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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

समय देखकर शत्रु पर आक्रमण करें और उन दोनों को मुक्त करके राजधानी में ले आयें। " शम्भूमहाराज पूजा के लिए गर्भगृह में प्रवेश करने ही वाले थे कि उनके कानों में आवाज आयी- 'शम्भू ! थोड़ा रुकिए।' महाराज ने गर्दन घुमाकर देखा तो वहाँ शम्भूमहाराज से बड़ी किन्तु बहनों में सबसे छोटी, सबसे प्रिय बहन अम्बिकाबाई कोने में खड़ी थीं। उन्हें वहाँ देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। क्योंकि इतने सवेरे अम्बिकाबाई को उठने की कभी आदत ही नहीं थी। शम्भूराजा कुछ पूछें उसमे पहले ही वे बोल पड़ीं - "शम्भू भैया, कर्नाटक की ओर का जिंजी इलाका अपने राज्य की दृष्टि से सोने की खान है।" "बिलकुल दीदी।" "राजा साहब! प्रश्न यह है कि वहाँ की लगान का सारा पैसा अपने खजाने तक पहुँच पाता है कि नहीं?" अम्बिकाबाई ने सीधा उत्तर माँगा। "न पहुँचने जैसा क्या हुआ? रघुनाथपन्त हणमन्ते जैसा खरा व्यक्ति वहाँ का सर्वेसर्वा है। ऐसा श्रेष्ठ, अनुभवी और ईमानदार आदमी तो अब मिलना भी मुश्किल है। दीदी, आपको मालूम है कि रघुनाथपन्त को किसने नियुक्त किया था? हमारे दादाजी शहाजीराजा भोसले ने। तब से यानी पिछले तीस वर्षों से हमाग दक्षिणी इलाका वे ही सँभाल रहे हैं और वह भी बिना किसी शिकायत के। रघुनाथपन्त के इतने गौरव से अम्बिकाबाई लज्जित हो गयीं। फिर भी उनके गौर ललाट पर खिंच आयी शिकन उनके बड़े कुंकुम के टीके के पीछे छिप न सकी। शम्भूराजा ने ही उनसे पूछा, "दीदी, आपको आज हुआ क्या है? आज सवेरे-सवेरे आपने यह विषय छेड़ दिया।" "सच कहूँ संभाजी राजा, आज आप भले ही रायगढ़ के राजा बन गये हों पर हो तो हमारे प्रिय छोटे भाई ही। पिताजी के पीछे छोटे भाई की चिन्ता करना उसका ध्यान रखना बड़ी बहन का कर्तव्य है। आपका जन्म सिद्ध उत्तराधिकार होने पर यहाँ के अधिकारियों और कर्मचारियों ने गद्दारी की है।" राजा ने हँसते हुए कहा, "दीदी, विद्रोह की वह आग अब बुझ चुकी है।" "देखिए राजा साहब, आपको अच्छा लगे या बुरा, विश्वास हो या न हो; यही रघुनाथपन्त सोयराबाई के साथ गुप्त पत्राचार करते रहे हैं। चाहे तो पूछताछ कर लीजिए। हमें क्या? हमने तो सचेत करने का काम किया है।" "इतनी नागज क्यों हो रही हो, दीदी?" "हमारा रिश्ता खून का है इसीलिए कलेजा जलता है। इसीलिए सचेत कर रही हूँ कि यदि अपने राज्य का सबसे समृद्ध इलाका विरोधी के हाथ में सौंपा गया तो धोखा होगा। शिवाजी महाराज की बेटी होने के नाते से माँ जगदम्बा ने इतनी सम्भाजी १२३

बुद्धि तो अवश्य दी है।" इतना कहकर अम्बिकाबाई शीघ्रतापूर्वक वहाँ से निकल गयी। संभाजी ने जल्दी से पूजा समाप्त की फिर अपना वस्त्र धारण करके बाहर आ गये। परिचारक उन्हें मोतियों की माला पहना रहे थे। उनकी कमर में कमरबन्द बाँधा जा रहा था। इसी समय सवेरे-सवेरे मस्तिष्क में विचारों का तूफान उठाने वाली अंबिकाबाई आकर सामने खड़ी हो गयीं। संभाजी के मुख से अनायास ही निकला-"दीदी, मान लीजिए कि कर्नाटक-जिंजी का प्रदेश हमने रघुनाथपन्थ हणमंते से निकाल लिया तो उनकी जगह लेने वाला दूसरा कौन है? इतनी दूर जाकर कार्य भार सँभाल सके, ऐसा कौन है?" दीदी की पलकें एक क्षण के लिए झुकीं दूसरे ही क्षण वे राजा की आँखों में आँखें डालकर बोलीं, "मेरे पति हरजीराजा महाडिक क्या कम योग्य हैं? कम हिम्मत वाले हैं? चाहें तो अपने कलश से विचार-विमर्श कर लीजिए।" शम्भू महाराज स्तब्ध रह गये। अम्बिकाबाई निकल गयीं। शिवाजी महाराज के शब्द उनके कानों में गूँजने लगे। उन्होंने कहा था-"हमारे चारों दामादों में हरजी राजा ही हमें शेर जैसी हिम्मत वाले लगते हैं। सीधे शेर के मुँह में हाथ डाल देने वाला शम्भुराजा के समान केवल हरजीराजा ही साहसी है।" बात समाप्त हो गयी। बाहर बहुत सा कार्य पड़ा था। दरबार में कुछ निर्णय तत्काल लेने थे। सिंहासनारोहण के मुहूर्त के लिए केवल दो दिन शेष थे। अनेक धार्मिक अनुष्ठान आरम्भ हो चुके थे। शम्भूमहाराज जल्दी जल्दी महल से बाहर निकले। दरबार में कवि कलश, प्रह्लाद निराजी तथा अन्य लोग राजा की प्रतीक्षा में बैठे थे। सबसे पहले अष्टांगार में कुछ कोंकणी किसानों का एक समूह महाराज से मिला। इस वर्ष पनवेल, पेण से श्रीबाग, चेऊल से आगे हबसाणा की सीमा तक भयानक अकाल पड़ा हुआ था। श्रावण महीने से ही बरसात का दर्शन तक नहीं हुआ था। शम्भुराजा ने उस क्षेत्र के किसानों के लिए लगान माफी का आदेश जारी किया। साथ ही सरकार की ओर से किसानों को बीज आदि की आपूर्ति का आदेश भी तत्काल दे दिया। कृतज्ञता से शम्भुराजा का अभिवादन करते हुए किसान बाहर निकल गये। "राजन! पिछले चार दिनों से पुर्तगाली टोपीकर आपसे मिलने के लिए काले हौद के समीप वकीली महल में रुका हुआ है।" "ऐसा? कविराज एक साथ अनेक शत्रुओं का सामना करना बुद्धिमानी नहीं है। शत्रु चाहे घर के हों या बाहर के। परिवार के भीतरी कलह के धुएँ से मेरी साँस घुट रही है। इसके साथ ही गोवा के पानी से पुर्तगाली नाम का मगरमच्छ, कोंकण 214 सम्भाजी

