छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
देवी की मूर्ति वहाँ विद्यमान थीं। महादजी रात को कुछ देर से घर लौटे। उन्होंने मन्दिर के सामने, संगमरमर के नंगे फर्श पर अपनी पत्नी को निढाल होकर पड़े देखा। शरीर पर एक भी आभूषण नहीं, शोक की व्याकुलता में बाल बिखरे हुए थे। महादजी के बाहर आने की आहट पाते ही वे घायल सिंहिनी की तरह झट से उठीं। उनकी आँखें क्रोध से अंगार की तरह जल रही थीं। वे गरज पड़ीं, "आइएऽऽ आइएऽऽ आ गये? बहुत बड़ी बहादुरी करके लौटे हैं? आइए मैं अपने बहादुर स्वामी की आरती उतारती हूँ।" महादजी क्रोध और सन्ताप से व्यग्र हुई अपनी पत्नी को मनाने की कोशिश करने लगे। सखुबाई क्रोधावेश में प्रश्नोत्तर करने लगीं। "हमारे छोटे भाई सम्भाजी राजा का ऐसा घोर अपमान हो रहा था। नासमझ छोटे बच्चे भी उन पर गोबर के गोले फेंक रहे थे। यह सब देखकर आपका खून उबला कैसे नहीं?" "परन्तु सखु. . ?" "वह शिवाजी जैसे प्रतापी का पुत्र था। वह जीजामाता जैसी युगस्त्री का पोता था। इस मिट्टी का अंश था। उसको पीड़ित करने वाले शत्रु का प्रत्युत्तर क्यों नहीं दिया आपने?" "सखु उस बादशाह परमेश्वर को कौन प्रत्युत्तर देगा।" सखुबाई का गला भर आया वे रोते हुए बोलीं, "सम्भाजी राजा का जहाज डूब रहा है। उसे छोड़कर सब लोग औरंगजेब से आकर मिलें। इस प्रकार का पत्र आपने सभी जागीरदारों को लिखा था। उस समय क्या मैंने आपसे एक भी शब्द पृछा था?" सखुबाई के एक भी प्रश्न का उत्तर महादजी के पास नहीं था। सखुबाई बिना रुके गरज रही थीं, "अजी, आप एक बार इस बात की उपेक्षा भी कर दें कि वह शिवाजी का बेटा है परन्तु यह कैसे भूल सकते हैं कि उसकी धमनियों में बहने वाला रक्त निंबालकर की बेटी का है। वह निंबालकर का नाती है। मैं पृछती हूँ कि यह आपको क्यों नहीं याद रहा? खून की पुकार पर खून मदद को क्यों नहीं दौड़ा?" सखुबाई के प्रश्नों की बौछार के सामने महादजी हतप्रभ हो गये। वे वहीं मन्दिर में ही बैठ गये। दुख, पीड़ा और पश्चाताप के स्वर में महादजी कहने लगे, "सखु तुम्हारे सीधे प्रश्नों का उत्तर देने में मुझे कोई संकोच नहीं है इस भूमि के अनेक जमींदारों और जागीरदारों ने अरबों-खरबों कमाये। किन्तु इस भूमि पर कोई छत्रपति बन सकता है, राजा बन सकता है इसका उदाहरण तुम्हारे पिता शिवाजी सम्भाजी :: 711
महाराज ने ही प्रस्तुत किया। तुम्हारे पिता और तुम्हारे भाई-शिवाजी और सम्भाजी समय को अतिक्रान्त करके हजारों योजन आगे जाने वाले महापुरुष ही थे। हम जैसे जमींदारों और जागीरदारों तथा शिवाजी सम्भाजी के बीच यही अन्तर है। आज जो घटना घटी है, जो हादसा हुआ है उससे हम बहुत शर्मिन्दा हैं। तीन बहुत देर रात में जुल्फिकारखान सैनिक की वर्दी पहने बादशाह के सामने उपस्थित हुआ। वह कहने लगा, "जहाँपनाह ! शाम के समय से ही मेरी फौजी टुकड़ियाँ बहादुरगढ़ से बाहर जाने लगी हैं। हुक्म की तामील हो गयी है।" "कुल मिलाकर कितनी फौज होगी? "मैं अपने साथ यहाँ से बीस हजार ले जाता हूँ। इसके अतिरिक्त पूना और चाकण में तैयार हैं। वहाँ से बीस हजार लेता हूँ और सीधे जाकर रायगढ़ को टक्कर देता हूँ।" "शाब्बास!" जीत का आनन्द औरंगजेब के चेहरे पर छुप नहीं पा रहा था। वह प्रसन्नता से बोला, "बेटे जुल्फी अब तो वैसे करना भी क्या है? सम्भा की गिरफ्तारी सुनकर मरगट्ठे अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भाग गये होंगे। तुम्हें बस इतना ही करना है-" "हुक्म, जहाँपनाह!" "आजतक हमें भूत की तरह चिढ़ाने वाली सह्याद्रि की पहाड़ी पर थूकना होगा और वहाँ के एक एक प्रदेश को जीतने की शुरुआत करनी होगी।" जुलूस के बाद दूसरे दिन नाश्ते का समय बीत गया फिर भी सूर्य बादलों के पर्दे से बाहर निकलने को तैयार न था। वजीर असदखान, औरंगजेब के सभी शहजादे, सभी जनानियाँ आदि सभी की एक ही चिन्ता थी कि आगे क्या होगा? बादशाह सम्भाजी के बारे में क्या निर्णय लेगा, इसका अनुमान वजीरे आज़म असदखान भी नहीं लगा सकता था। उस दिन जब असदखान सजधजकर अपने डेरे से बाहर निकलने लगा तो उसकी एक बेगम ने पूछा, "अजी, उस काफिर के बच्चे का क्या होगा?" "जो कुछ भी होगा, आज ही होगा।" असदखान ने उत्तर दिया, "घात- अपघात कुछ भी हो जाये किन्तु जब तक अपना दुश्मन समाप्त नहीं हो जाता तब 712 :: सम्भाजी
तक चुप बैठना अपने आलमगीर के स्वभाव में नहीं है।" अचानक असदखान अतीत की स्मृतियों में खो गया। उसने कहा, "बेगम, दारा शिकोह पकड़ा गया था, तब हमारे शाहजहाँ साहब बीमार होकर बिस्तर में पड़े थे। किन्तु बूढ़े बीमार बाप पर क्या गुजरेगी? इसकी चिन्ता जहाँपनाह ने बिलकुल नहीं की थी। सिर्फ दो तीन दिनों में ही उन्होंने निश्चिन्त भाव से अपने सगे भाई का सिर छाँट दिया था। इतना ही नहीं दारा के सिर को मिठाई के डिब्बे में ढककर शाहजहाँ साहब के पास भेज दिया था। जो अपनों का ऐसा हाल कर सकता है उसके लिए सम्भा जैसे दुश्मन की क्या बात है? सम्भा किसी भी हालत में कल का सूर्य नहीं देखेगा।" बोलते बोलते एक भयंकर कल्पना से बूढ़ा असदखान पसीना पसीना हो गया। अपना माथा पोंछते हुए बोला, "खुदा करे कि उस सम्भा की गर्दन पर वार करने की जिम्मेदारी मुझ पर वजीर के नाते न आये।" दोपहर को धूप निकली किन्तु बहादुरगढ़ के आसपास बादलों की छाया दूर नहीं हुई थी। हवा एकदम धीमी और घुटनभरी थी। मनुष्य और पशु आने वाली रात की प्रतीक्षा कर रहे थे। अन्ततः छावनी के ऊपर अँधेरा फैल गया। जगह जगह मशालें जला दी गयीं। चिरागों के प्रकाश में महल जगमगा उठे। भीमा नदी की ओर से ठंडी ठंडी चुभने वाली हवा बहने लगी। छावनी में जगह जगह कुत्ते करुण स्वर में विलाप कर रहे थे। दमड़ी मस्जिद का वह फकीर उदास होकर पागलों की