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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| १५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कार्यस्तस्य सुखोपायः कर्तव्यं सुखसाधनम्।<br>तस्यारातिः स विज्ञेयः सुखविघ्नं करोति यः॥ ४३<br><br>सुखोत्पादयिता मित्रं रागयुक्तस्य सर्वदा।<br>चतुरो नैव मुह्येत मूर्खः सर्वत्र मुह्यति॥ ४४अतः जैसे सुख प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना चाहिये और सुखके साधनका संग्रह करना चाहिये। जो उस सुखमें विघ्न डाले, उसे शत्रु समझना चाहिये। जो रागी पुरुषके सुखको सर्वदा बढ़ाये, वही मित्र है। चतुर मनुष्य मोहमें फँसता नहीं है; किंतु मूर्ख सर्वत्र आसक्त रहता है॥ ४३-४४॥
विरक्तस्यात्मरक्तस्य सुखमेकान्तसेवनम्।<br>आत्मानुचिन्तनं चैव वेदान्तस्य च चिन्तनम्॥ ४५<br><br>दुःखं तदेतत्सर्वं हि संसारकथनादिकम्।<br>शत्रवो बहवस्तस्य विज्ञस्य शुभमिच्छतः॥ ४६<br><br>कामः क्रोधः प्रमादश्च शत्रवो विविधाः स्मृताः।<br>बन्धुः सन्तोष एवास्य नान्योऽस्ति भुवनत्रये॥ ४७विरागी तथा आत्माराम पुरुषको एकान्तवास, आत्म-चिन्तन तथा वेदान्तशास्त्रका अनुशीलन करनेसे ही सुख होता है। सांसारिक विषयोंकी चर्चा आदि—यह सब उनके लिये दुःखरूप है। कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषके लिये बहुत शत्रु हैं; काम, क्रोध, प्रमाद आदि अनेक प्रकारके शत्रु बताये गये हैं; किंतु व्यक्तिका सच्चा बन्धु तो एकमात्र सन्तोष ही है; तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी नहीं है॥ ४५-४७॥
सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मत्वा तं ज्ञानिनं द्विजम्।<br>क्षत्ता प्रवेशयामास कक्षां चातिमनोरमाम्॥ ४८**सूतजी बोले—**शुकदेवजीकी बात सुनकर उन्हें ज्ञानी द्विज समझकर उसने शुकदेवजीको एक अत्यन्त रमणीय कक्षसे प्रवेश कराया॥ ४८॥
नगरं वीक्षमाणः संस्त्रैविध्यजनसङ्कुलम्।<br>नानाविपणिद्रव्याढ्यं क्रयविक्रयकारकम्॥ ४९<br><br>रागद्वेषयुतं कामलोभमोहाकुलं तथा।<br>विवदत्सजनाकीर्णं वसुपूर्णं महत्तरम्॥ ५०<br><br>पश्यन्स त्रिविधाँल्लोकान्प्रासरद् राजमन्दिरम्।<br>प्राप्तः परमतेजस्वी द्वितीय इव भास्करः॥ ५१<br><br>निवारितश्च तत्रैव प्रतीहारेण काष्ठवत्।<br>तत्रैव च स्थितो द्वारि मोक्षमेवानुचिन्तयन्॥ ५२तीन प्रकारके नागरिकजनोंसे भरे हुए; अनेक प्रकारके क्रय-विक्रयकी वस्तुओंसे सजी दूकानोंवाले; राग-द्वेष, काम, लोभ, मोहसे युक्त एवं परस्पर वाद-विवादमें संलग्न श्रेष्ठीजनोंसे सुशोभित और धन-धान्यसे परिपूर्ण विशाल नगरको देखते हुए शुकदेवजी चले। इस तरह तीन प्रकारके लोगोंको देखते हुए शुकदेवजी राजभवनकी ओर बढ़े। इस प्रकार द्वितीय सूर्यके समान परम तेजस्वी शुकदेवजी द्वारपर पहुँचे; द्वारपालने उन्हें अन्दर जानेसे रोका। तब वे काष्ठके समान वहीं द्वारपर खड़े हो गये और मोक्षसम्बन्धी विषयपर विचार करने लगे॥ ४९-५२॥
छायायामातपे चैव समदर्शी महातपाः।<br>ध्यानं कृत्वा तथैकान्ते स्थितः स्थाणुरिवाचलः॥ ५३धूप तथा छायाको समान-समझनेवाले महातपस्वी शुकदेवजी वहाँ एकान्तमें ध्यान करके इस प्रकार खड़े रहे मानो कोई अचल स्तम्भ हो॥ ५३॥
तं मुहूर्तादुपागत्य राज्ञोऽमात्यः कृताञ्जलिः।<br>प्रावेशयत्ततः कक्षां द्वितीयां राजवेश्मनः॥ ५४थोड़ी देर बाद राजमन्त्रीने हाथ जोड़े हुए स्वयं आकर उन्हें राजभवनके दूसरे कक्षमें प्रवेश कराया॥ ५४॥
अ० १७ ]प्रथम स्कन्ध१५९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र दिव्यं मनोरम्यं पुष्पितं दिव्यपादपम्।<br>तद्वनं दर्शयित्वा तु कृत्वा चातिथिसत्क्रियाम्॥ ५५<br><br>वारमुख्याः स्त्रियस्तत्र राजसेवापरायणाः।<br>गीतवादित्रकुशलाः कामशास्त्रविशारदाः॥ ५६<br><br>ता आदिश्य च सेवार्थं शुकस्य मन्त्रिसत्तमः।<br>निर्गतः सदनात्तस्माद्व्यासपुत्रः स्थितस्तदा॥ ५७<br><br>पूजितः परया भक्त्या ताभिः स्त्रीभिर्यथाविधि।<br>देशकालोपपन्नेन नानानेनाति तोषितः॥ ५८वहाँ एक दिव्य रमणीय उपवन था, जिसमें विविध प्रकारके पुष्पोंसे लदे दिव्य वृक्ष सुशोभित हो रहे थे। उस वनको दिखाकर मन्त्रीने उनका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया। वहाँ राजाकी सेवा करनेवाली अनेक वारांगनाएँ थीं, वे नृत्य-गानमें कुशल तथा कामशास्त्रमें निपुण थीं। शुकदेवजीकी सेवाके लिये उन्हें आदेश देकर राजमन्त्री उस भवनसे निकल गये और शुकदेवजी वहीं स्थित रहे। उन वारांगनाओंने परम भक्तिके साथ उनकी पूजा की और देशकालानुसार उपलब्ध अनेक प्रकारके भोजनसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ५५–५८॥
ततोऽन्तःपुरवासिन्यस्तस्यान्तःपुरकाननम् ।<br>रम्यं संदर्शयामासुरङ्गनाः काममोहिताः॥ ५९<br><br>स युवा रूपवान्कान्तो मृदुभाषी मनोरमः।<br>दृष्ट्वा ता मुमुहुः सर्वास्तं च काममिवापरम्॥ ६०तत्पश्चात् अन्तःपुरनिवासिनी कामिनी स्त्रियोंने उन्हें अन्तःपुरका वन दिखाया, जो अत्यन्त रमणीय था। वे युवा, रूपवान्, कान्तिमान्, मृदुभाषी एवं मनोरम थे। दूसरे कामदेवके समान उन शुकदेवजीको देखकर वे सभी मुग्ध हो गयीं॥ ५९–६०॥
जितेन्द्रियं मुनिं मत्वा सर्वाः पर्यचरंस्तदा।<br>आरणेयस्तु शुद्धात्मा मातृभावमकल्पयत्॥ ६१मुनिको जितेन्द्रिय जानकर वे सब उनकी परिचर्या करने लगीं। अरणिनन्दन शुद्धात्मा शुकदेवजीने उन्हें माताके समान समझा॥ ६१॥
आत्मारामो जितक्रोधो न हृष्यति न तप्यति।<br>पश्यंस्तासां विकारांश्च स्वस्थ एव स तस्थिवान्॥ ६२वे आत्माराम तथा क्रोधको जीतनेवाले शुकदेवजी न हर्षित होते थे और न दुःखी। उनकी चेष्टाओंको देखकर भी वे शान्तचित्त होकर स्थित रहे॥ ६२॥
तस्मै शय्यां सुरम्यां च ददुर्नार्यः सुसंस्कृताम्।<br>परार्ध्यास्तरणोपेतां नानोपस्करसंवृताम्॥ ६३<br><br>स कृत्वा पादशौचं च कुशपाणिरतन्द्रितः।<br>उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां ध्यानमेवान्वपद्यत॥ ६४तब उन स्त्रियोंने उनके लिये सुरम्य, कोमल तथा बहुमूल्य आस्तरण और नानाविध उपकरणोंसे सुसज्जित शय्या बिछायी। शुकदेवजी हाथ-पाँव धोकर हाथमें कुश लेकर सावधान हो सायंकालीन सन्ध्योपासन सम्पन्न करके भगवान्के ध्यानमें लग गये॥ ६३–६४॥
याममेकं स्थितो ध्याने सुष्वाप तदनन्तरम्।<br>सुप्त्वा यामद्वयं तत्र चोदतिष्ठत्ततः शुकः॥ ६५<br><br>पाश्चात्यं यामिनीयामं ध्यानमेवान्वपद्यत।<br>स्नात्वा प्रातःक्रियाः कृत्वा पुनरास्ते समाहितः॥ ६६इस प्रकार एक प्रहरतक ध्यानावस्थित होकर वे शयन करने लगे। दो प्रहर शयन करके पुनः वे शुकदेवजी उठ गये। रात्रिके चौथे प्रहरमें वे पुनः ध्यानमें स्थित रहे; तदनन्तर स्नान करके प्रातःकालीन क्रियाएँ सम्पन्न करके पुनः समाधिस्थ हो गये॥ ६५–६६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
शुकस्य राजमन्दिरप्रवेशवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥

१६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८

अथाष्टादशोऽध्यायः

शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश

सूत उवाचसूतजी बोले—
श्रुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।<br>पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात्॥ १शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये॥ १॥
कृत्वार्हणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम्।<br>पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम्॥ २महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा॥ २॥
स च तां नृपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।<br>पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम्॥ ३शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी कुशल-मंगल पूछा॥ ३॥
कृत्वा कुशलसंप्रश्नमुपविष्टं सुखासने।<br>शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः॥ ४<br>किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति।<br>जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्यं तन्मुनिसत्तम॥ ५इस प्रकार कुशल-प्रश्न करके सुखदायी आसनपर बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज जनकने पूछा—हे महाभाग! मेरे यहाँ आप निःस्पृहका आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रेष्ठ! उस प्रयोजन को बताइये?॥ ४-५॥
शुक उवाचशुकदेवजी बोले—
व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम्।<br>सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः॥ ६<br>मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्वा बन्धं गुरोरपि।<br>न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः॥ ७महाराज! मेरे पिता व्यासजीने मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही श्रेष्ठ है। गुरुरूप पिताकी आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया॥ ६-७॥
इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः।<br>उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः॥ ८<br>याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः।<br>विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम्॥ ९इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्तवाला समझकर मुनिश्रेष्ठ व्यासने तथ्ययुक्त वचन कहा—तुम मिथिला चले जाओ, खेद न करो। वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं, वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं। संसारमें विदेह नामसे विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं॥ ८-९॥
कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते।<br>त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप॥ १०हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी मायाके जालमें नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो?॥ १०॥
पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम्।<br>कुरु दारान्महाभाग पृच्छ वा भूपतिं च तम्॥ ११<br>सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत॥ १२उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें उठते हुए मोहका त्याग करो। हे महाभाग! विवाह करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो। वे राजा तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे। तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही मेरे पास चले आना॥ ११-१२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A

