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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

१४६ चरकसंहिता [ अ० ३
मरणोन्मुख रोगी के वर्ण, स्वर गन्ध और रस का पृथक् पृथक् वर्णन कर
दिया है, अब स्पर्श सम्बन्धी लक्षणों को कहते हैं ॥ ३ ॥
स्पर्शप्राधान्येनैवाऽऽतुरस्याऽऽयुष प्रमाणविशेषं जिज्ञासुः प्रकृति-
स्थेन पाणिना केवलमस्य शरीरं स्पृशेत् विमर्शयेद्वाऽन्येन ॥ ४ ॥
परिमृशता तु खल्वातुरशरीरमिमे भावास्तत्र तत्रावबोद्धव्या भवन्ति।
तद्यथा—सततं स्पन्दमानानां शरीरदेशानां स्तम्भः, नित्योष्मणां शीती-
भावः, मृदूनां दारुणत्वं, श्लक्ष्णाना खरत्व, स्थूलाना वृषणादीनां सता-
मसद्भावः, सन्धीनां स्रस-भ्रंश-च्यवनानि¹। मासशोणितयोर्वीतीभावो
दारुणत्व, स्वेदानुबन्धः स्तम्भो वा। यच्चान्यदपि किंचिदीदृश स्पर्शाना
लक्षणमनिमित्तं स्यात् । इति लक्षणानां संग्रहः स्पर्शानाम् ॥ ५ ॥
स्पर्श की प्रधानता से रोगी के आयु का परिणाम जानने की इच्छा से,
वैद्य अपने स्वस्थ हाथ से रोगी के सम्पूर्ण शरीर को स्पर्श करे अथवा किसी
दूसरे व्यक्ति से ( जिसका स्वस्थ हाथ हो ) स्पर्श करवावे । स्पर्श करते हुए
रोगी के शरीर में निम्न बाते जाननी चाहिये। यथा—निरन्तर स्पन्दन करने
वाले शरीर के भागों का स्पन्दन करने से रुक जाना, शरीर मे जो अग सदा
गरम रहते हैं उनका शीतल हो जाना, कोमल अंगों का कठोर हो जाना, चिकने
अगो का कर्कश हो जाना, वृषण आदि स्थूल अगों का लुप्त हो जाना, सन्धियों
का स्रसन ( गिर जाना ), भ्रंशन ( खिसक जाना ), च्यवन ( दूसरे स्थानों
में चले जाना ), मास और रक्त का बहुत क्षीण हो जाना और कठोर ( घट्ट )
बन जाना, पसीने का अधिक आना या बिल्कुल न आना। इसी प्रकार के
अन्य अकारण स्पर्श जन्य लक्षण जो भी उत्पन्न हों उनकी स्पर्श द्वारा परीक्षा
करनी चाहिये। ये सक्षेप में स्पर्श-लक्षणों का संग्रह किया है ॥ ४-५ ॥
तद् व्यासतोऽनुव्याख्यास्यामः—तस्य चेत्परिमृश्यमानं पृथक्त्वेन
पाद-जङ्घोरु-स्फिगुदर-पार्श्व-पृष्ठेषिका-पाणि-ग्रीवा-ताल्वोष्ठ-ललाटं
स्विन्नं शीतं स्तब्धं दारुणं वीत-मास-शोणितं वा स्यात्, परासुरयं
पुरुषो नचिरात्काल मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ६ ॥
उसीको विस्तार से आगे कहते हैं । रोगी के भिन्न २ अगों मे स्पर्श करने
से यदि पाव, जघा, ऊरु, नितम्ब, उदर, पार्श्व, पृष्ठ वश के मणके, हाथ, ग्रीवा,
तालु, ओष्ठ, ललाट ये अवयव पसीने से युक्त, शीतल या जड़ या कठोर अथवा
मास या रक्त से रहित हो तो समझ लेना चाहिये कि रोगी पुरुष बहुत दिनों
तक नहीं जीयेगा, उसकी मृत्यु शीघ्र ही होगी ॥ ६ ॥
१ 'स्रसभ्रंशधावनानि' इति पाठः ।

अ० ३ ] इन्द्रियस्थानम् १४७

अ० ३ ] इन्द्रियस्थानम् १४७
तस्य चेत्परिमृश्यमानानि पृथक्त्वेन गुल्फ-जानु-वङ्क्षण गुद-वृषण-
मेढ्र-नाभ्यंस-स्तन-मणिक-पर्शूका-हनु-नासिका-कर्णाक्षि-भ्रू-शङ्खादीनि
स्रस्तानि व्यस्तानि च्युतानि वा स्थानेभ्यः स्युः, परासुरय पुरुषो न
चिरात्कालं मरिष्यतीति विद्यात् ॥ ७॥
भिन्न २ अवयवों के स्पर्श करने पर यदि गुल्फ (टखने), जानु, वङ्क्षण,
गुदा, वृषण, शिश्न, नाभि, अंस, स्तन, हाथ (कलाई), पसुलिया, हनुसन्धि
(जबाड़ा), नासिका, कान, आख, भौंह, शंख आदि सन्धिया व्यस्त अवस्था
मे या इधर उधर अपने स्थानों से खिसकी हों तो समझ लेना चाहिये कि
पुरुष शीघ्र ही मर जायेगा ॥ ७॥
तथाऽस्योच्छ्वास-मन्या-दन्त-पक्ष्म-चक्षुः-केश-लोमोदर-नखाङ्गुलि-
गणं च लक्षयेत् । तस्य चेदुच्छ्वासोऽतिदीर्घोऽतिह्रस्वो वा स्यात् परा-
सुरिति विद्यात् । तस्य चेन्मन्ये परिमृश्यमाने न स्पन्देयातां परासुरिति
विद्यात् । तस्य चेद्दन्ताः परिकीर्णाः श्वेता जातशर्कराः स्युः, परासुरिति
विद्यात् । तस्य चेत्पक्ष्मणि जटाबद्धानि स्युः, परासुरिति विद्यात् ।
इसी प्रकार रोगी पुरुष के उच्छ्वास, मन्या (गले के पार्श्व में जाने वाली
दो धमनया), दात, पक्ष्म (पलक), आख, केश, लोम, पेट, नख और अंगुली
की भी परीक्षा करनी चाहिये । जिस रोगी को श्वास, प्रश्वास, बहुत लम्बा या
छोटा हो जावे, उसे मरा हुआ जाने । जिस रोगी के मन्या धमनियों में धड़कन
प्रतीत न हो, उसे प्राणशून्य जाने । जिसके दात मैल से भरे, श्वेत अथवा शर्क-
राय़ुक्त हो जाये, उसे प्राणरहित जाने । रोगी पुरुष की पलकों के बाल आपस
मे चिपटे (गुझले हुए) हुए हों, उसे भी प्राणरहित जाने ॥
तस्य चेच्चक्षुषी प्रकृतिहीने विकृतियुक्तेऽत्युत्पिण्डितेऽतिप्रविष्टेऽति-
जिह्मेऽतिविषमेऽतिप्रस्रुतेऽतिविमुक्तबन्धने सततोन्मिषिते, सततनिमे-
षिते, निमेषोन्मेषातिप्रवृत्ते, विभ्रान्तदृष्टिके, विपरीतदृष्टिके, व्यस्तदृ-
ष्टिके, नकुलान्धे, कपोतान्धेऽलातवर्णे, कृष्ण-नील-पीत-श्याव-ताम्र-हरि-
त-हारिद्र-शुक्ल-वैकारिकाणा वर्णानामन्यतमेनातिसंप्लुते वा स्यातां,
परासुरिति विद्यात् ।
रोगी की आखे प्रकृतिहीन और विकृति से युक्त अर्थात् बाहर को बहुत
निकली, चक्षु गोलकों में अन्दर धसी, बहुत कुटिल, बहुत विषम अथवा एक
आख खुली और एक बन्द, आख की मासपेशियां बहुत ढीली हो, बहुत शिथिल,
निरन्तर खुली या बन्द रहे, अथवा जल्दी जल्दी खुलें और बन्द हो, अप्रयुक्त