तरह हँस रहा था। सरस्वती की छोटी धारा के उस पार खंडोवा का बंजर मैदान जाग रहा था। वहाँ के भूत, बैताल और चुड़ैलें बरगद और पीपल की ऊँची डालों पर चढ़कर, लटकते हुए औरंगजेब की छावनी की ओर सहमी नजरों से देख रहे थे। भूत इत्यादि भी यह जानने के लिए उत्सुक थे कि बादशाह की गद्दी तक पहुँचा, इनसान के रूप में यह बैताल अब क्या कदम उठाएगा? अचानक असदखान के महल के पास किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। वह सावधान हो गया। इतने में उसके ही कुछ सैनिक दौड़ते हुए अन्दर आये। उन्होंने बताया, "बादशाह ने सम्भा के बन्दीखाने की ओर रूहूल्लाखान को भेजा है।" अपने ऊपर की विपत्ति टल गयी, यह सोचकर असदखान ने बड़ी कृतज्ञता से अल्लाह का नाम लिया। अब बहादुरगढ़ की पूरी छावनी का ध्यान रूहूल्लाखान की आगे की कार्यवाही की ओर लगा था। सम्भाजी :: 713
चार "सम्भाजी और कलश राजबन्दी नहीं लुटेरे हैं।" बादशाह ने स्पष्ट शब्दों में अपनी यह राय अनेक बार अपने कर्मचारियों और सहयोगियों के सामने दी थी। इसीलिए इन बन्दियों को बहादुरगढ़ के शाही कैदखाने में उन्हें नहीं भेजा गया था। एक किनारे पर खुले मैदान में बाँस और लकड़ी के मजबूत खम्भों से एक मजबूत कैदखाना एकदम नये रूप में बनाया गया था। उसे चारों ओर से लम्बी घास की छाजन से घेरा गया था। उस कैदखाने के चारों ओर पाँच हजार हैवानों की फौज नंगी तलवारें लिये तैनात थी। अन्दर बैठने के लिए कोई फटी पुरानी दरी भी नहीं थी। जिस प्रकार काबू में न आने वाले जंगली भैंसों या पागल हाथियों को बन्द कर दिया जाता है उसी तरह सम्भाजी और कवि कलश को अन्दर फेंक दिया गया था। उनके बिछाने के लिए थोड़ा बहुत धान का पुआल और नंगी मिट्टी ही थी। उन दोनों को कल ऊँट पर इस तरह आड़ा टेढ़ा दौड़ाया गया था कि इस अमानवीय यातना से उनके शरीर पत्थर हो गये थे। उनके शरीर का खून और उनकी चर्बी गीली मिट्टी के गोले की तरह हो गयी थी। उनके हाथ पीठ की ओर जंजीरों द्वारा मजबूती से बँधे थे। पाँवों में जानवरों की तरह बेड़ियाँ डाली गयी थीं। कल ऊँट की नंगी पीठ पर बैठने से उनके पुट्ठों और उनकी जाँघों की चमड़ी रगड़कर छिल गयी थी। किन्तु यह आघात और दुर्भाग्य का जहरीला घाव इतना अकल्पनीय और क्रूर था कि उसके सामने चमड़ी का छिल जाना कुछ भी नहीं था। उन दोनों की लाल आँखें प्रकाश में भयानक, दिल दहला देने वाली और चमकीली दिख रही थीं। उन कैदियों की दयनीय अवस्था देखकर कलेजा फटता था। रूहूल्लाखान का दिल भी दहल गया। वह अनजाने ही बोल पड़ा, "सम्भा बेटा ये तेरी कैसी हालत है? कहाँ गये तुम्हारे तैंतीस करोड़ देवी देवता? कहाँ भाग गये आग के समुद्र में छलाँग लगाने वाले शिवाजी के मर्द मावले ?" सम्भाजी राजा और कविराज दोनों ही चुप थे। वे चेतनाशून्य दिखाई पड़ रहे थे। उनकी आँखें झाड़ियों में फँसे बाघ के बच्चों की तरह लाल लाल दिख रही थीं। वे दोनों रूहूल्लाखान की ओर आक्रोशभरी नजरों से देख रहे थे। रूहूल्लाखान ने आते ही बादशाह का अतिमहत्त्वपूर्ण सन्देश पहुँचा दिया। "सम्भा, बादशाह को तुमसे दो और सिर्फ दो ही चीजें चाहिए। साफ साफ बता दे कि कहाँ रखे हैं तेरे जर जवाहरात और कहाँ हैं तुम्हारी रत्नशाला?" 714 · सम्भाजी
सम्भाजी के होंठ हिले नहीं। इसके विपरीत सम्भाजी राजा और कविराज खान की ओर व्यंगभरी नजरों से देखने लगे। खान को यकीन था कि पहला प्रश्न निरुत्तर रहेगा। इसलिए उसने तरकस से और तेज धार वाला तीर निकाल निशाना लगाने की तरह दूसरा प्रश्न किया, "तुम्हारे करोड़ों मुहरों के खजाने को जानकर बादशाह तुम पर फिदा हो जाएगा।" सम्भाजी राजा चुप थे किन्तु रूहूल्लाखान पीछे हटने को तैयार न था। उसने हठ करते हुए पूछा, "बोल, कौन, कौन हैं वे लोग?" "कैसे लोग?" कविराज ने मुँह खोला। "वही मूर्ख लोग! जो पिछले अनेक सालों से खाते हैं बादशाह का नाम और तुम मराठों के साथ गुप्त सम्बन्ध रखते हैं। बताओ कौन हैं वे बदमाश?" उन दो प्रश्नों के लिए खान ने बौछार लगा दी थी। जैसे भी हो दूसरे प्रश्न का उत्तर तो सम्भाजी को देना ही चाहिए। उत्तर न मिलने से वह बहुत बौखला रहा था। बड़ी दया दिखाकर राजा और कविराज को समझा बुझा रहा था, "सम्भा अभी बहुत जिन्दगी बाकी है। तुम्हारी अभी उम्र ही कितनी है? सिर्फ बत्तीस साल। हमारे बादशाह औरंगजेब की मर्जी से चलोगे तो अभी भी अपनी जिन्दगी बचा सकते हो। मेरी बात सुनो मूर्खों।" काल की चालाक अदृश्य कलाओं ने दोनों के होंठ सिल दिए थे। वे दोनों किसी भी बात का सुराग नहीं लगने दे रहे थे। रूहूल्लाखान परेशान हो गया। वह चिढ़कर जोर से चिल्लाया, "अरे शैतानों याद रखो— बादशाह सलामत ने अपनी जिन्दगी में किसी भी शत्रु पर इतना रहम नहीं दिखाया है। कस्मे वादे तोड़कर, अपने खून के रिश्ते वालों को भी जहन्नुम में भेजने के लिए वे ज्यादा मशहूर हैं। अच्छी तरह से कबूल करो, बोलो तुम्हारा खजाना कहाँ है? तुम्हारे साथ हमारे कौन कौन से गद्दार सरदार हैं?" "ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकता है तेरा वह नीच बादशाह?" कविराज ने जोर से पूछा। "पागल मत बनो! इस कैदखाने में भूखे कुत्ते छोड़े जाते हैं वे तुम्हारी चर्बी को काट काटकर खाएँगे।" "मतलब कि बादशाह अन्त में अपनी मदद के लिए अपने भाइयों को बुलाने वाला है।" कलश की इस बात पर सम्भाजी को उस अवस्था में भी हँसी छूट गयी। किन्तु आवश्यकता मनुष्य को अधम बना देती है। इसी वजह से रूहूल्लाखान ये गालियाँ, ये व्यंग सहन कर रहा था। कलश ने उसे अपने पास बुलाया। ऐसा संकेत दिया कि कुछ भेद की बात करनी है। जब रूहूल्लाखान पास आ गया तो कलश ने उसके मुँह पर थूक दिया। इस घोर अपमान से खान बहुत चिढ़ गया। सम्भाजी 715