के किनारे जंजीरे का सिद्दी नामक विषधर सर्प, आज नहीं तो कल आक्रमण करने के लिए दिल्ली में तैयारी कर रहा औरंगजेब नाम का विषैला भुजंग और इनके अतिरिक्त अंग्रेज, डच जैसे विषैले सरीसृप तो आसपास हैं ही। इन सभी के गुंजलक से स्वराज्य को बचाना है, कविराज ! "जंजीरे के हब्शियों ने औरंगजेब का मांडलिक होना स्वीकार कर लिया है। किन्तु औरंगजेब और पुर्तगालियों के बीच मित्रता होने के पहले ही गोवा के पुर्तगालियों को ठिकाने लगाना है। गोला बारूद और अस्त्र शस्त्र की दृष्टि से पुर्तगालियों की शक्ति बहुत बड़ी है।" दो घंटे बाद पुर्तगाली वकील को दरबार में निमन्त्रित किया गया। वर्तुलाकार टोपी पहने, मोटे कपड़े की पतलून पहने, लाल रंग के लिबास में दो फिरंगी वकील दरबार में आये। उन्होंने शम्भूमहाराज को भारतीय शैली में अभिवादन किया। दुभाषिया के रूप में उनके साथ रामचन्द्र शेणवी था। उनके साथ शम्भुराजा के गोवा के वकील रामजी ठाकुर और येसाजी गम्भीरराव भी आये थे। रामचन्द्र शेणवी ने वाइसराय द्वारा भेजा गया सन्देश मराठी में पढ़कर सुनाया। "सिंहासनाधीश शम्भूमहाराज गोवा के नये वाइसराय का कौष्ट द-आल्ह्वेर का सादर नमन ! महाराज आपसे स्नेह सम्बन्ध स्थापित करने के लिए हम आपसे भी कहीं अधिक उत्सुक हैं।" शम्भुराजा ने हँसते हुए कहा, "वाइसराय साहब की सम्बन्ध जोड़ने की इच्छा से हमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है।" पुर्तगाली दूतों ने दुभाषिये के माध्यम से स्पष्ट किया- "उसका एक कारण यह है कि सावन्तवाड़ी कुडाल के इलाके में आपकी और हमारी सीमाएँ आपस में जुड़ी हैं। इसलिए वाइसराय ने आपके लिए विशेष सन्देश भेजा है कि आप दक्षिणी सीमा पर अपना एक भी सिपाही तैनात न करें।" "क्यों ?" "क्योंकि आपके सिपाही बनकर पुर्तगाली स्वयं उस सीमा की रक्षा करेंगे।" "वाहऽऽ ! वाहऽऽ !" राजा ने हँसते हुए दाद दी। फिरंगियों ने अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ राजा को भेंटस्वरूप प्रदान कीं। फिरंगी शिष्ट मंडल निकलकर चला गया। दोपहर को कुछ धार्मिक विधियाँ समाप्त हुईं। राज्यारोहण की जोरदार तैयारी हो रही थी। मंगल वाद्य बज रहे थे। गढ़ पर का वातावरण अत्यन्त उत्सवी और उत्साहपूर्ण था। सन्ध्या समय सभी नजदीकी सम्बन्धी एक वृत्त बनाकर खड़े हो गये थे। सभी की आँखें बातें कर रही थीं। संभाजी ने समझ लिया कि ये लोग किसी सम्भाजी :: 215

महत्त्वपूर्ण मुद्दे की चर्चा करना चाहते हैं। महादजी निम्बालकर ने कहा- "शम्भूमहाराज ! रायगढ़ पर साक्षात् स्वर्ग अवतरित हो गया है। आप अब सिंहासनासीन होंगे। आपके ऊपर छत्र-चँवर सुशोभित होंगे। आपके इस आनन्द में हम भी सहभागी हैं, परन्तु...?" "कहिएऽऽ बताइएऽऽ।" "महाराज! आपने अपने प्रासादी को दाहिनी ओर अष्टप्रधानों के महलों की ओर कभी देखा क्या?" "मतलब ?" पिछले दो ढाई महीनों से बालाजी पन्त चिटणीस, अण्णाजी दत्तो, हिरोजी फर्जन्द जैसे बुजुर्ग लोग नजरबन्द हैं। उनके दरवाजों पर कड़ा पहरा है। महाराज ! हम सभी को लगता है कि अपने दीवाली और कर्मचारियों के घर होली का दृश्य देखना हमें अच्छा नहीं लग रहा है।" हरजी राजा महाडिक और येसूबाई ने कहा। शम्भूराजा बड़ी देर तक वैसे ही मौन बने रहे। जैसे किसी पहाड़ और घाटी से बादल आते और जाते रहते हैं वैसे ही उनके चेहरे के भाव बदल रहे थे। थोड़ी देर बाद उनके चेहरे की रेखाएँ ढीली पड़ने लगीं। लम्बी साँस भरते हुए उन्होंने कहा- "देखिए इन कर्मचारियों के लिए मेरा मन आपसे अधिक संवेदनशील है। क्योंकि ये सभी पिताजी के समीपी लोग हैं। उनकी गोद में, उनके कन्धे पर खेलते हुए हम बड़े हुए हैं। हिरोजी फर्जन्द रिश्ते में हमारे चाचा हैं। इन सभी को क्षमा कर देने का विचार आपसे पहले मेरे मस्तिष्क में आया था। परन्तु इसके बाद क्या ये हमारे राज्य के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे ?" शम्भूमहाराज का प्रश्न का सुनकर सभी का सिर नीचे झुक गया। राजा ने येसूबाई की ओर देखा। येसूबाई ने सहज भाव से कहा, "महाराज, आप व्यर्थ ही इतनी चिन्ता कर रहे हैं। गुनाह किससे नहीं होता? गलतियाँ कौन नहीं करता ?" येसूबाई के शब्द शम्भूमहाराज के कलेजे में कटार की तरह चुभ गये। परन्तु उन्होंने चेहरे पर यह भाव आने नहीं दिया। रात के भोजन के बाद अम्बिकाबाई पुनः शम्भूराजा के सामने खड़ी हो गयीं। उन्होंने कुछ कहा नहीं किन्तु शम्भूराजा ने उनकी आँखों के प्रश्न को पढ़ लिया। "उचित समय पर उचित निर्णय अवश्य लेंगे।" कहकर शम्भूराजा ने उनसे बिदा ली। वे अपने शयनकक्ष में आये तब फीकी हँसी हँसते हुए येसूबाई ने कहा, "अम्बिकाबाई के प्रस्ताव से स्वामी कितना बेचैन हो रहे हैं? छत्रपति का सम्बन्धी होना कोई गुनाह तो नहीं है न महाराज?" 216 : सम्भाजी

शम्भूराजा ने तुरन्त कहा, "यह कोई पुण्य भी तो नहीं है। सत्ता और सम्पत्ति की पालकी के सामने ये सम्बन्धी विदूषक की तरह नाचेंगे, किन्तु यदि एक बार बुरा समय आ गया तो ये रिश्तेदार मुँह छिपाकर दूर भाग जाएँगे, येसूरानी। मैं एक बात तुम्हें स्पष्ट बताना चाहता हूँ। पिताजी ने इन सम्बन्धियों की भीड़ जानबूझकर दूर ही रखी थी। उन्होंने मिट्टी में से मुहरें चुनी थीं। इसीलिए स्वराज्यमन्दिर का यह कलश इतना चमक रहा है।" सहजता से बात करते करते चुटकियाँ बजाते हुए शम्भूराजा ने पूछा— "युवराज्ञी, क्या आपको मालूम है कि बड़े महाराज ने सह्याद्रि की घाटी-पहाड़ियों से घिरे इस रायगढ़ को राजधानी बनाने के लिए क्यों चुना?" प्रश्न सुनकर येसूबाई राजा की ओर देखती रहीं। तब राजा ने ही कहा, "मिर्जाराजा जयसिंह और दिलेरखान ने पुरन्दर पर आक्रमण किया था। उस समय पिताजी मुगलों के आक्रमण को कोई महत्त्व नहीं दे रहे थे। दिल्ली का दबाव बढ़ता गया। राजगढ़ के आसपास के साठ-सत्तर गाँवों को उन्होंने तहस-नहस कर दिया। भविष्य में प्रजा की कभी ऐसी हालत न हो, इसलिए अपनी राजधानी मैदानी इलाके से दूर बनाने का निश्चय किया। रायगढ़ के चारों ओर बस्ती बहुत कम है और ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा किला अपनी प्राकृतिक सुरक्षा में सिर ऊँचा किये खड़ा है। रायगढ़ पहुँचने के लिए बस एक छोटी-सी राह। रायगढ़ की चोटी पर केवल तूफानी हवाएँ और बरसाती पानी की धाराएँ ही पहुँच पाती हैं।" शम्भूराजा रुके। फिर विषमण्डता से हँसते हुए बोले, "रायगढ़ को राजधानी बनाने का एक और भी महत्त्वपूर्ण कारण है। यहाँ की प्रकृति भरोसेमन्द है। स्वराज्य के पीछे खड़े रहने वाले कुनबी, कोली, भंडारी जैसी सामान्य जातियों के लोग बहुत ईमानदार हैं। इसके विपरीत घाट पर रहने वाले अपने भाई बन्धुओं और नाते रिश्तेदारों में आपसी झगड़े और द्वेषभाव बने रहते हैं। वहाँ के विद्रोही, अलगाववादी, स्वार्थी और अभिमानीवृत्ति के मराठों से दूर रहने के लिए रायगढ़ सर्वोत्तम स्थान है। शम्भूराजा की बात पर येसूबाई को हँसी आ गयी। उन्होंने कहा, "महाराज! दरबार मे यहाँ आने के पहले आपने बालाजी पन्त चिटणीस, अण्णाजी दत्तो, हिरोजी फर्जन्द जैसे जिन जिन लोगों ने अपराध किये थे उन्हें बड़ी दिलेरी से क्षमा कर दिया, यह अच्छा ही हुआ। इसमें हरजीराजा ने कोई गुनाह नहीं किया उनकी स्लेट अभी कोरी है।" "इतना भरोसा है आपको महाडिक पर?" "हाँ, क्यों नहीं? वे बुद्धि से कुशाग्र हैं, उनमें कुछ कर दिखाने का आत्मविश्वास है।" शम्भूराजा खुलकर हँसे और कहने लगे—"चलो ठीक है सम्भाजी 217