अ० १८ ]प्रथम स्कन्ध१६१

| सम्प्राप्तोऽहं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया।<br>मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ॥ १३<br><br>तपस्तीर्थव्रतेज्याश्च स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम्।<br>ज्ञानं वा वद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम्॥ १४ | हे महाराज! मैं उन्हींके आदेशसे आपकी पुरीमें आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये॥ १३॥<br>हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, तीर्थसेवन और ज्ञान—इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये॥ १४॥ | | जनक उवाच<br>शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत्।<br>उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ॥ १५<br><br>अधीत्य वेदवेदान्तान्दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः॥ १६<br><br>न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः।<br>अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवाक्शुचिः॥ १७<br><br>पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत्।<br>तपसा षड्रिपूञ्जित्वा भार्यां पुत्रे निवेश्य च॥ १८<br><br>सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित्।<br>वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे॥ १९<br><br>विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित्।<br>वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम॥ २० | **जनकजी बोले—**मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयनसंस्कारके बाद सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करनेहेतु गुरुके सांनिध्यमें रहना चाहिये। वहाँ वेद-वेदान्तोंका अध्ययन करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये। [गृहस्थाश्रममें रहते हुए] न्यायोपार्जित धनका अर्जन करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न रखे। पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और [मन, वचन, कर्मसे सदा] पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जानेपर [समयानुसार] वानप्रस्थ-आश्रममें रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा [काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य—इन] छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् वह धर्मात्मा सब अग्नियोंका अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय ले ले। विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है, अन्य किसीको नहीं—यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं—ऐसा मेरा मानना है॥ १५—२०॥ | | शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः।<br>चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः॥ २१<br><br>अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः।<br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम्॥ २२ | हे शुकदेवजी! वेदोंमें कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं। उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार महात्माओंने बताये हैं। मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रमसे ही [क्रमशः] दूसरे आश्रममें जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका आदेश है॥ २१-२२॥ | | शुक उवाच<br>उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे।<br>अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा॥ २३ | **शुकदेवजी बोले—**चित्तमें वैराग्य और ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवश्य ही गृहस्थादि आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनोंमें॥ २३॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A

१६२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
जनक उवाचजनकजी बोले—
इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद।<br>अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकंशः॥ २४हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं, वे वशमें नहीं रहतीं। वे अपरिपक्व बुद्धिवाले मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके विकार उत्पन्न कर देती हैं॥ २४॥
भोजनेच्छां सुखेच्छां च शय्येच्छामात्मजस्य च।<br>यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥ २५यदि मनुष्यके मनमें भोजनकी, शयनकी, सुखकी और पुत्रकी इच्छा बनी रहे तो वह संन्यासी होकर भी इन विकारोंके उपस्थित होनेपर क्या कर पायेगा?॥ २५॥
दुर्जयं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।<br>अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत्॥ २६वासनाओंका जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह शीघ्र नहीं मिटता। इसलिये उसकी शान्तिके लिये मनुष्यको क्रमसे उसका त्याग करना चाहिये॥ २६॥
ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।<br>परिव्रज्य परिभ्रष्टो न मार्गं लभते पुनः॥ २७ऊँचे स्थानपर सोनेवाला मनुष्य ही नीचे गिरता है, नीचे सोनेवाला कभी नहीं गिरता। यदि संन्यास-ग्रहण कर लेनेपर भ्रष्ट हो जाय तो पुनः वह कोई दूसरा मार्ग नहीं प्राप्त कर सकता॥ २७॥
यथा पिपीलिका मूलाच्छाखायामधिरोहति।<br>शनैः शनैः फलं याति सुखेन पदगामिनी॥ २८<br><br>विहङ्गमस्तरसा याति विघ्नशङ्कामुदस्य वै।<br>श्रान्तो भवति विश्रम्य सुखं याति पिपीलिका॥ २९जिस प्रकार चींटी वृक्षकी जड़से चढ़कर शाखापर चढ़ जाती है और वहाँसे फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक पैरोंसे चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-शंकाके भयसे कोई पक्षी बड़ी तीव्र गतिसे आसमानमें उड़ता है और [परिणामतः] थक जाता है, किंतु चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर [अपने अभीष्ट स्थानपर] पहुँच जाती है॥ २८-२९॥
मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।<br>अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥ ३०मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरुषोंके द्वारा सर्वथा अजेय है। इसलिये आश्रमोंके अनुक्रमसे ही इसे क्रमशः जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ३०॥
गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।<br>न च हृष्येन्न च तपेल्लाभालाभे समो भवेत्॥ ३१गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी जो शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभमें समान भाव रखता है॥ ३१॥
विहितं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।<br>आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संशयः॥ ३२जो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करता हुआ, सभी प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त रहता हुआ आत्मचिन्तनसे सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
पश्याहं राज्यसंस्थोऽपि जीवन्मुक्तो यथानघ।<br>विचरामि यथाकामं न मे किञ्चित्प्रजायते॥ ३३हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्य करता हुआ भी जीवन्मुक्त हूँ; मैं अपने इच्छानुसार सब काम करता हूँ, किंतु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नहीं होता॥ ३३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 B

अ० १८ ]प्रथम स्कन्ध१६३

| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ | | भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br> भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | |

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| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? | Wait, looking at line 1 left: भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥
कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥
आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ?
मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥
भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है।
न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥
शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४०आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥
शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥
जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥
अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥
विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C

Let's double-check the text on:

  • शुद्धो मुक्तः सदैवार्त्मा or सदैवात्मा? In the image: शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा (wait, let's look at सदैवार्त्मा - there is no repha, it is सदैवात्मा).
  • तस्मिञ्छान्ते - yes, तस्मिञ्छान्ते.
  • गम्योऽनुमानेन - yes.
  • यद्दृश्यमदृश्यं - yes.
  • ह्यस्मिन्सर्वं - yes.
  • सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् - yes.
  • विनातपं - yes.
  • विद्या चैतन्निवर्तनम् - yes.

All looks very accurate.| अ० १८ ] | प्रथम स्कन्ध | १६३ | | :--- | :---: | ---: |

| भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकResource? No: <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकresource? <br>भुञ्जानो विविधान्भोगान्कुर्वन्कार्याण्यनेकशः ।<br>भविष्यामि यथाऽहं त्वं तथा मुक्तो भवानघ ॥ ३४ | जिस प्रकार मैं अनेक भोगोंको भोगता हुआ तथा अनेक कार्योंको करता हुआ भी अनासक्त हूँ, उसी प्रकार हे अनघ ! आप भी मुक्त हो जाइये ॥ ३४ ॥ | | कथ्यते खलु यद्दृश्यमदृश्यं बध्यते कुतः ।<br>दृश्यानि पञ्चभूतानि गुणास्तेषां तथा पुनः ॥ ३५ | ऐसा कहा भी जाता है कि जो यह दृश्य जगत् दिखायी देता है, उसके द्वारा अदृश्य आत्मा कैसे बन्धनमें आ सकता है ? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये पंचमहाभूत और गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—ये उनके गुण दृश्य कहलाते हैं ॥ ३५ ॥ | | आत्मा गम्योऽनुमानेन प्रत्यक्षो न कदाचन ।<br>स कथं बध्यते ब्रह्मन्निर्विकारो निरञ्जनः ॥ ३६ | आत्मा अनुमानगम्य है और कभी भी प्रत्यक्ष नहीं होता। ऐसी स्थितिमें हे ब्रह्मन् ! वह निरंजन एवं निर्विकार आत्मा भला बन्धनमें कैसे पड़ सकता है ? | | मनस्तु सुखदुःखानां महतां कारणं द्विज ।<br>जाते तु निर्मले ह्यस्मिन्सर्वं भवति निर्मलम् ॥ ३७ | हे द्विज ! मन ही महान् सुख-दुःखका कारण है, इसीके निर्मल होनेपर सब कुछ निर्मल हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ | | भ्रमन्सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वा स्नात्वा पुनः पुनः ।<br>निर्मलं न मनो यावत्तावत्सर्वं निरर्थकम् ॥ ३८ | सभी तीर्थोंमें घूमते हुए वहाँ बार-बार स्नान करके भी यदि मन निर्मल नहीं हुआ तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। | | न देहो न च जीवात्मा नेन्द्रियाणि परन्तप ।<br>मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ॥ ३९ | हे परन्तप ! बन्धन तथा मोक्षका कारण न यह देह है, न जीवात्मा है और न ये इन्द्रियाँ ही हैं, अपितु मन ही मनुष्योंके बन्धन एवं मुक्तिका कारण है ॥ ३८-३९ ॥ | | शुद्धो मुक्तः सदैवात्मा न वै बध्येत कर्हिचित् ।<br>बन्धमोक्षौ मनःसंस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ ४० | आत्मा तो सदा ही शुद्ध तथा मुक्त है, वह कभी बँधता नहीं है। अतः बन्धन और मोक्ष तो मनके भीतर हैं, मनकी शान्तिसे ही शान्ति है ॥ ४० ॥ | | शत्रुमित्रमुदासीनो भेदाः सर्वे मनोगताः ।<br>एकात्मत्वे कथं भेदः सम्भवेद् द्वैतदर्शनात् ॥ ४१ | शत्रुता, मित्रता या उदासीनताके सभी भेदभाव भी मनमें ही रहते हैं। इसलिये एकात्मभाव होनेपर यह भेदभाव नहीं रहता; यह तो द्वैतभावसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥ | | जीवो ब्रह्म सदैवाहं नात्र कार्या विचारणा ।<br>भेदबुद्धिस्तु संसारे वर्तमाना प्रवर्तते ॥ ४२ | ‘मैं जीव सदा ही ब्रह्म हूँ’—इस विषयमें और विचार करनेकी आवश्यकता ही नहीं है। भेदबुद्धि तो संसारमें आसक्त रहनेपर ही होती है ॥ ४२ ॥ | | अविद्येयं महाभाग विद्या चैतन्निवर्तनम् ।<br>विद्याविद्ये च विज्ञेये सर्वदैव विचक्षणैः ॥ ४३ | हे महाभाग ! बन्धनका मुख्य कारण अविद्या ही है। इस अविद्याको दूर करनेवाली विद्या है। इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको चाहिये कि वे सदा विद्या तथा अविद्याका अनुसन्धानपूर्वक अनुशीलन किया करें ॥ ४३ ॥ | | विनातपं हि छायाया ज्ञायते च कथं सुखम् ।<br>अविद्यया विना तद्वत्कथं विद्यां च वेत्ति वै ॥ ४४ | धूपके बिना छायाके सुखका ज्ञान कैसे हो सकता है, उसी प्रकार अविद्याके बिना विद्याका ज्ञान कैसे किया जा सकता है ॥ ४४ ॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 6 C