उसने अपनी कमर पर हाथ रखा। वहाँ से तेज धार वाली कटार निकालकर कविराज की ओर झपटा। किन्तु उसी क्षण उसे बादशाह की याद आ गयी। उसे लगा कि बादशाह सोच सकता है कि इतने महत्त्वपूर्ण राजबन्दी को मैंने अपनी किसी स्वार्थ बुद्धि अथवा किसी दुष्टता से मार डाला। ऐसे शक्की और चालाक मालिक का क्या भरोसा ? उसने अपने पर काबू पा लिया। कटार उसके हाथ से नीचे गिर गयी। धमकियों का डर दिखाने का इन राजबन्दियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उसे जो चाहिए था वह भी सम्भव नहीं हो पा रहा था। इसलिए खान बहुत उतावला हो गया था। वह मिन्नत करते हुए बोला, "सम्भा बेटा, तेरी उम्र के मेरे दो बच्चे हैं। उनकी कसम खाकर कहता हूँ। सोने सी जिन्दगी का सर्वनाश क्यों कर रहे हो? फिजूल की इतनी जिद दिखाते हो? "खान साहबऽ तुम्हारे बादशाह पर मुझे बड़ी दया आती है।" सम्भाजी महाराज के मुँह से शब्द बाहर निकले। "क्यूँ?" "कोई पराजित राजा बन्दी बनाया जाता है, तो राजनीति में उसके साथ व्यवहार करने का कुछ ढंग होता है। किन्तु उस व्यवहार का कोई अंश भी तुम्हारे बादशाह में दिखाई नहीं देता। किसी गन्दे कुत्ते को हीरे मोती का हार पहनाकर, उसे मखमली वस्त्र पहनाकर सिंहासन पर बिठाया जाये तो भी वह रहेगा अपने गन्दे पैरों के साथ ही।" "तौबाऽऽ तौबाऽऽ—सम्भा कैसी बातें करते हो? आलमपनाह की बराबरी एक कुत्ते के साथ?" 'हाँ, कुत्ते की भी एक श्रेणी रहती है। तेरे बेवकूफ बादशाह से वह गरीब जानवर कितना नेक और वफादार होता है?" रूहूल्लाखान के पसीने छूट गये। वह पैर पटकते हुए कैदखाने से बाहर निकल गया। वह सोचने लगा, 'सम्भा ने आलमगीर को तोहफे में जो गिन गिनकर उपाधियाँ दी हैं उसे बादशाह से कैसे बताएँ?' रात बहुत हो चुकी थी। ठंडक भी बढ़ गयी थी। दोनों के शरीर के नीचे की मिट्टी और भी कुछ अधिक ही ठंडी हो गयी थी। पहरा देने वाले पाँच हजार सैनिक जाग रहे थे। हवा के तेज झोंके लकड़ी और घास से बने कैदखाने में घुसने की कोशिश कर रहे थे। कैदखाने की छत को ठीक करने के बहाने एक हट्टा कट्टा पहरे पर बैठा सूबेदार आगे आया। उसने जल्दी से घास के गट्ठर भीतर किये। कुछ बाँधने के लिए घास के गट्ठर खोलने का अभिनय किया। उसके साथ काम करने वाले उसके खास आदमी थे। 716 :: सम्भाजी
वह सूबेदार आगे बढ़ा। घास के गट्ठर जल्दी से खोलकर वहीं गीली जमीन पर एक हल्का-सा बिछौना तैयार किया। दुखने वाले शून्य हुए शरीर वाले सम्भाजी और कविराज को हाथ का सहारा देकर, धीरे से खींचकर बिछौने पर लिटा दिया। अँधेरे में उसका चेहरा भी पहचान में नहीं आ रहा था। किन्तु उसके काँपते हाथ बहुत दयालु और प्यारभरे थे। उस सूबेदार ने उन दोनों को वहाँ पर ठीक से सुला दिया। यह स्थिति देखकर उसका मन अचानक भर आया। वह वहीं पर नंगी जमीन पर बैठ गया। सम्भाजी का पैर पकड़कर वह फूट-फूटकर रोने लगा। उसके गर्म आँसुओं से सम्भाजी राजा की चेतना जाग गयी। सम्भाजी ने व्याकुलता से पूछा, "कौन भाई मियाँखान?"
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"जहाँपनाह! आज भी यदि किसी ने 'रामशेज' ऐसा कहा तो ऊँट और घोड़े थरथर काँपने लगते हैं। बेजुबान जानवरों का यह हाल है तो फौजियों का क्या होगा?" असदखान ने कहा। "वजीरे आजम! आपने हार मान ली क्या?" बादशाह की कत्थई आँखें उग्र हो गयीं। मुझे बस इतना ही कहना है, मेरे आका। रामशेज जैसे मराठों के साढ़े तीन सौ किले हैं, उनको जीतने के लिए बची हुई जिन्दगी को व्यर्थ में गँवाने के बदले सम्भा के साथ मीठी बातें करके पहले उसके किलों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए, हजरतऽऽ।" औरंगजेब ने प्रश्नाकुल नजरों से रूहूल्लाखान की ओर देखा। तब खान बोला, "मेरे आका, सम्भा और कवि कलश जन्मजात बदमाश हैं। वे शाहंशाह को गाली देते हैं।" बादशाह अपने सहयोगियों की बातें शान्तिपूर्वक सुन रहा था। वह अपना मत प्रकट नहीं कर रहा था। वह सोच रहा था, 'सम्भा को तत्काल समाप्त न करके उसके साथ मीठी मीठी बातें करके, आवश्यक होने पर थोड़ी दहशत देकर उसके किलों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए।' यही राय अनेक सरदारों की भी थी। दक्खिन में आठ-नौ वर्षों की संघर्षशील जिन्दगी बहुत हो गयी। अब कोई युद्ध नहीं चाहिए। अब तुरन्त उत्तर की ओर लौट जाएँ। इन्हीं विचारों में सभी बेताब हो रहे थे। आजकल बादशाह की मानसिक अवस्था बहुत अच्छी थी। वह अपने परिवार
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के साथ खाने का आनन्द लेता था। रिश्ते में चाचा लगने वाले असदखान को भी बड़े आग्रह से बुलाता था। बीच-बीच में उसे हास्य-व्यंग्य की लहर-सी आती थी। उसके व्यंग्य पर बेगमों को स्वयं पर नियन्त्रण रखना पड़ता था। बादशाह का नूर देखकर बेगमें मन्द-मन्द मुस्कराती थीं। एक बार बादशाह ने पूछा, "उदयपुरी! जब गोधूलि बेला-काफिरों की भाषा में साँझ होती है, तब काफिरों की औरतें क्या करती हैं?" उदयपुरी से कोई जवाब देते नहीं बना। तब बादशाह ने प्रश्नसूचक दृष्टि से असदखान की ओर देखा। असदखान ने सहजता से कहा, "ऐसे समय में वे औरतें इधर उधर घूमते हुए मुर्गे मुर्गियों और भेड़ बकरियों को इकट्ठा करती हैं।" इस बात पर रसोईघर में हँसी की लहर उठी। तब बादशाह ने अपनी शहजी की ओर गर्व से देखते हुए कहा, "जीनतउन्निसा बिटिया, तू ही बता इस सवाल का सही जवाब।" "अब्बाजान, साँझ के समय हिन्दू औरतें अपने मन्दिरों में दीप जलाती हैं। देवता को प्रणाम करती हैं। आँगन में आकर अपने पति की प्रतीक्षा करती हैं। घर के आसपास जब कहीं पति के घोड़े की टाप सुनाई पड़ती है तो उनके हृदय में खुशी का सागर लहराने लगता है।" "सम्भा को गिरफ्तार किये कितने दिन हो गये?" औरंगजेब का चेहरा एक कुटिल आनन्द मे खिल उठा। अपना पतला होंठ मगरूर दाँतों से दबाकर वह बोला, "सम्भा अपनी बेगम से कितनी मुहब्बत करता है, इसके अफसाने हम सुनते आये हैं। वह मूर्ख अपनी रियासत में अपनी औरत के नाम के सिक्के चलाता था। ऐसा लोग बताते हैं। खैर...