हरजीराजा तकदीर का धनी है।'' वह कैसे?'' येसूबाई ने उत्सुकता से पूछा। कल ही जासूसों के पत्र मिले। आपने सुना होगा कि बंगलूर की चौकी सही अर्थों में हमारे दादा शहाजीराज भोसले ने कायम की थी। उसे विराटनगरी का रूप दिया हमारे पिताजी ने और एकोजी राजा ने दक्षिण में मराठी शासन को सुदृढ़ बनाया। परन्तु हमारे उसी दक्षिणी उपजाऊ प्रान्त के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।'' किससे?'' मैसूर के चिक्कदेवराजा से। युवराज्ञी कर्नाटक की ओर तंजौर मदुरई से मैसूर और बंगलूर तक जगह जगह हमारी जागीरदारियाँ हैं। किन्तु उसी क्षेत्र में चिक्कदेवराज नीचे त्रिचनापल्ली की ओर से घुस आया है। समय रहते उस पर अंकुश लगाना आवश्यक है। ऐसे समय में अपनी तेज बुद्धि और तेज तलवार का उपयोग करके दक्षिण का क्षेत्र सँभालने वाले एक समर्थ पुरुष की आवश्यकता थी।'' इसीलिए अपने बहनोई साहब को .'' नहीं येसूरानी, बहनोई के नाते नहीं, एक सुयोग्य, कर्तव्यपरायण और साहसी मराठा सूबेदार के नाते हम हरजी राजा को कर्नाटक की ओर भेजने का मन बना रहे हैं।'' शम्भूराजा बिछौने पर विचारमग्न अवस्था में पड़े थे। इसी बीच येसूबाई के सुबह निकले सहज उद्गारों का स्मरण हो आया। 'महाराज गुनाह किससे नहीं होता? गलतियाँ कौन नहीं करता?' उन शब्दों का स्मरण करते हुए शम्भूमहाराज ने दुखी मन से कहा, रानी साहिबा आपके वे शब्द मेरे कलेजे में बाणों की तरह गहराई से घुस गये हैं। यदि आपने वैसा न कहा होता तो अच्छा था।'' क्षमा करें महाराज! किसी भी रूप में मेरा आशय आप पर आक्षेप करना नहीं था।'' येसूबाई शान्तिपूर्वक बोली, महाराज, शिवाजी महाराज जैसे महान पिता को छोड़कर दिलेरखान के पास जाना, भले थोड़े दिनों के लिए क्यों नहीं, आपका अपराध ही था।'' नहीं येसू, वह अपराध नहीं था। वह यौवन का नशा था, एक प्रकार की बेहोशी थी। उस दिलेरखान के पास जाकर मिलने का नाटक करना, उसे बेवकूफ बनाकर शत्रु के पेट में घुसना, फिर उसका पेट फाड़कर बाहर निकलना, कर्तृत्व का नया कीर्तिमान स्थापित करना, दूसरे प्रदेश से संचित धन प्राप्त करके सुयश चन्द्रज्योत्स्ना से पिताजी की आँखों को चकाचौंध कर देना ही उस बेहोशी के पीछे 218 : सम्भाजी

छिपा साहसी सपना था। किन्तु दुर्देव ने पासा ही उलट दिया।" "कुछ भी कहिए। पूनम की धवल चाँदनी बिखेरता रहे तो भी चन्द्रदेवता के मुँह पर जो दाग है वह कभी पोंछा नहीं जा सकता। वैसे ही यह बदनामी का कलंक आपके साथ सदैव बना रहेगा।" येसूबाई ने स्पष्टता मे कहा। "और यदि वह चाँद जलकर खाक हो गया तो?" शम्भूमहाराज ने दाँतों मे होठ चबाते हुए क्रुद्ध आवाज मे पूछा। "अँ ? यह केसी भयानक बात कर रहे हे, महाराज ?" शम्भूमहाराज झट म उठकर बैठ गये। बाहर तूफानी हवा बह रही थी। रोशनदानों और खिड़कियों मे आवाजें आ रही थी। शम्भूराजा ने येसूबाई का हाथ मजबूती से पकड़ा। उन्हें लगभग खींचते हुए छज्जे में ले गये। आकाश बादलो मे भरा था। जरा सी चन्द्रकोर बादलो के पहाड के पीछे छिप गयी थी। येसूबाई के हाथ को अपने सीने पर खींचकर रखते हुए शम्भूमहाराज ने चन्द्रमा की रुख किया और विवाद भरे स्वर मे कहने लगे—"येसूरानी। यदि कभी इम मिट्टी ने आवश्यकता पड़ने पर पुकार लगाइ तो आपके ललाट का यह चाँद पिताजी के हिन्दवी स्वराज्य के लिए जलकर खाक हो जाएगा। परन्तु उस आसमान के चाँद मे पृछिए कि क्या किसी के लिए इस तरह जलकर खाक होने की तैयारी उमकी है?" सम्भाजी 219

राजदंड एक "राजन! किले पर धुआँधार वर्षा और दिन में भी शुभ्र अँधेरा करने वाला कुहरा छाया है। उन मेहमानों ने अपने दिन कैसे काटे होंगे ?'' कवि कलश ने हँसते हुए पूछा। "कौन मेहमान ?'' "ब्रिटिशों के वे दोनों वकील—गैरी और राबर्ट। औरतों और उन बेचारों का निवास भी किले के ऊपर दूर पूर्वी छोर पर है। चट्टानों के ऊपर वहाँ बड़े बड़े झरने हैं। वहाँ रहने से तीन महीने में इन साहबजादों का प्राण निकलना ही बाकी होगा। उनका बटलर कहता था कि ये दोनों रात बेरात उठ जाते हैं। दो चट्टानो के बीच गिरने वाली पानी की धारा के साथ घूमने वाली हवा से उनकी नींद टूट जाती है। " "कविराज ! इतना विस्तार क्यों दे रहे हो ? साफ साफ बताइए कि आपका आशय क्या है ? "मिल लीजिए न उन बेचारों से एक बार ।" शम्भूराजा कुछ नहीं बोले। परन्तु उस रात कविराज और ज्योत्याजी केमकर के साथ बहुत देर तक विचार-विमर्श करते रहे। पुर्तगालियों से मुम्बई का टापू अँग्रेजों के हाथ में आ गया। मुम्बई में अँग्रेजों के व्यापार के साथ साथ उनकी मनमानी भी बढ़ने लगी। मुम्बई से अधिक सूरत की चौकी मराठों के लिए चिन्ता का विषय बन गयी। सूरत वाले अंग्रेज अधिकारियों को अधिक महत्त्व देते थे। वे अँग्रेजों के लिए गोला-बारूद की आपूर्ति करते थे। इसीलिए अँग्रेजों की मनमानी भी बढ़ती जा रही थी। कोंकणतट जल रहा था। इस भयंकर समय में संभाजीराजा ने कवि कलश को दक्षिण कोंकण में भेजा था। वे अभी अभी कीचड़ और वर्षा को रौंदते हुए रायगढ़ वापस आये थे। शम्भूमहाराज की इच्छा थी कि डिचोली और कुडाल में अपने बारूद के कारखाने खोले जायँ। यदि अपने कारखाने खुल जाएँ तो 220 :: सम्भाजी