| १६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ | | :--- | :--- |

| गुणा गुणेषु वर्तन्ते भूतानि च तथैव च।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु को दोषस्तत्र चात्मनः॥ ४५ | गुणोंमें गुण, पंचभूतोंमें पंचभूत तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें इन्द्रियाँ स्वयं रमण करती हैं; इसमें आत्माका क्या दोष है?॥ ४५॥ | | मर्यादा सर्वरक्षार्थं कृता वेदेषु सर्वशः।<br>अन्यथा धर्मनाशः स्यात्सौगतानामिवानघ॥ ४६<br><br>धर्मनाशे विनष्टः स्याद्वर्णाचारोऽतिवर्तितः।<br>अतो वेदप्रदिष्टेन मार्गेण गच्छतां शुभम्॥ ४७ | हे पवित्रात्मन्! सबकी सुरक्षाके लिये वेदोंमें सब प्रकारसे मर्यादाकी व्यवस्था की गयी है। यदि ऐसा न होता तो नास्तिकोंकी भाँति सब धर्मोंका नाश हो जाता। धर्मके नष्ट हो जानेपर सब कुछ नष्ट हो जायगा और सब वर्णोंकी आचार-परम्पराका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये वेदोपदिष्ट मार्गपर चलनेवालोंका कल्याण होता है॥ ४६-४७॥ | | शुक उवाच<br>सन्देहो वर्तते राजन्न निवर्तति मे क्वचित्।<br>भवता कथितं यत्तच्छृण्वतो मे नराधिप॥ ४८ | शुकदेवजी बोले—हे राजन्! आपने जो बात कही उसे सुनकर भी मेरा सन्देह बना हुआ है; वह किसी प्रकार भी दूर नहीं होता॥ ४८॥ | | वेदधर्मेषु हिंसा स्यादधर्मबहुला हि सा।<br>कथं मुक्तिप्रदो धर्मो वेदोक्तो बत भूपते॥ ४९<br><br>प्रत्यक्षेण त्वनाचारः सोमपानं नराधिप।<br>पशूनां हिंसनं तद्वद्भक्षणं चामिषस्य च॥ ५०<br><br>सौत्रामणौ तथा प्रोक्तः प्रत्यक्षेण सुराग्रहः।<br>द्यूतक्रीडा तथा प्रोक्ता व्रतानि विविधानि च॥ ५१ | हे भूपते! वेदधर्मोंमें हिंसाका बाहुल्य है, उस हिंसामें अनेक प्रकारके अधर्म होते हैं। [ऐसी दशामें] वेदोक्त धर्म मुक्तिप्रद कैसे हो सकता है? हे राजन्! सोमरस-पान, पशुहिंसा और मांस-भक्षण तो स्पष्ट ही अनाचार है। सौत्रामणियज्ञमें तो प्रत्यक्षस्वरूपसे सुराग्रहणका वर्णन किया गया है। इसी प्रकार द्यूतक्रीड़ा एवं अन्य अनेक प्रकारके व्रत बताये गये हैं॥ ४९-५१॥ | | श्रूयते स्म पुरा ह्यासीच्छशबिन्दुर्नृपोत्तमः।<br>यज्वा धर्मपरो नित्यं वदान्यः सत्यसागरः॥ ५२<br><br>गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता चोत्पथगामिनाम्।<br>यज्ञाश्च विहितास्तेन बहवो भूरिदक्षिणाः॥ ५३ | सुना जाता है कि प्राचीन कालमें शशबिन्दु नामके एक श्रेष्ठ राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, यज्ञपरायण, उदार एवं सत्यवादी थे। वे धर्मरूपी सेतुके रक्षक तथा कुमार्गगामी जनोंके नियन्ता थे। उन्होंने पुष्कल दक्षिणावाले अनेक यज्ञ सम्पादित किये थे॥ ५२-५३॥ | | चर्मणां पर्वतो जातो विन्ध्याचलसमः पुनः।<br>मेघाम्बुप्लावनाज्जाता नदी चर्मण्वती शुभा॥ ५४ | [उन यज्ञोंमें] पशुओंके चर्मसे विन्ध्यपर्वतके समान ऊँचा पर्वत-सा बन गया। मेघोंके जल बरसानेसे चर्मण्वती नामकी शुभ नदी बह चली॥ ५४॥ | | सोऽपि राजा दिवं यातः कीर्तिरस्याचला भुवि।<br>एवं धर्मेषु वेदेषु न मे बुद्धिः प्रवर्तते॥ ५५ | वे राजा भी दिवंगत हो गये, किंतु उनकी कीर्ति भूमण्डलपर अचल हो गयी। जब इस प्रकारके धर्मोंका वर्णन वेदमंत्रोंमें/वेदमें है, तब हे राजन्! मेरी श्रद्धाबुद्धि उनमें नहीं है॥ ५५॥ | | स्त्रीसङ्गेन सदा भोगे सुखमाप्नोति मानवः।<br>अलाभे दुःखमत्यन्तं जीवन्मुक्तः कथं भवेत्॥ ५६ | स्त्रीके साथ भोगमें पुरुष सुख प्राप्त करता है और उसके न मिलनेपर वह बहुत दुःखी होता है तो ऐसी दशामें भला वह जीवन्मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ ५६॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 D

अ० १९]प्रथम स्कन्ध१६५
जनक उवाचजनकजी बोले—
हिंसा यज्ञेषु प्रत्यक्षा साहिंसा परिकीर्तिता।<br>उपाधियोगतो हिंसा नान्यथेति विनिर्णयः॥ ५७यज्ञोंमें जो हिंसा दिखायी देती है, वह वास्तवमें अहिंसा ही कही गयी है; क्योंकि जो हिंसा उपाधियोगसे होती है वही हिंसा कहलाती है, अन्यथा नहीं—ऐसा शास्त्रोंका निर्णय है॥ ५७॥
यथा चेन्धनसंयोगादग्नौ धूमः प्रवर्तते।<br>तद्वियोगात्तथा तस्मिन्निर्धूमत्वं विभाति वै॥ ५८<br>अहिंसां च तथा विद्धि वेदोक्तां मुनिसत्तम।<br>रागिणां सापि हिंसैव निःस्पृहाणां न सा मता॥ ५९जिस प्रकार [गीली] लकड़ीके संयोगसे अग्निसे धुआँ निकलता है, उसके अभावमें उस अग्निमें धुँआ नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार हे मुनिवर! वेदोक्त हिंसाको भी आप अहिंसा ही समझिये। रागीजनोंद्वारा की गयी हिंसा ही हिंसा है, किंतु अनासक्त जनोंके लिये वह हिंसा नहीं कही गयी है॥ ५८-५९॥
अरागेण च यत्कर्म तथाहङ्कारवर्जितम्।<br>अकृतं वेदविद्वांसः प्रवदन्ति मनीषिणः॥ ६०जो कर्म रागरहित तथा अहंकाररहित होकर किया जाता हो, उस कर्मको वैदिक विद्वान् मनीषीजन न किये हुएके समान ही कहते हैं॥ ६०॥
गृहस्थानां तु हिंसैव या यज्ञे द्विजसत्तम।<br>अरागेण च यत्कर्म तथाहंकारवर्जितम्॥ ६१<br>साहिंसैव महाभाग मुमुक्षूणां जितात्मनाम्॥ ६२हे द्विजश्रेष्ठ! रागी गृहस्थोंके द्वारा यज्ञमें जो हिंसा होती है, वही हिंसा है। हे महाभाग! जो कर्म रागरहित तथा अहंकारशून्य होकर किया जाता है, वह जितात्मा मुमुक्षुजनोंके लिये अहिंसा ही है॥ ६१-६२॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य जनकोपदेशवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

शुकदेवजीका व्यासजीके आश्रममें वापस आना, विवाह करके सन्तानोत्पत्ति करना तथा परम सिद्धिकी प्राप्ति करना

शुक उवाचशुकदेवजी बोले—
सन्देहोऽयं महाराज वर्तते हृदये मम।<br>मायामध्ये वर्तमानः स कथं निःस्पृहो भवेत्॥ १<br>शास्त्रज्ञानं च सम्प्राप्य नित्यानित्यविचारणम्।<br>त्यजते न मनो मोहं स कथं मुच्यते नरः॥ २हे महाराज! मेरे हृदयमें यह शंका हो रही है कि मायामें लिप्त रहते हुए कोई मनुष्य निःस्पृह कैसे हो सकता है? शास्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नित्यानित्यका विचार करनेपर भी चित्तसे मोह नहीं दूर होता। तब भला वह मनुष्य मुक्त कैसे हो सकेगा?॥ १-२॥
अन्तर्गतं तमश्छेत्तुं शास्त्राद् बोधो हि न क्षमः।<br>यथा न नश्यति तमः कृतया दीपवार्तया॥ ३<br>अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्तव्यः सर्वदा बुधैः।<br>स कथं राजशार्दूल गृहस्थस्य भवेत्तथा॥ ४मनुष्यके मनमें स्थित मोहको दूर करनेके लिये केवल शास्त्रबोध ही समर्थ नहीं हो सकता, जैसे केवल दीप जलानेकी बात करनेसे अन्धकार दूर नहीं होता। अतः बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे कभी किसीसे द्वेष-भाव न रखें, परंतु हे नृपश्रेष्ठ! गृहस्थसे वह कैसे सम्भव है?॥ ३-४॥
१६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९