सम्भा की पत्नी अब पागल हिरनी की तरह इधर-उधर भाग रही होगी, बावली होकर।" "क्या कहना चाहते हैं अब्बाजान?" शहजादी ने पूछा। "आज नहीं तो कल, अपने शौहर की जिन्दगी की भीख माँगती हुई वह जंगली हिरनी यहाँ जरूर आएगी।" "अब्बाजान?" "हाँ बिटिया, वह अकेले नहीं सारे किले की चाभियाँ साथ लेकर आएगी।" गर्व से चारों ओर नजर घुमाते हुए बादशाह ने कहा, "सम्भा की जिन्दगी की खातिर् बेताब होकर वह मेरे पैरों पर नाक रगड़ेगी, वह जरूर आएगी।" औरंगजेब की सावधान नजरों से कुछ ओझल नहीं रह पाता था। शहजादी जीनतउन्निसा आजकल बिना किसी कारण के ही बेचैन दिखती थी। बादशाह को महसूस हुआ कि जबसे सम्भा का जुलूस निकाला गया तबसे शहजादी की बेचैनी 718 :: सम्भाजी
बहुत बढ़ गयी थी। पिछले दस वर्षों से दुर्गाबाई राजबन्दी के रूप में बादशाह की कैद में दिन काट रही थीं। औरंगजेब को पता था कि उसकी शहजादी को दुर्गाबाई और कमलजा से बहुत प्रेम था। उदयपुरी हों नवाबबाई हों या औरंगाबादी महल, इन सभी बेगमों की अपेक्षा औरंगजेब शहजादी जीनत की बात अधिक सुनता था। उसकी बात मानता था। यह बात सभी को मालूम थी। खाना खाते खाते जीनत ने बादशाह से पूछा, "अब्बाजान! उस सम्भा को जान से मारने का इरादा दिख रहा है आपका?" "अभी तक निश्चित नहीं है।" ऐसा कहते कहते बादशाह ने सावधान होकर पूछा, "क्यों? आपको क्या तकलीफ है?" "बस ऐसे ही अब्बाजान।" बादशाह कुछ अन्य कारणों से बहुत खुश था। उसने अपनी शहजादी से कहा "भरे बाजार में जैसे मुर्गा नचाया जाता है—लकड़ी का मुर्गा। वैसे ही शिवा के इस नापाक बच्चे को चौराहे चौराहे पर नचाएँगे। हो सकता है कि ये मरगट्ठे बगावत करके हमारे ऊपर आक्रमण करें।" "बगावत कैसी जहाँपनाह?" शहजादी के मुँह में खाना अटक गया। राजनीति के मामले में बोलना चाहिए कि नहीं? यह सोचकर शहजादी चुप हो गयी। किन्तु अपने को न रोक पाने के कारण फिर बोली "फिर भी अब्बाजान मुझे लगता है कि आपको रहम करनी चाहिए।" "कैसी रहम बिटिया?" "उस सम्भा को जिन्दगीभर के लिए कैदखाने की गन्दगी में फेंक दीजिए मगर उसे जान से मत मारिए।" "हूँऽऽ " औरंगजेब असन्तोष से बोला, "देखेंगे, लेकिन वह मूर्ख है बड़ा हठीला। टूट जाएगा मगर झुकेगा नहीं।" "अब्बाजान, जब आदमी हँसी-खुशी की जिन्दगी जी रहा होता है तब उसे कुछ अनुभव नहीं होता। मगर एक बार मौत का दरवाजा दिख जाये तो बड़े बड़े शैतान भी घबरा जाते हैं।" "नहीं, शहजादी, शिवा का यह छोकरा बड़ा जिद्दी है। हम तो इस जहन्नमी से पूरे हैरान हो गये हैं। इन दोनों बदमाशों का इतना बुरा हाल किया गया, नरक से भी ज्यादा तकलीफें दी गयीं। खुदकुशी करने का मन करता होगा, फिर भी दोनों झुकने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। वे अपना सिला हुआ मुँह खोलते हैं तो सिर्फ हमें शाप और गालियाँ देने के लिए।" "लेकिन अब्बाजान! दुर्गा, राणू और कमलजा जैसे उसके निकट सम्बन्धी सम्भाजी :. 719
हमारे कैदखाने में हैं। उन रिश्तेदारों के माध्यम से अपनी बात क्यों नहीं कहलवाते आप? अपने खून से सम्बन्धित लोग मिलते हैं तो बड़े बड़े पहाड़ भी पिघल जाते हैं। सम्भा को तो लोग बताते हैं कि शायर है।'" औरंगजेब ने बड़े गर्व से अपनी शहजादी की ओर देखा। बादशाह का चेहरा दमक उठा। उसे पुराना इतिहास स्मरण हुआ। इसके पहले जब दुर्गाबाई और राणूबाई अहमदनगर के किले में कैद थीं, तब सम्भाजी ने अनेक बार दस दस, पन्द्रह-पन्द्रह हजार की फौज भेजकर अहमदनगर के किले को ध्वस्त करने की कोशिश की थी। इसीलिए उन राजबन्दियों को औरंगजेब ने हमेशा के लिए बहादुरगढ़ किले में लाकर रखा था। बादशाह अच्छी तरह जानता था कि अपनी पत्नी और बहन के प्यार में सम्भा पागल हो जाता है। अब यदि दस ग्यारह वर्ष के बाद शायद सम्भा के सामने उसके परमप्रिय व्यक्तियों को खड़ा किया तो? यकीनन सम्भा का फौलादी सीना पिघल जाएगा। राजगढ़ी से भी अधिक प्रिय अपने आत्मीय जनों से मिलने के लिए वह घायल पंछी की तरह तिलमिला उठेगा। ऐसी स्थिति में वह किसी भी सन्धिपत्र पर हस्ताक्षर कर देगा। उसे लगा कि सारी उलझन सुलझ गयी। बड़ी प्रसन्नता के साथ बादशाह जनानखाने से बाहर निकला। शहजादी के मुख पर हाथ फेरकर उदयपुरी बेगम बोलीं, "बिटिया, हजरत के सामने बात करने का साहस तुम्हें कैसे होता है?" "नहीं अम्मीजान, किसी का भी दुख देखती हूँ तो मेरा कलेजा दुख से मरोड़ने लगता है।" जीनत जब यह तो उसे अपनी बड़ी जेबुन्निसा की बड़ी याद आयी। जेबुन्निसा सलीमगढ़ के पीछे मरते दम तक कैद की यातना भोगती रही। जीनत की आँखों में पानी उतर आया। छह उस रात जीनतउन्निसा को लाख कोशिश करने पर नींद नहीं आ रही थी। अपने बाप की जिन्दगी का एक-एक चित्र उसकी आँखों के सामने उभर रहा था। "मेरा बाप एक कुशल और सजग राजनीतिज्ञ हो सकता है मगर उसकी जिन्दगी काली करतूतों से भरी पड़ी है।" वह बीती घटनाएँ स्मरण कर रही थी। लगभग पन्द्रह वर्ष पहले, सिखों के पाँचवें गुरु तेगबहादुरसिंह को औरंगजेब 720 :: सम्भाजी