गोले-बारूद के लिए अंग्रेजों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। गत बीतती रही और विचार विमर्श होता रहा। सोने के लिए बहुत देर हो गयी थी, फिर भी शम्भूमहाराज बहुत सवेरे जाग गये। उन्होंने अपने शयनकक्ष से दूर तक निगाह दौड़ाई। उन्होंने जैसे ही हल्के से खिड़की खोली वैसे ही ठंडी हवा का एक झोंका अन्दर आया। पूरा किला अँधेरे और कुहरे से भर गया था। शम्भूमहाराज सवेरे-सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर बाहर निकले। कार्यों की व्यस्तता में सवेरे बाहर निकलकर टहलने का अवसर बहुत कम मिलता था। शम्भुराजा पालकी दरवाजे की सीढ़ियाँ उतरकर बाहर निकले। उनके पीछे पीछे बारह पन्द्रह हाथ की दूरी पर शस्त्रधारी सेवक चल रहे थे। अब अँधेरा कम होने लगा था। सावन का महीना अभी-अभी बीता था। किले पर चारों ओर हरियाली छायी हुई थी। पूरा रायगढ़ लाल और सफेद फूलों से भर गया था। समुद्र के पीछे, आँखों के सामने कोंकण के द्वीपों से किले का ऊपरी हिस्सा चमक रहा था। शम्भुराजा के सामने गंगासागर फैला था। उसका पानी शंख की तरह शुभ्र दिख रहा था। नाम के अनुसार न वह गंगा थी और न ही सागर। वह सचमुच कमल पुष्पों से सजा एक सुन्दर जलाशय था। उस जलाशय की सतह को देखते ही शम्भुराजा का मन भयभीत हो गया। वे आगे न जाकर पालकी दरवाजे की सीढ़ियाँ चढ़कर किले के भीतर आ गये। वहाँ रत्नमहल के समीप से बनी पगडंडी से होते हुए एक मनोर के पास पहुँच गये। गंगासागर के समीप होने से रायगढ़ की शोभा और भी बढ़ गयी थी। किले बारह कोणी और पाँच मंजिली मनोर किले की अद्भुत शोभा हो रही थी। संभाजी राजा मनोर की तीसरी मंजिल पर चढ़कर आये। पतला सा पर्दा हटाकर, गुंबज वाले छत के नीचे खड़े होकर वे बाहर का दृश्य देखने लगे। इस समय तक कुहरा पूरी तरह साफ हो चुका था। सावन के बाद की चारों ओर फैली हरियाली पर सूर्य की कोमल किरणें छोटे बच्चों की तरह दौड़ लगा रही थीं। प्रकृति के उस रमणीय सौन्दर्य से संभाजी राजा का कवि मन भी सचेत होने लगा। किन्तु उनकी बावरी दृष्टि जलाशय पर जाकर रुक गयी। उस काले नीले पानी में दुर्गाबाई और राणू दीदी की आँखें दिखाई देने लगीं। वे बहुत भावुक होने लगे। उन्होंने बलपूर्वक अपनी दृष्टि वहाँ से हटा ली। किले के नीचे पश्चिम की ओर फैले समुद्र की ओर देखने लगे। वहाँ दिखाई दिया कोंकण का तथा और पानी से उठने वाला धुआँ। ऐसा लगता था मानो धुएँ के ढेर एक दूसरे पर गिर रहे थे, और दिख रहा था मगरमच्छ की पीठ की तरह दिखने वाला जंजीरे का कगार। शम्भुराजा की आत्मा को मानो डंक लग गया। राजकार्य को सँभाले अभी केवल तीन महीने ही बीते थे। अभी तक जंजीरे के निवासियों की ओर से जंजीरे के सम्भाजी :: 221

सिद्दी के विरुद्ध कोई जंग नहीं छेड़ी थी। सिद्दी नाम के इस कालसर्प ने मुरुड, तला, म्हसला से कोंकण तट तक के प्रदेश पर कब्ज़ा कर लिया था। सिद्दी मूल रूप से अफ्रीका के हब्शी थे। इसलिए इस क्षेत्र को हबसाण कहा जाता था। जंजीरा की जगह पर पहले चट्टानों से बना लगभग चालीस एकड़ का मरुस्थल था। वहाँ पर किले जैसा कुछ नहीं था। पास के मुरुड गाँव में रामा पाटिल नाम का कोली रहता था। उसी साहसी नाविक ने उस चट्टान पर अपने रहने के लिए लकड़ी का घर बनाया था। इस टापू के पास से ईरान, इराक, इस्ताम्बुल और अफ्रीका की ओर से मुम्बई की ओर जहाज आते-जाते थे। उसी लकड़ी के मकान से रामा कोली व्यापार पर नियन्त्रण रखता था। उस समय निजाम के यहाँ रहने वाले सिद्दी ने रामा कोली को शराब के नशे में धुत करके अपनी सेना द्वारा उस लकड़ी के मकान पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद बुर्हाणखान ने उस कठोर चट्टान पर एक किला बाँधने की शुरुआत की और देखते-देखते विदेशी व्यापार पर अपनी हुकूमत चलाने लगा। उसी के कारण सिद्दी शक्तिशाली हो गये। वे किसी के मित्र नहीं थे। चारों ओर वे अत्यन्त स्वार्थी, धोखेबाज, घातक और जुल्मी के रूप में विख्यात थे। परन्तु पुर्तगाली, अँग्रेज और मुगल स्वयं सपेरे बनकर उन कालसर्पों को अपने इशारे पर नचाते थे। ये कालसर्प भी बहुत होशियार थे। उन्हें अपने कंठ के जहर और अपनी दहशत की पूरी जानकारी थी। इसलिए सिद्दी स्वयं कभी-कभी अपनी आँखें दिखाता और इन सँपेरों को ही अपनी धुन पर नाचने को मजबूर करता था। उनके मुँह में उठते बुलबलों को देखकर सिद्दी कालसर्प प्रसन्नता से अपनी पूँछ लहराता था। दोपहर में संभाजी महाराज दरबार में गये। उसी समय नगारखाने के दरवाजे मे दो-तीन सौ की संख्या में भेड़-बकरियों की तरह जनता वर्षा मे भीगती हुई महाराज के सामने आकर खड़ी हो गयी। ये लोग नागोठणा, आपटा और नगाव के क्षेत्र के आगरी, कोली और कुनबी थे। ये सभी लोग राजा के पैरों में गिरकर प्रार्थना कर रहे थे कि—'महाराज, हमें बचाओ उस हसवा के आतंक से। उसके सैनिक गाँव में आये और गाँव की जवान लड़कियों को उठाकर ले गये।' “हमारी लड़कियों का अब क्या होगा ? वे उनकी जिन्दगी बर्बाद कर देंगे। वह सिद्दी उन्हें गुलाम बनाकर मुम्बई के बाजार में बेच देगा।" बूढ़ी औरतें रो-रोकर चिल्ला रही थीं। उस जमात के मुखिया ने महाराज के पाँव पकड़ लिये। उन्होंने कहा, "सरकार उन सिद्दियों ने ऊधम मचा रखा है। वे जालिम हबशी हमें गुलाम बनाकर परदेश में ले जाते हैं और बेच देते हैं।" जनता की यह करुण कहानी सुनकर शम्भूराजा क्रुद्ध हो गये। इसके पहले ऐसी शिकायत नहीं आयी थी। महाराज ने 222 :: सम्भाजी

