
( इन्द्रियों को उद्विग्न करने वाला ) गन्ध, अथवा मुर्दे की दुर्गन्ध, तीव्र या उग्र
स्पर्श, क्रूर अन्य इसी प्रकार के अशुभ लक्षण हों तो इनको अशुभ जाने ॥१७-२३॥
तत्पूर्वमभितो वाक्यं वाक्यकालेऽथवा पुनः ।
दूतानां व्याहृतं श्रुत्वा धीरो मरणमादिशेत् ॥ २४ ॥
इति दूताधिकारोऽयमुक्तः कृत्स्नो मुमूर्षताम् ।
( ४ ) पूर्वापर लक्षण—
( १३ ) दूत के बचन से पूर्व भूतकाल के द्योतक वचनों में रोगी की

१८६ चरकसंहिता [ अ० १२
अवस्था का श्रवण करना अथवा रोगी का वर्णन करते समय भूतकाल की
क्रियाओं को सुनना अशुभ लक्षण हैं । ऐसा सुन कर रोगी की मृत्यु समझनी
चाहिये । इस प्रकार से मरणोन्मुख रोगियों के दूतों का वर्णन सम्पूर्ण रूप में
कह दिया ॥ २४ ॥
पध्याातुरकुलानां च वक्ष्याम्यौत्पातिकं पुनः ॥ २५ ॥
अवश्रुतमधोत्कृष्टं स्खलनं पतनं तथा।
आक्रोशः संप्रहारो वा प्रतिषेधो विगर्हणम् ॥ २६ ॥
वस्त्रोष्णीषोत्तरीयध्वजच्छत्रोपानद्युगाश्रयम् ।
व्यसनं दर्शनं चापि मृतव्यसनिनां तथा ॥ २७ ॥
चैत्यध्वजपताकानां पूर्णानां पतनानि च ।
हतानिष्टप्रवादाश्च दर्शनं भस्मपांसुभिः ॥ २८ ॥
पथच्छेदो विडालेन शना सर्पेण वा पुनः ।
मृगद्विजानां क्रूराणां गिरो दीप्तां दिशं प्रति ॥ २९ ॥
शयनासनयानानामुत्तानानां प्रदर्शनम् ।
इत्येतान्यप्रशस्तानि सर्वाण्याहुर्मनीषिणः ॥ ३० ॥
एतानि पथि वैद्येन पश्यताऽऽतुरवेश्मनि ।
शृण्वता च न गन्तव्यं तदागारं विपश्चिता ॥ ३१ ॥
इत्यौत्पातिकमाख्यातं पथि वैद्यविगर्हितम् ।
( ५ ) मार्ग के लक्षण—
रोगी के घर जाते समय रास्ते में जो अरिष्ट सूचक लक्षण ( अशुभ चिह्न )
होते हैं उनको कहते हैं—छींक का आना, डर कर रोना, फिसलना, गिरना,
चिल्लाना, चोट लगना, प्रतिषेध ( मत जाओ ऐसी रुकावट होना ), निन्दा,
वस्त्र, पगड़ी, चादर ( दुपट्टा ), छत्री, जूता इन पदार्थों का फट जाना, मार्ग
में दुःखी अथवा मृत या कान, नाक अथवा अंग से हीन व्यक्ति का दर्शन
होना, चैत्य (मन्दिर), ध्वजा, पताका अथवा पानी से भरे घड़ों का गिरना; मरना
या कोई अनिष्ट बात, या वस्तु का नाश सुनाई देना; राख या रेत-मिट्टी इन सहित
दीखना; बिल्ली, सांप या कुत्ता इनका रास्ता काट कर जाना; जिस दिशामें सूर्य हो
उधर ही शृगाल, गोहड़, गीध आदि क्रूर पशु पक्षी चिल्ला रहे हों; बिछौना, आसन,
गाड़ी आदि वस्तुएं उत्तान रूप से रास्ते में पड़ी हों तो बुद्धिमान् इनको अशुभ लक्षण
समझें । ۞ रोगी के घर में जाते समय ये लक्षण हों तो रोगी के घर नहीं जाना
चाहिये । वैद्य के लिए निन्दित इन 'औत्पातिक' लक्षणों को कह दिया ॥२५-३१॥
۞ दीप्ता दिक्—'दक्षिण दिशा' भी अर्थ है ।