ने बेहाल करके जान से मार डाला था। उसी क्रूरता से गुरु के शिष्य भाई मतिदास, सतीदास और दयालसिंह की दिन दहाड़े हत्या करवाई थी। उस घटना को सुनने वालों के शरीर अभी भी थरथराने लगते हैं। उन विषैली यादों से ज़ीनतउन्निसा बुरी तरह हैरान हो रही थी। दयालदास को दिन दहाड़े चाँदनी चौक में खौलते हुए तेल के कड़ाह में डाल दिया गया था। वह जानवरों की भाँति चीखते चिल्लाते, तड़प-तड़प कर मर गया। उसके शरीर की बची हुई चमड़ी अपने आप छिलकर नीचे लटक गयी थी। दयालदास की डरावनी लाश बादशाह ने बहुत दिनों तक चाँदनी चौक में लटका रखी थी। उस दिशा में भयभीत पंछी भूलकर भी उस ओर जाने का साहस नहीं करते थे। सतीदास की हत्या की कथा तो और भी अमानवीय थी। उसे चाँदनी चौक में एक खम्भे के साथ कसकर बाँध दिया गया था। सतीदास के पीछे एक और-एक हथियारबन्द व्यक्ति को खड़ा किया गया था। उनके हाथों में तेज नोंकवाले बघनखे लगाए गये थे। बादशाह के इशारे पर दोनों शैतान एक ही समय पर मतीदास के शरीर को फाड़ने लगे। जिस तरह कपड़े को फाड़ा जाता है उसी तरह उसका शरीर फाड़ा जा रहा था। उसके शरीर के मांस को खरोंच खरोंचकर निकाला जा रहा था। भयानक पीड़ा से तड़पता मतीदास जानवरों से भी ज्यादा जोर से चिल्ला रहा था। उसकी करुण चीत्कार न सह पाने के कारण दो महिलाओं को गर्भपात हो गया था। बादशाह के साथ कोई समझौता हो सके इसलिए शहजादी ने राणूबाई और दुर्गाबाई का मार्ग सुझाया था। किन्तु अपने बाप की क्रूरता का उसे पूरा अनुमान था। उस समय सतीदास का बघनखे से नोचा हुआ, खून से लथपथ जिन्दा शरीर उसकी कल्पना में बार बार उभर रहा था। दूसरे ही पल उसे अपने अब्बाजान की जगह हाथ में तेज कटार लिये एक नर राक्षस दिखाई देने लगा। यह सपना वह जागते हुए देख रही थी और पसीने से तरबतर होकर बिस्तर में तड़प रही थी।
सात
बारह वर्ष पहले बहादुरगढ़ किले में मियाँखान दुर्भाग्य से बन्दी बनाया गया था। दो बेटियों की शादी करने और उनका भविष्य सँवारने में सम्भाजी ने मियाँखान की सम्भाजी :: 721
बड़ी सहायता की थी। स्वयं भारी खतरा उठाकर, अपनी जान संकट में डालकर, सम्भाजी ने उसे किस प्रकार बाहर भेजा था, मियाँखान को भूला नहीं था। सब कुछ साफ-साफ स्मरण था। यही कारण था कि सम्भाजी राजा की दशा देखकर मियाँखान का कलेजा टूट रहा था। इन्तजाम देखने के बहाने मियाँखान, उस दुर्गन्ध भरे बन्दीखाने में अनेक बार जाता था। उसके साथ उस पर जान छिड़कने वाले नौकर अन्दर जाते थे। राजा और कविराज को जितना सम्भव होता उतना फलाहार देने, जितनी सम्भव हो उतनी सेवा करने में मियाँखान स्वयं धन्य मानता था। इस जालिम कैदखाने में मियाँखान ही सम्भाजी और कविराज के लिए आँख कान था। उसी से बहादुरगढ़ के समाचार उन तक पहुँचते थे। एक बार मियाँखान ने सम्भाजी राजा से धीरे से कहा, "महाराज ! कुछ भी करके आपके इस गुलाम ने आपको बहादुरगढ़ के इस फौलादी किले से बाहर निकाल दिया होता, मगर...'' "मियाँखान ?'' "हाँ सम्भाजी महाराज। यहाँ से बाहर निकलने में मुश्किल नहीं है। मगर इसलिए कि चारों ओर सौ-सौ कोस तक केवल मुगलों का ही शासन है। इस जुल्मी बादशाह ने किसी के भी तबेले में घोड़े नहीं रखने दिये। हर गाँव से बहुत सारे युवकों को मार-मारकर भगा दिया। आसपास का सारा इलाका मुगलों के क़ब्ज़े में है।'' "जाने दो खानसाहब ! ज़िन्दगी का इतना मोह क्या? कुछ लोग जन्म ही बुरी घड़ी में लेते हैं, क्या कहा जाए? ऐसे लोग अपनी जिन्दगी से नहीं अपनी मौत से यश प्राप्त करते हैं। ऐसे तेजस्वी लोगों की मालिका में सम्मिलित होने के लिए ही जगदम्बा ने हमें बनाया होगा? फिर दोष किसको दें?'' रायप्पा महार ने जुलूस के समय अपना जीवन-पुष्प सम्भाजी महाराज के चरणों में चढ़ा दिया था। उसकी बौखलाहट का अनुमान करके उसके भाई देवप्पा ने महारानी की चिट्ठी अपने पास रख ली थी। संयोग से देवप्पा और मियाँखान की भेंट हो गयी। परिणामस्वरूप चिट्ठी और देवप्पा दोनों सही जगह पर पहुँच गये। उस दिन अमलदार की हैसियत से मियाँखान बन्दीखाने में रात को गया। उसके सहयोगी कर्मचारी साथ थे। अन्दर जाकर उन्होंने कैदखाने का दरवाजा बन्द कर लिया। हजारों फौजियों के कड़े पहरे के बावजूद मियाँखान की सहायता से येसू महारानी का पत्र सम्भाजी राजा तक पहुँच गया। अपनी प्रिय रानी के अक्षरों को पढ़ते समय सम्भाजी की आँखें भर आयीं। महारानी ने लिखा था— "महाराज, चिन्ता न करें। हमने बड़े पैमाने पर फौज एकत्र करना आरम्भ कर 722 :: सम्भाजी
दिया है। बादशाह के बहादुरगढ़ पर आक्रमण करके युद्ध करने की तैयारी हम कर रहे हैं। औरंगजेब जैसे मगरमच्छ के मुँह में से आपको निकाले बिना हम कैसे शान्त बैठ सकते हैं?'' आगे जो लिखा था उसे पढ़कर महाराज का कलेजा काँप गया। महारानी ने लिखा था, "महाराज, आपके बन्दीखाने का रास्ता मेरे मायके से होकर गया है, यह हमारा दुर्भाग्य है। महाराज, आप अपनी येसू को माफ कर दें।" राजा बहुत समय तक चिन्तन-मनन करते रहे। मियाँखान अपने साथ दो बीजापुरी ब्राह्मणों को वेष बदलकर ले आया था। ये दोनों बहुत बुद्धिमान थे। उनसे महाराज ने कहा, "हम जो कुछ कह रहे हैं उसे बहुत सँभालकर कान में रखो। यहाँ से बाहर जाने के बाद सावधानी से उसे स्मरण करो और जो कुछ मैंने जिस रूप में कहा है उसे उसी रूप में रायगढ़ भेज दो। समाचार के साथ प्रमाण के लिए मैं अपनी अँगूठी दे रहा हूँ। इससे समाचार इच्छित स्थान पर पहुँच जाएगा।" महाराज ने बोलना आरम्भ किया— "येसूरानी! मन दुखी मत हो। जो समय हमारे सामने आया है वह किसी भी व्यक्ति की गति को रोक सकता है? यह मस्तिष्क को बेचैन कर देने वाला समय है। किन्तु समय अभी समाप्त नहीं हुआ है। हमें आशा है कि मुसीबतें अभी भी टल सकती हैं। किन्तु येसूरानी, अपने मायके वालों को व्यर्थ में दोष मत दो।" आगे का वाक्य बोलते हुए सम्भाजी राजा बहुत बेचैन हो गये। "गणोजी की हरामखोरी के लिए अपने शिर्केकुल को भी दोष न दो। हम रायगढ़ पर सत्ता ग्रहण करने जा रहे थे तब हमारे साथ आपके पिता पिलाजीराव पहाड़ बनकर खड़े थे। महाराष्ट्र की सबसे कार्यकुशल महारानी के रूप में जिस येसूबाई ने सात-आठ वर्षों तक रायगढ़ का कार्यभार सँभाला, उसे जन्म देने वाले कुल को कौन बुरा कह सकता है? येसूरानी, कुल बुरे नहीं होते। यह तो इनसान है जो इतना दगाबाज, समझ में न आने वाला और अकल्पनीय होता है। मिट्टी में कीड़े तो रहेंगे ही और भव्य महलों में भी नाले तो होते ही हैं। आप इसी तरह हिम्मत से खड़ी रहें। हमारी ओर से अगला संकेत मिलने तक सह्याद्रि में बने अपने अजेय किलों को खोना मत।" "मेरी चिन्ता में आपका हृदय विदीर्ण हो गया होगा। किन्तु मेरी चिन्ता रंचमात्र न करें। हमारे पूज्य पिताजी ने महाराष्ट्र के माथे पर अपना चिह्न गोदवाया है। उसे सुरक्षित रखने के लिए यदि आवश्यक हो तो अपनी माँग का सिन्दूर पुछाने के लिए भी आप तैयार रहना। किसी भी स्थिति में अपने किलों का अधिकार शत्रु के हाथ में न जाने पाए।" सम्भाजी :: 723