क्रुद्ध स्वर में कविराज से पूछा—“कलश, सुनी आपने यह करुण कहानी? उस अंग्रेज वकील की आप बहुत प्रशंसा कर रहे थे न? बताइए ये सिद्दी किसके बल पर इतने मगरूर हो गये हैं?” “परन्तु राजन—?” “मेरे पिताजी जो कहते थे वह पूरी तरह सच है। घर में घुसा हुआ चूहा जिस प्रकार सबकी नींद उड़ा देता है, उसी तरह ये सिद्दी हमारे कोंकण के तट को खा रहे हैं। ये छुपकर वार करने वाले मायावी लोग एक ओर तो औरंगजेब के साथ समझौता करते हैं, दूसरी ओर मुम्बई के अंग्रेजों से सांठ-गाँठ करते हैं। इन विषैली औलादों का विनाश ही अपने लिए सुदिन होगा।” राजा ने जनता को आश्वस्त किया कि वे हब्शियों का ठीक-ठीक प्रबन्ध करेंगे। महाराज की बात से आश्वस्त होकर लोग वापस गये। शम्भूराजा ने कवि कलश से कहा, “आज शाम को उन अंग्रेज वकीलों को दरबार में ले आइए।” उस दिन गैरी और राबर्ट शम्भूराजा का आदर से अभिवादन करते हुए दरबार में खड़े रहे। गैरी ने शम्भूराजा के पैरों के पास हीरे-जवाहरात से भरी परात भेंट की थी। राजा का ध्यान परात की ओर आकर्षित करने के लिए राबर्ट आँखों से संकेत कर रहा था। उसके उन दयनीय संकेतों को देखकर महाराज ने धीमे स्वर में कहा, “आपके इस तुच्छ नजराने से हम प्रसन्न हो जाएँगे, यह आपका भ्रम है। इस तरह के निरर्थक लोभ दिखाकर हमें जीतने के सपने कभी मत देखो।” अंग्रेजी वकीलों को संभाजी राजा की आँखों में दहकता अंगारा दिख रहा था। वे अपने लाल कपड़ों में पूरी तरह सिमटकर पसीने से तरबतर हो रहे थे। घबराये हुए उन वकीलों ने दुभाषिये के माध्यम से शम्भूराजा से पूछा—“महाराज, हम गरीब फिरंगियों पर आप इतना क्रोध क्यों करते हैं?” “क्योंकि दिये हुए वचन को निभाना आप नहीं जानते। इससे पहले आपने शिवाजी महाराज के साथ जंजीरे के हब्शियों की कोई भी सहायता न करने का वादा किया था। उस समझौते की सारी शर्तों को आज पैरों के नीचे कुचल दिया है क्या? सिद्दी के बेड़ों को मुम्बई में आश्रय नहीं देते क्या? उनको गोला-बारूद मुहैया नहीं कराते क्या? अपना यह धन्धा चुपचाप बन्द करो नहीं तो याद रखो मुकाबला मेरे साथ होगा।” संभाजी राजा ने इतनी ही चेतावनी नहीं दी। उन्होंने दुभाषिये को फटकारते हुए कहा, “जहाँ वकीली महल में आप लोग ठहरे हैं, उसके समीप ही एक गहरी घाटी है। उस घाटी के पीछे किले के ऊपरी हिस्से में एक बहुत नोकीली जगह है। वह कभी दिखाया साहब लोगों को?” सम्भाजी :: 223

‘‘अँ?...हाँ सरकार।...’’ ‘‘उस टीले पर बनी काल कोठरियाँ बड़ी जालिम हैं। जिस समय सिद्दी की सहायता के लिए तुम्हारी राजापुर की अँग्रेज मंडली पन्हाला के पास आयी थी उस समय मेरे पिताजी ने अँग्रेजों को पकड़कर दो वर्ष तक उन्हीं कालकोठरियों में रखा था। समझ में आया? यह सब अपने मालिकों को ठीक से समझा दीजिए। उन्हें बता दीजिए कि हब्शियों के मैत्री और हमारे साथ ऐसी मस्ती करेंगे तो उन्हें भी उन्हीं कालकोठरियों की सैर कराएँगे।’’ अँग्रेजों के वकील अपनी गर्दन झुकाए बाहर चले गये। इस अवसर पर उपस्थित कृष्णाजी कंक ने युवराज की प्रशंसा की— ‘‘महाराज! क्या हड़काया आपने इन गोरे बन्दरों को। देखिएगा चार दिन तक उन्हें ठीक से नींद भी नहीं आएगी।’’ शम्भूराजा मीठी हँसी हँसते हुए बोले, ‘‘इस तरह दम देने का मतलब है मुख से भाप का निकलना। इससे राज्य का कार्य चलता है क्या?’’ ऐसा कहते हुए राजा ने कवि कलश की ओर देखा। ‘‘राजापुर बन्दरगाह पर अपने दौलतखाने के पास अपनी पाँच हजार की नौसेना और पचास बेड़े हैं। उनसे कहो कि वे तैयार रहें। जंजीरे का सिद्दी ज्यादा मस्ती करे तो उसे उसी समय कुचलकर रख देंगे। बरसात के दिनों में यदि सिद्दी उन्हें इसी तरह आश्रय देता रहा तो उनके मुम्बई के सभी गोदामों को जलाकर खाक कर देंगे।’’ दो ‘‘कुछ भी करो, किन्तु यदि अपने राज्य और धर्म को बचाना है तो सबसे पहले इस कलुष को समाप्त करना होगा।’’ सोमाजी दत्तो बड़ी गम्भीरता से कह रहे थे। सिंहासनारोहण के समय सभी कर्मचारियों को मुक्त कर दिया गया था। राजाज्ञा के अनुसार उन्हें पहले जैसा मान सम्मान देने की घोषणा की गयी थी। परन्तु अभी तक कार्य का बँटवारा नहीं हुआ था। केवल बालाजी आवजी को चिटणीस का कार्य सौंपा गया था। बालाजी पीछे की सारी बातें भूलकर कार्य में व्यस्त हो गये थे। उनके पास थोड़ा भी समय नहीं था। मोरोपन्त के घर पर सभी की बैठक जमी थी। पान-सुपारी बँट रही थी, कुछ महत्त्वपूर्ण चर्चा चल रही थी। 224 :: सम्भाजी

मोरोपन्त पेशवा को अपनी बैठक में अण्णाजी और सोमाजी दत्तो का आना पसन्द नहीं था। क्योंकि अण्णाजी अतिमहत्त्वाकांक्षी और दुस्साहसी स्वभाव के कारण ही वे पिछले तीन महीने कारावास की सजा भोग चुके थे। अण्णाजी से रहा नहीं गया। उन्होंने वहाँ बैठे देवाजी से कहा, “जाओ देखकर आओ कि वहाँ दरबार में क्या चल रहा है?” बैठक में लौंग-सुपारी घुमाई जा रही थी। सामने ही बालेकिले की दीवार थी। उसी के पीछे अन्दर की ओर दरबार की कचहरी थी। देवबा दौड़ता हुआ गया और थोड़ी ही देर में लौटकर वापस आ गया। तब तक अण्णाजी बेचैन होकर उठे और पास के झूले पर जाकर बैठ गये। उनकी बेचैनी के साथ झूले की जंजीर भी कुर-कुर करके बजने लगी। सामने झुककर खड़े देवबा से उन्होंने पूछा—“क्यों रे लड़के, क्या चल रहा है वहाँ?” “न्याय का काम चल रहा जी! राजा के न्याय का काम।” “राजा का न्याय? अरे लेकिन शम्भूराजा तो दोपहर को ही किले से उतर कर नीचे चले गये हैं। ऐसा लोगों ने बताया है।” “राजा जब वहाँ है ही नहीं तो न्यायदान का कार्य कौन कर रहा है?” अण्णाजी ने पूछा। “अपने कवि कलुशा साहब जी।” “कहाँ? राजा की गद्दी पर?” “नहींऽ नहीं पन्त, आप भी कैसी बात करते हैं पन्त?” देवाजी ने कहा, “ऊपर जहाँ गद्दी है वहाँ से तीन सीढ़ी नीचे कविजी बैठे हैं। वे महाराज के सिंहासन पर कैसे बैठेंगे? राजा सिंहासन पर न भी बैठे हों तो भी राजसिंहासन को नमन किया जाता है जी।” “सिंहासन पर बैठें या न बैठें। राजा की ओर से न्याय तो आजकल कविराज ही देते हैं। लगता है आजकल फिर गंगा उल्टी बहने लगी है।” मोरोपन्त ने अण्णाजी की ओर घबराकर देखा, उसी समय प्रह्लाद निराजी वहाँ आ गये। उन्हें देखते ही अण्णाजी को जोश चढ़ गया। उन्होंने प्रह्लाद पन्त से पूछा— “क्यों प्रह्लाद पन्त? आजकल आपने न्यायाधीश का कार्य करना छोड़ दिया क्या? और बड़े महाराज के समय सिर पर चढ़ाया हुआ वह काजी हैदर हज की यात्रा पर चला गया क्या?” “अण्णाजी, क्या आपको खबर मिली?” “अजी वैसा कुछ नहीं है तो वह कन्नौजी कीड़ा कैसे अपनी चला रहा है और वह भी राजा के होते हुए।” 225