| वित्तैषणा न ते शान्ता तथा राज्यसुखैषणा।<br>जयैषणा च सङ्ग्रामे जीवन्मुक्तः कथं भवेः॥ ५ | अभी भी आपकी धनप्राप्तिकी कामना, राज्यसुख तथा युद्धमें विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा शान्त नहीं हुई है, तब आप जीवन्मुक्त कैसे हो सकते हैं? ॥ ५॥ | | चौरेषु चौरबुद्धिस्तु साधुबुद्धिस्तु तापसे।<br>स्वपरत्वं तवाप्यस्ति विदेहस्त्वं कथं नृप॥ ६ | अभी भी चोरोंके प्रति चौरबुद्धि तथा तपस्वीके प्रति साधुबुद्धि आपकी है ही। अपने-परायेका भेदभाव भी अभी आपमें है, तो फिर हे राजन्! आप विदेह कैसे? ॥ ६॥ | | कटुतीक्ष्णकषायाम्लरसान्वेत्सि शुभाशुभान्।<br>शुभेषु रमते चित्तं नाशुभेषु तथा नृप॥ ७ | अभी आप कटु, तिक्त, कसैले एवं खट्टे रसोंका तथा भले-बुरेका ज्ञान रखते ही हैं। हे राजन्! आपका चित्त शुभ कर्मोंमें रमता है, अशुभ कर्मोंमें नहीं। | | जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिश्च तव राजन् भवन्ति हि।<br>अवस्थास्तु यथाकालं तुरीया तु कथं नृप॥ ८ | जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये अवस्थाएँ अभी आपको समयानुसार होती ही हैं; तब भला आपको तुरीयावस्था कैसे प्राप्त होती होगी? ॥ ७-८॥ | | पदात्यश्वरथेभाश्च सर्वे वै वशगा मम।<br>स्वाम्यहं चैव सर्वेषां मन्यसे त्वं न मन्यसे॥ ९ | हे राजन्! घोड़े, रथ, हाथी तथा पैदल सैनिक—ये सब मेरे अधीन हैं और मैं इन सबका स्वामी हूँ—ऐसा आप अपनेको मानते हैं या नहीं? | | मिष्टमत्सि सदा राजन्मुदितो विमनास्तथा।<br>मालायां च तथा सर्पे समदृक् क्व नृपोत्तम॥ १० | आप मधुर भोजनको प्रसन्नतापूर्वक अथवा बेमनसे खाते ही होंगे। हे नृपश्रेष्ठ! आप माला और सर्पमें क्या समान दृष्टिवाले हैं? ॥ ९-१०॥ | | विमुक्तस्तु भवेद्राजन् समलोष्टाश्मकाञ्चनः।<br>एकात्मबुद्धिः सर्वत्र हितकृत्सर्वजन्तुषु॥ ११ | हे राजन्! विमुक्त पुरुष तो वह कहलाता है, जो मिट्टीके ढेले और स्वर्णको समान समझता हो, सब जीवोंमें एकात्मबुद्धि रखता हो तथा जीवमात्रका उपकार करता हो॥ ११॥ | | न मेऽद्य रमते चित्तं गृहदारादिषु क्वचित्।<br>एकाकी निःस्पृहोऽत्यर्थं चरेयमिति मे मतिः॥ १२ | मेरा मन घर-स्त्री आदिमें कभी नहीं लगता। इसलिये अकेले ही निःस्पृह भावसे मैं सदा विचरण करता रहूँ—यही मेरा विचार है॥ १२॥ | | निःसङ्गो निर्ममः शान्तः पत्रमूलफलाशनः।<br>मृगवद्विचरिष्यामि निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः॥ १३ | निःसंग, ममतारहित और शान्त होकर केवल पत्र, मूल, फल इत्यादि ग्रहण करता हुआ मैं निर्द्वन्द्व एवं अपरिग्रही होकर मृगकी भाँति स्वच्छन्द विचरण करूँगा॥ १३॥ | | किं मे गृहेण वित्तेन भार्यया च सुरूपया।<br>विरागमनसः कामं गुणातीतस्य पार्थिव॥ १४ | हे पार्थिव! गृह, धन तथा रूपवती स्त्रीसे मुझ विरक्तचित्त और गुणातीतका क्या प्रयोजन है? ॥ १४॥ | | चिन्त्यसे विविधाकारं नानारागसमाकुलम्।<br>दम्भोऽयं किल ते भाति विमुक्तोऽस्मीति भाषसे॥ १५ | आप अनेक प्रकारकी राग-द्वेषयुक्त बातें सोचते हैं, फिर भी 'मैं विमुक्त हूँ'—ऐसा आप कहते हैं। यह सब मुझे तो केवल आपका दम्भ ही जान पड़ता है। | | कदाचिच्छत्रुजा चिन्ता धनजा च कदाचन।<br>कदाचित्सैन्यजा चिन्ता निश्चिन्तोऽसि कदा नृप॥ १६ | आपको कभी शत्रुकी, कभी धनकी तथा कभी सेनाकी चिन्ता रहती ही है, तब हे राजन्! आप निश्चिन्त कहाँ? ॥ १५-१६॥ |

अ० १९ ]प्रथम स्कन्ध१६७
संस्कृतहिन्दी
वैखानसा ये मुनयो मिताहारा जितव्रताः।<br>तेऽपि मुह्यन्ति संसारे जानन्तोऽपि ह्यसत्यताम्॥ १७स्वल्पाहारी, अटल व्रतवाले जो वैखानस मुनि हैं, वे इस संसारकी अनित्यताको जानते हुए भी इसमें आसक्त हो जाते हैं॥ १७॥
तव वंशसमुत्थानां विदेहा इति भूपते।<br>कुटिलं नाम जानीहि नान्यथेति कदाचन॥ १८हे राजन्! आपके वंशमें उत्पन्न सभी राजाओंका नाम विदेह—यह हो जाता है, इसमें भी आप धोखा समझिये, दूसरा कुछ नहीं॥ १८॥
विद्याधरो यथा मूर्खो जन्मान्धस्तु दिवाकरः।<br>लक्ष्मीधरो दरिद्रश्च नाम तेषां निरर्थकम्॥ १९<br><br>तव वंशोद्भवा ये ये श्रुताः पूर्वे मया नृपाः।<br>विदेहा इति विख्याता नामतः कर्मतो न ते॥ २०जिस प्रकार किसी मूर्खका नाम विद्याधर, जन्मान्धका नाम दिवाकर तथा सतत दरिद्री मनुष्यका नाम लक्ष्मीधर रखना निरर्थक है, उसी प्रकार पूर्वकालमें आपके वंशमें उत्पन्न जिन-जिन राजाओंको मैंने सुना है, वे नामसे ही विदेह प्रसिद्ध हुए हैं कर्मसे नहीं॥ १९-२०॥
निमिनामाभवद्राजा पूर्वं तव कुले नृप।<br>यज्ञार्थं स तु राजर्षिर्वसिष्ठं स्वगुरुं मुनिम्॥ २१<br><br>निमन्त्रयामास तदा तमुवाच नृपं मुनिः।<br>निमन्त्रितोऽस्मि यज्ञार्थं देवेन्द्रेणाधुना किल॥ २२<br><br>कृत्वा तस्य मखं पूर्णं करिष्यामि तवापि वै।<br>तावत्कुरुष्व राजेन्द्र सम्भारं तु शनैः शनैः॥ २३हे नृप! आपके कुलमें पहले निमि नामके राजा हो चुके हैं। उन राजर्षिने एक बार अपने गुरु वसिष्ठमुनिको यज्ञके लिये निमन्त्रित किया। उस समय वसिष्ठजीने उनसे कहा कि आपसे पहले इन्द्रने मुझे यज्ञके लिये आमन्त्रित कर रखा है। इन्द्रका यज्ञ सम्पन्न कराकर मैं आपका भी यज्ञ पूर्ण करूँगा। अतः हे राजेन्द्र! तब तक आप धीरे-धीरे यज्ञ-सामग्री एकत्र कराइये॥ २१—२३॥
इत्युक्त्वा निर्ययौ सोऽथ महेन्द्रयजने मुनिः।<br>निमिरन्यं गुरुं कृत्वा चकार मखमुत्तमम्॥ २४ऐसा कहकर वसिष्ठमुनि इन्द्रका यज्ञ करानेके लिये चले गये और महाराज निमिने किसी दूसरेको आचार्य बनाकर अपना उत्तम यज्ञ सम्पन्न कर लिया॥ २४॥
तच्छ्रुत्वा कुपितोऽत्यर्थं वसिष्ठो नृपतिं पुनः।<br>शशाप च पतत्वद्य देहस्ते गुरुलोपक॥ २५यह सुनकर वसिष्ठजी राजापर अत्यन्त क्रोधित हुए और उन्हें शाप देते हुए बोले—'हे गुरुका परित्याग करनेवाले! तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाय'॥ २५॥
राजापि तं शशापाथ तवापि च पतत्वयम्।<br>अन्योन्यशापात्पतितौ तावेव च मया श्रुतम्॥ २६यह सुनकर महाराज निमिने भी शाप दिया कि आपका भी शरीर नष्ट हो जाय। इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरेके शापसे नष्ट हो गये—ऐसा मैंने सुना है॥ २६॥
विदेहेन च राजेन्द्र कथं शप्तो गुरुः स्वयम्।<br>विनोद इव मे चित्ते विभाति नृपसत्तम॥ २७हे राजेन्द्र! विदेह होकर भी राजाने अपने गुरुको स्वयं शाप क्यों दे डाला! हे नृपश्रेष्ठ! यह तो मेरे मनमें परिहास-जैसा प्रतीत हो रहा है॥ २७॥
जनक उवाच<br>सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चिदिदं मतम्।<br>तथापि शृणु विप्रेन्द्र गुरुर्मम सुपूजितः॥ २८जनकजी बोले—हे विप्रवर! आपने ठीक ही कहा है; इसमें मिथ्या कुछ भी नहीं है—ऐसा मैं मानता हूँ। फिर भी आप मेरी बात सुनें। हे विप्रेन्द्र!