आठ जब कैदखाने के लिए दुर्गाबाई, राणूबाई और दस वर्ष की राजकुमारी कमलजा निकलीं तो अपने प्रिय व्यक्ति से मिलने की उत्सुकता में वे विकल हो गयी थीं। उनका मन स्थिर नहीं था। एक दशक के सुदीर्घ विरह और असह्य दूरी निश्चित रूप से भयंकर थी। पिछली रात मियाँखान ने दुर्गाबाई से कहा था, "लगता है दुष्ट बादशाह का पत्थर दिल पिघल जाएगा और आप अपने प्रिय सम्भाजी से मिल सकेंगी। इसके बाद तीनों को पूरी रात नींद नहीं आयी।" आज वे तीनों बड़ी उमंग से निकली थीं। बन्दीखाने के आसपास पाँच हजार पहरेदार अपनी नंगी तलवारें नचाते हुए बड़ी सावधानी से पहरा दे रहे थे। घासफूस से बनाया गया बन्दीखाना बहुत गन्दा था। जंगल में खुले हाथियों को बाँधने के लिए भी ऐसा कैदखाना किसी ने नहीं बनाया था। उन तीनों को नदी के किनारे की ओर से वहाँ ले जाया गया। वहाँ की गन्दगी देखकर वे तीनों भौंचक रह गयीं। धड़कते दिल से वे तीनों मामने देखने लगीं। सामने जमीन पर मटमैला-सा फटा-पुराना कपड़ा बिछाया गया था। यह नहीं मालूम पड़ रहा था कि चीथड़ा मिट्टी पर है या मिट्टी चीथड़े पर। उस चीथड़े की तरह ही सूखे हुए, बहुत थके हारे सम्भाजी राजा और कवि कलश बाँस की दीवार के सहारे बैठे थे। वे लगभग अचेत अवस्था में दिखाई पड़ रहे थे। राजा के शरीर के कपड़े फटे हुए और उनका रंग उड़ गया था। हाथ-पैर जंजीरों से बँधे थे। जुलूस, यातनापृर्ण समय, हाथ-पैर में लगे घाव, ऊँट की नंगी पीठ पर बैठने के कारण कमर की छिली चमड़ी, शरीर पर जगह-जगह जमे खून, काले नीले दाग आदि शरीर पर यातना के चिह्न की तरह दिखाई पड़ रहे थे। वे दोनों अचेतावस्था में अधमरे से पड़े थे। वहाँ अँधेरे के साथ बदबू भी बहुत थी। राणूबाई को हीरे-मोती की मालाओं से सजाए गये घोड़े पर बैठकर, रायगढ़ पर चलने वाले अपने छोटे भाई का स्मरण हो आया। आज उसी राजकुमार को 'इस अवस्था में देखकर उनके पेट में भय का गोला घूमने लगा। जैसे नदी की ऊँची कछार पर गाय का बच्चा अटक जाये और दूसरी ओर कछार पर अटकी गाय चिल्लाए, उसी तरह राणूबाई जोर से चीखीं, "शम्भूऽऽ, बाल राजाऽऽ...शम्भुराजाऽऽ।" राजा के कानों पर यह मीठा स्वर दस वर्ष बाद पड़ा था। अपनी बहन की उस 724 :: सम्भाजी
व्याकुल तड़प को सुनकर सम्भाजी झट से उठकर खड़े हो गये। क्षणभर के लिए उनके शरीर के घाव और उनसे उठने वाली पीड़ा लुप्त हो गयी। शरीर से बँधी जंजीर बजी और सम्भाजी आगे दौड़े। उन्होंने राणू दीदी को बाँहों में भर लिया। रायगढ़ के राजकुमार, शिवाजी महाराज के पुत्र और अपने सुहाग को भिखारी से भी बदतर अवस्था में देखकर दुर्गाबाई का धैर्य छूट गया। उन्होंने राजा के थके हुए मांस के गोले जैसे शरीर को अपनी बाँहों में भर लिया। वे दहाड़ें मार-मारकर चिल्लाने लगी, "महाराजऽऽ महाराजऽऽ। दस वर्ष की कमलजा आजतक मराठों के राजा, अपने पिता की शौर्य गाथाएँ सुनती आ रही थी। अपने पिता पर आये इस वज्रघाती प्रहार और दुर्भाग्य की दारुण दशा को देखकर वह टूट गयी थी। राजा के शरीर का जो भी हिस्सा उसकी पकड़ में आया उसी से लिपटकर वह भी रोने लगी। वह भी चिल्लाने लगी, "पिताजीऽऽ, पिताजीऽऽ!" जिस प्रकार तेज तूफान आने पर बकुल वृक्ष के सर्वांग से पुष्प झरने लगते हैं, उसी प्रकार इन चारों का अविरल अश्रुपात हो रहा था। दुख की इस वर्षा ने सभी को भिगो दिया। राणूजीजी और दुर्गाबाई को अभी भी रोना आ रहा था। सम्भाजी ने कहा, "राणू दीदी ! कितना बुरा समय है यह ? इस दुर्भाग्य ने हमें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। नहीं तो राणू दी औरंगजेब की चमड़ी उतारकर उसमें भूसा भरने, उसके मांस को गिद्धों के सामने फेंकने और मनुष्य के साथ भगवान को भी मुक्त करने का हमारा पक्का संकल्प था।" "शम्भुराजा, क्या कहूँ कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। एक न एक दिन यह दुष्ट समय समाप्त हो जाएगा, हम रायगढ़ वापस आएँगे और अपने भाई को स्वर्ण सिंहासन पर बैठा हुआ देखेंगे। हमने यही एक सपना मन में पाल रखा था। इसी नशे में दस वर्षों का सुदीर्घ कारावास हमने आराम से काट लिया।" राजा के नेत्र भीग गये। वे व्याकुल होकर बोले, "क्षमा करें दीदीजी और दुर्गा रानी ! आपलोगों के लिए हम कुछ भी नहीं कर सके।" "ऐसा न कहें शम्भुराजा, बहुत लड़े आप; उस पापी औरंगजेब पर आप भरे बादल की तरह फट पड़े।" राणूबाई ने कहा। "हम राजबन्दिनी महिलाएँ होते हुए भी यहाँ की तेज गतिविधियों से हवा के रुख को समझती थीं।" दुर्गाबाई ने कहा। "इतना ही नहीं, औरंगजेब की फौज के साथ घूमते समय हमारी और कान खुले ही थे। पिछले सात-आठ वर्षों में मुगलों के आदमी ही नहीं जानवर भी आपकी दहशत से डर के मारे सहम जाते थे। आसमान में तारे भी चमकते तो बादशाह के जानवरों को तारों की जगह भाले और बर्छियाँ दिखाई देती थीं।" सम्भाजी :: 725