१४८ चरकसंहिता [ अ० ३
दृष्टि, अशुद्ध देखने वाली (विपरीत देखने वाली), हीनदृष्टि (जो दूर से न
देख सके), नकुलान्ध कपोतान्ध अलातवर्ण, अगारे के समान आख लाल ही
दीखे वा काला, पीला, नीला, श्याम, ताम्बे के समान, हरा, श्वेत इन वैकारिक
वर्णों में से किसी एक वर्ण से आक्रान्त हो तो रोगी को मरा हुआ जानना चाहिये।
अथास्य केशलोमान्यायच्छेत्—तस्य चेत्केशलोमान्यायस्यमानानि
प्रलच्चेरन्न च वेद्येयुः परासुरिति विद्यात् ।
शिर के बाल या शरीर के बाल खींचने पर उखड़ आयें और रोगी को
इनके उखड़ने का पता न लगे (दर्द न हो) तो उसको मरा हुआ जानना चाहिये।
तस्य चेदुदरे सिराः प्रदृश्येरन् श्याव-ताम्र-नील-हारिद्र-शुक्ला वा
स्युः परासुरिति विद्यात् ।
यदि रोगी के पेट की शिरायें दीखने लगे अथवा इनका रंग काला, ताम्बे
का रंग, हल्दी के समान पीला या श्वेत हो जाये तो उसे मरा हुआ ही जाने ।
तस्य चेन्नखा वीतमांसशोणिताः पक्वजाम्बववर्णाः स्युः, परासु-
रिति विद्यात् ।
जिस रोगी के नखों का मास और रक्त क्षीण हो जाये, पकी हुई जामुन के
समान नख काले नीले हो जायें तो उसे मरा हुआ समझें ।
अथास्याङ्गुलीरायच्छेत्तस्य चेदङ्गुलय आयम्यमाना न चेत्स्फुटेयुः,
परासुरिति विद्यात् ॥ ८ ॥
रोगी पुरुष की अंगुलियो को पकड़कर खींचे और यदि उसकी अगुलियों में
चटकने की आवाज़ न आये, तो उसे गतायु (मृत) ही समझे ॥ ८ ॥
भवति चात्र—एतान् स्पृश्यान् बहून् भावान् यः स्पृशन्नावबुध्यते ।
आतुरे न स संमोहमायुर्ज्ञानस्य गच्छति ॥ ६ ॥
वर्णन किये हुए स्पृश्य अंगों को स्पर्श करके सम्पूर्ण लक्षणों को जो वैद्य
भली प्रकार से जान लेता है, वह रुग्ण पुरुष के आयुर्ज्ञान मे कभी धोखा
नही खाता ॥ ६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते इन्द्रियस्थाने
परिमर्द्दनीयेन्द्रिय नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

१५० चरकसंहिता [ अ० ४ ]
योऽग्निं प्रकृतिवर्णस्थं नीलं पश्यति निष्प्रभम् ।
कृष्णं वा यदि वा शुक्लमग्नौ वसति १ सप्तमीम् ॥ ११ ॥
मरीचीनसतो मेघान्मेघान्वाप्यसतोऽम्बरे ।
विद्युतो वा विना मेघात् पश्यन्मरणमृच्छति ॥ १२ ॥
मृण्मयीमिव यः पात्रीं कृष्णाम्बरसमावृताम् ।
आदित्यमीक्षते शुद्धं चन्द्रं वा न स जीवति ॥ १३ ॥
अपर्वणि यदा पश्येत्सूर्याचन्द्रमसोर्ग्रहम् ।
अव्याधितो व्याधितो वा तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ १४ ॥
नक्तं सूर्यमहश्चन्द्रमग्नौ धूममुत्थितम् ।
अग्निं वा निष्प्रभं रात्रौ दृष्ट्वा मरणमृच्छति ॥ १५ ॥
प्रभावतः प्रभाहीनान्निष्प्रभान् वा प्रभावतः ।
खरा विलिङ्गान् पश्यन्ति भावान् प्राणाञ्जिहासवः ॥ १६ ॥
व्याकृतानि विवर्णानि विसरूपोपगतानि च ।
विनिमित्तानि पश्यन्ति रूपाण्यायुःक्षये नराः ॥ १७ ॥
यश्च पश्यत्यदृश्यान् वै दृश्यान् यश्च न पश्यति ।
तावुभौ पश्यतः क्षिप्रं यमालयमसंशयम् ॥ १८ ॥
अब इन्हीं का आगे विस्तार से वर्णन करते हैं—
(१) जो रोगी आकाश को ठोस (कठिन) रूप में देखता है, अथवा
पृथिवी को आकाश की भांति शून्यरूप मे देखता है, दोनों प्रकार का विपरीत
दर्शन करता हुआ पुरुष मृत्युको प्राप्त होता है ।
(२) जिस रोगी को आकाश में बहने वाली (अदृश्य) वायु दिखाई देने
लगे और जलती हुई आग दिखाई न देवे उस रोगी का आयु समाप्त हुआ जाने ।
(३) शुद्ध निर्मल जालरहित जल मे जाल(-तन्तु) देखे और स्थिर पानी
को चलता (बहता) देखे वह भी शीघ्र ही प्राणत्याग करेगा ।
(४) जो रोगी मनुष्य जागता हुआ प्रेत, राक्षस अथवा अन्य किसी प्रकार
का आश्चर्यकारक पदार्थ देखता है वह रोगी जीने में समर्थ नहीं है ।
(५) जो रोगी प्रकृति में स्थित (लाल, कपिल वर्ण की) अग्नि को नीली
और कान्ति से रहित, काली या श्वेत वर्ण की देखता है, वह सातवीं रात्रि में
स्वयं अग्नि (चिता) मे वास करता है ।
(६) जो रोगी आकाश में सूर्य की किरणों के न होने पर भी किरणों को,
१. 'निशा व्रजति, इति च पाठ', वह सातवीं रात चढ बसता है ।