प्रह्लाद निराजी का चेहरा सूख गया था। वे बोले, "राजा को एक साथ अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए अपने बहुत से कार्य दूसरे योग्य व्यक्तियों को सौंपने पड़ते हैं। बड़े महाराज कुछ जिम्मेदारियाँ दूसरों को सौंपते थे। कविराज ने उचित न्याय दिया या नहीं? प्रधान न्यायाधीश के नाते हम उसकी जाँच-पड़ताल करते हैं, उसके बाद ही उसकी तामील की जाती है। ऐसा महाराज का आदेश है, अण्णाजी पन्त।" "और प्रह्लाद पन्त क्या फिर आप वैसा ही करेंगे? याद है हम सभी अधिकारियों ने मिलकर विद्रोह किया था। हम सभी शम्भूराजा को पकड़ने के लिए पन्हाला गये थे किन्तु आप रात में हमसे अलग होकर पक्ष बदल लिए और हमें मुँह की खानी पड़ी।" अण्णाजी दत्तो बड़बड़ाये। "जाने दीजिए अण्णाजी, हम अधिक क्या कहें। आपके भले के लिए ही हम सारा प्रयास कर रहे हैं। उधर महारानी के पास आपके और हमारे लाभ के लिए प्रयास कर रहे हैं। सभी की कोशिश है कि हमें पहले जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो।" "किस प्रतिष्ठा की बात लेकर बैठे हैं? इस बदनाम राजा और उसके लुच्चे मित्रों के समय में किस प्रकार के मान-सम्मान की अपेक्षा करते हैं आप? अनीति और अधर्म के अतिरिक्त अब रायगढ़ पर कुछ भी नहीं मिलने वाला है।" मोरोपन्त से अब रहा न गया, वे उठकर इधर-उधर देखते हुए दया भाव से बोले, "बस, अण्णाजी बस, हम आपके सामने हाथ जोड़ते हैं। अपनी ईर्ष्या की भयानक आग में हमें न जलाइए। बुढ़ापा आ गया है अब तक जो हुआ बहुत हो गया। चार दिन की जो जिन्दगी बची है उसे सुख से जीने दीजिए।" थके हुए मोरोपन्त ने अपने पुत्र निलीपन्त की ओर उड़ती नजर से देखा। तीन धर्म की मांगलिकता के प्रति शम्भूराजा के हृदय में जन्मजात आस्था थी। रायगढ़ की गद्दी पर बैठते ही उन्होंने एक एक निर्णय लेना आरम्भ कर दिया था। उन्होंने सन्त तुकाराम के सुपुत्र महादोबा को वार्षिक उत्सव का स्मरण दिलाया। एक करहाड़ क्षेत्र के लोग रायगढ़ पर आकर शिकायत करने लगे- "शम्भू महाराज! चाफल में स्वामी रामदास का बनवाया एक विशाल मन्दिर 226 सम्भाजी

है। वहाँ रामनवमी के दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। प्रतिवर्ष हजारों लोग आते हैं। परन्तु एक समस्या है।" "कैसी समस्या? सज्जनगढ़ और चाफला के स्वर्गवासी महाराज ने जो वार्षिक अनुदान निश्चित किया था, वह हमने चालू रखा है। हमने तो अधिकारियों को कह रखा है कि स्वामीजी को जिस चीज की आवश्यकता हो उसकी तत्काल पूर्ति की जाय। उसके लिए हमारे आदेश की प्रतीक्षा न की जाय।" "महाराज, हम वही बता रहे हैं। वे गरीब यात्रियो को कष्ट पहुँचाते हैं।" शम्भुराजा के चेहरे पर अनेक भाव बने और बिगड़े। उन्होंने तत्काल कवि कलश को आदेश दिया—"कविराज, वासुदेव बालकृष्ण को शीघ्र पत्र भेजिए। चाफला के उत्सव और स्वामी जी तथा ईश्वर के निमित्त से चाफला मे बसे ब्राह्मण परिवारों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करें। व्यवस्था हो जाने पर हमें सूचित करें।" "जी राजन।" "इस पत्र की एक प्रति स्वामीजी के पट्टशिष्य देवमूर्ति दिवाकर गोसावी को भी सूचनार्थ भेज दीजिए।" चिंचवड़ देवस्थान के स्वामी मोरेश्वर गोसावी को भी गुंडो से परेशानी हो रही थी। उसकी शिकायत महाराज के पास आयी थी। उनके संरक्षण का आदेश शम्भुराजा ने अपने सेना अधिकारी को दी थी। राज्याभिषेक का समय समीप आ रहा था। एक दिन शम्भुराजा जल्दी में किले से नीचे उतरे। वे महाड, मंडनगढ़ पार करके केलशी की ओर गये। वहाँ समुद्र के किनारे याकूब औलिया फकीर की मजार थी। वहाँ बाबा की समाधि पर संभाजी राजा माथा टेकते थे। इस स्थान पर वे बड़े महाराज के साथ अनेक बार आये थे। बाबा के दर्शन किये थे। संभाजी राजा को उन सभी बातों का स्मरण हुआ। शम्भुराजा ने वहाँ पर अपने तंबू लगाए। समीप ही अपने मंडनगढ़ किले पर न जाकर वे आठ दिन तक औलिया बाबा की समाधि के आसपास ही रहे। उन्हें वहाँ बड़ी शान्ति मिली। रायगढ़ पर राज्याभिषेक की जोरदार तैयारियाँ चल रही थीं। शम्भुराजा के निजी हलके में तो मानो शादी की व्यस्तता चल रही हो। आज दोपहर मे येसूबाई को समाचार मिला कि खंडो बल्लाल काशी से वापस आ गये हैं। सन्ध्या हो गयी फिर शम्भुराजा अभी तक दरबार में व्यस्त थे। राजा के मुख से राज्याभिषेक का समाचार सुनने के लिए येसूबाई के कान अधीर हो रहे थे। उन्होंने बड़ी बहन सखूबाई से कहा था। "राज्याभिषेक का मुहूर्त अवश्य निकलेगा। गागाभट्ट के 'मम' बोलने की देर है, बाकी सब तैयारी तो हो चुकी है। भोजन समाप्त होने पर येसूबाई ने धीरे से पूछा—"खंडोबा और गागाभट्ट की भेंट नहीं हो पायी क्या?" सम्भाजी 227