१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९

१६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पितुः सङ्गं परित्यज्य त्वं वनं गन्तुमिच्छसि।<br>मृगैः सह सुसम्बन्धो भविता ते न संशयः॥ २९गुरु व्यासजी मेरे परम पूज्य हैं। उन अपने पिताका साथ त्याग करके आप वनमें जाना चाहते हैं। वहाँ भी तो मृग आदि पशुओंके साथ आपका स्नेह-सम्बन्ध रहेगा ही; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९॥
महाभूतानि सर्वत्र निःसङ्गः क्व भविष्यसि।<br>आहारार्थं सदा चिन्ता निश्चन्तः स्याः कथं मुने॥ ३०पृथ्वी, जल आदि महाभूत तो सर्वत्र ही विद्यमान हैं। तब आप निःसंग कैसे हो पायेंगे ? और फिर हे मुने! भोजन आदिकी भी चिन्ता रहेगी ही, तो आप निश्चिन्त कैसे रहेंगे ?॥ ३०॥
दण्डाजिनकृता चिन्ता यथा तव वनेऽपि च।<br>तथैव राज्यचिन्ता मे चिन्तयानस्य वा न वा॥ ३१जिस प्रकार आपको वनमें दण्ड और मृगचर्मकी चिन्ता बनी रहेगी, उसी प्रकार मुझ विचारशील राजाको भी राज्यसम्बन्धी चिन्ता तो होगी ही॥ ३१॥
विकल्पोपहतस्त्वं वै दूरदेशमुपागतः।<br>न मे विकल्पसन्देहो निर्विकल्पोऽस्मि सर्वथा॥ ३२आप ही भ्रममें पड़कर यहाँतक दूर देशमें आये हैं। मुझे किसी प्रकारका विकल्परूपी सन्देह नहीं है; क्योंकि मैं तो सर्वथा निर्विकल्प हूँ॥ ३२॥
सुखं स्वपिमि विप्राहं सुखं भुञ्जामि सर्वथा।<br>न बद्धोऽस्मीति बुद्ध्याहं सर्वदैव सुखी मुने॥ ३३<br><br>त्वं तु दुःखी सदैवासि बद्धोऽहमिति शङ्कया।<br>इति शङ्कां परित्यज्य सुखी भव समाहितः॥ ३४हे विप्र! मैं सुखसे भोजन करता हूँ और सुखपूर्वक शयन करता हूँ। हे मुने! 'मैं बद्ध नहीं हूँ' इस भावनासे मैं सर्वदा सुखी रहता हूँ। [इसके विपरीत] 'मैं बद्ध हूँ'—इस शंकासे आप सर्वदा दुःखी ही रहते हैं, अतः आप इस शंकाको छोड़कर सदा सुखी एवं स्वस्थ हो जाइये॥ ३३-३४॥
देहोऽयं मम बन्धोऽयं न ममेति च मुक्तता।<br>तथा धनं गृहं राज्यं न ममेति च निश्चयः॥ ३५यह शरीर मेरा है—यही बन्धनका कारण है; यह मेरा नहीं है—ऐसा निश्चय ही मुक्ति है। यह गृह, सम्पत्ति, राज्य मेरा नहीं है—ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है॥ ३५॥
सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य शुकः प्रीतमनाभवत्।<br>आपृच्छ्य तं जगामाशु व्यासस्याश्रममुत्तमम्॥ ३६सूतजी बोले—महाराज जनककी बात सुनकर शुकदेवजी हर्षित हुए और उनसे आज्ञा लेकर व्यासजीके उत्तम आश्रमके लिये चल पड़े॥ ३६॥
आगच्छन्तं सुतं दृष्ट्वा व्यासोऽपि सुखमाप्तवान्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं पप्रच्छ कुशलं पुनः॥ ३७व्यासजीने अपने ज्ञानी पुत्रको आते देखकर सुख प्राप्त किया। उन्होंने शुकदेवजीको हृदयसे लगाकर तथा उनका सिर सूँघकर उनकी कुशलता पूछी॥ ३७॥
स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये पितुः पार्श्वे समाहितः।<br>वेदाध्ययनसम्पन्नः सर्वशास्त्रविशारदः॥ ३८<br><br>जनकस्य दशां दृष्ट्वा राज्यस्थस्य महात्मनः।<br>स निर्वृतिं परां प्राप्य पितुराश्रमसंस्थितः॥ ३९सब शास्त्रोंमें कुशल एवं वेदाध्ययनमें तत्पर श्रीशुक-देवजी अपने पिताके साथ उस रमणीय आश्रममें सावधान होकर रहने लगे। राज्य करते हुए महात्मा जनककी वह विदेहावस्था देखकर शुकदेवजी परम शान्तिको प्राप्तकर अपने पिताके आश्रममें ही स्थित हो गये॥ ३८-३९॥
अ० १९ ]प्रथम स्कन्ध१६१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पितॄणां सुभगा कन्या पीवरी नाम सुन्दरी।<br>शुकश्चकार पत्नीं तां योगमार्गस्थितोऽपि हि॥ ४०<br>स तस्यां जनयामास पुत्रांश्चतुर एव हि।<br>कृष्णं गौरप्रभं चैव भूरिं देवश्रुतं तथा॥ ४१<br>कन्यां कीर्तिं समुत्पाद्य व्यासपुत्रः प्रतापवान्।<br>ददौ विभ्राजपुत्राय त्वणुहाय महात्मने॥ ४२योगमार्गमें स्थित रहते हुए भी शुकदेवजीने पितरोंकी पीवरी नामकी सौभाग्यवती सुन्दर कन्याको पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया। उन्होंने उससे कृष्ण, गौरप्रभ, भूरि और देवश्रुत नामक चार पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही उन प्रतापी व्याससुत शुकदेवजीने कीर्ति नामकी एक कन्या उत्पन्न करके उस कन्याका विवाह विभ्राजके पुत्र महात्मा अणुहके साथ कर दिया॥ ४०—४२॥
अणुहस्य सुतः श्रीमान्ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्।<br>ब्रह्मज्ञः पृथिवीपालः शुककन्यासमुद्भवः॥ ४३<br>कालेन कियता तत्र नारदस्योपदेशतः।<br>ज्ञानं परमकं प्राप्य योगमार्गमनुत्तमम्॥ ४४<br>पुत्रे राज्यं निधायाथ गतो बदरिकाश्रमम्।<br>मायाबीजोपदेशेन तस्य ज्ञानं निर्गलम्॥ ४५शुकदेवजीकी कन्यासे उत्पन्न अणुहके पुत्र श्रीमान् ब्रह्मदत्त हुए जो बड़े प्रतापी, ब्रह्मज्ञानी एवं पृथ्वीके रक्षक थे। वे कुछ समयके बाद देवर्षि नारदके उपदेशसे और परमश्रेष्ठ ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान पाकर योगमार्गका आश्रय लेकर राज्यका भार अपने पुत्रको सौंपकर बदरिकाश्रम चले गये। वहाँ नारदजीके कृपाप्रसादसे प्राप्त मायाबीजके उपदेशसे उन्हें निर्बाध तथा तत्क्षण मुक्तिदायक ज्ञान उत्पन्न हुआ॥ ४३—४५ १/२॥
नारदस्य प्रसादेन जातं सद्यो विमुक्तिदम्।<br>कैलासशिखरे रम्ये त्यक्त्वा सङ्गं पितुः शुकः॥ ४६<br>ध्यानमास्थाय विपुलं स्थितः सङ्गपराङ्मुखः।<br>उत्पपात गिरेः शृङ्गात्सिद्धिं च परमां गतः॥ ४७<br>आकाशगो महातेजा विरराज यथा रविः।<br>गिरेः शृङ्गं द्विधा जातं शुकस्योत्पतने तदा॥ ४८<br>उत्पाता बहवो जाताः शुकश्चाकाशगोऽभवत्।<br>अन्तरिक्षे यथा वायुः स्तूयमानः सुरर्षिभिः॥ ४९<br>तेजसातिविराजन्वै द्वितीय इव भास्करः।उधर शुकदेवजी भी अपने पिताका साथ त्यागकर कैलासके सुरम्य शिखरपर चले गये और निःसंग भावसे अविचल ध्यान लगाकर स्थित हो गये। कुछ ही दिनोंमें उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी और वे पर्वतके शिखरसे उड़ गये तथा महातेजस्वी वे शुकदेवजी आकाशमें जाकर सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। तब शुकदेवजीके उड़ते ही पर्वत-शिखर दो भागोंमें विभाजित हो गया। शुकदेवजीके आकाशमें जाते ही अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए वे शुकदेवजी अन्तरिक्षमें वायुकी भाँति स्थित हो गये। वे अपने तेजसे दूसरे सूर्यकी भाँति देदीप्यमान हो रहे थे॥ ४६—४९ १/२॥
व्यासस्तु विरहाक्रान्तः क्रन्दन्पुत्रेति चासकृत्॥ ५०<br>गिरेः शृङ्गे गतस्तत्र शुको यत्र स्थितोऽभवत्।<br>क्रन्दमानं तदा दीनं व्यासं मत्वा श्रमाकुलम्॥ ५१<br>सर्वभूतगतः साक्षी प्रतिशब्दमदात्तदा।<br>तत्राद्यापि गिरेः शृङ्गे प्रतिशब्दः स्फुटोऽभवत्॥ ५२इसी बीच पुत्रके वियोगसे व्यग्र होकर व्यासजी बार-बार 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहते हुए उस पर्वतकी चोटीपर पहुँचे, जहाँ शुकदेवजी रहते थे। थके हुए व्यासजीको दीन भावसे करुण क्रन्दन करते हुए देखकर सभी जीवोंमें साक्षीरूपसे विद्यमान परमात्माने प्रतिध्वनिके रूपमें उत्तर दिया। आज भी उस पर्वतके शृंगपर वैसी ही प्रतिध्वनि स्पष्ट सुनायी देती है॥ ५०—५२॥

| १७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |

| रुदन्तं तं समालक्ष्य व्यासं शोकसन्वितम्।<br>पुत्र पुत्रेति भाषन्तं विरहेण परिप्लुतम्॥ ५३<br>शिवस्तत्र समागत्य पाराशर्यमबोधयत्।<br>व्यास शोकं मा कुरु त्वं पुत्रस्ते योगवित्तमः॥ ५४<br>परमां गतिमापन्नो दुर्लभां चाकृतात्मभिः।<br>तस्य शोको न कर्तव्यस्त्वयाऽशोकं विजानता॥ ५५<br>कीर्तिस्ते विपुला जाता तेन पुत्रेण चानघ। | अपने प्रिय पुत्र शुकदेवके विरहमें ‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहकर विलाप करते हुए व्यासजीको शोक-सन्तप्त देखकर साक्षात् शंकरजी वहाँ आकर उन्हें सान्त्वना देने लगे—‘हे व्यासजी! आप शोक मत कीजिये; आपके पुत्र श्रेष्ठ योगवेत्ता हैं। उन्होंने अकृतात्माओंके लिये भी दुर्लभ परमगति प्राप्त कर ली है। अतः ब्रह्मज्ञान रखनेवाले आपको उन [ब्रह्मज्ञानी] शुकदेवके लिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये; हे पवित्रत्मन्! शुकदेवके समान पुत्रके द्वारा आपकी महान् कीर्ति हुई है’॥ ५३-५५ ½ ॥ | | व्यास उवाच<br>न शोको याति देवेश किं करोमि जगत्पते॥ ५६<br>अतृप्ते लोचने मेऽद्य पुत्रदर्शनलालसे। | व्यासजी बोले—‘हे देवेश! हे जगत्पते! मैं क्या करूँ, शोक दूर नहीं हो रहा है; पुत्र-दर्शनकी लालसावाले मेरे नेत्र अतृप्त हैं’॥ ५६ ½ ॥ | | महादेव उवाच<br>छायां द्रक्ष्यसि पुत्रस्य पार्श्वस्थां सुमनोहराम्॥ ५७<br>तां वीक्ष्य मुनिशार्दूल शोकं जहि परन्तप। | महादेवजी बोले—‘अब आप अपने पुत्रकी रमणीय छाया अपने पास सर्वदा विद्यमान देखेंगे। हे मुनिवर! हे परन्तप! उस छायाको देखकर आप अपना शोक दूर कीजिये’॥ ५७ ½ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा ददर्श व्यासस्तु छायां पुत्रस्य सुप्रभाम्॥ ५८<br>दत्त्वा वरं हरस्तस्मै तत्रैवान्तरधीयत।<br>अन्तर्हिते महादेवे व्यासः स्वाश्रममभ्यगात्॥ ५९<br>शुकस्य विरहेणापि तप्तः परमदुःखितः॥ ६० | **सूतजी बोले—**तदनन्तर व्यासजीने अपने पुत्र शुकदेवकी ओजस्विनी छाया देखी। उन्हें वरदान देकर शंकरजी वहीं अन्तर्धान हो गये। महादेवजीके अन्तर्हित हो जानेपर व्यासजी भी अपने आश्रमको लौट आये। शुकदेवजीके वियोगसे सन्तप्त होकर वे अत्यन्त दुःखी रहने लगे॥ ५८-६०॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकस्य विवाहादिकार्यवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥


अथ विंशोऽध्यायः

सत्यवतीका राजा शन्तनुसे विवाह तथा दो पुत्रोंका जन्म, राजा शन्तनुकी मृत्यु, चित्रांगदका राजा बनना तथा उसकी मृत्यु, विचित्रवीर्यका काशिराजकी कन्याओंसे विवाह और क्षयरोगसे मृत्यु, व्यासजीद्वारा धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति

| ऋषय ऊचुः<br>शुकस्तु परमां सिद्धिमाप्तवान्देवसत्तमः।<br>किं चकार ततो व्यासस्तन्नो ब्रूहि सविस्तरम्॥ १ | ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] शुकदेवजीको जब परम सिद्धि प्राप्त हो गयी तब देवश्रेष्ठ व्यासजीने क्या किया? यह सब विस्तारपूर्वक हमसे कहिये॥ १॥ | | सूत उवाच<br>शिष्या व्यासस्य येऽप्यासन्वेदाभ्यासपरायणाः।<br>आज्ञामादाय ते सर्वे गताः पूर्वं महीतले॥ २ | **सूतजी बोले—**उस समय व्यासजीके जितने वेदपाठी शिष्य थे, वे सब व्यासजीकी आज्ञा पाकर पहले ही भूमण्डलमें इधर-उधर चले गये थे॥ २॥ |

| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
असितो देवलश्चैव वैशम्पायन एव च।<br>जैमिनिश्च सुमन्तुश्च गताः सर्वे तपोधनाः॥ ३<br><br>तानेतान्वीक्ष्य पुत्रं च लोकान्तरितमप्युत।<br>व्यासः शोकसमाक्रान्तो गमनायाकरोन्मतिम्॥ ४असित, देवल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु आदि सभी तपोधन मुनि चले गये थे। उन ऋषियोंको अन्यत्र तथा अपने पुत्र शुकदेवको अन्तरिक्षमें गया हुआ देखकर शोकाकुल व्यासजीने वहाँसे चले जानेका विचार किया॥ ३-४॥
सस्मार मनसा व्यासस्तां निषादसुतां शुभाम्।<br>मातरं जाह्नवीतीरे मुक्तां शोकसमन्विताम्॥ ५उसी समय व्यासजीने मन-ही-मन निषादकन्या अपनी कल्याणकारिणी माताका स्मरण किया, जिन्हें उन्होंने शोकावस्थामें गंगाजीके तटपर ही छोड़ दिया था॥ ५॥
स्मृत्वा सत्यवतीं व्यासस्त्यक्त्वा तं पर्वतोत्तमम्।<br>आजगाम महातेजा जन्मस्थानं स्वकं मुनिः॥ ६अपनी माता सत्यवतीका स्मरण करके उस श्रेष्ठ पर्वतको त्यागकर महातेजस्वी व्यासजी अपने जन्मस्थानपर चले आये॥ ६॥
द्वीपं प्राप्याथ पप्रच्छ क्व गता सा वरानना।<br>निषादास्तं समाचख्युर्दत्ता राज्ञे तु कन्यका॥ ७<br><br>दाशराजोऽपि सम्पूज्य व्यासं प्रीतिपुरःसरम्।<br>स्वागतेनाभिसत्कृत्य प्रोवाच विहिताञ्जलिः॥ ८इस प्रकार उन्होंने उस द्वीपपर जाकर लोगोंसे पूछा कि 'वे सुन्दर मुखवाली [मेरी माता] कहाँ चली गयीं?' तब निषादोंने बताया कि उस कन्याका तो निषादराजने राजा [शन्तनु]-से विवाह कर दिया। तत्पश्चात् निषादराजने व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन एवं सत्कार करके हाथ जोड़कर कहा—॥ ७-८॥
दाशराज उवाच<br>अद्य मे सफलं जन्म पवित्रं नः कुलं मुने।<br>देवानामपि दुर्दर्शं यज्जातं तव दर्शनम्॥ ९दाशराज बोला—हे मुने! मेरा जन्म सफल हो गया और हमारा कुल पवित्र हो गया जो कि आज देवताओंके लिये दुर्लभ आपका दर्शन प्राप्त हुआ॥ ९॥
यदर्थमागतोऽसि त्वं तद् ब्रूहि द्विजसत्तम।<br>अपि दारा धनं पुत्रास्त्वदायत्तमिदं विभो॥ १०हे विप्रवर! आप जिस कामसे आये हैं, वह बताइये। हे विभो! धन, पुत्र, कलत्र आदि—यह सब आपके अधीन है॥ १०॥
सरस्वत्यास्तटे रम्ये चकाराश्रममण्डलम्।<br>व्यासस्तपःसमायुक्तस्तत्रैवास समाहितः॥ ११[निषादराजके प्रार्थना करनेपर] व्यासजीने सरस्वती नदीके सुन्दर तटपर अपना आश्रम बनाया और सावधान-चित्त हो वे पुनः तप करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ११॥
सत्यवत्याः सुतौ जातौ शन्तनोरमितद्युतेः।<br>मत्वा तौ भ्रातरौ व्यासः सुखमाप वने स्थितः॥ १२अपूर्व तेजस्वी महाराज शन्तनुको सत्यवतीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। इन दोनोंको अपना भाई मानकर वनवासी व्यासजी अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १२॥
चित्राङ्गदः प्रथमो रूपवाञ्छत्रुतापनः।<br>बभूव नृपतेः पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः॥ १३<br><br>विचित्रवीर्यनामासौ द्वितीयः समजायत।<br>सोऽपि सर्वगुणोपेतः शन्तनोः सुखवर्धनः॥ १४उनमें राजाका पहला पुत्र चित्रांगद रूपवान्, शत्रुओंको कष्ट देनेवाला तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। शन्तनुके दूसरे पुत्रका नाम विचित्रवीर्य था। वह भी सर्वगुणसम्पन्न एवं शन्तनुके लिये सुखवर्द्धक हुआ॥ १३-१४॥
१७२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
गाङ्गेयः प्रथमस्तस्य महावीरो बलाधिकः।<br>तथैव तौ सुतौ जातौ सत्यवत्यां महाबलौ॥ १५इसके पूर्व उन राजा शन्तनुको गंगासे भीष्म नामक बलशाली एवं पराक्रमी पुत्र पैदा हुआ था। उसी प्रकार सत्यवतीसे दो पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए॥ १५॥
शन्तनुस्तान्सुतान्वीक्ष्य सर्वलक्षणसंयुतान्।<br>अमंस्ताजय्यमात्मानं देवादीनां महामनाः॥ १६उन सर्वलक्षणसम्पन्न तीनों पुत्रोंको देखकर महामना शन्तनु अपने आपको देवताओंसे अजेय समझने लगे थे॥ १६॥
अथ कालेन कियता शन्तनुः कालपर्ययात्।<br>तत्याज देहं धर्मात्मा देही जीर्णमिवाम्बरम्॥ १७कुछ समय बीतनेपर यथासमय धर्मात्मा शन्तनुने उसी प्रकार अपना शरीर त्याग दिया, जिस प्रकार कोई मनुष्य अपना पुराना वस्त्र छोड़ देता है।
कालधर्मगते राज्ञि भीष्मश्चक्रे विधानतः।<br>प्रेतकार्याणि सर्वाणि दानानि विविधानि च॥ १८शन्तनुके कालके वशीभूत हो जानेपर भीष्मने विधिवत् उनके समस्त प्रेतकार्य किये और विविध प्रकारके दान दिये॥ १७-१८॥
चित्राङ्गदं ततो राज्ये स्थापयामास वीर्यवान्।<br>स्वयं न कृतवान् राज्यं तस्माद्देवव्रतोऽभवत्॥ १९तदनन्तर पराक्रमी भीष्मने चित्रांगदको राज्यसिंहासनपर बैठाया। उन्होंने स्वयं राज्य नहीं किया, इसी कारण उनका नाम देवव्रत हुआ॥ १९॥
चित्राङ्गदस्तु वीर्येण प्रमत्तः परदुःखदः।<br>बभूव बलवान्वीरः सत्यवत्यात्मजः शुचिः॥ २०सत्यवतीपुत्र चित्रांगद बलगर्वित, शत्रुसन्तापकर्ता, बलशाली, वीर तथा पवित्र थे॥ २०॥
अथैकदा महाबाहुः सैन्येन महतावृत्तः।<br>प्रचचार वनोद्देशान्यश्यन्वध्यान्मृगान् रुरून्॥ २१महाबाहु चित्रांगद एक बार महान् सेनासे युक्त होकर आखेटके लिये वनमें गये। वहाँ वध्य रुरुमृगोंको खोजते हुए वे विविध वन-प्रदेशोंमें घूम रहे थे।
चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो दृष्ट्वा तं मार्गगं नृपम्।<br>उत्ततारान्तिकं भूमेर्विमानवरमास्थितः॥ २२मार्गमें उन राजाको जाता हुआ देखकर चित्रांगद नामक एक गन्धर्व अपने सुन्दर विमानसे भूमिपर उनके समीप उतर पड़ा॥ २१-२२॥
तत्राभूच्च महद्युद्धं तयोः सदृशवीर्ययोः।<br>कुरुक्षेत्रे महास्थाने त्रीणि वर्षाणि तापसाः॥ २३**सूतजी बोले—**हे तपस्वियो ! उस समय कुरुक्षेत्रके उस विशाल मैदान में तीन वर्षतक समान बलवाले उन दोनोंमें घमासान युद्ध होता रहा॥ २३॥
इन्द्रलोकमवापाशु गन्धर्वेण हतो रणे।<br>भीष्मः श्रुत्वा चकाराशु तस्यौर्ध्वदैहिकं तदा॥ २४अन्तमें उस गन्धर्वके द्वारा राजा चित्रांगद युद्धमें मारे गये और उन्हें शीघ्र ही इन्द्रलोक प्राप्त हुआ। यह सुनकर भीष्मने उसी समय चित्रांगदका और्ध्वदैहिक संस्कार किया॥ २४॥
गाङ्गेयः कृतशोकस्तु मन्त्रिभिः परिवारितः।<br>विचित्रवीर्यनामानं राज्येशं च चकार ह॥ २५तत्पश्चात् मन्त्रियोंने भीष्मको समझा-बुझाकर शोकरहित किया। उन्होंने छोटे भाई विचित्रवीर्यको राजा बना दिया॥ २५॥
मन्त्रिभिर्बोधिता पश्चाद् गुरुभिश्च महात्मभिः।<br>स्वपुत्रं राज्यगं दृष्ट्वा पुत्रशोकहतापि च॥ २६मन्त्रियों, गुरुजनों एवं महात्माओंके समझानेके बाद शुभलक्षणा राजमाता सत्यवती अपने [ज्येष्ठ] पुत्रकी मृत्युसे शोकाकुल होती हुई भी अपने छोटे पुत्र