अ० ४ ] इन्द्रियस्थानम् १५१
मेघों के न होते हुए मेघों को आकाश मे देखे, अथवा बिना बादलों के बिजली
को देखे, उसे मरणोन्मुख समझना चाहिये ।
( ७ ) जो रोगी मेघ आदि से न छिपे, शुद्ध सूर्य या चन्द्रमा को काले वस्त्रों
से टपे कटोरे वा मिट्टी के बर्त्तन के रूप मे देखता है, वह नहीं जीता ।
( ८ ) जो मनुष्य ग्रहण-योग के बिना सूर्य या चन्द्रमा में ग्रहण देखता है,
उस स्वस्थ या रोगी पुरुष की आयु समाप्त समझनी चाहिये ।
( ६ ) जिस रोगी को रात्रि में सूर्य, दिन में चन्द्रमा और बिना आग के
धुंवा तथा रात्रि मे प्रभा के बिना आग दीखे [ दिन मे आग का निष्प्रभ
दीखना अरिष्ट नहीं ] उस रोगी को गतायु ( मृत ) समझना चाहिये ।
( १० ) जिन पुरुषों ने अञ्जन आदि नहीं लगाया उनमें अञ्जन आदि देखे
( बिना कान्ति के पुरुषों में कान्ति का दीखना ), तथा प्रभावान् पुरुषों को
निष्प्रभ देखना, इस प्रकार स्वाभाविक लक्षणों से रहित पुरुषों को प्राणों को
छोड़ने वाला पुरुष ही देखता है ।
( ११ ) आयु के क्षय होने पर रोगी मनुष्य पदार्थों के विकृत रूप, विपरीत
रंग, अशुद्ध सख्या से युक्त, बिना कारण के आकृति मे परिवर्त्तन देखता है।
( १२ ) जो मनुष्य अदृश्य रूपों को देखता है और आख से दीखने वाले
पदार्थों को नहीं देखता, वे दोनों निश्चय से शीघ्र ही यमलोक मे जाते हैं ॥६-१८॥
अशब्दस्य च यः श्रोता शब्दान् यश्च न बुध्यते ।
द्वावप्येतौ यथा प्रेतौ तथा ज्ञेयो विजानता ॥ १६ ॥
संवृत्त्याङ्गुलिभिः कर्णौ ज्वालाशब्दं य आतुरः ।
न शृणोति गतासुं तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
( १३ ) जो मनुष्य बिना शब्द के शब्द सुने और शब्द को नहीं सुनता,
इन दोनों मनुष्यों को प्रेत के समान गिनने चाहिये (मरे हुए समझने चाहिये) ।
( १४ ) अगुलियों से कानों को बन्द करने पर जिस रोगी को कानों में
‘ज्वाला-शब्द’ ‘घनघन’ आवाज सुनाई न देवे उसे मरा हुआ समझना चाहिये,
उसकी चिकित्सा न करे ॥ १६-२० ॥
विपर्ययेण यो विद्याद् गन्धाना साध्वसाधुताम् ।
न वा तान् सर्वशो विद्यात्तं विद्याद् विगतायुषम् ॥ २१ ॥
( १५ ) जो मनुष्य शुभ गन्ध को अशुभ और अशुभ गन्ध को शुभ इस
प्रकार विरुद्ध रूप से तथा जो मनुष्य सर्वथा गन्ध को नहीं पहिचानता, इन दोनों
को मरणासन्न समझना चाहिये ॥ २१ ॥

१५२ चरकसंहिता [ अ० ४
यो रसान्न विजानाति न वा जानाति तत्त्वतः ।
मुखपाकादृते पक्कं तमाहुः कुशला नरम् ॥ २२ ॥
( १६ ) जो मनुष्य 'मुख-पाक' के बिना ही रसों को नहीं जानता अथवा
रसों को उनके स्वकीय रूप (जैसे हैं वैसे रूप ) में नहीं पहिचानता, वह
शीघ्र मर जाता है, कुशल पुरुष उसकी आयु को पूर्ण हुई कहते हैं ॥ २२ ॥
उष्णान्वाशीतान् खरान् श्लक्ष्णान्मृदूनपि च दारुणान् ।
स्पृश्यान् स्पृष्ट्वा ततोऽन्यत्वं मुमूर्षुस्तेषु मन्यते ॥ २३ ॥
( १७) जो मनुष्य उष्ण, शीत, खर, श्लक्ष्ण, चिकने, कोमल या कठोर
पदार्थों को स्पर्श करके विपरीत रूप में ( यथा उष्ण को शीत और शीत को
उष्ण ) जानता है वह मरणासन्न है ऐसा समझना चाहिये ॥ २३ ॥
अन्तरेण तपस्तीव्रं योगं वा विधिपूर्वकम् ।
इन्द्रियैरधिकं पश्यन् पञ्चत्वमधिगच्छति ॥ २४ ॥
इन्द्रियाणामृते दृष्टेरिन्द्रियार्थान्न पश्यति ।
विपर्ययेण यो विद्यात्तं विद्याद्विगतायुषम् ॥ २५ ॥
स्वस्थाः प्रज्ञाविपर्यस्तैरिन्द्रियार्थेषु वैकृतम् ।
पश्यन्ति ये सुबहुशस्तेषां मरणमादिशेत् ॥ २६ ॥
( १८ ) जो मनुष्य तीव्र तप के बिना अथवा विधिपूर्वक योगसमाधि से
ज्ञान प्राप्त किये बिना, साधारण मनुष्यों से अधिक इन्द्रिय ज्ञान देखता है,
वह मरणासन्न है । [ समाधि-ज्ञान तथा तीव्र तप ही अतीन्द्रिय ज्ञान करा
सकते हैं ] ।
( १९) जो मनुष्य इन्द्रियों की शक्ति से अप्राप्य पदार्थों को इन्द्रियों
द्वारा देखने या प्राप्त करने लगता है वह जीवित नहीं रहता है ।
( २० ) नीरोग, स्वस्थ पुरुष जो कि बुद्धिदोष के कारण प्रायः करके
( एक बार नहीं ) इन्द्रियों के विषयों को विपरीत रूप में अथवा असद् रूप में
देखते हैं वे शीघ्र मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ २४-२६ ॥
तत्र श्लोकाः - एतदिन्द्रियविज्ञानं यः पश्यति यथातथम् ।
मरणं जीवितं चैव स भिषग्ज्ञातुमर्हति ॥ २७ ॥
जो पुरुष इस इन्द्रिय विज्ञान को भली प्रकार से देखता है, वह वैद्य मृत्यु
और जीवन दोनों को भली प्रकार से जान सकता है ॥ २७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने
इन्द्रियानीकमिन्द्रियं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५३

अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५३
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः पूर्वरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'पूर्वरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
पूर्वरूपाण्यसाध्याना विकाराणां पृथक् पृथक् ।
भिन्नाभिन्नानि वक्ष्यामो भिषजां ज्ञानवृद्धये ॥ ३ ॥
पूर्वरूपाणि सर्वाणि ज्वरोक्तान्यतिमात्रया ।
यं विशन्ति विशत्येन मृत्युर्ज्वरपुरःसरः ॥ ४ ॥
अन्यान्यपि च रोगस्य पूर्वरूपाणि य नरम् ।
विशन्त्येतेन कल्पेन तस्यापि मरणं ध्रुवम् ॥ ५ ॥
वैद्यों के ज्ञान बढाने के लिये असाध्य रोगों के भिन्न भिन्न पूर्वरूप पृथक्
पृथक् रूप से कहेंगे । ज्वर में कहे हुए पूर्वरूप जिस ज्वर रोगी में सम्पूर्ण रूप
में या बहुत अधिक प्रमाण मे प्रविष्ट होते हैं, उसमें ज्वर साक्षात् मृत्यु रूप से
घुस जाता है । इसी प्रकार अन्य किसी भी रोग में पूर्वरूप सम्पूर्ण रूप से या
बहुत प्रमाण में रोगी में दिखाई दें, तो उसकी भी निश्चय मृत्यु होती है ॥३-५॥
पूर्वरूपैकदेशांस्तु वक्ष्यामोऽन्यान् सुदारुणान् ।
ये रोगाननुबध्नन्ति मृत्युर्यैरनुबध्यते ॥ ६ ॥
बलं च हीयते यस्य प्रतिश्यायश्च वर्धते ।
तस्य नारीप्रसक्तस्य शोषोऽन्तायोपजायते ॥ ७ ॥
श्वभिरुष्ट्रैः खरैर्वाऽपि याति यो दक्षिणां दिशम् ।
स्वप्ने यक्ष्माणमासाद्य जीवित स विमुञ्चति ॥ ८ ॥
इसके आगे रोगों के भयंकर पूर्वरूपों के एक अंश का वर्णन करते हैं, जो
रोगों के साथ दिखाई देते हैं तथा जिनके साथ मृत्यु का निश्चय सम्बन्ध है ।
( १ ) जिस क्षय रोगी का बल घट गया हो और प्रतिश्याय ( कफ ) बढ
रहा हो, ऐसी अवस्था में भी रोगी स्त्री-सग का व्यसनी हो तोक्षय रोग उसकी
मृत्यु के लिये होता है ।
( २ ) जो क्षयरोगी स्वप्न में कुत्ते, ऊट, गधे आदि पर चढ़ कर दक्षिण
दिशा में गमन करता हो वह रोगी कभी जीता नहीं बच सकता ॥६-८॥
प्रेतैः सह पिबेन्मद्य स्वप्ने यः कृष्यते शुना ।
सुघोरं ज्वरमासाद्य स जीवमवसृजते ॥ ९ ॥