शम्भूराजा ने अपने हृदय की गहन वेदना को व्यक्त करते हुए कहा, "दुर्गा, राणूदीदी और बेटी कमलजा, आप तीनों को स्वराज्य में वापस ले आने के लिए हमने जान की बाजी लगा दी थी। बहुत बार अहमदनगर किले के आसपास हमारी दस-दस, बीस-बीस हजार की फौजें चक्कर काटकर आयी, हंबीरमामा ने भी बड़ी कोशिश की। अन्त में किले की खाई की बगल से एक सुरंग बनाने की गुप्त योजना हमने तैयार की। किन्तु शत्रु को खतरे की भनक लग गयी। उसने आपलोगों को बहादुरगढ़ भेज दिया। ईश्वर ने और भाग्य ने साथ दिया होता तो दो महीनों में आपलोग राजधानी पहुँच गये होते। उस समय हम स्वयं को कितना भाग्यवान समझते ?" कितनी बातें करें ? क्या बातें करें? सभी की स्थिति वर्षा में भीगी बेल की भाँति हो गयी थी। अपने पिता के फटे कपड़ों, आधे-अधूरे बढ़े सिर और दाढ़ी के बाल देखकर कमलजा घबरा गयी थी। किन्तु पिता की आँखों में तेज देखकर उसका मन गर्व से खिल उठा। महाराज ने कमलजा को अपने पास बुलाया। अपने जख्मी हाथों से पकड़कर बड़े प्यार से चूमा। उन्होंने अपनी बेटी को बाँहों में भर लिया और सीने से चिपका लिया। वे बड़े अधीर स्वर में बोले, "बेटी, कितनी बड़ी हो गयी तुम? यदि हम रायगढ़ पर होते तो हम अपनी लाड़ली बेटी का किसी राजकुमार के साथ बड़े ठाट बाट से विवाह किया होता ? मंगल अक्षतों के साथ गढ़ पर तोपों की गड़गड़ाहट हुई होती।" राणू दीदी ने सम्भाजी राजा के बालों में अपनी उँगलियाँ घुमाईं। वहाँ भी आधे-अधूरे बढ़े बालों में घावों के निशान दिखे। वे सान्त्वना के स्वर में बोलीं, "शम्भूराजा धीरज रखो। ये दिन भी कट जाएँगे।" "दीदीजी! समय ने इतने कठोर तमाचे हमें ही मारे ? यह कैसी घात करने वाला समय आया है। यह कितना मनहूस समय है ? अपनी इस बिटिया को इससे पहले हमने कभी देखा ही नहीं। आज पहली बार उसे सीने से लगाकर हृदय आनन्दित हो गया। किन्तु यह भी कैसा दुर्भाग्य ? दुनिया के इतिहास में होगा कोई ऐसा राजा जो अपनी प्यारी बेटी को दस वर्ष के बाद मिल पाया हो ? अपनी राजकन्या के साथ दस वर्ष बाद मिलना और वह भी फिर कभी न मिलने के लिए।" सम्भाजी की बात सुनकर सभी का कलेजा दहल गया। इतने में ही पहरेदार दुलारसिंह यमदूत की तरह अन्दर झाँका। गला साफ करके ऊँची आवाज में बोलने लगा, "जल्दी करो! आपलोगों के लिए समय बहुत कम है।" पहरेदार के शब्दों में दुष्टकाल का चेहरा दिखाई पड़ने लगा। उस लोकोत्तर मिलन में पलभर के लिए 726 :: सम्भाजी
अद्भुत सुख की अनुभूति हुई। सम्भाजी राजा दुर्गाबाई का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोले, "दुर्गा, एक स्त्री के रूप में, एक पत्नी के रूप में या एक इनसान के रूप में हम आपके लिए कुछ भी नहीं कर सके।" "महाराज, हमारे हिस्से में जो आया वह भी मेरे लिए बहुत था। शिवाजी महाराज की पुत्रवधू और सम्भाजी राजा की पत्नी होने पर जो आदर मुझे मिला, क्या वह कम है?" राणूदीदी कुछ आगे सरक आयीं और हड़बड़ी में पूछा, "क्या-क्या चाहिए उस दुष्ट राक्षस को?" "राणू दीदी! दुर्गा! बादशाह ने अनेक बार सन्देशा भेजा है कि वह आपलोगों के साथ मुझे भी छोड़ने को तैयार है।" "किन्तु इसके बदले में?" राणू दीदी और दुर्गाबाई ने एक साथ पूछा। "हमें अपने स्वराज्य के सारे किलेदारों को यहाँ बुलाकर, सभी किलों की चाभियाँ और उनकी हुकूमत बादशाह को सौंपनी होगी। हमें अपना यह मुल्क छोड़कर जाना होगा। हिन्दुस्तान के किसी दूसरे हिस्से में बादशाह हमें कोई खास जागीर देकर जिन्दगी भर के लिए ऐशो-आराम की सुविधा कर देगा। ऐसा आश्वासन वह मुझे दे रहा है।" "नहींऽऽ नहींऽऽ, बिलकुल नहीं, अपनी जान चली जाये तो भी अपना एक भी किला उसे मत दो।" दुर्गाबाई चिल्लाई। "अपने पिताजी की आन से पीछे न हटना।" राणू दीदी बोलीं। शम्भुराजा खिन्न मन से हँसते हुए बोले, "दुर्गारानी बादशाह की मेहरबानी से कितने दिनों के बाद हम मिल रहे हैं। उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें प्रसन्न करेंगे तो अपनी जान छूट जाएगी। अपने सुहाग की जिन्दगी काट सकेंगी आप।" दुर्गाबाई जोर से रो पड़ीं। रोते हुए व्याकुलता से उन्होंने सम्भाजी से कहा, "नहींऽऽ महाराज विनोद में भी ऐसा न कहें। हमारे पूज्य ससुर शिवाजी महाराज के स्वप्न और लक्ष्य के सामने मेरे सुहाग की क्या कीमत है? वैसे भी महाराज पिछले दस-बारह सालों में विधवा की जिन्दगी जीने की आदत पड़ गयी है। बची-खुची जिन्दगी भी काट लेंगे।" "सच है शम्भू बेटा। हमारी जान रहे या चली जाए, हमारी जान के मोह में ऐसा कोई समझौता न करना जिससे पिताजी के सम्मान को धक्का लगे।" राणू दीदी ने बड़ी गम्भीरता से कहा। इसी समय पहरेदार दरवाजे पर लकड़ी से ठोकने लगा। इस तरह समय समाप्त होने का संकेत देने लगा। वियोग की कल्पना से ही सभी का कलेजा हिल सम्भाजी 727
गया। राणूदीदी, सम्भाजी राजा, दुर्गाबाई और कमलजा ने एक दूसरे को बाँहों में भर लिया। आवेग से व्याकुल एक दूसरे को चूमने लगे। 'पिताजीऽऽ पिताजीऽऽ' कहकर रोने वाली कमलजा के बरसते हुए आँसुओं को सम्भाजी राजा ने देखा। प्यार से विह्वल उन चार प्राणियों ने चूमते हुए एक-दूसरे के आँसू पी लिए। वे तीनों आँसूभरी आँखों से सम्भाजी राजा को देखते हुए धीमी गति से पीछे जाने लगे। इतने में एक कोने से कवि कलश की आवाज आयी, “राणू दीदीऽ।” उस आवाज को सुनते ही राणू दीदी चौंक गयीं। कविराज की ओर तेजी से गयीं और व्याकुल होकर बोलीं, “कविराज दुख में, सुख में और मौत के दरवाजे पर भी आपने हमारे प्यारे शम्भुराजा का साथ निभाया। अगले जन्म में हमारे शम्भुराजा के मित्र बनकर, नहीं तो हमारे सगे भाई बन जन्म लीजिएगा।” दुर्गाबाई और कमलजा ने कवि कलश के चरणों के दर्शन किये। कविराज का गला भर आया। वे गदगद होकर बोले, “दुर्गा भाभीऽ, राणूदीदी सह्याद्रि घाटियों और पहाड़ों में अभी भी औरंगजेब के विरुद्ध लड़ने वालों को हमारा यह सन्देश भेज दीजिएगा- फाँसी की फाँस गले से लगाय चले हम मौज की चाल सदाही जानि परै अजहूँ पग के तल लोहे की तेज सतेज गड़ाहीं लोभ नहीं जिनगी का कभी था पै हाथ पे होती जो हाथ खड़ग दुधारी साथ तुम्हारे महार ण में लड़ता नितही बन वीर जुझारी। " नौ उजाला हो गया किन्तु सूर्य कहाँ है? सम्भाजी हाथ लग गया किन्तु मराठों का प्रदेश क़ब्ज़े में कहाँ आया ? औरंगजेब की स्थिति विचित्र हो गयी थी। प्लेग के कारण औरंगाबादी महल उसे छोड़कर चली गयी थी। इसलिए वह कुछ बेचैन हो गया था। एक ओर जहाँ सम्भाजी के कैद करने की उसे प्रसन्नता थी वहीं दूसरी ओर शहजादा मुअज्जम को कैदखाने में बन्दी बनाना पड़ा था। शहजादा अकबर जैसा प्रिय शहजादा हमेशा के लिए उसे छोड़कर चला गया था। ईरान के बादशाह की 728 :: सम्भाजी