| अ० २० ] | प्रथम स्कन्ध | १७३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सत्यवत्यतिसन्तुष्टा बभूव वरवर्णिनी।<br>व्यासोऽपि भ्रातरं श्रुत्वा राजानं मुदितोऽभवत्॥ २७विचित्रवीर्यको राजसिंहासनपर बैठा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं। व्यासजी भी अपने भ्राताके राजा होनेका समाचार पाकर प्रसन्न हुए॥ २६-२७॥
यौवनं परमं प्राप्तः सत्यवत्याः सुतः शुभः।<br>चकार चिन्तां भीष्मोऽपि विवाहार्थं कनीयसः॥ २८जब सत्यवतीके सुन्दर पुत्र विचित्रवीर्य पूर्ण युवा हुए तब भीष्म अपने कनिष्ठ भ्राताके विवाहकी चिन्ता करने लगे॥ २८॥
काशिराजसुतास्तिस्रः सर्वलक्षणसंयुताः।<br>तेन राज्ञा विवाहार्थं स्थापिताश्च स्वयंवरे॥ २९उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं—जो सभी शुभलक्षणोंसे युक्त थीं; उन राजाने विवाहके लिये उनका स्वयंवर रचाया॥ २९॥
राजानो राजपुत्राश्च समाहूताः सहस्रशः।<br>इच्छास्वयंवरार्थं वै पूज्यमानाः समागताः॥ ३०<br>तत्र भीष्मो महातेजास्ता जहार बलेन वै।<br>निर्मथ्य राजकं सर्वं रथेनैकेन वीर्यवान्॥ ३१<br>स जित्वा पार्थिवान्सर्वांस्ताश्चादाय महारथः।<br>बाहुवीर्येण तेजस्वी ह्याससाद गजाह्वयम्॥ ३२हजारों पूज्यमान राजा तथा राजकुमार आमन्त्रित होकर उस इच्छास्वयंवरमें उपस्थित हुए थे तथा पराक्रमी भीष्मने अकेले ही रथपर बैठकर सभी राजाओंको रौंदकर बलपूर्वक उन कन्याओंका हरण कर लिया। वे महारथी तथा तेजस्वी भीष्म अपने बाहुबलसे उन सभी राजाओंको जीतकर उन कन्याओंको लेकर हस्तिनापुर चले आये॥ ३०—३२॥
मातृवद्भगिनीवच्च पुत्रीवच्चिन्तयन्किल।<br>तिस्रः समानयामास कन्यका वामलोचनाः॥ ३३<br>सत्यवत्यै निवेद्याशु द्विजानाहूय सत्वरः।<br>दैवज्ञान्वेदविदुषः पर्यपृच्छच्छुभं दिनम्॥ ३४सुन्दर नेत्रोंवाली उन तीनों राजकुमारियोंमें माता, भगिनी एवं पुत्रीकी भावना रखते हुए भीष्म उन्हें ले आये और उन्हें सत्यवतीको सौंपकर शीघ्रतापूर्वक ज्योतिर्विदों तथा वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलाकर उनसे विवाहका शुभ मुहूर्त पूछा॥ ३३—३४॥
कृत्वा विवाहसम्भारं यदा वै भ्रातरं निजम्।<br>विचित्रवीर्यं धर्मिष्ठं विवाहयति ता यदा॥ ३५<br>तदा ज्येष्ठाप्युवाचेदं कन्यका जाह्नवीसूतम्।<br>लज्जमानासितापाङ्गी तिसृणां चारुलोचना॥ ३६<br>गङ्गापुत्र कुरुश्रेष्ठ धर्मज्ञ कुलदीपक।<br>मया स्वयंवरे शाल्वो वृतोऽस्ति मनसा नृपः॥ ३७<br>वृताहं तेन राज्ञा वै चित्ते प्रेमसमाकुले।<br>यथायोग्यं कुरुष्वाद्य कुलस्यास्य परन्तप॥ ३८<br>तेनाहं वृतपूर्वाऽस्मि त्वं च धर्मभृतां वरः।<br>बलवानसि गाङ्गेय यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३९विवाहकी तैयारी करके अपने छोटे भाई धर्मात्मा विचित्रवीर्यके साथ उन कन्याओंका विवाह करनेको जब भीष्म उद्यत हुए तब उन तीनोंमें सबसे बड़ी एवं सुन्दर नेत्रोंवाली कन्याने गंगापुत्र भीष्मसे लज्जित होते हुए इस प्रकार प्रार्थना की। हे गंगापुत्र! हे कुरुश्रेष्ठ! हे धर्मज्ञ! हे कुलदीपक! मैंने स्वयंवरमें मन-ही-मन राजा शाल्वका पतिरूपमें वरण कर लिया था। उन राजाने भी प्रेमपूर्वक हृदयसे मुझे अपनी पत्नी मान लिया था। हे परन्तप! अब आप इस कुलकी परम्पराके अनुसार जैसा उचित हो, वैसा कीजिये। उन्होंने पहलेसे ही मुझे वरण कर लिया है। हे गांगेय! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा बलवान् हैं; आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये॥ ३५—३९॥
सूत उवाच<br>एवमुक्तस्तया तत्र कन्यया कुरुनन्दनः।<br>अपृच्छद् ब्राह्मणान्वृद्धान्मातरं सचिवांस्तथा॥ ४०सूतजी बोले— इस प्रकार उस कन्याके कहनेपर कुरुनन्दन भीष्मजीने कुलवृद्धों, ब्राह्मणों, माता सत्यवती तथा मन्त्रियोंसे इस विषयमें परामर्श

| १७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वेषां मतमाज्ञाय गाङ्गेयो धर्मवित्तमः।<br>गच्छेति कन्यकां प्राह यथारुचि वरानने॥ ४१किया। सबकी अनुमति प्राप्त करके धर्मज्ञ गङ्गापुत्रने उस कन्यासे कहा—हे वरानने! तुम स्वेच्छापूर्वक जा सकती हो॥ ४०-४१॥
विसर्जिताथ सा तेन गता शाल्वनिकेतनम्।<br>उवाच तं वरारोहा राजानं मनसेप्सितम्॥ ४२<br><br>विनिर्मुक्तास्मि भीष्मेण त्वन्मनस्केति धर्मतः।<br>आगतास्मि महाराज गृहाणाद्य करं मम॥ ४३<br><br>धर्मपत्नी तवात्यन्तं भवामि नृपसत्तम।<br>चिन्तितोऽसि मया पूर्वं त्वयाहं नात्र संशयः॥ ४४भीष्मसे विदा होकर वह सुन्दरी कन्या राजा शाल्वके घर गयी और अपने मनकी अभीष्ट बात उनसे कहने लगी—हे महाराज! आपके प्रति आसक्तचित्त जानकर भीष्मने मुझे धर्मपूर्वक मुक्त कर दिया है। अब मैं आ गयी हूँ; आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये। मैं आपकी पूर्णरूपसे धर्मपत्नी होऊँगी; मैंने पूर्वमें आपको चाहा है और आपने मुझे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४२–४४॥
शाल्व उवाच<br>गृहीता त्वं वरारोहे भीष्मेण पश्यतो मम।<br>रथे संस्थापिता तेन न ग्रहीष्ये करं तव॥ ४५<br><br>परोच्छिष्टां च कः कन्यां गृह्णाति मतिमान्नरः।<br>अतोऽहं न ग्रहीष्यामि त्यक्तां भीष्मेण मातृवत्॥ ४६शाल्वने कहा— हे सुन्दरि! मेरे देखते-देखते भीष्मने तुम्हें पकड़ा और अपने रथपर बैठा लिया था, अतः अब मैं तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं कर सकता। कौन बुद्धिमान् मनुष्य दूसरेके द्वारा उच्छिष्ट कन्याको स्वीकार करेगा? अतः भीष्मके द्वारा मातृभावनासे भी त्यागी गयी तुम्हें मैं स्वीकार नहीं करूँगा॥ ४५-४६॥
रुदती विलपन्ती सा त्यक्ता तेन महात्मना।<br>पुनर्भीष्मं समागत्य रुदती चेदमब्रवीत्॥ ४७<br><br>शाल्वो मुक्तां त्वया वीर न गृह्णाति गृहाण माम्।<br>धर्मज्ञोऽसि महाभाग मरिष्याम्यन्यथा ह्यहम्॥ ४८महात्मा शाल्वने रोती तथा विलाप करती उस कन्याका त्याग कर दिया और वह पुनः भीष्मके यहाँ आकर रोती हुई इस प्रकार कहने लगी—हे वीर! आपके त्याग देनेके कारण शाल्व भी मुझे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हे महाभाग! आप धर्मज्ञ हैं, इसलिये आप मुझे स्वीकार कीजिये, अन्यथा मैं प्राण दे दूँगी॥ ४७-४८॥
भीष्म उवाच<br>अन्यचित्तां कथं त्वां वै गृह्णामि वरवर्णिनि।<br>पितरं स्वं वरारोहे व्रज शीघ्रं निराकुला॥ ४९भीष्म बोले— हे वरवर्णिनि! तुम दूसरेपर आसक्त चित्तवाली हो, अतः मैं तुम्हें कैसे स्वीकार करूँ? हे वरारोहे! अब तुम चिन्ता त्यागकर शीघ्र अपने पिताके पास चली जाओ॥ ४९॥
तथोक्ता सा तु भीष्मेण जगाम वनमेव हि।<br>तपश्चकार विजने तीर्थे परमपावने॥ ५०भीष्मके ऐसा कहनेपर वह [अपने पिताके घर न जाकर] वनमें चली गयी और वहाँ किसी निर्जन एवं परम पवित्र तीर्थमें तप करने लगी॥ ५०॥
द्वे भार्ये चातिरूपाढ्ये तस्य राज्ञो बभूवतुः।<br>अम्बालिका चाम्बिका च काशिराजसुते शुभे॥ ५१काशिराजकी अन्य दो रूपवती तथा कल्याणमयी कन्याएँ अम्बिका एवं अम्बालिका विचित्रवीर्यकी रानियाँ बन गयीं॥ ५१॥
राजा विचित्रवीर्योऽसौ ताभ्यां सह महाबलः।<br>रेमे नानाविहारैश्च गृहे चोपवने तथा॥ ५२महाबली राजा विचित्रवीर्य भी उन दोनोंके साथ कभी राजभवनमें और कभी उपवनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे॥ ५२॥

अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५

अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५


| वर्षाणि नव राजेन्द्रः कुर्वन् क्रीडां मनोरमाम्।<br>प्रापासौ मरणं भूयो गृहीतो राजयक्ष्मणा ॥ ५३ | इस प्रकार पूरे नौ वर्षतक मनोहर क्रीड़ा करते हुए राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मारोगसे ग्रसित हो गये और अन्तमें मृत्युको प्राप्त हुए ॥ ५३ ॥ | | मृते पुत्रेऽतिदुःखार्ता जाता सत्यवती तदा।<br>कारयामास पुत्रस्य प्रेतकार्याणि मन्त्रिभिः ॥ ५४ | उस समय पुत्रके मर जानेपर माता सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने मन्त्रियोंद्वारा पुत्रके सभी प्रेतकर्म सम्पन्न कराये ॥ ५४ ॥ | | भीष्ममाह तदैकान्ते वचनं चातिदुःखिता।<br>राज्यं कुरु महाभाग पितुस्ते शन्तनोः सुत ॥ ५५<br><br>भ्रातृभार्यां गृहाण त्वं वंशञ्च परिरक्षय।<br>यथा न नाशमायाति ययातेर्वंश इत्युत ॥ ५६ | तत्पश्चात् एक दिन अत्यन्त दुःखी होकर सत्यवतीने भीष्मसे एकान्तमें कहा—हे महाभाग! हे पुत्र! अब तुम अपने पिता शन्तनुका राज्य सम्भालो और अपनी भ्रातृजायाको स्वीकार करो और अपने वंशकी रक्षा करो, जिससे महाराज ययातिका वंश नष्ट न हो जाय ॥ ५५-५६ ॥ | | भीष्म उवाच<br>प्रतिज्ञा मे श्रुता मातः पित्रर्थे या मया कृता।<br>नाहं राज्यं करिष्यामि न चाहं दारसंग्रहम् ॥ ५७ | भीष्म बोले—हे माता! अपने पिताजीके लिये मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे तो आप सुन चुकी हैं। अतः मैं न तो राज्य ग्रहण करूँगा और न तो विवाह ही करूँगा ॥ ५७ ॥ | | सूत उवाच<br>तदा चिन्तातुरा जाता कथं वंशो भवेदिति।<br>नालसाद्धि सुखं मह्यं समुत्पन्ने ह्यराजके ॥ ५८ | सूतजी बोले—तब सत्यवती चिन्तित हो गयीं कि अब वंश कैसे चलेगा ? अपने कर्तव्यके प्रति यदि मैं उदासीन रहूँ तो अराजकताके व्याप्त होनेपर मुझे सुख कैसे प्राप्त होगा ? ॥ ५८ ॥ | | गाङ्गेयस्तामुवाचेदं मा चिन्तां कुरु भामिनि।<br>पुत्रं विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रजं चोपपादय ॥ ५९<br><br>कुलीनं द्विजमाहूय वध्वा सह नियोजय।<br>नात्र दोषोऽस्ति वेदेऽपि कुलरक्षाविधौ किल ॥ ६०<br><br>पौत्रं चैवं समुत्पाद्य राज्यं देहि शुचिस्मिते।<br>अहं च पालयिष्यामि तस्य शासनमेव हि ॥ ६१ | [इस प्रकार माताको चिन्तित देखकर] भीष्मने उनसे कहा—हे भामिनि! आप चिन्ता न करें। विचित्रवीर्यकी पत्नीके गर्भसे क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न कराइये। किसी कुलीन विद्वान् ब्राह्मणको बुलाकर वधूके साथ नियोग कराइये। इसमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि वंशरक्षाका विधान वेदमें भी है। हे प्रसन्नवदने! इस प्रकार पौत्र उत्पन्न कराकर आप उसीको राज्य सौंप दीजिये, मैं उसके राज्यशासनका सम्यक् संरक्षण करता रहूँगा ॥ ५९—६१ ॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कानीनं स्वसुतं मुनिम्।<br>जगाम मनसा व्यासं द्वैपायनमकल्मषम् ॥ ६२ | भीष्मकी वह बात सुनकर सत्यवतीने अपनी कुमारी अवस्थामें उत्पन्न अपने निर्दोष पुत्र द्वैपायन व्यासमुनिका स्मरण किया ॥ ६२ ॥ | | स्मृतमात्रस्ततो व्यास आजगाम स तापसः।<br>कृत्वा प्रणामं मात्रेऽथ संस्थितो दीप्तिमान्मुनिः ॥ ६३ | स्मरण करते ही तपस्वी व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और माताको प्रणाम करके वे तेजस्वी मुनि सामने खड़े हो गये ॥ ६३ ॥ |

१७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
भीष्मेण पूजितः कामं सत्यवत्या च मानितः।<br>तस्थौ तत्र महातेजा विधूमोऽग्निरिवापरः॥ ६४भीष्मने उनकी भलीभाँति पूजा की और माता सत्यवतीने भी आदर किया। उस समय महातेजस्वी व्यासजी वहाँ इस प्रकार सुशोभित हुए मानो धूमरहित साक्षात् दूसरे अग्निदेव ही हों॥ ६४॥
तमुवाच मुनिं माता पुत्रमुत्पादयाधुना।<br>क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य सुन्दरं तव वीर्यजम्॥ ६५माता सत्यवतीने व्यासमुनिसे कहा—इस समय तुम विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें अपने तेजसे सुन्दर पुत्र उत्पन्न करो॥ ६५॥
व्यासः श्रुत्वा वचो मातुराप्तवाक्यममन्यत।<br>ओमित्युक्त्वा स्थितस्तत्र ऋतुकालमचिन्तयत्॥ ६६माताका वचन सुनकर व्यासजीने उसे आप्तवाक्य माना और ‘ठीक है’—कहकर वे वहींपर ठहर गये और ऋतुकालकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ६६॥
अम्बिका च यदा स्नाता नारी ऋतुमती तदा।<br>सङ्गं प्राप्य मुनेः पुत्रमसूतान्धं महाबलम्॥ ६७<br><br>जन्मान्धं च सुतं वीक्ष्य दुःखिता सत्यवत्यपि।<br>द्वितीयां च वधूमाह पुत्रमुत्पादयाशु वै॥ ६८जब अम्बिका ऋतुमती होकर स्नान कर चुकी तब उसने मुनि व्यासजीके तेजसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जो महाबली और जन्मान्ध था। उस बालकको जन्मान्ध देखकर सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ। तब उन्होंने दूसरी वधू अम्बालिका से कहा कि तुम भी शीघ्र एक पुत्र उत्पन्न करो॥ ६७-६८॥
ऋतुकालेऽथ सम्प्राप्ते व्यासेन सह सङ्गता।<br>तथा चाम्बालिका रात्रौ गर्भं नारी दधार सा॥ ६९<br><br>सोऽपि पाण्डुः सुतो जातो राज्ययोग्यो न सम्मतः।<br>पुत्रार्थं प्रेरयामास वर्षान्ते च पुनर्वधूम्॥ ७०<br><br>आहूय च ततो व्यासं सम्प्रार्थ्य मुनिसत्तमम्।<br>प्रेषयामास रात्रौ सा शयनागारमुत्तमम्॥ ७१<br><br>न गता च वधूस्तत्र प्रेष्या सम्प्रेषिता तया।<br>तस्यां च विदुरो जातो दास्यां धर्मांशतः शुभः॥ ७२ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उस अम्बालिकाने व्यासजीसे गर्भ धारण किया। उससे उत्पन्न पुत्र भी पाण्डुरोगसे ग्रसित होनेके कारण राजा होनेके योग्य नहीं था। इसलिये माताने वधू अम्बालिकाको एक वर्षके बाद पुनः एक पुत्रके लिये प्रेरित किया। माता सत्यवतीने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीका आह्वानकर उनसे इसके लिये प्रार्थना की, परंतु उसने स्वयं न जाकर अपनी दासीको भेज दिया। उस दासीके गर्भसे धर्मके अंशसे युक्त शुभ विदुर उत्पन्न हुए॥ ६९—७२॥
एवं व्यासेन ते पुत्रा धृतराष्ट्रादयस्त्रयः।<br>उत्पादिता महावीरा वंशरक्षणहेतवे॥ ७३<br><br>एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्य वंशसमुद्भवम्।<br>व्यासेन रक्षितो वंशो भ्रातृधर्मविदानघाः॥ ७४इस प्रकार वंशकी रक्षाके लिये व्यासजीने धृतराष्ट्र आदि तीन महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। भ्रातृ-धर्मको जाननेवाले व्यासजीने ऐसा करके वंशकी रक्षा की। हे पुण्यात्मा मुनिजनो! इस प्रकार उनकी वंशोत्पत्तिसे सम्बन्धित समस्त कथानक मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ७३-७४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे धृतराष्ट्रादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥


॥ प्रथमः स्कन्धः समाप्तः॥


श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

द्वितीयः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

ब्राह्मणके शापसे अद्रिका अप्सराका मछली होना और उससे राजा मत्स्य तथा मत्स्यगन्धाकी उत्पत्ति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>आश्चर्यकरमेतत्ते वचनं गर्भहेतुकम्।<br>सन्देहोऽत्र समुत्पन्नः सर्वेषां नस्तपस्विनाम्॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] आपकी यह बात आश्चर्यजनक एवं रहस्यपूर्ण है। इस सम्बन्धमें हम सब तपस्वियोंको महान् सन्देह उत्पन्न हो गया है॥ १॥
माता व्यासस्य मेधाविन्नाम्ना सत्यवतीति च।<br>विवाहिता पुरा ज्ञाता राज्ञा शन्तनुना यथा॥ २<br><br>तस्याः पुत्रः कथं व्यासः सती स्वभवने स्थिता।<br>ईदृशी सा कथं राज्ञा पुनः शन्तनुना वृता॥ ३<br><br>तस्यां पुत्रावुभौ जातौ तत्त्वं कथय सुव्रत।<br>विस्तरेण महाभाग कथां परमपावनीम्॥ ४<br><br>उत्पत्तिं वद व्यासस्य सत्यवत्यास्तथा पुनः।<br>श्रोतुकामाः पुनः सर्वे ऋषयः संशितव्रताः॥ ५हे मेधाविन्! पूर्वकालमें सत्यवती नामसे विख्यात व्यासजीकी माताका राजा शन्तनुके साथ जिस प्रकार विवाह हुआ, उन सतीके अपने घरमें रहते हुए भी उनसे पुत्ररूपमें व्यास कैसे उत्पन्न हुए, ऐसी सत्यवतीका शन्तनुने पुनः वरण कैसे किया और उनसे दो पुत्रोंकी उत्पत्ति कैसे हुई? हे सुव्रत! हे महाभाग! आप इस परम पावन कथाको विस्तारपूर्वक कहिये। आप व्यासजी तथा सत्यवतीकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये; हम सभी व्रतधारी ऋषि इस विषयमें सुननेके लिये उत्सुक हैं॥ २–५॥
सूत उवाच<br>प्रणम्य परमां शक्तिं चतुर्वर्गप्रदायिनीम्।<br>आदिशक्तिं वदिष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम्॥ ६**सूतजी बोले—**मैं चतुर्वर्ग [धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष] प्रदान करनेवाली परमा आदिशक्तिको प्रणाम करके यह शुभ पौराणिक कथा कहूँगा॥ ६॥
यस्योच्चारणमात्रेण सिद्धिर्भवति शाश्वती।<br>व्याजेनापि हि बीजस्य वाग्भवस्य विशेषतः॥ ७<br><br>सम्यक् सर्वात्मना सर्वैः सर्वकामार्थसिद्धये।<br>स्मर्तव्या सर्वथा देवी वाञ्छितार्थप्रदायिनी॥ ८जिनके विशिष्ट वाग्भव बीजमन्त्र (ऐं)-का किसी भी बहानेसे उच्चारण करते ही शाश्वती सिद्धि प्राप्त हो जाती है, उन इच्छित फल देनेवाली भगवतीका सभी लोगोंको अपनी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेके लिये समर्पण भावसे सम्यक् स्मरण करना चाहिये॥ ७-८॥
राजोपरिचरो नाम धार्मिकः सत्यसङ्गरः।<br>चेदिदेशपतिः श्रीमान् बभूव द्विजपूजकः॥ ९उपरिचर नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा, ब्राह्मणपूजक तथा श्रीमान् राजा हुए, जो चेदि