१५४ चरकसंहिता [ अ० ५
( ३ ) जो रोगी नींद में प्रेतों के साथ मद्य पान करे और स्वप्न मे जिसको
कुत्ते घसीटते हो वह रोगी पुरुष घोर ज्वरी होकर जीता नहीं बच सकता ॥६॥
लाक्षारक्ताम्बराभं य पश्यत्यम्बरमन्तिकात् ।
स रक्तपित्तमासाद्य तेनैवान्ताय नीयते ॥ १० ॥
रक्तस्रग् रक्तसर्वाङ्गो रक्तवासा मुहुर्हसन् ।
यः स्वप्ने ह्रियते नार्या स रक्तं प्राप्य सीदति ॥ ११ ॥
( ४ ) जो रोगी समीप मे ही आकाश को लाख के रस या मेंहदी के रंग
में रंगे कपड़े के समान लाल देखे, वह रक्तपित्त रोग में ग्रस्त होकर उसी रोग
से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।
( ५ ) जो रोगी स्वप्न में लाल माला पहिने, सब अगों को लाल देखे,
लाल कपड़ा पहिने, बार बार हसता हुआ, स्त्री से कहीं अन्यत्र ले जाया जाये,
वह पुरुष रक्त पित्त का रोगी हो कर मर जाता है ॥ १०-११ ॥
शूलाटोपान्त्रकूजञ्च दौर्बल्य चातिमात्रया ।
नखादिषु च वैवर्ण्य गुल्मेनान्तकरो ग्रहः ॥ १२ ॥
लता कण्टकिनी यस्य दारुणा हृदि जायते ।
स्वप्ने गुल्मस्तमन्ताय क्रूरो विशति मानवम् ॥ १३ ॥
( ६ ) जिस रोगी को शूल, आध्मान ( आफरा ), आतों का कूजना शब्द,
और बहुत अधिक दुर्बलता हो, तथा नख आदि जिसके श्वेत हो जाये उस
रोगी का गुल्म ही मृत्युकारी होता है ।
( ७ ) जिस रोगी के हृदय मे स्वप्न में काटेदार बेल उत्पन्न हो, उस रोगी
को गुल्म रोग मृत्युरूप से आता है ॥ १२-१३ ॥
कायेऽल्पमपि सस्पृष्टं सुभृश यस्य दीर्यते ।
क्षतानि च न रोहन्ति कुष्ठैर्मृत्युर्हिनस्ति तम् ॥ १४ ॥
नग्नस्याज्यावसिक्तस्य जुह्वतोऽग्निमनर्चिषम् ।
पद्मान्युरसि जायन्ते स्वप्ने कुष्ठैर्मरिष्यतः ॥ १५ ॥
( ८ ) जिस रोगी के शरीर पर थोड़ा सा स्पर्श किया हुआ बहुत अधिक
घाव कर देता है, तथा जिसके व्रण नहीं भरते, वह मनुष्य कुष्ठ रोग के कारण
मरता है ।
( ६ ) जो मनुष्य स्वप्न में नगा होकर, अंगों पर घी लगा कर बिना
ज्वाला के अग्नि में हवन करता वा जिसके हृदय में से कमल उत्पन्न होता है,
वह कुष्ठ रोग से मरता है ॥ १४-१५ ॥

अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५५
स्नातानुलिप्तगात्रेऽपि यस्मिन् गृध्नन्ति मक्षिकाः ।
स प्रमेहेण संस्पर्शं प्राप्य तेनैव हन्यते ॥ १६ ॥
स्नेहं बहुविधं स्वप्ने चण्डालैः सह यः पिवेत् ।
बध्यते स प्रमेहेण स्पृश्यतेऽन्ताय मानवः ॥ १७ ॥
(१०) जिस मनुष्य के स्नान करने और चन्दन का लेप करने पर भी
मक्खिया शरीर पर से नहीं उड़तीं वह प्रमेह का रोगी होकर उसी से मृत्यु को
प्राप्त होता है ।
(११) जो मनुष्य स्वप्न में नाना प्रकार के स्नेहों का चाण्डालों के साथ
पान करता है, वह प्रमेह के रोग से आक्रान्त होकर प्रमेह से मरता है ॥१६-१७॥
ध्यानायासौ तथोद्वेगो मोहश्चास्थानसंभवः ।
अरतिर्बलहानिश्च मृत्युरुन्मादपूर्वकः ॥ १८ ॥
आहारद्वेषिण पश्येल्लुप्तचित्तमुददितम् ।
विद्याद्धीरो मुमूर्षु तमुन्मादेनातिपातिना ॥ १९ ॥
क्रोधन त्रासबहुल सकृत्प्रहसिताननम् ।
मूर्च्छापिपासाबहुल हन्त्युन्मादः शरीरिणम् ॥ २० ॥
नृत्यन् रक्षोगणैः साध य. स्वप्नेऽम्भसि सीदति ।
स प्राप्य भृशमुन्माद याति लोकमितः परम् ॥ २१ ॥
(१२) जिसको ध्यान और श्रम, उद्वेग और मोह आदि बिना अवसर
के (समय के बिना जहा नहीं करने चाहिये वहा) हों, उदासीनता और
बलहानि हो जाये, उसकी मृत्यु उन्माद रोग से होती है ।
(१३) भोजन से द्वेष करनेवाला, जिसका चित्त नष्ट हो गया हो,
(अस्थिर चित्त), तथा ऊर्ध्व वात से पीडित हो, ऐसा रोगी उन्माद रोग
से मरता है ।
(१४) अत्यन्त क्रोधी, बहुत डरने वाला, एकदम सहसा हसने लगे,
अतिशय मूर्छा प्यासवाला रोगी उन्माद से मरता है ।
(१५) जो मनुष्य स्वप्न में राक्षसों के साथ नृत्य करता हुआ पानी में
डूब जाता है, वह तीव्र उन्माद रोग से मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ १८-२१ ॥
असत्तत्त्वः पश्यति यो यः शृणोत्यसत. स्वरान् ।
बहून् बहुविधाञ्जाग्रत्सोऽपस्मारेण बध्यते ॥ २२ ॥
मत्तं नृत्यन्तमाविष्य प्रेतो हरति यं नरम् ।
स्वप्ने हरति तं मृत्युरपस्मारपुरःसरः ॥ २३ ॥