सहायता लेकर वह हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था। जुल्फिकारखान और शहजादा आजम सह्याद्रि की घाटियों में पहुँच अवश्य गये थे। किन्तु उनकी सफलता का कोई समाचार मिल नहीं रहा था। भाग्य ने औरंगजेब को बेहाल कर दिया था। रात को खाना खाते समय औरंगजेब बिना भूले बेगम उदयपुरी और शहजादी जीनतउर्न्निसा को अपने पास बुला लेता था। उनसे अपने मन की बात कहने में उसे हल्कापन महसूस होता था। आज बादशाह की मुद्रा कुछ ठीक नहीं दिखाई दे रही थी। उसने चिढ़े हुए स्वर में अपनी शहजादी से कहा, "जीनत, हमारे कर्मचारियों ने बहुत कोशिश की, किन्तु वह निकम्मा काफिरबच्चा तो एकदम उल्टी खोपड़ी का निकला।" "क्यूँ अब्बाजान?" "वह पत्थर जरा भी नहीं पिघलता। खुफिया लोगों से पता चला है कि सम्भा की औरत, बहन और बेटी भी बहुत जिद्दी और घमंडी हैं। ये सबकी सब फाँसी के तख्ते पर चढ़ने को तैयार हैं किन्तु समझौता नहीं करना चाहतीं।" "अब्बाजान धीरज रखिए सब कुछ ठीक हो जाएगा।" "नहीं बेटी, सम्भा तो शैतान ही है। अपनी आँखों की कोर में उस जहन्नमी के लिए जरा भी रहम रखने की भूल मत करो।" बादशाह के कान बाहर भी लगे थे। पिछले दिन से शहाबुद्दीनखान बे लगाम होकर बोल रहा था। बादशाह उसे किसी प्रकार समझाने की बात सोच रहा था। तोला माशा का सन्तुलन रखने वाली बेगम उदयपुरी कुछ दूरी पर थीं। उन्होंने बादशाह और शहजादी के संवाद में भाग नहीं लिया था। इसी बीच कुछ खुफिया और दासियाँ बाहर से आयीं। उनसे खड़े खड़े बात करके बेगम उदयपुरी अन्दर आयीं। उस समय उनकी मुखमुद्रा क्रोध से लाल हो गयी थी। बेगम उदयपुरी क्रोधावेश में बादशाह के सामने आकर खड़ी हो गयीं। बादशाह की आँखों में आँखें डालकर बेगम बोली, "बादशाह सलामत! आदमी की जोर जबरदस्ती की कोई सीमा होती है कि नहीं? एक समय दारा जैसे पवित्र और जिन्दादिल शहजादे के साथ मेरी शादी हुई थी। उसका कत्ल करके और सिंहासन से हटाकर आपने मुझे छीन लिया। तख्त तो लकड़ी का था वह बेचारा क्या करता? किन्तु मेरी भावनाओं की आपने कभी परवाह की? कभी नहीं, किन्तु वह सब कुछ चुपचाप पीकर मैं पूरी जिन्दगी बादशाह की इच्छानुसार जुर्मों की सेज सजाती रही। क्या मैंने कभी विरोध किया?" "खामोश बेगमऽ तुझे आज हो क्या गया है?" औरंगजेब भयंकर रूप से सन्तप्त होकर कभी उदयपुरी और कभी शहजादी की ओर देखने लगा। "सुनने दीजिए शहजादी को। वह कोई नासमझ बच्ची नहीं है। किन्तु सम्भाजी :: 729
हजरत, जिस व्यक्ति ने भरे बाजार में शौहर का कत्ल कर दिया हो, उसकी सेज सजाते हुए जिन्दगी भर जुर्म सहने के लिए बहुत बड़े साहस की जरूरत होती है। किन्तु अब उसकी भी हद हो गयी है।" "लेकिन बेगम, ऐसा क्या हो गया?" "आपका कुत्ता शहाबुद्दीनखान, जो जिन्दगी भर बड़ी-बड़ी बातें करता रहा किन्तु सम्भाजी दाहिनी ओर से आता है ऐसा सुनकर बाई ओर भागने वाला चूहा। उसकी इतनी मजाल?" "क्या हुआ? बताओ तो सही—" बादशाह ने चिल्लाते हुए पूछा। "उस बुड्ढे शहाबुद्दीनखान ने आज सम्भा के पास सन्देश भेजा है—अपने किलों की चाभियाँ और कब्जे दे दो, नहीं तो भरे बाजार में तुम्हारी औरत पर नौकरों और गुलामों के लड़के छोड़े जाएँगे। उसकी इज्जत लूटी जाएगी।" "बस इतना ही? मुझे तो लगा आपके सिर पर आसमान ही गिर गया था।" बादशाह शान्त होकर नीचे बैठ गया। किन्तु उदयपुरी के क्रोध का पारा ऊपर चढ़ता गया। शहजादी क्रोध से काँपने लगी। उन दोनों को समझाते हुए बादशाह ने कहा, "कितनी चिन्ता करती हो? इतनी बहस करने का क्या कारण है? क्या कुत्ता और क्या कैदी? दोनों बराबर ही होते हैं।" अब तक उदयपुरी का क्रोध अपनी सीमा पर पहुँच गया था। वे बादशाह के सामने बैठ गयीं। वे जिन्दगी में पहली बार बादशाह से विवाद कर रही थीं। "वह दुर्गा—वह राणू केवल सम्भाजी की पत्नी और बहन नहीं हैं, वे शिवाजी की पुत्रवधू और बेटी हैं। शिवाजी ने जिन्दगी भर दंगाफसाद और खूनखराबा किया परन्तु किसी मुसलमान बहू-बेटी का स्पर्श नहीं किया। उनकी मृत्यु के पश्चात् स्वयं आपने शिवाजी की इस विशेषता की तारीफ की थी। वह सम्भा बड़ा बदमिजाज है, इश्कबाज है, दारूबाज हैं, इसकी साक्ष्य मराठों के बड़े-बड़े पंडित दे रहे हैं, किन्तु किसी मुसलमान ने ऐसी शिकायत कभी भी नहीं की। इसके विपरीत हर मुसलमान माँ-बहन को सम्भा ने अपने पिता की भाँति ही हमेशा इज्जत दी।" महिलाओं के इस आक्रमण से बादशाह सकपका गया। उसने तत्काल शहाबुद्दीन को सन्देशा भेजा कि वह अपनी अकल ठिकाने रखे। इससे बुड्ढा शहाबुद्दीन ठिकाने पर आ गया। दिन बीत रहे थे। महाड़ से जुल्फिकार पत्र पर पत्र भेज रहा था। आज अशनी सेना बिखाड़ी तक पहुँच गयी। कल अवचितगढ़ तक पहुँच जाएँगे। किले की तलहटी में घेरा डाल दिया है। इन पत्रों को पढ़कर बादशाह असदखान पर भड़कता था, "आपका बेटा मुझे नक्शा पढ़ने का तरीका सिखा रहा है क्या?" 730 :: सम्भाजी