“अँ...हाँ भेंट हुई। इसके पहले के हमारे निवेदन के अनुसार उन्होंने नीति और धर्म से सम्बन्धित ‘समयनय’ नामक ग्रन्थ की रचना भी कर दी है। उसे उन्होंने खंडो बल्लाल के साथ हमारे पास भेज दिया है।” “राज्याभिषेक के समारोह में क्या वे सम्मिलित नहीं होंगे?” महारानी ने लड़खड़ाते हुए पूछा। “हाँ, उनकी तबीयत ठीक नहीं है।” येसूबाई और सखूबाई चुप थीं। किन्तु शम्भूराजा अपने आप को रोक नहीं सके। वे एक लम्बी साँस लेकर बोले, “रानीसाहब, हमारी अपेक्षा हमारे शत्रुओं की दौड़ बहुत तेज है। हम गागा भट्ट को निमन्त्रित करने वाले हैं, इसकी सूचना मिलते ही वे खंडोबा के पहले ही काशी पहुँच गये। हमारे शुभेच्छुओं गागाभट्ट का कान भरा—‘राज्याभिषेक शिवाजी के युवराज का है। किन्तु युवराज का व्यवहार और आचरण नीति-न्याय का नहीं है। चारों ओर घोर अधर्म फैला हुआ है, आदि-आदि।” येसूबाई ने डरकर कहा, “हाय राम?” ऐसी कडुई औषधि पीने की अब शम्भूराजा को आदत हो गयी थी। इसी समय जोत्याजी केसकर, दादाजी रघुनाथ देशपांडे, कृष्णाजी कंक जैसे मित्रों के दरबार में आने की सूचना रायप्पा ने दी। साथ ही येसाजी कंक, कोंडाजी बाबा फर्जन्द, केसोबा त्रिमल, म्हालोजी घोडपडे, हंबीरराव, मोहिते जैसे वरिष्ठ लोग भी आ पहुँचे। विचार विमर्श आरम्भ हुआ। अभी-अभी कुछ दिन पहले दिवंगत हुए मोरोपन्त पेशवा की चर्चा चल पड़ी। बहुत हल्की-सी बीमारी में वह पका हुआ फल डाली से गिर पड़ा। उन्हें स्मरण करते हुए संभाजी महाराज ने कहा, “पेशवा मन के बहुत अच्छे इन्सान थे। दूसरों के फन्दे में आकर उन्होंने जो बगावत की थी, उस भूल को उन्होंने अनेक बार मेरे सामने स्वीकार किया था।” “महाराज उनका यथायोग्य स्मारक बनना चाहिए।” हंबीरराव ने प्रस्ताव किया। “उनके ज्येष्ठ पुत्र निलोपन्त के गुणों को हमने अच्छी तरह परखा है। उन्हें पेशवा पद देने का हमने निश्चय कर लिया है।” शम्भूमहाराज ने सूचित किया। राजा का निर्णय सुनकर सभी बहुत प्रसन्न हुए। अपने की एक गाँठ खोलते हुए शम्भूमहाराज ने कहा— “येसाजी काका, कोंडाजी काका आप सभी को एक बात बताना आवश्यक लग रहा है। पिताजी के समय वरिष्ठ लोगों का मैं मान सम्मान नहीं करता, वरिष्ठ अधिकारियों से द्वेष रखता हूँ उनके साथ कपट का व्यवहार करता हूँ, ऐसा दूषित प्रचार करने में हमारे शत्रु बहुत सफल हो रहे हैं। उनका यह द्वेषपूर्ण प्रचार नासिक 228 सम्भाजी

त्र्यम्बकेश्वर से काशी तक फैल गया है।" "कुछ बिगड़े दिमाग वाले लोग इस प्रकार की बेतुकी बाते कर रहे होंगे। परन्तु येसाजीबाबा, हमारे हंबीरराव, केसोजी त्रिमल, म्हालोजी घौड़पड़े आदि लोग क्या आज छोकरे हैं। शिवाजी महाराज के समय से हम कार्यभार संभाल रहे हैं। यह सारी वरिष्ठ मंडली आप के साथ है फिर इन सियारों के हुँआने की क्या चिन्ता?" कोंडाजी फर्जन्द ने कहा। राजद्रोह जैसे गम्भीर अपमान करने वालों को आपने जीवन दान दिया, उन्हें पद और मान-सम्मान दिया। गद्दारों को इतनी सुविधा तो शिवाजी महाराज के समय में बिलकुल नहीं थी।" हंबीरराव ने स्मरण दिलाया। "शम्भूमहाराज, हम पहले ही कह देना चाहते हैं। आप कुछ भी कीजिए किन्तु उस अण्णाजी दत्तो को फिर से पद पर वापस न लीजिए।" दादाजी देशपांडे और कोंडाजी फर्जन्द एक साथ बोले। "कोंडाजी बाबा, इतना एक पक्षीय निर्णय न लीजिए। अण्णाजी का पहले का योगदान बहुत बड़ा है।" शम्भूमहाराज ने कहा। थोड़ी देर बाद बालाजी चिटणीस बैठक में सम्मिलित हुए। महाराज ने उनसे कहा- "चिटणीस, स्वामी समर्थरामदास के पास दूत भेजिए। वे स्वयं समारोह में उपस्थित होने की कृपा करें, इस प्रकार का साग्रह अनुरोध मेरी ओर से निमन्त्रण में करें।" अनेक विषयों पर चर्चा हुई। रात को विलम्ब से बैठक समाप्त हुई। बिछौने में शम्भुराजा को नींद नहीं आ रही है। उन्होंने येसूबाई से पूछा- "आप क्या सोचती हैं? क्या करें इस अण्णाजी पन्त का?" "जो भी लेना हो, एक बार निर्णय लेकर मुक्त होइए, कठोर तो कठोर ही सही।" शम्भुराजा ने लम्बी साँस लेते हुए कहा, "अण्णाजी बहुत धूर्त व्यक्ति है। तैरती हुई मछली की तरह। हाथ में आते-आते फिसल जाने वाले। वे बड़े जोर शोर से यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि वे और उनके साथ के कुछ अधिकारी ही शिवाजी महाराज के दरबार का सारा कार्य-भार संभालते थे। इस प्रसंग में मेरी स्थिति मोच खाये पैर जैसी हो गयी है। दौड़ो तो भी दर्द करता है, शान्त बैठो तो भी दर्द करता है।" लगभग छः वर्ष बाद रायगढ़ पर इतना बड़ा उत्सव हो रहा था राज्याभिषेक के लिए इतर प्रदेशों के और अपने प्रदेश के लाखों लोग रायगढ़ पर एकत्र हुए थे। राजपरिवार के अनेक रिश्तेदार सपरिवार रायगढ़ पर पहुँच गये थे। जिस प्रकार आषाढ़ी एकादशी के दिन, चन्द्रभागा नदी के किनारे बिट्ठल सम्भाजी 229

मन्दिर के पास लाखों यात्री एकत्र होते हैं, उसी उत्साह के साथ रायगढ़ पर सप्त महल से होली के मैदान तक, राजाबाजार जगदीश्वर मन्दिर से काले हौद तक लाखों लोगों की भीड़ एकत्र थी। जगह-जगह पर सेना की टुकड़ियाँ तैनात की गयी थीं। गंगासागर के पास की द्वादशकोणी मनोर और किले के बुर्जी को रंगीन पताकों से सजाया गया था। शम्भूमहाराज सभा मंडप की ओर जाने लगे। उसी समय प्रवेश द्वार के पास पन्द्रह बीस मुसलमानों का जत्था खड़ा दिखाई पड़ा। वे सभी लम्बे, कटी नुकीली दाढ़ी वाले और मैले कपड़ों में थे। शम्भूराजा समीप आने लगे उसी समय सोमाजी दत्तो और जोत्याजी आदि चिल्लाए- "पीछे हटो, महाराज को आगे जाना है।" मुहूर्त के लिए विलम्ब न हो जाय, इसलिए शम्भूराजा जल्दी में थे। शनिस्तोत्र के शब्द उनके कानों में पड़े- नीलांजनं समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम् । छाया मार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।। शम्भूराजा ठिठक गये। भयभीत स्वर में शनि का स्मरण कौन कर रहा है? कौन है इतने संकट में? उन्होंने शनि का स्तोत्र बोलने वाले उस गरीब मुसलमान लड़के की ओर देखा। महाराज वहाँ एकत्र लोगों के पास चले गये। अन्य लोग बगल हट गये। महाराज ने पूछा- "कौन हैं ये लोग?" "महाराज, हम जाति के ब्राह्मण हैं- कोल्हटकर, श्रीबागचे, गंगाधर पन्त, कुलकर्णी। हम सब को जंजीरे के हब्शियों ने जबरदस्ती मुसलमान बना दिया। "महाराज, आप हम लोगों को फिर धर्म में सम्मिलित करने की कृपा करें। इसी प्रकार घोर अन्याय के सताए हमारे जैसे इस राज्य में असंख्य लोग हैं।" रसूलकर ने विनय के स्वर में कहा। महाराज ने वहीं पर चिटणीस से पूछा- "बालाजी पन्त प्रत्येक व्यक्ति को धर्माचरण स्वेच्छा से करना चाहिए न ?" "जी महाराज ?" "इनकी समस्या का शीघ्रातिशीघ्र समाधान कीजिए। चिटणीसजी समारोह की व्यवस्था में व्यस्त हैं। इस समस्या की ओर मैं स्वयं देखता हूँ।" सोमाजी दत्तो ने आगे बढ़कर कहा। महाराज और महारानी के मंडप में आने में बिलम्ब होने से लोग बेचैन होने लगे। सिंहासन की दाहिनी ओर दृष्टि टिकाए लोग वहीं पर बैठ गये। उस दरबार की शान-शौकत बादशाह के दरबार को भी मात देने वाली थी। समारोह के लिए राजा ने खुले हाथ मुहरें लुटाई थीं। मराठों की राजगद्दी पर दूसरा छत्रपति विराजमान हुआ। इस बात का दशों दिशाओं में फैलना स्वाभाविक था। दरबार की दीवारें 230 :: सम्भाजी