१५६ चरकसंहिता [ अ० ५

( १६ ) अन्धकार के बिना जो अन्धकार को देखता है और जागता
हुआ भी बिना शब्दों के जो अनेक शब्द सुनता है, यह रोगी अपस्मार से
मारा जाता है ।
( १७ ) स्वप्न में मत्त होकर, नाचता हुआ प्रेत जिस मनुष्य को शिर
नीचा करके हर लेते हैं उसकी मृत्यु अपस्मार से होती है ।। २२-२३ ।।
स्तभ्येते प्रतिबुद्धस्य हनू मन्ये तथाऽक्षिणी ।
यस्य तं बहिरायामो गृहीत्वा हन्त्यसंशयम् ।। २४ ।।
शष्कुलीरप्यपूपान् वा स्वप्ने खादति यो नर ।
स चेत्तांश्छर्दयति प्रतिबुद्धो न जीवति ।। २५ ।।
( १८ ) जिस रोगी के जागते समय हनु ( जबड़े ), मन्या, शिरा तथा
आखें स्तम्भित ( जड़ ) रह जायें, वह रोगी 'बहिरायाम' नाम (वात व्याधि से)
मरता है । [ इस रोग में प्राण बाहर के बाहर ही रह जाते हैं, भीतर प्रवेश
नहीं करते । ]
( १६ ) जो मनुष्य स्वप्न में पूरी, पूए आदि वस्तु खाये और जागने
पर उसी प्रकार का फिर वमन करे, वह नहीं जीता । वह अवश्य मृत्यु को
प्राप्त होता है ।। २४-२५ ।।
एतानि पूर्वरूपाणि यः सम्यगवबुध्यते ।
स एषामनुबन्धं च फलं च ज्ञातुमर्हति ।। २६ ।।
जो वैद्य इन पूर्वरूपों को भली प्रकार से समझता है, वह इनके अनुबन्ध
और फलों को भली प्रकार से कह सकता है ।। २६ ।।
य इमांश्चापरान् स्वप्नान् दारुणानुपलक्षयेत् ।
व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ।। २७ ।।
यस्योत्तमाङ्गे जायन्ते वंशगुल्मलतादयः ।
वयांसि च विलीयन्ते स्वप्ने मौण्ड्यमियाच्च यः ।। २८ ।।
गृध्रोलूकश्वकाकाद्यैः स्वप्ने यः परिवार्यते ।
रक्षःप्रेत-पिशाच-स्त्री-चण्डाल-द्रविणान्धकैः ।। २९ ।।
वंश-वेत्र-लता-पाश-तृण-कण्टक-सकटे ।
प्रमुह्यति१ हि य स्वप्ने यो गच्छन् प्रपतत्यपि ।। ३० ।।
भूमौ पांशूपधानाया वल्मीके वाऽथ भस्मनि ।
श्मशानायतने श्वभ्रे स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ।। ३१ ।।
१ 'स सज्जति हि य' इति च पाठः ।

अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५७

अ० ५ ] इन्द्रियस्थानम् १५७
कलुषेऽम्भसि पङ्के वा कूपे वा तमसाऽऽवृते ।
स्वप्ने मज्जति शीघ्रेण स्रोतसा ह्रियते च यः ॥ ३२ ॥
स्नेहपानं तथाऽभ्यङ्गः स्वप्ने बन्धपराजयौ ।
हिरण्यलाभः कलहः प्रच्छर्दनविरेचने ॥ ३३ ॥
उपानद्युगनाशश्च प्रपातः पांशुचर्मणोः ।
हर्षः स्वप्ने प्रकुपितैः पितृभिश्चावभर्त्सनम् ॥ ३४ ॥
दन्त-चन्द्रार्क-नक्षत्र-देवता-दीप-चक्षुषाम् ।
पतनं वा विनाशो वा स्वप्ने भेदो नगस्य वा ॥ ३५ ॥
रक्तपुष्प वनं भूमिं पापकर्मोलया चिताम् ।
गुहान्धकारसबाधं स्वप्ने यः प्रविशत्यपि ॥ ३६ ॥
रक्तमाली हसन्नुच्चैर्दिग्वासा दक्षिणा दिशम् ।
दारुणामटवी स्वप्ने कपियुक्त १ प्रयाति वा ॥ ३७ ॥
कषायिणामसौम्यानां नग्नाना दण्डधारिणाम् ।
कृष्णानां रक्तनेत्राणां स्वप्ने नेच्छन्ति दर्शनम् ॥ ३८ ॥
कृष्णा पापा निराचारा दीर्घकेशनखस्तनी ।
विरागमाल्यवसना स्वप्ने कालनिशा मता ॥ ३९ ॥
इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्य्याति पञ्चताम् ।
अरोगः संशय गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ॥ ४० ॥
नीचे कहे जाने वाले दूसरे भयकर स्वप्न जो रोगियों को दिखाई देते हैं,
वे स्वप्न मृत्यु अथवा बहुत कष्ट देने के लिये होते हैं ।
( १ ) जिस रोगी के सिर पर स्वप्न में बास, पौधे, बेल आदि उत्पन्न हो
जाते हैं, स्वप्न मे जिसके शरीर में पक्षी प्रवेश करते हैं, स्वप्न में जिसका सिर
मुड जाये, स्वप्न में जिसको गीध, उल्लू, कुत्ते, कौवे आदि घेर लेते हैं, राक्षस,
प्रेत, पिशाच, स्त्री, चाण्डाल, अन्धे आदि जिसको रोक लेते हैं, स्वप्न में जो
बास, बेंत, लता जाल, तृण, काटे आदि में फस जाता है, जो स्वप्न में जाता
जाता रेत, धूल से युक्त भूमि पर, बलमीक या राख में गिर पड़ता है, जो स्वप्न
मे श्मशान, देवालय, या गड्ढे मे घुसता है, जो दूषित पानी में, कीचड़ में,
अन्धकार से भरे कुएं मे, जो स्वप्न में डूबता है (या स्नान करता है), अथवा —
जो स्वप्न में धार में बह जाता है, स्वप्नावस्था मे जो स्नेह पान करे, मालिश
करे, वमन करे, विरेचन करे, स्वर्णलाभ हो, झगड़ा हो, स्वप्न में बन्धन और
१. 'कपियुक्तेन याति यः' इति च पाठः ।

१५८ चरकसंहिता [ अ० ५
पराजय हो, दोनों जूतों को खो देवे, या धूल या चमड़े पर गिरे, स्वप्न में हर्ष
हो, क्रोधित पितरों से धिक्कारा जावे, दात, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, देवता, दिया
या आख अथवा पर्वत को गिरता देखे, या उनका नष्ट होना अथवा फटना
आदि स्वप्न में देखे, लाल फूलों से भरा जगल देखे, वध करने अथवा अन्य
पाप कर्म के स्थान या चिता मे या गाढे अन्धकार मे घुसे, नीद में लाल माला
पहिन कर, जोर से हंसता हुआ, नगा होकर दक्षिण दिशा में जावे, बन्दरों से
युक्त घने जंगल मे जावे तो ये स्वप्न रोगियो को विनाश या भारी कष्ट के
लिये होते है ।
कषाय, भगर्वे वस्त्र पहिने, उग्र, नगे, दण्ड धारण किये, काले लाल आँखों
वाले ऐसे अशुभ मनुष्यों का दर्शन, काली, पापी, अनाचारी, लम्बे बाल, नख
और स्तनों वाली, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हुई ऐसी स्त्री का दर्शन
कालनिंशा के समान है ( ये सब दारुण, भयकर स्वप्न है, जिनको देख कर
रोगी मर जाता है। नीरोग मनुष्य यदि इस प्रकार के स्वप्न देखे तो उसका
जीवन सन्देह में पड़ जाता है। इस प्रकार के अशुभ स्वप्नों को देख कर कोई
विरला ही बचता है) ॥२७-४०॥
मनोवहानां पूर्णत्वादोषैस्तैर्बलवत्तरैः ।
स्रोतसा दारुणान् स्वप्नान् काले पश्यति दारुणे ॥ ४१ ॥
नातिप्रसुप्तः पुरुषः सफलानफलानपि ।
इन्द्रियेशेन मनसा स्वप्नान् पश्यत्यनेकधा ॥ ४२ ॥
स्वप्न दर्शन का कारण- जिस समय कुपित हुए तीनों वात आदि दोष
शरीर के मनोवह स्रोतों को भर देते हैं, उस समय मनुष्य को शुभ या
अशुभ स्वप्नों का दर्शन होता है। जिस समय मनुष्य पूर्ण गहरी नींद में नहीं
होता है, उस समय सफल या निष्फल होने वाले अनेक स्वप्नों को इन्द्रियों के
स्वामी चित्त के द्वारा देखा करता है ॥ ४१-४२ ॥
दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं तथा ।
भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविध विदु ॥ ४३ ॥
स्वप्न के भेद-स्वप्न सात प्रकार के हैं। जैसे- (१) दृष्ट, आख से
देखा, (२) श्रुत, कान से सुना, (३) अनुभूत, शेष इन्द्रियों से जाना, (४)
प्रार्थित, देवता से मागा या चाहा हुआ (५) कल्पित, मन से कल्पना किया,
(६) भाविक, भावी शुभ अशुभ फल का सूचक, (७) दोषज, तीव्र वात
आदि दोष से उत्पन्न ये सात प्रकार के स्वप्न हैं ॥ ४३ ॥

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १५६

अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १५६
तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् ।
दिवास्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ॥ ४४ ॥
दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफलो भवेत् ।
न स्वपेद्यः पुनर्द्दष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ॥ ४५ ॥
अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः ।
पश्येत्सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ॥ ४६ ॥
इनमें से प्रथम पाच प्रकार के स्वप्नों को वैद्य व्यर्थ या निष्फल समझें ।
इसी प्रकार दिन का स्वप्न तथा रात में आया बहुत छोटा या बहुत बड़ा स्वप्न
व्यर्थ होता है । रात्रि के प्रथम भाग में जो स्वप्न आता है, वह भी निष्फल
होता है । जिस स्वप्न को देख कर फिर नींद न आये, वह स्वप्न शीघ्र ही बड़े
फल को देनेवाला होता है । जो मनुष्य पहिले तो अशुभ स्वप्न को देखे, फिर
इसी प्रसङ्ग में सौम्य और शुभ स्वप्न को देख ले तो इस स्वप्न का शुभ फल
समझना चाहिये ॥ ४४-४६ ॥
तत्र श्लोकः—पूर्वरूपाण्यथ स्वप्नान् य इमान्वेत्ति दारुणान् ।
न स मोहादसाध्येषु कर्माण्यरभते भिषक् ॥ ४७ ॥
जो वैद्य इन पूर्वरूपों को तथा भयानक स्वप्नों को जानता है, वह कभी भी
आलस्यवश प्रमाद से असाध्य अवस्था में चिकित्सा कर्म आरम्भ नहीं
करता ॥ ४७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने
पूर्वरूपीयमिन्द्रिय नाम पञ्चमोऽध्यायः ।
षष्ठोऽध्यायः
अथातः कतमानि शारीरीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
पूर्वरूपों के अनन्तर भावी व्याधि के आश्रय स्थानों के अरिष्ट लक्षण बतलाने
के लिये 'कतमानि-शारीरीय' इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
कतमानि शरीराणि व्याधिमन्ति महामुने ।
यानि वैद्यः परिहरेद्येषु कर्म न सिध्यति ॥ ३ ॥

१६० चरकसंहिता [ अ० ६
अग्निवेश ने पूछा—हे महामुने ! वे कौन से रोगी शरीर हैं, जिनमें
चिकित्सा कर्म सफल नही होता, जिनको वैद्य छोड़ दे और चिकित्सा न करे ॥३॥
इत्यात्रेयोऽग्निवेशेन प्रश्न पृष्टः सुदुर्बचम् ।
आचचक्षे यथा तस्मै भगवांस्तन्निबोधत ॥ ४ ॥
इस प्रकार अग्निवेश के प्रश्न पूछने पर भगवान् आत्रेय ने उसे उपदेश
किया, उसको आप भी सुनो और जानो ॥ ४ ॥
यस्य वै भाषमाणस्य रुजत्यूर्ध्वमुरो भृशम् ।
अन्नं च च्यवते भुक्तं स्थित चापि न जीर्यति ॥ ५ ॥
बलं च हीयते यस्य तृष्णा चाभिप्रवर्धते ।
जायते हृदि शूल च तं भिषक् परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
हिक्का गम्भीरजा यस्य शोणितं चातिसार्यते ।
न तस्मै भेषजं दद्यात्स्मरन्नात्रेयशासनम् ॥ ७ ॥
आनाहश्चातिसारश्च यमेतौ दुर्बलं नरम् ।
व्याधितं विशतो रोगौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ ८ ॥
आनाहश्चैव तृष्णा च यमेतौ दुर्बल नरम् ।
विशतो विजहत्येनं प्राणा नातिचिरान्न्ररम् ॥ ६ ॥
( १ ) जिस पुरुष के बोलते समय छाती के ऊपर का भाग बहुत दर्द करे,
खाया हुआ अन्न पेट में न ठहरे ओर पेट में गया हुआ अन्न न पचे, जिसका
बल दिन प्रति दिन कम हो रहा है और प्यास बढ़ती जा रही है, तथा हृदय में
में वेदना होती है, ऐसे रोगी को वैद्य छोड़ देवे ।
( २ ) भगवान् आत्रेय के उपदेश को स्मरण रख-कर जिस रोगी को नाभि
प्रदेश से हिचकी उत्पन्न हो और जिसको रक्तातिसार हो, इन दोनों को औषध
नहीं दे ।
( ३ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का फूलना ) और अतिसार
( पहले पानी वाले दस्त ) रोग उत्पन्न हो जायें, उसका जीना कठिन है ।
( ४ ) जिस निर्बल रोगी को आनाह ( पेट का अफारा ) और तृष्णा रोग
उत्पन्न हो जाता है, वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ देता है ॥ ५-६ ॥
ज्वरः पौर्वाह्निको यस्य शुष्ककासश्च दारुणः ।
[ ज्वरो यस्यापराह्ने तु श्लेष्मकासश्च दारुणः । ]
बलमांसविहीनस्य यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥

अ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् १६१

अ० ६ ] ११ इन्द्रियस्थानम् १६१
( ५ ) जिस रोगा को दिन के पूर्वभाग मे ज्वर आता है, तथा भयंकर
सूखी खासी हो [ वा जिसको दिन के उत्तर भाग में ज्वर आवे और बलगमदार
खासी का भयंकर वेग हो ] और शरीर में बल और मास क्षीण हो गये हो, ऐसा
रोगी प्रेत के समान मरा हुआ ही है ॥ १० ॥
यस्य मूत्रं पुरीषं च ग्रथितं संप्रवर्तते ।
निरूष्मणो जठरिणः श्वसनो न स जीवति ॥ ११ ॥
( ६ ) जिस उदर-रोगी का मल और मूत्र घना ( गाठ सा ), तथा ठण्डा
होता है ? वह रोगी सास लेता हुआ भी नहीं जीना ॥ ११ ॥
श्वयथुर्यस्य कुक्षिस्या हस्तपादं विसर्पति ।
ज्ञातिसंघ स सक्लेशय तेन रोगेण हन्यते ॥ १२ ॥
श्वयथुर्यस्य पादस्थस्तथा स्रस्ते च पिण्डिके ।
सीदतश्चाप्युभे शङ्खे तं भिषक्परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
शूनहस्तं शूनपादं शूनगुह्योदरं नरम् ।
हीनवर्णबलाहारमौषधैर्नोपपादयेत् ॥ १४ ॥
( ७ ) जिस पुरुष की कोख (उदर) में शोथ उत्पन्न होकर हाथ, पाव की
आर फलने लगता है, वह भाई बन्धुओं को बहुत कष्ट देकर मरता है, वह स्वयं
भा बहुत दुःख भोगता है और अन्त मे मरता है।
( ८ ) जिस रोगी के पाओं में शोथ उत्पन्न हो, पिण्डलियां ढीली पड़ जायें
तथा दोनों शंख प्रदेश दब जाये, वैद्य ऐसे रोगी की चिकित्सा नहीं करे ।
( ९ ) जिस रोगी के हाथ, पाव, गुह्य प्रदेश ( लिङ्ग ) तथा पेट सूज जायें
और वर्ण, बल और आहार क्षीण हो जाये, वैद्य ऐसे रोगी को औषध न
देवे ॥ १२-१४॥
उरोयुक्तो बहुश्लेष्मा नीलः पीतः सलोहितः ।
सततं ष्ठीवते यस्य दूरात्तं परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
हृष्टरोमा सान्द्रमूत्रः शूनः कासज्वरार्दितः ।
क्षीणमांसो नरो दूराद्भव्यो वैद्येन जानता ॥ १६ ॥
त्रय. प्रकुपिता यस्य दोषाः कष्टामिलक्षिताः ।
कृशस्य बलहीनस्य नास्ति तस्य चिकित्सितम् ॥ १७ ॥
ज्वरातिसारौ शोफान्ते श्वयथुर्वा तयोः क्षये ।
दुर्बलस्य विशेषेण नरस्यान्ताय जायते ॥ १८ ॥

१६२ चरकसंहिता [ अ० ६

(१०) जिसकी छाती में सचित हुआ बहुत कफ नीले पीले रक्त के साथ
निरन्तर निकलता रहता है, ऐसे रोगी को दूर से ही छोड़ दे।
(११) जिसका मूत्र गाढा हो, शरीर पर रोमाच हो अगों पर सूजन आ
जाये खासी और ज्वर से पीड़ित शरीर का मास क्षीण हो गया हो, ऐसे रोगी
को वैद्य जान बूझ कर दूर से ही छोड दे।
(१२) जिस कृश, बलहीन पुरुष के तीनों दोष कुपित होकर भिन्न २
पीड़ा के कारण हो उस पुरुष की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। [ कही 'कोष्ठा
भिलक्षिताः' पाठ है, वहा अर्थ है—तीनो दोष कोठे में देखे जायें ]।
(१३) जिस निर्बल मनुष्य को सूजन के पीछे ज्वर और अतिसार हों,
अथवा ज्वर और अतिसार के पीछे जिसको सूजन हो जाय, वह उसकी मृत्यु
का कारण होता है ॥ १५-१८ ॥
पाण्डुरश्च कृशोऽत्यर्थं तृष्णयाऽभिपरीप्लुतः ।
डम्बरी कुपितोच्छ्वासः प्रत्याख्येयो विजानता ॥ १९ ॥
(१४) पाण्डु रोगी, अति कृश, अत्यन्त प्यास से पीड़ित हो, डम्बरी
अर्थात् जिसकी आखें स्थिरता से घूर कर देखें और जिसका श्वास कुपित हो,
ऐसा रोगी भी जवाब देने योग्य है, चिकित्सा के लिये अयोग्य है ॥ १९ ॥
हनुमन्याग्रहस्तृष्णा बलह्रासोऽतिमात्रया ।
प्राणाश्चोरसि वर्तन्ते यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २० ॥
ताम्यत्यायच्छते शर्म न किञ्चिदपि विन्दति ।
क्षीणमांसबलाहारो मुमूर्षुरचिरान्नरः ॥ २१ ॥
(१५) जिस रोगी को हनुग्रह (जबाड़ी का बन्द होना), मन्याग्रह
(गर्दन की मन्या नामक शिराओं का अकड़ना), तृष्णा और शक्ति का अति
ह्रास हो, तथा जिसकी छाती में सास रुक रहे हों, ऐसे रोगी को छोड़ देना चाहिये।
(१६) जिस रोगी में बेहोशी रहती हो, जिसको किसी भी प्रकार चैन न
पडती हो, जिस रोगी के मास, बल और आहार क्षीण हो गये हों वह रोगी
जल्दी ही मर जाता है ॥ २०-२१ ॥
विरुद्धयोनयो यस्य विरुद्धोपक्रमा भृशम् ।
वर्धन्ते दारुणा रोगाः शीघ्रं शीघ्रं स हन्यते ॥ २२ ॥
बलं विज्ञानमारोग्य ग्रहणी मांसशोणितम् ।
एतानि यस्य क्षीयन्ते क्षिप्रं क्षिप्रं स हन्यते ॥ २३ ॥

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३
विकारा यस्य वर्धन्ते प्रकृतिः परिहीयते ।
सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम् ॥ २४ ॥
(१७) जिसके शरीर में विरोधी कारणों से रोग उत्पन्न हुए हों और
जिनकी चिकित्सा परस्पर विपरीत पड़े और रोग बड़े वेग से बढ़े वह शीघ्र ही
मर जाता है।
(१८) जिस रोगी का बल, ज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी मास और रक्त क्षीण
हो गये हों, वह रोगी शीघ्र ही मर जाता है।
(१९) जिस रोगी का आरोग्य दिन पर दिन घट रहा हो, तथा प्रकृति
स्वभाव (अथवा जन्म की 'कफ प्रकृति' आदि प्रकृति) बदलती जा रही हो
उस रोगी के जीवन को मृत्यु एकाएक हर लेता है ॥ २२-२४ ॥
तत्र श्लोकः-इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत् ।
न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात् ॥ २५ ॥
वर्णन किये हुए इन रोगी शरीरो का परित्याग करे, क्योंकि इनमें चिकित्सा
करने से विद्वान् लोग कुछ लाभ नहीं देखते ॥ २५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने कतमानि
शरीरीयमिन्द्रियं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे छाया-प्रतिच्छाया के विनाश रूप अरिष्ट को बतलाने के लिये
'पन्नरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
दृष्ट्वा यस्य विजानीयात्पन्नरूपां कुमारिकाम् ।
प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि ।
अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः ॥ ४ ॥
छिन्ना भिन्नाकुला छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा ।
नष्टा तन्वी द्विधा छिन्ना विशिरा विकृता च या ॥ ५ ॥