रामायण और महाभारत के प्रसंग चित्रों से सजाई गयी थीं। स्फटिक जैसे सुन्दर शीशों से बनाए गये झूमर दरबार की शान बढ़ा रहे थे। सम्मानित अतिथियों के लिए मखमली तख्तों की व्यवस्था की गयी थी। रायगढ़ का वह स्वर्ण सिंहासन कब से शम्भुराजा कर प्रतीक्षा कर रहा था। उस सिंहासन के साथ मावले मर्दों का खून पसीना, प्रेम और आदर का रिश्ता था। अचानक दाहिनी ओर मंगलवाद्य बजने लगे, नगाड़े भी जोर जोर से बजने लगे साथ ही चोबदारों की घोषणाएँ गूँजने लगीं—"महाराज धीरे धीरे महाराजऽऽ। सफल शास्त्र विचारशील, धर्मज्ञ, शास्त्रकोविद, क्षत्रिय कुलावतंस श्री शम्भू महाराज आ रहे हैंऽऽ।" चोबदारों के पीछे पीछे धीरे धीरे किन्तु दृढ़ता से कदम रखते हुए शम्भुराजा का आगमन हुआ। दरबार में हर्षोल्लास फैल गया। केवल बाईस तेइस वर्ष के ऊँचे, बलिष्ठ रेख उठान चेहरे वाले सपनीली आँखों और सुतवाँ नाक वाले गौरांग शम्भूमहाराज सभी के सामने प्रस्तुत हुए। उनकी नुकीली दाढ़ी शिवाजी का स्मरण दिला रही थी। उनके गले में मणियों और मोतियों की मालाएँ चमक रही थीं। किन्तु उनके मन के भीतर कुछ और ही सक्रिय था। शम्भुराजा के पीछे पीछे छरहरी और अभिजात सौन्दर्य से मंडित येसूबाई आयीं। उनके शरीर पर अंजीरी रंग शालू था। गले में पीली पीली चमकती कोल्हापुरी माला, कमर पर स्वर्ण करधनी, भाल पर कुंकुम की लम्बी लकीर, चन्द्रमा के निकलते समय आसपास झिलमिलाते बादलों का घेरा दिखाई पड़ता है, वैसे ही सिर पर पल्लू था। मदुरई के पुजारियों द्वारा घंटों के परिश्रम से सजाई गयी मीनाक्षी देवी की भाँति येसूबाई अत्यन्त सुन्दर लग रही थीं। उनके चेहरे पर विलसने वाली मधुर मुस्कान उनके सभी वस्त्रालंकारों को मात देती थी। येसूबाई के पीछे पीछे जानकी बाई और शम्भुराजा की सौतेली माँ सोयराबाई आती हुई दिखाई पड़ीं। शम्भुराजा के साथ एक ग्यारह वर्ष का सुन्दर राजकुमार आते हुए दिखाई पड़ा। उसके शरीर पर मूल्यवान रेशमी जाली वाला कुर्ता था और विशेष प्रकार के आभूषण चमक रहे थे। लोगों को यह पहचानते देर न लगी कि वे राजाराम हैं। धीमी गति से एक एक कदम रखते शम्भुराजा सिंहासन के पास पहुँचे। उन्होंने उस खचाखच भरे दरबार पर नजर डाली और फिर मुड़कर सिंहासन की ओर देखा। उस समय उनके पैर कुछ लडखड़ाये। मन कुछ सम्भ्रमित हुआ। वे सोचने लगे—उस स्वर्ण से सिंहासन पर बैठें या उसे त्याग दें, भरे दरबार से पीछे चले जायें? शम्भुराजा उसी स्थान पर स्तम्भवत खड़े रहे। वेणुवन की गूँजती हवा के समान पन्हाला की भेंट के समय शिवाजी महाराज द्वारा कहे गये शब्द उनके कानों में गूँजने लगे—"बेटे जब अपने पाँच सोपानों वाले पवित्र सिंहासन पर बैठने का सम्भाजी 231

समय आएगा तो केवल जन्मजात उत्तराधिकार से नहीं बल्कि अपने आत्मविश्वास से, मराठी मिट्टी के प्रति अटल निष्ठा से रायगढ़ के सिंहासन पर आसीन हो जाना। किन्तु यदि स्वराज्य के प्रति निष्ठा में थोड़ी भी दुविधा या शंका आये तो उस सिंहासन की हवा भी स्वयं को नहीं लगने देना। उसके बदले कफनी पहनकर, साधु बनकर प्रसन्नतापूर्वक वन की ओर चले जाना।" शम्भुराजा ने एक बार पुनः सभा मंडप की ओर देखा। हजारों मावल वीरों की आँखों के जादू ने उनमें एक नव-चैतन्य स्फुरित किया। अभिमान से उनका सीना तन गया। वे फिर सिंहासन की ओर ध्यान से देखने लगे। उन्हें आभास हुआ कि बड़े महाराज सिंहासन पर विराजमान हैं। इस कल्पना मात्र से उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे। उन आँसुओं पर झूमरों की तेज रोशनी पड़ने से वे स्फटिक के समान चमकने लगे। वे स्वयं से ही अस्पष्ट शब्दों में कुछ कहने लगे। उनके धीरे बोले गये शब्दों को अगली पंक्ति के कुछ सम्मानित लोगों ने सुना—'पिताजी! आपकी मुहर की, पवित्र पादुका की, तलवार की और परम्परा की मैं अपने प्राणों से भी अधिक हिफाजत करूँगा।' "वाह महाराज, वाहऽऽ!" कवि कलश, जोत्याजी, प्रहलाद निराजी जैसे सहकारियों ने आनन्द का उद्घोष किया। शम्भू महाराज ऐसे ओजस्वी स्वर में बोले मानो बड़े महाराज के सामने शपथ ले रहे हों। "जिस प्रकार जसवंती के कोमल फूल को नाखून से कुतर दिया जाता है वैसे ही यदि मेरे सिर को छाँटकरं काल के चरणों में फेंक दिया जाय तो भी मुझे स्वीकार है किन्तु अपने सह्याद्रि के हीरे मोतियों मे लाख गुना मूल्यवान किलों को किसी के भी हाथ में नहीं जाने दूँगा। हिन्दवी स्वराज्य पर आँच नहीं आने दूँगा।" इसी दृढ़ निश्चय के साथ शम्भुराजा सिंहासन पर विराजमान हुए। सिंहासन पर बैठते ही किले के सभी बुर्जों से तोपों के धड़ाके छूटने लगे। पिछले कई सालों में इस तरह नगाड़े नहीं बजे थे। शम्भुराजा पर पुष्पों की वृष्टि हुई ऐसा लगा मानो देवता उन पर वृष्टि कर रहे हों। येसूबाई की आँखों में आनन्द के आँसू उमड़ आए। छोटे राजाराम, जानकीबाई, राजा के सभी मित्र आनन्द विभोर हो गये थे। मन्त्रपाठ, जयघोष, राज्यारोहण विधि सब कुछ साथ-साथ चल रहा था। समारोह के प्रथम चरण की समाप्ति पर राजा को भेंट समर्पित की गयी। उस समारोह में स्वामी रामदास की ओर से उनके शिष्य दिवाकर गोसावी उपस्थित थे। उन्होंने स्वामीजी की ओर से आशीर्वाद प्रदान किया। समारोह में सन्त तुकाराम के चिरंजीव महादोबा और नारायण स्वामी उपस्थित थे। उन दोनों का सम्मानपूर्वक गौरव किया गया। दूसरे राज्यों के वकीलों ने झुककर अभिवादन किया। समारोह के 232 :. सम्भाजी