१६४ चरकसंहिता [ अ० ७
एताश्चान्याश्च याः काश्चित्प्रतिच्छाया विगर्हिताः ।
सर्वा मुमूर्षतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः ॥ ६ ॥
( १ ) जिस रोगी मनुष्य की प्रतिबिम्ब छाया दूसरे मनुष्य की आंख की
पुतली में अथवा अन्य की प्रतिबिम्ब रूप छाया जिस रोगी मनुष्य की पुतली में
पड़ना बन्द हो जाये वैद्य ऐसे पुरुष की चिकित्सा करने की इच्छा न करे। जिस
मनुष्य को चांदनी, धूप, दीपक के प्रकाश, पानी और शीशे (दर्पण) में अपनी
छाया और प्रतिबिम्ब में विकृति दिखाई दे, वह प्रेत के समान होता है। जिस
मनुष्य को अपनी छाया छिन्न-भिन्न, अनिश्चित प्रतिबिम्ब वाली, हीन, अथवा
अधिक, नष्ट, पतली दो भागों में विभक्त बिगड़ी हुई, बिना शिरोभाग के दीखने
वाली तथा अन्य निन्दित दूसरी सब प्रतिच्छाया मरने वालों की जाननी चाहिये
बशर्ते ये प्रतिच्छाया किसी कारण से उत्पन्न न हुई हों ॥ ३-६ ॥
सस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा ।
छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः ॥ ७ ॥
जिस स्वस्थ पुरुष की छाया, संस्थान (आकृति) प्रमाण (लम्बाई चौड़ाई)
वर्ण (रंग) और प्रभा (कान्ति) में अन्य प्रकार की हो जाती है, वह पुरुष
प्रेत के समान है ॥ ७ ॥
संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च या ।
संस्थान—संस्थान का अर्थ है आकृति। वह आकृति दो प्रकार की होती
है। (१) सुषमा और (२) विषमा।
मध्यसल्पं महच्चोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम् ॥ ८ ॥
प्रमाण तीन प्रकार का है। (१) मध्य, (२) अल्प और (३) महान् ॥८॥
प्रतिप्रमाणसस्थाना जलादर्शातपादिषु ।
छाया या सा प्रतिच्छाया-
प्रतिच्छाया—प्रमाण और संस्थान के अनुकूल जो छाया जल, दर्पण या
धूप आदि में दीखती है, उसको 'प्रतिच्छाया' कहते हैं।
छाया वर्णप्रभाश्रया ॥ ९ ॥
खादीना पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः ।
नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च ॥ १० ॥
रूक्षा श्यावाऽरुणा या तु वायवी सा हतप्रभा ।
विशुद्धरक्ता त्वाग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया ॥ ११ ॥

अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६५
शुद्धवैदूर्यविमला सुस्निग्धा चाम्भसी मता ।
स्थिरा स्निग्धा घना श्लक्ष्णा श्यामा श्वेता च पार्थिवी ॥१२॥
वायवी गर्हिता त्वासा चतस्रः स्युः शुभोदयाः ।
वायवी तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ १३ ॥
छाया—वर्ण प्रभा के साथ रहती है । आकाश आदि पाच महाभूतों के
अनुसार छाया भी पाच प्रकार की होती है, क्योंकि शरीर भी पाच महाभूतों से
मिल कर बना है । इसलिये इन महाभूतों की छाया भी पाच प्रकार की पड़ती
है । इनमें आकाश की छाया निर्मल, नीली, स्नेह और प्रभा (कान्ति) से युक्त
होती है । वायु की छाया रूक्ष, श्याम, लाल और कान्तिहीन होती है । अग्नि की
छाया शुद्ध लाल, दीप्त कान्ति, देखने मे आखों को प्रिय और जल की छाया
शुद्ध वैदूर्य के समान साफ, निर्मल, स्निग्ध होती है । पृथिवी की छाया स्थिर,
स्निग्ध, घन, श्लक्ष्ण, श्याम ( सावली ) काली और श्वेत होती है । इनमें
वायवी छाया निन्दित, नाशकारक और अत्यन्त कष्टदायक होती है । शेष चार
छायाए सुखदायक होती हैं ॥ ६-१३ ॥
स्यात्तैजसी प्रभा सर्वा सा तु सप्तविधा स्मृता ।
रक्ता पीता सिता श्यावा हरिता पाण्डुराऽसिता ॥ १४ ॥
तासा याः स्युर्विकासिन्यः स्निग्धाश्च विपुलाश्च याः ।
ताः शुभा रूक्षमलिनाः संक्षिप्ताश्चाशुभोदयाः ॥ १५ ॥
वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी ।
आसन्ना लक्ष्यते छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते ॥ ॥ १६ ॥
नाच्छायो नाप्रभः कश्चिद्विशेषाञ्चिह्वयन्ति तु ।
नॄणां शुभाशुभोत्पत्ति काले छायाः प्रभाश्रयाः ॥ १७ ॥
प्रभा के सात प्रकार—सब प्रकार की प्रभाए तैजस हैं । यह प्रभा सात
प्रकार की हैं । यथा-लाल, पीली, श्वेत, काली, हरी, पाण्डुर ( धूसर ) और
असित ( एकदम काली ) । इनमें जो प्रभा विकासिनी ( फैलने वाली ),
स्निग्ध, और बड़ी हो, वे सब शुभ फलदायक हैं। जो रूक्ष मलिन और सक्षिप्त
( सकुचित ) हैं ये सब अशुभ फल दायक है ।
छाया—छाया से अक्रान्त होने पर वर्ण उपलब्ध नहीं होता । प्रभा वर्ण
को प्रकाशित करती है । छाया समीप से देखी जाती है [ यथा चित्र की छाया
समीप से दीखती है ], प्रभा दूर से खूब चमकती है [ यथा, मणि, मुक्ता
आदि की प्रभा दूर से दीखती है ] । कोई भी मनुष्य एकाएक छायाहीन या

१६६ चरकसंहिता [ अ० ७
प्रभाहीन नहीं हो सकता । मृत्यु के समीप आने पर प्रभा पर आश्रित छाया
मनुष्य के शुभाशुभ को प्रकाशित कर देती है ॥ १४-१७ ॥
कामलाक्ष्णोर्मुखं पूर्णं गण्डयोर्युक्तमासता ।
संत्रासश्चोष्णगात्रं च यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥
उत्थाप्यमानः शयनात्प्रमोहं याति यो नरः।
मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकुत्थन ॥ १६ ॥
( १ ) जिस रोगी की आंखे कामला रोगी के समान पीली, मुख से लार
गिरना, गण्डस्थल गालों पर मास की वृद्धि ( गालों पर मास की अधिकता )
हो जिसको देखकर डर लगे, और शरीर में उष्णता हो, ऐसे रोगी को त्याग दे,
उसकी चिकित्सा स्वीकार न करे । ( २ ) जो रोगी प्रातःकाल विस्तरे से उठते
समय मूर्च्छित हो जाता हो, और बार बार अपना शोखो मारता रहे या निरन्तर
गालिया बोले वा बड़बड़ावे वह सात दिन में मर जाता है ॥ १८-१६ ॥
संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः ।
व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमास न जीवति ॥ २० ॥
उपरुद्धस्य रोगेण कर्षितस्याल्पमश्नतः ।
बहुमूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
दुर्बलो बहु भुक्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः ।
अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः॥ २२॥
इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः ।
शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥
( ३ ) जिस रोगी में प्रतिलोमगामी और अनुलोमगामी दोनों प्रकार के
रोग मिले हुए हों, और जिस की ग्रहणी दूषित हो, ( अन्नपाक होना बन्द हो
जाये ) वह पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । (४) रोग से पीडित दुर्बल व्यक्ति
तथा थोड़ा खाने पर जिसको मल ओर मूत्र अधिक परिमाण में आये, वह रोगी
त्याज्य है । ( ५ ) जो रोगी निर्बल होकर पहिले की अपेक्षा अधिक भोजन
करे, जिसको मल और मूत्र कम परिमाण में आता हो, वह प्रेत के समान है ।
(६) जो रोगी मन चाहा और गुणकारी अन्न को खाये, तो भी, बल और वर्ण
निरन्तर क्षीण होता जाये, वह नहीं बचता ॥ २०-२३ ॥
प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते ।
बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २४ ॥